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Friday, May 12, 2017

जनसंख्या विस्फोट से सावधान

दुनिया की बढ़ती आबादी धरती पर एक ऐसा बोझ है जिस पर समय रहते अगर ध्यान नहीं दिया गयातो आने वाले कुछेक शतक के भीतर मानव जाति अपना वजूद ही खो देगी. दुनिया के बड़े देश यों तो इस बात से चिंतित हैंपर यह चिंता आर्थिक संसाधनों की लूट-खसोट के चक्कर में विकासशील और पिछड़े देशों तक अभी उस रूप में नहीं पहुंची हैजैसे पहुंचनी चाहिए.तथ्य यह है कि इस समय धरती पर जितनी आबादी है,अगर उसकी फिर से उपयोग में आ सकने वाली प्राकृतिक जरूरतोंजैसे स्वच्छ हवा और पीने योग्य पानीकी उपलब्धता को देखेंतो हमें आज की धरती से 1.7 गुना बड़ी धरती की जरूरत होगी. धरती से हरियाली खत्म हो रही हैआधुनिक संसाधन के बहुतायत प्रयोग से पर्यावरणीय चक्र पटरी से उतर गया है. तूफानअकाल,बारिशबाढ़ और बवंडर... ऐसे में बड़े देश तो जनसंख्या मसले को केवल पर्यावरण संरक्षा से जोड़ कर देख रहे हैं. उन्होंने आपस में कुछ समझौते किए हैं और 'पृथ्वी सम्मेलनकी मार्फत कुछ वैज्ञानिक समूहोंनेताओं और स्वयंसेवी संस्थाओं को अपने से जोड़ा हैजबकि यह समस्या इतनी भयावह गति से आगे बढ़ रही है कि बिना जनभागीदारी और चतुर्दिक समाधान सोचेइससे पार पाना मुश्किल है. 
धरती पर मानवीय जरूरतों के लिए प्राकृतिक संसाधनों और उनके पुनर्प्रयोग के अध्ययन से जुड़ी 'ग्लोबल फूटप्रिंट नेटवर्कनामक स्वयंसेवी संगठन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत में जनसंख्या की मांग और प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता का औसत दोगुने को पार कर चुका हैयानी भारत की तेज बढ़ती आबादी'दो भारतके संसाधनों को हर साल खा जा रही है. पर कब तकफिर यह मसला केवल पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के बंटवारे भर से तो जुड़ा नहीं है. समाज और राजनीति की भी अपनी भूमिका है. सबको शिक्षारोटीकपड़ामकानपीने योग्य पानी और स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराना आधुनिक लोकतंत्र में राज्य की बुनियादी जिम्मेदारी मानी जाती है. फिर सभ्य समाज या राष्ट्रों की अमीरी का पैमाना भी वहां के नागरिकों को मुहैया संसाधनों की उपलब्धता से ही आंका जाता है.ऐसे में बिना जनसंख्या पर काबू पाए हम किसी भी तरह के विकास पैमाने को छू सकेंगेइसमें शक है. देश की बढ़ती आबादी पर नियंत्रण पाने के लिए जनजागरुकता अभियान में जुटी स्वयंसेवी संस्था 'टैक्सपेयर्स एसोसिएशन ऑफ भारत'  इस बाबत राष्ट्रीय कानून बनाने की मांग कर रहा है. इस संस्था का मानना है कि भारत में जिस तेज गति से आबादी बढ़ रही हैवह अब जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने वाले 'राष्ट्रीय कानूनके बिना नहीं थमेगी.
संस्था ने इस विचार का समर्थन करने वालों को एकजुट करने के लिए  'भारत फॉर पॉपुलेशन लॉके नाम से एक ऑन लाइन अभियान भी चला रखा है. इस समूह का मानना है कि भारत की आबादी इतनी तेजी से बढ़ रही है कि यह आर्थिक विकास के लाभों को बेकार कर रही है.यह संस्था आंकड़ों से अपनी बात साबित करती है. संस्था का दावा है कि आजादी के बाद देश की आबादी चार गुना बढ़ गई है. आजादी के समय की 36करोड़ आबादी वाला देश 132 करोड़ का हो गया है: अनुमान है कि भारत की जनसंख्या 1.2% की वार्षिक दर से बढ़ेगी और 2050 में 199 करोड़ पहुंच जाएगी. संस्था की भविष्यवाणी है कि देश की प्रजनन दर - प्रति महिला बच्चों की संख्या - 2050 में 2.45 हो जाएगी. अपनी आबादी में इस तरह की वृद्धि के साथदुनिया की आबादी में भारत का हिस्सा वर्तमान में 17% से बढ़कर 2050 में 20% हो जाएगा. 
हालांकि कुछ जानकार संस्था के इस दावे से इत्तिफाक नहीं रखते पर भारत की दस साला जनगणना रिपोर्टों को देखने पर इस बात से नकारा नहीं जा सकता कि कर दाता समूह की भविष्यवाणियां कई मामलों में सटीक साबित हुई हैं. यह सच है कि आजादी के बाद देश की आबादी चौगुनी हो गई हैपर तमाम दावों के बावजूद विकास दर में गिरावट आई है. आजादी के पहले दशक में जनसंख्या लगभग 21% बढ़ीपर 1961 और 1971के बीच इसमें 24.8% की वृद्धि हुई. 
इसकी तुलना में अगर विकास दर को देखें तो वह 1971 और 1981 के बीच भले ही समान रही होलेकिन उसके बाद हर दशक में उत्तरोत्तर गिरावट आई. 1981 और 1991 के बीच जहां आबादी में 23.87% की वृद्धि हुईवहीं 1991-2001 के दौरान विकास दर घटकर 21.54% हो गई. पिछली जनगणना ने अनुमान लगाया कि2001 और 2011 के बीच आबादी 17.7% बढ़ गई. यह क्रम अभी भी जारी है.कहने के लिए आबादी की बढ़ोत्तरी से जुड़े कारकों पर काबू पा लिया गया हैपर क्या वाकई ऐसा हैशिक्षाशिशु मृत्यु दरप्रारंभिक विवाह के मोरचे पर भले ही सरकार ने बढ़त पा ली होपर आरक्षण और सब्सिडी की बैसाखी से सारे संतुलन गड़बड़ा रहे हैं. फिर हम तो संयुक्त अरब अमीरात की तरह अमीर भी नहींजिसने आने वाली ढाई सदी बाद की पानी की समस्या से उबरने के लिए 8,800 किलोमीटर दूर अंटाकर्टिक से आईसबर्ग मंगवाकर अपनी प्यास बुझाने की परियोजना पर अभी से काम शुरू कर दिया है.हम तो इस भी लायक नहीं कि भौतिक विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग की हालिया डॉक्युमेंटरी में की गई भविष्यवाणीकि अगर आबादी की बढ़ती रफ्तार को नहीं रोका गया तो आने वाले सौ सालों के भीतर मानव जाति को अपना वजूद बचाने के लिए किसी दूसरे ग्रह की तरफ रुख करना होगापर अमल कर सकें. वैसे भी मौजूदा तकनीक में ख्ररबों अरब डॉलर खर्च करने के बावजूद सबसे नजदीकी ग्रह मंगल पर भी बस कर वहां के वायुमंडल में सांस लेने में एक लाख साल लगेंगे. सिलिंडर के साथ वहां निवास का मौका हो सकता हैपर बेहद अमीरों के अलावा इसे कोई दूसरा अफोर्ड करना तो दूरसोच भी नहीं सकेगा. जाहिर हैजनसंख्या नियंत्रण के कड़े कानून के अलावा हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है.

Saturday, May 6, 2017

‘मेघदूत’ पर नाहक विवाद को हवा

समय- समय पर अनेक वादों और आदर्शों ने उम्मीदें दी थीं। जिन पर ठिठुरते हुए हमने अपने हाथों को सेंका था, आज उनके कोयले मद्धिम हो चले हैं। सिर्फ राख बची रही गई है जो फूंक मारने से कभी दायीं ओर जाती है, कभी बाईं ओर। जिस दिशा में जाती है, हम उस तरफ भागते हुए कभी दक्षिणपंथी हो लेते हैं, कभी वामपंथी लेकिन राख-राख है, उसके पीछे अधिक दूर तक नहीं भागा जा सकता। आखिर में अपने पास लौटना पड़ता है।हिंदी के मूर्धन्य लेखक निर्मल वर्मा की ये बातें कब कही गईं थी, उसका काल ठीक से याद नहीं पड़ता लेकिन इस वक्त भी उनकी कही बातें एकदम सटीक मालूम पड़ती हैं। जब ठिठुरते हुए हाथ सेंके जा रहे थे तो उन कोयलों का रंग लाल होता था, जो मद्धिम पड़ा और फिर अब जब राख बनकर हवा में उड़ रहा है तब कभी कभार ऐसा होता है कि वो राख आपकी आंखों में पड़ जाए और आपको तकलीफ दे। आंखों में राख पड़ने से कोई नुकसान नहीं होता है लेकिन वो कुछ समय के लिए काफी तकलीफदेह होता है। अभी हाल ही में संगीत नाटक अकादमी में इस तरह की राख उड़ी थी जो अकादमी के चेयरमैन शेखर सेन की आंखों में जा पड़ी और उसने उनको तात्कालिक रूप से तकलीफ पहुंचाई। दरअसल हुआ यह कि संगीत नाटक अकादमी ने एक इब्राहिम अल्काजी की याद में एक कार्यक्रम का आयोजन किया। जब कार्ड का ड्राफ्ट तैयार होकर आया तो उसको मीडिया में लीक कर दिया गया। लीक किए कार्ड से भ्रम फैला कि दिल्ली के रवीन्द्र भवन स्थित मेघदूत थिएटर का नाम बदलकर इब्राहिम अल्काजी ने नाम पर किया जा रहा है। उस कार्ड के आधार पर सोशल मीडिया से लेकर अखबारों आदि में शोरगुल मचना शुरू हो गया। संगीत नाटक अकादमी के चेयरमैन शेखर सेन की घेरबंदी शुरू हो गई। शेखर सेन पर इस बात को लेकर हमले शुरू हो गए कि वो इब्राहिम अल्काजी को कालिदास से अहम मानते हैं। अजीब अजीब से तर्क गढ़े जाने लगे। बैगर तथ्यों को जाने समझे शोर मचाने की ये एक ऐसी मिसाल है जिसपर कला-संस्कृति जगत से जुड़े लोगों को गंभीरता से विचार करना चाहिए। जब शोरगुल ज्यादा बढ़ा तो थिएटर से गहरे जुड़ी वाणी त्रिपाठी ने विस्तार से लेख लिखकर भ्रम के इस जाले को साफ किया। वाणी ने अपने लेख में मेघदूत थिएटर की ऐतिहासिकता और इब्राहिम अल्काजी के थिएटर के योगदान को रेखांकित किया। वाणी ने इस बात को भी साफ किया कि रवीन्द्र भवन के परिसर के इस खुले रंगमंच का नामकरण अल्काजी ने ही किया था । वाणी त्रिपाठी के लेख के बाद इस पूरे विवाद पर से जाला हटना शुरू हो गया। फिर संगीत नाटक अकादमी की तरफ से भी इस पूरे विवाद पर चेयरमैन शेखर सेन अपनी सफाई पेश की। अगर हम समग्रता में विचार करें तो संगीत नाटक अकादमी से जुड़े पुराने लोगों ने विवाद उठाने की गरज से नए सिरे से काम करना शुरू किया है। उन्होंने गलत बातों को फैलाकर विवाद की आंधी खड़ा करने की कोशिशें शुरू कर दी है। लेकिन पंखे की हवा से बनाई गई कृत्रिम आंधी का कोई असर नहीं होता है। फिर वामपंथ के अनुयायी लेखकों-कलाकारों- संस्कृतिकर्मियों का एक ऐसा संगठित तंत्र है जहां किसी भी बात को या तथ्य को अपनी सुविधा के हिसाब से फैलाकर जनमानस को प्रभावित या भ्रमित करने की कोशिश होती है। कितनी सफलता मिलती है इसका आंकलन होना शेष है। वामपंथी गणेश जी देशभर में दूध पिलाने की घटना को आरएसएस से जोड़कर उनके अफवाह तंत्र को निशाने पर लेते रहे हैं। लेकिन खुद वामपंथियों का अफवाह तंत्र बेहद मजबूत है और वो जब चाहें, जैसे चाहें किसी को भी नाम दिला दें, बदनाम कर दें। पुरस्कार दिला दें या तिरस्कृत कर दें। अपनी इस ताकत के बूते पर वो परसेप्शन की लड़ाई भी लड़ते रहे हैं, अब भी लड़ रहे हैं। गंभीर विषयों की चाशनी में दरअसल वो अपनी विचारधारा को मार्ग प्रशस्त कर रहे होते हैं।    
दरअसल साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़ी अकादमियों और संस्थानों पर भले ही दो हजार चौदह में सरकार बदलने के बाद से पुरानी व्यवस्था में बदलाव कर दिए गए हो लेकिन यह बदलाव शीर्ष स्तर पर हुए हैं। चेयरमैन, अध्यक्ष आदि की भले ही नियुक्ति हो गई लेकिन उनको काम करने के लिए पर्याप्त कर्मचारी आदि नहीं दिए गए हैं। अभी तो इन संस्थानों के मुखिया को अपने कर्माचरियों के लिए ही मंत्रालय से संघर्ष करना पड़ रहा है, वो नया करने की सोचने की हालत में ही नहीं है। कलाकारों को इन संस्थाओं का अगुआ बनाकर अच्छी पहल की गई है लेकिन इन कलाकारों के साथ एक कुशल प्रशासक की नियुक्ति भी आवश्यक है। कुशल प्रशासक इस वजह से कि सालों से जड़ जमाए बैठी विचारधारा को अगर चुनौती देनी है तो पहले इस व्यवस्था को चुनौती देनी होगी । इसके अलावा जो लोग इन संस्थानों के कार्यकारी परिषद आदि में मनोनीत किए गए हैं वो पुरानी व्यवस्था को बदलना तो चाहते हैं लेकिन कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते हैं, किसी तरह के विवाद में पड़े बगैर शांति से संस्था को चलाने की कोशिश हो रही है। जबकि जरूरत इस बात की है कि सालों से जंग खाई व्यवस्था को एक बारगी तो जोरदार तरीके से हिलाने की जरूरत है। यहां इस बात की परवाह भी छोड़नी होगी कि विरोधी खेमे के लोग क्या कहेंगे। अगर विरोधियों की चिंता की गई तो बदलाव के नतीजों में संदेह है। दिल्ली के सांस्कृतिक गलियारे में इस बात की काफी चर्चा है कि नेशनल गैलरी ऑफ मॉर्डन आर्ट की पुरानी समिति ने दो हजार बीस तक के कार्यक्रमों को तय कर दिया है । अब अगर दो हजार बीस तक का संस्था का काम तय है तो नेशनल गैलरी ऑफ मॉर्डन आर्ट जो नए डायरेक्टर जनरल नियुक्त किए गए हैं वो क्या करेंगे । उन उड़ती हुई राख को बैठकर उड़ाते रहेंगे? क्योंकि इनके करने के बहुत कुछ तो है नहीं । यह सिर्फ नेशनल गैलरी ऑफ मॉर्डन आर्ट की स्थिति नहीं है। मंत्रालय में बैठे कुछ अधिकारी भी नई सरकार के नामित इन संस्थाओं के मुखिया की राह आसान बनाने की बजाए उसपर कांटे बिछाते रहते हैं। लालफीताशाही के फंदे में फंसाकर बदलाव को रोकना अफसरशाही के लिए काफी आसान होता भी है। लालफीताशाही से इन संस्थाओं को चलानेवाले इतने खफा हो गए थे कि उन्होंने दिल्ली में एक बैठक कर सामूहिक रूप से अपनी नाराजगी का इजहार किया था। उच्चस्तरीय दखल के बाद उसके बाद से संस्कृति मंत्रालय में काम को गति मिली थी। 
सवाल यह है कि इस सरकार पर सांस्कृतिक संस्थाओं पर कब्जे के आरोप भी लग रहे हैं, वामपंथियों का अफवाह तंत्र इसको फैलाने के लिए बेहद सक्रिय भी है और किसी भी बड़े छोटे मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहता है। बावजूद इस स्थिति के काम ज्यादातर वही हो रहे हैं जो पहले से तय कर दिए गए हैं। हद तो तब हो जाती है कि इन्हीं संस्थाओं में से एक के खर्चे पर विदेश जाकर एक इतिहासकार भारत के प्रधानमंत्री और मौजूदा सरकार को कठघरे में खड़ा कर देती हैं, अपनी ही देश की चुनी हुई सरकार को फासिस्ट आदि कह देती हैं। दरअसल यह तब होता है जब आपको अपने बौद्धिक सामर्थ्य पर भरोसा होता है लेकिन जब आप विचारधारा वाले तर्क पेश करते हैं तो वो अंधविश्वास के रूप में सामने आता है। विचारधारा की इस लड़ाई में वामपंथ के योद्धा हर तरह के हथियार से लैस हैं। पस्त जरूर हैं, लेकिन उनके अंदर इतनी ताकत तो शेष बची है कि वो किसी को भी शक के घेरे में खड़ा कर देने के लिए काफी है। किसी भी कार्यक्रम को वादित कर सकते हैं। उनसे वैचारिक रूप से लड़ा जा सकता है लेकिन वैचारिक लड़ाई में वो जिस तरह के गैर वैचारिक औजारों का इस्तेमाल करते हैं उनसे निबटने के लिए यह आवश्यक है कि सामने वाले भी उसको भांपकर अपनी तैयारी करें। संगीत नाटक अकादमी में ङी अगर वाणी त्रिपाठी ने मोर्चा नहीं संभाला होता तो उन्होंने अकादमी को बदनाम करने और शेखर सेन को लेकर एक भ्रम की ल्थिति तो बना ही दी थी। उनको एक तरीके से परंपरा और विरासत विरोधी बताने की महिम शुरू हो चुकी थी। अब भी वक्त है कि इस वैचारिक लड़ाई में अपने सामने वाले की चालों को समझा जाए और उनको निश्क्रिय करने के लिए उसी तरह की कोशिशें भी की जाएं । 

‘बादशाहत’ के 25 साल

पच्चीस साल का अंतराल बेहद लंबा होता है। इस लंबे अंतराल में जिंदगी उबड़-खाबड़ रास्तों से चलती हुई कई पड़ावों से गुजरती है। जिंदगी कई बार किस्मत से भी मुठभेड़ करती है। कहते हैं कि मुकद्दर के सिकंदर का किस्मत भी हर कदम पर साथ देती है। अस्सी के दशक में कई टीवी सीरियल्स में काम कर चुके शाहरुख खान भी ऐसे ही मुकद्दर के सिकंदर हैं। नब्बे के दशक की शुरुआत की बात रही होगी, जब एक तरफ देश में आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू हुआ था, उसी वक्त बॉलीवुड में भी बदलाव की बयार बहने लगी थी। फिल्मों में मार-धाड़ और हिंसा के दौर से दर्शक उबने लगे थे। तीन साल पहले आमिर खान ने कयामत से कयामत तक में मध्यवर्गीय परिवार के पापा के बड़े अरमानों का प्रतिनिधित्व किया था। युवा प्यार का भी चित्रण हुआ था। 
यह वही दौर था जब अजय देवगन (फूल और कांटे) अरमान कोहली (दुश्मन जमाना) सैफ अली खान(पहचान) अयूब खान(माशूक)के अलावा आमिर भी कयामत से कयामत तक की सफलता के बाद कई फ्लाप फिल्मों देने के बाद दिल और दिल है कि मानता नहीं के साथ वापसी कर रहे थे।
इस दौर में शाहरुख खान फिल्मों के लिए स्ट्रगल कर रहे थे लेकिन टीवी सीरियल्स उनको खूब शोहरत दिलवा चुकी थी। दिल आशाना है में शाहरुख खान को भूमिका मिल चुकी थी लेकिन किस्मत के पिटारे में उनके लिए कुछ और भी था। गुड्डू धनोवा की फिल्म दीवाना को राज कंवर डायरेक्ट कर रहे थे। कहा जाता है कि दीवाना फिल्म के लिए पहली पसंद नागार्जुन थे लेकिन डेट की समस्या की वजह से वो इस फिल्म को नहीं कर सके। तय हुआ कि इस फिल्म में ऋषि कपूर, दिव्या भारती और अरमान कोहली काम करेंगे। उन्होंने काम शुरू भी कर दिया था । अरमान कोहली को फिल्म को लेकर कुछ आपत्तियां थी लेकिन जब उनकी आपत्तियों को नहीं माना गया तो उन्होंने फिल्म दीवाना छोड़ दी। फिल्मकारों ने उस रोल के लिए शाहरुख खान को साइन कर लिया। किस्मत ने शाहरुख खान की जिंदगी को एक और अहम मोड़ दिया। यहां भी एक बेहद दिलचस्प किस्सा है । शाहरुख ने पहली व्यावसायिक फिल्म किंग अंकल का महुरूत शॉट दिया था, दिल आशना है शाहरुख की पहली फिल्म थी लेकिन रिलीज पहले दीवाना हुई । इस तरह से फिल्म दीवाना को बॉलीवुड को एक नया सुपर स्टार देने का श्रेय हासिल हो गया। इस फिल्म में शाहरुख की एंट्री इंटरवल के बाद होती है। इस फिल्म की कहानी बेहद दिलचस्प थी और दर्शकों ने शाहरुख के रोल को खूब सराहा। फिल्म सुपरहिट रही। रोमांस शाहरुख खान के अभिनय का अभिन्न अंग बन गया। जब कैमरा भावविह्वल होकर उनके चेहरे के करीब जाता उनके और अभिनेत्री के होठों पर फोकस करता है और शाहरुख कहते हैं और पास..और पास तो दर्शकों की सांसे तो एकबारगी थम सी जाती हैं। सिनेमा हॉल में आसन्न किसिंग सीन को लेकर सीटियां नहीं गूंजती बल्कि दर्शक खामोश हो जाते हैं। क्योंकि रोमांस का ये बादशाह अभिनेत्री के होठों को चूमता नहीं बल्कि गाना गाने लगता। काजोल के साथ उनके रोमांटिक सीन लोकप्रिय होने लगे थे। अपने दोनों हाथ हवा में फैलाकर जब राहुल अपनी नायिका को आमंत्रित करता है या आलिंगबद्ध करता है तो दर्शकों की कामेच्छा अपने चरम पर पहुंचती है। दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे शाहरुख के करियर की एक ऐसी फिल्म थी जिसने उसके किरदार को अमर कर दिया। मुंबई के मराठा मंदिर में अपने रिलीज से लेकर अबतक वो फिल्म चल रही है। शाहरुख खान ने रोमांस के साथ कई प्रयोग किए। बगैर अश्लील हुए शाहरुख की फिल्में दर्शकों को अपनी ओर खींचती रही। आम भारतीय मध्यवर्गीय परिवार एक साथ बैठकर शाहरुख की फिल्में देखने लगा था। फिल्म कुछ कुछ होता है के अंत्याक्षरी वाले दृश्य में जब एक सिख बच्चा शाहरुख को आइ लव यू कहने में मदद करता है तो वो दृश्य किरदार को जीवंत कर देता है। भले ही फिल्म समीक्षकों को वो दृश्य पसंद ना आया हो लेकिन दर्शकों ने उसको हाथों हाथ लिया था।
शाहरुख खान के साथ किस्मत कदम से कदम मिलाकर चलती रही। बाजीगर के किरदार को सलमान खान ने ठुकराया तो वो शाहरुख को मिली और डर के हीरो की भूमिका करने से आमिर खान ने मना कर दिया तो वो फिल्म भी शाहरुख को मिली। इस बात को हमेशा शाहरुख मजाक में कहते भी रहे हैं कि आमिर खान के वो बेहद शुक्रगुजार हैं और यही कारण है कि जब भी वो कोई फिल्म ठुकराते हैं तो वो उसको कर लेते हैं जैसे स्वदेश। इसके बाद शाहरुख ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज जब उनकी पहली फिल्म की रिलीज के पच्चीस साल पूरे होने जा रहे हैं तब रोमांस के इस बादशाह के सफर पर नजर डालते हैं तो किस्मत के साथ साथ उनका गजब का आत्मविश्वास भी नजर आता है जिसको रेखांकित किया जाना जरूरी है। विवेक वासवानी ने जब शाहरुख खान को अपनी फिल्म में काम करने का प्रस्ताव दिया और पूछा कि क्या वो उनकी फिल्म देखना चाहेंगे। शाहरुख ने साफ मना कर दिया था । इस इंकार से विवेक वासवानी काफी प्रभावित हो गए थे और दोनों की दोस्ती की नींव भी वहीं से पड़ी थी। शाहरुख एक किस्सा बार बार सुनाते हैं कि जब वो पहली बार मुंबई आए थे तो पहला हफ्ता उनके लिए बेहद कठिन रहा था तब उन्होंने मरीन ड्राइव पर रोते हुए चिल्लाकर एक कसम खाई थी कि एक दिन इस शहर पर राज करेंगे। यह एक कलाकार का आत्मविश्वास था।

शाहरुख खान एक बेहतरीन अभिनेता तो हैं, साथ-साथ मार्केटिंग के दांव-पेंच को भी काफी सूक्षम्ता से ना केवल समझते हैं बल्कि उसका उपयोग अपनी फिल्मों को हिट करवाने के लिए भी करते हैं। शाहरुख पिछले पच्चीस सालों में कई विवादों में भी रहे लेकिन उनके साथ विवाद भी तभी खड़े होते हैं जब उनकी फिल्म आनेवाली होती है। कई लोग तो उनपर जानबूझकर विवाद खड़ा करने का आरोप भी जड़ते हैं। मैंने शाहरुख खान के साथ तीन शोज़ किए हैं और यह महसूस किया है कि वो अपने साथ काम करनेवालों को उसकी अहमियत का अंदाज करवाते रहते हैं और इस वजह से उनके साथ काम करनेवाले उनके लिए अपना सर्वेश्रेष्ठ देते हैं। 

बाल साहित्य की उपेक्षा क्यों?

स्कूलों में गर्मी की छुट्टियां होनेवाली हैं और बच्चों को महीने डेढ महीने के लिए भारी भरकम बस्तों से भी छुट्टी मिलनेवाली है। इंटरनेट और इलेक्ट्रानिक गेम के चलन के पहले इस दौर में बच्चों की कई पत्रिकाएं निकलती थी। जो इन दिनों को ध्यान में रखकर विशेषांक आदि प्रकाशित करते थे । हमें याद है कि उन दिनों में बच्चों के अभिभावक अखबार डालनेवालों या फिर पुस्तक विक्रेताओं के पास जाकर बच्चों की पत्रिकाओं की अग्रिम बुकिंग करवा कर आते थे ताकि उनके बच्चों को पत्रिका के अंक मि सकें। पहले टीवी पर कार्टून ने और फिर इंटरनेट और इलेक्ट्रानिक गेम ने बच्चों के सामने विकल्प बढ़ा दिए। इन माध्यमों के तेजी से लोकप्रिय होते जाने से बच्चों की पत्रिकाएं धीरे धीरे बंद होने लगीं। इंद्रजाल कॉमिक्स से लेकर अमर चित्र कथा तक का प्रकाशन बंद हो गया। अब तो हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि कम से कम हिंदी साहित्य जगत में बच्चों की भागीदारी बहुत ही कम, बल्कि यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उनकी भागीदारी नगण्य हो चुकी है। लेखकों की प्राथमिकता में बाल साहित्य रहा नहीं । अधिकतर लेखक बच्चों के लिए रचनाएं लिखने से कन्नी काटते हैं । इसके पीछे के मनोविज्ञान को समझने की जरूरत है। आखिक क्यों लेखक बास पाठकों के लिए नहीं लिखना चाहते हैं। चंद लेखकों को छोड़ दें तो हाल के दिनों में सामने आई नई पीढ़ी के कथित युवा लेखकों में तो बाल साहित्य के प्रति अनुराग तो दूर की बात रुचि का भी आभाव दिखाई देता है। लेखकों को यह समझना होगा कि अगर श्रेष्ठ बाल साहित्य उपलब्ध नहीं होगा तो फिर उनकी अन्य रचनाओं को पढ़ने वाले पाठक कहां से मिलेंगे । दरअसल बाल साहित्य से किसी भी भाषा के साहित्य के पाठक ना केवल संस्कारित होते हैं बल्कि उनमें पठने की रुचि पैदा होती है । हिंदी में बाल साहित्य का ये आभाव, हो सकता है, पाठकों की कमी की वजह रही हो।

लेखकों से इतर अगर प्रकाशन की दुनिया पर नजर डालें तो वहां भी बाल साहित्य के नाम पर लगभग सन्नाटा ही दिखाई देता है। मेरी नजर में तो कोई भी हिंदी का प्रकाशक योजनाबद्ध तरीके से बच्चों की छुट्टियों को ध्यान में रखकर बाल साहित्य छापने का उपक्रम नहीं करता है। इससे इतर अन्य भारतीय भाषाओं में बाल साहित्य की स्थिति बेहतर नजर आती है। यहां तक कि असमिया में भी बाल साहित्य को लेकर नए लेखक सृजनरत हैं। असमिया की युवा लेखिका रश्मि नारजेरी को बाल साहित्य के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसी तरह की स्थिति मलयालम और तमिल में भी देखी जा सकती है। फिर सवाल उठता है कि हिंदी के युवा लेखकों में बाल साहित्य के प्रति उपेक्षा का भाव क्यों है। दरअसल हिंदी साहित्य का जो पिछला करीब ढाई दशक का कालखंड है जो कुछ नारों और आंदोलनों के इर्द गिर्द के लेखन का काल है। चाहे वो स्त्री विमर्श हो, दलित लेखन हो या फिर फॉर्मूलाबद्ध वैचारिक लेखन हो। इन आंदोलनों और नारेबाजी के लेखन में बाल साहित्य कहीं सिसकी भर रहा है । गुलजार ने अवश्य बच्चों के लिए लगातार लिखा है और अब भी लिख रहे हैं । हिंदी साहित्य की मजबूती के लिए यह आवश्यक है कि युवा लेखक बाल साहित्य की प्रवृत्त हों और अपने भविष्य के पाठक तैयार करने की ही सोचकर बाल साहित्य की रचना करें। आवश्यक तो यह प्रकाशकों के लिए भी है वो बच्चों की कृतियों के लिए योजनाबद्ध तरीके से लेखकों से लिखवाने का उपक्रम करें।  

Friday, May 5, 2017

खेती पर कर पर भ्रम!

किसानों को आयकर के दायरे में लाने के प्रस्ताव पर केंद्र सरकार में भ्रम की स्थिति दिखाई देती है। पहले नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय ने आयोग की बैठक में पेश अपने मसौदे में टैक्स दायरे को बढ़ाने के लिए किसानों को खेती से होनेवाली आय पर टैक्स लगाने का सुझाव दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई नीति आयोग की इस बैठक में बिबेक देबरॉय ने तीन साल की कार्ययोजना को पेश करते समय कृषि से होनेवाली आय को आयकर के दायरे में लाने की वकालत की। बिबेक देबरॉय ने कहा था कि आयकर का दायरा बढ़ाने का यह एक तरीका हो सकता है। बिबेक ने तमाम तरह के आयकर कानूनों का हवाला देते हुए अपना पक्ष रखा था। नीति आयोग के विजन डॉक्यूमेंट में एक हेडर है- इनकम टैक्स ऑन एग्रिकल्चर इनकम जो कहता है कि अभी खेती से होनेवाली आय में हर तरह की ठूट मिली है चाहे किसानों को कितनी भी आय हो। जबकि कृषि से होनेवाली आय में छूट देने का उद्देश्य किसानों को संरक्षण देना था। कभी कभार इस छूट का बेजा इस्तेमाल भी होता है और खेती के अलावा अन्य आय को भी कृषि आय के रूप में दिखाकर टैक्स में छूट हासिल किया जाता है। काले धन की समस्या से निबटने के लिए इस तरह के चोर दरवाजों को बंद करना होगा। नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय के इस बयान के बाहर आते ही पूरे देश में हंगामा मच गया। किसानों का मुद्दा हमेशा से हमारे देश में संवेदनशील रहा है । कृषि से होनेवाली आय को आयकर के दायरे में लाने की खबर और उसके होनेवाले असर से केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी दोनों चौकन्नी हो गई।
केंद्र सरकार की तरफ से वित्त मंत्री अरुण जेटली ने स्वयं मोर्चा संभाला और साफ कर दिया कि सरकार का कृषि से होनेवाली आय को कर के दायरे में लाने का कोई इरादा नहीं है और बिबेक देबरॉय का प्रस्ताव उनकी निजी राय है। वित्त मंत्री ने तो यहां तक कह दिया कि कृषि पर टैक्स लगाना केंद्र सरकार के कार्यक्षेत्र में आता भी नहीं है । नीति आयोग ने भी बिबेक देबरॉय के मत से अपना पल्ला झाड़ लिया था। लेकिन वित्त मंत्री अरुण जेटली के बयान के अड़तालीस घंटे भी नहीं बीते थे कि केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने भी खेती पर टैक्स की बात कहकर सरकार को धर्मसंकट में डाल दिया । एक कार्यक्रम में अरविंद सुब्रह्मण्यम ने साफ किया कि सरकार को अमीर और गरीब किसान में भेद करना होगा । अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए अरविंद ने जोर देकर किसानों पर टैक्स लगाने के प्रस्ताव का समर्थन कर दिया। केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने वित्त मंत्री अरुण जेटली से अलग अपनी राय रखी और कहा कि केंद्र सरकार को इस तरह का टैक्स लगाने के लिए कोई पाबंदी नहीं है। अरविंद के मुताबिक कोई भी कानून राज्य सरकारों को कृषि आय पर कर लगाने से नहीं रोकता है । उन्होंने कहा, राज्यों के पास ऐसा करने के लिए पूरा अधिकार है। इसके बाद से इस बात पर चर्चा शुरू हो गई है।

दरअसल कृषि से होनेवाली आय को कर के दायरे में लाने की वकालत समय समय पर अर्थशास्त्री करते रहे हैं। कानूनी पेचीदगियों से लेकर आंकड़ों की बाजीगरी करके इस तरह के प्रस्तावों के समर्थन करनेवाले लोग भी सामने आकर खड़े हो जाते हैं । बिबेक देबरॉय और अरविंद के सुझावों को उसी आईने में देखा जाना चाहिए। प्रतीत होता है कि राजनीति की तरह ही इस मुद्दे को भी उछालकर या उछलवाकर देश का मूड टेस्ट किया जाता रहा है। इस देश में जहां अब भी किसान इंद्र देवता की कृपा पर हों, वहां उनपर इंकम टैक्स लगाने की सोचने से पहले देश के रहनुमाओं को उनकी बेहतरी के बारे में कोई ठोस कार्ययोजना का प्रस्ताव करना चाहिए। नीति आयोग टैक्स के दायरे को बढ़ाने और कालेधन को रोकने के लिए चोर दरवाजे को बंद करने की कवायद कर रहा है, यह अच्छी बात है लेकिन बजाए इसमें ठोस सुझाव आने के किसानों को टैक्स के दायरे में लपेटने का आसान रास्ता चुना गया। अगर सचमुच मंशा कालेधन के जेनरेशन पर रोक लगाने की है तो उसके लिए फॉर्मूला सोचना होगा। या फिर जो किसानों के नाम पर अपना काला धन सफेद कर रहे हैं उनपर शिकंजा कसने के लिए प्रस्ताव लाना चाहिए।
इस देश में जहां किसानों की आत्महत्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही हो वहां इस तरह के टैक्स का बोझ डालना उनकी मुसीबतों को बढ़ानेवाला ही होगा । राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के पिछले साल दिसंबर में जारी आंकड़ों के मुताबिक किसानों की आत्महत्या की दर तेजी से बढ़ी है और दो हजार पंद्रह में बारह हजार छह सौ से ज्यादा किसानों ने खुदकुशी की। सबसे ज्यादा खुदकुशी के केस महाराष्ट्र से आए। इस रिपोर्ट के मुताबिक किसानों और खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या की वजह कर्ज, कंगाली और खेती से जुड़ी दिक्कतें हैं। ऐसे माहौल में नीति आयोग को किसानों को राहत देने के प्रस्ताव पर विचार करना चाहिए। किसानों को छेड़ना केंद्र सरकार को महंगा पड़ सकता है।
रही बात काले धन को बढ़ावा देने की तो क्या नीति आयोग ने उद्योगपतियों की कारगुजारियों से होनेवाले कालेधन के जेनरेशन पर विचार किया ? अगर किया तो उसको इतनी ही प्रमुखता से प्रचारित क्यों नहीं किया? आयकर बढ़ाने के लिए खेती पर टैक्स की वकालत करनेवाले अर्थशास्त्रियों को उन उद्योगपतियों के बारे में विचार करना चाहिए जो बैंकों का करोड़ो रुपए दबाकर बैठे हैं ।विजय माल्या जैसे लोग करोड़ो का चूना लगाकर चंपत हो जाते हैं लेकिन एजेंसियां कुछ कर नहीं पातीं। एक अनुमान के मुताबिक भारत के बैकों का सवा लाख करोड़ रुपए का एनपीए है। बैंक के बड़े डिफॉल्टरों को तो सरकार से लेकर इंकम टैक्स विभाग और बैंक हर जगह से राहत मिलती है और करोडों की राशि को एनपीए यानि नॉन परफॉर्मिंग असेट में दिखाने का खेल खेला जाता है। क्या नीति आयोग को सरकार को यह हीं सुझाना चाहिए कि वो बैंकों के इन डिफाल्टरों से पैसे वसूली के लिए उनके अन्य कारोबार को भी जब्त कर ले या फिर किसी और तरीके से इसकी वसूली की जा सके।
भारत को इन मामलों में चीन से सीखना होगा। चीन ने अभी अपने यहां बैंकों की राशि समय पर नहीं चुकानेवालों पर डंडा चलाया है। चीन ने करीब साठ लाख लोगों को चिन्हित किया है जिन्होंने बैंकों का धन वक्त पर नहीं चुकाया है । ऐसे लोगों को विमान से यात्रा करने पर रोक लगा दी गई है । इसी तरह के करीब तेइस लाख लोगों को हाई स्पीड ट्रेन से चलने पर रोक लगा दी गई है। हमारे यहां तो बैकों का लाखों करोड़ रुपए डूबा हुआ है और जो लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं वो अलग अलग कंपनियों के खाते पर तमाम तरह की लक्जरी का उपभोग करते हैं । इसके अलावा रिजर्व बैंक विलफुल डिफाल्टर्स के नाम भी उजागर करने की इजाजत बैंकों को नहीं देता है। बैंक कर्मचारियों के एसोसिएशन इसकी मांग कर रहे हैं लेकिन रिजर्व बैंक इसके लिए तैयार नहीं दिख रहा है। ऐसी हालत में कृषि पर आय का प्रस्ताव किसानों के लिए मुसीबत बढ़ानेवाला तो होगा ही राजनीतिक तौर पर सत्ताधारी दल के लिए भी मुश्किलें लेकर आ सकता है। राजनीतिक बुद्धिमत्ता तो यही कहती है कि किसानों को ना छेडा जाए।       


सुपरस्टार का ब्रेकअप!

कहते हैं दबंग की मौजूदा प्रेमिका लूलिया वंतूर इन दिनों सलमान खान से बेहद नाराज है। पहले तो वो इस बात से खफा हो गई थीं कि सलमान खान उनको अपने साथ वर्ल्ड टूर पर नहीं ले गए। लूलिया की ख्वाहिश थी कि वो सलमान खान के ट्रूप के साथ ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे पर जाए और वहां फरफॉर्म भी करे जिसे सलमान ने मना कर दिया। इस दौरे में सलमान के साथ सोनाक्षी सिन्हा, बिपाशा बसु के अलावा उनके परिवार के कई सदस्य भी साथ थे। सलमान के इंकार से लूलिया इतनी खफा हो गई कि वो अल्वीरा की पार्टी में सलमान के घर नहीं गई। बॉलीवुड की खबरों के मुताबिक लूलिया इन दिनों सलमान से बेहद खफा चल रही हैं। दोनों के बीच के रिश्ते में खटास की कई वजहें मानी जा रही है। पहली तो वर्ल्ड टूर के बारे में हम बात कर ही चुके हैं दूसरे सलमान खान का एक बार फिर से कटरीना के करीब आने को लूलिया बर्दाश्त नहीं कर पा रही हैं । सलमान खान इन दिनों खुलकर अपनी पुरानी प्रेमिका कटरीना की ना सिर्फ तारीफ कर रहे हैं बल्कि उसको फिल्में आदि दिलवाने के लिए भी कोशिश कर रहे हैं। कुछ दिनों पहले सल्लू भाई ने अपनी एक्स महबूबा के लिए अदि चोपड़ा को फोन किया था और बताया जाता है कि सलमान ने आमिर खान के अपोजिट कटरीना को लेने का सुझाव दिया था। इस खबर के बाहर आते ही लूलिया सलमान खान पर बुरी तरह से भड़क गईं और दोनों के बीच की दूरियां बढ़ गईं। इसके पहले भी जब सलमान खान ने टाइगर जिंदा है के सेट से अपनी और कटरीना का फोटो ट्वीट किया था तब भी लूलिया ने इसको पुराने प्यार के बिरबे को हरा होने जैसा माना था।
सलमान और लूलिया के बीच बढ़ती दूरी को ट्यूबलाइट की पार्टी के दौरान भी वहां मौजूद लोगों ने महसूस किया। दरअसल कबीर खान और उनकी पत्नी मिनी माथुर ने ट्यूबलाइट फिल्म के लिए एक पार्टी आयोजित की थी । इस पार्टी के लिए सलमान खान और लूलिया दोनों अलग अलग गाड़ी में पहुंचे थे और पूरी पार्टी के दौरान दोनों एक दूसरे से खिंचे खिंचे से रहे थे। करीब घंटे भर रहने के बाद सलमान बेहद तनाव में उस पार्टी से निकल गए थे। सलमान खान के निकलने के काफी देर बार लूलिया उस पार्टी से निकली थी और बगैर फोटो आदि के लिए पोज़ दिए वहां से तीर की तरह निकल गई थी। दोनों के चेहरे साफ बता रहे थे कि मामला संगीन है और कम से कम सामान्य तो नहीं ही है। लूलिया इस बात को बर्दाश्त नहीं कर पा रही है कि सलमान और कटरीना दोनों एक बार फिर से करीब आ रहे हैं । कटरीना भी सार्वजनिक रूप से सलमान की शान में कसीदे पढ़ रही है, उनकी जमकर तारीफ कर रही है। कटरीना की इन तारीफों का असर लूलिया पर हो रहा है और वो मानती है कि सलमान के दिल में भी कटरीना को लेकर अब दबा-दबा सा ही सही लेकिन प्यार की चिंगारी तो है ही जो कभी भी फूट सकता है।
सलमान और लूलिया के बीच झगड़े की ये कोई पहली घटना नहीं है । इसके पहले भी डेजी शाह और जरीन खान को लेकर भी सलमान और लूलिया में झगड़े होते रहे हैं । दरअसल लूलिया को सलमान और डेजी और जरीन की नजदीकियां पसंद नहीं हैं । वो कई बार सलमान खान से इस बारे में शिकायत कर चुकी है लेकिन सलमान भाई अपना स्टाइल को बदलने के लिए तैयार नहीं हैं । उनको अपने दूसरे रिश्तों में किसी का भी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं है। जब भी लूलिया ने डेजी की शिकायत सलमान खान से की तो सल्लू मियां ने उसको झिड़क दिया । फिर तो लूलिया ने डेज़ी शाह से खुद ही निबटने की ठानी और सीधे उससे भिड़ गईं । बॉलीवुड से जुड़े लोगों का कहना है कि हाल ही में डेजी शाह और लूलिया के बीच जमकर झगड़ा हुआ। झगड़ा इतना बढ़ गया कि सलमान को अपनी गर्लफ्रेंड लूलिया को चेतावनी देनी पड़ी । इसके पहले भी जब दो हजार सोलह में रोमानियन ब्यूटी लूलिया का वीजा खत्म हो गया था तब वो वापस अपने देश चली गई थी। उस वक्त भी दोनों के बीच मनमुटाव की खबरें आई थी और लूलिया ने अपने ट्वीट्स से भी कुछ इसी तरह के संकेत दिए थे। हाल ही में ये खबर भी आई कि किसी शादी के सिलसिले में सलमान खान और लूलिया वंतूर उदयपुर गए थे लेकिन दोनों में बातचीत नहीं हुई। लूलिया ने इंस्टाग्राम पर अपने अकेले की फोटो पोस्टकर इन बातों को और हवा दी।

इक्यावन साल के बॉलीवुड के इस सुपरस्टार सलमान खान को नजदीक से जाननेवाले लोगों का दावा है कि वो अपनी जाति जिंदगी में किसी तरह की दखलअंदाजी मंजूर नहीं करते हैं । बॉलीवुड के लंबे करियर में उनकी कई महबूबाएं हुई लेकिन कोई भी रिश्ता शादी के मंडप तक नहीं पहुंच पाया तो इसकी वजह यही मानी गई। जब उनकी गर्ल फ्रेंड डिमांडिंग होने लगती है तो वो उससे किनारा कर लेते हैं और सलमान भाई किनारा भी ऐसे करते हैं जैसे वो उनकी जिंदगी में कभी रही भी नहीं हो। लूलिया जिस तरह से सलमान खान की जिंदगी में हावी होने की कोशिश करती नजर आती हैं उसमें तो दोनों के बीच के झगड़ा होना तो निश्चित ही था। अब ये देखना दिलचस्प होगा कि सलमान खान और लूलिया के बीच का ये झगड़ा स्थायी हो जाता है यानि दोनों के बीच ब्रेक अप हो जाता है या फिर प्यार की रार की तरह दोनों कुछ दिनों तक अलग रहने का दिखावा करते हैं । फिर मान मनौव्वल के दौर से होते हुए रिश्ता हरा हो जाता है। पहले भी सलमान और उनके गर्ल फ्रेंड के बीच इस तरह की लड़ाई झगड़े भी होते रहे हैं और पैचअप भी होता रहा है। सल्लू भाई के इश्क के बारे में कहा जाता है कि इस बारे में वो खुद भी कुछ नहीं कह सकते हैं कि इश्क कब परवान चढ़ेगा और कब उतर जाएगा।             

Wednesday, May 3, 2017

AAP की बुनियाद उसकी चुनौती

एक के बाद एक हार के बाद दिल्ली की आम आदमी पार्टी अब आंतरिक कलह से जूझ रही है। दो ढाई साल पहले जिस पार्टी को दिल्ली ती जनता ने प्रचंड बहुमत से दिल्ली की गद्दी सौंपी थी वो इतने कम समय में ही इतने बड़े कलह का शिकार हो जाएगी किसी ने सोचा भी नहीं था। पंजाब में हार, दिल्ली उपचुनाव में तीसरे नंबर की पार्टी और फिर दिल्ली नगर निगम में हार के बाद पार्टी के संस्थापकों में से एक कुमार विश्वास ने बगावत का बिगुल फूंक दिया है। कुमार विश्वास की पीड़ा है कि पार्टी में उनकी पूछ नहीं हो रही और पार्टी के एक विधायक ने उनको भारतीय जनता पार्टी का एजेंट कह दिया। विधायक के इस आरोप के बाद भड़के कुमार को मनाने का दौर चल रहा है।पार्टी के नेता पहले उनको सार्वजनिक रूप से नसीहत भी देते हैं और फिर उनको मनाने उनके घर भी पहुंच जाते हैं। किसी का आंकलन है कि कुमार विश्वास अपनी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल पर दबाव बनाकर राज्यसभा की सीट पक्की करना चाहते हैं। दिल्ली में अगले साल जनवरी में तीन राज्यसभा की सीट खाली हो रही है। कुमार विश्वास को मनाने के लिए पार्टी के नेता क्यों परेशान हो रहे हैं यह समझ से परे है। क्या कुमार का इतना बड़ा जनाधार है कि वो आम आदमी पार्टी को नुकसान पहुंचा सकते हैं। कुमार के जनाधार का टेस्ट होना अभी शेष है।
कुमार विश्वास को लेकर पार्टी में भले ही अलग अलग राय दिख रही हो लेकिन आम आदमी पार्टी की समस्या कुछ अलग है। पार्टी के नेताओं के झगड़े के बीच राजनीतिक विश्लेषक भी इस समस्या पर गंभीरता से विचार किए बिना सतही तौर पर अंतर्कलह के कारणों का विश्लेषण कर रहे हैं। अरविंद केजरीवाल का बड़बोलापन, उनकी नकारात्मक राजनीति, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को मर्यादाहीन शब्दों से संबोधित करने आदि को जनता से उनके दूर जाने की वजह बता रहे हैं । जबकि इसके मूल में वजह कुछ और है। जब केजरीवाल ने अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को राजनीतिक पार्टी में बदलकर चुनावी राजनीति में आने का एलान किया था तब उनके पास भ्रष्टाचार से लड़ने के जज्बे की पूंजी थी। जब उन्होंने राजनीतिक दल बनाया तो उनका कोई वैचारिक आधार नहीं था। वो भ्रष्टाचार विरोधी लहर पर सवार थे और लोगों को लग रहा था कि एक ऐसा नेता आया है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ सकता है। उत्साह में उस वक्त कई लोगों ने केजरीवाल की तुलना नायक फिल्म के हीरो अनिल कपूर के किरदार से करना शुरू कर दिया था। लेकिन कोई भी पार्टी बगैर वैचारिक आधार के लंबे समय तक राजनीति नहीं कर सकती है। केजरीवाल ने एक बार वैचारिक आधार के बारे में पूछे जाने पर सवाल का मजाक उड़ाते हुए कहा था कि वैचारिकता से पेट नहीं भरता है। उन्होंने तब हल्के में ये भी कहा था कि जहां जनता का हित हो रहा होगा वहां वो लेफ्ट या राइट दोनों में से किसी विचारधारा से परहेज नहीं करेंगे।  
दरअसल अगर पूरी दुनिया पर नजर डालें तो एक मुद्दे की पार्टी बनकर कोई भी दल लंबे समय तक राजनीति में टिकी नहीं रह सकती है चाहे वो अमेरिका की प्रोहिबिशन पार्टी ही क्यों ना हो। जब वो पार्टी शुरू हुई थी तो उसको जोरदार जनसमर्थन मिला था जो समय के साथ छीजता चला गया। यूरोप में कई पार्टियां पर्यावरण आदि जैसे एक मुद्दे को लेकर चली लेकिन वो सफल नहीं हो पाईं।
आम आदमी पार्टी के दो-ढाई साल के कार्यकाल पर अगर गंभीरता से विचार करें तो इस पार्टी ने दिल्ली की जनता को सब्सिडी का लॉलीपॉप देने के अलावा कोई बिग टिकट आइडिया पर काम नहीं किया। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने भले ही शिक्षा के क्षेत्र में हाथ-पांव मारे लेकिन वो नाकाफी थे। आधारभूत ढांचा ठीक करने की दिशा में क्या हुआ। दिल्ली की सड़कें बेहाल हैं, बारिश के मौसम में सड़कों पर पानी जमा हो जाता है। एमसीडी के साथ दिल्ली सरकार का तालमेल कभी बन ही नहीं पाया। दिल्ली की जनता ने कई बार सड़कों पर कूड़े का अंबार देखा। इसी तरह से ट्रैफिक जाम को काबू में करने के लिए आड ईवन का प्रयोग किया गया था लेकिन उसकी सफलता का आंकलन आना बाकी है।

आम आदमी पार्टी की सबसे बड़ी ताकत उसकी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़नेवाली पार्टी की छवि थी। डिमोनेटाइजेशन के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से पूरे देश के लोगों को ये संदेश दिया कि वो कालेधन के खिलाफ इस मुहिम में मजबूती से खड़ी है उसने आम आदमी पार्टी को इस मुद्दे पर भी कमजोर कर दिया। इसके अलावा आम आदमी पार्टी ने जिस तरह से नोटबंदी का विरोध किया उसका भी जनता के बीच गलत संदेश गया। अब आम आदमी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़नेवाली पार्टी के तौर पर फिर से उभरने का उपक्रम करे। इसके अलावा सस्ती बिजली और पानी देकर जनता को लंबे समय तक खुश नहीं रखा जा सकता है । पार्टी को दिल्ली की जनता के उन समस्याओं को दूर करने के लिए कमर कसना होगा जिसे जनता का हर रोज सामना होता है। और इन सबसे ऊपर उनको दिल्ली के अपने जनाधार को मजबूत करना होगा ना कि देश के अन्य राज्यों में जाकर चुनाव लड़कर अपनी महात्वाकांक्षा की पूर्ति के यत्न में लगना होगा। जब जब केजरीवाल दिल्ली के बाहर जाकर चुनाव लड़ने की कोशिश करते हैं, असफल तो होते ही हैं, दिल्ली के जनाधार में सेंध लगती है। आमआदमी पार्टी की समस्या कुमार विश्वास नहीं बल्कि पार्टी के क्रियाकलाप हैं, उसको सुधारना होगा ।           

Tuesday, May 2, 2017

साहित्य का बढ़ता दायरा


हिंदी साहित्य में लंबे समय से पाठकों की कमी का रोना रोया जाता है। पाठकों की कमी को बहुधा साहित्यक कृतियों के वितरण की कमियों से जोड़कर भी पेश किया जाता है। यह माना जाता है कि रचनाएं हिंदी के विशाल पाठक वर्ग तक पहुंच नहीं पाती हैं। देश में इंटरनेट के बढ़ते घनत्व ने पाठकों तक पहुंचने का एक बड़ा अवसर हिंदी के प्रकाशकों और लेखकों को उपलब्ध करवाया है। पिछले एक दशक में देश में तकनीक का फैलाव काफी तेजी से हुआ है । मोबाइल फोन की क्रांति के बाद देश ने टू जी से लेकर फोर जी तक का सफर देखा और अब तो फाइव जी की बात होने लगी है। इसका फायदा उठाने की कोशिशें भी लगातार परवान चढ़ने लगी हैं । पहले डेली हंट नाम के एक एप पर साहित्यक कृतियां बहुत सस्ते में सुलभ हुई फिर किंडल पर हिंदी समेत कई भारतीय भाषाओं की रचनाएं ई बुक्स के फॉर्मेट में पेश की गईं। इस वैकल्पिक वितरण व्यवस्था ने हिंदी साहित्य के पारंपरिक वितरण व्यवस्था को मजबूती प्रदान की, ऐसा माना जाना चाहिए। साहित्यक कृतियां उन लोगों तक पहुंचने लगी जो कंप्यूटर, टैब और स्मार्ट फोन इस्तेमाल कर रहे थे। चंद सालों पहले सोशल मीडिया के बढ़ते कदम के मद्देनजर मोबाइल फर्स्ट का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया था लेकिन अब तो वो आगे बढ़कर मोबाइल ओनली तक पहुंच गया है । यही वजह है कि - अब लगभग सभी कंपनियां स्मार्टफोन की स्क्रीन साइज बढ़ा चुकी हैं । एप्पल जैसा पारंपरिक ब्रांड भी स्क्रीन साइज बढ़ाने को मजबूर हो गया था । इसी तरह सोशल मीडिया में सक्रिय कंपनियों को हिंदी में अपार संभावनाएं नजर आईं । धीरे-धीरे सबने हिंदी को अपनाना शुरू किया । ट्विटर ने हैशटैग के लिए भी हिंदी समेत कई भारतीय भाषाओं को अपने प्लेटफॉर्म पर शामिल किया । अब हिंदी में किए गए ट्वीट ट्रेंड कर सकते हैं, करने लगे भी है । 
स्मार्ट फोन के बढ़ते चलन से पाठकों या दर्शकों को चलते फिरते पढ़ने/ देखने की आदत बढ़ने लगी । बाजार की भाषा में कहते हैं कि उपभोक्ता आन द मूव पढ़ना, देखना चाहता है । अब कृतियों को देखने पढ़ने का आधार यूजर का मूड हो गया ।  लेखकों का एक वर्ग इस मूड के हिसाब से भी लेखन करने लगा। साहित्यक कृतियों के बाजार और उस बाजार पर कब्जे को लेकर रणनीतियां बनने लगीं । अभी हाल ही में एक नए प्रकाशक जगरनॉट ने हिंदी में अपना एप लॉंच किया है। यह एप आईओएस और एंड्रायड दोनों प्लेटफॉर्म पर डाउनलोड किया जा सकता है। इस एप पर एक महीने तक साहित्यक कृतियां मुफ्त में उपलब्ध हैं। जगरनॉट के इस एप पर मौजूद कृतियों को देखकर इस बात का सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि उनकी रणनीति क्या होगी। जिस तरह कि कहानियां या छोटे उपन्यास जगरनॉट ने अपने इस एप पर डाले हैं उसमें प्रकरांतर से यौन प्रसंगों को प्रमुखता दी गई है। साहित्यक कृतियों में रीतिकालीन प्रवृतियों को आधुनिकता के छौंक के साथ प्रस्तुत कर पाठकों की बांधने की रणनीति दिखाई देती है । इस एप के कर्ताधर्ताओं को लगता है कि इस तरह की कहानियां से उनके एप ज्यादा से ज्यादा डाउन लोड हो सकते हैं। संभव है उनकी यह रणनीति तात्कालिक रूप से सफल हो जाए लेकिन दीर्घकालीन सफलता में संदेह है।

जगरनॉट के पहले भी साहित्यक कृतियों को इस तरह के प्लेटफॉर्म पर पेश की गई थी। जैसा कि उपर संकेत किया गया है कि डेली हंट ने सात आठ साल पहले ही इसकी शुरुआत की थी। जहां बहुत सस्ती कीमत पर सुरेन्द्र मोहन पाठक से लेकर फैज तक की कृतियां उपलब्ध थीं। साहित्य की स्तरीय कृतियों की वहां भरमार थी। डेली हंट ने कालांतर में अपना नाम बदला और अब वो न्यूज हंट के नाम से मौजूद है। इसके अलावा प्रतिलिपि का भी अपना एक एप है जहां पाठक एंड्रायड प्लेटफॉर्म पर उसको डाउनलोड कर कहानियां और कविताएं पढ़ सकते हैं । साहित्य कृतियों की ऑनलाइन उपलब्धता बढ़ी है। यह साहित्य के लिए बेहतर स्थिति है। लेकिन अगर हम इस तरह के एप आधारित प्लेटफॉर्म के अर्थशास्त्र पर बात करें तो स्थिति बहुत आसान दिखाई नहीं देती है। आज ये समय में किसी भी उत्पाद का एप बनवाना बहुत आसान है। उस एप को उपभोक्ताओं के मोबाइल पर डाउनलोड करवाना और फिर उसको उनके मोबाइल में बनाए रखना बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण काम है। एप को डाउनलोड करवाने का काम तो कंपनियां कर रही हैं लेकिन उसको बनाए रखने का कोई तंत्र अभी विकसित नहीं हो पाया है। इस लिहाजा से देखें तो साहित्यक एप को पाठकों के मोबाइल या अन्य डिवाइस पर बनाए रखना बहुत मुश्किल है। अगर जगरनॉट या अन्य कंपनियां अपने एप को बनाए रखने में सफल रहती हैं तो यह साहित्य के लिए बेहतर स्थिति होगी। इससे हिंदी साहित्य का दायरा बढ़ेगा और पुस्तकों के संस्करणों की घटती संख्या की भारपाई हो सकेगी। हिंदी साहित्य के लेखकों की पहुंच भी विशाल पाठक वर्ग तक हो सकेगी ।    





Monday, May 1, 2017

बीजेपी के ‘शाह’ की रणनीति


उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जब भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला तो एक सुर से राजनीतिक विश्लेषक और विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने दो हजार चौबीस के लोकसभा चुनाव के बारे में विचार करने की बात शुरू कर दी। कहने का मतलब ये कि अमूमन सबने यह मान लिया था कि दो हजार उन्नीस का लोकसभा के चुनाव में बीजेपी को नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में जीत तय है। जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अबदुल्ला ने तो उत्तर प्रदेश चुनाव के रुझानों को देखते ही दो हजार चौबीस के चुनावों की बात शुरू कर दी थी। हाल ही दिल्ली नगर निगम के चुनावों में जिस तरह से बीजेपी को अपार जनसमर्थन मिला उससे भी राजनीति के विश्लेषक ये आंकलन करने लगे हैं कि दो साल बाद होनेवाले आम चुनाव में बीजेपी को केंद्र में सरकार बनाने से कोई रोक नहीं सकता है। नरेन्द्र मोदी का नेतृत्व दिन पर दिन मजबूत होता जा रहा है । अगर हम देखें तो मोदी के नेतृत्व पर देश की जनता का भरोसा पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से एकदम बढ़ गया है। लोगों को लगने लगा है कि एक दमदार नेतृत्व के हाथों में देश की बागडोर है और जनता उस हाथ को और मजबूत करती जा रही है। नरेन्द्र मोदी को अमित शाह के रूप में एक ऐसा पार्टी अध्यक्ष मिला है जो छोटे से लेकर बड़े चुनाव तक को गंभीरता से लड़ते हैं । दिल्ली में एमसीडी के चुनाव की भी हर बारीकी पर उनकी नजर थी। जब दिल्ली में स्थानीय निकाय के चुनावों के नतीजे आ रहे थे उस वक्त अमित शाह नक्सलबाड़ी में बीजेपी को मजबूत करने में लगे थे।
भले ही राजनीतिक विश्लेषक दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव को बीजेपी के लिए आसान मानते हों लेकिन अमित शाह उसकी तैयारी में गंभीरता से जुटे हुए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उनका लक्ष्य दो हजार चौदह से बड़ी जीत का है। कुछ लोगों का मानना है कि अमित शाह तो लगता है कि उत्तर भारत में उनको उतनी सीटें नहीं मिलेंगी लिहाजा वो उन इलाकों में पार्टी का जनाधार बढ़ाने में लगे हैं जहां दो हजार चौदह में बीजेपी को कम सीटें मिली थीं। अमित शाह ने उन एक सौ बीस लोकसभा सीटों पर जीत का लक्ष्य बनाया है जहां बीजेपी को दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा था। इन सीटों को जीतने की रणनीति के तहत अमित शाह ने सितंबर तक पचानवे दिन के दौरा की कार्ययोजना बनाई है। इन पचानवे दिनों में अमित शाह सभी छत्तीस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का दौरा करेंगे। अमित शाह ने राज्यों को श्रेणीबद्ध करके अपनी प्राथमिकताएं तय की हैं। किस राज्य में कितने दिन बिताने हैं यह वहां की लोकसभा सीटों के लक्ष्य पर निर्भर करेगा। राज्यों को तीन श्रेणी में बांटकर रणनीति तैयार की गई है । इसी रणनीति के तहत अमित शाह पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तेलांगाना, गुजरात, केरल आदि राज्यों का खुद दौरा कर जमीनी हकीकत को आंकने के काम में जुट गए हैं। प्राथमिकता वाले राज्यों में अमित शाह तीन दिन का प्रवास करेंगे जबकि उसके बाद वाले राज्यों में दिन और छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एक दिन का प्रवास करते हुए वहां कार्यकर्ताओं और लोगों से मिलकर पार्टी के जनाधार को बढ़ाने की रणनीति को अमली जामा पहनाना शुरू कर दिया है ।

एक तरफ जहां बिखरा हुआ विपक्ष अभी मंथन आदि के दौर से गुजर रहा है, अलग अलग पार्टी के नेता सोनिया गांधी से मिलकर महागठबंधन की संभावनाओं पर विचार कर रहे हैं वहीं बीजेपी का नेतृत्व दो हजार उन्नीस के चुनाव की रणनीति बनाकर जमीन पर उतर चुका है। अमित शाह जिस रणनीति पर काम कर रहे हैं उसके मुताबिक योजना यह है कि दो हजार उन्नीस के पहले देशभर के हर बूथ पर पार्टी का एक पूर्णकालिक कार्यकर्ता की तैनाती हो सके। बताया जा रहा है कि छह सौ ऐसे कार्यकर्ताओं को तैयार किया जा चुका है जो दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव में वोटिंग वाले दिन तक अपने अपने चिन्हित लोकसभा क्षेत्र में डटे रहेंगे। इसके अलावा पांच लोकसभा सीटों पर एक शख्स को तैनात किया जा रहा है जो वोटिंग वाले दिन तक अपनी पांचों लोकसभा सीटों पर नजर ही नहीं रखेगा बल्कि वहां पार्टी की रणनीति को सफलता दिलाने की कोशिश करेगा। बीजेपी के आला नेतृत्व ने नरेन्द्र मोदी के मजबूत नेतृत्व को और प्रचारित करने और जनता तक पहुंचाने की योजना बनाई है । इलसके तहत देशभर में वैसे युवाओं की तलाश शुरू की जा चुकी है जो पार्टी का पक्ष मजबूती से जनता के बीच रख सकें। ऐसे प्रवक्ताओं की तलाश की जा रही है जो राजनीतिक लफ्फाजी की बजाए तथ्यों, तर्कों और आंकड़ों के आधार पर सरकार की उपलब्धियों को जनता के बीच पहुंचा सकें। पार्टी अध्यक्ष ने संगठन की चूलें कसने भी शुरू कर दी हैं । अमित शाह ने अपने भरोसेमंद पार्टी महासचिव भूपेन्द्र यादव को गुजरात चुनाव का प्रभारी बनाया है । राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी चर्चा है कि संगठन और केंद्रीय मंत्रिमंडल में बड़ा फेरबदल होनेवाला है । जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं और जिन राज्यों पर दो हजार उन्नीस का फोकस है वहां से नए चेहरों को मंत्रिमंडल और संगठन में जगह मिल सकती है । कुछ मंत्रियों को संगठन के काम में भी लगाया जा सकता है। इस बीच एक और योजना पर काम चल रहा है वह है राज्यों के स्थानीय नायकों की स्मृति में कार्यक्रमों का आयोजन ताकि जनता को भावनात्मक स्तर पर पार्टी से जोड़ा जा सके। कहते भी हैं कि राजनीति ट्वेंटी फोर सेवन जॉब है और अमित शाह और नरेन्द्र मोदी इसी तरह से राजनीति कर भी रहे हैं ।  

Saturday, April 29, 2017

‘जुटान’ के बहाने प्रतिरोध का पाखंड

जब –जब चुनाव आते हैं तो वामदलों से संबद्ध लेखकों और लेखक संगठनों को उनके राजनीतिक आका काम पर लगा देते हैं। इन कामों का प्रकटीकरण कई बार अलग अलग रूपों में दिखाई देता है। बिहार चुनाव के पहले पुरस्कार वापसी से लेकर असहिष्णुता का शोर शराबा। चुनाव खत्म होते ही ये तमाम लोग शांत होकर बैठ जाते हैं और लगता है कि देश में अमन चैन कायम हो गया है और असहिणुता आदि जैसे मुद्दे नेपथ्य में चले गए हैं। एक तरफ जहां सारे राजनीतिक दल अब अगले कुछ महीनों में होनेवाले गुजरात, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में चुनाव प्रचार में लगे हैं वहीं वाम दलों के ये स्वयंसेवक लेखक दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव में अपने दलों के माहौल और भारतीय जनता पार्टी के विरोध में माहौल बनाने में जुटे हुए हैं। लेखकों के चोले में वामपंथी दलों के इन कार्यकर्ताओं ने जुटान के नाम से एक संगठन बनाया है जिसके तहत वो देशभर में विचार गोष्ठियां आयोजित करके केंद्र सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश करेंगे। हाल ही में दिनभर की एक गोष्ठी दिल्ली में हुई जिसमें कथित तौर पर प्रतिरोध का स्वर बुलंद करने की कोशिश की गई। इस कार्यक्रम में इस बात पर जोर दिया गया कि देशभर में प्रतिरोध के बिखरे हुए स्वर को एकजुट करने की जरूरत है। इसमें फिर से वही घिसा पिटा रिकॉर्ड भी बजा जिसमें ये बताया जाता है कि साहित्य का मतलब ही प्रतिरोध होता है, वह सत्ता के साथ नहीं होता है आदि आदि। पर अतीत में वामपंथी कार्यकर्ता लेखकों ने जो किया उससे उनके कथनी और करनी का भेद साफ तौर पर जनता के सामने खुल चुका है।
सत्ता के प्रतिरोध की बात करते करते वो कब सत्ता सुख का आस्वादान करने लगते हैं, इसका पता आम जनता को होने नहीं देते हैं। लंबे समय तक चले प्रतिरोध के इस पाखंड ने ईमानदार प्रतिरोध की जान ही निकाल दी। लेकिन चुनावों के वक्त इस तरह के संगठनों को राजनीतिक दलों, खासतौर पर सीपीएम और सीपीआई से जीवनी शक्ति मिलती है। इस जीवनी शक्ति को प्राप्त करते ही ये फिर से खड़े होने लगते हैं लेकिन ये अपने ही खेमे की अरुंधति राय की बात भूल जाते हैं जब वो कहतीं हैं- फंड लेकर क्रांति नहीं हो सकती है। ट्र्स्टों और फाउंडेशनों की कल्पनाओं से कोई असली बदलाव नहीं आएगा। अरुंधति जब यह बात कहती हैं तो उनके मन के किसी कोने अंतरे में वामपंथी संगठन थे या नहीं, यह कहा नहीं जा सकता है लेकिन चाहे अनचाहे उन्होंने जो भी कहा हो वो उनके वैचारिक दोस्तों पर भी लागू होता है।
अब एक और उदाहरण से वामपंथी दलों के इन छद्म कार्यकर्ताओं की बात समझी जा सकती है। मीडिया में छपी रिपोर्ट के मुताबिक जुटान की दिल्ली की गोष्ठी में कहा गया कि सिर्फ लिखने से नहीं चलेगा काम, सड़क पर उतरना होगा। इस वक्तव्य के बाद से इन छद्म कार्यकर्ताओं के चेहरे से मुखौटा हट गया है। कहना नहीं होगा कि अब इनके अंदर सत्ता हासिल करने की जो बेचैनी है फिर सत्ता छिन जाने का जो गम है वो उनको लेखकीय खोल से बाहर आने के लिए मजबूर कर रहा है। लुकाच ने समाजवादी परिप्रेक्ष्य की काफी चर्चा की थी। इस चर्चा से मार्क्सवादी लेखक का राजनीति से एक तरह का संबंध बनता चलता है। लुकाच के अलावा ब्रेख्त और बेंजामिन ने भी लेखकों के राजनीति से संबंध पर अपनी अपनी स्थापनाएं दी हैं । इन सबका मानना है कि लेखक और राजनीति का संबंध होना चाहिए लेकिन इनकी आड़ लेकर वामपंथी लेखक मित्र खुलकर राजनीति के मैदान में आने को जायज नहीं ठहरा सकते हैं। यह भूल जाते हैं कि उपर जिन भी लेखकों का नामोल्लेख किया गया है वो सब द्वितीय विश्वयुद्ध के वक्त के लेखक थे और इस वक्त लेखकों पर फासीवाद कहर बनकर टूटा था। इन्हीं लेखकों के मंतव्यों की आड़ में इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया कि लेखकों के राजनीतिक होने में कोई हर्ज नहीं है। इसमें किसी को कोई आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए क्योंकि जो भी इंसान सजग होगा और जिसकी भी लोकतंत्र में आस्था होगी वो राजनीतिक होगा। लेखक भी इंसान ही होता है लिहाजा उसका राजनीतिक होना आपत्तिजनक नहीं होता है । आपत्ति तब शुरू होती है जब वो अपनी राजनीति को खास दल के साथ जोड़कर अपने लेखन में प्रतिपादित करना शुरू हो जाता है। अज्ञेय से लेकर मुक्तिबोध तक ने लेखकों में राजनीतिक चेतना की वकालत की है लेकिन दलगत राजनीति का वकालत करनेवाला बड़ा लेखक सामने नहीं आया है। बल्कि दलगत राजनीति करने का विरोध ही होता आया है, बावजूद इसके वामपंथी लेखक इससे बाज नहींआते रहे हैं।
जुटान की अध्यक्षता कर रहे हिंदी के कवि इब्बार रब्बी ने भी खतरे की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि ये बेहद खतरनाक समय है और फासीवादी ताकतें देश को मध्यकाल में ले जाना चाहती हैं। इब्बार रब्बी के अलावा इस कार्यक्रम में अधिकतर वक्ताओं ने राग-फासीवाद गाया। कुछ लेखकों को एक बार फिर से दाभोलकर, कालबुर्गी और गोविंद पानसारे हत्याकांड की याद आई लेकिन जिस वक्ता को इन सारी हत्या की याद आ रही थी उनको मुजफ्फरनगर दंगे की याद और उसमें उस वक्त के सूबे की सरकार की भूमिका की याद नहीं आ रही थी। दरअसल लखटकिया पुरस्कार में बहुत ताकत होती है और वो लेखकों को सुविधाजनक तर्क ढूंढने के लिए मजबूर करता रहता है । लेखकों की स्वामीभक्ति का यह चरम है। दरअसल जिसको ये फासीवाद कह रहे हैं वो फासीवाद नहीं है बल्कि उनके हाथ से सत्ता जाने का दुख है। अगर वामपंथियों के हाथों में इन साहित्यक, सांस्कृतिक संगठनों की सत्ता बरकरार रहती तो संभव है देश पर फासीवाद का खतरा पैदा नहीं होता।

पाठकों को याद होगा कि जब बिहार विधानसभा चुनाव के वक्त वामपंथी संगठनों से जुड़े लेखकों ने बड़ा मुद्दा बनाकर प्रदर्शन आदि शुरू कर दिया था तब राष्ट्रवादी लेखकों ने भी जवाबी प्रदर्शन आदि किया था। वामपंथी संगठनों से जुड़े लेखक लगातार केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन आदि करते रहे लेकिन राष्ट्रवादी लेखकों का वो जमावड़ा फिर कभी दिखाई नहीं दिया। दरअसल होता यह है कि जब कोई संगठन तात्कालिता के दबाव में बनाया जाता है तो वो दीर्घजीवी नहीं हो सकता है। राष्ट्रवादी लेखकों के उस जुटान का भी वही हुआ। लेखकों का एक बड़ा वर्ग है जो वामपंथी या मार्क्सवादी विचारधारा से सहमत नहीं है लेकिन उनके पास वैकल्पिक प्लेटफॉर्म नहीं है और वामपंथियों की तरह का संरक्षण-तंत्र भी नहीं है। इन दोनों के आभाव में जो लेखक मार्क्सवादियों के विरोधी होते हैं वो भी खुलकर सामने नहीं आते हैं । इससे लगता है कि लेखकों के बीच वामपंथियों का ही दबदबा है। लेखकों के बीच वितार विनिमय के लिए भी यह आवश्यक है कि कोई वैकल्पित मंच बने जहां मार्क्सवाद से इतर विचारधारा के लोग भी मिल बैठकर आपस में संवाद कर सकें। भारत और भारतीयता की बात करनेवाली विचारधारा के बीच संवाद होना आवश्यक है क्योंकि इसी तरह के संवाद से कई तरह के भ्रम को फैलने या फैलाने का मौका नहीं मिलेगा। अब वामपंथी लेखकों का एक तबका यह कहकर मजाक उड़ाता है कि हिंदुओं ने वेदों में ही प्लास्टिक सर्जरी की खोज कर ली थी वर्ना हमारे एक देवता का सर हाथी का कैसे होता। इस तरह की बात फैलाने के बाद यह आरोप भी लगाते हैं कि इससे बातचीत का सार्वजनिक स्तर गिरता है। अब वामपंथियों को तो किसी भी बात को गढ़ने और उसको अपने कैडर के माध्यम से हर जगह फैलाने में महारथ हासिल है, लिहाजा वो इसको भी उसी विश्वास के साथ फैलाते हैं। अगर वैकल्पिक विचारधारा के लेखक बैठकर आपस में संवाद करने लगेंगे तो इस तरह की उलजलूल बातों को फैलने से रोका जा सकता है । आवश्यकता इस बात की है कि वैकल्पिक विचारधारा से जुड़े लेखकों को पहल करनी होगी। उनको अपना एक संगठन बनाना होगा और उस संगठन को सरकारी संरक्षण ना भी मिले तो उसके साथ सौतेला व्यवहार नहीं हो। क्योंकि लाख फासीवाद की बातें की जाएं, संस्थाओं पर संकट की बातें हो, लेकिन अब भी वामपंथी विचारधारा के कार्यकर्ता सरकारी और गैर सरकारी पदों पर बैठे हैं जो इस वैकल्पिक साहित्यक विचारों के एक जगह इकट्ठा होने में बाधा डाल सकते हैं। यह नहीं भूलना चाहिए कि देश में लेफ्ट की राजनीति कमजोर हुई है लेकिन खत्म नहीं हुई है। लेफ्ट से जुड़े लेखकों को दिल्ली की केजरीवाल सरकार से लेकर बिहार की नीतीश कुमार सरकार से भी संरक्षण मिलता रहा है । विचारों की इस लड़ाई में जितना आवश्यक इन लेखक कार्यकर्ताओं को बेनकाब करना है उतना ही आवश्यक है कि एक वैकल्पिक मंच का सृजन हो।         

जेरी ने बदला रास्ता!

जेरी पिंटो का नाम एक ऐसे लेखक के तौर पर जाना जाता है जो फिक्शन से लेकर बॉयोग्राफी और अनुवाद से लेकर बच्चों के लिए फिक्शन लिखते रहे हैं । अपने जमाने की मशहूर डांसर हेलन के जीवन पर जेरी ने बेहद रोचक और दिलचस्प किताब लिखी है। इसके अलावा जेरी ने अपनी किताब में बेहद संवेदनशील तरीके से मानसिक रोगियों पर भी लिखा है । जेरी अपनी चुटीली टिप्पणियों के लिए भी जाने जाते हैं । उनकी नई किताब मर्डर इन माहिम ने उनके लिए एक नई छवि गढ़ी है । जेरी पिंटो के इस उपन्यास में अपराध है, समलैंगिकता और उससे जुड़ी समस्याएं हैं और अपने संपूर्ण स्वरूप में उपस्थित है मायानगरी मुंबई । खांटी मुंबईकर की तरह जेरी ने माहिम, माटुंगा से लेकर मायानगरी के कई इलाकों में मौजूद सामाजिकक विसंगतियों और उससे उपजने वाले अपराध की मानसिकता की ओर भी इशारा करते चलते हैं। जेरी चूंकि मुबंई के रहनेवाले हैं लिहाजा उनके लेखन में मुंबई का समाज और उसकी बोली वाणी भी पाठकों को दिलचस्प लग सकती है ।
मर्डर इन माहिम में मुंबई के एक इलाके के पब्लिक टॉयलेट में एक युवक की लाश मिलती है जिसकी किडनी गायब है । इस केस को सुलझाने की जिम्मेदारी मिलती है मुंबई पुलिस के एक ईमानदार अफसर इंसपेक्टर झेंडे को जो इस केस में अपने मित्र बुजुर्ग पत्रकार पीटर डिसूजा को भी साथ रखता है और उससे केस की डिटेल्स पर चर्चा करता रहता है । जैसे जैसे यह अपराध की कथा आगे बढ़ती है वैसे वैसे इंसपेक्टर झेंडे और पीटर डिसूजा के बीच का संवाद बेहद दिलचस्प होता जाता है । कैसे किडनी निकाली गई होगी, क्या मर्डर करनेवाला पहली बार हत्या कर रहा होगा, उसे कैसे मालूम कि किडनी शरीर में कहां होती है, क्या हत्या कहीं और की गई और फिर लाश को लाकर टॉयलेट में फेंक दिया गया । इन सब बातों पर दोनों पात्रों के बीच बेहद सूक्षम्ता से बात होती है । दोनों पात्रों के बीच होनेवाली बातचीत के माध्यम से लेखक अपनी बात कहता चलता है यानि सामाजिक स्थितियों पर टिप्पणी भी करता चलता है । मर्डर इन माहिम भले ही अपराध कथा हो लेकिन लेखक इसको अपराध से ज्यादा समाज और पात्रों पर अपराध के असर को लेकर ज्यादा चौकस दिखाई देता है । पात्रोंके बीच जब धारा तीन सौ सतहत्तर को लेकर, अदालतों द्वारा दो वयस्कों के बीच के अप्राकृतिक यौन संबंधों को अपराध करार देने या फिर महानगर में अपनी मर्जी की जिंदगी के लिए छटपटाते मन को चित्रित करने की कोशिश इसको पठनीय बनाते हैं लेकिन कई बार अपराध कथा के तय खांचे से अलग भी लेकर चले जाते हैं । क्राइम फिक्शन में जिस थ्रिल की तलाश में पाठक रहते हैं वो जेरी की इस किताब में कई बार लेखक के ज्ञान से बाधित होती है । यह इस वजह से भी संभव है कि अपराध और अपराध की वजह और उसका प्रभाव भी उपन्यास में प्रमुखता से है । अपने एक इंटरव्यू में जेरी पिंटों ने माना भी है कि यह उपन्यास या क्राइम थ्रिलर समाज में व्याप्त स्थितियों को लेकर उनके गुस्से का प्रकटीकरण भी है । वो कहते हैं कि समाज की कबीलाई मानसिकता को लेकर उनके मन में बहुत दिनों से चल रहा था जिसको वो लगातार लिखते और सुधारते रहते थे, इस वजह से इस उपन्यास के दर्जनों ड्राफ्ट हुए। लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि अगर जेरी ने लगातार अपराध कथा लिखते रहने की ठानी तो यह भारतीय क्राइम फिक्शन के लिए बेहतर होगा ।

विरासत को सहेजने का वक्त

हिंदी की विपुल साहित्यक विरासत पर अगर नजर डालें तो इस वक्त उसको संरक्षित करने की बेहद आवश्कता दिखाई देती है । संरक्षण के साथ-साथ जरूरत इस बात की भी है कि हिंदी साहित्य को समृद्ध करनेवाली रचनाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम भी किया जाए। आज पूरे देश में हिंदी के पक्ष-विपक्ष में बयानबाजी हो रही है लेकिन अगर हिंदी के लिए कुछ ठोस करना है तो उसकी विरासत को समकालीन बनाने का यत्न किया जाना बेहद जरूरी है। हिंदी के व्याकरण को लेकर बहुत सारी बातें होती हैं, हिंदी में शब्दों की युग्म-रचना को लेकर भी बहसें होती रहती हैं । इन सारे प्रश्नों का जिस किताब में उत्तर है वह पुस्तक अब लगभग अप्राप्य है। पंडित किशोरीदास वाजपेयी की किताब हिन्दी शब्दानुशासन अहम है.,लेकिन वो अब मिलती नहीं है। अगर बहुत जतन के बाद आप इस पुस्तक तक पहुंच भी गए तो इसकी छपाई के अक्षर काफी पुराने हैं, लिहाजा आपको पढ़ने में कठिनाई होगी। नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी से प्रकाशित इस पुस्तक के पुनर्प्रकाशन और पाठकों तक इसकी जानकारी पहुंचाने की कोशिश की जानी चाहिए। इसी तरह से अगर आप हमारे वेदों को देखें तो वो उपलब्ध तो हैं लेकिन उनको समकालीन बनाने की आवश्यकता है। प्रस्तुतिकरण में समकालीन, छपाई में बेहतर अक्षरों का प्रयोग और इन सबसे अलग जो हिंदी में इसका अनुवाद छपा है उसको फिर से देखकर आज के जमाने की हिंदी की अनुसार करना होगा ताकि हमारी आज की युवा पीढ़ी उसको पढ़ समझ सके।   
इसी तरह से अगर हम विचार करें तो हमारे कई ऐसे कवि-लेखक हैं जिनके बारे में, जिनकी रचनाओं के बारे में युवा पीढ़ी को बताने के लिए काम करना होगा। अपनी परंपरा और विरासत तो सहेजकर ही उसकी मजबूत जमीन पर बुलंद इमारत खड़ी की जा सकती है।
अभी हाल ही में केंद्रीय हिंदी निदेशालय के सहयोग से अयोध्या में जगन्नाथदास रत्नाकर पर दो दिन की राष्ट्रीय संगोष्ठी हुई। इस गोष्ठी में जगन्नाथदास रत्नाकर और हिंदी साहित्य में उनके योगदान पर गहन चर्चा हुई। जगन्नाथदास रत्नाकर को ज्यादातर लोग रीतिकालीन कवि और उद्धव शतक के रचयिता के तौर पर जानते हैं, परंतु उनका रचना संसार काफी व्यापक है। कहा जाता है कि उन्होंने जयपुर राजघराने से लेकर बिहारी सतसई का भाष्य प्रस्तुत किया। कुछ लोगों का तो ये भी मानना है कि सूर सागर के संपादन और संकलन का बड़ा हिस्सा उन्होंने ही किया था । उद्धव शतक के रचयिता कविवर जगन्नाथदास रत्नाकर की कर्मभूमि अयोध्या है। वो करीब तीन दशकों तक अयोध्या में रहे और वहीं रहकर उन्होंने उद्धव शतक, गंगालहरी, गंगावतरण, बिहारी सतसई की टीका जैसे कई महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की।अच्छी बात यह रही कि इस गोष्ठी में केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने रत्नाकर के बिखरे साहित्य को सहेजने एवं पुनर्प्रकाशन का ऐलान किया । जगन्नाथदास रत्नाकर के बारे में यह तथ्य अभी तक सामने है कि वो आजादी पूर्व उन्नीस सौ दो में अयोध्या के राजा के निजी सचिव होकर आए थे और वहां रहते हुअ उन्होंने साहित्य के लिए बेहद अहम कार्य किया। उनकी रचनाएं काल की सीमाओ को तोड़ते हुए आज भीअपने बूते पर जिंदा हैं। जरूरत उसको विशाल हिंदी पाठक वर्ग तक पहुंचाने की है ।
टी एस इलियट ने कहा था- ऐतिहासिक बोध उन कवियों के लिए, जो अपनी उम्र के पच्चीस वर्ष बाद भी कवि बने रहना चाहते हैं, लभग अनिवार्य है। इस ऐतिहासिक बोध का मतलब है एक परप्रेक्ष्य, जो अतीत की अतीतता से नहीं, उसकी वर्तमानता से भी संबद्ध हो। ऐतिहासिक बोध व्यक्ति को इसके लिए बाध्य करता है कि वो अपनी अस्थियों में सिर्फ अपनी पीढ़ी को लेकर ही ना लिखे, बल्कि इस अनुभूति के साथ लिखे कि होमर से लेकर आजतक के यूरोप का संपूर्ण साहित्य उसमें अंतर्निहित है। इसमें उसके अपने देश के साहित्य का समांतर अस्तित्व होगा और वह समांतर क्रम में ही रचना करेगा। कवि जग्गनाथदास रत्नाकर में ये गुण है।

हिंदी में लंबे समय तक परंपरा को तोड़ने फोड़ने का काम किया गया और इस तोड़ फोड़ का नुकसान यह हुआ कि हम अपनी विरासत से दूर होते चले गए। अपरंपरा का शोर मचानेवाले तो समय के साथ साहित्य में हाशिए पर चले गए लेकिन जबतक शोर मचाते रहे तबतक साहित्य का बहुत नुकसान कर दिया। कुछ कवियों को आगे बढ़ा दिया तो कुछ के विचारों में कमजोरी पकड़कर उसके बरख्श किसी और कवि को खड़ा करने की कोशिश की गई। मिसाल के तौर पर जिस तरह से आलोचकों में गोस्वामी तुलसीदास और कबीर को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ दिखाई देती है उसको देखा जा सकता है। कबीर को क्रांतिकारी और तुलसी को रूढ़िवादी करार देकर सालों तक तुलसी के कवि रूप पर विचार नहीं किया गया या कह सकते हैं कि तुलसी को सायास हाशिए पर डालने की कोशिश की गई । तुलसी को वर्णाश्रम व्यवस्था का समर्थक और कबीर को रूढ़ियों पर प्रहार करनेवाला रचनाकार बताया जाता रहा। यह तो तुलसी के कवित्व की ताकत थी कि जिसके बूते पर वो पाठकों के मानस पर पीढ़ी दर पीढ़ी बने रहे। सवाल तो उसपर भी खड़े होने चाहिए कि कविता की कसौटी कवि का विचार होना चाहिए या उसकी विचारधारा? हमारा तो मानना है कि कविता को कविता की प्रचलित कसौटी पर ही कसा जाना चाहिए। कविता को विचार और विचारधारा की कसौटी पर कसना कवि के साथ अन्याय करने जैसा है। हिंदी में विचारधारा के आलोचकों ने जब कवियों का विचार और धारा के आधार पर मूल्यांकन शुरू किया तो इस तरह की गड़बड़ियां होने लगीं। जगन्नाथदास रत्नाकर से लेकर अन्य रीतिकालीनऔर भक्तिकालीन कवि हाशिए पर धकेले जाने लगे। अब वक्त आ गया है कि एक बार फिर से हमअपने पूर्ववर्ती रचनाकारों पर गंभीरता से बगैर किसी वैचारिक पूर्वग्रह के विचार करें और मूल्यांकन का आधार साहित्यक हो। सरकारें भी हिंदी का बहुत शोर मचा रही हैं लेकि अगर वो सचमुच हिंदी को लेकर गंभीर हैं तो उनको प्रतीकात्मकता छोड़कर ठोस कार्य प्रारंभ करना होगा। केंद्रीय हिंदी निदेशालय के अलावा भी भारत सरकार के कई संस्थान हैं जो इस तरह के काम को अपने हाथ में ले सकते हैं। कई संस्थाएं तो पुरानी कृतियों के संरक्षण और संवर्धन के लिए हैं। इस बिखने हुए संस्थामों को साथ आकर, गंभीरता से, लोगों को चिन्हित कर इस काम को करवाना होगा।          

Thursday, April 27, 2017

नक्सलियों के ‘गन’तंत्र पर हल्लाबोल

सुकमा में नक्सलियों के तांडव ने एक बार फिर से भारतीय गणतंत्र को चुनौती दी है । सीआरपीएफ के जवानों को घेर कर कत्ल करनेवाले नक्सलियों ने इस इलाके में तैनात राज्य के खुफिया तंत्र की पोल खोलकर रख दी है। घात लगाकर और गांववालों की आड़ में जिस तरह से नक्सलियों ने जवानों को मौत के घाट उतार दिया वो सरकार के लिए बेहद चिंता की बात है। राज्य और केंद्र सरकार के नुमाइंदे लगातार कड़ी कार्रवाई की बात कर रहे हैं लेकिन नियमित अंतराल पर नक्सली जिस तरह से सुरक्षा बलों के जवानों की हत्या कर रहे हैं उससे उनके बुलंद हौसलों का अंदाजा लगाया जा सकता है। छत्तीसगढ़ खासकर सुकमा इलाके में नक्सलियों पर काबू करने के लिए छत्तीसगढ़,ओडिशा और तेलांगाना की सरकार को मिलकर एक कार्यसोजना पर काम करना होगा। तीनों राज्यों की खुफिया तंत्र को मजबूत कर इनपुट साझा करने और बेहतर तालमेल का तंत्र बनाना होगा। जिस दिन सुकमा में नक्सलियों ने खून की होली खेली उसके एक दिन पहले मैं रायपुर में था । वहां के प्रबुद्ध जनों के साथ बातचीत में नक्सल समस्या पर भी बात हुई । एक सज्जन ने बहुत सही तरीके से कहा कि नक्सली अगर हिंसा छोड़कर पिछड़े इलाके का विकास करने लगें तो जनता उनकी दीवानी हो जाएगी। वो अगर सड़क काटने के बजाए पुल बनाने में लग जाएं तो उस इलाके की जनता उनको समर्थन देगी । अभी जनता जान के डर से समर्थन दे रही है लेकिन अगर नक्सली हिंसा का रास्ता छोड़कर विकास के रास्ते पर आते हैं तो सूरत कुछ अलग होगी। फिरक लोकतंत्र में उनकी भागीदारी भी बढ़ेगी। लेकिन उनकी तो गनतंत्र में आस्था है गणतंत्र में नहीं ।
हाल के दिनों में नक्सलियों ने जिस तरह से अपने प्रभाव वाले इलाकों में रंगदारी, वसूली, लड़कियों को जबरन उठाकर शादी करने की घटनाओं को अंजाम दिया है उसकी जड़ में ना तो विचारधारा हो सकती है और ना ही किसी लक्ष्य को हासिल करने का संघर्ष । कौन सी विचारधारा इस बात की इजाजत दे सकता है शिक्षा के मंदिर स्कूल को बम से उड़ा दिया जाए और आदिवासी इलाकों के बच्चों को शिक्षा से वंचित कर दिया जाए । दरअसल नक्सलियों की एक रणनीति यह भी है कि आदिवासियों को शिक्षित नहीं होने दो ताकि उनको आसानी से बरगलाया जा सके । अधिकारों के नाम पर बंदूक उठाने के लिए अशिक्षित आदिवासियों को प्रेरित करना ज्यादा आसान है । इन सबके उसके पीछे सिर्फ और सिर्फ अपराध की मानसिकता है और सरकार को नक्सलियों से अपराधी और हत्यारे की तरह सख्ती के साथ निबटना चाहिए ।

सरकार के अलावा इस देश के तथाकथित व्यवस्था विरोधी बुद्धिजीवी नक्सलियों के रोमांटिसिज्म से ग्रस्त हैं और नक्सलियों के वैचारिक समर्थन को जारी रखने की बात करते हैं । उन्हें नक्सलियों के हिंसा में अराजकता नहीं बल्कि एक खास किस्म का अनुशासन नजर आता है । नक्सलियों की हिंसा को वो सरकारी कार्रवाई की प्रतिक्रिया या फिर अपने अधिकारों के ना मिल पाने की हताशा में उठाया कदम करार देते हैं । नक्सल मित्रों को सुरक्षा बलों के तथाकथित अत्याचार नजर आते और उनकी कार्रवाई को राज्य सत्ता की संगठित हिंसा तक करार देते हैं। दरअसल नक्सलियों के विचारधारा के रोमांटिसिज्म से ग्रस्त ज्यादातर लोग मार्क्सवाद के बड़े पैरोकार हैं या वैसा होने का दावा करते हैं । दरअसल मार्क्सवादियों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है कि उनकी दीक्षा ही हिंसा और हिंसकराजनीति में होती है  उन्नीस सौ साठ में विभाजन के बाद सीपीआई तो लोकतांत्रिक आस्था के साथ काम करती रही लेकिन सीपीएम तो सशस्त्र संघर्ष के बल पर भारतीय गणतंत्र को जीतने के सपने देखती रही  चेयरमैन माओ का नारा लगानेवाली पार्टी चीन केतानाशाही के मॉडल को इस देश पर लागू करने करवाने का जतन करती रही  चीन में जिस तरह से राजनीतिक विरोधियों को कुचल डाला जाता है , विरोधियों का सामूहिक नरसंहार किया जाता है वही इनके रोल मॉडल बने  उसी चीनी कम्युनिस्ट विचारधारा की बुनियाद पर बनी पार्टी भारत में भी लगातार कत्ल और बंदूक की राजनीति को जायज ठहराने में लगी रही । कुछ सालों पहले केरल में एक मार्क्सवादी नेता ने खुले आम सार्वजनिक सभा में हिंसा और मरने मारने की बात की थी । 
अब वक्त आ गया है कि हमें देखना होगा कि जिनकी दीक्षा ही हिंसा और हिंसक राजनीति से शुरू होती है और जिनकी आस्था अपने देश से ज्यादा दूसरे देश में हो उनकी बातों को कितनी गंभीरता से ली जानी चाहिए । मेरा मानना है कि मार्क्स और माओ के इन अनुयायियों की बातों का बेहद गंभीरता से प्रतिकार किया जाना चाहिए । देश की जनता को उनके प्रोपगंडा और उसके पीछे की मंशा को बताने की जरूरत है । जब यह मंशा उजागर होगी तो उनके खंडित यथार्थ का असली चेहरा सामने आएगा । आज देश के बुद्धिजीवियों के सामने नक्सलमित्रों और नक्सलमित्रों की चालाकियों को सामने लाने की बड़ी चुनौती है । इसमें बहुत खतरे हैं । मार्क्सवाद के नाम पर अपनी दुकान चलानेवाले लोग बेहद शातिराना ढंग से आपको सांप्रदायिक, संघी आदि आदि करार देकर बौद्धिक वर्ग में अछूत बनाने की कोशिश करेंगे । अतीत में उन्होंने कई लोगों के साथ ऐसा किया भी है । लेकिन सिर्फ इस वजह से हिंसा की राजनीति को बढ़ावा देने उसको जायज ठहरानेवालों को बेनकाब करने से पीछे हटना अपने देश और उसकी एकता और अखंडता के साथ छल करना है ।