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Tuesday, May 2, 2017

साहित्य का बढ़ता दायरा


हिंदी साहित्य में लंबे समय से पाठकों की कमी का रोना रोया जाता है। पाठकों की कमी को बहुधा साहित्यक कृतियों के वितरण की कमियों से जोड़कर भी पेश किया जाता है। यह माना जाता है कि रचनाएं हिंदी के विशाल पाठक वर्ग तक पहुंच नहीं पाती हैं। देश में इंटरनेट के बढ़ते घनत्व ने पाठकों तक पहुंचने का एक बड़ा अवसर हिंदी के प्रकाशकों और लेखकों को उपलब्ध करवाया है। पिछले एक दशक में देश में तकनीक का फैलाव काफी तेजी से हुआ है । मोबाइल फोन की क्रांति के बाद देश ने टू जी से लेकर फोर जी तक का सफर देखा और अब तो फाइव जी की बात होने लगी है। इसका फायदा उठाने की कोशिशें भी लगातार परवान चढ़ने लगी हैं । पहले डेली हंट नाम के एक एप पर साहित्यक कृतियां बहुत सस्ते में सुलभ हुई फिर किंडल पर हिंदी समेत कई भारतीय भाषाओं की रचनाएं ई बुक्स के फॉर्मेट में पेश की गईं। इस वैकल्पिक वितरण व्यवस्था ने हिंदी साहित्य के पारंपरिक वितरण व्यवस्था को मजबूती प्रदान की, ऐसा माना जाना चाहिए। साहित्यक कृतियां उन लोगों तक पहुंचने लगी जो कंप्यूटर, टैब और स्मार्ट फोन इस्तेमाल कर रहे थे। चंद सालों पहले सोशल मीडिया के बढ़ते कदम के मद्देनजर मोबाइल फर्स्ट का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया था लेकिन अब तो वो आगे बढ़कर मोबाइल ओनली तक पहुंच गया है । यही वजह है कि - अब लगभग सभी कंपनियां स्मार्टफोन की स्क्रीन साइज बढ़ा चुकी हैं । एप्पल जैसा पारंपरिक ब्रांड भी स्क्रीन साइज बढ़ाने को मजबूर हो गया था । इसी तरह सोशल मीडिया में सक्रिय कंपनियों को हिंदी में अपार संभावनाएं नजर आईं । धीरे-धीरे सबने हिंदी को अपनाना शुरू किया । ट्विटर ने हैशटैग के लिए भी हिंदी समेत कई भारतीय भाषाओं को अपने प्लेटफॉर्म पर शामिल किया । अब हिंदी में किए गए ट्वीट ट्रेंड कर सकते हैं, करने लगे भी है । 
स्मार्ट फोन के बढ़ते चलन से पाठकों या दर्शकों को चलते फिरते पढ़ने/ देखने की आदत बढ़ने लगी । बाजार की भाषा में कहते हैं कि उपभोक्ता आन द मूव पढ़ना, देखना चाहता है । अब कृतियों को देखने पढ़ने का आधार यूजर का मूड हो गया ।  लेखकों का एक वर्ग इस मूड के हिसाब से भी लेखन करने लगा। साहित्यक कृतियों के बाजार और उस बाजार पर कब्जे को लेकर रणनीतियां बनने लगीं । अभी हाल ही में एक नए प्रकाशक जगरनॉट ने हिंदी में अपना एप लॉंच किया है। यह एप आईओएस और एंड्रायड दोनों प्लेटफॉर्म पर डाउनलोड किया जा सकता है। इस एप पर एक महीने तक साहित्यक कृतियां मुफ्त में उपलब्ध हैं। जगरनॉट के इस एप पर मौजूद कृतियों को देखकर इस बात का सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि उनकी रणनीति क्या होगी। जिस तरह कि कहानियां या छोटे उपन्यास जगरनॉट ने अपने इस एप पर डाले हैं उसमें प्रकरांतर से यौन प्रसंगों को प्रमुखता दी गई है। साहित्यक कृतियों में रीतिकालीन प्रवृतियों को आधुनिकता के छौंक के साथ प्रस्तुत कर पाठकों की बांधने की रणनीति दिखाई देती है । इस एप के कर्ताधर्ताओं को लगता है कि इस तरह की कहानियां से उनके एप ज्यादा से ज्यादा डाउन लोड हो सकते हैं। संभव है उनकी यह रणनीति तात्कालिक रूप से सफल हो जाए लेकिन दीर्घकालीन सफलता में संदेह है।

जगरनॉट के पहले भी साहित्यक कृतियों को इस तरह के प्लेटफॉर्म पर पेश की गई थी। जैसा कि उपर संकेत किया गया है कि डेली हंट ने सात आठ साल पहले ही इसकी शुरुआत की थी। जहां बहुत सस्ती कीमत पर सुरेन्द्र मोहन पाठक से लेकर फैज तक की कृतियां उपलब्ध थीं। साहित्य की स्तरीय कृतियों की वहां भरमार थी। डेली हंट ने कालांतर में अपना नाम बदला और अब वो न्यूज हंट के नाम से मौजूद है। इसके अलावा प्रतिलिपि का भी अपना एक एप है जहां पाठक एंड्रायड प्लेटफॉर्म पर उसको डाउनलोड कर कहानियां और कविताएं पढ़ सकते हैं । साहित्य कृतियों की ऑनलाइन उपलब्धता बढ़ी है। यह साहित्य के लिए बेहतर स्थिति है। लेकिन अगर हम इस तरह के एप आधारित प्लेटफॉर्म के अर्थशास्त्र पर बात करें तो स्थिति बहुत आसान दिखाई नहीं देती है। आज ये समय में किसी भी उत्पाद का एप बनवाना बहुत आसान है। उस एप को उपभोक्ताओं के मोबाइल पर डाउनलोड करवाना और फिर उसको उनके मोबाइल में बनाए रखना बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण काम है। एप को डाउनलोड करवाने का काम तो कंपनियां कर रही हैं लेकिन उसको बनाए रखने का कोई तंत्र अभी विकसित नहीं हो पाया है। इस लिहाजा से देखें तो साहित्यक एप को पाठकों के मोबाइल या अन्य डिवाइस पर बनाए रखना बहुत मुश्किल है। अगर जगरनॉट या अन्य कंपनियां अपने एप को बनाए रखने में सफल रहती हैं तो यह साहित्य के लिए बेहतर स्थिति होगी। इससे हिंदी साहित्य का दायरा बढ़ेगा और पुस्तकों के संस्करणों की घटती संख्या की भारपाई हो सकेगी। हिंदी साहित्य के लेखकों की पहुंच भी विशाल पाठक वर्ग तक हो सकेगी ।    





3 comments:

वंदना शुक्ला said...

जगर नॉट की ये अच्छी पहल है |यद्यपि ऑन लाइन किताबों को पढ़ना अभी भारतीय पाठकों की आदत में शामिल नहीं हुआ है लेकिन वक्त की रफ़्तार देखते हुए कहा जा सकता है कि यदि ये एप पाठकों को इस मंच पर एकत्रित करने में सफल रहा तो ऑन लाइन किताबों की दुनिया में इसे एक बड़ी उपलब्धि की तरह देखा जाएगा |ये अलग बात है कि ऑन लाइन किताबें सामान्य किताबों का स्थान कभी नहीं ले सकतीं | अलावा इसके उक्त एप को विषय चयन में ये सावधानी भी बरतनी लाजमी है कि बाज़ार की ''हवा' का रुख करते हुए कहीं एप बाजारू न हो जाए |

विकास नैनवाल said...

ये बात सही है कि पाठक एप्प को डाउनलोड तो कर लेंगे लेकिन फिर उसको फोन में रखे रखेंगे या नहीं। मेरे पास डेली हंट का एप्प है लेकिन मैंने वो इसीलिए लिया था क्योंकि उसमे पाठक साहब के वो उपन्यास हैं जिनकी हार्डकॉपी उपलब्ध नहीं है। व्यक्तिगत तौर पर मैं ई बुक तभी पढता हूँ जब वो या तो पब्लिक डोमेन में हो या उसकी हार्ड कॉपी उपलब्ध न हो या अगर उपलब्ध हो लेकिन उसकी कीमत ई बुक की कीमित में जमीन आसमान का फर्क हो।

लेख में लिखा है कि डेली हंट का नाम बदलकर न्यूज़ हंट हो गया है लेकिन असल में न्यूज़ हंट का नाम बदलकर डेली हंट कर दिया था।

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’देश के दुश्मन - बाहर भी, भीतर भी : ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...