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Saturday, February 22, 2020

यथार्थ की आड़ में कमी छिपाते निर्देशक


इन दिनों हिंदी फिल्मों के बदलाव को लेकर काफी बातें होती हैं। बदलाव की इन बातों में कथानक, फॉर्म, क्राफ्ट से लेकर तकनीक और संगीत तक पर चर्चा होती है। ये चर्चा होनी भी चाहिए। दरअसल सिनेमा एक ऐसा माध्यम है जिसमें लगातार बदलाव करते रहने की जरूरत भी है क्योंकि दर्शक एकरसता से उब जाते हैं। हिंदी फिल्मों में आ रहे इन तमाम बदलावों के बीच पिछले तीन चार वर्षों से एक बात अधिक सुनने को मिल रही है कि अब हिंदी फिल्मों की कहानियां यथार्थ के ज्यादा करीब पहुंच रही हैं। विकी डोनर से लेकर दम लगा के हइशा, बरेली की बर्फी जैसी फिल्में बनीं और लोगों ने इसको पसंद भी करना शुरू किया तो छोटे शहरों की बड़ी कहानियों की बातें शुरू हो गईं। फिर मुल्क, आर्टिकल 15, पिंक जैसी फिल्में भी आईं जो सफलता के फॉर्मूले को न अपनाते हुए कहानी के साथ चलीं। सफल भी हुईं। 2015 में बनारस की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म मसान आई। बेहद शानदार फिल्म, कलाकारों का सधा अभिनय भी। इस तरह की फिल्मों को कालांतर में कंटेट फिल्म कहा जाने लगा। ये नामकरण ठीक वैसा ही है जैसे हिंदी में नई वाली हिंदी को चलाने की कोशिश की गई। कंटेंट फिल्म कहने का अभिप्राय चाहे जो भी रहा हो लेकिन इससे एक अलग भाव यह भी निकलता है कि सिर्फ इन्हीं फिल्मों में कंटेंट है और अन्य फिल्में कंटेंटविहीन हैं। ऐसा नहीं है, इस कोष्ठक से बाहर की फिल्मों में भी कंटेंट होता है। दरअसल जिन कथित फॉर्मूलाबद्ध फिल्मों से खुद को अलग दिखाने की कोशिश में कंटेंट फिल्मका नाम चलाने की कोशिश की जा रही है वो फिल्में पहले भी थीं और आगे भी रहेंगी।
 हिंदी फिल्मों के इतिहास पर नजर डालें तो ये बहस बहुत पुरानी है। आजादी के बाद जब राज कपूर फिल्में बना रहे थे तब भी उनके सामने ये प्रश्न आया था। तब ये थोड़े बदले हुए रूप में आया था जब फिल्मों को बौद्धिक और संवेदनशील फिल्मों की श्रेणी में बांटकर देखा जाता था। राज कपूर फिल्मों को बौद्धिक माध्यम नहीं मानते थे उनका मानना था ये माध्यम संवेदना से चलता है। और वो इस बात को कहते भी थे। राज कपूर की बात सच भी है। हिंदी फिल्मों के इतिहास में अबतक ज्यादातर दर्शकों को वही फिल्में पसंद आती हैं या आ रही हैं जो कहानी को संवेदना की जमीन पर बुनती हैं। संवेदना से अलग खुरदरे यथार्थ को पेश करनेवाली फिल्में थोड़े दिनों के लिए चर्चा तो हासिल कर सकती हैं लेकिन ये चर्चा बेहद अल्पजीवी होती है। इसका सबसे सटीक उदाहरण अनुराग कश्यप नाम के एक निर्देशक हैं। अबतक इस निर्देशक ने जितनी भी फिल्में बनाई हैं, उनमें से ज्यादातर एक खास वर्ग द्वारा प्रशंसित रही हैं, दर्शकों में व्याप्ति का दायरा बेहद छोटा रहा। कहा जा सकता है कि इन साहब की फिल्में सुपरफ्लॉप लेकिन क्रिटिकली अकेल्मड फिल्मों की स्मारक हैं। यथार्थ के नाम पर फूहड़ता और अश्लीलता परोसने में इनको महारथ हासिल है। खैर ये अलहदा विषय है जिसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी।
ये सही है कि इन दिनों हिंदी फिल्मों के विषय अपेक्षाकृत यथार्थ के करीब जाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इस बात को रेखांकित करना भी आवश्यक है कि यथार्थ के करीब जाने में वो जीवन को जस का तस उठा कर रख देने की ओर भी बढ़ने लगे हैं। जीवन को जस का तस रखने का अर्थ है कि वो सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन के उन प्रसंगों या उन घटनाओं को उसी तरह से फिल्मा कर दर्शकों के लिए पेश कर देना। व्यक्तिगत जीवन में कई ऐसे पल होते हैं जिनको सीधे सीधे फिल्मों में नहीं उतारा जा सकता है, उसको दिखाने की एक न्यूनतम मर्यादा अपेक्षित होती है। फिल्मों में जीवन जस का तस पेश करने की प्रवृत्ति पर ध्यान देने के लिए क्रेंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड है लेकिन इंटरनेट के माध्यम से चलनेवाले प्लेटफॉर्म पर पेश किए जानेवाले कंटेंट पर ध्यान देने की कोई प्रविधि अभी है नहीं। इसका नतीजा क्या है। यथार्थ के नाम पर फूहड़ता, अश्लीलता, भयानक हिंसा, जुगुप्साजनक यौनिक दृश्य का चित्रांकन। इस स्तंभ में ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म (ओटीटी) पर चलनेवाले वेब सीरीज को लेकर पहले भी कई बार चर्चा हो चुकी है। इस माध्यम के विनियमन को लेकर भी चर्चा हो चुकी है। सरकार ने वेब सीरीज की दशा और दिशा को लेकर एक-दो बैठक भी कर ली है। अबतक नतीजा कुछ नहीं निकला है। हो सकता है सरकार इन सीरीज पर पेश किए जा रहे कंटेंट को लेकर संतुष्ट हो गई हो।
अभी हाल ही में नेटफ्लिक्स पर एक सीरीज आई है नाम है जामताड़ा। दस एपिसोड में पेश किए गए इस सीरीज के केंद्र में झारखंड का कस्बा जामताड़ा है जहां से बैंक फ्रॉड की वारदात को अंजाम दिया जाता है। अब अगर इस सीरीज को ही देखें तो इसमें जीवन को जस का तस दिखाने की प्रवृत्ति के कई प्रसंग हैं। इस वेब सीरीज में गालियों की भरमार है, कोई भी एपिसोड ऐसा नहीं है, बल्कि ये भी कह सकते हैं कि लगभग सभी प्रसंगों में गालियां उपस्थित हैं। जामताडा के युवाओं को इस तरह से पेश किया गया है कि प्रतीत होता है कि वहां का युवा कोई वाक्य बगैर गाली के बोलता ही नहीं है। हद तो तब हो जाती है जब नायक अपनी प्रेमिका से प्रेम प्रसंगों में गाली में ही बात करता है। ये यथार्थ है या फिर सारी सामाजिक वर्जनाओं को छिन्न भिन्न कर मुनाफा कमाने की युक्ति। इसपर विचार करने की जरूरत है। सरकार से अधिक निर्माताओं और निर्देशकों को समझने की जरूरत है। जामताड़ा की भाषा को लेकर भी इस वेब सीरीज में घालमेल किया गया है। कनटाप शब्द कानपुर से इतना जुड़ा है कि हिंदी पट्टी का कोई भी व्यक्ति इसको जानता है। जब इस सीरीज जामताडा में वहां के स्थानीय लड़के अपने संवाद मे कनटाप का प्रयोग करते हैं तो ये संवाद लेखक से लेकर निर्देशक के अज्ञान को ही दर्शकों के सामने पेश करता है। इसके अलावा भी अगर इस वेब सीरीज को देखें तो जाति व्यवस्था को सूक्ष्मता से समझे बगैर पात्रों के जातीय वर्गीकरण को चित्रित करने की कोशिश की गई है। जामताडा में जिस सहजता के साथ अपराधी बैंक में पैसे जमा करते और निकालते हैं वो भी यथार्थ से दूर नजर आता है। अगर आप बैंकों के फ्रॉड को लेकर कोई सीरीज बना रहे हैं तो इसके लिए न्यूनतम शोध तो अपेक्षित ही होता है।
यथार्थ के नाम पर कहानी के लोकेशन और गाली वाली भाषा को पेश करने की जो भेड़चाल इस दौर की वेब सीरीज में दिखाई देती है उसपर भी विचार करना होगा। यथार्थ के चित्रण के लिए जिस कौशल की जरूरत होती है वो न तो अनुराग कश्यप में है और न ही गाली गलौच और अश्लीलता दिखाने वाले निर्देशकों में। दरअसल इस तरह के लोग अपनी कमजोरियों को ढ़कने के लिए गालियों, हिंसा और यौनिक दृश्यों का सहारा लेते हैं। इसका नतीजा ये होता है कि फिल्म या वेब सीरीज के क्राफ्ट या निर्देशकों के कौशल पर बात नहीं होती है और सारी चर्चा इन गालियों और फूहड़ता पर केंद्रित हो जाती है। समांतर सिनेमा के दौर में भी फिल्मों में यथार्थ दिखाया जाता था चाहे वो गोविंद निहलानी की फिल्में हों या श्याम बेनेगल की या महेश भट्ट की। इनकी फिल्मों में भी यथार्थ होता था, वैसा य़थार्थ जो बगैर लाउड हुए जीवन को दर्शकों के सामने पेश करता था। 1982 में महेश भट्ट निर्देशित एक फिल्म आई थी अर्थ। इस फिल्म में समाज का ऐसा यथार्थ है जिसकी चर्चा फिल्म बनने के करीब चार दशक बाद अब भी होती है। फिल्म का अंतिम दृश्य जिसमें नायिका शबाना और नायक कुलभूषण खरबंदा का संवाद है वो इतना पॉवरफुल है कि अब भी दर्शकों के मानस पटल पर अंकित है। उस यथार्थ के चित्रण में फिल्मकार का कौशल दिखाई देता था। उनको अपने कौशल पर भरोसा होता था और वो उसी भरोसे के आधार पऱ फिल्म बनाते थे और उसी कौशल ने उनकी फिल्मों को अबतक जिंदा रखा है, उसकी चर्चा होती है। अब जिस कंटेंट फिल्म की चर्चा हो रही है उसको कबतक याद रखा जाएगा ये तो आनेवाले समय में पता चलेगा। लेकिन यथार्थ की आड़ में अपनी कमी छुपाने वाले निर्देशक इतिहास में गुम हो जाएंगे इस बात को समझने के लिए किसी समय का इंतजार नहीं करना होगा।  

Thursday, February 20, 2020

पुरस्कार से उठते विवादों के बोल


हिंदी फिल्मों के लंबे इतिहास में पुरस्कारों को लेकर विवाद उठते रहे हैं। ताजा विवाद उठा है गीतकार मनोज मुंतशिर के एक फैसले से। इस वर्ष के फिल्मफेयर अवॉर्ड की घोषणा के बाद मनोज मुंतशिर ने ट्वीटर पर ये एलान किया कि वो अब किसी अवॉर्ड फंक्शन का हिस्सा नहीं होंगे। ऐसा प्रतीत होता है कि वो इस बात से खफा हो गए कि फिल्म केसरी के लिए लिखे उनके गीत की बजाए गली बॉय के गीत अपना टाइम आएगा को फिल्मफेयर अवॉर्ड से पुरस्कृत कर दिया गया। मनोज इतने क्षुब्ध हो गए कि उन्होंने यहां तक कह दिया कि अगर वो अब भी अवॉर्ड का ध्यान रखते हैं तो ये उनकी कला का अपमान होगा। मनोज मुंतशिर अपने लिखे गीत को पुरस्कृत गीत से बेहतर मानते हैं इस वजह से दुखी हैं। उन्होंने अपने दुख को सार्वजनिक भी किया, बाद में उनका एक बयान भी प्रकाशित हुआ कि पूरा देश उनके साथ खड़ा है और गीत तेरी मिट्टी किसी भी पुरस्कार से परे है। मनोज मुंतशिर ने जिस तरह से पूरे मसले को सामने रखा उसको देखते हुए मुझे यतीन्द्र मिश्र की पुस्तक लता सुरगाथा का एक प्रसंग याद आ गया जिसमें लता जी कहती हैं आपसे एक दिल की बात शेयर कर रही हूं, वह यह कि मुझे पूरी उम्मीद थी कि वो कौन थी के लिए मदन मोहन को फिल्मफेयर पुरस्कार मिलेगा। उनको वह नहीं मिला, इसके लिए मुझे व्यक्तिगत तौर पर बहुत दुख हुआ था। मैंने मदन भैया से उनके घर जाकर यह व्यक्त भी किया था कि मुझे उम्मीद थी कि ये पुरस्कार इस साल आपको मिलेगा, मगर नहीं मिला। इसपर मदन भैया ने मुझसे कहा था, लता! तुमको अगर यह लगता है कि मुझको ये पुरस्कार मिलना चाहिए था और तुम्हें इस बात से तकलीफ है कि मुझे यह नहीं मिला, तो समझ लो कि मुझे यह पुरस्कार आज मिल गया। इससे बड़ा पुरस्कार मेरे लिए क्या होगा कि तुम्हें लगता है और न मिलने का दुख है। मनोज का लिखा गीत भी देश के लाखों लोगों को पसंद है यही उनका पुरस्कार है।
फिल्मफेयर अवॉर्ड को लेकर हमेशा से विवाद होते रहे हैं और हिंदी फिल्मों से जुड़े ज्यादातर लोगों को इसकी हकीकत पता भी है। इस हकीकत को ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा खुल्लमखुल्ला में बयां भी किया है। अपने और अमिताभ बच्चन के संबंधों पर ऋषि कपूर ने लिखा है कि फिल्म कभी-कभी की शूटिंग के दौरान उनके और अमिताभ के बीच शीतयुद्ध जैसी स्थिति थी और दोनों में बातचीत भी नहीं होती थी। ऋषि को लगता था कि अमिताभ इस बात से खफा थे कि ऋषि को बॉबी फिल्म के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था क्योंकि उनको लगता था कि उसी साल रिलीज हुई फिल्म जंजीर के लिए ये पुरस्कार उनको मिलना चाहिए था। ऋषि कपूर ने असली कहानी इसके बाद बताई, दरअसल वो पुरस्कार मैंने खरीदा था, मैं अनुभवहीन था और मेरा एक पीआरओ था तारकनाथ गांधी, उसने मुझसे कहा कि सर तीस हजार दे दो तो आपको मैं अवॉर्ड दिला दूंगा। मैंने बगैर कुछ सोचे समझे उसको तीस हजार दे दिए। तब मेरे सेक्रेटरी घनश्याम ने भी मुझे कहा था कि सर देते हैं, मिल जाएगा अवॉर्ड इसमें क्या है।तीस हजार रुपए देने के बाद उस साल का फिल्मफेयर अवॉर्ड ऋषि कपूर को मिल गया। बाद में किसी ने अमिताभ बच्चन को सारी बातें बता दीं। ऋषि कपूर के फिल्मफेयर पुरस्कार खरीदने की बात जानकर अमिताभ नाराज हो गए थे। इस तरह से देखा जाए तो फिल्मफेयर अवॉर्ड की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। मनोज मुंतशिर जो बात कहते हैं कि उनके गीत पुरस्कारों से परे हैं तो उसको ही सार्वजनिक जीवन में जीना भी चाहिए।   



Saturday, February 15, 2020

वैचारिक जकड़न से आजाद होते उपन्यास

हिंदी कथा परिदृश्य की अगर बात करें तो हम पाते हैं कि पिछले कुछ सालों में इसने अपने भूगोल का विस्तार किया है। वामपंथी विचार के प्रभाव में खास तरह की कहानियां या उपन्यास लिखे जा रहे थे। ये दौर बहुत लंबे समय तक चला और एक खास तरह की फॉर्मूलाबद्ध कहानियां और उपन्यास लिखे जाते रहे। एक गरीब होगा, उसका संघर्ष होगा, समाज के प्रभावशाली व्यक्ति के गरीबों के शोषण का चित्र होगा, उसमें लंबे लंबे वैचारिक आख्यान होगें और फिर कई बार सुखांत को कई बार दुखांत होगा। ये कथा-प्रविधि चलती रही। कुछ लेखक इससे हटकर भी लिखते रहे लेकिन जोर इसी तरह के लेखन का रहा। दुनिया को बदलने का स्वप्न देखनेवाले कथा लेखक अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता की वजह से अपनी कहानियों या उपन्यासों को भी दुनिया को बदलने का औजार बनाते चले गए।  जब इस तरह के औजार के प्रयोग हुआ तो उसने हिंदी के पाठकों को चौंकाया। लेकिन जब यही प्रविधि ज्यादातर लेखक लगातार उपयोग करने लगे तो पाठकों के बीच एक खास किस्म की ऊब पैदा हुई।
विचारधारा की जकड़न वाले ऐसे कथा लेखक इस बात का प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से उद्घोष भी करते रहे कि वो विचारधारा के पोषण के लिए और उसको मजबूत करने के लिए लिखते हैं। वो पाठकों की परवाह भी नहीं करते थे, बाजार की परवाह करना तो खैर उनकी मातृ-विचार के खिलाफ ही था। इसका दुष्परिणाम हिंदी साहित्य को झेलना पड़ा। एक समय ऐसा भी आया जब हिंदी साहित्य जगत में पाठकों की कमी को लेकर विमर्श शुरू हो गया। बड़े बड़े संस्थानों से लेकर साहित्यिक पत्रिकाओं में हिंदी के पाठकों की कमी का रोना रोते हुए लेख आदि छपने लगे। पाठकों की कमी की बात जब मुखर होने लगी तो उसी दौर में ये बाते में भी सामने आने लगीं कि हिंदी के कहानी संग्रह और उफन्यासों का संस्करण तीन सौ प्रतियों का होने लगा। लेकिन कभी भी इस बात की पड़ताल करने की कोशिश नहीं की गई कि पाठक क्यों कथा साहित्य से दूर जाने लगे हैं। लेखकों ने पाठकों की रुचि का ध्यान नहीं रखा और कहते भी थे कि वो रुचि का ध्यान रखकर लेखन नहीं कर सकते हैं। अगर बाजार की भाषा में इसको समझने की कोशिश करें तो कह सकते हैं कि वामपंथी लेखकों ने उपभोक्ता यानि पाठकों की रुचि का ध्यान नहीं रखा। वो रवीन्द्रनाथ टैगोर का कहा भी भूल गए। टैगौर साहब ने साहित्य की सामग्री नामक अपने लेख की शुरुआत में ही कहा था- केवल अपने लिए लिखने को साहित्य नहीं कहते हैं- जैसे पक्षी अपने आनंद के उल्लास में गाता है उसी प्रकार हम भी अपने आनंद में विभोर होकर केवल अपने लिए ही लिखते हैं, मानो श्रोता या पाठक का उस से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता। यह बात बिल्कुल निर्विवाद रूप से नहीं कही जा सकती कि पक्षी जब गाता है तब वह पक्षी समाज जरा भी उसके ध्यान में नहीं होता। यदि नहीं होता को न सही, इस बात पर तर्क करने से लाभ ही क्या है? परंतु यह तो मानना ही पड़ेगा कि लेखक की रचना का प्रधान लक्ष्य पाठक-समाज होता है।लेकिन वामपंथी लेखकों ने पाठक समाज को ध्यान में नहीं रखा उनका लक्ष्य तो कथा साहित्य से अपनी विचारधारा को पुष्ट करना था।  
जब वामपंथी विचारधारा का पराभव शुरू हुआ तो हिंदी साहित्य का कथा लेखन भी इस वैचारिक लेखन से मुक्त होने लगा। इसके बीच आर्थिक उदारीकरण के बाद के दौर में ही कथाभूमि में पड़ने शुरू हो गए थे। इक्कीसवीं सदी के आरंभ में बदलाव का ये पौधा उगना शुरू हो गया था और लोगों ने इससे अलग हटकर उपन्यास लिखना शुरू कर दिया था। इसी दौर में मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों ने अपनी नवीनता की वजह से हिंदी के पाठकों का ध्यान आकृष्ट किया था। भगवानदास मोरवाल का उपन्यास रेत और मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास अल्मा कबूतरी ने पाठकों को कथा के ऐसे प्रदेश से परिचय करवाया जिस ओर जाने से हिंदी के उपन्यास लेखक हिचकते थे। इन दोनों उपन्यासों में लेखकों ने जिन समुदायों को कथा के केंद्र में रखा है उसके जीवन को पाठकों के सामने पेश करने की कोशिश की, मोरवाल ने कुछ हिचक के साथ तो मैत्रेयी ने बोल्ड होकर। हम इन दोनों उपन्यासों को विचारधारा से मुक्त होने का प्रस्थान बिंदु मान सकते हैं। हलांकि मोरवाल के उपन्यासों में उसके अवशेष यदा कदा दिख जाते हैं।
इसके बाद के कथा लेखन खास तौर पर उपन्यासों को देखें तो वहां वैचारिक प्रतिबद्धता को पाठकों की रुचि ने विस्थापित कर दिया। नए लेखकों ने विश्वविद्यालय कैंपस की जिंदगी को विषय बनाया और पाठकों ने उनको खूब पसंद किया। इनमें से कुछ लेखक अब कैंपस से बाहर निकल गए हैं और उन्होंने अपने दायरे का विस्तार कर लिया जबकि कई लेखक अब भी कैंपस के ही चक्कर लगा रहे हैं। इनमें से जो लेखक कैंपस से बाहर निकल गए हैं उनकी व्याप्ति बढ़ी है और जो कैंपस में ही अटके हैं उनसे अपेक्षा की जा रही है कि वो अपनी कथाभूमि का विस्तार करें। पिछले दो तीन सालों को देखें तो कथा भूमि का और विस्तार दिखाई देता है। अब उपन्यासों के विषयों में पहले की अपेक्षा अधिक विविधताएं दिखाई देने लगी हैं। हिंदी का लेखक समाज बहुत बड़ा है और उसी अनुपात में पुस्तकें भी प्रकाशित होती हैं। लेकिन जिन उपन्यासों ने अपनी विषयगत नवीनता की वजह से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा उसमें पर्यावरण पर लिखा उपन्यास है, उसमें समाज में व्याप्त कानूनी असामनता को लेकर लिखा गया उपन्यास है। पिछले वर्ष के अंतिम महीने में दो ऐसे उपन्यास आए जिसने अपनी विशयगत नवीनता से पाठकों को चौंकाया। रत्नेश्वर ने फिर से पर्यावरण को अपने उपन्यास का विषय बनाया। उनका उपन्यास एक लड़की पानी पानी ने पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसमे रत्नेश्वर ने पानी की समस्या को बेहद रोचक तरीके से उठाया है। स उपन्यास के केंद्र में पानी की समस्या है, उपन्यास के पात्रों के बीच पानी की कमी को लेकर चलनेवाला विमर्श है जो भविश्य के खतरों के प्रति लोगों को आगाह भी करती है। इसी तरह से भगवानदास मोरवाल ने अपने नए उपन्यास वंचना में महिलाओं और बच्चों के लिए बनाए गए कानून की खामियों को विषय बनाया है। इस उपन्यास में मोरवाल ने बेहद सधे हुए अंदाज में संवेदनशील तरीके से उन स्थितियों की चर्चा की है। इन दोनों उपन्यासों में लेखकों के सामने अपनी कृतियों को पठनीय बनाए रखने की चुनौती थी जिसका सामना दोनों ने बखूबी किया। इस तरह के विषय हिंदी उपन्यासों के लिए पहले बिल्कुल नहीं सोचे गए थे। अगर लिखे गए हों तो संभव है कि मेरी नजर में ना आए हों। मार्क्सवादी लेखकों ने तो पर्यावरण को इस वजह से अपने लेखन में तवज्जो नहीं दी क्योंकि उनके आराध्य ने ही इस विषय पर कुछ नहीं देखा। दुनिया बदवे का स्वप्न देखते देखते बदलती हुई दुनिया उऩसे छूट गई।
ऐतिहासिक, पौराणिक और मिथकीय चरित्रों पर पहले भी लेखन होता था और अब उसमें काफी वृद्धि हुई है। राष्ट्रवाद के दौर में पाठकों की रुचि को ध्यान में रखकर ढेर सारे लेखकों ने महाभारत और रामायण के चरित्रों को लेकर उपन्यास लिखे। पहले नरेन्द्र कोहली ने अकेले इन विषयों पर विपुल लेखन किया जिसे बाद में अमीश से लेकर कई अन्य लेखकों ने बढाया। लेकिन पिछले ही साल नरेन्द्र कोहली का एक उपन्यास सागर मंथन प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने कथा के एक बिल्कुल नए क्षेत्र में प्रवेश किया जिसमें पौराणिकता के साथ साथ विज्ञान भी है। इस तरह से हम कह सकते हैं कि जो हिंदी में कथा साहित्य का जो मौदूदा दौर है उसको विचारधारा की गुलामी से मुक्त होने का दौर कह सकते हैं। उसको वर्तमान और भविष्य की चिंताओं को अपने अपने उपन्यासों का विषय बनाकर पाठकों के समक्ष ले जाने का जोखिम उठाने का दौर है। इस दौर को पाठकों या व्यापक हिंदी समाज की रुचियों की पूर्ति का दौर भी कह जा सकता है। यह अकारण नहीं है कि अब प्रकाशक लगातार सार्वजनिक तौर पर अपनी पुस्तकों के नए संस्करणों की बात करने लगे हैं। वो खुलकर ये बताने लगे हैं कि अमुक उपन्यास या अमुक पुस्तक की इतनी प्रतियां बिकीं। इस बदलाव को एक सुखद बदलाव के तौर पर भई देखा और रेखांकित किया जाना चाहिए। ये दौर उन आलोचकों के लिए भी चुनौती का दौर है जो सिर्फ उन्हीं पुस्तकों पर विचार करते रहे हैं जो उनकी विचारधारा के करीब रही है।

Wednesday, February 12, 2020

बल्लीमारान के ‘प्राण’


उर्दू के मशहूर शायर गालिब और हिंदी फिल्मों के शानदार अभिनेता प्राण दिल्ली की मिट्टी जोड़ती है। अपनी शादी के बाद गालिब अब के पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान में रहने चले आए थे वहीं अपनी शादी के बाद प्राण बल्लीमारान छोड़कर लाहौर चले गए थे। बल्लीमारान के एक खानदानी रईस परिवार में प्राण का जन्म हुआ था। प्राण के पिता लाला केवल कृष्ण सिकंद पेशे से सिविल इंजीनियर थे और ब्रिटिश हुकूम के दौरान सरकारी निर्माण का ठेका लिया करते थे। केवल कृष्ण सिकंद को सरकारी इमारतों, सड़कों और पुल बनाने का विशेषज्ञ माना जाता था और जहां भी सरकार को इस तरह का काम करवाना होता था तो वो उनको बुलाकर ठेके देती थी। सिकंद परिवार की बल्लीमारान ही क्या पूरी दिल्ली में बहुत प्रतिष्ठा थी और वो आर्थिक रूप से बहुत संपन्न थे। प्राण की जन्म तिथि को लेकर भी एक दिलचस्प कहानी है। प्राण बताते थे कि उनकी बुआ कहा करती थीं कि तुम्हारा जन्म 1920 के फरवरी के तीसरे सप्ताह में हुआ था। प्राण जब ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने पहुंचे तो फॉर्म में जन्मतिथि का कॉलम था लेकिन उनको तिथि पता नहीं थी। अपनी बुआ की फरवरी के तीसरे सप्ताह वाली बात याद करके उन्होंने 20 फरवरी की तारीख फॉर्म में भर दी, जो उनकी आधिकारिक जन्मतिथि बन गई। इस बीच प्राण एक अभिनेता के तौर पर मशहूर होने लगे थे और पत्र-पत्रिकाओँ में उनके बारे में छपने लगा था।
अचानक एक दिन प्राण को बल्लीमारान के एक निवासी का पत्र मिला। उन्होंने प्राण को लिखा कि एक लेख में मैंने आपकी जन्मतिथि 20 फरवरी 1920 पढ़ी है लेकिन मेरे पास इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं कि आपकी जन्मतिथि 12 फरवरी 1920 है। पत्र पढ़ने के बाद प्राण की उत्सुकता बढ़ी और उन्होंने पत्र का उत्तर लिखा और थोड़े चुनौती भरे अंदाज में उनसे पूछा कि आपके पास क्या प्रमाण है। कुछ दिन बीत गए। प्राण इस बात को भूल गए थे अचानक एक दिन वो अपनी डाक देख रहे थे तो एक लिफाफा में उनको अपना मूल जन्म प्रमाण पत्र दिखा जिसपर उनके जन्म की तिथि 12 फरवरी 1920 लिखी थी। प्रमाण पत्र के साथ उसी व्यक्ति का एक पत्र भी था जिसमें उन्होंने बताया था कि वो नगरपालिका का कर्मचारी था और उसने प्राण का जन्म प्रमाण पत्र देखा था। प्राण ने उस व्यक्ति को धन्यवाद का पत्र लिखा और तब से उनकी जन्मतिथि 12 फरवरी 1920 हो गई। 12 फरवरी 2020 को प्राण के सौ साल पूरे हो गए।
प्राण के पिता के पेशे की वजह से उनका स्थान परिवर्तन होता रहता था। जब भी कोई नया ठेका मिलता तो वो परिवार के साथ वहां शिफ्ट कर जाते। प्राण ने रामपुर के स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास की। लेकिन प्राण का पढ़ाई में मन नहीं लगता था। मैट्रिक पास करने के बाद एक दिन उनके पिता ने बुलाकर पूछा कि आगे क्या पढ़ोगे तो प्राण ने कहा कि वो अब पढ़ना नहीं चाहते हैं और फोटोग्राफी सीखना चाहते हैं। कुछ दिनों तक सोचविचार करने के बाद प्राण के पिता लाला केवल कृष्ण सिकंद ने बेटे को अपने मन की करने की अनुमति दे दी लेकिन साथ ही एक शर्त भी लगा दी वो कनॉट प्लेस स्थित ए दास एंड फोटोग्राफर्स में प्रशिक्षण लें। प्राण को मालूम था कि ए दास एंड फोटोग्राफर्स के मालिक उनके पिता के दोस्त हैं तो वो भी तैयार हो गए। प्राण ने वहां फोटोग्राफी की ट्रेनिंग के साथ साथ फिल्म को डेवलप और प्रिंट करने की कला भी सीखी। अब यहां से नियति प्राण को अभिनय की ओर ले गई। ए दास एंड कंपनी ने शिमला में एक शाखा खोली तो प्राण को वहां भेज दिया। शिमला में रहकर प्राण ने फोटोग्राफी में निपुण तो हुए ही वहां ही पहली बार अभिनय भी किया। वहां आयोजित होनेवाली वार्षिक रामलीला में उन्होंने सीता का अभिनय किया। उस रामलीला में उनके साथ राम की भूमिका मदनपुरी ने निभाई थी जो बाद में हिंदी फिल्मों के मशहूर अभिनेता बने।
शिमला में अपने कारोबार से उत्साहित होकर ए दास एंड कंपनी ने लाहौर में अपनी दुकान खोली और प्राण को वहां भेज दिया। लाहौर की रामलुभाया की पान दुकान पर उस समय फिल्म यमला जट लिख रहे लेखक वली मुहम्मद वली ने प्राण को पान खाते देखा और उनका अंदाज इतना भाया कि उन्होंने वहीं उनको फिल्म का ऑफर दे दिया। प्राण ने ए दास कंपनी की सौ रुपए की नौकरी छोड़कर पंचोली आर्ट स्टूडियो की पचास रुपए की नौकरी कर ली। इस बीच ये खबर बल्लीमारन में रहनेवाले उनके पिता तक पहुंची। वो थोड़े झुब्ध हो गए क्योंकि उस वक्त फिल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। प्राण के पिताजी ने उनको दिल्ली बुला लिया और फिल्म छोड़कर कोई और काम करने को कहा। प्राण फिर से ए दास एंड कंपनी से जुड़े लेकिन उनका मन नहीं लग रहा था। फिर घर के बड़े लोगों ने मिलकर तय किया कि उनकी शादी कर दी जाए। दिल्ली के ही एक संपन्न अहलूवालिया परिवार की लड़की से उनकी शादी तय कर दी गई। इस बीच उनके पिता का निधन हो गया। पिता के निधन के बाद प्राण फिर से फिल्मों में काम करने के लिए बल्लीमारान की गलियां छोड़कर लाहौर जा पहुंचे। लेकिन शादी तो तय हो चुकी थी। लड़की वाले प्राण के फिल्मों में काम करने को लेकर थोड़े सशंकित थे लेकिन उनकी लड़की और प्राण दोनों पहले मिल चुके थे और कह सकते हैं कि प्रेम भी अंकुरित हो चुका था। 1945 में प्राण की शादी हुई। शादी के बाद प्राण ने दिल्ली जरूर छोड़ा लेकिन पहले लाहौर और फिर मुंबई में रहते हुए वो बल्लीमारान को नहीं भूल पाए थे, उसकी गलियों को याद करते थे और याद तो वो कनॉट प्लेस में बिताए अपने दिनों को भी करते थे। ये भी कौन जानता था कि सीता जैसी महिला के किरदार से अभिनय की शुरुआत करनेवाले प्राण इस तरह के रोल करेंगे कि कोई अपने बच्चे का नाम प्राण नहीं रखेगा। खालिस दिल्ली की मिट्टी की खुशबू के साथ पला बढ़ा ये अभिनेता भारतीय सिनेमा में अपने दमदार अभिनय के बूते पर आज भी याद किया जाता है।  

Saturday, February 8, 2020

बेनकाब होने से क्रोधित कवि


मीडिया और उसकी भूमिका या उसके काम करने का तरीका एक ऐसा विषय है जिसपर घंटों बात हो सकती है, पक्ष में भी और विपक्ष में भी। मीडिया पर होनेवाली चर्चा में कुछ ऐसी बातें भी होती हैं जो पिछले कई सालों से बोली जा रही है यथा मीडिया चौराहे पर खड़ी है, मीडिया पर विश्वसनीयता का संकट है आदि आदि। इन सब जुमलेबाजियों के बीच मीडिया की अपनी साख कायम है, वो अपना विस्तार भी कर रही है। पर चर्चा है तो होती ही रहेगी। इसी तरह की एक चर्चा जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में रखी गई थी, विषय था चौथा स्तंभ। इसी तरह के कई जुमले वहां भी उछाले गए। पूर्व पत्रकार और अब राजस्थान के एक पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर विराजमान ओम थानवी, पांचजन्य के संपादक हितेश शंकर, पत्रकारिता पर नजर रखने का दावा करनेवाली एक वेबसाइट के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया के साथ मैं भी इस चर्चा में शामिल था। चर्चा तो जैसी होनी चाहिए थी वैसी ही हुई।

इस तरह की चर्चा में अगर तैयारी के साथ वक्ता नहीं आते हैं तो वो राजनीति की उंगली पकड़कर अपना बेड़ा पार करवाना चाहते हैं। ओम थानवी ने यही किया और राजनीति की बात करते करते वो साहित्य के प्रदेश में जा पहुंचे। इस बात को रेखांकित करने लगे कि मीडिया ने सरकार का विरोध करनेवाले उऩ लेखकों को पुरस्कार वापसी गैंग का नाम दिया जिन्होंने कालबुर्गी की हत्या के बाद साहित्य अकादमी का अपना पुरस्कार लौटा दिया था। मैंने विस्तार से उनको बताया कि क्यों इन लेखकों को गैंग कहा गया। इस स्तंभ में साहित्य वाले हिस्से की चर्चा ही करूंगा क्योंकि चौथे स्तंभ पर बात करते करते वक्ता गांधी से लेकर गोडसे और नागरिकता संशोधन कानून से लेकर राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर तक चले गए थे। अतुल चौरसिया ने एक ऐसी स्थापना सामने रखने की कोशिश की जो बिल्कुल ही तथ्यहीन तर्क की बुनियाद पर टिकी थी। उन्होंने मोदी सरकार के पहले की सरकार को इस आधार पर उदारवादी बताया कि उनके समय में न्यूज चैनलों के लाइसेंस उदारता के साथ दिए जाते थे और मोदी के पूर्व के सरकारों में मीडिया फलता फूलता था। इसके लिए उन्होंने रजत शर्मा के इंडिया टीवी और एनडीटीवी का उदाहरण दिया। पर उत्साह में बहुधा चूक हो जाती है और अतुल भी चूक गए और उन्होंने यहां तक कह दिया कि मोदी के शासनकाल में सिर्फ अर्णब के चैनल को लाइसेंस दिया गया। मैंने प्रतिवाद किया और उनको मंच से ही बता दिया कि कितने चैनलों के लाइसेंस दिया गया। बाद में वो सोशल मीडिया पर और भी मनोरंजक सफाई देने में जुटे रहे। सूचना प्रसारण मंत्रालय की एक सूची लगाई लेकिन जो तर्क दिए वो भी गलत थे। दक्षिण भारत में कई हिंदीतर भाषाओं में क्षेत्रीय चैनल का प्रसारण कर रहे एक मीडिया समूह को राष्ट्रीय हिंदी चैनल चलाने की अनुमति भी मिली थी। वो चैनल शुरू भी हुआ। चल भी रहा है। कांग्रेस के एक नेता की पत्नी का चैनल भी शुरू हुआ।
दरअसल जब पिछले साल मेरी किताब मार्क्सवाद का अर्धसत्य प्रकाशित हुई थी तो कुछ वरिष्ठ लोगों में मुझसे कहा था कि झूठ की विचारधारा को अर्धसत्य क्यों कहा, तो कुछ साथियों ने इस बात पर चुटकी ली कि झूठ की विचारधारा से अर्धसत्य निकालने का काम मैं ही कर सकता हूं। लेकिन जैसे जैसे दिन बीतते जाते हैं तो मेरा विश्वास इस बात को लेकर दृढ़ होता जाता है कि अर्धसत्य को एक विचारधारा के तौर पर स्थापित करने में मार्क्सवादियों और उनके अनुयायियों या साथियों का बड़ा योगदान है। अशोक वाजपेयी मार्क्सवादी नहीं हैं, पूर्व में वामपंथ के मुखर विरोधी थे लेकिन बदली हुई राजनीतिक परिस्थिति में उनके समर्थक या साथी हैं। तमाम क्रांतिकारी कवि इन दिनों उनकी परिक्रमा करते नजर आते हैं। वो भी वामपंथियों के साथ रहते हुए अर्धसत्य को बढ़ावा देने की कला में माहिर हो गए हैं। पाठक इस बात को समझ सकते हैं कि अगर अवसर ही विचार हैं की अवधारणा अर्धसत्य के कंधे पर सवार हो जाए तो किस तरह की बातें सामने आ सकती हैं। अशोक वाजपेयी इन दिनों इसी मिश्रण के साथ साहित्य की भूमि पर खड़े नजर आते हैं।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में मीडिया पर हुई चर्चा के दौरान पूरे समय वो बैठकर सुनते रहे थे। चर्चा खत्म होने के बाद तमतमाते हुए मेरे पास पहुंचे थे और कहा कि आप मंच से सफेद झूठ बोलते हैं। इस प्रसंग की चर्चा उनके कॉमरेड ओम थानवी ने सोशल मीडिया पर लिखे एक पोस्ट में भी की। लेकिन ओम थानवी ने अश्वत्थामा हतो, नरो के बाद शंख बजा दिया और इस प्रसंग को छोड़कर आगे बढ़ गए। अर्धसत्य के आधार पर अपनी बात को सामने रखने का एक और उदाहरण। जब अशोक वाजपेयी ने मुझपर झूठ बोलने का आरोप लगाया तो मैंने वहीं बहुत विनम्रतापूर्वक उनको याद दिलाया कि साहित्य में एकमात्र सत्यवादी हरिश्चंद्र तो वही हैं। मैं चाहता था कि अशोक वाजपेयी तथ्यों के आधार पर बात करें लेकिन क्रोध हमेशा विवेक का दुश्मन होता है और उस वक्त वो क्रोधित थे। क्रोध में उन्होंने यहां तक कह दिया कि 69 लोगों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाया था। ये संख्या भी गलत है। साहित्य अकादमी के युवा, अनुवाद, बाल पुरस्कारों को जोड़ने के बाद भी पुरस्कार वापसी की घोषणा करनेवाले 39 लेखक थे। घोषणा इस वजह से कि ना तो उनके पुरस्कार वापस हो सकते थे और ना ही उऩके द्वारा भेजी गई राशि वापस हो सकती थी। इनमें से भी कई लेखकों ने राशि का चेक वापस नहीं किया, कुछ ने चेक भेजा तो उसमें किसी का नाम नहीं लिखा था, कुछ ने स्मृति चिन्ह नहीं भेजा। इसके अलावा एक लेखक ने तो खेद जताकर पुरस्कार वापसी की अपनी घोषणा को रद्द भी कर दिया। अब अशोक वाजपेयी इतने भोले तो नहीं हैं कि उनको लेखकों की इस चतुराई का पता ना हो। पकी आंखों से साहित्य की राजनीति करनेवाले अशोक वाजयेपी को ये भी मालूम होगा कि पुरस्कार वापस करने की घोषणा करनेवाले कई लेखक अब छाती ठोककर अपनी पुस्तक पर छपे अपने परिचय में अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखक लिखते हैं। और तो और जो साहित्य अकादमी परिसर में कदम नहीं रखने की कसम खा चुके थे वो भी अब अकादमी की बैठकों में ना केवल शामिल होते हैं बल्कि अकादमी से बैठक में शामिल होने का मानदेय भी लेते हैं।
कोई भी व्यक्ति क्रोधित तब होता है जब उसके तर्क चुक जाएं। पुरस्कार वापसी अभियान पर अशोक वाजपेयी जब भी मुंह खोलते हैं तो उनका कहा गलत ही साबित होता है। पुरस्कार वापसी पर उनके तर्क एकदम कमजोर रहते हैं। पुरस्कार वापसी तो इतना लिखा जा चुका है कि अब कुछ शेष रहा नहीं है और ये कई बार साबित भी हो चुका है कि कैसे बिहार विधानसभा चुनाव के ठीक पहले जनता दल यूनाइटेड के एक बड़े नेता के घर पर हुई बैठक में इसकी रणनीति बनी थी। किस तरह से पुरस्कार वापसी अभियान के एवज में बिहार में विश्व कविता सम्मेलन के आयोजन की ठेकेदारी की बात होती है। यह अलग बात है कि जिस नीतिश कुमार की राजनीति के लिए पुरस्कार वापसी अभियान चलाया गया था वही नीतीश, भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री मोदी के साथ हो लिए। इसके बाद विश्व कविता सम्मेलन का आयोजन नहीं हो सका, टेंडर निकलने के बाद भी ठेका नहीं मिलने की पीड़ा तो होती ही है। इस स्तंभ में समय समय पर पुरस्कार वापसी अभियान से लेकर विश्व कविता के आयोजन की तिकड़मों पर लगातार लिखा जाता रहा है।
साहित्य की दुनिया में अशोक वाजपेयी लंबे समय से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से राजनीति करते रहे हैं। नौकरशाह होने की वजह से साधन और संसाधन की कमी कभी नहीं रही। अब भी रजा फाउंडेशन के स्वामित्व की वजह से संसाधन की कमी नहीं है लिहाजा अब भी उनकी राजनीति चल रही है। लेखकों के बीच भी और प्रकाशकों के बीच भी। फर्क इतना आया है कि अब उनके साहित्यिक वृत्त के बाहर के लेखक मुखर होकर उनकी राजनीति को रेखांकित करने लगे हैं। उनके अर्धसत्य को बेनकाब करने लगे हैं। अर्धसत्य का दौर अब रहा नहीं तो इस रेखांकन से उनका क्रोधित होने स्वाभाविक है। खिन्न तो वो इस बात से भी होंगे कि ललित कला अकादमी के उनके कार्यकाल के दौरान की गड़बड़ियों की सीबीआई जांच भी अंतिम चरण में है।

Saturday, January 25, 2020

कुंठित मानसिकता का सार्वजनिक प्रदर्शन

हिंदी फिल्मों के इतिहास में सलीम-जावेद की ऐतिहासिक जोड़ी को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। पंद्रह साल तक एक साथ फिल्में लिखने वाली जोड़ी जिसने ‘शोले’, ‘दीवार’, ‘जंजीर’ और ‘डॉन’ जैसी सुपर हिट फिल्में लिखीं। उस दौर में सलीम-जावेद की लिखी फिल्में सफलता की गारंटी मानी जाती थी। 1981 में ये जोड़ी टूटी और दोनों अलग हो गए। दोनों के करीबियों ने तरह-तरह की बातें बताईं, अंदाज लगे पर साफ सिर्फ यही हो पाया कि दोनों में मनभेद हो गया था जिसकी वजह से अलग हो गए। सलीम जावेद के बीच मतभेद तो स्क्रिप्ट को लेकर भी होते रहते थे और दोनों घंटो माथापच्ची करते थे। फिल्म ‘दीवार’ का वो प्रसिद्ध संवाद, ‘मेरे पास गाड़ी है, बंगला है...तुम्हारे पास क्या है’ के जवाब में ये लिखना कि ‘मेरे पास मां है’ को लेकर भी दोनों के बीच घंटों चर्चा हुई थी। सलीम खान ने कहीं लिखा भी है कि इस वाक्य पर पहुंचने के लिए दोनों ने मिलकर करीब पचास ड्राफ्ट फाड़े थे, तब जाकर ये पंक्ति निकल कर आ पाई थी।
पिछले करीब उनतालीस साल से सलीम खान और जावेद अख्तर की राय किसी मुद्दे या व्यक्ति पर एक रही हो ऐसा सार्वजनिक रूप से एक बार ही सामने आ पाया है। वो व्यक्ति हैं फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह। कुछ दिनों पहले एक साहित्य उत्सव में जावेद अख्तर ने नसीर के बारे में कहा था कि, ‘नसीर साहब को कोई सक्सेसफुल आदमी नहीं पसंद है, अगर कोई पसंद हो तो उसका नाम बताएं कि ये आदमी मुझे बहुत अच्छा लगता है हलांकि सक्सेसफुल है। मैंने तो आज तक सुना नहीं। वो दिलीप कुमार को क्रिटिसाइज करते हैं, अमिताभ बच्चन को क्रिटिसाइज करते हैं, हर आदमी जो सक्सेसफुल है वो उनको जरा भला नहीं लगता।‘  जावेद साहब ने ये तब कहा था जब नसीर ने राजेश खन्ना को औसत कलाकार कहकर मजाक उढाया था। उसी समय सलीम खान ने भी नसीरुद्दीन शाह को कुंठित और कड़वा व्यक्ति कहा था। इस पर सलीम-जावेद सहमत थे कि नसीरुद्दीन शाह कुंठित हैं। आप समझ सकते हैं कि ये मुद्दा कितना अहम होगा जिसपर सलीम खान और जावेद अख्तर एक बार फिर से सलीम-जावेद नजर आते हैं या ये बात सत्य के कितने करीब होगी जिसपर चार दशक तक एक दूसरे से दूरी रखनेवाले दो लेखक एक राय रख पाते हैं ।

हाल ही में नसीरुद्दीन शाह ने अभिनेता अनुपम खेर के बार में अनाप-शनाप बोलकर विवाद खड़ा करने की कोशिश की। नसीर ने कहा कि अनुपम खेर जोकर हैं और उनको गंभीरता से लेने की जरूरत हैं। खुशामद उनके स्वभाव में है। नसीरुद्दीन शाह ने अनुपम खेर के खून को भी सवालों के घेरे में लिया और बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की। अनुपम खेर ने चंद घंटों में ही नसीर को आईना दिखा दिया। लेकिन जिस तरह की शब्दावली का उपयोग नसीरुद्दीन शाह ने किया वो निहायत घटिया है और वो नसीर के संस्कारों पर भी सवाल खड़े करती है। मैंने जब नसीरुद्दीन शाह का अनुपम को लेकर दिया बयान सुना तो मेरे जेहन में उनकी पुस्तक का एक प्रसंग कौंध गया। पुस्तक का नाम है ‘एंड दैन वन डे’। ये पुस्तक 2014 में प्रकाशित हुई थी। ये पुस्तक नसीरुद्दीन शाह की लगभग आत्मकथा है हलांकि इसको संस्मरण के तौर पर पेश किया गया है। इस पुस्तक में नसीर ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय में रहने के दौरान के अपने से जुड़े प्रसंगों को विस्तार दिया है। इसके एक अध्याय ‘द वूमेन विद द सन इन हर हेयर’ में  उन्होंने स्वीकार किया है कि वहां उनको अपने से करीब पंद्रह साल बड़ी पाकिस्तानी लड़की परवीन से इश्क हो गया। इश्क की इस पूरी दास्तां को पढ़ने के बाद कहीं प्रत्यक्ष और कहीं परोक्ष रूप से नसीर ने ये लिखा है कि उस वक्त परवीन उनकी जरूरत थी। उनके अंदर विश्वास पैदा करने में, उनको गढ़ने में परवीन ने अहम भूमिका निभाई। नसीरुद्दीन और पुरवीन का इश्क परवान चढ़ने लगा था और नसीर हर दिन ये महसूस करने लगे थे कि परवीन उनके लिए और उनके करियर के लिए कितनी अहम है। पुरवीन उस वक्त अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय डॉक्टरी पढ़ रही थी और नसीर रंगकर्म की दुनिया में आगे बढ़ना चाहते थे। उन्हें किसी सहारे की जरूरत थी जो परवीन ने उन्हें दिया। इस सहारे को दोनों ने सहमति से रिश्ते में बदलने की बात सोची और दोनों ने शादी कर ली। अपने पिता की बेरुखी झेल रहे नसीरुद्दीन शाह को परवीन के रूप में एक समझदार पत्नी और उसकी मां के रूप में एक संवेदनशील महिला का सान्निध्य मिला।
शादी के बाद दोनों का दांपत्य जीवन ठीक-ठाक चल रहा था। दोनों की शादी के दस महीने के अंदर ही परवीन ने नसीर की बेटी को जन्म दिया । इस बीच नसीर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, दिल्ली पहुंच गए थे। परवीन अलीगढ़ में रह रही थी और नसीर दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में अपने करियर को परवान चढ़ाने में लगे थे। नसीर ने अपनी इस किताब में माना है कि दिल्ली में रहने के उस दौर में वो बेहद असुरक्षित महसूस करते थे जिस वजह से उनका यह रिश्ता लंबा नहीं चल पाया। दिल्ली में रहनेवाले नसीर की प्राथमिकताएं बदल गई थीं, दोस्त भी। नए रिश्ते भी पनपने लगे थे। नसीर को लगने लगा था कि उनके करियर में शादी और बच्चे दोनों बाधा हो सकते हैं। अपने करियर को तमाम रिश्तों पर प्राथमिकता देनेवाले नसीर को नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा पहुंचने के बाद शादी और बच्चा दोनों बोझ लगने लगे थे, लिहाजा उन्होंने पुरवीन से दूरी बनानी शुरू कर दी। नसीर का यह रुख उसके व्यवहार में भी दिखने लगा था। उन्होंने अलीगढ़ जाना कम कर दिया था, परवीन के पत्रों के उत्तर देने कम कर दिए थे। जब परवीन उऩसे मिलने दिल्ली आई तब भी नसीर ने बहुत बेरुखी से उनसे बातचीत की। परवीन ने नसीर से प्रार्थना की कि एक बार फिर से पति-पत्नी के रिश्ते को हरा करने की कोशिश करते हैं लेकिन नसीर का रुख नकारात्मक ही रहा। वो इस शादी से मुक्ति चाहने लगे थे। उनके सामने करियर का जो नया द्वार खुल रहा था उसमें शादीशुदा जिंदगी उनको बोझ और बाधा दोनों लगने लगी थी। इस तरह की सोच जब किसी व्यक्ति के मानस में अंकुरित होती है तो फिर वो रिश्ते की परवाह कहां करता है। दोनों अलग हो गए। थोड़े समय के बाद पाकिस्तानी महिला परवीन अपनी बच्ची को लेकर लंदन चली गई और फिर नसीर बारह साल तक उससे नहीं मिल सके। नसीर को बारह साल तक अपनी बेटी की भी याद नहीं आई। जब पुस्तक लिखी या जब करियर के शीर्ष पर पहुंच गए तो याद सताने लगी।
नसीरुद्दीन शाह ने अभिनेत्री रत्ना पाठक से दूसरी शादी की। उसका जिक्र करते हुए भी वो ये कह जाते हैं रत्ना एक मजबूत स्त्री है जिसने नसीर को कई बार संभाला। कमाल है इस कलाकार का, इनको प्रेम उसी स्त्री से होता है जिसमें उऩको संभालने की संभावना नजर आती है। हो सकता है कि कुछ लोगों को ये नसीर के व्यक्ति संदर्भ लगें और इन सबका उल्लेख अनुचित। लेकिन जब व्यक्ति अपना जीवन सार्वजनिक तौर पर खोलता है या किसी संदर्भ या पुस्तक में उसकी जिंदगी खुलती है तभी उसकी मुकम्मल तस्वीर बनती है। नसीर की इस किताब में कई ईमानदार प्रसंग भी हैं लेकिन इसी पुस्तक के कई प्रसंग उनकी सोच, उनकी मानसिकता, अपनी करियर की सीढ़ी के तौर पर रिश्तों का इस्तेमाल करने की उनकी प्रवृत्ति भी खुलकर सामने आ जाती है। ऐसा इंसान जब दूसरों को जोकर, खुशामदी या चापलूस कहता है या दूसरों के खून के बारे में बात करता है तो सही में लगता है कि वो कुंठित हो चुका है। सही तो जावेद अख्तर भी प्रतीत होते हैं कि नसीर किसी सफल आदमी की तारीफ नहीं कर सकते। आज अनुपम खेर बेहद सफल हैं, अमेरिका में मिले काम की वजह से उनको अंतराष्ट्रीय स्तर पर एक अभिनेता के तौर पर मान्यता मिल रही है वहीं नसीर मुंबई में बैठकर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। कभी उनको अपने बच्चों की फिक्र होती है, कभी वो राजेश खन्ना को कोसने लगते हैं। कुंठा का सार्वजनिक प्रदर्शन किसी गंभीर कलाकार को किस कदर हास्यास्पद बना देती है, नसीर खुद को इसकी जीती जागती मिसाल बनकर रह गए हैं।

Wednesday, January 22, 2020

कविता पर नेहरू की चिंता


गणतंत्र दिवस पर लाल किला में कवि सम्मेलन की परंपरा बहुत पुरानी रही है, एक जमाने में इस कवि सम्मेलन की दिल्ली के साहित्यप्रमियों को प्रतीक्षा रहती थी और वहां श्रोताओं की संख्या काफी होती थी। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी इस कवि सम्मेलन में वहां जाया करते हैं। रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी पुस्तक लोकदेव नेहरू में कई जगह पर जवारलाल नेहरू के लाल किला पर होने वाले कवि सम्मेलन में जाने की बात लिखी है। कई दिलचस्प प्रसंग भी लिखे हैं। एक जगह दिनकर ने 1950 में लालकिले पर आयोजित कवि सम्मेलन के बारे में लिखा है, लाल किले का कवि सम्मेलन 26 जनवरी को हुआ था या 25 जनवरी को, यह बात मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है। किन्तु उस सम्मेलन में पंडित जी भी आए थे और शायद, उन्हीं की मौजूदगी को देखकर मैंने जनता और जवाहर कविता उस दिन पढ़ी थी। श्रोताओं ने खूब तालियां बजाईं, मगर पंडित जी को कविता पसंद आई या नहीं, उऩके चेहरे से इसका कोई सबूत नहीं मिला। पंडित जी कवियों का बहुत आदर करते थे, किन्तु कविताओं से वे बहुत उद्वेलित कभी भी नहीं होते थे। संसत्सदस्य होने के बाद मैं बहुत शीघ्र पंडित जी के करीब हो गया था। उनकी आंखों से मुझे बराबर प्रेम और प्रोत्साहन प्राप्त होता था और मेरा ख्याल है, वे मुझे कुछ थोड़ा चाहने भी लगे थे। मित्रवर फीरोज गांधी मुझे मजाक में महाकवि कहकर पुकारा करते थे। संभव है, पंडित जी ने कभी यह बात सुन ली हो, क्योंकि दो एकबार उन्होंने भी मुझे इसी नाम से पुकारा था। किन्तु आओ महाकवि कोई कविता सुनाओ ऐसा उनके मुख से सुनने का सौभाग्य कभी नहीं मिला।
दिनकर ने कवियों को लेकर जवाहरलाल के मन में चलनेवाले द्वंद को भी प्रसंगों के माध्यम से उजागर किया है। दिनकर के मुताबिक पंडित जी उन दिनों लिखी जा रही कविताओं को लेकर बहुत उत्साहित नहीं रहते थे और कई बार अपनी ये अपेक्षा जाहिर कर चुके थे कि हिंदी के कवियों को कोई ऐसा गीत लिखना चाहिए जिसका सामूहिक पाठ हो सके। एक कवि सम्मेलन में जवाहर लाल जी पहुंच तो गए लेकिन खिन्न हो गए। दिनकर के मुताबिक सन् 1958 ई. में लालकिले में जो कवि सम्मेलन हुआ उसका अध्यक्ष मैं ही था और मुझे ही लोग पंडित जी को आमंत्रित करने को उनके घर लिवा ले गए थे। पंडित जी आधे घंटे के लिए कवि सम्मेलन में आए तो जरूर मगर खुश नहीं रहे। एक बार तो धीमी आवाज में बुदबुदाकर उन्होंने यह भी कह दिया कि यही सब सुनने के लिए बुला लाए थे?’
जवाहर लाल नेहरू कवियों की सामाजिक भूमिका को लेकर भी अपनी चिंता यदा कदा प्रकट कर दिया करते थे। चाहे वो कोई गोष्ठी हो या कवि सम्मेलन नेहरू अपनी बात कहने से चूकते नहीं थे। दिनकर ने भी लोकदेव नेहरू में एक प्रसंग में इसका उल्लेख किया है, एक बार लालकिले के गणतंत्रीय कवि-सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए उन्होंने यह बात भी कही थी कि कवियों का जनता के समीप जाना अच्छा काम है। मगर कवि सम्मेलनों में वो कितनी बार जाएं और कितनी बार नहीं जाएं, यह प्रश्न भी विचारणीय है। दरअसल नेहरू ती चिंता यह भी थी कि कवि जब अधिक कवि सम्मेलनों में शामिल होने लगता है तो वो फिर रचनात्मकता या उसकी स्तरीयता का ध्यान नहीं रख पाता है और वो उस तरह की कविता लिखने लग जाता है तो तालियां बटोर सके। 1950-60 में कविता को लेकर नेहरू की जो चिंता थी क्या आज वो चिंता दूर हो पाई है, हिंदी साहित्य जगत को विचार करना चाहिए।   

Saturday, January 18, 2020

साहित्यिक मेले से बनती संस्कृति


जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (जेएलए) एक ऐसा साहित्य महोत्सव है जो पूरी दुनिया के साहित्यप्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। हर वर्ष जनवरी के महीने में जयपुर के ऐतिहासिक डिग्गी पैलेस में आयोजित होनेवाले इस लिटरेचर फेस्टिवल में देश-विदेश के तमाम मशहूर लेखकों का जमावड़ा होता है जो साहित्य की विभिन्न विधाओं से लेकर राजनीति, खेल और सिनेमा लेखन की नई प्रवृत्तियों पर विमर्श करते हैं। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में नोबेल पुरस्कार प्राप्त लेखकों के अलावा दुनियाभर के प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित लेखकों के विचारों को सुनने का अवसर मिलता है। आज अगर पूरे देश के अलग अलग हिस्सों में अलग अलग लिटरेचर फेस्टिवल हो रहे हैं या कह सकते हैं कि पूरे देश में जो एक साहित्य महोत्सवों की संस्कृति का विकास हुआ है तो उसके पीछे जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की सफलता ही है। लगभग सभी साहित्य उत्सव जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की तर्ज पर ही आयोजित होते हैं। इस लिहाज से अगर देखा जाए तो देशभर में साहित्यिक संस्कृति को मजबूत करने में जेएलए ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है प्रत्यक्ष रूप से भी और परोक्ष रूप से भी।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का आयोजन 23 से 27 जनवरी तक हो रहा है। यह उनके आयोजन का तेरहवां साल है। तेरह सालों में जेएलए ने अपने आप को इतनी मजबूती से स्थापित कर लिया कि वो अब देश से निकलकर ब्रिटेन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में भी आयोजित होने लगा है। 2008 में पहली बार जब जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का आयोजन हुआ था तो इसकी संकल्पना जयपुर विरासत फाउंडेशन के कर्ताधर्ताओं ने की थी। जयपुर विरासत फाउंडेशन ने राजस्थान की लोक संस्कृति के लिए बहुत काम किया है। उस वक्त इससे जुड़ी मीता कपूर के मुताबिक 2008 के इंटरनेशनल हेरिटेज फेस्टिवल के तहत ही उसके खंड के रूप में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की शुरुआत हुई थी। 2008 में ये आयोजन तीन दिनों का था और दिग्गी पैलेस के एक ही हॉल में इसका आयोजन हुआ था। उस वर्ष भी नमिता गोखले जेएलएफ से एडवाइजर के तौर पर जुड़ी थीं। मीता कपूर बाद में इस आयोजन से अलग हो गईं लेकिन एक परंपरा जो उन्होंने पहले संस्करण में शुरू की थी उसका निर्वाह आज तक कर रही हैं। वो जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में आने वाले सभी प्रतिभागियों और अन्य महत्वपूर्ण अतिथियों को अपने घर पर शाम को दावत देती हैं। इस रात्रिभोज में परोसे जानेवाला खाना वो खुद बनाती हैं या उनकी देखरेख में राजस्थानी खाना तैयार किया जाता है।
कहना ना होगा कि जेएलए के आयोजन की संरचना इस तरह से की गई ताकि साहित्यप्रेमियों के अलावा अन्य लोगों को भी अपनी ओर आकृष्ट कर सके। अलग अलग भाषा के लेखकों के साथ-साथ सिनेमा और खेल के सितारों को हर संस्करण में नियमत रूप से आमंत्रित करने से भी इसको मजबूती मिली। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में फिल्म से जुड़े लोगों और फिल्मी सितारों को बुलाने को लेकर कई बार सवाल भी खड़े होते रहे हैं। ऐसे सवाल सिर्फ जेएलएफ को लेकर ही नहीं उठे हैं बल्कि दुनिया में जहां भी साहित्य महोत्सवों में फिल्मी सितारों को बुलाया जाता है वहां वहां ऐसे सवाल खड़े होते रहे हैं। बेस्टसेलर उपन्यास चॉकलेट की ब्रिटिश लेखक जॉन हैरिस ने भी साहित्य महोत्सवों में फिल्मी सितारों को लेकर एक अलग ही तरह का प्रश्न उठाया था। उन्होंने कुछ सालों पहले कहा था कि कई लिटरेचर फेस्टिवल इन सितारों के चक्कर में लेखकों पर होनेवाले खर्चे में भारी कटौती करते हैं। आयोजकों को लगता है कि सितारों के आने से ही उनको हेडलाइन मिलेगी। उनका मानना था कि इससे आयोजकों को फायदा होता है पर साहित्य नेपथ्य में चला जाता है । बाजार के विषेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के साहित्यिक आयोजन तभी सफल हो सकते हैं जब इसमें शिरकत करनेवालों में सितारे भी हों क्योंकि विज्ञापनदाता उनके ही नाम पर स्पांसरशिप देते हैं। विज्ञापनदाताओं की रणनीति होती है कि जितना बड़ा सितारा होगा उतनी बड़ी भीड़ जुटेगी और उनके उत्पाद का प्रचार बड़े उपभोक्ता वर्ग तक पहुंचेगा । परंतु सवाल यही है कि क्या इस तरह के आयोजनों में साहित्य या साहित्यकारों पर पैसे को तरजीह दी जानी चाहिए।अगर उद्देश्य साहित्य पर गंभीर विमर्श है, अगर उद्देश्य पाठकों को साहित्य के प्रति संस्कारित करने का है तो उसके साथ साथ इस सितारों को बुलाने में कोई हर्ज नहीं है। गुलजार, जावेद अख्तर, शाबाना आजमी, प्रसून जोशी तो लगभघ नियमित तौर पर ही इस आयोजन में आते रहे हैं। उनके अलावा काजोल, करन जौहर, सोमन कपूर, वहीदा रहमान जैसे कलाकार भी जेएलएफ की शान बढ़ा चुके हैं।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में विवादों की बड़ी भूमिका रही है हलांकि इसकी फेस्टिवल डायरेक्टर नमिता गोखले हमेशा से कहती हैं कि उनका उद्देश्य इस आयोजन में किसी तरह के विवाद पैदा करना कभी भी नहीं रहा। पर 2012 में विवादित लेखक सलमान रश्दी के जेएलएफ में आने को लेकर भारी विवाद हुआ था। सलमान पर अपनी किताब द सैटेनिक वर्सेस में ईशनिंदा का आरोप है और उनके खिलाफ ईरान के सर्वोच्च नेता आयातुल्ला खोमैनी ने जान से मारने का फतवा भी जारी किया था। सलमान रश्दी के विवाद के केंद्र में रहने की वजह से अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी इस आयोजन की तरफ लोगों का ध्यान गया था। चार दिनों तक हुए विवाद के बाद आखिरकार सलमान को जयपुर आने की इजाजत नहीं मिली। मामला इतने पर ही नहीं रुका था उस वक्त की गहलोत सरकार ने वीडियो लिंक के जरिए सलमान को सत्र में भाग लेने की अनुमति नहीं दी थी। लेकिन इसके बाद भी विवाद रुका नहीं था। सलमान रश्दी के नहीं आने और वीडियो लिंक से सत्र में जुड़ने की अनुमति नहीं मिलने के बाद लेखक जीत थाईल, रुचिर शर्मा और हरि कुंजरू ने सलमान रश्दी की विवादित किताब के अंश पढ़ दिए थे। उसके बाद जीत थाईल पर जयपुर और अजमेर में आठ केस दर्ज किए गए थे। उसके बाद के वर्षों में आशीष नंदी के एक बयान को लेकर आशुतोष की आपत्ति पर भारी विवाद हुआ था। ये विवाद भी काफी दिनों तक चला और बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया और वहां से निबटा। 2016 में फिल्मकार करण जौहर ने भी अपने बयान से छोटा ही सही पर विदा खड़ा किया था। जेएलएफ के आयोजन के पहले ही दिन करण जौहर ने लोकतंत्र को मजाक बता दिया था। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा था कि हमारे देश में फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन सबसे बड़ा जोक है और लोकतंत्र तो उससे भी बड़ा मजाक है । करण के मुताबिक अगर आप अपने मन की बात कहना चाहते हैं तो ये देश सबसे मुश्किल है। इसके अलावा तस्लीमा नसरीन के वहां पहुंचने और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मनमोहन वैद्य के एक बयान को लेकर भी भारी विवाद हुआ था। इ
इन विवादों ने जेएलएफ को चर्चित करने में अवश्य मदद की यहां गंभीर साहित्यिक विमर्श भी होते हैं जो पाठकों को संस्कारित करते हैं। राजनीति से लेकर अर्थशास्त्र और औपनिवेशिक संस्कृति के सवालों से भी विद्वान वक्ता मुठभेड़ करते हैं जो पाठकों को उन विषयों को सोचने समझने की एक नई दृष्टि देते हैं। देश दुनिया के पाठकों के लिए ये पांच दिन ऐसे होते हैं जिनमें हर तरह की रुचि के विषयों पर विमर्श होता है और पाठकों को भी उसमें हिस्सा लेने का अवसर प्राप्त होता है। पहले संस्करण में एक हॉल से शुरु हुए इस आयोजन में अब पांच स्थानों पर समांतर सत्र होते हैं और श्रोताओं के लिए विकल्प होता है कि वो किस विषय पर किस वक्ता को सुनना चाहते हैं। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल पिछले तेरह सत्रों में अपने आयोजन के स्वरूप में भी लगातार बदलाव करता रहता है। इसमें सांगीतिक आयोजन जुड़े, जयपुर बुक मार्क के रूप में प्रकाशन जगत की हस्तियों को आपस में विचार विनिमय का एक मंच मिला जहां पुस्तकों के प्रकाशन अधिकार से लेकर प्रकाशन जगत की समस्याओं पर विमर्श होते हैं। कुल मिलाकर अगर हम देखें तो जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल एक ऐसे आयोजन के तौर पर स्थापित हो चुका है जहां गंभीर साहित्यिक विमर्श के अलावा वहां जानेवालों के मनोरंजन से लेकर शॉपिंग तक के अवसर उपलब्ध होते हैं।
     

रणनीतिक चूक से असफल हुई फिल्म


अजय देवगन की फिल्म तान्हाजी ने एक बार फिर से ये साबित किया कि दर्शकों की अपने ऐतिहासिक चरित्रों में खासी रुचि है। ये फिल्म रिलीज के पहले ही सप्ताह में सौ करोड़ के कारोबारी आंकड़ें को पार करके अपनी सफलता का परचम लहरा चुकी है। जबकि इसके साथ ही दीपिका पादुकोण की फिल्म छपाक भी रिलीज हुई थी जिसको मेघना गुलजार जैसी मशहूर शख्सियत ने निर्देशित किया था। अपनी फिल्म की रिलीज के पहले दीपिका ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के आंदोलनकारी छात्रों को मूक समर्थन देकर मीडिया में सुर्खियां बटोरने का उपक्रम भी किया था। बावजूद इसके फिल्म छपाक को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। छपाक एक सप्ताह में लागत भी नहीं निकाल सकी और सप्ताह का कलेक्शन 26 करोड़ से नीचे रहा। बॉक्स ऑफिस की रिपोर्ट के मुताबिक दीपिका की फिल्प छपाक फ्लॉप हो गई है। सोशल मीडिया पर तमाम क्रांतिकारी शूरवीरों ने भी दीपिका की इस फिल्म को सफल बनाने की मुहिम चलाई थी लेकिन उस फिल्म को लेकर जो एक अवधारणा लोगों तक पहुंचनी चाहिए थी वो बन नहीं पाई। रिपोर्ट क मुताबिक छपाक ने बड़े शहरों में भी अच्छा बिजनेस नहीं किया और रिलीज होने के अगले शुक्रवार को उसका बिजनेस सवा करोड़ तक पहुंच गया। फिल्म छपाक का विषय अच्छा है लेकिन उसका ट्रीटमेंट और निर्देशन उस स्तर का नहीं है कि वो फिल्म से कोई छाप छोड़ सके। एसिड पीड़िता के दर्द को समाज में प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति महसूस करता है, इस हमले के खिलाफ उसके मन से प्रतिरोध की आवाज भी उठती रहती है लेकिन फिर भी लोग इस फिल्म को अपेक्षित संख्या में देखने नहीं गए। इसकी वजह यही रही कि ये फिल्म लोगों के बीच आपसी बातचीत का हिस्सा नहीं बन पाई। छपाक जैसी फिल्मों को कभी भी बंपर ओपनिंग नहीं मिली है और इस तरह की फिल्में धीरे-धीरे ही बेहतर कारोबार करती हैं। हाल ही में रिलीज हुई निर्देशक अनुभव सिन्हा की फिल्म आर्टिकल 15 भी इसी रास्ते पर चलकर सफल हुईं। आर्टिकल 15 के बारे में उसके विषय के बारे में, उसके ट्रीटमेंट के बारे में, आयुष्मान खुराना के अभिनय के बारे में लोगों के बीच चर्चा शुरू हो गई और फिर धीरे-धीरे दर्शक इस फिल्म को देखने के लिए सिनेमा हॉल जाने लगे और फिल्म सफल हो गई। लोगों के बीच चर्चा से फिल्म हिट होने का एक और सटीक उदाहरण है फिल्म शोले। 1975 में जब फिल्म शोले रिलीज हुई थी तब ना तो चौबीस घंटे के न्यूज चैनल थे, ना ही वेबसाइट्स और ना ही सोशल मीडिया। ट्विटर और फेसबुक का तो अता-पता ही नहीं था इस वजह से लाइव समीक्षा भी नहीं हो पाती थी फिल्मों की। तब अखबारों में विज्ञापन आया करते थे। फिल्म समीक्षा छपा करती थी। पोस्टरों से लोगों को फिल्मों की जानकारी मिलती थी या कई शहरों में तो रिक्शे पर लाउडस्पीकर लगाकर फिल्म का प्रचार किया जाता था। जब अगस्त 1975 में शोले रिलीज हुई थी तो लगभग सभी अखबारों ने इसको फ्लॉप करार दे दिया था। समीक्षकों को ये फिल्म अच्छी नहीं लगी थी। एक अखबार में तो फिल्म समीक्षा का शीर्षक था- शोले जो भड़क न सका। लेकिन फिल्म को लेकर जब लोगों के बीच बातचीत शुरू हुई तो फिर माउथ पब्लिसिटी ने वो असर दिखाया जिसके आगे प्रचार के सारे माध्यम पिछड़ गए। शोले की सफलता की कहानी लिखने की आवश्यकता नहीं है। शोले की सफलता के पीछे भी दर्शकों में आपस में हुई बातचीत के फैलने का असर ही माना जाता है। ये एक कारक था लेकिन इसके अलावा इसका निर्देशन और सभी कलाकारों का अभिनय भी कमाल का था।
दीपिका की फिल्म छपाक को अपेक्षित सफलता नहीं मिलने की एक वजह उनका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जाना भी रहा। वो छात्रों के बीच गईं, मौन रहीं लेकिन उनके आसपास जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार की उपस्थिति और वामपंथी विचारधारा के लोगों के दीपिका के पक्ष में आने से फिल्म के खिलाफ माहौल बन गया। जेएनयू जाकर दीपिका वामपंथियों के साथ खड़ी दिखी। इस स्तंभ में विस्तार से इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि दीपिका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय इस वजह से गई कि उनकी प्रचार टीम को दीपिका के इर्द गिर्द चर्चा चाहिए थी। प्रचार टीम इस बात का आकलन करने में चूक गई कि बाजार के औजार तभी सफल हो सकते हैं जब उसके साथ व्यापक जन समुदाय हो। बाजार उस विचारधारा के कंधे के पर नहीं चल सकता है जिस विचारधारा को पूरे देश ने लगभग नकार दिया। इसका प्रकटीकरण चुनाव दर चुनाव होता रहा। प्रचार टीम की इस रणनीतिक चूक का खामियाजा फिल्म को भुगतना पड़ा। एक अनुमान के मुताबिक कोई फिल्म तभी सफळ मानी जाती है जबकि उसको देखने के लिए कम से कम पचास लाख लोग पहुंचें। इस पचास लाख की संख्या से एक तय फॉर्मूल के आधार पर धनार्जन देखा जाता है।
बाजार के स्वभाव को नजदीक से जानने वालों का मानना है कि आमिर और शाहरुख खान की फिल्मों के फ्लॉप होने या उनकी चमक फीकी पड़ने के पीछे उनका 2014 के बाद दिया गया बयान रहा है। जन के मानस पर जो बात एक बार अंकित हो जाती है उसको कुछ लोग आक्रामक तरीके से प्रकट कर देते हैं जबकि ज्यादातर लोग खामोशी से उसका प्रतिरोध करते हैं। फिल्मों के वितरण के कारोबार से जुड़े लोगों का मानना है कि जनता के मन को समझते हुए ही शाहरुख और आमिर दोनों ने अपना रास्ता बदला और वो दोनों नरेन्द्र मोदी से मिलने का कोई मौका नहीं छोड़ते और प्रधानमंत्री के साथ मुलाकात की तस्वीरों को प्रचारित भी करते हैं ताकि जनता को ये संदेश जा सके कि वो अब मोदी के विरोध में नहीं हैं। दूसरी बात ये कि देश की जनता खासकर हिंदी फिल्मों के दर्शक इस बात को पसंद नहीं करते हैं कि राजनीति को फिल्मों के सफल होने का उपयोग किया जाए। इस बात के दर्जनों उदाहरण हैं कि जब फिल्म के कलाकारों ने फिल्म रिलीज के पहले राजनीति का दांव चला है उसका फायदा नहीं हुआ उल्टे नुकसान हो गया।  
दीपिका के जेएनयू जाने से जो प्रतिरोध हुआ उसका फायदा अजय देवगन की फिल्म को मिला। आज जिस तरह से देशभर में राष्ट्रवाद को लोग पसंद कर रहे हैं और उसके खिलाफ सुनने को तैयार नहीं है। कोई भी देश अपने स्वर्णिम इतिहास और उस इतिहास के उन चरित्रों को बेद पसंद करते हैं जिन्होंने देश की गौरव गाथा लिखी और अपनी वीरता, शौर्य और अपने कृत्यों से देश का नाम रौशन किया। अपने अतीत को लेकर गौरव का उभार इस वक्त पूरी दुनिया में है। इस वैश्विक परिघटना से भारत भी अछूता नहीं है। अब भारत औपनिवेशिक गुलामी से मानसिक रूप से भी लगभग मुक्त हो चुका है। आजादी के बाद की फिल्मों को देखें तो उस दौर में फिल्मकार अंग्रेजों के जुल्म को दिखाते थे और फिर नायक उस जुल्म के खिलाफ खड़ा होता था। उसको देखने के लिए जनता की भारी भीड़ उमड़ती थी। ये क्रम काफी लंबे समय तक चलता रहा। क्रांति और लगान भी इसी थीम पर बनी और उसको दर्शकों का जबरदस्त प्यार मिला। इसके बाद भारत पाकिस्तान के युद्ध पर आधारित फिल्में बनीं। पाकिस्तानियों को हारते हुए देखकर लोग खूब ताली बजाते थे और टिकट खिड़की पर दर्शक टूट पड़ते थे।  
हिंदी फिल्मों में अब वो दौर बदल गया है। अब लोग भारत की गौरव गाथा को देखना चाहते हैं। चाहे वो खेल के मैदान में लिखी गई गौरव गाथा हो, विज्ञान की दुनिया की खास उपलब्धि हो या फिर आजाद भारत की सैन्य उपलब्धियां हों। चाहे वो अक्षय कुमार की फिल्म गोल्ड हो, उनकी ही फिल्म मिशन मंगल हो या फिर फिर विकी कौशल की फिल्म उरी हो। ये बदलाव इस बात को रेखांकित करता है कि भारत में सिनेमा के दर्शकों का मन और मिजाज दोनों बदल रहा है। सिर्फ फिल्म ही क्यों अगर हम वेब सीरीज की या ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म पर भी देखें तो ऐतिहासिक चरित्रों के इर्द गिर्द बनी सीरीज बेहद सफल हो रही है। ना सिर्फ सफल हो रही बल्कि लगातार इस तरह की सीरीज बनने की घोषणाएं भी हो रही हैं। नेटफ्लिक्स से लेकर अमेजन और जी फाइव से लेकर एमएक्स तक के प्लेटफॉर्म पर गौरव गाथाओं को प्राथमिकता दी जा रही है। बाजार का अच्छा जानकार वही होता और माना जाता है जो देश के मूड को भांपते हुए जनता के मन मुताबिक चीज उसके सामने रखे। सफलता मिलती ही है नहीं तो फिर उसका छपाक हो जाता है।    

Wednesday, January 15, 2020

फिर भी रहेंगी निशानियां...

रितु नंदा एक ऐसी शख्सियत थीं जो दिल्ली के कारोबारी जगत से लेकर कला की दुनिया में अपने संवेदनशील स्वभाव की वजह से जानी जाती थीं। वो मसङूर अभिनेता और हिंदी फिल्मों के सबसे बड़े शो मैन राज कपूर की बेटी और एस्कॉर्ट कंपनी के मालिक राजन नंदा की पत्नी थीं। लेकिन इससे इतर भी उन्होंने अपनी एक पहचान बनाई थी। पेंटिग्स में उनकी गहरी रुचि थी और उन्होंने राज कपूर पर एक बेहतरीन पुस्तक भी लिखी थी जिसमें उन्होंने शुरू में ही ये स्वीकारा है कि- पापा ने बहुत अधिक पढ़ाई नहीं की थी और ना ही वो सिनेमा को बौद्धिक माध्यम मानते थे, वो एक रोमांटिक व्यक्तित्व थे और देश में व्याप्त आर्थिक और सामाजिक असामनता को वो बौद्धिक नजरिए से नहीं बल्कि संवदेनशील नजर से देखते थे। इस एक पंक्ति से उन्होंने अपने पिता के व्यक्तित्व को व्याख्यायित कर दिया था। राज कपूर पर लिखी उनकी किताब का दूसरा संस्करण जब 2002 में प्रकाशित हो रहा था तब उनसे मिलने का मौका मिला था। वो तय समय पर टीवी स्टूडियो में आ गईं थी। उनको स्टूडियो के बाहर एक कमरे में बैठाया गया जहां वो किसी वजह से सहज नहीं हो पा रही थीं। उन्होंने अपनी परेशानी को जाहिर नहीं किया बल्कि मुझसे पूछा कि कार्यक्रम शुरू होने में कितना समय है। जब मैंने उनको कहा कि 15 मिनट तो फौरन बोलीं कि क्या आप थोड़ी देर मेरी गाड़ी में बैठकर कार्यक्रम के बारे में बात कर सकते हैं। हमलोग उनकी गाड़ी में बैठे बातें करने लगे ठीक बारह मिनट बाद उन्होंने बातचीत समाप्त की और हम स्टूडियो में चले गए। उनका ये बड़ा गुण था कि वो सामने वाले को बहुत महत्व देती थीं और जो अगर कुछ पसंद नहीं आता था उसको जाहिर नहीं करती थीं।
किताब पर बातें हुईं, उन्होंने राज कपूर के बारे में ढेर सारी यादें ताजा की। दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में उनके भर्ती होने के समय का एक बेहद मार्मिक किस्सा सुनाया था। उन्होंने बताया था कि बहुत कम लोगों को मालूम है कि संगमफिल्म के लिए राज कपूर ने दिलीप कुमार को ऑफर दिया था जिसे करने से दिलीप साहब ने मना कर दिया था। ये वो दौर था जब दिलीप कुमार और राज कपूर के बीच प्रतिद्वंदिता थी। बावजूद इसके दोनों दोस्त थे। अपनी जिंदगी की आखिरी जंग लड़ रहे राज कपूर दिल्ली के एम्स के आईसीयू में भर्ती थे। दिलीप कुमार उनसे मिलने पहुंचे। राज कपूर अचेत थे। दिलीप कुमार ने उनका हाथ अपने हाथ में लिया और कहने लगे उठ जा राज! अब उठ जा, मसखरापन बंद कर। तू तो हमेशा से बढ़िया कलाकार रहा है जो हमेशा हेडलाइंस बनाता है। मैं अभी पेशावर से आया हूं और चापली कबाब लेकर आया हूं। याद है राज हम बचपन में पेशावर की गलियों में साथ मिलकर ये स्वादिष्ट कबाब खाया करते थे।बीस मिनट तक दिलीप कुमार राज कपूर का हाथ अपने हाथ में लेकर बोलते रहे थे।
रितु कपूर एक सफल उद्यमी भी थीं। इंश्योरेंस का उनका अपना कारोबार था जिसमें उनकी कंपनी देशभर में शीर्ष पर थीं। एक दिन में सबसे अधिक पॉलिसी बेचने का रिकॉर्ड उनके नाम पर ही था। न्य फ्रेंड्स कॉलोनी में उनका कार्यालय था जहां वो नियमित आती थीं। उनकी पेंटिग्स में भी गहरी रुचि थीं। एक बार अपने कार्यालय में उन्होंने मुझे एक पेंटिंग दिखाई जिसमें एक खाली कुर्सी रखी है जिसके सामने नीला आकाश था। उन्होंने इसको मानव मन के अकेलेपन से जोड़कर बेहतरीन व्याख्या की थी। 14 दिसंबर 2005 की इस मुलाकात के बाद उन्होंने अपनी पुस्तक दी उसपर लिखा- प्रिय अनंत, हम सभी मरने के लिए पैदा होते हैं। सिर्फ हमारे अच्छे काम बचे रह जाते हैं। बहुत प्यार के साथ आपको ये किताब भेंट कर रही हूं जो कि एक बेटी की अपने पिता और एक कलाकार को श्रद्धांजलि है, जिनका पूरा जीवन सिनेमा को समर्पित था। उसके बाद उन्होंने अपने पिता की फिल्म के एक गीत की दो पंक्ति लिखी- हम न रहेंगे, तुम ना रहोगे, फिर भी रहेंगी निशानियां। अब जब 71 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया है तो उनकी ये पंक्तियां बहुत याद आ रही हैं। 

Saturday, January 11, 2020

विवाद से मुनाफा कमाने का दांव फुस्स


दीपिका पादुकोण की फिल्म छपाक रिलीज हो गई और फिल्म कारोबार के जानकारों के मुताबिक उसकी फिल्म को अपेक्षित ओपनिंग नहीं मिल पाई। फिल्म के दर्शकों के पसंद करने के पूर्वानुमान के आंकड़ों से भी कम की ओपनिंग मिली। पहले दिन की जो ओपनिंग मिली है वो भी संतोषजनक नहीं कही जा सकती है। छपाक पहले दिन पांच करोड़ रु का बिजनेस भी नहीं कर पाई जबकि अनुराग कश्यप जैसे स्वनामधन्य सूरमा भी इस फिल्म के प्रमोशन के लिए कूद गए थे। वैसे भी अनुराग कश्यप फ्लॉप फिल्मों के ही निर्देशक बन कर रह गए हैं जो अपनी निजी कुंठा बेहद अमर्यादित तरीके से ट्वीटर पर निकालते रहते हैं। जिस तरह की गाली गलौच वो अपनी फिल्मों या वेब सीरीज में दिखाते-सुनाते हैं वो भी उसी मर्यादाहीन भाषा के शिकंजे में जकड़ते जा रहे हैं।  पहले दिन पांच करोड़ से नीचे रह जाना छपाक की टीम क लिए झटके जैसा है। मेट्रो शहरों के कुछ मल्टीप्लैक्स में इस फिल्म को देखने दर्शक पहुंचे लेकिन मेट्रो से बाहर इस फिल्म को अतिसाधारण ओपनिंग मिली। बिहार समेत कई मार्केट से इस तरह की खबरें आईं कि पहले शो में तो फिल्म छपाक को दर्शक ही नहीं मिले। पटना के एक सिनेमा हॉल में एक शो में तीन दर्शक के रहने की खबरें आई। दीपिका पादुकोण जैसी बड़ी स्टार और मेघना गुलजार जैसी मशहूर निर्देशक के होते हुए फिल्म छपाक को पहले दिन बॉक्स ऑफिस पर इतनी कम ओपनिंग मिलना चकित करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि दीपिका का जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आंदोलनकारी छात्रों के बीच जाने की युक्ति भी काम नहीं कर पाई। 7 जनवरी की शाम जब दीपिका पादुकोण जवाहलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के आंदोलनकारी छात्रों के बीच पहुंची थीं तो उसके बाद एक वर्ग विशेष ने फिल्म के पक्ष में माहौल बनाना शुरू कर दिया था। टिकट खरीदने और उसका स्क्रीन शॉट ट्विटर पर पोस्ट करने की मुहिम भी चलाई गई थी। कई घंटे तक ये मुहिम चलती भी रही थी। लेकिन अब जब दीपिका की फिल्म छपाक को देखने के लिए अपेक्षित संख्या में दर्शक नहीं पहुंचे तो ये संकेत तो साफ हो गया है कि सोशल मीडिया पर चाहे जितना शोर मचा लो फिल्म को फायदा नहीं मिला। बल्कि इसका फायदा अजय देवगन की फिल्म तान्हाजी को हो गया। तान्हाजी को बॉक्स ऑफिस पर पहले ही दिन 15 करोड़ से अधिक की ओपनिंग मिली जो कि सफल फिल्म होने का संकेत देती है। फिल्म छपाक की रिलीज के तीन दिन पहले दीपिका पादुकोण का जेएनयू जाना और वहां आंदोलनकारी छात्रों के साथ खड़े होने की रणनीति फिल्म प्रमोशन के लिए थी लेकिन अब वो चौतरफा घिर गई हैं। राजनीतिक तौर पर भी उनके बयानों की लानत मलामत हो रही है। केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी ने उनके जेएनयू जाने को लेकर उनको घेरा है। लगता है फिल्म को सफल बनाने के लिए जेएनयू जाने की रणनीति उल्टी पड़ती नजर आ रही है।   
फिल्म इंडस्ट्री में कई बड़े निर्माता निर्देशक एक रिपोर्ट पर विश्वास करते हैं और फिल्म की रिलीज के पहले उसकी रिपोर्ट पर गंभीरता से विचार कर रणनीति बनाते हैं। एक कंपनी ऑरमैक्स, सिनेमैट्रिक्स रिपोर्ट जारी करती है जिसके आधार पर पहले दिन बॉक्स ऑफिस ओपनिंग (एफबीओ)  के बारे में अंदाज लगाया जाता है। ऑरमैक्स सिनेमैट्रिक्स निश्चित तारीख पर रिलीज होनेवाली फिल्मों के प्रमोशन कैंपन को चार आधार पर ट्रैक करती है ताकि पहले दिन फिल्म की ओपनिंग का अंदाज लगाया जा सके। ये चार आधार होते हैं बज़ (चर्चा), रीच (पहुंच), अपील और इंटरेस्ट (रुचि)। ये एक रियल टाइम रिपोर्ट होती है जो किसी भी फिल्म के प्रमोशन कैंपेन को रोजाना ट्रैक करती है। इसको फर्स्ट डे बॉक्स ऑफिस मॉडल कहते हैं। इसके आधार पर ना केवल फिल्म का प्रमोशन कैंपेन डिजायन किया जाता है बल्कि उसमें आवश्यकतानुसार बदलाव भी किया जाता है। इस व्यवस्था को भरोसेमंद बनाने के लिए फिल्मों के 29 मार्केट से जानकारियां जमा की जाती है। जानकारियों का विश्लेषण करने के बाद सिनेमैट्रिक्स रिपोर्ट तैयार की जाती है।
इस रिपोर्ट में फिल्मों पर असर डालनेवाले बाहरी कारकों के प्रभाव का भी ध्यान रखा जाता है। बाहरी कारक यानि फिल्म रिलीज की तारीख के दिन या उसके आसपास पड़नेवाले त्योहार,छुट्टियां,क्रिकेट मैच, परीक्षाएं या मौसम को विश्लेषित किया जाता है। गौरतलब है कि फिल्म धूम 3 के लिए एफबीओ रिपोर्ट साढे बत्तीस करोड़ रुपए की ओपनिंग की थी जबकि वास्तविक ओपनिंग 30.9 करोड़ रु की रही जो कि पूर्वानुमान के बहुत करीब थी। फिल्म आर..राजकुमार के लिए ओपनिंग का पूर्वानुमान 8.3 करोड़ रु का था जबकि वास्तविक ओपनिंग 8.8 करोड़ रुपए की हुई थी। कंपनी मानती है कि उसकी रिपोर्ट एकदम सटीक नहीं होती है और उसमें पांच फीसदी ऊपर नीचे की गुंजाइश होती है। कंपनी की बेवसाइट का दावा है कि फिल्म उद्योग के कई स्टूडियोज उनकी इस रिपोर्ट को गंभीरता से लेते हैं।  
छपाक फिल्म की 7 जनवरी को दिन में ये रिपोर्ट आती है जिसमें वो उपर उल्लिखित चारों मापदंडों पर तीसरे स्थान पर आती है जबकि उसके रिलीज वाले दिन अजय देवगन-काजोल की फिल्म तान्हाजी, द अनसंग वॉरियर पहले स्थान पर थी। पहुंच में भी फिल्म छपाक, इसी दिन रिलीज होनेवाली फिल्म तान्हाजी, द अनसंग वॉरियरऔर 24 जनवरी को रिलीज होनेवाली फिल्म स्ट्रीट डांसर से पीछे थी। दर्शकों की रुचि में भी दीपिका की फिल्म तान्हाजी, द अनसंग वॉरियर से पीछे चल रही थी। इससे भी चिंता की बात ये थी कि एफबीओ में छपाक और तानाजी, द अनसंग वॉरियर की पहले दिन की ओपनिंग में बहुत अधिक फर्क थी तान्हाजी, द अनसंग वॉरियर को इस रिपोर्ट में छपाक से लगभग दुगनी ओपनिंग मिलने का पूर्वानुमान लगाया गया था। बताया जाता है कि इस रिपोर्ट के आते ही फिल्म छपाक का प्रमोशन देख रहे लोगों ने रणनीति बदली और उसके बाद ही दीपिका के जेएनयू जाने की योजना बनाई थी। फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े जानकारों का कहना था कि ऐसा पहली बार हो रहा था कि दीपिका की किसी भी फिल्म की पहले दिन बॉक्स ऑफिस ओपनिंग (एफबीओ) का आंकड़ा इकाई में नहीं आया था। एफबीओ के सिंगल डीजिट में आने से भी आनन फानन में जेएनयू जाने की योजना बनी थी। दीपिका पादुकोण के जेएनयू जाने के दो दिन बाद सिनेमैट्रिक्स की 9 जनवरी की रिपोर्ट से पता लगा था कि छपाक को बहुत मामूली फायदा हुआ था। चार मापदंडों पर दीपिका के जेएनयू जाने का थोड़ा ही असर हुआ लेकिन फर्स्ट डे बॉक्स ऑफिस ओपनिंग के पूर्वानुमान पर जरा भी असर नहीं पड़ा। जबकि तान्हाजी, द अनसंग वॉरियर के एफबीओ में मामूली वृद्धि होती दिख रही है। दोनों फिल्में फिल्म रिलीज हो गई हैं तो ये साफ हो गया है कि सिनेमैट्रिक्स रिपोर्ट के आंकड़े फिल्म दर्शकों के बारे में तकरीबन सही अंदाज लगा पाती है।
दीपिका पादुकोण की फिल्म का प्रमोशन देख रहे लोगों ने सोचा होगा कि उनके जेएनयू जाने से छपाक के पहले भी उसी तरह का विवाद उठ खड़ा होगा जिस तरह का विवाद फिल्म पद्मावत के वक्त उठ खड़ा हुआ था। उनके जेएनयू पहुंचने पर विवाद शुरू तो हुआ लेकिन उसकी चंद घंटों में ही निकल गई। विवाद से मुनाफा कमाने की रणनीति का कोई फायदा नहीं हुआ। विवाद उठाकर मुनाफा कमाने की रणनीति अब पुरानी हो गई है। आमिर खान की जब भी कोई फिल्म रिलीज होती है तो वो विवाद उठाने से नहीं चूकते हैं। किसी फिल्म की रिलीज के पहले उनको गुजरात दंगों की याद आती है तो किसी फिल्म के पहले वो नर्मदा आंदोलन को लेकर विवादित बयान दे देते हैं। विवाद उठाकर मुनाफा कमाने में आमिर खान को महारत हासिल है। जब कोई फिल्म नहीं आ रही होती है तो वो आमतौर पर खामोश ही रहते हैं। किसी भी कलाकार को या फिल्म प्रोड्यूसर को अपने उपक्रम से मुनाफा कमाने का हक है लेकिन मुनाफा के लिए लोगों की भावनाएं भड़का कर उनको सिनेमा हॉल तक खींचने का उपाय करना कितना उचित है इसपर भी विचार करने की जरूरत है। दीपिका की फिल्म छपाक को जिस तरह से विवाद का कोई फायदा नहीं मिला उससे बॉलीवुड के इन सितारों को सीख तो मिली ही होगी। उल्ट इस बार तो दीपिका विवाद में चौतरफा घिर भी गईं हैं। हां जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आंदोलनकारी छात्रों के साथ जाकर खड़े होने का एक फायदा ये हुआ कि कुछ राज्यों में ये फिल्म टैक्स फ्री हो गईं।