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Saturday, June 8, 2013

विघ्नों से घिरी पार्टी

अटल बिहारी वाजपेयी की एक प्रसिद्ध कविता है आओ फिर से दिया जलाएं । इस कविता की अंतिम पंक्तियां हैं- आहुति बाकी यज्ञ अधूरा, अपनों के विघ्नों ने घेरा, अंतिम जय का वज्र बनाने, नव दधीचि हड्डियां गलाएं, आओ फिर से दिया जलाएं । अगर हम अटल जी की इन कविताओं को भारतीय जनता पार्टी के अंदर सियासी घमासान के बरक्स व्याख्यायित करें तो पहली पंक्ति को लोकसभा के चुनाव से जोड़कर देख सकते हैं जिसमें 2014 के लोकसभा चुनाव रूपी यज्ञ की आहुति बाकी है लेकिन पार्टी को अपनों के विघ्नों ने घेरा हुआ है । भारतीय जनता पार्टी के लिए आगामी लोकसभा चुनाव अबतक का सबसे आसान चुनाव साबित हो सकता है । कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए 2 की साख पिछले एक दशक में अपने सबसे निचले स्तर पर है । घपलों घोटालों के घटाटोप से मनमोहन सरकार बुरी तरह से लड़खड़ाई हुई है । महंगाई से पूरे देश की जनता त्रस्त है । देश की विकास दर पांच फीसदी के निचले स्तर तक पहुंच गई है । राजनीति विश्लेषकों और चुनाव पूर्व सर्वे इस बात की ओर लगातार इशारा कर रहे हैं कि अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत लगभग नामुमकिन है । भारतीय जनता पार्टी प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते स्वाभाविक तौर पर सत्ता की सबसे बड़ी दावेदार होकर उभर रही है । इस स्वाभाविक दावेदारी की राह में सबसे बड़ी बाधा पार्टी नेताओं की महात्वाकांक्षा की टकराहट है । नेतृत्व को लेकर जबरदस्त खींचतान है । इस बीच गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूरे देश में सबसे मजबूत और निर्णायक नेता की छवि बनाने में कामयाबी हासिल की हुई है । हाल ही में उपचुनाव के नतीजों में गुजरात की दो लोकसभा और चार विधानसभा सीटों पर जीत हासिल कर मोदी के हौसले बुलंद हैं । उनके समर्थक अति उत्साह में इस नतीजे को 2014 के लोकसभा चुनाव का क्वाटर फाइनल मान रहे हैं । अगर अखबारों और टीवी चैनल के चुनाव पूर्व हो रहे सर्वे के नतीजों पर गौर करें तो कमोबेश बहुमत की राय भी मोदी को देश का कमान सौंपने के पक्ष में बनती वजर आ रही है । अंतिम जय का वज्र बनाने के लिए मोदी रूपी नव दधीचि हड्डियां गलाने के लिए तैयार है लेकिन पार्टी के कई अन्य नेता एक बार फिर से दिया जलाने को तैयार नहीं दिख रहे हैं । पार्टी के कई आला नेता नरेन्द्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पर एकमत दिखाई नहीं दे रहे हैं । मोदी को लेकर उनके मन में एक जिच नजर आती है । खास करके लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज के मन में । सुषमा स्वराज को जब भी मौका मिलता है वो यह कहने से नहीं चूकती हैं कि प्रधानमंत्री पद का फैसला बीजेपी की सर्वोच्च नीति निर्धारक समिति संसदीय बोर्ड करेगा । सुषमा स्वराज को लगता है कि लोकसभा में नेता विपक्ष होने की वजह से प्रधानमंत्री पद की स्वभाविक दावेदारी उनकी ही है ।
उधर भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी के मन से प्रधानमंत्री बनने की हसरत खत्म नहीं हुई है । आज से तकरीबन एक दशक पहले नरेन्द्र मोदी को लालकृष्ण आडवाणी का जोरदार समर्थन हासिल था । गुजरात दंगों के बाद जब अटल बिहारी वाजपेयी खफा थे तो आडवाणी का प्रत्यक्ष और परोक्ष आशीर्वाद मोदी को प्राप्त था । गुजरात विधानसभा चुनावों में जीत का हैट्रिक लगाने के बाद नरेन्द्र मोदी के मन में प्रधानमंत्री पद की ख्वाहिश हिलोरें लेने लगी । उनके इस ख्वाब को सोशल मीडिया ने भी खूब हवा दी । 2009 में मुंह की खाने के बावजूद यूपीए की खस्ता हालत के मद्देनजर एक बार फिर से आडवाणी के मन के कोने अंतरे में भी पद की लालसा जगी । लेकिन लालकृष्ण आडवाणी को पीएम की कुर्सी और अपने बीच मोदी सबसे बड़ी बाधा नजर आने लगे । जब भी उन्हें मौका मिलता है वो मोदी को किनारा लगाने की कोशिश में जुट जाते हैं । अभी हाल ही में उन्होंने मोदी के विकास पुरुष की छवि को पंचर करने की भी कोशिश की । आडवाणी ने कहा कि गुजरात तो पहले से ही स्वस्थ था जिसे मोदी ने उत्कृष्ट कर दिया । जबकि शिवराज सिंह चौहान ने बीमारू राज्य को स्वस्थ कर दिया । यह कहकर आडवाणी ने मोदी की सबसे बड़ी ताकत पर प्रहार किया । यही बात कांग्रेसी भी लगातार करते रहे हैं । दरअसल मोदी की सबसे बड़ी ताकत उनकी विकास पुरुष की छवि है । इसके अलावा आडवाणी ने शिवराज सिंह चौहान की तुलना अटल जी से करके एनडीए के सबसे बड़े घटक दल के नेता नीतीश कुमार को भी संदेश दे दिया । गौरतलब है कि दिल्ली की अधिकार रैली में नीतीश ने अटल जी जैसे व्यक्तित्व की वकालत की थी ।  
भारतीय जनता पार्टी में यह माना जाता है, तथ्य भी यही है, कि जब तक किसी नेता को राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का समर्थन हासिल नहीं होगा तबतक उसे पार्टी में सर्वोच्च पद हासिल नहीं हो सकता है। संघ प्रमुख मोहन भागवत की पसंद नितिन गडकरी के खिलाफ मोर्चा खोलकर आडवाणी ने संघ की नाराजगी मोल ली हुई है । संघ एक बार पहले भी जिन्ना प्रकरण में आडवाणी को आईना दिखा चुका है । इस बीच नरेन्द्र मोदी में आरएसएस को एक ऐसा नेता दिखाई दिया जिसके बूते वो हिंदुत्व की अपनी राजनीति को परवान चढ़ा सकता है । योगगुरु बाबा रामदेव के हरिद्वार के आश्रम के उद्घाटन के मौके पर पिछले 26 अप्रैल कर्नाटक के उडुपी मठ के श्री श्री विश्वेश्वर तीर्थ स्वामी ने नरेन्द्र मोदी को आशीर्वाद दिया । स्वामी ने साफ तौर पर मोदी को राम और कृष्ण दोनों करार दिया और कहा कि यूपीए के भ्रष्टाचार रूपी रावण का वही नाश कर सकते हैं । स्वामी ने जिस तरह से मोदी की तारीफ की उससे यह तो साफ हो गया कि संघ में मोदी का सितारा चमक रहा है । उनके बयान से आडवाणी कैंप को तगड़ा झटका लगा । इस बयान के बाद आडवाणी के सिपहसालार अनंत कुमार और वेंकैया नायडू स्वामी को मनाने में जुटे लेकिन नतीजा निकल नहीं सका । गौरतलब है कि उडुपी मठ के स्वामी जिन्ना प्रकरण के दौरान आडवाणी के समर्थन में थे ।

दरअसल भारतीय जनता पार्टी में इस वक्त सियासत का ऐसा खेल चल रहा है जिसमें किसी की जीत होती नहीं दिख रही । एक तरफ मोदी हैं तो दूसरी तरफ आडवाणी और सुषमा । इन दोनों गुटों के झगड़े के बीच अध्यक्ष राजनाथ सिंह अपनी गोटी फिट करने में लगे हैं । उनको लगता है कि मोदी और आडवाणी खेमे में ठनने के बाद स्वाभाविक तौर पर वो दोनों गुटों को स्वीकार्य हो सकते हैं । जिस तरह से गडकरी को अध्यक्ष पद से हटाने के बाद तमाम नाम चले लेकिन फायदा राजनाथ सिंह को ही हुआ । राजनाथ सिंह को संघ का भी आशीर्वाद प्राप्त है, एनडीए घटक दलों को भी उनके नाम पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए । उधर कुछ नेता मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी चढ़ाने में लगे हैं । लेकिन जिस तरह से पार्टी में मोदी की स्वीकार्यता बढ़ रही है उसके बाद आडवाणी की राह आसान नहीं लगती है । गोवा में होनेवाली पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से कोई संदेश निकलना चाहिए । लेकिन पार्टी के आला नेताओं के बीच मचे घमासान पर अटल जी की ही एक और कविता याद आ रही है अपनी ही छाया से बैर, गले लगने लगे हैं गैर, खुदकुशी का रास्ता. तुम्हें वतन का वास्ता, बात बनाएं, बिगड़ गई । दूध में दरार पड़ गई है । अगर समय रहते दूध में दरार पड़ने से नहीं रोका गया तो फिर यूपीए -3 की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता ।

 

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