Translate

Saturday, April 29, 2023

कला की आड़ में राजनीति


गुनीत मोंगा की डाक्यूमेंट्री द एलिफेंट व्हिसपर्रस को आस्कर पुरस्कार मिला। इसके पहले कान फिल्म फेस्टिवल में आल दैट ब्रीद्स को गोल्डन आई अवार्ड से सम्मानित किया गया। माना जा रहा है कि इन दो डाक्यूमेंट्री के अंतराष्ट्रीय मंच पर सम्मानित होने के बाद देश में दर्शकों का रुझान डाक्यूमेंट्री की तरफ बढ़ा है। ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म्स की लोकप्रियता के कारण भारत में बनने वाली डाक्यूमेंट्रीज को वैश्विक मंच मिला ओटीटी पर किसी प्रकार के प्रमाणन की भी बाध्यता नहीं है। अगर कोई डाक्यूमेंट्री निर्माता उसका सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं करके सिर्फ ओटीटी प्लेटफार्म पर प्रदर्शित करना चाहता है तो उसको केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के पास भी नहीं जाना होता है ।इसने डाक्यूमेंट्रीज के लिए एक ऐसा मंच खोल दिया जहां वो किस भी प्रकार की सामग्री और किसी भी प्रकार का संवाद दर्शकों के सामने पेश कर सकते हैं। इस विधा को राजनीतिक औजार के रूप में उपयोग में ला सकते हैं। कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर किसी विचारधारा विशेष को नीचा दिखा सकते हैं और किसी को उठा सकते हैं। 

जब कान फिल्म फेस्टिवल में आल दैट ब्रीद्स को पुरस्कृत किया गया तो चर्चा इस बात की हुई कि वो दिल्ली के दो भाइयों मोहम्मद और नदीम की कहानी है जो घायल पक्षियों को उपचार देने का काम करता है। इस डाक्यूमेंट्री में उन दोनों भाइयों के संघर्ष को रेखांकित किया गया। ये बताया गया कि किस तरह से दो मुस्लिम भाई दिल्ली के वजीराबाद इलाके में एक बेसमेंट में घायल पक्षियों विशेषकर चीलों को उपचार देते हैं। कान फिल्म फोस्टिवल में पुरस्कृत होने के शोरगुल के बीचतब इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया कि ये डाक्यूमेंट्री केवल घायल पक्षियों के देखभाल तक सीमित नहीं है। इस डाक्यूमेंट्री में सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट (सीएए) और नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजन्स (एनआरसी) पर भी टिप्पणी है। संवाद में चर्चा इस बात की भी है कि उनको फारेन कंट्रीव्यूशन रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए) के अंतर्गत विदेश से धन लेने की अनुमति नहीं मिलती है और सरकार इसका कार भी नहीं बताती हैजबकि ऐसा होता नहीं है। सरकार अगर किसी के आवेदन को अस्वीकार करती है तो उसका कारण अवश्य बताती हैडाक्यूमेंट्री निर्माता इतने पर ही नहीं रुकते हैं बल्कि वो दिल्ली के दंगों पर भी टिप्पणी करते चलते हैं। पृष्ठभूमि से लेके रहेंगे आजादी जैसे नारे भी लगते रहते हैं। इतना ही नहीं एक पत्रकार की आवाज भी गूंजती है जिसमें वो बताता है सीएए के पास होने पर पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान के मुसलमानों को वहां प्रताड़ित होने की दशा में भारत में नागरिकता नहीं मिलेगी जबकि अन्य धर्म के लोगों को मिलेगी।इस समाचर के अंश के प्रसारित होने के बाद परिवार में इस बात पर चर्चा होती है कि अगर नाम में स्पेलिंग गलत हो जाए तो भी दिक्कत आ सकती है। एक संवाद है जिसमें घर का बेटा अपनी पत्नी से पूछता है कि रिफ्यूजी बनकर कहां जाना चाहती हो, पाकिस्तान, बंगलादेश या अफगानिस्तान। वो जब कहती है कि क्या कहीं और नहीं जा सकते तो उत्तर मिलता है कि अगर कहीं और जाना है तो सरकार के निकालने के पहले जाना होगा। सरकार के निकालने के बाद पाकिस्तान जाने पर वहां पाकिस्तानी होने का सबूत मांगा जाएगा इस पूरे संवाद पर विचार करना चाहिए कि इसमें घायल पक्षियों की देखभाल और उनके संघर्ष से क्या लेना देना है। 

इसी तरह से इस संवाद के पहले नेपथ्य ये किसी का भाषण प्रसारित होता है। कहा जा रहा होता है कि एक बात का हमेशा ध्यान रखिए कि ये लड़ाई शांति और अहिंसा की है। ये लड़ाई विचार और विचारहीनता की है।..हमें इस देश के संविधान को बचाना है। इसी तरह से एक अन्य जगह कहा जाता है कि बहुमत का अर्थ क्या है? देश की चालीस प्रतिशत जनता। बहुमत हमेशा सही नहीं सोचती है या बहुमत का निर्णय सदैव सही नहीं होता है। फिर दिल्ली के दंगों की रिपोर्टिंग के दौरान की आवाजें और एक मीनारनुमा इमारत पर झंडा फहराने के लिए चढ़ता एक व्यक्ति। दंगों की चपेट में आए इलाकों की तस्वीरें। नेपथ्य से आवाज, दंगे कोई नई बात नहीं है। हम छत पर खेला करते थे और पता चलता था कि नीचे दंगा हो रहा है। पर इस बार अलग है। इस बार सिर्फ नफरत नहीं है चारों तरफ घिन फैली हुई है। इस तरह के संवादों से निर्माता निर्देशक की मंशा स्पष्ट हो जाती है। 

इसी तरह की एक और डाक्यूमेंट्री सीरीज आई है, डासिंग आन द ग्रेव। ये डाक्यूमेंट्री 1991 में बेंगलुरू में हुए चर्चित रिचमंड रोड केस पर आधारित है। इसमें एक हिंदू स्वामी श्रद्धानंद और एक मुस्लिम महिला की प्रेम कहानी और उसके बाद मर्डर मिस्ट्री है। शाकिरा खलीली मैसूर के दीवान की बेटी थी जो अपने पहले पति को छोड़कर स्वामी से शादी कर लेती है। उस समय ये प्रम विवाह काफी चर्चित हुआ था क्योंकि तब महा चार बच्चों की मां थी। 1991 में अचानक शाकीरा गायब हो जाती है। पहले पति से उसकी बेटी अपनी मां की तलाश में जुटती है। तीन साल बाद पता चलता है कि शाकिरा के पति स्वामी श्रद्धानंद ने ही उसको माकर अपने घर के आंगन में दफना दिया था। इस डाक्यूमेंट्री में सबकुछ है। विवाहित महिला का प्रेम है, हिंदू संत हैं, अकूत संपत्ति है, ड्रग है, मर्डर है और फिर स्वामी को अपनी पत्नी की हत्या के जुर्म में उम्रकैद की सजा है। इस डाक्यूमेंट्री को बनाया है पैट्रिक ग्राहम ने। अब जरा पैट्रिक ग्राहम के बारे में जान लेते हैं। इसके पहले पैट्रिक घोउल वेब सीरीज लिख और निर्देशित कर चुके हैं। इस सीरीज में भयानक हिंसा थी। इसके अलावा पैट्रिक वेब सीरीज लैला की टीम के साथ भी जुड़े रहे हैं। इस डाक्यूमेंट्री के संवाद में भी और दृष्यों में भी आपको स्पष्ट रूप से एक एजेंडा दिखाई देगा। हिंदू धर्म के खिलाफ एजेंडा। एक संवाद है जिसमें कहा गया कि मुझे लगता था कि वो ऐसे इंसान हैं जिसे दिव्य शक्ति प्राप्त है। वह भगवान का दूत लगता था। संवादों के अलावा अगर दृष्यों की बात करें तो जब स्वामी श्रद्धानंद की शादी शाकीरा खलीली की शादी हिंदी रीति रिवाज से होती है तो उसको बहुत विस्तार से दिखाया जाता है। हाथों में बंधे कलावा तक पर फोकस किया गया है। दृश्यों और संवादों से एक अलग तरह का माहौल बनाने का प्रयास किया गया है। पहले वेब सीरीज में इस तरह के संवाद आदि होते थे लेकिन जब उसको लेकर शोरगुल मचा तो अब वेब सीरीज में कम डाक्यूमेंट्रीज में अधिक होने लगा। 

इस तरह की डाक्यूमेंट्रीज में प्रत्यक्ष रूप से विषय कुछ और होता है लेकिन उसके अंदर परोक्ष रूप से कुछ और कहा जा रहा होता है। यह बेहद खतरनाक है क्योंकि मनोरंजन और कलात्मकता को राजनीति के औजार के तौर पर उपयोग में लाया जाता है। इसमें जिस तरह से राजनीतिक टिप्पणियां की जाती हैं वो दर्शकों के अवचेतन मन में धंसी रह जाती है जो लंबे समय तक अपना असर दिखाती रहती है। चीलों को बचाने के नाम पर संविधान को बचाने की बात हो, सीएए और एनआरसी के खिलाफ भ्रामक बातें हों या अपराध कथा में हिंदू धर्म प्रतीकों का उपयोग इस तरह के किया जाए जिसका अर्थ कुछ और निकले ऐसे में नीति निर्धारकों को इसके व्यापक असर के बारे में सोचना चाहिए।। विचार तो इस बात पर भी करना चाहिए कि क्या ओटीटी प्लेटफार्म पर दिखाई जानेवाली सामग्री के लिए कोई व्यावहारिक और प्रभावी नियमन हो। लंबे समय से इसको लेकर बातें हो रही हैं। स्व नियमन जैसी व्यवस्था है भी लेकिन ये प्रभावी नहीं है। 

 

Saturday, April 22, 2023

इतिहास से अनभिज्ञ राहुल

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व सांसद राहुल गांधी पिछले कई महीनों से चर्चा में बने हुए हैं। पहले अपनी पैदल यात्रा को लेकर, फिर वीर सावरकर पर की गई टिप्पणियों को लेकर, फिर ब्रिटेन में अलग अलग जगहों पर दिए गए अपने वक्तव्यों को लेकर, और फिर मानहानि के केस में सजा और उसके बाद की घटनाओं को लेकर। पैदल यात्रा खत्म होते ही इसकी चर्चा कम हो गई। वीर सावरकर पर की गई टिप्पणियों पर शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, जो कांग्रेस की सहयोगी पार्टियां हैं, ने आपत्ति जताई। उसके बाद वीर सावरकर पर कोई टिप्पणी नहीं आई है। ब्रिटेन में उन्होंने कई तरह की टिप्पणी की जिनमें से एक थीं भारत के लोकतंत्र को लेकर। वहां उन्होंने जो कहा था उससे ये ध्वनित हो रहा था कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है और लोकतंत्र के रखवाले कहां हैं। उनके इस बात पर पर्याप्त चर्चा हो रही थी फिर सूरत की अदालत का निर्णय आ गया। मानहानि के एक केस में उनको दो साल की सजा हो गई। सजा होते ही संसद से उनकी सदस्यता समाप्त हो गई। फिर कानूनी दांव-पेंच और अब सजा पर रोक की उनकी याचिका खारिज होने के कारण निरंतर चर्चा में बने हुए हैं। इन बातों की चर्चा करने का उद्देश्य केवल इतना है कि भारत में लोकतंत्र को लेकर राहुल गांधी ने जिस तरह से ब्रिटेन की धरती पर अपनी बात रखी और जिस तरह से लोकतंत्र के कथित पहरेदारों को ललकारा उसपर पर्याप्त चर्चा नहीं हो सकी। न्यूज चैनलों की डिबेट में शोरगुल के बीच इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर गंभीर और तथ्यपरक चर्चा की जगह राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप ज्यादा हुआ। 

अब राहुल गांधी के उस अपेक्षा की चर्चा करते हैं जो उन्होंने ब्रिटेन की धरती से विश्व के लोकतांत्रिक देशों से की। उन्होंने कहा कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है, अगर यहां लोकतंत्र का पतन होता है तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। हम तो उसको झेल लेंगे लेकिन उसका असर आप पर भी पड़ेगा। इस चेतावनी में एक भाव ये भी है कि दुनिया के देशों विशेषकर यूरोप और अमेरिका को भारत के लोकतंत्र पर नजर रखनी चाहिए। इसके पतन के आसन्न खतरों को देखते हुए उसको बचाने का प्रयत्न भी करना चाहिए। इस भाव को लेकर जमकर राजनीति हुई लेकिन इस आलेख में इस बात की चर्चा करेंगे कि क्या ब्रिटेन और अमेरिका लोकतंत्र की रक्षा करने के लिए कार्य करते रहे हैं या फिर लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर दुनियाभर के देशों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने की जुगत में रहते हैं। अमेरिका ने इराक में लोकतंत्र के नाम पर क्या किया वो जगजाहिर है। इस मसले पर अमेरिका का इतिहास देखे जाने की जरूरत थी। अब जरा ब्रिटेन की भी चर्चा कर लेते हैं। राहुल गांधी को या उनके सलाहकारों को तो ये याद होगा कि ब्रिटेन ने लंबे समय तक हमें गुलाम बनाकर रखा था। उनके नाना और नाना के पिता ने अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन में हिस्सा लिया था। उनकी दादी भी अंग्रेजों के खिलाफ स्वाधीनता आंदोलन में शामिल रही थीं। इंदिरा जी के प्रधानमंत्री रहने के दौरान अमेरिका और वहां के राष्ट्रपति का बर्ताव कैसा रहा था, इसको देश की जनता ने अभी तक भुलाया नहीं है। 

ब्रिटेन की धरती पर जब लोकतंत्र को लेकर राहुल गांधी चर्चा कर रहे थे तो संभवत: उनको जलियांवाला बाग नरसंहार की याद नहीं रही होगी। वही जलियांवाला बाग जहां सैकड़ों निर्दोष भारतीयों को अंग्रेज सिपाहियों ने गोलियों से भून दिया था। 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला नरसंहार हुआ था। इस ब्रितानवी नरसंहार के एक सौ चार वर्ष बाद एक पुस्तक आई है गांधी,जलियांवाला बाग विचार कोश। इसके लेखक हैं कमल किशोर गोयनका। कमल किशोर गोयनका की ख्याति प्रेमचंद के अध्येता के तौर पर रही है और उन्होंने प्रेमचंद के लेखन और उनके व्यक्तित्व के बारे में विपुल लेखन ही नहीं किया है बल्कि प्रेमचंद को लेकर जिस तरह की भ्रांतियां फैलाई गईं थी उसका निषेध भी किया था। अब अपनी इस नई पुस्तक गांधी, जलियांवाला विचार कोश में कमल किशोर गोयनका ने श्रमपूर्वक इस नरसंहार से जुड़े दस्तावेजों पर आधारित ऐतिहासिक तथ्यों को जुटाकर गांधी और के विचारों और योजनाओं की तस्वीर प्रस्तुत की है। कमल किशोर गोयनका ने बरतानवी अधिकारियों और उनके प्रतिनिधियों की रिपोर्ट, उनके आदेश को भी समेटा है। इतना ही नहीं गोयनका ने उस दौर के पत्रकारों, लेखकों और समाजेवियों के लिखे या उनके रिकार्डेड वक्तव्यों को भी आधार बनाया है। इनमें ब्रिटेन की वो मानसिकता स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है जो उनके लोकतंत्र प्रेम को एक्सपोज कर देती है। जलियांवाला बाग की नृशंसता के बाद पंजाब के तत्कालीन गवर्नर सर माइकल ओ डायर ने अपनी गवाही में कहा था कि मेरे निजी अनुभव के अनुसार शांति का अर्थ है जब कोई गोरा आदमी , बड़े साहब से लेकर आर्डिनरी टामी तक, बिना शस्त्र के हिंदुस्तान के किसी भी स्थान पर अकेला सैर कर सके और सुरक्षित रहे। कोई उसे बुरी नजर से न देखें, इस डर से कि उसकी आंखे निकाल ली जाएंगी, हाथापाई करने पर हाथ काट दिए जाएंगे और उपद्रव करनेवालों के गांव जला दिए जाएंगे। प्रकृति का सच है कि ताकतवर राज करते हैं। इन पंक्तियों को पढ़ने के बाद ब्रिटेन से किसी प्रकार की अपेक्षा शेष नहीं रहती है। आज भी स्थिति बदली नहीं है। इस हत्याकांड के सौ वर्ष बाद ब्रिटेन की संसद में इसपर बहस होती है। इस नरसंहार पर क्षमा मांगने को लेकर चर्चा होती है लेकिन अबतक ऐसा नहीं करके ब्रिटेन ने जता दिया है कि वो एक राष्ट्र के तौर पर अब भी नरसंहार को लेकर न तो शर्मिंदा है और न ही क्षमा मांगना चाहते हैं। इस पुस्तक में ऐसे सैकड़ों दृष्टांत हैं। जलियांवाला को लेकर महात्मा गांधी के विचारों को भी समग्रता में पेश किया गया है जो कि शोधार्थियों को लिए एक नई जमीन तैयार करती है। गांधी की एक नई छवि भी सामने आती है। 

कमल किशोर गोयनका अपनी इस पुस्तक में साबित करते हैं कि ब्रिटेन का शासन नस्ली था, क्रूर था। क्रूर इस वजह से कि जलियांवाला में गोलियां बरसाने के बाद जिस तरह की स्थितियां बनीं वो ब्रिटेन के दामन पर काला धब्बा है। जनरल डायर और माइकल ओ डायर के कृत्यों का जिस तरह से ब्रिटेन में बचाव होता रहा है उससे ये तो साबित होता है कि वहां का मानस कैसा है। ऐसे मानस वाले राष्ट्र से लोकतंत्र की रक्षा करने के लिए आगे आने की अपेक्षा करना व्यर्थ है। राहुल गांधी जब ब्रिटेन की धरती पर जाकर ऐसी बातें करते हैं तो इतिहास से अनभिज्ञ नजर आते हैं। उनको भारत के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास को ठीक तरह से आत्मसात करना चाहिए क्योंकि वैश्विक मंचों पर वो भारत के प्रमुख विपक्षी दल के नेता के तौर पर बोलते हैं। उनको लोग गंभीरता से सुनते हैं। अगर वो वैश्विक मंचों पर इस तरह की बातें करेंगे तो उनके बारे में अलग राय बनेगी। उनकी पार्टी के नेता तो उनकी प्रशंसा करेंगे ही लेकिन जब समर्थक पत्रकार भी सुर में सुर मिलाने लगते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि उनके समर्थकों का इतिहास बोध कितना कमजोर है। कुछ लोगों को राहुल गांधी के इन वक्तव्यों में उनका गांभीर्य दिखा था,अपने राष्ट्र को लेकर उनकी चिंता दिखी थी। उनके अपने तर्क थे लेकिन ऐतिहासिक तथ्य और घटनाएं तो कुछ अलग ही कहती हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के विपक्ष के नेता से ये अपेक्षा तो की जा सकती है कि वो वैश्विक मंच के अपने भाषण में उठाने वाले बिंदुओं पर बोलने के पहले समग्रता में विचार कर लें।  

Friday, April 21, 2023

स्वाद और एबियंस का काकटेल


जब भी उत्तर भारतीय खाने की बात आती है तो लोग दाल मखनी या बटर चिकन और तंदूरी रोटी की बात करने लगते हैं। उत्तर भारत के खान-पान परंपरा को देखें तो इसका दायरा दाल मखनी और बटर चिकन आदि से काफी विस्तृत है। उत्तर भारत की जो प्राचीन खान-पान परंपरा है उसका स्वाद मसालों के साथ साथ उनको बनाने की विधि पर निर्भर करता था। धीमी आंच पर खाना पकाने की पद्धति उसके स्वाद को कई गुणा बढ़ा देती है। धीमी आंच पर बनी दाल, लोहे की कड़ाही में बना मटन इसका स्वाद ही अलग होता है। दिल्ली के चाणक्यपुरी में सरदार पटेल मार्ग पर स्थित ताज पैलेस होटल में एक रेस्तत्रां है लोया। ताज पैलेस में घुसते ही ताज समूह की सिगनेचर स्टाइल की साज सज्जा। लेकिन जैसे ही आप लोया रेस्तत्रां में प्रवेश करते हैं तो वहां की साज सज्जा बिल्कुल ही अलग है। रेस्तत्रां के बीच में बार और उसके सामने और दोनों तरफ करीने से लगी मेज और कुर्सियां। वहां बैठकर आप न सिर्फ भोजन कर सकते हैं बल्कि बार टेंडर को कलात्मक तरीके से ड्रिंक्स तैयार करते और शेफ को किचन में खाना बनाते भी देख सकते हैं। इसके मेन्यू और डेकोरेशन में भी एक थीमैटिक जुड़ाव है। इस रेस्तरां की विशेषता है कि ये उत्तर भारत के अलग अलग इलाकों में प्रचलित खाने को उसी अंदाज में बनाते हैं जैसे कि वहां वर्षों पहले बनाई जाती थीं। उत्तर भारत का मतलब हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, जम्मू कश्मीर आदि। इनका पूरा ध्यान खाने के स्वाद और उसको बनाने के तरीके पर होता है।

इस रेस्तरां में कटहल और बैंगन का भर्ता बहुत स्वादिष्ट है। लोया के शेफ गगन सिक्का ने इसकी रेसिपी बताई। किस तरह से बैंगन को रोस्ट करके और फिर कटहल और मसाले के साथ मिक्स करके ये स्वादिष्ट डिश तैयार किया जाता है। सर्व करने के पहले थोड़ी देर तक इसको धीमी आंच पर चढ़ा कर रखते हैं। इसी तरह से हिमाचल की प्रसिद्ध दाल का स्वाद उसको बनाने के तरीके से खास हो जाता है। गगन सिक्का के अनुसार यहां के स्वाद में दादी और नानी के नुस्खों का खास ख्याल रखा जाता है। उसी तरह से मसालों को पीसकर वेज नानवेज में डाला जाता है जिस तरह से पुराने जमाने में डाला जाता था। वेज की तरह नानवेज पसंद करनेवालों के लिए भी कई तरह के स्वादिष्ट डिसेज उपलब्ध हैं। दम नल्ली का स्वाद भी नानवेज खानेवालों को बेहद पसंद आता है। धीमी आंच पर काफी देर तक पकाने के कारण मसालों का स्वाद टेंडर मटन के अंदर तक चला जाता है। इसी तरह से कांगड़ा खोड़िया गोश्त, मलेरकोटला कीमा छोले आदि भी क्षेत्र विशेष की रेसिपी के हिसाब से बनाकर परोसे जाते हैं। लोया के खाने में देसी खुशबू महसूस होती है। लोये के मेन्यू में स्वीट डिश के लिए मिट्ठा शब्द का प्रयोग किया गया है। यहां भी उत्तर भारत में प्रचलित मीठे को करीने से बनाकर पेश किया जाता है। अगर आप दूध जलेबी खाना चाहते हैं तो करीने से कांसे के ट्रे में तीन छोटे ग्लास में पिस्ता, छुहारा और केसर मिल्क और उनके ऊपर रखी गई एक एक जलेबी। इसी तरह से गुड़ की रोटी और खीर की डिश भी उन दिनों की याद दिलाते हैं जब गांवों में बच्चे रात को गुड़ की रोटी खाने की जिद करते थे और दादी मां उनको मीठी रोटी खिलाकर संतुष्ट कर देती थी। कई बार ये कहा जाता है कि फाइव स्टार का खाना काफी महंगा होता है लेकिन लोया में पांच छह हजार रु में दो लोग आराम से स्वादिष्ट भोजन कर सकते हैं।

Saturday, April 15, 2023

भाषाई गुलामी से मुक्त होती व्यवस्था


हाल में दिल्ली पुलिस कमिश्नर संजय अरोरा ने एक परिपत्र जारी कर आदेश दिया है कि किसी भी अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के समय सरल शब्दों का प्रयोग किया जाए। दिल्ली पुलिस का ये आदेश दिल्ली उच्च न्यायालय के एक आदेश के आलोक में जारी किया गया है। उच्च न्यायालय ने एक मामले में ये आदेश दिया था कि प्राथमिकी शिकायतकर्ता के शब्दों में होनी चाहिए। बहुत अधिक जटिल भाषा, जिसका अर्थ शब्दकोशों की मदद से खोजा जाता है, प्राथमिकी में इस्तेमाल नहीं किया जाना है। पुलिस अधिकारी बड़े पैमाने पर आम जनता के लिए काम कर रहे हैं और उन लोगों के लिए नहीं जो उर्दू, हिंदी या फारसी भाषा में डाक्टरेट के पदवी धारक हैं। जहां तक संभव हो प्राथमिकी में सरल शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए। न्यायालय के इस आदेश के अनुपालन में दिल्ली पुलिस ने कई कठिन शब्दों की एक सूची तैयार की और उसके सरल हिंदी शब्द की सूची भी परिपत्र के साथ जारी की। दिल्ली पुलिस के इस कदम को लेकर कुछ लोगों ने व्यंग्यात्मक शैली में अपनी बात की तो कइयों ने इसको उर्दू के खिलाफ कदम माना। भाषा की राजनीति करनेवाले इसको लेकर सक्रिय हुए। हिंदी उर्दू के परस्पर संबंधों की दुहाई दी गई। गंगा-जमुनी तहजीब की बात की गई। लेकिन आलोचना करनेवालों से एक चूक हो गई। उन्होंने उर्दू और अरबी फारसी को लेकर घालमेल कर दिया। फारसी और उर्दू का घालमेल करनेवालों और दिल्ली पुलिस के इस कदम की आलोचना करनेवालों को डा सैयद अली बिलग्रामी का कथन याद रखना चाहिए। उन्होंने कहा था कि शिक्षा की दृष्टि से मुसलमानों की पिछड़ी हुई दशा का प्रधान कारण दोषपूर्ण फारसी वर्णमाला है जो उनके बच्चों को बर्षों तक उलझाए रखती है। उनको सरल और व्यवस्थित नागरी वर्णमाला स्वीकार कर लेनी चाहिए जिसे छह ही महीनों में सीखा जा सकता है। इन दिनों उर्दू कू सबसे बड़ी चिंता यही है कि उसकी लिपि में लिखने पढ़नेवाले निरंतर कम होते जा रहे हैं।

दिल्ली पुलिस के इस परिपत्र को देखने के बाद आचार्य रामचंद्र शुक्ल के एक लेख की कुछ पंक्तियां याद आ गई। रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी के समर्थन में लीडर पत्रिका में एक लेख लिखा था। उसमें एक अदालती नोटिस का उल्लेख है जो देवनागरी लिपि में लिखी गई थी, इसको देखा जाना चाहिए- लिहाजा बजरिय :  इस तहरीर के तुम रामपदारथ मजकूर को इत्तला दी जाती है कि अगर तुम जर मजकूर यानि मुबलिग पंद्रह रुपए छह आने, जो अजरुए डिगरी वाजिबुल अदा है, इस अदालत में अंदर पंद्रह रोज तारीख मौसूल इत्तलानामा हाजा से अदा करो वरन :  वजह जाहिर करो कि तुम मुंदर्जी जैल खेतों से जिनके बावत बकाया डिगरी शुदा बाजिबुल अदा है, बेदखल क्यों न किए जाओ। आचार्य शुक्ल ने लिखा कि उपरोक्त नोटिस में क्रियाओं और सर्वनामों के अतिरिक्त सभी शब्द फारसी और अरबी के हैं और जिन लोगों ने मौलवी का प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया है उनकी समझ से पूर्णत: बाहर है। सरल बनाने के लिए इसको हिंदी में इस प्रकार से लिखा जा सकता है- सो इस लेख से तुमको जताया जाता है कि तुम ऊपर कहा हुआ रुपया जिसकी तुम्हारे ऊपर डिगरी हो चुकी है इस नोटिस को पाने के पंद्रह दिन के भीतर इस अदालत में चुकता करो, नहीं तो कारण बतलाओ कि तुम नीचे लिखे खेतों में से जिनके ऊपर डिगरी का रुपया आता है, क्यों न बेदखल किए जाओ। भले ही ये अदालती नोटिस है लेकिन किसी भी थाने में जो प्राथमिकी दर्ज की जाती है वो भी लगभग ऐसी ही भाषा में लिखी जाती है जो समझ से परे है। दिल्ली पुलिस ने जो शब्दों की जो सूची जारी की है वो भी इस तरह की कहानी ही कहते हैं। सूची को देखें तो उसमें भी अदम पता (जिसका पता न चले), अदम शनाख्त (जिसकी पहचान न हुई हो), अरसाल (प्रस्तुत है), काबिल दस्त अंदाजी (संज्ञेय अपराध) जैल (निम्न), ततीमा (अतिरिक्त), फर्द मकबूजगी (किसी वस्तु को कब्जे में लेने के लिखित दस्तावेज) आदि जैसे शब्द हैं। इनको भी समझने के लिए या तो शब्दकोश की आवश्यकता होगी या मौलवी का प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्ति की सहायता की।

दिल्ली पुलिस के इस कदम की सराहना की जानी चाहिए क्योंकि न्याय व्यवस्था की पहली सीढ़ी तो पुलिस थाना या चौकी ही है। किसी भी तरह के अपराध की पहली रिपोर्ट तो वहीं दर्ज की जाती है। न्यायालय में तो केस बाद में जाता है। थाना या पुलिस चौकी में जिस भाषा में अपराध की शिकायत दर्ज की जाती है उसके अधिकतर शब्द अरबी या फारसी के होते हैं। इससे शिकायत दर्ज करवानेवाला अपनी शिकायत के बारे में समझ नहीं पाता है कि उसने जो शिकायत लिखवाई वो सही से प्राथमिकी में दर्ज हुई या नहीं। अगर राजनीति से अलग हटकर बात करें तो पूरे देश में एक सामान्य भाषा को लेकर लोग बात भी करने लगे हैं और उसको साकार करने का प्रयत्न भी। भारत की लगभग सभी भाषाएं शब्दों के लिए हिंदी की तरह ही संस्कृत के द्वार पर जाती हैं। हिंदी, मराठी, गुजराती, बंगाली आदि में इतनी अधिक समानता है कि इससे एक भाषाई गठबंधन बनने की प्रबल संभावना है। कहीं पढ़ा था कि उर्दू को संस्कृत से परहेज है और वो संस्कृत से नहीं बल्कि फारसी और अरबी से शब्द उधार लेती है। इस कारण उर्दू न केवल दुरूह होती चली गई बल्कि भारतीय भाषाओं से एक दूरी भी बना ली। बाद में उर्दू के कई पैरोकार मुस्लिम विद्वानों औरर रहनुमाओं ने हिंदी को लेकर अनर्गल टिप्पणियां की। बावजूद इसके हिंदी का फैलाव होता रहा और उर्दू सिकुड़ती चली गई। इन कारणों की पड़ताल करनी चाहिए। फारसी के दुरूह शब्दों का उपयोग कम करने से उर्दू कमजोर नहीं होगी बल्कि उर्दू को ताकत ही मिलेगी और वो भारतीय भाषाओं के गठबंधन के करीब आ सकेगी। यहां के लोगों में उसकी स्वीकार्यता बढ़ेगी।

दिल्ली पुलिस के इस कदम पर भाषा की राजनीति करना व्यर्थ और अनुचित है। यह भारत सरकार के भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने की व्यापक योजना को हिस्सा तो है ही न्यायिक व्यवस्था को सुगम बनाने का उपक्रम भी। गृह मंत्री अमित शाह निरंतर भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के कार्य में लगे हैं। गृह मंत्रालय के अधीन ही राजभाषा विभाग आता है जो हिंदी को लेकर गंभीरता से काम कर रहा है। दिल्ली पुलिस भी गृह मंत्रालय के अधीन है। अभी कुछ दिनों पूर्व गृह मंत्रालय ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल में जनरल ड्यूटी के सिपाहियों की भर्ती के लिए हिंदी और अंग्रेजी समेत 13 अन्य भारतीय भाषाओँ में परीक्षा आयोजित करने का आदेश दिया। इसमें उर्दू भी शामिल है। इससे इन भाषा के प्रभाव वाले क्षेत्र के युवकों को अपनी मातृभाषा में परीक्षा देने का अवसर मिलेगा। केंद्रीय बलों में उनकी भागीदारी भी बढ़ेगी। अगर बिना किसी राजनीतिक चश्मे के भाषा को लेकर उठाए गए कदमों का समग्रता में विश्लेषण करें तो यह महत्वपूर्ण कदम नजर आता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी भारतीय भाषाओं को महत्व दिया गया है। शिक्षा से लेकर रोजगार तक अगर भारतीय भाषाओं को महत्व मिल रहा है तो प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था में भी भारतीय भाषा को प्राथमिकता मिलनी ही चाहिए। आक्रांताओं की भाषा को कब तक ढोते रहेंगे। स्वाधीनता के अमृत काल में तो स्वभाषा का उपयोग बढ़ाने का प्रयास हर स्तर पर होना चाहिए। सरकारी भी और गैर सरकारी संस्थाओं को भी आगे आकर भारतीय भाषाओं को सुदृढ़ करने के कार्य में लगना चाहिए। उर्दू के लिए भी बेहतर स्थिति यही होगी कि वो अरबी और फारसी की जगह भारतीय भाषाओं के शब्दों को उपयोग में लाए।

Saturday, April 8, 2023

भ्रांतियां दूर करने की चुनौती


पिछले दिनों एक सेमिनार में हिस्सा लिया था। वहां मुगलों और अंग्रेजों पर बात हो रही थी। एक वक्ता ने मंच से कहा कि भारत में कई सारी चीजें मुगल और कई अंग्रेज लेकर आए। इन चीजों और प्रथाओं ने भारतीय समाज को अपेक्षाकृत आधुनिक बनाया। यहां से होते हुए बात हिंदी-उर्दू पर चली गई और वहां से भारतीय पहरावा और खान-पान पर। मंच से ये तक कहा गया कि भारत में सिले हुए वस्त्र मुगलों के साथ आए और उसके पहले यहां के लोग सिले हुए वस्त्रों से परिचित ही नहीं थे। इस संबंध में उन्होंने चीनी यात्री फाहयान के यात्रा वृत्तांत का उदाहरण देते हुए ये साबित करने की कोशिश की मध्यकाल के पहले भारत में सिले हुए वस्त्रों का कहीं उल्लेख नहीं मिलता। कुछ देर तक इसके पक्ष-विपक्ष में बहस चलती रही लेकिन मुगलों और अंग्रेजों के पक्ष में तर्क रख रहे सज्जन ने विदेशी लेखकों के नाम गिनाने आरंभ किए तो सभागार में बैठे लोगों को लगा कि उनकी बातों में दम है। सत्र समाप्त हुआ। इसके बाद भी लोगों के बीच इस विषय पर चर्चा होती रही। लोग पक्ष विपक्ष में तर्क देते रहे लेकिन चूंकि हमारी शिक्षा पद्धति में इस तरह की बातों को उतना महत्व नहीं दिया इस कारण नई पीढ़ी तक बातें पहुंच नहीं पाई। विदेशियों की पुस्तकों के उद्धरणों और विदेशी विद्वानों के लिखे को अंतिम सत्य मानने वाले विद्वानों ने उनके आधार पर निरंतर ये भ्रम फैलाया कि भारत में सिले हुए वस्त्रों से परिचय मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमण के बाद हुआ। विदेशी लेखक बकनन हैमिल्टन ने अपनी पुस्तक ईस्टर्न इंडिया में ये कहा है प्राचीन हिंदू जाति सिले हुए वस्त्र के व्यवहार से पूर्णतया अनभिज्ञ थी, उका प्रचार मुसलमानों के आक्रमण के पश्चात हुआ। उनके इसी कथन को म्योर और वाटसन जैसे यूरोपीय विद्वानों ने आधार मानकर इस धारणा को आगे बढ़ाया। जिन लोगों ने सिर्फ इन विद्वानों को पढ़ा है उनको लगता है कि ये बात सही है। जबकि भारतीय लेखन में इसका कई बार प्रमाण सहित प्रतिकार किया जा चुका है। 

हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सरस्वती पत्रिका में 1902 में एक लेख लिखकर प्रमाण सहित बताया था कि प्राचीन भारत में सिले हुए वस्त्रों और सुई का प्रमाण उपलब्ध है। आचार्य शुक्ल ने अपने लेख में प्राचीन ग्रंथों और प्राचीन मूर्तियों के सहारे ये स्थापित किया कि सिले हुए वस्त्रों का चलन भारत में बहुत पहले से था। उन्होंने ऋगवेद का उदाहरण दिया जहां सुई और सीने का उल्लेख है। सिव्यतु अपच शुच्य छेद्यमानय, 2(288)। वो कहते हैं कि ‘मूल शब्द शूचि है जिसके लिए ये अनुमान बांधना कि उससे कांटे या और किसी नोकीली वस्तु से अभिप्राय है, उपहासजनक होगा। यह भी विचार करने का स्थल है कि प्राचीन आर्य लोहे के शस्त्र इत्यादि बनाने में कुशल होकर भी सुई से पूरे अनभिज्ञ बने रहते।‘  उन्होंने कर्नल टेलर के इस कथन का भी सोदाहरण निषेध किया है कि प्राचीन हिंदू जाति में दर्जी का होना प्रमाणित नहीं है और न ही उनकी भाषा में इसके लिए कोई शब्द है। इस संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल अमरसिंह के अमर कोष का संदर्भ देते हैं। यहां यह बताना आवश्यक है कि अमरसिंह का अमरकोष ईसा से पूर्व का माना जाता है। अमरसिंह के कोष में दर्जी के लिए दो शब्द प्रयोग किए गए हैं। एक है तन्तुवाय और दूसरा है सौचिक। (तन्तुवाय: कुविंद: स्यात्तुन्नवायस्तु  सौचिक:-अमरकोष)। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने लेख में इस बात को भी रेखांकित किया है कि पाणिनी के सूत्रों में भी इस शब्द का उल्लेख है। रामायण और महाभारत के अलावा भी संस्कृत के अन्यान्य ग्रंथों में इस तरह के पहिरावों का उल्लेख है जो बगैर सुई और सीने के बन नहीं सकते। उदाहरण के तौर पर कंचुक, कंचुलिक, अंगिका, चोलक, चोल, कुर्पासक। 

इन शब्दों को अर्थ और उसके प्रयोग को देखते हैं तो इस बात के प्रमाणिक संकेत मिलते हैं कि प्राचीन काल में भारत में सुई और सिले हुए वस्त्रों की परंपरा रही है। ऐसे वस्त्र पहने जाते थे तो सिलकर ही तैयार हो सकते थे। अब अगर कंचुक शब्द के अर्थ को ही देखें तो इसका अर्थ होता है सैनिकों का कुर्ते जैसा एक विशेष वस्त्र। कई जगह ‘सन्नाह’ शब्द का प्रयोग लोहे के कवच और सूत के बने वस्त्रों के लिए भी किया जाता है। सन्नाह को कंचुक का पर्यावाची मानकर कई कोष में उसका अर्थ वाणों से बचाव के लिए लोहे से निर्मित पहिराव के तौर पर किया गया है। रामचंद्र शुक्ल इस बात को प्रमाणित करते हैं कि प्रचीन काल में कंचुक का अभिप्राय सूत से बने वस्त्रों के लिए भी किया जाता था। इस संदर्भ में वो महाभारत का उदाहरण देते हैं कि युधिष्ठिर के राज्याभिषेक के समय ऋषियों का कंचुक और पगड़ी धारण करने का उल्लेख है। (विवशुस्ते सभां दिव्यां सोष्णीषां धृतकंचुका:)। अब एक और शब्द को देखते हैं। अंगिका एक प्रकार की कुर्ती होती थी जिसको हिंदी में अंगिया कहते हैं। अंगिया शब्द संस्कृत के अंगिका का अपभ्रंश है। इस बात को प्रमाणित करता है कि प्राचीन काल में सिले हुए वस्त्र पहने जाते थे। एक शब्द है नीवी। नीवी कहते हैं इजारबंद को जो घाघरे में डाला जाता है। अगर प्राचीन काल में घाघरे नहीं थे तो नीवी का क्या काम था। 

रामचंद्र शुक्ल ने शब्दों के अलावा अपने उस लेख में मूर्तियों और उसपर उकेरे गए वस्त्रों के आधार पर इस बात को प्रमाणित किया कि प्राचीन काल में भारत में सिले हुए वस्त्रों का चलन था। उन्होंने अमरावती और ओडिशा की प्राचीन मूर्तियों और वस्त्रों को आधार बनाया है। अमरावती में कई मूर्तियां नग्नावस्था और अर्धनग्नावस्था में हैं लेकिन उनके बीच कई मूर्तियां ऐसी भी हैं जिनके वस्त्र उस काल में दर्जी के अस्तित्व के संकेत करते हैं। पुस्तक ‘एंटिक्स आफ ओडीशा’ में उदयगिरी की गुफाओं में चट्टानों से काटकर बनाई मूर्ति को एक चुस्त चपकन पहने दिखाया गया है। इस मूर्ति की अवस्था करीब 2300 साल पूर्व की मानी जाती है।ये चपकन जामे के जैसा है। पुरुषों के अलावा अगर स्त्रियों की बात करें तो इस बात के कई प्रमाण धर्मशास्त्र से लेकर बौद्धग्रंथों में भी उपलब्ध हैं कि स्त्रियां पर्याप्त वस्त्र पहनती थीं। स्त्रियों में साड़ी का प्रचलन था। संपन्न घरों की स्त्रियां घाघरा और कुर्ती और उसके उपर से कभी कभार अंगिया धारण करती थीं। आचार्य शुक्ल ने उक्त लेख के अंत में बहुत ही दिलचस्प बात कही है वो ये कि बंगाल इत्यादि प्रांतों में अधिकांश दर्जी समूह मुसलमान हैं जिसकी वजह से हेमिल्टन समेत कई लेखक भ्रमित हो गए कि दर्जी की अवधारणा भारतीय नहीं है। परंतु पूरे भारतवर्ष में ऐसा नहीं था। शेरिंग ने अपनी पुस्तक ‘हिंदू कास्ट एंड ट्राइव्स आफ बनारस’ में हिंदुओं के दर्जी होने का उल्लेख किया है।ये भी बताया है कि हिंदुओं में किस जाति के लोग दर्जी का काम करते थे। 

अगर भारत के प्राचीन गंथों को और उस समय के विदेशी लेखकों के लेखन को समग्रता में देखें तो कई प्रकार की भ्रांतियां दूर होती हैं। आवश्यकता इस बात है कि हमारे देश में जो देसी विद्वानों ने जो लिखा उसको प्रचारित प्रसारित किया जाए। उसको नई पीढ़ी को बताया और पढ़ाया जाए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लिए नए पाठ्यक्रम तैयार किए जा रहे हैं। नई पुस्तकें तैयार की जा रही हैं। इस कार्य में उन विद्वानों को लगाना चाहिए जो सिर्फ ग्रंथों से परिचित ना हों बल्कि उन ग्रंथों को समग्रता से देखकर छात्रों के पाठ को तैयार कर सकें। अगर ऐसा हो पाता है तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति की सार्थकता स्थापित होगी और ये बदलाव का वाहक बन सकेगा। 


Saturday, April 1, 2023

महापुरुषों के कृतित्व का स्मरण काल


स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के बाद अब हम अमृतकाल में प्रवेश कर चुके हैं। अमृतकाल में इतिहास की जमीन पर विज्ञान के सहयोग से एक शक्तिशाली और समृद्ध राष्ट्र बनाने का संकल्प हर भारतीय का है। इसके लिए आवश्यक है कि उन महापुरुषों के कृतित्वों का स्मरण किया जाए जिन्होंने भारत में शिक्षा से लेकर संस्कृति तक को शक्ति देने में अपना जीवन लगा दिया। अमृत महोत्सव के दौरान पूरे देश ने उन महापुरुषों को याद किया जिन्होंने स्वाधीनता पाने के लिए अपना सर्वस्व गंवा दिया। लेकिन इस विशाल भारत भूमि पर ऐसे अनेक सपूत पैदा हुए जिन्होंने स्वाधीनता की न केवल जमीन तैयार की बल्कि लोगों के मन में एक विश्वास पैदा किया कि वो स्वाधीन हो सकते हैं। विदेशी आक्रांताओं ने हमारे देश की शिक्षा पद्धति तो तहस-नहस किया। सामाजिक सरोकारों के केंद्र रहे मंदिरों को नष्ट किया। ऐसे में जनमानस को स्वाधीनता के लिए तैयार करने के लिए आवश्यक था कि उनके मन घर कर गई दास भावना का शमन किया जाए। इस तरह के कार्य भी अनेकों महापुरुषों ने किए। स्वाधीनता के बाद इतिहासकारों ने जिस तरह से आधुनिक भारत का इतिहास लेखन किया उसमें उत्तर भारत की घटनाओं और स्वाधीनता सेनानियों को वरीयता दी गई। दक्षिण और पश्चिम भारत पर भी लिखा गया लेकिन पूर्वोत्तर पर बहुत कम लिखा गया। कह सकते है कि इतिहास लेखन में पूर्वोत्तर की घटनाओं और वहां के लोगों के योगदान की उपेक्षा की गई।

पिछले दिनों असम के डाउन टाउन विश्वविद्यालय में हरिनारायण दत्त बरुआ की स्मृति में आयोजित समारोह में जाने का अवसर मिला। समारोह का निमंत्रण मिलने के बाद हरिनारायण दत्त बरुआ के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई। उनके बारे में बहुत ही कम जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध है। असम जाकर कुछ पुस्तकें मिलीं जिनसे पता चला कि हरिनारायण दत्त बरुआ ने असमिया साहित्य को संजोने और उसको समृद्ध करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। हरिनारायण दत्त बरुआ स्कूली शिक्षक थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन असमिया साहित्य के संरक्षण और उसके पुर्नप्रकाशन में लगा दिया। शिक्षा के क्षेत्र में किया गया उनका कार्य अनुकरणीय है। 1885 में उनका जन्म हुआ था। जब वो शिक्षक बने तो उनको असमिया भाषा में पाठ्य पुस्तकों की कमी का अनुभव हुआ। उन्होंने कई छात्रोपयोगी पुस्तकें लिख डालीं। कुछ अपने नाम से तो कुछ बिना लेखक का  नाम दिए। उस समय पूर्वोत्तर में शिक्षा की हालत बहुत अच्छी नहीं थी। असमिया में पुस्तकों और उसके विक्रेताओं की कमी थी। इस कमी को पूरा करने के लिए हरिनारायण दत्त बरुआ ने अपने भाई के साथ मिलकर असम के नलबाड़ी में एक पुस्तक की दुकान खोली। यहां भी एक समस्या खड़ी हो गई। पुस्तकें बहुत कम संख्या में मिलती थीं और उनको बाहर से मंगवाना पड़ता था। इस कारण लागत अधिक हो जाती था। इस बीच उन्होंने 1932 में अपने पिता के नाम पर एक बालिका विद्यालय की स्थपना की। पुस्तकों की मांग इससे और बढ़ गई। किसी तरह से पांच छह साल तक पुस्तकों की आपूर्ति करते रहे। जब पुस्तकों की मांग बहुत अधिक बढ़ने लगी और बाहर से उतनी संख्या में पुस्तकें नहीं मिलने लगी तो उन्होंने तय किया कि एक प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना की जाए। लेकिन अर्थ का संकट। उस समय असम जैसे प्रदेश में प्रिंटिंग प्रेस लगाना बेहद मुश्किल और खर्चीला था। जब उद्देश्य पवित्र होता है तो राह आसान हो जाती है। उन्होंने 1938 में अपनी मां के नाम पर उमा प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना की। प्रिटिंग प्रेस की स्थापना के बाद ये संकट उत्पन्न हुआ कि कौन सी पुस्तकें प्रकाशित की जाएं। उन्होंने छात्रोपयोगी पुस्तकों के साथ साथ असमिया भाषा में लिखी गई प्राचीन पुस्तकों का प्रकाशन आरंभ किया। हरिनारायण दत्त बरुआ की लिखी और संरक्षित पुस्तकों से प्राचीन असमिया साहित्य और इतिहास के सूत्र मिलते हैं। उनकी लिखी पुस्तकों में असम के साथ-साथ भारत के इतिहास की भी कई अनकही कहानियां दर्ज हैं। आवश्यकता इस बात की है कि उनको भारतीय भाषाओं में अनूदित करवा कर पूरे देश के लोगों तक पहुंचाया जाए। 

श्रीमंत शंकरदेव की कई कृतियों को हरिनारायण दत्त बरुआ ने न केवल संरक्षित किया बल्कि उसके मूल स्वरूप में प्रकाशित करने का बेहद महत्वपूर्ण कार्य भी किया। कुछ लोगों का मत है कि श्रीमंत शंकरदेव के व्यक्तित्व के कुछ आयामों से दत्त बरुआ ने जनता का परिचय करवाया। असम के प्रसिद्ध संत श्रीमंत शंकरदेव का जन्म 1449 में हुआ था। उनके बारे में उपलब्ध जानकारी के अनुसार मात्र 13 वर्ष की आयु में उन्होंने पंडित महेंद्र कंदली की पाठशाला में विद्याध्ययन के लिए प्रवेश लिया था। मात्र चार वर्ष में हिंदू धर्म ग्रंथों का अध्ययन पूर्ण कर भगवद चिंतन में लग गए थे। घरवालों ने ये देखकर शंकरदेव का विवाह करवा दिया लेकिन वो भगवद चिंतन में ही रमा रहा। ये वो समय था जब कुछ लोग हिंदू धर्म के नाम पर तंत्र विद्या के विकृत रूप को चलाने में लगे हुए थे। जब शंकरदेव ने ये महसूस किया कि इससे हिंदू धर्म के बारे में गलत बातें फैल रही हैं तो उन्होंने हस्तक्षेप किया। उन्होंने एक ईश्वर में ध्यान लगाने के मत का प्रचार आरंभ किया। वो जनता के बीच जाकर ‘कलिका परम धर्म हरिनाम है’ का प्रचार करने लगे। उनकी वकतृत्व और तर्कशक्ति से प्रभावित होकर कई लोग धर्म प्रचारक बन गए जो कालांतर में धर्माचार्य कहलाए। शंकरदेव ने अपनी नीतियों में अहिंसा,छुआछूत, मद्य निषेध आदि को शामिल किया। वो श्रीकृष्ण को परमब्रह्म मानकर प्रचारित करने लगे। वो कहते थे कि एक कृष्ण की ही शरण लेकर उसी का नाम, गुण तथा श्रवण कीर्तन करने से सर्वसिद्धि प्राप्त होगी। इस कारण ही उनके प्रचारित मत को ‘एक शरण धर्म’ कहा गया। उनके शिष्य श्रीमंत माधवदेव की भी असम में बहुत ख्याति है। 

हरिनारायण दत्त बरुआ ने श्रीमंत शंकरदेव की रचनाओं को श्रमपूर्वक खोजकर निकाला और उसको प्रकाशित करवा कर जनता के बीच पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। श्रीमंत शंकरदेव के ‘चित्र भागवत’ का प्रकाशन एक ऐसी घटना है जिसको अगर ठीक से व्याख्यायित और प्रचारित किया जाए तो चित्रकला के बारे में बहुत सारी भ्रांतियां दूर होंगी। भारतीय चित्रकला का एक नया रूप सामने आएगा। हरिनारायण दत्त बरुआ ने 1946 में चित्र भागवत के प्रकाशन की प्रक्रिया आरंभ की थी और चार साल बाद उसका प्रकाशन हो सका था। अब ये पुस्तक मूल चित्रों की प्रतिलिपि के साथ प्रकाशित है। इस पुस्तक में चित्रों के साथ जो टिप्पणियां हैं वो असमिया, हिंदी और अंग्रेजी यानि तीन भाषाओं में प्रकाशित हैं। आज जब तमिलनाडू के मुख्यमंत्री दही के पैकेट पर हिंदी में दही लिखे जाने पर आगबबूला हो रहे हैं ऐसे में उनको हरिनारायण दत्त बरुआ से सीख लेनी चाहिए। जिन्होंने भाषा की दीवार को तोड़कर श्रीमंत शंकरदेव की कृतियों को व्यापक जनता तक पहुंचाने का स्वप्न देखा था। 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषा पर जोर दिया जा रहा है। विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनेक प्रकार की पुस्तकों का प्रकाशन हो रहा है। ऐसे में असम की सरकार को हरिनारायण दत्त बरुआ के बारे में देश की जनता को बताने का अभियान चलाना चाहिए। इससे न सिर्फ हरिनारायण दत्त बरुआ के योगदान के बारे में देश को पता चलेगा बल्कि अगर उनकी पुस्तकें हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित होकर प्रकाशित हो गईं तो श्रीमंत शंकरदेव की कृतियों से भी देश का परिचय होगा। असम में लोग हरिनारायण दत्त बरुआ के नाम के पहले साहित्यरत्न लगाते हैं लेकिन उनको सिर्फ साहित्य की चौहद्दी में नहीं बांधा जाना चाहिए। वो सच्चे अर्थों में भारत भूमि के ऐसे सपूत थे जिन्होंने शिक्षित भारत का ना केवल स्वप्न देखा बल्कि उसको साकार करने के लिए अंतिम दम तक लगे रहे।  

Saturday, March 25, 2023

राजनीतिक कोलाहल में गुम होता विमर्श


संसद के बजट सत्र में लगातार हंगामा होता रहा है। फिर मानहानि केस में दो साल की सजा के बाद राहुल गांधी की सदस्यता समाप्त हो गई। संसद से लेकर सड़क तक हंगामा और बढ़ गया। आरोप प्रत्यारोप की राजनीति तेज हो गई है। बयानों के कोलाहल में संसद से जुड़ी कुछ समितियों की सिफारिशें और सरकार का उत्तर कहीं दब सा गया। एक वर्ष के बाद लोकसभा का चुनाव होना है। देश में राजनीति चरम पर है। पर संसदीय व्यवस्था का जो विमर्श लोगों तक पहुंचना चाहिए उसको बाधित करने का अधिकार राजनीति को नहीं है। संसदीय व्यवस्था के विमर्श को बाधित करने से जनता अंधेरे में रह जाती है और ये लोकतंत्र को कमजोर करता है। संसद के बजट सत्र में हुए हंगामे के कारण देश की संस्कृति से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण विमर्श पर अपेक्षित चर्चा नहीं हो पाई। संस्कृति मंत्रालय से जुड़ी संसदीय समिति ने संस्कृति मंत्रालय की बजट राशि में बढोतरी की बात की। समिति का कहना है कि इस वर्ष के बजट का सिर्फ 0.075 प्रतिशत ही संस्कृति मंत्रालय को आवंटित किया गया है। जबकि चीन, ग्रेट ब्रिटेन, अमेरिका और आस्ट्रेलिया अपने कुल बजट का दो से पांच प्रतिशत संस्कृति के विकास और संरक्षण पर आवंटित करता है। संसदीय समिति की इस टिप्पणी पर संस्कृति मंत्रालय ने अपनी स्थिति स्पष्ट की। मंत्रालय के मुताबिक भारत जैसे विकासशील देश में जहां ग्रामीण इलाके में आधारभूत ढांचा, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन की स्थिति प्राथमिकता में है वहां जनता के अधिक धन को संस्कृति और कला के विकास पर खर्च करना तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता है। मंत्रालय की तरफ से ये भी कहा गया कि जिन देशों में कला और संस्कृति के विकास पर अधिक खर्च किया जा रहा है उनमें से अधिकांश राशि निजी क्षेत्रों के सहयोग से जुटाई जा रही है। संस्कृति मंत्रालय भी कला और संस्कृति के विकास के लिए देश की निजी कंपनियों को प्रोत्साहित कर रही है। अनेक ऐसी योजनाएं भी आरंभ की गई हैं जहां स्मारकों और पौराणिक इमारतों के रखरखाव का कार्य निजी कंपनियों को सौंपा गया है। 

ये एक ऐसा विषय है जिसपर राष्ट्रव्यापी चर्चा होनी चाहिए। यह सही है कि विकासशील देश की अलग प्राथमिकताएं होती हैं और विकसित देश की अलग। भारत जैसे समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाले देश को ये भी सोचना होगा कि क्या संस्कृति इसकी प्राथमिकता में है या नहीं? यह ठीक है कि शिक्षा,स्वास्थ्य और ग्रामीण इलाकों में आधारभूत संरचनाएं हमारे देश की प्राथमिकता है लेकिन क्या हम इन चीजों के साथ संस्कृति को जोड़कर नहीं देख सकते हैं। परिवहन, पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय की स्थायी समिति की रिपोर्ट संख्या 315 में कहा गया था कि संस्कृति का विकास किसी भी देश के विकास का अभिन्न हिस्सा है। संस्कृति के विकास से आर्थिक विकास को भी गति मिलती है। इससे रोजगार सृजन होता है और दूसरे क्षेत्रों में भी आर्थिक गतिविधियों में तेजी आती है। संस्कृति के समग्र विकास से देश की एकता और अखंडता को भी शक्ति मिलती है। संस्कृति का संरक्षण और विकास हमारे देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संजोती है। संस्कृति को संजोने की बात तो प्रधानमंत्री भी कर चुके हैं। 

स्वाधीनता के अमृत महोत्सव पर लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमृतकाल के पांच प्रण बताए थे। उसमें तीसरा प्रण देश की विरासत पर गर्व है। विरासत पर गर्व तो तभी कर सकेंगे जब आनेवाली पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत के बारे में बता सकेंगे। आनेवाली पीढ़ी के लिए अपनी विरासत को संजो कर, उसको संरक्षित कर सकेंगे। किसी भी विरासत को संजोने और संरक्षित करने में धन की आवश्यकता होती है। संसदीय समिति के अवलोकन और संस्कृति मंत्रालय के उत्तर से ये स्पष्ट होता है कि सरकार अपनी विरासत को संजोने और उसको संरक्षित करने के लिए अब निजी क्षेत्र को भागीदार बनाना चाहती है। निजी क्षेत्र को भागीदार बनाया जाना चाहिए। बनाया जा भी रहा है। लेकिन यह भी देखना होगा कि जो कार्य सरनरेन्काद्रर मोदी या सरकारी विभाग कर सकते हैं उसको निजी क्षेत्र के लोग उसी जिम्मेदारी से निभा पा रहे हैं या नहीं। आज जब पूरा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है तो क्या ये माना जाए कि सरकार देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को निजी क्षेत्रों के भरोसे संरक्षित और उसके विकास के रास्ते पर चलने का मन बना चुकी है। कला संस्कृति के विकास में निजी क्षेत्र की भागीदारी लंबे समय से रही है। दिल्ली से लेकर मुंबई और कोलकाता से लकर बेंगलुरू और चेन्नई तक में निजी क्षेत्र की भागीदारी से कला संस्कृति को बल मिल रहा है। चाहे वो सांस्कृतिक केंद्र की स्थपना हो या कलाओं को सहेजने का उपक्रम। निजी क्षेत्र की भागीदारी है और बढ़ भी रही है।  

संस्कृति को लेकर एक महत्वपूर्ण बात ये है कि अबतक केंद्रीय बजट में संस्कृति मंत्रालय को जितनी धनराशि का आवंटन किया जा रहा है उसका सही उपयोग हो पा रहा है नहीं। आजकल संस्कृति से जुड़ी सरकारी संस्थाओं में एक ऐसी प्रवृत्ति देखी जा रही है जिसको अविलंब तर्कसंगत बनाए जाने की आवश्यकता है। आज स्थिति ये है कि संस्कृति से जुड़ी संस्थाएं लगातार कार्यक्रमों के आयोजन करने में लग गई है। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव पर विशेष आयोजन होना उचित था। उसके बाद भी लगातार आयोजनों से क्या हासिल हो रहा है। इसका परीक्षण तो किसी न किसी स्तर पर किया ही जाना चाहिए। संस्कृति के विकास का दायित्व जिन संस्थाओं पर है वो कुछ ठोस करने की बजाए आयोजनों में जुटी हैं। जिन संस्थाओं पर संरक्षण की जिम्मेदारी है वो भी प्रदर्शनियों आयोजित कर रही हैं। अधिकारियों के लिए बहुत आसान होता है कि वो किसी मंत्री या नेता को बुलाकर आयोजन का शुभारंभ करवा कर अपने नंबर बढ़वा लें। जबकि कुछ ठोस करने के लिए श्रम करना होगा। संस्कृति से जुड़े ग्रंथों के पुनर्प्रकाशन या नए ग्रंथों के प्रकाशन के कार्य में सुपात्र के चयन से लेकर उसके प्रकाशन तक में मेहनत की आवश्यकता होगी। जिस मेहनत की आवश्यकता आयोजनों में नहीं होती। सांस्कृतिक संस्थाओं की देखा देखी अब विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में भी आयोजनों की भरमार हो गई है। 

संस्कृति मंत्रालय से जुड़ी इन संस्थाओं के आयोजनों में जो खर्च होता है वो तो बजट में आवंटित राशि से ही होता है। इस धनराशि का उपयोग पौराणिक इमारतों और स्मारकों के संरक्षण पर किया जाना चाहिए। पूरे देश में आर्कियोलाजी सर्वे आफ इंडिया (एएसआई) के संरक्षित इमारतों में से ज्यादातर की हालत बहुत अच्छी नहीं है। इस स्तंभ में कई स्मारकों और उसके संरक्षण में लापरवाहियों का उल्लेख किया जा चुका है। ऐसी स्थिति में सरकार को सांस्कृतिक विकास के लिए एक संतुलन बनाकर चलना होगा। निजी क्षेत्र को सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित करने के लिए प्रेरित करना, उनको संरक्षण पर धन खर्च करने के लिए प्रोत्साहित करें ।साथ ही सरकारी विभागों को आवंटित धन राशि को लेकर एक ऐसी व्यवस्था बनाए जिसमें उसका सदुपयोग हो सके। संस्कृति मंत्रालय को ये भी देखना चाहिए कि जिन विभागों के पास सांस्कृतिक धरोहरों को बचाकर रखने की जिम्मेदारी है वहां पर्याप्त मानव संसाधन है कि नहीं। संस्कृति मंत्रालय की स्थायी समिति ने एएसआई में विशेषज्ञों और कर्मचारियों की कमी की ओर भी ध्यान आकर्षित करवाया था। मंत्रालय को उनकी नियुक्ति में तेजी लानी चाहिए। संस्कृति से जुड़ा एक काम नीति आयोग को भी करना चाहिए। उसको कई मंत्रालयों में संस्कृति से जुड़े कार्यों का आकलन करना चाहिए और फिर केंद्र सरकार को संस्कृति मंत्रालय के पुनर्गठन का सुझाव देना चाहिए। इससे संस्कृति से जुड़े सभी कार्य एक ही मंत्रालय से हो सकेंगे और धन भी बचेगा। 

Saturday, March 18, 2023

संघ पर आधारहीन आरोप


कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और सांसद राहुल गांधी को जब भी अवसर मिलता है वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर हमलावर रहते हैं। कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा को लेकर, कभी हिंदुत्व को लेकर, कभी वीर सावरकर को लेकर तो कभी सांप्रदायिकता को लेकर। वो भारतीय जनता पार्टी की सरकार को भी जब घेरने का प्रयास करते हैं तो सायास उसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर आ जाते हैं। अभी हाल में विदेश में भी उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निशाना साधा। राहुल गांधी का मानना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत में सभी संस्थाओं पर कबजा कर लिया है। इससे संवाद की प्रक्रिया बाधित हुई है बल्कि आयडिया आफ इंडिया को नुकसान पहुंचा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था तहस नहस हो गई है। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि भारत में वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा भी संकट में है। उनको लगता है कि एक संगठन इस मजबूत भारतीय मूल्य को हानि पहुंचाने में सक्षम है। राहुल गांधी राजनेता हैं। राजनीति ही उनका कर्म है। उनके इस बयान पर हलांकि संघ ने बेहद सधी हुई प्रतिक्रिया दी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि राहुल गांधी अपना राजनीतिक एजेंडा चलाते हैं और हमारी उनसे कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। लेकिन साथ ही उन्होंने राहुल गांधी से और जिम्मेदार होने की अपेक्षा भी जताई। राहुल गांधी के साथ-साथ कांग्रेस के नेता और पूर्व वामपंथी बुद्धिजीवी जो इन दिनों कांग्रेस में अपना भविष्य तलाश रहे हैं वो भी निरंतर संघ की आलोचना करते हैं। उनकी आलोचना का आधार होता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देश के सभी सांस्कृतिक संस्थाओं पर कब्जा कर लिया। इस कब्ज ने देश में संवाद को बाधित किया है और लोकतांत्रिक व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया। 

लगभग दो वर्ष पहले की बात है। दिल्ली में कुछ बुद्धिजीवियों के साथ संघ प्रमुख मोहन भागवत की बैठक थी। दिनभर चली इस बैठक में भोजनावकाश के समय औपचारिक बातें हो रही थी। मोहन भागवत जिस टेबल पर भोजन कर रहे थे वहां एक वरिष्ठ पत्रकार पहुंचे। उन्होंने उनसे किसी नियुक्ति को लेकर बात आरंभ कर दी। संघ प्रमुख भोजन करते रहे। जब वरिष्ठ पत्रकार महोदय लगातार उसी विषय़ पर बोलते रहे तो मोहन जी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कभी भी नियुक्तियों आदि में न तो हस्तक्षेप करता है और न ही सरकार को अपनी पसंद बताता है। संघ का काम है देश हित में जनमानस को तैयार करना। जब समाज का मानस तैयार हो जाता है तो सरकारें स्वत: उसका संज्ञान लेती हैं और उसके अनुकूल कार्य करती हैं। नियुक्ति आदि का काम सरकार का होता है वही इसको देखे तो व्यवस्था बनी रहती है। फिर कुछ हास-परिहास हुआ और बात खत्म हो गई। यहां हंसते हुए मोहन भागवत ने जो बात कही वो बेहद महत्वपूर्ण थी। उसको समझे जाने की जरूरत है। अब जरा वास्तविकता पर भी दृष्टि डाल लेते हैं कि देश में शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में काम करनेवाली संस्थाओं का हाल क्या है। अगर संघ ने सचमुच हर जगह कब्जा कर लिया है तो इन संस्थाओं के प्रमुखों के पद पर तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोग ही पदस्थापित होंगे। 

शिक्षा से आरंभ करते हैं। एक बेहद दिलचस्प उदाहरण है बिहार के मोतिहारी स्थित महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय की। दो फरवरी 2021 को मोतिहारी के केंद्रीय विश्वविद्याल के कुलपति का कार्यकाल समाप्त हो गया। दो साल से अधिक समय बीत चुका है। दो बार वहां के कुलपति की नियुक्ति लिए चयन प्रक्रिया हो चुकी है। बावजूद इसके अबतक वहां किसी कुलपति की नियुक्ति नहीं हो सकी है। विश्वविद्यालय कार्यवाहक कुलपति के भरोसे चल रहा है। अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शैक्षणिक संस्थाओं पर कब्जा जमाने में लगा होता तो अबतक तो यहां कुलपति की नियुक्ति करवा चुका होता। ये नया विश्वविद्यालय है और यहां अपने संगठन और विचार के लोगों को भरने की संभावनाएं भी हैं, दो साल से इस केंद्रीय विश्वविद्यालय में कुलपति की नियुक्ति ना होना इस आरोप का निषेध करता है कि संघ योजनाबद्ध तरीके से संस्थाओं पर कब्जा कर रहा है। अब शिक्षकों की नियुक्ति की बात करते हैं। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने बुधवार को संसद में जानकारी दी कि शैक्षणिक संस्थानों में 11050 शिक्षकों के पद खाली हैं। जिनमें से 6028 पद  केंद्रीय विश्वविद्यालयों में, 4526 पद भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थानों में और 496 पद भारतीय प्रबंध संस्थान में रिक्त हैं। अगर संस्थाओं पर कब्जा होता तो इतनी बड़ी संख्या में शिक्षकों के पद खाली क्यों होते। संघ प्रयासपूर्वक नियुक्तियां करवा रहा होता। शिक्षा मंत्रालय से ही जुड़ी दो और संस्था का उदाहरण सामने है। एक संस्था है केंद्रीय हिंदी निदेशालय जो पिछले कई वर्षों से निदेशक की बाट जोह रहा है। इसी तरह से केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा को भी पिछले ढाई साल से प्रभारी निदेशक चला रही हैं। शिमला के भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में भी नियमित निदेशक की प्रतीक्षा है।    

अब जरा कला और साहित्य से जुड़ी संस्थाओं को देख लेते हैं। दिल्ली स्थित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में पिछले कई वर्षों से निदेशक का पद खाली है। वहां कई शिक्षकों के पद भी खाली हैं। यहां की स्थिति तो और भी दिलचस्प है। विद्यालय में दो कार्यवाहक निदेशक पद संभालकर सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इन दिनों नई दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के प्रोफेसर रमेश गौड़ नाट्य विद्यालय के निदेशक का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे हैं। यहां भी निदेशक के पद के लिए दूसरी बार साक्षात्कार हो चुका है लेकिन अबतक नियुक्ति नहीं हो पाई है। अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संस्थाओं पर कब्जा करने में लगा होता तो इस प्रतिष्ठित नाट्य संस्था पर अपनी पसंद का निदेशक तो चयनित करवा चुका होता। निदेशक की नियुक्ति की बात छोड़ भी दें तो विद्यालय परिसर में करीब दो साल पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का उपहास करते हुए पोस्टर लगाया गया था। संस्थाओं पर अगर कब्जा होता तो क्या ये संभव था कि वहां प्रधानमंत्री का उपहास उड़ाया जाता। संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत ही ललित कला अकादमी है, जहां नियमित सचिव का पद खाली है। कला संस्कृति से जुड़े संस्थानों में खाली पदों की सूची लंबी है। ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष के सलाहकारों ने ठीक से होमवर्क करके उनको जानकारी नहीं दी । अगर वो होमवर्क करते तो उनको पता चलता कि शिक्षा-संस्कृति के संस्थानों की वास्तविक स्थिति क्या है।

2014 में केंद्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने और कांग्रेस के निरंतर कमजोर होते जाने से वामपंथियों को चुनौतियां मिलने लगीं। इन चुनौतियों से जब वो पार नहीं पा सकते हैं तो दुष्प्रचार आरंभ कर देते हैं। दरअसल जो पूर्व वामपंथी बुद्धिजीवी कांग्रेस में अपनी संभावनाएं तलाश रहे हैं वो ही इस तरह की बातें फैलाते रहते हैं। इंदिरा जी के प्रधानमंत्रित्व काल से ही कांग्रेस ने शिक्षा और संस्कृति का क्षेत्र वामपंथियों को आउटसोर्स कर दिया था। विश्वविद्यालयों से लेकर अकादमियों तक में वामपंथियों का बोलबाला था। कुलपति से लेकर अकादमी के चेयरमैन और संस्थानों के निदेशक सभी पदों पर वामपंथी अपने पसंद के लोगों को बिठाते थे। ज्योति बसु की जीवनीकार को कुलपति बना दिया गया था। कांग्रेस और वामदलों के राजनीतिक रूप से कमजोर होने के बाद इन परजीवी किस्म के कथित बुद्धिजीवियों को सत्ता की मलाई मिलने में मुश्किल हो रही है तो वो अनर्गल प्रलाप में जुटे रहते हैं। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के इर्द-गिर्द भी इस विचारधारा के लोगों ने अपना घेरा मजबूत कर लिया है और राहुल गांधी को आगे करके वो अपनी स्वार्थसिद्धि के उपक्रम में जुटे रहते हैं। वो ये नहीं समझा पा रहे कि आरोप अगर तथ्यहीन होते हैं तो प्रभाव नहीं छोड़ते।  

Saturday, March 11, 2023

युवाओं में पुस्तकों का आकर्षण कायम


हाल ही में नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला समाप्त हुआ। पुस्तक मेला में युवाओं की उमड़ी भीड़ आश्वस्तिकारक है। यह उस दुष्प्रचार का भी निषेध करती है कि युवा पुस्तकों से विमुख हो रहे हैं। वो आनलाइन माध्यम को अधिक पसंद कर रहे हैं। वो किंडल और ई बुक में अपेक्षाकृत अधिक रुचि ले रहे हैं।कोरोना महामारी के कारण दो वर्ष तक विश्व पुस्तक मेला का आयोजन नहीं हो सका था। इस वर्ष जब पुस्तक मेला का आयोजन हुआ तो दिल्ली के प्रगति मैदान के गेट के बाहर पुस्तक प्रेमियों की लंबी कतार इस बात की गवाही दे रही थी कि पुस्तकों के पाठक हैं। यह ठीक है कि तकनीक ने पाठकों के सामने कई विकल्प दिए हैं। लेकिन छपे हुए शब्दों की महत्ता और पुस्तक को हाथ में लेकर पढने का रोमांच कम नहीं हुआ है। हिंदी के कई प्रकाशकों की तरफ से ये कहा जाता है कि हिंदी में पुस्तकें नहीं बिकतीं, हिंदी में पाठक कम हो रहे हैं। पुस्तक मेलों में पाठकों की संख्या और बिक्री के अनुमानित आंकडें कुछ अलग ही कहानी कहती हैं। अगर पुस्तकें नहीं बिकती हैं तो इतनी बड़ी संख्या में पुस्तकों का प्रकाशन क्यों और किसके लिए होता है। निरंतर नए नए प्रकाशन गृह क्यों खुल रहे हैं। पुराने प्रकाशन गृहों के अलग अलग प्रकल्प पुस्तकों का प्रकाशन क्यों करते हैं। स्वाधीनता के पहले हिंदी में दस प्रकाशक भी नहीं थे और इस वक्त एक अनुमान के मुताबिक चार सौ से अधिक प्रकाशक साहित्यिक कृतियां छाप रहे हैं। प्रकाशन जगत के जानकारों के मुताबिक हर साल हिंदी की करीब दो से ढाई हजार साहित्यिक किताबें छपती हैं। क्या साहित्य सेवा के लिए पुस्तकों का प्रकाशन होता है। अगर पुस्तक प्रकाशन व्यवसाय में घाटा हो रहा है तो नए प्रकाशन गृह कैसे विकसित हो रहे हैं। ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिसका उत्तर हिंदी का लेखक खोजना भी नहीं चाहता है।  

दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित पुस्तक मेले में तमाम बाधाओं के बीच पुस्तक प्रेमियों का पहुंचना कुछ तो संकेत कर रहा है। मैं पुस्तक मेले में गया था। प्रगति मैदान के गेट नंबर चार पर बहुत लंबी कतार लगी हुई थी। तीन-चार युवक बार-बार आनलाइन पेमेंट करके प्रवेश टिकट खरीदने का प्रयास कर रहे थे। दो बार जब उनका ट्रांजेक्शन फेल हो गया।उन्होंने गेट पर खड़े गार्ड से अपनी समस्या बताई। उनको अपना मोबाइल दिखाकर टिकट खरीद में आने की समस्या बताई। गार्ड ने उनके मोबाइल को देखा और कहा कि अंदर जाओ। दूसरे गार्ड ने उन लड़कों को रोकने का प्रयास किया तो पहले वाले गार्ड ने कहा कि जाने दो यार किताब ही तो खरीदने जा रहा है, कोई सर्कस देखने तो नहीं जा रहा है। यह है पुस्तकों के लिए हमारे मन में प्यार। उसके बाद उस गार्ड ने कई अन्य लड़कों को भी बगैर प्रवेश टिकट प्रगति मैदान में प्रवेश की अनुमति दी। मेला के अंदर हाल में तिल रखने की जगह नहीं थी। लगभग सभी प्रकाशकों के स्टाल पर पुस्तक प्रेमी पुस्तकें पलट रहे थे, खरीद रहे थे। हिंदी के बड़े प्रकाशकों के स्टाल पर स्थिति बेहतर थी। उनके यहां बिलिंग काउंटर पर ग्राहकों की कतार लगी थी। बिल बनानेवाले कम पड़ रहे थे। इंटरनेट नहीं चल पाने या धीमा चलने की वजह से आनलाइन पेमेंट में दिक्कत आ रही थी। ग्राहक धैर्यपूर्वक बिलिंग की प्रतीक्षा कर रहे थे। मेले में हर दिन दर्जनों पुस्तकों का विमोचन हो रहा था। इंटरनेट मीडिया पर इन विमोचन कार्यक्रमों की तस्वीरें प्रचलित हो रही थीं। अगर पाठक नहीं हैं तो ये पुस्तकें किनके लिए प्रकाशित हो रही हैं। 

गीता प्रेस के स्टाल पर तो हर वर्ष खरीदारों की भीड़ रहती ही है इस वर्ष भी उनके स्टाल पर जमकर खरीदारी हो रही थी। गीता प्रेस के स्टाल के एक कर्मचारी ने बताया कि इस वर्ष सबसे अधिक बिक्री श्रीरामचरितमानस और कल्याण के पुराने अंकों की हुई, जो अब पुस्तकाकार प्रकाशित हैं। अंग्रेजी के हाल में जो स्टाल थे उनपर भी बहुत भीड़ थी। पेंगुइन प्रकाशन पर तो कई कई बार पाठकों के प्रवेश को रोकना पड़ रहा था। उनके स्टाल के बाहर लंबी कतार लगी हुई थी। जब स्टाल के अंदर गए पाठक पुस्तक खरीदकर बाहर निकलते थे तब बाहर खड़े लोगों को अंदर जाने दिया जा रहा था। यह दृष्य संतोष देनेवाला था। आनलाइन प्लेटफार्म पर पुस्तकें बेचनेवाली कंपनियों के प्रतिनिधि भी मेले में घूम रहे थे। वो ये समझने का प्रयास कर रहे थे कि इतनी बड़ी संख्या में पाठक मेले में पुस्तकें क्यों खरीद रहे हैं, जबकि उनके प्लाटफार्म पर तो पुस्तकों की खरीद पर काफी छूट भी मिलती है। घर पर डिलीवरी का भी प्रविधान होता है। दरअसल पुस्तक मेलों में पाठकों को पुस्तकें तो मिलती ही हैं उनके लेखकों से मिलने का अवसर भी प्राप्त होता है। लेखकों से बात करने और उनकी रचना प्रक्रिया को सुनने समझने का अवसर भी मिलता है। यह सुविधा आनलाइन पुस्तक खरीद में नहीं होती है, छूट भले ही मिल जाए। 

एक और महत्वपूर्ण बात है जिसको रेखांकित किया जाना चाहिए, हिंदी समाज में अब भी पुस्तकों की भूख है। जरूरत इस बात की है कि पाठकों तक पुस्तकों को पहुंचाने का उपक्रम किया जाए। पुस्तकों को लेकर पाठकों तक पहुंचने का उपक्रम प्रकाशकों ने सामूहिक रूप से कभी किया नहीं। सभी प्रकाशकों को चाहिए कि वो साथ मिलकर पाठकों तक पुस्तकें पहुंचाने का एक तंत्र विकसित करें। अधिक से अधिक पुस्तकों की दुकानें खोलने का प्रयास किया जाना चाहिए। अभी हो ये रहा है कि कई प्रकाशक अलग अलग शहरों में अपनी पुस्तकों की दुकानें खोलते हैं। उनमें दूसरे प्रकाशकों की पुस्तकें नहीं रखते हैं। उनके बीच इस तरह का समन्वय होना चाहिए कि अगर एक प्राकशक ने एक शहर में पुस्तक विक्रय केंद्र खोला तो उसको सभी प्रकाशकों की पुस्तकें रखनी चाहिए। इससे उनकी लागत भी कम होगी और पाठकों को एक ही स्थान पर सभी पुस्तकें मिल जाएंगी। इसमें ईमानदारी और पारदर्शिता की आवश्यकता होगी। 

ईमानदारी और पारदर्शिता की आवश्यकता तो प्रकाशकों को लेखकों के साथ के संबंध में भी दिखाना चाहिए। आज कोई भी पुस्तक कितनी बिकी इसको जांचने का कोई तंत्र कम से कम हिंदी प्रकाशन जगत में तो उपलब्ध नहीं है। प्रकाशक जितना बता देता है उसपर ही विश्वास करना पड़ता है। अविश्वास की कोई वजह होनी भी नहीं चाहिए। संदेह तब पैदा होता है जब ये देखा जाता है कि अंग्रेजी के प्रकाशक कोई हिंदी की पुस्तक प्रकाशित करते हैं तो उनके यहां से वो पुस्तकें अपेक्षाकृत अधिक बिकती हैं । इस संदेह का निवारण होना पुस्तक व्यवसाय के लिए काफी आवश्यक है। पारदर्शिता और ईमानदारी के लिए किसी सरकार या सरकारी एजेंसी की आवश्यकता भी नहीं है, आवश्यक है परस्पर विश्वास की। हिंदी में पुस्तकों के संस्करणों को लेकर भी पारदर्शी व्यवस्था नहीं है। कई पुस्तकें बगैर दूसरे संस्करण के प्रकाशित होकर बाजार में बिकती रहती हैं। इसका पता तब चलता है जब एक ही संस्करण की प्रतियां अलग अलग प्रेस से छपकर बाजार में पहुंचती हैं। कई बार लेखक इस बात को प्रकाशक के संज्ञान में लेकर आता भी तो उसको इसका संतोषजनक उत्तर नहीं मिल पाता है। मैं हिंदी के कुछ प्रकाशकों को जानता हूं कि वो कुछ लेखकों को उनके उपन्यास या पुस्तक के लिए 15-20 लाख तक का अग्रिम भुगतान भी करते हैं। अगर पुस्तकें बिकती नहीं हैं तो ये साहस प्रकाशक कैसे कर लेते हैं। ये सभी इस बात को स्थापित करते हैं कि हिंदी में पुस्तकों के पाठक हैं और ये कहना कि पाठक लगातार कम हो रहे हैं, उचित नहीं है।  

Friday, March 10, 2023

साहित्याकाश पर छाता साहित्योत्सव


आज से 38 वर्ष पहले जब पूरे देश में लिटरेचर फेस्टिवल के बारे में कम ही लोग सोचते और जानते थे। उस समय साहित्य अकादमी ने 1985 में फेस्टिवल आफ लेटर्स का आरंभ किया था। नई दिल्ली के रवीन्द्र भवन परिसर स्थित साहित्य अकादमी भवन की पहली मंजिल के सभागार में प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता था। इस प्रदर्शनी में साहित्य अकादमी की गतिविधियों का प्रदर्शन होता था। मैक्सम्यूलर मार्ग के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में अकादमी राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन करती थी। इस फेस्टिवल का आरंभिक स्वरूप कुछ इस तरह का ही था। सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय, अन्नदा शंकर रे, अमृता प्रतम, कुर्तुलऐन हैदर,निर्मल वर्मा, विद्यानिवास मिश्र, विष्णु प्रभाकर, सुनील गंगोपाध्याय जैसे दिग्गज लेखकों की भागीदारी इस उत्सव में होती थी। करीब 25 वर्षों तक इस स्वरूप में साहित्य अकादमी का साहित्योत्सव चलता रहा। साहित्योत्सव के दौरान विभिन्न भाषा के साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखकों को सम्मानित किया जाता था। संवत्सर व्याख्यान का आयोजन होता था। साहित्योत्सव की एक विशेषता और रही है कि इसमें बड़े से बड़ा लेखक सहजता से पाठकों और श्रोताओं के साथ संवाद करते नजर आते हैं। मुझे याद पड़ता है कि अमृता प्रीतम को पहली बार मैंने साहित्य अकादमी के इस उत्सव में ही देखा था। तब दिल्ली विश्वविद्याल के छात्र एक साथ इस उत्सव में पहुंचते थे। अपने पसंदीदा लेखकों के विचारों को सुनते थे। न केवल विचारों को सुनते थे बल्कि छात्रावास लौटकर उनकी स्थापनाओं पर बहस करते थे।

2013 में जब डा के श्रीनिवासराव साहित्य अकादमी के सचिव बने तो उन्होंने इसको व्यापक स्वरूप प्रदान किया। साहित्य अकादमी की प्रदर्शनी को भवन की पहली मंजिल से उतारकर परिसर के लान में लाकर विस्तार दिया गया। संगीत नाटक अकादमी के मेघदूत थिएटर में भी इस साहित्योत्सव की गतिविधियां आरंभ हुईं। साहित्य अकादमी पुरस्कार अर्पण समारोह को और भव्य बनाया गया। धीरे धीरे ये साहित्योत्सव अखिल भारतीय स्वरूप लेने लगा। इसमें देश के विभिन्न भाषाओं के साहित्यकारों को आमंत्रित करके अलग अलग सत्रों में विचार मंथन होने लगा। प्रतिवर्ष इसमें अलग अलग विषय जैसे बहुभाषी कवि सम्मेलन, बहुभाषी कहानी पाठ, एलजीबीटीक्यू लेखक सम्मिलन, जैसे कार्यक्रम जोड़े गए। अभी देश में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के आलोक में मातृभाषा की चर्चा हो रही है। इस वर्ष साहित्योत्सव में मातृभाषा पर अलग से चर्चा रखी गई है। जी 20 सम्मेलन के आयोजन को ध्यान में रखते हुए कूटनीति और साहित्य विषय पर सत्र की संरचना की गई है। इसमें राजनयिक-लेखकों के विचार सुनने को मिलेंगे। 38 वर्ष के सफर में साहित्य अकादमी के साहित्योत्सव ने साहित्य जगत में अपनी एक विशिष्ठ पहचान बनाई है। यह एक ऐसा साहित्योत्सव है जो शोर-शराबे से दूर भारतीय भाषाओं के लेखकों के अखिल भारतीय मंच के तौर पर स्थापित हो गया है।    

Saturday, March 4, 2023

ज्ञान परंपरा का प्रचार आवश्यक


हाल ही में नागपुर में एस्ट्रोनामी पार्क के शुभारंभ के अवसर पर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के वक्तव्य के कुछ अंशों की चर्चा हो रही है। चर्चा इस बात की हो रही है कि मोहन भागवत ने कहा कि हमारे प्रचीन ग्रंथों की समीक्षा होनी चाहिए। इसको कुछ विद्वान इतिहास के पुनर्लेखन से जोड़कर देखने लगे हैं तो कुछ को पाठ्य पुस्तकों में बदलाव की आहट सुनाई दे रही है। कुछ तो प्रचीन श्रुतियों के आधार पर ग्रंथों के होने न होने पर टीका टिप्पणी कर रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि मोहन भागवत के बयान को समग्रता में समझा जाए। अगर उनके चौंतीस-पैंतीस मिनट के वक्तव्य को ध्यान से सुना जाए तो उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें कही हैं। भारत के गौरवशाली इतिहास को रेखांकित किया गया है। एस्ट्रोनामी पार्क के उद्घाटन में जब वो बोल रहे थे तो उन्होंने काल-गणना की भारतीय ज्ञान पद्धति पर विस्तार से प्रकाश डाला था। उन्होंने इस संबंध में भारत के अलग अलग प्रांतों में प्रचलित सूर्य और चंद्र की गति पर आधारित काल गणना पद्धति के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने ग्रह नक्षत्रों की स्थिति और उसकी भारतीय पद्धति से पहचान की बात भी की। इसी क्रम में उन्होंने भारत के मौखिक इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि हर अन्वेषण में हमारे पूर्वजों का किया कुछ न कुछ है। जो परंपरा से चला आ रहा है। पहले हमारे यहां ग्रंथ नहीं थे इसलिए ये बातें मौखिक परंपरा से चलीं। बाद में ग्रंथ हुए जो कुछ समय बाद इधर उधर हो गए। फिर इसमें कुछ स्वार्थी लोग घुस गए जिन्होंने उन ग्रंथों में कुछ कुछ घुसा दिया जो बिल्कुल गलत है। मोहन भागवत ने इसके अलावा यह भी कहा कि विदेशी आक्रमणों की वजह से हमारी ज्ञान परंपरा खंडित हो गई, जो व्यवस्थाएं थीं वो तहस नहस हो गईं। नियमित अंतराल पर हुए आक्रमणों की वजह से हमारी जो व्यवस्थाएं थीं वो तहस नहस हो गईं। इस पृष्ठभूमि में भागवत जी ने कहा कि उन ग्रंथों की पारंपरिक ज्ञान की एक बार समीक्षा की आवश्यकता है। 

मोहन भागवत के इस वक्तव्य में तीन महत्वपूर्ण बातें हैं जिनको रेखांकित किया जाना चाहिए और उसपर देशव्यापी विमर्श भी होना चाहिए। कुछ बातों पर तो विमर्श हो भी रहा है। मोहन भागवत ने जब भारतीय ज्ञान परंपरा की बात की तो उन्होंने यह भी कहा कि आज के विद्वानों का दायित्व है कि वो भारतीय ज्ञान परंपरा के बारे में समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेख लिखकर नई पीढ़ी को उनकी भाषा में अवगत करवाएं। किस प्रकार से ग्रह और नक्षत्र की स्थिति होती हैं और वो कैसे कृषि और किसानों के लाभ पर आधारित है। उन्होंने एक दो उदाहरण भी दिए। उन्होंने एक तरह से उन सेमिनारवीरों को नसीहत भी दे डाली जो भारतीय ज्ञान परंपरा आदि जैसे शब्दों का उपयोग तो बार बार करते हैं लेकिन उस बारे में विस्तार में नहीं जाते। जब वो ग्रंथों में स्वार्थी तत्वों की छेड़छाड़ की बात करते हैं तो वो इतिहास लेखन के बारे में संकेत करते हैं। इतिहास लिखना क्या होता है। वैसा लेखन जिसमें भूतकाल की गतिविधियों का लेखा जोखा होता है। इतिहास कभी बदलता नहीं है, उसको देखने की दृष्टि अलग अलग हो सकती है। इतिहास तो समय के पन्नों पर दर्ज होता चलता है। इतिहासकार जब वस्तुनिष्ठ नहीं होकर किसी विचारधारा विशेष के प्रभाव या दबाव में अपनी दृष्टि को संकुचित कर लेते हैं तो समय के पन्नों पर दर्ज घटनाएं विसंगतियों के साथ सामने आती हैं। इतिहास में कई बार पुरानी स्थापनाओं को खारिज करके नई स्थापनाएं दी जाती हैं। उदाहरण के लिए स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के अवसर पर आदिवासी नायकों या गुमनाम नायकों के योगदान के बारे में देश की जनता को बताया गया वो इतिहास के एक नए आयाम को जनता के सामने रखने का उपक्रम था। किसी भी देश का इतिहास सिर्फ राजा रानियों या वीर सेनाननियों की गाथाओं का वर्णन नहीं होता है बल्कि उस समय की आम जनता के क्रियाकलापों का लेखा-जोखा ही उसको पूर्णता प्रदान करता है। मोहन भागवत अपने वक्तव्य में इसकी ही अपेक्षा करते नजर आ रहे हैं। 

अपनी उपरोक्त अपेक्षा को प्रकट करने के क्रम में मोहन भागवत ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति और उसके अंतर्गत बन रहे पाठ्यक्रम का उल्लेख भी किया। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति के अनुसार पाठ्यक्रम बन रहा है और कक्षा छह तक पाठ्यक्रम बन भी गया है। इस पाठ्यक्रम में कई नई बातों को भी समाहित किया गया है जो पहले के पाठ्यक्रमों में नहीं थीं। आगे भी जो पाठ्यक्रम तैयार होगा उसमें भी नई बातों को समाहित किए जाने के संकेत उन्होंने दिए। मोहन भागवत ने कहा कि एक बार पाठ्यक्रम सामने आ जाए तो उसकी समीक्षा की जाएगी, चर्चा की जाएगी और प्रयास यही रहेगा कि वो ज्ञान परंपरा के अनुसार ठीक है। इस तरह की चीजों के आने से ज्ञान भी बढ़ेगा और स्वाभिमान भी। यहां भी उन्होंने ये अपेक्षा जताई कि भारतीय ज्ञान परंपरा की कुछ प्राथमिक बातें हम अपने घर में भी बच्चों को बता सकते हैं। मोहन भागवत ने विस्तार से धर्म और विज्ञान के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म और विज्ञान साथ चल सकते हैं। उनके अनुसार हमारे धर्म की परंपरा में फेथ और बिलीफ जैसे शब्द नहीं हैं हमारे यहां अनुभव और प्रतीति को प्रमुखता दी गई है। उन्होंने उदाहरणों के साथ बताया कि हमारा धर्म वैज्ञानिक है। विज्ञान का दायित्व है कि वो धर्म को साथ लेकर चले। मानव कल्याण उसका उद्देश्य हो।  

मोहन भागवत ने एक और महत्वपूर्ण बात कही कि जनता को सरकार पर निर्भरता कम करनी चाहिए। आजकल ये स्वाभाविक अपेक्षा रहती है कि हर काम सरकार ही करे। यह पद्धति भारत की नहीं रही है कि सरकार ही सबकुछ करे। नौकरी भी दे, खाने को भी दे, टीवी भी दे और उसके बदले राज्य पूरी संपत्ति अरापने हाथ में रख ले। भारत में स्वायत्तशासी व्यवस्था थी। राजा का कर्तव्य सीमा का संरक्षण, कानून व्यवस्था और अधर्म का निर्धारण करना था। बाकी सारी बातें प्रजा के हाथों में थीं। मोहन भागवत ने माना कि वो जमाना चला गया और अब नया जमाना है जिसमें अपेक्षा रहती है कि सरकार ही सबकुछ करे। उन्होंने कहा कि करे तो करे लेकिन मोहन भागवत ने एकबार फिर से उस प्रश्न को छेड़ दिया है कि सरकार का दायित्व क्या हो जनता का क्या? इस बारे में कई बार चर्चा होती है कि सरकर क्या क्या करे। हमारे देश में एक सरकारी उपक्रम अब भी सिर्फ यात्रा टिकट करवाने का काम करती है। क्या सरकार का ये दायित्व होना चाहिए कि एक पूरा महकमा सिर्फ रेल और जहाज के टिकटों की व्यवस्था करने में लगे। जिस तरह से जमाना बदला और सरकार पर निर्भरता बढ़ी उसी तरह से एक बार फिर समय बदल रहा है और सरकार पर निर्भरता कम से कम करने की आवश्यकता है। 

मोहन भागवत ने जिस तरह से अपनी ज्ञान परंपरा के प्राथमिक ज्ञान की बात को महत्ता दी, धर्म और विज्ञान को साथ चलने की सलाह दी, परोक्ष रूप से सरकार पर निर्भरता कम करने की बात की अगर हम इसको समग्रता में देखें तो ग्रंथों को ठीक करने की बात नेपथ्य में चली जाती है। महत्वपूर्ण है कि भारत की जो ज्ञान परंपरा है उसका परिचय भारत की नई पीढ़ी को मिले और इसके लिए शिक्षण संस्थान और उसके कर्ताधर्ता सिर्फ मौखिक बात नहीं करें बल्कि प्रमाणिक रूप से उस ज्ञान परंपरा को सरल भाषा में जनता के सामने रखें। मोहन भागवत के वक्तव्य के इस निहितार्थ को समझकर अनुशासनबद्ध तरीके से काम करने की आवश्यकता है। 


Saturday, February 25, 2023

छद्म प्रतिरोध का स्थापत्य गढ़ता कवि

हिंदी के एक कवि हैं। नाम है अशोक वाजपेयी। पूर्व नौकरशाह हैं। महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,वर्धा के कुलपति रहे हैं। प्रतिभाशाली इतने कि  अपने पूरे कार्यकाल में दिल्ली कार्यालय से वर्धा के विश्वविद्यालय का संचालन करते रहे। ललित कला अकादमी, नई दिल्ली के चेयरमैन रहे। अकादमी का उनका कार्यकाल विवादित रहा। कई तरह के आरोप लगे। सीबीआई जांच हुई। उनके कुछ संवेदनहीन बयान हिंदी साहित्य जगत में बहुधा गूंजते रहते हैं। भोपाल गैस त्रासदी के बाद दिया उनका बयान कि मरने वाले के साथ मरा नहीं जाता या हिंदी के लेखकों को मैंने पहली बार हवाई जहाज पर चढ़ाया अब भी हिंदी के लोगों के स्मरण में है। भोपाल गैस त्रासदी के बाद के बयान पर वो खेद प्रकट कर चुके हैं।2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले पुरस्कार वापसी अभियान के अगुवा रहे। अशोक वाजपेयी के बारे में ये चर्चा इस कारण क्योंकि उनके समर्थक एक बार फिर से उनकी जय-जयकार कर रहे हैं। प्रसंग ये है कि दिल्ली में अर्थ कल्चर फेस्टिवल के दौरान उनको काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किया गया था। रेख्ता के सहयोग से आयोजित इस सत्र में अशोक वाजपेयी के अलावा अनामिका, बद्री नारायण, दिनेश कुशवाह और मानव कौल का नाम विज्ञापित किया गया था। यह फेस्टिवल के पहले दिन का अंतिम सत्र था। सत्र के आयोजन वाले दिन अशोक वाजपेयी ने इंटरनेट पर एक टिप्पणी लिखकर घोषणा की कि वो काव्य पाठ में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने लिखा ‘मैं आज अर्थ और रेख्ता द्वारा आयोजित कल्चर फेस्ट में भाग नहीं ले रहा हूं क्योंकि मुझसे कहा गया कि मैं ऐसी ही कविताएं पढ़ूं जिसमें राजनीति या सरकार की सीधी आलोचना न हो। इस तरह का सेंसर अस्वीकार्य है।‘ इसके बाद उनके समर्थक इस टिप्पणी का स्क्रीन शाट लेकर फेसबुक पर लहालोट होने लगे जैसे अशोक वाजपेयी ने किसी क्रांति का शंखनाद किया हो। 

अशोक वाजपेयी के इंकार के बाद अष्टभुजा शुक्ल का नाम काव्य पाठ वाले सत्र में शामिल किया गया । अनामिका, बद्री नारायण, दिनेश कुशवाह और मानव कौल ने कविताएं पढ़ीं। साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चयनित बद्री नारायण ने बताया कि उनको भी आयोजकों की तरफ से फोन आया था। फोन करनेवाले ने पूछा था कि वो किस तरह की कविताएं पढ़ेंगे। बद्री नारायण ने उनसे कहा कि वो हाशिए के लोगों को लेकर लिखी कविताओं का पाठ करेंगे।बात समापत हो गई। दिनेश कुशवाह को भी फोन कर पूछा गया था कि वो किस तरह की कविताएं पढ़ेंगे। उन्होंने तो आयोजकों को कहा कि वो जैसी कविताएं लिखते हैं वही पढ़ेंगे। उन्होंने जिज्ञासा भी प्रकट की कि ये प्रश्न क्यों पूछा जा रहा है। फोन करनेवाले ने बताया था कि ये सूचनाएं सत्र संचालक की सुविधा के लिए जुटाई जा रही हैं। बात खत्म हो गई। अब पता नहीं अशोक वाजपेयी को आयोजकों ने ऐसा क्यों कहा कि वो राजनीति या सरकार की सीधी आलोचना वाली कविता नहीं पढ़ें। वैसे अशोक वाजपेयी राजनीतिक कविता लिखने के लिए जाने भी नहीं जाते हैं। उनकी कविताओं का मूल स्वर तो प्रेम, प्रकृति और देह है। राजनीतिक कविताओं का तो वो उपहास ही करते रहे हैं। राजनीतिक कविताओं को लेकर उन्होंने एक बार टिप्पणी की थी कि इनमें अभिधा का आतंक होता है। ऐसे कवि से कोई भी आयोजक ये क्यों कहेगा कि वो राजनीति या सरकार की सीधी आलोचना वाली कविता न पढ़ें। वो भी रेख्ता जैसी संस्था जिनसे अशोक वाजपेयी का ना केवल परिचय रहा है बल्कि बहुत गहरे और पुराने संबंध भी। रेख्ता की तरफ से सफाई आई। उनकी तरफ से सिर्फ ये पूछा गया था कि अशोक जी किस विषय पर बोलने जा रहे हैं। रेख्ता की सफाई में ये भी कहा गया है कि उनकी तरफ से किसी विशेष कविता के नहीं पढ़ने या पढ़ने का कोई आग्रह नहीं किया गया था। रेख्ता के प्लेटफार्म पर तो जावेद अख्तर और कुमार विश्वास जैसे कवि अपनी कविताओं का पाठ करते रहे हैं और बहुधा राजनीतिक टिप्पणियां भी। रेख्ता का कहना है कि पूरा मसला चकित करनेवाला और अप्रसांगिक है। सचाई क्या है ईश्वर जानें। 

ऐसा प्रतीत होता है कि अशोक वाजपेयी किसी न किसी बहाने से चर्चा में बने रहने का बहाना ढूंढ़ते रहते हैं। वो हमेशा से राजनीति और सत्ता से दूर रहने का दंभ भी भरते रहे हैं। राजनेताओं के साथ मंच साझा करने को लेकर भी वो चुनिंदा स्टैंड लेते रहते हैं। किसी दल के नेता के साथ मंच साझा करने में उनको कोई आपत्ति नहीं होती है तो किसी दल के नेता के साथ वो मंच पर दिखना नहीं चाहते हैं। कई अवसरों पर उनको राजनेताओं के साथ देखा गया है, कई बार मंच पर भी। हाल ही में अशोक वाजपेयी ने राहुल गांधी की भारत-जोड़ो यात्रा में शामिल होकर अपनी प्रतिबद्धता को सार्वजनिक भी किया था। यहां वो कह सकते हैं कि ये राजनीतिक यात्रा नहीं थी लेकिन सचाई सबको पता है। लोकतंत्र में किसी को भी कहीं जाने या अपनी पसंद के दल के नेताओं के साथ दिखने की स्वतंत्रता है। अशोक वाजपेयी को भी है। जब पसंदीदा नेताओं या दल के मंच पर खड़ा होना है तो ये नैतिक स्टैंड खोखला लगता कि लेखकों को नेताओं से दूर रहना चाहिए। कांग्रेस पार्टी से उनके पुराने संबंध रहे हैं, हलांकि वो अपने लेखन में इसका साक्ष्य नहीं होने की बात करते हैं। लेखन में न सही लेकिन उनके क्रियाकलापों में तो ये निरंतर दिखता है। जब वो एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति थे तो गुजरात हिंसा के खिलाफ अभियान चलाया था। राष्ट्रपति को ज्ञापन आदि भी देने गए थे। अभी भी हर चुनाव के पहले चलनेवाले नरेन्द्र मोदी या भारतीय जनता पार्टी विरोधी हस्ताक्षर अभियान में उनके हस्ताक्षर दिख जाते हैं। वो इसको एक नागरिक के कर्तव्य के तौर पर प्रचारित करते हैं। उन्होंने ये स्वीकार भी किया है कि उनकी प्रशासनिक सेवाओं का दो तिहाई हिस्सा कांग्रेसी सरकारों के साथ काम करते हुए बीता है। इसमें वो ये जोड़ना नहीं भूलते कि वो सभी सरकारों को लोकतांत्रिक प्रणाली ने चुना था। प्रश्न ये उठता है कि 2014 से या उसके बाद जो सरकारें बन रही हैं क्या वो लोकतांत्रिक प्रणाली से नहीं चुनी जा रही हैं। 

अशोक वाजपेयी ने अपने एक साक्षात्कार में नामवर सिंह को अचूक अवसरवादी कहा था। उस साक्षात्कार में उन्होंने नामवर सिंह के विचलनों का साक्ष्य देने का दावा किया था। क्या राहुल गांधी के साथ उनकी पदयात्रा में शामिल होकर अशोक वाजपेयी ने स्वयं ये साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर दिया कि उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता क्या है। पदयात्रा में शामिल होने को वो प्रतिरोध का स्थापत्य गढ़ना भी कह सकते हैं लेकिन उनकी पालिटिक्स हिंदी समाज को समझ आती है। बिहार विधानसभा चुनाव के पहले असहिष्णुता के नाम पर पुरस्कार वापसी अभियान चलाना भी उसी राजनीति का एक भाग था। अशोक वाजपेयी को उस समय आपत्ति नहीं हुई थी या कला संस्कृति पर कोई खतरा नजर नहीं आया था जब राजीव गांधी के शासनकाल में सलमान रश्दी की पुस्तक के आयात पर प्रतिबंध लगाया गया था। पुरस्कार वापसी जैसा कदम तब भी नहीं उठाया था जब मकबूल फिदा हुसैन ने भारत की नागरिकता छोड़ने का निर्णय लिया था। क्यों? क्योंकि तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। दरअसल अशोक वाजपेयी प्रतिरोध का स्थापत्य तभी गढ़ते हुए दिखते हैं जब राजनीति या राजनीतिक स्थितियां उनके अनुकूल नहीं होती है। आज स्थितियां इस तरह की बन गई हैं कि अशोक वाजपेयी ने नामवर सिंह को जिस विशेषण से विभूषित किया था वो पलटकर उनपर ही चिपकता नजर आ रहा है। नामवर जी में हो सकता है विचलन हो लेकिन इनके कांग्रेस प्रेम में तो निरंतरता है। 

Saturday, February 18, 2023

सम्मेलन का स्वरूप बदलने की आवश्यकता


फिजी के शहर नांदी में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन समाप्त हो गया है। अड़तालीस वर्षों में विश्व हिंदी सम्मेलन ने बारह पड़ाव तय किए हैं। हर सम्मेलन के दौरान पारित प्रस्तावों पर नजर डालने से पता चलता है कि हिंदी भाषा को लेकर अलग अलग चिंताएं रही हैं। हर सम्मेलन में किसी न किसी रूप में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने की बात उठती ही रही है। इस बार भी दो तीन सत्रों में वक्ताओं ने इस विषय को उठाया। यह एक भावनात्मक मुद्दा है जिसको रोका नहीं जा सकता है, रोका जाना भी नहीं चाहिए। फिजी में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी को विश्व भाषा यानि हिंदी को बोलने-जानने वालों और उसके प्रति अनुराग रखनेवालों विश्व के सभी नागरिकों के बीच हिंदी को संपर्क और संवाद की भाषा के रूप में विकसित करने पर जोर दिया गया। अगर हम पिछले आयोजनों और उसके प्रस्तावों पर नजर डालते हैं तो यह बात थोड़ी ही अलग दिखती है। एक मंतव्य ऐसा भी है जिसकी चर्चा 2007 में भी हो चुकी थी और उसको फिर से दोहराया गया है। 13-15 जुलाई 2007 को अमेरिका के न्यूयार्क में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन के पारित मंतव्यों में से एक मंतव्य ये था कि विश्व हिंदी सचिवालय के कामकाज को सक्रिय एवं उद्देश्यपरक बनाने के लिए सचिवालय को भारत तथा विश्व के चार पांच अन्य देशों में इस सचिवालय के क्षेत्रीय कार्यालय खोलने पर विचार किया जाए। 2023 में कहा गया है कि विश्व सभ्यता को हिंदी की क्षमताओं का समुचित सहकार प्राप्त हो सके, इसके लिए यह सम्मेलन विश्व हिंदी सचिवालय को बहुराष्ट्रीय संस्था के रूप में विकसित करने तथा प्रशांत क्षेत्र सहित विश्व के अन्य भागों में इसके क्षेत्रीय केंद्र स्थापित करने की आवश्यकता का भी अनुभव कर रहा है। इसको देखकर ये लगता है कि नांदी में सम्मेलन का जो प्रतिवेदन विदेश राज्यमंत्री मुरलीधरन ने हिंदी प्रेमियों के समक्ष रखा उसको तैयार करनेवालों ने पर्याप्त तैयारी नहीं की। जो बिंदु सोलह वर्ष पहले आयोजित सम्मेलन के मंतव्य का हिस्सा रहा हो उसके ही शब्दों को थोड़ा बहुत बदलकर फिर से प्रतिवेदन का हिस्सा बनाना उचित नहीं कहा जा सकता है। इस तरह की कई चीजें फिजी के सम्मेलन में घटित हुईं जिसको लेकर विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन के स्वरूप पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। 

वर्षों से विश्व हिंदी सम्मेलन का स्वरूप वही बना हुआ है। सम्मेलन में कुछ सत्र होंगे। हर सत्र में आठ-दस वक्ता होंगे । सभी अपनी-अपनी बात रखेंगे। कुछ पुस्तकों का विमोचन होगा। एक स्मारिका का प्रकाशन किया जाएगा। सम्मेलन के दौरान चार पन्ने का एक समाचार पत्र निकाला जाएगा। अब तकनीक ने बहुत से कामों को आसान कर दिया है तो इसके आयोजन और अन्य गतिविधियों को तकनीक आधारित किए जाने की आश्यकता है। उदाहरण के तौर पर अगर देखा जाए तो इस वर्ष सम्मेलन के दौरान जिस चार पन्ने के समाचार पत्र का प्रकाशन हुआ उसको अगर इलेक्ट्रानिक फार्मेट में बनाकर प्रतिदिन सभी प्रतिभागियों के व्हाट्सएप और ईमेल पर भेजने की व्यवस्था की जाती तो इसकी सार्थकता होती। उसके प्रकाशन पर आनेवाले खर्च को कम करके हिंदी भाषा के विकास पर खर्च किया जा सकता है। अगर इसका प्रकाशन इलेक्ट्रानिक फार्मेट में हो तो उसमें प्रतिदिन आयोजित होनेवाले सत्रों में हुई चर्चा को विस्तार से स्थान दिया जा सकता है। यह सम्मेलन के दौरान हुई चर्चा को भविष्य के लिए सहेज कर रखने का एक माध्यम भी हो सकता है। भविष्यय में इसका उपयोग संदर्भ सामग्री के रूप में हो सकता है। अगर ये इलेक्ट्रानिक फार्मेट में होगा तो इसकी पहुंच सम्मेलन स्थल से बाहर विश्व के अन्य देशों तक हो सकती है जहां के हिंदी प्रेमी सम्मेलन में क्या हो रहा है उसके बारे में जान समझ सकेंगे। तकनीक ने हमें अब ये सुविधा दे दी है कि प्रत्येक सत्र में हुई चर्चा के वीडियो को भी कहीं एक जगह अपलोड किया जाए ताकि दुनियाभर के हिंदीप्रेमी उसको देख सुन सकें। इसके लिए सबसे अच्छी जगह तो विश्व हिंदी सचिवालय की वेबसाइट ही हो सकती है। इस तरह के समन्वय के लिए आवश्यक है कि विश्व हिंदी सचिवालय को और सक्रिय भूमिका दी जाए। विश्व हिंदी सचिवालय की वेबसाइट पर वीडियो अपलोड करने का प्रविधान है लेकिन वहां एक आडियो फाइल अपलोड है। इस वेबसाइट को देखने के बाद ऐसा लगता है कि इसको एक ऐसे संपादक या व्यक्ति की आवश्कता है जो इसको अद्यतन रख सके। पहले ये तय भी था कि विश्व हिंदी सचिवालय की विश्व हिंदी सम्मेलनों के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका होगी लेकिन अबतक ऐसा हो नहीं सका है। विश्व हिंदी सचिवालय के अन्य केंद्र खोलने से अधिक आवश्यक है कि इस संस्था को ही अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय किया जाए। वहां निरंतर कार्य हो और विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान हुई चर्चा और सम्मेलन की अनुशंसाओं के अनुपालन की प्रगति की समीक्षा की जाए। मेरी जानकारी के अनुसार पिछले विश्व हिंदी सम्मेलन की अनुशंसाओं के अनुपालन की समीक्षा के लिए कोई अधिकृत बैठक नहीं हो सकी है। अगर सम्मेलन में पारित प्रस्तावों या सुझावों को लेकर निरंतर कार्य नहीं होगा तो उसका कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। कुछ वर्षों के बाद फिर से उसी प्रस्ताव को पारित करने जैसी गलती संभव है। जैसा इस वर्ष हुआ।

विश्व हिंदी सम्मेलन को समय के साथ भी चलने की भी आवश्यकता है। यह अच्छा है कि फिजी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस( कृत्रिम मेधा) पर चर्चा हुई लेकिन एक वक्ता को छोड़कर किसी ने भी गहराई से उसपर विचार नहीं किया। 2012 में दक्षिण अफ्रीका में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन के अवसर पर प्रकाशित स्मारिका में इसका उल्लेख था कि प्रगतिशील लेखक संघ ने भारत की सभी भाषाओं के लिए रोमन लिपि अपनाने का सुझाव दिया था, लेकिन देवनागरी लिपि समर्थकों ने ये कहते हुए उसे खारिज कर दिया था कि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। आज रोमन लिपि हिंदी के सामने एक बड़े खतरे के रूप में उपस्थित है। हिंदी फिल्मों की दुनिया में लगभग सारा कार्य रोमन लिपि में होता है। एक दो अभिनेताओं को छोड़कर लगभग सारे अभिनेता स्क्रिप्ट से लेकर संवाद तक रोमन में पढ़ते हैं। इसके अलावा जो पीढ़ी उन्नत तकनीक के साथ बड़ी हो रही है उसकी भाषा भी न तो देवनागरी हो पा रही है न ही अंग्रेजी। वो अधिकतर रोमन में संवाद करते हैं और अब तो वाक्यों और शब्दों का स्थान चिन्हों ने ले लिया है। हिंदी के सामने जो इस तरह की व्यावहारिक चुनौतियां हैं उसपर विचार करना बेहद आवश्यक है। दूसरी बात ये है कि विश्व हिंदी सम्मेलन और इसके कर्ताधर्ताओं को युवाओं को इससे जोड़ने का उपक्रम करना चाहिए। सम्मेलन के सत्रों को लाइव प्रसारण हो और उसमें युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। उनके मन में उठने वाले प्रश्नों पर मंथन हो। कोई ऐसा तंत्र विकसित किया जाए कि पूरी दुनिया में हिंदी से प्रेम करनेवाले युवा इस सम्मेलन से आनलाइन माध्यम से जुड़ सकें। अंत में काका साहब कालेलकर की एक पंक्ति याद आ रही है जहां उन्होंने कहा था कि हिंदी को राष्ट्रभाषा के तौर पर अगर विजयी बनना है तो वह संस्कृत का सहारा छोड़ नहीं सकती है। उनका मानना था कि भारत के हरेक प्रदेश ने संस्कृत भाषा से, संस्कृत साहित्य से और संस्कृत की शब्द शक्ति से लाभ उठाया है। संस्कृत संस्कृति ही भारतीय संस्कृति का प्राण है। संस्कृत की मदद के बिना भारत की कोई भाषा पनप नहीं सकती है। विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजकों को, विश्व हिंदी सचिवालय को काका कालेलकर की बातों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। 

Friday, February 10, 2023

आक्रांताओं के कारण प्रवेश पर पाबंदी


पिछले दिनों दक्षिण भारत की यात्रा पर गया था। यात्रा के दौरान त्रिवेन्द्रम स्थित श्रीपद्मनाभस्वामी मंदिर में दर्शन करके परिसर के उत्तरी गेट से बाहर निकल रहा था। गेट पर पहुंचकर देखा कि एक विदेशी महिला और पुरुष गेट पर तैनात सुरक्षाकर्मी से कुछ अनुरोध कर रहे थे। वो बार बार अंग्रेजी में कुछ कह रहे थे और सुरक्षाकर्मी सिर्फ नो नो (नहीं-नहीं) कह रहे थे। हम उनकी बात सुनने के लिए रुक गए। जिज्ञासा थी कि सुरक्षाकर्मी किस बात के लिए मना कर रहे हैं और विदेशी पर्यटक का आग्रह क्या है। जब हम रुके तो सुरक्षाकर्मी उनसे कह रहे थे ओनली हिंदू। ये सुनकर विदेशी पर्यटक ने कहा कि आई एम अ हिंदू, आई डू योगा। आई नो कृष्णा, आई नो रामा एंड आई विलीव इन गाड। (मैं हिंदू हूं, मैं योग करता हूं और राम और कृष्ण को जानता हूं। मैं भगवान में विश्वास करता हूं।) इतना सुनने के बाद भी सुरक्षाकर्मी सहमत नहीं हो रहे थे और बार बार उनसे कह रहे थे कि ओनली हिंदू कैन गो ( सिर्फ हिंदू ही मंदिर परिसर में जा सकते हैं)। विदेशी पर्यटक लगातार हिंदू धर्म के बारे में अपनी जानकारी सुरक्षाकर्मियों से साझा कर रहे थे। अब उसके साथ की महिला ने भी कहना आरंभ कर दिया था कि वो भी योग करती है इसलिए वो भी हिंदू है। हमने हस्तक्षेप करने का प्रयास किया लेकिन सुरक्षाकर्मी टस से मस नहीं हो रहे थे। थोड़ी देर तक दोनों की बातें सुनने के बाद सुरक्षाकर्मियों ने उनको अपने उच्चाधिकारियों के पास भेज दिया। पता नहीं उनको श्रीपद्मनाभस्वामी के दर्शन करने का सौभाग्य मिला या नहीं। जब हम कोच्चि के डच पैलेस के अंदर श्रीमहाविष्णु मंदिर पहुंचे तो मंदिर के बाहर बोर्ड लगा था, ओनली हिंदूज आर अलाउड इनसाइड द टैंपल (मंदिर में सिर्फ हिंदूओं के प्रवेश की अनुमति है)। वहां भी विदेशी पर्यटक मंदिर के गेट तक जा रहे थे और बोर्ड देखकर वापस हो रहे थे।

इन दो मंदिरों को देखने के बाद मन में ये प्रश्न उठा कि मंदिरों में गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित क्यों है। जबकि कहा ये जाता रहा है कि हिंदू धर्म, उपासना की पद्धति भर नहीं है, वह एक समग्र जीवन दर्शन और व्यवहार प्रक्रिया है। उसमें सकारात्मक स्वीकृतियों के साथ निषेधात्मक पक्षों के उन्नयन की गंभीर दृष्टि होती है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद से लेकर छांदोग्योपनिषद तक में धर्म के अर्थ को स्पष्ट किया गया है। ऋगवेद में तो धर्म का अर्थ निश्चित नियम या आचरण के तौर पर उल्लिखित है। ऋगवेद और अथर्ववेद में धर्मन् शब्द का उपयोग कई बार मिलता है। जैमिनी की परिभाषा के अनुसार वेदों में प्रयुक्त अनुशासनों के अनुसार चलना ही धर्म है। धर्म का संबंध उन क्रिया-संस्कारों से है, जिनसे आनंद मिलता है और जो वेदों द्वारा प्रशंसित और प्रेरित हैं। मनुस्मृति में भी कहा गया है आचार: परमो धर्म:। धर्म की परिभाषा को लेकर, इसको उपादानों को लेकर, इसके सूत्रों को लेकर, इसके सूत्रग्रंथों को लेकर विपुल सामग्री उपलब्ध है। लेकिन कहीं भी धर्म का अर्थ उपासना पद्धति नहीं मिलता है। धर्म को जीवन जीने की पद्धति के तौर पर ही देखा गया है। अगर हिंदू धर्म को जीवन जीने की पद्धति माना गया है तो उन विदेशियों का क्या किया जाए जो ये कहते हैं कि उनका तो हिंदू धर्म में विश्वास है, वो राम और कृष्ण में भी विश्वास रखते हैं। क्या वो मंदिरों में प्रवेश कर सकते हैं। इस बारे में व्यापक हिंदू समाज को विमर्श करना चाहिए। 

उससे भी महत्वपूर्ण ये जानना है कि हिंदू मंदिरों में गैर-हिंदुओं का प्रवेश निषेध क्यों किया गया था। मंदिरों में केवल हिंदुओं को ही प्रवेश देने की व्यवस्था क्यों की गई थी। आज के संदर्भ में अगर इस प्रश्न को पूछा जाएगा तो जो खुद को कथित उदारवादी परंपरा के लेखक मानते हैं उनमें से अधिकतर इसका उत्तर जातिप्रथा और धर्मशास्त्रों में निर्दिष्ट जीवनपद्धतियों की एकांगी व्याख्या के आधार पर देंगे। कोई इसके लिए आर्य-अनार्य के सिद्धांत का सहारा लेगा तो कोई वर्ण या जाति व्यवस्था को इसका आधार बनाकर अपनी विद्वता का परिचय देने का प्रयास करेगा। क्या इस तरह के विचारों या तर्कों से सहमत हुआ जा सकता है। बिल्कुल नहीं। मंदिरों में गैर हिंदुओं के प्रवेश पर पाबंदी लगाने के पीछे का सबसे बड़ा कारण रहा है विदेशी आक्रांताओं का मंदिरों पर हमला कर उसको तोड़ना, वहां संचित धन को लूटना और समाज के सांस्कृतिक केंद्र को तहस नहस करना। भारतीय संस्कृति में मंदिरों को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। मंदिरों से नृत्य और कला का गहरा जुड़ाव रहा है। मुगल आक्रांताओं ने जब हमारे देश पर हमला किया और तो उनको मंदिरों की सामाजिक और सांस्कृतिक महत्ता का अनुमान हो गया था। ये अकारण नहीं है कि मुगलकाल में मंदिरों पर हमले हुए, मंदिरों को तोड़ा गया। मुगलों ने मंदिरों को तोड़कर सिर्फ हिंदुओं की आस्था को नहीं तोड़ा बल्कि उन्होंने भारतीय समाज के उस केंद्र को नष्ट करने का प्रयास किया जहां लोग संगठित होते थे। मुगलों ने मंदिरों के रूप में स्थापित सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्रों को तोड़कर भारतीय समाज को कमजोर करने का प्रयत्न किया था। समाज की ताकत पर प्रहार किया। भारतीय कला लोक के केंद्र मंदिर हुआ करते थे। जनता की आकांक्षाएं और उसके स्वप्न उन्हीं कलाओं में खुलते और खिलते थे। उत्तर भारत में मुगलों का प्रभाव रहा और वो सुदूर दक्षिण भारत तक अपना साम्राज्य स्थापित नहीं कर पाए थे तो इस कारण दक्षिण भारत के मंदिर उनसे सुरक्षित रहे। जब उत्तर भारत के मंदिरों को तोड़े जाने और उसको नष्ट करने की खबरें दक्षिण भारत तक पहुंची होंगी तो मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई होगी। इन बातों का प्रमाण को ढूंढे जाने की आवश्यकता है। दक्षिण भारत के मंदिर के पुजारियों या वहां पीढ़ियों से रह रहे सेवादारों से बात करने पर इस तरह की बातें सामने आती हैं। उत्तर और पश्चिम भारत के मंदिरों में भी गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पाबंदी लगाने का प्रयास हुआ। कई मंदिरों में इस तरह की पाबंदी लगाई भी गई। उसके पीछे के कारण भी यही रहे कि मुगलों की सेना ने कई बार छलपूर्वक मंदिरों में प्रवेश करके उसको तोड़ने का कार्य किया। 

मुगलों के पराभव के बाद और अंग्रेजी राज के उदय के समय और कालांतर में उनके शासनकाल में भी मंदिरों का पौराणिक स्वरूप स्थापित नहीं हो सका। इसका कारण ये रहा कि मंदिरों पर अंग्रेज शासकों की लगातार नजर रहा करती थी। वहां होने वाली गतिविधियों पर, वहां होनेवाले धन संचय पर भी अंग्रेज नजर रखते थे। उनको लगता था कि मंदिर ही स्वाधीनता की गतिविधियों के केंद्र हो सकते हैं। अंग्रेजों ने मंदिरों के सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूप को बदलने का प्रयत्न किया और मंदिरों को सिर्फ धार्मिक केंद्र के रूप में प्रचारित करना आरंभ कर दिया। उनके सांस्कृतिक स्वरूप और सामाजिक भूमिका पर पाबंदियां लगाई गईं। अंग्रेजी शासन वाले कालखंड में धर्म से जुड़ी बातों को तोड़ा मरोड़ा गया। आधुनिक और अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर धर्म की गलत व्याख्या करके उसको रिलीजन बनाकर आनेवाली पीढ़ियों के मानस में स्थापित कर दिया गया।

हिंदू समाज बहुत उदार रहा है और इसके अंदर से ही रूढ़ियों को खत्म करने को लेकर सुधारवादी पैदा होते रहे हैं। उन्होंने हिदू समाज में समय के साथ कई तरह के सुधार किए। इस तरह के कई मंदिर मिलेंगे जहां पहले गैर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित था लेकिन वहां अब इस नियम में ढील दे दी गई है और हर तरह के धर्मावलंबी उन मंदिरों में जा रहे हैं। ये उदारवादी दृष्टि समयानुसार व्यापक होती रहती है। 


Saturday, February 4, 2023

तकनीक से समृद्ध होगी संस्कृति


एक फरवरी को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में बजट पेश किया। बजट पर चर्चा हो रही थी। अचानक एक सज्जन का फोन आया। कहने लगे कि इस बार प्रकाशन जगत के लिए सरकार ने कुछ नहीं किया। उल्टे डिजीटल पुस्तकालयों की घोषणा करके पुस्तक व्यवसाय के लिए एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। इतना कहने के बाद उन्होंने कहा कि हिंदी के एक शीर्ष प्रकाशक की बजट पर प्रतिक्रिया भेज रहे हैं, उसको देख लीजिएगा। उनके फोन रखते ही हमने मेल चेक की तो प्रकाशक महोदय की हिंदी और अंग्रेजी में बजट पर प्रतिक्रिया थी। बजट में प्रकाशन जगत की उपेक्षा पर वो झुब्ध नजर आ रहे थे। इसके अलावा उन्होंने डिजीटल पुस्तकालयों की घोषणा की भी आलोचना की थी और कहा था कि कोरोना के समय से संकटग्रस्त प्रकाशन व्यवसाय को सरकार की इस पहल से झटका लगेगा। यात्रा पर होने की वजह से बजट भाषण सुन नहीं पाया था। प्रकाशक महोदय की प्रतिक्रिया पढ़ने के बाद ये जानने की इच्छा हुई कि बजट में ऐसी क्या घोषणा हुई है जिसपर हिंदी के इस शीर्ष प्रकाशक ने इतनी कठोर प्रतिक्रिया दी है।

इस बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बच्चों और किशोरों के लिए नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी बनाने की घोषणा की। अपनी घोषणा में वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि इस डिजीटल पुस्तकालय में सभी भाषाओं और विषयों की उत्कृष्ट पुस्तकें होंगी। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा कि वो पंचायत और वार्ड स्तर पर पुस्तकालयों की स्थापना करें। इन पुस्तकालयों में इस तरह की व्यवस्था की जाए कि बच्चे और किशोर वहां बैठकर नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी की पुस्तकों तक पहुंच सकें। इसके साथ ही वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार देश में पढने की संस्कृति का विकास करने के लिए गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर हर आयुवर्ग के छात्रों के लिए पठनीय सामग्री उपलब्ध करने का प्रयास करेगी। इस कार्य में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास और चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट का सहयोग भी लिया जाएगा। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से अपेक्षा की गई है कि वो नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी के लिए सभी भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ट पुस्तकें उपलब्ध कराए। नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी में सिर्फ पुस्तकें ही नहीं होंगी बल्कि किशोरों और बच्चों को कई अन्य चीजें सीखने को मिलेंगी। ये डिजीटल पुस्तकालय शिक्षा मंत्रालय के अधीन होगा। 

अवधारणा के स्तर पर नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी की स्थापना एक बेहतर प्रयास दिखाई देता है। इसको आरंभ करके उत्कृष्टता प्रदान करने के लिए शीघ्रता से कार्य करना होगा। यह प्रयास राष्ट्रीय शिक्षा नीति को भी बल प्रदान कर सकता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्कूलों में जिस तरह से भारतीय भाषाओं को वरीयता देने की बात की गई है उसको लागू करने में भी डिजीटल लाइब्रेरी सहायक हो सकता है। पिछले बजट में सरकार ने देश में एक डिजीटल विश्वविद्यालय की स्थापना की घोषणा की थी। तब ये कहा गया था कि इस विश्वविद्लाय की स्थापना से छात्रों को लाभ होगा और वो कहीं से बैठकर उत्कृष्ट शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे। एक वर्ष बीतने के बाद अभी तक उस विश्वविद्यालय को शुरू नहीं किया जा सका है। कहा जा रहा है कि इस वर्ष जून जुलाई तक ये विश्वविद्लय अस्तित्व में आ जाएगा। इसी तरह से कुछ वर्षों पूर्व इंडियन इंस्टीट्यूट आफ हेरिटेज की स्थापना की बात की गई थी। उसको लेकर कई बैठकें हुईं। समितियां भी बना दी गईं, लेकिन उस घोषणा का क्या हुआ ये अभी तक सार्वजनिक नहीं हो सका है। उस समय दावा किया गया था कि संस्कृति के क्षेत्र में ये आईआईएम और आईआईटी की तरह कार्य करेगा। इसका आरंभ नहीं होना या इसपर धीमी गति के काम होना चिंताजनक है। खैर ये संस्कृति मंत्रालय से जुड़ा मामला है, इसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी। 

अभी हम बात कर रहे थे नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी की। हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी की स्थापना के साथ राज्यों में हर पंचायत और वार्ड में पुस्तकालय की स्थापना की बात भी की गई है। इस समय प्रकाशन जगह की जो स्थिति है उसमें प्रकाशकों से ये अपेक्षा करना व्यर्थ है कि वो पंचायतों तक पुस्तकों को पहुंचाने की कोई योजना बनाकर उसको साकार करें। पुस्तकों की पाठकों तक पहुंच इस वक्त प्रकाशन जगत की सबसे बड़ी समस्या है। प्रकाशकों तक की तरफ से इस समस्या को दूर करने की कोई कार्ययोजना सामने नहीं आई है। ग्राम पंचायत तो बहुत दूर की बात है महानगरों में भी पुस्तकों की दुकानें बहुत कम हैं। पुस्तकों की उपलब्धता भी। ऐसे वातावरण में नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी की सहायता से देश के हर पंचायत में बच्चों और किशोरों तक अपने देश का साहित्य और इतिहास पहुंचाया जा सकता है। उनको अपने गौरवशाली अतीत और वर्तमान की उपलब्धियों के बारे में आसानी से बता सकते हैं।  

दूसरा एक और लाभ नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी का है जिसको रेखांकित किया जाना बेहद आवश्यक है। बजट घोषणा में ये भी कहा गया है कि इसमें बच्चों औ किशोरों के लिए प्रचुर मात्रा में साहित्य और पठनीय सामग्री उपलब्ध होगी। अगर हम सिर्फ हिंदी की बात करें तो यहां बाल साहित्य बहुत कम मात्रा में उपलब्ध है। बाल साहित्य न तो लेखकों की प्राथमिकता में है और न ही प्रकाशकों की। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि हिंदी में बाल साहित्य लेखन पूरी तरह से उपेक्षित है। बच्चों की जो पत्रिकाए निकला करती थीं वो बंद हो चुकी हैं। एक दो पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है लेकिन उनकी पहुंच पाठकों तक नहीं बन पा रही है। हिंदी में बाल साहित्य की कमी को लकर कभी-कभार गोष्ठियों और सेममिनारों में चिंता तो व्यक्त की जाती है लेकिन इस कमी को दूर करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं दिखाई देता है। हिंदी के लेखक एक विशेष विचारधारा के वशीभूत होकर खास प्रकार का साहित्य लिखते रह गए। उनका अधिक ध्यान समाज में फैले कथित असामनता, गरीबी और मजदूरों की समस्या पर रहा और वो इन्हीं विषयों को केंद्र में रखकर लिखते रह गए। अब अगर नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी को समृद्ध करने के लिए राष्ट्रीय पुस्तक न्यास और चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट की ओर से पहल की जाती है तो हिंदी की इस कमी को पूरा करने की दिशा में प्रयास आरंभ हो सकता है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास बच्चों को ध्यान में रखकर पुस्तकें लिखवा सकता है।        

ज्ञान के साथ साथ संस्कृति के विकास और उसको मजबूत करने में भी डिजीटल लाइब्रेरी उपयोगी हो सकती है। संस्कृति को मजबूत करने के लिए यह आवश्यक है कि नई पीढ़ी के लोग अपनी विरासत के बारे नें विस्तार से जानें। नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी भारत की सांस्कृतिक विरासत को हर ग्राम पंचायत तक पहुंचाने का एक उपक्रम भी बन सकता है। रही बात प्रकाशकों को इस पहल से चुनौती की तो तकनीक कभी भी किसी व्यवस्या के लिए चुनौती बनकर नहीं आती है बल्कि वो उस व्यवसाय के लिए संभावनाओं के नए द्वार खोलती है। जब देश में कंप्यूटर आया था तो कई दलों के लोगों ने इसका ये कहते हुए विरोध किया था कि इससे बेरोजगारी बढ़ेगी लेकिन कालांतर में कंप्यूटर की उपयोगिता हर क्षेत्र में बढ़ी और इसने रोजगार की असमीति संभावनाओ को जन्म दिया। प्रकाशकों के सामने भी अब इस डिजीटल लाइब्रेरी के लिए बच्चों और किशोरों के लिए पुस्तकें उपलब्ध करवाने की चुनौती होगी। ऐसा नहीं है कि छपी हुई पुस्तकों की महत्ता खत्म हो जाएगी लेकिन इसका डिजीटल स्वरूप आने और उसकी लाइब्रेरी बनने से उसकी व्याप्ति बढ़ेगी। अगर पुस्तकों की व्याप्ति बढ़ती है तो प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रकाशकों को ही लाभ होगा। जरूरत इस बात की है कि प्रकाशक तकनीक को अपने व्यावसायिक हितों के लिए उपयोग करें।