Translate

Tuesday, July 16, 2013

पोस्टरों में हिंदी का दबदबा

हिंदी सिनेमा के सौ साल पूरे होने के दौरान फिल्म इंडस्टी में एक खामोश बदलाव भी हुआ । हलांकि यह खामोश बदलाव सौ साल के जश्न में उस तरह से उभर कर नहीं आ पाई जैसे कि आनी चाहिए थी । दरअसल यह हिंदी सिनेमा की विकास यात्रा में एक बेहद अहम पड़ाव है जिसे महत्वपूर्ण बदलाव के तौर पर रेखांकित किया जाना चाहिए । आज अगर हम देखें तो ज्यादातर हिंदी फिल्मों के पोस्टर भी अब हिंदी यानि देवनागरी लिपि में बनाए जाने लगे हैं । कुछ फिल्मों के रोमन में और कुछ फिल्मों के दोनों में बनाए जाते हैं । हलांकि हम कह सकते हैं कि इस तरह के प्रयोग सत्तर के दशक में शुरू हो गए थे और इक्का दुक्का फिल्मों के पोस्टर देवनागरी में लिखे जाने लगे थे। पोस्टर के पहले हिंदी फिल्मों का विज्ञापन सिर्फ अखबारों के जरिए हुआ करता था । तीन मई 1913 को जब पहली हिंदी फिल्म- हरिश्चंद्र- रिलीज हुई तो उसके प्रचार प्रसार के लिए कोई पोस्टर नहीं बना था । अखबारों में उसके विज्ञापन छपे थे और सिनेमा हॉल के बाहर पर्चा बंटा था जिसमें फिल्म के बारे में जानकारी थी । सिनेमा हॉल के बाहर बांटे गए उस पर्चे में भी चित्र का उपयोग नहीं हुआ था ।माना जाता है कि हिंदी फिल्मों का पहला पोस्टर 1920 में बाबू राव पेंटर ने अपनी पहली फिल्म-वत्सला हरण- के लिए बनाई थी। बाद में हिंदी फिल्मों के हाथ से बने पोस्टर खूब चलन में आए लेकिन उन पोस्टरों के शीर्षक भी ज्यादातर रोमन में ही लिखे जाते रहे । साठ के दशक तक तो हिंदी फिल्मों के पोस्टरों पर अनिवार्य रूप से शीर्षक रोमन के साथ साथ उर्दू में भी लिखा जाता था लेकिन साठ के दशक के बाद से फिल्मी पोस्टरों से उर्दू गायब होती चली गई । उर्दू के गायब होने की वजह वह नहीं है जो देवनागरी या हिंदी के स्थापित होने की है । उसकी वजह इतर है और उन वजहों की चर्चा यहां अवांतर होगी । दरअसल हाल के दिनों में बॉलीवुड में हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ी है । हिंदी फिल्मों में खालिस हिंदी पट्टी से आने वाले विशाल भारद्वाज और अनुराग कश्यप जैसे निर्देशकों की जो नई खेप आई है उसने हिंदी को बेहद मजबूती से बॉलीवुड में स्थापित किया है । इनकी फिल्मों के पोस्टर भी ज्यादातर हिंदी में ही बनते हैं। संवादों में भी एक देसीपन होता है ।  
इसके अलावा संजय लीला भंसाली और पंकज कपूर जैसे पुराने लोगों ने भी हिंदी की ताकत को पहचाना और उसमें काम करने की शुरुआत की । पंकज कपूर ने जब मटरू की बिजली का मंडोला बनाई तो उसके पोस्टर की बहुत तारीफ हुई थी । देवनागरी लिपि में बेहतरीन ढंग से लिखे गए अक्षरों ने दर्शकों के साथ साथ फिल्म समीक्षकों को भी अपनी ओर आकर्षित किया । फिल्म हरियाणा के छोटे से गांव की कहानी पर बनी थी लिहाजा उसी गांव के बैकड्रॉप पर पोस्टर भी तैयार किया गया था । इन सबसे पहले अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म राउडी राठौर के पोस्टर भी देवनागरी लिपि में लिखे गए थे । राउडी राठौर फिल्म के पोस्टर तो हिंदी में तैयार किए ही गए साथ ही साथ फिल्म के प्रमोशन के लिए पोस्टरों पर हिंदी के बेहद चलताऊ लाइनें नया साल, नया माल, फौलाद की औलाद आदि लिखे गए । अक्षय कुमार की इमेज को ध्यान में रखकर लिखी गई इन लाइनों को खूब पसंद किया गया । अभी अभी संजय लीला भंसाली की आनेवाली फिल्म रामलीला का पोस्टर भी हिंदी में ही जारी किया गया है । हिंदी में फिल्म समीक्षा के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित विनोद अनुपम देवनागरी में पोस्टरों के बनाए जाने के बढ़ते चलन को हिंदी भाषी लोगों की क्रय शक्ति के बढ़ने से जोड़कर देखते हैं । उनका मानना है कि आर्थिक उदारवाद की बयार के बाद हिंदी भाषी लोगों की क्रय क्षमता या यों कहें कि खर्च करने की क्षमता में लगातार बढ़ोतरी हुई है । विनोद अनुपम के तर्कों में दम है । हिंदी पट्टी के लोगों की क्रय क्षमता में बढ़ोतरी के बाद हमारे देश में बाजार का व्याकरण पूरी तरह से बदल गया । हिंदी के लोगों ने समाज की हर चीच को प्रभावित करना शुरू कर दिया । हिंदी पट्टी के लोग विचार, समाज और संसाधन तीनों को प्रभावित करने लगे । इस बढ़ते प्रभाव को बाजार ने फौरन भांप लिया । मार्केटिंग से जुड़े लोगों को लगा कि विशाल हिंदी भाषी जनता के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए उनकी भाषा में उन तक अपना प्रोडक्ट पहुंचाया जाए । उसी भाषा में ही बाजार उनसे संवाद करे । लिहाजा हिंदी को तवज्जो दी गई ।
रोमन में पोस्टर की डिजाइनिंग देवनागरी से अपेक्षाकृत ज्यादा आसान है । हिंदी में मात्राओं की वजह से डिजाइन बनाने में दिक्कतें आती हैं । लेकिन फिल्मों की मार्केटिंग करनेवालों को भी यह बात समझ में आई और इस दिक्कत को चैलेंज के रूप में लेकर उसे विकसित किया गया । सिनेमा को जनता तक पहुंचाने का पहला और सबसे आसान माध्यम पोस्टर ही रहा है । कंप्यूटर क्रांति और प्रिंटिंग में नई तकनीक के आने के पहले तो पोस्टर हाथ से बनाए जाते थे फिर उसे छपवा लिया जाता था । सार्वजनिक स्थानों से लेकर सार्वजनिक शौचालयों में फिल्मी पोस्टरों की भरमार हुआ करती थी । पोस्टरों को देखकर अंदाजा लगा लिया जाता था कि फिल्म कैसी होगी । स्कूल और कॉलेज के छात्रों को फिल्मी पोस्टरों का इंतजार रहता था और उसके लगते ही उसे उखाड़कर अपने कमरे में लगाने की होड़ भी । बाद में तो हालात यह हो गई कि फिल्मों की रील के डब्बों के साथ फिल्मों के पोस्टर भी सिनेमा हॉल मालिकों को भेजे जाने लगे । उसके बाद बैनरों का दौर आया जिसमें फिल्मों के कुछ रोचक सीक्वेंस छापे जाने लगे लेकिन तब भी रोमन का साम्राज्य कायम रहा । पहले यह माना जाता था कि देश के अंग्रेजी दां लोगों के पास ही पैसे खर्च करने की क्षमता है । लिहाजा उनकी पसंद को ध्यान में रखकर हिंदी फिल्मों के पोस्टर और बैनर भी रोमन में बनाए जाते थे । श्रीदेवी और जितेन्द्र की हिम्मतवाला जैसी खालिस हिंदी दर्शकों के लिए बनाई गई फिल्म के पोस्टर भी रोमन में लिखे गए थे । सुपर हिट फिल्म शोले का भी पहला पोस्टर रोमन में ही लिखकर आया था । रोमन में लिखे उस पोस्टर की कैलीग्राफी अब भी दर्शकों के दिमाग में ताजा है । राजश्री प्रोडक्शन जैसी फिल्म निर्माण कंपनियां जिनके पोस्टर से लेकर कास्टिंग तक पहले हिंदी में हुआ करती थी उन्होंने भी अपनी रणनीति बदलते हुए रोमन और अंग्रेजी का दामन थाम लिया था । लेकिन अब स्थिति पलटती नजर आ रही है । जब से बाजार की नजरों में हिंदी पट्टी के लोगों की अहमियत बढ़ी तो फिर उनकी रुचि का ध्यान रखा जाने लगा । उनकी भाषा में उन तक पहुंचने के बाजार के औजार का इस्तेमाल शुरू हुआ । इस बात की तस्दीक फिल्मों की मार्केंटिंग तकनीक में हुए बदलाव से भी होती है । पहले फिल्मों के प्रमोशन का सारा जोर दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों पर होता था लेकिन अब प्रमोशन का पूरा फोकस बाराणसी, गोरखपुर और पटना जैसे हिंदी पट्टी के शहरों की ओर हो गया है । चंद सालों पहले यह कल्पना भी नहीं की जा सकती थी सलमान और आमिर खान जैसे सुपर स्टार इन छोटे शहरों में जाएंगे । लेकिन अब तो इनकी हर फिल्म रिलीज के पहले ऐसा होता है । आमिर खान अपनी फिल्मों को हिट कराने के लिए कभी ऑटो चलाने वाले के घर वाराणसी पहुंच जाते हैं तो कभी पटना के चिड़ियाघर के पास के ढाबे में लिट्टी चोखा खाने बैठ जाते हैं । आज शाहरुख खान की सूची में पटना आवश्यक रूप से मौजूद रहता है ।
हिंदी आज बॉलीवुड की मजबूरी बन चुकी है । पहले हिंदी फिल्मों में ज्यादातर विषय महानगरों के इर्द गिर्द घूमा करते थे या फिर अप्रवासी भारतीयों को ध्यान में रखकर फिल्में बनाई जाती थी लेकिन अब तो बनारस और धनबाद को केंद्र में रखकर फिल्में बनाई जा रही हैं और दर्शकों को पसंद आने के साथ साथ बंपर कमाई भी कर रही है । हाल ही में आई फिल्म रांझणा और चंद्र प्रकाश द्विवेदी की आनेवाली फिल्म-मोहल्ला अस्सी- के केंद्र में बनारस है जो मशहूर साहित्यकार काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सी पर बन रही है । गैंग्स ऑफ वासेपुर के केंद्र में झारखंड के शहर धनबाद की कहानी है तो मटरू की बिजली का मंडोला में हरियाणा के एक गांव की । पहले इन गांव देहात की फिल्मों को यथार्थ का चित्रण करनेवाली कला फिल्में मानी जाती थी लेकिन अब इन फिल्मों ने भी बंपर बिजनेस करके यह साबित कर दिया कि फिल्मों में गांव और कस्बों की कहानियां भी बिकती है । लोग इस तरह की फिल्मों को देखने भी आते हैं । फिल्मों में तो हिंदी का दबदबा बढ़ा है लेकिन समाज में हिंदी साहित्य को लेकर उदासीनता बढ़ रही है । यह हिंदी और उसके चाहनेवालों के लिए चिंता की बात है । अब वक्त आ गया है कि साहित्य लेखन भी आयातित विचारधारा के बंधन से मुक्त होकर हिंदी के अपने आकाश में विचरण करे ।

Monday, July 15, 2013

फैसलों के निहितार्थ

देश में राजनीति के अपराधीकरण को रोकने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने दो बेहद अहम फैसले दिए हैं । पहला फैसला तो यह दिया कि जिस किसी को भी दो साल की या उससे ज्यादा की सजा होगी उनकी संसद, विधानसभा या विधान परिषद की सदस्यता फैसले के फौरन बाद खत्म हो जाएगी । आठ साल तक सुप्रीम कोर्ट में चली सुनवाई और विद्वान वकीलों और संविधान विशेषज्ञों की राय के बाद सुप्रीम कोर्ट ने ये ऐतिहासिक माना जानेवाला फैसला सुनाया । इसके अलावा दूसरा फैसला यह है कि अगर कोई व्यक्ति चुनाव के वक्त जेल या हिरासत में होगा तो उसको चुनाव लड़ने का हक नहीं मिलेगा। इस फैसले का आधार यह बताया गया है कि जिस व्यक्ति को वोट देने का अधिकार नहीं है वह चुनाव लड़ने के योग्य कैसे हो सकता है । सुप्रीम कोर्ट के दोनों फैसले तत्काल प्रभाव से लागू हो गए हैं । इन दोनों फैसलों का देश के कमोबेश सभी हलकों में जोरदार स्वागत हो रहा है । सियासी दलों ने भी इन फैसलों का आमतौर पर स्वागत ही किया है । मीडिया में इन दो फैसलों को राजनीति के अपराधीकरण पर लगाम लगाने की दिशा में एक बड़़ा कदम बताया जा रहा है । है भी । कहा और माना जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद राजनीतिक पार्टियां दागी उम्मीदवारों पर दांव नहीं लगाएंगी । उन्हें इस बात का डर होगा कि फैसले के बाद क्या होगा । फैसले के बाद तरह तरह की बातें शुरु हो गईं और उन नेताओं की सूची सामने आने लगी जिनपर इन फैसलों के बाद तलवार लटक गई है । सूची बेहद लंबी है जिसमें लालू, मुलायम, मायावती से लेकर जयललिता और कनिमोड़ी से लेकर राजा और मारन तक शामिल हैं ।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इन दोनों फैसलों में कुछ ऐसे बिंदु हैं जिनपर आनेवाले दिनों में विमर्श की जरूरत महसूस की जाएगी । दो साल की सजा के फौरन बाद सदस्यता खत्म होने का फैसला किसी भी व्यक्ति को प्राकृतिक न्याय के दायरे से बाहर रखती है । भारतीय संविधान के मुताबिक किसी भी व्यक्ति को निचली अदालतों के फैसले के खिलाफ उपरी अदालतों में अपील करने का अधिकार है । अपील के बाद अगर उपरी अदालत को केस में मेरिट दिखाई देता है और निचली अदालत के फैसले पर पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस होती है तो उसपर रोक लगा दी जाती है । कई बार सजा पर तो कई बार उसके अमल पर रोक लगा दी जाती है । लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसले के बाद अपील के अधिकार के बीच कार्रवाई हो चुकी होगी । अगर किसी संसद सदस्य के खिलाफ कोई केस होता है और उसमें निचली अदालत से उनको तीन साल की सजा हो जाती है । संविधान से मिले अधिकार के तहत जब तक सांसद महोदय हाईकोर्ट में अपील करेंगे तब तक उनकी संसद की सदस्यता जा चुकी होगी । लेकिन उस स्थिति की कल्पना कीजिए जब हाई कोर्ट निचली अदालत के उस फैसले पर रोक लगा देता है । सुनवाई के बाद निचली अदालत के फैसले को पलट देती है और सांसद महोदय को राहत मिल जाती है । लेकिन तबतक उनकी संसद की सदस्यता जा चुकी होगी । अगर सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसले के आलोक में इस स्थिति को देखें तो यह स्थित न्याय के अधिकार पर सवाल खड़े करती है । संविधान सभा की बहस के दौरान भी इस तरह के हालात पर चर्चा हुई थी । संविधान सभा के सदस्य एस एल सक्सेना ने उन्नीस मई दो हजार उनचास को हुई बहस में संविधान के ड्राफ्ट में संशोधन नंबर 1590 पेश किया था । सक्सेना ने कहा था कि अगर किसी संसद सदस्य को सजा हो जाती है तो अपील पर फैसला होने तक उसकी सदस्यता को मुअत्तल रखा जाए और सदन की कार्रवाई में भाग लेने और वोट करने के अधिकार पर भी उस दौरान रोक रहे । संविधान सभा ने सक्सेना के संशोधन को खारिज कर दिया था । इस केस में याचिकाकर्ता ने इसको भी आधार बनाया था ।
इसके अलावा कई ऐसी स्थितियां भी आ सकती हैं जिसमें उपरी अदालत के फैसले के बाद विवाद खड़ा हो सकता है । सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद उस स्थिति की कल्पना कीजिए जब किसी सदन का कोई सदस्य निचली अदालत से दो साल या उससे अधिक की सजा होती है और उसकी सदस्यता चली जाती है । वो  उपरी अदालत में अपील करता है । अपील पर सुनवाई होने के दौरान उस खाली हुई सीट पर चुनाव आयोग उपचुनाव करवाएगा । चुनाव होने तक अपील पर कोई फैसला नहीं हो पाता है और उसमें किसी और अन्य उम्मीदवार की जीत होती है । उसके बाद उपरी अदालत का फैसला निचली अदालत के विपरीत आता है । सजा रद्द कर दी जाती है । जिसकी सदस्यता गई उसकी भारपाई कौन करेगा । बगैर किसी दोष के उसकी सदस्यता जाने का जिम्मेदार कौन होगा । भारतीय न्याय व्यवस्था में ऐसे सैकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे जहां निचली अदालतों के फैसलों को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया है । निचली अदालत से सजा पाए लोग हाईकोर्ट से बाइज्जत बरी होते रहे हैं । हमारे देश की न्यायिक प्रणाली में माना जाता है कि एक भी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए चाहे कितने भी मुजरिम छूट जाएं । आदर्श स्थिति यह होती कि जबतक अपील पर फैसला ना आए तबतक उपचुनाव नहीं हो और उसकी संसद सदस्यता सस्पेंड रखी जाए और अंतिम फैसले का इंतजार किया जाए ।
दूसरे फैसले में जेल में रहनेवाले के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने का फैसला आया है। इसका तर्क भी सही है कि जिस परिस्थित में कोई शख्स वोट नहीं डाल सकते है उसी परिस्थिति में चुनाव कैसे लड़ सकता है । लेकिन इस फैसले को भी देस के मौजूद राजनीति हालात के मद्दनजर कसौटी पर कस कर देखा जाना होगा । शासक वर्ग द्वारा इस फैसले के दुरुपयोग की भी आशंका है । राजनीतिक दुश्मनी के चलते अपने विरोधियों को चुनाव के दौरान जेल में ठूंसकर उसे चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है । इस फैसले की आड़ में अपने राजीतिक विरोधियों को निबटाने का खेल भी खेला जा सकता है । इसके अलावा जैसा कि उपर के केस में है कि किसी वजह से कोई शख्स जेल में है और उस दौरान वो चुनाव नहीं लड़ सकता लेकिन बाद में अदालत उसे बाइज्जत बरी कर देता है तो फिर क्या होगा । इन दोनों फैसलों का स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन इन फैासलों से जो सवाल खड़े हो रहे हैं या इनके दुरुपयोग की जो आशंकाएं हैं उसका निराकरण भी होना चाहिए । सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ को इसपर विचार करना चाहिए ।
 

Saturday, July 6, 2013

एकोअहम की तलाश में द्वितीयोनास्ति

हिंदी में यात्रा वृत्तांत लिखने की एक समृद्धशाली परंपरा रही है । भारतेन्दु युग में भी अनेक लेखकों ने यात्रा वृत्तांत लिखकर हिंदी साहित्य को समृद्ध किया । खुद भारतेन्दु ने कविवचन सुधा में 1871 से 1879 तक कई वृत्तांत लिखे जिसमें हरिद्वार की यात्रा, लखनऊ की यात्रा और सरयू पार की यात्रा विशेष रूप से पठनीय हैं । उस काल की पत्र पत्रिकाओं में भी यात्रा वृत्तांत प्रमुखता से छपता था और लोग चाव लेकर पढ़ते थे । भारतेन्दु युग में तो खासतौर पर विदेश यात्रा के कई लेख मिलते हैं । लेकिन उस दौर में भी दुर्गम पहाड़ों की यात्रा से लौटे लोगों ने भी जमकर यात्रा की दुश्वारियों से लेकर रोमांच और उसके पौराणिक महत्व को समेटते हुए कई लेख लिखे । 1890 में विगू मिश्र ने बदरी-केदार यात्रा का अद्भुत वर्णन किया है । बाद में द्विवेदी युग में भी देवीप्रसाद खत्री, गोपालराम गहमरी आदि ने भी यात्रा वृत्तांत लिखे जो आज हिंदी साहित्य की थाती हैं । कालांतर में भी यात्रा वृत्त लिखने का क्रम जारी रहा । छायावादोत्तर काल तक आते आते यात्रा वृतांत शैली, शिल्प और विषय की विविधता की वजह से अहम हो गई, लोकप्रिय भी । इसी दौर में राहुल सांकृत्यायन जैसे यायावर पैदा हुए जिन्होंने प्रचुर मात्रा में इस विधा में लेखन कर हिंदी जगत को समृद्ध किया । इस दौर में ही भारत को स्वतंत्रतता मिली थी लिहाजा कई राजनेताओं ने भी विदेश यात्रा से लौटकर अपने संस्मरण लिखे । लेकिन जैसे जैसे वक्त आगे बढ़ता गया हिंदी साहित्य की यह समृद्ध विधा हाशिए पर चली गई । हो सकता है कि वैश्वीकरण और इंटरनेट ने दुर्गम स्थानों को भी इतना सुलभ करवा दिया कि लोगों की ज्यादा रुचि यात्रा वृत्तांत में रही नहीं । नतीया यह हुआ कि पत्र-पत्रिकाओं से इस तरह का लेखन गायब होता चला गया । बीच बीच में अवश्य कोई किताब या फिर कोई लेख यात्रा संस्मरणों पर दिख जाता है । फिलहाल तो कृष्णनाथ जी इस विधा में सबसे अहम काम कर रहे हैं । कुछ दिनों पहले हिंदी की मशहूर कवयित्री गगन गिल की भी पुरोवाक्- नाम से कैलाश मानसरोवर यात्रा पर एक किताब आई थी जिसकी खासी चर्चा हुई । मैं इस पूरी परंपरा को इस वजह से लिख रहा हूं कि हाल ही में मुझे वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा की एक अद्भुत किताब- द्वितीयोनास्ति , कैलास-पर्वत एक अकेला- मिली है जो हेमंत शर्मा की कैलास मानसरोवर यात्रा की दास्तां है ।
हेमंत शर्मा से मेरा परिचय उनके लेखन के माध्यम से ही रहा है बाद में वो टीवी पत्रकारिता से जुड़ गए और इंडिया टीवी में नींव से लेकर निर्माण तक हैं । हेमंत की छवि एक संवेदनशील पत्रकार के तौर पर रही है जो उनकी इस किताब से और पुष्ट होती है । कॉफी टेबल बुक स्टाइल में कैलास यात्रा की यह किताब हेमंत जी के पत्रकार व्यक्तित्व के अंदर के सहृदय लेखक को उभार कर पाठकों के सामने पेश कर देता है । लगभग सवा सौ पन्नों की यह किताब जब मुझे मिली तो मैं चकित रह गया । हिंदी में इस तरह की किताबें जरा कम ही छपती हैं । एक तो बेहतरीन आर्ट पेपर पर और शानदार फोटो के साथ । सारे फोटो भी लेखक हेमंत शर्मा के लिए हुए ।  हेमंत शर्मा फिलहाल टेलीवीजन पत्रकारिता कर रहे हैं इस वजह से उन्हे विजुअल की महत्ता का पता है । सवा सौ पन्नों की इस किताब के हर पन्ने पर एक ,से एक बेहतरीन फोटो हैं और वहीं उसके उपर ही छोटी छोटी टिप्पणियां । सिर्फ कुछ जगहों पर लंबी टिप्पणियां हैं । फोटो ही इतना कुछ कह जाता है कि ज्यादा लिखने की गुंजाइश ही नहीं बचती । हेमंत शर्मा की लेखन की शैली भी बेहतरीन है । अपनी यात्रा की शुरुआत से लेकर कैलास जाने और वहां से लौटने के क्रम में हेलीकॉप्टर खराब होने का जो उन्होंने वर्णन किया है वो पाठकों को हटने ही नहीं देता है । मैंने तो इस किताब को पढ़ना शुरू किया तो फिर खत्म करके ही उठा । दरअसल हेमंत शर्मा अपनी कैलास यात्रा की कहानी के साथ साथ उसके पौराणिक महत्व या किवदंतियों के बारे में भी साथ साथ टिप्पणी करते चलते हैं । हेमंत शर्मा शिव और उनके व्यक्तित्व को भी व्याख्यायित करते हैं । जैसे हेमंत शर्मा लिखते हैं- आज पर्यावरण बचाने की चिंता विश्वव्यापी है । शिव पहले पर्यावरण प्रेमी हैं । पशुपति हैं । निरीह पशुओं के रक्षक हैं । आर्य जब जंगल काट बस्तियां बसा रहे थे । खेती के लिए जमीन तैयार कर रहे थे । दूध के लिए गाय को दुह रहे थे पर बछड़े का मांस खा रहे थे, तब शिव ने बूढ़े बैल नंदी को अपना वाहन बनाया । सांड को अभयदान दिया । जंगल कटने से बेदखल सांपों को आश्रय दिया । उसी तरह हेमंत शर्मा का मानना है कि महादेव ने उपेक्षितों को भी गले लगाया । अपनी इस किताब में भाषा के प्रवाह और संप्रेषणीयता को बनाए रखने के लिए हेमंत शर्मा अंग्रेजी के शब्दों से भी परहेज नहीं करते हैं । जैसे एक जगह वो शिव के लिए ट्रबल शूटर शब्द का इस्तेमाल करते हैं । यह शब्द उसी सहजता से आता है जैसे गुलजार के एक मशहूर गाने की लाइन उनकी आंखें कमाल करती हैं, पर्सनल से सवाल करती है- में पर्सनल शब्द आता है । भाषा की यह बाजीगरी इस किताब को विशिष्टता प्रदान करती है । इसके अलावा भी जिस तरह के शब्दों और वाक्यों का प्रयोग इस किताब मैं है वो इसकी भाषा को चमका देती है । हेमंत शर्मा बनारस के हैं लिहाजा बनारसीपर पूरे किताब पर दिखाई देता है, भाषा में खासतौर पर- हवा तेजी से चुभ रही है , हड्डियां कड़कड़ा रही है । इसके अलावा खालिस हिंदी पट्टी के जुमले- सूर्य अस्त । पहाड़ मस्त भी पाठकों को बांधे रखते हैं । कैलास मानसरोवर की यात्रा जैसे जैसे आगे बढ़ती जाती है वैसे वैसे रोमांच भी अपने चरम पर पहुंचता जाता है । हाड़ कंपा देनेवाली ठंड में भी तड़के ब्रह्ममुहुर्त में मानसरोवर का रहस्य जानने के लिए लेखक सुबह साढ़े तीन बजे गेस्ट हाउस से निकलकर सरोवर के किनारे पहुंच जाते हैं । उसके सामने वाणभट्ट की कादंबरी, कालिदास के रघुवंश और कुमारसंभव साकार होने लगता है । लेकिन यहां भी एक दिलचस्प प्रसंग है लेखक को उनके गाइड ने अकेले और वो बगैर छड़ी के बाहर निकलने से मना किया था क्योंकि बाहर हिंसक कुत्तों का झुंड शिकार की तलाश में घूमता है । लेकिन मानसरोवर में सुबह सुबह देवताओं और अप्सराओं के दर्शन के उत्साह में गाइड की सालह को भुलाकर अकेले सिर्फ कैमरे के साथ सरोवर तक पहुंच जाते हैं । काफी देर बाद अचानक जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो कुत्तों का एक झुंड । डर से होश फाख्ता । किसी तरह जान बची ।
कैलास यात्रा के दौरान लेखक हेमंत शर्मा के अंदर के अंदर के पत्रकार की पैनी नजर और विश्लेषक नजरिया भी देखने को मिलता है । जब भी चीन या तिब्बत की बात आती है तो तिब्बत को नष्ट करने के लिए वो चीन की लानत मलामत करते हैं । साफ तौर उन्होंने तिब्बत की बर्बादी के लिए माओ को जिम्मेदार ठहराया है । साहित्य को नष्ट करने के लिए जिस तरह से ऐतिहासिक पांडुलिपियां चीनियों ने जलाई वो वामपंथ के चेहरे का ऐसा काला दाग है जो कभी भी मिट नहीं सकता । ना ही उन्हें माफ किया जा सकता है । हिंदी में इस तरह की किताब बिरले ही दिखाई देती है । इस किताब का प्रोडक्शन बेहतरीन है और इसके लिए इसके प्रकाशक- प्रभात प्रकाशन की भी तारीफ की जानी चाहिए ।

Thursday, July 4, 2013

एनकाउंटर पर सियासत

इशरत जहां एनकाउंटर केस की जांच नौ साल तक कई एजेंसियों अदालतों के चक्कर काटते हुए दो हजार ग्यारह में सीबीआई तक पहुंची थी । इस मामले की जांच कर रही स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम की जांच में इस मुठभेड़ को फर्जी करार दिया जा चुका था । गुजरात हाईकोर्ट ने आरोपी पुलिसवालों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया था, साथ ही इस पूरे मामले की सीबीआई जांच कराने का भी हुक्म दिया था। हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने तकरीबन डेढ साल की जांच के बाद अपनी पहली चार्जशीट अहमदाबाद की विशेष अदालत में दायर की । इस चार्जशीट में गुजरात पुलिस के कई आला पुलिसवालों को हत्या, गैरकानूनी हिरासत आदि आदि धाराओं में आरोपित किया गया है । चार्जशीट में गुजरात पुलिस के अफसरों के खिलाफ बेहद संगीन इल्जाम लगाए गए हैं । इन पर इशरत और उनके साथियों को बेहोश करके मारने और उसके बाद उनके शवों के पास आईबी के मुहैया कराए गए हथियार रखने की बात कही गई है । सीबीआई ने इस फर्जी मुठभेड़ में देश की शीर्ष खुफिया एजेंसी आईबी के अफसर की संलिप्पता की ओर भी संकेत किया है लेकिन साफ साफ कुछ भी नहीं कहा गया है । सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में कहा है कि आईबी के उस वक्त के ज्वाइंट डायरेक्टर राजेन्द्र कुमार और तीन अन्य अफसरों के खिलाफ और जांच की जरूरत है । यहां यह भी सवाल उठता है कि सीबीआई के सामने क्या विवशता थी कि वो बगैर जांच पूरी किए पहली चार्जशीट दायर कर दे और फिर अदालत में और जांच की जरूरत बताकर सप्लीमेंट्री चार्जशीट का रास्ता खुला रखे । क्या सीबीआई 31 जुलाई तक आईबी के स्पेशल डायरेक्टर राजेन्द्र कुमार के रिटायर होने का इंतजार कर रही है, ताकि उनको भी दूसरी चार्जशीट में आरोपी बनाया जा सके । सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों से जुड़े रहे लोगों का मानना है कि इस मामले में सीबीआई एक गलत ट्रेंड की शुरूआत कर रही है । जिस फोन कॉल डिटेल और आईबी अधिकारियों की पुलिस और नेताओं से मुलाकात जैसे फिल्मी सूबतों को सीबीआई आधार बना रही है वो साफ तौर किसी दबाव की ओर इशारा कर रहे हैं । सीबीआई इस बात को बाखूबी जानती है कि खुफिया एजेंसियों में यह बेहद सामान्य बात होती है कि उसके किसी भी यूनिट का हेड स्थानीय पुलिस अधिकारियों से लागातर मिलता जुलता रहता है । खुफिया अधिकारियों की राजनेताओं के साथ भी मुलाकात सामान्य और उनके रोजमर्रा के कामों में शुमार होता है । आंतरिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दे अगर बेहद अहम हैं और उसपर फौरन फैसले लेने की आवश्यकता होती है तो मुलाकातों और फोन कॉल्स की संख्या भी बढ़ जाती है । लेकिन इस केस में सीबीआई इसको साजिश का हिस्सा मानकर बतौर सबूत पेश कर रही है ।  
दूसरी अहम बात- सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में कहा है कि फर्जी मुठभेड़ के पहले मारे गए सभी लोगों को अलग अलग जगहों से उठाया गया था । मुठभेड़ में मार गिराने के पहले उनको गैरकानूनी तरीके से अलग अलग जगहों पर हिरासत में रखा गया था । सीबीआई की चार्जशीट के मुताबिक पुलिस ने इशरत जहां और जावेद शेख को ग्यारह जून को उठाया था और उनको एनकाउंटर करने के पहले चार दिनों तक एक फॉर्म हाउस में रखा था । यहां सवाल यह उठता है कि अगर इशरत जहां को पुलिस ने चार दिन पहले गैरकानूनी हिरासत में ले लिया था तो क्या इशरत के परिवारवालों ने मुंबई में गुमशुदगी की कोई रिपोर्ट दर्ज करवाई थी । सीबीआई को इस बिंदु पर जांच करके अपनी चार्जशीट में स्थिति साफ करनी चाहिए थी । इससे अदालत में सीबीआई का पक्ष और मजबूत होता और आरोपियों को सजा दिलवाने में आसानी होती । सीबीआई की चार्जशीट इस बात पर भी खामोश है कि इशरत जहां आतंकवादी थी या नहीं । यहां यह भी अहम है कि इशरत जहां के एनकाउंटर के बाद लश्कर की बेवसाइट और उसके मुखपत्र ख्वाजा टाइम्स में उसको शहीद बताकर महिमामंडन किया गया था । इसके अलावा आतंकवादी हेडली ने भी इशरत के आतंकवादियों से संबंध के बारे में एनआईए को जानकारी दी थी । सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में इन बातों को नजरअंदाज किया है । इन बातों को नजरअंदाज करने की वजहों का खुलासा होना चाहिए ताकि सीबीआई की जांच पर उठ रहे सवालों को संतुष्ट किया जा सके ।  सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में यह तो माना है कि पाकिस्तानी नागरिक जीशान और अहमद लश्कर के आतंकवादी थे लेकिन इस बात से इंकार किया है कि वो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या की मंशा से अहमदाबाद आए थे । जब आप किसी बात को काटते हैं तो उसके समर्थन में आपके पास तर्क होने चाहिए लेकिन सीबीआई से पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि लश्कर के दोनों आतंकवादी अहमदाबाद में क्या कर रहे थे। वो किस मंशा से भारत आए थे और गुजरात तक पहुंच गए थे ।
दरअसल, ऐसा लगता है कि, इस एनकाउंटर के बहाने से एक सियासी खेल खेला जा रहा है । अश्विनी कुमार के इस्तीफे के बाद जब कपिल सिब्बल ने देश के कानून मंत्री का पदभार संभाला तभी इस बात के संकेत दे दिए थे कि इशरत मामले में पत्रकारों को एक बडा़ मसाला हाथ लगनेवाला है । उसके बाद से ही सीबीआई की तरफ से इस मामले में आईबी अफसरों की संलिप्पता की बात लगातार लीक की जाने लगी, अखबारों में खबरे छपने लगी । गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके खास सिपहसालार अमित शाह का नाम भी उछाला जाने लगा । उधर राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानि एनआईए पर भी आरोप लगा कि उसने इशरत के बारे में आतंकवादी हेडली के बयान को नजरअंदाज कर दिया है । सियासत के इस खेल ने देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए जिम्मेदार एजेंसियों में बेवजह की खटास पैदा कर दी । सिसायी फायदे के लिए जिस तरह से सीबीआई के इस्तेमाल के आरोप लग रहे हैं वह देश की सुरक्षा के लिए बेहतर संकेत नहीं है । जिस तरह से आईबी के अधिकारियों को टारगेट किया जा रहा है उससे पूरी एजेंसी की कार्यक्षमता पर असर पड़ सकता है । खुफिया एजेंसियों का काम राज्य सरकारों और पुलिस को आतंकवादी खतरों से आगाह करते हुए इनपुट देने का होता है । अगर आतंकवाद या आतंकवादी वारदातों के इनपुट मात्र के आधार पर किसी को आरोपी बनाया जाने लगेगा तो आईबी के अफसर इनपुट देने में हिचकने लगेंगे । और तब उस स्थिति की सिर्फ कल्पना की जा सकती है । सीबीआई की चार्जशीट के बहाने से अब सियासत का खेल खेला जानेवाला है। एजेंसियों का इस्तेमाल होनेवाला है । जैसे 2014 के लोकसभा चुनाव नजदीक आएंगें वैसे वैसे हवाई आरोपों-प्रत्यारोपों की झड़ी लगनेवाली है । लेकिन आरोपों के इन घटाटोप के बीच देश के सियासतदानों को बेहद गंभीरता से इस बात पर विचार करना होगा कि सत्ता की राजनीति में वो सुरक्षा एजेंसियों का किस हद तक इस्तेमाल करें । राजनीति में सीबीआई के इस्तेमाल का आरोप इस देश की हर पार्टी पर लंबे सनमय से लगता रहा है । सुप्रीम कोर्ट तक इस एजेंसी के बारे में बेहद सख्त टिप्पणी कर चुकी है । लेकिन जिस तरह से इस बार देश की दो एजेंसियों को राजनीति में घसीटा जा रहा है वह भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है । आज बीजेपी सीबीआई के इस्तेमाल का आरोप लगा रही है लेकिन जब उनका शासन होता है तो उनपर भी यही आरोप लगते हैं । जरूरत इस बात कि एक ऐसा सिस्टम बने जिसमें जांच एजेंसियां और सुरक्षा के लिए जिम्मेदार एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिज्ञ अपने फायदे के लिए नहीं कर सकें । अगर ऐसा होता है तो इशरत जहां एनकाउंटर जैसे केस नहीं होंगे ।  

 

Wednesday, July 3, 2013

खंडित यथार्थ का प्रोपगंडा़

झारखंड के पाकुड़ में नक्सलियों ने एक बार फिर से बड़ी वारदात का अंजाम दिया और जिले के पुलिस अधीक्षक को गोलियों से भून कर मार डाला । इसके पहले हाल ही में नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के काफिले को घेर कर उनके नेताओं समेत कई लोगों की हत्या कर दी । इसके बाद नक्सलियों के एक गुट ने बिहार के जमुई के पास एक ट्रेन पर हमला किया और सुरक्षा बलों के हथियार लूट ले गए । इन बड़ी वारदातों के अलावा छोटे मोटे अपराध को नियमित अंतराल पर अंजाम दिया जा रहा है । इन वारदातों को गिनाने का मकसद सिर्फ इतना बताना है कि देश के कई हिस्सों में कानून के राज पर ग्रहण लगा हुआ है । केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री कई बार इस बात को दुहरा चुके हैं कि नक्सली इस देश के लिए बड़ा खतरा है । तमाम दावों और बयानों के बावजूद उनसे निबटने के उपायों पर सख्ती से अमल करने की इच्छा शक्ति दिखाई नहीं देती, बल्कि सरकार की नाकामी ही उजागर होती है । नक्सलियों से निबटने को लेकर प्रधानमंत्री के बयान खोखले लगते हैं । दरअसल कांग्रेस के कुछ नेताओं और केंद्र सरकार के कई मंत्रियों को नक्सलियों से सहानुभूति है । उन्हें अब भी लगता है कि नक्सल समस्या एक सामाजिक समस्या है और उसका हल उसी को आदार मानकर किया जाना चाहिए । लेकिन इस उहापोह के बीच और किसी ठोस रणनीति के आभाव में नक्सली बार बार बड़ी वारदातों को अंजाम देकर केंद्र सरकार को चुनौती दे रहे हैं । नक्सलियों ने जिस तरह से अपने प्रभाव वाले इलाकों में रंगदारी, वसूली, लड़कियों को जबरन उठाकर शादी करने की घटनाओं को अंजाम दिया है उसकी जड़ में ना तो विचारधारा हो सकती है और ना ही किसी लक्ष्य को हासिल करने का संघर्ष । कौन सी विचारधारा इस बात की इजाजत दे सकता है शिक्षा के मंदिर स्कूल को बम से उड़ा दिया जाए और आदिवासी इलाकों के बच्चों को शिक्षा से वंचित कर दिया जाए । दरअसल नक्सलियों की एक रणनीति यह भी है कि आदिवासियों को शिक्षित नहीं होने दो ताकि उनको आसानी से बरगलाया जा सके । अधिकारों के नाम पर बंदूक उठाने के लिए अशिक्षित आदिवासियों को प्रेरित करना ज्यादा आसान है ।  इन सबके उसके पीछे सिर्फ और सिर्फ अपराध की मानसिकता है और सरकार को नक्सलियों से अपराधी और हत्यारे की तरह सख्ती के साथ निबटना चाहिए ।
सरकार के अलावा इस देश के तथाकथित व्यवस्था विरोधी बुद्धिजीवी नक्सलियों के रोमांटिसिज्म से ग्रस्त हैं और नक्सलियों के वैचारिक समर्थन को जारी रखने की बात करते हैं । उन्हें नक्सलियों के हिंसा में अराजकता नहीं बल्कि एक खास किस्म का अनुशासन नजर आता है । नक्सलियों की हिंसा को वो सरकारी कार्रवाई की प्रतिक्रिया या फिर अपने अधिकारों के ना मिल पाने की हताशा में उठाया कदम करार देते हैं । नक्सल मित्रों को सुरक्षा बलों के तथाकथित अत्याचार नजर आते और उनकी कार्रवाई को राज्य सत्ता की संगठित हिंसा तक करार देते हैं। दरअसल नक्सलियों के विचारधारा के रोमांटिसिज्म से ग्रस्त ज्यादातर लोग मार्क्सवाद के बड़े पैरोकार हैं या वैसा होना का दावा करते हैं । दरअसल मार्क्सवादियों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है कि उनकी दीक्षा ही हिंसा और हिंसक राजनीति में होती है उन्नीस सौ साठ में विभाजन के बाद सीपीआई तो लोकतांत्रिक आस्था के साथ काम करती रही लेकिन सीपीएम तो सशस्त्र संघर्ष के बल पर भारतीय गणतंत्र को जीतने के सपने देखती रही चेयरमैन माओ का नारा लगानेवाली पार्टी चीन के तानाशाही के मॉडल को इस देश पर लागू करने करवाने का जतन करती रही चीन में जिस तरह से राजनीतिक विरोधियों को कुचला डाला जाता है , विरोधियों का सामूहिक नरसंहार किया जाता है वही इनके रोल मॉडल बने उसी चीनी कम्युनिस्ट विचारधारा की बुनियाद पर बनी पार्टी भारत में भी लगातार कत्ल और बंदूक की राजनीति को जायज ठहराने में लगी रही । पिछले साल केरल में एक मार्क्सवादी नेता ने खुले आम सार्वजनिक सभा में हिंसा और मरने मारने की बात की थी ।
अब वक्त आ गया है कि हमें देखना होगा कि जिनकी दीक्षा ही हिंसा और हिंसक राजनीति से शुरू होती है और जिनकी आस्था अपने देश से ज्यादा दूसरे देश में हो उनकी बातों को कितनी गंभीरता से ली जानी चाहिए । मेरा मानना है कि मार्क्स और माओ के इन अनुयायियों की बातों का बेहद गंभीरता से प्रतिकार किया जाना चाहिए । देश की जनता को उनके प्रोपगंडा और उसके पीछे की मंशा को बताने की जरूरत है । जब यह मंशा उजागर होगी तो उनके खंडित यथार्थ का असली चेहरा सामने आएगा । आज देश के बुद्धिजीवियों के सामने नक्सलमित्रों और नक्सलमित्रों की चालाकियों को सामने लाने की बड़ी चुनौती है । इसमें बहुत खतरे हैं । मार्क्सवाद के नाम पर अपनी दुकान चलानेवाले लोग बेहद शातिराना ढंग से आपको सांप्रदायिक, संघी आदि आदि करार देकर बौद्धिक वर्ग में अछूत बनाने की कोशिश करेंगे । अतीत में उन्होंने कई लोगों के साथ ऐसा किया भी है । लेकिन सिर्फ इस वजह से हिंसा की राजनीति को बढ़ावा देने उसको जायज ठहरानेवालों को बेनकाब करने से पीछे हटना अपने देश और उसकी एकता और अखंडता के साथ छल करना है ।

Monday, July 1, 2013

सूक्तियों की कसौटी पर प्रेमचंद

जिस तरह से महात्मा गांधी दुनिया भर के राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखनेवाले लेखकों को लुभाते हैं उसी तरह से हिंदी साहित्य में रुचि रखनेवालों या फिर देश के हिंदी विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ने-पढानेवालों को प्रेमचंद अपनी ओर प्रकाशित करते हैं । प्रेमचंद ने हिंदी में विपुल लेखन किया है । प्रेमचंद जब लिख रहे थे तो उस वक्त देश की जो सामाजिक स्थिति थी उसको ध्यान में रखकर उनकी रचनाओं को कसौटी पर कसा जाना चाहिए लेकिन कुछ अति उत्साही आलोचक आज की सामाजिक स्थिति को आधार बनाकर उनका मूल्यांकन करने में जुट जाते हैं । नतीया यह होता है कि प्रेमचंद की धज्जियां उड़ाकर, उन्हें दलित और महिला विरोधी करार देकर वो फौरी चर्चा तो हासिल कर लेते हैं लेकिन उतने ही वो हास्य के पात्र भी बनते रहे हैं । हर साहित्यकार का मूलयांकन उसके लेखन काल और देश में उस वक्त की परिस्थियों के आदार पर किया जाना चाहिए । जैसे प्रेमचंद ने लिखा था- सौभाग्यवती स्त्री के लिए उसका पति संसार की सबसे प्यारी वस्तु होती है । अब अगर प्रेमचंद की इस उक्ति को स्त्री विमर्श के नाम पर हाथ में एके 47 लेकर लेखन करनेवाली लेखिकाओं की कसौटी पर कसेंगे तो बेचारे प्रेमचंद कहीं के नहीं रहेंगे । आज की स्त्री विमर्शकार के लिए पति तभी तक संसार की सबसे प्यारी वस्तु हो सकता है जबतक कि वो अपनी पत्नी को तमाम तरह की आजादी दे, बराबरी का हक दे, उसके फैसलों में दखल ना दे । प्रेमचंद के युग से लेकर अबतक पति की परिभाषा पूरी तौर पर बदल चुकी है । प्रेमचंद के युग से लेकर पति ने लंबी यात्रा तय की है । अब वो परमेश्वर से सहजीवी और साथी से होते-होते लगभग खलनायक हो गया है ।
प्रेमचंद अपने कथा साहित्य में इतने पर ही नहीं रुकते हैं । वो कहते हैं- 1. पति की आड़ में सबकुछ जायज है । मुसीबत तो उसकी है जिसे कोई आड़ नहीं । 2. औरत जात बिना कुछ ताड़ना दिये काबू में भी तो नहीं रहती । 3. पुरुष में नारी के गुण आ जाते हैं तो वह महात्मा बन जाता है । नारी में पुरुष के गुण आ जाते हैं तो वह कुलटा हो जाती है । 4. ब्याह तो आत्मसमर्णण है । 5. प्रेम जब आत्म समर्पण का रूप लेता है तभी ब्याह है उसके पहले ऐय्याशी है । इन पांच सूक्तियों के आदार पर अगर प्रेमचंद का मूल्यांकन किया जाय तो उनका लेखन पूरी तौर पर मर्दवादी लेखन कहा जाएगा और स्त्री विमर्शकार उनको स्त्री विरोधी साबित कर देंगे । कईयों ने कोशिश भी की है । जबकि ऐसा है नहीं, जैसा कि मैंने उपर कहा कि प्रेमचंद को समग्रता में समझने के लिए तत्कालीन सामाजिक स्थिति को ध्यान में रखना आवश्यक है ।  
यह पूरा संदर्भ इसलिए दे रहा हूं कि अभी अभी मैं रांची विश्वविद्यालय के मारवाड़ी कॉलेज में व्याख्याता डॉ नियति कल्प का शोध प्रबंध पढ़ रहा था जो पुस्तकाकार भी प्रकाशित है । दरअसल पिछले महीने मैं भागलपुर गया था । भागलपुर मुझे अपने शहर जैसा ही लगता है कि क्योंकि वहीं से मैंने कॉलेज की पढ़ाई की थी । वहीं एक समारोह के दौरान मुझे नियति कल्प की किताब मिली- प्रेमचंद के कथा साहित्य में सूक्तियां । लगभग पौने चार सौ पृष्टों की इस किताब में बहुत श्रमपूर्वक प्रेमचंद के कथा साहित्य से सूक्तियां छांटकर उसको व्याख्यायित किया गया है । नियति ने समग्रता में सूक्तियों को देखा है और स्त्री के लिए लिए गए अच्छे वाक्यों को भी इस किताब में व्याख्यायित किया है 1. स्त्री पुरुष से उतनी ही श्रेष्ठ है, जितना प्रकाश अंधेरे से । 2. स्त्री जितना क्षमाशील हो सकती है, पुरुष नहीं हो सकता । 3. नारी हृद्य धरती के समान है, जिससे मिठास भी मिल सकती है, कड़वाहट भी । उसके अंदर पड़नेवाले बीज में जैसी शक्ति हो । 4. नारी परीक्षा नहीं चाहती, प्रेम चाहती है । परीक्षा गुणों को अवगुण, सुंदर को असुंदर बनाने वाली चीट है । प्रेम अवगुणों को गुण बनाता है, असुंदर को सुंदर । अब अगर इन सूक्तियों के आधार पर प्रेमचंद की विवेचना करें तो उनकी अलग ही छवि उभरती है । एरक ऐसे लेखक की जो स्त्री के पक्ष में मजबूती से खड़ा है, उस वक्त के पितृसत्तात्मक समाज के बगैर दबाव में आए । लेकिन नियति कल्प की इस किताब की खास बात यह है उसने सूक्तियों के बहाने प्रेमचंद के लेखकीय वयक्तित्व को बगैर किसी पूर्वग्रह के पाठकों के सामने रखा है ।
डॉ नियति कल्प ने अपनी इस किताब को छह खंडों में बांटा है । पहले अध्याय में सूक्ति का सैद्धांतिक विवेचन किया गया है जिसमें सूक्तियों के महत्व पर प्रकाश डाला गया है । दूसरे अध्याय में प्रेमचंद के साहित्य संसार पर आलोचनात्मक नजर डाली गई है । इस अध्याय को पढ़ने से इस किताब और प्रेमचंद के साहित्य संसार का एक बैकग्राउंडर पाठक को मिलता है । उसके बाद के अध्यायों में प्रेमचंद के कथा साहित्य में सामाजिक सूक्तियां, भावनात्मक सूक्तियां, दार्शनिक और राजनीति सूक्तियां और अन्य सूक्तियों को व्याख्यायित किया गया है । नियति कल्प की यह किताब साहित्य के विद्यार्थियों के अलावा साहित्य में रुचि रखनेवालों पाठकों के लिए एक संदर्भ ग्रंथ की तरह है । लेकिन एक चीज जो इस किताब में मुझे खटकी वो है इसकी भाषा । नियति कल्प भारत के विश्वविद्यालयों के शिक्षकों द्वारा प्रयोग में लाई जानेवाली भाषा से खुद को मुक्त नहीं कर पाई है । दरअसल यह नियति की कमी नहीं है यह कमी हमारी शिक्षण प्रणाली और विश्वविद्यालयों की है । हमारे विश्वविद्यालय के हिंदी विभागों को यह समझने की जरूरत है कि हिंदी एक भाषा के तौर काफी विकसित हो चुकी है । विभाग को भाषा के विकास के साथ कदम से कदम मिलाने की जरूरत है । नियति ने इस किताब में क्लासिक हिंदी का प्रयोग किया है । हलांकि शोध प्रबंध में इसकी ही अपेक्षा की जाती है । हिंदी के विभागों में काम करनेवाले ज्यादातर आलोचकों को ही देख लें तो वो मुक्तिबोध के आगे बढ़ ही नहीं पाते हैं । लौट लौटकर मीराबाई और कबीर तक जा पहुंचते हैं । कुछ आलोचल हिम्मत जुटाते भी हैं तो फिर से मैथिलीशरण गुप्त और सूरदास की तरफ पहुंच जाते हैं । लगता है कि प्राध्यापकीय आलोचना में अतीतोन्मुख होने की होड़ है । मेरी चिंता इस बात को लेकर है कि जिस तरह से निर्मल वर्मा और मुक्तिबोध को नामवर जी जैसे आलोचक मिले क्या नई पीढ़ी को वैसा कोई आलोचक मिल पाएगा । फिलहाल तो ऐसा दिखाई नहीं देता । आज विश्वविद्यालयों में इस बात की सख्त जरूरत है कि युवा शिक्षकों को इस बात के लिए प्रेरति और प्रोत्साहित किया जाए कि वो नई पीढ़ी के लेखकों की रचनाओं को आलोचना की कसौटी पर कसें ।

Saturday, June 29, 2013

पाठकों से दूर होती कहानी

चंद महीने पहले हमारे एक मित्र की कहानी हंस पत्रिका में छपी थी । लंबी कहानी थी और अरसे बाद उनकी कोई कहानी हंस जैसी प्रतिष्ठित साहित्यक पत्रिका में छपी थी लिहाजा वो काफी उत्साहित थे । कहानी छपने के बाद से तकरीबन हर रोज उनके पास देश के कोने कोने से उस पर प्रतिक्रिया आ रही थी । कभी असम से किसी प्रोफेसर का तो कभी पटना और गोरखपुर के किसी बुजुर्ग का । शुरुआती प्रतिक्रियाओं से तो वो उत्साहित रहे लेकिन लगभग एक पखवाड़े बाद ही उनको इस बात का एहसास हुआ कि कहानी पर प्रतिक्रिया देने वाले तकरीबन सभी लोग या तो रिटायर्ड थे या साठ साल की उम्र के आसपास के थे । जब उन्होंने मुझे ये बात बताई तो मैं चौंका ।  मैंने कई कहानीकारों से इस बाबत बात की । पता चला कि उन सबके अनुभव तकरीबन हमारे कहानीकार मित्र जैसे ही थे । सबों के अनुभव में यह एक बात समान रूप से थी कि युवा वर्ग से प्रतिक्रिया नहीं मिलती है । यह स्थिति हिंदी साहित्य के लिए बेहद चिंता की बात है । अगर किसी भी भाषा में उसके साहित्य को युवा वर्ग नहीं पढ़ता है तो इसको लेकर उस भाषा में गंभीर विमर्श के साथ साथ युवाओं तक पहुंचने के प्रयास भी किए जाने चाहिए । हिंदी में इस वक्त कम से कम चार से पांच पीढ़ियों के कथाकार एक साथ सक्रिय हैं । अस्सी पार के कथाकारों से लेकर बिल्कुल टटके कथाकार तक । चार पांच पीढ़ी की एक साथ सक्रियता चौंकानी वाली भी है लेकिन उससे भी ज्यादा चौंकाने वाली है कहानियों को लेकर युवा पीढ़ी की उदासीनता ।
सात नवंबर 1987 को राजस्थान के श्रीडूंगरगढ़ में राजस्थान युवा लेखक शिविर में बोलते हुए मशहूर कथाकार राजेन्द्र यादव ने कहा था- होता क्या है कि हर समय के लेखन की कुछ रूढियां बन जाती है । दुर्भाग्य से कहानी में इस समय कुछ कथा रूढ़ियां बन गई हैं । वे रूढ़ियां जिस तरह की कहानी हमारे सामने लाती हैं, वे एक खास फॉर्मूले के तहतत लिखी हुई होती हैं । वे अनुभव, ऑब्वजर्वेशन, पार्टिसिपेशन, शेयरिंग से आई हुई कहानियां नहीं हैं । चूंकि इस तरह की कहानियां चल रही हैं , इसलिए हैं, एक गरीब मजदूर है, उस पर अत्याचार है और अगर औरत है तो उसपर बलात्कार है , वगैरह वगैरह ।राजेन्द्र यादव चूंकि विचारधारा और प्रतिबद्धता की जंजीर से बंधे हैं इसलिए खुलकर कह नहीं पाए । लेकिन उनका इशारा साफ था कि एक खास विचारधारा और फॉर्मूले में बंधकर हिंदी कहानी पतनोन्मुख हो रही है । आज से तकरीबन छब्बीस साल पहले यह बात कही गई थी लेकिन इतने लंबे कालखंड में भी ना तो रूढियां टूटी और ना ही उसमें कुछ ज्यादा बदलाव आया । इतना अवश्य हुआ कि आंदोलनों के नाम पर कहानी में नारेबाजी बढ़ती चली गई । पहले दलितों के नाम पर उनके भोगे और झेले यथार्थ का चित्रण शुरु हुआ । बाद में स्त्री विमर्श के नाम पर कहानियों में पुरुषों के खिलाफ जमकर गोलियां चली । दोनों आंदोलनों ने फॉर्मूलाबद्ध होकर अपनी चिता खुद सजा ली । दलित लेखन में तो इस कदर फॉर्मूला लेखन हुआ कि हर कहानी में एक उच्च तबके का दबंग होता था जो दलित महिलाओं की अस्मत लूटता था । उसके बाद पीड़ित महिला का लड़का, भाई, चाचा आदि आदि में से कोई एक उच्च वर्ग खासकर ब्राह्मण लड़की से प्यार करता था और उसके साथ के अंतरंग क्षणों में उसके अंदर बदला लेने की खुशी हिलोरें मारती थी । यह प्लॉट सैकडो़ं कहानियों में दोहराया गया । यही हश्र स्त्री विमर्श के नाम पर कलम की बजाए एके सैंतालीस लेकर घूमनेवाली लेखिकाओं ने भी अपनी कहानियों का किया । पहले तो कहानियों में पति का ऐसा चित्रण हुआ जिसने पाठकों को जबरदस्त शॉक दिया लेकिन बाद में जब वही वही बातें दुहराई जाने लगी तो पाठकों में स्वाभाविक तौर पर एक उब आ गई । स्त्री विमर्श के नाम पर चला लेखन रूपी आंदोलन भी दम तोड़ गया और नए पाठकों को जोड़ने में बुरी तरह से विफल रहा ।
अगर हम देखें तो राजेन्द्र यादव ने अपने राजस्थान युवा लेखक शिविर के भाषण में चार चीजों के बारे में ध्यान दिलाया । अनुभव, ऑब्वजर्वेशन, पार्टिसिपेशन और शेयरिंग । इसमें मैं एक और चीज जोड़ना चाहता हूं वो है रिसर्च । इक्कीसवीं शदी के आगाज के साथ उभरे कहानीकारों ने हवा हवाई और फैशन की कहानियां लिखनी शुरू कर दी । कहानीकारों का अनुभव संसार छोटा होता चला गया, सामाजिक सरोकार खत्म होते चले गए । रूस के विघटन के बाद भी हिंदी साहित्य अबतक मार्क्सवाद के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाया है । विचारधारा की जड़े हमारे यहां के सृजनात्मक लेखन में इतनी गहरे तक है कि उसको हिलाना मुश्किल है । आज भी साहित्य की किसी भी विधा में बगैर मार्क्स बाबा के नाम के टैग के आपको गंभीरता से नहीं लिया जाता । यह टैग हिंदी साहित्य के विकास और उसके समय के साथ चलने में सबसे बड़ी बाधा है । विचारधारा के प्रभाव में हुए कहानी लेखन ने पाठकों को एक तरह से उबा दिया क्योंकि हर दूसरी कहानी में एक खास तरह के प्लॉट होते थे और उसका अंत भी तकरीबन वही होता था । शैली में कोई खास फर्क नहीं होता था । विचारधारा के प्रभाव में हुए लेखन से कहानियों से किस्सागोई गायब होती चली गई और उसकी जगह नारेबाजी ने ले ली । हिंदी की काहनियों में यातना, संघर्ष, यथार्थ का बोलबाला हो गया नतीजा क्या हुआ कि कहानियों से पठनीयता गायब होती चली हई । प्रेमचंद पर लिखते हुए आलोचक डॉ रामविलास शर्मा ने कहा था- कथा के आनंद को प्रेमचंद अधूरा नहीं रखते । लेकिन हमारे कहानीकारों ने कथा के आनंद की महत्ता को या तो समझा नहीं या जानबूझकर दरकिनार कर दिया ।
इक्कीसवीं सदी में हमारे समाज में कई बदलाव होने शुरु हुए जो लगातार जारी हैं । आप उसे बाजारवाद का प्रभाव कहें । वैश्विकरण का नतीजा कहें जो चाहे नाम दे लें लेकिन समाज के साथ साथ लोगों की मानसिकता भी बदली । आज की युवा पीढ़ी इतनी स्मार्ट है कि उसे किसी तरह से भी बरगलाया नहीं जा सकता ।  हिंदी के हमारे ज्यादातर कहानीकार समय के साथ कदमताल नहीं कर पाए और लगातार पिछड़ते चले गए । इंटरनेट के युग की भाषा अलग है, उसकी मानसिकता अलग है, प्राथमिकताएं अलग हैं । इंटरनेट के जमाने में जहां प्यार तक के मायने बदल गए, देह को लेकर वर्जनाएं खत्म हो गई, अपनी जिंदगी के फैसले युवा खुद लेने लगे वहां हमारे कहानीकारों की मानसिकता में कोई खास बदलाव नहीं हो पाया । । आज हिंदी के कहानीकारों को उसको समझने की जरूरत है । आज अगर कहानी युवाओं से दूर जा रही है तो उसकी वजह यही सब है । हिंदी के कुछ उत्साही कथाकारों ने इस तरह की भाषा में लिखने की कोशिश की लेकिन वो अतिरेक के शिकार हो गए और संतुलन नहीं बना पाने की वजह से उनका लेखन फूहड़ होता चला गया । हमें इस बात पर गंभीर चिंतन करने की जरूरत है कि आज हिंदी में हमारे पास कोई चेतन भगत या अनुजा चौहान या अद्वैत काला जैसा किस्सागो क्यों नहीं है । हिंदी कहानी में युवा लेखकों की इस वक्त एक बड़ी फौज है लेकिन युवाओं को अपना पाठक बना पाने में सफलता नहीं मिल पा रही है ।
हिंदी कहानी के पाठकों से दूर जाने की एक और वजह है कि हिंदी कहानी यथार्थ और संघर्ष से इतनी ऑबसेस्ड हो गई कि उससे प्रेम गायब सा ही हो गया । सिर्फ युवा ही क्यों हर उम्र के पाठकों को प्रेम कहानी अपनी ओर खींचती है लेकिन लंबे अरसे से हिंदी में कोई बेहतरीन प्रेम कहानी नहीं लिखी गई । सिनेमा ने तो अपने आपको बदल लिया वहां प्रेम की वापसी हुई लेकिन हिंदी कथा साहित्य अब भी एक अदद अच्छी प्रेम कहानी के लिए तरस रहा है । कहानी के पाठकों से दूर जाने की एक और वजह है किताबों के शीर्षक । चाहे वो किसी भी पीढ़ी के कथाकार हों उनकी कहानी संग्रहों के नाम बेहद ही अनाकर्षक होते हैं । अभी अभी लंदन के कथा यूके सम्मान का ऐलान हुआ है वो जिस कहानी संग्रह को मिला है उसका नाम है महुआ घटवारिन तथा अन्य कहानियां । अब आज के युवाओं के लिए घटवारिन शब्द इतना कठिन और अबूझ सा है कि वो इस संग्रह को खरीदने के पहले सौ बार सोचेगा । जरूरत इस बात की है कि युवाओं को अगर साहित्य से जोड़ना है तो हमें उनके मिजाज के हिसाब से लुभावने शीर्षक देने ही होंगे । कहानियों के चरित्र को आधुनिक बनाना ही होगा । कुछ महिला कथाकारों ने इस दिशा में लेखन शुरु किया है लेकिन उनको पाठकों तक पहुंचाने में काफी श्रम करना होगा । कुछ संपादकों ने कहानीकारों को कंधे पर बिठाकर प्रसिद्ध बनाने की कोशिश की, फौरी प्रसिद्धि दिलाने में सफल भी हो गए लेकिन उनको भी लोकप्रियता हासिल नहीं हो पाई । अगर युवा पाठकों को हिंदी कहानी से जोड़ना है तो विचारधारा से मुक्त होकर समय के मिजाज के हिसाब से लेखन करना होगा बरना वो दिन दूर नहीं जब कहानी के पाठकों की तलाश में हमें भटकना पड़े ।

Wednesday, June 26, 2013

रणनीतियों के खतरे

लियो टालस्टॉय के मशहूर उपन्यास वॉर एंड पीस में एक बेहद दिलचस्प प्रसंग है नेपोलियन और रूस की सेनाओं के युद्ध की रणनीति तय करने का वर्णन है । उसी प्रसंग में टालस्टॉय यह कहते हैं कि दोनों की सेना वही काम कर रही थी जिससे उनका खुद का नुकसान हो रहा था, लेकिन दोनों को यह बात समझ में नहीं आ रही थी । नेपोलियन चाहता था कि उसकी सेना सीधे मॉस्को पर कब्जा कर विजय पताका फहराए और वो इसी के मद्देनजर अपनी सारी रणनीति बना रहा था । सारी ताकत इसको हासिल करने में हीं झोंक रहा था । उधर रूस की सेना नेपोलियन को मॉस्को पर कब्जा करने से रोकने में प्राणपन से जुटी थी । सारा फोकस नेपोलियन को मास्को आने से रोकने पर था । दोनों की रणनीति से दोनों का ही नुकसान हुआ था जो बाद में साबित भी हुआ । अगर नेपोलियन रूस की परिधि के क्षेत्रों पर कब्जा कर आगे बढ़ते तो उसकी विजय का अर्थ होता और वो लंबे समय तक कायम रह सकता था । उनका नुकसान नहीं होता । मॉस्को फतह के बाद से ही उसके पतन की कहानी शुरू होती है । जब नेपोलियन की सेना वहां से लौटने लगी तो रास्ते में रूस के मामूली किसानों ने उनका खात्मा कर दिया । क्योंकि नेपोलियन ने मास्को के अलावा कहीं ध्यान ही नहीं दिया था और उसकी सेना मास्को विजय के उपरान्त विजय के मद में इतनी चूर थी कि वो आलसी हो गई थी । उधर रूस की सेना ये आकलन कर पाने में नाकाम रही कि मास्को पर कब्जे से नेपोलियन का नुकसान होगा लिहाजा उसने अपनी पूरी ताकत मास्को को बचाने में लगा दी थी । नतीजा यह हुआ कि पूरी सेना तबाह हो गई । कुछ इसी तरह की ही स्थिति इस वक्त कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की बन रही है । दोनों पार्टियां ऐसी राजनीतिक रणनीतियां बना रही हैं जिनसे दोनों का ही नुकसान हो रहा है । कांग्रेस मोदी को रोकने की रणनीति बनाकर उसके ट्रैप में पड़ गई है उधर भारतीय जनता पार्टी मुसलमानों को रिझाने की रणनीति बनाने में जुटकर अपनी असल ताकत को खोने का खतरा उठा रही है ।  
दरअसल नरेन्द्र मोदी के भारतीय जनता पार्टी के केंद्र में आने से देश की सियासत में जबरदस्त ध्रुवीकरण होना लगभग तय हो गया है । नकेन्द्र मोदी की छवि एक ऐसे कट्टर हिंदूवादी नेता की है जो मुसलमानों से सम्मान की टोपी भी नहीं लेता है इस ध्रुवीकरण का असर आगामी चुनावों पर साफ तौर पर देखने को मिलेगा । इस ध्रुवीकरण को और मजबूती देगा 2002 के गुजरात दंगों का दाग । दंगों के ग्यारह साल बाद अबतक मोदी ने एक बार भी उसपर अफसोस तक नहीं जताया है, माफी की बात तो दूर । मोदी इसे अपनी ताकत समझते हैं लेकिन अब जबकि वो गुजरात के बाहर की राजनीति करेंगे तो यह उनकी कमजोरी बन सकती है । पार्टी के रणनीतिकारों और खुद मोदी अपनी इस कमजोरी से निजात पाने की कोशिश में जुट गए हैं । अभी हाल ही में सबसे पहले भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने जयपुर में अल्पसंख्यकों के समक्ष चुनौतियां विषय पर आयोजित एक सम्मेलन में परोक्ष रूप से मुसलमानों से दो हजार दो के गुजरात दंगों को भूलकर आगे बढ़ने की अपील की । राजनाथ सिंह ने इस मौके का इस्तेमाल मुसलमानों को रिझाने के लिए भी किया । उन्होंने साफ तौर पर कहा कि मुल्क की तरक्की के लिए मुलमानों का साथ चाहिए । राजनाथ ने दावा किया कि जिन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है वहां सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए । आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर राजनाथ सिंह ने मुसलमानों को भारतीय जनता पार्टी पर भरोसा करने का दावत दिया और जोर देकर कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान मुसलमानों के विकास के जितने काम हुए उतने कांग्रेस के साठ सालों के शासन के दौरान नहीं हुए। राजनाथ सिंह के इन बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी की चुनाव प्रचार कमेटी की कमान संभालने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी एक सभा में कुछ इसी तरह के संकेत देते नजर आए । मोदी ने कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टीकरण नीति पर प्रहार करते हुए कांग्रेस पर जोरदार हमला बोला लेकिन साथ ही उन्होंने दिलों को जोड़ने की बात भी कही । मोदी के इस भाषण में अपनी कट्टर हिंदूवादी छवि को बदलने की बेचैनी और बेकरारी साफ दिख रही थी । देश के मुसलमानों के लिए साफ साफ संकेत दिया जा रहा था कि मोदी बदल रहे हैं । दरअसल नरेन्द्र मोदी अब अटल बिहारी वाजपेयी जैसा उदारवादी मुखौटा लगाना चाहते हैं । मोदी को लगने लगा है कि मुस्लिम विरोध की राजनीति लंबे समय तक नहीं चल सकती है । मोदी ने चुनाव प्रचार समिति की कमान संभालने के बाद से ही मुसलमानों को अपने साथ लाने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है । उनके खास सिपहसालार और पार्टी के महासचिव ने उत्तर प्रदेश का प्रभार संभालते ही अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ की बैठक की और मुसलमानों को पार्टी के पाले में लाने की रणनीति पर मंथन किया । अमित शाह ने प्रकोष्ठ के नेताओ से अपने समुदाय में मोदी को लेकर जारी दुश्प्रचार का जोरदार प्रतिकार करने का हुक्म दिया । एक अनुमान के मुताबिक उत्तर प्रदेश में तकरीबन उन्नीस फीसदी मुसलमान हैं जो तकरीबन दो दर्जन लोकसभा सीटों का भविष्य तय करते हैं । मोदी और उनके कारिंदे इस बात को अच्छी तरह से समझते हैं कि उन्हें दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा सीटों का फायदा मिल सकता है । लिहाजा मुसलमानों को रिझाने की रणनीति पर काम शुरू हो गया है ।  
अब भारतीय जनता पार्टी ने मुसलमानों को लेकर एक विजन डॉक्यूमेंट बनाने का ऐलान किया है । इसके लिए पार्टी के उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी की अध्यक्षता में बकायदा एक कमेटी बना दी गई है माना जा रहा है कि ये पहल गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के आशीर्वाद के बाद शुरु हुई है इस विजन डॉक्यूमेंट में मुसलमानों के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक पिछड़ेपन की वजहों और उसको दूर करने के उपायों को बारे में विचार किया जाना है भारतीय जनता पार्टी इस विजन डॉक्यूमेंट को सभी राज्य मुख्यालयों में गाजे बाजे के साथ पेश करने की तैयारी में है । मंशा यह है कि अल्पसंख्यकों के मन में नरेन्द्र मोदी को लेकर जो संशय है उसको दूर किया जाए । इसके अलावा मोदी की छवि को लेकर एनडीए के सहयोगी भी खुद को असहज महसूस करने लगे हैं । नीतीश कुमार तो मोदी की कट्टरवादी छवि को लेकर ही एनडीए से बाहर हो गए। सहयोगियों के छिटकने के बाद से पार्टी की देश में भौगोलिक उपस्थिति भी कांग्रेस की तुलना में काफी कम है । लोकसभा सीटों के आधार पर आंध्र प्रदेश ,पश्चिम बंगाल ,तमिलनाडु, उड़ीसा, केरल, हरियाणा की कुल 174 सीटों में से बीजेपी की उपस्थिति शून्य है । पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के राज्यों को जोड़ दें तो यह आंकड़ा और उपर जाता है । अगर नरेन्द्र मोदी दो हजार चौदह का रण जीतना चाहते हैं तो उन्हें अपनी स्वीकार्यता के साथ साथ  भौगोलिक उपस्थिति बढ़ानी होगी । इसको ही ध्यान में रखते हुए और नए साथियों की तलाश में मुसलमानों को लेकर पार्टी अपनी रणनीति बदल रही है । लेकिन भारतीय जनता पार्टी जिस विचारधारा में दीक्षित है उसकी सोच मुसलमानों को लेकर बिल्कुल साफ है । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बुनियाद ही मुस्लिम विरोध को लेकर है । ऐेसे में सवाल यह उठता है कि भारतीय जनता पार्टी की इस नई चाल पर मुसलमान कितना भरोसा कर पाते हैं । लेकिन मुसलमानों को रिझाने की ज्यादा कोशिश पार्टी को कट्टर हिंदू वोटों से अवश्य दूर ले जा सकती है ।