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Monday, August 31, 2020

किताबों से झांकती राजनीति

जुलाई 1969 में राज्यसभा की सबसे पीछे वाली सीट पर बैठने वाले प्रणब मुखर्जी जब जुलाई 2012 में देश के प्रथम नागरिक बने तब उन्होंने सक्रिय राजनीति को अलविदा कहा। राष्ट्रपति बनने के बाद प्रणब मुखर्जी ने अपनी यादों को संजोना शुरू किया था। प्रणब मुखर्जी के बारे में कहा जाता है कि उनकी याददाश्त हाथी के जैसी थी। वो जिस घटना के साक्षी बनते थे वो उनको याद रहता था, वो जिस कागज को एक बार देख लेते थे वो उनके मस्तिष्क पर छप जाता था। प्रणब मुखर्जी ने अपने राजनीति दौर को तीन पुस्तकों में समेटा, ‘द ड्रामैटिक डिकेड:द इंदिरा गांधी इयर्स’, ‘द टर्बुलेन्ट इयर्स’ और ‘द कोएलीशन इयर्स’। पहली किताब में प्रणब मुखर्जी ने इंदिरा गांधी के दौर के कांग्रेस की राजनीति का सूक्ष्मता से विवरण दिया। 1971 में पाकिस्तान से युद्ध जीतने वाली नायिका किस तरह से चार साल में ही देश में इमरजेंसी लगाने को मजबूर होती हैं, इसके कारण भी गिनाए। प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब में सिद्धार्थ शंकर रे को परोक्ष रूप से आपातकाल लगाने के लिए पृष्ठभूमि बनाने के लिए जिम्मेदार ठहराया।

अपनी दूसरी किताब द टर्बुलेंट इयर्स में उन्होंने 1980 से लेकर 1996 की भारतीय राजनीति का विवरण दिया। राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके बुरे दिन शुरू हो गए थे। यहां उन्होंने एक दिलचस्प टिप्पणी की है कि वो पार्टी और सरकार के काम में इतने व्यस्त हो गए थे कि काम लगानेवाले पर नजर नहीं रख सके थे। जितना जरूरी काम करना है उतना ही अहम काम लगानेवालों पर नजर रखना है।तीनों पुस्तकों में प्रणब मुखर्जी ने बहुत ही शास्त्रीय ढंग से राजनीतिक घटनाक्रम का विवरण पेश किया है, विवादों से दूर । तीसरी किताब द कोएलीशन इयर्स में उन्होंने कांची के शंकराचार्य की गिरफ्तारी के प्रसंग पर कैबिनेट की चर्चा का वर्णन किया है वो भी सपाट। लिखा कि ‘कैबिनेट की बैठक में शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती की गिरफ्तारी की टाइमिंग पर सवाल उठाते हुए गुस्सा हो गया और पूछा कि इस देश में धर्मनिरपेक्षता सिर्फ हिंदुओं के लिए ही है, किसी की हिम्मत है कि वो ईद के समय किसी मुस्लिम धर्मगुरू को गिरफ्तार कर ले?’ इसके बाद फौरन शंकराचार्य की रिहाई के आदेश हो गए। इस तरह के प्रसंग बहुत कम हैं लेकिन कांग्रेस के संविधान, कांग्रेस कार्यसमिति के नियम और अधिकार से लेकर संसदीय नियामवलियों का कब कैसे उपयोग हुआ है उसकी विस्तार से जानकारी है। यह अकारण नहीं था कि जब उनका राष्ट्रपति चुनाव के लिए उन्होंने मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दिया तो उस वक्त 97 मंत्रिमंडलीय समूह के अध्यक्ष थे।    

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ढकोसला


दिल्ली दंगों पर लिखी किताब ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ के प्रकाशन रोकने के प्रकाशक ब्लूम्सबरी के फैसले को लेकर वामपंथी लेखक-पत्रकार या कलाकार आदि बेहद खुश नजर आ रहे थे। उनको लग रहा था कि मोनिका अरोड़ा, सोनाली चीतलकर और प्रेरणा मल्होत्रा की इस किताब का प्रकाशन ब्लूम्सबरी प्रकाशन से रुकवाकर उन्होंने बड़ा तीर मार लिया है। लेकिन वो यह भूल गए कि ये भारत भूमि है जहां शब्दकोश में विकल्पहीनता शब्द नहीं है। ब्लूम्सबरी के प्रकाशन से इंकार के फौरन बाद गरुड़ प्रकाशन ने इस पुस्तक को प्रकाशित करने की घोषणा करते हुए प्री बुकिंग शुरू कर दी। पाठकों का इतना प्यार मिला कि एकबार तो गरुड़ प्रकाशन की वेबसाइट ही क्रैश कर गई। प्रकाशक के आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी को बंपर ओपनिंग मिली और चंद घंटों में ही 15000 प्रतियों की प्री बुकिंग हो गई। यह तो खैर इसकी लोकप्रियता का एक पक्ष है। लेकिन इस पूरी घटना से वामपंथी बौद्धिकों का खोखलापन उजागर हो गया। वामपंथ के ये झंडाबरदार लगातार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर छाती कूटते रहते हैं। हर छोटी बड़ी घटना पर उनको लगता है कि देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित किया जा रहा है और उनको जब ये लगता है तो सोशल मीडिया पर हाथों में तख्ती लेकर फोटो लगाने लगते हैं। इस बार जब उन्होंने दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी को रोकने के लिए अभियान चलाया तो वो ये भूल गए कि इस अभियान से उनकी खुद की पोल खुलने वाली है, उनका दुचित्तापन उजाहर होनेवाले है, उनके चेहरे पर लगा मुखौटा तार-तार होनेवाला है। जब वो इस किताब को रोक कर जश्न मनाने में लगे थे तो वो कुछ सालों पहले का एक वाकया भूल गए थे। भूल तो ये भी गए थे कि उस वक्त उन्होंने क्या क्या कहा था। वामपंथियों की स्मरण शक्ति कमजोर होती है लेकिन वो इतनी कमजोर होती है इसका अंदाजा नहीं था। ज्यादा समय नहीं बीते हैं छह साल पहले की ही बात है। हिंदू धर्म पर कई किताब लिखनेवाली लेखिका वेंडी डोनिगर की किताब- द हिंदूज, एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री को पेंग्विन बुक्स ने भारतीय बाजार से वापस लेने और छपी हुई अनबिकी प्रतियों को नष्ट करने का फैसला लिया । यह फैसला अदालत में उस किताब पर चल रहे केस के मद्देनजर याची के साथ समझौते के बाद हुआ । दरअसल दिल्ली की एक संस्था को इस किताब के कुछ अंशों पर आपत्ति थी और उस संगठन से जुड़े दीनानाथ बत्रा ने दो हजार ग्यारह में इस किताब के कुछ अंशों को हिंदुओं की भावनाएं भड़काने का आरोप लगाते हुए केस दर्ज करवाया था। किताब के खिलाफ याचिका दायर होने के तीन साल बाद आउट ऑफ द कोर्ट एक समझौता हुआ जिसके तहत किताब को वापस लेने का फैसला हुआ । दीनानाथ बत्रा ने पुस्तक को पढ़ने के बाद उसपर अपनी आपत्ति जताई थी। वामपंथियों की तरह नहीं कि बगैर ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ को पढ़े उसके खिलाफ नारे लगाने लगे या षड़यंत्र करने लगे।

वेंडि डोनिगर की पुस्तक छपने के बाद से ही उसपर विवाद शुरू हो गया था, अमेरिका में इसको खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुआ, लंदन में तो लेखिका पर अंडे तक फेंके गए थे। तब पेंग्विन के फैसले के बाद कुछ लोग इसको अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला करार देने लगे थे। कुछ वामपंथियों ने इसको हिंदू संगठनों की कथित फासीवादी मानसिकता करार दिया था। सेक्युलरिज्म के नाम पर अपनी दुकान चलानेवालों को हिंदू संगठनों पर हमलावर होने का बहाना चाहिए होता है। पेंग्विन के उस फैसले में भी उनको संभावना नजर आई थी और वो फासीवाद-फासीवाद चिल्लाने लगे थे। तब भी मैंने सवाल उठाया था कि वर्ष दो हजार नौ में किताब छपी उसके पांच साल बाद इस किताब को वापस लेने का फैसला प्रकाशक ने लिया। इसमे फासीवाद कहां से आ गया था । क्या शांतिपूर्ण तरीके से विरोध जताना और संविधान से प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करना फासीवाद है? यह तो वैश्विक ट्रेंड है कि अगर किसी किताब पर या उसके अंश पर आपत्ति हो तो अदालत का दरवाजा खटखटाया जाता है। वेंडि डोनिगर की पुस्तक के खिलाफ भी याचिकाकर्ता ने भी भारतीय संविधान के तहत मिले अपने नागरिक अधिकारों का उपयोग करते हुए कोर्ट में केस किया था । अदालत में मुकदमा चल ही रहा था कि दोनों पक्षों ने समझौता कर लिया था।


प्रकाशक के उस फैसले के बाद लेखकों के एक बड़े समुदाय में इस बात को लेकर खासी निराशा का प्रदर्शन हुआ था।  विवादास्पद लेखिका अरुंधति राय से लेकर पत्रकार और लेखक सिद्धार्थ वरदराजन आदि भी उस वक्त विवाद में कूदे थे। सिद्धार्थ ने तो पेंग्विन से अपनी किताबों को नष्ट करने और क़ापीराइट वापस करने की मांग भी की थी। सिद्धार्थ वरदराजन ने अपने पत्र में साफ लिखा था कि उन्हें अब पेंग्विन पर भरोसा नहीं रह गया, लिहाजा वो गुजरात दंगों पर लिखी गई उनकी किताब- दे मेकिंग ऑफ अ ट्रेजडी- के अधिकार वापस कर दें । सिद्धार्थ वरदराजन ने तब कहा था कि ‘अगर किसी समूह की भावना इस किताब से आहत हो जाती है और वो भारतीय दंड विधान की धारा 295 के तहत केस कर देता है, तो संभव है कि पेंग्विन उनकी किताब को भी वापस लेने का फैसला कर दे’। पता नहीं उनकी पुस्तकें नष्ट की गई या नहीं लेकिन अब भी सिद्धार्थ वरदराजन की ये किताब पेंग्विन बेच रहा है। ये है इनका विरोध। समय पर घोषणा करो, प्रचार हासिल करो और फिर भूल जाओ। ये है मार्क्सवाद का अर्धसत्य। वामपंथियों का झूठ का प्रचार एक बार होकर रुकता नहीं है वो सतत चलता रहता है। वेंडि डोनिगर के मसले के दो साल बाद पीईएन इंटरनेशनल ने एक रिपोर्ट पेश की थी, इमपोजिंग साइलेंस, द यूज ऑफ इंडियाज लॉज टू सप्रेस फ्री स्पीच। पेन कनाडा, पेन इंडिया और यूनिवर्सिटी ऑफ टोरेंटो के फैकल्टी ऑफ लॉ ने संयुक्त रूप से इस अध्ययन को करने का दावा किया था। पेन इंटरनेशनल कवियों, लेखकों और उपन्यासकारों की एक वैश्विक संस्था, जिसका दावा है कि वो पूरी दुनिया में साहित्य और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए काम करती है। उस रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर स्थिति बेहद विकट है । उस रिपोर्ट की आरंभिक पंक्तियों से ही शोधकर्ताओं के मंसूबे साफ दिखे थे– भारत में इन दिनों असहमत होनेवालों को खामोश कर देना बहुत आसान है...दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए ये स्थिति बेहद शर्मनाक है। भारत में धर्म पर लिखना मुश्किल होता जा रहा है।‘ इस संबध में वेंडी डोनिगर की ही किताब का उदाहरण दिया गया था। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि पेन इंटरनेशनल की रिपोर्ट में ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ के प्रकाशन को रोकने का जिक्र होता है या नहीं। वो इस तरह का शोध प्रस्तुत करते भी हैं या नहीं। अगर इनकी की रिपोर्ट में एक पुस्तक के प्रकाशन को रोकने की इन चालों का जिक्र नहीं होता है तो इनकी साख पर बड़ा सवालिया निशान लगेगा। दरअसल ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ के प्रकाशन का ब्लूम्सबरी ने प्रकाशन नहीं होने देना एक प्रकार की साहित्यिक माफियागीरी भी है। जिस तरह से पाकिस्तानी पिता की संतान लेखक आतिश तासीर ने ब्रिटेन के लेखक विलियम डेलरिंपल को ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ के प्रकाशन को रोकने के लिए सार्वजनिक रूप से बधाई दी उससे भारत के खिलाफ अंतराष्ट्रीय साजिश के भी संकेत मिलते हैं। ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ का प्रकाशन रोका जाना कोई साधारण घटना नहीं है बल्कि इसके दूरगामी असर होंगे। 

Saturday, August 29, 2020

भारतीय भाषाओं की बढ़ेगी ताकत


भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित प्रत्येक भाषा के लिए अकादमी स्थापित की जाएगी, जिसमें हर भाषा के श्रेष्ठ विद्वान एवं मूल रूप से वह भाषा बोलनेवाले लोग शामिल रहेंगे ताकि नवीन अवधारणाओं की सरल किंतु सटीक शब्द भंडार तैयार किया जा सके, तथा निमित रूप से नवीन शब्दकोश जारी किया जा सके (विश्व में कई भाषाओं अन्य कई भाषाओं के सफल प्रयोग सदृश)। इन शब्दकोशों के निर्माण के लिए ये अकादमियां एक दूसरे से परामर्श लेंगी, कुछ मामलों में आम जनता के सर्वश्रेष्ठ सुझावों को भी लेंगी। जब संभव हो, साझे शब्दों को अंगीकृत करने का प्रयास भी किया जाएगा। ये शब्दकोश व्यापक रूप से प्रसारित किए जाएंगे ताकि शिक्षा, पत्रकारिता, लेखन, बातचीत आदि में इस्तेमाल किया जा सके एवं किताब के रूप में तथा ऑनलाइन उपलब्ध हों। अनुसूची आठ की भाषाओं के लिए इन अकादमियों को केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों के साथ परामर्श करके अथवा उनके साथ मिलकर स्थापित किया जाएगा। इसी प्रकार व्यापक पैमाने पर बोली जानेवाली अन्य भारतीय भाषाओं की अकादमी केंद्र अथवा/और राज्य सरकारों द्वार स्थापित की जाएगी।‘ यह कहा गया है राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बिन्दु संख्या 22.18 में। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में यह एक बेहद महत्वपूर्ण कदम है। हमारे देश में सक्रिय भाषा अकादमियों की आवश्यकता है और ये उस आवश्कता पूर्ति की दिशा में उठाया गया एक कदम साबित हो सकता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लागू होने के बाद इसका देशव्यापी असर होगा।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भाषा अकादमियों के बनाने के प्रस्ताव पर विचार करें तो यह बहुत ही व्यावहारिक विचार लगता है। इस तरह की बात पहले भी हो चुकी है जब 1948 में राधाकृष्णन कमीशन ने भी कुछ इसी तरह का प्रस्ताव दिया था। राजभाषा आयोग के सुझावों में भी भाषा अकादमियों की बात की गई थी। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने भी सितंबर 1959 में राज्यसभा में दिए अपने भाषण में भी कहा था कि ‘मुझे इस बात की नितांत आवश्कता दिखती है कि हिंदी समेत भारत की भाषाओं की एक नेशनल अकादमी बना दी जाए और उसका प्रधान कार्यालय हैदराबाद में रखा जाए। इस अकादमी के जरिए हम प्रत्येक भाषा-क्षेत्र में वहां की भाषा को आगे बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। इस अकादमी के जरिए हम प्रत्येक भाषा क्षेत्र में द्विभाषी, त्रिभाषी विद्वान तैयार कर सकते हैं और भाषाओं के भीतर भावात्मक एकता लाने के लिए सभी उपायों को काम में ला सकते हैं।‘ कई बार भाषाओं के नेशनल अकादमी की बात होती है तो लोग कहते हैं कि साहित्य अकादमी है तो, लेकिन भ्रमित नहीं होना चाहिए। साहित्य अकादमी तो भारतीय भाषाओं में रचे साहित्य के लिए है भाषा के लिए नहीं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भाषा को लेकर बहुत महत्वाकांक्षी बातें की गई हैं तो उम्मीद की जा सकती है कि कुछ ठोस भी होगा। हलांकि भाषाई अकादमियों की स्थापना को लेकर चुनौतियां बहुत अधिक हैं।

चुनौतियां इस वजह से कि स्वतंत्रता के बाद देशभर में भाषा को लेकर कई तरह के संस्थान केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर बनाए गए। कई राज्यों में अलग अलग-अलग भाषाओं को लेकर अकादमियां हैं। उत्तर प्रदेश को ही लें तो वहां आठ भाषाई अकादमियां और संस्थान कार्य कर रहे हैं। जिनमें हिंदी, संस्कृत, उर्दू, सिंधी, पंजाबी, हिंन्दुस्तानी भाषाओं की अकादमियां हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में एक भाषा संस्थान भी है जिसका उद्देश्य ‘भारतीय भाषाओं और उसके साहित्य का अभिवर्धऩ है।‘ इस तरह से बिहार में मैथिली, अंगिका, भोजपुरी और मगही को लेकर भाषाई अकादमियां हैं। बिहार के इन अकादमियों की हालत पर किसी प्रकार की टिप्पणी करना व्यर्थ है। बिहार के भाषाई संस्थान संसाधनों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनके पा न तो अपेक्षित कर्मचारी हैं न ही धन। राजस्थान में भी आधा दर्जन भाषाई अकादमियां कार्य कर रही हैं, जिनमें राजस्थान साहित्य अकादमी, भाषा और संस्कृति अकादमी,संस्कृत अकादमी,उर्दू अकादमी, सिंधी अकादमी,पंजाबी अकादमी प्रमुख हैं। यहां क्या काम हो रहा है इसके बारे में जानना भी दिलचस्प होगा। राजस्थान में जो सबसे महत्वपूर्ण काम हुआ वो सीताराम लालस ने किया जिन्होंने दस खंडों में राजस्थानी का पहला शब्दकोश बनाया। सीताराम लालस मशहूर कोशकार और भाषाकर्मी थे। उसके बाद छिटपुट काम हुए। दिल्ली की हिंदी अकादमी भी आयोजनों में ही व्यस्त रहती है और अगर उससे समय मिलता है तो साहित्य पर काम होने लगता है। इन भाषाई अकादमियों में जो गड़बड़ियां हुईं वो इनके कर्ताधर्ताओं ने ही कीं। उन्होंने भाषा और साहित्य का घालमेल कर दिया। जिन संस्थाओं को काम भाषा को मजबूत करना और भाषा के क्षेत्र में नवाचार करना था वो साहित्य सेवा में जुट गए। साहित्यिक पत्रिकाएं निकालने लगे, साहित्य उत्सव होने लगे जिसमें भाषा से अधिक साहित्य के प्रश्नों पर चर्चा होने लगी। इससे भाषा के क्षेत्र में काम नहीं या बहुत कम हो सका। साहित्यिक कृतियों पर पुरस्कार देने लगे। इसके अलावा इन संस्थाओं में योग्य व्यक्तियों की नियुक्तियां भी बहुत कम हुईं। भाषाई अकादमियों के नाम पर कांग्रेस शासनकाल में जिन संस्थाओं का गठन किया गया उनमें से ज्यादातर अपने समर्थकों को फिट करने की मंशा थी, कागज पर लिखित उद्देश्य चाहे कुछ भी रहा हो।

केंद्रीय स्तर भी भाषा के संवर्धन के कई संस्थान हैं। मैसूर स्थित भारतीय भाषा संस्थान अपनी स्थापना के पचास साल पूरे कर चुका है। इस संस्थान की स्थापना भारतीय भाषाओं के विकास को समन्वित करने के लिए वैज्ञानिक अध्ययनों के माध्यम से भारतीय भाषाओं की मूलभूत एकता लाने के लिए की गई थी। मैसूर स्थित इस संस्थान ने अबतक अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए क्या किया इसपर विचार करना चाहिए। इसके अलावा भारतीय भाषाओं के लिए भी अलग अलग संस्थान हैं। तमिल के लिए चेन्नई स्थित सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ क्लासिकल तमिल है। हिंदी के लिए तो दिल्ली में केंद्रीय हिंदी निदेशालय है, आगरा में केंद्रीय हिंदी संस्थान हैं। उर्दू और सिंधी के लिए केंद्रीय स्तर पर राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद, राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद हैं। इस तरह के दर्जनों संस्थान देशभर में हैं। जरूरत है कि इन सभी संस्थानों के क्रियाकलापों पर विचार किया जाए और इन सारी संस्थाओं को एक केंद्रीय स्वरूप प्रदान किया जाए। एक ही भाषा के लिए जो अलग अलग संस्थाएं काम कर रही हैं और जिनके कामों के बीच दोहराव है उनका पुनर्गठन किया जाए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए भाषा संस्थाओं का पुनर्गठन बेहद आवश्यक है। भाषा अकादमियों के साथ-साथ जरूरत इस बात की भी है कि एक ऐसे केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए जहां सभी भारतीय भाषाएं और उसकी उपभाषाओं के संरक्षण और संवर्धन पर काम किया जा सके। यह एक ऐसा उपक्रम होगा जिसमें एक ही परिसर में सभी भारतीय भाषाओं के विद्वान, शोधार्थी और छात्र उपस्थित रहेगें। इसका लाभ यह होगा कि भाषाओं के बीच समन्वय बढ़ेगा, एक दूसरे की भाषा के महत्वपूर्ण गुणों और शब्दों को जानने का अवसर भी मिलेगा। दो तीन वर्ष पूर्व भारतीय भाषाओं के विश्वविद्लाय की स्थापना को लेकर एक एक गंभीर कोशिश हुई थी लेकिन पता नहीं मंत्रालय या सरकारी फाइलों में वो कोशिश कहां गुम हो गई। अब जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने की बात हो रही है तो जरूरत है कि भारतीय भाषा के विश्वविद्यालय की स्थापना के प्रस्ताव को भी निकालकर फैसला करना चाहिए। अगर ऐसा हो पाता है तो सचमुच आजादी के बाद भारतीय भाषाओं को मजबूती प्रदान करने की एक गंभीर कोशिश होगी जिसका परिणाम देश को मजबूक करेगा, राष्ट्रीय एकता को मजबूत करेगा।      

Saturday, August 22, 2020

निष्पक्षता की आड़ में कुंठा- प्रदर्शन

फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत को लेकर हिंदी फिल्मों की दुनिया लगातार चर्चा में है। फिल्मी दुनिया के दांव पेंच, सितारों की निजी जिंदगी तक की बातें सामने आ रही हैं। फिल्मी सितारों के बीच के अंतरंग मैसेज भी सार्वजनिक होकर चर्चित हो रहे हैं। फिल्मों से जुड़े लोग इस या उस पक्ष में होने के संकेत अपने बयानों से दे रहे हैं। कुछ लोग बयानों से अपनी कुंठा का सार्वजनिक प्रदर्शन भी कर रहे हैं। इसी तरह का एक बयान ताजा-ताजा बयानवीर बने नसीरुद्दीन शाह ने भी दिया। उन्होंने इशारों में कंगना रनौत को अर्धशिक्षित कह डाला। एक टीवी चैनल पर साक्षात्कार में नसीरुद्दीन ने कहा कि उनका भारत की कानून व्यवस्था और न्यायिक प्रणाली में विश्वास है और कोई भी व्यक्ति किसी अर्धशिक्षित सितारे की राय जानने में रुचि नहीं रखता है। नसीरुद्दीन शाह के इस बयान पर कंगना ने सवाल खड़ा किया और पूछा कि क्या नसीर यही बात प्रकाश पादुकोण या अनिल कपूर की बेटी के लिए कह सकते हैं। यह एक अलग लेकिन वैध मुद्दा है जो कंगना उठा रही है, पहले भी वो इस तरह के मुद्दे पर मुखर रही हैं। नसीरुद्दीन शाह का किसी को भी अर्धशिक्षित कहना यह बताने के लिए काफी है कि वो अहंकार की ऊंची मीनार पर खड़े होकर दूसरों को हेय दृष्टि से देख रहे हैं। पिछले साल भी जब नागरिकता संशोधन कानून को लेकर उनसे सवाल जवाब हुआ था तब भी उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर निहायत ही व्यक्तिगत आक्षेप किया था। उस वक्त उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री कभी छात्र रहे नहीं इसलिए वो छात्रों की बात नहीं समझ सकते हैं या उनके मन में छात्रों के लिए करुणा नहीं है। वो मानते हैं कि मौजूदा हुकूमत में कोई भी बुद्धिजीवी नहीं है, लिहाजा वो बुद्धिजीवियों की महत्ता को नहीं समझ सकते है। कहते हैं न कि लोग जोश में होश खो बैठते हैं या क्रोध विवेक को हर लेता है, नसीर भी इसके शिकार हैं। वो तो प्रधानमंत्री की डिग्री तक देखने की ख्वाहिश जताने लगे थे और अपने को हिंदी फिल्मों के मानसिक रूप से विपन्न एक निर्देशक की इच्छा के साथ जोड़ रहे थे। यह उस व्यक्ति का अहंकार ही बोल रहा था। 

पिछले कुछ सालों से नसीर इस बात की सफाई भी देने लगे हैं कि वो ये बात एक मुसलमान के तौर पर नहीं कह रहे हैं। इतना कहने के बाद वो अपनी भड़ास निकालने लगते हैं, वैसी भड़ास जिसमें तथ्य कम अहंकार अधिक रहता है। दरअसल नसीर जैसे लोगों के साथ दिक्कत ये हुई कि उनकी फिल्मों में उनके अभिनय को लेकर इतनी बड़ी-बड़ी बातें हो गईं कि वो खुद को बहुत ही ऊंचे पायदान पर देखने लगे। दरअसल 1970 में जब समांतर या कला फिल्मों की शुरुआत हुई तो उसमें काम करनेवाले अभिनेता अभिनेत्री को पता नहीं किस वजह से बुद्धिजीवी भी मान लिया गया। नसीर भी उनमें से एक हैं। फिल्मों से हटकर जब भी नसीर बात करते हैं तो उनकी बातें फूहड़ और चालू लगती हैं। वो वही बातें करते हैं जिनका आधार सोशल मीडिया पर चलनेवाली आधारहीन और तथ्यहीन बातें होती हैं। आपको यकीन न हो तो नागरिकता संशोधन कानून या अन्य मसलों पर उनका साक्षात्कार देख लें। वास्तविकता सामने आ जाएगी। 

नसीरुद्दीन शाह की ही तरह एक शायर हैं नाम है मुनव्वर राना। अभी राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उन्होंने अपनी कुंठा सार्वजनिक कर दी और कहा कि अदालतों में तो फैसले होते हैं, इंसाफ नहीं। जबकि राम मंदिर के मामले पर तो इंसाफ की जरूरत थी। सुप्रीम कोर्ट के राम मंदिर पर दिए फैसले से वो इतने कुपित थे कि उन्होंने फैसला सुनानेवाले खंडपीठ में शामिल सुप्रीम कोर्ट के उस वक्त के चीफ जस्टिस रंजन गगोई पर बेहद संगीन इल्जाम लगा दिए। उन्होंने कहा कि रंजन गगोई बिक गए। जैसा कि उपर कहा गया कि बहुधा क्रोध विवेक को हर लेता है वहीं मुनव्वर राना के मामले में भी हुआ और वो एक ऐसी बात बोल गए जो उनकी सामंती मानसिकता को भी उजागर कर गया। उन्होंने कहा कि वो तो इतने में बिक गए जितने में तवायफें नहीं बिकतीं। मुनव्वर राना का ये निहायत ही घटिया बयान है, जिसकी भर्त्सना होनी चाहिए थी। जो लोग महिला अधिकारों की बातें करते हैं वो खामोश रहे, हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श का झंडा लहरानेवाली लेखिकाएं भी इस मसले पर आश्चर्यजनक रूप से खामोश रहीं। मुनव्वर राना के इस बयान में एक खास चीज जो रेखांकित की जानी चाहिए वो ये कि जब वो राम मंदिर के फैसले पर बोल रहे थे तो उन्होंने भी ये कहा कि वो खरा-खरा बोलते हैं जिससे हिंदू भी नाराज होते हैं और मुसलमान भी। परोक्ष रूप से वो ये कहना चाह रहे थे कि वो जो कह रहे हैं वो एक मुसलमान के तौर पर नहीं कह रहे हैं बल्कि उनकी आवाज को एक स्वतंत्र आवाज समझी जानी चाहिए। यही बात नसीरुद्दीन शाह भी कहते हैं कि वो एक मुसलमान के तौर पर नहीं बोल रहे हैं। 

एक मुसलमान के तौर पर नहीं बोलने का दावा करने की बात को रेखांकित करते हुए अगर विश्लेषित करें तो पाते हैं कि इन दिनों ये बात आम हो गई है। कुछ कहने के पहले ये डिस्क्लेमर जरूर दिया जाता है। बावजूद इस पूर्वकथन के इनकी बातों से जो ध्वनित होता है वो यही है कि वो पक्के तौर पर एक मुसलमान होने के नाते ही ऐसी बातें कर रहे हैं, चाहे वो नसीरुद्दीन शाह हों या मुनव्वर राना या फिर दस साल तक देश के उप राष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी। और अगर एक मुसलमान होने के तौर पर ये बातें कह भी रहे हैं तो उसमे हर्ज क्या है। ये देश स्वतंत्र देश है और हर किसी को चाहे वो किसी भी मजहब या धर्म का हो उसको अपनी बात कहने का अधिकार है। दरअसल ये मौजूदा हुकूमत की आलोचना करने के पहले ये जताना चाहते हैं कि वो निष्पक्ष होकर अपनी बात कह रहे हैं। पर इनकी मुखरता इनके इस दावे की पोल खोल देता है। हाल के दिनों में नसीरुद्दीन शाह को अपने बेटों को लेकर डर लगता है, लेकिन नसीरुद्दीन शाह को तब डर नहीं लगा था जब मुंबई में बम धमाके हुए थे, उनको तब भी डर नहीं लगा था जब यूपीए के शासनकाल में नियमित अंतराल पर देश के इलग अलग शहरों में बम धमाके हो रहे थे। तब उनकी बेबाकी को लकवा मार गया था। दरअसल अगर नसीर और राना जैसे लोगों के वक्तव्यों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करें तो ये साफ तौर पर लगता है कि वो इस बात से आहत हैं कि इस देश का बहुसंख्यक अब अपनी बात मजबूती से रखने लगा है। बहुसंख्यकों की बात को और उनकी भावनाओं का सरकार सम्मान करने लगी है। बहुसंख्यकों के अपने हिस्से की बात करना उनको सांप्रदायिकता लगता है। यही मानसिकता उनसे ये कहवाती है कि वो एक मुसलमान के तौर पर नहीं बोल रहे हैं। इसके अलावा ये लोग जिस तरह से प्रतिक्रिया देते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि वो मोदी सरकार के तीन तलाक खत्म करने से लेकर संविधान के अस्थायी अनुच्छेद 370 खत्म करने के फैसले से भी खफा हैं। इसी को लेकर अपनी नाराजगी का प्रदर्शन वो कभी मोदी पर भड़ास निकालकर करते हैं तो कभी उनके मंत्रियों पर। पर इससे साख न तो मोदी की खराब होती है न उनके मंत्रियों की, बल्कि प्रतिष्ठा कम होती है नसीर और राना जैसों की। 

Saturday, August 15, 2020

प्रमाणन से मुक्त होती फिल्में

फिल्म ‘गुंजन सक्सेना, द कारगिल गर्ल’ की प्रशंसा हो रही है। ये फिल्म भारतीय वायुसेना की पहली महिला हेलीकॉप्टर पॉयलट गुंजन सक्सेना के जीवन पर आधारित है। फिल्म में सितारों के अभिनय आदि पर बात हो ही रही थी कि भारतीय वायुसेना ने इस फिल्म के कई दृष्यों और संवादों को लेकर आपत्ति जता दी। वायुसेना ने अपनी आपत्तियों को लेकर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को एक पत्र भी लिखा जिसमें साफ तौर पर फिल्म में वायुसेना की नकारात्मक छवि पेश करने के आरोप का उल्लेख किया गया है। इस पत्र को नेटफ्लिक्स और धर्मा प्रोडक्शन को भी भेजा गया है। धर्मा ने इस फिल्म को बनाया है और नेटफ्लिक्स पर प्रदर्शित की गई। इस फिल्म में गुंजन सक्सेना जब उधमपुर एयरबेस पर पहुंचती हैं तो उनको कदम दर कदम इस बात का एहसास होता या कराया जाता है कि वो महिला हैं, कई बार प्रत्यक्ष तो कई बार परोक्ष रूप से। उधमपुर एयरबेस में गुंजन सक्सेना के रहने के दौरान की घटनाओं और स्थितियों के फिल्म में चित्रण पर वायुसेना को आपत्ति होगी। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी इस विवाद पर टिप्पणी की। इसके पहले भी सेना और सैनिकों के चित्रण को लेकर विवाद खड़ा हुआ है। मुकदमे भी हुए। इन विवादों को देखते हुए 27 जुलाई 2020 को रक्षा मंत्रालय ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को एक पत्र लिखा। इस पत्र में रक्षा मंत्रालय ने बोर्ड को लिखा है कि उनकी जानकारी में ऐसी बातें आई हैं कि कुछ फिल्मों और वेब सीरीज में सेना की नकारात्मक छवि दिखाई पेश की जा रही है। इसलिए रक्षा मंत्रालय को ये अपेक्षा है कि फिल्मों और वेब सीरीज के निर्माताओं को सलाह दें कि वो अपनी फिल्मों या वेब सीरीज में सेना के बारे में दिखाने के पहले रक्षा मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाण पत्र लें। उनको ये सलाह देने की अपेक्षा भी की गई कि सेना की नकारात्मक छवि दिखाने से बचें। सेना ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को पत्र लिखकर अपनी अपेक्षाएं साझा कर लीं लेकिन रक्षा मंत्रालय से एक चूक हो गई।

रक्षा मंत्रालय से सक्षम अधिकारियों को ये पता होना चाहिए था कि वेब सीरीज या ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म पर दिखाए जाने वाली फिल्में या अन्य सामग्रियां केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के दायरे में नहीं आती हैं। इस पत्र का कोई अर्थ है भी नहीं। 27 जुलाई को रक्षा मंत्रालय ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को पत्र लिखा और 12 अगस्त को गुंजन सक्सेना को नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई जिसके कुछ दृश्यों पर भारतीय वायुसेना को आपत्ति है। इस फिल्म पर भारतीय वायुसेना की आपत्तियों के विश्लेषण से दो बातें सामने आती हैं, पहली तो ये कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने रक्षा मंत्रालय की अपेक्षा के अनुसार सभी फिल्म और वेब सीरीज प्रोड्यूसर्स को सलाह नहीं दी कि वो सेना या वायुसेना या नौसेना के बारे में किसी भी तरह के कटेंट को सार्वजनिक करने से पहले अनापत्ति प्रमाण पत्र लें। दूसरी बात ये हो सकती है कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने सलाह दी हो लेकिन निर्माताओं को ये आवश्यक नहीं लगा हो क्योंकि ऐसा कोई कानून तो है नहीं। ओटीटी पर दिखाई जानेवाली फिल्मों के निर्माता-निर्देशकों को इस बात के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है कि वो भारतीय सेना के बारे में कुछ भी दिखाने के पहले सक्षम अधिकारियों से अनापत्ति प्रमाण पत्र लें। कोविड की वजह से सिनेमाघर बंद हैं और तमाम फिल्मों का प्रदर्शन ओटीटी प्लेटफॉर्म पर हो रहा है। ऐसे में तो इन फिल्मों के लिए भी किसी प्रकार की प्रमाणन की कोई आवश्यकता रही नहीं। फिल्म प्रमाणन बोर्ड तो उन फिल्मों को प्रमाणित करता है जिनका सामूहिक प्रदर्शन होना होता है चाहे वो सिनेमाघरों में हो या फिर किसी फिल्म फेस्टिवल में। फिल्मों का अगर सार्वजनिक और सामूहिक प्रदर्शन होना होता है तो रक्षा मंत्रालय या भारतीय सेना को उसके रिलीज से पहले देखने का अधिकार है। रक्षा मंत्रालय को अगर कोई शिकायत हो तो उसको इलेक्ट्रानिक और प्रोद्योगिकी मंत्रालय को लिखना चाहिए था।

इस पूरे प्रकरण से एक बार फिर से स्पष्ट होता है कि ओटीटी पर चलनेवाले कंटेंट को लेकर नियमन की आवश्यकता है। कोरोना काल में ओटी प्लेटफॉर्म मनोरंजन का एक अनिवार्य अंग हो गया है। सिनेमा हॉल के खुलने की अनिश्चितता के बीच इस माध्यम की अनिवार्यता स्थायित्व लेती नजर आ रही है। सभी बड़े बजट की फिल्में यहां रिलीज हो रही हैं। इस उपक्रम का आकार भी दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। इस स्तंभ में पहले भी कई बार संकेत दिया जा चुका है कि मुनाफे के लिए ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाए जानेवाले कंटेंट में मर्यादा की सारी सीमाएं तोड़ी जा रही हैं। अश्लीलता और मनोरंजन का भेद मिट सा गया है। अभी हाल ही में आए आंकड़ों ने इस बात की पुष्टि भी की है। एक वेब सीरीज है जिसका नाम है मस्तराम। एक एजेंसी के आंकड़ों के मुताबिक इस वेब सीरीज को तीन जुलाई को एक दिन में एक करोड़ दस लाख से अधिक दर्शकों ने देखा। इसके मुताबिक इसको उस दिन तक छत्तीस करोड़ से अधिक लोग देख चुके हैं। ये वेब सीरीज तमिल, तेलुगू और हिंदी में उपलब्ध है और ये संख्या इन तीन भाषाओं के दर्शकों को मिलाकर है। निर्माता इस वेब सीरीज को भले ही वयस्क की श्रेणी में डालकर पेश कर रहे हों लेकिन ये है तो अश्लील ही। मस्तराम के नाम से कुछ वर्षों पूर्व पीली पन्नी में लपेटकर इरोटिक पुस्तकें बेची जाती थीं लेकिन अब ये खेल खुलकर चल रहा है। कहीं न कहीं दर्शक संख्या मुनाफे से जुड़ता है।

एक और आंकड़े पर गौर करना चाहिए। मैंने एक दिन नेटफ्लिक्स के कस्टमर केयर पर फोन किया तो बातों बातों में कस्टमर केयर एक्जीक्यूटिव ने बताया कि कोरोना काल में पिछले तीन महीनों में नेटफ्लिक्स के डेढ करोड़ एप डाउनलोड हुए हैं। ये इतनी बड़ी संख्या है,जिसकी कल्पना नेटफ्लिक्स के कैलिफोर्निया में बैठे कर्ताधर्ताओं ने सपने में भी नहीं की होगी। इस संख्या में उनको व्यापक संभावना नजर आ रही है, बहुत बड़ा बाजार नजर आ रहा है और इसके साथ ही मुनाफे का एक ऐसा फॉर्मूला भी उनके हाथ लग गया है जिसमें जोखिम कम है। अगर हम सिर्फ इस डेढ़ करोड़ की संख्या को ही लें और उसको सबसे कम यानि 199 रु प्रतिमाह की सदस्यता शुल्क के आधार पर गणना करें तो करीब तीन अरब रुपए प्रतिमाह का कारोबार होता दिखता है। ये तो सिर्फ इन तीन महीनों में बने नए ग्राहकों के न्यूनतम सदस्यता शुल्क के आधार पर कारोबार का टर्न ओवर है। अगर इसमें पुराने ग्राहकों की संख्या भी जोड़ लें तो सालभर में अरबों का टर्नओवर हो जाता है। अगर कारोबार इतना बड़ा है तो मुनाफा की कल्पना भी की ही जा सकती है। ये तो सिर्फ एक प्लेटफॉर्म का आंकड़ा है। अगर सभी को जोड़ दिया जाएगा तो इसका कारोबार हिंदी फिल्मों के सालाना कारोबार से कहीं अधिक होगा। देश में सभी व्यवसाय को नियंत्रित करने के लिए अलग अलग तरह के नियमन हैं लेकिन ये एक ऐसा कारोबार है जहां मुनाफा कमाने के लिए कुछ भी करने की छूट अबतक प्राप्त है चाहे वो सामाजिक तानेबाने को तोड़ने वाले संवाद हों, सांप्रदायिकता को बढ़ाने वाले बोल हों या फिर भारतीय सेना की नकारात्मक छवि पेश करने वाले दृश्य हों। जबकि भारतीय सेना को भी इस अराजकता ने अपनी जद में ले लिया है तब तो अपेक्षा करनी चाहिए कि इसके नियमन को लेकर प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

Saturday, August 8, 2020

देश की संस्कृति के आधार राम

अयोध्या में राम जन्मभूमि पर बननेवाले भव्य मंदिर के भूमिपूजन के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण के निहितार्थों पर पर्याप्त चर्चा होनी चाहिए। अगर गंभीरता से विचार किया जाए तो पांच अगस्त को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सिर्फ मंदिर के विधिवत निर्माण की शुरुआत ही नहीं की उन्होंने भारतीय संस्कृति के बारे में व्याप्त भ्रांतियों को दूर करने की नींव भी डाली। भारतीय संस्कृति को राम से जोड़कर नरेन्द्र मोदी ने उन उदारवादियों की सोच को भी सही दिशा में लाने की कोशिश की जो राम को धर्म से जोड़कर देखते और व्याख्यायित करते रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी का अयोध्या में दिया गया भाषण कई मायनों में ऐतिहासिक है। मोदी ने जय श्रीराम के नारे के स्थान पर सियावर रामचंद्र की जय या जय सियाराम का उद्घोष करके एक और संदेश दिया। ऐसा संदेश जो अपेक्षाकृत समावेशी है। राम जन्मभूमि आंदोलन के समय जय श्रीराम का उद्घोष किया जाता रहा था, बाद में भी जय श्रीराम का ही नारा लगता रहा। कुछ लोगों को प्रधानमंत्री का सियावर रामचंद्र कहना प्रतीकात्मक लग सकता है, लेकिन संस्कृति के सवालों से जब मुठभेड़ होती है तो प्रतीकों का भी बहुत अधिक महत्व हो जाता है। अपने पूरे भाषण के दौरान नरेन्द्र मोदी ने राम के सांस्कृतिक पक्ष को सामने रखा और स्पष्ट रूप से ये संदेश दिया कि भारत में किसी भी व्यक्ति का धर्म कुछ भी हो सकता है लेकिन हम सबकी संस्कृति तो राम ही है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम। वो कहते हैं कि ‘राम हमारे मन में गढ़े हुए हैं, हमारे भीतर घुल-मिल गए हैं। कोई काम करना हो, तो प्रेरणा के लिए हम भगवान राम की ओर ही देखते हैं। आप भगवान राम की अद्भुत शक्ति देखिए। इमारतें नष्ट कर दी गईं, अस्तित्व मिटाने का प्रयास भी बहुत हुआ, लेकिन राम आज भी हमारे मन में बसे हैं, हमारी संस्कृति का आधार हैं। श्रीराम भारत की मर्यादा हैं, श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं।‘

अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी साफ तौर पर संस्कृति और धर्म को अलग करके देखते हैं। जब वो विदेशों का उदाहरण देते हैं तो ये और भी स्पष्ट होता है, ‘दुनिया में कितने ही देश राम के नाम का वंदन करते हैं, वहां के नागरिक, खुद को श्रीराम से जुड़ा हुआ मानते हैं। विश्व की सर्वाधिक मुस्लिम जनसंख्या जिस देश में है, वो है इंडोनेशिया। वहां हमारे देश की ही तरह ‘काकाविन’ रामायण, स्वर्णद्वीप रामायण, योगेश्वर रामायण जैसी कई अनूठी रामायणें हैं। राम आज भी वहां पूजनीय हैं। कंबोडिया में ‘रमकेर’ रामायण है, लाओ में ‘फ्रा लाक फ्रा लाम’ रामायण है, मलेशिया में ‘हिकायत सेरी राम’ तो थाईलैंड में ‘रामाकेन’ है! आपको ईरान और चीन में भी राम के प्रसंग तथा राम कथाओं का विवरण मिलेगा। श्रीलंका में रामायण की कथा जानकी हरण के नाम सुनाई जाती है, और नेपाल का तो राम से आत्मीय संबंध, माता जानकी से जुड़ा है। ऐसे ही दुनिया के और न जाने कितने देश हैं, कितने छोर हैं, जहां की आस्था में या अतीत में, राम किसी न किसी रूप में रचे बसे हैं! आज भी भारत के बाहर दर्जनों ऐसे देश हैं जहां, वहां की भाषा में रामकथा, आज भी प्रचलित है।‘ उनके वक्तव्य के इस अंश के निहितार्थ को अगर समझें तो ये साफ होता है कि राम और राम का चरित्र उन देशों में भी संस्कृति का आधार हैं जिन देशों का धर्म या मजहब अलग है। इस्लाम को मानने वाले देशों में भी राम वहां की संस्कृति के आधार हैं। कहना न होगा कि प्रधानमंत्री ये साफ कर रहे हैं कि किसी का धर्म इस्लाम हो सकता है, कोई ईसाई धर्म में विश्वास रख सकता है लेकिन अगर वो भारत में रहता है तो उसकी संस्कृति राम है। राम को सिर्फ धर्म विशेष से जोड़ना उचित नहीं है वो तो भारत के हर धर्म के लोगों से जुड़े हैं, उनके जीवन में हैं। और यही तो संस्कृति है। कहा भी गया है कि संस्कृति को हम लक्ष्णों से जान सकते हैं, उसको परिभाषित करना जरा मुश्किल है।

यह भी कहा गया है कि संस्कृति वह गुण है जो हम सब में व्याप्त है जबकि सभ्यता वह चीज है जो हमारे पास है। तो राम तो हर भारतवासी के अंदर व्याप्त है, अपने अलग अलग रूपों में चाहे वो राम की मर्यादा हो, राम की नीति हो या फिर राम का नाम। दैनिंदिन अभिवादन से लेकर आचार व्यवहार तक में। तभी तो अपने भाषण में मोदी जोर देकर कहते हैं कि ‘जीवन का ऐसा कोई पहलू नहीं है, जहां हमारे राम प्रेरणा न देते हों। भारत की ऐसी कोई भावना नहीं है जिसमें प्रभु राम झलकते न हों। भारत की आस्था में राम हैं, भारत के आदर्शों में राम हैं! भारत की दिव्यता में राम हैं, भारत के दर्शन में राम हैं! हजारों साल पहले वाल्मीकि की रामायण में जो राम प्राचीन भारत का पथ प्रदर्शन कर रहे थे, जो राम मध्ययुग में तुलसी, कबीर और नानक के जरिए भारत को बल दे रहे थे, वही राम आजादी की लड़ाई के समय बापू के भजनों में अहिंसा और सत्याग्रह की शक्ति बनकर मौजूद थे! तुलसी के राम सगुण राम हैं, तो नानक और कबीर के राम निर्गुण राम हैं।’ जब वो वाल्मीकि के रामायण से लेकर कबीर के निर्गुण राम तक आते हैं या फिर बापू के राम की बात करते हैं तो वो एक परंपरा को रेखांकित कर रहे होते हैं। वाल्मीकि का राम अलग है जो समय और काल के अनुरुप तुलसी के यहां बहुत अलग दिखाई देता है। यह अकारण नहीं है कि तुलसीदास शम्बूक वध और सीता परित्याग की घटना रामचरित मानस में नहीं लिखते हैं। अलग अलग कालखंड में राम का चरित्र चित्रण इस तरह से हुआ है कि वो समकालीन चुनौतियों से मुठभेड़ करता दिखता है। राम का चरित्र देश काल और परिस्थिति के अनुसार इतना लचीला है कि वो अपने अंदर तमाम तरह के बदलावों को समाहित कर लेता है। अपने युग के धर्म का पालन भी करता है।

राम की व्याप्ति के इतने गवाक्ष खोलकर प्रधानमंत्री ने उनको लोक से जोड़ दिया। जब हम लोक की संस्कृति की बात करते हैं तो हमें रामधारी सिंह दिनकर के एक लेख ‘रेती के फूल’ की पंक्तियां याद पड़ती हैं जिसमें वो कहते हैं कि ‘असल में संस्कृति जिंदगी का एक तरीका है और यह तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है जिसमें हम जन्म लेते हैं। ...संस्कृति वह चीज मानी जाती है जो हमारे जीवन को व्यापे हुए है तथा जिनकी रचना और विकास में अनेक सदियों के अनुभवों का हाथ है। संस्कृति असल में शरीर का नहीं आत्मा का गुण है और सभ्यता की सामग्रियों से हमारा संबंध शरीर के साथ ही छूट जाता है, तब भी हमारी संस्कृति का प्रभाव हमारी आत्मा के साथ जन्म-जन्मांतर तक चलता रहता है।‘  हमारे राम ऐसे ही तो हैं, उनका प्रभावव भी तो हमारे देश में पीढ़ियों से चला आ रहा है। प्रधानमंत्री के इस भाषण के बाद बहुत संभव है कि उन बुद्धिजीवियों के मानस पर वर्षों से जमा वो भ्रम का जाला भी साफ होगा जिसमें वो भारत को विविध संस्कृतियों का देश मानते और बताते रहते हैं। विविध संस्कृतियों का देश बतानेवाले सिद्धातों का निषेध होगा क्योंकि यह तो साफ है कि भारत की संस्कृति तो एक ही है, लेकिन हम इस एक संस्कृति में विविधता का उत्सव मनाते हैं।

Saturday, August 1, 2020

बौद्धिक संपदा को सहेजने का भरोसा

पिछले दिनों सरकार ने नई शिक्षा नीति की घोषणा की। नई शिक्षा नीति में भाषा और कला को लेकर कई उत्साहवर्धक घोषणाएं की गई हैं। इन घोषणाओं में साफ तौर पर यह कहा गया है कि संस्कृति को मजबूत करने के लिए यह आवश्यक है कि भाषा को मजबूती प्रदान की जाए। शब्दकोश से लेकर अनुवाद तक की महत्ता के बारे में बात की गई है। एक और महत्वपूर्ण बात जो इस नई शिक्षा नीति में कही गई है वो ये है कि ‘भारत इसी तरह सभी शास्त्रीय भाषाओं और साहित्य का अध्ययन करनेवाले अपने संस्थानों और विश्वविद्यालयों का विस्तार करेगा और उन हजारो पांडुलिपियों को इकट्ठा करने, संरक्षित करने और अनुवाद करने और उनका अध्ययन करने का मजबूत प्रयास करेगा, जिस पर अभी तक ध्यान नहीं गया है। इसी प्रकार से सभी संस्थानों और विश्वविद्यालयों में जिसमें शास्त्रीय भाषाओं और साहित्य पढ़ाया जा रहा है, उनका विस्तार किया जाएगा। अभी तक उपेक्षित रहे लाखों अभिलेखों के संग्रह, संरक्षण, अनुवाद और अध्ययन के दृढ़ प्रयास किए जाएंगे।‘ इस शिक्षा नीति में यह एक बेहद महत्वपूर्ण प्रयास होगा। हमारे प्राचीन ग्रंथों को सहेजने का प्रयास होना चाहिए। कई बार कई तरह के सर्वेक्षणों में यह बात सामने आ चुकी है कि कि पूरी दुनिया में भारत के पास सबसे अधिक पांडुलिपियां है लेकिन साथ ही ये बात भी सामने आती हैं कि हमारे देश में इन पांडुलिपियों के संरक्षण की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक हमारे देश में इस वक्त दो करोड़ से अधिक पांडुलिपियां हैं जिनको संरक्षित करने की सख्त आवश्यकता है। 
इन पांडुलिपियों को सहेजने की बात नई नहीं है और इस शिक्षा नीति में जो कहा गया है इस तरह के प्रयास पहले भी हो चुके हैं। जब अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने 2002 में पंद्रह अगस्त को लाल किले की प्राचीर से ‘राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन’ की घोषणा की थी। सात फरवरी दो हजार तीन को ‘राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन’ की विधिवत शुरुआत की गई थी। मिशन की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इसकी स्थापना पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय के अधीन की गई थी और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र को नोडल एजेंसी बनाया गया था। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन ‘भविष्य के लिए अतीत का संरक्षण’ के उद्देश्य से स्थापित किया गया था। इसके शुभारंभ के मौके पर अटल जी ने भी भाषा को लेकर चिंता जताई थी और कहा था कि ‘चूंकि 70 प्रतिशत पाण्डुलिपियां संस्कृत में हैं अत: इस भाषा के शिक्षण और अध्ययन को और प्रवर्तित करने की आवश्यकता होगी और अनेक संस्थान जो पहले से ही इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं उन्हें इस मिशन से जोड़ा जाना होगा और अंतत: पाण्डुलिपियों के निजी अभिरक्षकों को आगे बढ़कर अपनी पाण्डुलिपियां मिशन को सौंप देने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु एक बड़ा जागरूकता अभियान चलाना होगा|’ कुछ इसी तरह की बात नई शिक्षा नीति में भी की गई है। 2003 में स्थापित राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन ने पिछले सत्रह साल में क्या काम किया ये अबतक ज्ञात नहीं हो पाया है। 2004 में एनडीए को पराजय का सामना करना पड़ा लेकिन पांडुलिपि मिशन बन गया था तो चलता रहा लेकिन कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन में इस पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। मिशन तो किसी काम को पूरा करने के लिए बनाया जाता है और उसकी एक निश्चित समयावधि होती है। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन का भी कार्यकाल तय था और अब इसको 2021 तक के लिए बढ़ाया गया है।   
पिछले दिनों वाराणसी के दो ऐसे स्थान पर जाने का अवसर मिला जहां हजारों पांडुलिपियां और प्राचीन ग्रंथ उपलब्ध हैं। पांडुलिपियों को उचित रखरखाव और प्राचीन ग्रंथों को पुनर्प्रकाशित करने की आवश्यकता है। काशी के सपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के पास हजारों दुर्लभ पांडुलिपियां हैं जिनपर काम करने की जरूरत है। उनको अनूदित करके शोधार्थियों या छात्रों के समक्ष लाने की जरूरत है। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन ने इस दिशा में जो प्रयास किया है वो नाकाफी है। सिर्फ बनारस में ही नहीं पूरे देश में जाने कितने पुस्तकालयों में पुरानी पांडुलिपियां पड़ी होंगी, इसका वास्तविक आकलन भी नहीं हो पाया है। सबसे बुरी स्थिति तो उन रजवाड़ों की बताई जा रही है जहां संपत्ति को लेकर विवाद के चलते संपत्तियां अदालतों के आदेश पर सील कर दी गई हैं। इन सील की गई कई संपत्तियों में उन राजघरानों के निजी पुस्तकालय भी हैं। उन पुस्तकालयों में ढेर सारी पांडुलिपियां हैं जो सालों से बगैर देखरेख के नष्ट हो गई हैं या नष्ट हो रही हैं। इसी तरह से देश के अलग अलग हिस्सों के लेखकों के घरों में पांडुलिपियां थीं जो या तो नष्ट हो गईं या नष्ट होने के कगार पर हैं। अगर नई शिक्षा नीति में पांडुलिपियों के प्रकाशन पर ध्यान दिया जाता है तो हम अपनी उन बौद्धिक संपदा को सहेज कर आनेवाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ा काम कर पाएंगे। 
सवाल यह भी उठता है कि अभी पांडुलिपि मिशन संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत है लेकिन जब नई शिक्षा नीति में इसपर काम करने की बात की गई है तो क्या ये माना जाए कि पांडुलिपि मिशन अब संस्कृति मंत्रालय से शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत होगा। शिक्षा नीति में तो मोटे तौर पर नीतिगत बातें की गई हैं, उसका क्रियान्वयन कैसे होगा इसपर विस्तृत जानकारी प्रतीक्षित है। अगर सरकार पांडुलिपियों को लेकर गंभीरता से काम करना चाहती है तो उसको पांडुलिपि मिशन को भंग करके राष्ट्रीय पांडुलिपि प्राधिकरण जैसी संस्था का गठन करना होगा। जैसे संस्कृति मंत्रालय ने 2010 में स्मारकों की सुरक्षा और उसके संरक्षण के लिए राष्ट्रीय स्मारक प्रधारिकरण का गठन किया था। अगर ऐसा हो पाता है तो पांडुलिपियों के संरक्षण के कार्य को गति भी मिलेगी और स्थायित्व भी। 
एक और बात इस नई शिक्षा नीति में कही गई है कि ‘भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित प्रत्येक भाषा के लिए अकादमी स्थापित की जाएगी जिसमें हर भाषा के श्रेष्ठ विद्वान एवं मूल रूप से वह भाषा बोलनेवाले लोग शामिल रहेंगे ताकि नवीन अवधारणाओं का सरल किन्तु सटीक शब्द भंडार तय किया जा सके तथा नियमित रूप से नवीन शब्दकोश जारी किया जा सके।... इसी प्रकार व्यापक पैमाने पर बोली जानेवाली अन्य भारतीय भाषाओं की अकादमी केंद्र अथवा/ और राज्य सरकारों द्वारा स्थापित की जाएंगीं।‘ अब ये भी कोई नई बात नहीं है अभी एक साहित्य अकादमी है जो संविधान में उल्लिखित भाषाओं के लिए काम करती हैं और केंद्रीय हिंदी संस्थान शब्दकोश बनाने का काम करता है। पिछले दिनों केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक नंदकिशोर पांडे ने बहुत श्रमपूर्वक शब्दकोश पर काम करवाया और 45 शब्दकोश का प्रकाशन हो गया और छह पर काम चल रहा है। राज्यों में भी भाषाई अकादमियां हैं उनमें से ज्यादातर की हालत बहुत खराब है क्योंकि उनके पास पर्याप्त बजट नहीं है। ये देखना दिलचस्प होगा कि इन अकादमियों का गठन होगा तो साहित्य अकादमी का क्या होगा, केंद्रीय हिंदी संस्थान का क्या होगा, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर का क्या होगा, केंद्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान, चेन्नई का क्या होगा? क्या सरकार इन संस्थानों के पुनर्गठन की सोच के साथ नई शिक्षा नीति को लेकर आई है। इसमें से कुछ संस्थान तो शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आते हैं लेकिन कई संस्थान संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत आते हैं। अगर पुनर्गठन की सोच है तो ये एक अच्छी पहल हो सकती है क्योंकि संस्कृति मंत्रालय की कई ऐसी संस्थाएं हैं जिनको अगर शिक्षा मंत्रालय के साथ कर दिया जाए तो बेहतर होगा। 

Thursday, July 30, 2020

फिल्मों में रामकथा


सचिन भौमिक को क्या पता था कि राज कपूर से उनकी एक मुलाकात उनको सफलता की ऐसी राह दिखा देगा जिसपर चलकर वो हिंदी फिल्मों के सबसे सफल कहानीकार बन जाएंगे। हिंदी फिल्मों के इतिहास में जितनी सिल्वर जुबली और गोल्डन जुबली फिल्में सचिन भौमिक के खाते में हैं उतनी किसी और के नहीं। सलीम-जावेद की जोड़ी को भी नहीं। सचिन भौमिक की सफलता के पीछे की कहानी बेहद दिलचस्प है। सचिन काम की तलाश में कोलकाता (तब कलकत्ता) से मायानगरी मुंबई (तब बांबे) पहुंचे थे। जब वो मुंबई आए तो उस समय राज कपूर को प्रसिद्धि मिल चुकी थी और उनकी फिल्म ‘बरसात’, ‘सरगम’, ‘आवारा’, ‘बूट पॉलिश’ और ‘श्री 420’ जैसी फिल्में लोकप्रिय हो चुकी थीं। सचिन भौमिक किसी तरह से राज कपूर से मिलना चाहते थे। एक दिन वो आर के स्टूडियो पहुंचे और राज कपूर से मिलने की इच्छा जताई। उस दिन राज कपूर से भेंट नहीं हो सकी लेकिन अगले दिन का समय तय हुआ। नियत समय पर सचिन भौमिक चेंबूर के आर के स्टूडियो पहुंचे। वहां उनको राज कपूर के कमरे में ले जाया गया। सचिन भौमिक से राज कपूर ने हाल-चाल पूछा और फिर आने का प्रयोजन। भौमिक ने बताया कि वो फिल्मों के लिए कहानी लिखना चाहते हैं। राज कपूर की सहमति के बाद सचिन ने कहानी सुनाना आरंभ किया और राज कपूर बहुत धैर्यपूर्वक उनकी कहानियां और बातें सुनते रहे। बातचीत जब खत्म हुई तो राज कपूर ने कहा कि आप हिंदी फिल्मों के लिए कहानियां लिखते हो, अच्छी बात है, लिखते भी रहो लेकिन इतना ध्यान रखना कि हिंदी फिल्मों में कहानी तो एक ही होती है, ‘राम थे, सीता थीं और रावण आ गया।‘ सचिन भौमिक जब राज कपूर से मिलकर निकल रहे थे तो उनके मस्तिष्क में ये बात बार-बार कौंध रही थी। सचिन भौमिक ने एक साक्षात्कार में बताया था कि राज कपूर की ये बात उन्होंने गांठ बांध ली थी और वो कोई भी कहानी लिखते थे तो उनके अवचेतन मन में रामकथा अवश्य चल रही होती थी।

अगर हम हिंदी फिल्मों के सौ साल से अधिक के इतिहास पर नजर डालें तो रामकथा अब तक सौ से अधिक फिल्मों का निर्माण हो चुका है। मूक फिल्मों के दौर में 1917 में दादा साहब फाल्के ने ‘लंका दहन’ के नाम से एक फिल्म बनाई थी। कहना न होगा कि जब लंका दहन के प्रसंग की चर्चा होगी तो राम कथा के अन्य प्रसंग भी इसमें आते चले जाते हैं। इस फिल्म की सफलता के साथ तो कई किवदंतियां भी जुड़ी हुई हैं। मद्रास (अब चेन्नई) में ये फिल्म इतनी हिट रही थी कि इसकी कमाई के पैसों को बैलगाड़ी में भरकर ले जाना पड़ता था। उस दौर में एक और फिल्मकार हुए जिनका नाम था श्री नाथ पाटणकर। इन्होंने 1918 में ‘राम वनवास’ के नाम से एक ऐतिहासिक फिल्म बनाई। इस बात का उल्लेख मिलता है कि पाटणकर की कंपनी फ्रेंड्स एंड कंपनी ने इस फिल्म को करीब पच्चीस हजार फीट के रील में शूटिंग की थी। इसको दर्शकों को धारावाहिक के रूप में दिखाया गया था और दर्शकों के लिए एक विशेष प्रकार का टिकट भी बनाया गया था। जब भी इस फिल्म का प्रदर्शन होता था तब उसके पहले राम की महिमा का बखान करनेवाले विशेष प्रकार के गीत-संगीत का कार्यक्रम होता था। उसी दौर में सीक्वल का भी चलन हिंदी फिल्मों में शुरू हो गया था और पाटणकर ने राम वनवास के सीक्वल के तौर पर ‘सीता स्वंयवर’, ‘सती अंजनि’ और ‘वैदेही जनक’ नाम से फिल्में बनाईं थीं। मूक फिल्मों के दौर में तकरीबन हर वर्ष राम कथा पर केंद्रित फिल्में बनती थीं। ‘अहिल्या उद्धार’, ‘श्री राम जन्म’, ‘लव कुश’, ‘राम रावण युद्ध’, ‘सीता विवाह’, ‘सीता स्वयंवर’ और ‘सीता हरण’ आदि प्रमुख फिल्में हैं।      
जब बोलती फिल्मों का दौर शुरू हुआ तब भी रामकथा फिल्मकारों की पंसद बनी रही। बंगाल के मशहूर फिल्मकार देवकी बोस ने ‘सीता’ के नाम से एक फिल्म बनाई थी जो बेहद लोकप्रिय हुई थी। इस फिल्म में राम के मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप को स्थापित करने की कोशिश की गई थी। इस फिल्म में सीता की भूमिका मशहूर अभिनेत्री दुर्गा खोटे ने निभाई थी और पृथ्वीराज कपूर ने राम की। ये हमारे देश में बनी पहली ऐसी फिल्म थी जिसको अंतराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया था। इस फिल्म का प्रदर्शन 1934 में वेनिस फिल्म फेस्टिवल में किया गया था। प्रकाश पिक्चर्स ने वाल्मीकि के रामयाण के आधार पर चार फिल्में बनाईं, ‘भरत मिलाप’, ‘रामराज्य’, ‘राम वाण’ और ‘सीता स्वयंवर’। इन चारों फिल्मों में पूरी रामायण को फिल्माया गया। इन चार फिल्मों में राम का किरदार अभिनेता प्रेम अदीब और सीता की भूमिका का शोभना समर्थ ने निभाई थी। इन फिल्मों में प्रेम अदीब और शोभना समर्थ ने बेहद शानदार काम किया था। उस दौर में लोग प्रेम अदीब और शोभना समर्थ की तस्वीरें देखकर उनके सामने सर झुकाकर प्रणाम करते थे। आज की पीढ़ी ने दूरदर्शन पर रामानंद सागर की रामायण की लोकप्रियता देखी। प्रकाश पिक्चर्स की ये चारों फिल्में भी अपने दौर में इसी तरह लोकप्रिय हुई थीं। इनमें से ‘रामराज्य’ को महात्मा गांधी ने देखी।
1967 में प्रकाश पिक्चर्स ने जब ‘रामराज्य’ को नए अंदाज में बनाने तैयारी शुरू की तो इसके निर्देशक विजय भट्ट ने नूतन से सीता के रोल के लिए संपर्क किया था। उनको लगा था कि शोभना समर्थ की बेटी नूतन इस भूमिका के लिए उपयुक्त होंगी। नूतन ने तब ये कहते हुए मना कर दिया था कि उनके अभिनय की तुलना उनके मां के अभिनय से होगी और वो ऐसा नहीं चाहती। नूतन के इंकार के बाद सीता की भूमिका वीणा राय ने निभाई थी। लेकिन ये फिल्म सफल नहीं हो पाई थी। इसके बाद भी नियमित अंतराल पर राम कथा पर फिल्में बनती रहीं हैं जो इस बात को साफ तौर पर इंगित करती हैं कि राम और उनसे जुड़ी कहानियां भारतीय जनमानस को हमेशा आकर्षित करती हैं। इसी आकर्षण को पकड़ने हुए राज कपूर ने सचिन भौमिक को कहा था कि कहानी तो एक ही है राम थे, सीता थीं और रावण आ गया।   

कलात्मक स्वतंत्रता के नाम पर...

पिछले दिनों दो ऐसी खबरें आईं जिसने ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटऑर्म की बढ़ती लोकप्रियता की ओर इशारा किया। पहली खबर तो ये कि पिछले तीन महीनों में डेढ करोड़ ग्राहकों ने नेटफ्लिक्स का एप डाउनलोड किया। ये इतनी बड़ी संख्या है जिसकी कल्पना नेटफ्लिक्स के कैलिफोर्निया में बैठे कर्ताधर्ताओं ने सपने में भी नहीं की होगी। इस संख्या में उनको व्यापक संभावना नजर आ रही है, बहुत बड़ा बाजार नजर आ रहा है और इसके साथ ही मुनाफे का एक ऐसा फॉर्मूला भी उनके हाथ लग गया है जिसमें जोखिम कम है। अगर हम सिर्फ इस डेढ़ करोड़ की संख्या को ही लें और उसको सबसे कम यानि 199 रु प्रतिमाह की सदस्यता शुल्क के आधार पर देखें तो करीब तीन अरब रुपए प्रतिमाह का कारोबार होता है। ये तो सिर्फ इन तीन महीनों में बने नए ग्राहकों के न्यूनतम सदस्यता शुल्क के आधार पर कारोबार का टर्न ओवर है। अब जरा इसी से जुड़ी दूसरी खबर पर विचार कर लेते हैं। एक और प्लेटफॉर्म है जिसका नाम है एमएक्स प्लेयर। इसपर एक वेब सीरीज है जिसका नाम है मस्तराम। एक एजेंसी के आंकड़ों के मुताबिक इस वेब सीरीज को तीन जुलाई को एक दिन में एक करोड़ दस लाख से अधिक दर्शकों ने देखा। इसके मुताबिक इसको अबतक छत्तीस करोड़ से अधिक लोग देख चुके हैं। ये वेब सीरीज तमिल, तेलुगू और हिंदी में उपलब्ध है और ये संख्या इन तीन भाषाओं के दर्शकों को मिलाकर है। निर्माता इस वेब सीरीज को भले ही वयस्क की श्रेणी में डालकर पेश कर रहे हों लेकिन ये है अश्लील। मस्तराम के नाम से कुछ वर्षों पूर्व पीली पन्नी में लपेटकर इरोटिक पुस्तकें बेची जाती थीं लेकिन अब ये खेल खुलकर चल रहा है। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर न केवल यौनिकता को खुलकर बढ़ावा दिया जा रहा है बल्कि वहां हमारे देश और देश की संस्थाओं के खिलाफ भी बहुधा अमर्यादित टिप्पणियां की जा रही हैं। 
अगप हम देखें तो वेब सीरीज में गाली गलौच और यौनिकता की शुरुआत को विदेशा कंटेंट से हुई लेकिन कुछ भारतीय निर्माताओं ने इसकी भौंडी नकल करनी शुरू कर दी और वो हिंसा और यौनिकता दिखाने में जुट गए। इसके अलावा उनकी जो राजनैतिक विचारधारा है उसका प्रकचीकरण भी उनके द्वारा निर्मित वेब सीरीज में दिखाई देने लगा। अगर विचार करें तो इस तरह को मामलों ने जोर पकड़ा लस्ट स्टोरीज और सेक्रेड गेम्स के बाद । ‘सेक्रेड गेम्स’ 2006 में प्रकाशित विक्रम चंद्रा के इसी नाम के उपन्यास पर बनाया गया धारावाहिक था, जिसको अनुराग कश्यप और विक्रमादित्य मोटवाणी ने निर्देशित किया है। भारतीय बाजार में सफलता के लिए कुछ तय फॉर्मूला है जिसपर चलने से कामयाबी मिल जाती है। ये फॉर्मूले हैं धर्म, हिंसा, सेक्स और अनसेंसर्ड सामग्री दिखाना। नेटफ्लिक्स ने ‘लस्ट स्टोरीज’ और ‘सेक्रेड गेम्स’ में इन फॉर्मूलों का जमकर इस्तेमाल किया।‘लस्ट स्टोरीज’ में भी सेक्स प्रसंगों को भुनाने की मंशा दिखती है। अनुराग कश्यप अपनी फिल्मों में गाली-गलौच वाली भाषा के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने यही काम इस सीरीज में भी किया है। फिल्म, धारावाहिक या साहित्य तो ‘जीवन’ जैसी कोई चीज है ‘जीवन’ तो नहीं है। अगर हम धारावाहिक या फिल्म में ‘जीवन’ को सीधे-सीधे उठाकर रख देते हैं तो यह उचित नहीं होता है। जीवन को जस का तस कैमरे में कैद करना ना तो फिल्म है ना ही धारावाहिक। जिस भी फिल्म में इस तरह का फोटोग्राफिक यथार्थ दिखता है वो कलात्मक दृष्टि से श्रेष्ठ नहीं माना जाता है।‘सेक्रेड गेम्स’ में सेक्स प्रसंगों की भरमार है, अप्राकृतिक यौनाचार के भी दृश्य हैं, नायिका को टॉपलेस भी दिखाया गया है। हमारे देश में इंटरनेट पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर पूर्व प्रमाणन जैसी कोई व्यवस्था नहीं है लिहाजा इस तरह के सेक्स प्रसंगों को कहानी में ठूंसने की छूट है जिसका लाभ उठाया गया है।
इन वेब सीरीज के माध्यम से दलितों, अल्पसंख्यकों के अधिकारों और राष्ट्रवाद की भ्रामक परिभाषाओं के
आधार पर एक अलग तरह का नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश की गई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों के क्रियाकलापों को कट्टरता से जोड़कर एक अलग ही तरह की तस्वीर पेश करने की कोशिशें भी की गई। इसका उदाहरण वेब सीरीज ‘लैला’ में देखा जा सकता है। ये सीरीज लेखक प्रयाग अकबर के उपन्यास पर आधारित है। ये हिंदुओं के धर्म और उनकी संस्कृति की कथित भयावहता को दिखाने के उद्देश्य से बनाई गई है। इस वेब सीरीज का निर्देशन दीपा मेहता ने किया है। भविष्य के भारत को आर्यावर्त बताया गया है। आर्यावर्त के लोगों की पहचान उनके हाथ पर लगे चिप से होगी। यहां दूसरे धर्म के लोगों के लिए जगह नहीं होगी। कुल मिलाकर भविष्य के भारत को हिंदू राष्ट्र की तरह पेश किया गया है। ‘आर्यावर्त’ में अगर कोई हिंदू लड़की किसी मुसलमान लड़के से शादी कर लेती है तो उसके पति की हत्या कर लड़की को ‘शुद्धिकरण केंद्र’ लाया जाएगा। इस ‘शुद्धिकरण केंद्र’ का भी घिनौना चित्रण किया गया है। धर्म के अलावा इस वेब सीरीज में जातिगत भेदभाव को उभारा गया है ताकि सामाजिक विद्वेष बढ़े। इसमें बेहद शातिर तरीके से हिंदुत्व को बदनाम करने की मंशा दिखती है।
सेक्रेड गेम्स के दूसरे सीजन में निर्माताओं ने एक कदम और बढ़ा दिया। उनको मालूम है कि इस माध्यम पर किसी तरह की कोई बंदिश नहीं है लिहाजा वो सांप्रदायिकता फैलाने से भी नहीं चूके जो परोक्ष रूप से एक राष्ट्र के तौर पर भारत को कमजोर करता है। इसके एक संवाद में जब मुसलमान अभियुक्त से पुलिस पूछताछ के क्रम में कहती है कि उसको यूं ही नहीं उठाकर पूछताछ किया जा रहा है तो अभियुक्त कहता है कि इस देश में मुसलमानों को उठाने के लिए किसी वजह की जरूरत नहीं होती है। अब इस बात पर विचार किया जाना आवश्यक है कि इस सीरीज के निर्माता और निर्देशक इस तरह के संवाद किसी पात्र के माध्यम से सामने रखकर क्या हासिल करना चाहते हैं। इस तरह के कई प्रसंग और संवाद इस सीरीज में है। जो मुसलमानों के मन में देश की व्यवस्था के खिलाफ गुस्से और नफरत के प्रकटीकरण की आड़ में उनको उकसाते हैं। इसी तरह से अभी एक वेब सीरीज आई पाताल लोक, इस सीरीज में भी मुसलमानों को लेकर बेहद ही अगंभीर टिप्पणियां की गईं और परोक्ष रूबप से ये बताने की कोशिश की गई कि भारतीय एजेंसियां मुसलमानों को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रसित रहती हैं। इस वेब सीरीज में साफ तौर पर पुलिस और सीबीआई दोनों को मुसलमानों के प्रति पूर्वग्रह से ग्रसित दिखाया गया। थाने में मौजूद हिंदू पुलिसवालों के बीच की बातचीत में मुसलमानों को लेकर जिस तरह के विशेषणों का उपयोग किया जाता है उससे ये लगता है कि पुलिस फोर्स सांप्रदायिक है। इसी तरह से जब इस वेब सीरीज में न्यूज चैनल के संपादक की हत्या की साजिश की जांच दिल्ली पुलिस से लेकर सीबीआई को सौंपी जाती है, और जब सीबीआई इस केस को हल करने का दावा करने के लिए प्रेस कांफ्रेंस करती है तो वहां तक उसको मुसलमानों के खिलाफ ही दिखाया गया है। मुसलमान हैं तो आईएसआई से जुड़े होंगे, नाम में एम लगा है तो उसका मतलब मुसलमान ही होगा आदि आदि। संवाद में भी इस तरह के वाक्यों का ही प्रयोग किया गया है ताकि इस नेरेटिव को मजबूती मिल सके। और अंत में ऐसा होता ही है कि सीबीआई मुस्लिम संदिग्ध को पाकिस्तान से और आईएसआई से जोड़कर उसे अपराधी साबित कर देती है। कथा इस तरह से चलती है कि जांच में क्या होना है ये पहले से तय है, बस उसको फ्रेम करके जनता के सामने पेश कर देना है। अगर किसी चरित्र को सांप्रदायिक दिखाया जाता तो कोई आपत्ति नहीं होती, आपत्तिजनक होता है पूरे सिस्टम को सांप्रदायिक दिखाना जो समाज को बांटने के लिए उत्प्रेरक का काम करती है। बात यहीं तक नहीं रुकती है, इस वेब सीरीज में तमाम तरह के क्राइम को हिंदू धर्म के प्रतीकों से जोड़कर दिखाया गया है।
ये सब सिर्फ इन ओटीटी प्लेटफॉर्म पर ही नहीं दिखाय जा रहा है बल्कि फिल्मों में भी परोक्ष और प्रत्यक्ष रूप से इस तरह के प्रसंगों को फिल्माया जाता है। अगर हम एक फिल्म मुक्काबाज की बात करें तो उसमें एक जगह एक संवाद है, वो आएंगें भारत माता की जय बोलेंगे और तुम्हारी हत्या करके चले जाएंगे। अब इस संवाद का फिल्म में जहां उपयोग हुआ है उसकी जरूरत बिल्कुल भी नहीं है लेकिन फिर भी निर्देशक को अरनी विचारधारा को आगे बढ़ाना है और भारत माता की जय बोलनेवाले को नीचा दिखाना है लिहाजा वो उसको ठूंस देते हैं। फिल्मों में चूंकि प्रमाणन की व्यवस्था है इसलिए ये दबे छुपे होता है लेकिन होता है। लेकिन ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कोई बंधन नहीं है किसी तरह का नियमन नहीं है लिहाजा वहां स्वच्छंदता है। कई बार ये तर्क दिया जाता है कि इन प्लेटफॉर्म पर जानेवाले लोग जानते हैं कि वो क्या करने जा रहे हैं. वो इनकी सदस्यता लेते हैं, शुल्क अदा करते हैं और उसके बाद वेब सीरीज देखते हैं। तो किसी को भी क्या सामग्री देखनी है ये चयन करने का अधिकार तो होना ही चाहिए। ठीक बात है, कि हर किसी को अपनी रुचि की सामग्री देखने का अधिकार होना चाहिए लेकिन उन अपरिपक्व दिमाग वाले किशोरों का क्या जिनके हाथ में बड़ी संख्या में स्मार्टफोन भी है, उसमें इंटरनेट कनेक्शन भी है और इतने पैसे तो हैं कि वो इन ‘ओवर द टॉप’ प्लेटफॉर्म की सदस्यता ले सके। क्या हम या इन प्लेटफॉर्म पर सामग्री देनेवाली संस्थाएं ये चाहती हैं कि हमारे देश के किशोर मन को अपरिपक्वता की स्थिति से ही इस तरह से मोड दिया जाए कि आगे चलकर इस तररह की सामग्री को देखनेवाला एक बड़ा उपभोक्ता वर्ग तैयार हो सके। इसके अलावा जो एक और खतरनाक बात यहां दिखाई देती है वो ये कि इन प्लेटफॉर्म्स पर कई तरह के विदेशी सीरीज भी उपलब्ध हैं जहां पूर्ण नग्नता परोसी जाती है। ऐसी हिंसा दिखाई जाती है जिसमें मानव शरीर को काटकर उसकी अंतड़ियां निकाल कर प्रदर्शित की जाती हैं। जिस कंटेंट को भारतीय सिनेमाघरों में नहीं दिखाया जा सकता है उस तरह के कंटेंट वहां आसानी से उपलब्ध हैं। चूंकि वेब सीरीज के लिए किसी तरह का कोई नियमन नहीं है लिहाजा वहां बहुत स्वतंत्र नग्नता और अपनी राजनीति चमकाने या अपनी राजनीति को पुष्ट करनेवाली विचारधारा को दिखाने का अवसर उपलब्ध है। लेकिन अब वक्त आ गया है कि सरकार इन वेब सीरीज के नियमन के बारे में जल्द से जल्द विचार करे।  

Saturday, July 25, 2020

इतिहास से छल करती पाठ्य पुस्तक

भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय से संबद्ध एक स्वायत्त संस्था है,राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद। इसको एनसीईआरटी के नाम से भी जाना जाता है।1961 में इसकी स्थापना केंद्र और राज्य सरकारों को स्कूली शिक्षा में गुणात्मक सुधार के लिए नीति और कार्यक्रम बनाने पर सुझाव देने के लिए की गई थी। इस संस्था का एक महत्वपूर्ण काम स्तरीय पुस्तकों के प्रकाशन का भी है। पुस्तकों के प्रकाशन में इस संस्था ने वामपंथी लेखकों के प्रभाव में जिस तरह की भाषा और जिस तरह की व्याख्या स्कूली छात्रों को अबतक पढ़ाई है वो एक अलग शोध की मांग करता है। नामवर सिंह से लेकर रोमिला थापर तक एनसीईआरटी की पुस्तकों के लिए नीति निर्धारण करते रहे हैं। परिणाम सबके सामने हैं कि छात्रों को क्या पढाया जा रहा है। अभी इस बात की जोरशोर से चर्चा हो रही है कि एनसीईआरटी ने बारहवीं कक्षा की पुस्तक ‘स्वतंत्र भारत में राजनीति’ में अनुच्छेद 370 को समाप्त किए जाने को लेकर महत्वपूर्ण बदलाव कर दिया है। परंतु महत्वपूर्ण बदलाव के नाम पर सिर्फ चंद पंक्तियां जोड़ी गई हैं। इस पुस्तक के पृष्ठ 158 पर यह जोड़ दिया गया है कि 5 अगस्त 2019 को जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 द्वारा अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया गया और राज्य को पुनर्गठित कर दो केंद्र शासित प्रदेश-जम्मू कश्मीर और लद्धाख बना दिए गए। न तो इस ऐतिहासिक कदम की पृष्ठभूमि बताई गई और न ही उन कारणों का उल्लेख किया गया है जिसको लेकर भारत सरकार ने ये फैसला लिया। इन कारणों को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में विस्तार से बताया भी था, पर इस ओर एनसीईआरटी का ध्यान नहीं गया। ध्यान तो मानव संसाधन विकास मंत्रालय में बैठे जिम्मेदार लोगों का भी नहीं गया। 
इस पुस्तक के ‘क्षेत्रीय आकाक्षाएं’ वाले अध्याय में अगर ‘जम्मू एवं कश्मीर’ पर विचार करते हैं तो यहां पहली ही पंक्ति से छात्रों को भ्रामक और गलत जानकारी दी गई है। अब इस पंक्ति पर गौर करिए, ‘आपने जैसा कि गत वर्ष पढ़ा है, जम्मू और कश्मीर को अनुच्छेद 370 के अंतर्गत विशेष दर्जा दिया गया था।‘ गड़बड़ी यहीं से शुरू होती है। यह अर्धसत्य बताकर छात्रों के मन में बचपन से ही गलत जानकारी बिठाई गई है। कहीं भी ये नहीं कहा गया है कि भारतीय संविधान में अनुच्छेद 370 को अस्थायी व्यवस्था बताया गया है। उसको इस तरह से लिखा गया है जैसे कि वो संविधान के अन्य अनुच्छेदों के समान है। इस अस्थायी व्यवस्था को छिपाकर विशेष दर्जा की बात को उभारा गया है और अंत में इसको खत्म करने की बात की गई है। स्वाभाविक तौर पर छात्रों के मन में प्रश्न उठेगा कि अगर मूल संविधान में किसी राज्य या भौगोलिक क्षेत्र को विशेष दर्जा दिया गया था तो उसको क्यों हटाया गया। यह पता नहीं कितने सालों से पढ़ाया जा रहा है और पीढ़ी दर पीढ़ी भ्रामक जानकारी देकर नए तरह का इतिहास गढ़ा जा रहा है।  
इसी तरह से पृष्ठ 154 पर लिखा गया है ‘जम्मू और कश्मीर की राजनीति बाहरी और आंतरिक कारणों से विवादास्पद और द्वंद्वपूर्ण बनी रही। बाहर से पाकिस्तान ने सदा दावा किया कि कश्मीर घाटी पाकिस्तान का हिस्सा होना चाहिए। जैसा हमने ऊपर जाना, पाकिस्तान ने 1947 में राज्य में कबायली हमला करवाया जिसके परिणामस्वरूप राज्य का एक हिस्सा पाकिस्तानी नियंत्रण में आ गया।‘ अगले पृष्ठ पर कहा गया कि ‘भारत दावा करता है कि इस पर गैर-कानूनी कब्जा किया गया है। पाकिस्तान इस क्षेत्र को ‘आजाद कश्मीर’ कहता है।‘  अब जरा इन पंक्तियों पर सावधानी और सूक्षम्ता से विचार करिए। ये हमारे देश की उस केंद्रीय संस्था की पाठ्य पुस्तक में है जिसको केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। इस पाठ्य पुस्तक का अनुसरण राज्यों के पाठ्यक्रम में भी होता है। इसमें लिखा गया है कि ‘भारत दावा करता है’। ऐसा प्रतीत होता है कि ये पुस्तक भारत के बाहर किसी देश में पढ़ाई जानेवाली हो या पाकिस्तान के पाठ्य पुस्तक में हो। ये लिखने का उद्देश्य और मंशा दोनों समझ से परे है। ये क्यों लिखा और पढ़ाया जा रहा है कि पाकिस्तान के कब्जेवाले कश्मीर पर भारत ‘दावा’ करता है? क्या लेखकों को या एनसीईआरटी को ये मालूम नहीं है कि भारत का ‘दावा’ नहीं बल्कि वो भौगोलिक क्षेत्र भारत का अभिन्न अंग है और इस बारे में हमारी संसद ने भी प्रस्ताव पास किया हुआ है। स्पष्ट है कि इस पुस्तक के लेखक वस्तुनिष्ठ होने की आड़ में पाकिस्तान का पक्ष भारतीय छात्रों को पढ़वा रहे हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो ये क्यों लिखा जाता कि पाकिस्तान ने जिस इस क्षेत्र पर कब्जा किया हुआ है उसको ‘आजाद कश्मीर’ कहता है। इसमें इस बात का कहीं भी जिक्र नहीं है कि भारत, पाकिस्तान के कब्जावाले कश्मीर को क्या कहता है। इस बात को छुपा ले जाना भी इस पुस्तक के लेखकों और एनसीआरटी में कार्यरत जिम्मेदार लोगों की पाकिस्तान परस्त मानसिकता को सार्वजनिक करता है। 
एक और बेहद आपत्तिजनक पंक्ति पृष्ठ संख्या 155 पर है जहां उल्लेख किया गया है कि ‘आंतरिक रूप से भारतीय संघ में कश्मीर के दर्जे के बारे में विवाद है।‘  अनुच्छेद 370 के समाप्त होने के बाद भारतीय संघ में कश्मीर के दर्जे को लेकर क्या विवाद है इस बारे में कुछ भी नहीं बताया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस अध्याय में जम्मू और कश्मीर के बारे में जो अनुच्छेद 370 के खत्म होने के पहले लिखा गया था उसको जस का तस रहने दिया गया और अध्याय के अंत में अनुच्छेद खत्म करने की बात जोड़ दी गई। यह घोर लापरवाही का एक नमूना भर है। इस पंक्ति के तीन चार पंक्तियों के बाद एक और ऐसी बात लिखी गई ‘जम्मू और कश्मीर के बाहर लोगों का एक वर्ग है कि जो विश्वास करता था कि अनुच्छेद 370 द्वारा प्रदत्त राज्य का विशेष दर्जा राज्य को भारत से पूर्ण रूप से एकीकृत नहीं होने देता है।‘  जम्मू और कश्मीर से बाहर के लोगों का एक वर्ग ऐसा सोचता है ये कहने का क्या आधार है। ऐसा प्रतीत होता है कि पूरे राष्ट्र की भावना को या उनकी सोच को एक वर्ग की भावना बताकर छात्रों के मन में शक का बीज बोने का काम बहुत सोच समझकर किया जा रहा है। जबकि अस्थायी अनुच्छेद 370 को खत्म हुए साल भर होने को आए। 
इसके अलावा की कई बातें हैं जो इस पुस्तक में इस तरह से कही गई हैं जिससे एक अलग तरह की तस्वीर बनती है। शेख अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कॉंफ्रेस को धर्मनिरपेक्ष बताया गया पर इस बात का उल्लेख नहीं किया गया कि पहले उसका नाम मुस्लिम कॉंफ्रेस क्यों था? शेख अब्दुल्ला को भारत सरकार ने चौदह साल तक कारावास में क्यों रखा? नेशनल कॉंफ्रेस और कांग्रेस के गठबंधन को भी इसमें गलत बताया गया है। सवाल ये उठता है कि एनसीईआरटी को ऐसी अराजक स्वायत्ता मानव संसाधन मंत्रालय क्यो दे रहा है? क्यों देश विरोधी बातें छात्रों को पढ़ाई जा रही हैं और मंत्रालय और एनसीईआरटी के जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं? क्यों गलत बातों का उल्लेख करके वस्तुस्थिति को छिपाया जा रहा है। क्यों इस तरह की व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है जो छात्रों के मानस पर अपने ही राष्ट्र की गलत छवि बनाती है? समय आ गया है कि इस पाकिस्तान परस्त और राष्ट्र विरोधी व्याख्या को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं। 

Saturday, July 18, 2020

विकलांग मानसिकता से उपजा हास्य

हरिशंकर परसाईं का एक बेहद मशहूर व्यंग्य है, राजनीतिक पुंगी। उसमें वो लिखते हैं, ‘आदमी और पुंगी में क्या फर्क है? आदमी खुद बोलता है और पुंगी बजायी जाती है। पुंगी में सिर्फ खाली पोल होती है, उसमें स्वर नहीं होता। पुंगी का स्वर उसी आदमी का स्वर होता है, जिसके हाथ में वो है और जो उसको फूंक रहा है। पिछले कुछ सालों में इस देश के स्टैंडअप कॉमेडियनों ने यह सिद्ध कर दिया कि वो स्टैंडअप कॉमेडियन नहीं हैं, मेले में मिलनेवाली दो टके की पुंगी हैं।‘ हमने नेता की जगह स्टैंडअप कॉमेडियन कर दिया है। हरिशंकर परसाईं की याद इस वजह से आई कि पिछले दिनों हास्य के नाम पर सार्वजनिक मंचों पर बजनेवाली ये पुंगियां अज्ञान की वजह से बेसुरी हो गई हैं। इन सबसे निकलनेवाले स्वर समाज के बहुसंख्यक समुदाय को आहत भी करने लगा हैं और उनके अंदर गुस्से का बीज भी बोने लगे हैं। हास्य की ये पुंगियां जब बजती हैं तो संविधान में प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ लेने की कोशिश करती हैं, लेकिन जब पुंगी सड़ने लगती है तो उससे स्वर की सुंदरता की अपेक्षा करना और उसके स्वर के अनुशासन के दायरे में रहने की कल्पना करना व्यर्थ है। लिहाजा हास्य की ये पुंगियां बहुधा संविधान के तहत मिली अभिव्यक्ति की आजादी का अतिक्रमण करती हैं और बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को आहत कर देती हैं। ये पुंगियां अपने संवैधानिक अधिकारों को तो याद रखती हैं लेकिन लोकप्रियता हासिल करने के चक्कर में शायद ये भूल जाती हैं कि जो संविधान उनको अभिव्यक्ति की आजादी देता है वही संविधान अन्य नागरिकों को भी अन्य कई तरह के अधिकार देता है। जिसमें उनकी भावनाएं आहत न हों इसका भी ख्याल रखा गया है।
अब जरा इस बात पर विचार कर लें कि हास्य के इन पुंगियों यानि स्टैंडअप कॉमेडियंस किस तरह से हिंदू धर्म, हिंदू परंपरा, हिंदू भगवान, हिंदू अनुष्ठान, हिंदू रीति-रिवाज और हिंदू धार्मिक संस्कारों का उपहास करते हैं। कभी गणेश जी की सूंढ़ को लेकर प्लास्टिक सर्जरी के सौंदर्य की बातें करते-करते मर्यादा की सभी सीमा लांघ जाते हैं। उन्हें यह याद नहीं रहता कि गणेश जी को हिंदू, भगवान के तौर पर पूजते हैं और उनका मजाक उड़ाना कुछ लोगों की भावनाओं को बुरी तरह आहत कर सकता है। स्टेज पर खडे होकर फूहड़ बातें करके जनता को हंसाने की कोशिश करनेवाले इन स्टैंडअप कॉमेडियंस को इसकी परवाह कहां। अभी पिछले दिनों एक वीडियो सुन रहा था जिसमें एक स्टैंडअप कॉमेडियन कहता है कि वो इस वजह से नास्तिक बन गया क्योंकि अगर वो नास्तिक नहीं बनता तो उसको ब्राह्मण कहलाना पड़ता। फिर अपनी मुद्राओं से लोगों को हंसाने की कोशिश करता है और बोलने के क्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और आईएसआईएस को एक ही कोष्ठक में रखते हुए आगे निकल जाता है। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जहां हिंदू प्रतीकों और देवताओं का मजाक उड़ाते नजर आते हैं। 
स्टैंडअप कॉमेडियंस की जो फौज इन दिनों यूट्यूब पर है उसमें से ज्यादातर ये मानते हैं कि विवादित बातें करके ही लोगों को अपनी ओर आकृष्ट किया जा सकता है। विवादप्रियता की वजह से ये लोग हिंदू देवी-देवताओं के बारे में उलजलूल बोलते हैं। उनको ये बात भी अच्छी तरह से मालूम है कि हिंदू समाज सहिष्णु है और वो बहुत जल्दी इस तरह की किसी बात पर उत्तेजित नहीं होता है। ये सब इसी सहिष्णुता का फायदा उठाकर हिंदू देवी-देवताओं के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी तक कर जाते हैं। एक कॉमेडियन तो भगवान शिव के बारे में इतनी आपत्तिजनक बातें कह गया है कि उसको लिखा भी नहीं जा सकता है। लेकिन जब हिंदू के अलावा किसी और धर्म की बात आती है तो इनकी जुबान तालू से चिपक जाती है। आपको याद होगा कि कुछ साल पहले एआईबी ने क्रिश्चियन समुदाय से बिना शर्त माफी मांगी थी। एक कार्यक्रम में इन लोगों ने कथित तौर पर जीजस और चर्च के खिलाफ कुछ टिप्पणी कर दी थी। उनकी टिप्पणी के सार्वजनिक होने के बाद एआईबी के खिलाफ कुछ क्रिश्चियन संगठनों के बयान आए थे। फौरन बाद एआईबी ने मुंबई के बिशप से मिलकर बिना शर्त लिखित माफी मांगी थी। माफी मांगनेवालों में जो लोग शामिल थे उनमें तन्मय भट्ट, गुरसिमरन, आशीष शाक्य और रोहन जैसे स्टैंडअप कॉमेडियन शामिल थे। बिशप ने इनका माफीनामा सार्वजनिक कर दिया था। इस्लाम को लेकर तो खैर कोई टिप्पणी आती ही नहीं। एंकर अर्णब गोस्वामी से विमान में सवाल पूछने का वीडियो जारी कर प्रचार हासिल करनेवाले कुणाल कामरा के बारे में मुझे किसी ने बताया कि उन्होंने कुछ समय पहले अपने ट्वीटर हैंडल से इस्लाम के बारे में की गई सारी टिप्पणियां हटा दी थीं। ये वही कुणाल कामरा है जो हिंदू धर्म और प्रतीकों के बारे में टिप्पणी करके खुद को परमवीर समझते हैं।    
स्टैंडअप कॉमेडियंस इतने पर ही नहीं रुकते, ये तो इतने संवेदनहीन हैं कि बलात्कार पीड़िता से लेकर एसिड अटैक पीड़िताओं तक का मजाक उड़ाने से बाज नहीं आते। हैरत इस बात पर होती है कि हमारे समाज में वो कौन लोग हैं जो इतने संवेदनशून्य हो चुके हैं कि इन पीड़िताओं के सार्वजनिक मजाक में भी उनको हास्य नजर आता है। पिछले दिनों सौरभ घोष नाम के कॉमेडियन ने छत्रपति शिवाजी का मजाक उड़ाया था, एक महिला कॉमेडियन ने भी। शिवाजी महाराज का मजाक उड़ाने का जब विरोध हुआ तो उस महिला ने एक वीडियो जारी करके माफी मांगी। इसका एक और पहलू भी है जहां से इस तरह की संवेदनहीन और आपत्तिजनक बातें करनेवालों को ताकत मिलती है। हिंदू देवी-देवताओं या प्रतीकों का जब मजाक उड़ाया जाता है और उसका विरोध होता है तो कथित तौर पर खुद को लिबरल कहनेवाली पूरी जमात उनके समर्थन में खड़ी हो जाती है। विरोध करनेवालों को संघी और भारतीय जनता पार्टी के आईटी सेल से जुड़ा बताकर मामले को राजनीतिक रंग देने की कोशिश होती है। सोशल मीडिया पर तो इस विरोध को मोदी से जोड़ दिया जाता है और विरोध करनेवालों को भक्त आदि कहकर इस तरह से प्रचारित करने की कोशिश होती है कि हिंदूवादी कितने असहिष्णु हैं। सोशल मीडिया पर ये कथित लिबरल्स एक और खेल खेलते हैं। वो किसी एक ऐसे व्यक्ति को खोजते हैं जिसकी टिप्पणी स्तरहीन होती है और फिर उसको मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जोड़कर शोर मचाने लगते हैं कि देखो सारे हिंदू ऐसे ही हैं। सवाल इन लिबरल्स का नहीं है, सवाल तो उन स्टैंडअप कॉमेडियंस का है जो हिंदू धर्म और उसके प्रतीकों का मजाक उड़ाते हुए एक बड़ी जनसंख्या की आस्था को अपमानित करते हैं। हुसैन के केस में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि ‘शब्द, पेंटिंग, रेखाचित्र और भाषण के माध्यम से अभिव्यक्ति की आजादी को संविधान में जो अधिकार मिला है वो हर नागरिक के लिए अमूल्य है। कोई भी कलाकार या पेंटर मानवीय संवेदना और मनोभाव को कई तरीकों से अभिव्यक्त कर सकता है। इन मनोभावों और आइडियाज की अभिव्यक्ति को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता है । लेकिन कोई भी इस बात को विस्मृत नहीं कर सकता कि जितनी ज्यादा स्वतंत्रता होगी उतनी ही ज्यादा जिम्मेदारी भी होती है।‘ स्टेज पर बजनेवाले पुंगियों के समर्थक लिबरल्स को ये बात कब समझ में आएगी पता नहीं, लेकिन जिस रफ्तार से इंटरनेट पर इस तरह के वीडियो अपलोड हो रहे हैं वो चिंता की बात है। देश को और सरकार को इसपर विचार करना ही चाहिए। 

Saturday, July 11, 2020

पत्र और पुस्तक से चुनावी दांव


नवंबर में अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव होना है। वहां चुनाव की सरगर्मियां बहुत तेज हो रही हैं। कोरोना के भयावह संकट से जूझ रहे देश में भी राजनीति के दांव-पेंच तो अपनी गति से चल ही रहे हैं लेकिन राजनीति से इतर वो गतिविधियां तेज हो गई हैं जो राजनीति को प्रभावित करती हैं। राष्ट्रपति के चुनाव के पहले उम्मीदवारों के बारे में पुस्तकें प्रकाशित होने का चलन रहा है। कभी किसी के पक्ष में तो कभी किसी को ध्वस्त करने की मंशा से पुस्तकें लिखी जाती रही हैं। चुनाव के मौसम में इस तरह की पुस्तकें बिकती भी हैं। पुस्तकों की बिक्री से प्रकाशक भी उत्साहित होते हैं और वो भी चुनाव के वक्त ऐसे लेखकों की तलाश में रहते हैं जो राष्ट्रपति के उम्मीदवार के करीब हों और उनके बारे में कुछ विस्फोटक लिख सकें। इसके अलावा पिछले दो तीन दशकों से वहां के चुनाव में लेखकों की आड़ में भी राजनीति शुरू हुई है। अमेरिका में डेमोक्रैट और रिपब्लिकन के समर्थक लेखक अपने-अपने उम्मीदवारों के समर्थन में प्रत्यक्ष या परोक्ष अपील भी जारी करते रहे हैं। अब जब इसी वर्ष नवंबर में अमेरिका में राष्ट्रपति पद का चुनाव होना है तो वहां पुस्तकें भी छपने लगी हैं और अपील भी जारी होने लगे हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिका का राष्ट्रपति बने लगभग चार साल होने को आए लेकिन इसके पहले वहां के बुद्धिजीवियों को ये याद नहीं आया था कि पूरी दुनिया में अभिव्यक्ति की आजादी पर पाबंदी लगाई जा रही है या स्वतंत्र राय व्यक्त करने पर सत्ता द्वारा परेशान किया जाने लगा है।

कुछ दिनों पहले अमेरिका और वहां की संस्थाओं से संबद्ध डेढ सौ बुद्धिजीवियों, स्तंभकारों, नाटककारों, लेखकों ने एक पत्र जारी किया। उन्होंने पूरी दुनिया में स्वतंत्र राय रखनेवालों को हो रही मुश्किलों पर चिंता जताते हुए उदारवादी शक्तियों पर अनुदारवादी ताकतों के प्रबल होते जाने के खतरे को रेखांकित किया है। इस पत्र पर हस्ताक्षऱ करनेवालों में हैरी पॉटर सीरीज की लेखिका जे के रॉलिंग से लेकर बुकर पुरस्कार प्राप्त उपन्यासकार, कहानीकार और कवयित्री के रूप में पूरी दुनिया के साहित्य जगत में समादृत मार्गेट अटवुड, वामपंथियों के ‘परम श्रद्धेय’ विचारक नोम चोमस्की, विवादास्पद लेखक सलमान रशदी के अलावा भी कई नामचीन हस्तियां शामिल हैं। इन सबलोगों की चिंता ये है कि पूरी दुनिया में स्वतंत्र विचारों का विनिमय बाधित किया जा रहा है ।ये मानते हैं कि स्वतंत्र विचारों का विनिमय उदारवादी समाज की प्राणवायु है और इसपर प्रतिबंध लगाने की परोक्ष कोशिशों से अनुदारवादी समाज की तरफ बढ़ रहे हैं। इस पत्र में असहिष्णुता का मुद्दा भी उठाया गया है और अमेरिकी समाज में बढ़ती असहिष्णुता को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई है। इस अपील के बाद अमेरिका में सोशल मीडिया पर इसको लेकर घमासान छिड़ गया। कुछ लोगों ने अमेरिका में ‘स्थगित संस्कृति’ का जुमला उछाला। हलांकि इस पत्र पर हस्ताक्षर करनेवाले चंद लोगों ने इसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जेनिफर बॉयलेन ने तो ट्वीट करके कहा कि वो नहीं जानती कि उनके अलावा और किसने इसपर हस्ताक्षर का है, वो तो ये समझ रही थीं कि ये अपील इंटरनेट पर होनेवाले दुर्व्यवहार के विरोध में है। इतिहासकार केरी ग्रीनिज तो इससे भी एक कदम आगे चली गईं और साफ किया कि वो हार्पर पत्रिका में छपे पत्र से सहमत नहीं हैं। केरी ग्रनिज के इस विरोध के बाद हार्पर ने उनका नाम इस पत्र से हटा भी दिया। दरअसल ये वामपंथी रुझानवाले लेखकों और बुद्धिजीवियों की अपनी विचारधारा वाले राजनीति दल को समर्थन करने का एक औजार मात्र है। इसमें वो समाज में अपनी साख का उपयोग अपनी विचारधारा को मजबूत करने और उस विचारधारा के आधार पर चलनेवाले राजनीतिक दलों को फायदा पहुंचाने के लिए करते हैं। हमारे देश ने भी चुनाव के समय बुद्धिजीवियों, नाटककारों, फिल्मकारों के कई ऐसे पत्र या अपील देखे हैं।
अमेरिका में जो पत्र जारी किया है उसमें वैश्विक स्तर पर अनुदारवादी विचार के मजबूत होने को लेकर चिंता जताई गई है। लेकिन नोम चोमस्की जैसे लोग भी ये भूल जाते हैं कि रूस के राष्ट्रपति पुतीन ने अब से कुछ दिनों पहले ही ही कहा था कि ‘उदारवादी विचार को जनता ने नकारना शुरू कर दिया है। अब वो दौर आ गया है कि उदारवादी किसी को भी किसी भी समय इस अवधारणा की आड़ में कुछ भी करने को मजबूर नहीं कर सकते हैं। पिछले कई दशकों के दौरान उदारवाद के नाम पर लोगों को तरह तरह के आदेश देकर सत्ता से अपने हिसाब से काम करवाया। उदारवाद के नाम पर अराजकता की इजाजत कतई नहीं दी जा सकती है। पुतीन का मानना है कि उदारवाद का सिद्धांत किसी भी देश के बहुमत के अधिकारों के खिलाफ जाता है, लिहाजा अब वो अर्थहीन हो चुका है।‘   पुतीन ने तब उदारवादी व्यवस्था की कमियों को लेकर बेहद आक्रामक तरीके से अपनी बातें रखी थीं। इस आलोक में अगर इन बुद्धिजीवियों की चिंता को देखें तो वो महज एक चुनावी दांव ही नजर आता है। 
अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के पहले पुस्तकों का प्रकाशन भी शुरू हो गया है। चंद दिनों पहले ही राष्ट्रपति ट्रंप की भांजी मैरी एल ट्रंप की एक पुस्तक आई है, ‘टू मच एंड नेवर एनफ, हाउ माई फैमिली क्रिएटेड द वर्ल्ड्स मोस्टडेंजरस मैन’ जिसमें ट्रंप के कई राज खोलने का दावा किया गया है। मैरी ट्रंप ने अपनी इस पुस्तक में अपने पारिवारिक झगड़ों और रिश्तों के बनने-बिगड़ने की कथा लिखी है। किताब खूब बिक भी रही है। इसके विवादास्पद अंश भी अमेरिका समेत पूरी दुनिया के अखबारों में छप रहे हैं। जैसा की पुस्तक के नाम से ही जाहिर है कि लेखिका ने किताब में क्या लिखा होगा। इस पुस्तक के विवादास्पद अंशों को लेकर अमेरिका में राजनीतिक बयानबाजी भी हो रही है। अमेरिका के चुनावी इतिहास को देखते हुए इस बात की संभावना है कि इस तरह की कई किताबें नवंबर के पहले प्रकाशित होंगी।
जब से हमारे देश में चुनाव लड़वाने वालों की पूछ बढ़ी है, जो आंकड़ों के अलावा चुनावी माहौल बनाने का वैज्ञानिक तंत्र खड़ा करने का दावा करते हैं, तब से यहां भी चुनाव के पहले पुस्तकों का प्रकाशन या बुद्धिजीवियों, फिल्मकारों या नाटककारों से अपील करवाने का चलन बढ़ा है। मतलब कि अमेरिका की तर्ज पर उन चुनावी औजारों का यहां भी उपयोग होने लगा है। हमारे देश में भी चुनावों के पहले असहिष्णुता का मुद्दा एक बार अवश्य उठता है। 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले तो चुनाव को ध्यान में रखकर किताबें भी लिखी भी गईं और प्रकाशित भी हुईं। चुनाव के पहले ‘व्हाई आई एम अ हिंदू” से लेकर ‘व्हाई आई एम अ लिबरल’ जैसी पुस्तकें प्रकाशित हुईं। उदारवादियों ने 2014 के बाद नरेन्द्र मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि सरकार अनुदारवादी है। दो हजार चौदह से लेकर दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव तक ये भी कहा जाता रहा कि सरकार में अनुवादरवादी शक्तियां प्रबल हैं। केंद्र सरकार पर तानाशाही से लेकर फासिज्म तक के आरोप जड़े जाते रहे। लेकिन चुनाव लड़वाने वाले और जितवाने वाले चाहे जितना दावा करें लेकिन जनता के मानस को समझने की जो दृष्टि जमीन से जुड़े नेताओं में होती है वो इन चुनावी मैनेजरों के पास नहीं होती। इसलिए न तो अमेरिका के चुनाव में अपील और किताबों के प्रकाशन का बहुत असर दिखता है और न ही भारत दो आम चुनाव में दिखा।

Friday, July 10, 2020

प्रचार के लिए कुछ भी...


ऐसा बहुत कम होता है कि किसी अन्य भाषा की फिल्म को लेकर दूसरी भाषा के लोग उद्वेलित हों। इन दिनों तेलुगू में बनी एक फिल्म को लेकर हिंदी भाषा के दर्शकों का एक बड़ा वर्ग क्षुब्ध नजर आ रहा है। दरअसल तेलुगू में एक फिल्म आई है जिसका नाम है कृष्णा एंड हिज लीलाऔर ये फिल्म नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई। इस फिल्म के रिलीज होने के बाद इसके नाम को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। ट्विटर पर लोगों का गुस्सा जमकर निकल रहा है और वो नेटफ्लिक्स पर पाबंदी लगाने की मांग कर रहे हैं। दरअसल अंग्रेजी सबटाइटल के साथ रिलीज हुई इस फिल्म में नायक का नाम कृष्णा है और उसकी एक गर्लफ्रेंड का नाम राधा और एक का सत्या है। रुक्मिणी से प्रेरित होकर एक पात्र का नाम रुखसार रख दिया गया है। इस फिल्म के आरंभ और अंत में ये बताया जाता है कि ये सत्य अफवाह पर आधारित है। दरअसल इसमें कहीं भी कृष्ण की कहानी नहीं है बस नाम रखकर विवादित करने की कोशिश दिखाई देती है। ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म पर दिखाए जाने वाले कंटेंट की तुलना में ये फिल्म साफ सुथरी है। लेकिन नाम से विवादित करके दर्शकों को अपनी ओर खींचने का प्रयास है।
पौराणिक नामों को रखकर विवाद खड़ा करके प्रचार हासिल करने की कोशिशें पहले भी की जाती रही हैं पर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के होने से स्थिति अराजक नहीं हो पाती थीं। 2017 में गोवा में आयोजित अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के इंडियन पैनोरमा में एस दुर्गा फिल्म को अनुमति नहीं देने पर विवाद हुआ था। मामला कोर्ट कचहरी तक गया था। इस फिल्म का नाम पहले कुछ और था लेकिन बाद में इसको एस दुर्गा किया गया था। इस बीच कई जगह इस फिल्म के पोस्टर पर थ्री एक्स दुर्गा भी लिखा गया था। भारतीय समाज में बेहद समादृत पौराणिक चरित्रों और देवी देवताओं के नाम के साथ इस तरह के शब्दों को जोड़कर विवाद खड़ा करने की कोशिशें वाटर फिल्म में दीपा मेहता ने भी की थी। इसी तरह से कुछ समय पहले नेटफ्लिक्स पर लैला नाम की एक वेब सीरीज में इस तरह का प्रयास किया गया था। ओटीटी को लेकर कोई नियमन ने होने की वजह से जो फिल्में यहां रिलीज होती हैं वो मनमानी कर सकती हैं। अगर नियमन होता को कृष्णा एंड हिज लीला जैसे नामों पर प्रमाणन के पहले विचार तो होता ही।

Sunday, July 5, 2020

‘सरस्वती’ और श्यामा प्रसाद मुखर्जी

हिंदी साहित्य के इतिहास में ‘सरस्वती’ पत्रिका का अपना एक विशिष्ट स्थान है। इस पत्रिका का प्रकाशन सन 1900 से आरंभ हुआ तो बाबू श्यामसुंदर दास ने इसका जिम्मा संभाला था। तीन साल बाद आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी इसके संपादक बनाए गए थे जो 1920 तक रहे। इनके बाद पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और पंडित देवीदत्त शुक्ल जैसे विद्वानों ने इस पत्रिका को संभाला था। ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से इसके संपादकों ने हिंदी को बहुत समृद्ध किया। इस पूरे दौर मे ‘सरस्वती’ पत्रिका में उत्कृष्ट साहित्य तो छपता ही था उस दौर की प्रमुख हस्तियों पर भी लेख आदि छपा करते थे। संपादकों की दृष्टि इतनी सजग होती थी कि कोई भी महत्वपूर्ण साहित्यिक घटना या साहित्यप्रेमी से संबंधित किसी प्रसंग को विषय विशेष के विद्वान से लिखवाते थे। इस बात की चर्चा इस वजह से प्रांसंगिक है कि आज भारत माता के सपूत श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जब देश की एकता और अखंडता के लिए 23 जून को अपना बलिदान दिया था तो ‘सरस्वती’ पत्रिका में देश, समाज और साहित्य के प्रति उनके योगदान को रेखांकित करते हुए चार पन्ने का बड़ा लेख प्रकाशित हुआ था। ये लेख लिखा था उस वक्त इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के आचार्य शिवाधार पांडेय ने और उस वक्त पत्रिका के संपादक थे पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और देवीदयाल चतुर्वेदी।
इस लेख की शुरुआत शिवाधार जी ने कुछ इस प्रकार की थी, ‘कलिकाल में भी इस भारत भूमि में नररत्न अवतार लेते हैं, कर्मभूमि में आकर अपने कर्म सुधारते हैं, परलोक संवारते हैं और संसार उद्धारते हैं। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ऐसे ही अवतारी पुरुष थे।‘ सरस्वती पत्रिका में इस लेख का शीर्षक ‘नरकेसरी श्यामा प्रसाद मुखर्जी’ दिया गया था। अपने लेख में आचार्य शिवाधार पांडेय ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के संस्मरण तो लिखे ही थे, उनकी लोकप्रियता को भी पाठकों के सामने प्रस्तुत किया था। देश को ये जानना चाहिए कि इस देश में ऐसे भी नेता हुए जिनके दौरे की जानकारी देने का समय नहीं होता था तो सड़क पर चूना से सिर्फ उनका नाम और स्थान लिख दिया जाता था और फिर सभा में ऐसी भीड़ उमड़ती थी कि सभास्थल पर तिल रखने की जगह नहीं होती थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ ऐसा ही हुआ था 1953 में मुंबई में एक जनसभा में। ये पूरा प्रसंग विस्तार से लिखा गया है।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जब अंग्रेजी में स्नातक किया तो उनके पिता आशुतोष मुखर्जी ने उनसे आग्रह किया कि उनको बांग्ला में एमए करना चाहिए क्योंकि इससे भारतीय भाषाओं को मजबूती मिलेगी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के दिल में ये बात बैठ गई, उन्होंने बांग्ला में एमए किया। इसके बाद जब वो कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने तो दीक्षांत समारोह में रवीन्द्रनाथ टैगोर को आमंत्रित किया। जब टैगोर ने आमंत्रण स्वीकार कर लिया तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उनसे अनुरोध किया कि वो अपना भाषणा बांग्ला में दें। टैगोर ने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया और कलकत्ता विश्वविद्यालय में पहली बार किसी ने बांग्ला में भाषण दिया। ये अपनी भाषा के प्रति श्यामा प्रसाद मुखर्जी का प्रेम था। श्यामा प्रसाद मुखर्जी को हिंदी से भी बहुत लगाव था। जनसंघ का पहला अधिवेशन कानपुर के फूलबाग में दिसंबर 1952 में हुआ था और डॉ मुखर्जी तीन दिन तक वहां उपस्थित रहे थे, इसको भी शिवाधार पांडेय जी ने दिलचस्प तरीके से ‘सरस्वती’ के लेख में रेखांकित किया है। 

Saturday, July 4, 2020

वामपंथियों की दिनकर से चिढ़ पुरानी


चीन से जारी तनातनी के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लेह की यात्रा की और वहां सेना के जवानों को संबोधित करते हुए दिनकर की कविता की पंक्तियों को भी उद्धृत किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राजनीति में अपने गैरपारंपरिक तौर तरीकों से चौंकाते रहे हैं। अब कूटनीति के एक नए आयाम में भी उन्होंने कविता के मार्फत संदेश देकर चौंकाना शुरू किया है। मोदी की साहित्य में रुचि रही है, गुजराती में छपी उनकी कविताओं को देखकर ये समझा जा सकता है। किताबों से उनको प्रेम है। किसी का स्वागत करने के लिए फूल की जगह किताब की पैरोकारी कर प्रधानमंत्री ने पुस्तकप्रेमियों को दिल जीत लिया था। इसी तरह से कुछ साल पहले एक पुरस्कार समारोह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह कहकर सबको चौंका दिया था कि हर घर मे पूजाघर की तरह एक पुस्तकालय अवश्य होना चाहिए। उन्होंने तो यहां तक कह दिया था कि घर बनाते समय आर्किटेक्ट से नक्शे में पुस्तकालय के प्रावधान के लिए अनुरोध किया जाना चाहिए। इसके अलावा जब नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं बने थे और संगठन का काम संभालते थे तो उस वक्त वो खूब पत्र लिखा करते थे। उन पत्रों को देखने से भी इस बात का पता चलता है कि मोदी में एक गहरी साहित्यिक अभिरुचि है। यह अकारण नहीं है कि वो समय-समय पर अपनी रैलियों में कविताओं का उपयोग करते हैं। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भी उन्होंने ‘ये देश नहीं मिटने दूंगा’ जैसी ओजपूर्ण कविता के माध्यम से देश को संदेश दिया था। कविता के माध्यम से जनता से जुड़ने और उनके दिलतक अपनी बात पहुंचाने का उनका अपना एक अलग ही अंदाज है।

प्रधानमंत्री मोदी का दिनकर की कविताओं को उद्धृत करना कई लोगों को खल गया। कुछ लोग दिनकर की उन पंक्तियों को उद्धृत करने लगे जिनमें उन्होंने जवाहरलाल नेहरू की प्रशंसा की थी। कई वामपंथी विचारधारा की तरफ झुकाव रखनेवाले लेखकों ने तो दिनकर को दक्षिणपंथी करार दे दिया। अपने कहे के समर्थन में वो प्रसंग उठा लाए जब दिनकर ने पांचजन्य पत्रिका के लिए छात्रों से बातचीत की थी। यहां सवाल दिनकर की रचनाओं को समझने का है। हिंदी में दिनकर अकेले ऐसे कवि हैं जो अपनी रचनाओं में खुद को अपने समय का सूर्य घोषित करते हैं – ‘मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूं मैं, उर्वशी ! अपने समय का सूर्य हूं मैं।‘ तो सूर्य का ताप उनकी कविताओं में भी दिखाई देता है। वामपंथियों ने लंबे समय तक दिनकर को हाशिए पर डालने की कोशिश की, उनके खिलाफ लिखा गया, उनकी उपेक्षा की गई। दिनकर को उनके जीवनकाल में ही साहित्य की परिधि पर धकेलने का प्रयास विदेशी विचारधारा के प्रभाव में काम कर रहे आलोचकों और लेखकों ने संगठित रूप से किया। उऩकी मृत्यु के बाद भी उनकी रचनाओँ का मूल्यांकन ना हो पाए, इस बात की कोशिश की गई। लेकिन दिनकर की रचनाओं में इतना दम है कि उसको दबाया नहीं जा सका।

वामपंथियों की दिनकर से चिढ़ पुरानी है। 1962 में चीन से पराजय के बाद जब दिनकर ने परशुराम की प्रतीक्षा लिखा को उनके खिलाफ इस विचारधारा के लोगों ने काफी दुष्प्रचार किया था। दिनकर ने लिखा भी है कि ‘‘परशुराम की प्रतीक्षा’ से तीन प्रकार के लोग नाराज हुए। एक तो वे, जो गांधीवाद का अर्थ यह समझते हैं कि कि दुश्मन जब धावा करे, तब उसे रोकने के लिए निहत्थे आदमियों को सरहद पर लेट जाना चाहिए। दूसरे वे लोग, जो यह समझते थे कि चूंकि चीन कम्युनिस्ट है, उसलिए उसके विरुद्ध उत्पन्न क्रोध की लपट प्रगतिशील भावनाओं को भी आंच पहुंचा सकती है। और तीसरे वे लोग, जो समझती थे कि सरकार अकर्मण्य रहना चाहती है, अतएव इस कविता के विरोध से सरकार के नेता खुश हो जाएंगें।‘  दिनकर को इस बात का भान था कि कम्युनिस्ट उनकी इस रचना के खिलाफ हैं और वो चीन को ललकारने की भावना को बढ़ाना नहीं देना चाहते हैं। इस वजह से भी उन्होंने दिनकर की इस कृति का नोटिस नहीं लिया। तब दिनकर ने लिखा था कि उनकी नजर में समाचारपत्रों के वे संपादक साहसी थे जिन्होंने ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ की समीक्षाएं प्रकाशित की थी। ऐसा प्रतीत होता है कि दिनकर उन दिनों कम्युनिस्टों से इस बात को लेकर झुब्ध थे कि वो चीनी आक्रमण के बाद भी चीन की निंदा नहीं कर रहे थे। दिनकर ने लिखा, ‘कम्युनिस्टों ने खुली आलोचनाएं तो बहुत कम लिखीं, किन्तु कानाफूसी के जरिए उन्होंने अपनी नाराजगी का समाचार सरहद के पार तक पहुंचा दिया था। इसलिए मुझे आश्चर्य हुआ कि पिछले 8 अक्तूबर 1964 ई. को साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित अपने स्वागत समारोह में श्री चेलीशेव ने यह कहा कि ‘चीनी आक्रमण के समय आपलोगों ने क्या लिखा, यह रूस में हम नहीं जान सके। हमने तो केवल ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ को पढ़ा और उसी काव्य की चर्चा हमारे देश में फैली है। आश्चर्य, संभव है, कुछ साम्यवादी पंडितों को भी हुआ हो।‘ तो यह कहा जा सकता है कि दिनकर ने अपनी रचनाओं में बहुधा वामपंथियों के दोहरे चरित्र को उजागर किया और उनके असली चेहरे को सामने लाने में हिचके नहीं। वो कहते भी थे कि उनको क्रेमलिन से आया फरमान कतई मंजूर नहीं है।
इस वक्त जो वामपंथी दिनकर की आलोचना करने में लगे हैं या फिर दिनकर को कांग्रेसी और नेहरू का चमचा कह रहे हैं उनको न तो दिनकर के बारे में पता है और न ही इतिहास बोध। वो तो बस उस सूखे पुआल के रखवाले की तरह हैं जो अंगार से डरता है। अब वामपंथी विचारधारा सूखा हुआ पुआल हो चुका है और ये वामपंथी उनके रखवाले जो दिनकर की रचनाओं के अंगार से भयाक्रांत दिखाई देते हैं। डर इस बात का है कि अगर इतिहास की लिखी सारी बातें अंगार के रूप में सामने आ जाएंगी तो सूखे पुआल को जलते देर नहीं लगेगी। दरअसल ये समझना होगा कि दिनकर की कविताओं में जो राजनीतिक चेतना है उसके आधार में राष्ट्र का हित है। नेहरू से वामपंथी इस वजह से भी चिढ़ते थे कि वो लगातार नेहरू के वामपंथ के प्रभाव से मुक्त होने की बात भी करते थे। एक बार दिनकर ने कह दिया था कि जैसे जैसे मार्क्स के सिद्धांत काल के गियर से छूटते गए वैसे वैसे पंडित जी की आस्था मार्क्स पर कम होती गई। इस तरह के बेबाक बोल उस वक्त की ताकतवर विचारधारा के कर्ताधर्ताओं को नहीं भाता था।  
एक किस्सा कई बार सुनाया जाता है कि एक बार किसी कार्यक्रम में दिनकर और जवाहरलाल नेहरू दोनों पहुंचे थे। कार्यक्रम स्थल पर जाने के दौरान नेहरू सीढ़ियों पर लड़खड़ा गए थे, उस वक्त दिनकर ने उनका हाथ थाम लिया था। जवाहरलाल नेहरू ने दिनकर को धऩ्यवाद कहा। इस धन्यवाद के उत्तर में दिनकर ने कहा था ‘जब जब सत्ता लड़खड़ाती है तो सदैव साहित्य ही उसे संभालती है।‘ दिनकर ने ये बात भले ही मजाक में कही हो लेकिन उस वक्त नेहरू की लड़खड़ाती सत्ता पर ये कड़ा व्यंग्यात्मक प्रहार था। आज दिनकर की आलोचना करनेवाले ये भूल जाते हैं कि उन्होंने राज्यसभा सांसद रहते कई मुद्दों पर नेहरू की आलोचना भी की थी। चाहे वो भाषा का मुद्दा हो या फिर भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का, दिनकर ने खुलकर अपनी बात रखी थी। उस वक्त की सरकार को कभी अपनी रचनाओं के माध्यम से तो कभी भाषणों से कठघरे में खड़ा किया था।

Saturday, June 27, 2020

वेब सीरीज पर लगाम कसने का समय


‘दुख हुआ, वेब-सीरीज ‘रसभरी’ में असंवेदनशीलता में एक छोटी बच्ची को पुरुषों के सामने उत्तेजक नाच करते हुए, एक वस्तु की तरह दिखाना निंदनीय है। आज रचनाकार और दर्शक सोचें कि बात मनोरंजन की नहीं, यहां बच्चियों के प्रति दृष्टिकोण का प्रश्न है, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है या शोषण की मनमानी? यह प्रश्न उठा रहे हैं केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड, जिसको बातचीत में सेंसर बोर्ड भी कहा जाता है, के अध्यक्ष और मशहूर गीतकार प्रसून जोशी। प्रसून जोशी पहले भी अपनी आपत्तियों को सार्वजनिक करने से बचते रहे हैं और जब से प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष बने हैं तब से तो बिल्कुल ही नहीं बोलते हैं, लेकिन वेबसीरीज ‘रसभरी’ के इस दृष्य ने उनको इतना उद्वेलित कर दिया कि वो सामने आए। उनकी इस आपत्ति का उत्तर दिया ‘रसभरी’ वेबसीरीज की नायिका स्वरा भास्कर ने, ‘आदर सहित सर, शायद आप सीन को गलत समझ रहे हैं, सीन का जो वर्णन किया है वो उसके ठीक उल्टा है। बच्ची अपनी मर्जी से नाच रही है, पिता देखकर झेंप जाता है और शर्मिंदा होता है। नाच उत्तेजक नहीं है, बच्ची बस नाच रही है, वो नहीं जानती समाज उसे सेक्सुअलाइज करेगा-सीन यही दिखाता है।‘  स्वरा बचाव करने की लाख कोशिश करे लेकिन बच्ची से उत्तजेक गाने पर नाच करवाने की कहानी या कहानी में जो पृष्ठभूमि या संवाद है उससे ही मंशा का पता चलता है। बच्ची के नाच के पहले एक महिला का ये कहना कि, ‘थोड़ा बहुत नाच गाना लड़कियों को आना चाहिए, कल को अपने पति को रिझाए रखेगी’ और गाना देखकर फिर वही महिला कहती है कि ‘तेरी बेटी के लक्षण ठीक नहीं लग रहे’ तो दूसरी महिला खास अदा के साथ कहती है कि ‘ये सिर्फ अपने पति को नहीं बल्कि पूरे मुहल्ले को रिझाएगी।‘ अगर इन संवादों के साथ प्रसून जोशी की आपत्ति को देखेंगे तो उसमें एक गंभीरता दिखाई देती है और स्वरा की प्रतिक्रिया बेहद हल्की और तथ्यहीन। किसी भी मुद्दे पर विचार करने से पहले उसपर समग्रता से सोचना आवश्यक होता है अन्यथा प्रतिक्रिया सतही होती है।

‘रसभरी’ और उसमें स्वरा की भूमिका ऐसी है जिसको खुद स्वरा ही नहीं चाहती की उसके पिता इस वेब सीरीज को उस वक्त देखें जब वो उनके आसपास हो। ये तो स्वरा ने सार्वजनिक रूप से माना है। उसके पिता ने अपनी बेटी को शाबाशी देते हुए ट्वीट किया कि उनको अपनी बेटी की प्रतिभा पर गर्व है। इसके उत्तर में स्वरा ने लिखा कि ‘डैडी! कृपया इसको उस वक्त नहीं देखें जब मैं आपके आसपास रहूं।‘ अब जरा इस मानसिकता को समझिए कि एक पुत्री अपने पिता को सार्वजनिक रूप से कह रही है कि वो इस वेब सीरीज को अपनी बेटी के आसपास होने पर न देखें और वही प्रसून जोशी को समाज की मानसिकता आदि के बारे में नसीहत देती है और समझाती है कि बच्ची सिर्फ नाच रही है। वैसे भी ये वेब सीरीज इतना फूहड़ और इसके संवाद इतने स्तरहीन हैं कि इसको कोई भी संजीदा व्यक्ति परिवार के आसपास होने पर नहीं देखना पसंद करेगा। प्रसून जोशी ने एक वेब सीरीज में बच्ची के नाच को लेकर जो सवाल खड़ा किया है उसपर हमारे समाज को विचार करना चाहिए। क्या वेब सीरीज की दुनिया अब इतना नीचे गिर जाएगी कि वो यौन प्रसंगों से भी आगे बढ़कर अब बच्चियों को एक आब्जेक्ट के तौर पर पेश करेगी। लाभ कमाने के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाना कहां तक उचित है? दरअसल ये एक और संकेत है कि ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म पर कंटेंट को लेकर कितनी अराजकता बढ़ती जा रही है। इन सीरीज पर किसी भी प्रकार का कोई नियमन नहीं होने की वजह से अराजकता अपने चरम पर है। पता नहीं क्यों वेब सीरीज निर्माताओं को ये क्यों लगता है कि अगर इनकी भाषा स्तरहीन रखी जाएगी, यौन प्रसंग होंगे, भयंकर हिंसा होगी तभी इसको दर्शक मिलेंगे। कुछ शुरुआती वेब सीरीज बनानेवाले निर्देशकों की वजह इस तरह की भ्रांति बनी। ‘रसभरी’ भी इसकी शिकार हुई है क्योंकि प्रचारित ये किया जा रहा है ‘रसभरी के जादू से कोई बच नहीं सकता एक बार आजमा कर तो देखो।‘ दो हजार अठारह में ‘वीरे द वेडिंग’ फिल्म में अपनी भूमिका से स्वरा ने जो छवि बनाई उसको ‘रसभरी’ पुष्ट करती है। कई बार इन सीरीज की प्रचार सामग्री से भी इस बात का अंदाज लग जाता है कि इसमें क्या होगा। लेकिन इसके ठीक पहले हॉटस्टार पर रिलीज ‘आर्या’ और उसके पहले प्राइम वीडियो पर रिलीज ‘पंचायत’ ने इस भ्रांति को भी तोड़ा कि जुगुप्साजनक अश्लीलता, नग्नता और हिंसा ही किसी सीरीज को चर्चित बनाती है। ‘आर्या’ में जिस तरह से ड्रग के धंधे को दिखाया गया है उसमें अश्लील दृश्यों को दिखाने की पूरी संभावना थी लेकिन निर्माता उस रास्ते पर नहीं चले। इस सीरीज में सुष्मिता सेन को लेकर या फिर अन्य नायिकाओं की नग्नता का प्रदर्शन किया जा सकता था लेकिन ऐसा किया नहीं गया और बहुत साफ सुथरे तरीके से कहानी आगे बढ़ती चली गई। दर्शक कहानी के सम्मोहन में इसके साथ जुडा रहता है। आज हालत ये है कि ‘आर्या’ किसी भी सीरीज से कम लोकप्रिय नहीं है। सुष्मिता सेन की अदाकारी, कहानी और संवाद का कसावट दर्शकों को अंत तक बांधे रखता है। इसमें भी कहीं-कहीं निर्माता भटकते दिखते हैं लेकिन फौरन संभल जाते हैं।
वेब सीरीज की अराजकता का दायरा धीरे-धीरे बढता जा रहा है। जो किताबें दशकों पहले फुटपाथ पर पीली पन्नियों में छुपाकर बेची जाती थीं, अब उसी स्तर की कहानियां और उसपर बनी फिल्में इन प्लेटफॉर्म पर वेबसीरीज के रूप में मौजूद हैं। ‘मस्तराम’ के नाम की जो किताबें कई सालों पहले किशोर और युवा छुपा कर पढते थे, कभी अपनी कोर्स की किताबों के बीच छुपाकर तो कभी घर के किसी सूने कोने में छिपकर अब उसी मस्तराम के नाम से पूरी की पूरी सीरीज ओटीटी पर उपलब्ध हैं। जिसमें उन किताबों की कहानियों को फिल्मा दिया गया है। इतना ही नहीं ‘कविता भाभी’, ‘लाली भाभी’ जैसी सीरीज भी उपलब्ध हैं। इन सीरीज में जो नग्नता दिखाई जा रही है उसपर समाज को विचार करना चाहिए। देशभर में इसपर चर्चा होनी चाहिए कि क्या इस तरह की नग्नता किसी प्लेटफॉर्म पर दिखाया जाना उचित है। क्या हमारा समाज इस तरह की सामग्री को परोसने की इजाजत दे सकता है। क्या हमारा समाज इतना परिपक्व हो चुका है कि इस तरह की कामोद्दीपक सीरीज को स्वीकार किया जा सके। कुछ लोग ये तर्क दे सकते हैं कि ओटीटी प्लेटफॉर्म फिल्मों से अलग है क्योंकि फिल्में सार्वजनिक तौर पर प्रदर्शित की जाती हैं, उसको सामूहिक तौर पर देखते हैं और वेब सीरीज को अपने मोबाइल पर व्यक्तिगत तौर पर देखते हैं। यह तर्क अपनी जगह सही हो सकता है लेकिन क्या इन वेब सीरीज पर इतना कंट्रोल है कि जो लोग वयस्क नहीं हैं और किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रख रहे हैं या जिनको अभी यौनिकता की समझ विकसित नहीं हुई है वो इसको देख नहीं सके। वेब सीरीज की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए ऐसा लगता है कि अब समय आ गया है कि सरकार इसके बारे में कुछ सोचे। सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष की तरफ से बच्ची के नाच पर बयान आना क्या इस ओर कोई संकेत कर रहा है या फिर प्रसून जोशी के बयान को सिर्फ उनका व्यक्तिगत बयान माना जाए। तमाम नजरें सूचना प्रसारण मंत्रालय की ओर है।