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Saturday, March 25, 2023

राजनीतिक कोलाहल में गुम होता विमर्श


संसद के बजट सत्र में लगातार हंगामा होता रहा है। फिर मानहानि केस में दो साल की सजा के बाद राहुल गांधी की सदस्यता समाप्त हो गई। संसद से लेकर सड़क तक हंगामा और बढ़ गया। आरोप प्रत्यारोप की राजनीति तेज हो गई है। बयानों के कोलाहल में संसद से जुड़ी कुछ समितियों की सिफारिशें और सरकार का उत्तर कहीं दब सा गया। एक वर्ष के बाद लोकसभा का चुनाव होना है। देश में राजनीति चरम पर है। पर संसदीय व्यवस्था का जो विमर्श लोगों तक पहुंचना चाहिए उसको बाधित करने का अधिकार राजनीति को नहीं है। संसदीय व्यवस्था के विमर्श को बाधित करने से जनता अंधेरे में रह जाती है और ये लोकतंत्र को कमजोर करता है। संसद के बजट सत्र में हुए हंगामे के कारण देश की संस्कृति से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण विमर्श पर अपेक्षित चर्चा नहीं हो पाई। संस्कृति मंत्रालय से जुड़ी संसदीय समिति ने संस्कृति मंत्रालय की बजट राशि में बढोतरी की बात की। समिति का कहना है कि इस वर्ष के बजट का सिर्फ 0.075 प्रतिशत ही संस्कृति मंत्रालय को आवंटित किया गया है। जबकि चीन, ग्रेट ब्रिटेन, अमेरिका और आस्ट्रेलिया अपने कुल बजट का दो से पांच प्रतिशत संस्कृति के विकास और संरक्षण पर आवंटित करता है। संसदीय समिति की इस टिप्पणी पर संस्कृति मंत्रालय ने अपनी स्थिति स्पष्ट की। मंत्रालय के मुताबिक भारत जैसे विकासशील देश में जहां ग्रामीण इलाके में आधारभूत ढांचा, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन की स्थिति प्राथमिकता में है वहां जनता के अधिक धन को संस्कृति और कला के विकास पर खर्च करना तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता है। मंत्रालय की तरफ से ये भी कहा गया कि जिन देशों में कला और संस्कृति के विकास पर अधिक खर्च किया जा रहा है उनमें से अधिकांश राशि निजी क्षेत्रों के सहयोग से जुटाई जा रही है। संस्कृति मंत्रालय भी कला और संस्कृति के विकास के लिए देश की निजी कंपनियों को प्रोत्साहित कर रही है। अनेक ऐसी योजनाएं भी आरंभ की गई हैं जहां स्मारकों और पौराणिक इमारतों के रखरखाव का कार्य निजी कंपनियों को सौंपा गया है। 

ये एक ऐसा विषय है जिसपर राष्ट्रव्यापी चर्चा होनी चाहिए। यह सही है कि विकासशील देश की अलग प्राथमिकताएं होती हैं और विकसित देश की अलग। भारत जैसे समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाले देश को ये भी सोचना होगा कि क्या संस्कृति इसकी प्राथमिकता में है या नहीं? यह ठीक है कि शिक्षा,स्वास्थ्य और ग्रामीण इलाकों में आधारभूत संरचनाएं हमारे देश की प्राथमिकता है लेकिन क्या हम इन चीजों के साथ संस्कृति को जोड़कर नहीं देख सकते हैं। परिवहन, पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय की स्थायी समिति की रिपोर्ट संख्या 315 में कहा गया था कि संस्कृति का विकास किसी भी देश के विकास का अभिन्न हिस्सा है। संस्कृति के विकास से आर्थिक विकास को भी गति मिलती है। इससे रोजगार सृजन होता है और दूसरे क्षेत्रों में भी आर्थिक गतिविधियों में तेजी आती है। संस्कृति के समग्र विकास से देश की एकता और अखंडता को भी शक्ति मिलती है। संस्कृति का संरक्षण और विकास हमारे देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संजोती है। संस्कृति को संजोने की बात तो प्रधानमंत्री भी कर चुके हैं। 

स्वाधीनता के अमृत महोत्सव पर लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमृतकाल के पांच प्रण बताए थे। उसमें तीसरा प्रण देश की विरासत पर गर्व है। विरासत पर गर्व तो तभी कर सकेंगे जब आनेवाली पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत के बारे में बता सकेंगे। आनेवाली पीढ़ी के लिए अपनी विरासत को संजो कर, उसको संरक्षित कर सकेंगे। किसी भी विरासत को संजोने और संरक्षित करने में धन की आवश्यकता होती है। संसदीय समिति के अवलोकन और संस्कृति मंत्रालय के उत्तर से ये स्पष्ट होता है कि सरकार अपनी विरासत को संजोने और उसको संरक्षित करने के लिए अब निजी क्षेत्र को भागीदार बनाना चाहती है। निजी क्षेत्र को भागीदार बनाया जाना चाहिए। बनाया जा भी रहा है। लेकिन यह भी देखना होगा कि जो कार्य सरनरेन्काद्रर मोदी या सरकारी विभाग कर सकते हैं उसको निजी क्षेत्र के लोग उसी जिम्मेदारी से निभा पा रहे हैं या नहीं। आज जब पूरा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है तो क्या ये माना जाए कि सरकार देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को निजी क्षेत्रों के भरोसे संरक्षित और उसके विकास के रास्ते पर चलने का मन बना चुकी है। कला संस्कृति के विकास में निजी क्षेत्र की भागीदारी लंबे समय से रही है। दिल्ली से लेकर मुंबई और कोलकाता से लकर बेंगलुरू और चेन्नई तक में निजी क्षेत्र की भागीदारी से कला संस्कृति को बल मिल रहा है। चाहे वो सांस्कृतिक केंद्र की स्थपना हो या कलाओं को सहेजने का उपक्रम। निजी क्षेत्र की भागीदारी है और बढ़ भी रही है।  

संस्कृति को लेकर एक महत्वपूर्ण बात ये है कि अबतक केंद्रीय बजट में संस्कृति मंत्रालय को जितनी धनराशि का आवंटन किया जा रहा है उसका सही उपयोग हो पा रहा है नहीं। आजकल संस्कृति से जुड़ी सरकारी संस्थाओं में एक ऐसी प्रवृत्ति देखी जा रही है जिसको अविलंब तर्कसंगत बनाए जाने की आवश्यकता है। आज स्थिति ये है कि संस्कृति से जुड़ी संस्थाएं लगातार कार्यक्रमों के आयोजन करने में लग गई है। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव पर विशेष आयोजन होना उचित था। उसके बाद भी लगातार आयोजनों से क्या हासिल हो रहा है। इसका परीक्षण तो किसी न किसी स्तर पर किया ही जाना चाहिए। संस्कृति के विकास का दायित्व जिन संस्थाओं पर है वो कुछ ठोस करने की बजाए आयोजनों में जुटी हैं। जिन संस्थाओं पर संरक्षण की जिम्मेदारी है वो भी प्रदर्शनियों आयोजित कर रही हैं। अधिकारियों के लिए बहुत आसान होता है कि वो किसी मंत्री या नेता को बुलाकर आयोजन का शुभारंभ करवा कर अपने नंबर बढ़वा लें। जबकि कुछ ठोस करने के लिए श्रम करना होगा। संस्कृति से जुड़े ग्रंथों के पुनर्प्रकाशन या नए ग्रंथों के प्रकाशन के कार्य में सुपात्र के चयन से लेकर उसके प्रकाशन तक में मेहनत की आवश्यकता होगी। जिस मेहनत की आवश्यकता आयोजनों में नहीं होती। सांस्कृतिक संस्थाओं की देखा देखी अब विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में भी आयोजनों की भरमार हो गई है। 

संस्कृति मंत्रालय से जुड़ी इन संस्थाओं के आयोजनों में जो खर्च होता है वो तो बजट में आवंटित राशि से ही होता है। इस धनराशि का उपयोग पौराणिक इमारतों और स्मारकों के संरक्षण पर किया जाना चाहिए। पूरे देश में आर्कियोलाजी सर्वे आफ इंडिया (एएसआई) के संरक्षित इमारतों में से ज्यादातर की हालत बहुत अच्छी नहीं है। इस स्तंभ में कई स्मारकों और उसके संरक्षण में लापरवाहियों का उल्लेख किया जा चुका है। ऐसी स्थिति में सरकार को सांस्कृतिक विकास के लिए एक संतुलन बनाकर चलना होगा। निजी क्षेत्र को सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित करने के लिए प्रेरित करना, उनको संरक्षण पर धन खर्च करने के लिए प्रोत्साहित करें ।साथ ही सरकारी विभागों को आवंटित धन राशि को लेकर एक ऐसी व्यवस्था बनाए जिसमें उसका सदुपयोग हो सके। संस्कृति मंत्रालय को ये भी देखना चाहिए कि जिन विभागों के पास सांस्कृतिक धरोहरों को बचाकर रखने की जिम्मेदारी है वहां पर्याप्त मानव संसाधन है कि नहीं। संस्कृति मंत्रालय की स्थायी समिति ने एएसआई में विशेषज्ञों और कर्मचारियों की कमी की ओर भी ध्यान आकर्षित करवाया था। मंत्रालय को उनकी नियुक्ति में तेजी लानी चाहिए। संस्कृति से जुड़ा एक काम नीति आयोग को भी करना चाहिए। उसको कई मंत्रालयों में संस्कृति से जुड़े कार्यों का आकलन करना चाहिए और फिर केंद्र सरकार को संस्कृति मंत्रालय के पुनर्गठन का सुझाव देना चाहिए। इससे संस्कृति से जुड़े सभी कार्य एक ही मंत्रालय से हो सकेंगे और धन भी बचेगा। 

Saturday, March 18, 2023

संघ पर आधारहीन आरोप


कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और सांसद राहुल गांधी को जब भी अवसर मिलता है वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर हमलावर रहते हैं। कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा को लेकर, कभी हिंदुत्व को लेकर, कभी वीर सावरकर को लेकर तो कभी सांप्रदायिकता को लेकर। वो भारतीय जनता पार्टी की सरकार को भी जब घेरने का प्रयास करते हैं तो सायास उसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर आ जाते हैं। अभी हाल में विदेश में भी उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निशाना साधा। राहुल गांधी का मानना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत में सभी संस्थाओं पर कबजा कर लिया है। इससे संवाद की प्रक्रिया बाधित हुई है बल्कि आयडिया आफ इंडिया को नुकसान पहुंचा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था तहस नहस हो गई है। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि भारत में वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा भी संकट में है। उनको लगता है कि एक संगठन इस मजबूत भारतीय मूल्य को हानि पहुंचाने में सक्षम है। राहुल गांधी राजनेता हैं। राजनीति ही उनका कर्म है। उनके इस बयान पर हलांकि संघ ने बेहद सधी हुई प्रतिक्रिया दी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि राहुल गांधी अपना राजनीतिक एजेंडा चलाते हैं और हमारी उनसे कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। लेकिन साथ ही उन्होंने राहुल गांधी से और जिम्मेदार होने की अपेक्षा भी जताई। राहुल गांधी के साथ-साथ कांग्रेस के नेता और पूर्व वामपंथी बुद्धिजीवी जो इन दिनों कांग्रेस में अपना भविष्य तलाश रहे हैं वो भी निरंतर संघ की आलोचना करते हैं। उनकी आलोचना का आधार होता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देश के सभी सांस्कृतिक संस्थाओं पर कब्जा कर लिया। इस कब्ज ने देश में संवाद को बाधित किया है और लोकतांत्रिक व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया। 

लगभग दो वर्ष पहले की बात है। दिल्ली में कुछ बुद्धिजीवियों के साथ संघ प्रमुख मोहन भागवत की बैठक थी। दिनभर चली इस बैठक में भोजनावकाश के समय औपचारिक बातें हो रही थी। मोहन भागवत जिस टेबल पर भोजन कर रहे थे वहां एक वरिष्ठ पत्रकार पहुंचे। उन्होंने उनसे किसी नियुक्ति को लेकर बात आरंभ कर दी। संघ प्रमुख भोजन करते रहे। जब वरिष्ठ पत्रकार महोदय लगातार उसी विषय़ पर बोलते रहे तो मोहन जी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कभी भी नियुक्तियों आदि में न तो हस्तक्षेप करता है और न ही सरकार को अपनी पसंद बताता है। संघ का काम है देश हित में जनमानस को तैयार करना। जब समाज का मानस तैयार हो जाता है तो सरकारें स्वत: उसका संज्ञान लेती हैं और उसके अनुकूल कार्य करती हैं। नियुक्ति आदि का काम सरकार का होता है वही इसको देखे तो व्यवस्था बनी रहती है। फिर कुछ हास-परिहास हुआ और बात खत्म हो गई। यहां हंसते हुए मोहन भागवत ने जो बात कही वो बेहद महत्वपूर्ण थी। उसको समझे जाने की जरूरत है। अब जरा वास्तविकता पर भी दृष्टि डाल लेते हैं कि देश में शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में काम करनेवाली संस्थाओं का हाल क्या है। अगर संघ ने सचमुच हर जगह कब्जा कर लिया है तो इन संस्थाओं के प्रमुखों के पद पर तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोग ही पदस्थापित होंगे। 

शिक्षा से आरंभ करते हैं। एक बेहद दिलचस्प उदाहरण है बिहार के मोतिहारी स्थित महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय की। दो फरवरी 2021 को मोतिहारी के केंद्रीय विश्वविद्याल के कुलपति का कार्यकाल समाप्त हो गया। दो साल से अधिक समय बीत चुका है। दो बार वहां के कुलपति की नियुक्ति लिए चयन प्रक्रिया हो चुकी है। बावजूद इसके अबतक वहां किसी कुलपति की नियुक्ति नहीं हो सकी है। विश्वविद्यालय कार्यवाहक कुलपति के भरोसे चल रहा है। अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शैक्षणिक संस्थाओं पर कब्जा जमाने में लगा होता तो अबतक तो यहां कुलपति की नियुक्ति करवा चुका होता। ये नया विश्वविद्यालय है और यहां अपने संगठन और विचार के लोगों को भरने की संभावनाएं भी हैं, दो साल से इस केंद्रीय विश्वविद्यालय में कुलपति की नियुक्ति ना होना इस आरोप का निषेध करता है कि संघ योजनाबद्ध तरीके से संस्थाओं पर कब्जा कर रहा है। अब शिक्षकों की नियुक्ति की बात करते हैं। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने बुधवार को संसद में जानकारी दी कि शैक्षणिक संस्थानों में 11050 शिक्षकों के पद खाली हैं। जिनमें से 6028 पद  केंद्रीय विश्वविद्यालयों में, 4526 पद भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थानों में और 496 पद भारतीय प्रबंध संस्थान में रिक्त हैं। अगर संस्थाओं पर कब्जा होता तो इतनी बड़ी संख्या में शिक्षकों के पद खाली क्यों होते। संघ प्रयासपूर्वक नियुक्तियां करवा रहा होता। शिक्षा मंत्रालय से ही जुड़ी दो और संस्था का उदाहरण सामने है। एक संस्था है केंद्रीय हिंदी निदेशालय जो पिछले कई वर्षों से निदेशक की बाट जोह रहा है। इसी तरह से केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा को भी पिछले ढाई साल से प्रभारी निदेशक चला रही हैं। शिमला के भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में भी नियमित निदेशक की प्रतीक्षा है।    

अब जरा कला और साहित्य से जुड़ी संस्थाओं को देख लेते हैं। दिल्ली स्थित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में पिछले कई वर्षों से निदेशक का पद खाली है। वहां कई शिक्षकों के पद भी खाली हैं। यहां की स्थिति तो और भी दिलचस्प है। विद्यालय में दो कार्यवाहक निदेशक पद संभालकर सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इन दिनों नई दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के प्रोफेसर रमेश गौड़ नाट्य विद्यालय के निदेशक का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे हैं। यहां भी निदेशक के पद के लिए दूसरी बार साक्षात्कार हो चुका है लेकिन अबतक नियुक्ति नहीं हो पाई है। अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संस्थाओं पर कब्जा करने में लगा होता तो इस प्रतिष्ठित नाट्य संस्था पर अपनी पसंद का निदेशक तो चयनित करवा चुका होता। निदेशक की नियुक्ति की बात छोड़ भी दें तो विद्यालय परिसर में करीब दो साल पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का उपहास करते हुए पोस्टर लगाया गया था। संस्थाओं पर अगर कब्जा होता तो क्या ये संभव था कि वहां प्रधानमंत्री का उपहास उड़ाया जाता। संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत ही ललित कला अकादमी है, जहां नियमित सचिव का पद खाली है। कला संस्कृति से जुड़े संस्थानों में खाली पदों की सूची लंबी है। ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष के सलाहकारों ने ठीक से होमवर्क करके उनको जानकारी नहीं दी । अगर वो होमवर्क करते तो उनको पता चलता कि शिक्षा-संस्कृति के संस्थानों की वास्तविक स्थिति क्या है।

2014 में केंद्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने और कांग्रेस के निरंतर कमजोर होते जाने से वामपंथियों को चुनौतियां मिलने लगीं। इन चुनौतियों से जब वो पार नहीं पा सकते हैं तो दुष्प्रचार आरंभ कर देते हैं। दरअसल जो पूर्व वामपंथी बुद्धिजीवी कांग्रेस में अपनी संभावनाएं तलाश रहे हैं वो ही इस तरह की बातें फैलाते रहते हैं। इंदिरा जी के प्रधानमंत्रित्व काल से ही कांग्रेस ने शिक्षा और संस्कृति का क्षेत्र वामपंथियों को आउटसोर्स कर दिया था। विश्वविद्यालयों से लेकर अकादमियों तक में वामपंथियों का बोलबाला था। कुलपति से लेकर अकादमी के चेयरमैन और संस्थानों के निदेशक सभी पदों पर वामपंथी अपने पसंद के लोगों को बिठाते थे। ज्योति बसु की जीवनीकार को कुलपति बना दिया गया था। कांग्रेस और वामदलों के राजनीतिक रूप से कमजोर होने के बाद इन परजीवी किस्म के कथित बुद्धिजीवियों को सत्ता की मलाई मिलने में मुश्किल हो रही है तो वो अनर्गल प्रलाप में जुटे रहते हैं। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के इर्द-गिर्द भी इस विचारधारा के लोगों ने अपना घेरा मजबूत कर लिया है और राहुल गांधी को आगे करके वो अपनी स्वार्थसिद्धि के उपक्रम में जुटे रहते हैं। वो ये नहीं समझा पा रहे कि आरोप अगर तथ्यहीन होते हैं तो प्रभाव नहीं छोड़ते।  

Saturday, March 11, 2023

युवाओं में पुस्तकों का आकर्षण कायम


हाल ही में नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला समाप्त हुआ। पुस्तक मेला में युवाओं की उमड़ी भीड़ आश्वस्तिकारक है। यह उस दुष्प्रचार का भी निषेध करती है कि युवा पुस्तकों से विमुख हो रहे हैं। वो आनलाइन माध्यम को अधिक पसंद कर रहे हैं। वो किंडल और ई बुक में अपेक्षाकृत अधिक रुचि ले रहे हैं।कोरोना महामारी के कारण दो वर्ष तक विश्व पुस्तक मेला का आयोजन नहीं हो सका था। इस वर्ष जब पुस्तक मेला का आयोजन हुआ तो दिल्ली के प्रगति मैदान के गेट के बाहर पुस्तक प्रेमियों की लंबी कतार इस बात की गवाही दे रही थी कि पुस्तकों के पाठक हैं। यह ठीक है कि तकनीक ने पाठकों के सामने कई विकल्प दिए हैं। लेकिन छपे हुए शब्दों की महत्ता और पुस्तक को हाथ में लेकर पढने का रोमांच कम नहीं हुआ है। हिंदी के कई प्रकाशकों की तरफ से ये कहा जाता है कि हिंदी में पुस्तकें नहीं बिकतीं, हिंदी में पाठक कम हो रहे हैं। पुस्तक मेलों में पाठकों की संख्या और बिक्री के अनुमानित आंकडें कुछ अलग ही कहानी कहती हैं। अगर पुस्तकें नहीं बिकती हैं तो इतनी बड़ी संख्या में पुस्तकों का प्रकाशन क्यों और किसके लिए होता है। निरंतर नए नए प्रकाशन गृह क्यों खुल रहे हैं। पुराने प्रकाशन गृहों के अलग अलग प्रकल्प पुस्तकों का प्रकाशन क्यों करते हैं। स्वाधीनता के पहले हिंदी में दस प्रकाशक भी नहीं थे और इस वक्त एक अनुमान के मुताबिक चार सौ से अधिक प्रकाशक साहित्यिक कृतियां छाप रहे हैं। प्रकाशन जगत के जानकारों के मुताबिक हर साल हिंदी की करीब दो से ढाई हजार साहित्यिक किताबें छपती हैं। क्या साहित्य सेवा के लिए पुस्तकों का प्रकाशन होता है। अगर पुस्तक प्रकाशन व्यवसाय में घाटा हो रहा है तो नए प्रकाशन गृह कैसे विकसित हो रहे हैं। ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिसका उत्तर हिंदी का लेखक खोजना भी नहीं चाहता है।  

दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित पुस्तक मेले में तमाम बाधाओं के बीच पुस्तक प्रेमियों का पहुंचना कुछ तो संकेत कर रहा है। मैं पुस्तक मेले में गया था। प्रगति मैदान के गेट नंबर चार पर बहुत लंबी कतार लगी हुई थी। तीन-चार युवक बार-बार आनलाइन पेमेंट करके प्रवेश टिकट खरीदने का प्रयास कर रहे थे। दो बार जब उनका ट्रांजेक्शन फेल हो गया।उन्होंने गेट पर खड़े गार्ड से अपनी समस्या बताई। उनको अपना मोबाइल दिखाकर टिकट खरीद में आने की समस्या बताई। गार्ड ने उनके मोबाइल को देखा और कहा कि अंदर जाओ। दूसरे गार्ड ने उन लड़कों को रोकने का प्रयास किया तो पहले वाले गार्ड ने कहा कि जाने दो यार किताब ही तो खरीदने जा रहा है, कोई सर्कस देखने तो नहीं जा रहा है। यह है पुस्तकों के लिए हमारे मन में प्यार। उसके बाद उस गार्ड ने कई अन्य लड़कों को भी बगैर प्रवेश टिकट प्रगति मैदान में प्रवेश की अनुमति दी। मेला के अंदर हाल में तिल रखने की जगह नहीं थी। लगभग सभी प्रकाशकों के स्टाल पर पुस्तक प्रेमी पुस्तकें पलट रहे थे, खरीद रहे थे। हिंदी के बड़े प्रकाशकों के स्टाल पर स्थिति बेहतर थी। उनके यहां बिलिंग काउंटर पर ग्राहकों की कतार लगी थी। बिल बनानेवाले कम पड़ रहे थे। इंटरनेट नहीं चल पाने या धीमा चलने की वजह से आनलाइन पेमेंट में दिक्कत आ रही थी। ग्राहक धैर्यपूर्वक बिलिंग की प्रतीक्षा कर रहे थे। मेले में हर दिन दर्जनों पुस्तकों का विमोचन हो रहा था। इंटरनेट मीडिया पर इन विमोचन कार्यक्रमों की तस्वीरें प्रचलित हो रही थीं। अगर पाठक नहीं हैं तो ये पुस्तकें किनके लिए प्रकाशित हो रही हैं। 

गीता प्रेस के स्टाल पर तो हर वर्ष खरीदारों की भीड़ रहती ही है इस वर्ष भी उनके स्टाल पर जमकर खरीदारी हो रही थी। गीता प्रेस के स्टाल के एक कर्मचारी ने बताया कि इस वर्ष सबसे अधिक बिक्री श्रीरामचरितमानस और कल्याण के पुराने अंकों की हुई, जो अब पुस्तकाकार प्रकाशित हैं। अंग्रेजी के हाल में जो स्टाल थे उनपर भी बहुत भीड़ थी। पेंगुइन प्रकाशन पर तो कई कई बार पाठकों के प्रवेश को रोकना पड़ रहा था। उनके स्टाल के बाहर लंबी कतार लगी हुई थी। जब स्टाल के अंदर गए पाठक पुस्तक खरीदकर बाहर निकलते थे तब बाहर खड़े लोगों को अंदर जाने दिया जा रहा था। यह दृष्य संतोष देनेवाला था। आनलाइन प्लेटफार्म पर पुस्तकें बेचनेवाली कंपनियों के प्रतिनिधि भी मेले में घूम रहे थे। वो ये समझने का प्रयास कर रहे थे कि इतनी बड़ी संख्या में पाठक मेले में पुस्तकें क्यों खरीद रहे हैं, जबकि उनके प्लाटफार्म पर तो पुस्तकों की खरीद पर काफी छूट भी मिलती है। घर पर डिलीवरी का भी प्रविधान होता है। दरअसल पुस्तक मेलों में पाठकों को पुस्तकें तो मिलती ही हैं उनके लेखकों से मिलने का अवसर भी प्राप्त होता है। लेखकों से बात करने और उनकी रचना प्रक्रिया को सुनने समझने का अवसर भी मिलता है। यह सुविधा आनलाइन पुस्तक खरीद में नहीं होती है, छूट भले ही मिल जाए। 

एक और महत्वपूर्ण बात है जिसको रेखांकित किया जाना चाहिए, हिंदी समाज में अब भी पुस्तकों की भूख है। जरूरत इस बात की है कि पाठकों तक पुस्तकों को पहुंचाने का उपक्रम किया जाए। पुस्तकों को लेकर पाठकों तक पहुंचने का उपक्रम प्रकाशकों ने सामूहिक रूप से कभी किया नहीं। सभी प्रकाशकों को चाहिए कि वो साथ मिलकर पाठकों तक पुस्तकें पहुंचाने का एक तंत्र विकसित करें। अधिक से अधिक पुस्तकों की दुकानें खोलने का प्रयास किया जाना चाहिए। अभी हो ये रहा है कि कई प्रकाशक अलग अलग शहरों में अपनी पुस्तकों की दुकानें खोलते हैं। उनमें दूसरे प्रकाशकों की पुस्तकें नहीं रखते हैं। उनके बीच इस तरह का समन्वय होना चाहिए कि अगर एक प्राकशक ने एक शहर में पुस्तक विक्रय केंद्र खोला तो उसको सभी प्रकाशकों की पुस्तकें रखनी चाहिए। इससे उनकी लागत भी कम होगी और पाठकों को एक ही स्थान पर सभी पुस्तकें मिल जाएंगी। इसमें ईमानदारी और पारदर्शिता की आवश्यकता होगी। 

ईमानदारी और पारदर्शिता की आवश्यकता तो प्रकाशकों को लेखकों के साथ के संबंध में भी दिखाना चाहिए। आज कोई भी पुस्तक कितनी बिकी इसको जांचने का कोई तंत्र कम से कम हिंदी प्रकाशन जगत में तो उपलब्ध नहीं है। प्रकाशक जितना बता देता है उसपर ही विश्वास करना पड़ता है। अविश्वास की कोई वजह होनी भी नहीं चाहिए। संदेह तब पैदा होता है जब ये देखा जाता है कि अंग्रेजी के प्रकाशक कोई हिंदी की पुस्तक प्रकाशित करते हैं तो उनके यहां से वो पुस्तकें अपेक्षाकृत अधिक बिकती हैं । इस संदेह का निवारण होना पुस्तक व्यवसाय के लिए काफी आवश्यक है। पारदर्शिता और ईमानदारी के लिए किसी सरकार या सरकारी एजेंसी की आवश्यकता भी नहीं है, आवश्यक है परस्पर विश्वास की। हिंदी में पुस्तकों के संस्करणों को लेकर भी पारदर्शी व्यवस्था नहीं है। कई पुस्तकें बगैर दूसरे संस्करण के प्रकाशित होकर बाजार में बिकती रहती हैं। इसका पता तब चलता है जब एक ही संस्करण की प्रतियां अलग अलग प्रेस से छपकर बाजार में पहुंचती हैं। कई बार लेखक इस बात को प्रकाशक के संज्ञान में लेकर आता भी तो उसको इसका संतोषजनक उत्तर नहीं मिल पाता है। मैं हिंदी के कुछ प्रकाशकों को जानता हूं कि वो कुछ लेखकों को उनके उपन्यास या पुस्तक के लिए 15-20 लाख तक का अग्रिम भुगतान भी करते हैं। अगर पुस्तकें बिकती नहीं हैं तो ये साहस प्रकाशक कैसे कर लेते हैं। ये सभी इस बात को स्थापित करते हैं कि हिंदी में पुस्तकों के पाठक हैं और ये कहना कि पाठक लगातार कम हो रहे हैं, उचित नहीं है।  

Friday, March 10, 2023

साहित्याकाश पर छाता साहित्योत्सव


आज से 38 वर्ष पहले जब पूरे देश में लिटरेचर फेस्टिवल के बारे में कम ही लोग सोचते और जानते थे। उस समय साहित्य अकादमी ने 1985 में फेस्टिवल आफ लेटर्स का आरंभ किया था। नई दिल्ली के रवीन्द्र भवन परिसर स्थित साहित्य अकादमी भवन की पहली मंजिल के सभागार में प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता था। इस प्रदर्शनी में साहित्य अकादमी की गतिविधियों का प्रदर्शन होता था। मैक्सम्यूलर मार्ग के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में अकादमी राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन करती थी। इस फेस्टिवल का आरंभिक स्वरूप कुछ इस तरह का ही था। सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय, अन्नदा शंकर रे, अमृता प्रतम, कुर्तुलऐन हैदर,निर्मल वर्मा, विद्यानिवास मिश्र, विष्णु प्रभाकर, सुनील गंगोपाध्याय जैसे दिग्गज लेखकों की भागीदारी इस उत्सव में होती थी। करीब 25 वर्षों तक इस स्वरूप में साहित्य अकादमी का साहित्योत्सव चलता रहा। साहित्योत्सव के दौरान विभिन्न भाषा के साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखकों को सम्मानित किया जाता था। संवत्सर व्याख्यान का आयोजन होता था। साहित्योत्सव की एक विशेषता और रही है कि इसमें बड़े से बड़ा लेखक सहजता से पाठकों और श्रोताओं के साथ संवाद करते नजर आते हैं। मुझे याद पड़ता है कि अमृता प्रीतम को पहली बार मैंने साहित्य अकादमी के इस उत्सव में ही देखा था। तब दिल्ली विश्वविद्याल के छात्र एक साथ इस उत्सव में पहुंचते थे। अपने पसंदीदा लेखकों के विचारों को सुनते थे। न केवल विचारों को सुनते थे बल्कि छात्रावास लौटकर उनकी स्थापनाओं पर बहस करते थे।

2013 में जब डा के श्रीनिवासराव साहित्य अकादमी के सचिव बने तो उन्होंने इसको व्यापक स्वरूप प्रदान किया। साहित्य अकादमी की प्रदर्शनी को भवन की पहली मंजिल से उतारकर परिसर के लान में लाकर विस्तार दिया गया। संगीत नाटक अकादमी के मेघदूत थिएटर में भी इस साहित्योत्सव की गतिविधियां आरंभ हुईं। साहित्य अकादमी पुरस्कार अर्पण समारोह को और भव्य बनाया गया। धीरे धीरे ये साहित्योत्सव अखिल भारतीय स्वरूप लेने लगा। इसमें देश के विभिन्न भाषाओं के साहित्यकारों को आमंत्रित करके अलग अलग सत्रों में विचार मंथन होने लगा। प्रतिवर्ष इसमें अलग अलग विषय जैसे बहुभाषी कवि सम्मेलन, बहुभाषी कहानी पाठ, एलजीबीटीक्यू लेखक सम्मिलन, जैसे कार्यक्रम जोड़े गए। अभी देश में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के आलोक में मातृभाषा की चर्चा हो रही है। इस वर्ष साहित्योत्सव में मातृभाषा पर अलग से चर्चा रखी गई है। जी 20 सम्मेलन के आयोजन को ध्यान में रखते हुए कूटनीति और साहित्य विषय पर सत्र की संरचना की गई है। इसमें राजनयिक-लेखकों के विचार सुनने को मिलेंगे। 38 वर्ष के सफर में साहित्य अकादमी के साहित्योत्सव ने साहित्य जगत में अपनी एक विशिष्ठ पहचान बनाई है। यह एक ऐसा साहित्योत्सव है जो शोर-शराबे से दूर भारतीय भाषाओं के लेखकों के अखिल भारतीय मंच के तौर पर स्थापित हो गया है।    

Saturday, March 4, 2023

ज्ञान परंपरा का प्रचार आवश्यक


हाल ही में नागपुर में एस्ट्रोनामी पार्क के शुभारंभ के अवसर पर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के वक्तव्य के कुछ अंशों की चर्चा हो रही है। चर्चा इस बात की हो रही है कि मोहन भागवत ने कहा कि हमारे प्रचीन ग्रंथों की समीक्षा होनी चाहिए। इसको कुछ विद्वान इतिहास के पुनर्लेखन से जोड़कर देखने लगे हैं तो कुछ को पाठ्य पुस्तकों में बदलाव की आहट सुनाई दे रही है। कुछ तो प्रचीन श्रुतियों के आधार पर ग्रंथों के होने न होने पर टीका टिप्पणी कर रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि मोहन भागवत के बयान को समग्रता में समझा जाए। अगर उनके चौंतीस-पैंतीस मिनट के वक्तव्य को ध्यान से सुना जाए तो उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें कही हैं। भारत के गौरवशाली इतिहास को रेखांकित किया गया है। एस्ट्रोनामी पार्क के उद्घाटन में जब वो बोल रहे थे तो उन्होंने काल-गणना की भारतीय ज्ञान पद्धति पर विस्तार से प्रकाश डाला था। उन्होंने इस संबंध में भारत के अलग अलग प्रांतों में प्रचलित सूर्य और चंद्र की गति पर आधारित काल गणना पद्धति के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने ग्रह नक्षत्रों की स्थिति और उसकी भारतीय पद्धति से पहचान की बात भी की। इसी क्रम में उन्होंने भारत के मौखिक इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि हर अन्वेषण में हमारे पूर्वजों का किया कुछ न कुछ है। जो परंपरा से चला आ रहा है। पहले हमारे यहां ग्रंथ नहीं थे इसलिए ये बातें मौखिक परंपरा से चलीं। बाद में ग्रंथ हुए जो कुछ समय बाद इधर उधर हो गए। फिर इसमें कुछ स्वार्थी लोग घुस गए जिन्होंने उन ग्रंथों में कुछ कुछ घुसा दिया जो बिल्कुल गलत है। मोहन भागवत ने इसके अलावा यह भी कहा कि विदेशी आक्रमणों की वजह से हमारी ज्ञान परंपरा खंडित हो गई, जो व्यवस्थाएं थीं वो तहस नहस हो गईं। नियमित अंतराल पर हुए आक्रमणों की वजह से हमारी जो व्यवस्थाएं थीं वो तहस नहस हो गईं। इस पृष्ठभूमि में भागवत जी ने कहा कि उन ग्रंथों की पारंपरिक ज्ञान की एक बार समीक्षा की आवश्यकता है। 

मोहन भागवत के इस वक्तव्य में तीन महत्वपूर्ण बातें हैं जिनको रेखांकित किया जाना चाहिए और उसपर देशव्यापी विमर्श भी होना चाहिए। कुछ बातों पर तो विमर्श हो भी रहा है। मोहन भागवत ने जब भारतीय ज्ञान परंपरा की बात की तो उन्होंने यह भी कहा कि आज के विद्वानों का दायित्व है कि वो भारतीय ज्ञान परंपरा के बारे में समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेख लिखकर नई पीढ़ी को उनकी भाषा में अवगत करवाएं। किस प्रकार से ग्रह और नक्षत्र की स्थिति होती हैं और वो कैसे कृषि और किसानों के लाभ पर आधारित है। उन्होंने एक दो उदाहरण भी दिए। उन्होंने एक तरह से उन सेमिनारवीरों को नसीहत भी दे डाली जो भारतीय ज्ञान परंपरा आदि जैसे शब्दों का उपयोग तो बार बार करते हैं लेकिन उस बारे में विस्तार में नहीं जाते। जब वो ग्रंथों में स्वार्थी तत्वों की छेड़छाड़ की बात करते हैं तो वो इतिहास लेखन के बारे में संकेत करते हैं। इतिहास लिखना क्या होता है। वैसा लेखन जिसमें भूतकाल की गतिविधियों का लेखा जोखा होता है। इतिहास कभी बदलता नहीं है, उसको देखने की दृष्टि अलग अलग हो सकती है। इतिहास तो समय के पन्नों पर दर्ज होता चलता है। इतिहासकार जब वस्तुनिष्ठ नहीं होकर किसी विचारधारा विशेष के प्रभाव या दबाव में अपनी दृष्टि को संकुचित कर लेते हैं तो समय के पन्नों पर दर्ज घटनाएं विसंगतियों के साथ सामने आती हैं। इतिहास में कई बार पुरानी स्थापनाओं को खारिज करके नई स्थापनाएं दी जाती हैं। उदाहरण के लिए स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के अवसर पर आदिवासी नायकों या गुमनाम नायकों के योगदान के बारे में देश की जनता को बताया गया वो इतिहास के एक नए आयाम को जनता के सामने रखने का उपक्रम था। किसी भी देश का इतिहास सिर्फ राजा रानियों या वीर सेनाननियों की गाथाओं का वर्णन नहीं होता है बल्कि उस समय की आम जनता के क्रियाकलापों का लेखा-जोखा ही उसको पूर्णता प्रदान करता है। मोहन भागवत अपने वक्तव्य में इसकी ही अपेक्षा करते नजर आ रहे हैं। 

अपनी उपरोक्त अपेक्षा को प्रकट करने के क्रम में मोहन भागवत ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति और उसके अंतर्गत बन रहे पाठ्यक्रम का उल्लेख भी किया। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति के अनुसार पाठ्यक्रम बन रहा है और कक्षा छह तक पाठ्यक्रम बन भी गया है। इस पाठ्यक्रम में कई नई बातों को भी समाहित किया गया है जो पहले के पाठ्यक्रमों में नहीं थीं। आगे भी जो पाठ्यक्रम तैयार होगा उसमें भी नई बातों को समाहित किए जाने के संकेत उन्होंने दिए। मोहन भागवत ने कहा कि एक बार पाठ्यक्रम सामने आ जाए तो उसकी समीक्षा की जाएगी, चर्चा की जाएगी और प्रयास यही रहेगा कि वो ज्ञान परंपरा के अनुसार ठीक है। इस तरह की चीजों के आने से ज्ञान भी बढ़ेगा और स्वाभिमान भी। यहां भी उन्होंने ये अपेक्षा जताई कि भारतीय ज्ञान परंपरा की कुछ प्राथमिक बातें हम अपने घर में भी बच्चों को बता सकते हैं। मोहन भागवत ने विस्तार से धर्म और विज्ञान के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म और विज्ञान साथ चल सकते हैं। उनके अनुसार हमारे धर्म की परंपरा में फेथ और बिलीफ जैसे शब्द नहीं हैं हमारे यहां अनुभव और प्रतीति को प्रमुखता दी गई है। उन्होंने उदाहरणों के साथ बताया कि हमारा धर्म वैज्ञानिक है। विज्ञान का दायित्व है कि वो धर्म को साथ लेकर चले। मानव कल्याण उसका उद्देश्य हो।  

मोहन भागवत ने एक और महत्वपूर्ण बात कही कि जनता को सरकार पर निर्भरता कम करनी चाहिए। आजकल ये स्वाभाविक अपेक्षा रहती है कि हर काम सरकार ही करे। यह पद्धति भारत की नहीं रही है कि सरकार ही सबकुछ करे। नौकरी भी दे, खाने को भी दे, टीवी भी दे और उसके बदले राज्य पूरी संपत्ति अरापने हाथ में रख ले। भारत में स्वायत्तशासी व्यवस्था थी। राजा का कर्तव्य सीमा का संरक्षण, कानून व्यवस्था और अधर्म का निर्धारण करना था। बाकी सारी बातें प्रजा के हाथों में थीं। मोहन भागवत ने माना कि वो जमाना चला गया और अब नया जमाना है जिसमें अपेक्षा रहती है कि सरकार ही सबकुछ करे। उन्होंने कहा कि करे तो करे लेकिन मोहन भागवत ने एकबार फिर से उस प्रश्न को छेड़ दिया है कि सरकार का दायित्व क्या हो जनता का क्या? इस बारे में कई बार चर्चा होती है कि सरकर क्या क्या करे। हमारे देश में एक सरकारी उपक्रम अब भी सिर्फ यात्रा टिकट करवाने का काम करती है। क्या सरकार का ये दायित्व होना चाहिए कि एक पूरा महकमा सिर्फ रेल और जहाज के टिकटों की व्यवस्था करने में लगे। जिस तरह से जमाना बदला और सरकार पर निर्भरता बढ़ी उसी तरह से एक बार फिर समय बदल रहा है और सरकार पर निर्भरता कम से कम करने की आवश्यकता है। 

मोहन भागवत ने जिस तरह से अपनी ज्ञान परंपरा के प्राथमिक ज्ञान की बात को महत्ता दी, धर्म और विज्ञान को साथ चलने की सलाह दी, परोक्ष रूप से सरकार पर निर्भरता कम करने की बात की अगर हम इसको समग्रता में देखें तो ग्रंथों को ठीक करने की बात नेपथ्य में चली जाती है। महत्वपूर्ण है कि भारत की जो ज्ञान परंपरा है उसका परिचय भारत की नई पीढ़ी को मिले और इसके लिए शिक्षण संस्थान और उसके कर्ताधर्ता सिर्फ मौखिक बात नहीं करें बल्कि प्रमाणिक रूप से उस ज्ञान परंपरा को सरल भाषा में जनता के सामने रखें। मोहन भागवत के वक्तव्य के इस निहितार्थ को समझकर अनुशासनबद्ध तरीके से काम करने की आवश्यकता है। 


Saturday, February 25, 2023

छद्म प्रतिरोध का स्थापत्य गढ़ता कवि

हिंदी के एक कवि हैं। नाम है अशोक वाजपेयी। पूर्व नौकरशाह हैं। महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,वर्धा के कुलपति रहे हैं। प्रतिभाशाली इतने कि  अपने पूरे कार्यकाल में दिल्ली कार्यालय से वर्धा के विश्वविद्यालय का संचालन करते रहे। ललित कला अकादमी, नई दिल्ली के चेयरमैन रहे। अकादमी का उनका कार्यकाल विवादित रहा। कई तरह के आरोप लगे। सीबीआई जांच हुई। उनके कुछ संवेदनहीन बयान हिंदी साहित्य जगत में बहुधा गूंजते रहते हैं। भोपाल गैस त्रासदी के बाद दिया उनका बयान कि मरने वाले के साथ मरा नहीं जाता या हिंदी के लेखकों को मैंने पहली बार हवाई जहाज पर चढ़ाया अब भी हिंदी के लोगों के स्मरण में है। भोपाल गैस त्रासदी के बाद के बयान पर वो खेद प्रकट कर चुके हैं।2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले पुरस्कार वापसी अभियान के अगुवा रहे। अशोक वाजपेयी के बारे में ये चर्चा इस कारण क्योंकि उनके समर्थक एक बार फिर से उनकी जय-जयकार कर रहे हैं। प्रसंग ये है कि दिल्ली में अर्थ कल्चर फेस्टिवल के दौरान उनको काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किया गया था। रेख्ता के सहयोग से आयोजित इस सत्र में अशोक वाजपेयी के अलावा अनामिका, बद्री नारायण, दिनेश कुशवाह और मानव कौल का नाम विज्ञापित किया गया था। यह फेस्टिवल के पहले दिन का अंतिम सत्र था। सत्र के आयोजन वाले दिन अशोक वाजपेयी ने इंटरनेट पर एक टिप्पणी लिखकर घोषणा की कि वो काव्य पाठ में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने लिखा ‘मैं आज अर्थ और रेख्ता द्वारा आयोजित कल्चर फेस्ट में भाग नहीं ले रहा हूं क्योंकि मुझसे कहा गया कि मैं ऐसी ही कविताएं पढ़ूं जिसमें राजनीति या सरकार की सीधी आलोचना न हो। इस तरह का सेंसर अस्वीकार्य है।‘ इसके बाद उनके समर्थक इस टिप्पणी का स्क्रीन शाट लेकर फेसबुक पर लहालोट होने लगे जैसे अशोक वाजपेयी ने किसी क्रांति का शंखनाद किया हो। 

अशोक वाजपेयी के इंकार के बाद अष्टभुजा शुक्ल का नाम काव्य पाठ वाले सत्र में शामिल किया गया । अनामिका, बद्री नारायण, दिनेश कुशवाह और मानव कौल ने कविताएं पढ़ीं। साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चयनित बद्री नारायण ने बताया कि उनको भी आयोजकों की तरफ से फोन आया था। फोन करनेवाले ने पूछा था कि वो किस तरह की कविताएं पढ़ेंगे। बद्री नारायण ने उनसे कहा कि वो हाशिए के लोगों को लेकर लिखी कविताओं का पाठ करेंगे।बात समापत हो गई। दिनेश कुशवाह को भी फोन कर पूछा गया था कि वो किस तरह की कविताएं पढ़ेंगे। उन्होंने तो आयोजकों को कहा कि वो जैसी कविताएं लिखते हैं वही पढ़ेंगे। उन्होंने जिज्ञासा भी प्रकट की कि ये प्रश्न क्यों पूछा जा रहा है। फोन करनेवाले ने बताया था कि ये सूचनाएं सत्र संचालक की सुविधा के लिए जुटाई जा रही हैं। बात खत्म हो गई। अब पता नहीं अशोक वाजपेयी को आयोजकों ने ऐसा क्यों कहा कि वो राजनीति या सरकार की सीधी आलोचना वाली कविता नहीं पढ़ें। वैसे अशोक वाजपेयी राजनीतिक कविता लिखने के लिए जाने भी नहीं जाते हैं। उनकी कविताओं का मूल स्वर तो प्रेम, प्रकृति और देह है। राजनीतिक कविताओं का तो वो उपहास ही करते रहे हैं। राजनीतिक कविताओं को लेकर उन्होंने एक बार टिप्पणी की थी कि इनमें अभिधा का आतंक होता है। ऐसे कवि से कोई भी आयोजक ये क्यों कहेगा कि वो राजनीति या सरकार की सीधी आलोचना वाली कविता न पढ़ें। वो भी रेख्ता जैसी संस्था जिनसे अशोक वाजपेयी का ना केवल परिचय रहा है बल्कि बहुत गहरे और पुराने संबंध भी। रेख्ता की तरफ से सफाई आई। उनकी तरफ से सिर्फ ये पूछा गया था कि अशोक जी किस विषय पर बोलने जा रहे हैं। रेख्ता की सफाई में ये भी कहा गया है कि उनकी तरफ से किसी विशेष कविता के नहीं पढ़ने या पढ़ने का कोई आग्रह नहीं किया गया था। रेख्ता के प्लेटफार्म पर तो जावेद अख्तर और कुमार विश्वास जैसे कवि अपनी कविताओं का पाठ करते रहे हैं और बहुधा राजनीतिक टिप्पणियां भी। रेख्ता का कहना है कि पूरा मसला चकित करनेवाला और अप्रसांगिक है। सचाई क्या है ईश्वर जानें। 

ऐसा प्रतीत होता है कि अशोक वाजपेयी किसी न किसी बहाने से चर्चा में बने रहने का बहाना ढूंढ़ते रहते हैं। वो हमेशा से राजनीति और सत्ता से दूर रहने का दंभ भी भरते रहे हैं। राजनेताओं के साथ मंच साझा करने को लेकर भी वो चुनिंदा स्टैंड लेते रहते हैं। किसी दल के नेता के साथ मंच साझा करने में उनको कोई आपत्ति नहीं होती है तो किसी दल के नेता के साथ वो मंच पर दिखना नहीं चाहते हैं। कई अवसरों पर उनको राजनेताओं के साथ देखा गया है, कई बार मंच पर भी। हाल ही में अशोक वाजपेयी ने राहुल गांधी की भारत-जोड़ो यात्रा में शामिल होकर अपनी प्रतिबद्धता को सार्वजनिक भी किया था। यहां वो कह सकते हैं कि ये राजनीतिक यात्रा नहीं थी लेकिन सचाई सबको पता है। लोकतंत्र में किसी को भी कहीं जाने या अपनी पसंद के दल के नेताओं के साथ दिखने की स्वतंत्रता है। अशोक वाजपेयी को भी है। जब पसंदीदा नेताओं या दल के मंच पर खड़ा होना है तो ये नैतिक स्टैंड खोखला लगता कि लेखकों को नेताओं से दूर रहना चाहिए। कांग्रेस पार्टी से उनके पुराने संबंध रहे हैं, हलांकि वो अपने लेखन में इसका साक्ष्य नहीं होने की बात करते हैं। लेखन में न सही लेकिन उनके क्रियाकलापों में तो ये निरंतर दिखता है। जब वो एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति थे तो गुजरात हिंसा के खिलाफ अभियान चलाया था। राष्ट्रपति को ज्ञापन आदि भी देने गए थे। अभी भी हर चुनाव के पहले चलनेवाले नरेन्द्र मोदी या भारतीय जनता पार्टी विरोधी हस्ताक्षर अभियान में उनके हस्ताक्षर दिख जाते हैं। वो इसको एक नागरिक के कर्तव्य के तौर पर प्रचारित करते हैं। उन्होंने ये स्वीकार भी किया है कि उनकी प्रशासनिक सेवाओं का दो तिहाई हिस्सा कांग्रेसी सरकारों के साथ काम करते हुए बीता है। इसमें वो ये जोड़ना नहीं भूलते कि वो सभी सरकारों को लोकतांत्रिक प्रणाली ने चुना था। प्रश्न ये उठता है कि 2014 से या उसके बाद जो सरकारें बन रही हैं क्या वो लोकतांत्रिक प्रणाली से नहीं चुनी जा रही हैं। 

अशोक वाजपेयी ने अपने एक साक्षात्कार में नामवर सिंह को अचूक अवसरवादी कहा था। उस साक्षात्कार में उन्होंने नामवर सिंह के विचलनों का साक्ष्य देने का दावा किया था। क्या राहुल गांधी के साथ उनकी पदयात्रा में शामिल होकर अशोक वाजपेयी ने स्वयं ये साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर दिया कि उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता क्या है। पदयात्रा में शामिल होने को वो प्रतिरोध का स्थापत्य गढ़ना भी कह सकते हैं लेकिन उनकी पालिटिक्स हिंदी समाज को समझ आती है। बिहार विधानसभा चुनाव के पहले असहिष्णुता के नाम पर पुरस्कार वापसी अभियान चलाना भी उसी राजनीति का एक भाग था। अशोक वाजपेयी को उस समय आपत्ति नहीं हुई थी या कला संस्कृति पर कोई खतरा नजर नहीं आया था जब राजीव गांधी के शासनकाल में सलमान रश्दी की पुस्तक के आयात पर प्रतिबंध लगाया गया था। पुरस्कार वापसी जैसा कदम तब भी नहीं उठाया था जब मकबूल फिदा हुसैन ने भारत की नागरिकता छोड़ने का निर्णय लिया था। क्यों? क्योंकि तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। दरअसल अशोक वाजपेयी प्रतिरोध का स्थापत्य तभी गढ़ते हुए दिखते हैं जब राजनीति या राजनीतिक स्थितियां उनके अनुकूल नहीं होती है। आज स्थितियां इस तरह की बन गई हैं कि अशोक वाजपेयी ने नामवर सिंह को जिस विशेषण से विभूषित किया था वो पलटकर उनपर ही चिपकता नजर आ रहा है। नामवर जी में हो सकता है विचलन हो लेकिन इनके कांग्रेस प्रेम में तो निरंतरता है। 

Saturday, February 18, 2023

सम्मेलन का स्वरूप बदलने की आवश्यकता


फिजी के शहर नांदी में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन समाप्त हो गया है। अड़तालीस वर्षों में विश्व हिंदी सम्मेलन ने बारह पड़ाव तय किए हैं। हर सम्मेलन के दौरान पारित प्रस्तावों पर नजर डालने से पता चलता है कि हिंदी भाषा को लेकर अलग अलग चिंताएं रही हैं। हर सम्मेलन में किसी न किसी रूप में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने की बात उठती ही रही है। इस बार भी दो तीन सत्रों में वक्ताओं ने इस विषय को उठाया। यह एक भावनात्मक मुद्दा है जिसको रोका नहीं जा सकता है, रोका जाना भी नहीं चाहिए। फिजी में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी को विश्व भाषा यानि हिंदी को बोलने-जानने वालों और उसके प्रति अनुराग रखनेवालों विश्व के सभी नागरिकों के बीच हिंदी को संपर्क और संवाद की भाषा के रूप में विकसित करने पर जोर दिया गया। अगर हम पिछले आयोजनों और उसके प्रस्तावों पर नजर डालते हैं तो यह बात थोड़ी ही अलग दिखती है। एक मंतव्य ऐसा भी है जिसकी चर्चा 2007 में भी हो चुकी थी और उसको फिर से दोहराया गया है। 13-15 जुलाई 2007 को अमेरिका के न्यूयार्क में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन के पारित मंतव्यों में से एक मंतव्य ये था कि विश्व हिंदी सचिवालय के कामकाज को सक्रिय एवं उद्देश्यपरक बनाने के लिए सचिवालय को भारत तथा विश्व के चार पांच अन्य देशों में इस सचिवालय के क्षेत्रीय कार्यालय खोलने पर विचार किया जाए। 2023 में कहा गया है कि विश्व सभ्यता को हिंदी की क्षमताओं का समुचित सहकार प्राप्त हो सके, इसके लिए यह सम्मेलन विश्व हिंदी सचिवालय को बहुराष्ट्रीय संस्था के रूप में विकसित करने तथा प्रशांत क्षेत्र सहित विश्व के अन्य भागों में इसके क्षेत्रीय केंद्र स्थापित करने की आवश्यकता का भी अनुभव कर रहा है। इसको देखकर ये लगता है कि नांदी में सम्मेलन का जो प्रतिवेदन विदेश राज्यमंत्री मुरलीधरन ने हिंदी प्रेमियों के समक्ष रखा उसको तैयार करनेवालों ने पर्याप्त तैयारी नहीं की। जो बिंदु सोलह वर्ष पहले आयोजित सम्मेलन के मंतव्य का हिस्सा रहा हो उसके ही शब्दों को थोड़ा बहुत बदलकर फिर से प्रतिवेदन का हिस्सा बनाना उचित नहीं कहा जा सकता है। इस तरह की कई चीजें फिजी के सम्मेलन में घटित हुईं जिसको लेकर विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन के स्वरूप पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। 

वर्षों से विश्व हिंदी सम्मेलन का स्वरूप वही बना हुआ है। सम्मेलन में कुछ सत्र होंगे। हर सत्र में आठ-दस वक्ता होंगे । सभी अपनी-अपनी बात रखेंगे। कुछ पुस्तकों का विमोचन होगा। एक स्मारिका का प्रकाशन किया जाएगा। सम्मेलन के दौरान चार पन्ने का एक समाचार पत्र निकाला जाएगा। अब तकनीक ने बहुत से कामों को आसान कर दिया है तो इसके आयोजन और अन्य गतिविधियों को तकनीक आधारित किए जाने की आश्यकता है। उदाहरण के तौर पर अगर देखा जाए तो इस वर्ष सम्मेलन के दौरान जिस चार पन्ने के समाचार पत्र का प्रकाशन हुआ उसको अगर इलेक्ट्रानिक फार्मेट में बनाकर प्रतिदिन सभी प्रतिभागियों के व्हाट्सएप और ईमेल पर भेजने की व्यवस्था की जाती तो इसकी सार्थकता होती। उसके प्रकाशन पर आनेवाले खर्च को कम करके हिंदी भाषा के विकास पर खर्च किया जा सकता है। अगर इसका प्रकाशन इलेक्ट्रानिक फार्मेट में हो तो उसमें प्रतिदिन आयोजित होनेवाले सत्रों में हुई चर्चा को विस्तार से स्थान दिया जा सकता है। यह सम्मेलन के दौरान हुई चर्चा को भविष्य के लिए सहेज कर रखने का एक माध्यम भी हो सकता है। भविष्यय में इसका उपयोग संदर्भ सामग्री के रूप में हो सकता है। अगर ये इलेक्ट्रानिक फार्मेट में होगा तो इसकी पहुंच सम्मेलन स्थल से बाहर विश्व के अन्य देशों तक हो सकती है जहां के हिंदी प्रेमी सम्मेलन में क्या हो रहा है उसके बारे में जान समझ सकेंगे। तकनीक ने हमें अब ये सुविधा दे दी है कि प्रत्येक सत्र में हुई चर्चा के वीडियो को भी कहीं एक जगह अपलोड किया जाए ताकि दुनियाभर के हिंदीप्रेमी उसको देख सुन सकें। इसके लिए सबसे अच्छी जगह तो विश्व हिंदी सचिवालय की वेबसाइट ही हो सकती है। इस तरह के समन्वय के लिए आवश्यक है कि विश्व हिंदी सचिवालय को और सक्रिय भूमिका दी जाए। विश्व हिंदी सचिवालय की वेबसाइट पर वीडियो अपलोड करने का प्रविधान है लेकिन वहां एक आडियो फाइल अपलोड है। इस वेबसाइट को देखने के बाद ऐसा लगता है कि इसको एक ऐसे संपादक या व्यक्ति की आवश्कता है जो इसको अद्यतन रख सके। पहले ये तय भी था कि विश्व हिंदी सचिवालय की विश्व हिंदी सम्मेलनों के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका होगी लेकिन अबतक ऐसा हो नहीं सका है। विश्व हिंदी सचिवालय के अन्य केंद्र खोलने से अधिक आवश्यक है कि इस संस्था को ही अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय किया जाए। वहां निरंतर कार्य हो और विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान हुई चर्चा और सम्मेलन की अनुशंसाओं के अनुपालन की प्रगति की समीक्षा की जाए। मेरी जानकारी के अनुसार पिछले विश्व हिंदी सम्मेलन की अनुशंसाओं के अनुपालन की समीक्षा के लिए कोई अधिकृत बैठक नहीं हो सकी है। अगर सम्मेलन में पारित प्रस्तावों या सुझावों को लेकर निरंतर कार्य नहीं होगा तो उसका कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। कुछ वर्षों के बाद फिर से उसी प्रस्ताव को पारित करने जैसी गलती संभव है। जैसा इस वर्ष हुआ।

विश्व हिंदी सम्मेलन को समय के साथ भी चलने की भी आवश्यकता है। यह अच्छा है कि फिजी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस( कृत्रिम मेधा) पर चर्चा हुई लेकिन एक वक्ता को छोड़कर किसी ने भी गहराई से उसपर विचार नहीं किया। 2012 में दक्षिण अफ्रीका में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन के अवसर पर प्रकाशित स्मारिका में इसका उल्लेख था कि प्रगतिशील लेखक संघ ने भारत की सभी भाषाओं के लिए रोमन लिपि अपनाने का सुझाव दिया था, लेकिन देवनागरी लिपि समर्थकों ने ये कहते हुए उसे खारिज कर दिया था कि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। आज रोमन लिपि हिंदी के सामने एक बड़े खतरे के रूप में उपस्थित है। हिंदी फिल्मों की दुनिया में लगभग सारा कार्य रोमन लिपि में होता है। एक दो अभिनेताओं को छोड़कर लगभग सारे अभिनेता स्क्रिप्ट से लेकर संवाद तक रोमन में पढ़ते हैं। इसके अलावा जो पीढ़ी उन्नत तकनीक के साथ बड़ी हो रही है उसकी भाषा भी न तो देवनागरी हो पा रही है न ही अंग्रेजी। वो अधिकतर रोमन में संवाद करते हैं और अब तो वाक्यों और शब्दों का स्थान चिन्हों ने ले लिया है। हिंदी के सामने जो इस तरह की व्यावहारिक चुनौतियां हैं उसपर विचार करना बेहद आवश्यक है। दूसरी बात ये है कि विश्व हिंदी सम्मेलन और इसके कर्ताधर्ताओं को युवाओं को इससे जोड़ने का उपक्रम करना चाहिए। सम्मेलन के सत्रों को लाइव प्रसारण हो और उसमें युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। उनके मन में उठने वाले प्रश्नों पर मंथन हो। कोई ऐसा तंत्र विकसित किया जाए कि पूरी दुनिया में हिंदी से प्रेम करनेवाले युवा इस सम्मेलन से आनलाइन माध्यम से जुड़ सकें। अंत में काका साहब कालेलकर की एक पंक्ति याद आ रही है जहां उन्होंने कहा था कि हिंदी को राष्ट्रभाषा के तौर पर अगर विजयी बनना है तो वह संस्कृत का सहारा छोड़ नहीं सकती है। उनका मानना था कि भारत के हरेक प्रदेश ने संस्कृत भाषा से, संस्कृत साहित्य से और संस्कृत की शब्द शक्ति से लाभ उठाया है। संस्कृत संस्कृति ही भारतीय संस्कृति का प्राण है। संस्कृत की मदद के बिना भारत की कोई भाषा पनप नहीं सकती है। विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजकों को, विश्व हिंदी सचिवालय को काका कालेलकर की बातों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। 

Friday, February 10, 2023

आक्रांताओं के कारण प्रवेश पर पाबंदी


पिछले दिनों दक्षिण भारत की यात्रा पर गया था। यात्रा के दौरान त्रिवेन्द्रम स्थित श्रीपद्मनाभस्वामी मंदिर में दर्शन करके परिसर के उत्तरी गेट से बाहर निकल रहा था। गेट पर पहुंचकर देखा कि एक विदेशी महिला और पुरुष गेट पर तैनात सुरक्षाकर्मी से कुछ अनुरोध कर रहे थे। वो बार बार अंग्रेजी में कुछ कह रहे थे और सुरक्षाकर्मी सिर्फ नो नो (नहीं-नहीं) कह रहे थे। हम उनकी बात सुनने के लिए रुक गए। जिज्ञासा थी कि सुरक्षाकर्मी किस बात के लिए मना कर रहे हैं और विदेशी पर्यटक का आग्रह क्या है। जब हम रुके तो सुरक्षाकर्मी उनसे कह रहे थे ओनली हिंदू। ये सुनकर विदेशी पर्यटक ने कहा कि आई एम अ हिंदू, आई डू योगा। आई नो कृष्णा, आई नो रामा एंड आई विलीव इन गाड। (मैं हिंदू हूं, मैं योग करता हूं और राम और कृष्ण को जानता हूं। मैं भगवान में विश्वास करता हूं।) इतना सुनने के बाद भी सुरक्षाकर्मी सहमत नहीं हो रहे थे और बार बार उनसे कह रहे थे कि ओनली हिंदू कैन गो ( सिर्फ हिंदू ही मंदिर परिसर में जा सकते हैं)। विदेशी पर्यटक लगातार हिंदू धर्म के बारे में अपनी जानकारी सुरक्षाकर्मियों से साझा कर रहे थे। अब उसके साथ की महिला ने भी कहना आरंभ कर दिया था कि वो भी योग करती है इसलिए वो भी हिंदू है। हमने हस्तक्षेप करने का प्रयास किया लेकिन सुरक्षाकर्मी टस से मस नहीं हो रहे थे। थोड़ी देर तक दोनों की बातें सुनने के बाद सुरक्षाकर्मियों ने उनको अपने उच्चाधिकारियों के पास भेज दिया। पता नहीं उनको श्रीपद्मनाभस्वामी के दर्शन करने का सौभाग्य मिला या नहीं। जब हम कोच्चि के डच पैलेस के अंदर श्रीमहाविष्णु मंदिर पहुंचे तो मंदिर के बाहर बोर्ड लगा था, ओनली हिंदूज आर अलाउड इनसाइड द टैंपल (मंदिर में सिर्फ हिंदूओं के प्रवेश की अनुमति है)। वहां भी विदेशी पर्यटक मंदिर के गेट तक जा रहे थे और बोर्ड देखकर वापस हो रहे थे।

इन दो मंदिरों को देखने के बाद मन में ये प्रश्न उठा कि मंदिरों में गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित क्यों है। जबकि कहा ये जाता रहा है कि हिंदू धर्म, उपासना की पद्धति भर नहीं है, वह एक समग्र जीवन दर्शन और व्यवहार प्रक्रिया है। उसमें सकारात्मक स्वीकृतियों के साथ निषेधात्मक पक्षों के उन्नयन की गंभीर दृष्टि होती है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद से लेकर छांदोग्योपनिषद तक में धर्म के अर्थ को स्पष्ट किया गया है। ऋगवेद में तो धर्म का अर्थ निश्चित नियम या आचरण के तौर पर उल्लिखित है। ऋगवेद और अथर्ववेद में धर्मन् शब्द का उपयोग कई बार मिलता है। जैमिनी की परिभाषा के अनुसार वेदों में प्रयुक्त अनुशासनों के अनुसार चलना ही धर्म है। धर्म का संबंध उन क्रिया-संस्कारों से है, जिनसे आनंद मिलता है और जो वेदों द्वारा प्रशंसित और प्रेरित हैं। मनुस्मृति में भी कहा गया है आचार: परमो धर्म:। धर्म की परिभाषा को लेकर, इसको उपादानों को लेकर, इसके सूत्रों को लेकर, इसके सूत्रग्रंथों को लेकर विपुल सामग्री उपलब्ध है। लेकिन कहीं भी धर्म का अर्थ उपासना पद्धति नहीं मिलता है। धर्म को जीवन जीने की पद्धति के तौर पर ही देखा गया है। अगर हिंदू धर्म को जीवन जीने की पद्धति माना गया है तो उन विदेशियों का क्या किया जाए जो ये कहते हैं कि उनका तो हिंदू धर्म में विश्वास है, वो राम और कृष्ण में भी विश्वास रखते हैं। क्या वो मंदिरों में प्रवेश कर सकते हैं। इस बारे में व्यापक हिंदू समाज को विमर्श करना चाहिए। 

उससे भी महत्वपूर्ण ये जानना है कि हिंदू मंदिरों में गैर-हिंदुओं का प्रवेश निषेध क्यों किया गया था। मंदिरों में केवल हिंदुओं को ही प्रवेश देने की व्यवस्था क्यों की गई थी। आज के संदर्भ में अगर इस प्रश्न को पूछा जाएगा तो जो खुद को कथित उदारवादी परंपरा के लेखक मानते हैं उनमें से अधिकतर इसका उत्तर जातिप्रथा और धर्मशास्त्रों में निर्दिष्ट जीवनपद्धतियों की एकांगी व्याख्या के आधार पर देंगे। कोई इसके लिए आर्य-अनार्य के सिद्धांत का सहारा लेगा तो कोई वर्ण या जाति व्यवस्था को इसका आधार बनाकर अपनी विद्वता का परिचय देने का प्रयास करेगा। क्या इस तरह के विचारों या तर्कों से सहमत हुआ जा सकता है। बिल्कुल नहीं। मंदिरों में गैर हिंदुओं के प्रवेश पर पाबंदी लगाने के पीछे का सबसे बड़ा कारण रहा है विदेशी आक्रांताओं का मंदिरों पर हमला कर उसको तोड़ना, वहां संचित धन को लूटना और समाज के सांस्कृतिक केंद्र को तहस नहस करना। भारतीय संस्कृति में मंदिरों को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। मंदिरों से नृत्य और कला का गहरा जुड़ाव रहा है। मुगल आक्रांताओं ने जब हमारे देश पर हमला किया और तो उनको मंदिरों की सामाजिक और सांस्कृतिक महत्ता का अनुमान हो गया था। ये अकारण नहीं है कि मुगलकाल में मंदिरों पर हमले हुए, मंदिरों को तोड़ा गया। मुगलों ने मंदिरों को तोड़कर सिर्फ हिंदुओं की आस्था को नहीं तोड़ा बल्कि उन्होंने भारतीय समाज के उस केंद्र को नष्ट करने का प्रयास किया जहां लोग संगठित होते थे। मुगलों ने मंदिरों के रूप में स्थापित सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्रों को तोड़कर भारतीय समाज को कमजोर करने का प्रयत्न किया था। समाज की ताकत पर प्रहार किया। भारतीय कला लोक के केंद्र मंदिर हुआ करते थे। जनता की आकांक्षाएं और उसके स्वप्न उन्हीं कलाओं में खुलते और खिलते थे। उत्तर भारत में मुगलों का प्रभाव रहा और वो सुदूर दक्षिण भारत तक अपना साम्राज्य स्थापित नहीं कर पाए थे तो इस कारण दक्षिण भारत के मंदिर उनसे सुरक्षित रहे। जब उत्तर भारत के मंदिरों को तोड़े जाने और उसको नष्ट करने की खबरें दक्षिण भारत तक पहुंची होंगी तो मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई होगी। इन बातों का प्रमाण को ढूंढे जाने की आवश्यकता है। दक्षिण भारत के मंदिर के पुजारियों या वहां पीढ़ियों से रह रहे सेवादारों से बात करने पर इस तरह की बातें सामने आती हैं। उत्तर और पश्चिम भारत के मंदिरों में भी गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पाबंदी लगाने का प्रयास हुआ। कई मंदिरों में इस तरह की पाबंदी लगाई भी गई। उसके पीछे के कारण भी यही रहे कि मुगलों की सेना ने कई बार छलपूर्वक मंदिरों में प्रवेश करके उसको तोड़ने का कार्य किया। 

मुगलों के पराभव के बाद और अंग्रेजी राज के उदय के समय और कालांतर में उनके शासनकाल में भी मंदिरों का पौराणिक स्वरूप स्थापित नहीं हो सका। इसका कारण ये रहा कि मंदिरों पर अंग्रेज शासकों की लगातार नजर रहा करती थी। वहां होने वाली गतिविधियों पर, वहां होनेवाले धन संचय पर भी अंग्रेज नजर रखते थे। उनको लगता था कि मंदिर ही स्वाधीनता की गतिविधियों के केंद्र हो सकते हैं। अंग्रेजों ने मंदिरों के सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूप को बदलने का प्रयत्न किया और मंदिरों को सिर्फ धार्मिक केंद्र के रूप में प्रचारित करना आरंभ कर दिया। उनके सांस्कृतिक स्वरूप और सामाजिक भूमिका पर पाबंदियां लगाई गईं। अंग्रेजी शासन वाले कालखंड में धर्म से जुड़ी बातों को तोड़ा मरोड़ा गया। आधुनिक और अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर धर्म की गलत व्याख्या करके उसको रिलीजन बनाकर आनेवाली पीढ़ियों के मानस में स्थापित कर दिया गया।

हिंदू समाज बहुत उदार रहा है और इसके अंदर से ही रूढ़ियों को खत्म करने को लेकर सुधारवादी पैदा होते रहे हैं। उन्होंने हिदू समाज में समय के साथ कई तरह के सुधार किए। इस तरह के कई मंदिर मिलेंगे जहां पहले गैर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित था लेकिन वहां अब इस नियम में ढील दे दी गई है और हर तरह के धर्मावलंबी उन मंदिरों में जा रहे हैं। ये उदारवादी दृष्टि समयानुसार व्यापक होती रहती है। 


Saturday, February 4, 2023

तकनीक से समृद्ध होगी संस्कृति


एक फरवरी को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में बजट पेश किया। बजट पर चर्चा हो रही थी। अचानक एक सज्जन का फोन आया। कहने लगे कि इस बार प्रकाशन जगत के लिए सरकार ने कुछ नहीं किया। उल्टे डिजीटल पुस्तकालयों की घोषणा करके पुस्तक व्यवसाय के लिए एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। इतना कहने के बाद उन्होंने कहा कि हिंदी के एक शीर्ष प्रकाशक की बजट पर प्रतिक्रिया भेज रहे हैं, उसको देख लीजिएगा। उनके फोन रखते ही हमने मेल चेक की तो प्रकाशक महोदय की हिंदी और अंग्रेजी में बजट पर प्रतिक्रिया थी। बजट में प्रकाशन जगत की उपेक्षा पर वो झुब्ध नजर आ रहे थे। इसके अलावा उन्होंने डिजीटल पुस्तकालयों की घोषणा की भी आलोचना की थी और कहा था कि कोरोना के समय से संकटग्रस्त प्रकाशन व्यवसाय को सरकार की इस पहल से झटका लगेगा। यात्रा पर होने की वजह से बजट भाषण सुन नहीं पाया था। प्रकाशक महोदय की प्रतिक्रिया पढ़ने के बाद ये जानने की इच्छा हुई कि बजट में ऐसी क्या घोषणा हुई है जिसपर हिंदी के इस शीर्ष प्रकाशक ने इतनी कठोर प्रतिक्रिया दी है।

इस बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बच्चों और किशोरों के लिए नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी बनाने की घोषणा की। अपनी घोषणा में वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि इस डिजीटल पुस्तकालय में सभी भाषाओं और विषयों की उत्कृष्ट पुस्तकें होंगी। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा कि वो पंचायत और वार्ड स्तर पर पुस्तकालयों की स्थापना करें। इन पुस्तकालयों में इस तरह की व्यवस्था की जाए कि बच्चे और किशोर वहां बैठकर नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी की पुस्तकों तक पहुंच सकें। इसके साथ ही वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार देश में पढने की संस्कृति का विकास करने के लिए गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर हर आयुवर्ग के छात्रों के लिए पठनीय सामग्री उपलब्ध करने का प्रयास करेगी। इस कार्य में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास और चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट का सहयोग भी लिया जाएगा। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से अपेक्षा की गई है कि वो नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी के लिए सभी भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ट पुस्तकें उपलब्ध कराए। नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी में सिर्फ पुस्तकें ही नहीं होंगी बल्कि किशोरों और बच्चों को कई अन्य चीजें सीखने को मिलेंगी। ये डिजीटल पुस्तकालय शिक्षा मंत्रालय के अधीन होगा। 

अवधारणा के स्तर पर नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी की स्थापना एक बेहतर प्रयास दिखाई देता है। इसको आरंभ करके उत्कृष्टता प्रदान करने के लिए शीघ्रता से कार्य करना होगा। यह प्रयास राष्ट्रीय शिक्षा नीति को भी बल प्रदान कर सकता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्कूलों में जिस तरह से भारतीय भाषाओं को वरीयता देने की बात की गई है उसको लागू करने में भी डिजीटल लाइब्रेरी सहायक हो सकता है। पिछले बजट में सरकार ने देश में एक डिजीटल विश्वविद्यालय की स्थापना की घोषणा की थी। तब ये कहा गया था कि इस विश्वविद्लाय की स्थापना से छात्रों को लाभ होगा और वो कहीं से बैठकर उत्कृष्ट शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे। एक वर्ष बीतने के बाद अभी तक उस विश्वविद्यालय को शुरू नहीं किया जा सका है। कहा जा रहा है कि इस वर्ष जून जुलाई तक ये विश्वविद्लय अस्तित्व में आ जाएगा। इसी तरह से कुछ वर्षों पूर्व इंडियन इंस्टीट्यूट आफ हेरिटेज की स्थापना की बात की गई थी। उसको लेकर कई बैठकें हुईं। समितियां भी बना दी गईं, लेकिन उस घोषणा का क्या हुआ ये अभी तक सार्वजनिक नहीं हो सका है। उस समय दावा किया गया था कि संस्कृति के क्षेत्र में ये आईआईएम और आईआईटी की तरह कार्य करेगा। इसका आरंभ नहीं होना या इसपर धीमी गति के काम होना चिंताजनक है। खैर ये संस्कृति मंत्रालय से जुड़ा मामला है, इसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी। 

अभी हम बात कर रहे थे नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी की। हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी की स्थापना के साथ राज्यों में हर पंचायत और वार्ड में पुस्तकालय की स्थापना की बात भी की गई है। इस समय प्रकाशन जगह की जो स्थिति है उसमें प्रकाशकों से ये अपेक्षा करना व्यर्थ है कि वो पंचायतों तक पुस्तकों को पहुंचाने की कोई योजना बनाकर उसको साकार करें। पुस्तकों की पाठकों तक पहुंच इस वक्त प्रकाशन जगत की सबसे बड़ी समस्या है। प्रकाशकों तक की तरफ से इस समस्या को दूर करने की कोई कार्ययोजना सामने नहीं आई है। ग्राम पंचायत तो बहुत दूर की बात है महानगरों में भी पुस्तकों की दुकानें बहुत कम हैं। पुस्तकों की उपलब्धता भी। ऐसे वातावरण में नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी की सहायता से देश के हर पंचायत में बच्चों और किशोरों तक अपने देश का साहित्य और इतिहास पहुंचाया जा सकता है। उनको अपने गौरवशाली अतीत और वर्तमान की उपलब्धियों के बारे में आसानी से बता सकते हैं।  

दूसरा एक और लाभ नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी का है जिसको रेखांकित किया जाना बेहद आवश्यक है। बजट घोषणा में ये भी कहा गया है कि इसमें बच्चों औ किशोरों के लिए प्रचुर मात्रा में साहित्य और पठनीय सामग्री उपलब्ध होगी। अगर हम सिर्फ हिंदी की बात करें तो यहां बाल साहित्य बहुत कम मात्रा में उपलब्ध है। बाल साहित्य न तो लेखकों की प्राथमिकता में है और न ही प्रकाशकों की। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि हिंदी में बाल साहित्य लेखन पूरी तरह से उपेक्षित है। बच्चों की जो पत्रिकाए निकला करती थीं वो बंद हो चुकी हैं। एक दो पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है लेकिन उनकी पहुंच पाठकों तक नहीं बन पा रही है। हिंदी में बाल साहित्य की कमी को लकर कभी-कभार गोष्ठियों और सेममिनारों में चिंता तो व्यक्त की जाती है लेकिन इस कमी को दूर करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं दिखाई देता है। हिंदी के लेखक एक विशेष विचारधारा के वशीभूत होकर खास प्रकार का साहित्य लिखते रह गए। उनका अधिक ध्यान समाज में फैले कथित असामनता, गरीबी और मजदूरों की समस्या पर रहा और वो इन्हीं विषयों को केंद्र में रखकर लिखते रह गए। अब अगर नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी को समृद्ध करने के लिए राष्ट्रीय पुस्तक न्यास और चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट की ओर से पहल की जाती है तो हिंदी की इस कमी को पूरा करने की दिशा में प्रयास आरंभ हो सकता है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास बच्चों को ध्यान में रखकर पुस्तकें लिखवा सकता है।        

ज्ञान के साथ साथ संस्कृति के विकास और उसको मजबूत करने में भी डिजीटल लाइब्रेरी उपयोगी हो सकती है। संस्कृति को मजबूत करने के लिए यह आवश्यक है कि नई पीढ़ी के लोग अपनी विरासत के बारे नें विस्तार से जानें। नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी भारत की सांस्कृतिक विरासत को हर ग्राम पंचायत तक पहुंचाने का एक उपक्रम भी बन सकता है। रही बात प्रकाशकों को इस पहल से चुनौती की तो तकनीक कभी भी किसी व्यवस्या के लिए चुनौती बनकर नहीं आती है बल्कि वो उस व्यवसाय के लिए संभावनाओं के नए द्वार खोलती है। जब देश में कंप्यूटर आया था तो कई दलों के लोगों ने इसका ये कहते हुए विरोध किया था कि इससे बेरोजगारी बढ़ेगी लेकिन कालांतर में कंप्यूटर की उपयोगिता हर क्षेत्र में बढ़ी और इसने रोजगार की असमीति संभावनाओ को जन्म दिया। प्रकाशकों के सामने भी अब इस डिजीटल लाइब्रेरी के लिए बच्चों और किशोरों के लिए पुस्तकें उपलब्ध करवाने की चुनौती होगी। ऐसा नहीं है कि छपी हुई पुस्तकों की महत्ता खत्म हो जाएगी लेकिन इसका डिजीटल स्वरूप आने और उसकी लाइब्रेरी बनने से उसकी व्याप्ति बढ़ेगी। अगर पुस्तकों की व्याप्ति बढ़ती है तो प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रकाशकों को ही लाभ होगा। जरूरत इस बात की है कि प्रकाशक तकनीक को अपने व्यावसायिक हितों के लिए उपयोग करें। 


Saturday, January 28, 2023

संघ बहाना, मोदी निशाना


इन दिनों पूरे देश में प्रमुख रूप से दो चर्चा हो रही है। एक बीबीसी की डाक्यूमेंट्री इंडिया, द मोदी क्वेश्चन की और दूसरी शाह रुख खान की फिल्म पठान की। वामपंथी छात्र संगठन बीबीसी की डाक्यूमेंट्री का सार्वजनिक प्रदर्शन करना चाह रहे हैं। इसपर विवाद हो रहे हैं। फिल्म पठान को सफल बताकर उसी ईकोसिस्टम के लोग भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों को घेरने का प्रयास कर रहे हैं। बीबीसी की डाक्यूमेंट्री की आड़ में वो दल भी हमलावर हैं जिनके नेता ऐश्वर्या राय से लेकर क्रिकेट की अधिक चर्चा होने पर पर मीडिया को घेरते रहे हैं। अगर डाक्यूमेंट्री की ही चर्चा करनी थी तो ‘आल दैट ब्रीथ्स’ और ‘द एलिफेंट व्हिस्पर्स’ की चर्चा करते। उनका सार्वजनिक प्रर्दर्शन करते। ये दोनों आस्कर अवार्ड के लिए शार्टलिस्टेड हैं। इसकी चर्चा नहीं करके वामदलों का ईकोसिस्टम एक ऐसी डाक्यूमेंट्री की चर्चा करने में लगा है जिसका रिसर्च तो दोषपूर्ण है ही उसकी मंशा पर भी प्रश्नचिन्ह है। द मोदी क्वेश्चन में गुजरात हिंसा के बहाने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घेरा जा रहा जिसपर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आ चुका है। 

बीबीसी की डाक्यूमेंट्री अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करने का एक प्रयास है। ऐसा नहीं है कि इस तरह का प्रयास पहली बार हुआ है। पिछले महीने ‘द इकोनामिस्ट’ में एक लेख प्रकाशित हुआ था, द मिथ आफ अ होली काउ। इस लेख में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से गाय और हिंदू राष्ट्र को जोड़कर देखा गया। इस लेख के लेखक ने गिनकर ये बताया कि ऋगवेद में 700 जगहों पर गाय का उल्लेख है लेकिन गोमांस नहीं खाने की बात कहीं नहीं है। ग्रंथों से खोज-खोजकर बताया गया है कि प्राचीन काल में गोमांस खाने का उल्लेख मिलता है। लेख में आर्य समाज को हिंदू फंडामेंटलिस्ट समूह बताया गया है। आर्यसमाजियों ने भारत की हिंदू पहचान को फिर से स्थापित करने के लिए गोरक्षा को औजार बनाया था। वो हिंदू पहचान जो मुस्लिम आक्रांताओं की वजह से धूमिल पड़ गया था। लेख में देश की स्वतंत्रता के लिए भी गोरक्षा के उपयोग का तर्क दिया गया है।  इस संदर्भ में गांधी को उद्धृत किया गया है। गांधी गोरक्षा को विश्व को हिदुत्व का तोहफा मानते थे और कहते थे कि हिंदुत्व तबतक रहेगा जबतक गाय की रक्षा करनेवाले हिंदू रहेंगे। कहना न होगा कि लेखक ने गोरक्षा को हिदुंत्व से जोड़कर उसपर राजनीति करनेवालों और घटनाओं को गिनाया। फिर उसको मोदी और मोदी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से जोड़ा। यहां लेख में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दक्षिण पंथी अर्धसैनिक संगठन तक बता दिया। ये तो एक उदाहरण मात्र है जबकि ऐसे कई लेख ‘द इकोनामिस्ट’ जैसी पत्रिकाएं में प्रकाशित होते रहे हैं। इस तरह के लेखों को आधार बनाकर वामपंथी ईकोसिस्टम छाती कूटने लगता है। 

अगले वर्ष देश में लोकसभा चुनाव होने हैं। अभी जिस तरह का माहौल है और चुनावी सर्वे और चुनावी पंडित जो संकेत दे रहे हैं उससे लगता है कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी तीसरी बार केंद्र में सरकार बनाएगी। एक तरफ विपक्षी दल यात्राओं आदि के माध्यम से सरकार पर हमलावर हैं तो दूसरी तरफ ईकोसिस्टम को काम पर लगाया गया है। पिछले दिनों कन्नड के लेखक देवनूरु महादेवा की एक पुस्तिका पर नजर पड़ी। इस पुस्तिका का नाम है आरएसएस, द लांग एंड द शार्ट आफ इट। पुस्तिका मूल रूप से कन्नड में लिखी गई है। पुस्तक के बारे में बात करने के पहले जान लेते हैं कि देवनूरु महादेवा कौन हैं। पुस्तिका में ही लिखा है कि इन्होंने 2015 में पुरस्कार वापसी अभियान के दौरान साहित्य अकादमी और पद्मश्री पुरस्कार लौटाने की घोषणा की थी। ये भी बताया गया है कि छात्र जीवन में देवानूरु महादेवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रभाव में थे। बाद में उनका कई कारणों से मोहभंग हो गया। छोटी सी पुस्तिका की भूमिका रामचंद्र गुहा ने लिखी है और अंत में योगेन्द्र यादव की एक लंबी टिप्पणी भी है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि एक लंबे लेख को पुस्तिका की शक्ल दी गई। कई भाषाओं में इसको अनुदित कर प्रकाशित करवाया गया। 

अपनी इस पुस्तिका में देवानूरु महादेवा की स्थापना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मनुस्मृति के चातुर्वण के आधार पर समाज को बांटकर रखना चाहता है। इस्लाम और ईसाई धर्म का विरोध संघ इस वजह से करता है क्योंकि इन दोनों धर्मों में चतुर्वण का निषेध है। संघ को ये निषेध स्वीकार नहीं । संघ चहता है कि समाज में जाति व्यवस्था बनी रहे। देवानूरु महादेवा अपनी इस स्थापना के लिए गुरुजी गोलवलकर और वीर सावरकर के लेखों और पुस्तकों को उद्धृत करते हैं। उनका दावा है कि झूठ संघ का कुलदेवता है। एक जगह वो सुरुचि प्रकाशन से 1997 में प्रकाशित पुस्तक ‘परम वैभव के पथ पर’ को उद्धृत करते हुए बताते हैं कि उसमें संघ से जुड़े 40 संगठनों का उल्लेख है। फिर कहते हैं कि उस समय ये स्थिति थी तो अब न जाने कितने संगठन इसकी छत्रछाया में पल रहे होंगे। जब किसी चीज को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करना होता है तो तथ्यों के साथ इसी तरह से छेड़छाड़ की जाती है। डा सदानंद दामोदर सप्रे की इस पुस्तक में 31 संगठनों का विवरण है जिसको देवानूरु महादेवा 40 बता रहे हैं। यहां तक कि वो धर्म संसद को भी संघ की संस्था के तौर पर उल्लिखित करते हैं। एक जगह लेखक विरोधी दल के नेता की तरह हर भारतीय को 15 लाख के वादे और करोड़ों को नौकरी आदि का प्रश्न उठाते हैं। लेखक या गुहा और यादव जैसे उनके समर्थकों को ये बताना चाहिए कि उनकी पालिटिक्स क्या है।  

अपनी इस पुस्तिका में लेखक चतुर्वण को लेकर भी भ्रमित हैं। वो व्यवसाय आधारित जाति व्यवस्था और जन्म आधारित जाति व्यवस्था का घालमेल करते हुए दोषपूर्ण निष्कर्ष देते हैं। भारत रत्न से सम्मानित लेखक डा पांडुरंग वामन काणे ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक धर्मशास्त्र का इतिहास के पहले खंड में विस्तार से वर्ण पर विचार किया है। काणे ने एक जगह कहा है कि ‘जन्म और व्यवसाय पर आधारित जाति व्यवस्था प्राचीन काल में फारस रोम और जापान में भी प्रचलित थी। किंतु जैसी परंपराएं भारत में चलीं और उनके व्यावहारिक रूप जिस प्रकार भारत में खिले, वे अन्यत्र दुर्लभ थे और यही कारण था कि अन्य देशों में पाई जानावेली व्यवस्था खुल-खिल न सकी और समय के प्रवाह में पड़कर समाप्त हो गई।‘ पता नहीं देवानूरु महादेवा ने कौन सी मनुस्मृति और कौन सा अनुवाद पढ़ा । अगर इसका उल्लेख कर देते तो स्पष्ट होता। मनुस्मृति के कई अंग्रेजी अनुवाद हुए। डा बुहलर के अनुवाद को बेहतर माना जाता है। काणे बुहलर की उस स्थापना का भी निषेध करते हैं जिसमें वो कहते हैं कि मनुस्मृति, मानवधर्मसूत्र का रूपांतर था। काणे मानवधर्मसूत्र को कोरी कल्पना कहते हैं। संभव है कि देवानूरु ने कोई ऐसा ही भ्रामक अनुवाद पढ़कर अपनी राय बना ली हो। 

दरअसल अगले वर्ष लोकसभा चुनाव तक कई ऐसी पुस्तकें और पर्चे छपेंगे जिनमें इसी तरह की भ्रामक बातों की ओट में राजनीति की जाएगी। कुछ फिल्में भी आएंगी जिनमें इस तरह के संवाद होंगे जो वर्तमान परिस्थिति में परोक्ष रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और नरेन्द्र मोदी की नीतियों के खिलाफ होंगे। जैसे अभी एक फिल्म आई मिशन मजनू। इसमें एक लंबा संवाद है जिसमें नायक कहता है कि हम इंडिया हैं, नफरत पर नहीं प्यार पर पलते हैं। इसको सुनकर राहुल गांधी की यात्रा के दौरान के उनके बयान याद आते हैं। दरअसल ईकोसिस्टम प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर हमला दिखता है लेकिन असली निशाना नरेन्द्र मोदी हैं।  


Saturday, January 21, 2023

पीएम की नसीहत के बाद बोलती बंद


भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक चल रही थी। बैठक के दूसरे दिन पार्टी के अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा का कार्यकाल अगले वर्ष जून तक के लिए बढ़ाया जा चुका था। हर तरफ राजनीतिक बातें हो रही थीं। इस वर्ष नौ राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनाव की संभावनाओं पर कार्यकारिणी के सदस्य आपस में चर्चा कर रहे थे। बैठक समापन की ओर था। सबको प्रधानमंत्री के भाषण की प्रतीक्षा थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बोलने के लिए खड़े हुए। उन्होंने चिरपरिचित अंदाज में उन्होंने अपना भाषण आरंभ किया। राष्ट्र और राजनीति की बातें करते हुए उन्होंने सबको साथ लेकर चलने की बातें की। अचानक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सिनेमा से जुड़ा एक बड़ा संदेश दे दिया। प्रधानमंत्री ने अपने दल के नेताओं को कहा कि प्रतिदिन सिनेमा पर बोलने की आवश्यकता नहीं है। प्रधानमंत्री ने उन नेताओं को भी नसाहत दी जो हर दिन फिल्मों या फिल्मों से जुड़े मसलों पर विवाद खड़े करनेवाले बयान देते रहते हैं। फिल्म पर अपनी बात कहने के बाद प्रधानमंत्री अन्य मुद्दों पर चले गए। प्रधानमंत्री का संदेश ये था कि नेताओं को हर चीज के प्रति संवेदनशील होना चाहिए और आवश्कता पड़ने पर गंभीरता के साथ अपनी बात कहनी चाहिए। प्रधानमंत्री का भाषण समाप्त हुआ। कार्यकारिणी की बैठक भी समाप्त हुई। खबरों में प्रधानमंत्री के भाषण के अन्य बिंदुओं पर जमकर चर्चा हुई। सामाजिक समरसता से लेकर बुद्धिजीवियों तक से पार्टी के नेताओं को संपर्क बढ़ाने की बात पर काफी चर्चा हुई। सिनेमा पर विवादित बयान देनेवाले अपनी पार्टी के नेताओं को दी गई उनकी नसीहत पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कम लोगों का ही ध्यान प्रधानमंत्री के सिनेमा पर दिए गए बयान पर गया। हलांकि हिंदी फिल्म से जुड़े बड़े सितारों को राजनीतिक बातों पर प्रतिक्रिया देने में काफी वक्त लगता है।  

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस बयान के बाद मध्यप्रदेश के मंत्री नरोत्तम मिश्रा का एक बयान जागरण समूह के समाचारपत्र नईदुनिया/नवदुनिया में प्रकाशित हुआ है। प्रकाशित बयान के मुताबिक नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि ‘प्रधानमंत्री ने किसी का नाम नहीं लिया है। प्रधानमंत्री की हर बात हमारे लिए शिरोधार्य है। सारे कार्यकर्ता वहां से प्रेरणा लेकर आए हैं। हमारा आचरण और व्यवहार हमेशा उनके मार्गदर्शन में उर्जा से भरते हैं।‘ नरोत्तम मिश्रा भारतीय जनता पार्टी के उन नेताओं में से हैं जो फिल्मों या वेब सीरीज पर लगातार बयान देते रहते हैं। मध्यप्रदेश के गृहमंत्री होने के कारण कई बार उन्होंने आपत्तिजनक माने जानेवाले दृष्यों को लेकर सिर्फ बयान ही नहीं दिए बल्कि सख्त कदम उठाने की बात भी की थी। अब उनका ये कहना कि नेतृत्व का आदेश शिरोधार्य होगा, इस बात का संकेत दे रहा है कि प्रधानमंत्री का फिल्मों को लेकर दी गई नसीहत का उनकी पार्टी के बयानवीर नेताओं पर असर हुआ है। दरअसल इंटरनेट मीडिया पर शाह रुख खान की फिल्म पठान के बेशर्म रंग गाने के रिलीज होने के बाद उसके बायकाट को लेकर चर्चा हो रही है। पक्ष विपक्ष में ट्वीट हो रहे हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री का सिनेमा पर हर दिन बयानबाजी से बचने की सलाह महत्वपूर्ण हो जाती है।

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ फिल्म से जुड़े लोगों की बैठक में अभिनेता सुनील शेट्टी ने योगी जी से फिल्मों के बायकाट की मुहिम को लेकर अपनी बात रखी थी। उन्होंने तब ये भी आग्रह किया था कि वो इंडस्ट्री की भावना को प्रधानमंत्री तक पहुंचा दें। योगी जी ने ये बात प्रधानमंत्री तक पहुंचाई या नहीं ये तो नहीं मालूम लेकिन प्रधानमंत्री ने जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में सिनेमा को लेकर अपनी बात कही उससे लगता है कि प्रधानमंत्री का सूचना तंत्र बेहद सक्रिय है। उनतक हर छोटी बड़ी बात पहुंचती है। फिल्मों की बायकाट की अपील का मसला पिछले कुछ दिनों से काफी बढ़ा है। कई बार ये स्वत:स्फूर्त होता है तो कई बार अभियान चलाया जाता है। कई बार फिल्म के कलाकारों के व्यवहार के कारण दर्शक खिन्न हो जाते हैं और इंटरनेट मीडिया पर उसके खिलाफ अपनी बात कहते लिखते हैं। कई बार अभिनेता, अभिनेत्री या निर्देशक के राजनीतिक बयानों का असर भी फिल्म पर पड़ता है। उनके बयानों से नाराज होकर राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता अपना विरोध जताने के लिए उनकी फिल्म का विरोध करते हैं। इसमें कोई गलत बात नहीं है। जब तक विरोध शांतिपूर्ण ढंग से होता है तबतक किसी को इसपर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। आप नरेन्द्र मोदी का विरोध भी करेंगे, आप विरोधी दलों के लिए प्रचार भी करेंगे और ये अपेक्षा करेंगे कि मोदी के समर्थक या भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता आपकी फिल्म भी देखें। अब ऐसा संभव नहीं दिखता। अब अगर कोई अभिनेत्री जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आंदोलनकारी छात्रों के साथ जाकर खड़ी होती है तो उसका असर उसकी फिल्म के कारोबार पर पड़ता है। हिंदी फिल्म के कर्ताधर्ताओं को ये बात समझनी होगी। कलाकारों को अगर राजनीति करनी है तो राजनीति के मैदान में आना चाहिए। अब अगर कोई फिल्मकार अपनी फिल्म में राजनीतिक संदेश देता है और अपेक्षा करता है कि उस राजनीतिक संदेश का असर जिस समूह पर पड़ेगा वो उसकी फिल्म देखे तो यह अपेक्षा व्यर्थ है। अब जनता जागरूक हो गई है। वो अपनी पसंद और नापसंद को खुलकर व्यक्त भी करती है। खैर ये अलग मुद्दा है।

बात हो रही थी प्रधानमंत्री के पार्टी नेताओं को दिए गए संदेश और उसके असर की । ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री ने पहली बार इस तरह से सार्वजनिक रूप से अपनी पार्टी के नेताओं को नसीहत दी है। इसके पहले भी पार्टी की संसदीय दल की बैठक में प्रधानमंत्री ने मध्यप्रदेश के नेता कैलाश विजयवर्गीय का नाम लिए बगैर बेहद कठोर टिप्पणी की थी। दरअसल हुआ ये था कि इंदौर नगर निगम के किसी कर्मचारी को बैट से पीटते हुए कैलाश विजयवनर्गीय के पुत्र आकाश का वीडियो इंटरनेट मीडिया पर प्रचलित हो गया था। उसके बाद संसदीय दल की एक बैठक में प्रधानमंत्री ने कहा था कि बेटा किसी का भी ऐसा व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। तब प्रधानमंत्री ने पार्टी की मर्यादा की भी याद दिलाई थी और कहा था कि ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जो पार्टी की प्रतिष्ठा को कम करे। अगर कोई गलत काम करता है तो उसपर कार्रवाई होनी चाहिए। प्रधानमंत्री की उस नसीहत का असर कैलाश विजयवर्गीय और उनके बेटे आकाश विजयवर्गीय पर दिखा। प्रधानमंत्री मोदी का संदेश देने का ये तरीका एक और बैठक में दिखा था। जब उन्होंने अपनी पार्टी के उन बयानवीर नेताओं को चेतावनी दी थी जो हर दिन सुबह टीवी चैनलों के कैमरे पर अपने घर के सामने खड़े होकर किसी भी समस्या पर बयान दे देते थे। छापस रोग से ग्रस्त पार्टी के नेताओं का इलाज उनके एक बयान हो गया था।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का काम करने का अपना तरीका है। वो संचार की उस शैली को अपनाते हैं जिसमें संप्रेषण के साथ असर भी हो। इस बात को लगातार कहा जाता है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने कोई प्रेस कांफ्रेंस नहीं की। प्रधानमंत्री मोदी ने भले ही कोई प्रेस कांफ्रेंस नहीं की लेकिन जिस तरह से उन्होंने जनता और दुनिया से संवाद बनाए रखने के लिए इंटरनेट मीडिया का प्रयोग किया है वो उल्लेखनीय है। संचार का मुख्य उद्देश्य यही होता है कि बात सही व्यक्ति तक पहुंच जाए। प्रधानमंत्री मोदी ने भी पारंपरिक संचार शैली से अलग हटकर अपनी शैली विकसित की है। इस शैली को इंटरनेट मीडिया पर तो देखा ही जा सकता है, उनके वकतव्यों में भी रेखांकित किया जा सकता है। तीन उदाहरण तो ऊपर ही दिए गए हैं।

Saturday, January 14, 2023

सांस्कृतिक धरोहरों की उपेक्षा


कुछ समय पूर्व ओडिशा स्थित कोणार्क के सूर्य मंदिर जाने का अवसर प्राप्त हुआ। सूर्य मंदिर परिसर के प्रवेश द्वार से विशाल मंदिर बेहद भव्य लग रहा था। परिसर में अंदर जाते ही एक शिलालेख पर इस मंदिर के बारे में जानकारी दिखी। स्थापत्य कला की इस अनुपम कृति का निर्माण 1250 ईसवी में गंग राजा नरसिंहदेव प्रथम के राज्यकाल में सूर्य प्रतिमा की स्थपना के लिए किया गया था। इस संपूर्ण स्थापत्य को एक विशाल रथ के रूप में अनुकृत किया गया था। इस कृति में बारह जोड़ी अंलकृत पहिए लगे हुए हैं और उसे सात घोड़े खींच रहे हैं। शिलालेख के मुताबिक यह मंदिर ओडिशा के स्थापत्य कला के चरमोत्कर्ष का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस मंदिर का गर्भगृह और नाट्य मंदिर भग्न रूप में हैं, जबकि जगमोहन सुरक्षित स्थिति में है। मंदिर की भित्तियों पर दैवीय मानव , पेड़, पौधों और जीव जंतुओं के साथ साथ ज्यामितीय अलंकरण बहुतायत में हैं। कन्याओं, नर्तकियों और वादकों की शारीरिक संरचना, अलंकरण एवं भाव भंगिमाएं विशेष दर्शनीय हैं। 

शिलालेख को पढ़ने के बाद मंदिर को पास से देखने की उत्सुकता और बढ़ गई। शिलालेख के विवरण को पढ़कर जो छवि बनी थी उसके साक्षात अवलोकन के लिए मंदिर के पास पहुंचा। मुख्य मंदिर की तरफ जाने के लिए सामने की तरफ से सीढ़ियां बनी हुई हैं। उन सीढ़ियों के पहले भी एक प्रवेश द्वार है। वहां विशाल शिलाओं से बनी हाथी की आकृति है। अचानक मेरी नजर एक तरफ के हाथी की आकृति वाले शिला पर पड़ी तो तो उसके एक पांव पर सीमेंट और बालू का लेप लगा दिखा। पास जाने पर ऐसा प्रतीत हुआ कि मूर्ति में आई दरार को पाटने के लिए उसको सीमेंट और बालू से भर दिया गया था। ये भी लग रहा था कि इसके ऊपर सीमेंट का घोल डाल दिया गया है। हाथी पर घोले हुए सीमेंट के निशान स्पष्ट दिख रहे थे। ये निशान उस कलाकृति को भद्दा बना रहे थे। मंदिर के चारो तरफ घूमने और सूर्य मंदिर में पत्थर पर उकेरी गई कलाकृतियों को देखकर मंदिर की स्थापत्य कला से बेहद प्रभानित हुआ अपने देश की मंदिर निर्माण कला के बारे में जानना और उसको प्रत्यक्ष देखना अविस्मरणीय था। 

कोणार्क का ये सूर्य मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में शामिल है। इसकी देखरेख की जिम्मेदारी आर्कियोलाजी सर्वे आफ इंडिया (एएसआई) पर है। इस संगठन का काम ही सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण का है। यह संस्था भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करती है। इतने उत्कृष्ट कला के संरक्षण में इतनी लापरवाही हो रही है कि किसी कलाकृति की दरार को बेहद भद्दे तरीके भर दिया जा रहा है। दरार को पाटने वाली सामग्री के घोल को उसपर उड़ेल देना जिससे उसकी खूबसूरती नष्ट हो जा रही हो। प्रश्न उठता है कि एएसआई कोणार्क के सूर्य मंदिर के संरक्षण को लेकर इतनी लापरवाह क्यों है। क्या इन संरक्षित धरोहरों का रखरखाव विशेषज्ञों की देख-रेख में नहीं होता है। क्या इन सांस्कृतिक धरोहरों के रखरखाव का कोई वार्षिक आडिट नहीं होता है। करीब डेढ़ वर्ष पहले कुछ ऐसा ही अनुभव त्रिपुरा के उनकोटि परिसर में जाकर भी हुआ था। अगरतला से करीब पौने दो सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित उनकोटि में पत्थर पर उकेरी गई बेहतरीन कलाकृतियां हैं। इस परिसर में करीब तीस फीट के ‘उनकोटेश्वर कालभैरव’ की पत्थर की मूर्ति है। इस मूर्ति का मुकुट करीब दस फीट के पत्थर पर बना है जिसपर अद्भुत कलाकारी है। उनके आसपास दो देवियों के चित्र पत्थर पर उकेरे हुए हैं। पास ही में नंदी की पत्थर की दो मूर्तियां हैं। काल भैरव की मूर्ति की दूसरी तरफ एक विशाल शिला पर गणेश जी की मूर्ति बनी हुई है जिसके दोनों तरफ हाथी की मुखाकृति वाले चित्र उकेरे हुए हैं। उनकोटि परिसर के देखभाल का दायित्व भी एएसआई पर है। वहां भी उन मूर्तियों के संरक्षण के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं दिखा था। कुछ मूर्तियां भले ही एक कमरे में बंद कर दी गई हैं लेकिन हजारों मूर्तियां ऐसे रखी हुई हैं और लोग उसपर चढ़कर आते जाते हैं। एक जगह तो एक मूर्ति पर कपड़े धोए जा रहे थे। इस स्तंभ में विस्तार से इसपर चर्चा हो चुकी है। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वाधीनता के अमृत महोत्सव में लाल किले की प्राचीर से पांच प्रण की घोषणा करते हुए विरासत पर गर्व की बात करते हैं। अपने उसी गर्व को सहेजने के लिए प्रधानमंत्री की पहल पर काशी विश्वनाथ मंदिर का नव्य स्वरूप, उज्जैन का महाकाल लोक का भव्य परिसर का निर्माण हुआ। अयोध्या में भव्य राममंदिर का निर्माण हो रहा है। इसके पहले केदारनाथ धाम से लेकर गुजरात के मंदिरों की पौराणिकता को भव्यता के साथ सहेजा गया। इसको देश में सांस्कृतिक पुनरुत्थान के तौर पर देखा जा रहा है। विरासत पर गर्व करने के लिए यह बेहद आवश्यक है कि हम अपनी विरासत को संरक्षित करें। संस्कृति मंत्रालय के अधीन आनेवाली संस्था एएसआई की अपनी विरासत को सहेजने में लापरवाही और उदासीनता दिखाई देती है। संसद के पिछले सत्र में 13 दिसंबर 2022 को राज्यसभा में संस्कृति मंत्रालय की स्टैंडिंग कमेटी ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की। संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध संसद की इस समिति ने अपनी रिपोर्ट संख्या 330 में एएसआई के कामकाज को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए हैं। रिपोर्ट में समिति ने मंत्रालय/एएसआई में धनराशि के उपयोग को लेकर बेहद कठोर टिप्पणी की है। समिति के मुताबिक मंत्रालय ने अपने उत्तर में इस बात का उल्लेख नहीं किया है कि एएसआई को जो धनराशि आवंटित की गई थी उसका आगे आवंटन और उपयोग किस तरह से किया गया। इसके अलावा एएसआई में खाली पदों को भरने में हो रहे बिलंब पर भी समिति ने टिप्पणियां की है। संस्कृति मंत्रालय के विभिन्न संस्थानों में खाली पदों की स्थिति को रेखांकित करते हुए स्थिति को बेहद दयनीय बताया। समिति की रिपोर्ट में बताया गया है कि एएसआई के आर्कियोलाजी काडर में 420 पद स्वीकृत हैं जिसमें से 166 पद खाली हैं। संरक्षण काडर में कुल स्वीकृत पद 918 हैं दिनमें से 452 पद खाली हैं। समिति की इन टिप्पणियों पर संस्कृति मंत्रालय ने सफाई दी लेकिन समिति मंत्रालय के उत्तर से संतुष्ट नहीं हो सकी। उसने अपना असंतोष रिपोर्ट में दर्ज भी कर दिया। संस्कृति मंत्रालय के कामकाज को लेकर संसदीय समिति की इस रिपोर्ट में इस बात पर नाराजगी जताई गई है कि करीब पचास फीसद पद कैसे खाली हैं। क्या मंत्रालय या एएसआई इस बात का आकलन नहीं कर सकी कि भविष्य में कितने पद खाली होनेवाले हैं। समय रहते अगर ऐआसा हो जाता तो ये स्थिति नहीं बनती।

संस्कृति मंत्रालय में ऐसी स्थिति क्यों बनती हैं कि उससे संबद्ध कई संस्थाएं वर्षों से तदर्थ तरीके से चल रही हैं। भारतीय जनता पार्टी से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक देश की संस्कृति और सांस्कृतिक विरासत को लेकर संवेदनशील हैं, बावजूद इसके संस्कृति अगर मंत्रालयों की प्राथमिकता में नहीं आ रही है तो इसके कारणों पर विचार करने की आवश्यकता है। क्या नौकरशाही संस्कृति को लेकर संवेदनशील नहीं है। संस्कृति और उसके संरक्षण के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों और अधिकारियों का विशेष तौर पर प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। आवश्यक है कि संस्कृति मंत्रालय के मंत्रियों का कला, संस्कृति और संरक्षण में रुचि लेकर उसके प्रति संवदेशनशील होना। कलाकारों और उनके हुनर का सम्मान करना। इस स्तंभ में कई बार इस बात की चर्चा की गई है कि संस्कृति को सरकार की प्राथमिकता में लाने के लिए देश में एक समग्र सांस्कृतिक नीति की आवश्यकता है।एक ऐसी नीति जिसमें संस्कृति, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और आयोजनों के बीच सामंजस्य हो।  


Saturday, January 7, 2023

अनियमितताओं के भंवर में अकादमी


भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध एक स्वायत्त संस्था है, ललित कला अकादमी। इस संस्था का मुख्यालय नई दिल्ली में है। देशभर में इस संस्था के कई क्षेत्रीय केंद्र हैं। इसकी स्थापना 1954 में हुई थी। इसकी परिकल्पना राष्ट्रीय कला अकादमी के रूप में की गई थी। अकादमी के गठन का उद्देश्य सृजनात्मक दृश्य कलाओं के क्षेत्र में क्रियाकलापों को प्रोत्साहित और समन्वित करते हुए देश की सांस्कृतिक एकता का प्रोन्नयन करना है। अपने स्थापना के बाद के दशकों में ललित कला अकादमी ने काफी महत्वपूर्ण कार्य किया। अकादमी के संग्रह में कई अनमोल कलाकृतियां हैं। पिछले करीब तीन दशक से ललित कला अकादमी विवादों में घिरी रही है। कभी उसके संग्रह की कलाकृतियों के गायब होने की खबर आती रही तो कभी उचित रखरखाव के आभाव में कलाकृतियों के खराब होने की। नई दिल्ली के गढ़ी केंद्र में अवैध कब्जे के समाचार भी आए थे। इसके पूर्व अध्यक्ष और हिंदी के कवि अशोक वाजपेयी पर सीबीआई की जांच भी हुई थी या हो रही है। इस जांच का निष्कर्ष क्या रहा ये सार्वजनिक नहीं हो पाया है। अकादमी के सचिव रहे सुधाकर शर्मा भी विवाद में घिरे थे। अशोक वाजपेयी के कार्यकाल में पहले हटाए गए फिर बहाल किए गए। अशोक वाजपेयी के बाद के के चक्रवर्ती को ललित कला अकादमी का अध्यक्ष बनाया गया था। इनका कार्यकाल भी बेहद विवादित रहा। विवाद इतना बढ़ा था कि मंत्रालय ने इनको बर्खास्त करके ललित कला अकादमी को अपने अधीन कर लिया था। उसके बाद मंत्रालय ने कृष्णा शेट्टी को ललित कला अकादमी का प्रशासक नियुक्त किया था। फिर मंत्रालय के संयुक्त सचिव प्रोटेम चेयरमैन बनाए गए। प्रोटेम चेयरमैन बनाए जाने को लेकर भी विवाद हुआ था। 

इन विवादों के बीच महाराष्ट्र के उत्तम पचारणे को ललित कला अकादमी का चेयरमैन नियुक्त किया गया। उनकी नियुक्ति और उनके कार्यकाल में वित्तीय गड़बड़ियों को लेकर विवाद उठा और पूरा मामला अदालत तक गया। जो अभी विचाराधीन है। इस बीच उत्तम पचारणे का कार्यकाल समाप्त हो गया। उनको छह महीने का सेवा विस्तार मिला था ताकि नए अद्यक्ष का चययन हो सके। लेकिन ऐसा नहीं हो सका तो संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव उमा नंदूरी को मंत्रालय ने ललित कला अकादमी की चेयरमैन का कार्यभार सौंप दिया। अकादमी की इस पृष्ठभूमि का बताने का आशय सिर्फ इतना है कि भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध इस संस्था में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। उपरोक्त सारी बातें तो मीडिया में आईं थीं लेकिन अभी कुछ दिनों पहले भारत सरकार के लेखा परीक्षा के महानिदेशक कार्यालय ने ललित कला अकादमी की आडिट की थी। 14 अक्तूबर 2022 को ओबीएस 446867 के अंतर्गत लेखा परीक्षकों ने जो रिपोर्ट दी उसमें भारी वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितता की बात सामने आई है। 

लेखा परीक्षक ने अपने आडिट रिपोर्ट में वाहन किराए पर लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि बगैर किसी टेंडर के गाड़ियों को किराए पर लिया जाता रहा। जबकि नियमानुसार बगैर टेंडर के अकादमी वाहन किराए पर नहीं ले सकती है। कोविड के समय भी स्टाफ को लाने और छोड़ने के लिए जिन गाड़ियों को किराए पर लिया गया उसमें भी आडिट रिपोर्ट में खामियां पाई गई हैं। संस्कृति राज्य मंत्री के नाम पर ललित कला अकादमी ने एक गाड़ी किराए पर ली जिसका प्रतिमाह किराया 52 से 55 हजार रुपए भुगतान किया गया। लेखा परीक्षक के मुताबिक ये नियम विरुद्ध है। इस मद में अकादमी ने साढे छह लाख रुपए खर्च किए हैं। रिपोर्ट में इसको अविलंब रोकने की सलाह दी गई है। गाड़ियों के अलावा बिजली बिल के भुगतान में भी अनियमितता पाई गई है। लेखा परीक्षक की रिपोर्ट में जो सबसे बड़ी खामी पाई गई है वो ये है कि अकादमी ने सांस्कृतिक संस्थाओं को बगैर उपयोग प्रमाण पत्र के आर्थिक सहयोग दिया। नियम के मुताबिक जब किसी सांस्कृतिक संस्था को किसी प्रकार की आर्थिक मदद दी जाती है तो उसको अकादमी में उस धनराशि के उपयोग का प्रमाण पत्र जमा करना होता है । उसके बाद ही उसको फिर से आर्थिक सहायता दी जाती है लेकिन इस नियम की धज्जियां उड़ा दी गई। करीब 25 करोड़ की धनराशि का उपयोग प्रमाण पत्र अकादमी के रिकार्ड में नहीं है। 

वित्तीय अनियमितताओं की कहानी यही नहीं रुकती है। अकादमी अपने कर्मचारियों को किसी कार्य के लिए अग्रिम धनराशि देती है। नियम है कि बगैर इस राशि का हिसाब दिए दूसरी बार किसी को अग्रिम धनराशि नहीं दी जा सकती है। लेकिन अकादमी में 31.3.2022 तक 133 केस पेंडिंग है जिसका हिसाब नहीं दिया गया था। लेखा परीक्षकों ने इसपर प्रश्न उठाए हैं। पूर्व अध्यक्ष उत्तम पचारणे से लेकर क्षेत्रीय सचिवों और कई कर्मचारियों के नाम भी अग्रिम धनराशि पेंडिंग है जिसका हिसाब नहीं दिया गया है। लेखा परीक्षकों की इस रिपोर्ट में गड़बड़ियों की लंबी फेहरिश्त है जिसमें लैपटाप खरीद में गड़बड़ी, वकीलों की फीस में अनियमितता, बिना किसी अनुमति के मुख्यालय और गढ़ी केंद्र पर 173 सुरक्षा गार्डों को काम पर रखना, 12 लाख से अधिक के ओवरटाइम में गड़बड़ी, नियम विरुद्ध नियुक्तियां और वेतन निर्धारण, विज्ञापन पर एक करोड़ से अधिक खर्च आदि आदि। एक बड़ा ही गंभीर मसला इस रिपोर्ट में है। इस वक्त ललित कला अकादमी के प्रभारी सचिव रामकृष्ण वेडाला हैं। रिपोर्ट में है कि 2019 में ये बगैर मंत्रालय की अनुमति के मैक्सिको की यात्रा पर गए। जबकि मंत्रालय ने अकादमी को पत्र लिखकर निर्देश दिया था कि सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बगैर वो विदेश नहीं जाएं। लेकिन ललित कला अकादमी के प्रभारी सचिव ने भारत सरकार के दिशा निर्देश की अनदेखी की। इसका संज्ञान भी मंत्रालय को लेना चाहिए। अकादमी के स्टाक पर भी लेखा परीक्षकों ने गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।

केंद्रीय व्यय के महानिदेशक लेखा परीक्षक कार्यालय ने ललित कला अकादमी के क्रियाकलापों में जो अनियमितताएं पाईं है वो बेहद गंभीर हैं। संस्कृति मंत्रालय को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। साहित्य, कला और संगीत के क्षेत्र में कार्य कर रही संस्थाओं को स्वायत्ता दी जानी चाहिए लेकिन जब करदाताओं के पैसे का अपव्यय सामने आए या उसका दुरुपयोग दिखे तो सरकार को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए। इस वक्त अकादमी के अध्यक्ष का कार्यभार संभाल रहीं संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव उमा नंदूरी से ये अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि लेखा परीक्षकों की रिपोर्ट में जिन अनियमितता और गड़बड़ियों की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया है उनपर कार्रवाई करेंगी। बगैर उपयोग प्रमाण पत्र के आर्थिक मदद का हिसाब किताब लिया जाएगा। इन गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदार कर्मचारियों के खिलाफ भी नियमानुसार दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। 

संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध संस्थाओं में नियुक्ति की प्रक्रिया भी तेज करनी होगी। कई महीनों से ललित कला अकादमी में अध्यक्ष और सचिव का पद खाली है। इसको अविलंब भरने की आवश्यकता है। दरअसल इन संस्थाओं के नियमित चेयरमैन, सचिव या निदेशक के नहीं होने के कारण वहां अराजकता का माहौल बन जाता है। ललित कला अकादमी के अलावा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में नियमित निदेशक नहीं होने की वजह से अराजकता जैसा माहौल है। कुछ दिनों पहले प्रभारी निदेशक ने कुलसचिव को सेवामुक्त करने का आदेश दे दिया था जिसकों कुछ ही घंटों में वापस लेना पड़ा था। राष्ट्रीय महत्व के इस संस्थान में नियमित निदेशक नहीं होने के कारण नियमित शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हो पा रही है। नुकसान छात्रों और संस्था का हो रहा है। संस्कृति मंत्रालय के अधीन कई संस्थाएं ऐसी हैं जहां कई महत्वपूर्ण पद खाली हैं। संस्कृति मंत्री को स्वयं रुचि लेकर इन पदों को भरने का उपक्रम आरंभ करना चाहिए। 


Saturday, December 31, 2022

समय और भूमिका में बदलाव आवश्यक


नववर्ष का आरंभ हो गया है। हिंदी फिल्म जगत नववर्ष को उम्मीदों से देख रहा है। इन उम्मीदों की वजह भी है। बीते वर्ष 2022 में हिंदी फिल्में दर्शकों की तलाश कर रही थीं। निर्माता और कलाकार सफल फिल्मों की प्रतीक्षा कर रहे थे। हिंदी फिल्मों में सफलता की गारंटी माने जाने वाले शाह रुख खान, आमिर खान और सलमान खान की फिल्मों को अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही है। सिनेमा की भाषा में अगर कहें तो शाह रुख खान की आखिरी ब्लाकबस्टर फिल्म 2013 में प्रदर्शित ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ थी। उसके अगले साल सुपर हिट फिल्म ‘हैप्पी न्यू ईयर’ रही लेकिन उसके बाद उनकी कोई फिल्म सुपरहिट या ब्लाकबस्टर नहीं रही। 2017 और 2018 में आई उनकी फिल्में ‘जब हैरी मेट सेजल’ और ‘जीरो’ फ्लाप हो गई। 2018 के बाद से शाह रुख की कोई फिल्म नहीं आई।चार वर्षों के बाद इस वर्ष उनकी फिल्म ‘पठान’ आ रही है जो लगातार विवाद में घिरी हुई है। सिर्फ शाह रुख खान ही नहीं बल्कि आमिर खान की फिल्में भी दर्शकों को पसंद नहीं आ रही हैं। उनकी 2016 की फिल्म ‘दंगल’ के बाद कोई भी फिल्म ब्लाकबस्टर नहीं हो पाई। 2018 की ‘ठग्स आफ हिंदोस्तान बुरी तरह से पिटी। उनकी भी फिल्में नहीं आ रही थीं। चार साल बाद पिछले वर्ष ‘लाल सिंह चडढा’ सिनेमाघरों में पहुंची तो उसको दर्शकों ने बुरी तरह से नकार दिया। तीसरे खान सलमान के बारे में कहा जाता था कि उनका अपना एक अलग ही दर्शक वर्ग है जो उनकी फिल्मों की प्रतीक्षा करता है लेकिन आंकड़े कुछ अलग ही कहानी कहते हैं। 2017 में ही उनकी भी ब्लाकबस्टर फिल्म आई थी ‘टाइगर जिंदा है’। उसके बाद से सलमान खान भी सुपर हिट फिल्म के लिए तरस रहे हैं। रेस-3, भारत, दबंग-3 आदि फिल्में भी औसत कारोबार ही कर पाईं। इन आंकड़ों को देख कर तो लगता है कि हिंदी फिल्मों से इन अभिनेताओं के दौर समाप्त होने के संकेत मिलने लगे हैं। सलमान खान की फिल्म राधे, योर मोस्ट वांटेंड भाई की कमाई के आंकड़ों को लेकर स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है क्योंकि ये ओवर द टाप प्लेटफार्म (ओटीटी) पर रिलीज हुई थी। इसके अलावा अक्षय कुमार की भी एक के बाद एक लगातार चार फिल्में फ्लाप हुईं।

शाह रुख, आमिर और सलमान की फिल्मों के नहीं चलने से हिंदी फिल्मों को लेकर एक निराशा का माहौल बनाया गया। कहा जाने लगा कि हिंदी फिल्मों की कहानियां अच्छी नहीं होती हैं, ट्रीटमेंट अच्छा नहीं होता है इसलिए दर्शक उनको नकार रहे हैं। नकार और निराशा के इस बनाए गए वातावरण में एक युवा अभिनेता और एक निर्देशक ने अपने हुनर और कौशल से उम्मीद की लौ जलाए रखी। इस युवा अभिनेता का नाम है कार्तिक आर्यन। कार्तिक आर्यन की फिल्म भूल भुलैया-2 ने जबरदस्त सफलता हासिल की। दर्शकों ने कार्तिक आर्यन के अभिनय को खूब पसंद किया। पिछले वर्ष मई में प्रदर्शित इस फिल्म ने दुनियाभऱ में अच्छा कारोबार किया। हिंदी फिल्मों के आंकड़ों पर नजर रखनेवालों का अनुमान है कि इस फिल्म ने वैश्विक स्तर पर करीब 266 करोड़ का कारोबार किया, जबकि इस फिल्म की लागत करीब 65 करोड़ रुपए थी। इस तरह से अगर हम देखें तो विवेक अग्निहोत्री की फिल्म द कश्मीर फाइल्स ने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए। कश्मीरी हिंदुओं पर हुए अत्याचार और उनके पलायन को केंद्र में रखकर बनाई गई फिल्म की लागत करीब 25-30 करोड़ रुपए बताई जाती है। वैश्विक स्तर पर इस फिल्म ने करीब 341 करोड़ रुपए का बिजनेस किया। इस फिल्म की मुख्य भूमिका में अनुपम खेर हैं। तीसरी एक और सफल फिल्म रही अजय देवगन की दृश्यम- 2। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस फिल्म की लागत 50 करोड़ रुपए है जबकि अबतक इस फिल्म ने वैश्विक स्तर पर करीब 330 करोड़ रुपए की कमाई कर ली है। उपरोक्त तीनों फिल्में ब्लाकबस्टर की श्रेणी में रखी जा सकती हैं। अनुपम खेर, कार्तिक आर्यन और अजय देवगन, इन तीन अभिनेताओं ने तीनों खानों की कमी महसूस नहीं होने दी। हलांकि रणबीर कपूर की फिल्म ब्रह्मास्त्र के भी अच्छा कारोबार करने की बात सामने आई थी। लेकिन इस फिल्म के काराबोर के आंकड़ों पर लगातर प्रश्न उठे। इस कारण उसके बारे में ठोस रूप से कुछ कह पाना संभव नहीं है।

2023 में हिंदी फिल्मों का स्वरूप कैसा होगा? क्या हिंदी फिल्मों के दर्शक नए कलाकारों को पसंद करेंगे? क्या हिंदी फिल्मों के उन कलाकारो को दर्शक पसंद करेगी जो राजनीतिक बयान देकर सुर्खियां बटोरने की फिराक में रहते हैं? इस बारे में विचार करना होगा। इस दौर में आमतौर पर ये देखा गया है कि हिंदी फिल्मों के दर्शकों को विशुद्ध मनोरंजन चाहिए। उनका पसंदीदा अभिनेता या अभिनेत्री या फिल्म का टीजर भी अगर उनको किसी प्रकार की राजनीति से प्रेरित नजर आता है तो वो कन्नी काट जाते हैं। फिल्म छपाक के पहले दीपिका पादुकोण दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों को मौन समर्थन देने चली गई थी। उनकी फिल्म छपाक बुरी तरह से फ्लाप हो गई। इसके अलावा एक और प्रवृत्ति देखने को मिली। जब भी हिंदी फिल्मों के निर्माताओं ने ऐतिहासिक या पौराणिक कहानियों पर फिल्में बनाईं और वो स्थापित मान्यताओं से अलग गए तो दर्शकों ने फिल्म को को नकार दिया। फिल्म आदिपुरुष के साथ यही हुआ। जबकि इसका तो सिर्फ टीजर रिलीज हुआ था। ये फिल्म इस महीने ही प्रदर्शित होनेवाली थी लेकिन उसका प्रदर्शन जून तक के लिए टाल दिया गया। निर्माता-निर्देशक ने इस फिल्म में प्रभु श्रीराम के चरित्र को स्थापित मान्यताओं के विपरीत जाकर उनको आक्रामक दिखाने का प्रयास किया था। जिसका विरोध हुआ। आसन्न खतरे को भांपते हुए फिल्मकार ने रिलीज की तिथि आगे बढ़ा दी। फिल्म में बदलाव आदि की बातें भी सामने आईं हैं। फिल्म के प्रदर्शित होने पर ही वास्तविक स्थिति का पता चलेगी।   

इन दिनों बहुधा ये कहा जाता है कि अच्छी हिंदी फिल्में नहीं बन रही हैं। इस कारण ही दर्शक दूर हो रहे हैं। हिंदी फिल्मों के इतिहास में हर दौर में खराब और अच्छी दोनों तरह की फिल्में बनती रही हैं। क्या दादा कोंडके अच्छी फिल्में बनाते थे। क्या 1980 के बाद के दस वर्षों में बनी सभी फिल्में अच्छी फिल्मों की श्रेणी में रखी जा सकती हैं। उत्तर है नहीं। फिल्मों की सफलता और असफलता भी साथ साथ चलती रही है। 2023 में फिल्म निर्माताओं को हिंदी फिल्मों की नई प्रतिभाओं के साथ आगे बढ़ना होगा। दर्शक लंबे समय तक चंद अभिनेताओं को और उनकी अदाकारी को देखकर बोर हो चुके हैं। शाह रुख खान, आमिर खान और सलमान खान की काफी उम्र हो गई है। उनको अपनी उम्र का ध्यान रखते हुए उसी तरह की भमिकाओं की तलाश करनी चाहिए। अब ये लोग अपने से आधी उम्र की नायिकाओं के साथ रोमांस करते हुए दर्शकों को अच्छे नहीं लगते हैं। अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना का उदाहरण इनके सामने है। अमिताभ बच्चन ने समय को भांपा और अपना ट्रैक बदल दिया। अबतक न केवल प्रासंगिक बने हुए हैं बल्कि उनकी अवस्था को ध्यान में रखकर भूमिकाएं भी लिखी जा रही हैं। राजेश खन्ना को ये समझने में देर हुई। वो अपनी अवस्था को समझ कर भी उसके अनुरूप कार्य नहीं कर पाए तो दर्शकों ने उनको नकार दिया। जब उन्होंने अवतार और सौतन जैसी फिल्मों में अभिनय किया तो उनको भी सफलता मिली। नए वर्ष में हिंदी फिल्मों के स्थापित नायकों या सुपरस्टार्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती स्वयं के आकलन की है। जिसने भी खुद को आंक लिया वो सफल रहेगा और जो चूक गया वो हाशिए पर चला जाएगा। 

Sunday, December 25, 2022

कथेतर के विविध रंग


वर्ष 2022 बीतने को आया। साहित्य सृजन की दृष्टि से इस वर्ष कुछ उल्लेखनीय पुस्तकों का प्रकाशन हुआ। कथेतर विधा में प्रकाशित पुस्तकों पर मेरी टिप्पणी 

हिंदी साहित्य के इतिहास में जब छायावाद पर बात होती है तो जयशंकर प्रसाद, निराला, महादेवी और पंत का नाम लिया जाता है। जयशंकर प्रसाद की कृति कामायनी पर मुक्तिबोध से लेकर रामस्वरूप चतुर्वेदी तक ने विस्तार से लिखा है। उनकी रचनाओं को समग्रता में समझने के लिए इस वर्ष एक पुस्तक आई है, जयशंकर प्रसाद, महानता के आयाम। जयशंकर प्रसाद की रचनाओं से गुजरते हुए पाठकों को ये अनुभूति होती है कि कवि/लेखक खुद को लगातार परिष्कृत करता चलता है। इस पुस्तक के लेखक ने अपनी इस पुस्तक में प्रसाद के इस गुण को भी रेखांकित करने का प्रयास किया है। 

पुस्तक- जयशंकर प्रसाद, महानता के आयानम, लेखक- करुणाशंकर उपाध्याय, प्रकाशक- राधाकृष्ण प्रकाशन,नई दिल्ली, मूल्य- रु. 1495

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संस्कृत काव्यशास्त्र के अध्येता राधावल्लभ त्रिपाठी का मानना है कि साहित्य का उत्स जीवन है। कविता और उसकी व्याख्या के सिद्धांतों के मूल में लोक और जीवन है। इसलिए वो कहते हैं कि जीवन में रस है, रीति है, वक्रोक्ति है तो ये सारे तत्व कविता में भी हैं। अपनी पुस्तक भारतीय साहित्यशास्त्र की नई रूपरेखा में त्रिपाठी संस्कृत काव्यशास्त्र की प्राचीन परंपरा का परीक्षण करते हैं। साथ ही भारतीय काव्यशास्त्र के संदर्भों से वैश्विक साहित्य के मूल्यांकन की एक पीठिका भी तैयार करते हैं। इसमें साहित्य की उपादेयता के साथ रस और अलंकार का भी विवेचन है।

पुस्तक- भारतीय साहित्यशास्त्र की नई रूपरेखा, लेखक- राधावल्लभ त्रिपाठी, प्रकाशक- सामयिक बुक्स, नई दिल्ली, मूल्य- रु. 895

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नाम और कवर के चित्रों से ये लग सकता है कि ये फिल्मी पुस्तक है। दरअसल ये पुस्तक एक साहित्यिक कृति के फिल्म बनने की बेहद दिलचस्प कहानी है। ‘दो गुलफामों की तीसरी कसम’ नाम की इस पुस्तक के लेखक हैं अनंत। उन्होंने इस पुस्तक में बहुत ही रोचक अंदाज में फणीश्वर नाथ रेणु की कृति ‘मारे गए गुलफाम अर्थात तीसरी कसम’ के पात्रों के चयन पर लिखा है। गाड़ीवान हिरामन और नर्तकी हीराबाई की भूमिका निभाने वाले कलाकार से लेकर फिल्म के निर्देशक चुनने की रोचक कहानी है, जिसको अनंत ने सधे अंदाज में लिखा है। 

पुस्तक- दो गुलफामों की तीसरी कसम, लेखक- अनंत, प्रकाशक- कीकट प्रकाशन, पटना, मूल्य- रु 650 

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कश्मीर साहित्य और संस्कृति को लेकर बेहद समृद्ध रहा है। भारत की इस भूमि पर ऐसे ऐसे दार्शनिक, कवि और लेखक हुए हैं जिन्होंने भारतीय प्रज्ञा को अपनी लेखनी से नई ऊंचाई दी। कश्मीरी काव्य में रामकथा, कश्मीर के कृष्णभक्त कवि परमानंद, कश्मीर की प्रसिद्ध कवयित्री अलखेश्वरी रूपभवानी और हिंदी और कश्मीरी के अंतर्संबंधों पर केंद्रित एक पुस्तक आई, कश्मीर साहित्य और संस्कृति। इसमें कश्मीरी साहित्य के अलावा वहां की संस्कृति पर भी लेखक शिबन कृष्ण रैणा ने प्रकाश डाला है। कश्मीरी नववर्ष नवरेह से लेकर कश्मीरी शिवरात्रि के बारे में विस्तार से लिखा गया है। कश्मीर की संस्कृति और साहित्य को जानने के लिए यह उपयोगी पुस्तक है। 

पुस्तक- कश्मीर, साहित्य और संस्कृति, लेखक- शिबन कृष्ण रैणा, प्रकाशक- लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, मूल्य – रु 199

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स्वाधीनता के अमृत महोत्व वर्ष में कई गुमनाम नायकों या कम ज्ञात नायकों पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हुई। ऐसी ही एक पुस्तक है महाराणा, सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध । इस पुस्तक में लेखक ने मेवाड़ के योद्धाओं की वीरगाथा को कमलबद्ध किया है। लेखक ने मुस्लिम आक्रांताओं से लोहा लेनेवाले और हिंदू समाज की रक्षा करनेवाले मेवाड़ के शूरवीरों और जौहर की ज्वाला में अपने को होम करनेवाली रानियों के बारे में लिखते हुए लेखक सत्य को भी उद्घाटित करते चलते हैं। 

पुस्तक- महाराणा,सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध, लेखक- ओमेन्द्र रत्नू, प्रकाशक- प्रभात प्रकाशन, दिल्ली, मूल्य- रु 500