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Monday, September 7, 2009
दो जन्मदिन, दो अहसास
Tuesday, August 18, 2009
टीआरपी के लिए सबका सामना
इसके शो बालिका वधू ने मनोरंजन चैनलों से सास बहू के आठ साल के रुदन काल को खत्म कर दिया । घर घर की तुलसी का स्थान जगदीश और आनंदी के चटपटे किस्सों ने ले लिया । अपनी कुर्सी हिलती देख स्टर प्लस ने अमेरिका के बेहद लोकप्रिय शो – द मोमेंट ऑफ ट्रूथ के हिंदी संस्करण, ‘सच का सामना’ लॉंच कर दर्शको और मीडिया विशेषज्ञों के साथ संसद को भी हिला दिया । स्टार प्लस पर दिखाए जानेवाले इस शो में पूछे जाने वाले सवालों को लेकर जोरदार बहस शुरू हो गई । ये बहस मीडिया और इंटरनेट के सोशल नेटवर्किंग साइट से होती हुई संसद तक पहुंच गई और समाजवादी पार्टी से सांसद ने राज्यसभा में इस शो में पूछे जानेवाले सवालों को भारतीय सभ्यता और संस्कृति के खिलाफ करार दिया । हंगामा बढ़ता देखकर सूचना प्रसारण मंत्री ने चैनल को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया । लेकिन इस हल्ला गुल्ला का फायदा इस शो को हुआ और ये अपने टाइस स्लॉट में नंबर वन बन गया ।
इस तरह के रियलिटी शो का सहारा मनोरंजन चैनलों की दौड़ में लगातार पिछड़ रहे एनडीटीवी इमेजिन को भी मिला और उसने आइटम गर्ल राखी सावंत का स्वयंवर करवा कर अपनी लोकप्रियता में खासा इजाफा किया । टीआरपी इतनी बढ़ी कि उसने सोनी को पीछे धकेल दिया और नंबर चार पर काबिज हो गया । इस शो की लोकप्रियता से उत्साहित होकर इस चैनल ने अब राहुल महाजन के लिए आदर्श पत्नी तलाशने के कार्यक्रम बनाने की योजना बना ली है । अपनी हालत पतली होती देख सोनी टीवी ने भी छोटे मोटे सेलिब्रिटीज को लेकर एक नया रियलिटी शो शुरू कर दिया- इस जंगल से मुझे बचाओ । इस शो की शूटिंग मलेशिया के जंगलों में हुई और इसकी शूटिंग के लिए तेरह देशों से लगभग तीन सौ तकनीशियनों की टीम लगातार काम कर रही है । इस शो में नायिकाएं कम कपड़ों में जंगल में झरनों के नीचे नहाते दिखी साथ ही कुछ ऐसे संवाद भी सुनने को मिले जो दर्शकों के झटका देने वाले थे । सोनी के इस शो को भी सवा तीन की टीआरपी मिली जो नीचे गिरते चैनल के लिए सुकून देनेवाली है ।
शाम के वक्त मनोरंजन चैनलों पर जो मारकाट मची है दरअसल वो टीआरपी हासिल करने की होड़ है। लेकिन ये टीआरपी आखिर क्या बला है , क्या है टीआरपी का तिलिस्म जिसकी चाहत ने मनोरंजन चैनलों को इस कदर दीवाना बना दिया है कि वो एक के बाद एक रिएलिटी शो की भरमार कर रहे हैं। हर बहस मुहाबिसे में टीआरपी का जिक्र जरूर आता है। लेकिन कोई ये बताने को तैयार नहीं है कि आखिर टीआरपी किस चिड़िया का नाम है और ये क्यों इतना अहम है । टीआरपी दरअसल टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट है जिसे टैम ( टेलीविजन ऑडियंस मेजरमेंट ) नाम की संस्था हर हफ्ते जारी करती है । ये रेटिंग हर कार्यक्रम की होती है और टाइमबैंड के हिसाब से जारी की जाती है । मसलन रात दस बजे कौन सा चैनल सबसे ज्यादा देखा गया । इस रेटिंग में पूरे हफ्ते की औसत रेटिंग तो होती ही है साथ ही हर दिन की अलग अलग टाइम बैंड की भी रेटिंग दी जाती है । रेटिंग के अलावा ये संस्था किसी भी चैनल के दर्शकों के बीच उसकी पहुंच (रीच) को भी बताती है कि अमुक कार्यक्रम या अमुक चैनल की पहुंच कितने भारतीय घरों में है ।
अब दूसरा सवाल ये उठता है कि इस रेटिंग की जरूरत क्या है और ये इतना अहम क्यों है । ये अहम इसलिए है कि इसके आधार पर ही चैनलों को मिलनेवाले विज्ञापन और उसकी दर तय होती है । भारतीय टेलीविज़न बाजार लगभग चौबीस हजार करोड़ रुपये का है, इसमें विज्ञापन से होनी वाली आय और ग्राहकों से मिलनेवाली सब्सक्रिप्शन फीस भी शामिल है और इंडस्ट्री पर नजर रखनेवालों का अनुमान है कि मंदी के बावजूद अगले पांच साल में ये चालीस हजार करोड़ को पार कर जाएगी । देश के लगभग साढे सात करोड़ घरों में केबल कनेक्शन है और अगले पांच साल में इसके दस करोड़ के पार पहुंच जाने का अनुमान है । दरअसल इन घरों में टीवी चैनलों के कार्यक्रमों की पहुंच और उसकी लोकप्रियता को मापने का औजार टीआरपी ही है ।
लेकिन टैम जो रेटिंग जारी करती है वो कितना विश्वसनीय हैं, इन आंकड़ों का आधार क्या है और इनकी गणना कैसे की जाती है और इस गणना के लिए सैंपल साइज कितना है । रेटिंग जारी करनेवाली एजेंसी टैम का दावा है कि देशभर में रेटिंग दर्ज करनेवाले आठ हजार बक्से लगे हैं और रिसर्च करनेवालों की एक पूरी टीम हफ्ते भर इसपर काम करती है, उसके बाद ही रेटिंग जारी की जाती है । रेटिंग पर नजर रखनेवालों का ये भी कहना है कि भारत में टीआरपी की जो व्यवस्था है वो विश्व की सबसे बड़ी व्यवस्था है । किसी भी और देश में रेटिंग को रिकॉर्ड करने के लिए इतने बक्से नहीं लगे हैं, जितने भारत में । लेकिन यहां सवाल ये खड़ा हो जाता है कि क्या आठ हजार बक्सों के आधार पर देशभर में किसी कार्यक्रम की लोकप्रियता को आंका जा सकता है और अगर आंका जा सकता है तो वो कितना प्रामाणिक है । देश में टीआरपी की ये व्यवस्था उसी तरह की है जैसे कि चुनाव पू्र्व सर्वेक्षण होते है । चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में दस बीस हजार के सैंपल साइज को आधार बनाकर देशभर के प्रमुख दलों को मिलने वाली सीटों की भविष्यवाणी कर दी जाती है और उसका हश्र सबके सामने है कि हर चुनाव में ये सर्वे औंधे मुहं गिरते हैं और गलत साबित होते हैं । दरअसल ये पूरी की पूरी धारणा पश्चिम के देशों से आयात की गई है जहां कि जनसंख्या बेहद कम होती है और पूरे देश की संसकृति लगभग एक जैसी होती है । पश्चिम से आयातित इस तरह के फॉर्मूलों को भारत में लागू करने से बहुधा गड़बड़ियां होती है । भारत विविधताओं का देश है, जहां हर कोस पर बोली बदल जाती है और हर प्रांत और सूबे की अपनी एक संस्कृति और पसंद है । यहां ये दावा नहीं किया जा सकता है कि हिंदी भाषी राज्यों में लोगों की पसंद में भी समानता हो सकती है । जो चीज बिहार के लोगों को पसंद हो वो मध्य प्रदेश या फिर हरियाणा के लोगों को पसंद आ जाए ये जरूरी नहीं है । तो ऐसे में टेलीविजन रेटिंग का ये फंडा दोषपूर्ण लगता है । अखबारों की प्रसार संख्या जानने के लिए जो संस्था ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन है उसमें ऑडिटरों की टीम हर अखबार के रिकॉर्ड की जांच करती है जिसमें डिस्पैच और भुगतान की भी जांच की जाती है । लेकिन टैम के बक्से कहां लगे हैं ये रहस्य है और टैम का कहना है कि रेटिंग की पवित्रता को बचाए रखने के लिए ये जरूरी है ।
लेकिन विडंबना ये है कि इस संस्था के द्वारा दिए गए रेटिंग के आधार पर ही हजारों करोड़ रुपये का विज्ञापन तय होता है और रेटिंग में अव्वल स्थान हासिल करनेवाले कार्यक्रमों में दस सेकेंड के विज्ञापन के लिए एक लाख से सवा लाख रुपये तक का रेट है । टैम के विकल्प के रूम में ए-मैप नाम की एक संस्था खड़ी करने की कोशिश की गई लेकिन उसे अबतक विज्ञापन दाताओं से मान्यता नहीं मिल पाई है ।
टीआरपी सिस्टम की एक और विडंबना पर नजर डालते चलते हैं । कुछ महीनों पहले तक हिंदी मार्केट की रेटिंग में बिहार और छत्तीसगढ़ की कोई अहमियत ही नहीं थी । इन राज्यों के लोगों की पसंद नापसंद के बगैर ही हिंदी मार्केट में खबरिया चैनलों का शेयर तय होता था । हिंदी न्यूज चैनल को हिंदी मार्केट पर कब्जा जमाने के लिए गुजरात और महाराष्ट्र के अखाड़े में लड़ाई लड़नी होती थी । कई सालों के बाद अब बिहार और छत्तीसगढ़ के दर्शकों की पसंद को अहमियत दी गई और बताते हैं कि अब इन दोनों सूबे में न्यूज चैनलों की लोकप्रियका मापने के लिए टैम ने बक्से लगा दिए हैं । तो जिस टीआरपी के लिए मनोरंजन चैनल समाज की वर्जनाओं और देश की परंपराओं को छिन्न भिन्न कर रहे हैं उसका आधार ही दोषपूर्ण है और आठ दस हजार लोगों की पसंद के आधार पर सवा करोड़ हिंदी दर्शकों की पसंद के आधार पर करोड़ों रुपये के विज्ञापन तय होते हैं । और इस विज्ञापन के अर्थशास्त्र में सबसे ज्यादा हिस्सा झटकने या हासिल करने के लिए मची होड़ में कभी कभी सीमाओं का अतिक्रमण भी हो जाता है ।
Sunday, August 9, 2009
हिंदी अकादमी में संग्राम
Saturday, July 25, 2009
पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?
हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार उदय प्रकाश इन दिनों फिर से विवादों में घिरे हैं । विवाद की जड़ में है - पांच जुलाई को गोरखपुर में गोरक्षपीठ के कर्ताधर्ता और बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ के हाथो पहला 'नरेन्द्र स्मृति सम्मान' लेना । जबसे ये खबर छपी है पूरे साहित्य जगत में उदय की जमकर आलोचना शुरू हो गई । उदय प्रकाश सार्वजनिक जीवन में कई दशकों से वामपंथी आदर्शों की दुहाई देते रहे हैं । लेकिन इस सम्मान ग्रहण के बाद उनके चेहरे का लाल रंग धुधंला होकर भगवा हो गया है । दरअसल उदय को नजदीक से जानने वालों का दावा है कि उदय प्रकाश हमेशा से अवसरवादी रहे हैं और जब भी, जहां भी मौका मिला है उन्होंने इसे साबित भी किया है । परिस्थितियों के अनुसार उदय अपनी प्राथमिकताएं और प्रतिबद्धताएं तय करते हैं और एक रणनीति के तहत उसपर अमल भी करते हैं ।अगर मेरी स्मृति मेरा साथ दे रही है तो उदय प्रकाश ने अपने कहानी संग्रह- सुनो कारीगर- को लगभग दर्जनभर साहित्यकारों को समर्पित किया था, जिसमें नामवर भी थे और काशीनाथ सिंह भी और नंदकिशोर नवल भी थे और भारत भारद्वाज भी । जाहिर तौर पर ये एक साथ दर्जनभर से ज्यादा साहित्यकारों/आलोचकों को साधने की कोशिश थी । बाद में जब शिवनारायण सिंह संस्कृति मंत्रालय में थे तो उनको भी अपना एक कविता संग्रह समर्पित कर दिया । संयोगवश उसी वक्त उदय को मंत्रालय की फैलोशिप भी मिली । इसके अलावा उदय प्रकाश भारत भवन की पत्रिका पूर्वग्रह से भी जुडे़ रहे हैं, ये वो वक्त था जब अशोक वाजपेयी मध्य प्रदेश में साहित्य और संस्कृति के कर्ताधर्ता हुआ करते थे । लेकिन जब किसी वजह से वो पूर्वग्रह से बाहर हुए तो अशोक वाजपेयी और उनकी मित्रमंडली को 'भारत भवन के अल्सेशियंस' तक कह डाला था । उसके बाद से अशोक और उदय साहित्य के दो अलग-अलग छोर पर रहे । लेकिन वाजपेयी के पिछले जन्मदिन पर उदय ने जिस अंदाज में वाजपेयी को शुभाकमनाएं अर्पित की उसके बाद दोनों के बीच जमी बर्फ पिघली और बताते हैं कि एक मुलाकात के बाद उदय को लखटकिया वैद सम्मान मिला । ये हैं उदय की प्राथमिकता और प्रतिबद्धता ।
बीजेपी सांसद और कट्टर हिंदुत्ववाद के स्वयंभू मसीहा योगी आदित्यनाथ के हाथों सम्मान ग्रहण करने के बाद जब उदय पर चौतरफा हमले शुरू हुए तो अपने बचाव में उन्होंने बेहद लचर तर्कों का सहारा लिया - एक नियोजित तरीके से मुझ पर आक्रमण करके बदनाम करने की घृणित जातिवादी राजनीति की जा रही है.....दरअसल इस हिंदू जातिवादी समाज में विचारधाराओं से लेकर राजनीति और साहित्य का जैसा छद्म और चतुर खेल खेला गया है, उसके हम सब शिकार हैं । मेरे परिवार में यह सच है कि कि कोई भी एक सदस्य ऐसा नहीं है ( इनमें मेरी पत्नी, बच्ची, बहू और पोता तक शामिल हैं और मेरे मित्र तथा पाठक भी ) जो किसी एक धर्म, क्षेत्र, जाति, नस्ल आदि से जुडे़ हों । लेकिन हिंदी साहित्य और ब्लॉगिंग में सक्रिय सवर्ण हिंदू उसी कट्टर वर्णाश्रम -व्यवस्थावदी माइंडसेट से प्रभावित पूर्व आधुनिक सामंती, अनपढ़ और घटिया लोग हैं -जिनके भीतर जैन, बौद्ध, नाथ, सिद्ध, ईसाइयत, दलित, इस्लाम आदि तमाम आस्थाओं और आइडेंटिटीज़ के प्रति घृणा और द्वेष है इसे वे भरसक ऊपर-ऊपर छिपाए रखने की चतुराई करते रहते हैं । मैंने जीवनभर इनका दंश और जहर झेला है और अभी भी झेल रहा हूं ।' अपनी लंबी सफाई के आखिर में धमकाने के अंदाज में सवर्ण लुटेरों के साम्राज्य को ध्वस्त करने का दावा भी करते हैं । उदय पर पहले भी जब-जब उनकी व्यक्तिवादी कहानियों को लेकर उंगली उठी थी तो किसी को मथुरा का पंडा, तो किसी को घनघोर अनपढ़ घोषित किया तो किसी को अफसर होकर साहित्य की दुनिया में अनाधिकार प्रवेश के लिए लताड़ा ।
इसके पहले जब वर्तमान साहित्य के मई दो हजार एक के अंक में उपेन्द्र कुमार की कहानी 'झूठ का मूठ' छपी थी तो अच्छा खास विवाद खड़ा हो गया था । उस वक्त भी सफाई देते हुए उदय प्रकाश ने कहा था कि- दरअसल ऐसा है कि दिल्ली में गृह मंत्री के भ्रष्ट अधिकारियों का एक क्लब है जो नाइट पार्टी का आयोजन करता है । इसमें शराब पी जाती है और अश्लील चर्चा होती है । जो इसमें शामिल नहीं होता है, ये लोग उसपर हमला करते हैं । ये साहित्येतर लोग हैं जो अमेरिकी साम्राज्यवाद का विरोध तो करते हैं मगर गली-मोहल्ले के मवालियों के साथ बैठकर शराब पीते हैं ।' तो उदय प्रकाश की जब भी आलोचना होती है तो वो बिफर जाते हैं । रविभूषण ने जब इनकी कहानी पर विदेशी लेखकों की छाया की बात की थी तो मामला कानूनी दांव-पेंच में भी उलझा था ।
लेकिन बीजेपी सांसद के हाथों सम्मानित होकर इस बार उदय बुरी तरह फंसते नजर आ रहे हैं । उदय की सफाई के बाद हिंदी के दो दर्जन से ज्यादा महत्वपूर्ण साहित्यकारों ने अपने हस्ताक्षर से एक बयान जारी कर उदय की भर्त्सना की । बयान जारी करनेवालों में प्रमुख नाम हैं- ज्ञानरंजन, विद्यासागर नौटियाल, विष्णु खरे, भगवत रावत, मैनेजर पांडे, राजेन्द्र कुमार, इब्बार रब्बी, मदन कश्यप, देवीप्रसाद मिश्र आदि । चौतरफा घिरता देख उदय प्रकाश ने एक बार फिर से अपने ब्लॉग पर एक सफाई लिखी लेकिन ये सफाई कम धमकी ज्यादा है । इसके बाद उदय प्रकाश की ओर से व्लॉग चलानेवाले पत्रकार अविनाश ने मोर्चा संभला और जनसत्ता में 'और अंत में घृणा' के नाम से एक लेख लिखकर उदय की दलीलों को आगे बढा़या । उदय के समर्थन में उतरे अविनाश के तर्क भी उतने ही लचर हैं जितने उनके अंतरराष्ट्रय ख्याति के प्रिय रचनाकार की । तर्क पर गौर फरमाइये- जिन नरेन्द्र जी की स्मृति में उदय प्रकाश को योगी ने सम्मानित किया, वे नरेन्द्र जी उदय प्रकाश के फुफेरे भाई थे । दोनों में तीन दशकों की वैचारिक दूरी थी, जो हर मुलाकात में बहसों की शक्ल लेकर परिवारवालों का जीना दूभर करती रही थी । एक बरस पहले कुंवर नरेन्द्र की मृत्यु के बाद की शोकाकुल स्थियों में उदय प्रकाश उपस्थित नहीं हो सके । लेकिन पहली बरसी पर वो गए । इस बरसी में वे भी मौजूद थे, जो कुंवर साहब की जीवन की छटाओं में बिखरे थे । योगी भी इसलिए आए । लेकिन उस वक्त उदय प्रकाश अपनी मौजूदगी के राजनीतिक अर्थ नहीं निकाल पाए । अबोध बने रहे ।' अब अविनाश को कौन बताए कि उदय प्रकाश को वो जितने अबोध समझ रहे हैं या साबित करना चाह रहे हैं वो उतने अबोध हैं नहीं । मृत्यु के मौके पर ना जाकर बरसी पर जाना और सम्मानित होना भी मंशा पर सवाल तो खड़े करता ही है ।लेकिन अविनाश ने जाने अनजाने एक काम ये कर डाला कि जो विवाद अबतक ब्लॉग तक सीमित था, उसे राष्ट्रीय दैनिक में उजागर कर दिया ।
उदय प्रकाश एक बेहतर कवि हो सकते हैं, कहानियां भी हो सकता है कि उन्होंने अच्छी लिखी हों, लेकिन उनकी कहानियां व्यक्तियों पर केंद्रित होकर लोगों को दुखी करती रही हैं । जब उपेन्द्र कुमार की कहानी 'झूठ का मूठ' छपी थी तो उसपर पटना से प्रकाशित 'प्रभात खबर' में एक लंबी परिचर्चा छपी थी । जिसमें सुधीश पचौरी ने लिखा था- अरसे से हिंदी कथा लेखन में एक न्यूरोटिक लेखक कई लेखकों को अपने मनोविक्षिप्त उपहास का पात्र बनाता आ रहा था । पहले उसने एक महत्वपूर्ण कवि की जीवनगत असफलताओं को अपनी एक कहानी में सार्वजनिक मजाक का विषय बनाया । फिर वामपंथी गीतकार असफल प्रेमकथा का साडिस्टिक उपहास उड़ाने के लिए कहानी लिखी । किसी ने रोका नहीं तो, तो जोश में कई हिंदी अद्यापकों और आलोचकों के निजी जीवन पर कीचड़ उचालनेवाली शैली में कविताएं भी लिख डाली । किसी दीक्षित मनोविक्षिप्त की तरह उसने ये समझा कि उसे सबको शिकार करने का लाइसेंस हासिल हो गया है । उसके शिकारों में से उक्त गीतकार तो आत्महत्या तक कर बैठा । हिंदी के कई पाठक उसकी आत्महत्या के पीछे का कारण इस साडिज्म को भी मानते हैं । यह लेखक दरअसल स्वयं एक 'माचोसाडिस्ट' है जो दूसरों को अपने 'मर्दवादी परपीड़क विक्षेप' में जलील करता और सताता आया है । यह पहली कहानी है जिसने एक दुष्ट शिकारी का सरेआम शिकार किया है । शठ को शठता से ही सबक दिया है ।' संयोग ऐसा कि तब प्रभात खबर के साहित्य पृष्ठ के प्रभारी अविनाश ही थे ।
उदय प्रकाश की राजनीति और जोड़-तोड़ और दंद-फंद को समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है । इन सबको देखकर मुक्तिबोध की आत्मा कराहती हुई पूछ रही होगी - पार्टनर ! तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?
Monday, July 6, 2009
कहां चला राहुल गांधी का जादू ?
Friday, July 3, 2009
लेखिकाओं का प्यारा खलनायक
Thursday, June 25, 2009
चलता हूं दोस्त...देख लेना
हर दिन की तरह बुधवार को भी मैं अपने दफ्तर में रन डाउन की बगल की अपनी सीट पर बैठा था । अचानक पीछे से किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और पीछे से आवाज आई- अच्छा दोस्त चलता हूं, तड़का के दो सेगमेंट निकल गए हैं, बाकि देख लेना । मैं जबतक पीछे मुड़ता तबतक शैलेन्द्र जी हाथ हिलाते हुए न्यूजरूम से बाहर की तरफ चल पड़े थे । तड़का फिल्मी दुनिया पर हामरे चैनल पर चलनेवाल एक शो है जिसे शैलेन्द्र जी प्रोड्यूस करते थे । उस दिन से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था कि शैलेन्द्र घर जाते वक्त मुझे कहें कि देख लेना । सबकुछ सामान्य ढंग से खत्म हुआ । फाइनल बुलेटिन रोल करने के बाद मैं लगभग एक बजे घर पहुंचा । लगभग ढाई बजे तक रात की पाली के प्रोड्यूसर से सुबह की बुलेटिन की प्लानिंग पर बात होती रही और फिर अखबार आदि पलटने के बाद सो गया। सुबह साढे चार बजे के करीब मोबाइल की घंटी बजी और दफ्तर के एक सहयोगी ने सूचना दी कि नोएडा एक्सप्रेस वे पर शैलेन्द्र जी का एक्सीडेंट हो गया है और वो ग्रेटर नोएडा के शारदा अस्पताल में भर्ती हैं । इस सूचना के बाद दफ्तर में फोन मिलाया तो जानकारी मिली कि रात तकरीबन ढाई बजे शैलेन्द्र जी की गाड़ी की टक्कर ट्रक से हो गई है । टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि उनकी कार ड्राइवर की सीट तक ट्रक के नीचे तक घुस गई थी । राह चलते लोगों ने जब शैलेन्द्र जी को उनकी कार से निकालकर पास के अस्पताल में पहुंचाया तबतक बहुत देर हो चुकी थी और खून इतना बह चुका था कि उनको बचाना नामुमकिन था ।
Wednesday, June 24, 2009
धार्मिक खिलवाड़ को बेनकाब करती कृति
आस्था का जब धर्म से मिलन हो जाता है तो वो श्रद्धा में बदल जाती है और जहां श्रद्धा हो वहां सवाल नहीं हो सकते । यही बात भारत में लेखन को लेकर भी कही जा सकती है । हिंदू देवी देवताओं और मान्यताओं और रूढ़ियों पर हजारों लेख लिखे जा चुके हैं, सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है । मुझे याद है बचपन में जब मैं ‘चंपक’ पढ़ा करता था तो उसमें दिल्ली बुक कंपनी की एक पुस्तक – हिंदू समाज पथभ्रष्टक तुलसीदास- का विज्ञापन उसमें प्रमुखता से छपा करता था । चूंकि हिंदू धर्म में सहिष्णुता की गुंजाइश है इसलिए इसपर उठने वाले सवालों और तीखी आलोचनाओं पर बवाल नहीं मचता ।
Sunday, June 7, 2009
नहीं रहे हबीब तनवीर
किसी भी विधा में ये देखने को कम ही मिलता है कि अपने जीवन काल में ही उसमें काम करनेवाला लीजेंड बन जाता है । लेकिन हबीब के साथ यही हुआ और वो रंगमकर्म की दुनिया के लीविंग लीजेंड बन गए थे . बावजूद इसके हबीब तनवीर का लोगों से जुड़ाव कम नहीं हुआ और वो लोक के कलाकार के तौर पर मशहूर हुए । हबीब ने जब रंगकर्म की दुनिया में कदम रखा तो उस वक्त रंगमंच की दुनिया में लोक की बात कम होती थी । लेकिन इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ के साथ बहीह के जुड़ाव ने उन्हें लोक से जुड़ने के लिए ना केवल प्रेरित किया बल्कि उनके विचारों को भी गहरे तक प्रभावित किया । एक सितंबर 1923 को रायपुर में जन्मे हबीब तनवीर को पद्म भूषण, पद्म श्री और संगीत नाटक अकादमी जैसे पुरस्कार मिले थे. रायपुर में हुआ और स्कूली शिक्षा वहां से पूरी करने के बाद वो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पहुंचे जहां से उन्होंने ग्रेजुएशन किया और फिर 1945 में वो मुंबई चले गए जहां उनकता जुड़ा इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ से हुआ । लेकिन हबीब ने नाटक की दुनिया में कदम दिल्ली में आने के बाद ही रखा- सन 1954 में जहां पहली बार उन्होंने आगरा बाजार का मंचन किया, लिखा भी । दिल्ली में ये वो दौर था जब रंगमंच की दुनिया यूरोपियन मॉडल से प्रभावित थी और यहां अंग्रेजी वालों का बोलबाला था । लेकिन अपने इस नाटक से तनबीर ने ना केवल अंग्रेजी का आधिपत्य तोड़ा बल्कि रंगमंच की दुनिया के लिए एक नया आकाश उद्धाटित किया । ये नाटक अटारहवीं शताब्दी के मशहूर उर्दू शायद अकबर नजीराबादी पर केंद्रित था । इस नाटक में हबीब तनवीर ने ओखला गांव के कलाकारों को लेकर रंगमंच के आभिजात्य को चुनौती देते हुए एक नई भाषा भी गढ़ी । इसके बाद हबीब इंगलैंड चले गए जहां तीन साल तक रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स में रंगमंच और उसकी बारीकियों को समझा . फिर 1959 में तनबीन ने अपनी रंगकर्मी पत्नी मोनिका मश्रा के साथ मिलकर नया थिएटर नास से एक ग्रुप बनाया जिसने भारतीय और यूरोपियन क्लासिक का मंचन किया । रंगमंच की दुनिया को तनबीर ने अंग्रेजी आभिजात्य से तो आजादी दिलाई साथ ही उन्होंने लोक कलाकारो को स्थानीय बोली बानी में नाटक करने के लिए प्रोत्साहित किया ।
1975 में हबीब तनबीर ने अपना मशहूर नाटक चरणदास चोर का मंचन किया जो आजतक इतना लोकप्रिय है कि जहां भी, जब भी इसका मंचन होता है, लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है । इसके बाद तनबीर ने कई विश्व क्लासिक का मंचन किया जिसमें – गोर्की की एनेमीज पर आधारित दुश्मन, असगर वजाहत की जिन लाहौर नहीं बेख्या के अलावा कामदेव का अपना, बसंत ऋतु का सपना, शाजापुर की शांतिबाई आदि ने रंगमंच को एक नई उंचाई दी । हबीब तनवीर ने थिएटर के साथ बालीवुड की फिल्मों में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी। उन्होंने नाना पाटेकर अभिनीत चर्चित फिल्म 'प्रहार' और निर्देशक सुभाष घई की 'ब्लैक एंड ह्वाइट' में भी काम किया।
हबीब तनबीर के प्रगतिशील विचारों को जब नाटकों में जगह मिलने लगी तो भगवा ब्रिगेड के कान खड़े हुए और जब मध्य प्रदेश में सन दो हजार तीन में पोंगा पंडित और लाहौर का मंचन शुरु हुआ तो भगवा ब्रगेड के कार्यकर्ताओं ने जमकर विरोध प्रदर्शन कर इन दोनों नाटको के मंचन को रुकवाने की कोशिश की । लेकिन हबीब की जिजीविषा पर कोई असर नहीं हुआ और अपने नाटकों के माध्यम से वो अलख जगाते रहे, बगैर डरे, बगैर घबराए । रंगमंच की इस महान विभूति को हमारी श्रद्धांजलि ।
टूटते सपनों की दास्तां
Sunday, May 17, 2009
बचपन पर हमला
Sunday, May 10, 2009
पत्रिकाओं के बहाने...
Thursday, May 7, 2009
एक खामोश मौत
भोजपुरी फिल्मों के शेक्सपियर कहे जानेवाले मोती ने गुमनामी में दम तोड़ दिया । मीडिया में कम ही लोग इस नाम से परिचित हैं । मोती बीए की खामोश मौत पर इकबाल रिजवी ने हाहाकार के लिए खासतौर पर ये लेख लिखा है ।
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आज़ादी से पहले उन्होंने एमए कर लिया था लेकिन कविता के मंच पर अपनी क्रांतिकारी रचनाओं की वजह से वे तब देश भर में चर्चित हो गए जब उन्होंने बीए किया था और तभी से उनके नाम के आगे बीए ऐसा जुड़ा कि वे हमेशा मोती बीए के नाम से ही जाने गए। वे मोती बीए ही थे जिन्होंने हिंदी सिनेमा में भोजपूरी की सर्वप्रथम जय जयकार करायी। हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी और भोजपुरी पर समान अधिकार रखने वाला और भोजपुरी के शेक्सपियर के नाम से याद किया जाने वाला वह गीतकार लंबी गुमनामी के बाद चुपके से सबको छोड़ कर चला गया।
मोती लाल बीए का पूरा नाम मोती लाल उपाध्याय था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के देवरिया ज़िले के बरेजी नाम के गांव में 1 अगस्त 1919 को हुआ। बचपन से ही कविता में उनकी दिलचस्पी बढ़ने लगी। वे मनपसंद कविताओं को ज़बानी याद कर लेते थे। फिर उन्होंने खुद कविताएं लिखनी शुरू कर दीं। उनकी पढ़ाई वाराणसी में हुई। 16 साल की उम्र में पहली बार उनकी कविता दैनिक आज में प्रकाशित हुई। जिसके बोल थे " बिखरा दो ना अनमोल - अरि सखि घूंघट के पट खोल "। जब उन्होंने बीए करा तब तक वे कवि सम्मेलनो में एक गीतकार के रूप में पहचान बना चुके थे। उन्होंने अपने नाम के आगे बीए लगाना शुरू कर दिया। उस समय आज़ादी की जंग जोरो पर थी। अंग्रेज़ों के खिलाफ़ पूरे देश में माहौल बहुत गर्म था। मोती जी भोजपुरी भाषा में क्रांतिकारी गीत लिख लिख कर लोगों को सुनाया करते थे। उसी दौर का उनका एक गीत था
"भोजपुरियन के हे भइया का समझेला
खुलि के आवा अखाड़ा लड़ा दिहे सा
तोहरी चरखा पढ़वले में का धईल बा
तोहके सगरी पहाड़ा पढ़ा दिये सा "
धीरे धीरे मोती की सक्रियता कलम के सहारे क्रांतिकारी विचारों को गति देने में बढ़ने लगी। सन् 1939 से 1943 तक "अग्रगामी संसार" तथा "आर्यावर्त" जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में कार्य के दौरान राष्ट्रीय विचारों एवं उससे जुडे़ लेखन के चलते कई बार जेल भी जाना पड़ा। 1943 में वे दो महीने की सज़ा काट कर जेल से रिहा किये गए फिर उन्होंने टीचर्स ट्रेनिंग कालेज वाराणसी में दाखिला ले लिया। इसी दौरान जनवरी 1944 में वाराणसी में हुए एक कवि सम्मेलन में पंचोली आर्ट पिक्चर संस्था के निर्देशक रवि दवे ने उन्हें सुना। मोती का गीत "रूप भार से लदी तू चली" उन्हें बहुत पसंद आए और उन्होंने मोती को फ़िल्मों में गीत लिखने के लिये निमंत्रण दिया। लेकिन मोती जी अचानक मिले इस निमंत्रण को फ़ौरन स्वीकार नहीं पाए और साहित्य रचना में ही जुटे रहे। 945 में वे फिर गिरफ़्तार कर लिये गए। उन्हें वाराणसी सेंट्रल जेल में भारत रक्षा क़ानून के तहत नज़र बंद कर दिया गया लेकिन पहले की ही तरह कुछ हफ़्तों बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।
मोती जी पत्रकारिता ओर साहित्य से ही जुड़े रहना चाहते थे। फ़िल्मों में जाना उनकी प्राथमिकता कभी नहीं रही फिर भी जेल से रिहाई के बाद रोज़गार के अवसर की तलाश में उन्हें रवि दवे का फ़िल्मों में गीत लिखने का निमंत्रण फिर याद आया। मोती जी ने लाहौर का रूख किया जहां पंचोली आर्ट पिक्चर संस्था थी। उनकी मुलाक़ात संस्ता के मालिक दलसुख पंचोली से हुई और पंचोली ने उन्हें 300 रूपए महीना वेतन पर गीतकार के रूप में रख लिया। मोती को गीत लिखने के लिये पहली फ़िल्म मिली "कैसे कहूं"। इसके संगीतकार थे पंडित अमरनाथ। इस फ़िल्म में मोती ने पांच गीत लिखे शेष गीत डी एन मधोक ने लिखे। इसके बाद आयी किशोर साहू निर्देशित और दिलीप कुमार अभीनीत फ़िल्म " नदिया के पार(1948)" जिसमें सात गीत मोती बीए ने लिखे। इस फ़िल्म के गीतों की सारे देश में धूम मच गयी। खास कर इसका एक गीत "मोरे राजा हो ले चल नदिया के पार " मोती बीए की पहचान बन गया। पहली बार किसी गीतकार ने हिंदी फ़िल्मों में भोजपुरी को प्रमुखता से स्थान दिया था।
नदिया के पार के बाद मोती जी की व्यस्तताएं बढ़ गयीं उन्होंने कई फ़िल्मों में गीत लिखे। उनकी चर्चित फ़िल्में रहीं "सुभद्रा (1946)", भक्त ध्रुव (1947)", "सुरेखा हरण(1947)", "सिंदूर(1947)", "साजन(1947)", "रामबान(1948)","राम विवाह(1949)", और "ममता(1952)",। साजन में लिखा उनका एक गीत "हमको तुम्हारा है आसरा तुम हमारे हो न हो" अपने समय में काफ़ी लोकप्रिय रहा।
मोती बीए को फ़िल्मों में काम की कमी नहीं थी। उनके लिखे गीतों को शांता आप्टे, शमशाद बेगम, गीता दत्त, लता मंगेशक, मोहम्मद रफ़ी, मन्ना डे, और ललिता देवलकर जैसे गायकों ने स्वर दिये। लेकिन उन्हें एहसास होने लगा था कि मुम्बई की फ़िल्मी दुनिया में सम्मान की रक्षा के साथ वहां अधिक समय तक टिक पाना संभव नहीं होगा। और एक दिन अचानक उन्होंने फ़ैसला किया वे अपने घर लौट जाएंगे। फिर यही हुआ। 1952 में मुम्बई से लौटकर वे देवरिया के श्रीकृष्ण इंटरमीडियेट कालेज में इतिहास के प्रवक्ता के रूप में पढ़ाने लगे। मुम्बई में रहने के दौरान उनकी अंतिम फ़िल्म ममता थी। कुछ सालों बाद जब चरित्र अभिनेता नज़ीर हुसैन, सुजीत कुमार और कुछ दूसरे कलाकारों ने भोजपूरी फ़िल्मों के निर्माण की गति को तेज़ किया तो मोती बीए फिर याद किये गए। मोती जी ने कई भोजपूरी फ़िल्मों "ई हमार जनाना" (1968), ठकुराइन (1984), गजब भइले रामा (1984), चंपा चमेली (1985), ममता आदि में गीत लिखे। 1984 में प्रदर्शित गजब भइले रामा में उन्होंने अभिनय भी किया। यह आखरी फ़िल्म थी जिससे मोती जी किसी रूप में जुड़े।
देवरिया में अध्यापन के दौरान मोती जी साहित्य सृजन में लगे रहे। उन्होंने शेक्सपियर के सानेट्स का हिंदी में सानेट्स की शैली में ही अनुवाद किया। कालीदास के संस्कृत में लिखे मेघदूत का भोजपूरी में अनिवाद किया इसेक अलावा हिंदी में 20 पुस्तकें और उर्दू में शायरी के तीन संग्रह "रश्के गुहर", "दर्दे गुहर" और "एक शायर" की रचना की। उन्होंने भोजपूरी में भी काव्य रचना की और पांच संग्रह सृजित किये। उनकी करीब चार कृतियां अभी अप्रकाशित हैं। अध्यापन से सेवा निवृत्त होने के बाद मोती बीए जैसा गीतकार गुमनामी के अंधेरों में खोता चला गया। मोती बीए को कई सम्मान मिले लेकिन भोजपूरी के विद्वान के रूप में उनका मूल्यांकन कभी नहीं हुआ। उनके पुत्र भाल चंद्र उपाध्याय उनकी कृतियों को सहेज कर रखने का काम तो करते रहे लेकिन वे अपने पिता को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिलाने में नाकाम रहे।
शोहरत, सम्मान और अपनी शर्तों पर काम, सब कुछ मोती बीए को मिला लेकिन नौकरशाही ने अंत तक उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा नहीं दिया। हांलाकि इस बात का उल्लेख अनेक संवतंत्रता सेनानी और साहित्यकार समय समय पर करते रहे कि मोती बीए को उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों की वजह से कई बार अंग्रेज़ी शासन ने गिरफ़्तार कर जेल भेजा फिर भी उन्हें जेल भेजे जाने का रिकार्ड आज़ाद हिंदुस्तान की नौकरशाही को नहीं मिल पाया।
पिछले कुछ सालों से मोती जी की बोलने की ताकत खत्म हो गयी थी। उन्होंने 23 जनवरी 2009 को दुनिया से विदा लेली। उत्तर प्रदेश के एक दैनिक को छोड़ उनकी मौत किसी के लिये ख़बर तक नहीं बन सकी।