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Saturday, February 26, 2022

अराजकता का रंगमंच,अव्यवस्था का खेला


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इन दिनों अपने चुनावी भाषणों में एक शब्द का प्रयोग कई बार करते हैं वो है ईकोसिस्टम। जब वो ईकोसिस्टम की बात करते हैं तो उनका निशाना उस संगठित समूह की ओर होता है जो उनकी पार्टी और उनके कार्यों को विफल करना चाहती है, लक्ष्य तक पहुंचने की राह में रोड़े अटकाती है। इस ईकोसिस्टम का प्रभाव राजनीति के बाद सबसे अधिक संस्कृति से जुड़ी संस्थाओं में देखा जा सकता है। इस ईकोसिस्टम का प्रभाव देखना हो तो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में पिछले पांच छह साल में घटने वाली घटनाओं को देखा जा सकता है।  ईकोसिट्म के सदस्य वहां इस कदर हावी हैं कि संस्थान  के हर तरह के काम में रोड़े अटकाए जाते हैं। पिछले दिनों राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की दीवार पर प्रधानमंत्री का एक बेहद ही आपत्तिजनक चित्र बना दिया गया। बड़े आकार के चित्र को दीवार पर उकेरने में घंटों लगे होंगे लेकिन विद्यालय प्रशासन को इसकी भनक नहीं लगी । चित्र जब व्हाट्सएप पर साझा किया जाने लगा तो प्रशासन हरकत में आया। चित्र मिटाया गया। उस शिक्षक पर कोई कार्रवाई नहीं हुई जिसकी देखरेख में आपत्तिजनक चित्र बना। यहां भी ईकोसिस्टम सक्रिय हुआ और पहले इसको अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ा गया लेकिन जब कार्यकारी निदेशक के कार्यालय से दबाव बना तो इसको छात्रों की उत्साह में की गई गलती बताकर मामले को रफा दफा करने की कोशिशें हुईं। किसी पर भी कोई कार्रवाई हुई हो ये पता नहीं चल पाया। 

नई दिल्ली के बहावलपुर हाउस में चलनेवाला राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नाट्य प्रशिक्षण देता है। नाट्य प्रशिक्षण के क्षेत्र में इस संस्था की देश-विदेश में बहुत प्रतिष्ठा है। इन दिनों ये संस्था अपनी इस प्रतिष्ठा को बचाने के लिए संघर्षरत है। आए दिन इसके कैंपस में हाय-हाय के नारे गूंजते हैं। इस संस्था के अध्यक्ष प्रख्यात अभिनेता और पूर्व सांसद परेश रावल हैं। परेश रावल को 2020 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की कमान सौंपी गई थी। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि संस्थान के अध्यक्ष का पद करीब तीन साल तक खाली रहा था। परेश रावल के पहले रतन थिएम 2017 में पदमुक्त हो चुके थे। संस्थान में सितंबर, 2018 के बाद से कोई नियमित निदेशक भी नहीं है। ज्यादतर प्रशासनिक कार्य तदर्थ आधार पर हो रहे हैं। इस संस्थान में सरकार ने दो बार निदेशक नियुक्त करने की प्रक्रिया आरंभ की लेकिन अब तक सफलता नहीं मिल पाई है। पहली बार जब निदेशक नियुक्ति की प्रक्रिया आरंभ तो अज्ञात कारणों से नियुक्ति अटक गई। जब परेश रावल अध्यक्ष बने तो उन्होंने दुबारा प्रक्रिया आरंभ की, साक्षात्कार आदि संपन्न हुआ और सफल अभ्यार्थियों का पैनल बनाकर संस्कृति मंत्रालय भेज दिया गया। इस बीच पहली सूची में चयनित पैनल का एक व्यक्ति अदालत चला गया और मामला लंबा उलझ गया। अदालत से केस के निस्तारण के भी कुछ महीने बीत चुके हैं लेकिन निदेशक की नियुक्ति नहीं हो पा रही है।  

इतने महत्वपूर्ण संस्थान में निदेशक के नहीं होने और करीब तीन वर्ष तक अध्यक्ष नहीं होने की वजह से वहां व्यवस्था लड़खड़ा गई। प्रशासनिक भी और अकादमिक भी। जब व्यवस्था लड़खड़ाती है तो अराजकता का जन्म होता है। वहां भी हुआ। ईकोसिस्टम मजबूत हुआ। इस तरह के नाटकों पर काम होने लगा जो अपने समाज की सही तस्वीर पेश नहीं करता है। आपत्तिजनक भी है। कोई देखनेवाला नहीं है और ईकोसिट्म मजबूत है तो इस तरह के काम निर्बाध गति से चलते भी रहते हैं। स्टूडेंट प्रोडक्शन के नाम पर जिन नाटकों को तैयार करवाया जाता है उसको लेकर कोई नियम नहीं होने की वजह से फूहड़ नाटकों के प्रदर्शन को बढ़ावा मिलता है। किसी भी संस्थान का पाठ्यक्रम निर्धारित होता है, यहां भी है लेकिन स्टूडेंट प्रोडक्शन का एक ऐसा रास्ता है जिसका कोई पाठ्यक्रम या नाटकों की कोई सूची निर्धारित नहीं है। जो भी निर्देशक या शिक्षक पढ़ाने आएगा वो अपनी मर्जी के नाटक का चयन करेगा। अगर नाटक की स्क्रिप्ट है तब तो उसका पता संस्थान के अन्य विभाग को लग सकता है लेकिन अगर नाटक इंप्रोवाइज्ड है तो उसका पता प्रोडक्शन के बहुत करीब आने पर ही चलता है। इसकी आड़ में ही मनमाने नाटकों का प्रदर्शन होता रहता है। कई बार राजनीतिक एजेंडे वाले नाटकों का भी प्रोडक्शन होता है तो कई बार यौन उनमुक्तता को विषय बनाकर समाज की भद्दी छवि पेश की जाती है। बताया जाता है कि इस महीने के आरंभ में इस तरह के एक नाटक का प्रदर्शन वहां हुआ। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री का आपत्तिजनक चित्र भी राजनीतिक एजेंडे वाले एक नाटक की तैयारी के दौरान ही बनाया गया बताते हैं। 

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय संस्कृति मंत्रालय के अधीन है और भारत सरकार से वित्त पोषित है। जब परेश रावल को वहां का अध्यक्ष बनाया गया था तो उम्मीद जगी थी कि नाट्य विद्यालय की प्रतिष्ठा वापस लौटेगी। परेश रावल ने अपने कार्यकाल के आरंभिक दिनों में इसके लिए प्रयास भी किए थे। उत्साह में देशभर में नाट्य प्रदशनों को लेकर बडी बड़ी बातें की थीं लेकिन ईकोसिस्टम ने उनके कुछ नया करने के मंसूबों पर पानी फेर दिया। अब तो वो संस्थान में यथास्थितिवाद को बनाए रखने के लिए ही संघर्ष करते नजर आ रहे हैं। ईकोसिट्म ने अध्यक्ष के एक सहयोगी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और उसको हटाने का दबाव बनाया जा रहा है। अध्यक्ष के सहयोगी का दोष इतना है कि उसने पूर्व में हुई गड़बड़ियों को सामने लाने का काम आरंभ किया है। ईकोसिस्टम को ये मंजूर नहीं है। ईकोसिट्म को न तो छात्रों की परवाह है ना ही विद्यालय की प्रतिष्ठा की। ईकोसिस्टम में तो वहां ऐसे सदस्य भी हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वो कम्युनिस्ट पार्टी के भी सक्रिय सदस्य हैं और पार्टी की इंटरनेट पर चलनेवाली गतिविधियों को संचालित भी करते हैं। अर्जुन देव चारण सालों से संस्थान के उपाध्यक्ष के पद पर बने हुए हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की हालत का अंदाज इस बात से ही लगाया जा सकता है कि वहां की वेबसाइटट तक अपडेट नहीं हो रही है। 

आवश्यकता इस बात की है कि संस्कृति मंत्रालय में उच्चतम स्तर पर इस संस्थान पर ध्यान दिया जाए। यहां नियमित निदेशक की नियुक्ति की जाए ताकि प्रशासनिक कार्य पटरी पर आ सके। मंत्रालय एक शार्टकट निकालता है कि निदेशक की नियुक्ति होने तक मंत्रालय के किसी अफसर को संस्थान का प्रभार दे दिया जाए। यह स्थायी समाधान नहीं है। आवश्यक नहीं कि जिस अधिकारी को नाट्य विद्यालय का प्रभार दिया जाए उसकी रुचि इस विधा या कला में हो। हमारे सामने ललित कला अकादमी और संगीत नाटक अकादमी का उदाहरण है जहां अधिकारी इन संस्थाओं को चला रहे हैं। ये दोनों संस्थाएं कैसे चल रही हैं इस बारे में कई बार इस स्तंभ में लिखा जा चुका है, उसको दोहराने का कोई लाभ नहीं। जरूरत इस बात की भी है कि इस संस्थान के पाठ्यक्रम को अद्यतन किया जाए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप पाठ्यक्रम में बदलाव किया जाना आवश्यक है। संस्थान के अध्यक्ष परेश रावल को भी सामने आकर नेतृत्व करना होगा। उनको भी ये समझना होगा कि अभिनय और इससे जुड़ी विधाओं में उनके अनुभव का विपुल लाभ किस तरह से छात्रों को और संस्थान को मिले। ईकोसिस्टम को खत्म करने का सबसे अच्छा तरीका है कि उसके सामने उनसे बड़ी लकीर खींच दी जाए। कोसने का वक्त निकल चुका है, अब कर दिखाने का समय है। संस्कृति मंत्रालय में इस वक्त योग्य मंत्रियों की टीम है और उम्मीद की जानी चाहिए कि ये टीम ईकोसिस्टम के दुष्प्रभावों को कम करने या खत्म करने के क्षेत्र में सक्रिय होंगे।     


Thursday, February 24, 2022

चुनाव प्रचार में तकनीक का बोलबाला


उत्तर प्रदेश विधानसभा के चार चरणों के चुनाव संपन्न हो चुके हैं। पहले दो चरण के चुनाव पर कोरोना महामारी की छाया रही और ज्यादातर चुनाव प्रचार आभासी माध्यमों के जरिए हुए। बाद में चुनाव का पारंपरिक रंग देखने को मिला। इस चुनाव में एक नया ट्रेंड देखने का मिला वो है इंटरनेट मीडिया और तकनीक का चुनाव प्रचार में उपयोग। 2014 के लोकसभा चुनाव में पहली बार देश की जनता ने तकनीक का कमाल देखा था। उस वक्त नरेन्द्र मोदी ने पहली बार अपने चुनाव प्रचार के दौरान होलोग्राम तकनीक का उपयोग किया था। इस तकनीक में वो अपने निवास से जमसभा को संबोधित करते थे, न्यूज चैनलों के स्टूडियो में लाइव दिखाई देते थे। इससे समय की बचत होती थी। उस चुनाव में फेसबुक और ट्विटर का भी उपयोग हुआ था। चुनाव में तकनीक का उपयोग उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान भी देखने को मिल रहा है। इस बार प्रचार में ट्विटर के स्पेसेज का जमकर उपयोग हो रहा है। इसमें किसी भी ट्वीटर हैंडल से आडियो के जरिए कहीं से भी जुड़ा जा सकता है। किसी भी विषय पर चर्चा आयोजित की जा रही है। हर दिन शाम को ट्विटर स्पेसेज पर राजनीतिक चर्चा सुनी जा सकती है। नेता और राजनीतिक दलों से जुड़े लोग अपने घर से या यात्रा के दौरान भी स्पेसेज पर जनता के सामने अपनी बात रखते हैं। स्पेसेज आयोजित करनेवाला होस्ट किसी को भी बोलने की अनुमति दे सकता है। चुनाव के आंरंभिक काल से ही बीजेपी उत्तर प्रदेश के हैंडल से नियमित अंतराल ट्विटर स्पेसज पर आयोजित हो रहा है। अलग अलग राजनीतिक दल भी स्पेसेज आयोजित करते हैं।

ट्विटर की कंटेंट पार्टनरशिप की इंडिया प्रमुख अमृता त्रिपाठी के मुताबिक स्पेसेज की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है और संस्थान, राजनीतिक दल और पत्रकार भी इसका उपयोग राजनीतिक चर्चा के लिए कर रहे हैं। अमृता ने बताया कि ट्विटर भी लगातार अपनी इस सेवा में नए नए फीचर जोड़ने पर काम कर रहा है। ट्विटर स्पेसेज पर होनेवाली चर्चा को अब रिकार्ड भी किया जा सकता है ताकि बाद में भी लोग चर्चा को सुन सकें। स्पेसज पर आयोजित चर्चा को शेड्यूल भी किया जा सकता है और आयोजन का समय और विषय आयोजक के हैंडल पर चर्चा आरंभ होने तक दिखता है। ट्विटर के प्लेटफार्म पर आयोजित चर्चा में जितने लोग जुड़े दिखाई देते हैं उससे कहीं अधिक लोग उसे सुन रहे होते हैं। इसको इंटरनेट पर भी सुना जा सकता है जो संख्या चर्चा के दौरान दिखती नहीं है। इस प्लेटफार्म को आभासी चौपाल कहा जा सकता है। ट्विटर के अलावा फेसबुक रूम पर भी राजनीतिक चर्चा सुनी जा सकती है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान क्लबहाउस की लोकप्रियता भी दिखी थी। इस ऐप के जरिए उस समय राजनीतिक चर्चा और नेताओं से संवाद के कई कार्यक्रम हुए थे।

चुनाव के दौरान मैसेजिंग प्लेटफार्म का भी खूब उपयोग हो रहा है। व्हाट्सएप, टेलीग्राम और सिग्नल पर संदेशों और इमोजी का आदान-प्रदान पुरानी बात हो गई है। उत्तर प्रदेश,उत्तराखंड, गोवा  आदि राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान मैसेजिंग एप पर राजनीतिक संदेशों वाले स्टिकर और जीआईएफ का प्रयोग देखने को मिला। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की भिन्न-भिन्न मुद्राओं वाले स्टिकर उपयोग में लाए जा रहे हैं। इन स्टीकरों ने चुनाव चिन्ह वाले बैज और बिंदी का स्थान ले लिया है। तकनीक के प्रयोग ने चुनाव प्रचार को एक नया आयाम प्रदान किया है।    



Saturday, February 19, 2022

वैचारिक जकड़न में इतिहास लेखन


इतिहास, ये एक ऐसा शब्द है जिसको लेकर स्वाधीन भारत में लंबे समय से बहस चलती रही है। पश्चात्य और वामपंथी इतिहासकार हमेशा से इस बात को स्थापित करने में लगे रहे कि भारतीयों ने अपना इतिहास लिखा ही नहीं। कई बार तो यहां तक कह दिया जाता है कि भारतीयों के पास इतिहास लेखन का विवेक ही नहीं था। 1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ तो वामपंथी इतिहासकारों ने विदेशी इतिहासकारों के लेखन को पत्थर की लकीर मान लिया। उनके लेखन को ही प्रचारित प्रसारित करते रहे। पीढ़ियों तक उनका लिखा इतिहास भारत के विद्यालयों से लेकर महाविद्यालयों और विश्वविद्यालय के छात्रों को पढ़ाया जाता रहा है। जब भी इतिहास लेखन ने पाश्चात्य-वामपंथी धारा से अलग हटकर कुछ करने की कोशिश की तो उसकी प्रामाणिकता को लेकर संदेह का वातावरण बनाने का प्रयास हुआ। इस प्रयास में सफलता भी मिली। अब भी वामपंथी इतिहासकारों का ये प्रयास जारी है। ताजा मामला है विक्रम संपत का। वीर सावरकर पर दो खंडों में लिखी उनकी पुस्तक में वर्णित तथ्यों में जब किसी प्रकार की कमजोरी नहीं मिली तो उनके लेखन को संदेहास्पद बनाने के लिए दूसरे हथकंडों का उपयोग किया जाना लगा। मामला इतना बढ़ा कि विक्रम संपत को अदालत की शरण लेनी पड़ी जहां से उनको राहत मिली। विक्रम संपत अकेले उदाहरण नहीं हैं । जिस भी इतिहासकार ने इतिहास लेखन का वैकल्पिक मार्ग चुना और भारतीय पौराणिक ग्रंथों के आधार पर लिखने की कोशिश की उनको नीचा दिखाने की कोशिश की गई। उनके अकादमिक कार्य को कोरी कल्पना तक करार दे दिया गया। पुराणों और वेदों में लिखे गए तथ्यों को कल्पना बताकर या साहित्य बताकर खारिज किया जाता रहा है। वामपंथी इतिहासकारों ने कभी भी पुराणों में वर्णित राजवंशों के कालखंड की तरफ देखा ही नहीं। कई इतिहासकार पुराणों की ऐतिहासिकता को भी संदिग्ध मानते हैं। संदिग्ध मानने की वजह बताए बगैर सीधा निर्णय सुना देते हैं। 

एफ ई पार्जिटर जैसे पश्चिमी विद्वान एक तरफ पुराणों में उल्लिखित कई बातों को अपने इतिहास लेखन का आधार बनाते हैं और दूसरी तरफ भारतीय इतिहास लेखन की परंपरा और प्रविधि पर संदेह भी करते हैं। उनके लेखन में ये विरोधाभास दिखता है। आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से संबद्ध संस्कृत के विद्वान आर्थर एंटनी मैकडानेल से लेकर अलबरुनी तक बेहिचक ये कहते रहे हैं कि भारतीयों को इतिहास लिखना नहीं आता है। मैकडानेल ने तो अपनी पुस्तक संस्कृत साहित्य में भी भारतीय इतिहास लेखन को लेकर निर्णयात्मक टिप्पणी की थी। उन्होंने लिखा था कि इतिहास लेखन भारतीय साहित्य की कमजोरी है, बल्कि ये कह सकते हैं कि भारतीय साहित्य में इतिहास लेखन अनुपस्थित है। वो यहीं नहीं रुकते हैं और यहां तक कह देते हैं कि भारतीय साहित्य में इतिहास बोध की कमी पूरे संस्कृत साहित्य पर एक छाया की तरह दिखाई देती है। अलबरुनी तो एक कदम आगे बढ़ जाता है जब वो कहता है कि दुर्भाग्य से हिंदुओं ने इतिहास को कालक्रम के अनुसार नहीं संजोया और वो शासकों के कालखंड को दर्ज करने को लेकर लापरवाह रहे। इस तरह की टिप्पणियों को स्वाधीन भारत के इतिहासकारों ने गंभीरता से लिया और उसके आधार पर ही व्याख्या करने में लग गए। होना ये चाहिए था कि इसको परखने की कोशिश होती लेकिन वैसा नहीं हुआ। परिणाम ये हुआ कि वो भी विदेशी इतिहासकारों और विद्वानों की तरह दोष के शिकार हो गए। विदेशी विद्वान अगर पुराणों को छोड़ भी देते और सिर्फ कल्हण की राजतरंगिणी को ही देख लेते तो उनकी भारतीय इतिहास लेखन को लेकर पैदा हुई भ्रांति दूर हो सकती थी। 

उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में पश्चिमी देशों में या पश्चिम के अकादमिक जगत में इतिहास लेखन की जो प्रविधि थी वो इतिहास लेखन की भारतीय पद्धति से बिल्कुल अलग थी। पश्चिम के इतिहासकार जब भारत का इतिहास लिखने लगे तो उन्होंने अपने देश के इतिहास लेखन के औजारों को अपनाया। स्वाधीन भारत में वामपंथियों ने मार्क्सवादी सिद्धांतों के आधार पर इतिहास लेखन किया। ये दोनों ही भारतीय इतिहास लेखन की परंपरा को समझने में विफल रहे। वो ये भी समझने में विफल रहे कि इतिहास सिर्फ कालखंड का निर्धारण या शासकों के नामों और युद्ध में जय पराजय का लेखा-जोखा मात्र नहीं है। इतिहास सिर्फ राजनीतिक घटनाओं का विवेचन भी नहीं है, इतिहास तो समवेत रूप से समाज की परंपराओं को रेखांकित करता है। इसमें राजनीति, धर्म, समाज के बनने और बिगड़ने की खोज होती है और उसके आधार पर आकलन होता है। जब भारत पराधीन हुआ तो सिर्फ राजनीतिक रूप से ही पराधीन नहीं हुआ बल्कि गुलामी ने अकादमिक जगत को भी प्रभावित किया । पाश्चात्य लेखकों के प्रभाव के पहले भारतीय इतिहास लेखन की प्रविधि और दृष्टि अलग थी जो पराधीनता के काल में बदल गई। उम्मीद की गई थी कि स्वाधीनता के बाद हम अपने प्राचीन ग्रंथों और इतिहास लेखन के तौर तरीकों को अपनाते हुए गुलामी के कालखंड का परिस्थितियों के आधार पर भारतीय पद्धति से विश्लेषण करेंगे लेकिन ऐसा हो न सका। काशी प्रसाद जायसवाल जैसे कई इतिहासकारों ने भारतीय पद्दति अपनाने की कोशिश की थी लेकिन उनको हाशिए पर डाल दिया गया। 1970 के बाद जब भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का गठन हुआ तो तमाम वामपंथी इतिहासकार उसके कर्ताधर्ता हुए। वहां से इतिहास लेखन की धारा ऐसी बदली कि भारतीय लेखन पद्धति नेपथ्य में चली गई और मार्क्सवादी पद्धति केंद्र में आ गई। कभी उसको सुधारने की कोशिश भी नहीं की गई बल्कि उसको मजबूती ही प्रदान की गई।

स्कूली छात्रों को पढ़ाई जानेवाली किताबों में भी इन वामपंथी इतिहासकारों के मार्गदर्शन में तैयार किया गया। नेशनल काउंसिल आफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (एनसीईआरटी) ने जिस तरह की इतिहास पुस्तकें तैयार की वो भी छात्रों को परोक्ष रूप से यही बताती रही कि भारतीयों के पास इतिहास लेखन का विवेक ही नहीं था। घटनाओं  का विचारधारा के आधार पर वर्णन किया गया। एक ही उदाहरण काफी होगा कि स्कूली छात्रों को ये पढ़ाया जाता रहा कि महात्मा गांधी की हत्या एक हिंदू ब्राह्मण ने की। ये उनको मन में एक समुदाय और जाति के खिलाफ नफरत का बीज बोने के लिए किया गया प्रतीत होता है। इस बात की क्या आवश्यकता थी कि गांधी के हत्यारे की जाति छात्रों को बताई जाए। पता नहीं कि पुस्तक में संशोधन हुआ या अब भी यही पढ़ाया जा रहा है। पिछले दिनों एनसीईआरटी के नवनियुक्त निदेशक प्रोफेसर दिनेश प्रसाद सकलानी ने अपने एक साक्षात्कार में कहा कि इतिहास लेखन का काम इतिहासकारों का है । अगर उनके पास किसी पाठ्य सामग्री को लेकर कोई शिकायत आती है तो वो विशेषज्ञों से जांच करवाने के बाद उसपर निर्णय लेंगे। अच्छी बात है पर जो शिकायतें पहले से मौजूद हैं उसकी जांच भी प्राथमिकता के आधार पर करवानी चाहिए। इस स्तंभ में कई बार एनसीईआरटी की इतिहास और अन्य विषयों के पुस्तकों में वर्णित तथ्यों को लेकर चर्चा की जा चुकी है। अनुच्छेद 370 का जिस तरह से उल्लेख एनसीईआरटी की पाठ्य पुस्तक में है उसपर निदेशक महोदय को विचार करना चाहिए। एनसीईआरटी की भूमिका इस वजह से महत्वपूर्ण है कि छात्रों को भारत का वही इतिहास पढाया जाए जो किसी विचारधारा में रंगा हुआ न हो। 

इसके अलावा अकादमिक जगत में भी इतिहास लेखन की उस प्रणाली को मजबूत करना होगा जिसमें भारतीय साहित्य में उपलब्ध तथ्यों का उपयोग हो। भारतीय साहित्य में उपलब्ध स्त्रोंतों का आधार हो। उस पूर्वग्रह से मुक्त होकर इतिहास लिखना होगा कि भारतीयों के पास इतिहास लेखन का विवेक ही नहीं है। अगर समग्रता में देखें और पौराणिक ग्रंथों में  उपलब्ध स्त्रोतों को आधार बनाया जाए तो भारतीय इतिहास लेखन की स्वदेशी प्रणाली को पुनर्जीवित किया जा सकता है।    


Saturday, February 12, 2022

वैचारिक दासता से मुक्ति की दरकार


गीतकार मजरुह सुल्तानपुरी को उनकी एक कविता के लिए जेल भेज दिया गया था। तब देश में कांग्रेस का शासन था और नेहरू जी प्रधानमंत्री थे। संविधान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान ये बातें कहीं। कुछ बुद्धिजीवियों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश कर करने का आरोप लगाया। नरेन्द्र मोदी को बेहतरीन गल्पकार तक बता दिया गया। विद्वान माने जानेवाले  कुछ स्तंभकारों ने प्रधानमंत्री को लेकर अनर्गल टिप्पणियां कीं। प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में दिए अपने वक्तव्य में लता मंगेशकर के भाई ह्रदयनाथ मंगेशकर को वीर सावरकर की कविता को लेकर आकाशवाणी से निकाले जाने का उदाहरण दिया। विवाद मजरुह सुल्तानपुरी पर कही उनकी बातों को लेकर आरंभ हुआ। आरोप लगानेवालों ने जो प्रसंग बताया उसके मुताबिक मजरुह वामपंथी थे। स्वाधीनता  को झूठी आजादी बताकर वामपंथियों ने उस समय की सरकार के खिलाफ आंदोलन और षडयंत्र रचा था, उसमें मजरुह की गिरफ्तारी की बात की गई।

तथ्यों को जान लेते हैं कि मजरुह की गिरफ्तारी किस वजह से हुई थी। आजादी के बाद वामपंथियों का सरकार के खिलाफ विद्रोह चल रहा था। अलग-अलग क्षेत्र में काम करनेवाले कम्युनिस्ट उस विद्रोह में शामिल हो रहे थे। हिंदी फिल्म जगत भी उससे अछूता नहीं रहा था। सिनेमा से जुड़े कुछ लेखक, गीतकार, निर्देशक और अभिनेता भी उस आंदोलन में हिस्सा ले रहे थे। मजरुह उनमें से एक थे। मजरुह जिस कवि गोष्ठी या मुशायरे में जाते थे तो एक कविता अवश्य पढ़ते थे। उस कविता की कुछ पंक्तियां थीं- ये भी है हिटलर का चेला/मार लो साथी जाने न पाए/कामनवेल्थ का दास है नेहरू/मार लो साथी जाने न पाए। इस कविता में नेहरू का नाम लेकर मजरुह ने हमला किया था और उनके पहनावे को खादी का केंचुल बताकर तंज किया था। मजरुह को मुंबई में गिरफ्तार कर लिया गया। कांग्रेस से जुड़े कई लोगों ने उनको सलाह दी कि नेहरू से माफी मांग लें तो रिहाई हो जाएगी। मजरुह ने माफी नहीं मांगी और उनको लंबा समय जेल में बिताना पड़ा। उसी समय प्रदर्शन करते समय अभिनेता बलराज साहनी भी गिरफ्तार हुए थे। कैफी आजमी गिरफ्तारी से बचने के लिए भूमिगत हो गए थे। कई फिल्मों के संवाद लेखक अख्तर उल ईमान को सरकार के खिलाफ षडयंत्र रचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। अख्तर उल ईमान मशहूर अभिनेता अमजद खान के श्वसुर थे। ये तथ्य है और इसका उल्लेख सरकारी अभिलेखों में मिलता है। उस दौर में लिखी पुस्तकों में भी। बहुत संभव है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में कविता पर जेल भेजे जाने की ये पहली घटना हो। तो जो विद्वान लेखक प्रधानमंत्री को संसद की मर्यादा भंग करने की नसीहत दे रहै हैं या उनके भाषण को अर्धसत्य बता रहे हैं उनको अपने लेखन पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।

कलाकारों के खिलाफ कार्रवाई सिर्फ नेहरू जी के जमाने में ही नहीं हुई। कालांतर में जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं तो उनके कार्यकाल में भी फिल्म से जुड़े लोगों को विरोध करने की सजा मिली। प्रख्यात अभिनेता देवानंद ने अपनी आत्मकथा रोमांसिंग विद लाइफ में इमरजेंसी के दौर की एक घटना का उल्लेख किया है। देवानंद के मुताबिक इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी सातवें आसमान पर थीं। गूंगी गुड़ियानिरंकुश हो गई थीं और अपनी हनक स्थापित करने में लगी थी। संजय गांधी अपनी मां की वारिस के तौर पर खुद को स्थापित कर चुके थे। कांग्रेस ने उस समय दिल्ली में एक रैली की थी जिसमें देवानंद भी शामिल हुए थे। दिलीप कुमार भी। उन्होंने रैली के दौरान के अपने अनुभव के आधार पर लिखा कि संजय गांधी या कांग्रेस की प्रोपगंडा मशीनरी फासीवादी तरीके से काम कर रही थी। रैली के बाद देवानंद और दिलीप कुमार को कांग्रेस की तरफ से संदेश दिया गया कि दूरदर्शन केंद्र जाकर इमरजेंसी के समर्थन में बयान रिकार्ड करवाएं। दिलीप कुमार हिचक रहे थे लेकिन देवानंद ने साफ मना कर दिया कि वो इमरजेंसी के समर्थन में बयान नहीं देंगे। देवानंद ने लिखा है कि उनके मना करने के तुरंत बाद से दूरदर्शन पर उनकी फिल्मों के प्रदर्शन को बैन कर दिया गया। किसी भी सरकारी माध्यम में देवानंद के नाम लिखे जाने तक पर पाबंदी लगा दी गई। इसके पहले किशोर कुमार के साथ भी ऐसा किया जा चुका था क्योंकि उन्होंने गाने से मना कर दिया था।

इस घटना से व्यथित होकर देवानंद ने उस समनय के सूचना ओर प्रसारण मंत्री से भेंट की। मंत्री ने छूटते ही देवानंद से पूछा कि आपको दिक्कत क्या है? देवानंद ने उनको स्पष्ट किया कि वो दबाव में किसी तरह का बयान इमरजेंसी के समर्थन में नहीं दे सकते हैं। मुलाकात खत्म हो गई। कुछ दिनों बाद गांधी परिवार की करीबी अभिनेत्री नर्गिस से देवानंद की मुंबई में एक पार्टी में मुलाकात हुई। नर्गिस ने भी देवानंद से सरकार के समर्थन में बयान न देने की चर्चा की और कहा कि वो अनावश्क रूप से जिद पाले बैठे हैं। बात खत्म हो गई लेकिन जो एक पंक्ति देवानंद ने लिखी है उसका उल्लेख आवश्यक है। देवानंद के मुताबिक इस पूरे प्रकरण के बाद संजय गांधी के दरबारियों ने उनको चिन्हित कर लिया था। उस वक्त देवानंद की फिल्म देस परदेस बन रही थी और वो उसके भविष्य को लेकर चिंतित थे। देवानंद ने भले ही मना कर दिया लेकिन उस वक्त फिल्मों के अधिकांश कलाकार इंदिरा गांधी और इमरजेंसी के समर्थन में थे। इन दिनों एक वरिष्ठ अभिनेत्री लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र की बात जोर शोर से कर रही हैं, लेकिन उस वक्त आपातकाल का समर्थन किया था। इमरजेंसी में इंदिरा गांधी की सरपरस्ती में संजय गांधी के फासीवादी कदमों की चर्चा विनोद मेहता भी अपनी पुस्तक द संजय स्टोरी में करते हैं। ये सूची बहुत लंबी है। स्वतंत्र भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करने की चार बेहद गंभीर कोशिशें हुईं जो नेहरू, इंदिरा, राजीव और मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुई। इस स्तंभ में एकाधिक बार इसकी चर्चा की जा चुकी है।

अब प्रश्न ये उठता है कि जब संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात उठाकर प्रधानमंत्री ने नेहरू के दौर को याद किया तो एक विचारधारा विशेष के पोषक स्तंभकारों ने उसपर सुनियोजित तरीके से प्रतक्रिया क्यों दी। अगर आप ध्यान से प्रधानमंत्री के भाषण को सुनेंगे तो उत्तर भी उसमें ही निहित है। उन्होंने अपने भाषण में एक ईको सिस्टम की बात की। भारतीय जनता पार्टी के विरोधी कहें या कांग्रेस के समर्थकों का वो ईको सिस्टम इस तरह का है कि उसमें वैकल्पिक विचारों के लिए जगह ही नहीं है। वो सिर्फ अपने सिद्धांतों को और अपने विचारों को ही दुनिया का श्रेष्ठ विचार मानते हैं। दूसरे विचारों का उपहास करना और उनसे इतर विचारों को हेय समझना और बताना उनकी योजना का हिस्सा है। इसी श्रेष्ठता ग्रंथि को लेकर चलनेवाले स्तंभकार और कथित इतिहासकार आजाद भारत में घटी घटनाओं का विश्लेषण करते समय वैचारिक दोष के शिकार हो जाते हैं। इस कारण उनके लेखन में समग्र दृष्टि का अभाव दिखाई देता है। इतिहास पर लिखनेवालों से ये अपेक्षा की जाती है कि वो वैचारिक रूप से निरपेक्ष रहकर और समग्र दृष्टि के साथ लेखन करेंगे। अफसोस कि हमारे देश में स्वाधीनता के बाद का इतिहास लेखन वैचारिक जकड़न से मुक्त नहीं हो पाया। यह अकारण नहीं है कि स्वाधीन भारत में घटनेवाली राजनीतिक घटनाओं पर लिखते समय भी वैचारिक दासता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। स्वाधीनता के अमृत काल में वैचारिक दासता से मुक्ति भी आवश्यक है।

 

Tuesday, February 8, 2022

राम और कृष्ण की भक्त थीं लता जी


लता मंगेशकर लगातार को भक्ति के पद गाने में बहुत आनंद आता था। उन्होंने मीरा के कई पद गाए। उनको जयदेव का गीत गोविन्द भी बेहद प्रिय था। लता मंगेशकर बचपन से ही कृष्ण के प्रति आकर्षित रहती थीं। बाद में जब मीरा, सूरदास और जयदेव के पदों को पढ़ा तो उनकी कृष्ण में आस्था और गहरी हो गई। वो कोई भी गीत कागज पर लिखती थीं तो सबसे पहले वहां श्रीकृष्ण लिखती थीं और उसके बाद गीत के बोल। इससे जुड़ा एक प्रसंग लता जी ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था। लता जी का उदयपुर के महाराज महाराणा भागवत सिंह से पारिवारिक रिश्ता था। एक बार वो, पंडित नरेन्द्र शर्मा, उषा मंगेशकर और ह्रदयनाथ मंगेशकर उदयपुर गए और महाराणा मेवाड़ भागवत सिंह से मिलने उनके महल पहुंचे। भागवत सिंह बहुत प्रसन्न थे। महाराणा ने उनसे कहा कि आप तो कृष्ण की भक्त हैं, आपको मीरा के पद गाना और सुनना दोनों बेहद पसंद है। आपको अपनी पूर्वज मीराबाई के भगवान का दर्शन करवाते हैं। फिर महाराज उनको एक कमरे में लेकर गए। वहां बेहद करीने से रखे गए कृष्ण की छोटी सी मूर्ति के दर्शन करवाए। भागवत सिंह ने लता मंगेशकर को बताया कि ये कृष्ण की वही मूर्ति है जिसको गोद मे लेकर मीराबाई पूजा किया करती थीं। कृष्ण की उस मूर्ति को देखकर लता जी की आंखों में आंसू आ गए। कृष्ण भक्त लता अपने अराध्य की मूर्ति का दर्शन कर बेहद रोमांचित थीं।   

दूसरा वाकया राम भक्ति से जुड़ा है। लता मंगेशकर ‘राम रतन धन पायो’ वाला रिकार्ड तैयार कर रही थीं। उसी समय उनके बेहद नजदीकी पंडित नरेन्द्र शर्मा ने उनसे कहा कि ‘राम ऐसे अकेले भगवान हुए हैं कि अगर कोई उनकी तन मन से सेवा करे तो तो उसका सारा कार्य सिद्ध होता है। राम ही वो ईश्वर हैं जो सत्य के छोर पर खड़े होकर आपको अंत में निर्वाण की दशा में ले जाते हैं। लता मंगेशकर ने यतीन्द्र मिश्र को बताया कि, पंडित नरेन्द्र शर्मा की ये बात उनको गहरे तक छू गई और पता नहीं क्या हुआ कि इस रिकार्ड के बनते बनते तक उनकी राम में श्रद्धा बढ़ने लगी। लता जी ने आगे कहा कि, ‘तभी से मैं राम भक्त हूं और मैं मानती हूं कि उनके जैसा चरित्र बल किसी दूसरे पौराणिक किरदार में ढूंढने से नहीं मिलेगा। पंडित नरेन्द्र शर्मा ने लता जी से कहा था कि देखना तुम्हारा ये रिकार्ड सबसे अधिक चलेगा। आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि जब ये रिकार्ड रिलीज हुआ तब से लेकर आजतक उसके मुकाबले कोई रिकार्ड नहीं चला। बधाई और आशीर्वाद के जितने भी पत्र आजतक मुझे मिलते रहे हैं वो पहले या बाद में कभी इस तरह से नहीं मिले। इसको मैं रामजी का आशीर्वाद मानती हूं।‘  इन दो प्रसंगों से स्पष्ट है सकता है कि लता जी बेहद धार्मिक और आस्थावान महिला थीं। 

प्रतिभा को मिलती रही अंतराष्ट्रीय मान्यता


कोरोना महामारी के दौर में ओवर द टाप (ओटाटी) प्लेटफार्म और तकनीक के अन्य माध्यमों के जरिए देश विदेश में फिल्मों का प्रदर्शन होता है। फिल्म निर्माता या कंपनी फिल्म के मुनाफे को प्रचारित करती हैं तो बहुधा फिल्म के विदेश में प्रदर्शन से होनेवाली आय को भी जोड़ा जाता है। आमिर खान की फिल्म दंगल या इरफान खान अभिनित फिल्म हिंदी मीडियम की विदेश में प्रदर्शन से होनेवाली आय पर भी खूब बातें हुईं। करण जौहर की फिल्मों की विदेश में सफलता को भी प्रचारित किया जाता रहा है। जब इन फिल्मों के विदेश में सफलता की बात होती है तो हम ये भूल जाते हैं कि भारतीय निर्माताओं की फिल्में स्वाधीनता के पहले से विदेशी दर्शकों को आकर्षित करती रही हैं। किश्वर देसाई ने अपनी पुस्तक द लाइफ एंड टाइम्स आफ देविका रानी में हिमांशु राय की फिल्म कर्मा के लंदन और बर्मिंघम के सिनेमा में प्रदर्शन और उसको लेकर उत्सुकता के बारे में विस्तार से लिखा है।  ये फिल्म 1933 में लंदन में रिलीज हुई थी और इसका निर्माण भारत, ब्रिटेन और जर्मनी के निर्माताओं ने संयुक्त रूप से किया था। इसके लीड रोल में हिमांशु राय और देविका रानी थी। 68 मिनट की इस फिल्म को देखने के लिए उस वक्त लंदन का पूरा अभिजात्य वर्ग उमड़ पड़ा था। आक्सफोर्ड स्ट्रीट पर इस फिल्म का एक बड़ा पोस्टर लगा था जिसमें सिर्फ देविका रानी की तस्वीर लगी थी। इस फिल्म के बारे में लंदन के समाचारपत्रों में कई प्रशंसात्मक लेख छपे थे। उसके बाद भी कई हिंदी फिल्मों को विदेश में सराहना मिली थी। इससे परतंत्र भारत के फिल्मकारों और कलाकारों का स्वयं पर भरोसा भी गाढ़ा हुआ था। 

जब देश आजाद हुआ तो भारतीय फिल्मों खासतौर पर हिंदी फिल्मों को लेकर पूरी दुनिया में एक उत्सुकता का माहौल बना। फिल्म इतिहासकारों के मुताबिक इसकी वजह ये थी कि दुनिया के अलग अलग देशों के लोग भारत के बारे में जानना चाहते थे। 1952 में दिलीप कुमार और निम्मी की एक फिल्म आई थी ‘आन’। इस फिल्म को योजनाबद्ध तरीके से दुनिया के 28 देशों में रिलीज किया गया था। दुनिया की 17 भाषाओं में इस फिल्म का सबटाइटल तैयार किया गया था। लंदन में इस फिल्म के प्रीमियर पर ब्रिटेन के उस समय के प्रधानमंत्री लार्ड एटली के उपस्थित रहने का उल्लेख कई जगहों पर मिलता है। अंग्रेजी में इसको सैवेज प्रिंसेस तो फ्रेंच में मंगला, फी दिज आंद ( मंगला, भारत की लड़की) के नाम से रिलीज किया गया था। इस फिल्म में निम्मी ने जिस चरित्र को निभाया था उसका नाम मंगला था। इस फिल्म को कुछ समय बाद जापान में भी रिलीज किया गया था और वहां के दर्शकों ने भी इसको खूब पसंद किया था। राज कपूर की फिल्म ‘आवारा’ हिंदी में 1951 में रिलीज हो गई थी। 1954 में मास्को और लेनिनग्राद में भारतीय फिल्म फेस्टिवल में राज कपूर की इस फिल्म का प्रदर्शन हुआ। इस फिल्म को दर्शकों ने खूब पसंद किया और वहां के अखबारों में राज कपूर के अभिनय की जमकर प्रशंसा हुई। राज कपूर का जादू ऐसा चला कि इस फिल्म को रूस के अन्य सिनेमाघरों में भी प्रदर्शित किया गया। इस फिल्म के बाद ‘श्री 420’ आई उसको भी रूस के दर्शकों ने बेहद पसंद किया था। इस फिल्म के प्रीमियर पर जब राज कपूर वहां पहुंचे थे तो दर्शकों को काबू में करना मुश्किल हो गया था। फिर तो राज कपूर की हर फिल्म रूस में रिलीज होने लगी और व्यावसायिक रूप से भी सफल हुई । राज कपूर की फिल्मों को तो इजरायल के दर्शकों ने भी खूब पसंद किया था। वहां तो राज कपूर की फिल्म ‘श्री 420’ का गाना ‘ईचक दाना बीचक दाना’ तो इतना अधिक लोकपर्य हुआ कि इजरायल के गायक नईम ने उसको अपनी भाषा में गाया। कई फिल्म इतिहासकारों का मानना है कि रूस और चीन में राज कपूर की फिल्में इस वजह से दर्शकों को पसंद आ रही थीं कि वो समाजवादी विचारधारा के नजदीक थीं। पर राज कपूर खुद कह चुके हैं कि उनकी फिल्में विचार या विचारधारा को ध्यान में रखकर नहीं बनाई जाती हैं। उनकी फिल्मों में दर्शकों की संवेदना का ध्यान रखा जाता है। 

1960 के दशक और उसके बाद बनी फिल्में भी विदेश में लोकप्रिय हुईं जिनमें मुगले आजम प्रमुख हैं। 1965 आई देवानंद की फिल्म गाइड को भी विदेश में पसंद किया गया। उसके बाद शोले फिल्म को भी अंतराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली। कालांतर में करण जौहर की रोमांटिक फिल्मों ने भी अंतराष्ट्रीय दर्शकों को अपनी ओर खींचा लेकिन तबतक हिंदी फिल्मों में पैसा आ चुका था और तकनीक भी बेहतर हो चुकी थीं। तकनीक के मामले में भी अगर हिंदी फिल्मों के सफर को देखें तो हिंदी फिल्मकारों ने कम संसाधन होने के बावजूद बेहतरीन दृश्यों की संरचना की। व्ही शांताराम जैसे निर्देशक तो बैलगाड़ी के अगले हिस्से में कैमरा लगाकर जिमी जिब तैयार कर मूविंग शाट्स लेते थे। उस जमाने में एल्यूमिनियम शीट्स पर पानी डालकर समंदर की लहर का अहसास करवाने वाले शाट्स बनाए जाते थे। तकनीक के मामले में भी हिंदी फिल्मों ने बहुत लंबा सफर तय कर लिया है। वीएफएक्स के इस दौर में तो गानों से लेकर नायकों की त्वचा तक को बेहतर बनाया जा सकता है। इस तरह से हम देखें तो भारतीय फिल्मकारों ने स्वाधीनता के पहले जो एक विश्वास अर्जित किया था उसकी बुनियाद पर बाद के फिल्मकारों ने सफलता की बुलंद इमारत खड़ी की। 

Saturday, February 5, 2022

राष्ट्र पर राहुल की लचर दलील


राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने संसद में कुछ ऐसी बातें कहीं जिस पर, उनको लगता है कि चर्चा की जानी चाहिए। पहली बात तो उन्होंने ये कही कि भारत राष्ट्र नहीं है और ये राज्यों का संघ है। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के सदस्यों को भारतीय संविधान पढ़ने की भी सलाह दी और कहा कि संविधान में लिखा है कि भारत राज्यों का संघ है और वो राष्ट्र नहीं है।इसके आगे वो नरेन्द्र मोदी पर हमलावर हुए। संविधान के अनुच्छेद एक में ये अवश्य लिखा है कि भारत राज्यों का संघ होगा लेकिन पूरे संविधान में ये कहीं नहीं लिखा है कि भारत एक राष्ट्र नहीं है। दरअसल राहुल गांधी ने संविधान का अनुच्छेद एक तो पढ़ लिया लेकिन वो संविधान की प्रस्तावना पढ़ना भूल गए, प्रतीत होता है। संविधान की मूल प्रस्तावना और इमरजेंसी के समय हुए संशोधन के बाद की प्रस्तावना में भारत के लिए राष्ट्र शब्द का उल्लेख है। प्रस्तवाना में लिखा है कि ...उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए...। ये तो स्पष्ट  कि संविधान भारत को एक राष्ट्र के तौर पर देखता है। अगर संविधान की प्रस्तावना और संविधान सभा की बहस को देखें तो ये अधिक स्पष्ट होता है। संविधान सभा की बहस में राज्यों के यूनियन आफ स्टेट्स और फेडरल शब्द के उपयोग को लेकर लंबी बहस हुई थी। उस बहस में बाबा साहब अंबेडकर, प्रो के टी शाह, एच वी कामथ आदि ने हिस्सा लिया था। भारत औप भारत वर्ष नाम पर भी लंबी चर्चा हुई थी। तमाम दलीलों के बाद भारत को राज्यों के संघ के तौर पर स्वीकृत किया गया था। फेडरल स्टेट की मांग को खारिज कर दिया था। दरअसल राजनीतिक भाषणों में जब अकादमिक पुट दिया जाता है तो इस तरह की त्रुटियां हो जाती हैं, क्योंकि राजनीतिक भाषणों में समग्रता में अपनी बात कहने का अवसर नहीं होता है जबकि अकादमिक बहसों या लेखन में अपनी बात समग्रता में कही जा सकती है। राहुल गांधी की चिंता राज्यों के अधिकारों को लेकर है। सविंधान के अलग अलग अनुच्छेद में राज्यों के अधिकारों की चिंता की गई है। ये बात संविधान सभा की बहस में बाबा साहेब अंबेडकर ने भी कई बार दोहराई है। 

दरअसल जब राहुल गांधी भारत के राष्ट्र होने की अवधारणा का निषेध करते हैं तो वो जाने अनजाने कम्युनिस्टों के सोच को आगे बढ़ाते प्रतीत होते हैं। देश की स्वाधीनता के बाद कम्युनिस्टों ने भी राष्ट्र की अवधारणा को, लोकतंत्र की अवधारणा को, लोक कल्याणकारी राज्य का निषेध किया था। कम्युनिस्ट हमेशा से अंतराष्ट्रीयता को मानते रहे। यह अनायस नहीं है कि उनकी पार्टी का नाम भारत की कम्युनिस्ट पार्टी है, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी नहीं। कम्युनिस्ट विचारधारा लोक कल्याणकारी सबल राष्ट्र की पक्षधर नहीं रही है। कम्युनिस्ट पार्टियों में ये बहस चलती रही है कि सरकार की नीतियों को गरीबों तक पहुंचने दिया जाए या नहीं। आप अगर ध्यान से देखेंगे तो नक्सली हमेशा से स्कूल और अस्पतालों पर हमला करते हैं और उनको नष्ट करने की फिराक में रहते हैं। उनका मानना है कि अगर सभी वर्गों तक सरकारी सुविधाओं या योजनाओं का लाभ पहुंच गया तो वर्ग संघर्ष के माध्यम से मजदूरों का राज कायम नहीं हो सकेगा। कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन के आधार को देखेंगे तो वहां भी भारत से अधिक रूस और चीन में व्याप्त विचारधारा का असर दिखता है। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) में जब विभाजन हुआ और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी बनी तो वैचारिक भिन्नता का आधार रूस और चीन की साम्यवादी विचारधारा थी। एक गुट रूस तो दूसरा चीन की विचारधारा को लेकर आगे बढ़ना चाहता था। जब देश आजाद हुआ था तो जवाहरलाल नेहरू रूस के अधिक करीब थे। रूस की कम्युनिस्ट पार्टी चाहती थी कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी नेहरू को लेकर उदार रहे। जबकि सीपीआई का एक गुट इसके खिलाफ था। 1962 में चीन के साथ युद्ध होने के बाद भी सीपीआई का एक गुट चीन की पैरोकारी में लगा रहा। माओ को लेकर नारा भी लगता था उनका चेयरमैन हमारा चेयरमैन। चीन के साथ युद्ध के दो वर्ष बाद पार्टी में विभाजन हुआ। जब राष्ट्र के निषेध की बात होती है तो कम्युनिस्टों की पुरानी वैचारिकी जीवंत हो उठती है। आज जब पूरा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है तो राहुल गांधी का राष्ट्र की अवधारणा का निषेध चौंकाता है। उन्होंने कहा कि भारत में हमेशा संवाद से शासन चला है और इस संबंध में उन्होंने अशोक, मौर्य और गुप्तवंश की चर्चा की। शायद राहुल गांधी जोश में बिंदुसार के शासन काल के युद्धों को भूल गए, भूल तो वो कलिंग युद्ध को भी गए। 

दूसरी बात राहुल गांधी ने कही कि भारत मे हर राज्य का अपना इतिहास है, अपनी भाषा है और अपनी संस्कृति है। इतिहास और भाषा तक तो बात समझ आती है लेकिन अलग अलग संस्कृति की बात गले नहीं उतरती है। पूरे भारत की संस्कृति एक ही है जहां हम विविधता का उत्सव मनाते हैं। ये बात हमारे पौराणिक ग्रंथों से भी सिद्ध होती है और वासुदेव शरण अग्रवाल, कुबेरनाथ राय और रामधारी सिंह दिनकर के लेखन से भी स्पष्ट होता है। जब हम संस्कृति की बात करते हैं तो हमें उसके मूल तत्वों को समझना होगा। दिनकर ने स्पष्ट किया है कि संस्कृति ऐसी चीज है जिसे लक्ष्णों से तो हम जान सकते हैं किंतु उसकी परिभाषा नहीं दे सकते। कुछ अर्शों में वो सभ्यता से भिन्न गुण है। सभ्यता वो चीज है जो हमारे पास है, संस्कृति वह गुण है जो हममें व्याप्त है। दिनकर के अलावा अगर हम राजनीतिशास्त्र के विद्वानों की तरफ से दिए गए आयडिया आफ इंडिया की बात भी करें तो वहां भी स्पष्ट है कि भारत की संस्कृति तो एक ही है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और कच्छ से लेकर कोलकाता तक भाषा, पहनावे, और खान-पान में विविधता दिखाई देती है लेकिन पूरे देश की संस्कृति में भारत की व्याप्ति नजर आती है। इस वजह से स्वाधीनता के बाद अपने एक लेख में वासुदेव शरण अग्रवाल कहते हैं कि ‘राष्ट्र संवर्धन का सबसे प्रबल कार्य संस्कृति की साधना है। उसके लिए बुद्धिपूर्वक यत्न करना होगा। इस देश की संस्कृति की धारा  अति प्राचीन काल से बहती आई है उसके प्राणवंत तत्व को अपनाकर ही हम आगे बढ़ सकते हैं।‘ जब हम राष्ट्र को ही निगेट करेंगे तो हमको संस्कृतियां भी अलग अलग नजर आएंगी । 

राहुल गांधी के भाषण के इस बिंदुओं पर अगर हम समग्रता में देखें तो लगता है कि वो किस तरह से कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रभाव में आकर अपनी ही पार्टी की विरासत को भूल रहे हैं। बाबा साहेब अंबेडकर के संविधान की मूल भावना और सरदार पटेल की राष्ट्र निर्माण के अथक परिश्रम की भी अनदेखी कर रहे हैं। स्वाधीनता आंदोलन में अपना सर्वस्व होम करनेवाले सेनानियों के योगदान को भूल रहे हैं। तात्कालिक राजनीतिक सफलता के लिए इस तरह की जुमलेबाजी की अपेक्षा 136 साल पुरानी पार्टी के अध्यक्ष रहे व्यक्ति से नहीं की जा सकती है। इस तरह के बयानों से हो सकता है तात्कालिक राजनीतिक लाभ मिल जाए। अपने राजनीतिक विरोधी नरेन्द्र मोदी को घेरने में सफलता मिल जाए।कुछ राज्यों में शासन कर रही क्षेत्रीय दलों का समर्थन कांग्रेस को मिल जाए, कुछ चुनावी फायदा हो जाए लेकिन इसका असर लंबे समय तक रहेगा, इसमें संदेह है। इतनी पुरानी पार्टी के अध्यक्ष पद पर रहे व्यक्ति से ये अपेक्षा की जाती है कि वो देश को समझे, उसके संविधान की मूल भावना को समझे, देशवासियों की भावना को उनकी संवेदनाओं को समझें और उसके अनुसार सार्वजनिक बयान दें।   



Friday, February 4, 2022

स्त्रियों की आर्थिक आजादी की पक्षधर


स्वाधीनता आंदोलन में कई ऐसी सेनानी रही हैं जिन्होंने स्वतंत्रता के पहले भी और देश के स्वतंत्र होने के बाद भी अपने कार्यों से भारतीय समाज को प्रभावित किया। ऐसी ही एक सेनानी हैं रमादेवी चौधरी। रमादेवी ने किशोरावस्था में ही अपने पति के साथ देश की स्वाधीनता का स्वप्न देखा और उसको साकार करने में जुट गई। रमादेवी जब 15 वर्ष की थीं तो उनकी शादी हो गई थी। शादी के वक्त उनके पति सरकारी अधिकारी थे। बाद में उन्होंने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और स्वाधीनता आंदोलन में शामिल हो गए। रमादेवी के स्वाधीनता आंदोलन में शामिल होने की भी बेहद दिलचस्प कहानी है। महात्मा गांधी पूरे देश के दौरे पर थे। उसी क्रम में वो कटक पहुंचे थे और वहां के बिनोद विहारी मंदिर में महिलाओं के साथ उन्होंने एक बैठक की थी। उस बैठक में अन्य महिलाओं के साथ रमादेवी भी शामिल हुई थीं। उस बैठक के बाद उनके मन पर गहरा प्रभाव पड़ा और अपने पति के साथ कांग्रेस में शामिल हो गई। 1922 के कांग्रेस के गया अधिवेशन में हिस्सा लिया। इस अधिवेशन में शामिल होकर लौटने के बाद रमादेवी ने अपने इलाके की महिलाओं को संगठित करना आरंभ कर दिया। 

1930 में गांधी ने जब नमक सत्याग्रह का आह्वान किया तो रमादेवी ने अपने क्षेत्र की महिलाओं को संगठित करने के काम में जुट गईं। महिलाओं की भागीदारी से उत्साहित होकर रमादेवी ने महिलाओं को स्वाधीनता आंदोलन में शामिल करने का अभियान आरंभ किया। उनका ये अभियान अंग्रजों को नागवार गुजरा और 1930 के अंत में रमादेवी  को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। 1931 में गांधी-इरविन समझौता हुआ तो उसके कई महीने बाद रमादेवी की रिहाई हुई। जेल से बाहर आने के बाद रमादेवी ने अस्पृश्यता के खिलाफ बड़ा जागरूता आंदोलन चलाया। इसके लिए उन्होंने अस्पृश्यता निवारण संघ बनाया। रमादेवी मानती थीं कि समाज में कोई भी बदलाव बगैर स्त्रियों की सक्रिय भूमिका के संभव नहीं है। इसी समय उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर सेवाघर नाम से एक आश्रम की स्थापना की। इस आश्रम के माध्यम से उन्होंने स्वदेशी को बढ़ावा देना और महिलाओं को शिक्षित करने का भी उपक्रम शुरु किया गया। आश्रम की लोकप्रियता बढ़ने लगी थी और बड़ी संख्या में लोग इससे जुड़ने लगे थे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय फिर रमादेवी को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया और उनके आश्रम को अंग्रेजों ने गैरकानूनी घोषित कर बंद कर दिया। दो वर्ष के बाद रमादेवी जब जेल से बाहर आईं तो उन्होंने महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के काम में लग गईं। 

1947 में जब देश आजाद हुआ तो रमादेवी ने बिनोवा भावे के सर्वोदय आंदोलन में सक्रिय हिस्सेदारी की। भूमि सुधार के लिए उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर ओडीशा में करीब 4000 किलोमीटर की पदयात्रा भी की थी। स्वतंत्रता के बाद महिलाओं की सार्वजनिक जीवन में भागीदारी कम थी। रमादेवी इसको बढ़ाना चाहती थीं। इसके लिए उन्होनें उत्कल खादी मंडल की स्थापना की। इसके माध्यम से वो महिलाओं को रोजगार देना चाहती थीं। उन्होंने ओडीशा के आदिवासियों की बेहतरी के लिए भी काम किया। 1951 में जब देश में अकाल पड़ा था तो अपने संगठन के माध्यम से उन्होंने अकाल पीड़ितों की मदद के लिए भी दिन रात एक कर दिया था। इंदिरा गांधी ने जब देश में इमरजेंसी लगाई तो रमादेवी उसके खिलाफ खड़ी हो गईं थीं। उन्होंने मीडिया पर पाबंदी का विरोध किया था। हरेकृष्ण महताब और नीलमणि राउतराय के साथ मिलकर उन्होंने ग्राम सेवक प्रेस के नाम से एक समाचारपत्र निकाला। इस समाचार पत्र को इंदिरा सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया और रमादेवी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। भारत की आजादी के लिए जेल जानेवाली एक सेनानी स्वतंत्र भारत में फिर से जेल में डाल दी गईं। इमरजेंसी के बाद जब जेल से उनकी रिहाई हुई तो वो शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने लगी। बच्चों को शिक्षा मिले इसके लिए उन्होंने शिशु विहार के नाम से स्कूल आरंभ किया। उनकी देखरेख में कटक में एक कैंसर अस्पताल की स्थापना भी की गई। 1985 में अपने निधन के पहले तक वो लगातार भारत की महिलाओं, बच्चों और समाज के निचले पायदान के लोगों की बेहतरी के लिए काम करती रहीं। 


Saturday, January 29, 2022

पद्म सम्मान पर सियासी विवाद


हर वर्ष गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत सरकार पद्म सम्मानों की घोषणा करती है। पद्म सम्मान उन लोगों को दिया जाता है जो अपने अपने क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करते हैं। ये राष्ट्रीय सम्मान है। पिछले कुछ वर्षों से पद्म सम्मान ऐसे लोगों को दिए गए हैं जिससे इस सम्मान की प्रतिष्ठा बढ़ी है। कई बार इस पुरस्कार पर राजनीतिक कारणों से विवाद उठते रहते हैं। इस वर्ष के पद्म सम्मानों की घोषणा को लेकर भी विवाद उठा। भारत सरकार ने इस वर्ष कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के नेता और बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को पद्मभूषण से सम्मानित करने की घोषणा की। इस घोषणा के चंद घंटे के बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य की पार्टी की तरफ बयान आया कि उन्होंने पद्म सम्मान लेने से मना कर दिया है। एक और समाचार भी बंगाल से ही आया। बंगाली की मशहूर गायिका और बंगाल की लता मंगेशकर कही जानेवाली संध्या मुखर्जी की बेटी की तरफ से एक बयान आया। उसमें कहा गया कि उनकी मां ने पद्मश्री सम्मान लेने से मना कर दिया है। उस बयान के मुताबिक जब गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने उनकी सहमति लेने के लिए फोन किया तो उन्होंने ये कहकर इंकार कर दिया कि 90 वर्ष की अवस्था में पद्मश्री उनके लिए अपमान जैसा है। ये सम्मान अपेक्षाकृत कम उम्र के कलाकार को दिया जाना चाहिए। यह उनकी राय है जिसका सम्मान किया जाना चाहिए। जब पद्म सम्मानों की सूची जारी हुई तो उसमें संध्या मुखर्जी का नाम नहीं था। संध्या मुखर्जी की पुत्री की तरफ से दिए गए बयान से एक बात स्पष्ट होती है कि पद्म सम्मान के पहले गृह मंत्रालय के अधिकारी संबंधित व्यक्ति को फोन कर उनकी सहमति लेते हैं।

अब एक बार फिर से लौटते हैं बुद्धदेव भट्टाचार्य के मामले पर। बुद्धदेव भट्टाचार्य का नाम पद्म सम्मान के लिए घोषित सूची में आया। कुछ घंटे के बाद उनकी तरफ से उनकी पार्टी ने सम्मान के अस्वीकार करने की बात कही। सवाल यही उठता है कि क्या बुद्धदेव भट्टाचार्य को सम्मानित करने के फैसले के पहले उनकी सहमति नहीं ली गई। क्या गृह मंत्रालय के किसी अधिकारी ने बुद्धदेव भट्टाचार्य को फोन नहीं किया। जब पद्मश्री से सम्मानित करने के लिए संध्या मुखर्जी की सहमति के लिए उनको फोन किया गया तो यह मानने की कोई वजह नहीं है कि सरकार की तरफ से बुद्धदेव भट्टाचार्य को फोन नहीं किया गया होगा। इस वर्ष पद्म सम्मान से सम्मनित होनेवालों में फिल्म निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी का भी नाम है। उन्होंने बताया कि गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने उनको सूची जारी होने के पहले फोन किया और पूछा कि क्या आप सम्मान ग्रहण करने की स्वकृति देते हैं। जब चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने सहमति दी तो उस अधिकारी ने अपना फोन नंबर भी दिया और कहा कि अगर कोई बात हो उनको सूचित करें । सहमति के बाद ही द्विवेदी का नाम पद्मश्री सम्मान के लिए घोषित किया गया। सवाल ये उठता है कि यही प्रक्रिया बुद्धदेव भट्टाचार्य के साथ भी अपनाई गई होगी। उनकी सहमति के लिए भी फोन किया गया होगा। उनके पास भी गृह मंत्रालय के अधिकारी ने फोन नंबर छोड़ा होगा। तो फिर पद्मभूषण अस्वीकार करने की बात सूची में नाम आने के बाद क्यों की गई? क्या पहले सहमति दी गई और जब कम्युनिस्ट पार्टी को ये बात पता चली तो उन्होंने बुद्धदेव बाबू का निर्णय बदलवा दिया? मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और उसके नेता इस तरह के द्वंद्व के शिकार होते रहे हैं

1996 में बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया गया था। उस वक्त भी पार्टी के नेताओं ने ज्योति बसु पर दबाव बनाकर उनसे प्रधानमंत्री का पद अस्वीकार करवा दिया था। तब सीपीएम क नेताओं ने तर्क दिए थे कि गठबंधन सरकार में प्रधानमंत्री बनकर ज्योति बसु मार्क्सवादी एजेंडे को लागू नहीं करवा पाएंगे। ज्योति बाबू ने पार्टी के अनुशासित कार्यकर्ता की तरह उस निर्णय को स्वीकार कर लिया था लेकिन मन मसोस कर। चंद महीने बाद ही ज्योति बाबू का दर्द छलक आया था। उन्होंने अपनी पार्टी के नेताओं के निर्णय को ऐतिहासिक भूल करार दिया था। ज्योति बाबू लंबे समय तक बंगाल के मुख्यमंत्री रहे, पार्टी के अनुशासित कार्यकर्ता रहे लेकिन इस मसले पर उन्होंने पार्टी की आलोचना की थी। कहा जाता है कि ज्योति बाबू ने एक ही बार पार्टी के निर्णय को सार्वजनिक रूप से गलत बताया था। बाद में सीपीएम के कई नेताओं ने पार्टी के उस फैसले से असहमति जताते हुए गलती मानी। दरअसल सीपीएम अपने स्थापना काल से ही द्वंद्वात्मक राजनीति का शिकार होती रही है। स्वाधीनता के आंदोलन में  जब बापू ने भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ किया था तब कम्युनिस्टों ने उसका विरोध किया था। इसी तरह से अमेरिका के साथ परमाणु करार के समय पार्टी की लाइन नहीं मानने पर सीपीएम ने सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से निकाल दिया था। ये हास्यास्पद फैसला था क्योंकि सोमनाथ चटर्जी उस समय लोकसभा के स्पीकर थे। स्पीकर किसी पार्टी का सदस्य नहीं होता है। बाद में सोमनाथ चटर्जी ने अपनी संस्मणात्मक पुस्तक कीपिंग द फेथ, मेमोयर्स आफ अ पार्लियामेंटेरियन में अपनी पूर्व पार्टी की द्वंद्वात्मक राजनीति पर विस्तार से लिखा। संभव है सीपीएम को कई सालों बाद बुद्धदेव के पद्मभूषण सम्मान लौटाने के फैसले पर अफसोस हो। 

दूसरा विवाद उठा गुलाम नबी आजाद पद्म भूषण से सम्मानित करने के निर्णय को लेकर। इस सूचना के सार्वजनिक होते ही कांग्रेस के नेता और पूर्व मंत्री जयराम रमेश ने बुद्धदेव भट्टाचार्य के पद्मभूषण अस्वीकार के एक ट्वीट को रिट्वीट करते हुए लिखा कि वो आजाद रहना चाहते हैं गुलाम नहीं। उनकी इस टिप्पणी को गुलाम नबी आजाद पर सीधा हमला माना गया। उसके बाद पूर्व कानून मंत्री अश्विनी कुमार, कपिल सिब्बल के साथ साथ पूर्व मंत्री कर्ण सिंह भी गुलाम नबी आजाद के समर्थन में आ गए। कर्ण सिंह ने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा कि राष्ट्रीय सम्मान को पार्टी के अंदरुनी कलह से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। विवाद के बीच कांग्रेस के एक नेता ने तो दूरदर्शन पर हुई एक चर्चा में गुलाम नबी आजाद को गद्दार तक कह दिया। गुलाम नबी पर बीजेपी से साठगांठ का आरोप तक जड़ दिया। जब कि कांग्रेस के नेता ये भूल गए कि पिछले ही वर्ष कांग्रेस के नेता और असम के मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई को मरणोपरांत पद्म सम्मान से सम्मानित किया गया था। कांग्रेस के ही नेता रहे नगालैंड के पूर्व मुख्यमंत्री एस सी जमीर को भी पद्मभूषण से सम्मानित किया जा चुका है। इन दोनों को सम्मानित करने पर तो कांग्रेस के नेताओं को कोई आपत्ति नहीं हुई। 

सवाल यह उठता है कि पद्म पुरस्कार को राजनीति के अखाड़े में क्यों घसीटा जाता है। पद्म पुरस्कार कोई दल या कोई व्यक्ति नहीं देता है। भारत के इस प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान को दलगत राजनीति से उपर उठकर देखा जाना चाहिए। जैसा कि ऊपर कहा गया है कि पिछले कुछ सालों से जिस तरह के लोगों का चयन पद्म सम्मानों के लिए हो रहा है उसने इस सम्मान की प्रतिष्ठा बढ़ी है। उसको एक दो नामों के आधार पर विवादित करने या उसके आधार पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। आज पूरा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है। अमृत महोत्सव वर्ष में सभी दलों के नेताओं को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर समाज के अपने नायकों का सम्मान करना चाहिए। बुद्धदेव भट्टाचार्य या गुलाम नबी आजाद को पद्म सम्मान से सम्मानित करने के समावेशी निर्णय को स्वीकार करते हुए सभी दलों को सहिष्णुता का परिचय देना चाहिए था। 

Saturday, January 22, 2022

सम्राट अशोक पर अनावश्यक विवाद


बिहार के स्कूल में पढ़ाई के दौरान की एक स्मृति अबतक मानस पटल पर है। कक्षा में छात्रों से बात करते हुए हमारे प्राथमिक विद्यालय के मास्टर साहब कौवा और कान का उदाहरण देकर छात्रों को समझाया करते थे । वो हमेशा कहते थे कि अगर कोई कहे कि कौवा कान लेकर भाग गया तो कौवा के पीछे मत भागो पहले अपने कान को देखो। बिहार में इसका प्रयोग कहावत की तरह भी होता है। अपने गृह राज्य बिहार में सम्राट अशोक पर उठे विवाद के बाद अपने प्राथमिक विद्यालय के इस प्रसंग की लगातार याद आ रही है। बुजुर्ग लेखक दया प्रकाश सिन्हा को उनके नाटक सम्राट अशोक के लिए साहित्य अकादमी का पुरस्कार दिया गया। उनपर आरोप है कि उन्होंने सम्राट अशोक की तुलना मुगल आततायी औरंगजेब से की। उनके खिलाफ भारतीय जनता पार्टी के बिहार के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल ने केस दर्ज करवाया। अपनी शिकायत में उन्होंने आरोप लगाया है कि पुस्तक में सम्राट अशोक की तुलना औरंगजेब से की गई है। यह आश्चर्य का विषय है कि दया प्रकाश सिन्हा ने अपनी पुस्तक सम्राट अशोक में कहीं भी औरंगजेब का नामोल्लेख तक नहीं किया है। अब कोई ये बताए कि बगैर नामोल्लेख के अशोक की तुलना औरंगजेब से कैसे की जा सकती है। सिर्फ भारतीय जनता पार्टी ही नहीं बल्कि जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के नेता उपेन्द्र कुशवाहा भी दया प्रकाश सिन्हा से पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस लेने की मांग कर रहे हैं। उपेन्द्र कुशवाहा इन दिनों जेडीयू में हैं इसके पहले वो इस पार्टी में आते जाते रहे हैं। उपेन्द्र कुशवाहा 2014 से लेकर करीब चार साल तक केंद्र में मानव संसाधन विकास मंत्रालय (अब शिक्षा मंत्रालय) में राज्यमंत्री रह चुके हैं। उपेन्द्र कुशवाहा इस बात से खिन्न हैं कि दया प्रकाश सिन्हा ने सम्राट अशोक के बारे में आपत्तिजनक बातें लिखी हैं। 

दया प्रकाश सिन्हा ने अपने नाटक जिन बातों का उल्लेख किया है उसके बारे में इतिहासकार लंबे समय से लिखते रहे हैं। ए एल बैशम, राम शरण शर्मा, रोमिला थापर, डी एन झा, के एम श्रीमाली से लेकर रमाशंकर त्रिपाठी तक ने अपनी पुस्तकों में इन बातों का उल्लेख किया है। करीब चार साल तक उपेन्द्र कुशवाहा केंद्र में शिक्षा राज्य मंत्री रहे ।उनके मातहत एक संस्था है राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद। यहां से राम शरण शर्मा लिखित ग्यारहवीं कक्षा की पाठ्य पुस्तक एनसिएंट इंडिया प्रकाशित है। इसकी पृष्ठ संख्या 100-01 पर इस बात का उल्लेख है कि बौद्ध परंपरा के अनुसार अशोक अपनी आरंभिक जिंदगी में बहुत निर्दयी था और उसने राजगद्दी पाने के लिए अपने 99 भाइयों की हत्या की थी। हलांकि लेखक ये भी कहते हैं कि ये गलत भी हो सकता है क्योंकि बौद्ध लेखकों ने उनकी जीवनी में कई काल्पनिक बातें डाली हैं। सवाल ये उठता है कि अगर ये तथ्य गलत थे तो इसका उल्लेख क्यों किया गया ? छात्रों को सालों से ये क्यों पढाया जा रहा है? शिक्षा राज्य मंत्री रहते हुए उपेन्द्र कुशवाहा ने इसको पाठ्य पुस्तक से हटवाने का उपक्रम क्यों नहीं किया? 

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी माध्यम कार्यन्वयन निदेशालय की एक पुस्तक है प्राचीन भारत का इतिहास। इस पुस्तक के संपादक हैं इतिहासकार डी एन झा और के एम श्रीमाली। इस पुस्तक के एक लेख के अनुसार, अशोक के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के प्रमुख साधन उसके शिलालेख तथा स्तंभों पर उत्कीर्ण अभिलेख हैं। किंतु ये अभिलेख अशोक के प्रारंभिक जीवन पर कोई प्रकाश नहीं डालते। इनके लिए हमें संस्कृत तथा पालि में लिखे हुए बौद्ध ग्रंथों पर निर्भर करना पड़ता है। परंपरानुसार अशोक ने अपने भाइयों का हनन करके सिंहासन प्राप्त किया था (पृ. संख्या 178)। ये पुस्तक पहली बार 1981 में प्रकाशित हुई थी। क्या शिक्षा राज्य मंत्री रहते हुए उपेन्द्र कुशवाहा ने दिल्ली विश्वविद्यालय को इस सबंध में कोई आपत्ति पत्र भेजा था। पहली बार 1942 में प्रकाशित अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ एनशिएंट इंडिया में रमा शंकर त्रिपाठी भी लिखते हैं कि सिंहली परंपराओं के अनुसार अशोक ने अपने 99 भाइयों की हत्या करने और खून की नदियां बहाकर गद्दी हासिल की थी। त्रिपाठी भी इस बात का उल्लेख करते हैं कि कुछ विद्वानों को इस पर संदेह है। अपनी पुस्तक ‘द वंडर दैड वाज इंडिया’ में इतिहासकार ए एल बैशम भी बौद्ध सूत्रों के आधार पर लिखते हैं कि अशोक ने विरोधियों की हत्या करके गद्दी हथियाई थी। एक तानाशाह के रूप में अपना शासन किया था (पृ संख्या 53)। बैशम भी यहां जोड़ते हैं कि अशोक के शिलालेखों में इस बात का उल्लेख नहीं मिलता । 

रोमिला थापर ने 1963 में एक पुस्तक लिखी जिसका नाम है ‘अशोक एंड द डिक्लाइन आफ द मौर्याज’। ये आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित है। अपनी इस पुस्तक में रोमिला थापर ने अशोक के बारे में विस्तार से लिखा है। इस पुस्तक की पृष्ठ संख्या 20 से लेकर 30 तक में रोमिला थापर ने विभिन्न बौद्ध सूत्रों के आधार पर अशोक के बारे में विस्तार से लिखा है। रोमिला थापर लिखती हैं कि अशोक अपने आरंभिक दिनों में सुंदर नहीं दिखते और उनके पिता बिंदुसार उनको पसंद नहीं करते थे। बाद के पृष्ठों पर लिखा है कि दिव्यावदान के मुताबिक जब अशोक के पिता बिंदुसार की मृत्यु हो रही थी तो वो अपने पुत्र सुसीम को राजा बनाना चाहते थे लेकिन उनके मंत्रियों ने अशोक को गद्दी पर बिठा दिया। महावंस और दीपवंस के अनुसार अशोक ने बिंदुसार की अन्य पत्नियों से जन्मे अपने 99 भाइयों की हत्या करवाई। तारानाथ के अनुसार अशोक ने अपने जीवन के आरंभिक वर्ष आनंद और मनोरंजन में व्यतीत किए जिसकी वजह से उनको कामाशोक आदि कहा गया। अपनी इस पुस्तक में रोमिला थापर ने विस्तार से अशोक के स्वभाव, महिलाओं के प्रति उनके व्यवहार,परिवार के सदस्यों के आपसी संबंधों आदि को बौद्ध सूत्रों के आधार पर पाठकों के समक्ष रखा है। रोमिला थापर की इस पुस्तक के दस से अधिक रिप्रिंट हो चुके हैं। रोमिला थापर ने ये पुस्तक 1963 में लिख दी थी अन्यथा अब तो उनको भी केस मुकदमा झेलना पड़ता।

इस देश में तो भगवान राम के बारे में भी जाने लोग क्या क्या कहते रहे हैं। सीता निर्वासन के प्रसंग को लेकर फूहड़ बातें भी लिखी गईं। एम एफ हुसैन तो देवी देवताओं के नग्न चित्र तक बनाते रहे। महात्मा गांधी के बारे में कितनी तरह की बातें कही जाती रही हैं। करीब दस साल पहले तेलुगू के एक लेखक वाई लक्ष्मण प्रसाद को साहित्य अकादमी ने उनकी पुस्तक द्रौपदी पर पुरस्कृत किया था। उस पुस्तक में द्रौपदी को लेकर अमर्यादित टिप्पणी की गई थी। भाषा बेहद निम्न स्तर की थी। जब इन मसलों का विरोध होता था तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकारों के पेट में दर्द होने लगता था। चूंकि दया प्रकाश सिन्हा कभी भारतीय जनता पार्टी से जुड़े रहे हैं तो अभिव्यक्ति के सारे पहरेदार अचानक खामोश हो गए हैं। दया प्रकाश सिन्हा ने अपने नाटक में सम्राट अशोक के बारे में कोई नई बात नहीं बात लिखी है। इतिहासकार ये लिखते रहे हैं।उनके विरोध की वजह अकादमिक न होकर राजनीतिक प्रतीत होती है। क्या बिहार की राजनीति में कुछ नया घटित होनेवाला है जिसकी पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है या उपेन्द्र कुशवाहा अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करने के लिए इस मुद्दे को हवा दे रहे हैं। इतिहास अशोक को सम्राट अशोक मानता है और अंग्रेजी में उनको ‘अशोक द ग्रेट’ कहा जाता है। उनके बारे में तमाम तरह के तथ्य खुलेंगे लेकिन अशोक ने जिस तरह से ‘दिग्विजय’ के स्थान पर ‘धम्मविजय’ के सिद्धांतों को अपनाया वो अतुलनीय है। 

Saturday, January 15, 2022

साहित्य में दयनीय महानता का दौर


इन दिनों हिंदी साहित्य में एक अजीब किस्म का सन्नाटा दिखाई देता है। कुछ रचनाकार कई बार अपने लेखन से तो कई बार अपनी टिप्पणियों से इस सन्नाटे को तोड़ने की कोशिश करते हैं। वरिष्ठ लेखिका मैत्रेयी पुष्पा नियमित तौर पर फेसबुक पर कोई टिप्पणी लिखकर साहित्य के ठहरे पानी में कंकड़ फेंकती रहती हैं। कई बार उस पर विवाद भी होता है। बीच-बीच में लेखक संगठनों के नाम पर कुछ नए पुराने लेखक अपील आदि जारी करते रहते हैं लेकिन उसका भी कहीं कोई असर दिखाई नहीं देता है। ऐसी अधिकतर अपील किसी न किसी चुनाव के पहले ही जारी की जाती हैं। अब तो इसका असर इंटरनेट मीडिया पर भी नहीं होता।  जमीनी स्तर पर तो शायद अपील पहुंचती भी नहीं है। कुछ ऐसे भी लेखक हैं जो साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में फासीवाद को लेकर चिंतित ही नहीं रहते हैं बल्कि उसके खतरों से लोगों को आगाह भी करते रहते हैं। उधर सरकार के विभिन्न मंत्रालय और विभाग साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में वैचारिक विरोधियों को लगातार स्थान देती रहती है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय की पत्रिका आजकल के आवरण पर धुर वामपंथी कवि की तस्वीर छपती है। इसके पहले भी वामपंथी विचारधारा के लेखकों के चित्र आजकल पत्रिका के आवरण पर नियमित तौर पर छपते रहे हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार मोदी सरकार के घोषित विरोधियों को दिया जाता है। फिल्म फेस्टिवल से लेकर युवा महोत्सव तक में सरकार विरोधियों की फिल्में और वक्ता के तौर पर उनको आमंत्रित करके सरकार लगातार अपने लोकतांत्रिक होने का प्रमाण देने में जुटी है। बावजूद इसके विचारधारा विशेष के लेखकों को 2014 के बाद से ही फासीवाद का डर सता रहा है। 

अब वामपंथियों में एक नई प्रवृत्ति स्पष्ट दिखने लगी है। पहले वो अपनी विचारधारा से संबद्ध राजनीतिक दलों के लिए काम करते थे । पिछले तीन चार साल से हो रहे चुनावों में वामपंथी दलों की हालत बहुत खराब हो गई है। अब अधिकतर वामपंथी लेखकों को कांग्रेस में संभावना नजर आने लगी। वामपंथी लेखक अब खुलकर कांग्रेस पार्टी के लिए काम करते हुए नजर आने लगे हैं। इंटरनेट मीडिया पर उनके लिखे को देखने से ये स्पष्ट हो जाता है। उनको अब इंदिरा गांधी के फासीवाद की बिल्कुल याद नहीं आती। उनको आपातकाल के दौर की ज्यादातियों की भी याद नहीं आती। निर्मल वर्मा ने तमिल लेखक पी कृष्णन से एक बातचीत में स्पष्ट रूप से इंदिरा गांधी की फासीवादी नीतियों और हिंदी के लेखकों पर अपनी राय रखी थी। निर्मल वर्मा ने कहा था, सबसे अधिक चौंकानेवाली बात थी इंदिरा गांधी की अलोकतांत्रिक तथा अत्याचारी नीतियों का बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा जरा भी विरोध न किया जाना। वैसे तो इंदिरा गांधी की तानाशाही हल्की थी लेकिन इस हल्के संस्करण ने भी  हमारे बुद्धिजीवी वर्ग को खासा भयभीत कर दिया था और उन्होंने घुटने टेक दिए थे। इस क्रम में निर्मल ने रघुवीर सहाय और धर्मवीर भारती तक का नाम लिया था। निर्मल ने बहुत कठोर शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा था कि उन्हें इस बात का अंदाज नहीं था कि हिंदी के बड़े साहित्यकार इतने भंगुर और सारहीन सिद्ध होंगे। अब जब वामपंथी लेखक भय से नहीं बल्कि राजनीतिक कारणों से इंदिरा गांधी की विरासत की प्रशंसा कर रहे हैं। संभव है इस वजह से प्रभाव नहीं पैदा कर पा रहे हैं। 

साहित्य के राजनीतिक दांवपेंच से अलग हटकर अगर रचनात्मक स्तर पर भी देखें तो हिंदी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य बहुत आशाजनक नहीं लगता है। अब भी वरिष्ठ और बुजुर्ग साहित्यकार ही अपनी सक्रियता से रचनात्मक संसार को जीवंत बनाने के प्रयास में लगे हुए हैं, लेकिन उनकी अपनी सीमाएं हैं। हिंदी के अधिकतर युवा लेखक आत्ममुग्धता के शिकार हो गए हैं। छोटे-मोटे उपन्यास लिखनेवाले भी खुद को प्रेमचंद से बड़ा कथाकार मानने लगा है। उसकी अपेक्षा भी होती है कि साहित्य समाज उनको प्रेमचंद से अधिक सम्मान भी दे। इसी अहंकार में वो आलोचना से लेकर समीक्षा विधा को खारिज करने लगते हैं। इंटरनेट माध्यम पर होनेवाली फूहड़ या प्रशंसात्मक चर्चा को सत्य मानकर वो अपनी कृति को महान समझ लेते हैं। कवियों के तो कहने ही क्या, वो तो खुद की रचनाओं पर मुग्ध रहते ही हैं। साहित्य के इस दौर को देखकर एक मित्र की टिप्पणी सटीक लगती है। उसने एक दिन कहा था कि हिंदी साहित्य में ये दयनीय महानता का दौर है। ,

आज अगर हिंदी साहित्य में किसी प्रकार का कोई विमर्श नहीं हो रहा है तो उसके पीछे के कारणों की पहचान करनी होगी। राजेन्द्र यादव से हमारा वैचारिक स्तर पर काफी विरोध रहता था लेकिन उनकी इस बात के लिए उनके विरोधी भी प्रशंसा करते थे कि वो साहित्य में अछूते प्रश्न उठाते थे। नामवर सिंह धुर वामपंथी थे, कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ चुके थे लेकिन जब वो लिखते थे तो उससे साहित्य जगत में हलचल होती थी, उनके लिखे के पक्ष विपक्ष में बातें होती थीं। अशोक वाजपेयी भी जबतक वामपंथ की राजनीति में नहीं उलझे थे तबतक उनके लेखन में एक वैचारिक उष्मा होती थी। इनके बाद की पीढ़ी में भी देखें तो ज्ञानरंजन से लेकर रवीन्द्र कालिया तक के लेखन में कुछ ऐसे तत्व अवश्य होते थे जो पाठकों के बीच चर्चा की वजह बनते थे। नरेन्द्र कोहली के लेखन में लगातार प्रयोग होते थे जो पाठकों को नई तरह से सोचने का आधार देते थे। कमलकिशोर गोयनका ने प्रेमचंद को समझने की नई दृष्टि हिंदी साहित्य जगत को दी। इन लोगों में अहंकार नहीं था और वो अपने पूर्वज लेखकों को कभी खारिज नहीं करते थे। उनको साहित्य की परंपरा का भी ज्ञान था और उसपर वो गुमान भी करते थे। कविता में भी देखें तो आधुनिक काल के कवियों ने काफी प्रयोग किए। स्वाधीनता के बाद भी कवियों ने अपनी लेखनी के माध्यम से भारतीय समाज की जड़ता पर प्रहार किया। आज ज्यादातर कविताएं गद्य में लिखी जा रही हैं। पहले कवियों पर संपादक नाम की संस्था का एक फिल्टर होता था लेकिन अब इंटरनेट मीडिया ने उस फिल्टर को समाप्त कर दिया। परिणाम यह हो रहा है कि कविता के नाम पर अंट शंट लिखा जा रहा है। लेकिन अहंकार इतना कि खुद को दिनकर और बच्चन से कम मानने को राजी नहीं। 

एक जमाना होता था जब साहित्यकारों की निजी गोष्ठियां हुआ करती थीं। जिसमें साहित्य की प्रवृत्तियों से लेकर नए लिखे जा रहे पर चर्चा होती थी। लोग खुलकर नई रचनाओं पर अपनी बातें रखते थे। आलोचना या प्रशंसा दोनों होती थी। इसमें बैठनेवाले वरिष्ठ साहित्यकार नए लेखकों की टिप्पणियों को ध्यान से सुनते थे और अगर आवश्यकता होती थी तो उसमें सुधार भी करते थे। इसका फायदा ये होता था कि नए लेखकों की समझने की दृष्टि का विस्तार होता था।  इंटरनेट मीडिया के विस्तार के बाद इस तरह की गोष्ठियां कम हो गईं। लोगों में पढ़ने की भी आदत कम होती जा रही हैं। रचनाओं पर टिप्पणी के स्थान पर लाइक के बटन अधिक दबने लगे हैं। दूसरी एक बात जो युवा लेखकों में देखने को मिल रही है कि वो अपनी लेखकीय परंपरा से अनजान हैं, उनको इस बात का भान ही नहीं है कि वो जिस भारतीय लेखन परंपरा में आना चाह रहे हैं वो कितना समृद्ध है। जब अपनी परंपरा के वैराट्य का अनुमान नहीं होता है तो व्यक्ति अहंकार का शिकार हो जाता है। उसको लगता है कि उसने जो लिख दिया है वही सबसे अच्छा है। युवा लेखकों को अपनी इस कमी को दूर करना होगा तभी जाकर हिंदी साहित्य जगत का वैचारिक सन्नाटा दूर होगा।  

Saturday, January 8, 2022

भाषा के बीच की खाई भरती फिल्में


कोरोना की तीसरी लहर के आरंभ होने के पहले एक बड़ी हिंदी फिल्म रिलीज हुई, जिसका नाम है 83। रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण जैसे बड़े सितारों और कबीर खान जैसे निर्देशक के होने के बावजूद यह फिल्म बुरी तरह असफल रही। इतनी बड़ी स्टार कास्ट के बावजूद फिल्म का लागत भी नहीं निकाल पाना कई सवाल खड़े करता है। फिल्म समीक्षकों ने इस फिल्म को चार उसके अधिक स्टार दिए थे, लेकिन ये फिल्म नहीं चली। समीक्षा को फिल्म की सफलता से नहीं जोड़ा जा सकता है। मुझे याद है मैं बहुत छोटा था तब फिल्म शोले रिलीज हुई थी। उसकी प्रकाशित समीक्षा का शीर्षक अबतक याद है। शीर्षक था, शोले जो भड़क न सका। शोले ऐसा भड़का कि उसने सफलता के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए थे। फिल्म 83 को समीक्षकों ने सर पर चढ़ाया लेकिन दर्शकों पर जादू नहीं चल सका। कुछ लोगों का तर्क है कि फिल्म 83, जो कि 1983 में भारत के क्रिकेट विश्व कप जीतने पर आधारित है, का क्लाइमैक्स दर्शकों को मालूम है इस वजह से फिल्म नहीं चली। इस तरह के तर्क देनेवालों के सामने रामलीलाओं के मंचन का उदाहरण है। रामलीला का क्लाइमैक्स सभी को पता है। बावजूद इसके रामलीला में भारी भीड़ उमड़ती है। इसलिए यह तर्क सही प्रतीत नहीं होता है कि क्लाइमैक्स पता होने की वजह से फिल्म नहीं चली। कुछ लोगों का तर्क है कि लोग क्रिकेट देखने सिनेमा हाल में नहीं जाते हैं और निर्देशक ने फिल्म में क्रिकेट बहुत अधिक दिखाई है। अलग अलग लोग अलग अलग तर्क। पर मुझे लगता है कि इसपर भी विचार किया जाना चाहिए कि क्या दिल्ली के जवाहलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रदर्शनकारियों के साथ खड़ी दीपिका की तस्वीर अब भी दर्शकों के मन पर अंकित है?  2020 के जनवरी में दीपिका की फिल्म छपाक आई थी तब वो अपने फिल्म के प्रमोशन को ध्यान में रखते हुए दीपिका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ जाकर खड़ी हो गई थी। तब उनकी फिल्म छपाक पिट गई थी। अब एक बार फिर 83 में दीपिका की उपस्थिति और फिल्म का असफल होना, कहीं कोई संकेत तो नहीं है? अगर ये संकेत सही है तो फिल्मी दुनिया के कलाकारों को सावधान हो जाना चाहिए। उनको ये बात समझ में आ जानी चाहिए कि फिल्म और राजनीति दोनों अलग अलग हैं। दोनों का घालमेल नुकसान पहुंचा सकता है।  

इसी समय एक दूसरी फिल्म आई पुष्पा, जो मूलरूप से तेलुगू में बनी है। इस फिल्म को हिंदी में डब करके रिलीज की गई। इस फिल्म को दर्शकों ने खूब पसंद किया। इसके नायक अल्लू अर्जुन हैं। फिल्म भले ही एक्शन ड्रामा है लेकिन पूरा परिवेश दक्षिण भारतीय है, फिर भी हिंदी के दर्शकों को भाया। इस फिल्म को दर्शकों ने 83 से अधिक पसंद किया। कमाई भी अधिक रही। वजह है फिल्म की कहानी और उसको कहने का अंदाज। पुष्पा फिल्म के निर्देशक सुकुमार ने फिल्म 83 के निर्देशक कबीर खान से बेहतर तरीके से अपनी कहानी को दर्शकों के सामने रखी। दर्शकों ने उसको पसंद किया। कबीर खान फिल्म 83 को भव्य और ग्लैमरस बनाने के चक्कर में कहानी को यथार्थ से दूर ले गए। नतीजा यह हुआ कि दर्शकों ने फिल्म को नकार दिया। दंगल हो या फिर सुल्तान दोनों फिल्में भव्य भी थीं, ग्लैमर भी था लेकिन निर्देशक ने यथार्थ की डोर नहीं छोड़ी। दूसरी एक बात जो फिल्म 83 को अति साधारण फिल्म बना देती है वो यह कि इस फिल्म से दर्शकों की भावनाएं नहीं जुड़ पाई। 1983 की विश्व कप जीत के बाद पैदा और जवान हुई पीढ़ी खुद को इस फिल्म के साथ आईडेंटिफाई नहीं कर पाई। निर्देशक इसमें चूक गए। फिल्म चक दे इंडिया के निर्देशक शमित अमीन अपनी फिल्म को दर्शकों की संवेदना से जोड़ने में सफल रहे थे। फिल्म भी सुपरहिट रही थी। 

फिल्म 83 के फ्लॉप होने की को दर्शकों की बदलती पसंद से जोड़कर भी देखा जा सकता है। ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म के लोकप्रिय होने के बाद से फिल्मी सितारों से अधिक लोग कहानी को पसंद करने लगे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि अगर इसी तरह चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब हिंदी फिल्मों से स्टार और सुपरस्टार वाली व्यवस्था खत्म हो जाएगी । दरअसल ओटीटी ने दर्शकों की रुचि का विस्तार किया है। अब हिंदी भाषी दर्शक अन्य भारतीय भाषाओं की फिल्में अपेक्षाकृत अधिक देखने लगे हैं। ओटीटी के पहले ये विकल्प मौजूद नहीं था। पहले होता ये था कि तमिल भाषा की फिल्म सिर्फ तमिलनाडु या पडुचेरी में दिखाई जाती थी। अन्य प्रदेशों में उसको दिखाने के लिए उस प्रदेश की भाषा में डब करना पड़ता था। एक दौर में टीवी पर दक्षिण भारतीय भाषाओं की हिंदी में डब की गई फिल्में खूब दिखाई जाती थीं। ओटीटी के प्रचलन में आने के बाद से अब दर्शक मूल भाषा में फिल्में देखना पसंद करने लगे हैं। अभी पिछले दिनों एक रिपोर्ट आई थी जिसमें ये बताया गया था कि मलयालम में बनी फिल्म को केरल के बाहर के दर्शकों ने अधिक देखा। अब मलयालम या मराठी फिल्मों को गैर मलयाली और गैर मराठी दर्शक भी देख रहे हैं। जिनको पहले क्षेत्रीय फिल्में कहा जाता था आज वो मुख्यधारा की फिल्में बन रही हैं। अल्लू अर्जुन की फिल्म पुष्पा हो या मलयाली फिल्म कुरुथी हो या फिर तमिल फिल्म सरपता परमबराई हो। इन सबकी सफलता ने ये साबित किया है कि क्षेत्रीय फिल्में अपनी भौगोलिक सीमा से बाहर निकलकर दूसरी भाषा के लोगों को भी पसंद आ रही हैं। अमेजन प्राइम वीडियो के एक अधिकारी का बयान प्रकाशित हुआ था कि तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ फिल्म के पाचस प्रतिशत दर्शक उनके अपने प्रदेशों के बाहर के होते हैं। भाषाई फिल्मों की व्याप्ति बढ़ने से जो सबसे महत्वपूर्ण घटित हो रहा है वो ये कि भारतीय भाषाओं के बीच वैमनस्यता कम हो रही है। हिंदी को लेकर अन्य भारतीय भाषा के कुछ लोगों के मन में जो दुर्भाव था वो कम हो रहा है। जब इस तरह के लोग ये जानते पढ़ते हैं कि हिंदी भाषी लोग अन्य भारतीय भाषाओं की फिल्मों को उनसे अधिक संख्या में देख रहे हैं तो उनके मन से हिंदी प्रति दुर्भावना कम या खत्म हो रही है। इस तरह से अगर हम देखें तो भाषाई वैमनस्यता दूर करने में फिल्में अब बड़ी भूमिका निभा रही हैं।ये बहुत बड़ी बात है। 

अपनी तमाम कमियों और राजनीतिक एजेंडा के बावजूद ओटीटी पर दिखाई जानेवाले कंटेट ने मनोरंजन की दुनिया को पहले से अधिक समावेशी बनाया है। अब फिल्मों में पहले की अपेक्षा अधिक प्रयोग हो रहे हैं। एक और बात जो रखांकित की जानी चाहिए वो ये कि ओटीटटी पर भारतीय फिल्मों को वैश्विक दर्शक भी मिलने लगे हैं। इसके भी कई फायदे हैं। अब वैश्विक मंचों पर भारतीय फिल्मों की चर्चा होने लगी है। पूरी दुनिया का ध्यान भारतीय भाषाओं में बनने वाली फिल्मों की ओर जाने लगा है। भारत कहानियों का देश है, कथावाचकों का देश है। कहानियां भी हैं और कहने का अलग अलग अंदाज भी है। कहने के विविध अंदाज को भी वैश्विक दर्शक मिले हैं। कोरोना के संकट ने एक बार फिर से सिनेमा हाल के जरिए फिल्म के व्यवसाय को बाधित किया है। फिर से फिल्मों के ओटीटी पर दिखाने का दौर आरंभ होगा। ओटीटी पर आनेवाली फिल्मों के निर्माता और निर्देशकों को भारतीय दर्शकों की रुचियों में आ रहे बदलाव का ध्यान रखना होगा। कहानी को यथार्थ के रास्ते पर चलाकर ही प्रयोग करने होंगे। सफलता की कुंजी वहीं हैं।  


Saturday, January 1, 2022

रचनात्मकता से भरपूर होगा नववर्ष


नववर्ष 2022। हिंदी साहित्य और प्रकाशन जगत को इस वर्ष से बहुत उम्मीदें हैं। समकालीन साहित्यिक और प्रकाशन परिदृश्य से जिस तरह का समाचार प्राप्त हो रहा है वो बेहद उत्साहजनक है। इस समय हिंदी साहित्य में कई पीढ़ियां एक साथ सृजनरत हैं। एक तरफ रामदरश मिश्र और विश्वनाथ त्रिपाठी जैसे बुजुर्ग लेखक हैं तो दूसरी तरफ नवीन चौधरी और भगवंत अनमोल जैसे युवा लेखक अपनी रचनाशीलता से हिंदी साहित्य जगत की रचनात्मकता को जीवंत रखे हुए हैं। इनके बीच में यतीन्द्र मिश्र, मनीषा कुलश्रेष्ठ, रजनी गुप्त, रत्नेश्वर और संजय कुंदन की पीढ़ी के लेखक भी लगातार लिख रहे हैं। मैत्रेयी पुष्पा और उषाकिरण खान की भी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं। हिंदी साहित्य की रचनाशीलता के हिसाब से ये वर्ष बेहद आश्वस्तिकारक लग रहा है। वाणी प्रकाशन से वरिष्ठ लेखिका पुष्पा भारती की एक महत्वपूर्ण पुस्तक का प्रकाशन इस वर्ष होगा जिसका नाम है अमिताभ बच्चन एक जीवनगाथा। पुष्पा भारती हिंदी की समर्थ लेखिका और धर्मवीर भारती की पत्नी हैं। धर्मवीर भारती और हरिवंशराय बच्चन के परिवार में निकटता रही है। पुष्पा भारती ने अमिताभ बच्चन के संघर्ष और सफलता को बहुत करीब से देखा है। उनके इस पुस्तक की साहित्य जगत को उत्सुकता से प्रतीक्षा है। हिंदी फिल्मों से जुड़े एक और व्यक्तित्व पर पुस्तक इस वर्ष प्रकाशित होगी। गीतकार, पटकथा लेखक और निर्देशक गुलजार के जीवन पर यतीन्द्र मिश्र की बहुप्रतीक्षित पुस्तक का प्रकाशन भी वाणी प्रकाशन से ही होगा। यतीन्द्र मिश्र ने हिंदी में पुस्तक लेखन की एक शैली विकसित की है जिसमें वो किसी प्रसिद्ध व्यक्ति से लंब समय तक बातचीत रिकार्ड करते हैं फिर उसके आधार पर पुस्तक लिखते हैं। गुलजार से भी यतीन्द्र पिछले 15 साल से उनके जीवन और फिल्मों पर बातचीत रिकार्ड कर रहे थे। पिछले दो साल से वो इसको पुस्तक का स्वरूप देने में लगे थे। अब इस वर्ष उसका प्रकाशन होता दिख रहा है। यतीन्द्र मिश्र के मुताबिक इस पुस्तक में गुलजार और उनकी कला के बारे में, उनके कवि रूप के बारे में पाठकों को कई नई जानकारियां मिलेंगी। गुलजार ने जो फिल्में बनाई हैं या जो गीत लिखे हैं उसमें उन्होंने अनेक प्रयोग किए हैं। यतीन्द्र ने उन प्रयोगों को अपनी इस पुस्तक में संजोया है। 

इक्कसवीं शताब्दी के आरंभ में हिंदी में कई महत्वपूर्ण उपन्यास प्रकाशित हुए थे। इसमें मैत्रेयी पुष्पा का अल्मा कबूतरी, चित्रा मुद्गल का आवां, असगर वजाहत का कैसी आगी लगाई आदि प्रमुख हैं। उसके बाद भी उपन्यासों का प्रकाशन होता रहा लेकिन पिछले कुछ वर्षों से उपन्यास लेखन कम हुआ। नई वाली हिंदी के सत्य व्यास ने अपने उपन्यासों से हिंदी साहित्य जगत में एक सार्थक हस्तक्षेप किया। लेकिन लंबे समय तक याद रखे जानेवाले उपन्यासों की कमी को आलोचक लगातार रेखांकित करते रहे। इस वर्ष कई महत्वपूर्ण उपन्यास आनेवाले हैं। एक तो चित्रा मुदगल का उपन्यास नकटौरा जो सामयिक प्रकाशन से प्रकाश्य है। लड़के के विवाह के लिए जब घर के पुरुष बारात चले जाते थे तो उस रात को घर की स्त्रियां नकटौरा आयोजित करती थीं। इसमें पास पड़ोस की स्त्रियां भी शामिल होती थीं। इसमें स्त्रियां एक तरह से स्वांग रचाती थीं और अपने मन की बातें किया करती थीं। कुछ महिलाएं, पुरुष का वेश बनाकर संवाद किया करती थीं। इसमें स्त्रियां उन प्रसंगों की चर्चा भी करती थीं जो आमतौर पर वो नहीं करती थीं। गाली से लेकर स्त्री पुरुष संबंध भी नकटौरा का विषय हुआ करती थी। नकटौरा में सिर्फ महिलाएं ही हुआ करती थीं। परंपरा ये थी कि जब सारे पुरुष बारात चले जाते थे तो नकटौरा के बहाने महिलाएं सारी रात जागती थीं ताकि किसी प्रकार की चौरी आदि की घटनाएं न हों। कुछ सालों पहले तक ये बेहद चर्चित परंपरा थी। चित्रा मुदगल के उपन्यास के नाम से ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने इस पंरपरा को ही केंद्र में रखकर लिखा है। इस उपन्यास के कवर पर लिखा है कि हमारा समाज जैसा दिखाई पड़ता है वैसा है नहीं। वह अपने तमाम दुर्गुणों , विकृतियों, विडंबनाओं और विद्रूपताओं के बावजूद मनुष्यता के उच्चतम मूल्यों की परंपरा को पुरस्कृत करनेवाली विरासत का उत्तराधिकारी भी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि चित्रा मुदगल ने नकटौरा के बहाने अपने विरासत में से सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को खोजकर पाठकों के लिए पेश किया होगा। 

चित्रा मुदगल  के अलावा राजकमल प्रकाशन समूह से ह्रषिकेश सुलभ का एक उपन्यास दातापीर भी इस वर्ष प्रकाशित होगा। इस उपन्यास में सुलभ ने कब्रिस्तान में काम करनेवालों को केंद्र में रखा है। उस उपन्यास में पटना शहर के पुराने इलाकों की भी कहानी साथ चलती रहती है।  लंबे समय तक कहानी और नाटक लिखने वाले सुलभ का ये दूसरा उपन्यास है। रत्नेश्वर ने भी एक उपन्यास त्रयी लिखी है जिसका नाम है महायुग। इसका पहला खंड है 32000 साल पहले, दूसरा खंड होगा हिमयुग में प्रेम और तीसरा खंड होगा प्रार्थना का आरंभ। इसका प्रकाशन भी इस वर्ष संभव है। उषाकिरण खान हिंदी और मैथिली की ऐसी लेखिका हैं जो अपनी लेखनी के माध्यम से लगातार युवा लेखकों को टक्कर देती रहती हैं। रचनाकर्म में वो कई युवा लेखकों और लेखिकाओं से अधिक सक्रिय हैं। उषाकिरण खान का मैथिली में एक बहुत चर्चित उपन्यास है पोखरि रजोखरि। इस वर्ष सामयिक प्रकाशन से उसका हिंदी अनुवाद प्रकाशित होने जा रहा है जिसका नाम है कथा रजोखर। मैथिली से इस उपन्यास का हिंदी में अनुवाद मीना झा ने किया है। रजोखर मिथिला का एक बड़ा जल स्त्रोत है जिसके माध्यम से मिथिला की सत्तर साल की दशा-दुर्शा की कथा कही गई है। पुस्तक के कवर पर ये बताया गया है कि उषाकिरण खान ने कथा रजोखर में स्वतंत्रता आंदोलन, नेहरू-गांधी के स्वप्न, चरखा, खादी ग्रामोद्योग का गठन और उसके विघटनकारी तत्व, स्वातंत्र्योत्तर मिथिला के नवनिर्माण की सरकारी योजनाएं और उसका परिणाम, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद स्वार्थ की राजनीति, राजनीति का अपराधीकरण, छूआछूत, विधवा विवाह और पलायन जैसी समस्याओं पर सवाल उठाया है। 

एक और महत्वपूर्ण अनुवाद पुस्तक का प्रकाशन प्रभात प्रकाशन से होने जा रहा है। इस पुस्तक का नाम है छत्रपति शिवाजी महाराज। अंग्रेजी में ये पुस्तक शिवाजी द ग्रैंड रेबल के नाम से इस प्रकाशित है जिसके लेखक हैं डेनिस किनकेड। एक और रोचक पुस्तक प्रभात प्रकाशन से आ रही है रामायण से स्टार्टअप सूत्र, इसको लिखा है प्राची गर्ग ने। इसी कड़ी में एक और पुस्तक आएगी वेदांत व जीवन प्रबंधन जिसको कलमबद्ध किया है विक्रांत सिंह तोमर ने। पौराणिक ग्रंथों से प्रबंधन के सूत्र निकालकर पाठकों के सामने पेश करना एक श्रमसाध्य कार्य है। लेकिन ये हिंदी साहित्य के क्षितिज का विस्तार करनेवाली पुस्तकें हैं।

हिंदी के अलावा अगर हम अंग्रेजी की बात करें तो कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद की आत्मकथा भी इस वर्ष प्रकाशित होनेवाली है। इस पुस्तक की प्रतीक्षा राजनीति से जुड़े लोग उत्सुकता से कर रहे हैं। लंबे समय तक गांधी परिवार के साथ रहे गुलाम नबी आजाद का परिवार से मोहभंग हुआ। सब लोगों की निगाह इस पर टिकी है कि अपनी इस पुस्तक में वो राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के बारे में क्या लिखते हैं। इस पुस्तक का प्रकाशन रूपा पब्लिकेशंस से होनेवाला है। दिल्ली विश्वविद्यालय अपनी स्थापना के सौवें वर्ष में प्रवेश करनेवाला है। समाचारों के मुताबिक इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी के संपादन में दिल्ली विश्वविद्यालय पर केंद्रित एक पुस्तक प्रकाशित होगी जिसमें विश्विद्यालय के पूर्व छात्र अपने अनुभवों को लिखेंगे। अंग्रेजी में कई अन्य महत्वपूर्ण पुस्तकों के प्रकाशन की खबर है, रामविलास पासवान और जार्ज फर्नांडिस की जीवनी के अलावा पत्रकार नीरजा चौधरी के राजनीतिक संस्मरणों की किताब भी इस वर्ष आएगी। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वर्ष 2022 रचनात्मकता से भरपूर होगा।   



Saturday, December 25, 2021

आत्मकथा और जीवनियों का वर्ष


वर्ष 2021 बीतने को आया। कुछ दिनों बाद ये वर्ष इतिहास हो जाएगा। इस वर्ष का उत्तरार्ध कोरोना महामारी के भय में गुजरा। चारो ओर कोरोना संक्रमण की बातें हो रही थीं। संक्रमण के फैलने की आशंका से जो भय का वातावरण बना था उसने सिनेमा जगत को भी प्रभावित किया। सिनेमा हाल लंबे समय तक बंद रहे, नई फिल्मों के निर्माण पर असर पड़ा, फिल्म जगत के सामने ओटीटी (ओवर द टाप) प्लेटफार्म चुनौती बनकर खड़े हो गए। सिनेमा हाल की व्यवस्था पर ऐसा ही बड़ा असर तब पड़ा था जब 1980 के बाद के वर्षों में देश में वीसीआर और कैसेट पर फिल्में देखने का चलन बढ़ा था। 2020 में फिल्म जगत का जो परिदृश्य बदलने लगा था वो बदलाव 2021 में और गाढ़ा हुआ। वीसीआर के दौर में तकनीक की वजह से सिनेमा दर्शकों का स्वभाव बदला था और अब भय की वजह से फिल्में देखने का माध्यम बदला। सिनेमा से जुड़े लोग अब भी दर्शकों के सिनेमा हाल में वापसी को लेकर आशंकित हैं। फिल्म निर्माण, वितरण और उसके अर्थशास्त्र को लेकर तमाम तरह की आशंकाओं के बीच वर्ष 2021 में फिल्म से जुड़ी एक विधा में उम्मीद की किरण नजर आई।  वर्ष 2021 में फिल्मों से जुड़े लोगों की आत्मकथाएं और जीवनियां प्रकाशित हुई। इनमें से कई पुस्तकें काफी चर्चित रही और बेहद लोकप्रिय भी हुईं। आत्मकथा या जीवनी या संस्मरण ऐसी विधा है जिसके ज्यादातर लेखक अपने को कसौटी पर नहीं कसते या अपने से जुड़े अप्रिय प्रसंगों को छोड़ देते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि फिल्मी आत्मकथाएं या जीवनियां उबाऊ और बोझिल हो जाती हैं। 2021 में इस विधा की कई पुस्तकें ऐसी आईं जिनमें बहुत हद तक लेखक ने खुद को कसौटी पर कसा है और अपने से जुड़े अप्रिय प्रसंगों को भी लिखा है। ज्यादातर लेखकों ने ईमानदारी बरती। 

सबसे पहले चर्चा करना चाहूंगा कबीर बेदी की आत्मकथा स्टोरीज आई मस्ट टेल, द इमोशनल लाइफ आफ एन एक्टर की। कबीर बेदी ने इसमें काफी हद तक ईमानदारी से अपनी जिंदगी से जुड़ी बातें लिखी हैं। कबीर बेदी अपने बचपन की यादों को भी इस पुस्तक में लेकर आते हैं। 1970 के बाद के वर्षों में मुंबई में फिल्मों से जुड़े कई युवाओं का एक ‘बोहेमियन जूहू गैंग’ होता था, जिसमें कबीर के अलावा शेखर कपूर, डैनी, महेश भट्ट, परवीन बाबी और शबाना आजमी आदि हुआ करते थे। कबीर बेदी ने उन वर्षों को रोचक अंदाज में याद किया है। इस पुस्तक में अपने कई संबंधों के बारे में भी बेबाकी से लिखा है। अपने पहले प्यार और पत्नी प्रतिमा बेदी के साथ साथ परवीन बाबी से अपने अफेयर पर भी लिखा है। हलांकि प्रतिमा बेदी ने अपनी पुस्तक टाइमपास, द मेमोरीज आफ प्रतिमा बेदी में इन प्रसंगों को अलग तरीके से लिखा है। कबीर ने परवीन बाबी की मानसिक स्थिति पर भी तटस्थ होकर लिखा है। इसमें उन्होंने परवीन बाबी के पत्रों का उल्लेख भी किया है। कबीर बेदी जब अपने युवा पुत्र की आत्महत्या के बारे में लिखते हैं तो पाठक उनकी संवेदना के साथ खुद को एकाकार कर लेता है। अपनी पीड़ा और संत्रास को उन्होंने कोमल गद्य के सहारे अपनी पुस्तक में आगे बढ़ाया है। कबीर बेदी के माता पिता स्वाधीनता सेनानी थी और उनका चिंतन गहरा था। अपनी इस पुस्तक में कबीर बेदी ने कई जगहों पर अपने अभिभावकों की सीख को भी उद्धृत किया है। बेदी धर्म को लेकर भी अपनी राय पाटकों के सामने रखते हैं। एक अध्याय में तो गुरू नानक, कबीर और सूफी संतों के हवाले से कई दार्शनिक बातें भी कहते हैं। इसमें वो गीता और बुद्ध के ज्ञान को भी अपने तरीके से पाठकों के सामने रखते हैं। अगर समग्रता में देखें तो कबीर बेदी की ये पुस्तक फिल्म से जुड़े किस्से तो बताती है लेकिन साथ ही इसमें एक पूरा कालखंड भी जीवंत होता है।   

फिल्मों से जुड़ी एक और शख्सियत नीना गुप्ता की आत्मकथा ‘सच कहूं तो’ भी इस वर्ष प्रकाशित हुई। ऐसा बहुत कम होता है कि कोई पुस्तक अंग्रेजी में प्रकाशित हो और उसका शीर्षक हिंदी के शब्दों का हो। नीना गुप्ता ने ये किया। नीना गुप्ता की आत्मकथा से पाठकों को ये उम्मीद रही होगी कि इसमें उनकी और विवियन रिचर्ड्स की लव स्टोरी का किस्सा  होगा। इस पुस्तक में नीना ने रिचर्ड्स से अपने संबंधों के बारे में नहीं बताया लेकिन उनको पाठकों की अपेक्षा का अंदाज रहा होगा। उन्होंने इस बारे में लिखा कि वो उन स्थितियों को अपने और रिचर्ड्स की बेटी मसाबा गुप्ता की खातिर दोहराना नहीं चाहती हैं। वो नहीं चाहती हैं कि एक बार फिर से उन स्थितियों को लेकर उनकी बेटी के सामने अप्रिय स्थिति उत्पन्न हो। पर उन्होंने मातृत्व के अपने अनुभवों को और एक अनव्याही मां को लेकर समाज की प्रतिक्रियाओं के बारे में लिखा है। अपनी जिंदगी के उतार चढ़ाव को भी उन्होंने स्वीकार किया है। इस पुस्तक में एक बात जो रेखांकित करने योग्य है वो ये कि नीना ने अपने आसपास के लोगों का नाम लेकर उनको शर्मिंदा नहीं किया। संकेतों में बात करके निकल गई हैं। जब नीना गुप्ता अपनी फिल्म बाजार सीताराम बना रही थीं तो वो उन्होंने श्याम बेनेगल से बात की थी। बेनेगल ने उनको सलाह दी थी कि हमेशा इस बात को याद रखना कि किसी भी कहानी का एक निश्चित आरंभ हो, उसका सुगठित मध्य भाग हो और उसका तार्किक अंत हो। अगर किसी कहानी में ये तीनों चीजें हैं तो वो कहानी कभी पिट नहीं सकती। ये सीख उनके जीवन में बहुत काम आई। नीना गुप्ता ने इसमें अपने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के दिनों को बेहद संजीदगी से याद किया है। इस पुस्तक में भी छिपाया कम बताया ज्यादा गया है। 

तीसरी पुस्तक जिसकी चर्चा की जानी चाहिए वो है अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा जोनस के संस्मरणों की किताब, अनफिनिश्ड । इस पुस्तक को लेकर इंटरनेट मीडिया पर जबरदस्त उत्सुकता का माहौल बना था। आनलाइन बुक स्टोर में अपने प्रकाशन के कई महीनों बाद तक ये पुस्तक लोकप्रियता के शीर्ष पर बनी रही थी। इस पुस्तक की शुरुआत उसके दस साल के भाई के अपनी बहन को मिस इंडिया प्रतियोगिता में भेजने के प्रसंग से होती है। प्रियंका के घर में दो बेडरूम थे। एक उसका था और एक माता पिता का। भाई को एक छोटे से कमरे में जगह दी गई थी और दस साल का बच्चा अपना बड़ा और अच्छा बेडरूम चाहता था। इसलिए उसने अपनी बहन को मिस इंडिया में भेजने की योजना बनाई ताकि वो उसके बेडरूम में रह सके। प्रियंका ने अमेरिकी फिल्मों में काम करने के लिए जो संघर्ष किया वो भी लिखा है। हिंदी फिल्मों की दुनिया से जुड़े प्रसंग भी हैं। दो अन्य पुस्तकों का उल्लेख भी आवश्यक है। एक है संजीव कुमार की आधिकारिक जीवनी, एन एक्टर्स एक्टर।  इसको हनीफ जरीवाला और सुमंत बत्रा ने लिखा है। संजीव कुमार पर कम लिखा गया और ये पुस्तक उस कमी को पूरा करती है। एक और पुस्तक अभी हाल ही में प्रकाशित हुई है, राज कपूर द मास्टर एट वर्क। ये पुस्तक राहुल रवैल और प्रियंका शर्मा की है। राहुल रवैल लंबे समय तक राज कपूर के सहायक रहे हैं, लिहाजा उन्होंने राज कपूर से जुड़े कई दिलचस्प प्रसंग लिखे हैं, कुछ व्यक्तिगत संसमरणों को भी जगह मिली है। महामारी की आशंका के बीच फिल्मों से जुड़े इन व्यक्तित्वों ने पाठकों के सामने स्तरीय पठनीय सामग्री पेश की है। आनलाइन बुक स्टोर में लोकप्रियता की सूची में इन पुस्तकों की रैकुंक देखकर इस बात का संकेत मिलता है कि पाठकों ने भी इन आत्मकथाओं और जीवनियों को पसंद किया है। 

Monday, December 20, 2021

मंदिरों की राष्ट्र संवर्धन में बड़ी भूमिका


काशी विश्वनाथ धाम के नव्य और भव्य स्वरूप के लोकार्पण के बाद भारतीय समाज और संस्कृति में मंदिरों के स्थान को लेकर भी चर्चा होनी चाहिए। मंदिरों के सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्र के ऐतिहासिक स्वरूप पर बात होनी चाहिए। मंदिरों से जुड़ी कलाओं पर भी चर्चा होनी चाहिए। हमारीभारतीय संस्कृति में मंदिरों को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। मंदिरों से नृत्य और कला का गहरा जुड़ाव रहा है। मुगल आक्रांताओं ने जब हमारे देश पर हमला किया और तो उनको मंदिरों की सामाजिक और सांस्कृतिक महत्ता का अनुमान हो गया था। ये अकारण नहीं है कि मुगलकाल में मंदिरों पर हमले हुए, मंदिरों को तोड़ा गया। मुगलों ने मंदिरों को तोड़कर सिर्फ हिंदुओं की आस्था को नहीं तोड़ा बल्कि उन्होंने भारतीय समाज के उस केंद्र को नष्ट करने का प्रयास किया जहां लोग संगठित होते थे। मुगलों ने मंदिरों के रूप में स्थापित सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्रों को तोड़कर भारतीय समाज को कमजोर किया। समाज की ताकत पर प्रहार किया। मुगलों के शासनकाल में विदेशों से चित्रकार आदि भारत आए। मुगलों की कला में और उसके पहले के भारतीय कला में एक आधारभूत अंतर था। मुगल कला का केंद्र बिंदु बादशाह का निजी जीवन और निजी पसंद था। भारतीय कला लोक के बीच व्याप्त थी। मंदिर उसके केंद्र हुआ करते थे। जनता की आकांक्षाएं और उसके स्वप्न कलाओं में खुलते और खिलते थे।

मुगलों के पराभव के बाद और अंग्रेजी राज के उदय के समय और कालांतर में उनके शासनकाल में भी मंदिरों का पौराणिक स्वरूप स्थापित नहीं हो सका। मंदिरों पर अंग्रेज शासकों की लगातार नजर रहा करती थी। वहां होने वाली गतिविधियों पर, वहां होनेवाले धन संचय पर भी अंग्रेज नजर रखते थे। इसी काल में मंदिरों को सिर्फ धार्मिक केंद्र के रूप में माने जाने पर जोर दिया जाने लगा। उनके सांस्कृतिक स्वरूप और सामाजिक भूमिका पर पाबंदियां लगाई गईं। अंग्रेजी शासन वाले कालखंड में धर्म से जुड़ी बातों को तोड़ा मरोड़ा गया। आधुनिक और अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर धर्म की गलत व्याख्या करके उसको रिलीजन बनाकर आनेवाली पीढ़ियों के मानस में स्थापित कर दिया गया। जब देश स्वाधीन हुआ तो पहले प्रधानमंत्री का वैचारिक झुकाव साम्यवाद की ओर था। सोमनाथ मंदिर पर देश के पहले राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्रीजवाहरलाल नेहरू के बीच ऐतिहासिक मतभेद हुआ था। राजेन्द्र बाबू सोमनाथ मंदिर को सिर्फ धर्म से जोड़कर नहीं देख रहे थे लेकिन साम्यवाद के प्रभाव में नेहरू उसको धार्मिक केंद्र मानते थे। यह भारतीय दृष्टि और विदेशी प्रभाव की दृष्टि की टकराहट भी थी। स्वाधीनता के कुछ वर्षों के बाद संस्कृति और शिक्षा पर साम्यवादियों की पकड़ मजबूत होने लगी थी। इंदिरा गांधी के शासनकाल में साम्यवादियों ने संस्कृति और शिक्षा पर अपनी सत्ता लगभग स्थापित कर ली। धर्म को अफीम मानने वाले साम्यवादियों का मंदिरों के प्रति क्या रुख रहा है ये सार्वजनिक है। साम्यवादियों ने विदेशी कलाओं से लेकर विदेशी नाटककारों के नाटकों को भारत में खूब बढ़ाया। कहना न होगा कि साम्यवादियों के इसी उपेक्षा भाव की वजह से भारतीय कला पर विदेशी कलाओं को प्राथमिकता दी गई। धर्म से दूरी की वजह से मंदिर कलाओं के साधकों को हाशिए पर डालने की कोशिशें हुईं। उनको सांप्रदायिक तक करार दिया गया, क्योंकि साम्यवादी कला को भी धर्म से मुक्त करवाकरध़र्मनिरपेक्ष बनाना चाहते थे। 

पिछले दिनों प्रसिद्ध नृत्यांगना सोनल मानसिंह से संवाद पर आधारित यतीन्द्र मिश्र की पुस्तक देवप्रिया (वाणी प्रकाशन)पढ़ रहा था। अचानक मेरी नजर एक प्रश्न पर चली गई।यतीन्द्र ने सोनल जी से उनपर सांप्रदायिक होने के लगनेवाले आरोपों के बारे में पूछा। सोनल मानसिंह ने लंबा उत्तर दिया। उसका एक अंश, ‘मैंने जिस विधा में जीवन गुजारा है वो संस्कृति से उपजा है और नृत्य जैसी महान परंपरा का स्थायी अंग है। आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत की ज्यादातर नृत्य परंपराएं मंदिर कलाओं के उदाहरण हैं। ये मठ, मंदिरों से जन्मी हैं और उनमें ज्यादातर कार्य व्यवहार देवता के प्रति आभार प्रदर्शन के अर्थ में होता आया है। पुराण, धर्म ग्रंथ, संत साहित्य, भजनावलियों और मंदिरों के महात्म्य का वर्णन ही नृत्य विधा में होता रहा है। यही मैंने जीवनभर किया है। । अब अगर ओडिसी या भरतनाट्यम के नृत्य करने से, गीत-गोविंद की चर्चा या आदर करने से कोई सांप्रदायिक ठहराया जाए तो मैं क्या कर सकती हूं। इस लिहाज से यदि आप या कोई व्यक्ति किसी कला या कलाकार का सरलीकरण करेगा, तब यह देखना मुश्किल हो जाएगा कि क्या क्या सांप्रदायिक हो सकता है? शास्त्रीय संगीत में भी अधिकांश गायन भक्तिपदों का होता है तो क्या सारे गायक सांप्रदायिक हो गए। भारतीय संस्कृति को उजागर करनेवाली कलाओं में खासकर नृत्य में कोई मार्क्सवादी विचार, मेरे देखने में नहीं आया है। आपको कहीं मिले तो ढूंढकर मुझे भी दीजिएगा।‘ 

सोनल मानसिंह के उत्तर के कई आयाम हैं और उसमें उन्होंने कई ऐसी बातें कही हैं जिसपर चर्चा होनी चाहिए। पहली बात तो ये कि भारत की ज्यादातर नृत्य परंपराएं मंदिर कलाओं के उदाहरण हैं। इससे यह बात पुष्ट होती है कि मंदिर भारतीय कलाओं का महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करता था। यहां हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय साहित्य में नटराज यानि शिव सबसे अच्छे नर्तक के रूप में स्थापित हैं। शिव का ये स्वरूप नृत्य कला का आधार भी कहा जाता है। सोनल जी अपने उत्तर का अंत एक प्रश्न से करती हैं और जानना चाहती हैं कि नृत्य में कोई मार्क्सवादी विचार हैं क्या? नृत्य और कला में मार्क्सवादी विचार के बारे में कल्पना करना भी व्यर्थ है। मार्क्सवादियों का तो नृत्य संगीत से ही कोई लेना देना रहा नहीं है। उनके हिसाब से तो ये सब बुर्जुआ से जुड़ी विधाएं हैं। काफी समय तक तो सिनेमा को लेकर भी उनकी यही राय थी।गीत संगीत को लेकर भी। वो कला की विभिन्न विधाओं से चिढ़ते हैं। उसकी उपेक्षा करते हैं। मार्क्सवादियों को लगता है कि हिंदू धर्म या सनातन धर्म नृत्य, गीत, अभिनय और कला की अन्य प्रवृत्तियों की वजह से जीवंत है। आततायियों के आक्रमण और मंदिरों को तोड़े जाने के बावजूद भारतीय धर्म के निर्मल आदर्शों के कारण भारतीय कला बची रही। आज जब एक बार फिर से मंदिरों को सांस्कृतिक और सामाजिक केंद्रों के रूप में स्थापित किया जा रहा है तो मार्क्सवादी असहज हो रहे हैं। उनको लग रहा होगा अगर ये मंदिर फिर से सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर शक्तिशाली हो गए तो धर्म का प्रभाव बढ़ेगा। धर्म का प्रभाव बढ़ेगा तो भारतीय संस्कृति मजबूत होगी। प्रसिद्ध लेखक वासुदेव शरण अग्रवाल ने स्वाधीनता के बाद अपने एक लेख में कहा था, ‘राष्ट्र संवर्धन का सबसे प्रबल कार्य संस्कृति की साधना है। उसके लिए बुद्धिपूर्वक प्रयत्न करना होगा, हमारे देश की संस्कृति की धारा अति प्राचीन काल से बहती आई है, उसके प्राणवंत तत्त्व को अपनाकर ही हम आगे बढ़ सकते हैं।‘ मंदिरों के सांस्कृतिक केंद्र के रूप में पुनर्स्थापना राष्ट्र संवर्धन का उपक्रम है इसको सिर्फ धार्मिक केंद्र के रूप में देखना गलत है। मंदिरों के प्राचीन वैभव की वापसी के उपक्रम से किसी अन्य मतावलंबियों को कोई खतरा नहीं है।मार्क्सवादी बुद्धिजीवी अपने राजनीतिक आकाओं को प्रसन्न करने के लिए समाज में कई तरह से भ्रम फैलाते हैं। इस भ्रम का परोक्ष लक्ष्य अपनी वैचारिकी से जुड़े राजनीतिक दलोंको फायदा पहुंचाना होता है। आगामी महीनों में कुछ राज्यों में विधानसभा के चुनाव होनेवाले हैं । मार्क्सवादियों को लगता है कि मंदिर के नाम पर वो समाज में ध्रुवीकरण करने में सफल हो जाएंगे और चुनाव में उनको फायदा मिल जाएगा। ऐसी ही परिस्थतियों को ध्यान में रखकर वासुदेव शरण अग्रवाल ने बुद्धिपूर्वक प्रयत्न की सलाह दी थी।


Saturday, December 11, 2021

स्त्री विमर्श का समग्र स्वरूप


इन दिनों हिंदी साहित्य जगत में एक बार फिर से स्त्री विमर्श चर्चा के केंद्र में है। एक लेखिका को उठाने और दूसरे को गिराने के लिए स्त्री विमर्श के विविध रूपों की आड़ ली जा रही है।  रचना से अधिक व्यक्तिगत संबंधों पर बातें हो रही हैं। इसमें युवा लेखिकाएं भी शामिल हैं तो बुजुर्ग लेखिका भी मनोयोगपूर्वक अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने की होड़ में लगी दिखाई दे रही हैं। जो गंभीरता के साथ स्त्री विमर्श को समझती और बरतती हैं वो चुप हैं। राजेन्द्र यादव ने हिंदी साहित्य में जिस तरह के स्त्री विमर्श की नींव रखी थी उसको ही धुरी बनाकर कुछ लेखिकाएं तलवारबाजी करती रहती हैं। किसी का निधन हो तब, कोई विचार गोष्ठी हो तब, कोई समारोह हो तब स्त्री को लेकर उसी तरह का विमर्श किया जाता है जैसा राजेन्द्र यादव करते थे या करने के लिए अपने खेमे की लेखिकाओं को उकसाते रहते थे। राजेन्द्र यादव ने हिंदी साहित्य के स्त्री विमर्श को देह विमर्श के वृत्त में समेट दिया था। उस वृत्त की परिधि को क्रांतिवीर लेखिकाएं अब भी नहीं तोड़ पाई हैं। बल्कि अब तो स्त्री विमर्श के उस वृत्त के अंदर अज्ञान का भी प्रवेश हो गया है। ऐसी राय बनने के पीछे एक दो नहीं कई साहित्यिक गोष्ठियों का अनुभव है। कई लेखिकाएं वामपंथी विचार से अपनी करीबी प्रदर्शित करती रहती हैं। इस प्रदर्शन के चक्कर में वो भारतीय पौराणिक ग्रंथों के हवाले से स्त्रियों की चर्चा करती हैं।इस तरह की चर्चाओं में पौराणिक काल में भारतीय स्त्रियों की स्थिति पर आलोचनात्मक टिप्पणियां करती हैं। जब भी अवसर मिलता है तो गोष्ठियों में ऋगवेद से लेकर रामचरितमानस तक को उद्धृत कर डालती हैं। पौराणिक ग्रंथों से बगैर संदर्भ के एक दो पंक्तियां उठा लेती हैं। उन पंक्तियों के आधार पर उस समय के पूरे भारतीय समाज को स्त्री विरोधी और दकियानूसी साबित कर डालती हैं। 

हाल ही में एक गोष्ठी में एक लेखिका ने बेहद क्रांतिकारी अंदाज में टेबल पर मुक्का मारते हुए ये साबित करने की कोशिश की कि ऋगवेद में स्त्रियों के बारे में आपत्तिजनक बातें हैं। इस सबंध में उन्होंने ऋगवेद के पुरुरवा- उर्वशी संवाद से एक पंक्ति बताई। उसमें उर्वशी कहती है कि ‘स्त्रियों से स्थायी मैत्री होना संभव नहीं है। स्त्रियों का ह्रदय भेड़िए के समान होता है।‘ ये बताते हुए उन्होंने कई बार  मेज पर मुक्का मारा। जब वो बोल रही थीं तो मुझे भारतीय जनता पार्टी के नेता स्वर्गीय अरुण जेटली का राज्यसभा में दिया एक भाषण याद आ रहा था। जेटली ने कहा था, इफ यू हैव द फैक्ट, बैंग द फैक्ट, इफ यू डू नाट हैव द फैक्ट, बैंग द टेबल (अगर आपके पास तथ्य हैं तो तथ्य पर जोर दो और अगर तथ्य नहीं है तो टेबल पीटो)।  ऋगवेद के आधार पर वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति पर बोलनेवाली लेखिका के पास तथ्य नहीं था लिहाजा वो टेबल पर मुक्का मारकर अपने कहे को प्रभावी बनाना चाह रही थीं। दरअसल ये वामपंथियों की पुरानी प्रविधि है कि भारतीयता और सनातन धर्म को बदनाम करो। इसके लिए वो पौराणिक ग्रंथों से संदर्भों के बिना पंक्तियां उद्धृत करके भ्रम का वातावरण बनाते रहे हैं। यही काम तुलसीदास के साथ किया गया, यही काम वेद और पुरणों के अलावा स्मृतियों के साथ भी किया। ऋगवेद में जिस पुरुरवा-उर्वशी संवाद की उपरोक्त बातें कही गई उसका प्रसंग भी जानना समझना होगा। प्रसंग ये है कि जब उर्वशी, पुरुरवा से पीछा छुड़ाना चाहती है तो वो स्वयं ही स्त्रियों के स्वभाव की निंदा करती है। उसको लगता है कि ऐसा करने से उसको लाभ होगा। बगैर इस संदर्भ को समझे और समग्रता में श्रोताओं के सामने रखे क्रांतिकारी लेखिकाएं यहां तक कह देती हैं कि वैदिक काल में स्त्रियों की तुलना भेड़िए से की जाती थी, जो आपत्तिजनक है। इसी तरह स्मरण आता है दिल्ली की एक गोष्ठी में वामपंथी लेखिका ने राम की इस वजह से आलोचना की थी कि उन्होंने सीता को गर्भवती होने के बावजूद घर से निकाल दिया था। जब मैंने उनसे पूछा था कि ऐसा कहां उल्लिखित है तो उन्होंने बहुत ताव के साथ मुझे श्रीरामचरितमानस पढ़ने की सलाह दी थी। उस वक्त उनको बता नहीं पाया था कि श्रीरामचरितमानस श्रीराम के राज्याभिषेक के साथ खत्म हो जाता है। उसमें ये प्रसंग है ही नहीं।     

वेदों को बिना पढ़े, उनको बिना समझे, उनमें वर्णित पंक्तियों को संदर्भ से काट कर किसी निर्णय पर पहुंचनेवालों को ये देखना चाहिए कि वेदों में महिलाओं को कितना उच्च स्थान दिया गया है। ऋगवेद में तो कन्या, पत्नी और माता के रूप में नारी का समाज में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान था। विश्ववारा, घोषा, अपाला, लोपामुद्रा जैसी तेजस्वी नारियों का वर्णन ऋगवेद में मिलता है। ऋगवेद में विवाह योग्य कन्या की तुलना सूर्य के प्रकाश से की गई है, जो कि अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि लड़कियों का कितना सम्मान था । उनको कितने उच्च स्थान पर रखा जाता था। विवाह के बाद जब लड़की ससुराल आती थी तो उसको गृह स्वामिनी का अधिकार दिया जाता था। उसका अधिकार सिर्फ पति पर नहीं बल्कि घर से जुड़ी हर चीज पर होता था। वह सभी धार्मिक कार्यों में पति के साथ बराबरी से भाग लेती थी। उस काल में भी पुरुष का एक विवाह आदर्श माना जाता था और परस्त्री गमन को पाप समझा जाता था। माता का स्थान समाज में बेहद प्रतिष्ठित था। देवताओं की जननी के तौर पर पृथ्वी को रखा गया है और पृथ्वी को माता कहा गया है। पृथ्वी माता की उदारता और सहिष्णुता से जुड़े प्रसंग पौराणिक ग्रंथों में बहुतायत में मिलते हैं। माता रूपी इस प्रतीक को स्त्री विमर्श की क्रांतिकारी झंडाबरदार समझ पाएंगी या समझकर भी न समझने का स्वांग करेंगी यह कहना कठिन है। 

भारतीय समाज में सनातन काल से स्त्रियों का बहुत ही श्रेष्ठ स्थान रहा है और वो पुरुषों के साथ बराबरी का अधिकार रखती थीं। जब हमारे देश पर विदेशी आक्रांताओं का आक्रमण हुआ तो उन्होंने न सिर्फ भारत की भौगोलिक भूमि पर कब्जा जमाया बल्कि संस्कृति और समाज को प्रभावित किया। विदेशी आक्रांताओं के प्रभाव में या उनके भय का असर ये हुआ कि महिलाएं पर्दा करने लगीं, शिक्षा से दूर हो गईं, पुरुषों से बराबरी का अधिकार खत्म सा होने लगा। मुगलों के शासनकाल में भारत की महिलाओं को उनके अधिकार से वंचित किया जाने लगा। अंग्रेजों के काल में भी ये जारी रहा। ऐसे कई उदाहरण हैं कि जब किसी राजघराने में पुरुष वारिस नहीं होता था तो अंग्रेज उस राज पर कब्जा कर लेते थे। भारतीय समाज में महिलाओं को गैरबराबरी का दर्जा आक्रांताओं के काल में ही आरंभ होकर स्थापित होता है। स्त्री विमर्श का झंडा उठानेवाली अधिकतर लेखिकाएं इस बात का न तो उल्लेख करती हैं और न ही इसको रेखांकित करती हैं। आवश्यकता इस बात की है कि स्त्री विमर्श पर जब भी बात हो तो कथित क्रांतिकारिता के साथ साथ अपनी विरासत और परंपराओं पर भी बात हो। उन अधिकारों की भी चर्चा हो जो हमारे देश की नारियों को आक्रांताओं के भारत आगमन के पूर्व मिला हुआ था। अगर ऐसा होता है तो भारतीय स्त्री विमर्श पश्चिम के स्त्री विमर्श से अलग नजर आएगा। देह विमर्श के वृत्त से बाहर निकलकर स्त्रियों के मूल अधिकारों की ओर समाज का ध्यान आकर्षित हो पाएगा। वामपंथी या वामपंथी दिखने की कोशिश में लगी लेखिकाओं को अब सत्य का संधान करना चाहिए ताकि स्त्री विमर्श का एक समग्र रूप समाज के सामने आ पाए।