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Sunday, February 8, 2015

नेमाडे को ज्ञानपीठ सम्मान

भालचंद्र नेमाडे  मराठी साहित्य का एक ऐसा नाम जिसने साठ के दशक में अपनी लेखनी से उसकी धारा बदल दी । जिन्होंने साठ के दशक के बाद चले लघु पत्रिका आंदोलन में सक्रिय भागीदारी से मराठी साहित्य जगत को समकालीनता से जोड़े रखा था और सेठाश्रयी पत्रिका के बरक्श चले इस आंदोलन को मजबूती दी थी । पच्चीस साल की उम्र में भालचंद्र नेमाड़े ने अपना पहला उपन्यास लिखा था और वो भी सिर्फ सोलह दिनों में । 1963 में प्रकाशित उस उपन्यास का नाम कोसला था और उसने भालचंद्र नेमाड़े को रातोरात मशहूर कर दिया था और मराठी में जारी साहित्यक लेखन की जड़ता पर भी प्रहार किया था । दो हजार दस में जब भालचंद्र नेमाडे का उपन्यास हिंदू जगण्याची समृद्ध अडगल छपा तो उसकी भी खासी सराहना हुई थी । ये उनके उपन्यास त्रयी की पहली कड़ी थी और नेमाडे के प्रकाशक के मुताबिक वो दूसरा खंड पूरा कर चुके हैं और उसके संपादन का काम कर रहे हैं । उस वक्त भालचंद्र नेमाड़े ने कहा था कि हिंदू के दो और खंड लिखने के बाद वो उपन्यास लेखन से तौबा कर लेंगे और कविता पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगे । उस उपन्या में नेमाडे ने भारती सभ्यता और संस्कृति को सिंधु घाटी सभ्यता के वक्त से परखा है । नेमाडे भले ही मराठी में लिखते हों लेकिन उनकी लोकप्रियता ने भाषा की सारी सरहदें तोड़ दी हैं । उनके पहले उपन्यास कोसला का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है । इन्हीं भालचंद्र नेमाड़े को भारत का सर्वोच्च साहित्य सम्मान ज्ञानपीठ सम्मान देने का एलान किया है । ज्ञानपीठ सम्मान का यह पचासवां साल है । हिंदी के सबसे बड़े लेखक नामवर सिंह की अध्यक्षता में दस सदस्यीय समिति ने भालचंद्र नेमाड़े को सम्मानित करने का फैसला किया और अपने वक्तव्य में कहा कि भालचन्द्र नेमाडे मराठी साहित्य में सर्वस्पर्शी तथा सर्वप्रतिष्ठित नाम है। उपन्यास, कविता एवम्ïआलोचना में उनकी विरल ख्याति है। श्री नेमाड़े मराठी आलोचना में 'देसीवाद’ के प्रवर्तक हैं। 1963 में प्रकाशित 'कोसला’ उपन्यास ने मराठी उपन्यास लेखन में दिशा प्रवर्तन का काम किया। इस उपन्यास ने मराठी गद्य लेखन को पिछली आधी शताब्दी में लगातार चेतना और फॉर्म के स्तर पर उद्वेलित किया। उनके अन्य उपन्यास 'हिंदू’ में सभ्यता विमर्श उपस्थित है। यह कृति काल की आवधारणा की वैज्ञानिक दृष्टि से भाष्य करती है। ग्रामीण से आधुनिक परिसर तक की सामाजिक विसंगतियों को गहराई से अभिव्यक्त करने वाले श्री नेमाड़े मराठी साहित्य की तीन पीढिय़ों के सर्वप्रिय लेखक हैं।
पचासवें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित होने वाले भालचंद्र नेमाडे ने कोसला के बाद बिढाल, हूर, जरीला और झूल लिखकर पर्याप्त ख्याति अर्जित की थी । उपन्सकार के साथ साथ कवि और आलोचक भी हैं । नेमाडे ने मेलड़ी और देखणी कविता के जरिए भी अपार लोकप्रियता हासिल की थी । बहुमुखी प्रतिभा के धनी नेमाडे ने साहित्य की लगभग हर विधा में लेखन किया । उपन्यास और कविता के अलावा उन्होंने आलोचना के क्षेत्र में सार्थक हस्तक्षेप किया । आलोचना की उनकी कई किताबें प्रकाशित हैं जिनमें टीकास्वयंवर, साहित्याची भाषा प्रमुख हैं । 1999 में टीकास्वयंवर पर उन्हें प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिल चुका है । नेमाडे को पद्मश्री से भी सम्नानित किया जा चुका है । 27 मई उन्नीस सौ अड़तीस में खानदेश के एक गांव में पैदा हुए भालचंद्र नेमाडे ने पुणे के मशहूर फर्गुयसन कॉलेज से ग्रेजुएट और मुंबई विश्वविद्लाय से एम किया । पीएचडी और डी लिट करने के बाद भालचंद्र नेमाडे ने अहमदनगर, धुले और औरगंबाद युनिवर्सिटी में मराठी साहित्य पढ़ाने का काम किया । उसके बाद वो लंदन के मशहूर स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंज अफ्रीकन स्टडीज मे पढ़ाने चले गए । कालांतर में उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय के गुरुदेव टैगोर तुलनात्मक साहित्य चेयर की अध्यक्षता भी की और वहीं से रिटायर हुए । भालचंद्र नेमाडे के बारे में उनके प्रकाशक ने बेहतरीन टिप्पणी की है । उसके मुताबिक नेमाडे लोकप्रिय साहित्य नहीं लिखते लेकिन फिर भी उनका साहित्य बेहद लोकप्रिय है । किसी भी लेखक के लिए यह टिपप्णी किसी पुरस्कार से कम नहीं है । ज्ञानपीठ से सम्नानित होने पर नेमाडे को बधाई 

Saturday, February 7, 2015

कहानी पर अश्लीलता के आरोप


जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में स्त्री शक्ति के सत्र में बहुत गर्मागर्मी रही थी । हिंदी की तीन कथाकार उसमें हिस्सा ले रही थी और संचालन कर रहे थे जनसत्ता के संपादक ओम थानवी । कहानी पर बात होते होते इस चर्चा में हिस्सा लेते हुए कथा लेखिका मृदुला बिहारी ने कहा कि इन दिनों स्त्री विमर्श के नाम पर देह विमर्श हो रहा है और कुछ नई लेखिकाएं अपनी रचनाओं में देह का वर्णन करती हैं जो कि काफी अश्लील होता है । स्त्री के नाम पर देह विमर्श की बात बहुत पुरानी है । राजेन्द्र यादव ने जब हंस पत्रिका के माध्यम से स्त्री विमर्श को उठाया था तब भी उनके उपर और पूरे विमर्श के उपर देह विमर्श का आरोप लगता था । कालांतर में कई बार राजेन्द्र यादव को इस तर्क की बिनाह पर घेरने की कोशिश भी की गई । लेकिन मृदुला बिहारी ने देह विमर्श से आगे जाकर नई पीढ़ी की कहानी पर अश्लील होने का आरोप जड़ा । जाहिर है वहां मौजूद युवा दर्शकों को उनका यह कहना नहीं भाया और उन्होंने विरोध दर्ज करवाया । वहां मौजूद कहानीकार गीताश्री ने मृदुला बिहारी को कठघरे में खड़ा करते हुए उनसे अश्लील लेखन करनेवाली लेखिकाओं के नाम पूछे लेकिन बवाल बढ़ता देख संचालक महोदय ने बहस को अन्य दिशा में मोड़ दिया । दरअसल मृदुला बिहारी ने जो कहा या जो आरोप नई पीढ़ी के लेखकों पर लगाया वह और भी कई लोग लगा चुके हैं । अब वक्त आ गया है कि हिंदी साहित्य में अश्लीलता को परिभाषित किया जाना चाहिए । दरअसल सेक्सुअल और सेंसुअल के बीच में हिंदी के लोग फर्क नहीं कर पाते हैं । आजतक कालिदास पर अपनी कृतियों में अश्लील होने का आरोप नहीं लगा और ना ही विद्यापति पर । दोनों ने अपनी रचनाओं में स्त्री पुरुष संबंधों को उठाया है । हिंदी के आलोचक या कुछ लेखक रचनाओं में शुद्धतावाद की पैरवी करते नजर आते हैं । उन्हें लगता है कि स्त्री पुरुष के संबंधों के वर्णन की एक सीमा होनी चाहिए । जो भी उस लक्ष्मण रेखा के करीब जाता है उसपर अश्लीलता का आरोप लगने लगता है । इसी तरह के शुद्धतावादियों ने मंटो की कहानियों पर भी अश्लीलता के आरोप लगाए थे । दरअसल कहानी में वर्णित चरित्रों के चित्रण और उसके बात व्यवहार को लेकर आपत्ति जताई जताई जाती है । इन आपत्तियों को सुनने और कहानी के अश्लील औप बुरे होने के कोलाहल में मुझे 1961 में मोहन राकेश की एक और जिंदगी की भूमिका में लिखे शब्द याद आ रहे हैं ष मोहन राकेश ने लिखा था कहानी की अच्छाई और बुराई का संबंध इस बात से कदापि नहीं है कि जिन चरित्रों को कहानी में चित्रित किया गया है वे भले हैं या बुरे अपना सरपत काटकर किसी को दे आते हैं या नहीं । यदि चरित्र की उद्दात्तता ही कहानी की कसौटी है तो गुंडों, जुआरियों , वेश्याओं और घूसखोर अफसरों को लेकर लिखी गई संसार की कहानियां रद्दी हैं । चरित्र की श्रेष्ठता ही,कहानी की श्रेष्ठता है तो संसार की सर्वश्रेष्ठ कहानियां आज से हजार साल पहले लिखी जा चुकी है । मोहन राकेश जो बात साठ के दशक में कह रहे थे वो अब भी मौजूं हैं । कहानियों पर अश्लीलता का आरोप लगानेवालों को इस पर विचार तो करना ही चाहिए कि जब वो नई दृष्टि नई चेतना आदि की बात करते हैं तो उसमें अश्लीलता की बात ना जोड़ें । दरअसल अगर हम विचार करते हैं तो यह पाते हैं कि यह नए कथाकारों और पुराने कथाकारों की सोच और पीढ़ियों में अंतर की वजह से ऐसे आरोप लगते हैं । आज से बीस साल पहले का समाज और आज के समाज में बहुत फर्क है । पहले कहानियों में सहजीवन जैसा विषय विरले ही देखने को मिलते थे लेकिन अब कथाकार बहुत बोल्ड होकर इस तरह के विषयों को अपनी कहानी में उठाते हैं । इससे पुरानी पीढ़ी के लेखकों के मन को ठेस पहुंचती है । अश्लीलता का आरोप तो मृदुला गर्ग के उपन्यास कठगुलाब और मैत्रेयी पुष्पा के दो तीन उपन्यासों पर भी लगा था । इन दोनों लेखिकाओं ने अपनी कलम से स्थापित मान्यताओं की धज्जियां उड़ा दी थी लिहाजा यथास्थितिवादियों के पेट में उस वक्त भी दर्द हुआ था और अब भी हो रहा है । आज की जो पीढ़ी है वह अपने मनोभावों और भावभूमि के आधार पर रचनाएं लिखती हैं । उनकी भाषा उत्तर आधुनिक से भी आगे की भाषा है । अश्लीलता का आरोप दरअसल कुंठा और अज्ञानता की उपज है ।  
आज की कहानी को लेकर जो चिंता है वो यह है कि कहानी की कई फैक्ट्रियां खुल गई हैं । इन दिनों हिंदी साहित्य में कहानियां भी बहुतायत में लिखी जा रही हैं । मांग के आधार पर कहानियां लिखने का चलन काफी भढ़ा है । जिस तरह से लेख लिखे जाते हैं उसी तरह से इन दिनों कहानियां भी लिखी जा रही हैं । कहानीकारों पर शब्द संख्या में कहानी लिखने का दबाव बढ़ा है । पत्र-पत्रिकाओं की अपनी सीमाएं होती हैं और उनके पाठक लंबी कहानियां पढ़ना नहीं चाहते हैं लिहाजा वहां से छोटी कहानियों की मांग होती है । हजार डेढ हजार शब्दों की कहानी । इसका नुकसान यह हो रहा है कि नई पीढ़ी के कथाकार छोटी कहानियां लिख रहे हैं जो कि विस्तार से स्थितियों और परिस्थितियों के चित्रण में नाकाम हो जा रही हैं । पात्रों के मनोभावों को उभारने का ना तो वक्त है और ना ही जगह । परिस्थिति के विशाल फलक से सिमटती हुई कहानी घटना प्रधान होती जा रही है । कहीं कहीं तो कहानी और घटनाओं के विवरण का भेद भी मिट जा रहा है । कहानी से कहानीपन ही गायब होता जा रहा है । यह अकारण नहीं है कि हिंदी के कथा प्रदेश में कई कथाकार फॉर्मूलाबद्ध कहानियां लिखकर ख्यात होने की बेचैनी से विचरण कर रहे हैं । इस वक्त हिंदी में कहानीकारों की पांच पीढ़ियां मौजूद हैं । कृष्णा सोबती और शेखर जोशी सबसे वरिष्ठ पीढ़ी के कथाकार हैं । उसके बाद रवीन्द्र कालिया और दूधनाथ सिंह की पीढ़ी, फिर उदय प्रकाश, शिवमूर्ति की पीढ़ी, उसके बाद अखिलेश से लेकर संजय कुंदन की पीढ़ी और इस वक्त युवा लेखकों की पीढ़ी जिसमें गीताश्री, मनीषा कुलश्रेष्ठ से लेकर बिल्कुल नई कथाकार इंदिरा दांगी और सोनाली सिंह कहानी लिख रही हैं । नई कहानी के दौर में हरिशंकर परसाईं ने कभी कहा था कि जीवन के अंश को अंकित करनेवाली हर गद्य रचना, जिसमें कथा का तत्व हो, आज कहानी कहलाती है ।  कालांतर में यह और भी विकसित हुआ लेकिन कहानी से कथा तत्व का लगातार ह्रास होते रहा । नये विषयों और नई भाव-भूमि और नए यथार्थ की आड़ में कहानी का रूप बदला लेकिन यह रूप हर जगह एक सा ही लगने लगा । कहानी के इस एकरूपता ने कहानी से किस्सागोई गायब कर दी । घटना प्रधान और विवरणों से भरपूर कहानियां थोक के भाव से लिखी जाने लगीं । आज हम कहानी के परिदृश्य पर नजर डालते हैं तो ज्ञानरंजन की घंटा, रवीन्द्र कालिया की काला रजिस्टर, दूधनाथ सिंह की रक्तपात, अमरकांत की हत्यारे, शेखर जोशी की कहानी कोशी का घटवार, शिवमूर्ति का तिरिया चरित्तर, सृंजय का कामरेड का कोट के अलावा उदय प्रकाश की कहानियों याद आती हैं । इन कहानियों के बरक्श आज की कहानियों को रखकर देखने पर स्थिति उत्साहजनक नहीं दिखाई देती है । कविता की तरह अब कहानी भी थोक के भाव से लिखी जाने लगी है । प्रसिद्धि की भागदौड़ में कहानी पीछे छूट रही है । वजह की तलाश होनी चाहिए ।
कहानीकारों से नए की मांग भी उनको कुछ भी उलजलूल करने को बाध्य कर देता है । मोहन राकेश ने अपने उसी लेख में कहा था कि कहानी की नवीनता का संबंध अगर वस्तु और चरित्र की नवीनता के साथ जो़ दिया जाए तो संसार में जितनी कहानियां लिखी जा रही हैं उनमें से एक भी नयी कहानी ढूंढ लेना कठिन काम होगा । उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि कहानी की सार्थकता इस बात में नहीं है कि वह किस नये अजायबघर से कौन सा अजूबा लाकर हमारे सामने पेश करती है । तो कहानी का जो दूसरा नुकसान हो रहा है वह है नए विषय की मांग और उसका दुराग्रह । होना यह चाहिए कि आज की कहानी पर उसके हल्के होते चले जाने और बिल्कुल सपाट तरीके से कह देने पर विमर्श होना चाहिए । उसपर सवाल खड़े करने चाहिए जबकि हो यह रहा है कि कहानी या कहानीकार पर अश्लीलता का आरोप चस्पां कर उसको खारिज किया जा रहा है । मूल चिंता यह है ही नहीं । मूल चिंता तो है कहानियों के पाछक का कम होना ।कहानियों से मानवीय पक्ष और हमारे जीवन की बिडंबनाओं के संकेत का खत्म होना । उसका सपाट होना । कहानीकारों के अनुभूतियों का विस्तार हुआ है लेकिन उन अनुभूतियों को जल्दबाजी में पिरोने से हल्का होने का खतरा बढ़ा है । अब भी वक्त है हिंदी कहानी के संभलने का नहीं तो उसे कविता की गति प्राप्त होते देर नहीं लगेगी ।

Monday, February 2, 2015

अवसर के इंतजार में कांग्रेस

हाल ही में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के बाद इस तरह की खबर आई कि राहुल गांधी ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और मंत्रियों को कांग्रेस की हार के लिए जिम्मेदार ठहराया । उन्होंने वरिष्ठ नेताओं पर कार्यकर्ताओं को हतोत्साहित करने का भी आरोप लगाया । लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद राहुल गांधी की ये खरी खरी पार्टी के बुजुर्ग नेताओं के लिए खतरे की घंटी हो सकती है । इस वक्त कांग्रेस जिस तरह के संक्रमण के दौर से गुजर रही है उसमें पार्टी को इस तरह के कड़वे घूंट की नहीं बल्कि शल्य चिकित्सा की आवश्यकता है । कांग्रेस सवा सौ साल से ज्यादा पुरानी पार्टी है और कई बार इस तरह के संक्रमण काल से गुजरी है । उन्नीस सौ इकहत्तर में दुर्गा के रूप में उभरी इंदिरा गांधी को चार साल के अंदर देश में इमरजेंसी लगानी पड़ी थी । सतहत्तर में जो कुछ हुआ वह इतिहास है । दरअसल सत्तर के दशक के बाद कांग्रेस से लोगों का मोहभंग होता रहा है और वो कई बार विपक्ष को जिताते रहे हैं लेकिन विपक्ष की नाकामी से हर बार कांग्रेस को फिर मौका मिलता रहा है । अस्सी के चुनाव में मोरारजी देसाई और जनता पार्टी में सर फुटव्वल की वजह से देश के मतदाताओंने इमरजेंसी की ज्यादातियों को भुलाते हुए इंदिरा गांधी को गद्दी सौंप दी । चौरासी में तो इंदिरा गांधी की हत्या की वजह से कांग्रेस को इतनी सीटें मिली कि वो इतिहास हैं । फिर अगर देखें तो नवासी के चुनाव में जनता ने कांग्रेस से उबकर वी पी सिंह के हाथ में देश की कमान सौंपी लेकिन विश्वनाथ प्रताप सिंह के मंत्रियों की महात्वाकांक्षा उसको ले डूबी । चंद्रशेखर देश के प्रधानमंत्री बने । उन्नीस सौ इक्यानवे में कांग्रेस फिर बाय डिफाल्ट केंद्र में सरकार बनाने में कामयाब हो गई । राजीव गांधी की हत्या की सहानुभूति लहर के बावजूद कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला लेकिन नरसिंहाराव ने पांच साल तक अल्पमत की सरकार चलाई । इसके बाद तो जैसे सरकारों का आना जाना लगा ही रहा । देश ने कई प्रधानमंत्री देखे । फिर उन्नीस सौ निन्यानवे में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पच्चीस से ज्यादा दलों के गठबंधन एनडीए की सरकार बनी । जब दो हजार चार में शाइनिंग इंडिया से देश प्रकाशमान हो रहा था तो जनता कुछ और ही तय कर चुकी थी । दो हजार चार के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार बनी तो दस साल तक उसने शासन किया। दस सालों के शासन से उब चुकी जनता को नरेन्द्र मोदी में एक नायक दिखा और उसने इस बार पूर्ण बहुमत के साथ उनको राज पाट सौंप दिया। कांग्रेस को इतनी कम सीटें मिली कि उसे लोकसभा में नेता विपक्ष का दर्जा भी नहीं मिल सका ।
यह बताने का मकसद सिर्फ इतना था कि पिछले तीन चार दशकों में कांग्रेस को संगठन मजबूत करके या फिर करिश्माई नेतृत्व की अगुवाई के आधार पर जनादेश नहीं मिला । इस पार्टी को बाय डिफाल्ट ही जनादेश मिलता रहा । इस बार की स्थितियां थोड़ी अलग हैं । इस बार विपक्ष के नाम पर कांग्रेस उतनी मजबूत नहीं दिखती है । जनता परिवार के एकजुट होने की संभावनाएं अभी परवान नहीं चढ़ पाई हैं । कांग्रेस के लिए यह गंभीर चुनौती का समय है । लोकसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी की तरफ से संगठन को मजबूत करने का कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका है । सवाल यही है कि क्या कांग्रेस इस बार भी सोच रही है कि जनता बाय डिफाल्ट उसको सत्ता सौंप देगी । कांग्रेस को यह मंथन तो करना ही चाहिए कि क्यों जनता ने उसको इस तरह से हाशिए पर धकेल दिया । कांग्रेस को यह भी सोचना होगा कि जब वरिष्ठ नेताओं की तरफ से कांग्रेस को मजबूत करने की पहल शुरू होती है तो अचानक से राहुल गांधी को कांग्रेस की कमान सौंपने की बात क्यों शुरू हो जाती है । लोकसभा चुनाव के बाद यह तीन बार हो चुका है । कांग्रेस को अपने उन नेताओं की पहचान करके उनको उनकी सही जगह दिखानी होगी जो कि पार्टी में पीढ़ियों की टकराहट पैदा करके अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं । यह पार्टी के हित में भी होगा और लोकतंत्र के भी क्योंकि लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष का होना आवश्यक है ।

Sunday, February 1, 2015

साहित्य को समेटता विशेषांक

हिंदी समेत कई भारतीय भाषाओं में साहित्य विशेषांक निकालने की परंपरा रही है । कोलकाता से उत्सव के मौके पर जनसत्ता का साहित्य विशेषांक, नागपुर से प्रकाशित लोकमत का साहित्य विशेषांक के अलावा कई साहित्यक पत्रिकाओं के विशेषांक निकलते रहे हैं । किसी जमाने में इंडिया टुडे सालाना साहित्य विशेषांक निकालता था बाद में हिंदी के वरिष्ठ कवि विष्णु नागर शुक्रवार साप्ताहिक के संपादक बने तो उन्होंने भी साहित्य विशेषांक निकाले थे, लेकिन जनसत्ता और लोकमत को छोड़कर लगभग सभी साहित्य विशेषांकों का प्रकाशन स्थगित हो चुका है । भारतीय ज्ञानपीठ की प्रतिष्ठित पत्रिका नया ज्ञानोदय भी कई साहित्य विशेषांक निकाल चुका है । नया ज्ञानोदय की कमान संभालने के बाद हिंदी के वरिष्ठ कवि लेखक लीलाधर मंडलोई के संपादन में नया ज्ञानोदय की साहित्य वार्षिकी 2015 हाल ही में बाजार में आया है । करीबन तीन सौ पृष्ठों के इस विशेषांक में निराला से लेकर सविता भार्गव तक की रचनाएं प्रकाशित हैं । इस विशेषांक को उन्नीस हिस्सों में विभक्त किया गया है। अगर कविता के तीन खंडों को एक मान लें तो सत्रह होते हैं । पुऱखों के कोठार से खंड में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, से लेकर रायकृष्ण दालस, रामविलास शर्मा और हरिशंकर परसाईं । संपादक लीलाधर मंडलोई का मानना है कि ये लेखक हमारे इतिहास के कलंदर हैं । इनका अपना संघर्ष था। वीतराग था इनका । संपादक ने पाठकों को भरोसा दिया है कि नया ज्ञानोदय की पुरखों की कोठार से रचनाएं निकालकर नए पाठकों के सामने प्रस्तुत करने की पहल जारी रहेगी । लेखक मनोज मोहन ने बेहद ही गंभीर मसले पर विचारोत्तेजक बहस आयोजित की है । इस परिचर्चा का विषय है उदारवाद में साहित्य संस्कृति का वर्तमान और सहभागी हैं अशोक वाजपेयी, कृष्ण कुमार, प्रेमपाल शर्मा, विष्णु नागर, मनीषा कुलश्रेष्ठ और चित्रकार अशोक भौमिक । उदारवाद के साहित्य और संस्कृति पर पड़नेवाले असर को लेकर तमाम लेखक और बुद्धिजीवी चिंतित नजर आते हैं लेकिन अशोक वाजपेयी बेहद साफगोई से कहते हैं वैचारिक आंदोलन के न होने का अर्थ विचार का न होना नहीं है । वाजपेयी के मुताबिक- यह सांस्कृतिक शून्यता ह पर बाहर से किन्हीं शक्तियों ने नहीं लाद दी है । हमने स्वयं उसकी रचना में उसकी भूमिका निभाई है । उससे उबरना तब शुरू होगा जब हम आत्माभियोग के भाव से अपनी हिस्सेदारी स्वीकार करें । ऐसे स्वीकार से नया प्रतिरोघ, नए रूपाकार उभर सकते हैं । लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ का मानना है कि नवउदारतावाद के पीछे विचारहीन पीढ़ी की पीढ़ी छद्मज्ञान का मुखौटा ओढ़े खड़ी है । ऐसी ही कई दिलचस्प टिप्पणियां इस परिचर्चा में हैं जो पाठकों को एक नए दिशा की तरफ सोचने को मजबूर कर सकती है ।   

इस अंक में वरिष्ठ पत्रकार दिनकर कुमार ने असमिया के मशहूर गायक और संगीतकार भूपेन हजारिका की संक्षिप्त जीवनी लिखी है । यह हिंदी पाठकों को भूपने की जिंदगी से रूबरू करवाता है । इस विशेषांक में एक औपर नई पहल, कह सकते हैं, शुरू हुई है- हिंदी की अलग अलग विधाओं की किताबों के लेखक पाठक सर्वेक्षण प्रकाशित हैं । उपन्यासों में काशीनाथ सिंह के उपसंहार, ज्ञान चतुर्वेदी हम न मरब और भगवानदास मोरवाल के नरक मसीहा को क्रमश:  पहला दूसरा और तीसरा स्थान मिला है । इसी तरह केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी और लीलाधर जगूड़ी के संग्रह को कविता की सूची में स्थान मिला है । अगर यह परंपरा कायम रह सकती है तो हिंदी में बेस्ट सेलर की तरह की एक अवधारणा का विकास हो सकेगा । कुल मिलाकर अगर हम देखें तो नया ज्ञानोदय के इस साहित्य वार्षिकी में पाठकों के लिए ढेर सारी पठनीय और सहेजने योग्य सामग्री है । इस आयोजन के संपादक मंडलोई साधुवाद के पात्र हैं ।  

Wednesday, January 28, 2015

मुरुगन के साथ कौन ?

चंद दिनों पहले मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजय किशन कौल ने एक बेहद अहम टिप्पणी की । एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस कौल ने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं यानि अदालतों के अलावा किसी और संस्था के पास यह अधिकार नहीं है कि वो ये फैसला दे कि क्या सही है और क्या गलत है । दरअसल जस्टिस कौल लेखक मुरुगन के उपन्यास पर इलाके की पीस कमेटी के फैसले पर दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहे थे । इस याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्होंने एक और तल्ख टिप्पणी की कि प्रशासन को भी यह अधिकार नहीं है कि वो किसी लेखक को यह बताए कि वो क्या लिखे या उसका लिखा हुआ सही है या गलत ।  तमिलनाडू के लेखक पेरुमल मुरुगन के उपन्यास मथुर बागान जिलसका अंग्रेजी अनुवाद वन पार्ट वूमेन के नाम से छपा था । उस उपन्यास को लेकर कई दक्षिणपंथी संगठनों ने खासा बवाल मचाया । विरोध प्रदर्शन हुए । तमिलनाडू के नामक्कल जिले में जब विरोध काफी बढ़ गया और हिंसा की आशंका बढ़ने लगी तो जिला प्रशासन ने एक शांति समिति बनाई और उसकी बैठक में यह फैसला लिया गया कि मुरुगन बाजार से इस उपन्यास की सभी प्रतियां वापस ले लेंगे । उनसे एक लिखित अंडरटेकिंग लिया गया जिसमें बिना शर्त माफी की भी बात थी । इस अंडरटेकिंग में यह बात भी लिखवाई गई कि मरुगन अपने उपन्यास से सभी विवादित अंश हटाएंगे और भविष्य में कोई भी विवादास्पद चीज नहीं लिखेंगे । यह एक बेहद आपत्तिजनक कदम था जो कि नामक्कल जिला प्रशासन ने उठाया । विरोध प्रदर्शन रोकने की अपनी नाकामी को छुपाने के लिए जिला प्रशासन ने लेखक को पहले तो दबाव में लिया और फिर उनसे भविष्य में इस तरह के लेखन नहीं करने का लिखित में आश्वासन लिया । यह जिला प्रशासन का एक ऐसा कदम था जो कि लेखकीय अभिव्यक्ति पर हमला ही नहीं है बल्कि एक तरह की सेंसरशिप है । जिला प्रशासन की अगुवाई में हुई इस शांति् समिति के फैसले के खिलाफ कुछ संगठन अदालत पहुंचे हैं । अदालत ने कहा है कि यह मामला एक व्यक्ति विशेष का नहीं है बल्कि यह संविधान में प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ा मामला है । अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि जिस किसी को भी किसी किताब पर या उसके अंश पर आपत्ति हो वह अदालत की शरण में जाए क्योंकि अदालत के अलावा कोई भी व्यक्ति या संस्था यह फैसला नहीं कर सकती है कि क्या सही है और क्या गलत है
दरअसल इस पूरे मामले को जिस तरह से जिला प्रशासन ने निबटाया है वह घोर आपत्तिजनक है । लेखक मुरुगन को जिलाधिकारी के कार्यालय में भारी सुरक्षाबल के बीच ले जाकर बार बार बयान बदलने को मजबूर किया गया वह उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला है । जिला प्रशासन ने संविधान को दरकिनार कर लेखक पर दबाव बनाया और उनके वकील को यहां तक कह डाला कि यह कानून व्यवस्था का मामला है और इसको उसी तरह से देखा जाएगा । दरअसल जिला प्रशासन के इस रवैये पर पूरे देश के लेखक समुदाय को खड़ा होना चाहिए और इस प्रवृत्ति का पुरजोर विरोध किया जाना चाहिए । जिस तरह से एक लेखक को दबाव डालकर उसको लिखने से रोका जा रहा है उसपर कलम के तमाम सिपाहियों को विरोध जताना चाहिए । लेखक समुदाय से यह अपेक्षा की जाती है कि वो साथी लेखकों के पक्ष में खड़ा हो और वृहत्तर सवालों पर अपनी आस्था और राजनीतिक झुकाव को दरकिनार कर विरोध में खड़ा हो जाए । लेखक चाहे किसी वाद या विचारधारा का हो अगर उसके पास लेखकीय स्वतंत्रता ही नहीं बचेगी तो फिर वाद और विचारधारा की माला गले में लटकाए घूमते रहने से कोई फायदा नहीं है ।

Monday, January 19, 2015

सजने लगा साहित्य का ‘मीनाबाजार’

जयपुर के दिग्गी पैसेल होटल परिसर में इक्कीस से पच्चीस जनवरी तक चलनेवाले जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की तैयारी लगभग पूरी हो चुकी है । आठ सालों से आयोजित इस सालाना लिटरेचर फेस्टिवल में इस बार साहित्य के अलावा भी कई अन्य विषयों पर मंथन के लिए अपने अपने क्षेत्र के दिग्गज जुटेंगे । साहित्य के सवालों से टकराने के लिए बना विमर्श का यह मंच अब उससे बहुत आगे निकल चुका है । अब इस लिटरेटर फेस्टिवल के दैरान दिग्गी पैलेस परिसर में एक पूरा मीना बाजार सजता है । राजस्थानी कपड़ों से लेकर हस्तशिल्प तक और सोने के गहनों से लेकर जूतियों तक की दुकानें वहां लगाई जाती हैं । आयोजकों ने इस साहित्यक महफिल को पूरी तरह से मीना बाजार के माहौल के हिसाब से बना दिया है । इस बार तो यह मीना बाजार और भी ग्लैमरस होने जा रहा है । इस बार इस साहित्यक महोत्सव के केंद्र में फिल्म और फिल्म लेखन है । जावेद अख्तर और शाबाना आजमी के अलावा गीतकार प्रसून जोशी और फिल्म पर गंभीर लेखन करनेवाले यतीन्द्र मिश्र फिल्मों पर बात करेंगे । फिल्म समीक्षक अनुपमा चोपड़ा की किताब- द फ्रंट रो, कनवरसेशंस ऑन सिनेमा को मशहूर फिल्म अभिनेत्री सोनम कपूर जारी करेंगी । इसके अलावा जावेद अख्तर के नए कविता संग्रह का भी विमोचन किया जाएगा ।   आयोजक इस बात के लिए खुश होते हैं और सही दावा भी करते हैं कि ये विश्व का सबसे बड़ा लिटरेचर फेस्टिवल है जहां लोगों का प्रवेश मुफ्त है ।  जयपुर के इस साहित्योत्सव में अब विमर्श कम भीड़ ज्यादा होती है । सात साल पहले जब उस महोत्सव की शुरुआत हुई थी तो दिग्गी पैलेस के फ्रंट लॉन में सिर्फ साहित्य के गंभीर श्रोता और साहित्यप्रेमी ही मौजूद होते थे । अब तो हालात यह है कि स्कूली बच्चों को बसों में भर भर कर मेला घुमाने के लिए लाया जाता है । आयोजकों ने भी इस साहित्यक मेले को लोकप्रिय बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ीहै । हर बार मशहूर लेखकों के अलावा तीन चार फिल्म कलाकार यहां आते ही हैं । इस बार सोनम कपूर, वहीदा रहमान, जावेद अख्तर , शबाना आजमी समेत कई सितारे यहां चमकने के लिए तैयार हैं । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को मशहूर करने में विवादों की भी बड़ी भूमिका है । चाहे वो समाजशास्त्री आशीष नंदी के पिछड़ों पर दिए गए बयान और आशुतोष के प्रतिवाद का विवाद हो  या फिर सलमान रश्दी के जयपुर आने को लेकर मचा घमासान हो । सलमान रश्दी के आने का वक्त उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के पहले का वक्त था लिहाजा सियासी दलों ने भी उसको भुनाने की कोशिश की थी । मामला इतना तूल पकड़ गया था कि सलमान रश्दी का भारत दौरा रद्द करना पड़ा था । उस विवाद की छाया लंबे समय तक जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को प्रसिद्धि दिलाती रही । पिछले साल अमेरिकी उपन्यासकार जोनाथन फ्रेंजन ने यह कहकर आयोजकों को झटका दिया था कि - जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल जैसी जगहें सच्चे लेखकों के लिए खतरनाक है, वे ऐसी जगहों से बीमार और लाचार होकर घर लौटते हैं । साहित्य  के साथ साथ वहां बहुधा राजनीतिक टिप्पणियां भी हो जाती हैं । पिछले साल नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अमर्त्य सेन ने आम आदमी पार्टी के उभार को भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती के तौर पर पेश किया । वहीं अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के नेत्रहीन लेखक वेद मेहता ने मोदी पर निशाना साधते हुए कहा था कि उनका पीएम बनना देश के लिए घातक हो सकता है । साहित्य से व्यावसायिकता की राह पर चल पड़े जयपुर साहित्य महोत्सव को तमाम लटके झटकों के बावजूद इस बात का श्रेय तो दिया ही जाना चाहिए कि इसने पूरे देश में साहित्यक उत्सवों की एक संस्कृति विकसित की है । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की देखादेखी आज देशभर में कई लिटरेचर फेस्टिवल आयोजित होने लगे हैं । इससे देश में एक साहित्यक माहौल बनने में मदद तो मिल ही रही है 


Sunday, January 18, 2015

ड्रामेटिक जीवन, ड्रामेटिक विरोध

स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की सोनिया गांधी की फिक्शनलाइज्ड जीवनी कई सालों के अघोषित प्रतिबंध के बाद अब प्रकाशित हुई है । द रेड साड़ी के नाम की इस किताब के प्रकाशन को लेकर कांग्रेस ने खूब हो हल्ला मचाया था । लेखक जेवियर मोरो को कानूनी धमकियां दी गई थी । कांग्रेस उस वक्त सत्ता में थी लिहाजा सोनिया गांधी की इस किताब को हमारे यहां प्रकाशित नहीं होने दिया गया । लगभग चार साल बाद अब स्थितियां बदल गई हैं । कांग्रेस सत्ता से बाहर है और जेवियर मोरो की किताब रेड साड़ी को लेकर बवाल मचानेवाले कांग्रेस के नेता भी कमजोर हुए हैं । सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस के नेता क्यों विरोध कर रहे थे । सवाल यह है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हो हल्ला मचानेवाली ब्रिगेड उस वक्त कहां थी । तमिल लेखक मुरुगन की किताब पर विरोध करनेवाले, वेंडी डोनिगर की किताब के प्रकाशक का उसको वापस लेने का फैसला करने पर छाती कूटनेवाले लोग उस वक्त कहां थे जब जेवियर मोरी की किताब को डरा धमका कर प्रकाशित होने से रोका गया था । सत्ता की हनक में तब भी अभिव्यक्ति की आजादी पर पाबंदी लगी थी । लेकिन विरोध का स्वर उतना तीव्र नहीं था जितने की अपेक्षा की जाती है । अभिव्यक्ति की आजादी की पक्षपातपूर्ण विरोध की यह घटना मिसाल है । अभी हाल में लेखक जेवियर मोरे ने माना है कि कांग्रेस पार्टी ने उसके किताब के खिलाफ एक अभियान चलाकर उसका प्रकाशन रोका गया था । उनके मुताबिक उस वक्त तो वो छह महीने तक अपने ईमेल अकाऊंट को खोलने से भी घबराते थे कि कहीं कोई कानूनी नोटिस तो नहीं आ रहा है । दो हजार दस में जेवियर मोरो इसको अंग्रेजी में प्रकाशित कर भारतीय बाजार के अलावा अन्य यूरोपीय देशों और अमेरिका के बाजार में सोनिया गांधी के नाम को भुनाना चाहते थे । जेवियर मोरो की यह किताब अक्तूबर दो हजार आठ में स्पेनिश में छपी और बाद में इसका अनुवाद इटैलियन, फ्रैंच और डच में किया गया । भारत में उठे विवाद के पहले के अनुमान के मुताबिक इसकी तीन लाख प्रतिया बिक चुकी थी । 
 दरअसल स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की ये किताब कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी के जीवन पर आधारित है लेखक मोरो का दावा है कि यह पूरी किताब सोनिया के बचपन से लेकर उनकी राजीव गांधी से मुलाकात और शादी से लेकर सास इंदिरा गांधी के साथ बिताए दिनों के अलावा राजीव गांधी की हत्या का बाद सोनिया की मानसिकता का चित्रण करती है दरअसल मोरो की इस किताब से इस बात के संकेत मिलते हैं कि सोनिया गांधी अपने पति की हत्या के बाद भारत छोड़कर इटली जाना चाहती थी मोरो की किताब में इस तरह के संकेत हैं कि सोनिया गांधी के दिमाग में यह बात आई थी कि उस देश में क्यों रहना जो अपने ही बच्चों को खा जाता है इस किताब में इस बात की ओर भी पर्याप्त इशारा किया गया है कि गांधी परिवार में राजीव की मौत के बाद इटली वापस लौट जाने पर चर्चा होती थी हलांकि कई प्रसंगों में साफ है कि लेखक ने सोनिया गांधी की जिंदगी के यथार्थवादी पहलुओं में अपनी कल्पना का तड़का लगाया है जैसे एक जगह इस बात का जिक्र है कि रात के तीन बजे सोनिया ने राजीव को कहा कि देश में इमरजेंसी लगाने के ड्राफ्ट में उन्होंने इंदिरा गांधी की मदद की थी  मोरो लिखते हैं- सोनिया के पैदा होने पर लुजियाना के घरों में परंपरा के अनुसार गुलाबी रिबन बांधे गए चर्च ने सोनिया को नाम दिया एडविजे एनटोनियो अलबिना मैनो लेकिन उनके पिता स्टीफैनो ने उन्हें सोनिया नाम दिया रूसी नाम रखकर वो उन रूसी परिवारों का शुक्रिया अदा करना चाहते थे जिन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उनकी जान बचाई थी सोनिया के पिता स्टीफैनो, मुसोलिनी की सेना में थे जो रूसी सेना से पराजित हो गई थी सोनिया जियोवेनो के कॉन्वेंट स्कूल में गई लेकिन उतनी ही पढाई की  जितनी की जरूरत थी यानि वो अच्छी विद्यार्थी नहीं थी लेकिन पढ़ाई में कमजोर होने के बावजूद वो हंसमुख और दूसरों की मदद को तत्पर रहती थी कफ और अस्थमा की शिकायत की वजह से वो बोर्डिंग स्कूल में अकेले सोती थी आगे जाकर तूरीन में पढ़ाई के दौरान सोनिया के मन में एयर होस्टेस बनने का अरमान भी जगा था ले किन वो सपना जल्द ही बदल गया उसके बाद सोनिया विदेशी भाषा की शिक्षक या फिर संयुक्त राष्ट्र में अनुवादक बनने की ख्वाहिश पालने लगी
लेखक मोरो का दावा है कि उसकी किताब लंबे समय तक किए गए शोध पर आधारित है । जेवियर मोरो का दावा है कि तथ्यों और घटनाओं की सत्यता को परखने के लिए उन्होंने सोनिया के होम टाउन लुजियाना में काफी वक्त बिताया उसका तो यह भी दावा है कि उसवे किताब छपने के पहले उसकी पांडुलिपि सोनिया गांधी की बहन नाडिया को भी दिखाई थी क्योंकि वो स्पैनिश जानती थी कांग्रेस नेताओं की आपत्तियों और लेखक को कानूनी नोटिस के हो हल्ले के बीच जेवियर मोरो की किताब सोनिया और उसके इर्द गिर्द के विवादों और घटनाओं में सिमटकर रह गई। जबकि इस किताब में इस वक्त केंद्र सरकार में मंत्री और सोनिया की देवरानी मेनका गांधी के बारे में ज्यादा विस्फोटक प्रसंग छपे हैं, जो घटनाओं के चश्मदीदों के बयानों पर आधारित होने की वजह से ज्यादा प्रामाणिक प्रतीत होते हैं बेटे संजय गांधी की जिद की वजह से तेइस सितंबर उन्नीस सौ चौहत्तर को गांधी के पारिवारिक मित्र मोहम्मद युनुस के घर पर संजय और मेनका परिणय सूत्र में बंध गए यहां पर जेवियर मोरो ने इस बात के संकेत दिए हैं कि मेनका को गांधी परिवनार में एडजस्ट करने में सोनिया से ज्यादा दिक्कत हुई
एक और बेहद ही दिलचस्प वाकया इस किताब में है एक बार मशहूर लेखक खुशवंत सिंह जब गांधी परिवार से मिलने उनके घर गए तो वहां कुत्तों के बीच जबरदस्त झगड़ा चल रहा था किताब के मुताबिक मेनका के आइरिश वुल्फहाउंड और सोनिया के शांत से अफगानी कुत्ते के बीच लड़ाई चल रही थी सोनिया दोनों को अलग करना चाह रही थी लेकिन मेनका इस झगड़े से मजा ले रही थी क्योंकि उसे मालूम था कि उसका कुत्ता सोनिया के कुत्ते से मजबूत था लेखक ने इंदिरा गांधी की सचिव उषा के हवाले से लिखा है कि मेनका बेहद ही बुद्धिमती लेकिन महात्वाकांक्षी थी उसे हर वक्त यह लगता था कि जल्द ही संजय गांधी भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे, और वो गाहे बगाहे इस बात तो सार्वजनिक रूप से कहती भी थी लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था सतहत्तर में कांग्रेस की कारी हार के बाद जब संजय गांधी की एक विमान दुर्घटना में मौत हो गई तो इंदिरा गांधी मेनका को लेकर बेहद चिंतित रहने लगी उन्होंने अपनी दोस्त पुपुल जयकर से अपनी चिंता जताते हुए कहा भी था कि मेनका की मां की महात्वाकांक्षा उसको संजय की जगह लेने के लिए प्रेरित करेगी इस सोच को बल मिला खुशवंत सिंह के एक लेख से जिसमें उन्होंने खुलेआम इस बात की वकालत की थी कि संजय की मौत के उनकी राजनीतिक वारिस मेनका हैं खुशवंत सिंह ने यह भी लिखा कि मेनका संजय गांधी की तरह बहादुर हैं और दुर्गा की अवतार हैं जाहिर है खुशवंत सिंह के इस लेख से इंदिरा गांधी आहत हुई क्योंकि बांग्लादेश युद्द में विजय के बाद इंदिरा गांधी की तुलना दुर्गा से होने लगी थी खुशवंत की इस तुलना से इंदिरा गांधी के मन में इस बात का संदेह पैदा हो गया कि मेनका की रजामंदी के बाद ही खुशवंत ने वो लेख लिखा मेनका गांधी को घर वापस निकालने  के इंदिका गांधी के फैसले पर भी यह किताब प्रकाश डालती हैं । घर से बाहर निकालने के वक्त हुए हाई वोल्टेज ड्रामा पर भी मोरो ने विस्तार से लिखा है
ये सारी बातें लिखते हुए मोरो ने किताब में एक डिस्क्लेमर भी लगाया है - बातचीत, संवाद और स्थितियां लेखक के व्याख्या पर आधारित है और यह जरूरी नहीं है कि वो प्रामाणिक भी हो इस पूरे विवाद पर जैसे अभिव्यक्ति की आजादी के झंडाबरदारों पर सवाल खड़े होते हैं उसी तरह लेखक की मंशा पर भी सवालिया निशान लगता है । सवाल वही कि क्या लेखकीय आजादी के नाम पर कुछ भी काल्पनिक लिखने की इजाजत किसी लेखक को दी जा सकती है इन्हीं सवालों के बीच अब सोनिया की यह जीवनी भारतीय पाठकों के लिए उपलब्ध है । राजनीति और राजनेताओं की किताबों की खासी बिक्री के बीच इस बात पर सबकी नजर रहेगी कि सोनिया गांधी की इस काल्पनिक जीवनी को हमारे देश का पाठक कैसे लेता है ।