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Saturday, November 25, 2023

असहमति निर्माण का राजनीतिक खेल


शुक्रवार को भुनेश्वर में आयोजित एसओए साहित्य उत्सव में भाग लेने का अवसर मिला। इसके उद्घाटन सत्र में प्रख्यात समाजशास्त्री आशीष नंदी का वक्तव्य हुआ। अपने उद्घाटन भाषण में आशीष नंदी ने कई बार डिस्सेंट (असहमति) शब्द का उपयोग किया। उन्होंने साहित्यकारों की रचनाओं में असहमति के तत्व की बात की। उसकी महत्ता को भी स्थापित करने का प्रयत्न किया। अपने भाषण के आरंभ में उन्होंने कहा था कि वो कोई विवादित बयान नहीं देंगे। लेकिन असहमति की बात करते हुए उन्होंने एक किस्सा सुनाया। कहा कि एक कवयित्री हैं जो नरेन्द्र मोदी के बारे में  हमेशा अच्छा अच्छा लिखती थी। उनकी प्रशंसा करती थी। उस कवयित्री को उन्होंने नरेन्द्र मोदी का प्रशंसक तक बताया। फिर आगे बढ़े और कहा कि एक दिन उस कवयित्री ने गंगा नदी में बहती लाशों के बारे में लिख दिया। इसके बाद उसके प्रति कुछ लोगों का नजरिया बदल गया। वो इंटरनेट मीडिया पर ट्रोल होने लगी। इस किस्से के बाद वो अन्य मुद्दों पर चले गए। कहना न होगा कि आशीष नंदी का इशारा कोविड महामारी के दौरान गंगा नदी में बहती लाशों की ओर था। वो इतना कहकर आगे अवश्य बढ़ गए लेकिन वहां उपस्थित लोगों के मन में असहमति को लेकर एक संदेह खड़ा गए। परोक्ष रूप से वो ये कह गए कि वर्तमान केंद्र सरकार या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर असहमति प्रकट करने के बाद प्रहार सहने के लिए तैयार रहना चाहिए। यहां आशीष नंदी ये बताना भूल गए कि कोविड महामारी के दौरान गंगा में बहती लाशों को लेकर जो भ्रम फैलाया गया था वो एक षडयंत्र का हिस्सा था। केंद्र के साथ साथ उस समय की उत्तर प्रदेश सरकार को कठघरे में खड़ा करने की मंशा से ये नैरेटिव बनाने का प्रयास किया गया था। उसी समय दैनिक जागरण ने गंगा नदी में बहती लाशों को लेकर उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार तक पड़ताल की थी। उस झूठ का पर्दाफाश किया था कि लाशें महामारी की भयावहता को छिपाने के लिए गंगा में बहा दी गईं थीं। बाद में उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में जनता ने भी गंगा में तैरती लाशों वाले उस नैरेटिव पर ध्यान नहीं दिया। किड महामारी के बाद हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में फिर से योगी आदित्यनाथ की सरकार को जनादेश देकर उस विमर्श को खत्म कर दिया था। 

इन दिनों असहमति को लेकर खूब चर्चा होती है। यह भी कहा जाता है कि असहमति को दबाने का प्रयास किया जाता है। कई बार ये कहते हुए केंद्र सरकार के विरोध में अपनी राय रखनेवाले कथित बुद्धिजीवि असहमति को दबाने के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से केंद्र सरकार या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  पर आरोप भी लगाते हैं। यहां वो असहमति का एक महत्वपूर्ण पक्ष बताना भूल जाते हैं। असहमति का अधिकार लोकतंत्र में होता है, होना भी चाहिए लेकिन असहमति के साथ साथ उसकी मंशा और उद्देश्यों पर भी ध्यान देना चाहिए। डिस्सेंट जितना महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण है उस डिसेंट के पीछे का इंटेंट। अगर असहमति के पीछे छिपी मंशा किसी दल या विचारधारा का विरोध है तो उसको भी उजागर करना चाहिए। उसको भी असहमति के साथ ही रखकर विचार किया जाना चाहिए। अगर किसी विचार से असहमति हो और उसके पीछे मंशा वोटरों को लुभाने की हो तो उसपर खुलकर बात की जानी चाहिए। बौद्धिक और साहित्य जगत में असहमति होना आम बात है लेकिन अगर किसी रचना का उद्देश्य किसी विचारधारा विशेष को पोषित करना और उसके माध्यम से पार्टी विशेष को लाभ पहुंचना है तो फिर उस असहमति का प्रतिकार करने का अधिकार सामने वाले को भी होना ही चाहिए। वामपंथ में आस्था रखनेवाले बुद्धिजीवियों ने वर्षों तक ये किया। इल तरह का बौद्धिक छल कहानी, कविता और आलोचना के माध्यम से हिंदी जगत में वर्षों तक चला, अब भी चल ही रहा है। वामपंथी पार्टियों के बौद्धिक प्रकोष्ट की तरह कार्य करनेवाले लेखक संगठनों से जुड़े लेखकों ने अपनी रचनाओं में वामपंथी विचारों को परोसने का काम किया। पाठकों को जब उनकी ये प्रवृति समझ में आई तो वो इस तरह की रचनाओं को खारिज करने लगे। इस तरह की रचना करनेवाले लेखकों की विश्वसनीयता भी पाठकों के बीच संदिग्ध हो गई। ये अकारण नहीं है कि एक जमाने में वामपंथ को पोषित करनेवाली लघुपत्रिकाएं धीरे-धीरे बंद होती चली गईं। उनके बंद होने के पीछे इन लेखक संगठनों के मातृ संगठनों का कमजोर होना भी अन्य कारणों में से एक कारण रहा। इन मातृ संगठनों के कमजोर होने की वजह उनमें लोगों का भरोसा कम होना भी रहा। आशीष नंदी जैसे समाजशास्त्री जब असहमति की पैरोकारी करते हैं तो इस महत्वपूर्ण पक्ष को ओझल कर देते हैं। 

अमेरिकी पत्रकार वाल्टर लिपमैन ने 1922 में जनमत के प्रबंधन के लिए एक शब्द युग्म प्रयोग किया था, मैनुफैक्चरिंग कसेंट (सहमति निर्माण)। उसके बाद कई विद्वानों ने इस शब्द युग्म को अपने अपने तरीके से व्याख्यायित किया। एडवर्ड हरमन और नोम चोमस्की ने 1988 में एक पुस्तक लिखी मैनुफैक्चरिंग कंसेंट, द पालिटिकल इकोनामी आफ द मास मीडिया। इस पुस्तक में लेखकों का तर्क था कि अमेरिका में जनसंचार के माध्यम सरकारी प्रोपगैंडा का शक्तिशाली औजार है और उसके माध्यम से सरकारें अपने पक्ष में सहमति का निर्माण करती हैं। उनके ही तर्कों को मानते हुए अगर थोड़ा अलग तरीके से देखें तो हम कह सकते हैं कि हमारे देश में एक खास विचारधारा के पोषक मैनुफैक्चरिंग डिस्सेंट में लगे हैं। यानि वो अपने विचारों से, अपने वक्तव्यों से, अपने लेखन से असहमति का निर्माण करने का प्रयास करते हैं जिससे परोक्ष रूप से सरकार के विरोधी राजनीतिक दलों के प्रोपैगैंडा को बल प्रदान किया जा सके। इस असहमति के निर्माण में लोकतंत्र, जनतंत्र, संवैधानिक अधिकारों की एकांगी व्याख्या आदि का सहारा लिया जाता है ताकि उनको तर्कों को विश्वसनीयता का बाना पहनाकर जनता के सामने पेश किया जा सके। यहां वो यह भूल जाते हैं कि भारत और यहां की जनता अब पहले की अपेक्षा अधिक समझदार हो गई है, शिक्षा का स्तर बढ़ने और लोकतंत्र के गाढ़ा होने के कारण असहमति निर्माण का खेल बहुधा खुल जाता है। बौद्धिक जगत में भी अब असहमति निर्माण करनेवालों के सामने उनके उद्देश्य को लेकर प्रश्न खड़े किए जाने लगे हैं। परिणाम यह होने लगा है कि जनता को समग्रता में सोचने विचारने का अवसर मिलने लगा है। 

हमारे देश में असहमति निर्माण का ये खेल चुनावों के समय ज्यादा दिखाई देता है। जब जब देश में चुनाव होते हैं तो कभी पुरस्कार वापसी का प्रपंच रचा जाता है तो कभी असहिष्णुता को लेकर असहमति निर्माण का प्रयास किया जाता है तो कभी फासीवाद का नारा लगाकर तो कभी संस्थाओं पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कब्जे का भ्रम फैलाकर। कई बार हिंदुत्व और हिंदूवाद की बहस चलाकर भी। लेकिन इन सबके पीछे का उद्देश्य एक ही होता है कि किसी तरह से मोदी सरकार की छवि धूमिल हो सके ताकि चुनाव में विपक्षी दलों को उसका लाभ मिल सके। लेकिन हो ये रहा है कि न तो पुरस्कार वापसी का प्रपंच चल पाया, न ही असहिष्णुता का आरोप गाढ़ा हो पाया। फासीवाद फासीवाद का नारा लगाने वाले भी अब ये जान चुके हैं कि ये शब्द भारत और यहां की राजनीति के संदर्भ में अपना अर्थ खो चुके हैं। हिंदुत्व और हिंदूवाद की बहस भी अब मंचों तक सीमित होकर रह गई है। अगले वर्ष के आरंभ में आम चुनाव होनेवाले हैं। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि असहमति निर्माण के इस खेल में नए नए तर्क ढूंढे जाएं। पर असहमति निर्माण में लगे लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि ये जो जनता है वो सब जानने लगी है। 

Saturday, November 18, 2023

हिंदी कहानी पर आत्मुग्धता का खतरा


काफी दिनों के बाद एक साहित्यिक गोष्ठी में जाना हुआ। वहां समकालीन हिंदी कहानी और उपन्यास लेखन पर चर्चा हो रही थी। कार्यक्रम चूंकि हिंदी कहानी और उपन्यास पर हो रही थी इस कारण वक्तों में कहानीकार और उपन्यासकार अधिक थे, टिप्पणीकार कम। एक बुजुर्ग लेखक ने जोरदार शब्दों में हिंदी कहानी से कथा तत्व के लगभग गायब होते जाने की बात कही। साथ ही उन्होंने कहानियों में जीवन दर्शन की कमी को भी रेखांकित किया। इस क्रम में उन्होंने रैल्फ फाक्स को उद्धृत करते हुए कहा कि हो सकता है कि ‘जब जब दार्शनिकों ने कहानियां लिखी हों मुंह की खाई हो, लेकिन यह भी तय है कि उपन्यास बिना एक सुनिश्चित जीवन-दर्शन के लिखा ही नहीं जा सकता।‘ इसके बाद एक युवा उपन्यासकार बोलने के लिए आए। युवा उत्साही होते हैं तो उनके वक्तव्य में भी उत्साह था और उन्होंने उपन्यास में जीवन दर्शन जैसे गंभीर बातों की खिल्ली उड़ाई और कहा कि हिंदी कहानी को इस तरह की बातों से ही नुकसान पहुंचा है। उसके मुताबिक आज का उपन्यास हिंदी के इन आलोचकीय विद्वता से मुक्त होकर आम आदमी की कहानी कहने लगा है। उसने इसके फायदे भी गिनाए और कहा कि जीवन दर्शन आदि की खोज से दूर जाकर हिंदी कहानी ने अपने को बोझिलता से दूर किया। युवा उपन्यासकार ने न केवल हिंदी की समृद्ध परंपरा का उपहास किया बल्कि यहां तक कह गए कि हिंदी कथा साहित्य को अज्ञेय और निर्मल वर्मा जैसों की बौद्धिकता से दूर ही रहने की आवश्यकता है। आश्चर्य की बात है कि जब वो ये सब बोल रहे थे तो सभागार में बैठे कुछ अन्य युवा तालियां भी बजा रहे थे। बाद के कुछ वक्ताओँ ने हल्के स्वर में उनकी स्थापनाओं का प्रतिरोध करने की औपचारिकता निभाई और अन्य बातों पर चले गए।

कार्यक्रम के अगले हिस्से में समकालीन कहानियों के समाचारों पर आधारित होने की बात एक वक्ता ने उठाई। उनका कहना था कि हिंदी के नए कहानीकार अब समाचारपत्रों से किसी घटना को उठाते हैं और उसको अपनी भाषा में थोड़ी काल्पनिकता का सहारा लेकर लिख डालते हैं। उन्होंने नए कहानीकारों पर फार्मूलाबद्ध और फैशनेबल कहानियां लिखने का आरोप भी जड़ा। उनका तर्क था कि जब इस तरह की कहानी पाठकों के सामने आती है तो वो सतही और छिछला प्रतीत होता है। उन्होंने नए कहानीकारों को हिंदी कहानी की परंपरा को साधने और उसको ही आगे बढ़ाने की नसीहत देते हुए कहा कि हिंदी के नए कहानीकारों को अपने पूर्वज कहानीकारों का ना केवल सम्मान करना चाहिए बल्कि उनको पढ़कर कहानी लिखने की कला भी सीखनी चाहिए। ये महोदय बहुत जोश में बोल रहे थे और ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सभागार में उपस्थित बहुसंख्यक श्रोता उनकी बातों से सहमत भी हो रहे थे। दो सत्र के बाद कार्यक्रम संपन्न हो गया। लेकिन दोनों सत्रों में वक्ताओं ने जिस प्रकार से अपने तर्क रखे उसको देखकर लगा कि हिंदी में इस समय अतिवादिता का दौर चल रहा है। एक तरफ अपने पूर्वज कथाकारों को नकारने की प्रवृत्ति देखने को मिली तो दूसरी तरफ युवा लेखकों को खारिज करने का सोच दिखा। दोनों ही अतिवाद है। ऐसा नहीं है कि हिंदी कहानी को लेकर इस तरह की गर्मागर्मी पहले नहीं होती थी। हर दौर में इस तरह की साहित्यिक बहसें होती थीं। पहले साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में लेख और टिप्पणियों के माध्यम से इस प्रकार की बहसें चला करती थीं। अब साहित्यिक पत्रिकाओं के कम हो जाने के कारण गोष्ठियों में इस तरह की बातें ज्यादा सुनने को मिलती हैं।

इन दोनों टिप्पणियों को सुनने के बाद मुझे कथाकार राजेन्द्र यादव की याद आ गई। उन्होंने लिखा था कि ‘कभी-कभी होता क्या है कि साहित्य का कोई युग खुद ही एक अजब सा खाली-खालीपन, एक निर्जीव पुनरावृत्ति और सब मिलाकर एक निर्रथक अस्तित्व का बासीपन महसूस करने लगता है। सब कुछ तब बड़ा सतही और छिछला लगता है। उस समय उसे जीवन और प्रेरणा शक्ति देनेवाली दो शक्तियों की ओर निगाह जाती है, एक लोक साहित्य और और लोक जीवन की प्रेरणाएं और दूसरे विदेशी साहित्य की स्वस्थ उपलब्धियां। राजेन्द्र यादव ने तब लिखा था कि अगर इस देश के कथा साहित्य को तटस्थ होकर देखें तो ये दोनों ही प्रवृत्तियां साफ साफ दिखती हैं। उनका मानना था कि उनके समय में भी सतहीपन और झूठे मूल्यों का घपला ही था जिससे उबकर नवयुवक कथाकारों की एक धारा ग्रामीण जीवन और आंचलिक इकाइयों की ओर मुड़ गईं और दूसरी विदेशी साहित्य की ओर। वो उस काल को प्रयोग और परीक्षण का काल मानते थे जिसमें भटकाव भी था लेकिन दोनों धारा में एक सही रास्ता खोजने की तड़प थी। आज की कहानियों पर अगर विचार करें तो यहां न तो कोई प्रयोग दिखाई देता है और न ही किसी प्रकार का कोई परीक्षण। एक दो उपन्यासकार को छोड़ दें तो ज्यादातर उपन्यासकार प्रयोग का जोखिम नहीं उठाते हैं। इस समय जो लोग ग्रामीण जीवन पर कहानियां लिख रहे हैं वो तकनीक आदि के विस्तार से जीवन शैली में आए बदलाव को पकड़ नहीं पाते हैं या पकड़ना नहीं चाहते हैं। इसके पीछे एक कारण ये हो सकता है कि वो श्रम से बचना चाहते हों। लोगों के मनोविज्ञान में आ रहे बदलाव को समझने और उसको कथा में पिरोने की जगह वो ऐसा उपक्रम करते हैं कि पाठकों को लगे कि वो नई जमीन तोड़ रहे हैं। समाज में हिंदू-मुसलमान के सामाजिक रिश्तों में बदलाव आ रहा है। इस रिश्ते के मनोविज्ञान को पकड़ने का प्रयास हिंदी कहानी में कहां दिखाई देता है।

हम अज्ञेय या निर्मल वर्मा की भाषा की बात करें तो उसमें एक खास प्रकार का आकर्षण दिखाई देता है। जिसको एक कथाकार ने उत्साह में बोझिलता बता दिया था दरअसल वो हिंदी भाषा की समृद्धि का प्रतीक है। दरअसल होता यह है कि जब भी हिंदी में कहानियों की भाषा पर बात की जाती है तो वो भी यथार्थ के धरातल पर आकर टिक जाती है। इस तरह की बातें करनेवाले ये भूल जाते हैं कि भाषा केवल स्थितियों और परिस्थितियों को अभिव्यक्त ही नहीं करती है बल्कि पाठकों के सामने चिंतन के सूत्र भी छोड़ती है। वो अतीत में भी जाती है और वर्तमान से होते हुए भविष्य की चिंता भी करती है। आज के कहानीकारों के सामने सबसे बड़ा संकट ये है कि उनकी पीढ़ी का कोई कथा आलोचक नहीं है। इस वक्त हिंदी कहानी पर टिप्पणीकार तो कई हैं लेकिन समग्रता में कथा आलोचना के माध्यम से कहानीकारों और पाठकों के बीच सेतु बनने वाला कोई आलोचक नहीं है। आज के अधिकतर कहानीकार अपने लिखे को अंतिम सत्य मानते हैं और उसपर आत्ममुग्ध रहते हैं। उनको आईना दिखानेवाला न तो कोई देवीशंकर अवस्थी है, न कोई सुरेन्द्र चौधरी और न ही कोई नामवर सिंह। इसके अलावा इस समय कथा का जो संकट है वो ये है कि कहानीकार भी अपने समकालीनों पर लिखने से घबराते हैं। इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर आपको सिर्फ प्रशंसात्मक टिप्पणियां मिलेंगी। अच्छी रचनाओं की प्रशंसा अवश्य होनी चाहिए। प्रशंसा से लेखक का उत्साह बढ़ता है लेकिन कई बार झूठी प्रशंसा लेखकों या रचनाकारों के लिए नुकसानदायक होती है। आज हिंदी के युवा कथाकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वो सबसे पहले कहानी या उपन्यास की परंपरा का अध्ययन करें, उसको समझकर आत्मसात करें, फिर अपने लेखन में उसके आगे बढ़ाने का प्रयत्न करें। अगर लेखकों को अपनी परंपरा का ज्ञान नहीं होगा तो उसके आत्ममुग्ध होने का बड़ा खतरा होता है। ये खतरा इतना बड़ा होता है कि वो लेखन प्रतिभा को कुंद कर देता है।

Monday, November 13, 2023

मन के अंदर हों श्रीराम - मिश्र


हिंदी साहित्य के इतिहास में रामदरश मिश्र संभवत: पहले ऐसे लेखक हैं जो अपनी जन्म शताब्दी की देहरी पर खड़े हैं। अस्सी वर्षों से निरंतर साहित्य की विभिन्न विधाओं में सार्थक लेखन से उन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। इस उम्र में भी वो साहित्यिक बैठकी में जमकर संस्मरण सुनाते हैं और युवा लेखकों का उत्साहवर्धन भी करते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शिक्ष रहे रामदरश मिश्र के अंदर अब भी उनका गांव बसता है। गांव की चर्चा होते ही उनका चेहरा प्रफुल्लित हो जाता है। वो मानते हैं कि अनुभव और मानवीय मूल्य ही किसी रचना को उत्तम बनाते हैं। दैनिक जागरण के एसोसिएट एडिटर अनंत विजय ने  रामदरश मिश्र से उनके आरंभिक जीवन, शिक्षण के अनुभव, उनकी रचना प्रक्रिया, समकालीन साहित्यिक, सामाजिक, राजनीतिक परिदृश्य और अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण को लेकर उनसे लंबी बातचीत की। यह भी जानने का प्रयास किया गया कि उनके शतायु होने का राज क्या है। प्रस्तुत है उनसे विस्तृत बातचीत के प्रमुख अंशः

-आज का जो साहित्यिक परिदृश्य है, जिस तरह की चीजें लिखी जा रही हैं, उससे आपको कितनी संतुष्टि होती है या जितना आप पढ़ पाते हैं इस अवस्था में आने के बाद, जितना आपको सुनाया जाता है, या जितना आप जानते हैं, कोई आश्वस्ति होती है या लगता है कि जैसे कुछ छूट रहा है?

- पहली बात, मेरा लिखना-पढ़ना दोनों बंद हो गया है। जब लिखने की क्षमता कम हुई तो अपनी सर्जना को डायरी के माध्यम से, कभी-कभी गजल के माध्यम से व्यक्त करता रहा हूं।  मुझे लगता है कि इन दिनों चाहे गजल या कविता हो या कहानी, उनमें वो ऊंचाई नहीं है, गहराई नहीं है जो कुछ समय पहले तक थी। नागार्जुन, केदारनाथ, भवानी भाई के साथ जुड़ा हूं। इन लोगों को पढ़ने का जो एक आनंद था, वो मुझे महसूस नहीं होता है। किसी अच्छे कवि से संपर्क होता है, तो पता चलता है कि कुछ अच्छा भी लिखा जा रहा है। लेखन कोई भी हो, उसमें अपनापन होना चाहिए। जब जब हम चीजों को जीते हैं, तो जो रचनाएं उनकी अभिव्यक्ति होती हैं, वे प्रभावशाली होती हैं। उनमें अपने परिवेश से उपजा अनुभव होता है। हालांकि कई बार मात्र अनुभव ही पर्याप्त नहीं होता। लेखक अपने अनुभव से लिखते हैं, लेकिन लेखक का अपना निर्णय भी होता है कि क्या देना चाहिए और क्या नहीं।

- आपकी एक कविता है कि आप पहुंचे छलांगे लगाकर वहां मैं पहुंचा धीरे-धीरे। आप धीरे-धीरे लक्ष्य तक पहुंचे। साहित्य में प्रतिष्ठा मिली जो एक आलोचना का परिदृस्य था, काफी समय तक आपके साहित्य को मान्यता नहीं दी। उसमें कभी ऐसा लगा कि आपका देय आपको नहीं मिला?

- मेरा स्वभाव महत्वाकांक्षी नहीं है। मैं अपना काम करता हूं और यदि वो काम अच्छा होता है तो संतोष मिलता है, नहीं तो यह भी विश्वास रहता है कि कल वहां ये पहुंचेगा, जहां इसे पहुंचना चाहिए। लोगों की उपेक्षा से दुख इसलिए भी नहीं हुआ क्योंकि मैं मानता था कि एक विचारधारा है, एक दल है, वही सब कुछ निर्णय कर रहा है। वे अपने से अलग लोगों को हाशिये पर डाल रहे हैं, इसलिए उनकी चिंता मत करो, बस लिखते जाओ। यदि मैं उसमें शामिल हो गया होता तो मुझे भी वही मिलता, लेकिन मैं किसी दल से संबद्ध नहीं हुआ। बीएचयू में रहते हुए दो तीन-साल के लिए कम्युनिस्ट हुआ था लेकिन जल्दी ही ज्ञात हो गया कि उसके प्रभाव में जो लिख रहा हूं वो ठीक नहीं है। जब मेरी किताब आई तो उन कविताओं को हटा दिया। मैंने कोशिश की कि अपना रास्ता बनाऊं। अपने रास्ते पर चलने वालों की तारीफ करूं।  जिन पत्रिकाओं को मैं समझता था कि कुछ खास लोगों की हैं, जैसे अशोक बाजपेयी की 'पूर्वाग्रह', नामवर सिंह की 'आलोचना' हो, राजेंद्र यादव की 'हंस' हो वहां मैंने कुछ दिया ही नहीं, उन्होंने सम्मान से कुछ मांगा भी नहीं, एक तरह से अच्छा ही हुआ । मेरी नियति कुछ अजीब है। लगता है कि मेरा अपकार कर रही हैं, दुख दे रही है, फिर लगता है कि उस क्रिया में ही तो इतना सम्मान था। यौवनकाल में सब मस्ती से जी लेते हैं, लेकिन बुढा़पा सन्नाटों में भर जाता है, मेरी नियति ने बुढ़ापे को सम्मान से भर दिया। मुझे वृद्धावस्था में सम्मान और लोगों का प्यार मिल रहा है।

नियति पर बहुत भरोसा है, क्या आप भाग्यवादी हैं?

- भाग्यवादी नहीं हूं लेकिन जैसा मैंने अनुभव किया है उसके माध्यम से ये बात कह रहा हूं कि जब मेरे साथ दुर्घटना होती है तो लगता है कि एक बुरी नियति से जुड़ा हुआ हूं, लेकिन जब उसका दूसरा परिणाम आता है तो लगता है कि उस नियति का एक दूसरा पहलू भी है।

- आप बीएचयू के उस हिंदी विभाग में रहे हैं, जिसकी तुलना नामवर सिंह ने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से की है कि वहां भी तीन बड़े आलोचक रहे। उन्होंने रामचंद्र शुक्ल रचनावली की भूमिका में ये बात कही बीएचयू में आचार्य शुक्ल, नंददुलारे वाजपेजी, हजारीप्रसाद द्विवेदी की त्रिमूर्ति थी। द्विवेदी जी की यादें साझा करेंगे कि वे कैसे छात्रों से मिलते थे। उन पर आरोप लगा कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधित थे?

- द्विवेदी जी कहते थे कि साहित्य मनुष्य के लिए है। मनुष्य के हित के लिए जो भी साहित्य लिखा जाए वो अच्छा साहित्य है। जब द्विवेदी जी आरएसएस में बोलने गए तो बड़ी बदनामी हुई, लेकिन जब स्टालिन की मृत्यु हुई थी, तो उन्होंने जो भाषण दिया वो अद्भुत था। न वो आरएसएस के थे, ना कम्युनिस्ट थे। वे मानवता से जुड़े थे। उनके अध्यापन की विशेषता थी कि वो कोई विषय बहुत व्यापक रूप में लेते थे। कबीर का दोहा है, वो मात्र दोहा नहीं रह जाता था है, उस दोहे के भाव में जो भी है, वो जहां से भी संभव हो लाकर डाल देते थे। पूरा साहित्य उसमें मूर्त हो जाता था। बेहद प्रसन्नचित्त थे। छात्रों को बहुत प्यार करते थे। उनके साथ शाम को घूमना बहुत अच्छा लगता था। उस समय वे ऐसी बातें कहते थे जो शायद क्लास में नही कह सकते थे। वे ऐसे ढंग से कहते थे कि वो भीतर तक पहुंच रही है। एक बार उनके घर में बैठे थे, एक संन्यासी का फोन आया। पंडित जी आ जाऊं। उन्होंने कहा आ जाइए। उस संन्यासी ने एक किताब लिखी थी, जो द्विवेदी जी को पढ़ने को दी। उन्होंने कहा कि हर लेखक का लक्षित पाठक होता है। आपने लिखा है कि हमारे घर की औरतों को श्रृंगार नहीं करना चाहिए, सिनेमा नहीं देखना चाहिए। क्या वो पढ़ेंगी इसको। हमारे घर की जो स्त्रियां श्रृंगार नहीं करती, वे उसे पढ़ेंगी, लेकिन वह उनके काम की नहीं है।

- एमए के दौरान कभी आपको ऐसा लगा कि शुक्ल जी ने तुलसी की व्याख्या की, लेकिन दिवेदी जी ने तुलसी पर विचार न करके कबीर को पकड़ा। क्या आपको लगा कि वे तुलसी के बरअक्स कबीर को खड़ा करना चाहते थे?

- देखिए कबीर को मानना का क्या होता है। जिसने निर्भीकता से आडंबर का विरोध किया, उसके प्रस्तोता आचार्य दिवेदी जी थे। ऐसा नहीं था कि उन्होंने तुलसीदास की उपेक्षा की थी। उन्हें लगा कि तुलसीदास को तो मिल गया है, उन्होंने जो छूट गया यानी कबीरदास जी को संभाला, ये बड़ी बात थी।

-आप डेढ़ दो साल के लिए कम्युनिस्ट हुए। नागार्जुन की वो पंक्ति याद आती है कि जब उन्होंने 1975 के बाद कहा था कि कोई 24 घंटे कम्युनिस्ट नहीं हो सकता। घंटा दो घंटा तो ठीक। नामवर जी ने चुनाव लड़ा था। क्या आप राजनीति में आना चाहते थे?

- जब मैं एएमए फाइनल में था तब भाई साहब ने मुझे चुनाव लड़ने को कहा। कालेज की छुट्टियां थीं। भाई साहब मुझे लेकर चुनाव प्रचार को जाते थे। पूरे गांव का समर्थन था। इतना समां बंध गया था कि लगा कि जीत जाऊंगा लेकिन एक नुक्ता रह गया था जिसकी वजह से पर्चा खारिज हो गया। हमारे भाई साहब उस फैसले के खिलाफ हाइकोर्ट तक गए थे, पर मैं सोचता हूं जो हुआ अच्छा हुआ। राजनीति में वो जाए जो मोटी चमड़ी का हो।

-आपने स्वतंत्रता से पहले और उसके बाद की राजनीति देखी है। क्या अंतर महसूस करते हैं?

-पुराने समय में राजनेता साहित्य में रुचि रखते थे। उनका सम्मान भी करते थे। उनकी भाषा संसद या संसद के बाहर ऐसी नहीं थी, जैसी आज हो गई है। बाबू जगजीवनराम का एक आत्मीय था, वो मेरा शिष्य। मुझे बताने लगा कि बाबू जी आपको बहुत याद करते हैं। मिलने चलिए उनसे।बहुत आग्रह के बाद उनके घर मिलने गया। उनका बाहरी कमरा नेताओं से भरा हुआ था। उस लड़के ने बाबू जी से जाकर बताया तो वे दौड़कर मिलने आए और गले लगा लिया। राजनीति और साहित्य के संबंध में एक घटना याद आती है। लाल किले पर एक विशाल वार्षिक कवि सम्मेलन हुआ करता था। उसमें दिनकर जी आए हुए थे। जवाहर लाल मंच जी सीढ़ी जी चढ़ रहे थे, फिसल गए तो दिनकर जी ने संभाल लिया और कहा, नेहरू जी जब राजनीति लड़खड़ाती है तो साहित्य उसे संभालता। अब तो किसी नेता को साहित्य से कोई वास्ता नहीं है। 

-नए लेखकों को कोई संदेश देना चाहेंगे?

- सबसे मैं यही कहता हूं कि अपना रास्‍ता बनाओ। बड़े लोगों से कुछ पाने के लिए उन जैसा न लिखो। इनके जैसा लिखूंगा, इनसे मिलूंगा तो यह मिल जाएगा तो तुम्‍हारा अपना नहीं होगा। तुम खुद अपना रास्‍ता चुनो। गिरो, पड़ो, उठो। जो तुम्‍हारा अपना रास्‍ता होगा, वही तुम्‍हारा अपना लेखन होगा। वही तुम्‍हे ताकत देगा। लोग उसी को याद करेंगे। यही मैं सबसे कहता हूं कि अपना रास्‍ता बनाओ।

-सौ साल तक जीने का क्या राज है?

- जिसने मुझे बनाया है, उससे पूछो। मैं क्‍या जवाब दूं। मैं यही जवाब दे सकता हूं कि मैंने कभी महत्‍वाकांक्षा नहीं पाली। महत्‍वाकांक्षा बहुत मारती है। वह पूरी नहीं होती है, तो लोग रोते हैं, तड़पते हैं और जिनसे आपका काम पूरा नहीं होता, उसे गाली देते हैं। मन में द्वेष रखते हैं। दूसरी बात यह कि नशा नहीं किया। बनारस में रहकर पान नहीं खाया। ये भी एक कारण है कि मैं कभी उम्र के संकट में नहीं पड़ा। बीमार तो पड़ता गया लेकिन मुझे कोई ऐसा रोग नहीं है जो कि यकायक मुझे खत्‍म कर दे। तीसरी बात यह है कि पत्‍नी के होने से सब चीजें घर में ही मिल जाती रहीं। बाजार से संबंध नहीं होना भी एक कारण हो सकता है। बाकी तो ईश्‍वर जानें।

आपकी दिनचर्या क्या रहती है?

- देखिए ऐसा है कि पत्‍नी बीमार हैं। मेरे पैर में फ्रैक्‍चर हो गया था। सर्जरी के बाद अब आराम हो गया है, लेकिन अब चाहे बुढ़ापा कहिए या कुछ और, दोनों पांवों में दर्द होता है। मैं चल तो लेता हूं। ठीक से चल लेता हूं, लेकिन दर्द होता रहता है। दिन में सो लेता हूं। अब तो खाली ही रहता हूं।

अपनी लेखन प्रक्रिया के बारे में बताइए?

- मेरे लेखन की एक प्रक्रिया रही है। सबकी अलग अलग होती है। मैं केवल सुबह लिखता था। सुबह के मतलब नाश्ता आदि करने के बाद। लेकिन जिस दिन क्‍लास लगती थी, उस दिन नहीं लिखता था। लिखने के लिए दो घंटे चाहिए होता है। मैं किस्‍तों में लिखता था। लेकिन लिखते लिखते मैं इतना लिख गया कि देखकर खुश होता हूं कि अरे इसे मैंने लिखा है। ये उपन्‍यास, ये कहानियां मैंने लिखी हैं। मैं ये सब देखकर अब आश्‍चर्य करता हूं।

आपके देखकर लगता नहीं कि आप क्रोध करते होंगे। क्या सचमुच ऐसा है?

- नहीं, मुझे भी क्रोध  आता है। खासकर जहां गलत काम देखता हूं। जब नागरिकता बोध को खंडित होते देखता हूं तो उस पर बहुत गुस्‍सा आता है। 

-रावण वध के बाद श्रीराम के अयोध्या पहुंचने के उपलक्ष्य में हर साल दीवाली मनाई जाती है, लेकिन पांच सौ साल बाद रामलला भव्य मंदिर में विराजमान होने जा रहे हैं। इस अर्थ में क्या यह दीवाली कुछ खास है। ?

- राम मंदिर बनना अपने आपमें एक बड़ी चीज है। हालांकि मैं सोचता हूं कि श्रीराम ने तो रावण का वध कर दिया, लेकिन क्या वह सचमुच में मर गया है? एक गजल याद आ रही है- वह न मंदिर में, न मस्जिद में, न गुरुद्वारे में हैं। वह पराई पीर वाली आंख के तारे में है…। अपने मन के भीतर एक मंदिर बनाइए। राम मंदिर तो एक प्रतीक है। उसके माध्‍यम से श्रीराम को भीतर ले आइये। कृष्‍ण और राम के रूप में ईश्वर की जो सगुण कल्‍पना की गई है, यह बहुत बड़ी बात है। ईश्वर के उन गुणों को अगर आपने नहीं अपनाया तो फिर मंदिर भी व्‍यर्थ है और बाकी सब कुछ भी।


Saturday, November 11, 2023

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का हिंदू मन


भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में पिछले दिनों भारतीय भाषाओं के अंतरसंबंध पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने का अवसर मिला। उस दौरान आचार्य रामचंद्र शुक्ल का अंग्रेजी में लिखा लेख हिंदी एंड द मुसलमान्स पर चर्चा हुई। उसी क्रम में रामचंद्र शुक्ल की तुलसी की भक्तिपरक और काव्य पद्धति को पढ़ने का मौका मिला। उसके बाद ऐसा प्रतीत हुआ कि रामचंद्र शुक्ल के साथ बाद के लेखकों ने न्याय नहीं किया। तुलसी काव्य की उनकी व्याख्या और उसके धार्मिक आधारों की विवेचना कम हुई। चर्चा इस बात की अधिक होती रही कि रामचंद्र शुक्ल ने तुलसी के सामने कबीर को याद नहीं किया। इतना ही नहीं कोशिश तो ये भी हुई कि तुलसी और कबीर को लेकर आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी को प्रतिद्वंदी की तरह पेश किया गया। रामचंद्र शुक्ल के तुलसी काव्य पर लिखे को आगे बढ़ाने का प्रयास न के बराबर हुआ। अगर शुक्ल के लेखन के समग्र आयामों पर अगर बात होती तो उनका हिंदू मन या सनातन धर्म में उनकी आस्था सामने आ जाती। ये बात वामपंथ में आस्था रखनेवाले लेखकों और आलोचकों को स्वीकार नहीं होता, लिहाजा इस तरह का प्रपंच रचा गया कि शुक्ल के लेखन के हिंदू पक्ष के बारे में बात ही न हो। यह कार्य निराला के साथ भी किया गया, प्रेमचंद के साथ भी किया गया और कल्याण पत्रिका में प्रकाशित उनके लेखों को हिंदी के नए पाठकों से दूर रखने का बौद्धिक षडयंत्र रचा गया। इस षडयंत्र की चर्चा आगे होगी लेकिन पहले देख लेते हैं कि शुक्ल जी ने क्या लिखा है। 

तुलसी की भक्ति पद्धति में आचार्य शुक्ल ने दिल खोलकर हिंदूओं और उनके धर्म प्रतीकों पर लिखा है। लेख के आरंभ में आचार्य शुक्ल कहते हैं कि देश में मुसलमान साम्राज्य के पूर्णतया प्रतिठित हो जाने पर वीरोत्साह के सम्यक संचार के लिए वह स्वतंत्र क्षेत्र न रह गया, देश का ध्यान अपने पुरुषार्थ और बल-पराक्रम की ओर से हटकर भगवान की शक्ति और दया-दाक्षिण्य की ओर गया। देश का वह नैराश्य काल था जिसमें भगवान के सिवा कोई सहारा नहीं दिखाई देता था। आचार्य शुक्ल ने आगे कहा कि सूर और तुलसी ने इसी भक्ति के सुधारस से सींचकर मुरझाते हुए हिंदू जीवन को फिर से हरा कर दिया। भगवान का हंसता खेलता रूप दिखाकर सूरदास ने हिंदू जाति की नैराश्यजनित खिन्नता हटाई जिससे जीवन में प्रफुल्लता आ गई। पीछे तुलसीदासजी ने भगवान का लोक-व्यापारव्यापी मंगलमय रूप दिखाकर आशा और शक्ति का अपूर्व संचार किया। अब हिंदू जाति निराश नहीं है। आचार्य शुक्ल इतने पर ही नहीं रुकते हैं वो आगे कहते हैं कि सूरदास की दिव्य वाणी का मंजु घोष घर-घर क्या, एक एक हिंदू के ह्रदय तक पहुंच गया। यही वाणी हिंदू जाति को नया जीवनदान दे सकती थी। इसके बाद वो तुलसी के रामचरित की जीवनव्यापकता पर आते हैं और कहते हैं कि राम के चरित से तुलसी की जो वाणी निकली उसने राजा, रंक, धनी, दरिद्र, मूर्ख, पंडित सबके ह्रदय और कंठ में बसा दिया। गोस्वामी जी ने समस्त हिंदू जीवन को राममय कर दिया।

आचार्य शुक्ल ने सूफियों के ईश्वर को केवल अपने मन के भीतर समझने और ढूढ़ने की अवधारणा पर भी प्रहार किया। उन्होंने कहा कि भारतीय परपंरा का भक्त अपने उपास्य को बाहर लोक के बीच प्रतिष्ठित करके देखता है, अपने ह्रदय के कोने में नहीं। गोस्वामी जी भी ललकार कर कहते हैं कि भीतर ही क्यों देखें, बाहर क्यों न देखें- अन्तर्जामिहु तें बड़ बारहजामी हैं राम जो नाम लिए तें। पैज परे प्रह्लादहु को प्रगटे प्रभु पाहन तें, न हिए तें। वो स्पष्ट रूप से कहते हैं कि अगर भगवान को देखना है तो उन्हें व्यक्त जगत के संबंध से देखना चाहिए। वो यह मानते थे कि भगवान को मन के भीतर देखना योगमार्ग का सिद्धांत है भक्ति मार्ग का नहीं। सूफियों की इस अवधारणा के बाद गोस्वामी जी ने उपासना या भक्ति का केवल कर्म और ज्ञान के साथ ही सामंजस्य स्थापित नहीं किया, बल्कि भिन्न भिन्न उपास्य देवों के कारण जो जो भेद दिखाई पड़ते थे, उनका भी एक में पर्यवसान किया। इसी एक बात से ये अनुमान हो सकता है कि उनका प्रभाव हिंदू समाज की रक्षा के लिए ,उसके स्वरूप को रखने के लिए कितने महत्व का था। तुलसी के इस महत्व को बाद के दिनों में बहुत ही कम रेखांकित किया गया। आचार्य शुक्ल ने तुलसी के काव्य को लेकर इस प्रकार के जो विचार प्रस्तुत किए थे उसको भी दबाने का प्रयास किया गया। धर्म और जातीयता के समन्वय पर भी आचार्य शुक्ल ने विचार किया। उनका मानना था कि तुलसी ने अपने काव्य में जो रामरसायन तैयार किया जिसके सेवन से हिंदू जाति विदेशी मतों के आक्रमणों से बहुत कुछ रक्षित रही और अपने जातीय स्वरूप को दृढ़ता से पकड़े रही। उनका मानना था कि सारा हिंदू जीवन राममय हो गया था। वो तो यहां तक कह गए कि राम के बिना हिंदू जीवन नीरस है, फीका है, यही रामरस उनका स्वाद बनाए रहा और बनाए रहेगा। राम का मुंह देख हिंदी जनता का इतना बड़ा भाग अपने धर्म और जाति के घेरे में पड़ा रहा। न उसे तलवार हटा सकी, न धनमान का लोभ, न उपदेशों की तड़क भड़क। जिन राम को जनता जीवन के प्रत्येक स्थिति में देखती आई, उन्हें छोड़ना अपने प्रियजन को छोड़ने से कम कष्टकर न था। आचार्य शुक्ल ने बहुत बोल्ड तरीके से अपनी बात कही थी कि हमने चौड़ी मोहरी का पायजामा पहना, आदाब अर्ज किया पर राम-राम न छोड़ा। कोट पतलून पहनकर बाहर ‘डैम नानसेंस’ कहते हैं पर घर आते ही राम-राम।

अब आते हैं बौद्धिक षडयंत्र पर जहां कि रामचंद्र शुक्ल के हिंदू मन को हिंदी पाठकों से छिपाने का प्रयत्न हुआ। यशपाल से लेकर प्रकाशचंद्र गुप्त तक ने शुक्ल जी को सामंतवाद का विरोधी और जनवादियों से सहानुभूति रखनेवाला बताया। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की त्रैमासिक पत्रिका बहुवचन के प्रवेशांक( अक्तूबर-दिसंबर 1999) में सुधीश पचौरी का एक लेख प्रकाशित हुआ था, रामचंद्र शुक्ल की धर्म भूमि। विखंडनवाद के औजारों से लैस होकर सुधीश पचौरी ने रामचंद्र शुक्ल को एक धार्मिक विमर्शकार करार दिया था। लेख जब आगे बढ़ता है तो वो शुक्ल जी को एक हिंदू विमर्शकार के रूप में रेखांकित करते हैं और कहते हैं कि वो एक हिंदू विमर्शकार हैं जो अपने समय के प्रतिबिंब तो हैं ही अपने समय को सत्ता विमर्श में बदलनेवाले भी हैं और हिंदी आलोचना अभी तक उनके विमर्श से बाहर नहीं निकली है। इस लेख में सुधीश पचौरी ने शुक्ल जी की आलोचना करते हुए उनको एकार्थवादी हिंदुत्व के औजार बनते देखते हैं। सुधीश पचौरी की स्थापनाओं पर तब काफी विवाद हुआ था। यह साहित्यिक विमर्श का विषय हो सकता है लेकिन शुक्ल जी ने जिस प्रकार से हिंदी आलोचना की अस्मिता को तुलसी और सूर के काव्य के माध्यम से राम और कृष्ण से जोड़ा वो उनके हिंदू मन को सामने लाता है। आचार्य शुक्ल ने उस हिंदू मन को पकड़ा और रेखांकित किया है जो अपने अतीत को याद रखते हुए अपनी ज्ञानदृष्टि को समायनुकूल बनाने में नहीं हिचकता है। शुक्ल जी ने जर्मन वैज्ञानिक हैकल की एक पुस्तक का अनुवाद किया था जो ‘विश्वप्रपंच’ के नाम से प्रकाशित है उसकी भूमिका में उनकी समयानुकूल दृष्टि दिखती है। अपनी परंपरा और जड़ों से जुड़े रहकर भी आधुनिक बने रहने की। कहना न होगा कि शुक्ल हिंदी आलोचना के ऐसे हिरामन हैं जिनकी वैश्विक दृष्टि ने भारतीय साहित्य को समृद्ध किया। जरूरत इस बात की है कि उनके हिंदू मन पर समग्रता में विमर्श हो। 

Saturday, November 4, 2023

आकांक्षी लेखक व बुजुर्ग अवसरवादिता


लखनऊ में आयोजित होनेवाले आनंद सागर स्मृति कथाक्रम सम्मान का निमंत्रण पत्र पिछले दिनों मिला। कथाक्रम सम्मान, लखनऊ निवासी उपन्यासकार शैलेन्द्र सागर पिछले कई वर्षों से प्रदान कर रहे हैं। कथाक्रम सम्मान के निमंत्रण पत्र को देख रहा था। वहां कोष्ठक में उल्लिखित रजा फाउंडेशन से सहयोग प्राप्त पढ़ते समय थोड़ी देर रुका। रजा फाउंडेशन पूर्व नौकरशाह अशोक वाजपेयी चलाते हैं। इसके पहले कानपुर के किसी महाविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम की प्रचार सामग्री इंटरनेट मीडिया पर दिखी थी। उसपर भी रजा फाउंडेशन का लोगो लगा था। हिंदी साहित्य से जुड़े कई अन्य कार्यक्रमों में रजा फाउंडेशन का सहयोग दिखता है। इसमें से अधिकतर कार्यक्रमों में रजा फाउंडेशन से संबद्ध अशोक वाजपेयी का नाम वक्ता के तौर पर होता है। कथाक्रम सम्मान समारोह के निमंत्रण पत्र पर भी वक्ता के तौर पर अशोक वाजपेयी का नामोल्लेख है। जब रजा फाउंडेशन का लोगो और अशोक वाजपेयी का नाम वक्ता के तौर पर देखा तो एक उपन्यासकार मित्र को फोन किया। चर्चा के दौरान उन्होंने और भी कई दिलचस्प बातें बताईं। उन्होंने कहा कि सिर्फ आनंद सागर कथाक्रम सम्मान क्यों, रजा फाउंडेशन तो देवीशंकर अवस्थी सम्मान और भारत भूषण अग्रवाल सम्मान में भी सहयोग करता है और वहां भी कई बार अशोक वाजपेयी वक्ता होते हैं। सम्मान और आयोजनों में सहयोग करके वक्ता बनने की ये प्रवृत्ति हिंदी साहित्य के लिए नई और दिलचस्प है। इसपर अगर गंभीरता से विचार किया जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि अशोक वाजपेयी रजा फाउंडेशन के माध्यम से हिंदी के पुरस्कारों का अधिग्रहण कर रहे हैं। क्या अशोक वाजपेयी हिंदी में एक नया साहित्यिक उपनिवेश बनाना चाहते हैं। 

हिंदी साहित्य में नया उपनिवेश बनते देखकर अशोक वाजपेयी की वर्षों पहले लिखी एक टिप्पणी का स्मरण हो उठा। बुजुर्ग अवसरवादिता के नाम से लिखी उस टिप्पणी में अशोक जी ने शायर कैफी आजमी और अली सरदार जाफरी पर प्रहार किया था। अशोक वाजपेयी ने तब लिखा था, सफलता के इस निर्लज्ज युग में अकसर यह मान लिया जाता है कि युवा लोग ही अवसरवादी होते हैं। पर सच यह नहीं है। हमारे बुजुर्ग चौहान भी अवसर का लाभ उठाने से कतई नहीं चूकते। गालिब की द्विशताब्दी के सिलसिले में दिल्ली के लालकिले के नौबतखाने पर जो मुशायरा मुनक्कद किया गया था उसमें, जाहिर है, गालिब को प्रणीति देनी थी। उर्दू में किसी पुराने कवि की जमीन पर नया कुछ कहकर प्रणीति देने की एक खूबसूरत परंपरा है। लेकिन उस शाम हमारे दो बुजुर्ग शायरों कैफी आजमी और सरदार अली जाफरी ने इस परंपरा को तज दिया जबकि बाकी सबने उसे बखूबी निभाया। इस टिप्पणी में अशोक वाजपेयी ने जाफरी साहब पर गालिब से अलग हटकर गोष्ठी को हिंद-पाक दोस्ती के गुणगान के कार्यक्रम में बदलने के लिए व्यंग्य किया। अशोक वाजपेयी इतने पर ही नहीं रुके। उन्होंने जाफरी साहब की आलोचना करते हुए लिखा कि उन्होंने अहमद फराज की दोस्ताना नज्म के उत्तर में हिंद-पाक के 1965 के युद्ध के समय लिखी अपनी नज्म सुनाई । उनकी टिप्पणी थी, माना कि बम परीक्षण के बाद हिंद-पाक संबंध फिर से हमारी चिंता के विषय हो गए हैं पर इसका यह मतलब तो नहीं कि हर मौके पर उसी का राग अलापा जाने लगे, वह भी गालिब को प्रणिति देने के बजाय। 

अशोक वाजपेयी ने अली सरदार जाफरी की अवसरवादिता का एक और उदाहरण अपनी उसी टिप्पणी में दिया था। उन्होंने लिखा था कि जाफरी साहब ने ज्ञानपीठ पुरस्कार के अवसर पर ऐसी ही अवसरवादिता का परिचय अपने स्वीकृति भाषण में दिया। अव्वल तो भारतीय संस्कृति में कमल के फूल के महत्व पर बेमौके काफी देर तक बोले जिसपर स्वयं प्रधानमंत्री जी ने भी बाद में चुटकी ली। दूसरे, उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी की कविता उद्धृत की, प्रधानमंत्री जी को कवि की हैसियत से उनके बम-विरोध की याद दिलाने के लिए। अपनी टिप्पणी की अंतिम पंक्ति में अशोक वाजपेयी कहते हैं कि उम्र के इस पड़ाव पर जाफरी साहब को यह सब करने की क्या जरूरत है। आज से करीब 25 वर्ष पूर्व जब अशोक वाजपेयी उर्दू के दो कवियों के बहाने जिस बुजुर्ग अवसरवादिता को रेखांकित कर रहे थे वही अब परोक्ष रूप से उनके व्यवहार में या कर्म में दिखाई देता है। आयोजन को अपने फाउंडेशन के माध्यम से आर्थिक सहयोग देना और फिर उसी आयोजन में वक्ता बनना। यह तो ‘बुजुर्ग चौहान’ का अवसर का लाभ उठाने जैसा ही प्रतीत होता है। इस सहयोग का एक अन्य पहलू भी है। रजा फाउंडेशन के माध्यम से अशोक वाजपेयी साहित्य और संस्कृति की दुनिया में एक प्रतीकात्मक राजसत्ता की स्थापना कर रहे हैं। एक ऐसी राजसत्ता जिसमें साहित्यिक न्याय के लिए कोई जगह नहीं होगी। जिसमें समर्थकों और चाटुकारों को स्थान मिलेगा। स्थान उपलब्ध करवाने वाले के लिए नायकत्व का सृजन होगा। एक तरफ अपने राजनीतिक आकाओं के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कारों की वापसी का प्रपंच रचा जाता है दूसरी तरफ पूंजी की शक्ति का उपयोग करके पुरस्कारों का अधिग्रहण कर अपने समर्थकों को उपकृत किया जाता है। आयोजनों में ‘सहयोग’ देकर मंच हासिल करते हैं और फिर उस मंच से राग फासीवाद और समय का संकट जैसे राग अलापते हैं। अवसर मिलते ही ‘बुजुर्ग चौहान’ भारत जोड़ो यात्रा में शामिल होकर अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता, संबद्धता और संलिप्तता भी साबित करते हैं। 

एक जमाना था जब हिंदी पट्टी के साहित्यकार दिल्ली आते थे तो अकारण राजेन्द्र यादव से मिलने हंस पत्रिका के कार्यालय चले जाते थे। वहां जानेवालों का उद्देश्य साहित्य सत्ता के दरबार में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाना होती थी। नामवर सिंह के यहां भी पद और पुरस्कार के आकांक्षी लेखक अपनी हाजिरी लगाते थे। राजेन्द्र यादव और नामवर सिंह के निधन के बाद हिंदी के आकांक्षी लेखक अशोक वाजपेयी के दरबार में पहुंचने लगे। अशोक वाजपेयी के पास आर्थिक शक्ति भी है जिसका उद्घोष रजा फाउंडेशन से सहयोग प्राप्त, की पंक्ति निरंतर करती रहती है। ये पंक्ति आयोजनों की प्रचार सामग्री से लेकर पुस्तकों पर दिखती रहती है। हिंदी साहित्य में आपको कई ऐसे लेखक मिल जाएंगे जो रजा फाउंडेशन के लिए किसी दिवंगत हो गए लेखक की जीवनी लिख रहे होंगे। दिवंगत लेखक भी ‘बुजुर्ग चौहान’ की पसंद के होते हैं। लेखक को पैसे देकर जीवनी लिखवाना और फिर प्रकाशकों को सहायता प्रदान कर पुस्तकों का प्रकाशन। अब तो हालत यहां तक पहुंच गई है कि अपना साक्षात्कार भी ‘सहयोग और मदद’ से प्रकाशित करवा रहे हैं। परिणाम यह कि ‘बुजुर्ग चौहान’ के इर्द गिर्द आकांक्षी प्रकाशकों का जमावड़ा। आकांक्षी लेखक और आकांक्षी प्रकाशकों की मदद से नायकत्व का विस्तार होता जाता है। ‘बुजुर्ग चौहान’ फासीवाद-फासीवाद का राग भी अलापते रहते हैं लेकिन जब अपने नायकत्व को मजबूत कर रहे होते हैं तो एक प्रकार से साहित्यिक फासीवाद का पोषण कर रहे होते हैं। 

अशोक वाजपेयी ने सरदार जाफरी, कैफी आजमी से लेकर नामवर सिंह तक को अवसरवादी कहा और लिखा है। नामवर सिंह को तो उन्होंने उनके विचलनों के आधार पर अचूक अवसरवादी करार दिया था। जहां तक मुझे याद है तो इसी शीर्षक से एक लंबा लेख भी लिखा था। अपने साथी लेखकों को अवसरवादी करार देनेवाले अशोक वाजपेयी रजा फाउंडेशन के माध्यम से अपनी साहित्यिक महात्वाकांक्षओं की पूर्ति में लगे हैं। विचार करना होगा कि अपने को साहित्य का नायक स्थापित करने के लिए हर तरह के अवसर का लाभ उठाना अवसरवादिता है या नहीं। क्या साहित्य सेवा की आड़ में अपनी छवि को गाढ़ा करने का खेल अवसरवादिता है या नहीं। अंत में अशोक वाजपेयी के शब्दों के साथ में ही अगर कहूं तो, उम्र के इस पड़ाव पर आखिर ये सब करने की जरूरत क्या है।  


Saturday, October 28, 2023

मनोरंजन का कारोबार या एजेंडा सेटिंग


कुछ दिनों पूर्व दो वेबसीरीज आई जिसको लेकर काफी चर्चा रही। एक है बंबई मेरी जान और दूसरी है मुंबई डायरीज सीजन टू। दोनों वेबसीरीज मुंबई शहर की पृष्ठभूमि पर आधारित है। बंबई मेरी जान में 1960 के दशक में उस शहर के अपराध की दुनिया को दिखाया गया है। उस दौर में हाजी मस्तान से लेकर दाऊद इब्राहम, हसीना पार्कर, वरदराजन मुदलियार, करीम लाला जैसे गैंगस्टरों की कारस्तानियों और बांबे (अब मुंबई) पर कब्जे की लड़ाई को चित्रित किया गया है। मुंबई डायरीज के दूसरे संस्करण में मायानगरी में आई 2006 में आई भयानक बाढ के दौरान अस्पताल में डाक्टरों की कठिन जिंदगी को दिखाया गया है। इस सीरीज में न्यूज चैनलों के कामकाज पर भी कटाक्ष किया गया है। इस आलेख का मंतव्य सीरीज की समीक्षा नहीं बल्कि इनके माध्यम से दिए जानेवाले परोक्ष संदेश को रेखांकित करना है। मनोरंजन के माध्यमों का उपयोग करके किसी व्यक्तित्व, घटना या विचारधारा को पुष्ट किया जाता है, वो यहां स्पष्ट दृष्टिगोटर होता है। पहले बात करते हैं बंबई मेरी जान की। इस वेब सीरीज को रीतेश सिधवानी और फरहान अख्तर ने प्रोड्यूस किया है। दस एपिसोड का ये सीरीज एस हुसैन जैदी की पुस्तक डोंगरी टू दुबई, सिक्स डीकेड्स आफ द मुंबई माफिया पर आधारित है। इस सीरीज में विस्तार से हाजी मस्तान के आपराधिक साम्राज्य, उसकी कार्यशैली और फिर दाऊद इब्राहिम के अपराध की दुनिया में आने और छा जाने की परिस्थितियों को दिखाया गया है।

बंबई मेरी जान में के के मेनन ने दाऊद इब्राहिम के पिता इब्राहिम कासकर की भूमिका निभाई है। इस्लाइल कादरी नाम का ये शख्स पुलिस में होता है और उसको हाजी मस्तान, करीम लाला और वरदराजन मुदलियार के आपराधिक सांठगांठ को तोड़ने का काम सौंपा गया है। उसको एक बेहद ईमानदार पुलिस अधिकारी के तौर पर दिखाया गया है जो विषम परिस्थितियों में भी टूटने को तैयार नहीं होता है। नौकरी चली जाती है, गरीबी में पूरा परिवार बिखरने लगता है, बच्चे की पढ़ाई छूट जाती है, त्योहार पर घर में खाने या पकवान के लिए पैसे नहीं होते हैं। ऐसे माहौल में उसका बेटा दारा, जिसका चरित्र दाऊद इब्राइम पर आधारित है, बकरीद के मौके पर पहला अपराध करता है और बकरा चोरी करता है। यहां विचार करने योग्य बात ये है कि इस चोरी में भी मजहब को डालना क्यों जरूरी था। बकरीद के मौके पर बेचारे बच्चे को कुर्बानी देनी है, मांस खाना है इसलिए वो चोरी करता है। ऐसी परिस्थिति बना दी गई है कि दर्शकों को उसके अपराध के पीछे उसकी बेचारगी नजर आती है। जैसे जैसे दारा का चरित्र आगे बढ़ता है उसके अपराध को अन्य परिस्थितियों से जोड़ दिया जाता है। जब भी उसका पिता उसको अपराध के बाद किसी प्रकार का नसीहत देना चाहता है तो वो अपने पिता को उसकी बेचारगी और परिवार की बदहाली का ताना देकर अपने कुकर्मों को जस्टिफाई करता है। हाजी मस्तान जब इस्माइल कादरी के घर आता है। बच्चों को तोहफा देकर जाने लगता है तो कादरी विरोध करता है लेकिन उसकी पत्नी बच्चों की भूख का हवाला देकर उसके विरोध को कुंद कर देती है। 

पूरी कहानी इस तरह से बुनी गई है कि दाऊद जैसे अपराधी को लेकर दया का भाव उभरता है। उसको अच्छे बाप का बुरा बेटा दिखाया जाता है। चरित्र भले ही बुरा हो लेकिन बुराई में नायकत्व को उभारा गया है। वो हफ्ता भी वसूलता है तो मस्जिद के मरम्मत के नाम पर। एक बार फिर अपराध को जस्टिफाई करने के लिए मजहब की आड़ ली जाती है। कहीं भी कहानी में कहानीकार या सीरीज में निर्देशक ने उसके नायकत्व को गढ़ने में कोई कमी नहीं छोड़ी है। ऐसा नायक जिसके परिवार के पीछे दूसरे गैंगस्टर पड़े हैं, उसके परिवार पर अस्पताल में हमला होता है। परिवार की जान बचाने के लिए एक भाई गोली खाकर जख्मी होता है तो बहन गोली चलाने को मजबूर हो जाती है। यहां ऐसा माहौल बनाया गया है जैसे आत्मरक्षा में हत्या की जा रही हो। अपराधी  मनोरंजन की आड़ में छवि निर्माण की कोशिश या खूंखार छवि को अपेक्षाकृत माइल्ड करने का प्रयास दिखता है। इस स्तंभ में पहले भी इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि कैसे वेब सीरीज निर्माताओं, निर्देशकों और कहानीकारों के एजेंडा का संवाहक बनता जा रहा है। वेबसरीज को लेकर जिस भी प्रकार का स्वनियमन हो लेकिन उसका प्रभाव कहीं दिखता नहीं है। फिक्शन की आड़ में कई तरह के खेल होते नजर आते हैं।

बंबई मेरी जान की तुलना में मुंबई डायरीज का दूसरा सीजन बेहतर है। इसमें न्यूज चैनल की एक एंकर को अपने शो की रेटिंग बढ़ाने के लिए शहीद की पत्नी की भावनाओं से खेलते हुए दिखाया गया है। ये घटना काल्पनिक हो सकती है लेकिन पीड़ितों को स्टूडियो में बैठाकर उनके आरोपों को प्रसारित होते तो हमारे देश ने देखा है। जब दिल्ली में निर्भया कांड हुआ तो पीड़ित लड़की के साथ बस में उसका जो दोस्त था उसको टीवी स्टूडियो में बिठाने की होड़ लगी थी। न्यूज चैनलों में जिस प्रकार का मीडिया ट्रायल होता है उसका चित्रण मुंबई डायरीज में है। डाक्टर किन परिस्थितयों में काम कर रहे होते हैं उसको जाने बगैर उनपर आरोपों की बौछार करना। असाधारण परिस्थिति में उनसे सामान्य परिस्थितियों की तरह व्यवहार की अपेक्षा कर दोषी ठहरा देने की प्रवृत्ति पर भी प्रहार किया गया है। लेकिन इस वेब सीरीज में भी यथार्थ चित्रण के नाम पर जिस तरह के दृष्य दिखाए गए हैं वो इस सैक्टर में नियमन या प्रमाणन की आवश्यकता को पुष्ट करते हैं। बाढ में फंसी गर्भवती महिला की स्थिति जब बिगड़ती है तो उसकी शल्यक्रिया का पूरा दृष्य दिखाना जुगुप्साजनक है। कैमरे पर आपरेशन के दौरान पेट को चीरने का दृश्य, खून से लथपथ बच्चे को माता के उदर से बाहर निकालने आदि से बचा जा सकता था। कोई भी संवेदनशील दर्शक ऐसे दृश्यों को नहीं देखना चाहता है। इस तरह के दृश्यों को दिखाकर निर्माता निर्देशक पता नहीं क्या हासिल करना चाहते हैं। 

ओवर द टाप (ओटीटी) पर एक फिल्म आई खुफिया उसमें एक संवाद है, जबतक दुनिया देश और धर्म में बंटी है तब तक खूनखराबा होता रहेगा।इस संवाद में भी एक एजेंडा है जहां परोक्ष रूप से राष्ट्र की अवधारणा का निषेध किया जा रहा है। एक विचारधारा विशेष में वर्षों से देशों की भौगोलिक सीमाओं को खत्म करने की पैरोकारी करता रहा है। उनका मानना है कि इससे युद्ध से लेकर समुदायों के बीच की घृणा समाप्त होगी। यहां तक तो ठीक है लेकिन जब उसको धर्म से जोड़ दिया जाता है तो मंशा स्पष्ट होने लगती है। प्रमाणन के बावजूद इस तरह के संवाद फिल्मों में दिख जाते हैं, पता नहीं क्यों और कैसे। फिल्म ब्रह्मास्त्र में मंदिरों के शहरों की बात होती है तो एक संवाद आता है, इस शहर में हर कोई कुछ न कुछ छुपाने आता है, कोई अपनी परछाईं छुपाता है तो कोई अपने पाप। आखिर धर्म से बड़ा मुखौटा और क्या हो सकता है। यहां जिस तरह से मंदिर, धर्म और मुखौटा का प्रयोग किया गया है उससे निर्माता निर्देशक की मंशा साफ हो जाती है। प्रमाणन वाली फिल्मों में इस तरह के संवाद अपेक्षाकृत कम होते है लेकिन ओटीटी पर प्रदर्शित होनेवाली फिल्मों में और वेब सीरीज में तो ये आम है। ओटीटी इंडस्ट्री के स्वनियमन का असर नहीं दिख रहा है, सरकार को इस दिशा में कदम उठाना चाहिए। ओटीटी प्लेटफार्म्स को काफी अवसर दिए गए लेकिन वहां की अराजकता जस की तस है।   

  


Saturday, October 21, 2023

हिंदी फिल्मों के अच्छे दिन


हम आपके लिए सितारे लेकर आते हैं और आप उनमें चमक भरते हैं। कुछ दिनों पहले सिनेमा हाल के कारोबार की कंपनी पीवीआऱ आईनाक्स ने अपने विज्ञापन में ये भी बताया कि इस वर्ष जुलाई- सितंबर की तिमाही में उसके सिनेमाघरों में चार करोड़ अस्सी लाख दर्शक पहुंचे। । पीवीआर के पास देशभर के 115 शहरों में 1702 स्क्रीन हैं। इस विज्ञापन को देखकर मस्तिष्क में एक बात कौंधी कि अगर तीन महीने में पीवीआर के मल्टीप्लेक्सों में करीब पांच करोड़ दर्शक फिल्म देखने पहुंचे तो अगर इसमें सिंगल थिएटर और अन्य मल्टीप्लेक्स शृंखलाओं के दर्शकों को जोड़ दिया जाए तो आंकड़े कहीं और ऊपर चले जाएंगे। देशभर में सिंगल थिएटरों की संख्या में निरंतर कमी आ रही है। फिल्म फेडरेशन आफ इंडिया की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकडों के मुताबिक देशभर में सिंगल थिएटर 10167 हैं। अगर इन आंकड़ों में कमी भी आई होगी तो छह से सात हजार तक सिंगल थिएटर तो देश में हैं हीं। पीवीआर के आंकड़े संकेत कर रहे हैं कि सिनेमा का दर्शक एक बार फिर से सिनेमाघरों की ओर लौट रहा है। पीवीआर के इन आंकड़ों को देखने के बाद सिनेमाप्रेमी होने के कारण मन में संतोष हुआ लेकिन ये जिज्ञासा भी हुई कि देखा जाए कि किन फिल्मों ने ये चमत्कार किया। खिन फिल्मों के कारण जुलाई-सितंबर की तिमाही में बाक्स आफिस पर खुशी का वातावरण देखने को मिल रहा है। 

जागरण फिल्म फेस्टिवल के दौरान मुंबई में फिल्मकारों से चर्चा हो रही थी। पटकथा लेखक हैदर रिजवी ने एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी। उन्होंने बताया था कि अब मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में लोगों के चेहरे खिले हुए हैं। लोगों का विश्वास वापस लौटता दिख रहा है। उस समय ये बात आई गई हो गई। अब सोचता हूं तो ऐसा लगता है कि इस बात में कई संकेत छिपे हुए थे। फिल्मों से जुड़े लोगों का विश्वास वापस लौटना और उनके चेहरे के खिलने का सीधा संबंध सिनेमाघरों में दर्शकों की वापसी और मुनाफा से जुड़ा हुआ है। पिछले दिनों ओरमैक्स मीडिया की सिंतबर की बाक्स आफिस रिपोर्ट आई थी। ओरमैक्स मीडिया हर महीने के तीसरे सप्ताह में पिछले महीने की बाक्स आफिस रिपोर्ट जारी करती है जिसमें फिल्मों के कारोबार की जानकारी होती है। ओरमैक्स मीडिया की रिपोर्ट पर फिल्म इंडस्ट्री और उससे जुड़े लोगों का विश्वास है। ऐसा माना और कहा जाता है। सिंतबर की भारत की बाक्स आफिस रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। सितंबर 2023 में प्रदर्शित फिल्मों ने घरेलू बाक्स आफिस पर 1353 करोड़ रुपए का कारोबार किया है। इस वर्ष प्रदर्शित फिल्मों के आंकड़ों पर नजर डालें तो फिल्म के कारोबार की तस्वीर बेहद अच्छी नजर आती है। इस वर्ष अबतक फिल्मों ने 8798 करोड़ रुपए का कारोबार किया है जो पिछले वर्ष से छह प्रतिशत अधिक है। 

दरअसल कोरोना महामारी के दौरान सिनेमाघरों से दर्शक दूर हो गए थे और कई बड़े बजट की फिल्में भी बाक्स आफिस पर अच्छा नहीं कर पाई थीं। इस वर्ष का आरंभ भी काफी अच्छा रहा था। उसके बाद के महीनों में भी प्रदर्शित गदर-2, पठान और जवान ने बाक्स आफिस पर बंपर कमाई की। इन तीनों फिल्मों ने अलग अलग 600 करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार किया है। अब भी इनको दर्शक मिल रहे हैं। 66 वर्ष के अभिनेता सनी देओल ने जब लंबे अंतराल के बाद फिल्मों में वापसी की तो गदर 2 में उनका जादू सर चढ़कर बोला। इस फिल्म की सफलता का अनुमान फिल्मों से जुड़े लोग भी नहीं लगा पाए थे। इसी तरह 57 वर्ष के अभिनेता शाह रुख खान को भी दर्शकों ने खूब पसंद किया। उनकी फिल्म पठान 646 करोड़ रुपए तो फिल्म जवान ने 733 करोड़ रुपए का कारोबार किया। इन अधेड़ उम्र के अभिनेताओं के साथ साथ तमिल फिल्मों के सुपर स्टार 72 वर्षीय के रजनीकांत की फिल्म जेलर ने भी भारत में करीब चार सौ करोड़ रुपए का कारोबार करके ये साबित किया कि दक्षिण भारतीय फिल्मों के बास का जलवा अब भी कायम है। इन सबके बीच एक फिल्म आई ओएमजी-2 । इसमें पंकज त्रिपाठी, यामी गौतम के अलावा अक्षय कुमार भी संक्षिप्त भूमिका में हैं। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से काफी दिक्कतों के बाद पास हुई इस फिल्म ने भी भारत में 200 करोड़ रुपए से अधिक का बिजनेस किया। इस फिल्म के निर्देशक अमित राय की जमकर प्रशंसा हुई। फिल्म से जुड़े लोगों का मानना है कि अगर फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने इस फिल्म को वयस्क फिल्म (ए सर्टिफिकेट) की बजाए यूनिवर्सल (यू) प्रमाण पत्र दिया तो इसका कारोबार और भी बेहतर हो सकता था। इस फिल्म ने न केवल अच्छा कारोबार किया बल्कि अक्षय कुमार को लगातार पांच फिल्मों की असफलता के बाद सफलता का स्वाद भी चखाया। तमाम विवादों के बीच भी फिल्म आदिपुरुष ने 331 करोड़ रुपए का और द केरला स्टोरी ने ढाई सौ करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार किया। इन फिल्मों ने दर्शकों को सिनेमाघरों में लौटाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। फिल्मों की इस सफलता में हिंदी फिल्मों की हिस्सेदारी 42 प्रतिशत है जबकि तमिल और तेलुगु फिल्मों की हिस्सेदारी सोलह सत्रह प्रतिशत के करीब है। 

कोरोना महामारी के समय भी और उसके बाद भी फिल्मों को लेकर कई फिल्मी पंडित सशंकित हो गए थे। उनको लगने लगा था कि हिंदी फिल्मों का बाजार खत्म हो गया है। पिछले वर्ष उन्होंने ये भवियवाणी तक कर दी थी कि अब दक्षिण भारतीय फिल्में ही चलेंगी। उस समय भी कार्तिक आर्यन की फिल्म भूल भुलैया-2 ने उम्मीद जगाए रखी थी और ढाई सौ करोड़ रुए से अधिक का कारोबार किया था। अजय देवगन और तब्बू की फिल्म दृश्यम 2 ने और भी अच्छा बिजनेस किया था। उस फिल्म ने बाक्स आफिस पर तीन सौ करोड़ रुपए के करीब अर्जित किया था। इन सभी सफल फिल्मों पर नजर डालें तो इनमें से कई पुरानी फार्मूला वाली फिल्में हैं। जिसमें जबरदस्त एक्शन है, रोमांस है और ऐसे संवाद हैं तो दर्शकों को पसंद आते हैं। लगता है कि दर्शकों को हल्का फुल्का मनोरंजन पसंद आ रहा है। द केरला स्टोरी और ओएमजी 2 में कहानी अलग हटकर है। द केरला स्टोरी और ओएमजी 2 दोनों में यथार्थ बहुत मजबूती के साथ उपस्थित है। अच्छी कहानी और अच्छा मनोरंजन दोनों दर्शकों को पसंद आ रहे हैं। आनेवाले दिनों में सलमान खान की फिल्म टाइगर 3, शाह रुख खान की डंकी और प्रभास की सालार आनेवाली है, जिसको लेकर दर्शकों के बीच उत्सुकता है। अगर इन तीनों फिल्मों ने बहुत अच्छा कारोबार किया तो ये वर्ष भारतीय फिल्मों के लिए बहुत अच्छा वर्ष साबित होगा। फिल्मों के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती है दर्शकों को सिनेमाघरों की तरफ निरंतर आकर्षित करते रहने की। इसके लिए फिल्मों के टिकटों की दरें कम करनी चाहिए। कई बार सिनेमाघर इस तरह के प्रयोग कर भी रहे हैं। जब वहां किसी विशेष दिन टिकटों की दर सौ रुपए के करीब रखा जाता है तो उस दिन दर्शकों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक रहती हैं। सिनेमाघरों में टिकटों के मूल्य के साथ साथ वहां मिलनेवाले खाद्य सामग्रियों और पेयजल के मूल्य पर भी ध्यान देना चाहिए और दर्शकों को उचित मूल्य पर उपलब्ध होना चाहिए। एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति अपने परिवार के साथ फिल्म देखने जाता है तो टिकट और इंटरवल में पापकार्न और चाय काफी के लिए उसे दो हजार रुपए तक खर्च करने पड़ते हैं। ऐसे में वो सोचता है कि एक दो महीने बाद फिल्म ओटीटी प्लेटफार्म पर आ ही जाएगी, तब देख लेंगे। इस धारणा को कमजोर करना होगा ताकि फिल्मों के प्रति दर्शकों का प्रेम बना रहे।   

Saturday, October 14, 2023

आतंक का हथियार यौनिक हिंसा


इजरायल पर हमास के आतंकवादी हमले के दौरान पूरी दुनिया ने देखा कि किस तरह से आतंकवादियों ने एक इजरायली महिला के साथ क्रूर बर्ताव किया। किस तरह से मजहबी नारे लगाकर महिलाओं को निर्वस्त्र करके गाड़ी में बंधक बना कर उनके शरीर के साथ खिलवाड़ किया गया। किस तरह से महिलाओं को घरों से पकड़कर गाड़ियों में जबरन ठूंस कर अज्ञात स्थान पर ले गए। किस तरह से महिलाओं की गोद से उनके बच्चों को छीनकर या तो गोली मार दी गई या फिर उनको काट डाला गया। किस तरह से उनको बंधक बनाकर मनमानी की जा रही है। आतंकी हमले में महिलाओं के साथ जिस तरह का अमानवीय और क्रूर व्यवहार किया गया उससे सभ्य वैश्विक समाज की ओर बढ़ रही दुनिया के सामने एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया। इजरायल पर इतने बड़े आतंकी हमलों के कारणों पर चर्चा करनेवाले अधिकर विशेषज्ञों को महिलाओं के इस भयानक दर्द का अनुमान नहीं है, ऐसा प्रतीत होता है। इनमें से अधिकतर विशेषज्ञ भौगोलिक और राजनीतिक कारणों की पड़ताल और उसके विश्लेषण में जुटे हैं। विशेषज्ञों के लंबे लंबे वक्तव्यों और राजनियक दांव पेंच को समझाने के प्रयासों में भी कहीं महिलाओं का ये दर्द दिखता नहीं है। अगर कोई इसकी चर्चा करता है तो बस एक दो पंक्तियों में । अपने देश में तो कुछ लोग हमास की आतंकी वारदात पर बोलने से भी कतरा रहे हैं। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी ने अपनी कार्यसमिति की बैठक के बाद जो प्रस्ताव पास किया उसमें हमास और आतंकी वारदात का उल्लेख तक नहीं किया। महिलाओं के दुख और दर्द की बात तो बहुत दूर प्रतीत होती है। कई विशेषज्ञ तो हमास के आतंकी कारनामे को ऐसिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयत्न कर रहे हैं। इजरायल और फिलस्तीन में हो रहे बम धमाकों के बीच महिलाओं की चीखें दब गई हैं। 

ऐसे समय में याद आता है तीन वर्ष पहले प्रकाशित ब्रिटिश पत्रकार और लेखक क्रिस्टीना लैंब की पुस्तक ‘आवर बाडीज देयर बैटलफील्ड, व्हाट वार डज टू वूमन’। अपनी इस पुस्तक में क्रस्टीना लैंब ने विस्तार से केस स्टडीज के साथ बताया है कि किस तरह से युद्ध के दौरान बलात्कार को हथियार के तौर पर उपयोग में लाया जाता है। लैंब का कहना है कि बलात्कार युद्ध का सबसे सस्ता हथियार है जिसका उपयोग पुरुष करते हैं। इस हथियार से युद्ध के दौरान परिवारों को तबाह कर दिया जाता है। पूरे इलाके को आतंक के साये में जीने को मजबूर किया जा सकता है। इस हथियार से पीढियों को तबाह किया जा सकता है। इस पुस्तक में लेखिका ने प्रथम विश्व युद्ध से लेकर हाल के दिनों के युद्धों औपर हिंसाग्रस्त क्षेत्रों का विश्लेषण किया है। अमेरिका के राष्ट्रपति रहे अब्राहम लिंकन के वर्ष 1863 में जारी किए गए उस कोड की चर्चा भी करती हैं जो अमेरिका के सिविल वार के समय सैनिकों को रेप से रोकता है। प्रथम विश्व युद्ध के समय तुर्की (अब तुर्किए) के सैनिकों ने आर्मेनिया में जो नरसंहार किया था तब भी बलात्कार और यौनिक हिंसा पर गहन विचार किया गया था। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी यौन हिंसा में किसी प्रकार की कमी देखने को नहीं मिली थी। उस दौरान भी दोनों पक्षों पर महिलाओं के दौहिक शोषण के आरोप लगे थे। युद्ध अपराधियों के विरुद्ध विशेष अंतराष्ट्रीय अदालतों में सुनवाई भी हुई थीं लेकिन वहां भी रेप के किसी आरोपी को सजा नहीं हो सकी थी। सजा तो बहुत दूर की बात किसी भी कोने से स्टालिन के सैनिकों का सैकड़ों जर्मन महिलाओं से बलात्कार पर बात भी नहीं हुई। इस मसले पर उस समय भी खामोशी ओढ़ ली गई थी। स्पेन की महिलाओं से बलात्कार और उनके वक्ष काटने की दर्दनाक वारदात पर भी किसी तरह की बात ना होना अब भी मानवता के सामने एक बड़ा प्रश्न है। दरअसल तब युद्ध के दौरान बलात्कार को उस वक्त के राजनेता अपराध नहीं मानकर युद्ध का एक हिस्सा मानते थे। 

1949 में जब जेनेवा कंन्वेशन हुआ तो उसकी धारा 27 में ये स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया कि युद्ध के दौरान महिलाओं की मर्यादा की विशेष रूप से रक्षा की जाएगी, बलात्कार और वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर नहीं किया जा सकेगा। इस समय से लेकर इसपर चर्चा तो होती रही लेकिन किसी प्रकार से इसको रोका नहीं जा सका। 19 जून 2008 को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद ने एक निर्णय लिया जिसके अनुसार बलात्कार और अन्य प्रकार की यौनिक हिंसा को युद्ध अपराध और मानवता के विरुद्ध अपराध माना जाएगा। इसके एक वर्ष बाद हिंसाग्रस्त क्षेत्र में यौनिक हिंसा को लेकर संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के प्रतिनिधि की नियुक्ति की गई। उसके बाद भी विश्व के कई देशों में हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में महिलाओं के खिलाफ यौनिक अपराध में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं आई।  बोस्निया से लेकर रवांडा और इराक से लेकर नाइजीरिया तक के हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में महिलाओं के खिलाफ जिस तरह की वारदातें आतंकी संगठनों ने की उसपर अंतराष्ट्रीय संगठनों का ध्यान तो गया लेकिन उसको रोकने के लिए किसी प्रकार का कारगर कदम नहीं उठाया गया। अब भी ये कहा जाता है कि युद्ध के दौरान क्लाश्निकोव बंदूक से ज्यादा असरकारी बलात्कार होता है। बोको हरम से लेकर इस्लामिक स्टेट (आईएस) के आतंकी हिंसक वारदातों के दौरान महिलाओं को निशाना बनाते हैं। इस प्रकार की कई कहानियां कई जगहों से सामने आई जिसमें आईएस के आतंकी किसी परिवार को बंधक बनाते हैं तो पहले उस परिवार के पुरुषों और महिलाओं को अलग करते हैं। पुरुषों को या तो मार डालते हैं या उनको छोड़कर महिलाओं को बंधक बनाकर अपने कैंप्स में ले आते हैं। वहां महिलाओं को यौन गुलामों की तरह से रखा जाता है और उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया जाता है। कई बार तो आतंकी गुट बंधक बनाई गई महिलाओं को दूसरे आतंकी गुट को बेच भी देते हैं। बंधक बनाई गई महिलाओं को ऐसी जगहों में रखा जाता है जो नरक से भी खराब स्थिति में होते हैं। उनको भूखा रखा जाता है, पानी नहीं दिया जाता है, चारों ओर पसीने और मलमूत्र का दुर्गंध होता है। इस तरह की नारकीय जीवन में भायनक यातनाएं भी दी जाती हैं। 

इजरायल में जिन यहूदी महिलाओं को हमास के आतंकवादियों ने बंधक बना लिया है उनके साथ किस तरह का बर्ताव हो रहा होगा ये तो उनमें से एक दो महिलाओं के आजाद होने के बाद ही पता चल सकेगा। लेकिन इन आतंकवादी संगठनों का जो इतिहास रहा है उसको देखते हुए इस बात की कल्पना की जा सकती है किस तरह की नारकीय यातना ये इजरायली महिलाओं को गुजरना पड़ रहा होगा। इजरायल ने गाजा पट्टी पर हमला आरंभ कर दिया है। बहुत संभव है कि वो अपने क्षेत्र से आतंकवादियों का खात्मा भी कर देगा लेकिन जो नारकीय यातनाएं बंधक बनाई गई यहूदी  महिलाओं ने झेली हैं उसका बदला न तो लिया जा सकता है और ना ही उस दर्द और यातना को कम किया जा सकता है। आज पूरे विश्व को ये सोचना होगा कि जो आतंकवादी मानवता के दुश्मन हैं या जो संगठन हिंसा को हर समस्या का हल मानते हैं उनको किस तरह से काबू में किया जाए। इतना ही आवश्यक है कि इन हिंसक वारदातों के दौरान अगर महिलाओं के खिलाफ वारदात सामने आते हैं तो उसके लिए भी असाधारण सजा का प्रविधान किया जाए। पूरी दुनिया को इसमें एकजुट होना होगा अन्यथा मानवता का ये कलंक कभी खत्म नहीं हो पाएगा। 


Sunday, October 8, 2023

साहित्य के इतिहास का ओझल पक्ष


बुधवार को एक साहित्यिक गोष्ठी में जाने का अवसर मिला। ये गोष्ठी हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जन्मतिथि पर आयोजित की गई थी। गोष्ठी में मंचासीन अधिकतर वक्ता विश्वविद्यालयों के शिक्षक थे। कार्यक्रम दो घंटे तक चला और सभी वक्ताओं ने आचार्य शुक्ल को हिंदी साहित्य का पहला व्यवस्थित और प्रमाणिक इतिहास लिखने के लिए याद किया। एक वक्ता ने आचार्य शुक्ल को नामवर सिंह के हवाले से उनको हिंदी नवजागरण से जोड़ते हुए उनके योगदान को रेखांकित किया। गोष्ठी का नियत समय दो घंटे था लेकिन समय अधिक लग गया। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद घर वापस लौटते हुए गोष्ठी में हुई चर्चा को याद कर रहा था। वहां आचार्य रामचंद्र शुक्ल के लेखकीय व्यक्तित्व के अपेक्षाकृत अधिक ज्ञात पक्षों पर चर्चा हुई। अपने समय की राजनीति पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी और अंग्रेजी में जो टिप्पणियां की थीं उसका किसी वक्ता ने उल्लेख नहीं किया। शुक्ल जी ने अपने लेखों में इतिहास पर लिखा, धर्म पर विचार किया, विज्ञान पर चर्चा की। अंग्रेजी में जो लेख उन्होंने लिखे उसमें कई जटिल विषयों पर अपने विचार जनता के समक्ष प्रस्तुत किए। उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों के संबंधों पर लिखा। जाति व्यवस्था से लेकर धर्म के विकास पर विस्तार से लिखा। गांधी के असहयोग आंदोलन की आलोचना की आदि। उन्होंने उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद में विभेद करते हुए अंग्रेजों को साम्राज्यावादी करार दिया था। 

आज इतिहास के पुर्नलेखन को लेकर बहुत चर्चा होती है। पक्ष विपक्ष में अनेक प्रकार के तर्क दिए जाते हैं। मौजूदा सरकार पर कथित प्रगतिशील बुद्धिजीवी आरोप लगाते हैं कि वो इतिहास बदलने की कोशिश कर रही है। इतिहास के पुनर्लेखन का अर्थ ये नहीं है कि इतिहास की घटनाओं को बदल दिया जाएगा। पुनर्लेखन का अर्थ है कि इतिहास लेखन को संतुलित और समग्र किया जाए। आचार्य शुक्ल के संबंध में जो लेखन हुआ या उनके लिखे पर बाद में जो विचार हुआ उसमें उनके व्यक्तित्व के कई आयामों को छोड़ दिया गया। जहां उन्होंने कांग्रेस की आलोचना की, जहां उन्होंने गांधी के कदमों को प्रश्नांकित किया उसको ओझल करने का प्रयास किया है। इस तरह का व्यवहार सिर्फ आचार्य शुक्ल के साथ ही नहीं किया बल्कि उन सभी लोगों के साथ किया गया जिन्होंने कांग्रेस की, गांधी की आलोचना की। उन सभी विचारों को बौद्धिक जगत की परिधि पर पहुंचाया गया ताकि उनपर कम से कम चर्चा हो सके। शुक्ल जी के राजनीतिक लेखों को आगे न बढ़ाकर उनको साहित्य के इतिहासकार और निबंधकार के रूप में रिड्यूस करने का खेल भी खेला गया। इसको लेकर एक जमाने में प्रगतिशील माने जाने वाले नामवर सिंह को भी कहना पड़ा कि हिंदी के लेखकों को बार-बार ये पढ़ाने और समझाने की कोशिश की जाती है कि यदि इंडियन नेशनल कांग्रेस न होती तो राष्ट्रीय चेतना हिंदी लेखकों में आई ही न होती। स्वाधीनता संग्राम का इतिहास सचमुच नए सिरे से लिखा जाना चाहिए और देखना चाहिए कि स्वाधीनता संग्राम में रोष्ट्रीय चेतना और स्वाधीनता की चेतना के विकास में देशी भाषाओं के लेखकों और साधारण जनता की क्या भूमिका है, उनकी अपेक्षा, जो अंग्रेजी माध्यम से इन तमाम चीजों का प्रचार किया करते थे। 1928 में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा था, कांग्रेस वर्ष में किसी एक दिन कहीं किसी बड़ी सभा में एकत्र होकर प्रस्ताव पास किया करती थी और स्वाधीनता की मांग याचना से आगे नहीं बढ़ती थी। 

जब उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद को लेकर बहस चल रही थी तो 1907 में ही आचार्य शुक्ल ने द हिन्दुस्तान रिव्यू में एक लेख लिखकर स्पष्ट किया था कि साम्राज्यावद ही भारत में ब्रिटिश राज की नीति की प्रेरक शक्ति रही है। नामवर सिंह ने माना था कि आच्राय शुक्ल ही पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने साम्राज्यावाद पर अंगुली रखी। उनके अनुसार इसके पहले किसी ने अंग्रेज भारतीय शासकों को इतने स्पष्ट शब्दों में साम्राज्यवादी नहीं कहा था। तब नामवर सिंह ने इस बात की अपेक्षा जताई थी कि विश्वविद्यालयों में इसपर शोध होना चाहिए। नामवर सिंह ये बातें तो कहते रहे लेकिन उन्होंने शुक्ल जी पर इस तरह का कोई शोध करवाया हो ये ज्ञात नहीं है। स्वाधीनता आंदोलन में रत कांग्रेस पार्टी को भी उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद को समझने में काफी समय लगा। इसी कारण से कांग्रेस को स्वराज्य और स्वाधीनता का स्वरूप तय करके उसके बारे में मत बनाने में भी समय लगा। लाहौर अधिवेशन में आकर कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य की मांग की। आचार्य शुक्ल का एक और महत्वपूर्ण राजनीतिक लेख है जो उन्होंने असहयोग आंदोलन के समय लिखा था। आचार्य शुक्ल ने तब कहा था कि असहयोग आंदोलन देश के पूंजीपतियों का पक्षधर है। इस आंदोलन से पूंजीपतियों का हित हो रहा है। पश्चिम के राष्ट्र अपने को जिससे मुक्त करना चाह रहे हैं उसी पूंजीवाद की ओर यह बढ़ता कदम है। यह पूंजी बटोरने और समाज में व्यक्तिवादी जीवन मूल्यों के क्षुद्र अमेरिकी मानदंड स्थापित करने का प्रयास भर है। अगर 1907 में लिखे आचार्य शुक्ल के लेख और असहोयग आंदोलन पर लिखे उनके लेख को देखें तो ये पता चलता है कि किस तरह से हिंदी का एक लेखक स्वाधीनता आंदोलन के विभिन्न कोणों को देखते हुए उसकी व्याख्या कर रहा था। सिर्फ व्याख्या ही नहीं बल्कि उसकी स्वस्थ आलोचना कर समाज में एक नया विमर्श स्थापित करना चाहता था। आचार्य शुक्ल का एक और अधूरा लेख हिंदी साहित्य के सामने है जिसमें उन्होंने जाति व्यवस्था पर विचार किया था। 

आचार्य शुक्ल ने 1917 में लीडर पत्रिका में एक लेख हिंदी और मुसलमान नाम से लिखा था। इस लेख में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि उर्दू कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है। यह पश्चिमी हिंदी की एक शाखा मात्र है जिसे मुसलमानों द्वारा अपनी ऐकांतिक रुचियों और पूर्वग्रहों के अनुकूल एक निजी रूप दे दिया है। अपने इस लेख में रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी और उर्दू को लेकर जो भ्रांतियां विदेशी भाषाविज्ञानियों द्वारा पैदा की गई हैं उसका खंडन भी किया है। यह लेख उर्दू और हिंदी के संबंधों को समझने के लिए आवश्यक लेख है। हिंदी और उर्दू के बीच जो खिंचाव दिखाई देता है उसके ऐतिहासिक कारण है। कुल मिलाकर अगर देखा जाए तो आचार्य शुक्ल सिर्फ हिंदी साहित्य का इतिहास लिखनेवाले लेखक नहीं थे बल्कि जैसी वो अपेक्षा करते थे वैसा ही उनका व्यक्तित्व भी था। वो एक साथ समाज सुधारक, राजनीतिक आंदोलनकर्ता, कवि और शिक्षाशास्त्री थे। आचार्य शुक्ल हिंदी के एक ऐसे लेखक थे जिनसे देश की नई पीढ़ी का परिचय करवाना बहुत आवश्यक है। उनके लेखन के विविध कोणों पर व्यापक शोध की आवश्यकता भी है ताकि उनके ओझल हो चुके विचारों को सामने लाया जा सके। इतिहास का पुनर्लेखन इसलिए भी आवश्यक है कि शुक्ल जी जैसे लेखकों का सोच समग्रता में सामने आ सके।         


Saturday, September 30, 2023

नारी शक्ति का जयघोष करती फिल्म


हिंदी के वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण सिनेमा प्रेमी थे। कविता के अलावा उनको जब भी अवसर मिलता था तो वो वैश्विक सिनेमा को लेकर टिप्पणी किया करते थे। 1992 में उनका एक लेख प्रकाशित हुआ था। उस लेख में उन्होंने लिखा था, कि सफल फीचर फिल्म के कथानक के साथ साथ वृत्तात्मक पक्ष सबल होना उसकी प्रामाणिकता को स्थापित करने में विशेष महत्व रखता है तथा कथानक को अतिरिक्त गहराई देने में सहायक होता है। भारतीय फिल्मों में स्थानीयता या वातावरण को बिल्कुल सजावटी ढंग से रख दिया जाता है, इस कारण उनका कोई चारित्रिक महत्व नहीं उभरता है। पिछले दिनों विवेक अभिनेत्री निर्देशित और नाना पाटेकर और पल्लवी जोशी अभिनीत फिल्म द वैक्सीन वार देखा। इस फिल्म को देखने के बाद सहसा कुंवर नारायण की उक्त पंक्तियों का स्मरण हो उठा। फिल्म द वैक्सीन वार में कथानक के साथ-साथ निर्देशक जिस प्रकार के वातावरण की निर्मिति करता है वो कथानक को अतिरिक्त गहराई देता है। फिल्म का पहला ही दृष्य इसका संकेत दे दाता है। कोविड महामारी के दौरान लाकडाउन में स्कूटर से एक विज्ञानी का पुलिस बैरीकेड को पार करने की कोशिश करना। बैरीकेड पर खड़े पुलिसवाले की सख्ती दिखाना और उसके बाद विज्ञानी को धक्का देना। इन दृष्यों से निर्देशक जिस वातावरण का निर्माण करता है वो ये बताने के लिए पर्याप्त है कि कैसे फिल्म का कथानक वातावरण से प्रामाणिकत हो जाता है। सिर्फ इतना ही नहीं कोविड के दौरान इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च के कार्यालय का वातावरण और वहां काम करनेवालों की कशमकश को दिखाकर निर्देशक ने एक वातावरण का निर्माण करने का सफल प्रयास किया है। 

इटली के प्रसिद्ध फिल्मकार फ्रांचेस्को रोसी की एक फिल्म है क्रानिकल आफ ए डेथ फोरटोल्ड। ये फिल्म मशहूर कथाकार मार्खेज के उपन्यास पर आधारित है। कुंवर नारायण ने लिखा है कि फिल्म की असली ताकत को जहां दर्शक महसूस करते हैं वो है स्थान और वातावरण के साथ चरित्रों कि पक्की पहचान स्थापित कर सकने की वृत्तात्मक क्षमता। मार्खेज अपने उपन्यासों में जादुई यथार्थवाद का चित्रण करने के लिए जाने जाते हैं। इस उपन्यास में भी मार्खेज ने अपने स्टाइल में जो चित्र खींचा है उसको रोसी ने अपनी फिल्म में दृष्यों के माध्यम से संभव कर दिखाया है। विवेक अग्निहोत्री की फिल्म द वैक्सिन वार आईसीएमआर के पूर्व निदेशक डा बलराम भार्गव की पुस्तक गोइंग वायरल, मेकिंग आफ कोवैक्सीन पर आधारित है। इसमें और रोसी की फिल्म कला में एक और समानता है। रोसी ने अपनी फिल्म के अंत में स्त्री का अपने पति से प्रेम और सुलह को फिल्मी अंदाज में लाकर खड़ा कर दिया। मार्खेज का जो उपन्यास है वो प्रेम की भावना का अभिनय नहीं है, वो मनुष्य की उच्छृंखल कामुकता और उद्दात प्रेम के बीच अंतर करते हैं। फिल्म में हत्या को फिल्मी अंदाज में चित्रित किया है जबकि उपन्यास में मार्खेज अधिक संयत तरीके से जीवन मूल्यों को उभारते हैं। इसी तरह से विवेक अग्निहोत्री भी फिल्म के अंत में वैक्सीन को बनाने से रोकने के षडयंत्रों पर अधिक केंद्रित हो जाते हैं और कथानक उपन्यास से थोड़ा अलग दिखता है। महानगरों में बैठे कुछ फिल्म समीक्षकों को ये फिल्म का कमजोर पक्ष लग सकता है लेकिन इसके पीछे जो एक वैचरिक संघर्ष दिखता है, भारत और भारत के विज्ञानियों की मेहनत को कमतर करने की अंतराष्ट्रीय साजिश दिखाई गई है उसको रेखांकित किया जाना आवश्यक है। रोहिणी सिंह धूलिया तो एक चरित्र मात्र है उसके माध्यम से फिल्मकार ने उस प्रवृत्ति पर चोट किया है जो निरंतर भारतीयों की उपलब्धियों को कम करके आंकते रहे हैं। 

जब से विवेक अगिनहोत्री की फिल्म द कश्मीर फाइल्स सुपरहिट हुई तब से उसपर एजेंडा फिल्मकार का ठप्पा भी लगा दिया गया। ऐसा करनेवालों ने न द कश्मीर फाइल्स देखी थी और न ही द वैक्सीन वार। बगैर फिल्म देखे द वैक्सीन वार को भी एजेंडा फिल्म करार दे दिया गया है। यह सुखद संयोग है कि देश में नारी शक्ति वंदन अधिनियम को संसद के दोनों सदनों ने पास करके विधायिका में महिलाओं को आरक्षण का रास्ता साफ कर दिया। ऐसे उत्सवी माहौल में फिल्म द वैक्सीन वार देश की महिला विज्ञानियों की तपस्या को सामने लेकर आई। इस फिल्म में कोविड की पहली भारतीय वैक्सीन बनाने वाली महिला विज्ञानियों के संघर्षों भी दिखाया गया है। हमारे देश में महिला कितने भी बड़े पद पर या कितनी बड़ी जिम्मेदारी निभा रही हो उसको घर-परिवार के दायित्वों से मुक्ति नहीं मिलती है। इस फिल्म में एक महिला विज्ञानी घर पहुंचती है और उसका बच्चा एक कविता सुनाना चाहता है लेकिन कार्यालय से फोन आने पर वो अपने बच्चे को रोता बिलखता छोड़कर रात में निकल पड़ती है। ऐसे कई प्रसंग इस फिल्म में हैं। इस तरह के प्रसंगों को देखकर मुझे एक वाकया याद आ गया। कुछ वर्षों पहले एक महिला केंद्रीय मंत्री के साथ किसी बैठक में था। मंत्री जी के मोबाइल की घंटी बजी। उन्होंने फोन उठाकर चंद क्षणों बाद कहा कि दीदी से पूछ लो, जो खाना चाहे बना दो। बाद में उन्होंने बताया कि उनका घरेलू सहायक पूछ रहा था कि रात के खाने में सब्जी क्या बनेगी। खैर ये अवांतर प्रसंग है। 

द वैक्सीन वार में नाना पाटेकर ने अपने शानदार अभिनय से डा बलराम भार्गव के किरदार को जीवंत बना दिया है। फिल्म के कथानक में इस चरित्र के साथ भी जिस तरह का वातावरण तैयार किया गया है वो भी रेखांकित किया जाना चाहिए। कोरोना महामारी के दौरान एक दिन डा बलराम भार्गव अपने कार्यालय पहुंचते हैं तो उनके कमरे के सामने बैठनेवाले चपरासी की कुर्सी खाली है। अचानक से प्रश्न ये कहां गया फिर वातावरण में की खामोशी से उस प्रश्न का उत्तर मिलता है। वातावरण की चुप्पी से भावनाओं का जो शोर उठता है उससे दर्शक स्वयं समझ जाते हैं कि चपरासी को कोरोना लील गया। डा भार्गव का रूखा व्यवहार कई बार उनके साथी विज्ञानियों को बुरा लगता है। नेशनल इंस्टीट्यूट आफ वीरोलाजी (एनआईवी) की निदेशक के साथ उनका इतना रूखा व्यवहार रहता है कि वो एक दिन रो पड़ती है। बलराम भार्गव का जो कैरेक्टर इस फिल्म में उभरता है उसके लिए अंग्रेजी में एक शब्द है टफ टास्कमास्टर। इस विशेषण को नाना पाटेकर ने अपने अबिनय से साकार कर दिया । कुछ लोग इस फिल्म की बहुत छोटी छोटी बातों को लेकर उलझे हुए हैं। कोई कह रहा है बंदर पकड़ने के लिए विज्ञानियों को भेज दिया कोई चूहे पर होने वाली जांच को लेकर मजाक उड़ा रहा है। कोई इस फिल्म की एक पात्र रोहिणी सिंह धूलिया के चरित्र चित्रण में उलझ कर रह गया है। कम ही लोग इस फिल्म में महिलाओं के सामर्थ्य चित्रण का उत्सव मना पा रहे हैं। 

कुछ समीक्षक इस फिल्म की ओपनिंग कलेक्शन को लेकर इसका उपहास करने का प्रयास कर रहे हैं। उनको ये समझना होगा कि दस-बारह करोड़ रुपए की लागत से बनी फिल्म से 50 करोड़ रुपए की ओपनिंग की अपेक्षा तो निर्माता निर्देशक की भी नहीं रही होगी। फिल्म धीरे धीरे अच्छा करेगी। लोग इस फिल्म को लेकर आपस में चर्चा कर रहे हैं। एक दूसरे से इस फिल्म के बारे में जानकारी साझा कर रहे हैं। माउथ पब्लिसिटी के आधार पर ही ये फिल्म चलेगी और व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचेगी। इस फिल्म को इस बात का श्रेय भी देना चाहिए कि इसने हिंदी फिल्मों के दर्शकों को वैज्ञानिक शोध प्रविधि के बारे में न केवल बताया बल्कि उसको होते हुए दिखाया भी है। संभव है कि इसके बाद विज्ञान पर आधारित कई और फिल्में बनें। 


Tuesday, September 26, 2023

क्लासिक फिल्मों की जीवंत अभिनेत्री


कौन कल्पना कर सकता है कि जिस लड़की को कैमरा एंगल के बारे में, फ्रेमिंग के बारे में, क्लोजअप शाट में चेहरे के भावों को बदलने के बारे में, अन्य शाट्स में शरीर के मूवमेंट के बारे में जानकारी न हो उसको एक दिन भारतीय फिल्मों का सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के सम्मान से सम्मानित किया जाएगा। उस लड़की ने दशकों तक हिंदी फिल्मों के दर्शकों के बीच लोकप्रियता बटोरी। जिसने अपने अभिनय क्षमता से प्यासा जैसी फिल्म में गुलाबो के चरित्र को अमर कर दिया। जिसको शाट्स का नहीं पता था, जिसको मूवमेंट का नहीं पता था उसने जब पर्दे पर जाने क्या तूने कही, जाने क्या मैंने कही गाया तो उसके सभी मूवमेंट और शाट्स परफेक्ट लगते हैं। सिर्फ इस गाने में ही नहीं बल्कि देवानंद के साथ फिल्म गाइड में कांटो से खींच के आंचल गाती हैं तो ट्रैक्टर से लेकर ऊंट तक में उनके चेहरे पर जो भाव आते हैं वो इस गीत की खूबसूरती में चार चांद लगा देते हैं। शोख, चुलबुली अदा के साथ जब भरटनाट्यम में पारंगत वहीदा रहमान नृत्य करती हैं तो चेहरे के भाव जीवंत हो उठते हैं। इसके पीछे की भी एक दिलचस्प कहानी है। एक ही स्टूडियो में सीआईडी और प्यासा की शूटिंग होती थी। गुरुद्दत सीआईडी के प्रोड्यूसर थे और प्यासा के निर्देशक। फिल्म सीआईडी के निर्देशक राज खोसला जब वहीदा रहमान के शाट्स के व्याकरण को नहीं समझ पाने को लेकर निराश हो जाते तो गुरुदत्त के पास पहुंच जाते। फिर गुरुद्दत सीआईडी के सेट पर आते और वहीदा को अभिनय करके बताते कि इस तरह से इस शाट्स में मूवमेंट करना है और चेहरे पर भाव लाने हैं। साथ ही गुरुद्दत वहीदा को नसीहत देते कि उनकी नकल न करे। वो कहते कि तुम अपनी तरह से करो क्योंकि अभिनेता और अभिनेत्री के भाव अलग होंगे। इसके बाद तो वहीदा रहमान ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 

वहीदा रहमान को इस बात के लिए भी याद किया जाता है कि उन्होंने अपने दौर में डायलाग डिलीवरी के अंदाज को बदल दिया। नाटकीय संवाद को उन्होंने स्वाभाविक अंदाज में कहना आरंभ किया था। याद कीजिए प्यासा का एक दृश्य। नायक विजय के पास पैसे नहीं होने की वजह से रेस्तरां का वेटर उसकी थाली खींचता है तो वहीं थोड़ी बैठी गुलाबो खान के पैसे देती है। गुलाबो उससे कहती है कि खाना खा लो, तुम्हें मेरी कसम। दुखी विजय कहता है आप अपनी कसम क्यों देती हैं, आप ठीक तरह से मुझे जानती भी नहीं। इसके बाद कुछ और संवाद और फिर गुलाबो का उत्तर, जब तुम्हारी नज्मों  और गजलों से, जब तुम्हारे ख्यालात और और जज्बात को जान लिया तो अब जानने को क्या बचा है। इस संवाद का दृश्यांकन भी बेहतरीन है और वहीदा की संवाद कला भी एकदम स्वाभाविक। यह अकारण नहीं है कि सीआईडी और प्यासा दोनों फिल्मों ने सिल्वर जुबली मनाई थी। ये बहुत कम अभिनेत्रियों के साथ होता है कि उनके जीवन काल में उनकी फिल्म क्लासिक का दर्जा पा ले। वहीदा की दो फिल्म प्यासा और गाइड अपने प्रदर्शन के साठ-सत्तर वर्ष बाद भी पसंद की जाती हैं। 


Sunday, September 24, 2023

गाता रहे मेरा दिल


देवानंद, भारतीय फिल्म जगत का एक ऐसा सितारा जिसने अपनी कला से, रूपहले पर्द पर अपनी उपस्थिति से और अपनी अदाओं से दशकों तक दर्शकों को अपना दीवाना बना कर रखा। देवानंद का नाम लेते ही जिस एक फिल्म का स्मरण होता है वो है गाइड। ये फिल्म क्लासिक और कल्ट फिल्म है। देवानंद का अभिनय, इसके गीत, इसका फिल्मांकन और कहानी में परोक्ष रूप से चलनेवाला दर्शन फिल्म को ऊंचाई पर स्थापित करता है। इस फिल्म को वैश्विक स्तर पर मान सम्मान मिला, लेकिन इसके बनने और प्रर्दर्शित होने तक संघर्ष की लंबी और दिलचस्प कहानी है। 1962 में बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में देवानंद की फिल्म हम दोनों का प्रदर्शन हुआ। वहीं एक पार्टी मं उनकी भेंट अमेरिकी फिल्म निर्देशक टैड डेनियलेव्स्की से हुई। डेनियलेव्स्की और नोबेल पुरस्कार विजेता लेखिका पर्ल एस बक देवानंद से मुंबई (तब बांबे) में मिल चुके थे। उस भेंट में डेनियलेव्स्की और पर्ल ने देवानंद को अपनी फिल्म में लेने का प्रस्ताव दिया था। तब देवानंद ने कहानी सुनकर मना कर दिया था। पर उनके मन के किसी कोने अंतरे में अमेरिकी निर्देशक के साथ काम करने की इच्छा शेष रह गई थी। बर्लिन की भेंट में फिर से बात उठी। देवानंद को आर के नारायण के उपन्यास गाइड के बारे पता चला। वो उसको लेकर अमेरिका पहुंचे। पर्ल एस बक से मिले। चर्चा हुई। इस उपन्यास पर फिल्म बनने का तय हुआ। टैड डेनियलेव्स्की और पर्ल की कंपनी और देवानंद की फिल्म कंपनी नवकेतन में हिंदी और अंग्रेजी में एक साथ फिल्म बनाने का करार हुआ। अंग्रेजी फिल्म को डेनियलेव्स्की निर्देशित कर रहे थे जिसकी स्क्रिप्ट पर्ल एस बक ने लिखी। देवानंद बेहद खुश थे।

फिल्म पर काम आरंभ हुआ। डेनियलेव्स्की अपनी टीम के साथ भारत आए । कास्टिंग और हिंदी फिल्म के निर्देशक को तय करना था। टैड ने नायिका के तौर पर लीला नायडू को पसंद किया क्योंकि वो अच्छी अंग्रेजी बोलती थी। देवानंद वैजयंतीमाला को चाहते थे क्योंकि फिल्म की नायिका डांसर थीं। टैड का तर्क था कि वैजयंतीमाला मोटी हैं और अमेरिकी दर्शक उसको पसंद नहीं करेंगे। वो इसके लिए भी तैयार थे कि फिल्म में कोई डांस ना हो और पेपर में छपी खबरों से नायिका को डांसर बता दिया जाए। देवानंद ने कहा कि अगर ऐसा हुआ तो फिल्म डूब जाएगी। टैड किसी तरह माने। देवानंद ने वहीदा रहमान का नाम सुझाया। वो टैड को पसंद नहीं थी। देवानंद के अनुरोध पर तैयार हुए। इस बीच किसान की भूमिका के लिए टैड ने के एन सिंह को चुन लिया। उसको लेकर भी विवाद हुआ। हिंदी के निर्देशक की खोज जारी थी। विजय आनंद उर्फ गोल्डी ने पर्ल एस बक की स्क्रिप्ट को खारिज कर दिया था और फिल्म करने से मना कर दिया। उसने साफ तौर पर कहा कि वो ऐसे निर्देशके साथ काम नहीं कर सकता जिसको के एन सिंह में भारतीय किसान दिखता है। दोनों भाइयों में बातचीत बंद हो गई। देवानंद ने चेतन आनंद को तैयार किया। कुछ ही समय में वो अपनी फिल्म हकीकत में व्यस्त हो गए और फिल्म छोड़ दी। राज खोसला को डेनियलेव्स्की के सहायक के तौर पर रखा गया तो वहीदा ने ये कहकर फिल्म करने से मना कर दिया कि राज खोसला ने पिछली फिल्म में उनका अपमान किया था। समझौते कि कोशिश बेकार गई। राज खोसला को फिल्म छोड़नी पड़ी। अब देवानंद के सामने कोई विकल्प नहीं बचा तो वो फिर गोल्डी के पास पहुंचे। गोल्डी अपनी शर्तों पर राजी हुए।

देवानंद के संघर्ष का दौर खत्म नहीं हुआ था। एस डी बर्मन को म्यूजिक देना था लेकिन काम आरंभ हो इसके पहले उनको ह्रदयाघात हो गया। जब वो ठीक हुए तो गीत के कुछ शब्दों को लेकर आपत्ति की तो हसरत भड़क गए और बोल गए कि दलाल करैक्टर के लिए कैसे शब्द लिखे जाएंगे। गोल्डी और सचिन बर्मन बहुत आहत हुए। देवानंद ने हसरत जयपुरी को 25 हजार रुपए देकर फिल्म से विदा कर दिया। फिर शैलेन्द्र आए और उन्होंने अमर गीत कांटो से खींच के ये आंचल लिखा। संकट जारी था। देवानंद को बदसूरत दिखाने के गोल्डी की मंशा पर देव साहब भड़क गए और गोल्डी पर करियर बर्बाद करने का आरोप जड़ गए। फिल्म के कैमरापर्सन ने गोल्डी को समझाने का प्रयास किया लेकिन अड़े रहे। आखिरकार देवानंद झुके। याद करिए गाइड फिल्म का आखिरी सीन जब राजू की बढ़ी हुई दाढ़ी और तपस्वी टाइप लुक। राम राम करके फिल्म पूरी हुई।

अब दूसरी आफत खड़ी थी। फिल्म इंडस्ट्री में देवानंद के विरोधियों ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय में सैकड़ों पत्र भिजवाए कि ये फिल्म समाज में अनैतिकता को बढ़ावा देनेवाली है। इसमें शादी शुदा स्त्री परपुरुष से प्रेम करती है आदि। सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट रुक गया। देवानंद निराश होकर तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी के पास पहुंचे। उन्होंने फिल्म देखी। उसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं पाया। तब जाकर फिल्म को सर्चचिफिकेट मिल पाया और फिल्म रिलीज हुई। जबरदस्त सफल हुई। ये बात सही साबित हुई कि इतिहास बिना संघर्ष के नहीं बनता है।  

Saturday, September 23, 2023

हिंदी पखवाड़ा और भाषाई चुनौतियों


इस समय देश भर के सरकारी कार्यालयों, सरकारी उपक्रमों, कई महाविद्यालयों आदि में हिंदी पखवाड़ा मनाया जा रहा है। भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने पुणे में राजभाषा अधिकारियों और हिंदी प्रेमियों को आमंत्रित कर राजभाषा सम्मेलन का आयोजन किया। हिंदी पखवाड़ा मनाए जाने के बीच दो खबरों ने ध्यान आकृष्ट किया। पहली खबर कानपुर से दैनिक जागरण में विगत शुक्रवार को प्रकाशित हुई थी। ये समाचार अखिल भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी सोमेश तिवारी से जुड़ा है। तिवारी का दावा है कि अक्तूबर 2022 में उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारी को विभाग में अधिकतर कामकाज अंग्रेजी में होने के बाबत पत्र लिखा था। अनुरोध ये भी किया था कि अधिकतर कामकाज राजभाषा हिंदी में किया जाना चाहिए।  उन्होंने विभाग की हिंदी पत्रिका के लिए समुचित राशि के आवंटन की मांग भी की। उनका आरोप है कि उनके वरिष्ठ अधिकारी को ये नागवार गुजरा। उन्होंने न केवल विभागीय हिंदी पत्रिका बंद कर दी बल्कि सोमेश तिवारी का तबादला आंध्र प्रदेश के गुंटूर कर दिया। इसके पहले भी हिंदी में कार्यालय का कामकाज करने को लेकर उनका तबादला गुवाहाटी कर दिया गया था। मामला अदालत तक गया था और निर्णय तिवारी के पक्ष में आया था। इस बार भी उन्होंने प्रधनामंत्री और गृहमंत्री आदि को पत्र लिखकर अपनी व्यथा बताई है। 

दूसरी खबर जम्मू से आई। इसमे बताया गया है कि जम्मू कश्मीर पुलिस ने जम्मू संभाग में अपने कार्यलयों में हिंदी के उपयोग को बढ़ावा देने के बीस सदस्यीय समिति का गठन किया है। 5 अगस्त 2019 को संसद ने जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देनेवाले संविधान के अनुचछेद 370 को खत्म कर दिया था। इसके पहले जम्मू कश्मीर के सरकारी कार्यालयों में उर्दू और अंग्रेजी में कामकाज होता था क्योंकि वहां की राजभाषा हिंदी नहीं थी। सितंबर 2022 में लोकसभा ने जम्मू कश्मीर की आधिकारिक भाषा अधिनियम पास किया। इसके बाद कश्मीरी, डोगरी और हिंदी को जम्मू कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश में आधिकारिक भाषा का दर्जा मिला। इस अधिनियम के कानून बनने के बाद जम्मू संभाग के सरकारी कार्यालयों में राजभाषा हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देन के प्रयास आरंभ हुए। जम्मू कश्मीर पुलिस का हिंदी को बढ़ावा देने के लिए समिति निर्माण का निर्णय इसका ही अंग है। स्वाधीनता के बाद पूरे देश में हिंदी राजभाषा के रूप में प्रयोग में लाई जा रही थी लेकिन अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू कश्मीर को जो विशेष दर्जा प्राप्त होने के कारण वहां सरकारी कार्यालयों में राजभाषा हिंदी का प्रयोग नहीं हो रहा था। अब हिंदी के साथ साथ डोगरी और कश्मीरी को भी समान अधिकार मिला है। यह स्थानीय भाषाओं को महत्व देकर हिंदी को शक्ति प्रदान करने की कोशिशों का हिस्सा है। स्थानीय भाषाओं की समृद्धि के साथ हिंदी का भविष्य जुड़ा हुआ है। 

हिंदी पखवाड़े के दौरान केंद्रीय सेवा के एक अधिकारी के हिंदी प्रेम के चलते तबादले का समाचार आना, दूसरी तरफ स्वाधीनता के बाद हिंदी को मान देने के लिए प्रयास आरंभ होना, विरोधाभास जैसा प्रतीत होता है। दरअसल सरकारी कार्यालयों में हिंदी के प्रयोग में सबसे बड़ी बाधा अधिकारियों की वो मानसिकता है जिसमें उनको लगता है कि अंग्रेजी श्रेष्ठ है। अफसरों में अंग्रेजी को लेकर जो श्रेष्ठता बोध है वो अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों के बीच गहरे तक धंसा हुआ है। आज हालात ये है कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री अपने भाषणों में, अपने सरकारी कामकाज में हिंदी को प्राथमिकता देते हैं। जब अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से संवाद करते हैं तो वो हिंदी में होता है। इनको जो फाइलें भेजी जाती हैं,उनमें अधिकतर टिप्पणियां हिंदी में होती हैं। प्रधानमंत्री ने पिछले वर्ष लाल किले की प्राचीर से पांच प्रण की घोषणा की थी। उसमें एक प्रण पराधीनता की मानसिकता को खत्म करने का भी था। अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों में भाषा को लेकर गुलामी की मानसिकता सबसे अधिक है। इसी मानसिकता का परिणाम है कि हिंदी के प्रयोग करने का प्रयास करनेवाले अधिकारी को गैर हिंदी प्रदेश के ऐसे जिले में भेज दिया जाता है जहां हिंदी का उपयोग एक चुनौती है। अमृत काल में पराधीनता की इस मानसिकता से मुक्ति सबसे बड़ी चुनौती है। 

पुणे में भले ही राजभाषा सम्मेलन का आयोजन हो गया। फिल्मी सितारों और चमकते चेहरों से हिंदी में संवाद भी हुआ,शब्दकोश आदि की घोषणा की गई। उसके बाद देशभर में हिंदी पखवाड़ा मनाया जा रहा है। कई कार्यलयों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के लिए शपथ आदि भी दिलवाया जा रहा है। लेकिन अंग्रेजी के श्रेष्ठता बोध को खत्म करने के लिए किसी प्रकार का कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है। नई शिक्षा नीति में मातृभाषा और भारतीय भाषाओं पर जोर दिया गया है लेकिन इसके क्रियान्वयन की गति थोड़ी धीमी है। गांधी जी को इस बात की आशंका थी और वो बार बार हिंदी और भारतीय भाषाओं के प्रयोग को लेकर आग्रह करते रहते थे। 1921 में ही उन्होंने कहा था कि अंग्रेजी से प्रेरणा लेने की गलत भावना से छुटकारा होना स्वराज्य के लिए अति आवश्यक है। फिर उन्होंने 1947 में हरिजन पत्रिका में एक लेख लिखकर कहा था कि जिस प्रकार भारत के लोगों ने सत्ता हड़पनेवाले अंग्रेजों के राजनैतिक शासन को सफलतापूर्वक उखाड़ फेंका उसी प्रकार सांस्कृतिक अधिग्रहण करनेवाली अंग्रेजी को भी हटा देना चाहिए। यह आवश्यक परिवर्तन करने में जितनी देरी होगी उतनी ही अधिक राष्ट्र की सांस्कृतिक हानि होती जाएगी। जब संविधान लागू हुआ तो तय ये हुआ कि अंग्रेजी चलती रहेगी। हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो मिला लेकिन अंग्रेजी के साथ साथ चलते रहने के निर्णय के कारण राजकाज की प्राथमिक भाषा अंग्रेजी बनी रही। स्वाधीनता के बाद सत्ता में आए नेता गांधी की बातों को राजनीतिक कारणों से नजरअंदाज करते रहे।

संविधान लागू होने के 15 वर्ष बाद हिंदी और अंग्रेजी के प्रयोग को लेकर पुनर्विचार आरंभ हुआ। उस वक्त के गृह मंत्री लालबहादुर शास्त्री ने संसद में कहा कि ‘हम अंग्रेजी को अनिश्चित काल के लिए जीवन-दान दे रहे हैं, अनंत काल के लिए नहीं।‘ तब कवि लेखक रामधारी सिंह दिनकर ने गृहमंत्री के उक्त वाक्य को उद्धृत करते हुए कहा था कि ‘जिस प्रकार सरकार भाषा को लेकर में कार्य करती है, उससे मुझे भय होता है कि वह ‘कल-कल’ की बात अनंत काल तक बढ़ जाएगी।‘ वही हुआ। 1963 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संसद में एक ऐसा वाक्य कह दिया जिसकी वजह से अंग्रेजी आज भी सरकारी कामकाज में प्राथमिकता पर है। तब नेहरू ने कहा था कि ‘जबतक अहिंदी भाषी राज्य अंग्रेजी को चलाना चाहेंगे तब तक हिंदी के साथ-साथ केंद्र में अंग्रेजी भी चलती रहेगी।‘ यह ठीक बात है कि ये अंग्रेजी के श्रेष्ठता बोध की जो औपनिवेशिक मानसिकता है उसको खत्म करना या कम करना बेहद चुनौतीपूर्ण है। यह चुनौती आज की है भी नहीं। नेहरू जी स्वयं हिंदी से अधिक अंग्रेजी में सहज थे इस कारण भी अधिकारी सरकारी कामकाज में अंग्रेजी को प्राथमिकता देते थे। अब आवश्यकता इस बात की है कि भाषा को लेकर देशव्यापी चर्चा हो। भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी के मुकाबले प्राथमिकता देने को लेकर राज्य सरकारों को विश्वास में लिया जाए। गैर हिंदी प्रदेशों में हिंदी को लेकर जो एक भय का छद्म वातावरण तैयार किया गया है उसका निषेध किया जाए। भाषा को राजनीति से दूर रखा जाए। अगर ऐसा हो पाता है तो हिंदी समेत तमाम भारतीय भारतीय भाषाओं को ताकत मिलेगी और किसी सोमेश तिवारी को हिंदी में कामकाज करने के लिए गुंटूर भेजने का साहस कोई अधिकारी नहीं कर पाएगा।   


Thursday, September 21, 2023

अध्यात्म और अतीत का गौरव गान


हिंदी जगत में रामधारी सिंह दिनकर की राष्ट्रकवि के रूप में समादृत हैं। द्वारिका राय सुबोध के साथ एक साक्षात्कार में दिनकर ने इस विशेषण को लेकर अपनी पीड़ा व्यक्त की थी। जब उनसे पूछा गया कि क्या आलोचकों ने उनके साथ न्याय किया तो उन्होंने साफ कहा कि राष्ट्रकवि के नाम ने मुझे बदनाम किया है। मेरे कवित्व की झांकी दिखलाने का कोई प्रयास नहीं करता। उन्होंने माना था कि कवि की निष्पक्ष आलोचना उसके जीवनकाल में नहीं हो सकती है क्योंकि जीवनकाल में उनके व्यवहार आदि से कोई रुष्ट रहता है और कोई अकारण ईर्ष्यालु हो उठता है। यह अकारण भी नहीं है कि दिनकर को राष्ट्रकवि कहा जाता है। उनकी कविताओं में राष्ट्रीय भावनाओं का प्राबल्य है। उनकी आरंभिक कविताओं से लेकर परशुराम की प्रतीक्षा तक में राष्ट्र को लेकर चिंता दिखाई देती है। स्वयं दिनकर ने भी लिखा है कि लिखना आरंभ करने के समय सारे देश का कर्त्तव्य स्वतंत्रता संग्राम को सबल बनाना था। अपनी कविताओं के माध्यम से वो भी कर्तव्यपालन में लग गए थे। दिनकर की कविताओं में अतीत का गौरव गान भी मुखरित होता है। जब देश स्वाधीन हुआ था तो दिनकर ने ‘अरुणोदय’ जैसी कविता लिखकर स्वतंत्रता का स्वागत किया था। एक वर्ष में ही दिनकर का मोहभंग हुआ और उन्होंने ‘पहली वर्षगांठ’ जैसी कविता लिखकर राजनीतिक दलों की सत्ता लिप्सा पर प्रहार किया। 

राष्ट्रकवि के विशेषण से दिनकर के दुखी होने का कारण था कि उनकी अन्य कविताओं और गद्यकृतियों को आलोचक ओझल कर रहे थे। दिनकर के सृजनकर्म में पांच महत्वपूर्ण पड़ाव है। इनको रेखांकित करने के पहले दिनकर के बाल्यकाल के बारे में जानना आवश्यक है। दिनकर ने दस वर्ष की उम्र से ही रामायण और श्रीरामचरितमानस का नियमित पारायण आरंभ कर दिया था। रामकथा और रामलीला में उनकी विशेष रुचि थी। उनपर श्रीराम के चरित्र का गहरा प्रभाव था। किशोरावस्था से ही वो वाल्मीकि और तुलसी की काव्यकला से संस्कारित हो रहे थे। कालांतर में पराधीनता ने उनके कवि मन को उद्वेलित किया। रेणुका और हुंकार जैसी कविताओं ने उनको राष्ट्रवादी कवि के रूप में पहचान दी। जब कुरुक्षेत्र और के बाद रश्मिरथी का प्रकाशन हुआ तो दिनकर को चिंतनशील और विचारवान कवि माना गया। कुछ समय बाद जब ‘संस्कृति के चार अध्याय’ का प्रकाशन हुआ तो दिनकर को इतिहास में संस्कृति और दर्शन की खोज करनेवाला लेखक कहा गया। दिनकर की कलम निरंतर चल रही थी। उर्वशी के प्रकाशन पर तो साहित्य जगत में जमकर चर्चा हुई। दर्जनों लेख लिखे गए, वाद-विवाद हुए। चर्चा में दिनकर को प्रेम और अध्यात्म का कवि कहा गया। 1962 के चीन युद्ध के बाद जब ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ आई तो आलोचकों ने कविता में विद्रोह के तत्वों को रेखांकित करते हुए उनको विद्रोही कवि कह डाला। 

दिनकर चाहते थे कि उनकी कृतियों की समग्रता में चर्चा हो लेकिन जब सिर्फ उनकी राष्ट्र आधारित कविताओं की चर्चा होती तो वो झुब्ध हो जाते । दिनकर की कविताओं में वर्णित ओज के आधार पर कुछ आलोचक उनको गर्जन-तर्जन का कवि घोषित कर देते हैं। वो भूल जाते हैं कि ओज के पीछे गहरा चिंतन भी है। दिनकर की कविता की भाषा एकदम सरल है लेकिन बीच में जिस तरह से वो संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग करते हैं उससे उनकी कविता चमक उठती है। इस बात पर भी शोध किया जाना चाहिए कि जो दिनकर बाल्यकाल में रामायण और श्रीरामचरितमानस के प्रभाव में थे उन्होने बाद में अपने प्रबंध काव्यों में महाभारत को प्राथमिकता क्यों दी। प्रणभंग, कुरुक्षेत्र और रश्मिरथी तो महाभारत आधारित है। अगर समग्रता में देखें तो दिनकर की कविताओं में समय, समाज, संस्कृति, प्रेम,प्रकृति, राजनीति और राष्ट्रीयता आदि की गाढ़ी उपस्थिति है। यही उनकी काव्य धरा भी है और क्षितिज भी।     


Saturday, September 16, 2023

एक राष्ट्र, एक पुस्तकालय की चुनौतियां


पिछले कुछ समय से भारत सरकार पुस्तकों को लेकर सक्रिय दिख रही है। अगस्त में संस्कृति मंत्रालय ने प्रगति मैदान में पुस्तकालय उत्सव का आयोजन किया। इसका शुभारंभ राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु ने किया। पुस्तकालय उत्सव स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के दूसरे चरण का हिस्सा है। इसका उद्देश्य देश में पुस्तकालय संस्कृति और डिजिटलीकरण को बढ़ावा देना और पढ़ने की संस्कृति का विकास करना भी है। संस्कृति राज्यमंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने उस दौरान बताया था कि पुस्तकालय इतिहास और असीमित भविष्य की खाई को पाटने का काम करता है। उन्होंने ये भी कहा था कि पुस्तकालयों का विकास सरकार की प्राथमिकता है और वन नेशन वन डिजीटल लाइब्रेरी पर भी कार्य होगा। उन्होंने भौतिक और डिजिटल पुस्तकालयों के संतुलन पर बल दिया था। इसके अलावा संस्कृति मंत्रालय के सचिव और संयुक्त सचिव ने भी पुस्तकालयों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कई नीतिगत बातें की थीं। पुस्तकालयों की रैंकिंग से लेकर जिला स्तर तक पुस्तकालयों को समृद्ध और साधन संपन्न करने की बात की गई थी। राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु ने भी पुस्तकालय उत्सव के शुभारंभ के अवसर पर पुस्तकालयों को समाज संस्कृति के विकास को जोड़कर देखा था। उन्होंने पुस्तकालयों को सभ्यताओं के बीच का सेतु भी बताया था। राष्ट्रपति महोदया ने पुस्तकालयों को सामाजिक संवाद, अध्ययन और चिंतन का केंद्र बनाने पर बल दिया था। उत्सव हुआ। वहां पुस्तकालयों कि स्थिति और संसाधनों को लेकर मंथन हुआ। ग्राम और सामुदायिक स्तर पर पुस्तकालयों की चर्चा हुई। कई तरह के सुझाव भी आए। क्रियान्वयन कैसे होगा ये देखना होगा।  

संस्कृति मंत्रालय के इस आयोजन के बाद शिक्षा मंत्रालय ने 11 सितंबर को एक आदेश जारी किया। उसमें बताया गया कि देश में पढ़ने की आदत का विकास, स्तरीय प्रकाशन को प्रोत्साहन, प्रकाशन व्यवसाय को दिशा और देश में खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में पुस्तकालय आंदोलन को पुनर्जीवित करने के लिए फरवरी 2010 में एक टास्क फोर्स का गठन किया गया था। इसको समग्रता में राष्ट्रीय पुस्तक प्रोन्नयन नीति तैयार करने का कार्य सौंपा गया था। टास्क फोर्स से इक्कसवीं सदी की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए नीति तैयार करने की अपेक्षा की गई थी। अब राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के चेयरमैन मिलिंद सुधाकर मराठे की अध्यक्षता में विशेषज्ञों की एक 14 सदस्यीय समिति का गठन किया गया है जो राष्ट्रीय पुस्तक प्रोन्नयन नीति का फाइनल ड्राफ्ट तैयार करने में मदद करेगी। इस समिति से ये अपेक्षा की गई है कि वो राष्ट्रीय शिक्षा नीति को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय पुस्तक प्रोन्नयन नीति तैयार करे। इस समिति में चामू शास्त्री, प्रो कुमुद शर्मा, रमेश मित्तल, गरुड़ प्रकाशन के सक्रांत सानु, प्रभात प्रकाशन के प्रभात कुमार, प्रो गोविंद प्रसाद शर्मा के अलावा आईआईटी खड़गपुर के निदेशक, एनसीईआरटी के निदेशक के अलावा सरकारी अधिकारियों को शामिल किया गया है। राजा राम मोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के महानिदेशक भी इस समिति में रखे गए हैं। 

समिति से ये अपेक्षा भी की गई है कि वो एक महीने के अंदर राष्ट्रीय पुस्तक प्रोन्नयन नीति के ड्राफ्ट का अवलोकन करे और उसको राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप करते हुए संशोधित करे। उसमें स्तरीय अनुवाद पर बहुत जोर दिया गया है। पुस्तकों का सभी भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो और उनको स्कूलों और अन्य पुस्तकालयों तक पहुंचाने के बारे में सुझाव दिए जाएं। ग्रामीण क्षेत्रों में पुस्तकालयों की स्थापना और डिजीटल पुस्तकालय को कैसे गांवों से जोड़ा जाए या गांवों में डिजीटल पुस्तकालयों की स्थापना के तरीकों पर भी विचार हो और ठोस सुझाव आए। इस समिति को हर तरह की सहायता देने के लिए राष्ट्रीय पुस्तक न्यास को जिम्मेदारी दी गई है। यहां यह बताना आवश्यक है कि राष्ट्रीय पुस्तक न्यास का उद्देश्य भी पुस्तकों की संस्कृति और पाठकों के बीच पढ़ने की आदत का विकास करना है। ये संस्था यह कार्य पिछले छह दशक से अधिक समय से कर भी रही है।   

संस्कृति और शिक्षा मंत्रालय की पुस्तकालयों को लेकर पहल अच्छी है। उद्देश्य भी। शिक्षा मंत्रालय ने तो समिति का गठन कर दिया है और एक महीने का समय दिया है ताकि राष्ट्रीय पुस्तक प्रोन्नयन नीति को समग्रता में तैयार किया जा सके। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के पेश होने के तीन वर्ष बाद इस ओर मंत्रालय का ध्यान गया है। संस्कृति मंत्रालय के अधीन तो एक संस्था पहले से बनी हुई है, राजा रामहोन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन। जिसका मुख्यालय कोलकाता में है। ये संस्था पुस्तकालयों के लिए पुस्तकों का खरीद करती है। राज्यों के पुस्तकालयों को पुस्तकों की खरीद के लिए अनुदान देती है। देश के अलग अलग इलाकों में पुस्तकालयों की स्थिति बेहतर करने के लिए अनुदान देती है। पुस्तकालयों के फर्नीचर से लेकर आधुनिकीकरण तक के लिए धन उपलब्ध करवाती है। जो पुस्तकें कापीराइट से मुक्त हो जाती हैं उनके डिजीटलीकरण के लिए भी संसाधन उपलब्ध करवाती है। पुस्तकालयों और पुस्तक व्यवसाय को केंद्र में रखकर अगर विचार किया जाए तो यह संस्था महत्वपूर्ण है। अब इस संस्था पर नजर डालते हैं। इस संस्था में पिछले दो वर्षों से अध्यक्ष नहीं है। कंचन गुप्ता को 2019 में अद्यक्ष बनाया गया था। दो वर्ष के बाद वो दूसरे दायित्व पर चले गए। उसके बाद से कोई अध्यक्ष नियुक्त नहीं हुआ। संस्कृति मंत्री जी किशन रेड्डी इस जिम्मेदारी को निभा रहे हैं। उनके पास पर्यटन और पूर्वोत्तर विकास मंत्रालय भी है। वो तेलंगाना बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। उनकी व्यस्तता समझी जा सकती है। ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी प्राथमिकता में राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन काफी नीचे है। परिणाम ये है कि 2020-21 के बाद पुस्तकों की खरीद नहीं हुई। इसके पहले भी दो वर्ष पुस्तकों की खरीद नहीं हुई। 

राजा रामहोन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन में पुस्तकों की खरीद में काफी भ्रष्टाचार होता रहा है। सरकारी खरीद के लिए पुस्तकों को मूल्य को काफी बढ़ाकर रखा जाता है। एक कविता पुस्तक जो बाजार में दो सौ रुपए में उपलब्ध है उसको हजार रुपए में सरकारी खरीद में बेच दिया जाता था। इसको रोकने के लिए पुस्तक खरीद बंद करना उचित नहीं है। भ्रष्टाचार को रोकने के लिए ऐसे लोगों की समिति बनानी होगी जिनको पुस्तकों के बारे में पता हो, जो इस व्यवसाय को जानते हैं। ऐसे नियम बनाने होंगे जिसमे पारदर्शिता हो। संस्कृति मंत्री और मंत्रालय को समय निकालकर इसपर ध्यान देना होगा। उत्सव से माहौल बनेगा लेकिन प्रधानमंत्री मोदी का पुस्तकालयों को लेकर जो विजन है उसको यथार्थ की भूमि पर उतारने के लिए गंभीरता से कार्य करना होगा। समय पर नियुक्तियां करनी होंगी। समय पर पुस्तकों की खरीद करनी होगी। प्रकाशकों को विश्वास में लेना होगा। पुस्तकालयों तक पुस्तक पहुंचे, इसकी व्यवस्था करनी होगी। राज्यों को जो अनुदान दिए जाते हैं उसमें स्तरीय पुस्तकों की खरीद हो इसके लिए नीति बनाकर क्रियान्वयित करनी होगी। तकनीक के बढ़ते प्रभाव को ध्यान में रखकर डिजीटल लाइब्रेरी बनानी होगी। अच्छी पुस्तकों के अधिकार खरीदकर उसको वहां उपलब्ध करवाना होगा। प्रकाशकों को इसके लिए प्रोत्साहन देना होगा। पुस्तक व्यवसाय से जुड़े कागज उद्योग, स्याही उद्योग, प्रकाशन संस्थानों के हितों का भी ध्यान रखना होगा। अगर देश में पढ़ने की आदत का विकास करना है तो स्कूली छात्रों की रुचियों तक पहुंचने का उपक्रम करना होगा। आज अगर देखा जाए तो पुस्तकालयों में जानेवालों की संख्या कम हो रही है उसको बढ़ाने के लिए रुचिकर कार्यक्रम करने होंगे। ई बुक्स और पुस्तक दोनों के बीच एक संतुलन स्थापित करना होगा ताकि हर व्यक्ति को अपनी सुविधानुससार पसंदीदा सामग्री पढ़ने को उपलब्ध हो सके। अगर ऐसा होता है तो पुस्तकालय महोत्सव और राष्ट्रीय पुस्तक प्रोन्नयन नीति आदि का लाभ हो सकेगा। अन्यथा ये रस्मी आयोजन बनकर रह जाएंगे।