Translate

Sunday, April 10, 2016

विलाप से नहीं होगा भला !

अभी पिछले दिनों दिल्ली में भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने हिंदी में अंग्रेजी शब्दों के बढ़ते प्रयोग की चिंता को लेकर एक बैठक की । इस बैठक में विश्वविद्यालय के कुलपति और शिक्षकों के साथ संपादकों और संवाददाताओं की उपस्थिति रही । अहम बात ये रही कि बैठक में पूरे वक्त विदेश मंत्री सुषमा स्वराज मौजूद रहीं । उन्होंने संपादकों समेत वहां मौजूद कई लोगों की बातें पूरे मनोयोग से सुनीं और अपना पक्ष रखा । दरअसल ये बैठक पत्रकारिता विश्वविद्यालय के एक सर्वे के आधार पर की गई थी । पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने सात हिंदी अखबारों का कई दिनों तक अध्ययन किया और फिर उसके आधार पर पंद्रह हजार सात सौ सैंतीस अंग्रेजी के शब्दों को चिन्हित किया जो अखबारों में धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहे हैं । अंग्रेजी के इन शब्दों का पांच श्रेणियों में वर्गीकरण किया गया है और एक श्रेणी अंग्रेजी के वैसे शब्दों की है जिसका उपयोग बाजिब माना गया । इस सर्वेक्षण की सबसे बड़ी खामी ये रही कि इसने एक वैसे अखबार को शामिल नहीं किया जो सबसे ज्यादा अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल करता है ।  हिंदी को लेकर ये विचार विनिमय जरूरी है और केंद्र सरकार का एक बड़ा मंत्री अगर पूरे वक्त मौजूद रहे तो इससे उसकी गंभीरता और बढ़ जाती है । विचार विनिमय का हमेशा स्वागत होता है लेकिन जब इस विनिमय ये निकले निचोड़ को हकीकत में बदला जाता है तब भाषा को मजबूती मिलती है । गोष्ठियों और सेमिनारों में हिंदी को लेकर विलाप करनेवाले यह भूल जाते हैं कि हिंदी का भला छाती कूटने और अंग्रेजी को कोसने से नहीं होगा । हम हिंदी वालों को ये आत्म मंथन करना होगा कि हमने हिंदी के लिए क्या किया । क्या हमने हिंदी को नए शब्द देने का उपक्रम किया । क्या हमने हिंदी को नए सिरे से नई पीढ़ी के सामने पेश करने का कोई उद्यम किया । आज हालात यह है कि हिंदी में अरविंद कुमार के समांतर कोश के बाद किसी भी कोश पर गंभीरता से काम नहीं हुआ । जिस किसी को कोश का काम सौंपा गया उसने बेहद चलताऊ तरीके से ये काम किया । प्रोज्क्ट पूरा हुआ, पैसे मिले और राम राम । अब भी हरदेव बाहरी और फादर कामिल बुल्के का हिंदी शब्दकोश ही प्रामाणिक तौर पर हमारे सामने है । हिंदी से कोशकार शब्द ही मानो गायब हो गया । बदलते वक्त और परिवेश के मुताबिक हिंदी में नए शब्द नहीं गढ़े जा रहे हैं । अंग्रेजी का एक शब्द है स्मॉग । अब इसके लिए हिंदी में कोई शब्द सूझता नहीं है । इसके लिए कुछ उत्साही युवा मित्रों ने धुंधूषण शब्द गढ़ा लेकिन ये परवान नहीं चढ़ सका । क्रोनी कैपिटलिज्म के लिए कुछ लोगों ने चंपू पूंजीवाद शब्द चलाने की कोशिश की लेकिन वो भी नहीं चला । कोश और नए शब्दों की कमी हिंदी को अंग्रेजी की ओर ले जाती है । अंग्रेजी के कोश हर साल कुछ नए शब्दों को लेकर आते हैं लेकिन वैसी व्यवस्था हिंदी में बन नहीं पा रही है । इसके अलावा हिंदी की शुद्धता और दूसरी भाषाओं पर इसकी श्रेष्ठता के पैरोकार भी इसका नुकसान कर रहे हैं । हिंदी के ज्यादा उपयोग को लेकर जोरदार तरीके से अपनी बात कहनेवाले भूल जाते हैं कि इससे अन्य भारतीय भाषाओं में एक भय व्याप्त हो जाता है और वो हिंदी को अपना दुश्मन समझने लगती है । इसके लिए एक ही उदाहरण काफी है कि साहित्य अकादमी स्थापना के पांच दशक से ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद भी मौजूदा अध्यक्ष पहली बार हिंदी से आए हैं । जब भी हिंदी का कोई शख्स चुनाव में खड़ा होता है तो तमाम भारतीय भाषा के प्रतिनिधि उसके खिलाफ एकजुट हो जाते हैं । इन सब बातों का भी ध्यान रखना होगा ताकि हिंदी भारतीय भाषाओं की सहोदर भाषा के रूप में अपना विकास कर सके ।   
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने कहा था कि सरकार का धर्म है कि वह काल की गति को पहचाने और युगधर्म की पुकार का बढ़कर आदर करे । दिनकर ने यह बात साठ के दशक में संसद में भाषा संबंधी बहस के दौरान कही थी । अपने उसी भाषण में दिनकर ने एक और अहम बात कही थी जो आज के संदर्भ में भी एकदम सटीक है । दिनकर ने कहा था कि हिंदी को देश में उसी तरह से लाया जाना चाहिए जिस तरह से अहिन्दी भाषी भारत के लोग उसको लाना चाहें । यही एक वाक्य हमारे देश में हिंदी के प्रसार की नीति का आधार है भी और भविष्य में भी होना चाहिए । साठ के दशक में जब दक्षिण भारत में हिंदी के खिलाफ हिंसक आंदोलन हुए थे तब भी और उसके पहले भी सबों की राय यही बनी थी कि हिंदी का विकास और प्रसार अन्य भारतीय भाषाओं को साथ लेकर चलने से ही होगा, थोपने से नहीं । महात्मा गांधी हिंदी के प्रबल समर्थक थे और वो इसको राष्ट्रभाषा के तौर पर देखना भी चाहते थे लेकिन गांधी जी ने भी कहा भी था कि हिंदी का उद्देश्य यह नहीं है कि वो प्रांतीय भाषाओं की जगह ले ले । वह अतिरिक्त भाषा होगी और अंतरप्रांतीय संपर्क के काम आएगी ।
हमारा देश फ्रांस या इंगलैंड की तरह नहीं है जहां एक भाषा है । विविधताओं से भरे हमारे देश में दर्जनों भाषा और सैकड़ों बोलियां हैं लिहाजा यहां एक भाषा का सिद्धांत लागू नहीं हो सकता है । इतना अवश्य है कि राजकाज की एक भाषा होनी चाहिए । आजादी के पहले और उसके बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की कोशिश हुई लेकिन अन्य भारतीय भाषाओं के विरोध के चलते वह संभव नहीं हो पाया । हिंदी राजभाषा तो बनी लेकिन अंग्रेजी का दबदबा कायम रहा । जनता की भाषा और शासन की भाषा अलग रही । ना तो हिंदी को उसका हक मिला और ना ही अन्य भारतीय भाषाओं को समुचित प्रतिनिधित्व । हिंदी के खिलाफ भारतीय भाषाओं को खड़ा करने में अंग्रेजी प्रेमियों ने नेपथ्य से बड़ी भूमिका अदा की थी । यह अकारण नहीं था कि बांग्ला भाषा के तमाम लोगों ने आजादी पूर्व हिंदी भाषा का समर्थन किया था । चाहे वो केशवचंद्र सेन की स्वामी दयानंद को सत्यार्थ प्रकाश हिंदी में लिखने की सलाह हो या बिहार में भूदेव मुखर्जी की अगुवाई में कोर्ट की भाषा हिंदी करने का आंदोलन हो । जब हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की कोशिश हुई तो बंगला के लोग अपनी साहित्यक विरासत की तुलना हिंदी से करते हुए उसे हेय समझने लगे थे । जहां के चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने हिंदी के विकास के लिए अनथक प्रयास किया वहीं के तमिल भाषी अपने महाकाव्यों की दुहाई देकर हिंदी को नीचा दिखाने लगे । अंग्रेजी के पैरोकारों ने ऐसा माहौल बनाया कि हिंदी को अन्य भारतीय भाषा के लोग दुश्मन की तरह से समझने और उसी मुताबिक बर्ताव करने लगे । आज अंग्रेजी उन्हीं अन्य भारतीय भाषाओं के विकास में सबसे बड़ी बाधा है । इस बात को समझने की जरूरत है।

आज हिंदी बगैर किसी सरकारी बैसाखी के खुद लंबा सफर तय कर चुकी है और विंध्य को लांघते हुए भारत के सुदूर दक्षिणी छोर तक पहुंच चुकी है और पूर्वोत्तर में भी यह धीरे धीरे लोकप्रिय हो रही है । सरकार अगर सचमुच हिंदी के विकास को लेकर संजीदा है तो उसको सभी भारतीय भाषाओं के बीच के संवाद को तेज करना होगा । एक भाषा से दूसरी भाषा के बीच के अनुवाद को बढ़ाना होगा । माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय नेएक पहल की है उसको आधार बनाकर आगे बढ़ना होगा  सरकार को साहित्य अकादमी की चूलें कसने के तरीके ढूंढने होंगे । साहित्य अकादमी के गठन के वक्त उद्देश्य था कि वो भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय का काम करेगी । लेकिन कालांतर में साहित्य अकादमी ने साहित्य में अपना रास्ता तलाश लिया और भाषाओं के समन्वय का काम छोड़ दिया । एक भाषा से दूसरी भाषा के बीच अनुवाद का काम भी अकादमी कितनी गंभीरता से करती है इसपर बात होनी चाहिए । अकादमी बनने से भी हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय को भी कसौटी पर कसा जाना चाहिए । साहित्य अकादमी के राजनीति का अखाड़ा बनने और वामपंथियों के दबदबे की वजह से नतीजा यह हुआ कि अन्य भारतीय भाषाओं की हिंदी को लेकर शंकाए दूर नहीं हो पाईं । अगर हम हिंदी के लोग और सरकार सचमुच इसके विकास को लेकर गंभीर हैं तो हमें गंभीरता से भारतीय भाषाओं को स्पेस देना होगा । हिंदी के विकास में बोलियों की भी अहम भूमिका है । हिंदी के शुद्धतावादी जब बोलियों से हिंदी को अलग कर देखने की कोशिश करते हैं तो हिंदी की ताकत को कम करते हैं । क्या भोजपुरी, अवधी या अन्य बोलियों से हिंदी को अलग किया जा सकता है । अन्य भारतीय भाषाओं के साथ बोलियों के सहयोग से हिंदी मजबूत होगी । अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों को हिंदी में शामिल किए जाने से परहेज नहीं किया जाना चाहिए । अंग्रेजी की ही तरह हर साल शब्दकोश के नए संस्करण आएं जिनमें नए नए शब्द हों तभी हिंदी का भला होगा अन्यथा तो इस तरह के शोध और सेमिनार आदि तो सालों से हो ही रहे हैं । 

No comments: