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Saturday, August 27, 2022

राजभाषा हिंदी की बढ़ने लगी व्याप्ति


राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं से प्रेम करते थे। उनके लेखन और वक्तव्यों में हिंदी और भारतीय भाषाओं के प्रति उनका लगाव झलकता है। जब दिनकर राज्यसभा के सदस्य थे तो उस दौर में हिंदी को लेकर काफी चर्चा हुई थी। 6 मई 1963 को राज्यसभा में दिनकर ने हिंदी को लेकर अपनी बात रखी थी। भाषा पर पेश विधायी प्रस्ताव पर संशोधन प्रस्तुत करते हुए दिनकर ने आशा प्रकट की थी कि ‘केंद्रीय सरकार तत्काल कुछ ऐसा उपयुक्त तंत्र बनाएगी जो केंद्रीय सरकार को केंद्रीय सरकार की विभिन्न शाखाओं में हिंदी के उत्तरोत्तर प्रयोग पर सलाह देगा और संसद की सभाओं को हिंदी की प्रगति के संबंध में समय समय पर प्रतिवेदन प्रस्तुत करेगा, ताकि 1975 के वर्ष तक हिंदी विधि निर्माण तथा प्रशासन का उतना ही प्रभावी माध्यम बन जाए, जितना इस समय अंग्रेजी है।‘ दिनकर की चिंता स्वाधीनता के बाद हिंदी को उसका उचित अधिकार नहीं मिलने को लेकर थी। उनके वक्तव्य से स्पष्ट है। वो इससे चिंतित थे कि शासन के तंत्र में हिंदी की प्रगति अंग्रेजी के साथ साथ कैसे की जा सकती है। उन्होने उस वक्त के गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के एक वक्तव्य को भी अपनी चिंता से जोड़ा था। गृहमंत्री ने तब कहा था कि  ‘हम अंग्रेजी को अनिश्चित काल के लिए जीवन-दान दे रहे हैं, अनंत काल के लिए नहीं।‘  दिनकर ने गृहमंत्री के इस वाक्य को उद्धृत करते हुए अपना मत रखा था, ‘जिस प्रकार सरकार इस बारे में कार्य करती है, उससे मुझे भय होता है कि वह ‘कल-कल’ की बात अनंत काल तक बढ़ जाएगी।‘  दिनकर हिंदी को राजभाषा बनाए जाने और फिर 15 वर्षों के बाद उसकी समयावधि बढ़ाने को लेकर सशंकित थे। दिनकर की आशंका स्वाधीन भारत में सही साबित हुई और हिंदी को राजभाषा से राष्ट्रभाषा बनाने की कोशिशें ‘कल-कल’ करते हुए सचमुच अनंतकाल तक चलती चली जा रही हैं। 

हिंदी को देश की राष्ट्रभाषा बनाने का प्रश्न बहुत पुराना है। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान ये तय था कि स्वतंत्रता के बाद हिंदी राष्ट्रभाषा बनेगी। गांधी भी अपने लेखों और भाषणों में इसके आग्रही दिखते हैं। वो अपनी पत्रिका हरिजन में और अपने वक्तव्यों में इस बात के संकेत देते रहते थे कि हिंदी को स्वाधीनता के बाद राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना चाहिए। गांधी जी तो स्वराज्य के लिए भी भारतीय भाषाओं को आवश्यक मानते थे। 1921 में उन्होंने कहा था, अंग्रेजी के ज्ञान के बिना भी भारतीय मस्तिष्क का सर्वोच्च विकास संभव होना चाहिए। अंग्रेजी से प्रेरणा लेने की गलत भावना से छुटकारा होना स्वराज्य के लिए अत्यावश्यक है। 1947 में अपनी पत्रिका हरिजन में भी गांधी ने लिखा, ‘मेरा आशय यह है कि जिस प्रकार हमने सत्ता हड़पनेवाले अंग्रेजों के राजनैतिक शासन को सफलतापूर्वक उखाड़ फेंका उसी प्रकार हमें सांस्कृतिक अधिग्रहण करनेवाली अंग्रेजी को भी हटा देना चाहिए। यह आवश्यक परिवर्तन करने में जितनी देरी होगी उतनी ही अधिक राष्ट्र की सांस्कृतिक हानि होती जाएगी।‘ गांधी निरंतर अंग्रेजी को हटाने की बात कर रहे थे लेकिन उनके अनुयायी और स्वाधीनता के बाद सत्ता में आए नेता गांधी की इन बातों को राजनीतिक वजहों से नजरअंदाज करते रहे। संविधान सभा में सदस्यों ने भाषा संबंधी गांधी की भावनाओं का ध्यान नहीं रखा। भाषा के प्रश्न पर लगातार बहस से बचते रहे और उसको अंतिम बैठकों के लिए टालते रहे। आखिरकार  12 सितंबर 1949 को संविधानसभा में भाषा के प्रश्न पर बहस आरंभ हुई। चर्चा तीन दिनों तक चली। तमाम तरह के तर्क वितर्क हुए। 14 सितंबर 1949 को ये तय किया गया कि देवनागरी लिपि में लिखी जानेवाली हिंदी देश की राजभाषा होगी। संविधान सभा में हिंदी और हिंदुस्तानी को लेकर भी बहस और मतविभाजन हुआ था लेकिन हिंदी के पक्ष में बहुमत था। 

कुछ लोग संविधान सभा में हिंदी के पक्ष में बहुमत को भारत पाकिस्तान विभाजन के बाद लोगों के मत बदलने से भी जोड़कर देखते हैं। प्रख्यात गांधीवादी अप्पा साहब पटवर्धन ने भी कहा था कि ‘यह उचित ही है कि हमलोग अब हिंदी को ही राष्ट्रभाषा कहें क्योंकि पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा उर्दू होगी।‘ हिंदी को लेकर पक्ष विपक्ष की बातें होती रहीं पर यह प्रविधान बना कि संविधान के लागू होने के 15 वर्षों तक अंग्रेजी चलती रहेगी। 15 वर्षों के बाद अगर संसद को लगता है कि आगे भी इस प्रविधान की जरूरत है तो वो कानून बनाकर इसको लागू रख सकती है। फिर भाषा आयोग बना,अध्यादेश जारी हुए। हिंदी राजभाषा तो बनी रही पर सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का दबदबा कायम रहा। 1963 तक पूरे देश में ऐसी स्थिति बन गई जिससे साफ हो चला था कि 1965 में यानि संविधान लागू होने के 15 वर्ष बाद भी शासन की भाषा हिंदी नहीं हो पाएगी। 1963 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संसद में घोषणा कर दी कि ‘जबतक अहिंदी भाषी राज्य अंग्रेजी को चलाना चाहेंगे तब तक हिंदी के साथ-साथ केंद्र में अंग्रेजी भी चलती रहेगी।‘ नेहरू का ये वक्तव्य भाषा अधिनियम का आधार बना। तब से लेकर अबतक अंग्रेजी शासन की भाषा बनी हुई है। उसका दबदबा कायम है क्योंकि इसको लेकर गंभीरता से प्रयास नहीं हुए, जो भ्रांतियां हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच पैदा की गईं उनको दूर करने का राजनीतिक स्तर पर प्रयास नहीं हुआ। देश को चलानेवाले अधिकतर लोग अंग्रेजीदां रहे और उनके लिए शासन की भाषा अंग्रेजी रखना आसान रहा। 

लेकिन हिंदी को मजबूती देने का काम अहिंदी भाषियों ने भी किया चाहे वो वीर सावरकर हों, तिलक हों, भूदेव मुखर्जी हों, सुनीति कुमार चाटुर्ज्या हों या अन्य महानुभाव। उसी तरह से जब 2014 में केंद्र में नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने और गुजराति होते हुए भी उन्होंने अपनी प्राथमिक भाषा हिंदी बनाई तो शासन की भाषा बदलने लगी। 2019 में जब अमित शाह गृह मंत्री बने तो उन्होंने खामोशी से राजभाषा हिंदी को मजबूत करने का प्रयास आरंभ कर दिया। अमित शाह भी गुजराती हैं और उन्होंने हिंदी सीखी। वो खुद हिंदी में लिखने लगे और अधिकारियों को हिंदी में लिखने के लिए प्रोत्साहित और प्रेरित करने लगे। जब प्रधानमंत्री और गृहमंत्री राजभाषा हिंदी में कार्य करने लगे तो अन्य मंत्रियों ने भी इसको प्राथमिकता देना आरंभ किया। परिणाम ये हुआ कि अन्य मंत्रालयों में हिंदी में कामकाज को वरीयता मिलने लगी। राजभाषा गृह मंत्रालय के अंतर्गत आता है और गृहमंत्री राजभाषा हिंदी को प्राथमिकता दे रहे हैं। 2019 में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में दूसरी बार सरकार बनी तो गृह मंत्री अमित शाह ने रुचि लेकर 49 मंत्रालयों में हिंदी सलाहकार समिति का गठन करवाया। राजभाषा विभाग की सक्रियता सतह पर दिखने लगी। अन्य भारतीय भाषाओं को हिंदी से जोड़ने का कार्य आरंभ हुआ। ‘लीला राजभाषा’ और ‘लीला प्रवाह’ के अंतर्गत 14 भारतीय भाषाओं में हिंदी सीखने की सहूलियतें प्रदान की गई। अनुवाद का साफ्टवेयर ‘कंठस्थ’ और ‘ईमहाशब्दकोश’ तैयार हुए। संसदीय राजभाषा समिति ने दस खंडों में अपनी सिफारिशें राष्ट्रपति को दीं। पिछले वर्ष काशी में पहला अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन आयोजित किया गया। हिंदी दिवस के अवसर पर अगले महीने सूरत में राजभाषा का एक सम्मेलन गृह मंत्रालय आयोजित कर रहा है। एक शब्दकोश पर भी कार्य हो रहा है। इसके अलावा कर्मचारियों के हिंदी प्रशिक्षण को लेकर भी राजभाषा विभाग सक्रिय दिख रहा है। गृह मंत्रालय की पहल पर गैर हिंदी भाषी कर्माचरियों में हिंदी सीखने की ललक बढ़ी है। गृह मंत्री अमित शाह के बारे में कहा जाता है कि वो खुद हिंदी के व्यापक प्रयोग को लेकर सतर्क रहते हैं। उम्मीद की जा सकती है कि दिनकर ने जो आशंका जताई थी वो अब निर्मूल साबित होगी और हिंदी को उसका उचित स्थान मिलेगा और वो शासन के साथ ज्ञान और रोजगार की भाषा भी बनेगी।  

Saturday, August 20, 2022

बहिष्कार के मकड़जाल में बालीवुड


इन दिनों कुछ फिल्मों के बहिष्कार को लेकर खूब चर्चा हो रही है। इंटटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर फिल्मों के बायकाट को लेकर पक्ष विपक्ष में हलचल दिखती है। अभिनेता आमिर खान की फिल्म लाल सिंह चड्ढा की रिलीज के पहले से उसके बायकाट की अपील जारी होने लगी थी। फिल्म रिलीज हुई और फ्लाप हो गई। इसी तरह से अक्षय कुमार की फिल्म रक्षाबंधन को लेकर भी बायकाट की अपील इंटरनेट मीडिया पर हुई। ये फिल्म भी फ्लाप हो गई। हम इन फिल्मों के बायकाट और इनके फ्लाप होने पर बात करेंगे लेकिन उसके पहले देख लेते हैं कि और कौन सी बड़ी बजट की फिल्में फ्लाप हुईं। यशराज फिल्म्स की दो बेहद महात्वाकांक्षी फिल्म आई, सम्राट पृथ्वीराज और शमशेरा। दोनों फिल्मों ने बाक्स आफिस पर अपेक्षित प्रदर्शन नहीं किया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार फिल्म सम्राट पृथ्वीराज की लागत तीन सौ करोड़ रुपए थी और उसने बाक्स आफिस पर तिरानवे करोड़ रुपए का बिजनेस किया। इसी तरह से शमशेरा के निर्माण की लागत डेढ सौ करोड़ रुपए थी और इस फिल्म ने भी चौंसठ करोड़ रुपए का बिजनेस किया। अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म बच्चन पांडे को बनाने में एक सौ अस्सी करोड़ रुपए खर्च हुए और बाक्स आफिस बिजनेस तेहत्तर करोड़ का रहा। बच्चन पांड को लेकर कहा गया था कि वो ‘द कश्मीर फाइल्स’ की वजह से पिट गई थी।खुद अक्षय कुमार ने भी भोपाल में चित्र भारती के मंच से ऐसा ही कहा था। सम्राट पृथ्वीराज और शमशेरा के खिलाफ न तो कोई बायकाट की अपील थी और न ही कोई हैशटैग चला था। बायकाट की अपील होती क्यों हैं इसके पीछे के कारणों को देखना चाहिए। 

आज से करीब दो दशक पहले गुजरात में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। उसके बाद अभिनेता आमिर खान ने एक साक्षात्कार दिया था। उस साक्षात्कार में उन्होंने उस वक्त के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर जमकर आरोप लगाए थे। गुजरात में हुई हिंसा में मरनेवालों के लिए नरेन्द्र मोदी को उत्तरदायी माना था। उसी साक्षात्कार में आमिर खान ने नरेन्द्र मोदी को अमेरिका का वीजा नहीं मिलने का उपहास भी उड़ाया था। 2006 में आमिर खान मेधा पाटकर के साथ नर्मदा बचाओ आंदोलन में शामिल हुए थे और उस वक्त की गुजरात सरकार के विरोध में जमकर बयानबाजी की थी। 2015 में जब गजेन्द्र चौहान को पुणे के भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान का चेयरमैन नियुक्त किया गया था तो छात्रों ने उसका विरोध किया था। आंदोलन भी हुआ था। उस समय भी आमिर खान मुखर हुए थे और आंदोलनकारी छात्रों का समर्थन किया था। 2015 में ही जब पुरस्कार वापसी अभियान चल रहा था तब भी आमिर खान ने देश में असहिष्णुता का राग अलापा था। उस वक्त की अपनी पत्नी किरण राव से एक बातचीत का हवाला दिया था और कहा था कि वो देश के माहौल से डरकर देश छोड़ने की बात करती है। आमिर खान के इन बयानों से स्पष्ट है कि वो राजनीति में एक पक्ष विशेष का विरोध कर रहे थे और परोक्ष रूप से एक पक्ष का समर्थन कर रहे थे। जब आप राजनीतिक होना चाहते हैं तो विरोध के लिए भी तैयार रहना चाहिए। ये संभव नहीं कि जब आपकी फिल्म आए तो लोग राजनीतिक समरत् या विरोध को भुलाकर फिल्म देखने चले जाएं। आपकी फिल्म को सफल बनाएं। आप जिस पक्ष का विरोध कर रहे थे उनको भी तो आपके विरोध का अधिकार है। उसी अधिकार की परिणति है बहिष्कार की अपील। बायकाट का हैशटैग।

आमिर खान या तमाम वो अभिनेता जो राजनीतिक टिप्पणियां करते रहे हैं उनके खिलाफ अगर बायकाट की अपील होती है तो इससे उनको परेशान नहीं होना चाहिए। राजनीति में तो वार पलटवार होते ही रहते हैं। दीपिका पादुकोण भी जब अपनी फिल्म छपाक के रिलीज के पहले दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू युनिवर्सिटी के छात्रों के प्रदर्शन में गई थीं तो उसका नकारात्मक प्रभाव फिल्म के कारोबार पर पड़ा था। अभी एक और फिल्म रिलीज हुई दोबारा, जिसमें अभिनेत्री तापसी पन्नू हैं। पिछले दिनों तापसी पन्नू और उस फिल्म के निर्देशक का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वो फिल्मों के बायकाट के ट्रेंड का मजाक बना रही थीं। उनका निर्देशक भी राजनीतिक बातें कर रहा था। वो पहले भी नेताओं को लेकर अपमानजनक और घटिया बातें करता रहा है। उनको गंभीरता से कोई लेता नहीं। तापसी की इस फिल्म को लेकर भी बायकाटदोबारा ट्विटर पर ट्रेंड हुआ। फिल्म पहले दिन सिर्फ 72 लाख का कारोबार कर पाई। कई शोज रद्द करने पड़े। थिएटरों में सन्नाटा रहा। इस फिल्म की लागत भी करीब तीस करोड़ रुपए है। अब तापसी पन्नू और उसके निर्देशक को समझ में आ रहा होगा कि ये बहिष्कार की अपील का मजाक उड़ाना उनको कितना महंगा पड़ा। हो सकता है कि इन अभिनेताओं, अभिनेत्रियों और निर्देशकों को फिल्मों के फ्लाप होने पर धनहानि न होती हो क्योंकि पैसा तो निर्माता का लगता है। ये लोग फिल्म पूरी करके अपना मेहनताना लेकर निकल लेते हैं। लेकिन इनको ये सोचना होगा कि इसका प्रभाव उनके करियर पर पड़ सकता है। 

बहिष्कार को लेकर एक बात और कही जाती है कि इंटरनेट मीडिया के जमाने में ये नया ट्रेंड आरंभ हुआ है। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म पर भले ही बहिष्कार नया लगता हो लेकिन हमारे देश में तो बहिष्कार की अपील स्वाधीनता पूर्व से होती रही है। गांधी जी ने भी अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए बहिष्कार की अपील को अपना हथियार बनाया था। इमरजेंसी के दौर में भी लोगों ने बहिष्कार की अपील की थी। पिछले दिनों जगदीशचंद्र माथुर का नाटक कोणार्क पढ़ रहा था। इस पुस्तक में मई 1961 में लिखी माथुर साहब की एक टिप्पणी है, ‘यों तो इस नाटक के विषय में मुझे अनेक रोचक अनुभव हुए, किंतु सबसे दिलचस्प अनुभव हुआ दिल्ली के अंग्रेजी समाचारपत्रों में इस नाटक के अभिनय की समालोचना पढ़कर । उनमें से एक समालोचक महोदय (अथवा महोदया!) ने लिखा कि इस नाटक की भाषा इतनी दुरूह है कि इस नाटक का बहिष्कार होना चाहिए, क्योंकि लेखक ने यह नाटक संस्कृतमयी हिंदी का प्रचार करने के लिए लिखा है।‘ इससे स्पष्ट है कि रंगमंच की दुनिया में 1961 में बहिष्कार की अपील की गई थी। ये अलग बात है कि उस समय इंटरनेट मीडिया नहीं था। तो जो लोग इसको नया ट्रेंड बता रहे हैं उनको इतिहास में जाने और समझने की आवश्यकता है। 

एक और बात है जो बायकाट ट्रेंड के साथ सामने आ रही है। पहले फिल्मों का जब विरोध होता था तो सिनेमा हाल के पोस्टर फाड़े जाते थे, कई बार उनमें आग भी लगा दी जाती थी। विरोध प्रदर्शन जब उग्र होता था तो शहरों में भी प्रदर्शन आदि होते थे। ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब फिल्म पद्मावत को लेकर कई शहरों में विरोध प्रदर्शन और आगजनी हुई थी। अब इस तरह के प्रदर्शन लगभग बंद हो गए हैं और इंटरनेट मीडिया पर विरोध होता है। क्या इसको भारतीय समाज के मैच्योर होने के संकेत के तौर पर देखा जाना चाहिए। हिंसा और आगजनी वाले विरोध प्रदर्शन से अलग विरोध का एक ऐसा तंत्र जिसमें अपनी बात भी पहुंच जाए और सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान भी न हो। पुलिस और अन्य तंत्र का समय भी खराब न हो। फिल्मों के फ्लाप होने की एकमात्र वजह बायकाट नहीं है। उसपर एक अलग लेख लिखा जा सकता है कि इन दिनों बड़े बजट की अधिकतर हिंदी फिल्में क्यों पिट रही हैं। क्यों वो अपनी लागत तक नहीं निकाल पा रही हैं। लेकिन बायकाट के इस खेल में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री उलझ गई है और उसको फिलहाल कोई रास्ता दिख नहीं रहा है। 

Saturday, August 13, 2022

सलमान रश्दी पर हमले से उपजे प्रश्न


बुकर पुरस्कार से सम्मानित और करीब तीन दशक से भारी सुरक्षा में जीवन बसर कर रहे भारतीय मूल के लेखक सलमान रश्दी पर अमेरिका के न्यूयार्क में हमला हुआ। हमलावर हादी मतर ने उनकी गरदन, हाथ और पेट पर चाकू से वार किए। उनकी हालत गंभीर बनी हुई है। उनके लिटरेरी एजेंट के अनुसार उनकी एक आंख की रोशनी जा सकती है। हमले में उनके हाथ की नस कट गई है और लीवर भी जख्मी हुआ है। सलमान रश्दी पर हमले की आशंका काफी लंबे समय से बनी हुई थी। जब उनकी पुस्तक ‘द सेटेनिक वर्सेस’ प्रकाशित हुई थी तो उनपर ईशनिंदा का आरोप लगा था। उसके बाद 14 फरवरी 1989 को ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खोमैनी ने सलमान रश्दी की मौत का फतवा जारी किया था। खोमैनी ने उस किताब को ईशनिंदा और इस्लाम का मजाक उड़ाने का दोषी करार दिया था । खोमैनी के फतवे के बाद सलमान रश्दी बहुत दिनों तक सार्वजनिक जीवन से दूर रहे थे। कभी ब्रिटेन में तो कभी नार्वे में रहे। अपने निर्वासन के दिनों को सलमान रश्दी ने अपनी पुस्तक ‘जोसेफ एंटन’ में विस्तार से लिखा है। साढे छह सौ पृष्ठों की इस पुस्तक में सलमान रश्दी ने निर्वासन का दर्द तो लिखा ही है कई जगहों पर अपने जीवन पर मंडरा रहे आसन्न खतरे का भी उल्लेख किया है। सलमान रश्दी पर हमले के बाद कई बिंदुओं पर एक बार फिर से विचार करने की आवश्यकता है। सलमान पर जानलेवा हमला अमेरिका के शहर न्यूयार्क में हुआ। वो भी करीब ढाई हजार लोगों की उपस्थिति में। यहां ये प्रश्न उठता है कि जो अमेरिका पूरी दुनिया को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाता रहता है उसके यहां इस तरह के हमले क्यों हो जाते हैं। ब्रिटेन और नार्वे में तो सलमान रश्दी पर हमला नहीं हो पाया। अमेरिका में हमलावरों ने अपने नापाक मंसूबे को कैसे अंजाम तक पहुंचा दिया। क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ढिंढोरा पीटनेवाला देश अपनी धरती पर एक लेखक को सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकता है? 

सलमान रश्दी पर हमले के बाद दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न ये उठता है कि कोई मजहबी नेता या मजहबी रहनुमा किसी की हत्या का फतवा कैसे जारी कर सकते हैं। इस्लाम में कई बार ये देखने को मिलता है कि ईशनिंदा के आरोप में मौत का फतवा जारी कर दिया जाता है। मौत का फतवा जारी करने के साथ ही इनाम की घो]षणा भी की जाती है। अयातुल्ला खोमैनी ने जब सलमान रश्दी की मौत का फतवा जारी किया था तब भी मारनेवाले को भारी भरकर रकम इनाम में देने की बात की गई थी। ये सब धर्म की आड़ में किया जाता है। अमेरिकी मीडिया में छप रही खबरों के मुताबिक सलमान रश्दी पर हमला करनेवाला हादी मतर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स नामक संस्था का सदस्य है। इंटरनेट मीडिया पर उपलब्ध उसके परिचय में शिया उग्रवादी संगठनों से संबंध का शक भी है। अब किस तरह से हादी मतर को रैडिकलाइज किया गया कि वो भीड़ के बीच किसी की जान लेने चला गया। 

सलमान रश्दी अकेले नहीं हैं जिनपर ‘द सैटेनिक वर्सेस’ की वजह से हमला हुआ है। द सैटेनिक वर्सेस से जुड़े कई लोगों पर हमले हुए। एक व्यक्ति की तो जान भी गई। 1991 में सलमान की इस पुस्तक का इटालियन में अनुवाद करनेवाले एत्तोरे कैपरियोलो पर मिलान में हमला हुआ। उनके भी गले, हाथ और छाती पर चाकू से वार कर उनको बुरी तरह से घायल कर दिया गया था। 1991 में ही सैटेनिक वर्सेस का जापानी में अनुवाद करनेवाले  हितोशी इहारशी की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। उनका शव जापान के एक विश्वविद्यालय के परिसर में मिला था। इसके दो साल बाद नार्वे में उस प्रकाशक पर हमला हुआ जिसने नार्वे में ‘द सैटेनिक वर्सेस’ का प्रकाशन किया था। उनको उनके घर के सामने गोली मारी गई थी जिसमें वो बुरी तरह से जख्मी हो गए थे। इन वारदातों के बाद सलमान रश्दी की सुरक्षा और बढ़ा दी गई थी। अगर नार्वे की घटना को छोड़ दिया जाए तो सभी हमले लगभग एक ही तरीके से किए गए हैं यानि गले पर वार। ऐसा प्रतीत होता है कि हर हमलावर सर को तन से जुदा करने की कोशिश में गले पर वार करता है। 

अब अगर हम अपने देश में सलमान रश्दी पर हुए हमले पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रगतिशील पैरोकारों की प्रतिक्रिया को देखते हैं। लगभग हर जगह इसके लिए धर्मांधता को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, बिना उस धर्म का नाम लिए। जावेद अख्तर ने सलमान पर हमला करनेवाला को ‘किसी कट्टरपंथी’ कहा। उन्होंने हमलावर का नाम और पहचान सामने आने के बाद से चुप्पी साध ली है। हमलावर को इस्लामी कट्टरपंथी कहने में इनके हाथ कांपने लगते हैं, उंगलियां सुन्न हो जाती हैं। अगर कोई अपराधी हिंदू होता है तो उसको हिंदू धर्मांध या हिंदू फैनेटिक कहने में देर नहीं करते हैं। सलमान रश्दी पर हमले के ठीक पहले उन्होंने एक रिट्वीट किया है जिसमें अक्षय कुमार को कनाडा कुमार बताकर उनका मजाक उड़ाया गया है और आमिर खान की इस बात के लिए प्रशंसा की गई है कि उसने अपनी फिल्म पाकिस्तान में रिलीज करने के मना कर दिया था। जावेद अख्तर भी बहुधा नैतिकता की मीनार पर खडे होकर अपनी निष्पक्षता का ढिंढोरा पीटते रहते हैं लेकिन समय आने पर उनकी निष्पक्षता का ढोंग उजागर हो जाता है। कई वामपंथी बुद्धिजीवी सलमान पर हुए हमले को लेकर बहुत हल्की प्रतिक्रिया दे रहे हैं। हमलावर को धर्मांध कहने से इस समस्या का समाधान नहीं निकलनेवाला है। धर्मांध कहकर तो अपराध कम करते हैं। अपराधी के कुकर्मों पर धर्म का परदा डालने की कोशिश करते हैं। 

किसी भी अपराधी को धर्मांध बनाता कौन है इसपर विचार करना होगा, उन कारकों को चिन्हित करना होगा, उन स्थितियों की पहचान करनी होगी जिसमें कोई किसी की जान लेने की हद तक चला जाता है। प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को इन कारणों पर विचार करके मुखर होना पड़ेगा अन्यथा उनकी प्रतिक्रिया रस्म अदायगी बनकर रह जाएगी। वैसे इस जमात से इस प्रकार की अपेक्षा रखना व्यर्थ है क्योंकि निर्वासित बंगालादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन के मसले पर इन्होंने कभी कुछ नहीं बोला। जब बंगाल की वामपंथी सरकार ने उनको पर्याप्त सुरक्षा नहीं दी या जब ममता सरकार ने उनको अपने राज्य में रखने से मना कर दिया, तब भी इन प्रगतिशीलों ने अपने मुंह सिल लिए थे। मेरे जानते दुनिया में इस्लाम अकेला ऐसा मजहब है जिसके माननेवालों के बीच मौत के फतवे की अवधारणा है। धर्म की आड़ में जिस तरह से हत्या होती है उसके बारे में मुस्लिम समाज के रहनुमाओं को भी विचार करना होगा। साहस के साथ इसके विरोध में अपनी आवाज बुलंद करनी होगी। ईशनिंदा की सजा मौत की लगातार मजबूत होती जा रही अवधारणा पर न केवल विचार करने की आवश्यकता है बल्कि इसका निषेध भी समय की मांग है। इसके लिए मुस्लिम समाज को अपने मजहब में व्यापक स्तर पर धार्मिक सुधार की आवश्यकता है। वैज्ञानिक तरीके से अपने मजहबी विचारों की व्याख्या करने की जरूरत है। आधुनिक और सभ्य समाज में कानून और संविधान से बाहर जाकर मौत की सजा देने का अधिकार किसी को नहीं है। इस बात को प्रचारित प्रसारित करना होगा। यह काम आसान प्रतीत नहीं होता है। लेकिन आज नहीं तो कल इसपर काम करना ही पड़ेगा। बेहतर है कि इस कार्य को शीघ्र आरंभ कर दिया जाए, ताकि कम से कम लोगों की जान जाए और जो दहशत में जी रहे हैं उनको खुली हवा में सांस लेने का अवसर मिल सके। 

Saturday, August 6, 2022

प्रेमचंद ने उर्दू में लिखना क्यों छोड़ा?


हिंदी में कथा सम्राट के नाम से प्रसिद्ध प्रेमचंद के कृतित्व और व्यक्तित्व को लेकर हिंदी में विपुल लेखन हुआ है। उनकी रचनाओं को आधार बनाकर देशभर के विश्वविद्यालयों में सैकड़ों शोध हुए हैं। इस बारे में भी सैकड़ों लेख लिखे गए कि कैसे प्रेमचंद गरीबों और किसानों की समस्याओं को अपनी रचनाओं में स्थान देते थे। उनकी रचनाओं में गरीबों और किसानों की समस्या के चित्रण के आधार पर उनकी प्रगतिशीलता और जनपक्षधरता को भी रेखांकित किया जाता रहा है। इस बात का उल्लेख भी मिलता है कि प्रेमचंद पहले उर्दू में नवाबराय के नाम से लिखते थे। कई जगह इस बात का उल्लेख मिलता है कि जुलाई 1908 में कानपुर से सोजेवतन नामक उनके पहले कहानी संग्रह का प्रकाशन हुआ था। इस संग्रह में प्रकाशित देशप्रेम की कहानियों को अंग्रेजों ने आपत्तिजनक माना था। तब कानपुर के कलक्टर ने उनको बुलाकर फटकारा था और कहा था कि अगर मुगलों का राज होता तो तुम्हारे दोनों हाथ काट लिए जाते। तुम्हारी कहानियां एकांगी हैं और तुमने अंग्रेजी राज की तौहीन की है। कलक्टर ने कहानी संग्रह को जब्त कर उसमें आग लगवा दी थी। फिर पुलिस के अफसरों के साथ कलेक्टर ने मीटिंग की जिसमें ये निष्कर्ष निकाला गया कि कहानियां राजद्रोह की श्रेणी में आती हैं। प्रेमचंद ने लिखा- ‘पुलिस के देवता ने कहा कि ऐसे खतरनाक आदमी को जरूर सख्त सजा देनी चाहिए।‘ मामला किसी तरह रफा दफा हुआ। उनको चेतावनी दी गई थी कि वो अपनी रचनाएं प्रकाशन पूर्व प्रशासन को दिखवा लिया करें। कहानी संग्रह की जब्ती और अंग्रेज कलेक्टर की फटकार के बाद नवाबराय ने प्रेमचंद के नाम से हिंदी में लिखना आरंभ कर दिया। इस तरह के आलेखों में ये बताया जाता रहा है कि इस कारण से ही प्रेमचंद ने उर्दू में लिखना बंद कर दिया। लेकिन ये सत्य नहीं बल्कि अर्धसत्य है। इस बात की चर्चा कम होती है कि प्रेमचंद ने जब ‘कर्बला’ नाम का नाटक लिखा था तो उसका उस दौर के मुस्लिम लेखकों ने जमकर विरोध किया था। ये तर्क दिया गया था कि हिंदू लेखक मुसलमानों के इतिहास को आधार बनाकर कैसे लिख सकते हैं। प्रेमचंद इस तरह की बातों के आधार पर अपनी आलोचना से बेहद खिन्न हुए थे। इस बात की चर्चा हिंदी के प्रगतिशील लेखकों ने बिल्कुल ही नहीं की है बल्कि उनके जीवनीकार ने भी इसका उल्लेख नहीं किया। कमलकिशोर गोयनका जैसे प्रेमचंद साहित्य के अध्येता इस बात को रेखांकित करते रहे हैं। 

अब देखते हैं कि प्रेमचंद ने स्वयं उर्दू में नहीं लिखने का क्या कारण बताया है। 1964 में साहित्य अकादमी से एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी जिसका नाम है प्रेमचंद रचना संचयन। इस पुस्तक का संपादन निर्मल वर्मा और कमलकिशोर गोयनका ने किया था। इस पुस्तक में 1 सितंबर 1915 का प्रेमचंद का अपने मित्र मुंशी दयानारायण निगम को लिखे एक पत्र का अंश प्रकाशित है। इस पत्र में प्रेमचंद ने लिखा है, ‘अब हिंदी लिखने की मश्क (अभ्यास) भी कर रहा हूं। उर्दू में अब गुजर नहीं। यह मालूम होता है कि बालमुकुंद गुप्त मरहूम की तरह मैं भी हिंदी लिखने में जिंदगी सर्फ (खर्च) कर दूंगा। उर्दू नवीसी में किस हिंदू को फैज (लाभ) हुआ है, जो मुझे हो जाएगा।‘  इस वाक्यांश को ध्यान से समझने की आवश्यकता है, उर्दू में अब गुजर नहीं है और उर्दू नवीसी में किस हिंदू को लाभ हुआ है। इससे प्रेमचंद के आहत मन का पता चलता है कि वो उर्दू वालों या अपने समकालीन मुसलमान लेखकों के विरोध से कितने खिन्न थे। वो स्पष्ट रूप से प्रश्न की शक्ल में कह रहे थे कि उर्दू में लिखने से किसी हिंदू को लाभ नहीं हो सकता । प्रेमचंद के इस आहत मन को प्रगतिशील आलोचकों और लेखकों ने या तो समझा नहीं या समझबूझ कर योजनाबद्ध तरीके से दबा दिया। इस बात की संभावना अधिक है कि जानबूझकर इस प्रसंग को नजरअंदाज किया गया। प्रेमचंद को प्रगतिशील जो साबित करना था। जानबूझकर इस वजह से क्योंकि प्रेमचंद से संबंधित कई तथ्यों को ओझल किया गया। नई पीढ़ी को ये जानना चाहिए कि 1920 में प्रकाशित कृति ‘वरदान’ को प्रेमचंद ने राजा हरिश्चंद्र को समर्पित किया था। उसको बाद के संस्करणों में हटा दिया गया। इसी तरह प्रेमचंद के कालजयी उपन्यास ‘गोदान’ का नाम ही बदल दिया गया। पंडित जनार्दन झा ‘द्विज’ ने अपनी ‘पुस्तक प्रेमचंद की उपन्यास कला’ में स्पष्ट किया है कि प्रेमचंद ने पहले अपने उपन्यास का नाम गौ-दान रखा था। द्विज जी के कहने पर उसका नाम गो-दान किया गया। गो-दान 1936 में सरस्वती प्रेस, बनारस और हिंदी ग्रंथ-रत्नाकर कार्यालय, बंबई (अब मुंबई) से प्रकाशित हुआ। लेकिन आज जो उपन्यास उपलब्ध हैं उसका नाम गोदान है। गो और दान के बीच के चिन्ह को हटाकर इसको मिला दिया गया। प्रेमचंद की रचनाओं में भी बदलाव किए गए जिसके प्रमाण उपलब्ध हैं। 

प्रेमचंद के उपरोक्त कथन कि उर्दू में लिखने से किसी हिंदू को लाभ नहीं हो सकता, में उपेक्षा का दर्द है और वो दर्द कालांतर में हिंदी-उर्दू संबंध में भी दिखता है। प्रगतिशीलों ने उर्दू में हिंदू लेखकों की उपेक्षा को अपने लेखन में प्रमुखता नहीं दी और उर्दू के पक्ष में खड़े होकर गंगा-जमुनी तहजीब के विचार को प्रमुखता देते रहे। यह अनायास नहीं है कि उर्दू लेखकों को जितना मान-सम्मान और स्थान हिंदी साहित्य में मिला उस अनुपात में हिंदी लेखकों को उर्दू में नहीं मिल पाया। उर्दू के तमाम शायर इकबाल से लेकर फैज तक देशभर में तब लोकप्रिय हो पाए जब उनके दीवान देवनागरी लिपि में छपकर आए। उर्दू वालों ने ये सह्रदयता हिंदी के लेखकों को लेकर नहीं दिखाई। निराला, दिनकर, पंत आदि की रचनाओं का उर्दू में अपेक्षाकृत कम अनुवाद हुआ। अंग्रेजों के साथ मिलकर उर्दू ने करीब सौ सालों तक हिंदी को दबाने का काम किया। उन्नसवीं सदी के आखिरी वर्षों में जब हिंदी अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रही थी तो सर सैयद अहमद ने अलीगढ़ में ‘उर्दू डिफेंस एसोसिएशन’ नाम की संस्था बनाई। इसी तरह जब 1900 में संयुक्त प्रांत के गवर्नर मैकडानल ने हिंदी को उर्दू के बराबर दर्जा देने की घोषणा की तो सर सैयद के उत्तराधिकारी मोहसिन उल मुल्क ने इसका विरोध किया था। ये बातें नामवर सिंह भी स्वीकार करते थे। लेकिन नामवर के इस स्वीकार का भी प्रचार प्रसार नहीं हो पाया और उसको दबा दिया गया। कहना न होगा कि प्रगतिशील विचार के झंडाबरदार हर उस विचार को दबा देते थे जिससे उर्दू और उर्दू वालों की छवि हिंदी और हिंदीवालों के विरोध की बनती थी। 

स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में या अमृतकाल में प्रेमचंद के साथ हुए इन छल के दोषियों को चिन्हित करना चाहिए। चिन्हित करने के साथ-साथ प्रेमचंद की रचनाओं को मूल स्वरूप में लाकर उनका समग्रता में मूल्यांकन भी होना चाहिए। साहित्य अकादमी  लेकर प्रेमचंद के नाम पर बनी संस्थाएं और विष्वविद्यालयों के हिंदी विभागों का ये उत्तरदायित्व है कि वो अपने पूर्वज लेखक की रचनाओं के साथ हुए इस अनाचार को दूर करने की दिशा में ठोस और सकारात्मक पहल करें। एक लेखक जिसका मन हिंदू धर्म में पगा है, जो अपनी रचनाओँ में भारत और भारतीयता की बात करता है, जो बच्चों के लिए रामचर्चा जैसी कथा पुस्तक लिखता है, जो स्वामी विवेकानंद को उद्धृत करता है उसको मूल रूप में पुनर्स्थापित किया जाए। प्रेमचंद को मार्क्सवाद की जकड़न से आजाद करवाने के लिए सांस्थानिक प्रयत्व किए जाने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन के लिए बनाए जानेवाले पाठ्यक्रमों में प्रेमचंद के वास्तविक स्वरूप को छात्रों को पढ़ाया जा सके, इसकी व्यवस्था की जानी चाहिए।   

Saturday, July 30, 2022

उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का हिंदू मन


आज उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की जयंती है। 1880 में आज के ही दिन प्रेमचंद का जन्म हुआ था। आज एक बार फिर मार्क्सवादी लेखक और मार्क्सवाद में आस्था रखनेवाले प्रेमचंद को कम्युनिस्ट और प्रगतिशील और जाने किन विशेषणों से विभूषित करेंगे। इस तरह की प्रवृति बहुत लंबे समय से हिंदी साहित्य में चल रही है। प्रेमचंद के लेखन का मूल्यांकन करते समय मार्क्सवादी आलोचकों ने समग्रता में उनके कृतित्व को ध्यान में नहीं रखा। प्रेमचंद की उन कृतियों को या उन कार्यों को जानबूझकर ओझल कर दिया गया जिससे उनकी एक अलग ही छवि बनती है। प्रेमचंद को जबरन मार्क्सवादी बताने का ये खेल हिंदी साहित्य में लंबे समय तक चलता रहा। स्कूल और कालेज की पुस्तकों में प्रेमचंद की रचनाओं की व्याख्या इस तरह से की जाती रही कि उनकी आस्था मार्क्सवाद में थी और उनकी रचनाओं में ये प्रतिबंबित होती थी। विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों में मार्क्सवादियों का बोलबाला रहा है जिसकी वजह से छात्रों के मानस पर प्रेमचंद की मार्क्सवादी लेखक की छवि अंकित करवाने में उनको अधिक परेशानी नहीं हुई।  जिस भी लेखक ने प्रेमचंद की रचनाओं को समग्रता में सामने लाने का प्रयत्न किया उनको हाशिए पर रखने का उपक्रम मार्क्सवादियों ने चलाया, खासतौर पर विश्वविद्यालयों में। परिणाम ये हुआ कि लंबे कालखंड तक प्रेमचंद की रचनाओं का मूल्यांकन एकतरफा होता रहा। छात्र भी प्रेमचंद के लेखकीय व्यक्तित्व के एक ही रूप से परिचित होते रहे। ये सिर्फ प्रेमचंद के साथ ही नहीं किया गया बल्कि हिंदी के तमाम लेखकों के साथ ऐसा किया गया। निराला के उन लेखों को साहित्य जगत में सामने ही नहीं आने दिया गया जो उन्होंने कल्याण पत्रिका में लिखे थे। निराला ने कल्याण पत्रिका के अलग अलग अंकों में कई लेख लिखे थे लेकिन उसपर हिंदी में चर्चा नहीं हुई। 

प्रेमचंद की रचनाओं में हिंदू संस्कृति को लेकर कितना कुछ लिखा गया है या उनकी कहानियों में हिंदू संस्कृति किस तरह से मुखर हुई है इसपर प्रेमचंद साहित्य के विद्वान कमलकिशोर गोयनका ने काफी लिखा है। गोयनका को विचारधारा विशेष के विरुद्ध जाकर लिखने की कीमत भी चुकानी पड़ी। अपमान झेलना पड़ा।  साहित्यिक मंच पर सरेआम धमकियां दी गईं। लेकिन कहते हैं न कि सत्य को बहुत दिनों तक रोका नहीं जा सकता है। अब प्रेमचंद के अनेक रूप उपस्थित हो रहे हैं। पिछले दिनों विश्वविद्यालय प्रकाशन, काशी ने प्रेमचंद के संपादन में 1933 में प्रकाशित हंस पत्रिका के काशी अंक का पुनर्प्रकाशन किया। अक्तूबर-नवंबर 1933 में प्रकाशित पत्रिका के इस अंक के लेखों को देखकर संपादक प्रेमचंद की रुचि का पता चलता है। प्रेमचंद के संपादन में निकली इस पत्रिका में एक लेख प्रकाशित है, काशी: हिंदू संस्कृति का केंद्र। इसमें लेखक ने लिखा है- ‘मध्य युग में देश पर बाहरवालों के कितने ही हमले हुए। उत्तर भारत का कोई भी प्रसिद्ध नगर उनके विनाशकारी प्रभाव से नहीं बचा। काशी पर भी सुल्तान नियाल्तगीन, कुतबुद्दीन इबुक के, तथा मुगल-काल में भी कितने ही हमले हुए, परंतु काशी की महिमा का मुख्य आधार व्यापारिक अथवा राजनीतिक महत्ता कभी नहीं रहा, उसका अटूट संबंध तो धर्म और संस्कृति से था। यदि कोई विजयी शासक नगर में लूटपाट मचा देता, मंदिर या मूर्तियों को विध्वंस्त करवा देता, अथवा लोगों का दमन करने लगता तो यह अवश्य था कि काशी कुछ दिनों के लिए श्रीविहीन हो जाती परंतु उसपर कोई वास्तविक प्रभाव न पड़ता था। हर साल फिर ग्रहण पड़ते, अमावस्या और एकादशी आतीं और उनके साथ ही साथ आता- स्त्री-पुरुषों का विशाल जनसमूह जो काशी की गलियों, घाटों और मंदिरों में समा जाता। फिर सदा की भांति प्रात: और संध्या आरती, काशी नगरी में घंटे और शंख के गंभीर निनाद के साथ भक्तों की कंठ ध्वनि मिलकर फिर वही अपूर्व समां बांध देती, मानो कुछ हुआ ही न हो।‘  इस उद्धरण से कई बातें स्पष्ट रूप से सामने आती हैं। पहला ये कि बाहर से कई हमले काशी पर हुए, मुगलों ने भी किए। मंदिर और मूर्तियां नियमित अंतराल पर तोड़ गए, लेकिन हिंदू संस्कृति में वो ताकत है कि वो इन हमलों को न केवल झेल गई बल्कि वापस उठ खड़ी हुई। प्रेमचंद अपने संपादन में इस तरह के लेख प्रकाशित करके उस वक्त अपना सोच देश के सामने रख रहे थे। 

हंस पत्रिका के इसी अंक में प्रेमचंद ने  काशी विश्वनाथ मंदिर पर भी एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख का एक महत्वपूर्ण अंश देखा जाना चाहिए, ‘काशी के श्रीविश्वनाथ मंदिर में स्वयंजात ज्योति:स्वरूप लिंग हैं, इनके ही दर्शन और अर्चन से भक्त लोग अपनी समस्त कामनाओं की पूर्ति के साथ-साथ मोक्ष जैसा अलभ्य प्राप्त करने काशी आते हैं। स्वर्गीय महारानी अहित्याबाई ने पंच मंडप-संयुक्त एक विशाल मंदिर बनवा दिया। 51 फीट ऊंचा यह वर्तमान मंदिर कीमती लाल पत्थरों से बना है। इसके बाद ही सन् 1839 ई. में सिख जाति के मुकुटमणि पंजाब केशरी स्वर्गीय महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के ऊपरी हिस्से को स्वर्ण मंडित करके उसकी सौगुनी शोभा बढ़ा दी।‘  इस लेख की ही कुछ और पंक्तियां, मुसलमान शासकों ने प्राचीन मंदिर को तोड़ा था, उन्हीं ने वर्तमान मंदिर के सिंहद्वार के सामने एक नौबतखाना बनवा दिया, जहां अबतक नौबत बजती है, जिसके ऊपर से विजातीय लोग दर्शन किया करते हैं। केवल दर्शन ही नहीं अंग्रेज लोग पूजोपहार और दक्षिणा भी दे जाते हैं। सम्राट पंचम जार्ज से लेकर प्रत्येक वायसराय विश्वनाथ-दर्शन कर चुके हैं। अभी हाल ही में जब लार्ड इरविन आए थे तब श्रद्धा के साथ चांदी के पूजा-पात्र उपहारस्वरूप भेंट कर गए थे। इस तरह विश्वनाथ इस समय समस्त जातियों द्वारा सम्मानित और पूजित होकर काशी में सुख से विराज रहे हैं।‘ 

उपरोक्त दोनों उद्धरणों में एक बात जो समान है कि मुस्लिम आक्रांताओं ने काशी में मंदिर और मूर्तियां तोड़ीं। इस पत्रिका के कई अन्य लेखों में भी मंदिरों के तोड़े जाने का प्रसंग आया है। एक और लेख है काशी का इतिहास उसमें भी लेखक ने विस्तार से काशी पर हुए अनके हमलों का उल्लेख किया है। इसमें इस बात का जिक्र भी है कि शाहजहां ने भी काशी में मंदिर तुड़वाए थे। धर्मांध औरंजगजेब ने यहां के मंदिर तुड़वाने की आज्ञा प्रचलित की जिनके चिन्ह स्वरूप ज्ञानवापी और बेनीमाधन की मस्जिदें अभी तक मौजूद हैं। औरंगजेब ने तो काशी का नाम बदलकर मुहम्मदाबाद रखा था पर वो प्रचलित नहीं हो पाया। लेकिन मुगलकाल में काशी की जो टकसाल थी वहां के कुछ सिक्कों और कागजों में ये नाम मिलता है। मंदिरों और मूर्तियों को तोड़े जाने के अलावा प्रेमचंद के संपादन में निकले इस अंक से एक और ध्वनि निकलती है वो है हिंदू धर्म और संस्कृति की । 

इस अंक से प्रेमचंद की हिंदू धर्म और संस्कृति में आस्था का पता चलता है। बार बार मंदिरों के तोड़े जाने का उल्लेख इस बात की ओर संकेत करता है कि संपादक इससे आहत था।  उसको अपनी पत्रिका के माध्यम से आमजन तक पहुंचाना भी चाहता था क्योंकि अगर इन लेखों में प्रयुक्त वक्तव्यों, उद्धरणों और घटनाओं के आवरण को हटाकर भीतर छिपी मूल भावनाओं को देखें आपको प्रेमचंद का हिंदू मन दिखाई देगा। वो हिंदू मन जो अपने मंदिरों के तोड़े जाने से आहत है, वो हिंदू मन जो अपनी संस्कृति पर हुए हमलों से दुखी है, वो हिंदू मन जो सनातन संस्कृति की शक्ति को जानता है, वो हिंदू मन जो अपनी परंपरा से विद्रोह का खोखला नारा नहीं लगता बल्कि अपनी परंपरा को अपनी लेखनी से समृद्ध करता है। जो मार्क्सवादी लेखक विचारधारा की शिलाखंड पर बैठकर प्रेमचंद के साम्यवादी होने का शोर मचाते हैं उनको प्रेमचंद के संपादन में प्रकाशित पत्रिकाओं के अंक देखने चाहिए। 


Saturday, July 23, 2022

रचनात्मकता से समृद्ध होंगी भाषाएं


दो दिन पहले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा हुई। फीचर फिल्मों और लोकप्रिय सितारों को पुरस्कार मिले। उनकी खूब चर्चा हुई लेकिन कुछ फिल्मों का उल्लेख नहीं हो पाया। ये उन भाषाओं में बनी फिल्में हैं जो हमारे देश के अलग अलग हिस्सों में बोली जाती हैं। कई बार छोटे भूभाग पर बोली जानेवाली भाषा में बेहतरीन फिल्म देखने को मिल जाती हैं कई बार ऐसा होता कि भौगोलिक रूप से बड़े क्षेत्र में बोली जानेवाली भाषा में अच्छी फिल्में बनती हैं। दो दिन पहले घोषित राष्ट्रीय पुरस्कार में बेस्ट नान फीचर फिल्म के लिए डांगी भाषा की फिल्म टेस्टीमनी आफ एना चुनी गई। इस भाषा के बारे में कम ही जानकारी है। गुजरात का एक जिला है डांग जो महाराष्ट्र की सीमा से लगता है। उस जिले में आदिवासी आबादी है और वहां डांगी बोली जाती है। इस छोटे से आदिवासी बहुल जिले में बोली जानेवाली भाषा में बनी नान फीचर फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार में स्वर्ण कमल प्रदान किया जाएगा। इसी तरह 2020 के लिए ही बेस्ट शार्ट फिल्म कर्बी भाषा में बनी एक फिल्म को दिए जाने की घोषणा की गई है। हरियाणवी में दादा लख्मी पर बनी फिल्म , दिमासा में अमी बरुआ की फिल्म और टुलू में संतोष माडा की फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार दिया जाएगा। इसके अलावा राजस्थानी की एक फिल्म को भी सम्मानित करने की घोषणा की गई है।

उपरोक्त सभी भाषाओं पर विचार करें तो इनमें से कोई भी भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं है। राजस्थानी को छोड़कर सभी भाषाएं अपेक्षाकृत छोटे भूभाग की भाषा है लेकिन इन भाषाओं में लगातार फिल्में बन रही हैं। लगातार इस वजह से कि पिछले तीन वर्षों के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की सूची देखने पर इस तरह की कई भाषाओं की फिल्में दिखती हैं जिनको स्वर्ण कमल या रजत कमल से सम्मानित किया गया है। 2017 में तो निर्देशक की पहली सर्वोत्तम फिल्म का अवार्ड लक्षद्वीप में बोली जानेवाली भाषा जेसरी में बनी फिल्म सिंजर को दिया गया था। इस फिल्म का चयन करनेवाली जूरी के अध्यक्ष मशहूर फिल्मकार शेखर कपूर थे। करीब 115 मिनट की ये फिल्म लक्षद्वीप में रहनेवाले एक मछुआरे पर वैश्विक आतंकवाद के प्रभाव की कहानी है। फिल्म में ये दिखाया गया है कि जब उसकी बहन और मंगेतर को आईएसआईएस के आतंकवादियों के चंगुल से छुड़ाया जाता है तो पता चलता है कि उनके साथ बलात्कार हुआ है। स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब पता चलता है कि युवतियां गर्भवती हैं। जब उनसे संवाद होता है तो ये बात सामने आती हैं कि वो अपना गर्भ गिराने को तैयार नहीं हैं। इस पूरी कहानी और नायक के मन के द्वंद्व को निर्देशक पैंपली ने बेहतरीन तरीके से दर्शकों के सामने रखा है। फिल्म के साथ साथ निर्देशक को भी सम्मानित किया गया था। इसी वर्ष लद्दाखी और टुलू भाषा में बनी फिल्मों को भी पुरस्कृत किया गया था। अगले वर्ष के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में भी राजस्थानी, गारो, सेरदुकपेन जैसी भाषाओं में बनी फिल्मों को सम्मानित किया गया। अगले वर्ष यानि 2019 में पर्यावरण पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मोनपा में बनी फिल्म को दिया गया। इसके साथ ही खासी, मीशिंग, पानिया, टुलू और छत्तीसगढ़ी में बनी फिल्मों को भी पुरस्कार मिले।

उपरोक्त सारी भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में नहीं है। कहने का अर्थ ये है कि संविधान की आठवीं अनुसूची में नहीं होते हुए भी इन भाषाओं में बेहतर कार्य हो रहा है। वो अपनी जमीन से जुड़ी कहानियों और अपने समाज में फैली कुरीतियों पर अपनी कला के माध्यम से प्रहार कर रहे हैं। अच्छी बात ये है कि कला जगत इनके कार्यों को रेखांकित भी कर रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि इन भाषाओं में अधिक से अधिक काम हो ताकि उन इलाकों में फैली कहानियों को देश के सामने लाया जा सके। अब जैसे इस वर्ष अभिनेता यशपाल शर्मा की फिल्म दादा लख्मी को सर्वश्रेष्ठ हरियाणवी फिल्म का पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। दादा लख्मी हरियाणवी के प्रसिद्ध कवि और कलाकार थे। उनको हरियाणा में सूर्य कवि कहा जाता है। लोक कला के क्षेत्र में दादा लख्मी की बहुत प्रतिष्ठा है। अभिनेता यशपाल शर्मा ने श्रमपूर्वक दादा लख्मी के जीवन को पर्द पर उतारा है। इसके लिए उनको इस बात की आवश्कता नहीं हुई कि हरियाणवी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषा हो। किसी भी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग अपनी जगह सही हो सकती है लेकिन उस भाषा के लोगों का ये भी दायित्व होता है कि वो अपनी भाषा में बेहतर काम करें और उसको समृद्ध बनाएं।

इस देश में भाषा के नाम पर स्वाधीनता के बाद से राजनीति हो रही है। कभी राष्ट्रभाषा के नाम पर तो कभी राज्यों के बंटवारे के नाम पर तो कभी शिक्षा नीति में भाषा को मिलनेवाली प्राथमिकता के नाम पर। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के आने के बाद भी भाषा को लेकर एक विभाजन करने की कोशिश की गई थी लेकिन राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषा का उल्लेख होने की वजह से वो विभान संभव नहीं हो पाया। कला जगत में भाषा के नाम पर राजनीति अपेक्षाकृत कम है लेकिन जो कलाकार भाषा के आधार पर कला से महत्व चाहते हैं उनको अपनी भाषा में रचनात्मक कार्य करना चाहिए। रचनात्मक कार्यों से उस भाषा के प्रति लोगों के मन में एक आकर्षण पैदा होगा और वो अधिक लोगों तक पहुंच सकेगी। अगर हम लक्षद्वीप में बोली जानेवाली भाषा जेसरी में बनी फिल्म संजर का ही उदाहरण लें तो निर्देशक ने अपनी कला के माध्यम से अपनी भाषा को वैश्विक मंच तक पहुंचाया। जिस प्रकार से उन्होंने अपनी फिल्म ने वैश्विक आतंकवाद और उसके प्रभाव का मुद्दा उठाया और उसको वैश्विक मंचों पर सराहना मिली। उसने फिल्म से साथ साथ जेसरी भाषा के बारे में जानने की उत्सकुकता भी पैदा की। इस तरह के प्रयासों से न केवल भाषा का फैलाव होता है बल्कि भाषा को मजबूती भी मिलती है।

देश के अलग अलग हिस्सों में बोली जानेवाली भाषा में फिल्में बनने का एक और लाभ है।    हमारे यहां कथावाचन की एक सुदीर्घ और लंबी परंपरा रही है। उस परंपरा को समृद्ध करने के लिए अपने देश की हर भाषा में जो कदम कदम पर कहानियां बिखरी पड़ी हैं, जो लोककथाएं सुनाई जाती हैं उनको फिल्मों के माध्यम से दुनिया के सामने लाया जा सकते है। 2017 में ही एक फिल्म पुरस्कृत हुई थी जिसका नाम है विलेज राकस्टार और इसकी निर्देशक हैं रीमा दास। असमिया में बनी इस फिल्म में एक उत्तर पूर्व के एक 10 वर्षीय बच्ची धुनू की कहानी है। वो अपना राक बैंड बनाना चाहती है। इस फिल्म में उसके सपने और संघर्ष के बीच चलती कथा है जिसमें उसकी विधवा मां है और लड़कों का एक समूह है। इसको जिस तरह से निर्देशक ने कहानी में पिरोया है वो अद्भुत है। पिछले दिनों कान में आयोजित फिल्म फेस्चिवल में भारत को दुनिया का कंटेंट हब बनाने की बात हुई थी। तमाम तरह की सहूलियतों के साथ साथ हमारे देश की सैकड़ों भाषा में फैली कहानियां भी इस योजना में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। अगर हम गंभीरता से अपनी भाषा को समृद्ध और मजबूत करना चाहते हैं तो उसमें रचनात्मक कार्य करें। दुनियाभर का उदाहरण हमारे सामने है कि कोई भी भाषा आंदोलन से न तो दीर्घजीवी हुई है और न ही समृद्ध। उसमें होनेवाले रचनात्मक कार्य ही उस भाषा को और उसको बरतनेवालों को दीर्घायु बनाते हैं।  

दक्षिण में लहराया स्वदेशी का झंडा


भारतीय स्वाधीनता संग्राम में कश्मीर से कन्याकुमारी तक के लोगों ने एकजुट होकर भाग लिया और योगदान दिया। यह इतिहासकारों की समस्या रही कि उन्होंने स्वाधीनता का इतिहास लिखते समय स्वतंत्रता संग्राम के कई ऐसे नायकों को या तो भुला दिया या उनके महत्व का आकलन सही तरीके नहीं किया गया। दक्षिण भारत के स्वाधीनता सेनानियों की तो ब्रिटिश इतिहासकारों ने उपेक्षा ही की। सुनील खिलनानी ने अपनी पुस्तक इनकारनेशंस में इतिहासकार डेविड वाशब्रुक को उद्धृत किया है। उनके मुताबिक ‘1895 से 1916 के बीच मद्रास (अब चेन्नई) की सड़कों पर कोई ब्रिटिश विरोधी कुत्ता शायद ही भौंका होगा। तूतीकोरन अपवाद था।‘ जब डेविड वाशब्रुक तूतीकोरन को अपवाद मान रहे थे तो उसकी वजह थे, वी ओ चिंदबरम पिल्लै। चिंदबरम पिल्लै ने न केवल ब्रिटिश कंपनियों को चुनौती दी बल्कि उन्होंने स्वदेशी के नारे को साकार भी किया। उन्होंने समंदर में ब्रिटिश कंपनियों के एकाधिकार को चुनौती दी थी। इसकी भी बेहद दिलचस्प कहानी है। चिदंबरम पिल्लै का जन्म 1872 में हुआ था। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वो वकालत करने के लिए तूतीकोरन पहुंचे थे। यहां वो शैव सभा के संपर्क में आए और उनका रुझान साहित्य और संस्कृति की ओर हुआ। शैव सभा में सक्रिय चिदंबरम पिल्लै का लेखकों से संपर्क बढ़ा और एक दिन उनके किसी साथी ने उनको बाल गंगाधर तिलक के लेख आदि पढने को दिए। चिंबरम पिल्लै पर तिलक के लेखन का जबरदस्त प्रभाव पड़ा और उनका युवा मन देश को गुलामी की बेड़ियों के आजाद करवाने के लिए तड़पने लगा। 

इस बीच अंग्रेजों ने बंगाल के विभाजन का निर्णय लिया जिसकी देशभर में कठोर प्रतिक्रिया हुई। देशभर में अंग्रजी वस्तुओं का बहिष्कार आरंभ हुआ। युवा पिल्लै ने भी विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के साथ साथ अंग्रेजों के स्कूलों और अन्य संस्थाओं के बहिष्कार की भी अपील की। अब वो सक्रिय राजनीति में आ चुके थे। पिल्लै ने विदेशी वस्तुओं और संस्थाओं के बहिष्कार के लिए अपने इलाके के लोगों को शपथ दिलानी शुरू की। पिल्लै ने लोगों को पानी में खड़े होकर मां काली की शपथ दिलाई थी कि वो विदेशी सामान और संस्थाओं का बहिष्कार करेंगे। इसका जबरदस्त असर तूतीकोरन और आसपास के इलाके में हुआ। इस दौरान ही चिदंबरम पिल्लै ब्रिटिश पुलिस की नजरों में आ गए थे। इतने से पिल्लै का मन नहीं भरा था और वो कुछ बड़ा करके ब्रिटिश राज को चुनौती देना चाहते थे। वो जिस इलाके में रहते थे वो व्यापार का बड़ा केंद्र था। वहां के समुद्री तट पर ब्रिटिश इंडिया स्टीम नेविगेशन कंपनी के जहाजों का कब्जा था। इनके माध्यम से ब्रिटिश कंपनियां भारतीय उत्पाद एक जगह से दूसरे जगह ले जाकर बेचती और मुनाफा कमाती थी। पिल्लै के मन में ये विचार पनप रहा था कि एक देसी जहाज कंपनी होनी चाहिए ताकि यहां के व्यापारियों को लाभ मिल सके। उन्होंने 1906 के अप्रैल में एक योजना बनाई और उसपर अमल आरंभ कर दिया। दिसंबर 1906 में पिल्लै ने अपनी कंपनी स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी बनाई और इस कंपनी का एक जहाज समंदर में उतार दिया। इनकी कंपनी का रेट कम होने की वजह से इनको अधिक यात्री और कारोबारी मिलने लगे। इससे बौखलाई ब्रिटिश कंपनी ने पुलिस और प्रशासन का सहारा लिया। स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी को कानूनी अड़चनें लगाकर बाधित करने का प्रयास किया जाने लगा लेकिन चिदंबरम ने हार नहीं मानी। उन्होंने पैसे जुटाकर दो और जहाज खरीद लिए। ये दोनों जहाज पहलेवाले से बड़े थे। इन दोनों जहाजों पर पिल्लै ने हरा, पीला और लाल झंडा पेंट करवाकर बड़े बड़े अक्षरों में वंदे मातरम लिखवा दिया था। उनका ये प्रयोग बहुत सफल रहा था और लोग उनको स्वदेशी पिल्लै कहने लगे थे। 

ये सब चल ही रहा था कि पिल्लै ने एक और युवा साथी शिवम के साथ मिलकर तूतीकोरन में मिल मजदूरों का आंदोलन आरंभ कर दिया। अधिक सुविधा और वेतन की मांग करते हुए कोरल मिल में हड़ताल हो गई। ये हड़ताल इतनी सफल रही कि अंग्रेजों ने मजदूरों से समझौता करना पड़ा। इसके बाद पूरे इलाके में चिदंबरम पिल्लै की लोकप्रियता और बढ़ गई और इससे बढा उनका हौसला भी। लेकिन अंग्रेजों ने चिदंबरम को फंसाने की योजना बना ली थी और उनको देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इनकी गिरफ्तारी के विरोध में तूतीकोरन में भयंकर हिंसा और आगजनी हुई थी। अंग्रेज सरकार ने आनन-फानन में पिल्ले को डबल उम्रकैद की सजा सुनाकर जेल भेज दिया। जेल में उको आम कैदी की तरह रखा गया और हाड़तोड़ मेहनत करवाई जाती थी। चिंदबरम पिल्लै ने हाईकोर्ट में अपील की और फिर उनका केस प्रीवी काउंसिल तक गया। उनकी सजा कम हुई और चार साल के बाद उनको रिहा कर दिया गया। इन चार सालों में स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी लगभग बंद हो चुकी थी और जहाज बिक गए थे। उनका वकालत का लाइसेंस रद कर दिया गया था। बाद में गांधी से मतभेद के चलते पिल्लै ने 1920 में कांग्रेस पार्टी छोड़ दी। फिर बैंक मैनेजर की नौकरी की। इससे ऊबकर उन्होंने वकालत का लाइसेंस वापस करने की अपील की जिसको न्यायालय ने मान लिया। वो फिर से वकालत भी करने लगे और कांग्रेस पार्टी भी ज्वाइन कर ली। धीरे धीरे वो गुमनामी में चले गए और 1936 में तूतीकोरन के कांग्रेस के कार्यलय में अंतिम सांसे लीं। स्वदेशी का झंडा बुलेंद करनेवाले इस स्वाधीनता सेनानी ने शिपिंग में जिस तरह के स्वावलंबन की राह दिखाई थी उसपर आगे चलकर भारतीय कंपनियों ने काम किया। 

Saturday, July 16, 2022

इंदिरा, इमरजेंसी और कंगना


कंगना रनोट बेहद प्रतिभाशाली अभिनेत्री हैं। कई फिल्मों में उनका उत्कृष्ट अभिनय देखने को मिला है। कमर्शियल फिल्मों में उनकी सफलता की कहानी तो सबको मालूम है। कई बार वो लीक से हटकर फिल्में करती हैं और उसमें अपने अभिनय से दर्शकों का मन मोह लेती हैं। पिछले दिनों तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रही जयललिता की जिंदगी पर उनकी फिल्म थलाइवी आई थी। उस फिल्म में कंगना ने जयललिता के किरदार को पर्दे पर अपने अभिनय कौशल से जीवंत कर दिया था। तमिल और हिंदी में बनी इस फिल्म में उनके अभिनय की बेहद सराहना हुई थी। अब कंगना ने एक और बेहद चुनौतीपूर्ण विषय और पात्र का चयन किया है। अब वो आपातकाल पर फिल्म बना रही हैं। इस फिल्म में वो इंदिरा गांधी की भूमिका में होंगी। कंगना ने इस फिल्म का एक छोटा सा वीडियो इंटरनेट मीडिया पर साझा किया है। उसको देखकर लगता है कि कंगना ने इस किरदार को निभाने के लिए बहुत श्रम किया है। छोटे से वीडियो में कंगना ने इंदिरा गांधी के हाव-भाव और उनके बोलने के स्टाइल को पूरी तरह से किरदार में उतार दिया है। इस वीडियो को देखकर इस बात का अंदाज लग रहा है कि इस फिल्म में कंगना की एक और दमदार और यादगार भूमिका दर्शकों के सामने होगी। इस फिल्म को कंगना स्वयं निर्देशित भी कर रही हैं। इमरजेंसी भारतीय लोकतंत्र का वो काला अध्याय है जिसने समाज के हर अंग को प्रभावित किया था। उस दौर की अनेक कहानियां अब भी लोगों की स्मृतियों में शेष हैं। इमरजेंसी में जितना कुछ घटा या जिस प्रकार से इंदिरा गांधी के इस निर्णय और संजय गांधी के तानाशाही रवैये ने लोगों को परेशान किया उस अनुपात में फिल्में नहीं बनीं। रचनात्मक लेखन भी न के बराबर हुआ। लेख आदि अवश्य लिखे गए, पत्रकारों और राजनेताओं की पुस्तकें आईं लेकिन बहुत कम साहित्यकारों ने इमरजेंसी को विषय बनाकर उपन्यास या कहानी लिखी। 

हिंदी फिल्मों की अगर बात करें तो एक फिल्म याद आती है वो है किस्सा कुर्सी का। अमृत नाहटा की ये फिल्म इमरजेंसी के पहले बन गई थी और सेंसर बोर्ड के पास प्रमाणन के लिए गई थी। जबतक सेंसर बोर्ड से इसको प्रमाण पत्र मिलता तबतक देश में इमरजेंसी लागू कर दी गई थी।  इस फिल्म में संजय गांधी और इंदिरा गांधी के क्रियाकलापों पर कटाक्ष किया गया था। संजय गांधी की कार फैक्ट्री लगाने के मंसूबों पर व्यंग्य भी था। संजय गांधी को जब इसका पता लगा तो वो भड़क गए थे। उसके बाद तो जो हुआ वो इतिहास में दर्ज है। कई जगह इस बात का उल्लेख मिलता है कि सेंसर बोर्ड में जमा किए गए फिल्म के प्रिंट को उस वक्त के सूचना और प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल के आदेश पर जब्त कर लिया गया था। संजय गांधी इससे संतुष्ट नहीं हुए। वो चाहते थे कि फिल्म के सभी प्रिंट नष्ट कर दिए जाएं। उनकी इस इच्छा की पूर्ति के लिए दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने बांबे (अब मुंबई) के प्रभादेवी इलाके में एक फिल्म प्रोसेसिंग लैब पर छापा मारा। छापे में फिल्म के निगेटिव समेत सभी प्रिंट जब्त कर लिए गए और उसको लेकर पुलिसवाले दिल्ली आ गए। इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि पूरी सामग्री को मारुति कार फैक्ट्री के कैंपस में लाकर जला दिया गया था। इस फिल्म में मनोहर सिंह, शबाना आजमी और सुरेखा सीकरी मुख्य भूमिका में थे। बाद में वो फिल्म फिर से बनी और रिलीज हुई परंतु मूल फिल्म नष्ट कर दी गई। इस फिल्म को लेकर केस मुकदमा भी हुआ था।

ये तो इमरजेंसी के दौर की बात है लेकिन इमरजेंसी लगने के कुछ महीने पहले 1975 में एक फिल्म आई थी जिसका नाम था आंधी। फिल्म रिलीज हो गई। उसके बाद ये बात फैल गई कि ये फिल्म इंदिरा गांधी के जीवन पर है। फिर क्या था। इस फिल्म के निर्माताओं को घेरने की कोशिश होने लगी और आखिरकार इस फिल्म को बैन कर दिया गया। आई एस जौहर की एक फिल्म नसबंदी भी आई थी जिसमें इमरजेंसी के दौर में नसबंदी को लेकर की गई ज्यादतियों को दिखाया गया था। इस फिल्म को भी कई तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ा था। जबकि ये फिल्म इमरजेंसी के बाद बनी थी। 2017 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त निर्माता मधुर भंडारकर ने इंदु सरकार के नाम से फिल्म बनाई। इस फिल्म के खिलाफ पूरे देश में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन आदि किया। हैरत की बात ये कि उस वक्त सेंसर बोर्ड ने भी इस फिल्म की रिलीज की राह में रोड़े अटकाए थे। क्या ये माना जाए कि उपरोक्त फिल्मों का हश्र देखकर इमरजेंसी पर फिल्म बनाने का साहस कम फिल्म निर्माताओं ने किया या इसकी कोई और वजह रही है। दरअसल अगर हम समग्रता में देखें तो इसके अलावा भी कई वजहें नजर आती हैं। एक तो यही कि अधिकतर फिल्म निर्माता कारोबारी हैं और वो अपने व्यवसाय में किसी प्रकार का झंझट नहीं चाहते हैं। वो चाहते हैं कि फिल्म में निवेश करें और मुनाफा कमाएं। ये प्रवृत्ति फिल्मकारों को किसी प्रकार का जोखिम लेने से रोकती है। ये अनायास नहीं है कि गांधी पर इस देश में बहुत कम फिल्में बनीं। एक संपूर्ण फिल्म बनी भी स्वाधीनता के पैंतीस साल बाद। उसको भी एक विदेशी रिचर्ड एटनबरो ने बनाई। 

एक और महत्वपूर्ण बात जो इस संदर्भ में रेखांकित की जानी चाहिए वो ये कि हिंदी में राजनीतिक विषयों पर कहानियां कम लिखी गईं। उपन्यास और भी कम। स्वाधीनता के बाद भारत-पाकिस्तान के विभाजन पर जो कल्ट फिल्म मानी जाती है वो है गरम हवा। वो इस्मत चुगताई की कहानी पर आधारित है। विभाजन की त्रासदी पर हिंदी के लेखकों से अधिक पंजाबी के लेखकों ने लिखा क्योंकि वो भारत पाकिस्तान विभाजन से ज्यादा प्रभावित हुए थे। उसकी त्रासदी को नजदीक से देखा और महसूसा था। स्वाधीन भारत के इतिहास में कई ऐसी राजनीतिक घटनाएं हैं जिनपर बेहतरीन फिल्में बन सकती हैं। उनपर लिखा कम गया इस कारण फिल्मकारों का ध्यान भी उनपर कम गया। अगर हम स्वाधीनता के बाद के राजनीतिक घटनाक्रम पर बात करें तो भाषा को लेकर आंदोलन और प्रांतों का विभाजन। उसके बाद की हिंसा। कांग्रेस में विभाजन और इंदिरा गांधी का उदय। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में राजीव गांधी को अकल्पनीय बहुमत और पांच साल में ही जनता का मोहभंग। विश्वनाथ प्रताप सिंह का प्रधानमंत्री बनने का घटनाक्रम और संसदीय दल की बैठक के पहले की साजिशें और बैठक के दौरान का नाटकीय घटनाक्रम। कई राजनीतिक विषय हैं जिनपर फिल्में बन सकती हैं। निर्माता निर्देशक जोखिम उठाएं तो उनको सफलता भी मिल सकती है। विवेक अग्निहोत्री ने लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु और कश्मीर नरसंहार पर फिल्म बनाने का जोखिम उठाया। एक में उनको अपेक्षाकृत कम सफलता मिली लेकिन दूसरी फिल्म में जनता ने उनको इतना प्यार दिया जिसकी कल्पना भी उन्होंने नहीं की होगी। 

अब कंगना रनोट इमरजेंसी पर फिल्म बना रही हैं तो ये उम्मीद की जानी चाहिए कि जो बाधाएं उनके पूर्ववर्ती फिल्मकारों के सामने आई थीं वो उसका सामना कंगना को नहीं करना पड़ेगा। इमरजेंसी के दौरान धरपकड़, पाबंदियां और जुल्म तो हैं ही उस दौर में संजय गांधी और उनकी महिला मित्रों की भी कई कहानियां इधर उधर पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी हुई हैं। अगर कंगना की टीम ने उन कहानियों को फिल्म की कहानी में ठीक से पिरो दिया तो फिर फिल्म की सफलता में कोई संदेह नहीं रहेगा। संभव है कि इस सफलता से और भी फिल्मकार राजनीतिक फिल्म बनाने के लिए प्रेरित हों।  


Saturday, July 9, 2022

ओटीटी प्लेटफार्म्स की चुनौतियां


कोरोना काल में जब लाकडाउन की वजह से सिनेमा हाल बंद हुए और लोग घरों से बाहर नहीं निकल रहे थे, ऐसे में ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म्स काफी लोकप्रिय हुए थे। घर बैठे उनके सामने मनोरंजन का एक ऐसा विकल्प था जहां देश विदेश की असंख्य सामग्री उपलब्ध थी। सिर्फ महानगरों में ही नहीं बल्कि छोटे शहरों में भी इन ओटीटी प्लेटफार्म को डाउनलोड करके लोगों ने मनोरंजन के इस नए विकल्प को अपनाया था। कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान इन प्लेटफार्म्स पर बड़े सितारों की फिल्में भी रिलीज हुईंन थीं। उस समय दुनिया में ये आकलन किया गया था कि भारत ओटीटी प्लेटफार्म्स का या वीडियो आन डिमांड स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म्स का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ बाजार है। अनुमान ये भी लगाया गया था कि इस वर्ष के अंत तक देश में स्मार्ट फोन या इंटरनेट की सुविधा वाले मोबाइल फोन के उपभोक्ताओं की संख्या 80 करोड़ पहुंच जाएगी। इस संख्या को ध्यान में रखते हुए ओटीटी प्लेटफार्म्स ने भारतीय बाजार को लेकर अपनी रणनीति बनाई और यहां निवेश किया। वैश्विक स्तर पर भी कोरोना के दौर में इस माध्यम को दर्शकों ने अपनाया था। आपदा में मिले इस अवसर की वजह से इन प्लेटफार्म्स को चलानेवाली कंपनियों को दो साल में काफी मुनाफा हुआ। कोरोना का भय कम होने की वजह से अब इन कंपनियों के सामने अपनी उस सफलता को बनाए रखने की चुनौती है। चुनौती तो ग्राहकों की संख्या को बरकरार रखने की भी है। 

कनाडा की मार्केटिंग विशेषज्ञ रेबेका आल्टर ने अपने एक लेख में लोकप्रिय ओटीटी प्लेटफार्म नेटफ्लिक्स की वैश्विक चुनौतियों के बारे में लिखा है। रेबेका के मुताबिक इस वर्ष की पहली तिमाही में नेटफ्लिक्स ने दो लाख ग्राहक खो दिए और विशेषज्ञों का अनुमान है कि दूसरी तिमाही में करीब बीस लाख ग्राहक इस प्लेटफार्म को छोड़ सकते हैं। रेबेका इसके लिए यूक्रेन युद्ध की वजह से रूस में अपनी सेवाएं बंद करने के नेटफ्लिक्स के फैसले को तो जिम्मेदार मानती ही है, साथ ही ग्राहक शुल्क में बढ़ोतरी को भी एक कारण माना है। वैश्विक बाजार की बात छोड़ भी दें तो अपने देश में भी नेटफ्लिक्स की सेवाएं अन्य सभी ओटीटी प्लेटफार्म्स से महंगी हैं। नेटफ्लिक्स मोबाइल पर देखने की सुविधा देने के एवज में प्रतिमाह 149 रु लेता है जो कि एक वर्ष का 1788 रु बनता है। अन्य लोकप्रिय ओटीटी प्लेटफार्म वार्षिक शुल्क के तौर पर हजार रुपए तक लेती हैं। अमेजन प्राइम, डिजनी हाटस्टार और सोनी लिव आदि का वार्षिक शुल्क एक हजार रु से कम ही है। लेकिन इन सभी प्लेटफार्म के सामने सबसे बड़ी चुनौती है अपने ग्राहकों को जोड़े रखने की। कोरोना महामारी के दौरान जितने ग्राहक जुड़े थे उनको बनाए रखना इनके लिए बेहद कठिन होता जा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में 2020 के अप्रैल से लेकर जुलाई तक विभिन्न ओटीटी प्लेटफार्म्स से करीब तीन करोड़ नए ग्राहक जुड़े थे। जो अब लगातार कम होते जा रहे हैं। इन प्लेटफार्म्स को नजदीक से जाननेवाले और इनकी गतिविधियों पर नजर रखनेवालों का अनुमान है कि कोरोना काल में जितने ग्राहक इन प्लेटफार्म्स से जुड़े थे उनमें से करीब आधे ग्राहकों ने सब्सक्रिप्शन का नवीनीकरण नहीं करवाया। वैश्विक स्तर पर भी लगभग यही स्थिति है। सबसे बड़ा कारण कोरोना का भय खत्म होने लगा है और सिनेमा हाल खुल गए हैं। 

ओटीटी प्लेटफार्म्स से दर्शक क्यों जुड़े रहें, अगर इसका उत्तर ढूंढे तो सबसे पहले तो इन प्लेटफार्म्स पर उपलब्ध मनोरंजन सामग्री की गुणवत्ता की बात होगी। दूसरी वजह इनको देखने का शुल्क। इसके अलावा हमारे देश में इन प्लेटफार्म्स को विवादों के कारण भी काफी फायदा मिला था। ओटीटी प्लेटफार्म पर उपलब्ध कंटेंट को लेकर जब विवाद होता है और उसकी चर्चा होती है तो इन प्लेटफार्म्स को नए ग्राहक मिलते हैं। लोग उस सामग्री को देखना चाहते हैं। ग्राहकों की यही चाहत उनसे इन प्लेटफार्म्स को डाउनलोड करवाती है। अब अगर इन प्लेटफार्म्स पर उपलब्ध मनोरंजन सामग्री का आकलन करते हैं तो पाते हैं कि वहां बहुत अधिक दुहराव होने लगा है। पहले कुछ सामग्री चौंकाती थी और दर्शकों को अपने साथ रोकती थी। अब लगातार एक ही तरह की सामग्री उपलब्ध होने लगी तो दर्शकों के लिए वो सामान्य बात हो गई। नेटफ्लकिस पर पहले ‘लस्ट स्टोरीज’ और ‘सेक्रेड गेम्स’ जैसी सीरीज आई जिसमें नग्नता और भयंकर हिंसा थी। इन प्लेटफार्म्स पर किसी प्रकार की प्रमाणन की आवश्यकता नहीं है इस वजह वो सेंसर बोर्ड की कैंची से मुक्त होकर खुले आम नग्नता और यौनिकता परोस रहे थे। हिंसा के नाम पर शरीर के अंगों को इस तरह से काटकर दिखा रहे थे कि कुछ दर्शकों को झटका लगता था। भाषा के स्तर भी सारी मर्यादा तोड़कर भरपूर गाली गलौच भरे संवाद भी दर्शकों को चौंका रहे थे। इन सबसे होनेवाली चर्चा से ग्राहक बढ़ रहे थे। धीरे धीर इनकी नवीनता खत्म हो गई।  

इसके अलावा भारतीय संस्कृति को लेकर विवादास्पद टिप्पणियां या दृश्य दिखाने पर भी जमकर विवाद हुए। लैला जैसी सीरीज भी आई जिसने हिंदू मानस को झकझोरा था। नेटफ्लिक्स पर ही एक सीरीज आई थी ‘द सूटेबल बाय’। इसमें मंदिर प्रांगण में चुंबन दृश्य पर जमकर बवाल हुआ था। केस मुकदमे भी हुए। प्लटफैर्म को अपेक्षित प्रचार मिला और परिणामस्वरूप उसके ग्राहक भी बढ़े। इसी तरह से अगर देखें तो सभी ओटीटी प्लेटफार्म ने अलग अलग तरीके से दर्शकों की जेब से पैसे निकलवाने का उपक्रम किया। जो ओटीटी प्लेटफार्म मुफ्त में कंटेंट दिखा रहा था उसने वेब सीरीज के बीच में विज्ञापन दिखाना आरंभ कर दिया। इतनी बार विज्ञापन आता है कि दर्शक परेशान हो जाते हैं। तभी स्क्रीन पर एक फ्लैश आता है कि अगर आप बगैर विज्ञापन या बिना अवरोध के वेब सीरीज देखना चाहते हैं तो अमुक राशि देकर वार्षिक ग्राहक बनें। इसके अलावा कई प्लेटफार्म्स ने तय ग्राहक शुल्क पर एक ही डिवाइस पर देखने की सुविधा दी। मोबाइल की अलग दर और मोबाइल और टीवी पर देखने के लिए अलग दर। इन सब झंझटों से भी ग्राहक इनसे दूर हुए। एक और बात जिसको रेखांकित करना आवश्यक है वो ये कि इन प्लेटफार्म्स ने हिंदी फिल्मों के बड़े सितारों को भारी भरकम रकम देकर उके साथ कंटेंट के लिए समझौता किया। सामग्री अर्जित करने के लिए निवेश किया गया लेकिन उसको अपेक्षित दर्शक नहीं मिले। डिजनी हाटस्टार पर अजय देवगन की एक वेब सीरीज आई जिसका नाम था रुद्रा, द एज आप डार्कनेस। अजय देवगन की वजह से प्लेटफार्म ने इसपर भारी भरकम रकम खर्च की लेकिन ये सीरीज अपेक्षित सफलता अर्जित नहीं कर सकी। जानकारों का मानना है कि इससे भारी नुकसान हुआ। इसी तरह कुछ फिल्में भी खरीदी गईं जिनको सफलता नहीं मिली। 

इन ओटीटी प्लेटफार्म्स के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती है वो है लगातार कटेंट में इस तरह का बदलाव जिससे दर्शकों को अपनी ओर खींचने और फिर उनको रोके रखने में सफलता मिल सके। विवाद की गुंजाइश अब लगभग खत्म सी हो गई है क्योंकि सभी निर्माता अब इसकी परिणति से बचना चाहते हैं। वो सतर्क होकर सीरीज बनाने लगे हैं। तीसरे अगर भारतीय बाजार में उनको बने रहना है और लंबे समय तक मुनाफे का कारोबार करना है तो ये आवश्यक है कि वो अपने शुल्क निर्धारण पर काम करें। भारत में इंटरनेट की लोकप्रियता की एक वजह उसका सस्ता होना भी है। अगर ये सस्ते पैकेज पर अपना कंटेंट उपलब्ध करवाने के बारे में सोच सकते हैं तो इनकी ग्राहक संख्या बढ़ सकती है। कस्बों और गांवों तक पहुंचना है तो उनको अपना ग्राहक शुल्क कम रखना ही होगा। आधार बढ़ाकर भी मुनाफा बढ़ाया जा सकता है।  


Saturday, July 2, 2022

लड़खड़ाती हिंदी आलोचना


समकालीन हिंदी साहित्य में होनेवाले विमर्शों में अधिकतर लेखक आलोचना को लेकर उदासीन दिखाई पड़ते हैं। कुछ युवा और कई अधेड़ होते लेखक तो आलोचना के अंत की घोषणा करते नजर आते हैं। फेसबुकजीवी लेखक तो आलोचना की आवश्यकता को ही नकार रहे हैं। उनके मुताबिक साहित्य को न तो आलोचक की आवश्यकता है और न ही आलोचना की। हिंदी आलोचना पर कई तरह के आरोप लगते हैं। कुछ कहते हैं कि आलोचना रचना केंद्रित नहीं रही और वो लेखक केंद्रित हो गई है। आलोचकों के अलग अलग खेमे हैं और वो अपने खेमे के लेखकों की औसत रचनाओं को भी कालजयी साबित करने में जुटे रहते हैं। इसकी वजह से आलोचना की साख छीजती है। इसमें दो राय नहीं कि आलोचक की व्यक्तिगत रुचि और संबंधों के निर्वाह की वजह से आलोचना विधा को नुकसान पहुंचा है। इसके अलावा एक महत्वपूर्ण तथ्य को भी रेखांकित किया जाना चाहिए। इस वक्त जो आलोचक सक्रिय हैं उनकी तैयारी भी उतनी नहीं है कि वो किसी रचना को व्याख्यायित करके पाठकों के सामने उसके अर्थ खोल सकें। आलोचना पर लगनेवाले तमाम आरोप सही हो सकते हैं लेकिन जो लोग आलोचना की आवश्यकता पर प्रश्न उठाते हैं उनको समझना चाहिए कि आलोचना के बिना रचना और रचनाकार की प्रतिष्ठा स्थापित नहीं हो सकती है। 

स्वाधीनता के बाद से देखें तो हिंदी साहित्य की अलग अलग विधा में अलग अलग तरह की प्रवृत्तियां दिखाई पड़ती हैं। उदाहरण के लिए कहानी में नई कहानी, अकहानी, आंचलिक कहानी, सचेतन कहानी, समांतर कहानी आदि का दौर दिखाई देता है। कविता में भी नई कविता,अकविता, प्रयोगवादी कविता, प्रगतिवादी कविता की चर्चा होती है। कविता और कहानी की इन प्रवृत्तियों को स्थापित करने में आलोचकों की बड़ी भूमिका रही है। समकालीन हिंदी साहित्यिक परिदृश्य में कोई विशेष प्रवृति नजर नहीं आती है, क्यों? क्योंकि समकालीन दौर के आलोचक इस विधा को गतिशील बनाए रखने में चूक गए। आलोचना के कई दशक पुराने औजारों के आधार पर ही रचना को परखने की ऐतिहासिक भूल हुई। हिंदी आलोचना पर तमाम तरह के आरोप लगते हैं, लेकिन आलोचना की दयनीय स्थिति क्यों हुई इसके पीछे के कारणों को जानने की गंभीर कोशिश नहीं होती। ये कोशिश इसलिए नहीं होती है कि अगर इन कारणों तक पहुंचेगें तो हिंदी आलोचना के पुराने गढ़ और मठ ध्वस्त होने लगेंगे। पाश्चात्य आलोचना के सिद्धांतों की नकल करते हुए पूर्व में जो विद्वतापूर्ण व्याख्याएं की गईं है वो सारी मान्यताएं संदेह के घेरे में आ जाएंगी। संस्कृत काव्यशास्त्र में रचना को समझने की जो प्रविधि है वो बेहद वैज्ञानिक है। इसमें जिस शब्द शक्ति की बात है वो पाश्चात्य आलोचना में कहां दिखाई देती है। हमारे देश का रस सिद्धांत या ध्वनि सिद्धांत कितनी बारीकी से कविता को विन्यस्त करता है इसकी कल्पना भी आई ए रिचर्ड्स को नहीं थी। जिस विदेशी लेखक को रस सिद्धांत या धव्नि सिद्धांत के बारे में जानकारी नहीं थी उससे सीखकर भारतीय आलोचक हिंदी कविता की व्याख्या कर रहे थे। ठीक से याद नहीं आ रहा है लेकिन कहीं पढ़ा था कि संस्कृत के अलंकारशास्त्र और उपमा के बारे में पश्चिमी आलोचकों की अज्ञानता उनको हास्यास्पद बना देती है। 

पश्चिम के आलोचकों के अलावा हिंदी आलोचना में मार्क्सवादी सिद्धातों के आधार पर रचना की आलोचना की गई। इस विचारधारा के लेखकों ने मार्क्सवादी सिद्धांतों की जड़ता को अपनी ताकत बनाने की कोशिश की। परिणाम ये हुआ कि मार्क्सवादी आलोचना जड़ होती चली गई और उनका विकास अवरुद्ध होता गया। रामचंद्र शुक्ल के बाद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा ने रचना से मुठभेड़ करते हुए आलोचना के अपने प्रतिमान बनाए। कुछ हद तक नामवर सिंह ने भी। नामवर के बाद जो भी ख्यात आलोचक हुए वो रचना से टकराने में हिचकते नजर आते हैं। मार्क्सवादी विचारधारा के प्रभाव में वो रचना को लेकर समाज की ओर जाते तो हैं लेकिन समग्रता से मूल्यांकन नहीं कर पाते हैं। इसका एक और दुपरिणाम ये हुआ कि रचना को खोलने के जो औजार रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा के यहां दिखाई देते हैं वो बाद के आलोचकों के यहां नहीं दिखते हैं। इन औजारों की अनुपस्थिति के कारण हिंदी आलोचना की धार कुंद होती चली गई और इस विधा में एक वैचारिक सन्नाटा पसरता चला गया। अशोक वाजपेयी कभी कभार आलोचना में तलवारबाजी करते हैं लेकिन वो भी इस विधा को गतिशील नहीं बना पाते हैं। उनकी अपनी सीमाएं हैं जिसको वो पार नहीं कर पाते हैं। बाद के आलोचकों ने भी रचना के पाठ में समय के साथ हो रहे बदलाव को पकड़ने की कोशिश नहीं की और वो आलोचना के नए प्रतिमान गढ नहीं पाए।  

पिछले दिनों सुधीश पचौरी की एक पुस्तक आई है ‘नयी साहित्यिक सांस्कृतिक सिद्धान्तकियां’। इस पुस्तक में सुधीश पचौरी ने आलोचना के नए प्रतिमान स्थापित करने की कोशिश की है। उन्होंने रचना से टकराने और फिर उसके आधार पर उसको व्याख्यित करने का आग्रह किया है। सुधीश पचौरी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि रचना सिर्फ रचना नहीं होती वह एक जटिल और पेचीदा नेटवर्क का हिस्सा होती है। इसको वो अलग तरीके से सामने रखते हैं। इस संदर्भ में वो जायसी की पद्मावत और तुलसीदास के रामचरित मानस का उदाहरण देकर नया प्रतिमान गढ़ने का प्रयास करते हैं। वो बताते हैं कि रामचंद्र शुक्ल ने करीब नब्बे वर्ष पहले जायसी के पद्मावत की भूमिका लिखी थी और उसे प्रेमगाथाओं की काव्य परंपरा में ऊंचा स्थान दिया था। इसमें उन्होंने लौकिक प्रेम की अलौकिकता के बारे में बताया था। शुक्ल जी का ये पाठ ही पद्मावत का अंतिम पाठ बन गया। उनकी स्थापना है कि जैसे ही संजय लीला भंसाली ने 2017 में फिल्म पद्मावत बनानी आरंभ की तो इसका नया पाठ सामने आने लगा। जैसे जैसे फिल्म को लेकर विवाद बढ़ा तो पद्मावत के तीन पाठ सामने आए। सुधीश पचौरी मानते हैं कि पद्मावत का पहला पाठ फिल्मी पाठ था जिसे निर्माता निर्देशक बना रहा था जो दो सौ करोड़ रुपए की आर्थिकी से जुड़ा था। दूसरा पाठ कर्णी सेना का क्षत्रियवादी (जातिवादी) पाठ था जिसमें इस्लाम विरोधी पाठ भी सक्रिय था। तीसरा पाठ राजनीतिक रहा जिसको संसद की बहसों और चुनाव के दौरान देखा गया। उनके मुताबिक इसके बाद पद्मावत का अकादमिक पाठ भी बदला। इसी तरह से जब तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना की थी तो उस समय का उसका पाठ अलग था और अब बिल्कुल अलग है। अब उसको पावर टेक्सट कहा जा सकता है। 

अपनी इस पुस्तक में सुधीश पचौरी ने हिंदी आलोचना की सीमाओं पर ठीक से विचार किया है। वो मानते हैं कि आरंभ में हिंदी आलोचना खुद को संस्कृत से जोड़कर देखती थी। धीरे-धीरे वो इससे दूर होती चली गई। बाद में अंग्रेजी साहित्य शास्त्र ने उसकी जगह ले ली। वो बेहद तल्ख अंदाज में कहते हैं कि संस्कृत का काव्यशास्त्र जो हिंदी को उत्तराधिकार में मिला था उसकी कुंजियां बना ली गईं लेकिन उसमें गहरे नहीं उतरा गया। इसलिए उसका नया संस्कार नहीं हो सका। सुधीश पचौरी ने अपनी इस पुस्तक में भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा से रस, छंद, अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि आदि पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उन्होंने ध्वनि सिद्धांत के पुनर्पाठ की बात भी की है और इसकी पश्चिम के सिद्धांत और सिद्धांतकारों की स्थापनाओं से तुलना करके इसकी श्रेष्ठता साबित की है। हिंदी आलोचना को अगर कठघरे में खड़ा करना है तो इस तरह से करना होगा जैसे सुधीश पचौरी ने किया है। अगर हमें हिंदी आलोचना की दुर्दशा की बात करनी है तो उसकी भूल गलतियों को लेकर गंभीरता से विमर्श करना होगा।न इसका महत्वपूर्ण लाभ ये होगा कि जो ऐतिहासिक भूलें हुई हैं उसका परिमार्जन हो सकेगा।

Saturday, June 25, 2022

अमृत काल में सकारात्मक पहल


देश में इस वक्त राष्ट्रपति चुनाव की हलचल है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की तरफ से द्रौपदी मुर्मू को उम्मीदवार बनाया गया है जबकि विपक्ष की ओर से पूर्व बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं। नरेन्द्र मोदी के बारे में कहा जाता है कि वो हमेशा अपने निणयों से चौंकाते हैं। इस बार भी उन्होंने ओडीशा की आदिवासी महिला नेता द्रोपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर चौंकाया। नरेन्द्र मोदी के इन चौंकानेवाले निर्णयों के पीछे एक सुविचारित और सुचिंतित सोच होता है। जब द्रोपदी मुर्मू के नाम की घोषणा हुई तो उसको लेकर विपक्षी खेमे से सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं आई। हर चीज में, हर निर्णय में नकारात्मकता खोजनेवाले लिबरल झंडाबरदारों ने भी द्रोपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने के निर्णय को भी उसी ढंग से लिया।  कुछ लोगों ने इस आधार पर इस निर्णय की आलोचना आरंभ कर दी कि राष्ट्रपति बनाकर किसी समुदाय का क्या भला हो सकता है। क्या ए पी जे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनाने से मुसलमानों का भला हो गया। ऐसे बालक बुद्धि लोगों को राजनीतिक टिप्पणियों से बचना चाहिए। राजनीति में हमेशा से प्रतीकों का महत्व रहा है। प्रतीकों की राजनीति का असर भी समाज पर होता है। आज दलितों में अपने सम्मान का भाव गाढ़ा हुआ है। इसके पीछे के कारणों की पड़ताल करेंगे तो उसमें एक कारण प्रतीकों की राजनीति भी नजर आती है। इस तरह के प्रतीकों से किसी समुदाय के लोगों के मन में सम्मान का भाव तो जगता ही है वो समाज के अन्य समुदा के लोगो के साथ जुड़ते भी हैं। उनके अंदर ये भावना बी उत्पन्न होती है कि देश उनके समुदा का सम्मान करता है और उनके बीच का कोई किसी भी सर्वोच्च पद पर पहुंच सकते हैं। ये भावना और ये सोच परोक्ष रूप से देश को मजबूत करता है। किसी भी देश की जनता का जब उस देश की व्यवस्था में भरोसा गाढ़ा होता है तो वो राष्ट्रहित में होता है। 

बालक बुद्धि लिबरल्स को ये समझना चाहिए कि जब द्रोपदी मुर्मू राष्ट्रपति बन जाएंगी तो देश के आदिवासी समुदाय के लोगों पर उसका कितना सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। आदिवासी समुदाय के लोग जब ये देखेंगे कि देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर उनके बीच की एक महिला विराजमान है तो उनके अंदर जो गर्व का भाव पैदा होगा वो हमारे राष्ट्र के समावेशी आधार को मजबूती प्रदान करेगा। एक आदिवासी महिला का नाम देश के सबसे उच्च संवैधानिक पद के लिए प्रस्तावित करने के लिए स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष से अधिक उपयुक्त कोई समय हो नहीं सकता। राजनीति में हर कदम के प्रतीकात्मक महत्व के साथ साथ जमीनी प्रभाव भी होता है। द्रोपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने कई स्तर पर जनआकांक्षा का ध्यान रखा। अगर हम ऐतिहासिक दृष्टि से विचार करें तो इस वक्त ओडीशा का जो क्षेत्र है वो लंबे कालखंड से अपनी उपेक्षा को लेकर कभी मुखर तो कभी मौन विरोध करता रहा है। प्रचीन भारत के इतिहास पर नजर डालें तो सम्राट अशोक के शासनकाल में कलिंग में भयानक युद्ध लड़ा गया था। इस युद्ध की भयावहता के बारे में बहुत अधिक लिखा जा चुका है। उस युद्ध के बाद उस क्षेत्र पर या उस क्षेत्र के लोगों पर बहुत अधिक ध्यान दिया हो ऐसा उल्लेख इतिहास की पुस्तकों में नहीं मिलता है। कलिंग युद्ध के बाद एक लंबा कालखंड बीतता है। उसके बाद जब मुगलों ने उस क्षेत्र पर कब्जा किया तो उन्होंने वहां लूटपाट की, वहां के नागरिकों पर अत्याचर किए लेकिन उस क्षेत्र को मुख्य धारा में लाने कि कोशिश नहीं दिखती। मुगलों के बाद जब अंग्रेजों ने वहां अपना राज कायम किया तो उन्होंने भी वहां के प्राकृतिक संसाधनों को तो लूटा, मानव संसाधन का दोहन किया लेकिन उस क्षेत्र पर बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया। उस क्षेत्र में अपनी उपेक्षा को लेकर रोष भी रहा है। 

ओडिया लेखक बिजय चंद्र रथ की एक पुस्तक है ‘जयी राजगुरु, खोर्धा विद्रोह के अप्रतिम क्रांतिकारी’ जिसका हिंदी में अनुवाद सुजाता शिवेन ने किया है। इस पुस्तक में ओडिशा के कम ज्ञात स्वाधीनता संग्राम सेनानी राजगुरु जयकृष्ण महापात्र की कहानी है। अंग्रेजों ने कटक पर आक्रमण करके उसको अपने अधिकार में ले लिया था। ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिक या उसके मुखिया पहले स्थानीय राजाओं के साथ समझौता करते थे और फिर खुद को मजबूत करने के बाद समझौते से मुकर जाया करते थे। इस तरह का बर्ताव  ईस्ट इंडिया कंपनी ने खोर्धा के राजा के साथ किया। कंपनी सरकार ने राजा के साथ किए गए करार को मानने से इंकार कर दिया। परिणाम ये हुआ कि वहां विद्रोह की आग सुलगने लगी। 1804 में जब वहां की जनता ने कंपनी सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया । राजगुरु जयकृष्ण महापात्र ने इस विरोध का नेतृत्व किया लेकिन अंग्रेजों ने उनको बंदी बना लिया और फिर उनकी जान ले ली। पुस्तक में जनश्रुतियों के हवाले से ये बताया गया है कि कंपनी सरकार के सैनिकों ने राजगुरु को पेड़ की दो टहनियों से बांध दिया। इसके बाद उन टहनियों को विपरीत दिशा में गिरा दिया। राजगुरु का शरीर दो हिस्सों में फट गया और उनकी मृत्यु हो गई। इस नृशंसता का कोई दस्तावेजी साक्ष्य मौजूद नहीं है लेकिन वहां के लोक में मौखिक रूप से राजगुरु की ये कहानी अब भी जीवंत है। इतिहासकारों ने इस वीर की भी उपेक्षा की। क्रांतिकारी योद्धा जयकृष्ण महापात्र, जिनको उस क्षेत्र के लोग जयी राजगुरु के नाम से जानते हैं, के संघर्ष और उनके बलिदान के बारे में कम ही लोगों को पता है। उस क्षेत्र के नायकों की उपेक्षा का ये उदाहरण है। उस क्षेत्र के कई नायक इस तरह की उपेक्षा के शिकार बने। 

ये सिर्फ ओडीशा क्षेत्र की बात नहीं है बल्कि अगर पूरे देश के आदिवासियों पर नजर डालें तो अनेक ऐसे क्रांतिकारी या क्रांतिवीर हैं जिनकी इतिहास लेखन में घोर उपेक्षा की गई है। भगवान बिरसा मुंडा के बारे में तो सब जानते हैं लेकिन तिलका मांझी से लेकर सिदो मुर्मू और कान्हो मुर्मू के बारे में पूरे देश को बताया जाना चाहिए था। जून 1855 में संताल हूल विद्रोह के बारे में भी अब जाकर थोड़ी बहुत जानकारी उपलब्ध होने लगी है अन्यथा भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इस अध्याय के बारे में स्वाधीन भारत के इतिहासकारों ने न्याय नहीं किया। अब भी इस विद्रोह के बारे में, उसके नायकों के बारे में, उनकी वीरता के बारे में विस्तार से राष्ट्र को बताने की आवश्यकता है। इतनी उपेक्षाओं के बीच अगर आदिवासी समाज की किसी महिला को देश के राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया गया है तो विपक्षी दलों समेत तमाम बौद्धिकों को इसका स्वागत करना चाहिए था। 2014 में जब नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने थे तो उन्होंने सबका साथ और सबका विकास की बात की थी। बाद में उन्होंने इसको और व्यापक बनाकर इसमें प्रयास और विश्वास भी जोड़ा। सबका साथ और सबका विकास को वामपंथ से जुड़े बौद्धिकों ने मुसलमानों से जोड़कर देखने और व्याख्यायित करने की कोशिश की। इसको नारे और जुमला आदि कहकर उपहास भी किया। जबकि अगर पिछले आठ साल में नरेन्द्र मोदी सरकार के निर्णयों को देखा जाए तो ये नारा नहीं बल्कि भारतीय समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर आगे बढ़ने का उपक्रम नजर आता है। भारतीय संविधान भी तो यही कहता है कि बिना किसी भेदभाव के सभी वर्गों को समान अवसर मिलना चाहिए। द्रोपदी मुर्मू को देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बिठाकर कृतज्ञ राष्ट्र उन आदिवासी नायकों को श्रद्धांजलि तो देगा ही उनको सपनों को भी साकार होते देखेगा।

सिनेमा पर आपातकाल का कहर

सिनेमा एक ऐसा माध्यम है जिसका भारतीय समाज पर जबरदस्त प्रभाव पड़ता है। सिने अभिनेता और अभिनेत्रियों की लोकप्रियता का कई बार राजनीति में उपयोग किया जाता है। कभी चुनाव जीतने के लिए तो कभी भीड़ जुटाने के लिए। दब देश में इमरजेंसी लगी थी और संजय गांधी खुद को इंदिरा गांधी के राजनीतिक वारिस के तौर पर स्थापित करने में लगे थे तब उन्होंने भी फिल्मी क
लाकारों की लोकप्रियता का सहारा लेने की कोशिश की थी। जब इंदिरा गांधी ने देश पर इमरजेंसी थोपी उस वक्त कांग्रेस पार्टी में इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा का नारा हकीकत हो चुका था। कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेता घुटने टेक चुके थे। संजय गांधी का बोलबाला था। इमरजेंसी में हुई ज्यादतियों का सारा ठीकरा इंदिरा गांधी के सर फोड़ा जाता है और संजय गांधी की कारगुजारियों पर कम चर्चा होती है। इमरजेंसी के दौरान फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कलाकारों पर जो पाबंदियां लगाई गईं उसके लिए संजय गांधी और उस दौर के उनके चमचे जिम्मेदार थे। इमरजेंसी के दौर में किशोर कुमार के गानों पर प्रतिबंध की खूब चर्चा होती है लेकिन देवानंद की फिल्मों और उनकी फिल्मों के गानों पर लगे प्रतिबंध के बारे में कम ही लोगों का पता है। देवानंद पर प्रतिबंध की वजह भी लगभग वही है जिसकी वजह से किशोर कुमार के गानों को प्रतिबंधित किया गया। 

देश में जब इमरजेंसी लगी थी तो हिंदी फिल्मों के ज्यादातर नायक और नायिकाएं उसके पक्ष में थे। बाद में उनमें से कइयों को कांग्रेस सरकार ने राज्यसभा में नामित करके पुरस्कृत भी किया। इनमें से एक अभिनेत्री तो वो भी हैं जो इन दिनों अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर और फासीवाद की आहट पर लगातार टिप्पणी करती हैं। ये अभिनेत्री इमरजेंसी के दौर में कांग्रेस के एक कार्यक्रम में नृत्य करने आई थीं और स्टेज पर परफार्म भी किया था। संजय गांधी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए काम भी किया था। दिलीप कुमार और नरगिस तो घोषित तौर पर कांग्रेस और संजय गांधी के पक्ष में थे और हिंदी फिल्मों के अन्य कलाकारों को उनके पक्ष में मोबलाइज भी कर रहे थे। देवानंद ने अपनी  आत्मकथा रोमांसिंग विद लाइफ में संजय गांधी के समर्थकों के बारे में लिखा है। उन्होंने लिखा है कि इमरजेंसी के दौर में युवा कांग्रेस की एक बेहद खूबसूरत और आकर्षक महिला बांबे (अब मुंबई) आई थी और उसने बालीवुड में संजय के पक्ष में समर्थन जुटाने का अभियान चलाया था। वो चाहती थी कि हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय अभिनेता और अभिनेत्री संजय गांधी की अगुवाई में दिल्ली में होनेवाली रैली में शामिल हों। देवानंद को भी उसने तैयार कर लिया। देवानंद जब दिल्ली की रैली में पहुंचे तो दिलीप कुमार वहां पहले से मंच पर मौजूद थे। देवानंद के मुताबिक उस रैली में संजय गांधी को नेता के तौर पर स्थापित करनेवाले भाषण हो रहे थे और नारे लग रहे थे। रैली खत्म होने के बाद देवानंद को कहा गया कि उनको दूरदर्शन के स्टूडियो जाकर युवा कांग्रेस और उसके नेता की प्रभावी नेतृत्व क्षमता के बारे में अपनी बात रिकार्ड करवानी है। देवानंद ने लिखा है कि ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उस वक्त की प्रोपगंडा मंशीनरी एकदम से फासीवादी तरीके से हर अवसर और हर व्यक्ति का उपयोग संजय गांधी की छवि चमकाने में लगी हुई थी। देवानंद को प्रोपगंडा मशीनरी का ये प्रस्ताव नहीं भाया और उन्होंने न सिर्फ दूरदर्शन जाने से मना कर दिया बल्कि इसका विरोध भी किया। उस दौर में कई अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने इमरजेंसी और संजय गांधी के पक्ष में बयान दिया था जो दूरदर्शन पर प्रसारित भी हुआ था। अगर दूरदर्शन के आर्काइव में वो सामग्री हो तो उसको निकालकर देश की जनता को बताना चाहिए कि कौन कौन से फिल्मी कलाकार इमरजेंसी के पक्ष में थे। खैर.. ये अवांतर प्रसंग है। 

देवानंद के मना करने की उस वक्त की सरकार में बेहद तीखी प्रतिक्रिया हुई। दूरदर्शन पर उनकी फिल्मों को तो बैन किया ही गया किसी भी सरकारी माध्यम में देवानंद का नाम नहीं आए ऐसी व्यवस्था बना दी गई। ये जानकर देवानंद को बहुत बुरा लगा था और उन्होंने उस वक्त के सूचना और प्रसारण मंत्री से इसकी शिकायत भी की थी लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। जब वो बांबे लौटे तो एक पार्टी मं उनको इस बात का एहसास हुआ कि उनके मना करने का कांग्रेस नेतृत्व ने कितना बुरा माना है। एक पार्टी में उनको अभिनेत्री नरगिस मिलीं और उनका हाथ पकड़कर एक कोने में ले गईं। वहां उन्होंने देवानंद से कहा कि आपने संजय गांधी के पक्ष में बोलने से मना कर अच्छा नहीं किया। उन्होंने देवानंद को दूरदर्शन पर जाने की सलाह भी दी। जब देवानंद ने उनको भी मना किया तो वो झल्ला गईं और बोली कि आप बेवजह हठ कर रहे हैं। आपको ये हठ छोड़ देना चाहिए। देवानंद नहीं माने और उन्होंने लिखा है कि उसके बाद वो संजय गांधी के चमचों और दरबारियों के निशाने पर आ गए थे। देवानंद की फिल्म देस परदेश रिलीज होनेवाली थी और उनको डर सता रहा था कि संजय गांधी के दरबारी उनकी फिल्म को नुकसान न पहुंचा दें। डर जायज भी था क्योंकि इमरजेंसी के दौर में जो भी संजय गांधी के विरोध में गया था उसको काफी परेशानियां झेलनी पड़ी थीं। फिल्मकारों को भी और कलाकारों को भी।   

Saturday, June 18, 2022

फिल्मों की सफलता की नई राह


कोरोना महामारी के दौर में सिनेमाघरों के बंद होने का फिल्म उद्योग पर बहुत बुरा असर पड़ा था। फिल्म प्रदर्शन का व्यवसाय बंद होने के कारण भारतीय फिल्म उद्योग पर भी संकट मंडराने लगा था। कई फिल्में पूरी हो गई थीं लेकिन उनका प्रदर्शन लगातार टलता रहा था। बड़े प्रोड्यूसर तो किसी तरह से फिल्मों की रिलीज के टलनेवाले नुकसान को झेल गए लेकिन छोटे प्रोड्यूसरों पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ा। कई फिल्में आधे में बंद हो गईं तो कई फ्लोर पर ही नहीं जा सकीं। कोरोना महामारी का प्रकोप कम होने के बाद कई तरह की पाबंदियों के साथ जब सिनेमाघर खुले तो भी अपेक्षित कारोबार नहीं हो पा रहा था। इन परिस्थितियों को देखते हुए फिल्मों पर लिखनेवाले कुछ लेखकों ने फिल्म व्यवसाय के बदलते स्वरूप को रेखांकित करना आरंभ कर दिया। सिनेमाघर के कारोबार पर भई प्रश्नचिन्ह लगाना आरंभ कर दिया। उन्होंने महामारी के कारण सिनेमाघरों में दर्शकों की कम उपस्थिति को दर्शकों की बदलती रुचि मान लिया। सिनेमाघरों के बजाए वो एप आधारित प्लेटफार्म को फिल्मों के प्रदर्शन के नए प्लेटफार्म के तौर पर स्थापित करने में जुट गए। सिनेमाहाल में जानेवाले परंपरागत दर्शकों को लेकर जल्दबाजी में टिप्पणी करने लगे। इस तरह के आकलन और निष्कर्ष पर पहुंचने के पहले उन्होंने कोरोना और उसके फैलाव की आशंका पर विचार किया हो, ऐसा नहीं लगता। बंद और वातानुकूलित वातावरण में कोरोना के फैलने की आशंका जताई गई थी। ये बात कहीं न कहीं परंपरागत सिने दर्शकों के अवचेतन मन में थी। इस वजह से सिनेमाघरों में दर्शकों की अपेक्षित उपस्थिति नहीं हो रही थी पर सिनेमा के प्रति प्रेम कम नहीं हो रहा था। जैसे जैसे कोरोना के मरीजों की संख्या कम हुई, अधिकांश लोगों को वैक्सीन की डोज लगी, निश्चिंतता बढ़ने लगी। और बढ़ने लगी सिनेमाघरों में दर्शकों की संख्या भी। फिल्मों के व्यवसाय के विभिन्न आयामों का आकलन करनेवाली संस्था ओरमैक्स मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक इस वर्ष जनवरी से लेकर अप्रैल तक रिलीज फिल्मों ने चार हजार करोड़ रुपए से अधिक का बिजनेस किया। इसका अर्थ ये हुआ कि इस वर्ष हर महीने फिल्मों ने एक हजार करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार किया। फिल्म इंडस्ट्री के लिए ये बेहद सुखद आंकड़ा है। लेकिन इस कारोबार में एक संदेश भी है, उसपर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लोगों को विचार करना चाहिए।

इस वर्ष जिन फिल्मों को दर्शकों का प्यार मिला उसमें दक्षिण भारतीय फिल्मों के हिंदी संस्करण का योगदान अधिक है। ओरमैक्स मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार फिल्मों के बिजनेस में मूल रूप से हिंदी में बनी फिल्मों की हिस्सेदारी अड़तीस प्रतिशत है जबकि साउथ की हिंदी में डब की गई फिल्मों की हिस्सेदारी साठ प्रतिशत है। अब जरा दक्षिण भारत की उन फिल्मों पर विचार करते हैं जिनको दर्शकों का अपार स्नेह मिला और जिसने पांच सौ करोड़ रुपए से अधिक का व्यवसाय किया। ओरमैक्स मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक फिल्म केजीएफ चैप्टर 2 ने 1008 करोड़ का कारोबार किया वहीं आरआरआर ने 875 करोड़ रु और द कश्मीर फाइल्स ने 293 करोड़ रु का बिजनेस किया। द कश्मीर फाइल्स की असाधारण सफलता के पीछे असधारण वजहें हैं। इसकी सफलता पर इस स्तंभ में पहले भी विचार किया जा चुका है। अब अगर हम केजीएफ चैप्टर 2 और आरआरआर की बात करें तो इसमें ज्ञान, भाषण और सैद्धांतिकी की प्रत्यक्ष बातें नहीं हैं। लेकिन फिल्मकार ने परोक्ष रूप से बहुत बड़ा संदेश दिया है। दर्शकों ने फिल्मकार के उस संदेश को पकड़ा भी और उसको पसंद भी किया। आरआरआर की कहानी राम, भीम और सीता के इर्द गिर्द घूमती है। राम-सीता और भीम हमारे दो महान पौराणिक ग्रंथ- रामायण और महाभारत के पात्र हैं। इस फिल्म की कहानी इस तरह से लिखी गई है कि राम और भीम एक दूसरे की मदद करते हैं। सीता-राम और भीम की ये कहानी कहीं न कहीं रामराज्य में भीम की महत्ता को स्थापित करने का परोक्ष संदेश देती है। दर्शकों को ये अच्छा लगता है। इसके अलावा फिल्म की भव्यता भी दर्शकों को बांधती है। इसी तरह से फिल्म केजीएफ चैप्टर 2 में का नायक अपने संवाद में राजनीति में वंशवाद की विषबेल पर टिप्पणी करता है। फिल्म में नायक जब वंशवाद पर टिप्पणी करता है तो सिनेमाहाल में तालियां गूंजती हैं। इसका अर्थ ये है कि दर्शक फिल्मकार की सोच से खुद को एकाकार करता है। इन दो फिल्मों से उदाहरण से ये संकेत तो मिलता ही है कि आज का दर्शक मनोरंजन के साथ साथ अपनी परंपरा और विरासत से खुद को एकाकार करना चाहता है। साथ ही उसको मनोरंजक तरीके से समकालीन राजनीति की विसंगतियों पर की गई टिप्पणियां भी पसंद आती हैं। फिल्मों में इस तरह मनोरंजन की चाशनी में लिपटी राजनीतिक टिप्पणियों को देखने पर एक शिफ्ट का संकेत भी है। इसके पहले तो हिंदी फिल्मों में इस तरह के संवाद सुनने को मिलते थे कि वो आएंगे भारत माता की जय के नारे लगाएंगे और तुम्हारी हत्या कर देंगे। इस संबंध में हिंदी फिल्मों के कई उदाहरण हमारे सामने हैं।   

इस वर्ष जनवरी से अप्रैल के बीच रिलीज फिल्मों से जो सकारात्मक संकेत मिले हैं वो उसके बाद रिलीज फिल्मों में भी दिखाई देता है। मनोरंजन, मनोरंजन और मनोरंजन यही फिल्मों की सफलता का आधार है। इस वर्ष मई में दो फिल्में रिलीज हुई जिसके कारोबारी परिणाम इस अवधारणा को मजबूती प्रदान करते हैं। एक फिल्म है भूल भुलैया-2 और दूसरी फिल्म है अनेक। भूल भुलैया 2 को दर्शकों ने खूब पसंद किया। चार सप्ताह में इसका कलेक्शन करीब पौने दो सौ करोड़ रुपए तक पहुंच गया है जबकि फिल्म अनेक बाक्स आफिस पर बुरी तरह से पिट गई। पहले भूल भुलैया 2 पर विचार करते हैं कि क्यों दर्शकों ने इसको पसंद किया जबकि ये 2007 में आई फिल्म भूल भुलैया का सीक्वल है।इसमें कर्तिक आर्यन, तब्बू और कियारा आडवाणी लीड रोल में हैं। ये हारर मूवी है बावजूद इसके इसमें जबरदस्त हास्य है। पिछले दिनों एक निजी बातचीत में गीतकार और कवि प्रसून जोशी ने फिल्मों के बारे में बेहद महत्वपूर्ण बात कही थी। कोरोना महामारी के बाद के दौर में जिस तरह की फिल्में सफल हो रही हैं, उनको देखकर प्रसून जोशी की बात सहसा याद आ गई। प्रसून ने कहा था कि ‘ऐसा लगता है कि हमारा ये युग मनोरंजन का युग है। अब लोग रिश्तों में भी मनोरंजन तलाशने लगे हैं। आज लोग अपने परिवार में भी इंटरटेनिंग पर्सनैलिटी की तलाश करने लगे हैं। पुत्र भी पिता से अपेक्षा करता है कि वो इंरटेनिंग हों।‘ अगर आज हमारा समाज परिवार में भी इंटरटेनमेंट खोज रहा है तो उसके पीछे के मनोविज्ञान को समझना होगा। इंटरटेनमेंट को खुशहाली के व्यापक अर्थ में देखा जाना चाहिए। समाज के इन बदलते मनोभावों को जो फिल्मकार अपनी फिल्मों में दिखा पा रहे हैं उनको दर्शक मिल रहे हैं और वो अच्छा मुनाफा भी कमा रहे हैं। जो फिल्मकार इसमें असफल हो जा रहे हैं उनको दर्शकों का प्यार नहीं मिल पाता है। आज जब फिल्म उद्योग पटरी पर लौटता दिख रहा है तो फिल्मकारों को बेहद सावधानी के साथ व्यापक अर्थ और संदर्भ में दर्शकों के मनोरंजन का ध्यान रखना होगा। फिल्मों के पुराने घिसे पिटे फार्मूले को छोड़कर मनोरंजन के नए रास्ते तलाशने होंगे। सितारों की छवि के सहारे फिल्म हिट हो जाए ये आवश्यक नहीं है. छवि के साथ साथ कहानी में दर्शकों को बांधे रखने की क्षमता भी होनी चाहिए। पौराणिक कथा को भी अगर फिल्मकार नए संदर्भ और समकालीन विमर्श से परोक्ष रूप से नहीं जोड़ पाएंगे तो फिल्मों की सफलता में संदेह है। ऐसा लगता है कि दक्षिण भारत के फिल्मकार इस ट्रेंड को समझ गए हैं। 


Saturday, June 11, 2022

सत्य को भी चाहिए शक्ति का आधार


शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद देश के कई राज्यों में जिस तरह से उपद्रव और बवाल हुआ उसके बाद हिंदुओं और मुसलमानों के रिश्तों को लेकर चर्चा आरंभ हो गई है। न्यूज चैनलों और इंटरनेट मीडिया पर पर कई स्वयंभू विचारक नए नए सिद्धांत पेश कर रहे हैं। कुछ लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के हाल में संघ शिक्षा वर्ग के तृतीय वर्ष के समापन समारोह में दिए उनके वक्तव्य को उद्धृत कर रहे हैं। कुछ उत्साही विश्लेषक मोहन भागवत के वक्तव्य के उस अंश को उद्धृत करते हुए उनकी आलोचना कर रहे हैं जहां उन्होंने ज्ञानवापी के संदर्भ में अपनी बात रखी। वो लगातार चीख रहे थे कि संघ ने मुसलमानों को लेकर अपना स्टैंड बदल लिया है और अब संघ अपनी मुस्लिम विरोध की छवि में सुधार करना चाहता है। इंटरनेट मीडिया पर हिंदुत्व की ध्वजा लेकर विचरण करनेवाले कई विद्वान तो मोहन भागवत के इस बयान की तुलना लालकृष्ण आडवाणी के जिन्ना के मजार पर लिखी टिप्पणी से कर बैठे। उनकी इन बचकानी टिप्पणियों पर बात करने से पहले जरा देख लेते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा क्या था। 

सरसंघचालक ने कहा था कि ज्ञानवापी का अपना एक इतिहास है जिसको हम बदल नहीं सकते हैं। इसको न आज के हिंदू ने बनाया न आज के मुसलमानों ने बनाया। ये उस समय घटा। इस्लाम बाहर से आया, आक्रामकों के साथ आया। उस आक्रमण में भारत की स्वतंत्रता चाहनेवाले व्यक्तियों का मनोधैर्य खर्च करने के लिए देवस्थान तोड़े गए, जिनकी संख्या हजारों में है। उनमें से कइयों का हिंदुओं की आस्था में विशेष स्थान है। आगे उन्होंने कहा कि हिंदुओं को लगता है कि पुनर्उत्थान का कार्य करना चाहिए। राममंदिर का एक आंदोलन हुआ अब उस तरह का आंदोलन नहीं करना है। लेकिन इश्यू जो मन में हैं वो उठते तो हैं। वो किसी के विरुद्ध नहीं हैं। ...आपस में मिल बैठकर सहमति से रास्ता निकालना चाहिए। हर बार सहमति से रास्ता नहीं निकलता तो संविधान सम्मत न्याय व्यवस्था को मानना चाहिए और उसपर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाना चाहिए। इसी क्रम में वो कहते हैं कि ज्ञानवापी में हिंदुओं की श्रद्धा है लेकिन हर मस्जिद में शिवलिंग क्यों देखना। उसके आगे भी उनका वक्तव्य चलता है जिसमें वो बाहर से आई पूजा पद्धति को अपनाने वालों को भी भारतीय बताते हैं। उनके और हिंदुओं के पूर्वजों के एक होने की बात करते हैं। लेकिन उनका पूरा जोर शक्ति पर होता है। 

अपने वक्तव्य के आरंभ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बहुत स्पष्टता के साथ राष्ट्र और राष्ट्रीयता की बात रखी। विस्तार से धर्म और स्व को परिभाषित किया। समन्वय, संतुलन, सबको साथ लेकर चलने, सबकी उन्नति करना ही स्व है और उसके आधार पर ही देश के तंत्र को स्थापित करने की बात होती है। धर्म के संरक्षण के लिए मोहन भागवत जी ने स्पष्ट किया कि वो दो प्रकार से होता है। एक तो जब धर्म पर आक्रमण होता है तो उसको आक्रमण से बचाना होता है, बलिदान देना होता है। लड़ाई भी करनी पड़ती है। इसके अलावा धर्माचरण के माध्यम से धर्म की अभिवृद्धि की बात भी उन्होंने की। संघ प्रमुख ने जो बात रखी वो कोई नई बात नहीं कही है। नए विचारकों के लिए ये नई बात हो सकती है लेकिन मुसलमानों को लेकर संघ का ये विचार वर्षों से रहा है। हिंदुत्व और आक्रामक हिंदुत्व को परिभाषित करनेवाले राजनीतिक विश्लेषक गुरुजी गोलवलकर का नाम लेना नहीं भूलते हैं और ना ही भूलते हैं उनकी पुस्तक ‘वी आर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ को। इस पुस्तक के आधार पर वो मुसलमानों के प्रति संघ की सोच को व्याख्यायित करते हैं। लेकिन हिंदुत्व को या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सोच को विश्लेषित करनेवाले नए विचारक इस तथ्य से या तो अनभिज्ञ हैं या फिर उसको जानबूझकर उजागर नहीं करते कि जिस वक्त गुरु गोलवलकर ने ये पुस्तक लिखी थी वो न तो संघ के पदाधिकारी थे और न ही सरसंघचालक। मुसलमानों को लेकर संघ का क्या सोच रहा है इसको जानने के लिए गुरू गोलवलकर और पत्रकार सैफुद्दीन जिलानी की 30 जनवरी 1970 की बातचीत देखनी चाहिए। ये बातचीत नरेन्द्र ठाकुर के संपादन में प्रकाशित पुस्तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण में संकलित है। इसमें जब सैफउद्दीन साहब ने मुसलमानों को लेकर उनके दृष्टिकोण के बारे में पूछा तो गुरुजी का कहना था कि हमें ये बात हमेशा ध्यान में रखनी होगी कि हम सबके पूर्वज एक ही हैं। हम सब उनके वंशज हैं। आप अपने-अपने धर्मों का प्रामाणिकता से पालन करें परंतु राष्ट्र के मामले में हम सबको एक रहना चाहिए। राष्ट्रहित के लिए बाधक सिद्ध होनेवाले अधिकारों और सहूलियतों की मांग बंद होनी चाहिए। हम हिंदू हैं, इसलिए हम विशेष सहूलियतों या अधिकारों की कभी बात नहीं करते। इसी बातचीत में गुरूजी एक जगह कहते हैं कि भारतीयकरण का अर्थ सबको हिंदू बनाना तो नहीं है। तो अगर गुरू गोलवलकर की बातों को ध्यान से देखें तो यही लगेगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत उन्हीं बातों को समकालीन परिप्रेक्ष्य में आगे बढ़ा रहे हैं। संघ अपनी नीति पर कायम है, न तो कोई स्टैंड बदला है और न ही राष्ट्रविरोधियों को लेकर साफ्ट हुआ है। 

हिंदू धर्म और संघ की नीतियों के नए विश्लेषकों को मोहन भागवत जी के हाल के भाषण को फिर से सुनना समझना चाहिए। इस भाषण में मोहन भागवत ने एकाधिक स्थान पर शक्ति की महत्ता को रेखांकित किया है। वो तो यहां तक कहते हैं कि सत्य को भी शक्ति का आधार चाहिए होता है। बिना शक्ति के दुनिया नहीं मानती। उनके वक्तव्य की बारीकियों को समझे बिना किसी तरह का विश्लेषण अधूरा लगता है। वो हिंदू समाज को शक्ति देने की बात कर रहे हैं। बार बार कर रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि बगैर शक्ति के दुनिया आपकी बात मानना तो दूर सुनेगी भी नहीं। आज अगर भारत में हिंदुओं की बात सुनी जा रही है तो उसके पीछे समाज की शक्ति है। वो स्पष्ट तौर पर कहते हैं कि दुनिया में दुष्ट लोग हैं जो हमको जीतना चाहेंगे इसलिए शक्ति की आराधना करनी चाहिए। उनके लगभग इकतीस मिनट के भाषण में हिंदू समाज को शक्ति देने की बात प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कई बार आती है। मोहन भागवत की आलोचना करनेवाले व्याख्याकारों और टीकाकारों को उनके वक्तव्य को समग्रता में देखना चाहिए। संघ प्रमुख ने न तो संघ का कोई स्टैंड बदला है न ही वो मुसलमानों को खुश करने के लिए ऐसी बात कर रहे हैं। संघ हमेशा से भारतीय मुलमानों को यहां का मानता है। उनको आक्रमणकारियों के साथ जोड़कर नहीं देखता है और यही अपेक्षा करता है कि इतिहासकार और भारतीय मुसलमान भी अपने को भारतीय मानें और आक्रांताओं के साथ खुद को जोड़कर नहीं देखें। नए नए संघ विचारक बने टीवी चैनलों की खिड़कियों पर रात दिन टंगे रहनेवाले स्वयंभू विद्वान किसी भी चीज को समग्रता में नहीं देख पाते हैं। नतीजा यह होता है कि किसी वक्तव्य के एक छोटे हिस्से के आधार पर उसका मूल्यांकन करके निर्णय देने लग जाते हैं और दोष के शिकार हो जाते हैं। हर मस्जिद में शिवलिंग खोजने का जो बयान है उसके पहले भी काफी देर तक हिंदू समाज को शक्ति देने की, धर्म की, स्व की, धर्माचरण के बारे में कहा गया लेकिन न तो उसको सुनने की किसी को फुर्सत है और न ही उसकी बारीकियों को विश्लेषित करने की कला। इसका नुकसान ये होता है कि समाज में गलत संदेश जाता है और भ्रम की स्थिति बनती है। इससे बचा जाना चाहिए।  


Saturday, June 4, 2022

सत्य होती सत्यजित राय की चिंताएं


प्रख्यात फिल्मकार सत्यजित राय के शताब्दी वर्ष में उनकी फिल्मों पर चर्चा हो रही है। फिल्म  निर्माण की उनकी कला के बारे में सेमिनार और गोष्ठियां आदि आयोजित हो रही हैं। फ्रांस में आयोजित होनेवाले कान फिल्म फेस्टिवल से लेकर देश के फिल्म उत्सवों में उनकी फिल्मों का प्रदर्शन किया जा रहा है। कुछ फिल्मकार उनके जीवन और उनकी कला पर डाक्यूमेंट्री भी बना रहे हैं। लेकिन सत्यजित राय के जन्म शताब्दी वर्ष में फिल्मों को लेकर उन्होंने जो चिंताएं व्यक्त की थीं उनपर भी बात होनी चाहिए। फिल्मों की कहानियों और फिल्म और साहित्य के रिश्ते पर उन्होंने जो चिंता व्यक्त की थीं, उसपर कम बात होती है। 1980 में सत्यजित राय ने एक सेमिनार में कहा था कि इन दिनों लेखन में एक खास तरह की गिरावट देखी जा सकती है। अब जिस तरह के उपन्यास प्रकाशित हो रहे हैं या कहानियां छप रही हैं वो फिल्मकारों को फिल्म बनाने के लिए उकसा नहीं पा रही हैं। लेखकों ने एक खास किस्म की लेखन प्रविधि अपना ली है । वो अपने लेखन में जोखिम नहीं उठा रहे हैं और किसी प्रकार का प्रयोग भी नहीं कर पा रहे हैं। नतीजा ये हुआ है कि उनके लेखन में एक ठहराव आ गया है। सत्यजित राय के समकालीन लेखन पर इस टिप्पणी का बंगाल के लेखकों ने प्रतिवाद किया था और फिर कहा था कि ये लेखकों का दायित्व नहीं है कि वो फिल्मकारों को ध्यान में रखकर कहानियां या उपन्यास लिखे। लेखकों और सत्यजित राय के बीच इस विषय पर लंबा संवाद हुआ था। करीब चालीस वर्ष बाद आज भी सत्यजित राय के प्रश्न चुनौती बनकर लेखकों के सामने खड़े हैं। इस प्रश्न का उत्तर ढूंढना चाहिए कि समकालीन लेखन में ऐसे उपन्यास या कहानियां क्यों नहीं लिखी जा रही हैं जो फिल्मकारों को प्ररित कर सकें कि वो उसपर उत्साहित होकर फिल्म बनाने के लिए आगे आएं। 

इन प्रश्नों का उत्तर ढूंढने के लिए हमें अतीत में जाना होगा। हमें ये देखना होगा कि कैसे लेखकों ने एक विचारधारा का दामन थामा और वो फार्मूलाबद्ध लेखन के जाल में फंसते चले गए। 1967 में जब नक्सबाड़ी आंदोलन का आरंभ हुआ तो उससे बंगाल के अलावा हिंदी प्रदेश के लेखक भी प्रभावित हुए। नक्सलवाद के रोमांटिसिज्म में हिंदी लेखन भी फंसा और इसमें भी नक्सलवाद का या मार्क्सवाद का प्रभाव दिखने लगा। इस आंदोलन के प्रभाव में ही समांतर सिनेमा का आरंभ हुआ जिसको न्यू वेव सिनेमा भी कहा गया। हिंदी सिनेमा भी इससे अछूता नहीं रहा और यहां भी इस समानंतर सिनेमा की छतरी के नीचे फिल्मकारों ने फिल्में बनानी शुरू की। उस वक्त की सरकार की तरफ से भी इन फिल्मकारों को मदद मिली थी। फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन ने इस तरह की फिल्म बनाने वालों को आर्थिक मदद की । मुनाफा या फिल्म पर आनेवाले खर्चे की चिंता नहीं होने की वजह से समांतर सिनेमा से जुड़े फिल्मकारों ने कला को छोड़कर विचारधारा को दिखाना आरंभ कर दिया। सरकारी खर्चे से बबनेवाली फिल्मों की चर्चा तो बहुत हुई लेकिन दर्शकों का प्यार कम मिला। ये दौर बहुत लंबे समय तक चला। अपनी विचारधारा के फिल्मकारों को फिल्म समीक्षकों ने बढ़ाना और स्थापित करना आरंभ कर दिया। सत्यजित राय जब तक जीवित रहे वो इस इस तरह की फिल्मो के चक्कर में नहीं पड़े। उनपर हमले भी हुए, उनकी फिल्मों की आलोचना भी होने लगी। उनपर बंगाल की संस्कृति से दूर जाने के आरोप भी लगाए गए लेकिन वो हर तरह की फिल्म बनाते रहे और वैश्विक स्तर पर उनकी फिल्मों को सराहना मिली। आज भी कान फिल्म फेस्टिवल के दौरान सत्यजित राय की फिल्मों का न केवल प्रदर्शन होता है बल्कि उनकी फिल्म कला पर चर्चा होती है। जैसे जैसे विचारधारा का प्रभाव कम हुआ उसके आधार पर बनी फिल्में भी नेपथ्य में चली गईं। उपन्यास और कहानी के नाम पर वैचारिकी परोसनेवाले लेखक भी पिछड़ गए। 

वैचारिक लेखन के कई नुकसान सामने आए। विशेष रूप से अगर हम हिंदी में उपन्यास और कहानी लेखन को देखें तो वामपंथी विचारधारा के प्रभाव में जिस तरह से यथार्थ के नाम पर लेखन आरंभ हुआ वो एकांगी होता चला गया। कहानी में किस्सागोई का स्थान नारेबाजी ने ले लिया। गांव-देहात, किसान-मजदूर के नाम पर लिखी जानेवाली कहानियों में परोक्ष रूप से विचारधारा को मजबूत करनेवाली बातें कही जाने लगीं। विचारधाऱा के खूंटे से बंधे लेखकों की कृतियों में कथित यथार्थवाद जड़ हो गया। मजदूरों, गरीबों और किसानों की समस्याएं बदलीं, उनका संकट बदला लेकिन हिंदी के अधिकांश लेखक उन समस्याओं को या संकट को पकड़ने में नाकाम रहे। लगातार एक तरह के लेखन से पाठक भी दूर होते गए और साहित्यिक कृतियों पर फिल्म बनानेवालों के सामने भी संकट आ खड़ा हो गया। जिसको सत्यजित राय ने अस्सी के शुरुआती दशक में ही भांप कर प्रकट कर दिया था। सत्यजित राय ने जब कहानियों में विविधता और प्रयोगात्मकता की ओर संकेत किया था तो उसके करीब एक दशक बाद देश में आर्थिक उदारीकरण का दौर आरंभ हुआ। वामपंथ के किले ढहने लगे थे, वामपंथी विचारधारा के सामने बड़ी चुनौती आकर खड़ी हो गई थी। रूस और चीन में भी खुलेपन की बयार बहने लगी। लेकिन विचारधारा वाले लेखक इस बदलाव को भांप नहीं पा रहे थे। भारतीय समाज भी पर आर्थिक उदारीकरण का गहरा प्रभाव पड़ा। भारत में एक नया मध्यवर्ग पैदा हो गया। भारत में गरीबों का किसानों का, मजदूरों का जीवन स्तर बेहतर होने लगा था। 

आर्थिक उदारीकरण के बाद नए मध्यवर्ग की आशा और आकांक्षाएं बदलने लगी थीं। मध्यवर्ग की बदलती आशा और आकांक्षाओं का प्रकटीकरण साहित्य में आनुपातिक रूप में कम हो रहा था। भारत के इस मध्यवर्ग की जीवनशैली को अंधाधुंघ शहरीकरण ने भी प्रभावित किया। युवाओं और महिलाओं की समस्याओं और सपने भी अलग हो गए। विचारधारा की गुलामी की बेड़ियों में जकड़े हिंदी के लेखक यथार्थ के नाम पर जो परोस रहे थे वो इस बदले हुए यथार्थ से कोसों दूर था। परिणाम यह हुआ कि ऐसे लेखन के पाठक कम होते चले गए और तब हिंदी के लेखकों ने हिंदी में पाठकों की कमी का रोना आरंभ कर दिया। लेखकों के इस रुदन में कई प्रकाशक भी शामिल हो गए। उन्होंने भी पुस्तकों की कम होती बिक्री के बारे में कहना शुरु कर दिया। इस स्थिति पर अगर समग्रता से विचार किया जाए तो इस समस्या के मूल में हिंदी लेखकों का अपने पाठकों की रुचि को समझ पाने में नाकामी बड़ी वजह है। अब भी अगर स्वाधीनता क बाद के समय में किसानों और मजदूरों की समस्या का समकालीन बताकर पाठकों के सामने पेश किया जाएगा तो पाठक उसको स्वीकार करेंगे इसमें संदेह है। अब कुछ युवा लेखकों ने अपने समय को अपने उपन्यासों में या अपनी कहानियों में स्थान देना शुरू किया है तो उनको पाठक मिलने लगे हैं। हिंदी में पाठक नहीं है, यह अवधारणा गलत है। पाठक हैं और वो खरीदकर पढ़ना भी चाहते हैं लेकिन जरूरत इस बात की है कि उनकी रुचि की पुस्तकें लिखी जाएं और वो अपने पाठकों तक पहुंचने का उपक्रम करें। फिल्मकार भी साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बनाना चाहते हैं। फिल्म एक ऐसा माध्यम है जो समय के साथ चलता है और अपने समय के यथार्थ को दर्शकों के सामने पेश करता है।  साहित्यिक कृतियों से कहानियां उठाकर निर्देशक उसको इस तरह से पेश करता है कि कई बार कहानी बदली हुई लगती है लेकिन वो माध्यम की मांग होती है। सत्यजित राय ने भी प्रेमचंद की कृति शतरंज के खिलाड़ी में कई बदलाव किए थे। आज अगर साहित्य को व्यापक दर्शक/पाठक वर्ग तक पहुंचना है तो उसको फिल्म के साथ साहचर्य स्थापित करने के बारे में सोचना चाहिए।