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Monday, July 23, 2012

दलित प्रतिभाओं का मेला

चौथी दुनिया के अपने स्तंभ में कुछ महीनों पहले मैंने एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था बिहार में सांस्कृतिक क्रांति । उस लेख के शीर्षक को लेकर मुझपर जमकर हमले किए गए । पटना के कुछ लेखकों ने मेरे उस लेख पर गंभीर एतराज जताते हुए बेवसाइट्स पर लेख लिए । चौथी दुनिया में मेरा स्तंभ बंद करवाने के लिए तमाम दंद फंद रचे । मुझे नीतीश सरकार का प्रशस्ति गायन करनेवाला लेखक करार दे दिया । एक बेवसाइट के मॉडरेटर ने मुझे भगवा समीक्षक करार दे दिया । मुझपर व्यक्तिगत हमले हुए । कालांतर में मुझ पर हमला करनेवाले लोग किन्ही गैर साहित्यिक वजहों से चर्चा में रहे । दिल्ली के एक कवि मित्र, जो पत्रकार भी हैं , ने फोन करके मेरी लानत मलामत की । वो मुझे फोन पर पत्रकारिता सिखाने की कोशिश करने लगे । बिहार के सांस्कृतिक संस्थानों की बदहाली गिनाने लगे । उनकी वरिष्ठता और वय को ध्यान में रखते हुए मैंने उनसे सिर्फ इतना कहा कि आप इस बात के लिए बिहार सरकार के संस्कति मंत्री या संस्कृति मंत्रालय की तारीफ कीजिए कि सूबे एक बार फिर से सांस्कृतिक गतिविधियां शुरू हो गई हैं जो पिछले दो दशक से बंद थी । मेरे इतना कहने के बाद वो बेतरह नाराज हो गए और कहा कि वो मंत्री को भी जानते हैं और मुझे भी । उसके बाद उन्होंने मुझपर कई तरह के उलजलूल आरोप मढे । जब कवि मित्र आपे से बाहर होने लगे तो उनके पास कोई तर्क बचा नहीं । इस तरह के बुद्धिजीवियों की दिक्कत यही है कि जब उनके पास कोई तर्क बचता नहीं है तो वो एक ही तर्क का सहारा लेते हैं कि आप तो संघी हैं आपसे बहस ही नहीं की जा सकती । नतीजा बातचीत खत्म हो जाती है । उस वक्त मैंने अपने इस कॉलम में अपना पत्र रखते हुए एक और लेख लिखा था । दरअसल लालू मोह में ग्रस्त कुछ लेखकनुमा लोग बिहार में हो रहे सांसकृतिक गतिविधियों और विकास के कामों को पचा नहीं पा रहे हैं । दलितों के नाम पर सालों से अपनी सांस्कृतिक दुकान चला रहे इन लोगों को लगता है कि अगर सरकारी स्तर पर कार्यक्रम या फिर किताबें प्रकाशित होने लगी तो उनकी दुकान बंद हो जाएंगी । लालू राज के दौरान इन संस्थानों और कार्यक्रमों में कुछ चुनिंदा लोगों की भागीदारी रहती थी । वो चंद लोग चुपचाप अपना हित साधते रहते थे क्योंकु उन्हें व्यक्तिगत लाभ लोभ के आगे सूबे की छवि या बिहार की समृद्धशाली परंपरा का ना तो अभिमान था और ना ही उन्हें प्रचारित करने में कोई रुचि । अब जब बिहार में सांस्कृतिक गतिविधियां होने लगी हैं । सरकारी स्तर पर प्रयास करके कई बेहतरीन किताबों का प्रकाशन होने लगा है तो लालू राज के दौरान काम कर रहे मठाधीशों को लगने लगा है कि अब उनकी दुकानदारी तो बंद हो गई । लिहाजा उन्होंने इस तरह के हमले शुरू किए ताकि सरकारी सांस्कृतिक पहल पर ब्रेक लगवा सकें ।
अभी जून के महीने में बिहार सरकार के संस्कृति मंत्रालय की पहल पर दस से पंद्रह तारीख के बीच पटना के प्रेमचंद रंगशाला मैं लोकोत्सव का आयोजन किया गया था । इस लोकोत्सव में दलित संस्कृति के विभिन्न रूपों को समेकित रूप से प्रदर्शित किया गया था । लोकोत्सव में बिहार के विभिन्न क्षेत्रों और दलित जातियों की विशिष्ट लोकगाथाओं हिरनी बिरनी, राजा सलहेस, सती बिहुला, रेशमा चूहडमल, दीना भदरी, और बहुरा गोढिन की सानदार प्रस्तुति भी पेश की गई थी । हैरानी की बात है कि इन प्रस्तुतियों के दौरान प्रेमचंद रंगशाला खचाखच भरा रहता था । लोकोत्सव में पहले दिन हिरनी विरनी की प्रस्तुति हुई । हिरवी विरनी नट जातियों में प्रचलित है । यह लोकगाथा अंग क्षेत्र से लेकर लेकर मध्य विहार तक में सुनी जाती है । नारी मुक्ति पर केन्द्रित यह लोकगाथा हिरनी बिरनी दो बहनों के माध्यम से अपने अधिकारों के बारे में बात करती है । दलित और स्त्री दोनों को समटे इस प्रस्तुति ने दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर जदिया । हिरनी विरनी के अगले दिन विन्देश्वर पासवान और उनके दल ने राजा सलहेस को पेश किया । मिथिलांचल के दलित जातियों में प्रचलित यह लोकगाथा अब अपनी जातीय सीमाओं से परे पूरे मिथिलांचल में समान रुप से पसंद की जाती है।  राजा सलहेस में सामंती अन्याय के खिलाफ उठ खड़े होने के संघर्ष दास्तां है । बाद में छपरा के शिव जी और उनके दल ने सती बिहुला पेश कर दर्शकों का मन मोह लिया । यह प्रस्तुति मुख्य रूप से हमारे समाज में महिलाओं के समर्पण और महत्व को रेखांकित करती है। रेशमा चौहरमल को जहानाबाद के बली राय और उनके ग्रुप ने एक अलग शैली में प्रस्तुत कर शहरी दर्शकों कों थिएटर का एक नया रूप दिखाया । मध्य बिहार की दलित जातियों में प्रचलित यह लोकगाथा सामाजिक सौहार्द्र को रेखांकित करती है। लोकोत्सव में अनिल सदा ने अपने ग्रुप के साथ दीना भदरी की प्रस्तुति दी । उस उत्सव का समापन बहुरा गोढिन की प्रस्तुति के साथ हुआ।  बेगुसराय के पवन पासवान और उनके दल ने बहुरा गोढिन को को जीवंत करते हुए दर्शकों को मोह लिया ।
लोकोत्सव में इन प्रस्तुतितियों के अलावा भी विचार विमर्श हुए जिसमें हर तरह की विचारधारा के लोगों को आमंतत्रित किया गया था । बिहार में लोकोत्सव हो, बिहार की प्रचलित लोकगाथाओं की बिहार के कलाकारों प्रस्तुति हो या क्या क्रांति से कम है । क्या क्रांति का रंग सिर्फ लाल ही होता है । क्या क्रांति समाज के दबे चुचले लोगों से जुड़ी लोकगाथाओं को प्रमुखता से मंच देना क्रांति नहीं है । मैं तो आज भी डंके की चोट पर कहता हूं कि इलस वक्त बिहार में जिस तरह से सांस्कृतिक गतिविधियां हो रही है वो तारीफ के काबिल हैं । क्या इनका विरोध करने वाले लोग वो दौर भूल गए जब कला और संस्कृति के नाम पर बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लौंडे का डांस करवाया करते थे और अपने तमाम कारकुनों के साथ सगर्व लौंडा डांस देखते हुए तस्वीरें खिंचवाया करते थे । ठीक है आपको शौक है आप लौंडा डांस देखिए लेकिन बिहार की गौरवशाली सांस्कृतिक परंपराओं को बचाए रखने का दायित्व का भी निर्बाह करिए ।
जिस तरह से इस बार दलित कलाकारों की भागीदारी से लोकोत्सव का आयोजन पचना में किया गया उसी तरह के आयोजन देश के अन्य भागों में भी होने चाहिए ताकि पूरे देश को बिहार की दलित प्रतिभा का पता चल सके और बिहार के कलाकारों को भी देश के अन्य भागों की कलाओं और कलाकारों से रू ब रू होने का मौका मिलेगा । मैं एक बार फिर से कह रहा हूं कि बिहार में जिस तरह से सांस्कृतिक गतिविधियों ने अंगड़ाई ली है और वो उठ खड़ी हुई है उसके बाद अब बिहार सरकार का दायित्व है कि बिहार की उन साहित्यकिक और सांस्कृतिक संस्थाओं को जिंदा करने की जो पिछले दो दशक से लगभग मृतप्राय हैं । बिहार संगीत नाटक अकादमी, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, मगही अकादमी आदि आदि को पुनर्जीवित करने की आवश्कता है । बिहार में प्रतिभा की कमी नहीं है, कमी है सिर्फ इच्छाशक्ति की । हाल के दिनों में सास्कृतिक गतिविधियों को लेकर जिस तरह से राजनैतिक नेतृत्व की इच्छाशक्ति दिखाई देती है उससे एक उम्मीद बंधी है कि बिहार एक बार फिर से देश के सांस्कृतिक नक्शे पर अपनी अहमियत मजबूती से दर्ज करवाएगा ।   

Sunday, July 22, 2012

लेखकों की राजनीति


मध्य प्रदेश का भारत भवन अपने स्थापना काल से ही विवादों में रहा है । हिंदी के वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी की पहल पर भोपाल में बना यह साहित्य और संस्कृति का केंद्र एक बार फिर से विवादों में घिर गया है । इस बार विवाद की वजह है हिंदी के प्रगतिशील और जनवादी लेखक संगठनों से जुड़े तीन लेखकों की वो अपील जो उन्होंने जनवादी-प्रगतिवादी लेखक संगठनों से जुड़े कॉमरेड लेखकों से की है । इस अपील में इन संगठनों और विचारधारा से जुड़े साथी लेखकों से अनुरोध किया गया है कि वो भारत भवन, मध्य प्रदेश साहित्य परिषद, उर्दू अकादमी समेत मध्य प्रदेश के कई सरकारी संस्थानों के कार्यक्रमों का बहिष्कार करें । इस अपील में दलील दी गई है कि मध्य प्रदेश की वर्तमान सरकार की अन्यथा स्पष्ट सांस्कृतिक नीतियों की वजह से इन संस्थानों का और साथ ही प्रदेश की मुक्तिबोध, प्रेमचंद और निराला सृजनपीठों का, वागर्थ, रंगमंडल आदि विभागों का पुछले आठ नौ सालों में सुनोयोजित तरीके से पराभव कर दिया गया । अब यहां सवाल यह उठता है कि अगर पिछले आठ नौ सालों से ये सुनियोजित साजिश चल रही थी तो अब तक लेखक और लेखकों के संगठन चुप क्यों बैठे थे । क्या जनवादी और प्रगतिशील पत्रिकाओं में मध्यप्रदेश शासन का विज्ञापन नहीं छपता रहा है । दरअसल मध्यप्रदेश विधानसभा के चुनाव नजदीक आते ही इन लोगों को इन संस्थाओं के पतन और पराभव की याद आने लगी । चाहे वो प्रगतिशील लेखक संगठन हों या फिर जनवादी लेखक संगठन इनके सदस्यों का ना तो अपना कोई वजूद है ना तो अपनी कोई सोच ना ही अपनी कोई लाइन । हर तरह के कार्यक्रमों के लिए साहित्य के ये संगठन अपने राजनीतिक आकाओं का मुंह जोहते हैं और इतिहास इस बात का गवाह है प्रगतिशील लेखक संगठन और जनवादी लेखक संगठन से जुड़े लेखक हमेशा से सीपाआई और सीपीएम की विचारधारा के ही पोषक और प्रचारक रहे हैं । दरअसल अगर हम इस अपील को ठीक से पढ़ें और उसकी पड़ताल करें तो इसमें कुछ और खेल नजर आता है ।
इस अपील में लिखा गया है कि हमारा विरोध किसी राजनैतिक अनुशंसा से उतना नहीं है जितना क्योंकि व्यवस्था में इन पदों पर पहले भी राजैनतिक अनुशंसाओं ले लोग नामित किए जाते रहे हैं लेकिन वे सब असंदिग्ध रूप से हमारे समकालीन साहित्य के मान्य, समादृत हस्ताक्षर रहे हैं । इस वाक्य के बाद लेखकों की एक सूची दी गई है जिसमें वामपंथी विचारधारा के बाहर के भी कुछ लोगों के नाम शामिल कर अपील की साख को बढ़ाने की कोशिश की गई है । लेकिन इन तीन लोगों को यह याद दिलाने की जरूरत है कि जब अशोक वाजपेयी भारत भवन के कर्ता-धर्ता थे तो इन्हीं संगठनों से जुड़े लेखकों ने वाजपेयी पर जोरदार हमले किए थे । उन हमलों को अभी हिंदी साहित्य जगत भूला नहीं है । अशोक वाजपेयी का दोष तब इतना था कि उन्होंने भारत भवन पर कम्युनिस्ट पार्टी का झंडा लहराने से मना कर दिया था । लिहाजा उन पार्टियों से जुड़े लेखकों ने अशोक वाजपेयी औऱ उनसे जुड़े लेखकों को कलावादी कह किनारा लगाने की लगातार कोशिश की। उनको कल्चरल माफिया कहा गया तो भारत भवन को संस्कृति का अजायबघर । अशोक वाजपेयी के साथियों को अष्टछाप कह कर उनका मजाक उड़या गया । यही काम इन संगठन से जुड़े लेखकों ने हिंदी के हिरामन लेखक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के साथ भी किया और अब भी कर रहे है । भारत भवन के कामकाज में निसंदेह गिरावट आई है । जिस उद्देश्य के लिए उसकी स्थापना की गई थी उससे वह भटक गया है । लेकिन आठ सालों तक उसके कार्यक्रमों में दीप प्रजज्वलित करने और सक्रिय हिस्सेदारी के बाद चुनाव के वक्त उसका गिरता स्तर याद आना अपीलकर्ताओं की मंशा को संदेहास्पद बना रही है । अपीलकर्ताओं ने जो ईमेल अखबारों और लेखकों को भेजा है उसमें बार बार राजनीतिक भावना से काम न करने की सफाई दी है । बार-बार सफाई देना ही उस संदेह को बढ़ाने का पर्याप्त आधार है ।
दरअसल प्रगतिशील लेखक संघ और जनवादी लेखक संघ दोनों लेखकों के बड़े समुदाय से कट गए है । लेखकों की बेहतरी और उनके कल्याण के लिए उनके पास कोई ठोस योजना नहीं है । उनका काम सिर्फ लेखकों की मौत पर शोकगीत लिखना रह गया है । हिंदी के वरिष्ट कथाकार अरुण प्रकाश का जब  निधन हुआ था तो उनके पड़ोस में रहनेवाले जनवादी और प्रगतिशील संगठनों से जुड़े उनके साथी लेखकों के पास उनके अंतिम संस्कार में भाग लेने का वक्त नहीं था । दुख की उस घड़ी में परिवार के साथ खड़े होने से ज्यादा जरूरी उन संगठनों को सारे अखबारों को शोक संदेश प्रेषित करना लगा । जो लेखक अरुण प्रकाश के घर से चंद मीटर की दूरी पर रहते थे उनके दुख का पता अखबारों से चला । प्रचारप्रियता की पराकाष्ठा । दरअसल इन संगठन से जुड़े लेखक अब लेखक रहे नहीं वो पूरे तौर पर नेता हो गए हैं और उन्हीं की तरह के राजनीतिक दांव-पेंच चलते हैं । नेताओं की तरह का व्यवहार भी करते हैं और उनका वर्गचरित्र भी नेताओं वाला ही हो गया है । लेखकों का काम लिखना है राजनीति करना नहीं । इन लेखक संगठनों ने लेखकों को राजनीति करना सिखा दिया जिसका नतीजा यह हुआ कि उनसे जुड़े लेखकों की साख नेताओं की तरह संदिग्ध हो गई । लेखक अपने पाठकों से और रचनाओं से दूर होते चले गए । आज हालात यह है कि हिंदी समाज चंद लेखकों को छोड़कर किसी को जानता नहीं है, जानते हैं साहित्य की दुनिया में आवाजाही करनेवाले चंद लोग । लेखक संगठनों ने लेखकों को राजनीति के ऐसे दलदल में ढकेल दिया था कि जितना वो उससे निकलने की कोशिश करते थे उतना ही उसमें फंसते चले गए ।
मध्यप्रदेश के ये तीन कवि जो अपने सूबे की संस्थाओं के गिरते स्तर और पतनशीलता पर जार-जार हो रहे हैं उनको साथी लेखिका तसलीमा नसरीन का दर्द याद नहीं आता है । तसलीमा हर दिन घुट रही है लेकिन उसके लिए क्या कभी कोई प्रयास किया गया । एम एफ हुसैन के लिए बुक्का फाड़ विरोध करनेवाले इन लेखक संगठनों ने सलमान रश्दी के भारत आने पर मुल्लाओं के विरोध में चुप्पी साध ली थी । वजह बहुत साफ है उसको कहने की आवश्यकता नहीं है । जनवादिता और प्रगतिशीलता जब अपने आपको एक दायरे में समेट लेती है या विरोध या प्रशंसा का पैमाना विचारधारा और परोक्ष रूप से विचारधारा के लिए वोट जुटाना हो जाता है तो लेखकों का व्यवहार राजनेताओं सरीखा हो जाता है । लेखन से ज्यादा राजनीति करने का नतीजा यह होता है कि पाठकों के बीच उनकी साख कम से कमतर होती चली जाती है । आज संस्थाओं से ज्यादा जरूरी, गंभीर और बुनियादी समस्याएं लेखकों के सामने हैं । आज हिंदी में किताबों की उपलब्धता, हिंदी समाज के फैलाव के बावजूद साहित्यिक किताबों की कम बिक्री, लेखकों की रॉयल्टी, लेखकों की सहायता के लिए आकस्मिक कोष की कमी जैसी समस्याएं हैं जिनपर तवज्जो की जरूरत है । लेखक संगठन के कर्ताधर्ताओं और उनसे जुड़े लेखकों को इनपर ध्यान देना चाहिए और हालात की बेहतरी के लिए काम करना होगा । लेकिन इन समस्याओं को लेकर कभी हल्ला-गुल्ला नहीं मचता, कोई आंदोलन नहीं होता , कभी कोई अपील नहीं जारी की जाती । इसकी वजह है कि उससे कोई दलगत हित नहीं सधता । जरूरत इस बात की है कि इन मुद्दों पर गंभीर विमर्श हो वर्ना लेखक समुदाय एक दिन मृतप्राय लेखक संगठनों का शोकगीत लिख डालेंगे ।

Thursday, July 19, 2012

पिकी को पान सिंह तोमर मत बनाओ

कुछ दिनों पहले एक फिल्म आई थी जिसकी स्मृति अभी भी जनमानस में ताजा है । फिल्म का नाम था- पान सिंह तोमर । उस फिल्म में एक अंतरराष्ट्रीय धावक, जिसने भारत का नाम पूरे विश्व में उंचा किया था, की कहानी थी । पान सिंह तोमर पर समाज और सरकार से मिले उपेक्षा का दंश इतना गहरा हो गया था कि उसने बीहड़ में जाकर हथियार उठा लिया था । पहले पान सिंह तोमर एक जिम्मेदार नागरिक की तरह पुलिस स्टेशन जाता है लेकिन जब वहां बुरी तरह से अपमानित हो जाता है तो उसके पास कोई विकल्प बचता नहीं है । अभी अंतराष्ट्रीय महिला धावक पिकी प्रामाणिक के साथ भी वैसा ही सलूक किया जा रहा है । एक जमीन के टुकड़े के लिए पिंकी प्रमाणिक पर रेप का आरोप जैसे केस का सनसनीखेज खुलासा हुआ है । पिंकी प्रामाणिक एशियाई खेलों में भारत के लिए स्वर्ण पदक और राष्ट्रमंडल खेलों में रजत पदक जीतकर भारत का नाम रोशन कर चुकी है । लेकिन कृतध्न राष्ट्र उनके साथ दुर्दांत अपराधी जैसा बर्ताव कर रहा है ।

पिकी प्रमाणिक महिला है जिसपर पुरुष होने का आरोप लगा है लेकिन अबतक ये साबित नहीं हुआ है कि वो पुरुष हैं । जब पश्चिम बंगाल में उनपर एक महिला ने रेप का आरोप लगाया तो पिंकी के साथ पुलिस ने बेहद अमानवीय व्यवहार किया । जैसे ही रेप का आरोप लगा वैसे ही पुलिस ने पिंकी को मुजरिम मानते हुए जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया । उसको गिरफ्तार करने से पहले पुलिस सारे कायदे कानून भूल गई कि एक महिला को महिला पुलिस की मौजूदगी में ही गिरफ्तार किया जा सकता है । पुरुष पुलिस अधिकारी पिंकी को घसीटते हुए थाने तक ले गए । पुलिस की मंशा इससे भी साफ जाहिर होती है कि उसने आरोप लगाने वाली लड़की का मेडिकल तक नहीं करवाया । ना ही यह जानने की कोशिश की गई कि आरोप लगानेवाली महिला के पेनिट्रेशन हुआ या नहीं ताकि कानूनन रेप की पुष्टि हो सके । इस केस में ऐसा नहीं किया गया क्योंकि पुलिस ये फैसला ले चुकी थी कि पिंकी पुरुष है । उसके बाद रेप के आरोप में जब पिंकी को जेल भेजा गया तो उसे महिला वॉर्ड की बजाए अलग वार्ड में रख दिया गया । जेल मैनुअल के तहत महिलाओं को मिलने वाली सहूलियतें पिंकी को नहीं दी गई। अदालत ले जाते समय वैन में भी पिंकी के साथ कोई महिला कॉंस्टेबल मौजूद नहीं रहती थी । क्यों । क्योंकि पुलिस और जेल प्रशासन ने मान रखा है कि पिंकी पुरुष है ।

करीब महीने भर तक जेल में जिल्लत, हिकारत और अपमान की जिंदगी काटने के बाद जब पिंकी जेल से बाहर निकली तो उन्होंने जो बताया वो सभ्य समाज के मुंह पर तमाचा है । जेल में रहने के दौरान जब भी उनका जेंडर टेस्ट किया गया तो पुलिस पिंकी के हाथ पांव जानवरों की तरह बांध देती थी और बेहोश करके जबरन ये टेस्ट किया जाता था । अबतक पुलिस एक निजी नर्सिंग होम, जिला अस्पताल और एसएसकेएम अस्पताल में पिंकी का जेंडर टेस्ट करवा चुकी है । क्या इस तरह से पिंकी को जानबूझकर अपमानित नहीं किया जा रहा है । अभी तक ये साबित नहीं हुआ है कि पिंकी महिला है या पुरुष लेकिन पुलिस ने जिस तरह से उसे पुरुष समझ कर उसतके साथ गैरजिम्मेदाराना व्यवहार किया है उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए । जिस तरह से सोशल नेटवर्किंग साइट्स और इंटनेट पर पिंकी की मेडिकल के वक्त के अंतरंग वीडियो या एमएमएस घूम रहे हैं वो उसकी प्रतिष्ठा और मान सम्मान को तार-तार कर रहे हैं । पिंकी को रेलवे के नियम की वजह से नौकरी से स्सपेंड कर दिया गया । इन सबके उपर जिस तरह से मीडिया के एक हिस्से में पिंकी प्रमाणिक की कहानी को रस ले लेकर दिखाया गया वह बेहद शर्मनाक है । कई अखबारों ने तो उसको सूत्रों के हवाले से उभयलिंगी बता दिया । इन सबसे पिंकी की प्रतिष्ठा तो धूमिल हुई ही समाज में सर उठाकर चलने का उसका भरोसा भी खत्म हो गया । क्या हमारा भारतीय समाज अपने नायकों और विजेताओं के साथ इसी तरह का व्यवहार करता है । क्या इस व्यवहार पर पूरे देश को शर्मसार नहीं होना चाहिए । एक बच्ची को पेशाब चटवाने के मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय हरकत में आ जाता है लेकिन इस पूरे मसले पर शासन-प्रशासन की चुप्पी उनकी कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़े कर रही है । क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों के लिए हमेशा चिंता जतानेवाले खेल मंत्री की इस मसले पर खामोशी हैरान करनेवाली है ।  

दरअसल इस पूरे समस्या की जड़ में इंटरनेशनल ओलंपिक कमिटी की तरफ से जेंडर तय करने के लिए कोई तय मानक नहीं हैं । जेंडर टेस्ट के लिए ओलंपिक कमेटी के कई बयोलॉजिकल मानक हैं उसके मुताबिक शरीर में टेस्टोएस्टेरॉन की मात्रा से जेंडर तय किया जाता है । जांच में मेल हॉर्मोन टेस्टोएस्टेरॉन की मात्रा ज्यादा पाई जाती है तो माना जाता है कि वो पुरुष है । विडंबना यह है कि टेस्टोएस्टेरॉन का कोई एक मानक स्तर तय नहीं है जिसके आधार पर जेंडर तय हो सके । यह जांच भी इतना आसान नहीं है । उसमें टेस्टोएस्टेरॉन की मात्रा और उसकी कार्य क्षमता की संयुक्त जांच के बाद ही इसका पता लग पाता है । अगर मेल क्रोमोजोम वाई टेस्टोएस्टेरॉन के साथ कोई प्रतिक्रिया नहीं देता है तो उसका विकास महिला की तरह होता है । उसी तरह अगर अनुवांशिक रूप से किसी महिला के दो एक्स क्रोमोजोम और अतिविकसित एडरीनल ग्लैंड्स के हार्मोन टेस्टोएस्टेरॉन में तब्दील हो जाते हैं तो उससे शरीर में टेस्टोएस्टेरॉन की मात्रा बढ़ जाती । ऐसी महिलाओं के एंबिगुअस जेनेटिला भी विकसित हो जाते हैं । उसी तरह अगर किसी महिला में वाई क्रोमोजोम विकसित हो जाता है और जेनेटिक डिफेक्ट की वजह से वाई क्रोमोजोम टेस्टोएस्टेरॉन के साथ रेस्पांड नहीं करता है तो उस प्रक्रिया के आदार पर भी जेंडर टेस्ट में मदद मिलती है ।
इस वजह से ही गिरफ्तार होने के बाद जब पिंकी प्रमाणिक के हुए दो अलग अलग टेस्ट के अलग अलग नतीजे आए हैं । पिंकी के टेस्ट में जिस तरह के नतीजे अबतक मिले हैं उससे पिंकी में कुछ जेनेटिक डिफेक्ट के संकेत मिले हैं । लेकिन विशेषज्ञों की राय में कार्योटाइपिंग के अलावा इस तरह के मामलों में शरीर की संरचना और बचपन से उसके लालन पालन के आधार का भी ध्यान रखना पड़ा है ताकि नतीजे सटीक हो सकें । अब देश को पिंकी के तीसरे टेस्ट के नतीजों का इंतजार है । लेकिन इस पूरे प्रकरण से ये साफ हो गया है कि हमारा समाज समय समय पर पान सिंह तोमर बनाता है । अब भी वक्त है कि पिंकी को पानसिंह तोमर बनने से रोका जाए । उसको उसकी खोई प्रतिष्ठा तो वापस नहीं दी जा सकती लेकिन सम्मान तो हम दे ही सकते हैं ।

Sunday, July 15, 2012

किताब संस्कृति की बाधाएं

हिंदी की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका साहित्य अमृत के अपने संपादकीय में त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी ने लिखा है – दिल्ली में हिंदी साहित्य की पत्र-पत्रिकाओं के मिलने का कोई एक स्थान नहीं है, जहां पाठक पन्ने पलटकर अपनी पसंद की कोई पत्रिका खरीद सके । त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी के लंबे संपादकीय में यह छोटी सी टिप्पणी पूरे हिंदी समाज में साहित्यक किताबों और पत्र-पत्रिकाओं की उपलब्धता के बारे में सटीक लेकिन कड़वी हकीकत बयान करती है । आज हमारे समाज में हिंदी साहित्य की किताबों को लेकर जो एक उदासीनता, खासकर नई पीढ़ी में, दिखाई देती है उसके पीछे किताबों और साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं की अनुपलब्धता बड़ी वजह है । आज अगर हिंदी साहित्य का कोई नया पाठक प्रेमचंद से लेकर अज्ञेय से लेकर संजय कुंदन तक की रचनाएं पढना चाहता है तो उसे उसके आसपास मिल नहीं पाता है । अपने पसंदीदा लेखक की किताब के लिए पाठक को कई किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है या फिर इतना श्रम करना पड़ता है कि पढ़ने का उत्साह ही खत्म हो जाता है । अब जरूर एक नया विकल्प इंटरनेट के जरिए ऑर्डर देकर किताबें मंगवाने का है लेकिन वहां यह आवश्यक नहीं है कि मनचाही हिंदी की किताबें मिल ही जाएं ।
दिल्ली और मुंबई, जैसे महानहरों के अलावा अगर हिंदी पट्टी के बड़े शहरों मसलन लखनऊ, पटना,इलाहाबाद, कानपुर, भोपाल, जयपुर आदि की भी बात करें तो हर जगह कमोबेश एक ही तरह की स्थिति है । छोटे शहरों में जरूर कुछ स्थिति बेहतर है वो भी इस लिहाज से कि वहां की जनसंख्या और शहरों के फैलाव के अनुपात में एक भी साहित्यिक पत्रिकाओं की दुकान से पाठकों को देर सबेर कुछ ना कुछ मिल ही जाता है । दिल्ली के केंद्र में स्थित श्रीराम सेंटर में वाणी प्रकाशन की किताबों और पत्रिकाओं की एक दुकान हुआ करती थी जहां हर तरह की पत्र-पत्रिकाएं मिल जाया करती थी । वहां पाठकों को बाहर बैठकर किताबों को देखने पलटने की भी सहूलियत भी थी । लेकिन कारोबारी वजहों से वो सेंटर बंद हो गया और हिंदी की साहित्यक पत्रिकाओं और साहित्य की किताबें ढूंढना दिल्ली में एक श्रमसाध्य काम हो गया । कड़वी सचाई यही है कि साहित्यक पत्रिकाओं का कोई भी केंद्र दिल्ली में नहीं है जहां आपको देशभर की किताबें मिल सकें ।  
पाठकों तक किताबों को पहुंचाने और उसकी उपलब्धता बढ़ाने की दिशा में ना तो हिंदी के प्रकाशक और ना ही सरकार की तरफ से कोई पहल हो रही है । नतीजा ह हो रहा है कि हिंदी जगत में पुस्तक संस्कृति विकसित नहीं हो पा रही है । पहले तो पुस्तकालयों के माध्यम से ये संभव हो जाता था, लेकिन अब तो पुस्तकालय भी भगवान भरोसे ही हैं । दरअसल पुस्तक संस्कृति के फैलाव से नई पीढ़ी में एक तरह के संस्कार पैदा होता है जो अपनी समृद्ध साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपराओं का ज्ञान कराता है । जब आपको अपनी परंपरा का ज्ञान होगा तो उस पर आप अभिमान कर पाएंगे । प्रकाशक तो संसाधनों की कमी का रोना रोकर इस पहल से पल्ला झाड़ लेते हैं । प्रकाशकों के संगठनों के सामने फ्रांस का उदाहरण है जहां प्रकाशकों के संगठनों ने शानदार पहल की और किताबों की दुकान को लेकर सरकार को एक ठोस नीति बनाने के लिए मजबूर कर दिया । फ्रांस में हर गली मोहल्ले में आपोक किताबों की दुकान मिल जाएगी । एक अनुमान के मुताबिक फ्रांस में पिछले दस साल में किताबों की बिक्री में सालाना सात फीसदी इजाफा हुआ है । किताबों के कारोबार को लोकप्रिय बनाने में फ्रांस के संस्कृति मंत्री रहे जैक लैंग की महती भूमिका रही है । लैंग लॉ फ्रांस का मशहूर कानून है जिसकी दुहाई पूरे यूरोप में दी जाती है और उसे पुस्तकों की संस्कृति विकसित करने की दिशा में एक आदर्श कानून माना जाता है  । जैक ने सबसे पहले एक काम किया कि कानून बनाकर किताबों की कीमत तय करने का एक मैकेन्जिम बनाया । नतीजा यह हुआ कि पूरे देश में किताबों की कीमत में एकरूपता आ गई । वहां कोई भी प्रकाशक सूची में प्रकाशित मूल्य से पांच फीसदी से ज्यादा की छूट नहीं दे सकता है । अमेजोन और दूसरे बेवसाइट पर भी इतनी ही छूट दी जा सकती है । इससे ज्यादा देने पर वो गैरकानूनी हो जाता है । हिंदी में यह स्थिति नहीं है । कारोबारी कमीशन से इतर पाठकों को भी प्रकाशक अपनी मर्जी से बीस से पच्चीस फीसदी तक छूट दे देते हैं । पुस्तक मेले में तो ये छूट बढ़कर पच्चीस फीसदी तक पहुंच जाती है । सरकारी खरीद में कितनी छूट दी जाती है ये तो प्रकाशक या फिर संबंधित विभाग को ही पता रहता है । मूल्य निर्धारण की हिंदी में कोई सर्वमान्य प्रक्रिया भी नहीं है, लिहाजा किताबों के दाम बहुधा ज्यादा और सरकारी खरीद को ध्यान में रखकर तय किए जाते हैं । कभी कभार तो ये आम पाठकों की पहुंच से बाहर होते हैं ।
दूसरी बात जो किताब की दुकानों की कमी को लेकर है । यह कमी सरकारी उदासीनता और कोई ठोस नीति नहीं होने की वजह से हैं । किताब की दुकान खोलने के लिए सरकारी या सरकारी सहायता प्रापत् स्वायत्त साहित्यक संस्थाओं की तरफ से कोई आर्थिक सहायता का प्रावधान नहीं है । ना ही बैंको से रियायती दरों पर किताब की दुकान खोलने के लिए कर्ज मिलता है । हमारे यहां कई गैरजरूरी चीजों पर सरकारी सब्सिडी मिल सकती है लेकिन किताबों की उपल्बधता बढ़ाने के लिए होनेवाले खर्च पर सरकार भी उदासीन है । अगर हम फ्रांस की बात करें तो वहां कई सरकारी संस्थाएं रियायती दरों पर किताब की दुकान के कारोबार के लिए कर्ज देती है । नतीजा यह होता है कि अगर कोई एक किताब की दुकान बंद होती है तो उसके पड़ोस में नई दुकान खुल जाती है ।  किताब के करोबार को हमारे यहां ना तो उद्योग और ना ही लघु उद्योग का दर्जा प्राप्त है । हमारे देश की विडंबना यह है कि यहां किसी भी तरह की संपत्ति की बिनाह पर बैंक से लोन मिल जाता है लेकिन अगर किताबों के स्टॉक को गिरवी रखकर भी आप लोन लेना चाहें तो बैंक इंकार कर देते हैं । प्रकाशन जगत में एक जुमला बहुत चलता है – छपने के पहले कागज चार रुपए किलो, छपने के बाद दो रुपए किलो । ये कहावत हमारे देश में छपी किताबों को लेकर उससे जुड़े कारोबारियों की ममोदशा की ओर इशारा करता है ।   
पाठकों तक किताबें भेजने के लिए साहित्यक पत्र पत्रिकाओं के लिए डाक दरों में भी रियायत नहीं मिलती है । खबर छापने वाली पत्रिकाओं को डाक दर में रियायत मिलती है । रेलवे से किताब भेजने पर जितनी छूट पहले मिला करती थी वो भी अब लगातार कम होती जा रही है । इन सबके पीछे जो वजह है वो यह कि किताबों को लेकर हमारे देश में कोई नीति नहीं है । नीति तब बनती है जब सत्ता के शीर्ष पर बैठा कोई शख्स उसमें रुचि लेता है । जवाहरलाल नेहरू जब प्रधानमंत्री थे तो उनकी उन कला संस्कृति, पुस्तक लेखक और उनसे जुड़े सवालों में रुचि थी । आज के राजनीति परिदृश्य में नेहरू जैसे शख्सियत कम ही हैं । आजादी के पैंसठ साल बाद भी हमारे देश में किताबों को लेकर कोई ठोस नीति नहीं होना दुर्भाग्यपूर्ण है । आज हमारे देश में जरूरत इस बात की है कि किताबों को लेकर एक राष्ट्रीय पुस्तक नीति बने जिसमें उन सारी बातों और पहलुओं का ध्यान रखा जाना चाहिए जिससे देश में किताबों की एक संस्कृति का विकास हो सके । इस नीति के पहले राष्ट्रीय स्तर पर एक बहस हो जिसमें लेखकों, प्रकाशकों और आम पाठकों की भागीदारी हो । उस मंथन से जो अमृत निकले उसको लेकर आगे बढ़ा जाए ताकि हमारे देश में पुस्तक संस्कृति का निर्माण हो सके ।

Sunday, July 8, 2012

ई रीडर्स मांगे मोर

पिछले करीब तीन महीनों से ई एल जेम्स की फिफ्टी शेड्स ट्रायोलॉजी यानि तीन किताबें –फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे, फिफ्टी शेड्स डार्कर, फिफ्टी शेड्स फ्रीड अमेरिका में प्रिंट और ई एडीशन दोनों श्रेणी में बेस्ट सेलर बनी हुई हैं । जेम्स की इन किताबों ने पूरे अमेरिका और यूरोप में इतनी धूम मचा दी है कि कोई इसपर फिल्म बना रहा है तो कोई उसके टेलीवीजन अधिकार खरीद रहा है । फिफ्टी शेड्स ट्रायोलॉजी लिखे जाने की कहानी भी बेहद दिलचस्प है । टीवी की नौतरी छोड़कर पारिवारिक जीवन और बच्चों की परवरिश के बीच एरिका ने शौकिया तौर पर फैनफिक्शन नाम के बेवसाइट पर मास्टर ऑफ यूनिवर्स के नाम से एक सीरीज लिखना शुरू किया । एरिका ने पहले तो स्टीफन मेयर की कहानियों की तर्ज पर प्रेम कहानियां लिखना शुरू किया जो काफी लोकप्रिय हुआ ।  लोकप्रियता के दबाव और ई रीडर्स की मांग पर उसे बार बार लिखने को मजबूर होना पड़ा । शौकिया लेखन पेशेवर लेखन में तब्दील हो गया । पाठकों के दबाव में एरिका ने अपनी कहानियों का पुर्नलेखन किया और उसे फिर से ई रीडर्स के लिए पेश कर दिया । पात्रों के नाम और कहानी के प्लॉट में बदलाव करके उसकी पहली किश्त बेवसाइट पर प्रकाशित हुई तो वह पूरे अमेरिका में वायरल की तरह फैल गई । चंद हफ्तों में एरिका लियोनॉर्ड का भी नाम बदल गया और वो बन गई ई एल जेम्स । उसकी इस लोकप्रियता को भुनाते हुए उसने ये ट्रायोलॉजी प्रकाशित करवा ली । इसके प्रकाशन के पहले ही प्री लांच बुकिंग से प्रकाशकों ने लाखों डॉलर कमाए । यह सब हुआ सिर्फ साल भर के अंदर ।
इस पूरे प्रसंग को लिखने का उद्देश्य यह बताना था कि ई बुक्स की बढती लोकप्रियता और उसके फायदों के मद्देनजर यूरोप और अमेरिका में लेखकों ने ज्यादा लिखना शुरू कर दिया है । उनकी पहली कोशिश ये होने लगी है कि वो अधीर पाठकों की झुधा को शांत करे जो कि अपने प्रिय लेखक की कृतियां एक टच से या एक क्लिक से डाउनलोड कर पढ़ना चाहता है । ई रीडिंग और ई राइटिंग के पहले के दौर में लेखक साल में एक कृति की रचना कर लेते थे तो उसे बेहद सक्रिय लेखक माना जाता था । जॉन ग्रीशम जैसा लोकप्रिय लेखक भी साल में एक ही किताब लिखता था । पाठकों को भी साल भर अपने प्रिय लेखकों की कृति का इंतजार रहता था । पुस्तक छपने की प्रक्रिया भी वक्त लगता था । पहले लेखकों के लिखे को टाइप किया जाता था । फिर उसकी दो तीन बार प्रूफरीडिंग होती थी । कवर डिजायन होता था । ले देकर हम कह सकते हैं कि लेखन से लेकर पाठकों तक पहुंचने की प्रक्रिया में काफी वक्त लग जाता था । यह वह दौर था जब पाठकों और किताबों के बीच एक भावनात्नक रिश्ता होता था । पाठक जब एकांत में हाथ में लेकर किताब पढ़ता था तो किताब के स्पर्श से वह उस किताब के लेखक और उसके पात्रों से एक तादात्मय बना लेता था । कई बार तो लेखक पाठक के बीच का भावनात्मक रिश्ता इतना मजबूत होता था कि पाठक वर्षों तक अपने प्रिय लेखक की कृति के इंतजार में बैठा रहता था और जब उसकी कोई किताब बाजार में आती थी तो उसे वो हाथों हाथ ले ले लेता था । लेकिन वक्त बदला, स्टाइल बदला, लेखन और प्रकाशन की प्रक्रिया बदली । अब तो ई लेखन का दौर आ गया है । ई लेखन और ई पाठक के इस दौर में पाठकों की रुचि में आधारभूत बदलाव देखने को मिल रहा है । पश्चिम के देशों में पाठकों की रुचि में इस बदलाव को रेखांकित किया जा सकता है । अब तो इंटरनेट के दौर में पाठकों का लेखकों से भावनात्मक संबंध की बजाए सीधा संवाद संभव हो गया है । लेखक ऑनलाइन रहते हैं तो पाठकों के साथ बातें भी करते हैं । ट्विटर पर सवालों के जवाब देते हैं । पेसबुक पर अपना स्टेटस अपडेट करते हैं । ई एल जेम्स की सुपरहिट ट्राय़ोलॉजी तो पाठकों के संवाद और सलाह का ही नतीजा है ।

दरअसल हमारे या विश्व के अन्य देशों के समाज में जो इंटरनेट पीढ़ी सामने आ रही है उनके पास धैर्य की कमी है । कह सकते हैं कि वो सबकुछ इंस्टैंट चाहती हैं । उनको लगता है कि इंतजार का विकल्प समय की बर्बादी है । अमेजोन या किंडल पर किताबें पढ़नेवाला ये पाठक समुदाय बस एक क्लिक या एक टच पर अपने पसंदीदा लेखक की नई कृति चाहता है । इससे लेखकों पर जो दबाव बना है उसका नतीजा यह है कि बड़े से बड़ा लेखक अब साल में कई कृतियों की रचना करने लगा । कई बड़े लेखक तो साल में दर्जनभर से ज्यादा किताबें लिखने लगे । जो कि ई रीडिंग और ई राइटिंग के दौर के पहले असंभव हुआ करता था । जैम्स पैटरसन जैसे बड़े लेखकों की रचनाओं में बढ़ोतरी साफ लक्षित की जा सकती है । पिछले साल पैटरसन ने बारह किताबें लिखी और एक सहलेखक के साथ यानि कुल तेरह । एक अनुमान के मुताबिक अगर पैटरसन के लेखन की रफ्तार कायम रही तो इस साल वो तेरह किताबें अकेले लिख ले जाएंगें । पैटरसन की सालभर में इतनी किताबें बाजार में आने के बावजूद ई पाठकों और सामान्य पाठकों के बीच उनका आकर्षण कम नहीं हुआ, लोकप्रियता में इजाफा हुआ है । लेकिन जेम्स पैटरसन की इस रफ्तार से कई साथी लेखक सदमे में हैं ।
ई रीडर्स की बढ़ती तादाद का फायदा प्रकाशक भी उठाना चाहते हैं, लिहाजा वो भी लेखकों पर ज्यादा से ज्यादा लिखने का दबाव बनाते हैं । प्रकाशकों को लगता है कि जो भी लेखक इंटरनेट की दुनिया में जितना ज्यादा चर्चित होगा वो उतना ही बड़ा स्टार होगा । जिसके नाम को किताबों की दुनिया में भुनाकर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है । इसके मद्देनजर प्रकाशकों ने एक रणनीति भी बनाई हुई है । अगर किसी बड़े लेखक की कोई अहम कृति प्रकाशित होनेवाली होती है तो प्रकाशक लेखकों से आग्रह कर पुस्तक प्रकाशन के पहले ई रीडर्स के लिए छोटी छोटी कहानियां लिखवाते हैं । जो कि सिर्फ डिजिटल फॉर्मेट में बी उपलब्ध होता है । इसका फायदा यह होता है कि छोटी कहानियों की लोकप्रियता से लेखक के पक्ष में एक माहौल बनता है और उसकी आगामी कृति के लिए पाठकवर्ग में एक उत्सुकता पैदा होती है । जब वह उत्सुकता अपने चरम पर होती है तो प्रकाशक बाजार में उक्त लेखक की किताब पेश कर देता है । उत्सुकता के उस माहौल का फायदा परोक्ष रूप से प्रकाशकों को होता है और वो मालामाल हो जाता है । इसमें कुछ गलत भी नहीं है क्योंकि कारोबार करनेवाले अपने फायदे की रणनीति बनाते ही हैं ।
मशहूर और बेहद लोकप्रिय ब्रिटिश थ्रिलर लेखक ली चाइल्ड ने भी अपने उपन्यास के पहले कई छोटी छोटी कहानियां सिर्फ डिजीटल फॉर्मेट में लिखी । उन्होंने साफ तौर पर माना कि ये कहानियां वो अपने आगामी उपन्यास के लिए पाठकों के बीच एक उत्सुकता का माहौल बनाने के लिए लिख रहे हैं । तो प्रकाशक के साथ-साथ लेखक भी अब ज्यादा से ज्यादा लिखकर उस कारोबारी रणनीति का हिस्सा बन रहे हैं । चाइल्ड ने माना है कि पश्चिम की दुनिया में सभी लेखक कमोबेश ऐसा कर रहे हैं और उनके मुताबिक दौड़ में बने रहने के लिए ऐसा करना बेहद जरूरी भी है । इन स्थितियों की तुलना में अगर हम हिंदी लेखकों की बात करें तो उनमें से कई वरिष्ठ लेखकों को अब भी सोशल नेटवर्किंग साइट्स सरे परहेज है । उनकी अपनी कोई बेवसाइट नहीं है । दो-चार प्रकाशकों को छोड़ दें तो हिंदी के प्रकाशकों की भी बेवसाइट नहीं है । हिंदी के वरिष्ठ लेखक अब भी फेसबुक और ट्विटर से परहेज करते नजर आते हैं । नतीजा यह कि हिंदी में लेखकों पर अब भी पाठकों का कोई दबाव नहीं, वो अपनी रफ्तार से लेखन करते हैं । फिर रोना रोते हैं कि पाछक नहीं । वक्त के साथ अगर नहीं चलेगें तो वक्त भी आपका इंतजार नहीं करेगा और आगे निकल जाएगा । हिंदी के लेखकों के लिए चेतने का वक्त है ।

Saturday, July 7, 2012

फिडेल का फरेब ?

क्यूबा-फिडेल कास्ट्रो और अमेरिका –जॉन एफ कैनेडी – ये दो ऐसे विषय हैं जिनपर अबतक सैकड़ो किताबें लिखी जा चुकी हैं, हजारों लेख लिखे जा चुके हैं । लेकिन क्यूबा और अमेरिका में शह और मात के खेल में साठ के दशक में जो चालें चली गई हैं अब जाकर उनपर से धीरे-धीरे पर्दा हटने लगा है । अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी की हत्या पर भी सैकड़ों लेखकों ने लिखा, कई फिल्में बनीं, अपराध कथा लेखकों ने राष्ट्रपति की हत्या पर उपन्यास लिखे, टीवी निर्माताओं ने कैनेडी की हत्या और कैनेडी-कास्ट्रो संबंधों पर डॉक्यूमेंट्री बनाईं । कैनेडी की हत्या के चालीस साल बाद भी ये एक ऐसा विषय है जो अब भी लेखकों को झकझकोरते हुए चुनौती देता है । कैनेडी की मर्जर मिस्ट्री को लोग दुनिया की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री करार दे चुके हैं । नतीजा यह है कि इस विषय पर हर साल कई नई किताबें आती है जिसका लेखक शोध का दावा करते हुए कुछ नया अन्वेषण का ऐलान करता है । अब अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए में लंबे समय तक लैटिन अमेरिका मामलों के आला खुफिया अधिकारी ब्रायन लैटल की नई किताब- कास्ट्रो’ज सीक्रेट्स : द सीआईए एंड क्यूबा’ज इंटेलिजेंस मशीन- में कई सनसनीखेज खुलासे हुए हैं । ब्रायन का दावा है उन्होंने इस किताब को लिखने के लिए तकरीबन पांच साल तक शोध किया और हजारों दस्तावेज खंगाले । इसके अलावा अमेरिका और क्यूबा के खुफिया एजेंसी के अफसरों से बात की । इस किताब में लेखक का दावा है कि क्यूबा के राष्ट्रपति फिडेल कास्ट्रो को अमेरिका के राष्ट्रपति जे एफ कैनेडी के कत्ल के बारे में पता था और उन्होंने 22 नवंबर 1963 को कैनेडी के कत्ल के बाद झूठ बोला था कि उन्हें इस कत्ल की ना तो कोई जानकारी थी और ना ही आभास । कास्ट्रो ने ये बयान कैनेडी के कत्ल के एक दिन बाद दिया था जिसे उन्होंने अलग अलग जगहों पर कई बार दोहराया भी है । कास्ट्रो ने इस बात से भी इंकार किया था कि कैनेडी के कातिल ओसवाल्ड को वो जानते हैं ।

इस किताब के लेखक ब्रायन ने क्यूबा के पूर्व खुफिया अधिकारी और उसके राजदूतावास में उस वक्त तैनात रहे अफसरों के हवाले से कास्ट्रो के दोनों बयानों को झूठा ठहराया है । ब्रायन ने एक वक्त क्यूबा के डीजीआई इंटेलिजेंस सर्विस के अहम अधिकारी रहे और 1987 में क्यूबा छोड़कर अमेरिका में शरण लेनेवाले फ्लोरेन्टिनो लोम्बार्ड के हवाले से बताया है कि कास्ट्रो को कत्ल की जानकारी थी । लोम्बार्ड के मुताबिक जिस दिन कैनेडी का कत्ल हुआ उस दिन उसको आदेश मिला था कि वो अमेरिका के रेडियो तरंग को पकड़ने के लिए हवाना में लगे एंटिना का रुख मियामी से हटाकर टैक्सास की तरफ कर दें और वहां की हर छोटी बड़ी सूचना से तुरंत ही देश के सर्वोच्च नेता को अवगत कराया जाए। हुक्म देने वाले ने जोर देकर कहा था कि टैक्सास में घटित होनेवाली हर छोटी से छोटी घटना को भी नजरअंदाज नहीं किया जाए । इस हुक्म के चंद घंटों के भीतर ही टैक्सास में अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी को ओसवाल्ड ने गोलियों से भून दिया । लेखक का दावा है कि फ्लोरेन्टिनो लोम्बार्ड ने उन्हें यह भी बताया था कि कास्ट्रो को इस बात की पहले से जानकारी थी कि ओसवाल्ड कैनेडी को गोली मारेगा । इसके अलावा लैटेल ने जो दूसरा परिस्थितिजन्य सबूत पेश किया है वो यह है कि ओसवाल्ड के कैनेडी को मारने के इरादे का भी पता कास्ट्रो को था और क्यूबा का राष्ट्रपति उस शख्स को जानता भी था । कैनेडी के कत्ल के पहले ओसवाल्ड ने क्यूबा के मैक्सिको स्थित दूतावास में क्यूबा जाने के लिए वीजा का आवेदन दिया था जिसे दूतावास ने खारिज कर दिया था । वीजा खारिज होने से खफा ओसवाल्ड ने चिल्लाते हुए कहा था कि मैं कैनेडी को मारने जा रहा हूं और कास्ट्रो के समर्थन में नारे लगाए थे । ये बातें कास्ट्रो को उनके दूतावास अधिकारियों ने बताई थी । बाद में कास्ट्रो ने भी एक डबल एजेंट से हुई बातचीत में इस बात को स्वीकार भी किया था ।

इस किताब में इन दो बातों के आधार पर ये साबित करने की कोशिश की गई है कि कास्ट्रो ने कैनेडी के कत्ल की पहले से जानकारी नहीं होने के बारें में झूठ बोला था । लेकिन लेखक इस बात को लेकर बेहद सावधान हैं कि इस किताब से यह ध्वनित नहीं हो कि कैनेडी के कत्ल की साजिश रचने में कास्ट्रो की कोई प्रत्यक्ष भूमिका थी । ब्रायन ने यह स्वीकार किया है कि - उन्हें नहीं मालूम कि फिडेल कास्ट्रो ने कत्ल का हुक्म दिया था । उन्हें यह भी नहीं मालूम कि कातिल ओसवाल्ड कास्ट्रो के इशारे पर काम कर रहा था । ब्रायन के मुताबिक ये मुमकिन हो सकता है कि ओसवाल्ड कास्ट्रो के इशारे पर काम कर रहा हो लेकिन उन्हें अपने शोध के दौरान इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला । उन्होंने ये साबित करने की कोशिश की है कि फिडेल कास्ट्रो को कैनेडी से अपनी जान का खतरा था । इतिहास में इस बात के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं हैं बगैर अमेरिकी जनता की जानकारी और अमेरिकी कांग्रेस को विश्वास में लिए जॉन और रॉबर्ट कैनेडी ने आठ बार फिडेल के कत्ल की साजिश रची और आठों बार नाकाम रहे । दरअसल फिडेल कास्ट्रो की खुफिया जानकारियां और रणनीति अमेरिकी खुफिया एजेंसियों और उनकी रणीनित से बेहतर थी । इस वजह से अमेरिका तमाम कोशिशों को बावजूद क्यूबा को झुका नहीं पाया ।
लेकिन ब्रायन लैटल ने की नई किताब - कास्ट्रो’ज सीक्रेट्स : द सीआईए एंड क्यूबा’ज इंटेलिजेंस मशीन में जो बातें क्यूबा के कम्युनिस्ट नेता फिडेल कास्ट्रो के बारे में लिखी गई हैं उसका जिक्र कैनेडी हत्याकांड की जांच कर रही किसी एजेंसी ने नहीं किया । कैनेडी की हत्या की जांच करनेवाली वॉरेन कमीशन, द हाउस असेसिनेशन कमेटी और द चर्च कमेटी ने अपनी जांच के दौरान इन तथ्यों को क्यों नजरअंदाज कर दिया । यह एक बड़ा सवाल है । कैनेडी की हत्या पर अमेरिका में वर्षों से शोध हो रहे हैं।  सरकरी कमीशनों और खुफिया एजेंसियों ने इस हत्याकांड और उसे जुड़े तथ्यों को करीब पचास लाख पन्नों में दर्ज कियया है लेकिन उन पचास लाख पन्नों में इन दो तथ्यों का उल्लेख नहीं होना हैरान करनेवाला है । हो सकता है कि कई सालों बाद जब कुछ और वर्गीकृत सूचनाएं सार्वजनिक हों तो इस बात का खुलासा हो लेकिन फिलहाल ब्रायन की इस किताब ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है कि क्या कैनेडी के कत्ल के मामले में फिडेल कास्ट्रो ने झूठ बोला था ।

Saturday, June 30, 2012

लुगदी साहित्य की दुर्दशा

सूरजमुखी, प्सासी नदी, प्यासे रास्ते, पतझड़ का सावन, झील के उस पार, शर्मीली, चिंगारी, पाले खां, चैंबूर का दादा, लाल निशान, नरक का जल्लाद, पिशाच का प्यार, वर्दी वाला गुंडा ये कुछ ऐसे नाम थे जो साठ के दशक से लेकर अस्सी के दशक हिंदी पट्टी में लोकप्रियता का पैमाना हुआ करता था । ये नाम थे उन उपन्यासों के जिनको रानू, गुलशन नंदा, सुरेन्द्र मोहन पाठक और वेदप्रकाश शर्मा जैसे लेखक लिखा करते थे । इन उपन्यासों की बिक्री सबसे ज्यादा रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड के बुक स्टॉल से हुआ करती थी । उस दौर में इन किताबों की इतनी धूम रहती थी कि लेखकों को अग्रिम रॉयल्टी दी जाती थी । उपन्यासों की अग्रिम बुकिंग होती थी । कई छोटे शहरों के रेलवे स्टेशन पर तो इन उपन्यासों को छुपाकर रखा जाता था और दुकानदार अपने खास ग्राहकों को काउंटर के नीचे से निकालकर देते थे । लेकिन जब से नब्बे के दशक में टीवी ने दबे पांव लोगों के घरों में दस्तक दी तो उसका सबसे ज्यादा असर इन उपन्यासों पर ही पड़ा । धीरे धीरे टीवी ने हिंदी मध्यवर्गीय पाठकों औप परिवारों पर अपना कब्जा कर लिया और उनकी उस झुधा को शांत करने लगे जिनकी पूर्ति उक्त इपन्यास किया करते थे । कुछ चर्चित टीवी कार्यक्रमों के नाम भी इस तरह के ही होने लगे – जुर्म, हत्यारा कौन, सनसनी, सीआईडी, सास बहू और साजिश, बनेगी अपनी बात, तारा आदि । क्राइम और सेक्स की जो भूख लुगदी साहित्य से मिटती थी उसे अब टीवी पूरा करने लग गया था । लिहाजा धीरे-धीरे इस तरह के उपन्यासों की मांग कम होती चली गई और अब तो यह इंडस्ट्री मरणासन्न है ।

अगर हम थोड़ा पीछे जाएं तो हम मान सकते हैं कि हिंदी में पल्प फिक्शन की शुरुआत इब्ने सफी के उपन्यासों से हुई । इब्ने सफी, इब्ने सईद और राही मासूम रजा तीनों दोस्त थे । एक दिन बातचीत में उनके बीच जासीसी उपन्यासों पर चर्चा हो रही थी । बातों बातों में रजा ने कहा कि बगैर सेक्स का तड़का डाले जासूसी उपन्यास लोकप्रिय नहीं हो सकता है । इब्ने सफी ने इसे चुनौती के तौर पर लिया और बगैर सेक्स प्रसंग के पहला उपन्यास लिखा । वह उपन्यास जबरदस्त हिट हुआ । फिर तो इब्ने सफी ने जासूसी उपन्यासों की दुनिया में तहलका मचा दिया । इब्ने सफी के इमरान सीरीज के उपन्यासों की बदौलत उनके मित्र अली अब्बास हुसैनी ने एक प्रकाशन गृह खोल लिया । अभी कुछ दिनों पहले एक बार फिर से हॉर्पर कॉलिंस ने इब्ने सफी के उपन्यासों को प्रकाशित करना शुरू किया है । उसी वक्त के आसपास इलाहाबाद से जासूसी पंजा नाम की पत्रिका में अकरम इलाहाबादी भी एक जासूसी सीरीज लिखा करते थे जो उन दिनों बेहद लोकप्रिय था । जासूसी पंजा की लोकप्रियता के मद्देनजर डायमंड पॉकेट बु्क्स और हिंद पॉकेट बुक्स ने एक रुपए की सीरीज की किताबें छापनी शुरू की । लेकिन इस तरह के रहस्य और रोमांच से भरे कथानक वाले उपन्यासों की धूम मची साठ के दशक के बाद जब जब गुलशन नंदा, रानू, सुरेन्द्र मोहन पाठक, अनिल मोहन, कर्नल रंजीत और मनोज जैसे लेखकों ने इस साहित्य को एक नई उंचाई तक पहुंचा दिया । रानू और गुलशन नंदा तो हिंदी पट्टी के तकरीबन हर घर तक पहुंच रहे थे । रानू और गुलशन नंदा महिलाओं और नए नए जवान हुए कॉलेज छात्र-छात्राओ की पहली पसंद हुआ करते थे । गुलशन नंदा तो इतने लोकप्रियय हुए कि उनके उपन्यास- झील के उस पार, शर्मीली और चिंगारी पर फिल्म भी बनी जो हिट रही । गुलशन नंदा ने जब 1962 में अपना पहला उपन्यास लिखा तो उसकी दस हजार प्रतियां छपी । ये प्रतियां बाजार में आते ही खत्म हो गई और मांग के मद्देनजर दो लाख प्रतियां छपवानी पड़ी थी । पहले उपन्यास  की सफलता से उत्साहित प्रकाशक ने फिर तो गुलशन नंदा के उपन्यासों का पहला संस्करण ही पांच लाख का छपवाना शुरू कर दिया । जो कि ऐताहिसक आंकड़ा था । उस दौर में उन उपन्यासों की कीमत पांच रुपय़े हुआ करती थी और सारा खर्चा काटकर भी प्रकाशक को हर प्रति पर एक रुपए का मुनाफा होता था जो कि उस वक्त के लिहाज से बेहतरीन मुनाफा माना जाता था ।  इस तरह के उपन्यासों की मांग यात्राओं के दौरान बेहद ज्यादा होती थी । छोटी और लंबी यात्रा करनेवाले पांच से दस रुपए तक का यह उपन्यास खरीद लेते थे । इनकी लोकप्रियता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि सुरेन्द्र मोहन पाठक का उपन्यास पैंसठ लाख की डकैती की अबतक पच्चीस लाख से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं । भले ही चालीस साल में ये आंकड़ा हासिल हुआ हो लेकिन हिंदी के लिए यह स्थिति अकल्पनीय है । इस तरह के उपन्यासों की लोकप्रियता को देखते हुए कई घोस्ट राइटर्स ने भी पैसे की खातिर लिखना शुरू कर दिया । मनोज ऐसा ही काल्पनिक नाम था जिसकी आड़ में कई लेखक लिखा करते थे ।

जासूसी और हल्की रोमांटिक कथाओं का बड़ा बाजार बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और कुछ कुछ राजस्थान के अलावा दिल्ली और मुंबई जैसे महानगर भी थे । इन रोमांटिक उपन्यासों में जिस तरह का हल्का फुल्का सेक्स प्रसंग होता था उसने भी इन्हें लोकप्रिय बनाया ।  सा सत्तर के दशक में भारतीय समाज में सेक्स प्रसंगों को लेकर इस तरह का खुलापन नहीं था । लोग बाग घर परिवार में भी सेक्स प्रसंगों के बारे में बातें करते हुए कतराते थे । घर की लड़कियां और महिलाएं तो इस बारे में सिर्फ सोचकर ही रह जाती थी । उस माहौल में रोमांस और सेक्स प्रसंगों की चर्चा करके लेखकों ने अपनी कृतियों को पठनीय बना दिया था । कई घरों में तो किशोरवय के लड़के लड़कियां रानू और गुलशन नंदा को अपने अभिभावकों से छिपकर पढ़ते थे । उस दौर में इन उपन्यासों के लोकप्रिय होने के सामाजिक कारण थे । लेकिन जब नब्बे के दशक में टीवी आया तो रोमांस और सेक्स प्रसंगों पर सीरियल्स में खुलकर बातें होने लगी थी । इससे गुलशन नंदा और रानू के उपन्यासों के पाठक कम होने लगे । टीवी में इन प्रसंगों की जैसे जैसे बढ़ोतरी हुई वैसे वैसे पल्प फिक्शन खत्म होने लगा । दर्शक में तब्दील हो चुके पाठकों को टीवी में उपन्यास से ज्यादा मसाला मिलने लगा । सास बहू सीरियल्स के रूप में महिलाओं को एक नया स्वाद मिला और वो अपने आप को उन पात्रों से आईडेंटिफाई करने लगी । हम कह सकते हैं कि पल्प फिक्शन या लुगदी साहित्य का आखिरी लोकप्रिय उपन्यास वर्दी वाला गुंडा था । इसके लेखक वेद प्रकाश शर्मा हैं । राजीव गांधी की हत्या को केंद्र में रखकर लिखे गए इस उपन्यास के लिए उत्तर भारत के शहरों में होर्डिंग लगे थे, एडवांस बुकिंग हुई थी । नतीजा यह हुआ कि जब यह उपन्यास बाजार में आया तो आते ही खत्म हो गया । रीप्रिंट पर रीप्रिंट करने पड़े । वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों का बाजार अब भी थोडा़ बहुत बचा है । लेकिन वो स्वर्णिम दौर खत्म हो गया लगता है । इसके साथ ही खत्म हो गया मेरठ से चलनेवाला यह कारोबार । हिंदी के ये उपन्यास मेरठ से छपा करते थे और वहीं से देशभर में भेजे जाते थे । टेलीविजन ने भारत में इस लोकप्रिय विधा को लगभग समाप्त कर दिया – कई लोगों को इस बात पर आपत्ति है लेकिन तमाम आपत्तियों और तर्कों के बावजूद इतना तो तय है कि टीवी ने इनकी लोकप्रियता को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया । हाल के दिनों में जिस तरह से कुछ नए प्रकाशकों ने इन पुराने उपन्यासों को छापकर बेचने की योजना बनाई है उससे एक बार इसके फिर से जी उठने की उम्मीद जगी है । उम्मीदें कितनी कामयाब होती है यह अभी समय के गर्भ में हैं ।

Saturday, June 23, 2012

संबंधों और विमर्श की नदी

हिंदी में इन दिनों स्त्री विमर्श के नाम पर रचनाओं में जमकर अश्लीलता परोसी जा रही है । स्त्री विमर्श की आड़ में देहमुक्ति के नाम पर पुरुषों के खिलाफ बदतमीज भाषा का जमकर इस्तेमाल हो रहा है । कई लेखिकाओं को यह सुनने में अच्छा लगता है कि आपकी लेखनी तो एके 47 की तरह हैं । माना जाता है कि हिंदी में स्त्री विमर्श की शुरुआत राजेन्द्र यादव ने अपनी पत्रिका हंस में की । नब्बे के शुरुआती वर्षों में । उस वक्त विमर्श के नाम पर काफी धांय-धांय हुई थी । कई अच्छे लेख लिखे गए । कई शानदार रचनाएं आई । लंबी लंबी बहसें हुई । लेकिन कुछ साल बाद स्त्री और विमर्श दोनों अपनी अपनी अलग राह चल पड़े और उनकी जगह ले ली एक तरह की अश्लील और बदतमीज लेखन ने । शुरुआत में तो पाठकों को उस तरह का बदतमीज या अश्लील लेखन एक शॉक की तरह से लगा था जिसकी वजह से उसकी चर्चा भी हुई और लोगों को पसंद भी आई । बाद में जब हर कोई फैशन की तरह बदतमीज लेखन करने लगा तो उसकी शॉक वैल्यू खत्म हो गई और पाठकों के साथ साथ आलोचकों ने भी उस तरह से लेखन को नकारना शुरू कर दिया । सवाल भी उठे कि क्या स्त्री विमर्श का मतबल परिवार तोड़कर, परिवार छोड़कर, रिश्तों से आजादी है । क्या देहमुक्ति का मतलब अवारागर्दी है । क्या स्त्रियां देहमुक्ति के नाम पर जब चाहे जिससे चाहे शारीरिक संबंध बना लें और उसका वर्णन हमारे साहित्य का हिस्सा बन जाए । इन सवालों से टकराते हुए स्त्री विमर्श की मुहिम पर ब्रेक लगा ।

उस मुहिम पर ब्रेक भले ही लग गया हो लेकिन उस दौर में लिखने की शुरुआत कर रही कई लेखिकाओं ने स्त्री विमर्श के मूल को पकड़ा और इंटरनेट युग की युवतियों की छटपटाहट, बेचैनी, मुक्त होने की लालसा, अपनी देह की मालकिन होने की अभिलाषा, अपनी आजादी और स्वतंत्रता के लिए किसी भी हद तक जाने की जिद को अपनी रचनाओं का विषय बनाया । कुछ वरिष्ठ लेखिकाएं भी अपने तरीके से अपनी रचनाओं में स्त्री विमर्श को उठाए रही । अभी हाल ही में मैने युवा लेखिका जयश्री राय का पहला उपन्यास –औरत जो नदी है – पढ़ा । करीब डेढ सौ पन्नों के इस उपन्यास में स्त्री मन की आजादी का कोमल और संवेदनशील चित्रण है । उपन्यास की शुरुआत बेहद ही नाटकीय तरीके से होती है । नायक अशेष त्यागी एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करता है तबादले के बाद गोवा पहुंचता है । वो शादी शुदा और बाल बच्चेदार आदमी है लेकिन तबादले की वजह से पत्नी और परिवार के बगैर गोवा में मिलेज लोबो के घर उसे ठिकाना मिलता है । अकेला और आजाद । वहां उसकी मुलाकात दामिनी नाम की एक युवती से होती है । उपन्यास के शुरुआत में फोन नंबर का प्रसंग एक तिलस्म की तरह है जो धीरे-धीऱे खुलता है । बेहद दिलचस्प । दामिनी और अशेष की मुलाकात होती है और बिना प्यार में जीने मरने की कसमें खाए बगैर दोनों के बीच शारीरिक संबंध बनते हैं । जयश्री राय ने उन अंतरंग क्षणों का बेहद संवेदनशीलता के साथ वर्णन किया है बगैर अश्लील हुए । लोग तर्क दे सकते हैं कि स्त्री-पुरुष के बीच जब अंतरंग संबंध बनते हैं तो उसका जो वर्णन होगा उसमें खुलापन तो होगा । लेकिन जयश्री ने उन क्षणों का वर्णन इस तरह से किया है कि उससे जुगुप्सा नहीं बल्कि बेहतरीन गद्य को पढने का सुख मिलता है । उस वक्त लेखिका की भाषा काफी संयत लेकिन आज के जमाने के हिसाब है । प्रतीकों में तो बातें कहती है लेकिन रीतिकालीन भाषा में नहीं । गौर फर्माइये- अपने तटबंधों को गिराते हुए मुझमें किसी बाढ़ चढी नदी की तरह उफन आई थी वह । प्रेम के क्षणों में जितनी कोमल थी वह कभी-कभी उतनी ही आक्रामक भी- एक सीमा तक हिंसक ! अपनी देह पर खिले अनवरत टीसते हुए नीले फूलों को देखकर पीड़ा का ऐसा स्वाद ऐसा मधुमय भी हो सकता है, यह उसी रात महसूस कर पाया था मैं ।
इस तरह के कई प्रसंग हैं उस उपन्यास में लेकिन सभी मर्यादा में रहकर । इस उपन्यास में एक जगह इस बात का संकेत है कि अंतरंग क्षणों में स्त्रियों को कष्ट पहुंचाने से कईयों को ज्यादा आनंद की अनुभूति होती है । यहां सिर्फ संकेत मात्र है लेकिन अंग्रेजी में इस विषय पर कई उपन्यास लिखे गए हैं । अभी हाल ही में पूर्व टीवी पत्रकार ई एल जेम्स की तीन किताबें आई हैं – फिफ्टी शेड्स आफ ग्रे, फिफ्टी शेड्स डॉर्कर और फिप्टी शेड्स फ्रीड । जेम्स की इन किताबों में नायक ग्रे और नायिका एना के बीच के सेक्स संबंध को बीडीएमएस के तौर पर दिखाया गया है । यूरोप और अमेरिका में ये किताबें कई हफ्तों से बेस्ट सेलर की सूची में हैं । सेक्स प्रसंगों की वजह से कुछ आलोचकों ने तो इसे मम्मी पॉर्न का खिताब दे डाला है तो कुछ इसको वुमन इरोटिका लेखन के क्षेत्र में क्रांति की तरह देख रहे हैं । उसके पहले भी 1965 में पॉलिन रेग का उपन्यास स्टोरी ऑफ ओ आया था । स्टोरी ऑफ ओ में एक खूबसूरत पर्सियन फोटोग्राफर अपने प्रेमी के साथ सेक्स संबंधों में गुलाम की तरह का व्यवहार किया जाना पसंद करती थी । उसको लेकर उस वक्त फ्रांस में काफी बवाल मचा था और पुस्तक पर पाबंदी की मांग भी उठी थी, शायद पाबंदी लगी भी थी । लेकिन हिंदी में फीमेल इरोटिका पर अब भी पाठकों को एक बेहतरीन कृति का इंतजार है ।
जयश्री के इस उपन्यास में अशेष और दामिनी के बीच जब संबंधों की शुरुआत होती है तो अशेष उससे झूठ बोलता है कि उसका अपनी पत्नी से संबंध ठीक नहीं है आदि आदि । यह प्रसंग रोचक है । अमूमन ऐसा होता ही है । लेखिका ने उसको भी स्त्री मन से जोड़कर उसे एक उंचाई दे दी है । पत्नी से खराब संबंध की बात सुनकर दामिनी के मन में जो भाव उठते हैं उसे जयश्री नायक के मार्फत इस तरह से व्यक्त करती है- ...मैं जानता था वह मेरा होना चाह रही थी, मगर रस्म निभा रही थी- दुनियादारी की रस्म । यह जरूरी हो जाता है, ऐसे क्षणों में जब हमन किसी वर्जित क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हों, अपनी ग्लानि को कम करना जरूरी हो जाता है । दिमाग जिसे नहीं स्वीकारता, मन उसे अस्वीकार नहीं कर पाता । इस तरह से स्त्री के मन में चलनेवाले द्वंद को भी जहां मौका मिला है बेहतर तरीके से उघारा गया है । इस उपन्यास में दामिनी की मां की एक समांतर कहानी चलती है । किस तरह से दामिनी के पिता ने उसकी मां के साथ इमोशनल अत्याचर किया । वो उससे बात ही नहीं करते थे, जिसका मनोवैज्ञानिक असर जानलेवा साबित हुआ और अएक दिन उनकी मृत्यु हो जाती है । दामिनी के मन पर इस घटना का जबरदस्त प्रभाव आखिर तक बना रहता है ।

अशेष और दामिनी के बीच का प्यार चरम पर होता है उसी वक्त एक और स्त्री रेचल का प्रवेश कथा में होता है । अशेष उसके भी देहमोह में फंसता है । एक दिन रेचल के साथ रात बिताकर बिस्तर में ही होता है कि अचानक सुबह सुबह दामिनी उसके कमरे पर आ जाती है । स्त्री तो आखिर स्त्री ही होती है । जब वो पुरुष के साथ संबंध में होती है तो उसे दूसरी स्त्री बर्दाश्त नहीं होती है । दामिनी के साथ भी वही होता है । वो रेचल को बर्दाश्त नहीं कर पाती है । दोनों के संबंध दरक जाते हैं । संबंधों की उष्मा भाप बनकर उड़ जाती है । अलगाव होता है और फिर उसी तरह के ओवियस भी संवाद होते हैं । स्त्री के मन और मनोविज्ञान का भरपूर वर्णन । उपन्यास का अंत भी बेहद बोल्ड हो सकता था जहां दामिनी, अशेष और रेचल के संबंधों को सहजता से लेती और मस्त रहती । लेकिन मुमकिन है कि लेखिका पारंपरिक अंत करके स्त्री विमर्श की चौहद्दी तोड़ना नहीं चाहती । हमारे समाज में अभी लड़कियां कितनी भी बोल्ड हो जाएं पर वो जिसे प्यार करती हैं उसे दूसरी महिला के साथ बिस्तर में बर्दाश्त नहीं कर सकती ।  
उस उपन्यास में इन दो कहानियों के साथ साथ भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति और पुरुषों की मानसिकता पर भी टिप्पणी चलते रहती है । कभी दामिनी की विदेशी दोस्तों और अशेष के संवाद के रूप में तो कभी दामिनी की सहयोगी उषा की मौत के पहले के उसके बयान से । इस दौर मे जयश्री राय की भाषा से उपन्यास का कथ्य चमक उठता है । भाषा इस उपन्यास की ताकत है जब जयश्री लिखती हैं- सूरज का सिंदूर समंदर के सीने में उतरकर न जाने कब एकदम से घुल गया । जयश्री राय के इस उपन्यास की आने वाले दिनों में हिंदी साहित्य में चर्चा होनी चाहिए और आलोचकों और पाठकों के बीच जयश्री के उठाए सवालों पर बहस भी ।

Wednesday, June 20, 2012

इतिहास का ड्राफ्ट

दो हजार में जब बिहार से अलग हटकर झारखंड राज्य अस्तित्व में आया था उस वक्त उम्मीद जगी थी कि इलाके के आदिवासियों का समुचित विकास होगा और उनकी समस्याओं पर बेहतर तरीके से ध्यान दिया जाएगा । लेकिन पिछले एक दशक में झारखंड विकास के बजाए लूट की उर्वर भूमि में तब्दील हो चुकी है । राज्य के नेताओं में सत्ता की भूख इतनी ज्यादा है कि वो किसी भी पार्टी से हाथ मिलाने को तैयार हैं बशर्तें कि उनके समर्थन से सरकार बन सके । चाल चरित्र और चेहरा के अलावा सार्वजनिक जीवन में शुचिता की बात करनेवाली भारतीय जनता पार्टी भी झारखंड में सत्ता के लिए कई बार नापाक गठजोड़ कर चुकी है । सूबे में प्राकृतिक संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं । इस वजह से बड़े औद्योगिक घरानों की नजर वहां लगी रहती है । औद्योगिक घरानों की इस नजर में ही राजनेताओं को संभावनाएं दिखाई देती हैं । आदिवासियों की राजनीति करनेवाले नेताओं को हवस है सिर्फ पैसे की । इसी हवस ने राज्य के एक पूर्व मुख्यमंत्री और कई मंत्रियों को जेल भिजवाया और कई तो जेल जाने की लाइन में लगे हैं । प्रदेश का राजनैतिक नेतृत्व का इस कदर नैतिक पतन हो चुका है कि वहां सरेआम घूस लेने देने की बात होती है । एक पार्टी के मुखिया तो खुलेआम अफसरों से कहते हैं कि वैसी फाइल ढूंढो जिससे पैसे निकल सकें । इन हालातो में मीडिया की जिम्मेदारी बनती थी कि घोटालों, घपलों और राजनेताओं के चेहरे से नकाब उजागर करे । झारखंड में इस भूमिका को वहां से एक छोटे से अखबार(हरिवंश जी के शब्द) प्रभात खबर ने बखूबी निभाया । झारखंड बनने के दस साल पहले और झारखंड बनने के दस साल बाद वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश की अगुवाई में प्रभात खबर ने कई घपलों –घोटालों को उजागर किया । खुद हरिवंश ने कई विचारोत्तजक लेख लिखकर झारखंड के इतिहास में अपनी जोरदार तरीके से अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई । उनके करीब दो दशकों के लेखों का संग्रह दो खंडो में प्रकाशित हुआ है । पहले खंड- झारखंड-समय और सवाल में 48 लेख हैं जो 1991 से 2007 के बीच लिखे गए हैं । दूसरे खंड झारखंड-सपने और यथार्थ में 2007 के बाद के लेख हैं । अपनी किताब की भूमिका में हरिवंश ने चर्चिल को कोट करते हुए लिखा है कि- अतीत को जितना पीछे तक देख सकते हैं, देखें । इससे भविष्य की दृष्टि (विजन) मिलेगी । हरिवंश जी ने पहले खंड में झारखंड के एक दशक के अतीत को एक सावधान संपादक की आंखों से देखा है । हरिवंश जी अपने अखबार में उन मुद्दों को उठाने के लिए जाने जाते हैं जो समाज से जुड़े हर तबके के लोगों के मुद्दे हों । हो सकता है शुरू में ये मुद्दे स्थानीय और लोकल लेवल के लगते हों लेकिन बाद में वही मुद्दे राष्ट्रीय महत्व के हो जाते हैं । अपनी किताब की भूमिका में हरिवंश ने माना है कि उनकी पत्रकारिता जंगल जल और जमीन जुड़ी रही है और वो इन मुद्दों को उठाते रहे हैं । इन लेखों से यह साबित भी होता है । किताब का पहला ही लेख पलामू अकाल सं संदर्भ लेते हुए गुमला के गुमनाम से प्रखंड बिशुनपुर फैली बीमारी के बहाने हरिवंश ने बेहद बारीक तरीके से सरकारी व्यवस्था की खामियों पर चोट किया है । जैसे जब वो लिखते हैं कि 25 हजार की दवाइयां बांटने के लिए तीन लाख का अमला नियुक्त किया गया है । उनके मुताबिक उस अंचल में पांच स्वास्थ्य केंद्र हैं जहां प्रतिवर्ष पांच हजार की दवाइयां आती हैं यानि कि पांचों उपकेंद्र मिलाकर पच्चीस हजार की दवाइयां । लेकिन उन दवाइयों को बांटने के लिए एक एमबीसीएस डॉक्टर समेत वहां साठ लोग तैनात हैं जिनके वेतन आदि पर प्रतिवर्ष तीन लाख रुपए का खर्च होता है । सिर्फ एक अंचल का उदाहरण देकर हरिवंश ने पूरे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की खामियों की ओर संकेत किया है । आज भी अगर स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र का ऑडिट किया जाए तो इस तरह की कई विसंगतियां सामने आ सकती हैं । बल्कि मेरा तो मानना है कि राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति और भी बुरी हो सकती है ।
अपनी किताब की भूमिका में हरिवंश जी ने कहा है जब 1992-93 में प्रभात खबर ने पशुपालन घोटाला का मुद्दा उठाया तब प्रभात खबर सिर्फ रांची से छपता था । लेकिन बाद में उसी पशुपालन घोटाला ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया था । बिहार के मुख्यमंत्री लालू यादव समेत पूर्व मुख्यमंत्री और कई मंत्रियों के अलावा बड़े अफसरशाह इस गोटाले में नपे । लालू को तो जेल भी जाना पड़ा, बिहार पर बीस साल राज करना का लालू का सपना चकनाचूर हो गया । लालू के सपने में प्रभात खबर की पत्रकारिता ने ही पलीता लगया, ऐसा कहा जा सकता है । दरअसल जब प्रबात खबर रांची से निकलता था तब भी उसकी एक जुजारू छवि थी और लोग मानते थे कि वो अखबार मुद्दों को प्रधानता देता है, इसका श्रेय अखबार की टीम के कप्तान को जाता है कि वो अखबार को किस दिशा में ले जाना चाहता है ।
हरिवंश के लेखों की भाषा और उसके शीर्षक बेहद मारक होते हैं । जैसे इस किताब में एक लेख है- जिसका शीर्षक है – चरित्रहीन पार्टियां, ब्लैकमेलर विधायक, ‘रंगबाज मंत्री’ और असहाय झारखंड । अब इस शीर्षक से ही पूरी कहानी साफ हो जाती है कि लेखक क्या कहना चाहता है । झारखंड की पतनशील राजनीति का जो समीकरण सात सितंबर 2006 के लेख में हरिवंश ने खींचा है वो है- झूठ + प्रपंच + छल + षडयंत्र + तिकड़म  । हरिवंश इसको राजनीति का नया समीकरण कहते हैं लेकिन उनसे थोड़ा सा आगे जाने की धृष्टता करते हुए मन करता है कि उनके समीकरण झूठ + प्रपंच + छल + षडयंत्र + तिकड़म में भ्रष्टाचार जोड़कर = सत्ता कर दूं तो वो और मौजूं हो जाएगा । अपने लेखों मे हरिवंश अंग्रेजी के शब्दों का इस तरह से इस्तेमाल करते हैं कि वो और भी मारक हो जाता है । अंग्रेजी के शब्दों के अलावा हरिवंश  खांटी देशज शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उसे और भी स्वीकार्य बना देते हैं । जैसे हम शर्मिंदा है कि आप विधायक हैं शीर्षक लेख में हरिवंश ने लिखा है – झारखंड में लोकतंत्र अविश्वसनीय बन जाए, इसके लिए हमारे विधायक खूब खट रहे हैं । अब ये जो शब्द खट है वो खांटी देशड शब्द है, स्थानीय स्तर पर बोली जाती है । इसता मतलब है मेहनत करना । लेकिन अपने वाक्य में खट का इस्तेमाल कर हरिवंश के तंज का दंश गहरा गया है । उसी तरह से झारखंड के चुनाव पर एल लेख सबसे गरीब जनता, सबसे अमीर विधायक वाले लेख में भी हरिवंश की भाषा बेहद मारक है । एक जगह विधायकों के बारे में लिखते हैं- इस तरह परफॉरमेंस में सिफर, पर सुविधाओं में सबसे आगे । तंज कसते हुए गंभीर बातें कह देने की जो कला हरिवंश में है उस बाद की पीढ़ी के पत्रकारों को एक सीख देती है ।
हरिवंश की ये दोनों किताबें झारखंड के दो दशक का राजनीतिक घटनाक्रमों का इतिहास है, जिनके लेखों से घझारखंड की कड़वी सचाई सामने आती है  । हलांकि हरिवंश ने भूमिका में लिखा है कि पत्रकारिता को इतिहास का पहला ड्राप्ट कहा जाता है । पर इस पुस्तक में सामाजिक इतिहास बताने या दर्ज करने का मकसद नहीं । पर कौन सी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांसकृतित धाराएं और उपधाराएं इस दौर को प्रबावित कर रही हैं और राज्य व देश की राजनीति को भविष्य में प्रभावित करेंगी, उन्हें रेखांकित और उजागर करने की कोशिश है । झारखंड-दिसुम मुक्तिगाथा और सृजन के सपने, जोहार झारखंड, जमसरोकार की पत्रकारिता समते कई अन्य पुस्तकों के लेखक हरिवंश की प्रतिष्ठा में ये दोनों किताबें तो इजाफा करती ही हैं, झारखंड के समय समाज और राजनीति की समझ को विकसित करने में पाठकों को एक नई और याथार्थपरक दृष्टि भी देती है ।