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Saturday, August 26, 2023

फिल्म पुरस्कारों पर अकारण विवाद


कुछ दिनों पूर्व राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा हुई। आमतौर पर प्रतिवर्ष कुछ विघ्नसंतोषी किस्म के लोग राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा पर विवाद उठाने का प्रयास करत रहे हैं। कभी किसी नाम को लेकर तो कभी किसी फिल्म के चयन को लेकर। 2021 के लिए घोषित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में फिल्म मिमी के अभिनेता पंकज त्रिपाठी को सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता और कृति सैनन को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का साझा पुरस्कार देने की घोषणा की गई। कुछ लोगों ने इस फिल्म के कलाकारों को पुरस्कृत करने पर इस आधार पर प्रश्न खड़ा किया कि किसी रीमेक फिल्म को कैसे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिया जा सकता है। फिल्म मिमी मराठी फिल्म मला आई व्हायचंय का रीमेक है। मिमी को पुरस्कार पर प्रश्न खड़ा करनेवालों को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की नियमावली देखनी चाहिए। अगर रीमेक को पुरस्कार नहीं देने का नियम होता तो संजय लीला भंसाली की शाह रुख खान अभिनीत देवदास को पांच राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार कैसे मिल पाते। जब देवदास प्रदर्शित होनेवाली थी तब ये प्रचारित किया गया था कि ये फिल्म तीसरा रीमेक है। होता ये है कि अज्ञानतावश कई बार आलोचना आरंभ हो जाती है। इंटरनेट मीडिया के इस दौर में तथ्यों को परखने की या उस तक पहुंचने का समय कम लोगों के पास होता है। झटपट लिख कर पहले पोस्ट करने की हड़बड़ी होती है। किसी एक ने लिख दिया और फिर उससे जुड़े लोग उसी लिखे को लेकर शोरगुल मचाने लग जाते हैं। आलोचना बहुत सावधानी से किया जाना वाला कार्य है। होना यह चाहिए कि पूरी तरह से तथ्यों को परखने के बाद ही अपने मत को सार्वजनिक करना चाहिए, अन्यथा जानकारों के बीच आलोचना करनेवाले उपहास के पात्र बन जाते हैं।

हाल ही में घोषित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में फिल्म द कश्मीर फाइल्स को राष्ट्रीय एकता के लिए सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का पुरस्कार देने की घोषणा की गई। इस घोषणा के बाद कांग्रेस ने इसका विरोध किया। कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता ने ट्वीट करके कहा कि ‘एक ऐसी फिल्म जिसने लोगों के बीच विषाक्त माहौल बनाया, जिसने एक समुदाय विशेष को टारगेट किया, जिसने ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ा मरोड़ा, कहानी का सिर्फ एक विद्रूप पक्ष दिखाया, जिसका एकमात्र उद्देश्य सिर्फ वैमनस्यता फैलाना और शांति भंग करना था, उस फिल्म ‘कश्मीर फाइल्स’ को राष्ट्रीय एकता के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया है।‘ लंबी प्रतिक्रिया में आगे कहा गया कि ‘ऐसी फिल्म, जिसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर ‘वल्गर और प्रोपेगैंडा’ कहा गया, जिसके निर्माता लगातार जहर उगलते हैं और अगर आप उनसे असहमत हैं तो जाहिलियत करने पर उतारू हो जाते हैं...अगर लोगों का जख्म कुरेद कर, लोगों पर बीती त्रासदी को भुनाकर पैसा कमाने की प्यास नहीं बुझी, तो उस फ़िल्म को पुरस्कार देकर कश्मीरियों के घावों पर नमक छिड़क दिया गया है। राष्ट्रीय पुरस्कारों की जूरी पर एक नज़र डालने से ही पता चल जाता है कि ‘कश्मीर फाइल्स’ जैसी विकृत फिल्म को क्यों पुरस्कृत किया गया है! उन्माद और नफ़रत की इस आग को भड़काने के लिए कोई हथकंडा नहीं छोड़ेगी यह सरकार।‘ 

 द कश्मीर फाइल्स पर कांग्रेस की इस प्रतिक्रिया में स्पष्ट रूप से राजनीति दिखाई देती है। प्रतिक्रिया के अंत में इसको उन्माद और नफरत की आग को भड़काने वाला सरकार का कदम बताया गया। शायद कांग्रेस पार्टी को ये नहीं मालूम हो कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के लिए फिल्मों का चयन एक जूरी स्वतंत्र रूप से करती है। फिल्मों को पुरस्कृत करने के लिए चयन का कार्य दो स्तरों पर किया जाता है जिसमें सरकार का कोई दखल नहीं होता है। ये मेरा अनुभ भी है। द कश्मीर फाइल्स को वैमनस्यता फैलाने और शांति भंग करनेवाला बताया गया है। द कश्मीर फाइल्स को लेकर कहां शांति भंग हुई या कहां वैमनस्यता फैली ये ज्ञात नहीं हो सका। पूरी दुनिया में इस तरह की फिल्में पहले भी बनती रही हैं और उसपर विमर्श भी होते रहे हैं। नाइट एंड फाग से लेकर सिंडलर्स लिस्ट से लेकर पियानिस्ट तक। यह सूची बहुत लंबी है। द कश्मीर फाइल्स ने कश्मीर के इतिहास की एक बेहद भयानक और क्रूरतापूर्ण घटना को देश की जनता के सामने रखा। एक ऐसी घटना जिसमें हिंदुओं के साथ बर्बरतापूर्ण अत्याचार हुआ था। यह स्वाधीन भारत के इतिहास का वो काला अध्याय है जिसको भूलना संभव नहीं है। जब यह फिल्म रिलीज हुई थी तो इसको देखे बगैर लोगों ने इसपर टिप्पणियां की थीं। इसके निर्माताओं का दावा है कि इसमें किसी घटना को फिक्शनलाइज नहीं किया गया है। खैर इसपर बात करने का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि इस फिल्म के कंटेंट को लेकर पूर्व में काफी बातें हो चुकी हैं। 

एक और आरोप जो कांग्रेस प्रवक्ता ने अपनी प्रतिक्रिया में जड़ा वो कि जूरी पर नजर डालने से पता चल जाता है कि इस तरह की विकृत फिल्म को क्यों पुरस्कृत किया गया। 2021 के लिए घोषित फीचर फिल्मों की जूरी के अध्यक्ष केतन मेहता हैं। केतन मेहता की विचारधारा क्या रही है ये सबको ज्ञात है। मिर्च मसाला से लेकर माया मेमसाब, टोबा टेक सिंह, मंगल पांडे, मांझी द माउंटेनमैन जैसी फिल्मों से जुड़े केतन मेहता दक्षिणपंथी या सरकार समर्थक फिल्मकार नहीं माने जाते हैं। वो फिल्म निर्देशक अनुभव सिन्हा जैसे वर्तमान सरकार के आलोचक के साथ काम कर चुके हैं। हिंदी फिल्मों की दुनिया में केतन मेहता को लिबरल फिल्मकार माना जाता है जिसकी आत्मा वाम की ओर झुकी हुई है। कम से कम हिंदी फिल्मों के जो लोग उनके साथ सार्वजनिक रूप से दिखते हैं वो मोदी सरकार के समर्थक तो नहीं हैं। केतन मेहता का फिल्मों में काम करने का वृहद अनुभव है। वो फिल्म और टेलीविजन संस्थान से प्रशिक्षित हैं। हर तरह की फिल्में बनाई हैं। उनकी अध्यक्षता में जूरी ने द कश्मीर फाइल्स को राष्ट्रीय एकता के लिए सर्वश्रेष्ठ फिल्म चुनने का निर्णय लिया है। ऐसे व्यक्ति को जूरी का चैयरमैन बनाकर सरकार ने अपनी निष्पक्षता का परिचय दिया लेकिन कांग्रेस उनके विवेक और चयन पर प्रश्न खड़ा कर रही है। कहा जा रहा है कि जूरी पर नजर डालने से विकृत चयन का पता चल रहा है। 

रही बात अतीत के जख्मों को कुरेदने की तो अंग्रेजी के एक विख्यात लेखक ने कहा था कि अतीत आपके भविष्य को परिभाषित तो नहीं करता लेकिन आपके भविष्य निर्माण में उसकी अहम भूमिका होती है। अगर इस लिहाज से देखें तो द कश्मीर फाइल्स ने कश्मीरी हिंदुओं पर हुए अमानवीय कृत्यों को आज की पीढ़ी के सामने लाने का जो प्रयास किया है, उसको रेखांकित किया जाना चाहिए। द कश्मीर फाइल्स को जिस इजरायली फिल्मकार ने प्रोपगैंडा फिल्म कहा था उसको भी भारत सरकार ने ही गोवा में आयोजित होनेवाले अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल की जूरी में नामित किया था। उसपर भी काफी बातें हो चुकी हैं इससलिए उसको दोहराने का कोई अर्थ नहीं है। अगर समग्रता में कांग्रेस की द कश्मीर फाइल्स को मिले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की टिप्पणी को देखा जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि पार्टी इसपर राजनीति कर रही है। राजनीतिक दल होने के नाते यह उनका धर्म भी है लेकिन सिनेमा को राजनीति का औजार बनाने के बचना चाहिए था। साहित्य और कला में राजनीति के घालमेल से हिंदी साहित्य का अधिकतर सृजनात्मक लेखन एकांगी हो गया है। पिछले आठ नौ सालों से राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों और गोवा में आयोजित होनेवाले अंतराष्ट्रीय फिल्म उत्सव को विवादित करने का भरपूर प्रयत्न किया जाता रहा है। एस दुर्गा फिल्म के प्रदर्शन को लेकर विवाद हो या विनोद खन्ना को दादा साहब फाल्के पुरस्कार देने का मसला हो, विवादजीवी सक्रिय होते ही रहते हैं। स्वस्थ आलोचना विधा को समृद्ध करती है जबकि आधारहीन आलोचना से विधा के कुम्हलाने का डर होता है। 


Tuesday, August 22, 2023

लकीरों में मिलना था


कोयंबटूर में आजाद फिल्म की शूटिंग चल रही थी। संभवत: 1954 की बात है। दिलीप कुमार शूटिंग के सिलसिले में वहां थे। उनसे मिलने जेमिनी स्टूडियो के एस एस वासन साहब पहुंचे। उस दौर में दिलीप कुमार की आशिकी के चर्चे फिल्मी पत्रिकाओँ में खूब छपा करते थे। उनकी उम्र 32 साल हो चुकी थी लेकिन शादी नहीं हुई थी। वासन ने उनसे कहा कि चलो एक ज्योतिष के पास चलते हैं और उनसे पूछते हैं। दोनों ज्योतिष के पास पहुंचे। ज्योतिष ने दिलीप कुमार की एक कुंडली बनाई और फिर उनके करियर और परिवार के बारे में बताने लग गए। दिलीप कुमार ज्योतिष की बातें सुनकर चकित थे। अचानक वासन साहब ने ज्योतिष से कहा कि ये बताइए की इनकी शादी कब होगी। ज्योतिष थोड़ी देर चुप रहे, दिलीप कुमार के चेहरे को देखा, फिर हथेली की लकीरों को और कहा कि इनकी शादी चालीस वर्ष की उम्र पार करने के बाद होगी और लड़की इनसे आधी उम्र की होगी। ज्योतिष ने ये भी भविष्यवाणी की थी कि वो फिल्म इंडस्ट्री से होगी। ये सुनकर दिलीप कुमार ने जोरदार ठहाका लगाया और कहा कि इंडस्ट्री की लड़की से तो वो कभी शादी नहीं करेंगे। बात आई गई हो गई लंबा अरसा बीत गया। एक दिन नसीम बानो ने दिलीप कुमार को फोन करके सायरा बानो की जन्मदिन पार्टी में आने का न्योता दिया। दिलीप साहब जन्मदिन की पार्टी में पहुंचे और सायरा को देखते ही दिल दे बैठे। इसके पहले वो सायरा को बच्ची समझते थे और लगातार उनके साथ फिल्म में काम करने से मना कर रहे थे।  उधर सायरा के दिल में उनके लिए प्रेम अंकुरित होकर बढ़ने लगा था। सायरा बानो बेहद साफ बोलनेवाली महिला हैं। जब दिलीप कुमार ने समंदर किनारे उनको प्रपोज किया था और शादी की बात की थी तब भी सायरा ने उनसे पूछ लिया था कि शादी की बात वो कितनी लड़कियों से कर चुके हैं। जल्द ही दोनों का विवाह गो गया। जब विवाह हो रहा था तो दिलीप कुमार को अचानक कोयंबटूर के ज्योतिष की बात याद आ गई थी। 

विदेश में पढ़ी लिखी और संपन्न परिवार की लड़की सायरा जब शादी करके ससुराल आई थी तो उसको अपनी ननदों के तानों का सामना करना पड़ा था लेकिन वो घर को जोड़े रही थीं। उस समय तक वो बेहद सफल और लोकप्रिय अभिनेत्री हो चुकी थी। देव आनंद, राजकपूर, राजेन्द्र कुमार आदि के साथ उनकी फिल्में सिनेमाघरों में धूम मचा चुकी थीं लेकिन ये दिलीप कुमार की बहनों की समज में नहीं आ रही थी और वो सायरा को लगातार तंग करते थे। दिलीप कुमार चाहते थे कि अलग घर लेकर रहें लेकिन सायरा चाहती थीं कि परिवार एक साथ रहे। और ऐसा ही हुआ भी। दिलीप कुमार की एक बहन थी अख्तर। उसने के आसिफ से विवाह कर लिया था जिससे नाराज दिलीप कुमार ने उनसे संबंध तोड़ लिए थे। एक दिन दोपहर को अस्पताल से फोन आया कि अख्तर बहुत बीमार है और अपने भाई से मिलना चाहती है। फोन सायरा ने उठाया था। उसने दिलीप कुमार को सारी बातें बताईं और बहन से मिलने का अनुरोध किया। तबतक के आसिफ का भी निधन हो चुका था। दिलीप कुमार ने बहुत बेरुखी से मना कर दिया और कहा मेरे लिए अख्तर मर चुकी है। दो घंटे तक सायरा बानो दिलीप कुमार को मनाती रही और आखिरकार अपने साथ उनको लेकर अस्पताल पहुंची। भाई बहन को मिलवाया। बाद में अख्तर और सायरा अच्छी दोस्त बन गईं। सायरा बानो के व्यक्तित्व के इस पक्ष पर चर्चा कम होती है। वो जितनी ग्लैमरस और लोकप्रिय अभिनेत्री थीं उतनी ही सहज और पारिवारिक संबंधों को निभाने वाली महिला हैं। सायरा बानो ने दिलीप कुमार से न केवल टूटकर प्रेम किया बल्कि उनकी पत्नी होने की सभी जिम्मेदारियों को भी बखूबी निभाया। आज वो एक सफल अभिनेत्री और बेहतर इंसान के तौर पर हिंदी फिल्म जगत में समादृत हैं। 

Saturday, August 19, 2023

हिंदी फिल्मों में साम्यवादी षडयंत्र


पिछले कई वर्षों से देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू चर्चा में हैं। नेहरू के व्यक्तित्व और कृतित्व के विभिन्न आयामों और पहलुओं को लेकर विमर्श चलता रहता है। एक तरफ उनको आधुनिक भारत का निर्माता बताया जाता है तो दूसरी तरफ विभाजन के समय के उनकी भूमिका से लेकर देश में कला जगत पर सोवियत रूस के प्रभाव को गहरा करने के लिए वातावरण बनाने का आरोप भी लगता है। नेहरू पर कम्युनिज्म का प्रभाव था ये बात वो स्वीकार भी करते थे। स्वाधीनता के बाद देश के प्रधानमंत्री बनने के बाद के निर्णयों में इसकी छाप भी दिखाई देती थी। कुछ दिनों पहले एक वेब सीरीज आई थी जुबली जिसमें हिंदी सिनेमा पर कम्युनिस्टों के प्रभाव की ओर इशारा किया गया था। इस वेब सीरीज के रिलीज के समय इस बात की चर्चा भी हुई थी कि किस तरह से 1952 में उस वक्त के सूचना और प्रसारण मंत्री ने आकाशवाणी पर हिंदी गानों के प्रसारण पर रोक लगा दी थी। तर्क ये दिया गया था कि गाने भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है। उस समय रूसियों का भी यही तर्क होता था। कहना न होगा कि स्वाधीनता के बाद जब भारत एक राष्ट्र के रूप में हर क्षेत्र में अपने को शक्तिशाली बनाने का प्रयास कर रहा था उस समय हिंदी सिनेमा पर रूसियों के प्रभाव को बढ़ाने में तत्कालीन सरकार ने जमीन उपलब्ध करवाई । हाल ही में प्रख्यात अभिनेता देवानंद के शताब्दी वर्ष पर कुछ शोध करने के क्रम में उनकी आत्मकथा रोमासिंग विद लाइफ को दूसरी बार पढ़ा। पहली बार जब पढ़ा था तो उसमें वर्णित कुछ प्रसंगों की ओर ध्यान नहीं गया था। जब दूसरी बार पढ़ रहा था तो वेब सीरीज जुबली के कई संवाद और दृष्य अवचेतन में थे। 

देवानंद ने अपनी आत्मकथा के अट्ठाइसवें और उनतीसवें अध्याय में विस्तार से तत्कालीन सोवियत संघ की यात्रा का वर्णन किया है। इस वर्णन में कई ऐसे सूत्र हैं जिससे ये स्पष्ट होता है कि उस समय की सरकार कैसे कम्युनिस्टों के एजेंडे को बढ़ाने में मदद कर रही थी। बात 1954 की है जब सोवियत संघ ने दूसरे देश के लोगों को अपने यहां आने की अनुमति दी थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ ने अपनी सीमाएं दूसरे देश के नागरिकों के लिए बंद कर रखी थीं। जब सोवियत संघ ने अपनी सीमाएं खोलीं तब भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने हिंदी सिनेमा से जुड़े अभिनेताओं, अभिनेत्री और लेखकों को वहां भेजने का निर्णय लिया। देवानंद ने लिखा है कि इस यात्रा पर जाने के लिए प्रतिनिधि मंडल के सदस्यों के चयन और नेतृत्व का दायित्व ख्वाजा अहमद अब्बास को सौंपा गया क्योंकि उनकी विचारधारा वामपंथी थी। इसका अर्थ ये हुआ कि मनेहरू सरकार के समय संस्कृति मंत्रालय इस तरह के दायित्व विचारधारा के आधार पर दिया करती थी। खव्जा अहमद अब्बास ने बलराज साहनी, बिमल राय, राज कपूर, नर्गिसस, देव आनंद, चेतन आनंद और ऋषिकेश मुखर्जी का चयन किया। नाम को देखकर अंदाज लगाया जा सकता है कि ख्वाजा अहमद अब्बास ने जिन कलाकारों का चयन किया, उनकी विचारधारा क्या थी या उनका झुकाव किस विचारधारा की ओर था। हिंदी फिल्मों से जुड़े ये कलाकार पहले जेनेवा पहुंचे और वहां से चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग। उस वक्त चेकोस्लोवाकिया में कम्युनिस्टों का शासन था। जेनेवा में रुकने के दौरान ये लोग मशहूर अमेरिकी कलाकार चार्ली चैपलिन से भी मिले थे। वो उन दिनों अमेरिका से देश निकाला झेल रहे थे और जेनेवा से थोड़ी दूर एक स्थान पर रह रहे थे। प्राग में प्रतिनिधिमंडल का स्वागत चेकोस्लोवाकिया के अफसर और दुभाषिया ने किया था। 

देवानंद ने लिखा है कि ऐसा लग रहा था कि प्रतिनिधिमंडल की हर गतिविधि पर लगातार नजर रखी जा रही थी। प्राग से इन सबको मास्को तक पहुंचाने के लिए सोवियत संघ के एक विशेष विमान की व्यवस्था की गई थी। ये लोग इतने महत्वपूर्ण थे कि इनके लिए एक विशेष विमान आया। इनको किस किस तरह से प्रभावित किया जा रहा था इसका विस्तार से वर्णन देवानंद ने किया है। ख्वाजा अहमद अब्बास निर्देशित फिल्म राही और अन्य हिंदी फिल्मों को सोवियत संघ की विभिन्न भाषाओं में डब किया गया था। सबके आठ सौ प्रिंट निकलवा कर पूरे सोवियत संघ में रिलिज की गई थी। देवानंद कहते हैं कि इस तरह की व्यवस्था सिर्फ सरकारी नियंत्रण वाले समाज में ही संभव थी। प्रतिनिधिमंडल का दौरा छह सप्ताह का था। उसके प्रत्येक सदस्य को सोवियत संघ के किसी भी शहर में घूमने जाने का विकल्प दिया गया था जिसकी सारी व्यवस्था सोवियत सरकार कर रही थी। सारी व्यवस्था थी, आतिथ्य में किसी प्रकार की कमी नहीं थी लेकिन किसी भी कलाकार को कहीं भी अकेले घूमने जाने की छूट नहीं दी गई थी। इन कलाकारों के सम्मान में हर दिन पार्टियां होती थीं जिनमें बैले नृत्य और वोडका से स्वागत किया जाता था। लेकिन किसी भी कलाकार को रूसियों से निकटता बढ़ाने की छूट नहीं थी। देवानंद ने एक पार्टी का उल्लेख किया है जिसमें दो बेहद खूबसूरत लड़कियां उनके साथ नृत्य कर रही थीं और वो इंटिमेट हो रही थीं। अचानक दोनों गायब हो गईं । देवानंद ने खोजने की कोशिश की लेकिन पता ही नहीं चला और पूरे दौरे के दौरान वो दोनों फिर कहीं नहीं दिखीं। इसी तरह से वो बताते हैं कि लोग फिल्मी सितारों के साथ दोस्ती बढ़ाना चाहते थे लेकिन उनको ऐसा नहीं करने दिया जाता था। देवानंद ने अपनी आत्मकथा में सवाल उठाया कि कहीं उनपर नजर रखनेवाले केजीबी के एजेंट तो नहीं थे। 

पूरे प्रसंग से एक बात तो स्पष्ट है कि उस समय की भारत सरकार अपने कलाकारों को सोवियत रूस भेजकर उनको वामपंथ के प्रभाव में आने का मार्ग प्रशस्त कर रही थी। ये वही दौर था जब हिंदी फिल्मों पर साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव बढ़ा। गरीबों- मजदूरों के अधिकारों को लेकर धड़ाधड़ फिल्में बन रही थीं। उनको सोवियत रूस के विभिन्न सिनेमाघरों में वहां की विभिन्न भाषाओं में डब करके दिखाया जा रहा था। सोवियत संघ के विभिन्न शहरों में हिंदी फिल्मों के लिए फिल्म फेस्टिवल आयोजित किए जाने लगे थे। सोवियत संघ के निर्माता और हिंदी फिल्मों के निर्माताओं के बीच साझेदारी बढ़ने लगी थी। इन सबसे होनेवाला मुनाफा हिंदी फिल्मों के निर्माताओं के साथ साझा किया जाता था। हिंदी फिल्मों के माध्यम से साम्यवादी विचारधारा को मजबूत करने का ये उपक्रम प्रतीत होता है। उस दौर के हिंदी गीतों और संवादों में साम्यवादी विचारधारा स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। पूंजीपति वर्ग को शोषक और गरीब को शोषित दिखाने की परंपरा ने स्वाधीनता के बाद ही जोर पकड़ा था। जमींदार है तो वो बुरा ही होगा ये लगभग हर हिंदी फिल्म का केंद्रीय थीम होने लगा था। पूंजीवादी व्यवस्था के कथित दुर्गुणों को फिल्मों में प्रमुखता से दिखाकर भारतीय जनमानस पर साम्यवादी विचारधारा को थोपने का प्रयास किया जा रहा था। 

उस समय भारत सरकार के मुखिया नेहरू के मन में साम्यवाद को लेकर एक आकर्षण था इसलिए इस प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता रहा, सरकारी संरक्षण भी। इसी दौर में भारतीय जन नाट्य संघ से जुड़े लोग हिंदी फिल्मों में प्रमुख स्थान पाने लगे। गीतकार और कहानीकार भी पूंजीपति बनाम आम जनता की कहानी लिखने लगे थे। उस समय ऐसी फिल्मों को सोवियत संघ में बाजार मिल जाता था। सोवियत संघ में उस समय वहां के संस्कृति मंत्रालय के नियंत्रण में फिल्में बनती थीं जिसमें विचारधारा होती थी। ऐसे में भारत से साम्यवादी विचार वाली फिल्में जिनमें मनोरंजनभी होता था वहां के दर्शकों को पसंद आने लगा था। समग्रता में इसपर विचार करें तो ये निष्कर्ष निकलता है कि स्वाधीनता के बाद नेहरू सरकार की सरपरस्ती में फिल्मों में साम्यवादी विचार फले फूले। 


Saturday, August 12, 2023

नेहरू रिपोर्ट और विभाजन की पृष्ठभूमि


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनाने का आह्वान देश की जनता से किया था। इस दिवस को भारत सरकार ने गजट में नोटिफाई किया था और कहा था कि भारत की वर्तमान और भावी पीढ़ियों को विभाजन के दौरान लोगों द्वारा सही गई यातना और वेदना का स्मरण दिलाने के लिए 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में घोषित करती है। जब ये घोषणा हुई तो पूरे देश में विभाजन के दर्द को सहने वाले और उसको महसूस करनेवाले लोग सामने आए और आपबीती साझा की। दैनिक जागरण ने भी पिछले वर्ष देशभर के उन लोगों को खोज निकाला था जिन्होंने विभाजन के दौरान अपना सब कुछ गंवा दिया। कालांतर में अपने सामर्थ्य और पुरुषार्थ से उठ खड़े हुए थे। भारत विभाजन मानवता के इतिहास की बेहद दर्दनाक और शर्मनाक घटना है। देश की भावी पीढ़ियों को इसका स्मरण रखना चाहिए। विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस की स्मृतियों को जनमानस में जीवित रखने के लिए यह भी आवश्यक है कि इस दिशा में अकादमिक जगत में लगातार शोध हों। इसके कारणों की पड़ताल हो। दबा या छुपा दिए गए तथ्यों का अन्वेषण हो। इतिहास के उन पन्नों को पलटा जाए जिनमें कई राज दबे हुए हैं। आइए आधुनिक भारत के इतिहास के एक ऐसे अध्याय के कुछ पन्नों को पलटते हैं जिनमें विभाजन के बीज देखे जा सकते हैं।

इतिहासकारों के अनुसार बीसबीं शताब्दी में स्वाधीनता संग्राम के दौरान तीन कालखंड में स्वाधीनता को लेकर गंभीर कोशिशें हुई। कुछ इतिहासकार इसको राष्ट्रवाद का उफान मानते हैं। राष्ट्रवाद की पहली लहर 1920 में उठी जो दो वर्ष तक चली और 1922 में मद्धिम पड़ गई। दूसरी लहर पहले की अपेक्षा लंबे समय तक चली और 1930 में आरंभ होकर चार वर्षों के बाद 1934 में थोड़ी सुस्त हुई। तीसरी बार राष्ट्रवाद का ज्वार 1942 में उठा और करीब साल सवा साल के बाद 1943 में धीमा पड़ा। लेकिन राष्ट्रवाद के इन उफानों के बीच भी स्वाधीनता को लेकर, उसको हासिल करने के प्रयासों को लेकर, स्वाधीनता की ओर बढ़ने के तरीकों को लेकर विमर्श, बैठकें और शासन व्यवस्था में सुधार आदि होते रहे। आमतौर पर जिन्ना को विभाजन का जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। उसकी भूमिका में किसी को कोई संदेह नहीं है। लेकिन विभाजन की पृष्ठभूमि के लिए सिर्फ जिन्ना नहीं बल्कि अंग्रेज और भारतीय मुसलमानों की महात्वाकांक्षाएं भी जिम्मेदार रही हैं। कांग्रेस के कई नेता भी। विभाजन के प्रस्ताव को स्वीकार करने की बात नहीं कर रहा हूं वो तो ज्ञात ही है कि किस तरह से कांग्रेस के उस समय के शीर्ष नेतृत्व ने माउंटबेटन की विभाजन की योजना को स्वीकृति दी। यहां बात करना चाहता हूं विभाजन की पृष्ठभूमि या भूमिका तैयार करने की। जब स्वाधीनता संग्राम का 1920 से लेकर 1922 का कालखंड खत्म होता है तो उसके बाद भारत के लिए शासन व्यवस्था में सुधार और जन अधिकारों को लेकर संवैधानिक प्रविधान में सुधार की मांग तेज होने लगी थी। परिणामस्वरूप 1924 में अलेक्जेंडर मुडिमैन की अध्यक्षता में एक रिफार्म समिति का गठन किया गया। उन्होंने कुछ संवैधानिक सुझाव दिए थे जिसको कांग्रेस ने अस्वीकार कर दिया था। 

इसके कुछ अंतराल के बाद साइमन कमीशन का गठन हुआ जिसका जोरदार विरोध हुआ था। साइमन कमीशन जब भारत आया था तब देश के कई हिस्सों में हिंसक वोध प्रदर्शन भी हुए थे। इसी दौर में ही इतिहास का एक बेहद दिलचस्प मोड़ है जिसकी चर्चा कम होती है। हुआ ये कि साइमन कमीशन की घोषणा के पूर्व भारतीय मामलों को सचिव लार्ड बर्कनहेड ने उस समय के भारतीय नेताओँ को एक सर्वमान्य संविधान बनाने की चुनौती दी। उनको मालूम था कि मुस्लिम लीग के नेता जिन्ना आदि कांग्रेस के नेताओं के बनाए संविधान या सुधारों को मान्यता नहीं देंगे। यहां मुस्लिम लीग भी बंटा हुआ था। मुहम्मद शफी के नेतृत्व वाले लीग ने साइमन कमीशन के समर्थन की घोषणा कर रखी थी। उका मत अलग था। लेकिन कांग्रेस ने बर्कनहेड की चुनौती स्वीकार कर ली। फरवरी 1928 में दिल्ली में एक सर्वदलीय बैठक हुई। फिर मई 1928 में बांबे (अब मुंबई) में एक और सव्रदलीय बैठक हुई। इसके बाद मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई जिसको संविधान में सुधार के लिए सुझाव देने का काम शीघ्रता के साथ करवाने का दायित्व दिया गया। इस संविधान में सांप्रदायिकता की समस्या से निबटने के तरीकों की अपेक्षा की गई थी। इसमें मोतीलाल नेहरू के साथ सर अली इमाम, शोएब कुरैशी, एम एस अणे, एम आर जयकर, जी आर प्रधान, सरदार मंगल सिंह, तेज बहादुर सप्रू और एन एम जोशी जैसे नेता शामिल किए गए थे। नेहरू समिति ने संविधान की एक रूपरेखा प्रस्तुत की जिसमें इंगलैंड की सरकार की तरह की अधिकार संपन्न केंद्र सरकार की प्रस्तवाना की गई। यहां तक तो बात ठीक थी, लेकिन नेहरू समिति की संविधान को लेकर जो रिपोर्ट थी उसने सांप्रदायिकता को भी मान्यता प्रदान करने का काम किया। इस समिति ने माना कि सिंध को एक अलग मुस्लिम बहुक प्रांत बनाया जाना चाहिए। उस दौर के मुसलमान काफी समय से ये मांग कर रहे थे। इतना ही नहीं मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली समिति ने पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत को भी कई तरह के संवैधानिक अधिकार देने की सिफारिश की। मुसलमानों की धार्मिक और सांस्कृतिक हितों की रक्षा के लिए संविधान में अधिकारों की घोषणा का प्रविधान प्रस्तावित किया गया था। इस तरह की सिफारिशों से उस वक्त के मुसलमान नेताओं के महात्वाकांक्षओं को पंख लगे। जिन्ना इसमें तीन संशोधन चाहते थे, पहला विधानसभा में एक तिहाई सीट मुलमानों को मिले, पंजाब और बंगाल में जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व और प्रातों को अधिक शक्तियां। जिन्ना के इन मांगों को कांग्रेस ने खारिज कर दिया। उधर मुहम्मद शफी ने दिल्ली में 31 दिसंबर 1928 को आल पार्टीज मुस्लिम कांफ्रेंस की बैठक बुलाकर नेहरू समिति की सभी सिफारिशों के विरोध में प्रस्ताव पारित करवा दिया। 

खिलाफत आंदोलन की विफलता के बाद सांप्रदायिकता को राजनीति का औजार बनाने वाले मुस्लिम नेता स्वाधीनता संग्राम में हाशिए पर चले गए थे। मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में बनी समिति संवैधानिक सुधार के सुझावों के बाद उस समय के मुस्लिम नेताओं की महात्वाकांक्षाएं काफी बढ़ गईं। उनको लगा कि जब सिंध को मुस्लिम बहुल प्रांत बनाने की मांग स्वीकार की जा सकती है, जब मुसलमानों की धार्मिक हितों की रक्षा के लिए संविधान में अधिकारों की घोषणा का प्रस्ताव किया जा सकता है तो इसके आगे की मांगे भी मानी जा सकती हैं। इस कारण उन्होंने अपना रुख और कठोर कर लिया था। परिणाम ये हुआ कि 1932 में कम्यूनल अवार्ड की घोषणा ब्रिटिश सरकार ने कर दी। इन परिस्थियों की परिणति अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग के तौर पर हुई। राष्ट्र का विभाजन हुआ। अभूतपूर्व घटनाएं हुईं। विस्थापन और पलायन की बेहद दर्दनाक और दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं हुईं। लाखों लोगों का बसा-बसाया संसार उजड़ गया। इस बात की सूक्षम्ता से पड़ताल की जानी चाहिए कि वो कौन की स्थितियां या मजबूरियां थीं जिसके चलते नेहरू समिति ने मुसलमानों के धार्मिक अधिकारों के लिए संविधान में घोषणा की बात की थी। वो कौन सी स्थितियां थीं जिसके चलते सिंध को मुस्लिम प्रांत के तौर पर मान्यता की मांग मान ली गई थी। विचार तो इसपर भी होना चाहिए कि अगर नेहरू समिति ने संविधान सुधार के लिए ये सिफारिशें नहीं की होतीं तो उस समय के मुसलमान नेता धर्म या जनसंख्या के आधार पर प्रांत या राष्ट्र की मांग नहीं करते। तब विभाजन के अलावा किसी अन्य विकल्प पर भी बात होती?      


Saturday, August 5, 2023

फिल्म निर्देशकों की छीजती महत्ता


दिल्ली में आयोजित जागरण फिल्म फेस्टिवल के दौरान फिल्म निर्देशकों ने हिंदी फिल्मों की दुनिया की कई रोचक बातें साझा की। प्रख्यात फिल्म निर्देशक राहुल रवेल, बोनी कपूर और सुभाष घई ने अपने अनुभवों को श्रोताओं के साथ बांटा। फिल्म निर्माता और निर्देशक के संबंधों पर भी बात हुई। राहुल रवेल ने एक फिल्म निर्देशित की थी जिसका नाम है लव स्टोरी। ये फिल्म सुपर हिट रही थी। इसके प्रोड्यूसर अपने जमाने के बेहद लोकप्रिय अभिनेता राजेन्द्र कुमार थे। उन्होंने अपने बेटे कुमार गौरव को बतौर हीरो लांच करने के लिए ये फिल्म बनाई थी। फिल्म निर्माण के दौरान इसके निर्देशक राहुल रवेल और राजेन्द्र कुमार के बीच मतभेद हो गए थे। राजेन्द्र कुमार इस फिल्म में खुद का अभिनेत्री विद्या सिन्हा के साथ एक गीत रखना चाहते थे। राजेन्द्र कुमार कुछ वर्ष पहले रिलीज हुई फिल्म त्रिशूल में संजीव कुमार और वहीदा रहमान फिल्माए गाने ‘आपकी महकी हुई जुल्फ को कहते हैं घटा’  से प्रभावित थे। कुछ उसी तरह का एक गाना फिल्म लव स्टोरी में भी रखना चाहते थे। राहुल रवेल इसके विरोध में थे। उनका मानना था कि लव स्टोरि युवा प्रेम संबंध की कहानी है। इसलिए लव स्टोरी में बीते जमाने के अभिनेता राजेन्द्र कुमार और अभिनेत्री विद्या सिन्हा पर फिल्माया गीत दर्शकों को पसंद नहीं आएगा। राजेन्द्र कुमार इस बात पर अड़े थे। राहुल रवेल फिल्म की स्क्रिप्ट के अनुसार राजेन्द्र कुमार के सीन कम करके कुमार गौरव को ज्यादा से ज्यादा स्पेस देने के पक्ष में थे। राजेन्द्र कुमार को ये बातें पसंद नहीं आ रही थी। वो राहुल रवेल को बार-बार कहते थे कि मैं फिल्म का प्रोड्यूसर हूं और तुम मेरा रोल कैसे कम कर सकते हो। राहुल रवेल नहीं माने । बात यहां तक पहुंच गई कि राहुल रवेल ने फिल्म पूरी होने के बाद उससे अपना नाम हटा लिया। 

जागरण फिल्म फेस्टिवल के दौरान राहुल रवेल ने बताया कि वो इतने खिन्न हो गए थे कि वो कोर्ट चले गए कि फिल्म से बतौर डायरेक्टर उनका नाम हटा दिया जाए। कोर्ट ने तमाम बातों को सुनने के बाद फैसला दिया कि फिल्म लव स्टोरी से राहुल रवेल का निर्देशक के रूप में नाम हटा लिया जाए। जबकि फिल्म के कई कलाकारों ने अदालत में शपथ पत्र दिया था कि पूरी फिल्म राहुल रवेल ने निर्देशित की है। इस तरह से लव स्टोरी पहली फिल्म बनी जिसके रिकार्ड में किसी निर्देशक का नाम नहीं है। राहुल रवेल ने बातचीत के दौरान हंसते हुए कहा था कि लव स्टोरी दुनिया की एकमात्र फिल्म है जिसका कोई डायरेक्टर नहीं है। इसी तरह का मिलता जुलता एक किस्सा सुभाष घई ने भी सुनाया। सुभाष घई ने फिल्म विधाता के निर्देशन का दायित्व संभाला था। वो इस फिल्म में दिलीप कुमार को लेना चाहते थे। वो दिलीप कुमार के पास फिल्म की कहानी लेकर पहुंचे। जब बातचीत हो रही थी तो सुभाष घई ने दिलीप कुमार से दो बातें कहीं। सुभाष घई ने दिलीप कुमार से कहा कि फिल्म इंडस्ट्री में लोग कहते हैं कि आप बहुत डोमिनेटिंग हैं और निर्देशक को अपने हिसाब से काम नहीं करने देते हैं। आप निर्देशकों के काम में बहुत दखल डालते हैं। दूसरी बात ये कि आपके साथ काम करने से फिल्म में काफी समय लगेगा। दिलीप कुमार पहली मीटिंग में कुछ भी तय नहीं करते थे। सुभाष घई के मुताबिक दिलीप कुमार किसी भी मसले पर काफी सोच विचार के बाद निर्णय लेते थे। दिलीप कुमार ने उनसे भी कहा कि एक दो बार और मिलते हैं फिर तय करेंगे। 

सुभाष घई कुछ दिनों बाद दिलीप कुमार से मिलने पहुंचे। फिल्म विधाता पर बात होने लगी। काफी देर की बातचीत के बाद दिलीप कुमार ने फिल्म करने के लिए हामी भरी। सुभाष घई प्रसन्न होकर चलने लगे। तब दिलीप कुमार ने उनको रोका और कहा कि फिल्म विधाता तुम ही डायरेक्ट करोगे सिर्फ तुम। दिलीप कुमार के मन में सुभाष घई की निर्देशक के काम में दखल डालने वाली बात रही होगी इस वजह से उन्होंने ऐसा कहा। बातचीत के दौरान सुभाष घई ने बताया कि पूरी फिल्म के दौरान दिलीप कुमार ने एक भी फ्रेम के बारे को बदलने या इंप्रूव करने के लिए सुभाष घई को नहीं कहा, दबाव डालने की बात तो दूर। निर्देशक के तौर पर सुभाष घई जो भी कहते गए दिलीप कुमार ने वैसा ही किया। दिलीप कुमार ने जितनी डेट्स दी थी उसके अनुसार वो शूटिंग के लिए उपस्थित रहे। फिल्म समय पर पूरी हुई। कहना ना होगा कि दिलीप कुमार ने निर्देशक नाम की संस्था का न केवल सम्मान किया बल्कि उसकी गरिमा भी बनाकर रखी। 

उपरोक्त दो उदाहरण हैं हिंदी फिल्मों में निर्देशकों की भूमिका को लेकर। एक में निर्देशक ने अपना सम्मान कायम रखने के लिए प्रोड्यूसर के दबाव से तंग आकर फिल्म से अपना नाम वापस ले लिया और दूसरे में एक सुपर स्टार ने एक अपेक्षाकृत नए निर्देशक का मान रखा और उनपर किसी प्रकार का कोई दबाब नहीं डाला। इन दो घटनाओं को सामने रखकर अगर वर्तमान समय में हिंदी फिल्मों के निर्देशकों की स्थिति का आकलन करते हैं तो स्थिति बेहद अलग दिखाई देती है। आज तो हालात ये है कि सुपरस्टार्स फिल्मों में अपनी मर्जी चलाते हैं। निर्देशकों से लेकर वस्त्र सज्जा से लेकर मेकअप आदि तक में दखल देते हैं। स्क्रिप्ट में तो शूटिंग के समय बदलाव कर देते हैं। और तो और फिल्म की एडिटिंग देखने के बाद जब उनको लगता है कि साथी कलाकारों का अभिनय प्रभावशाली बन रहा है तो उसको कटवा देते हैं या सीन छोटे करवा देते हैं। एक अभिनेता के बारे में तो कहा जाता है कि उनके पास तीन-चार हजार चुटकुलों का एक संग्रह है। वो अपनी फिल्म के संवादों में उन चुटकुलों को डलवाने के लिए पटकथा लेखक और निर्देशक पर दबाव डालते हैं। आज के अधिकतर फिल्मी सितारों को लगता है कि वो फिल्म निर्माण की हर कला से वाकिफ हैं। यह अनायास नहीं है कि कई फिल्मों में उसके मुख्य अभिनेता के साथ या उनकी कंपनी में काम करनेवाले किसी भी व्यक्ति को निर्देशक का दयित्व सौंप दिया जाता है।

अगर हम इसके कारणों की तह में जाते हैं तो मुझे लगता है कि जबसे फिल्मों का आकलन उसके निर्माण कला की जगह सौ करोड़ और दो सौ करोड़ से होने लगा है तब से निर्देशक नाम की संस्था का क्षरण आरंभ हो गया है। आज फिल्म निर्माण की कला को उत्कृष्टता पर न तो अधिकतर निर्माता का ध्यान है और ना ही निर्देशक का। उनका सारा ध्यान इसपर लगा होता है कि फिल्म को कितने करोड़ की ओपनिंग मिलेगी, फिल्म पहले सप्ताह में बाक्स आफिस पर कितने करोड़ का कारोबार करेगी। इस कारोबार और सौ करोड़ क्लब में जल्द से जल्द शामिल होने की होड़ में फिल्म निर्माण की कला प्रभावित होती चली जा रही है। इससे हिंदी फिल्मों का बहुत नुकसान हो रहा है। आज पहले की तुलना में अधिक फिल्में बन रही हैं। पहले की तुलना में तकनीक बहुत उन्नत हो गई है लेकिन ऐसी फिल्में नहीं बन पा रही हैं जो भविष्य में क्लासिक का दर्जा हासिल कर सके। जिस फिल्म को देखकर फिल्म निर्माण की बारीकियों पर चर्चा हो सके। निर्देशक के सोच पर चर्चा हो सके और उसके फिल्माए दृश्यों को लोग वर्षों तक याद रखे। आज उस तरह के संवाद भी नहीं लिखे जा रहे हैं जो दर्शकों की जुबान पर चढ जाए और आम बोलचाल में उसका प्रयोग हो। यह स्थिति हिंदी फिल्मों के लिए अच्छी नहीं है और इसके बारे में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों को विचार करना होगा।   

Saturday, July 29, 2023

कलाओं के संरक्षण और संवर्धन की चुनौती


मणिपुर पर संसद में चल रहे गतिरोध और शोरशराबे के बीच 24 जुलाई को राज्यसभा में संस्कृति मंत्रालय से जुड़ी राष्ट्रीय अकादमियां और अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं के कामकाज से संबंधित एक रिपोर्ट पेश की गई। इस रिपोर्ट में अकादमियों के बीच समन्वय पर टिप्पणी की गई है। इसके अलावा इन अकादमियों और संस्कृतिक संस्थाओं की चुनौतियों और अवसरों पर भी बात की गई है। 96 पन्नों की यह महत्वपूर्ण रिपोर्ट है। इस रिपोर्ट में संसदीय समिति ने 2015 के पुरस्कार वापसी अभियान के कारणों पर मंथन किया और अपने सुझाव दिए। एक बार फिर याद दिला दें कि बिहार विधानसभा चुनाव के पहले सुनियोजित तरीके से असहिष्णुता को मुद्दा बनाकर पुरस्कार वापसी का अभियान चलाया गया था। इस स्तंभ में पुरस्कार वापसी अभियान की चर्चा कई बार हो चुकी है, उसके प्रमुख रणनीतिकारों के बारे में विस्तार से लिखा गया है इसलिए उन सबको दोहराना उचित नहीं होगा। 

पुरस्कार वापसी अभियान के करीब आठ वर्ष बाद संसदीय समिति ने उसपर विचार किया है। समिति ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अकादमियों को पुरस्कार देने के पहले संभावित लेखकों, कलाकारों से एक वचन पत्र लेना चाहिए कि अगर उनको पुरस्कार दिया जाता है तो वो भविष्य में उसको नहीं लौटाएंगे। बौद्धिक जगत में इसको केंद्र सरकार से जोड़कर आलोचना हो रही है। कहा जा रहा है कि सरकार अब लेखकों को पुरस्कार देने के पहले वचन पत्र लेना चाहती है। आलोचना करनेवाले यह भूल गए कि पुरस्कार वापसी अभियान के समय एक लेखक ने घोषणा करके खूब प्रचार हासिल किया। जब मामला ठंडा पड़ गया तो साहित्य अकादमी को पत्र लिखकर पुरस्कार वापसी पर खेद प्रकट करते हुए पुरस्कार अपने पास रखने का आग्रह किया। अकादमी के संविधान में पुरस्कार वापसी का कोई प्रविधान ही नहीं है इसलिए उसने किसी का लौटाया गया पुरस्कार स्वीकार नहीं किया। पुरस्कार वापसी अभभियान के समय कई लेखकों ने साहित्य अकादमी परिसर में कदम न ऱकने की कसम खाई थी। वो भी राजनीतिक कसम साबित हुआ । अब वो सभी लेखक साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों में न केवल नजर आते हैं बल्कि सक्रिय सहयोग भी कर रहे हैं। संसदीय समिति ने ठीक लिखा है कि पुरस्कार वापसी अभियान पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित था। अकादमी के प्रतिष्ठित पुरस्कारों को राजनीतिक का औजार बनने से रोकने के लिए समिति ने वचन पत्र का सुझाव दिया है। संसदीय समिति का मानना है कि इस तरह राजनीतिक अभियानों का हिस्सा बनने से पुरस्कारों की प्रतिष्ठा कम होती है। अकादमियों का ये दायित्व है कि वो अपने द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कारों के सम्मान को बनाए रखने का प्रयास करे। संसदीय समिति ने ये भी सुझाव दिया है कि अगर वचन पत्र के बावजूद कोई लेखक या कलाकार पुरस्कार वापसी करता या करती है तो उसके नाम पर भविष्य में किसी भी प्रकार के पुरस्कार के लिए विचार नहीं किया जाए। 

संसदीय समिति की रिपोर्ट के इस बिंदु पर जितनी चर्चा हुई उसकी वजह से अन्य महत्वपूर्ण निष्कर्षों या राय पर चर्चा नहीं हो पाई। बौद्धिक जगत अगर इन टिप्पणियों पर चर्चा करता तो देश में साहित्य कला संस्कृति को लेकर एक सकारात्मक वातावरण बनता। संसदीय समिति की रिपोर्ट के दो अन्य बिंदुओं को रेखांकित किया जाना चाहिए। वो है कला और संस्कृति से जुड़े अधिकारियों की संवेदनशीलता और अकादमी और अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं में अधिकारियों और कर्मचारियों की कमी। संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सांस्कृतिक प्रबंधन से जुड़े अधिकतर अधिकारियों और कर्मचारियों को इसका बहुत कम ज्ञान है। समिति ने इसके लिए व्यापक स्तर पर कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने की अपेक्षा की है। कहा गया है कि मंत्रालय पहले इन कर्मचारियों के प्रशिक्षण क्षेत्रों का आकलन करे और फिर उसके आधार पर कला प्रबंधन के लिए इनके प्रशिक्षण का प्रबंध करे। संस्कृति मंत्रालय में समय-समय पर रेलवे, आयकर, रेलवे लेखा, डाक सेवा और अन्य सर्विस के अधिकारी महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं, अब भी हैं। इनसे कला और कलाकारों को लेकर उस तरह की संवेदशीलता की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सूचना सेवा के अधिकारी को अगर कला के संरक्षण का जिम्मा दिया जाएगा तो उनको परेशानी होगी और संरक्षण का कार्य प्रभावित होगा। रेलवे या लेखा विभाग के अधिकारी को अगर नाट्य प्रशिक्षण का कार्य देखने का दायित्व होगा तो उनसे इसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती है कि वो हमारे देश की नाट्य परंपराओं को जानें और उसकी संवेदनशीलता को समझते हुए इस क्षेत्र को समृद्ध करने में अपना योगदान दे सकें। इस संबंध में भी इस स्तंभ में कई बार लिखा जा चुका है कि देश में एक संस्कृति नीति बने और कला संस्कृति के अधिकारियों का एक कैडर बने। संसदीय समिति जब अगली बार अपनी रिपोर्ट तैयार करे तो सांसदों को इस दिशा में मंथन करते हुए सरकार को अपनी सुझावों से अवगत करवाना चाहिए। 

संसदीय समिति ने दूसरी एक महत्वपूर्ण तथ्य को रेखांकित किया है वो है इन अकादमियों और संस्थाओं में अधिकारियों और कर्माचरियों की कमी। संसदीय समिति ने सूक्ष्मता से इसका आकलन किया है और बताया है कि संगीत नाटक अकादमी में 111 स्वीकृत पद हैं जिनमें से 65 रिक्त हैं। ललित कला अकादमी में 170 में से 99 पद रिक्त हैं। साहित्य अकादमी में 175 में से 44 पद रिक्त हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में 176 में से 82 पद रिक्त हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के 248 स्वीकृत पदों में से 88 रिक्त हैं। इस तरह से देखा जाए तो सात संस्थाओं के 1078 स्वीकृत पदों में 450 पद रिक्त हैं। यानि औसतन एक तिहाई से अधिक पद रिक्त हैं। अभी हाल ही में राष्ट्रीय संग्रहालय से जुड़ी एक बेहद रोचक जानकारी संज्ञान में आई। वहां के एक अधिकारी अगले महीने सेवानिवृत होने जा रहे हैं। उनके पास कलाकृतियों के संरक्षण का दायित्व है। संस्था में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिनको वो सेवानिवृत्ति के वक्त चार्ज दे सकें। अगर चार्ज नहीं देंगे तो उनको सेवानिवृत्ति पर मिलनेवाली जमा राशि आदि नहीं मिल पाएगी। उनको कहा जा रहा है कि संस्थान उनको किसी अन्य विधि से सेवा में बनाए रखना चाहती है लेकिन वो सेवानिवृत्ति होना चाहते हैं। देखना होगा कि किस प्रकार से ये मामला परिणति तक पहुंचता है। कला और संस्कृति के इस विषय को संस्कृति मंत्रालय को गंभीरता से देखने की आवश्यकता है। संसदीय समिति ने अपनी पिछली रिपोर्ट में भी और इस रिपोर्ट में भी मंत्रालय को इन पदों को जल्द से भरने का सुझाव दिया है लेकिन पता नहीं किन कारणों से ये संभव नहीं हो पा रहा है। अगले वर्ष लोकसभा के चुनाव हैं और अगर इस वर्ष दिसंबर या अगले वर्ष जनवरी तक भर्तियां नहीं हो पाती हैं तो फिर मसला जून जुलाई तक टल जाएगा। यह कला संस्कृति के लिए अच्छी स्थिति नहीं होगी। 

संस्कृति मंत्रालय का प्राथमिक दायित्व कला और संस्कृति का संरक्षण और सवर्धन है। अगर संस्कृति मंत्रालय अपने इन दायित्वों से हटकर कार्यक्रमों के आयोजन में ही अपनी पूरी ऊर्जा लगा देती है तो फिर संरक्षण और संवर्धन का क्या होगा जिसपर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार बल देते हैं। कार्यक्रमों का तात्कालिक महत्व होता है, वो आयोजित होने चाहिए लेकिन संस्कृति मंत्रालय को बहुत गंभीरता के साथ कला संस्कृति को समृद्ध करनेवाले दीर्घकालीन योजनाएं बनाकर उसके क्रियान्वयन पर कार्य करने की आवश्यकता है। संस्कृति मंत्री किशन रेड्डी के पास पहले से पर्यटन और अन्य मंत्रालय की जिम्मेदारी है। अब तो उनको तेलंगाना का प्रदेश अध्यक्ष भी बना दिया गया है। ऐसे में उनके सामने बड़ी चुनौती है कि वो किस तरह से मंत्रालय के अपने प्राथमिक दायित्व का निर्वहन कर पाते हैं।      


Saturday, July 22, 2023

प्रभावी नीति की आवश्यकता


ओवर द टाप ( ओटीटी) प्लटफार्म्स पर दिखाई जानेवाली सामग्री के विनियमन को लेकर जो त्रिस्तरीय व्यवस्था बनाई गई थी, उसके परिणाम संतोषजनक नहीं दिखाई दे रहे हैं। न  तो अश्लीलता रुक रही है और न ही विवादित प्रसंग। सरकार की तरफ से लगातार ओटीटी प्लेटफार्म्स को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। उनको सरकारी समारोहों में भागीदार बनाया जा रहा था। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव से लेकर गोवा में आयोजित होनेवाले अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल तक में उनकी भागीदारी के रास्ते खोले जा रहे थे। इस वर्ष तो फिल्म फेस्टिवल में ओटीटी के लिए पुरस्कार की भी घोषणा की गई है। दूसरी तरफ इन प्लेटफार्म्स पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर शिकायतें भी बढ़ती जा रही थीं। ओटीटी प्लेटफार्म्स की सामग्रियों के प्रमाणन को लेकर एक संस्था बनाने पर भी निरंतर चर्चा हो रही है। लोगों को लगता है कि भारत जैसे देश में ओटीटी प्लेटफार्म्स पर किसी तरह का रेगुलेशन नहीं होने से अराजकता को बढ़ावा मिल रहा है। इन चर्चाओं को ध्यान में रखते हुए कुछ दिनों पहले सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने ओटीटी प्लेटफार्म्स के प्रतिनिधियों के साथ एक बैठक की जिनमें इन सब बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा हुई। इस चर्चा में सरकार ने अपना रुख साफ कर दिया। अनुराग ठाकुर ने नसीहत दी कि ओटीटी प्लेयर्स को कलात्मक स्वतंत्रता के नाम पर अश्लीलता दिखाने से बचना चाहिए। मंत्री ने इन प्लेटफार्म्स को सलाह दी कि वो भारत की सांस्कृतिक परंपराओं और विविधताओं को लेकर सतर्क भी रहें और संवेदनशील भी। बताया जाता है कि इस बैठक में लस्ट स्टोरीज और राना नायडू जैसे सीरीज की सामग्री को लेकर चर्चा हुई। पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में आकर जिस तरह की सामग्री परोसी जा रही है वो भारतीय समाज के लिए कितना उचित है। चर्चा तो इस बात पर भी हुई कि कि ओटीटी प्लेटफार्म्स के रेगुलेशन को लेकर जो त्रिस्तरीय व्यवस्था है उसमें एक स्तर और जोड़ा जाए। ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री की स्क्रिप्ट को शूटिंग के पहले एक कमेटी देखे। ओटीटी प्लेटफार्म्स के प्रतिनिधियों को 15 दिनों का समय दिया गया है ताकि वो इसको लेकर कोई व्यवस्था बनाएं और सरकार को सुझाएं। हलांकि ये व्यवस्था कितनी व्यावहारिक होगी ये देखनेवाली बात होगी।

ओटीटी प्लेटफार्म्स  पर दिखाई जाने वाली सामग्री को लेकर देश में लंबे समय से चर्चा हो रही है। सामग्री के पक्ष और प्रतिपक्ष में कई प्रकार के तर्क सामने आते रहते हैं। कई बार यहां दिखाई जानेवली वेब सीरीज को लेकर हंगामा तक हो चुका है। मामला पुलिस से लकर अदालतों तक में गया है। वेब सीरीज में गालियों की भरमार, यौनिकता और नग्नता का प्रदर्शन, जबरदस्त हिंसा और खून खराबा, अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां, कई बार सेना और सैनिकों की छवि खराब करने जैसे प्रसंग भी सामने आते रहे हैं। कोरोना काल के पहले जब ओटीटी प्लेटफार्म्स और वेब सीरीज हमारे देश में लोकप्रिय हो रहे थे तब कई निर्माताओं ने सेक्स और गाली गलौच के जरिए लोकप्रिय होने का रास्ता चुना था। कई विदेशी वेब सीरीज में तो नग्नता आम बात थी। ओटीटी को लेकर किसी प्रकार का कोई नियमन नहीं होने के कारण नग्न दृश्यों के प्रदर्शन पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं था। अब भी नहीं है। कोरोना काल में ओटीटी बेहद लोकप्रिय हो गया। नेटफ्लिक्स ने दिसंबर 2021 में ग्राहकों को कम मूल्य पर अपनी सेवाएं उपलब्ध करवाना आरंभ किया। नेटफ्लिक्स ने दो तरह की रणनीति अपनाई थी। एक तो ग्राहकों को जो शुल्क देना पड़ता था उसको कम किया और अपने प्लेटफार्म पर भारतीय फिल्में और भारतीय कहानियों पर बनीं वेब सीरीज को प्राथमिकता देना आरंभ कर दिया। इंडस्ट्री को जानकारों का मानना है कि नेटफ्लिक्स को इसका काफी लाभ हुआ। इसी तरह से प्राइम वीडियो, हाटस्टार आदि ने भी भारतीय कहानियों को केंद्र में रखकर कहानियां पेश करनी शुरु कर दी। उनको भी इसका लाभ हुआ। कहना न होगा कि कोरोना के बाद जिस तरह से ओटीटी प्लेटफार्म्स ने स्थानीय कंटेंट को बढ़ावा दिया और ग्राहकों के शुल्क को युक्तिसंगत बनाया उससे इनकी लोकप्रियता काफी बढ़ी।

एक तरफ ओटीटी प्लेटफार्म्स की लोकप्रियता बढ़ रही थी लेकिन साथ ही साथ वहां दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर विवाद भी बढ़ने लगे थे। सरकार की नजर भी इनपर थी। इंडस्ट्री को लोगों को लेकर लंबे समय तक चले विचार विमर्श के बाद फरवरी 2021 में इंटरनेट मीडिया को लेकर केंद्र सरकार ने एक गाइडलाइन जारी की थी। उसके अंतर्गत ही ओटीटी प्लेटफार्म्स को लेकर एक त्रिस्तरीय शिकायत निवारण व्यवस्था बनाई गई थी। तब ओटीटी प्लेटफार्म्स से जुड़े लोगों ने इसका स्वागत किया था। उस व्यवस्था का कोई खास प्रभाव देखने को नहीं मिला। वेब सीरीज और ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर विवाद जारी रहे। शिकायतें भी आती रहीं उसका निबटारा भी होता रहा लेकिन विवाद फिर भी जारी रहे। बाद के दिनों में एक खास प्रकार की प्रवृत्ति दिखाई देने लगी कि इन ओटीटी प्लेटफार्म्स पर दिखाई जानेवाली सामग्री में कभी प्रत्यक्ष तो बहुधा परोक्ष रूप से राजनीतिक विचारों को उठाने और गिराने का खेल चलने लगा। संवाद से लेकर दृश्यों तक में। अभिव्यक्ति की रचनात्मक स्वतंत्रता और यथार्थ  की आड़ में नग्नता और गाली गलौच दिखाने का चलन कम नहीं हुआ। इस वर्ष अप्रैल में संसदीय समिति ने ओटीटी प्लेटफार्म पर दिखाई जानेवाली अश्लीलता पर चिंता प्रकट की थी। समिति के अधिकांश सदस्यों का मानना था कि जिस प्रकार की अश्लीलता इन सीरीज में दिखाई जाती है वो भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है। इसका दुष्प्रभाव समाज पर पड़ता है। सरकार और समाज के स्तर पर भी इसको लेकर निरंतर मंथन हो रहा है।ओटीटी प्लेटफार्म्स भी अपने ग्राहकों की संख्या को बढ़ाने, उसको कायम रखने के लिए लगातार कंटेंट में प्रयोग करते रहे। अब भी कर भी रहे हैं। यह एक अलग विषय है जिसपर फिर कभी चर्चा होगी।

प्रश्न ये उठता है कि जब इस देश में फिल्मों को लेकर एक प्रकार के प्रमाणन की व्यवस्था है तो फिर् ओटीटी को लेकर क्यों नहीं इस तरह की व्यवस्था बन सकती है। ओटीटी का आकार इतना व्यापक होता जा रहा है कि अगर इसके लिए किसी प्रमाणन की व्यवस्था तय होती है तो उसके लिए काफी संसाधन की आवश्यकता होगी। अगर प्रोडक्शन के पहले स्क्रिप्ट देखने की व्यवस्था बनाई जाती है तो इसके लिए भी क्षेत्रीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर समितियों का गठन करना होगा। अगर इसके अलावा किसी तरह की कोई व्यवस्था बनाई जाती है तो उसके भी व्यावहारिक पक्ष को देखने की आवश्यकता होगी। इस स्तंभ में पहले भी कई बार ओटीटी की सामग्रियों के प्रमाणन या फिर किसी अलग प्रकार के मैकेनिज्म की चर्चा हो चुकी है। आज जिस प्रकार से इन प्लेटफार्मस पर वेब सीरीज के माध्यम से राजनीति की जा रही है या जिस प्रकार से हिंदुत्व और उसके प्रतीक चिन्हों पर टिप्पणियां की जाती हैं उसको ध्यान में रखना चाहिए। धर्म विशेष या समुदाय विशेष को बदनाम करने वाले कंटेंट का इंटेंट देखा जाना चाहिए। आलोचना हो लेकिन आलोचना के पीछे राजनीतिक उद्देश्य न हो। आलोचना के पीछे किसी राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने की मंशा न हो। क्योंकि जब मनोरंजन राजनीति का औजार बनता है तो कई बार समाज का बड़ा वर्ग उसको समझ नहीं पाता है और वो परोक्ष रूप से लोकतंत्र को कमजोर करता है। ओटीटी आज एकक ऐसे सेक्टर के तौर पर उभरा है जहां अनेक प्रकार की संभावनाएं हैं। उन संभावनाओं को बाधित किए बगैर ओटीटी प्लेटफार्म्स को लेकर एक प्रभावी नियमन होना चाहिए। विमर्श काफी लंबे समय से चल रहा है अब वक्त है कि सरकार एक नीति बनाकर उसको लागू कर दे।  

Thursday, July 13, 2023

तथ्यहीन आधार पर नैरेटिव


पिछले दिनों कल्याण पत्रिका चर्चा में रही। गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार की घोषणा हुई थी। कुछ दिनों बाद प्रधानमंत्री अपने गोरखपुर दौरे के समय गीता प्रेस गए। पुरस्कार की घोषणा और प्रधानमंत्री के गीता प्रेस जाने के समय इस बात का बार-बार उल्लेख किया गया कि कल्याण पत्रिका के अंकों में महात्मा गांधी की हत्या पर कुछ भी नहीं प्रकाशित किया गया। ऐसा कहनेवालों ने कल्याण पत्रिका और इसके संपादक को गांधी विरोधी करार दिया। इस तरह की टिप्पणियां की गईं जिसके भ्रम का वातावरण बने कि कल्याण के संपादक हनुमानप्रसाद पोद्दार और बापू के हत्यारे के बीच संबंध थे। उनके ऐसा कहने के पीछे अंग्रेजी में प्रकाशित एक पुस्तक गीता प्रेस एंड द मेकिंग आफ हिंदू इंडिया में उल्लिखित प्रसंग का सहारा लिया गया। इस पुस्तक के लेखक अक्षय मुकुल हैं। उन्होंने अपने पुस्तक के पेज 58 पर लिखा है कि गीता प्रेस ने गांधी की हत्या पर खामोशी ओढ़ ली थी। कल्याण के लिए जिस व्यक्ति का आशीर्वाद और लेखन बेहद महत्वपूर्ण था उसी पत्रिका में अप्रैल 1948 के अंक तक एक बार भी उनका (गांधी) उल्लेख नहीं हुआ। इस अंक में पोद्दार ने गांधी से अपनी विभिन्न मुलाकातों के बारे में लिखा। बाद के अंकों में भी गांधी का लेखन कल्याण में प्रकाशित हुआ। लेकिन अक्षय मुकुल ये प्रश्न उठाते हैं कि फरवरी और मार्च 1948 के अंक में गांधी के बारे में कुछ भी प्रकाशित क्यों नहीं हुआ। अक्षय ने हाल के अपने लेख में भी इस ओर फिर से संकेत किया है। मुकुल इस बात का भी दावा करते हैं कि कल्याण के संपादक हनुमानप्रसाद पोद्दार, महात्मा गांधी के कटु आलोचक थे। इस संबंध में वो कुछ प्रसंगों और पत्रों का हवाला देते हैं जहां पोद्दार गांधी के विचारों की आलोचना करते है। अक्षय मुकुल ने जो व्याख्या की हैं उसमें कई दोष रह गए हैं। 

गांधी की हत्या 30 जनवरी 1948 को हुई थी। कल्याण पत्रिका का जनवरी अंक बहुत सारे ग्राहकों को भेजा जा चुका था। कुछ अंक ग्राहकों को नहीं भेजे जा सके थे। गांधी की हत्या का समाचार आते ही बचे हुए अंकों का डिस्पैच रोककर उसमें तीन पन्ने अलग से लगाए गए। एक पूरे पन्ने पर बापू की तस्वीर लगाई गई जिसके ऊपर लिखा गया ‘महाभागवत बापू’ और तस्वीर के नीचे लिखा गया ‘सकल लोक मां सहु ने बंदे’। एक पेज पर राघवदास जी की एक टिप्पणी प्रकाशित है जिसका शीर्षक है ‘महाभागवत पूज्य बापू जी’। उसमें राघवदास जी ने लिखा है कि पूज्य बापू जी कहा करते थे मेरा ह्रदय चीरकर देखो तो उसमें राम-राम लिखा मिलेगा। बहुतों को ये बात समझने में बहुत दिक्कत होती हो, पर जब हम उनको तारीख 30.1.48 को साढे पांच बजे बजे गोली का शिकार होते देखते हैं तो उनके मुंह से हे राम, हे राम यह दो शब्द ही निकलते हैं। मैंने गोली का अभ्यास करनेवालों से बातें की तो उन्होंने मुझे बताया कि गोली लगने पर मुख की आकृति बिगड़ जानी चाहिए, परेशानी चेहरे पर आनी चाहिए पर वैसा नहीं हुआ... कितना सुंदर स्वरूप है इस महाभागवत का। ग्रंथों में संतों के वर्णन पढ़े थे. पर प्रत्यक्ष रूप से देखने का अवसर इसी महापुरुष के जीवन में हमें मिला। बोलिए महाभागवत की जय। राघवदास जी की कल्याण में प्रकाशित इस टिप्पणी में गहरी श्रद्धा परिलक्षित होती है।    

अब नजर डाल लेते हैं कल्याण के 1948 के जनवरी अंक में तत्कालीन संपादक हनुमानप्रसाद पोद्दार की टिप्पणी पर। वो लिखते हैं, पूज्य महात्मा जी संत थे, महापुरुष थे मानवमात्र का हित चाहनेवाले थे और विश्व की एक महान विभूति थे। वे धर्म और जाति के भेद से ऊपर उठे हुए थे और सत्य और अहिंसा के सच्चे पुजारी थे। वे मानवता के खरे प्रतीक थे। ईश्वर की प्रार्थना के समय जाते हुए उनकी निर्मम हत्या करके हत्यारे ने अपना तो लौकिक और पारलौकिक महान अहित किया ही, हिंदू जाति पर भी-जो धर्मत: और स्वभावत: अहिंसाप्रिय है- कलंक का अमिट टीका लगा दिया। अगर हनुमानप्रसाद पोद्दार गांधी को नापसंद करते, तो कलंक का अमिट टीका जैसी कठोर टिप्पणी हिंदू जाति पर नहीं करते।  अपनी इस टिप्पणी में हनुमानप्रसाद पोद्दार लिखते हैं कि बापू के साथ उनका पारिवारिक संबंध था। बापू उनको पुत्र के समान मानते और स्नेह करते थे। उनके स्नेह की एक एक बात याद करके दिल भर आता है। इस तरह की टिप्पणियों को पढ़ने के बाद क्या संदेह रह जाता है कि हनुमानप्रसाद पोद्दार गांधी को पसंद नहीं करते थे। वैचारिक मतभेद हो सकते हैं लेकिन उसको व्यक्तिगत द्वेष की तरह देखना और व्याख्यायित करने में अंतर है। अक्षय मुकुल इस अंतर को समझ नहीं पाए या समझ कर अनदेखी की। एक और बात मुकुल ने जोर देकर पूछी है कि कल्याण पत्रिका के 1948 के फरवरी और मार्च अंक में गांधी का उल्लेख क्यों नहीं है। यहां भी मुकुल की लापरवाही या तथ्यों की अनदेखी दिखाई देती है। प्राथमिक स्त्रोत तक नहीं पहुंचने की लापरवाही या किसी खास कारण से अनदेखी। 1948 के फरवरी अंक में हिंदू विधवा के नाम से बापू की टिप्पणी है, कवर पर भी उल्लेख है। तो क्या ये माना जाए कि लेखक इतना लापरवाह था कि वो बगैर देखे बड़े-बड़े दावे कर रहा था या वो जानबूझकर कुछ तथ्यों को छिपाकर एक नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहा था। अनुत्तरित तो ये प्रश्न है। 1926 से लेकर 1948 तक बापू की कई टिप्पणियां कल्याण के विभिन्न अंकों में प्रकाशित हुईं। 

एक और दोषपूर्ण टिप्पणी अक्षय ने अपनी पुस्तक में की है कि गीता प्रेस के निजी अभिलेखागार में गांधी की हत्या से संबंधित कोई रेफरेंस उपलब्ध नहीं है। पिछले सप्ताह मैं गोरखपुर में था।  गीता प्रेस जाकर कल्याण के उस अंक को स्वयं देखा जिसमें बापू की हत्या पर तीन पृष्ठ हैं। यह अंक उनके अभिलेखागार में उपलब्ध है। कोई भी अनुमति लेकर देख सकता है। मुझे लगता है कि मुकुल ने कल्याण पत्रिका की फाइल देखी ही नहीं। उसने उन विशेषांकों को देखा जो बाद में पुस्तकाकार प्रकाशित हुए। प्रतिवर्ष कल्याण का जनवरी अंक विशेषांक होता है जो बाद में पुस्तकाकार प्रकाशित होता है। जनवरी 1948 का अंक भी विशेषांक था, नारी अंक, जो कालांतर में पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ। अब जो नारी अंक बाजार में उपलब्ध है उसमें गांधी की हत्या के प्रसंग पर राघवदास जी, पोद्दार जी की टिप्पणियां नहीं हैं। गांधी का चित्र भी नहीं है। ये तो पुस्तक प्रकाशन जगत की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। जब किसी पत्रिका के विशेषांक को पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाता है तो उसमें तात्कालिक या घटनात्मक टिप्पणियां नहीं रखी जाती हैं। बिना फाइल देखे सिर्फ बाद में प्रकाशित पुस्तक के आकार पर टिप्पणी करना ये दर्शाता है कि लेखक कितनी लापरवाही से तथ्यों को इकट्ठा कर रहा था। प्राथमिक स्त्रोत तक नहीं पहुंच रहा था। लेकिन बड़े बड़े प्रश्न खड़े कर रहा था। 

कल्याण, गांधी और हनुमानप्रसाद पोद्दार के संबंधों को समझने के लिए जो दृष्टि चाहिए वो अक्षय मुकुल के पास नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि अक्षय मुकुल ने एक विशेष नैरेटिव को बल देने के लिए ये पुस्तक लिखी। पुरस्कृत हुए। अब उसी पुस्तक में वर्णित गलत तथ्यों और प्रसंगों को उद्धृत नैरेटिव बनाए जा रहे हैं। इंटरनेट मीडिया के दौर में लोगों के पास किसी भी प्रसंग या घटना को समग्रता में देखने या उसकी पड़ताल करने का धैर्य नहीं है। अगर मैं भी गोरखपुर के गीताप्रेस जाकर इन प्रसंगों को नहीं देखता समझता तो संभव है कि मान लेता कि कल्याण में बापू की हत्या के बाद कुछ नहीं प्रकाशित हुआ। 


Tuesday, July 11, 2023

कोलाहल में दबती फिल्म निर्माण कला


बीते शुक्रवार को फिल्म 72 हूरें रिलीज हुईं। इस फिल्म का भी कुछ लोगों ने एजेंडा और प्रोपगैंडा फिल्म बताकर विरोध किया।न कई लोग इसको एक समुदाय विशेष को बदनाम करनेवाली फिल्म बताने में जुटे रहे। इसके पहले जब फिल्म द केरल स्टोरी रिलीज हुई थी तो भी इसी तरह का वातावरण बना था। द केरल स्टोरी के पहले द कश्मीर फाइल्स के प्रदर्शन के बाद इसके निर्देशक विवेक अग्नहोत्री को काफी विरोध झेलना पड़ा था। उनको जान से मरने की धमकियां भी मिली थीं। इन सबके बीच शाह रुख खान की फिल्म पठान आई थी। उसके एक गाने में अभिनेत्री के वस्त्र को लेकर विवाद हुआ था। इन विवादों में एक बात समान रूप से देखने को मिलती है। अधिकतर लोग फिल्म को बिना देखे उसका विरोध करते हैं। यह मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव से कह रहा हूं। पिछले दिनों द केरल स्टोरी को लेकर भी मेरा यही अनुभव रहा था और अब 72 हूरों को लेकर भी ऐसा ही हो रहा है। जो लोग 72 हूरों को एजेंडा और प्रोपगैंडा फिल्म बता रहे हैं उनमें से अधिकतर ने ये फिल्म नहीं देखी है। मजे की बात ये कि फिल्म को एजेंडा और प्रोपगैंडा बतानेवाले अधिकतर लोग इस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी कर रहे हैं कि उन्होंने फिल्म नहीं देखी है। ये कैसा विरोध? किसी भी रचनात्मक कृति की आलोचना उसको बिना देखे या पढ़े कैसे की जा सकती है, ये समझ से परे है।

फिल्मों को लेकर इस तरह के वाद-विवाद की वजह से फिल्म कला का नुकसान हो रहा है। शोर मचाकर फिल्म हिट करवा लेने की बढ़ती प्रवृत्ति की वजह से देश में फिल्म संस्कृति के विकास की दिशा भटक रही है। इसपर हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए। विवादों के इस कोलाहल में फिल्म कला या फिल्म के क्राफ्ट उसकी कहानी और ट्रीटमेंट पर बात नहीं होती है। फिल्म पर गंभीरता से लेखन नहीं हो रहा है। फिल्मों पर लिखनेवाले अधिकतर लोग भी चाहे-अनचाहे इन विवादों का हिस्सा बन जाते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि फिल्म के क्राफ्ट पर बात हो, छायांकन और दृश्यांकन कला पर चर्चा हो। संवादों में जो फूहड़पन है और गीतों में जिस तरह से शब्दों का उपयोग हो रहा है उसपर बात होनी चाहिए। निर्देशकों की कला और संगीतकारों के प्रयोगों पर मंथन होना चाहिए। ये नहीं हो रहा है। हमेशा से इस तरह की बातें कम होती थीं लेकिन होती थीं। अब तो लगभग नहीं के बराबर हो रही हैं। कोरोना महामारी के दौरान फिल्म फेस्टिवल्स का आयोजन भी बाधित हुआ था। इस कारण वहां होनेवाले विमर्श भी नहीं हो पाए। फिल्मों पर गंभीर बात करने-कराने और उसके क्राफ्ट पर चर्चा करवाने में फिल्म फेस्टिवल्स की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जागरण फिल्म फेस्टिवल जैसे उत्सव देश के अठारह शहरों में आयोजित किए जाते हैं। जिनमें देश-विदेश की बेहतरीन फिल्में दिखाई जाती हैं। फिल्मों से जुड़े लोगों से संवाद होता है। निर्देशकों से उनके सोच के बारे में दर्शकों को जानने समझने का अवसर मिलता है। इस तरह के आयोजन देश में फिल्म संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण होते हैं। फिल्म फेस्टिवल्स की उपयोगिता असंदिग्ध है, इस पर फिर कभी बात होगी। 

फिल्मों पर जारी शोरगुल के बीच जब क्राफ्ट की बात होती है तो बिमल राय, व्ही शांतारम, सत्यजित राय, गुरुदत्त जैसे फिल्मकार याद आते हैं। आज गुरुदत्त की जयंती है। तीन दिन बाद 12 जुलाई को बिमल राय की जयंती है। बिमल राय की फिल्मों ने जिस तरह से भारतीय सिनेमा को ऊंचाई प्रदान की उसमें कई बार वो सत्यजित राय से बड़े फिल्मकार दिखाई देते हैं। उनकी फिल्म दो बीघा जमीन, सुजाता और बंदिनी को देखकर लगता है कि हमारे देश में कितनी उन्नत फिल्में बना करती थीं। फिल्मों की कहानियों में उसके पात्रों के माध्यम से बिमल राय जिस प्रकर से मानव मन की उलझनों को या यों कहें कि मनोविज्ञान के उलझे रेशे को दिखाते हैं वो अप्रतिम है। बिमल राय ये मानते थे कि मानव मन के अंदर चलनेवाले द्वंद्व का चित्रण दर्शकों को बांधता है। बिमल राय फिल्मों में यौनिकता के अत्यधिक प्रदर्शन के विरुद्ध थे। वो कहा करते थे कि फिल्मों में सेक्स सीन की बहुलता वही दिखाते हैं जिनको प्यार और प्रेम की समझ नहीं होती है। फिल्म दो बीघा जमीन में बिमल राय ने जिस प्रकार से स्वाधीनता के बाद औद्योगिक विकास और किसानों की समस्या को दिखाया है वो दर्शकों को झकझोरता है। इस फिल्म को देखकर किसी विदेशी आलोचक ने फिल्मकार की उस दृष्टि की प्रशंसा की थी जिसमें वो अपने देश के आर्थिक विकास की क्रूरता को रेखांकित करता है। बिमल राय की फिल्म देवदास, मधुमति और यहूदी की खूब चर्चा होती है क्योंकि ये फिल्में व्यावसायिक रूप से भी काफी सफल रही थीं। इन फिल्मों से दिलीप कुमार का अभिनय निखरा था। बिमल राय की फिल्म देवदास की तुलना प्रथमेश बरुआ की 1935 में बनी फिल्म देवदास से की जाती रही है। अधिकतार फिल्म इतिहासकारों का मानना है कि बिमल राय की फिल्म बरुआ की फिल्म से बेहतर बनी थी। बिमल राय की एक फिल्म की चर्चा कम होती है। ये फिल्म भारतीय फिल्मों के इतिहास में उल्लेखनीय मानी जा सकती हैं। ये फिल्म है परख। यह फिल्म तीसरे आम चुनाव के पहले की है। इस फिल्म में बिमल राय ने चुनावी राजनीति को विषय बनाया था और उसपर व्यंग्यात्मक लहजे में प्रहार किया था। फिल्मकार ने इस फिल्म में गांव में चलनेवाली राजनीतिक दांव-पेंच को बेहद सूक्ष्मता से पकड़ा और उसको अपने फिल्म के माध्यम से दर्शकों के सामने पेश कर दिया था। चुनाव किस तरह से एक शांत गांव को अशांत बनाता है, यह देखना हो तो फिल्म परख देखी जानी चाहिए।

पिछले कुछ वर्षों से ये कहा जाने लगा कि फिल्में सिर्फ मनोरंजन के लिए होती हैं। बिमल राय इससे अलग सोचते थे। वो मानते थे कि फिल्में दर्शकों का मनोरंजन तो करे ही विषय विशेष को लेकर बौद्धिक रूप से समृद्ध भी करे। बिमल राय की फिल्मों में ये दिखता भी है। इंटरनेट मीडिया के इस युग में फिल्मों पर लिखनेवाले बढ़े हैं, फेसबुक से लेकर ट्विटर पर आपको फिल्मों के कई प्रकार के विशेषज्ञ मिल जाएंगे लेकिन फिल्मों के क्राफ्ट पर गंभीरता से विमर्श का आभाव दिखता है। आज अधिकतर फिल्मकारों की रुचि बाक्स आफिस के आंकड़ों में रह गई है। इस आंकड़ों में रुचि रखना गलत नहीं है लेकिन बाक्स आफिस के अलावा फिल्मों के कंटेंट और उसके ट्रीटमेंट पर भी ध्यान रखना चाहिए। फिल्म निर्माण का उद्देश्य लाभ कमाना होना चाहिए। लेकिन लाभ के लिए कला को समाप्त करने की प्रवृत्ति रोकने के भी प्रयास किए जाने चाहिए। कलात्मकता के नाम पर फूहड़ता या यौनिकता के अत्यधिक प्रदर्शन से तात्कालिक लाभ तो हो सकता है लेकिन उससे कला का नुकसान होता है। याद पड़ता है कि जब बिमल राय की फिल्में देवदास, मधुमति और यहूदी जबरदस्त कामयाब हुईं तो इस बात की चर्चा आरंभ हो गई थी कि बिमल राय भी व्यावसायिकता की होड़ में शामिल हो गए हैं। इन तीन फिल्मों के बाद बिमल राय ने बंदिनी और सुजाता बनाकर इस धारणा का निषेध किया था। कहने का अर्थ ये है कि अगर आपके पास फिल्म निर्माण की कला होगी तो बाक्स आफिस भी आपके साथ होगा और बेहतर फिल्में भी बनेंगी। आज जिन फिल्मकारों के पास फिल्म की समझ दिखाई देती है उनको प्रोड्यूसर मिलने में कठिनाई होती है। आज बहुत कम ऐसे प्रोड्यूसर बचे हैं जो फिल्मों की बारीकियों को समझते हैं। ऐसे में दर्शकों का दायित्व बढ़ जाता है कि वो बेहतर फिल्मों के लिए दबाव बनाएं। 


Saturday, July 1, 2023

प्रतिभा विकास में भाषा बाधक न बने


दिल्ली विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मेट्रो रेल से विश्वविद्यालय गए। मेट्रो की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री ने साथ यात्रा कर रहे छात्रों से बातचीत की। छात्रों से चर्चा के समय प्रधानमंत्री मोदी ने बहुत ही अच्छी बात कही जिसपर देशव्यापी सोच बनना चाहिए। प्रधानमंत्री ने एक छात्र से जानना चाहा कि वो मूल रूप से कहां के रहनेवाले हैं। छात्र ने बताया कि वो रांची, झारखंड का है। प्रधानमंत्री ने सहजता से पूछा कि बाहर के किसी को दोस्त बनाया। रांची के उस छात्र ने उत्साह से बताया कि यूपी के लड़कों से दोस्ती की। वो जिस कालेज में पढ़ते हैं उसका प्रबंधन बालाजी मंदिर भी चलाते हैं तो वहां तेलुगु भाषी भी हैं। उसने तेलुगु बोलनेवालो से भी दोस्ती की है। वो उत्साह से बोले जा रहा था लेकिन प्रधानमंत्री कुछ और जानना चाह रहे थे। वो जानना चाह रहे थे कि दक्षिण भारत के राज्यों के छात्रों से दोस्ती की और उनसे उनकी भाषा के पांच-दस वाक्य सीखे या नहीं। प्रधानमंत्री के इतना बोलते ही एक छात्रा फटाक से बोल पड़ी कि उसने ऐसा किया है। एक वाकया भी बताया। वो अपने कालेज परिसर में थी तो उसने देखा कि एक लड़की फोन पर बात कर रही थी। बातचीत की भाषा वो नहीं समझ पा रही थी। बात खत्म होने के बाद उसने जानना चाहा कि किस भाषा में बात हो रही थी। पता चला कि बातचीत मलयालम में हो रही थी। इसके बाद उसने उस लड़की से अनुरोध किया कि उसे भी मलयालम के कुछ वाक्य बता दे। जैसे कि अगर को किसी को हैलो करना हो या हालचाल पूछना हो तो मलयालम में कैसे और क्या बोलेंगे। जब उस लड़की ने मलयालम में बताना आरंभ किया तो हिंदी भाषी लड़की ने फोन पर रिकार्ड कर लिया, ताकि बाद में उसको सुनकर सीख सके। इसी तरह से एक छात्रा ने बताया कि उसने मणिपुरी छात्राओं से मित्रता करके उनको हिंदी सिखाई तो असम की छात्रा ने बताया कि दिल्ली विवविद्यालय में अपने अध्ययन के दौरान उसने अपने कई साथियों का असमिया सिखाई। 

देखने में ये पूरा प्रसंग बहुत सामान्य लग रहा है लेकिन अगर सूक्ष्मता और गंभीरता से विचार करें तो एक देश के प्रधानमंत्री अपने देश के छात्रों को देश के अलग अलग हिस्सों में बोली जानेवाली भाषाओं को सीखने के लिए प्रेरित कर रहे थे। सहजता के साथ। इस देश ने भाषा के नाम पर अतीत में बहुत हिंसा झेली है। राज्यों का बंटवारा देखा है। खून खराबा देखा है। भारतीय भाषाओं को राजनीति का औजार बनते देखा है। अभी भी कभी कभार इस तरह के प्रसंग देखने को मिल जाते हैं। तमिलनाडु जैसे भाषाई रूप से समृद्ध प्रदेश के नेता अकारण हिंदी विरोध का झंडा उठाते रहते हैं। अब स्थितियां कुछ बदलती दिखने लगी हैं। सत्ता के शीर्ष स्तर पर बैठे नेताओं ने भारतीय भाषाओं को आगे बढ़ाने और उसके बल देने का उपक्रम आरंभ किया है। भाषा की राजनीति अपेक्षाकृत कम होने लगी है। प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत के क्रम में एक छात्र ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं के महत्व की चर्चा की। इसपर प्रधानमंत्री मोदी का उत्तर बेहद सधा हुआ था। सधा हुआ इस वजह से कि उन्होंने अंग्रेजी की आलोचना नहीं की। बिना अंग्रेजी की आलोचना के उन्होंने भारतीय भाषाओं की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि हमारे देश के गांवों में बहुत प्रतिभा है लेकिन अधिकतर को अंग्रेजी का सौभाग्य नहीं मिला तो वे प्रतिभाएं बाधित हो गईं, रुक गईं। बातचीत के क्रम में ही प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि प्रतिभा के विकास में भाषा बाधक नहीं होनी चाहिए। इस बातचीत से जो संदेश निकल रहा था वो ये भी था कि भारतीय भाषाओं के बीच किसी प्रकार का वैमनस्य नहीं होना चाहिए। हर भारतीय को मातृभाषा के अलावा एक और भाषा सीखनी चाहिए। 

पिछले दिनों भारतीय भाषाओं के बीच बेहतर समन्वय और अतीत की कटुता को दूर करने के लिए वाराणसी और गुजरात में तमिल संगम जैसे कार्यक्रम हुए। उसके पहले पिछले वर्ष शिमला में साहित्य अकादमी ने उन्मेष नाम से चार दिनों का एक कार्यक्रम किया था। शिमला में आयोजित उस कार्यक्रम में भारतीय भाषाओं के चार सौ के करीब लेखकों की भागीदारी रही थी। विभिन्न विषयों पर मंथन किया गया था। आगामी अगस्त के पहले सप्ताह में फिर से साहित्य अकादमी भोपाल में उन्मेष का आयोजन कर रही है। इसमें भी भारतीय भाषाओं के विद्वानों की भागीदारी होगी। तमिल से लेकर कश्मीरी तक, गुजराती-मराठी से लेकर बांगला और पूर्वोत्तर की भाषाओं के लेखकों के बीच विचारों का आदान-प्रदान होगा। अगर देखा जाए तो केंद्र सरकार के स्तर पर भारतीय भाषाओं के बीच संवाद बढ़ाने का प्रयास निरंतर चल रहा है। 

स्वाधीनता के पहले हिंदी और तमिल के बीच इतना अधिक साहचर्य था कि 1910 में तत्कालीन मद्रास से काशी आकर बी कृष्णस्वामी अय्यर ने घोषणा की थी कि हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है। तमिल और हिंदी भाषा के बीच कृतियों के अनुवाद की बेहद समृद्ध परंपरा थी। जयशंकर प्रसाद की कालजयी कृति कामायनी और आंसू दोनों काव्यों के अनुवाद तमिल में प्रकाशित हुए थे। प्रेमचंद के उपन्यास सेवासदन का भी तमिल में अनुवाद हुआ था और उसपर तो तमिल में एक फिल्म भी बनी थी। सुब्रह्मण्य भारती की रचनाओं को अनुवाद हिंदी में हो रहा था। आपको ये जानकर आश्चर्य हो सकता है कि तमिल के महावि कंब के रामायण का हिंदी में अनुवाद बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना से प्रकाशित हुआ था। अन्य भारतीय भाषाओं के बीच भी अनुवाद के क्रम चलते रहते थे। स्वाधीनता के कुछ वर्षों बाद जब भाषा के आधार पर राजनीति आरंभ हुई तो ये प्रक्रिया बाधित हुई। राजनीति ने भाषा को औजार बनाकर भारत को बांटने का काम किया। स्वाधीनता के पहले दक्षिण, पश्चिम और पूर्वी भारत से हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात उठती रहती थी। उन प्रदेशों के लोगों के मस्तिष्क में हिंदी को लेकर आशंका के बीज बो दिए गए। संविधान सभा में देश की भाषा समस्या पर तीन दिनों तक चर्चा हुई थी। वहां पुरषोत्तमदास टंडन जी के विचारों को आज याद करने की आवश्यकता है। टंडन जी को इस कारण क्योंकि वो हिंदी के प्रचंड समर्थक थे। जब हिंदी में अंतरराष्ट्रीय अंकों की स्वीकार या अस्वीकार करने पर बात हो रही तो किसी ने कहा कि जनमत लेने से तो हिंदी आएगी नहीं। इसपर टंडन जी का उत्तर था कि ‘यदि विभिन्न प्रांत हिंदी को स्वीकार नहीं करते हैं तो मैं किसी भी स्थिति में उनपर हिंदी लादने को तौयार नहीं हूं। प्रांत हिंदी को ग्रहण करेंगे या नहीं यह निश्चय तो उन्हीं को करना है। जो लोग आज जिम्मेदारी की जगहों पर बैठे हैं उनसे मैं अपील करूंगा कि वे अपनी अन्तरात्मा की बारीक आवाज को सुनने की कोशिश करें और ऐसी कोई भी बात स्वीकार नहीं करें जो उनके प्रांतों को अमान्य होगी।‘ 

भाषा को लेकर जिस प्रकार को जोश और उत्साह स्वाधीनता के पहले दिखता है वो स्वाधीनता के बाद शिथिल हो गया। जब भाषा में राजनीति का प्रवेश हुआ तो उसने भारतीय भाषाओं को लड़ाकर अंग्रेजी की स्थिति मजबूत कर दी। जब देश की अर्थव्यवस्था को खोला गया या उदारीकरण का दौर चला तब भी भारतीय भाषाओं को मजबूत करने के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किया गया। अंग्रेजी की स्थिति शासकों की भाषा वाली बनी रही। प्रधानमंत्री मोदी के आने के बाद भारतीय भाषाओं को लेकर एक सुचिंतित मुहिम शुरु हुई है। ये मुहिम निरंतर आगे बढ़ रही है जो भारतीय भाषाओं के लिए सुखद है। 


Saturday, June 24, 2023

औपनिवेशिक ताकतों का प्रतिकार


गीता प्रेस, गोरखपुर को गांधी शांति पुरस्कार देने की घोषणा होते ही इंटरनेट मीडिया और अन्य समाचार माध्यमों में सकारात्मक और नकारात्मक टिप्पणियां देखने को मिलने लगीं। कांग्रेस पार्टी ने तो एक पुस्तक की आड़ लेकर गीता प्रेस की तुलना गोडसे से कर डाली। कांग्रेस की इस तुलना के बाद मामले ने तूल पकड़ा और गीता प्रेस के साथ-साथ इससे जुड़े हनुमानप्रसाद पोद्दार के बारे में भी अनाप-शनाप लिखा जाने लगा। किसी ने उनको हिंदू सांप्रदायिकता से जोड़ा, किसी ने उनके संपादन में निकलनेवाली पत्रिका कल्याण में मुस्लिम लेखकों की खोज आरंभ कर दी, किसी ने उनको राष्ट्रीय स्वयंसेव संघ का एजेंडा चलानेवाला व्यक्ति बताया। हनुमानप्रसाद पोद्दार जी के बारे में विभिन्न प्रकार की टिप्पणियां पढ़ते हुए स्वर्गीय नरेन्द्र कोहली की एक बात याद आई। जब भी श्रीरामचरितमानस या महाभारत के बारे में कोई पाठक उनसे मूर्खतापूर्ण प्रश्न करता था तो वो हंसते हुए कहते थे कि अज्ञान असीमित होता है जबकि ज्ञान की सीमा होती है। हुनमानप्रसाद पोद्दार के बारे में भी अधिकतर टिप्पणीकारों ने असीमित अज्ञान का ही प्रदर्शन किया है। दरअसल होता ये है कि जब आप पूर्वाग्रह से भर कर किसी का आकंलन करते हैं या किसी एजेंडा के तहत किसी व्यक्तित्व या संस्थान का मूल्यांकन करते हैं तो उनके योगदानों को एकांगी होकर देखते हैं। गीता प्रेस और हनुमानप्रसाद पोद्दार पर टिप्पणी करते समय भी कई लोग इस दोष के शिकार हो गए। एक तो अज्ञान दूसरे एजेंडा। कांग्रेस ने क्यों हनुमानप्रसाद पोद्दार की तुलना गोडसे से की ये वही जानें लेकिन मुझे लगता है कि कांग्रेस पार्टी में हिंदुत्व और हिंदू महापुरुषों को लेकर एक भ्रम की स्थिति है जिसका प्रदर्शन उस पार्टी के नेता नियमित अंतराल पर करते रहते हैं। खैर हम राजनीति की बात नहीं करके पुस्तक और कल्याण पत्रिका को केंद्र में रखकर चर्चा करेंगे। 

गीता प्रेस की स्थापना 1923 में हुई। उस समय को याद करना चाहिए। भारत अंग्रेजों के अधीन था। उसके पहले हमारा देश मुगलों और अन्य आक्रांताओं की यातनाओं को झेल चुका था। भारतीय संस्कृति को लगातार मिटाने के प्रयास मुगलकाल में भी हुए और अंग्रेजों ने भी उसको आगे बढ़ाया। ऐसे कठिन समय में गीता प्रेस की स्थापना हुई। हिंदू धार्मिक ग्रंथों के इस प्रकाशन गृह ने हिंदुओं को बेहद सस्ते दामों पर अपने पौराणिक ग्रंथों से परिचय करवाया। गीता प्रेस के योगदान को इस दृष्टि से भी देखे जाने की आवश्यकता है कि इसने स्वाधीनता संग्राम के लिए देश के जनमानस को तैयार किया। भारतीय पौराणिक ग्रंथों का प्रकाशन और उसको जन-जन तक पहुंचाकर गीता प्रेस ने जो कार्य किया है उसके समांतर विश्व इतिहास में कम उदाहरण मिलते हैं। इन ग्रंथों को पढ़कर, धर्म के प्रति, न्याय के प्रति, अपने अधिकारों के प्रति, समाज के प्रति और देश के प्रति जनता के मन जो भावना जाग्रत हुई उसके आकलन के बिना गीता प्रेस और उसके योगदान पर लिखा नहीं जा सकता है। यह तो भारतीय इतिहास लेखन की दोषपूर्ण पद्धति रही है कि उसने हिंदू धर्म से जुड़ी संस्थाओं और संस्थानों के योगदानों की चर्चा तक नही की। अगर कहीं उल्लेख करने की मजबूरी हुई तो एक पंक्ति में लिख दिया। आज फ्रांस के प्रकाशक गालीमर की चर्चा पूरी दुनिया में होती है क्योंकि उस देश के लेखकों ने इस प्रकाशन गृह के बारे में, उसके योगदान के बारे में लिखा लेकिन गीता प्रेस को धार्मिक पुस्तकों का प्रकाशन करार देकर उसको हाशिए पर डालने का प्रयास हुआ। 

गीता प्रेस से प्रकाशित पत्रिका कल्याण में प्रेमचंद से लेकर निराला तक ने लेख लिखे हैं। वामपंथी इतिहासकारों ने इसकी चर्चा तक नहीं की। यहां तक की जब इन लेखको का मूल्यांकन करते हुए आलोचनात्मक पुस्तकें लिखी गईं तो कल्याण में प्रकाशित उनके लेखों  की उपेक्षा की गई। अगर निराला और प्रेमचंद के कल्याण में प्रकाशित लेखों को सामने रखा जाता तो उनको वामपंथी विचार का लेखक सिद्ध करने में परेशानी होती। वो भारतीय विचारों के लेखक के तौर पर देश के सामने होते। प्रेमचंद ने कल्याण के कृष्णांक में जो लेख लिखे थे वो गीता प्रेस से पुस्तकाकार प्रकाशित है और अब भी बाजार में उपलब्ध हैं। हिंदी साहित्य से जुड़े नंददुलारे वाजपेयी, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, चतुरसेन शास्त्री और बनारसीदास चतुर्वेदी जैसे दिग्गज रचनाकार कल्याण पत्रिका के संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार के संपर्क में थे। नंददुलारे वाजपेयी ने तो 24.12.1931 के अपने पत्र में लिखा भी, कल्याण के द्वारा आप समाज की जो सेवा कर रहे हैं वो मुझे बहुत अच्छी लगती है। आपने महर्षि शंकराचार्य आदि के मूल्यावान ग्रंथों की प्रकाशन व्यवस्था करके हिंदी पर बड़ा उपकार किया है। 

गीता प्रेस और कल्याण पत्रिका ने सनातन संस्कृति को बल देने का कार्य भी किया। देश सैकड़ों वर्षों से गुलामी की जंजीर में जकड़ा हुआ था। सनातन पर दूसरी संस्कृति को थोपने के लगातार प्रयास हो रहे थे। ऐसे वातावरण में सनातनी ग्रंथों का प्रकाशन और सनातनी विचारों से पूर्ण पत्रिका कल्याण के द्वारा गीता प्रेस ने औपनिवेशिक ताकतों का प्रतिकार किया। कल्याण पत्रिका ने न केवल सनातनी संस्कृति को बल दिया बल्कि उसने हिंदी भाषा के क्षितिज का भी विस्तार किया। जब देश में अंग्रेज शासक उर्दू को बढ़ावा दे रहे थे तो कल्याण के जरिए और अपने प्रकाशनों के जरिए गीता प्रेस हिंदी को मजबूती प्रदान कर रही थी। 1932 के 12 मार्च को बनारसीदास चतुर्वेदी ने हनुमान प्रसाद पोद्दार को एक पत्र लिखकर कहा कि कल्याण के 16 हजार ग्राहक हैं। यदि आप उसके मूल्य में चार आने की भी वृद्धि कर दें और उस चार हजार रुपयों से हिंदी के लेखकों से अच्छे लेख लिखाने और अनुवाद आदि कराने में व्यय करे तो अनेक लेखकों का आप उद्धार कर सकते हैं। अपने इसी पत्र में चतुर्वेदी जी ने हनुमानप्रसाद पोद्दार जी को स्वर्गीय गणेश शंकर विद्यार्थी का अनुसरण करने की सलाह दी और लिखा, स्वर्गीय गणेश शंकर विद्यार्थी को मैं सच्चा आस्तिक और भक्त मानता हूं। इस पंक्ति से भी एजेंडा लेखन की पोल खुलती है जो गणेश शंकर विद्यार्थी को वामपंथी सिद्ध करते रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि गीता प्रेस गोरखपुर के योगदान का मूल्यांकन समग्रता में किया जाए। 

इस पूरे प्रकरण से एक बात और स्पष्ट हो गई है कि वर्तमान समय में जो विचारधारा का संघर्ष चल रहा है उसमें पुस्तकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। कर्नाटक चुनाव के पहले देवारुण महादेव की एक पतली सी पुस्तक आई थी आरएसएस, द लांग एंड शार्ट आफ इट। इस पुस्तक का फोरवर्ड रामचंद्र गुहा ने आफ्टरवर्ड योगेन्द्र यादव ने लिखा था। कवर पर हिंदी लेखिका गीतांजलिश्री की टिप्पणी प्रकाशित थी। कन्नड में लिखी गई इस पुस्तक का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया गया। चुनाव के पहले प्रदेश में माहौल बनाने के लिए इस पुस्तक को चर्चित करने और पाठकों तक पहुंचाने का उपक्रम किया गया। जैसा कि इस पुस्तक के नाम से जाहिर है कि इसका केंद्रीय विषय राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ है। इसमें लेखक ने राष्ट्रीय संव्यंसेवक संघ के कार्यक्रमों की आलोचना की। कुछ गलत तथ्यों के साथ भी। जब देश के तथाकथित बड़े लेखक और इतिहासकार उसकी चर्चा करते हैं तो आम पाठकों के बीच उस पुस्तक को लेकर एक उत्सुकता पैदा होती है। यह सही है कि पुस्तकों का चुनावी राजनीति पर सीधा असर नहीं होता है लेकिन पुस्तकों में प्रकाशित विचार मतदाताओं को परोक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। इस वक्त विचारधारा विशेष के लेखक और बुद्धीजीवी पुस्तकों के माध्यम से राजनीति करने में लगे हैं और उनको हिंदी और अंग्रेजी के कुछ प्रकाशकों का साथ भी मिल रहा है। वैकल्पिक विचारधारा के लेखकों को भी पुस्तक का उत्तर पुस्तक से ही देना होगा।    


Saturday, June 17, 2023

उद्देश्य बदलने की आवश्यकता


आज देश की राजनीति में नेहरू से जुड़ा कोई प्रसंग अगर आता है तो उसपर फौरन राजनीति आरंभ हो जाती है। पक्ष विपक्ष के बीच बयानों के तीर चलने लगते हैं। कुछ दिनों के बाद मामला शांत हो जाता है। ताजा मामला नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय से जुड़ा हुआ है। दिल्ली के इस परिसर का नाम बदलकर प्रधानमंत्री संग्रहालय और पुस्तकालय कर दिया गया है। उसी परिसर में नेहरू समेत भारत के सभी प्रधानमंत्रियों का एक विश्वस्तरीय संग्रहालय बनाया गया था। इसके आधार पर ही नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय सोसाइटी के सदस्यों ने इसका नाम बदलने का निर्णय लिया। कांग्रेस के नेता सोसाइटी के इस कदम से आगबबूला हैं। कांग्रेस अध्यक्ष ने लंबा ट्वीट लिखकर इसपर अपनी आपत्ति जताई और भारतीय जनता पार्टी को निशाने पर लिया। ये तो हुई राजनीति की बातें। जब भी किसी जिले, शहर, भवन या रोड आदि का नाम बदला जाता है उसपर विवाद उठते ही रहते हैं। बयानबाजी और राजनीति भी होती ही है। ये तो स्वाधीनता के बाद से ही चलता आया है। कांग्रेस की इस बात लेकर आलोचना होती रही है कि देशभर में सैकड़ों सड़कों, भवनों, संस्थानों आदि के नाम नेहरू, इंदिरा, राजीव और संजय गांधी के नाम पर रखे गए। बाद की सरकारों ने भी अपने नेताओं या अपनी विचारधारा से जुड़े लोगों के नाम पर भवनों, सड़कों आदि के नाम रखे। कभी कम तो कभी अधिक विवाद हुए। लेकिन आज हम बात कर रहे हैं नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय के नाम बदले जाने पर उठे विवाद की। 

पहले जान लेते हैं कि नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय किन परिस्थियों में और किन उद्देश्यों को लेकर बनाया गया था। नेहरु की कैबिनेट में शिक्षा मंत्री रहे मोहम्मदअली करीम छागला की आत्मकथा है रोजेज इन दिसंबर। ये पुस्तक भारतीय विद्या भवन से प्रकाशित है। इसमें छागला ने नेहरू के कालखंड की बहुत सारी स्मृतियों को सहेजा है। उन्होंने स्वाधीन भारत में इतिहास लेखन आरंभ करने के प्रसंग पर भी लिखा है। छागला औपनिवेशिक इतिहासकारों के लिखे से संतुष्ट नहीं थे। देश के इतिहास को नए सिरे से लिखवाने के लिए उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में लेक्चरर रहीं मिस थापर को चुना था। छागला के मुताबिक मिस थापर तर्कवादी और आधुनिक सोच वाली महिला थीं। पूर्वाग्रह से भी मुक्त। उन्होंने इतिहास की दो पुस्तकें तैयार की। इसके अलावा वो नेहरू संग्रहालय और पुस्तकालय की स्थापना की कहानी भी बताते हैं। लिखते हैं कि, ‘नेहरू के निधन के बाद मैंने ये व्यवस्था की कि तीन मूर्ति भवन का एक हिस्सा उसी तरह से संजोया जाए जिस तरह  नेहरू के जीवित रहते हुआ करता था। मैं चाहता था कि पूरे भारवर्ष से लाखों लोग आएं और इस घऱ को राष्ट्र मंदिर के तौर पर देखें। उस वक्त के राष्ट्रपति राधाकृष्णन ने एक भव्य समारोह में तीनमूर्ति भवन को इस उद्देश्य के लिए समर्पित किया। लेकिन मैं ये नहीं चाहता था कि ये सिर्फ एक संग्रहालय के तौर पर रहे मृतप्राय स्थिति में रहे बल्कि मेरी इच्छा थी कि ये विचार और आदर्श के जीवंत केंद्र के रूप मे विकसित हो। इसको ध्यान में रखते हुए वहां एक पुस्तकालय की स्थापना की गई। इस पुस्तकालय में आधुनिक भारत की प्रगति से संबंधित पुस्तकें और सामग्री रखने की योजना बनी। इसको ध्यान में रखते हुए इस विषय से संबंधित उपलब्ध पुस्तकों को जुटाया गया। छात्रों को पुस्तकें लिखने के लिए प्रेरित किया गया। उन लोगों के अनुभवों को टेप पर रिकार्ड किया गया जो नेहरू से मिले थे। अब समस्या थी एक ऐसे निदेशक को खोजने की जो इस तरह के कार्यों में रुचि रखता हो। फिर मेरी नजर रेल मंत्रालय में काम करनेवाले श्रीमान नंदा पर नजर गई। उन्होंने कुछ पुस्तकें लिखी थीं, जो मैंने देखी थीं। मैंने उनको नेहरू संग्रहालय में नियुक्त कर दिया।‘ इस प्रसंग को बताने के क्रम में वो ये भी स्वीकार करते हैं कि नेहरू संग्रहालय और पुस्तकालय की स्थापना के बाद देश में इतिहास लेखन को प्रोत्साहन मिला।

छागला की आत्मकथा के इस प्रसंग के कई बातें ध्वनित होती हैं जो नेहरू संग्रहालय और पुस्तकालय की स्थापना के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हैं। एक तो ये कि उस वक्त की सरकार नेहरू संग्रहालय और पुस्तकालय को राष्ट्र मंदिर के तौर पर स्थापित करना चाहती थी। एक ऐसा राष्ट्र मंदिर जहां नेहरू देवता के तौर पर स्थापित हों और देश की जनता उनको और उनके विचारों की पूजा करे। छागला ने जो लिखा है उससे स्पष्ट है कि इस केंद्र को इतिहास लेखन के केंद्र के रूप में विकसित करने की भी योजना बनी। इतिहास लिखा भी गया। किस तरह का इतिहास लिखा गया ये सबको पता है। अगर आप किसी व्यक्ति को केंद्र में रखकर राष्ट्र मंदिर बनाएंगे तो वहां लिखा जाने वाला इतिहास भी तो उस व्यक्ति की महत्ता को स्थापित करने के कार्य में जुटेगा। ठीक से याद नहीं है लेकिन किसी अन्य पुस्तक में इस बात भी उल्लेख है कि इंदिरा गांधी भी चाहती थीं कि तीन मूर्ति किसी भी कीमत पर सरकार के पास नहीं जाए और वहां नेहरू से जुड़ी चीजें आदि रखी जाएं। रही बात इसको आदर्श वैचारिक केंद्र बनाने की तो वो ये केंद्र कभी बन नहीं पाया। यहां के जो भी निदेशक हुए उनमें से अधिकतर ने जो कार्य करवाए उसके केंद्र में नेहरू और कांग्रेस रही। ज्यादा पीछे नहीं जाते हुए एक उदाहरण देता हूं। 2011 में कांग्रेस पार्टी के इतिहास पर केंद्रित दो खेंडो में पुस्तक आई। नाम था कांग्रेस एंड द मेकिंग आफ द इंडियन नेशन। इस पुस्तक के प्रधान संपादक थे प्रणब मुखर्जी और इसको तैयार करने में मृदुला मुखर्जी, आदित्य मुखर्जी और अन्य की भूमिका थी। अब जरा जान लीजिए कि मृदुला मुखर्जी कौन हैं। वो नेहरू संग्रहालय और पुस्तकालय की निदेशक थीं। उनको सोनिया गांधी का आशीर्वाद प्राप्त था। जब रामचंद्र हुहा के नेतृत्व में उनको नेहरू मेमोरियल के निदेशक पद से हटाने की मुहिम चली थी तो उन्होंने एक प्रसंग में कहा था कि उनको सोनिया गांधी का मैंडेट प्राप्त है। तब ये प्रश्न मुखरता से नहीं उठा था कि सोनिया गांधी ने किस हैसियत से नेहरू संग्रहालय और पुस्तकालय के निदेशक को मैंडेट दिया था। इस प्रसंग का उल्लेख इस कारण कर रहा हूं कि छागला ने जिस सोच के साथ नेहरू स्मारक औऐर संग्रहालय की स्थापना की थी उसको कालांतर में खाद पानी डालकर पोसा गया। नेहरू संग्रहालय और पुस्तकालय के अलावा नेहरू स्मारक निधि भी उसी परिसर से चलता है। इस निधि से शोध करने के लिए भी धन दिया जाता है। इस निधि से शोध करनेवाले शोधार्थियों की सूची और उनके विषयों पर नजर डाल लीजिए पता चल जाएगा कि कैसे एक परिवार और पार्टी विशेष को केंद्र में रखकर इसको चलाया जा रहा था। 

अभी तो नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय का नाम बदला गया है। सोसाइटी को ये निर्णय करना चाहिए कि भारत के सभी प्रधानमंत्रियों के कालखंड में देश को प्रभावित करने या दिशा देनेवाली घटनाएं घटी हैं उनपर शोध हो। उनका दस्तेवाजीकरण किया जाए। उन घटनाओं से जुड़े लोगों के साक्षात्कार रिकार्ड करवाकर इस पुस्तकालय में रखे जाएं ताकि आनेवाली पीढ़ियों के शोधार्थियों को देश के सभी प्रधानमंत्रियों के योगदान के बारे में जानकारी उपलब्ध हो सके। संस्कृति मंत्रालय के अधीन आनेवाले इस संस्थान को इस ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। देश के सभी प्रधानमंत्रियों ने इस राष्ट्र के निर्माण में अपना योगदान दिया है। उनके विचारों को और उनके समय की परिस्थियों को जानने का अधिकार हर भारतीय को है। अगर ऐसा हो पाता है तो इस संग्रहालय के नाम बदलने की सार्थकता सिद्ध होगी अन्यथा तो बस राजनीति और बयानों के भंवर में ये मुद्दा खो जाएगा.

Saturday, June 10, 2023

कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक पर राजनीति


नई संसद के उद्घाटन को करीब एक पखवाड़ा होने को आया लेकिन सेंगोल पर प्रश्न अब भी उठ रहे हैं। स्वाधीनता के समय सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के तौर पर सेंगोल को लार्ड मांउटबैटन को सौंपा गया था।फिर उनसे लेकर समारोहपूर्वक जवाहरलाल नेहरू को सौंपा गया। सरकार का तर्क है कि सेंगोल को सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की सलाह पर बनाया गया था। विपक्ष इसकी प्रामाणिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है। कांग्रेस इस प्रसंग को कालपनिक बता रही है। 14 अगस्त 1947 का एक चित्र भी उपलब्ध है जिसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू के हाथ में सेंगोल है और उनके साथ थिरूवावडुथुरई अधीनम के कुमारस्वामी तम्बीरमन खड़े हैं। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की सलाह पर सेंगोल तैयार करने का दायित्व थिरूवावडुथुरई अधीनम को अनुरोधपूर्वक सौंपा गया था। जिस जूलर ने सेंगोल बनया था उसने भी इसको प्रमाणित कर दिया। अभी थिरूवावडुथुरई अधीनम की तरफ से एक लिखित बयान जारी किया गया है जिसमें कहा गया है कि उन्हें इस बात का गर्व है कि वो 1947 के सेंगोल समारोह का हिस्सा रहे हैं। सरकार के आमंत्रण पर थिरूवावडुथुरई अधीनम से संतों का एक समूह सेंगोल लेकर दिल्ली गया था। वहां सबसे पहले सेंगोल को लार्ड मनाउंटबेटन को सौंपा गया। माउंटबेटन से वापस लेकर सेंगोल का गंगाजल से अभिषेक करवाया गया। अभिषेक के बाद सेंगोल को जवाहरलाल नेहरू को सौंपा गया। 

थिरूवावडुथुरई अधीनम के मुताबिक हाल ही में अधीनम का इतिहास प्रकाशित हुआ है। उस पुस्तक में सेंगोल सिरापु नाम से एक अध्याय है जिसमें भी इस बात का उल्लेख है कि सेंगोल को पहले लार्ड माउंटबेटन को सौंपा गया और उसके बाद जवाहरलाल नेहरू को। थिरूवावडुथुरई अधीनम से जुड़े मसीलामणि पिल्लै इस पूरे घटनाक्रम को अपनी आंखों से देख चुके हैं। वो इस वक्त 96 वर्ष के हैं और इस पूरे घटनाक्रम को सही बता रहे हैं। पिल्लै ने ये भी बताया कि सेंगोल से सत्ता हस्तांतरण का पूरा कार्य चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की पहल पर हुआ था। इस बात के भी प्रमाण हैं कि 1947 में मद्रास के कलेक्टर थिरूवावडुथुरई अधीनम आए थे और उन्होंने सेंगोल की व्यवस्था के कार्य को परखा था। कुछ लोग प्रश्न उठा रहे हैं कि अगर माउंटबेटन को सेंगोल सौंपा गया था तो उसकी कोई तस्वीर क्यों नहीं है। अधीनम ने उसका भी उत्तर दिया है कि माउंटबेटन से मिलने संतों का जो समूह गया था उसमें कोई कैमरामैन नहीं था। सवाल ये उठता है कि थिरूवावडुथुरई अधीनम के दावों पर प्रश्न क्यों उठाए जा रहे हैं। जब उस पूरी घटना के दो जीवित गवाह हैं जो ये कह रहे हैं कि माउंटबेटन को सेंगोल सौंपा गया था उसके बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू को सौंपा गया। उनके बयान के बाद संदेह की गुंजाइश बचती कहां है। सेंगोल से सत्ता हस्तांतरण की परंपरा चोल राजवंश में थी उसको स्वतंत्र भारत में सनातन से जोड़कर अपनाया गया। समाज के उस हिस्से को सेंगोल बनाने और सत्ता हस्तांतरण समारोह की जिम्मेदारी दी गई जो गैर ब्राह्मण थे, लेकिन शिव और सनातन में उनकी आस्था थी। थिरूवावडुथुरई अधीनम तमिलनाडू के शिवभक्तों का एक बड़ा और प्रभावशाली समूह है। इस समुदाय को स्वाधीन देश से जोड़ने का चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का सोच था जिसको माउंटबेटन से लेकर नेहरू तक ने माना था।   

सेंगोल की कहनी पर प्रश्न उठ रहे हैं तो पंडित नेहरू से जुड़ा एक और प्रसंग याद आ रहा है। उस प्रसंग को बताने के पहले नेहरू के बारे में आधुनिक भारत के इतिहासकारों की राय देखते हैं। लगभग सभी इतिहासकारों ने इस बात पर बल दिया है कि नेहरू धर्म को शासन से अलग रखना चाहते थे। उनकी छवि भी इसी प्रकार से गढ़ी गई कि वो सरकारी कामों से धर्म को अलग रखना चाहते थे। इतिहासकारों से इस आकलन में चूक हुई। नेहरू सत्ता में बने रहने के लिए इस तरह का कार्य किया करते थे। जब उनको लगता था कि सत्ता के लिए या राजनीति के लिए धर्म का उपयोग आवश्यक है तो वो बिल्कुल नहीं हिचकते थे। अब उस प्रसंग पर आते हैं जिससे ये बात साफ भी हो जाएगी। तिथि 14 अगस्त 1947। शाम के समय डा राजेन्द्र प्रसाद के घर पूजा और हवन आदि का आयोजन किया गया। हिंदू पुरोहितों को बुलाया गया था कि वो हवन आदि करवाएं। भारत की नदियों से पवित्र जल मंगवाए गए थे। डा राजेन्द्र प्रसाद और नेहरू हवन कुंड के सामने बैठे थे और वहां उपस्थित महिलाओं ने दोनों के माथे पर चंदन का तिलक लगाया। फिर नेहरू और राजेन्द्र प्रसाद ने हवन आदि किया। पूजा और हवन के पहले नेहरू ने सार्वजनिक रूप से ये स्टैंड लिया था कि उनको ये सब पसंद नहीं है। तब उनके कई मित्रों ने समझाया कि सत्ता प्राप्त करने का हिंदू तरीका यही है। नेहरू इस हिंदू तरीके को अपनाने को तैयार हो गए। इसका उल्लेख ‘आफ्टरमाथ आफ पार्टिशन इन साउथ एशिया’ नाम की पुस्तक में मिलता है। कई अन्य जगहों पर भी। बावजूद इसके आधुनिक भारत के अधिकतर इतिहासकारों ने नेहरू के व्यक्तित्व को धर्म से निरपेक्ष व्यक्तित्व के तौर पर गढ़ा। 

नेहरू से जुड़ा एक और किस्सा है। 1952 में लोकसभा का चुनाव चल रहा था। नेहरू उत्तर प्रदेश के फूलपुर में एक स्थान पर चुनावी सभा कर रहे थे। तभी उसी रास्ते से स्थानीय राजा अपने हाथी पर सवार होकर निकले। नेहरू की सभा के कारण राजा और उनके हाथी को रोक दिया गया। राजा नाराज हो गए। मंच पर बैठे नेहरू को जब इस बात का पता चला तो वो वहां से उतरकर राजा के पास पहुंचे। वहां पहुंचकर नेहरू ने महाराज की जय हो कहकर उनका अभिवादन किया। राजा खुश हो गए। हाथी से उतरकर नेहरू के साथ मंच पर गए और सभा में उपस्थित जनता से नेहरू को वोट देने की अपील कर दी। उसके बाद राजा वहां से चले गए। राजा के जाने के बाद नेहरू ने उस अधिकारी को समझाया कि राजा को जयकारे की जरूरत थी और और मुझको वोट की। मैंने राजा की इच्छा पूरी की और उन्होंने मेरी। इसी तरह से लेनार्ड मोस्ले की 1961 में प्रकाशित पुस्तक द लास्ट डेज आफ ब्रिटिश राज में इस बात का उल्लेख मिलता है कि नेहरू रेडक्लिफ को भारत पाकिस्तान के सीमा निर्धारण के लिए अधिक समय देने के पक्ष में नहीं थे। उनको लगता था कि जल्द से जल्द भारत की स्वाधीन सरकार बने। सीमा निर्धारण बाद में दोनों देश आपसी सहमति से कर लेंगे। परिणाम सबके सामने है। 

सेंगोल प्रकरण में प्रश्न तो ये उठाया जाना चाहिए कि भारत के इतिहास का इतना महत्वपूर्ण अध्याय क्यों दब या दबा दिया गया। सेंगोल जैसा महत्वपूर्ण प्रतीक राष्ट्रीय संग्रहालय में न होकर प्रयागराज के संग्रहालय में क्यों और कैसे पहुंचा। सनातन को मानने वाले समाज के पिछड़े वर्ग के समूह अधीनम को प्रतिनिधित्व देने के राजा जी की इंक्लूसिव सलाह को इतिहास के पन्नों में गुम करने का षडयंत्र किसने रचा। देश इन प्रश्नों का उत्तर चाहता है। कहानियों में उलझाने से बेहतर है कि इन प्रश्नों पर बात हो। 

Saturday, June 3, 2023

नसीरुद्दीन शाह का बुढ़भस


तीन-चार वर्ष पूर्व की बात है।फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने एक साहित्योत्सव में कहा था कि वो फिल्मों में इस कारण आए थे क्योंकि वो लोकप्रिय होना चाहते थे। नसीरुद्दीन शाह इतने पर ही नहीं रुके थे बल्कि यहां तक कहा था कि वो फिल्मों के माध्यम से कला की सेवा करने के उद्देश्य से इस क्षेत्र में नहीं आए थे बल्कि वो तो लोकप्रियता चाहते थे। जो लोग फिल्मों में आने का कारण कला की सेवा बताते हैं वो झूठ बोलते हैं। सचाई ये है कि लोग फिल्मों में धन कमाने और प्रसिद्ध होने के लिए आते हैं। ये वो व्यक्ति बोल रहा था जिनको श्रेष्ठ कलाकार और कला को नई ऊंचाई पर पहुंचानेवाला अभिनेता आदि कहा जाता रहा है। नसीरुद्दीन शाह के इस वक्तव्य के कुछ महीनों पहले उनकी पुस्तक आई थी। दरअसल देश में पिछले कई वर्षों से एक ट्रेंड चल रहा है कि जिन फिल्मी कलाकारों को काम नहीं मिलता है या कम काम मिलता है वो पुस्तक लिख देते हैं। पुस्तक लिखने का एक फायदा यह होता है कि उनको बुद्धीजीवी मान लिया जाता है और दूसरा कि उनको साहित्योत्सवों में आमंत्रित किया जाने लगता है। साहित्योत्सवों से एक अलग प्रकार की लोकप्रियता मिलती है। तो नसीरुद्दीन शाह को जब काम कम मिलने लगा तो उन्होंने भी पुस्तक लिख दी। कई साहित्योत्सवों में बुलाए गए। वहां विवादित बयान देकर चर्चित हुए। पुस्तक भी खूब बिकी। इस बात को भी कई वर्ष बीत गए। उनकी कोई दूसरी पुस्तक नहीं आई तो साहित्योत्सवों से आमंत्रण मिलना बंद हो गया। अब उन्होंने चर्चित होने का एक नया तरीका निकाला। समय समय पर विवादित बयान देने लगे। कभी देश में डर का माहौल बताने लगे तो तो कभी इस भय के वातावरण के कारण अपने बच्चों की चिंता जताने लगे। कभी अनुपम खेर को जोकर कह दिया तो कभी अन्य साथी कलाकारों पर घटिया टिप्पणी कर दी। इंटरनेट मीडिया के इस युग में इस तरह के विवादित बयानों को प्रचलित होते देर नहीं लगती है और पक्ष विपक्ष में बयानवीर खड़े हो जाते हैं। 

जब नसीर को फिल्मों में कम काम मिलने लगा तो उन्होंने ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म्स की ओर रुख किया। जब उनकी कोई बेव सीरीज रिलीज होती तो फिर वो सामने आते और विवादित बातें कहकर चर्चा में बने रहने का प्रयास करते। अभी जब उनकी वेब सीरीज ताज,रेन आफ रिवेंज आई तो एकबार फिर से नसीर को इंटरव्यू आदि देने का अवसर मिला। इस बार नसीरुद्दीन शाह को तो डर नहीं लगा बल्कि इस बार वो इस बात को रेखांकित करते दिखे कि हिंदी फिल्मों के बड़े कलाकार भयभीत हैं। इसके अलावा वो नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह का भी उपहास उड़ाते नजर आए। नसीर ने प्रश्न उठाया कि नए संसद के उद्घाटन के समय इस तरह के भव्य समारोह की क्या आवश्यकता थी। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम लिए बिना यहां तक कह दिया कि देश के सुप्रीम नेता स्वयं के लिए स्मारक बनवा रहे हैं। उनको इस बात पर भी आपत्ति है कि संसद के शुभारंभ समारोह में नरेन्द्र मोदी हाथ में धर्म दंड लिए पुजारियों से क्यों घिरे हुए थे। उपहास के अंदाज में कहा कि ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे ब्रिटेन का राजा बिशपों के साथ चल रहा हो। अब नसीरुद्दीन शाह को भारतीय परंपराओं के बारे में कौन समझाए। जब उनका मूल उद्देश्य ही प्रचार पाना हो तो वो उस प्रकार की बातें ही करते हैं जो हेडलाइन बने और इंटरनेट मीडिया पर प्रचलित हो सके। उनको शायद ये ज्ञात नहीं होगा कि जब देश को स्वाधीनता मिली थी तो जवाहरलाल नेहरू ने भी डा राजेन्द्र प्रसाद के घऱ पर पूजा पाठ की थी। देशभर की नदियों के जल का छिड़काव करवाया गया था। पूजा-पाठ के उस कार्यक्रम के बाद जवाहरलाल नेहरू, डा राजेन्द्र प्रसाद और अन्य स्वाधीनता सेनाननियों के साथ संविधान सभा की बैठक में भाग लेने गए थे। जब आपको अपने देश की परंपरा का बोध न हो और आलोचना करके प्रसिद्धि हासिल करना उद्देश्य हो तो इस तरह के अनर्गल बातें ही की जा सकती हैं। जब उनसे ये पूछा गया कि शाह रुख खान ने तो संसद भवन और उसकी भव्यता की प्रशंसा की तो उन्होंने खामोशी ओढ़ ली।

नसीरुद्दीन शाह मुंह खोलें और डर की बात न करें ये तो संभव ही नहीं है। शाह रुख और आमिर जैसे अभिनेताओं को भी 2014 के बाद इस देश में डर लगा था लेकिन अब वो भयमुक्त होकर काम कर रहे हैं। नरेन्द्र मोदी का विरोध करनेवाले आमिर खान न केवल प्रधानमंत्री मोदी से मिलते हैं बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों से मिलने-जुलने में उनको किसी प्रकार का परहेज नहीं है। एक नसीरुद्दीन शाह बचे हैं जिनको अब भी लगता है कि हिंदी फिल्मों के जिन लोगों की बातों में वजन है वो किसी डर से चुप हैं। नसीरुद्दीन शाह इस बात को लेकर चिंतित नजर आते हैं कि इस समय देश में एजेंडा और प्रोपगैंडा वाली फिल्में बन रही हैं और हिंदी फिल्मों के दिग्गज किसी अनजान डर से इसके विरोध में चुप हैं। नसीर साहब इस बात को भूल गए कि जब वो समांतर सिनेमा के दौर में प्रसिद्धि पा रहे थे तो उन फिल्मों में किस विचारधारा का एजेंडा चल रहा था। उस समय तो वो सफल थे, उनकी बातों का वजन और असर होता। तब तो उनको न तो एजेंडा दिखा और न ही प्रोपेगैंडा। उस दौर के पहले जाएं तो जब ख्वाजा अहमद अब्बास के नेतृत्व में अभिनेताओं की टीम सोवियत रूस जाकर वहां कार्यक्रमों में हिस्सा लेती थे। वहां की सरकार के आतिथ्य का आनंद उठाती थी और लौटकर उनकी विचारधारा के आधार पर फिल्में बनाती थी। उसके बारे में कभी नसीरुद्दीन शाह ने कुछ नहीं बोला। इसको कहते हैं चुनिंदा चुप्पी या चुनिंदा मसलों पर प्रतिक्रिया देना। इस तरह की बातें अब देश की जनता समझने लगी है। समझ तो इनका एजेंडा भी आ गया है। 

नसीरुद्दीन शाह के बारे में जावेद अख्तर और सलीम खान की राय एक है। दोनों का मानना है कि नसीर कुंठा में इस तरह के बयान देते हैं। दरअसल कुछ वर्षों पूर्व नसीरुद्दीन शाह ने राजेश खन्ना को औसत कलाकार कहकर उनका मजाक उड़ाया था। तब जावेद अख्तर ने स्पष्टता के साथ कहा था कि ‘नसीर साहब को कोई सक्सेसफुल आदमी पसंद नहीं है। अगर कोई पसंद हो तो नाम बताएं कि ये आदमी मुझे अच्छा लगता है क्योंकि वो सक्सेसफुल है। मैंने तो आज तक नहीं सुना। वो दिलीप कुमार को क्रिटिसाइज करते हैं, अमिताभ बच्चन को क्रिटिसाइज करते हैं, हर आदमी जो सक्सेसफुल है उनको अच्छा नहीं लगता है।‘ लगभग उसी समय सलीम खान ने भी नसीरुद्दीन शाह को कुंठित और कड़वा व्यक्ति कहा था। ऐसा प्रतीत होता है कि सलीम खान और जावेद अख्तर का नसीरुद्दीन शाह पर दिया गया बयान ठीक था। वो इस बात से कुंठित हो सकते हैं कि उनकी ही आयु के अनुपम खेर इस वक्त भी अलग अलग तरह की भूमिकाएँ कर रहे हैं और व्यस्त हैं। उनसे बड़ी आयु के अमिताभ बच्चन को अब भी काम मिल रहा है जबकि नसीरुद्दीन शाह को फिल्म इंडस्ट्री में बहुत कम लोग पूछ रहे हैं। हिंदी फिल्मों की दुनिया इस मायने में बहुत ही निर्मम है कि अगर किसी अभिनेता को दर्शक पसंद नहीं कर रहे हैं या उनकी फिल्में सफल नहीं हो पा रही हैं तो उनकी तरफ देखते भी नहीं हैं, उनके साथ फिल्म करना तो बहुत ही दूर की बात है। नसीर को ये समझना होगा। 


Friday, June 2, 2023

मिलन की वो रैना


3 जून 1973 को फिल्मों के महनायक और अभिनेत्री जया बच्चन की शादी हुई थी। 50 वर्ष पहले बांबे (अब मुंबई) में दोनों परिणय सूत्र में बंधे थे। अमिताभ की शादी में हरिवंश राय बच्चन के कुछ मित्र शामिल हुए थे। अमिताभ के दोस्त संजय गांधी भी। बारात निकलने के पहले पंडित नरेन्द्र शर्मा ने कहा कि दूल्हे को काजल का दिठौना लगना चाहिए। अमिताभ की मुंहबोली बहन नीरजा खेतान तैयार थीं। पुष्पा भारती ने लिखा है कि नीरजा ने जैसे ही काजल की डिबिया में अपनी ऊंगली डाली, उसकी आंखों में एक शरारती चमक तैर गई। तेजी जी ने उसको भांपते हुए कहा कि तेरा नेग तुझे मुंहमांगा मिल जाएगा, कोई शरारात मत करना। छोटा सा दिठौना लगा। बच्चन जी के अमिताभ को तिलक लगाने के बाद बारात मालाबार हिल के लिए चल पड़ी। संयोग ये था कि हिंदी के प्रसिद्ध लेखक भगवती चरण वर्मा बच्चन जी की शादी समारोह में भी थे और अब अमिताभ और जया को आशीर्वाद देने के लिए भी उपस्थित थे। 

बारात चली तो अजिताभ और संजय गांधी अपनी गाड़ी को लेकर बहुत तेज चलने लगे। पीछे की गाड़ियां भी तेज रफ्तार पकड़ने लगी तो भगवती बाबू ने एकदम से कहा कि बारात को धीरे-धीरे चलना चाहिए। उनके इतना कहते ही धर्मवीर भारती ने गाड़ी धीरे चलानी शुरू कर दी। आराम से मालाबार हिल्स पहुंचे। द्वारपूजा के बाद हल्की बारिश शुरु हो गई तो किसी ने कहा कि लगता है कि जया ने बचपन में कड़ाही की खुरचन चाटी है तभी ब्याह के समय पानी बरसने लगा है। खुशनुमा माहौल था। जया के मुंहबोले भाई गुलजार भी अपनी नई नवेली दुल्हन राखी के साथ मौजूद थे। छत पर बने विवाह मंडप में रस्में होने लगीं। जब अग्नि के फेरे का समय आया तो जया की बहन नीता अपनी बहन का लहंगा संभालने के चक्कर में दो फेरे लगा गईं। ये देख तेजी बच्चन ने कहा अगर नीता इस तरह से सात फेरे ले लेगी तो उसपर भी अमित का हक हो जाएगा। इतना सुनते ही मंडप ठहाकों से गूंज उठा और नीता ने फौरन जया का लहंगा छोड़ा और बैठ गई। एक और दिलचस्प वाकया हुआ। मंडप पर धान की रस्म के समय दुल्हन के भाई गुलजार की खोज शुरु हुई लेकिन वो कब के निकल चुके थे। पुष्पा जी ने लिखा था, नई नवेली खूबसूरत पत्नी और मौसम की पहली फुहार। इतनी देर तक कहां...। विवाह संपन्न हुआ। बारात के पहले बहन ने भाई को काजल का जो दिठौना लगाया था उसने आजतक भाई को बुरी नजर से बचाकर रखा है।