हर दिन की तरह बुधवार को भी मैं अपने दफ्तर में रन डाउन की बगल की अपनी सीट पर बैठा था । अचानक पीछे से किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और पीछे से आवाज आई- अच्छा दोस्त चलता हूं, तड़का के दो सेगमेंट निकल गए हैं, बाकि देख लेना । मैं जबतक पीछे मुड़ता तबतक शैलेन्द्र जी हाथ हिलाते हुए न्यूजरूम से बाहर की तरफ चल पड़े थे । तड़का फिल्मी दुनिया पर हामरे चैनल पर चलनेवाल एक शो है जिसे शैलेन्द्र जी प्रोड्यूस करते थे । उस दिन से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था कि शैलेन्द्र घर जाते वक्त मुझे कहें कि देख लेना । सबकुछ सामान्य ढंग से खत्म हुआ । फाइनल बुलेटिन रोल करने के बाद मैं लगभग एक बजे घर पहुंचा । लगभग ढाई बजे तक रात की पाली के प्रोड्यूसर से सुबह की बुलेटिन की प्लानिंग पर बात होती रही और फिर अखबार आदि पलटने के बाद सो गया। सुबह साढे चार बजे के करीब मोबाइल की घंटी बजी और दफ्तर के एक सहयोगी ने सूचना दी कि नोएडा एक्सप्रेस वे पर शैलेन्द्र जी का एक्सीडेंट हो गया है और वो ग्रेटर नोएडा के शारदा अस्पताल में भर्ती हैं । इस सूचना के बाद दफ्तर में फोन मिलाया तो जानकारी मिली कि रात तकरीबन ढाई बजे शैलेन्द्र जी की गाड़ी की टक्कर ट्रक से हो गई है । टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि उनकी कार ड्राइवर की सीट तक ट्रक के नीचे तक घुस गई थी । राह चलते लोगों ने जब शैलेन्द्र जी को उनकी कार से निकालकर पास के अस्पताल में पहुंचाया तबतक बहुत देर हो चुकी थी और खून इतना बह चुका था कि उनको बचाना नामुमकिन था ।
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Thursday, June 25, 2009
चलता हूं दोस्त...देख लेना
Wednesday, June 24, 2009
धार्मिक खिलवाड़ को बेनकाब करती कृति
आस्था का जब धर्म से मिलन हो जाता है तो वो श्रद्धा में बदल जाती है और जहां श्रद्धा हो वहां सवाल नहीं हो सकते । यही बात भारत में लेखन को लेकर भी कही जा सकती है । हिंदू देवी देवताओं और मान्यताओं और रूढ़ियों पर हजारों लेख लिखे जा चुके हैं, सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है । मुझे याद है बचपन में जब मैं ‘चंपक’ पढ़ा करता था तो उसमें दिल्ली बुक कंपनी की एक पुस्तक – हिंदू समाज पथभ्रष्टक तुलसीदास- का विज्ञापन उसमें प्रमुखता से छपा करता था । चूंकि हिंदू धर्म में सहिष्णुता की गुंजाइश है इसलिए इसपर उठने वाले सवालों और तीखी आलोचनाओं पर बवाल नहीं मचता ।
Sunday, June 7, 2009
नहीं रहे हबीब तनवीर
किसी भी विधा में ये देखने को कम ही मिलता है कि अपने जीवन काल में ही उसमें काम करनेवाला लीजेंड बन जाता है । लेकिन हबीब के साथ यही हुआ और वो रंगमकर्म की दुनिया के लीविंग लीजेंड बन गए थे . बावजूद इसके हबीब तनवीर का लोगों से जुड़ाव कम नहीं हुआ और वो लोक के कलाकार के तौर पर मशहूर हुए । हबीब ने जब रंगकर्म की दुनिया में कदम रखा तो उस वक्त रंगमंच की दुनिया में लोक की बात कम होती थी । लेकिन इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ के साथ बहीह के जुड़ाव ने उन्हें लोक से जुड़ने के लिए ना केवल प्रेरित किया बल्कि उनके विचारों को भी गहरे तक प्रभावित किया । एक सितंबर 1923 को रायपुर में जन्मे हबीब तनवीर को पद्म भूषण, पद्म श्री और संगीत नाटक अकादमी जैसे पुरस्कार मिले थे. रायपुर में हुआ और स्कूली शिक्षा वहां से पूरी करने के बाद वो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पहुंचे जहां से उन्होंने ग्रेजुएशन किया और फिर 1945 में वो मुंबई चले गए जहां उनकता जुड़ा इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ से हुआ । लेकिन हबीब ने नाटक की दुनिया में कदम दिल्ली में आने के बाद ही रखा- सन 1954 में जहां पहली बार उन्होंने आगरा बाजार का मंचन किया, लिखा भी । दिल्ली में ये वो दौर था जब रंगमंच की दुनिया यूरोपियन मॉडल से प्रभावित थी और यहां अंग्रेजी वालों का बोलबाला था । लेकिन अपने इस नाटक से तनबीर ने ना केवल अंग्रेजी का आधिपत्य तोड़ा बल्कि रंगमंच की दुनिया के लिए एक नया आकाश उद्धाटित किया । ये नाटक अटारहवीं शताब्दी के मशहूर उर्दू शायद अकबर नजीराबादी पर केंद्रित था । इस नाटक में हबीब तनवीर ने ओखला गांव के कलाकारों को लेकर रंगमंच के आभिजात्य को चुनौती देते हुए एक नई भाषा भी गढ़ी । इसके बाद हबीब इंगलैंड चले गए जहां तीन साल तक रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स में रंगमंच और उसकी बारीकियों को समझा . फिर 1959 में तनबीन ने अपनी रंगकर्मी पत्नी मोनिका मश्रा के साथ मिलकर नया थिएटर नास से एक ग्रुप बनाया जिसने भारतीय और यूरोपियन क्लासिक का मंचन किया । रंगमंच की दुनिया को तनबीर ने अंग्रेजी आभिजात्य से तो आजादी दिलाई साथ ही उन्होंने लोक कलाकारो को स्थानीय बोली बानी में नाटक करने के लिए प्रोत्साहित किया ।
1975 में हबीब तनबीर ने अपना मशहूर नाटक चरणदास चोर का मंचन किया जो आजतक इतना लोकप्रिय है कि जहां भी, जब भी इसका मंचन होता है, लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है । इसके बाद तनबीर ने कई विश्व क्लासिक का मंचन किया जिसमें – गोर्की की एनेमीज पर आधारित दुश्मन, असगर वजाहत की जिन लाहौर नहीं बेख्या के अलावा कामदेव का अपना, बसंत ऋतु का सपना, शाजापुर की शांतिबाई आदि ने रंगमंच को एक नई उंचाई दी । हबीब तनवीर ने थिएटर के साथ बालीवुड की फिल्मों में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी। उन्होंने नाना पाटेकर अभिनीत चर्चित फिल्म 'प्रहार' और निर्देशक सुभाष घई की 'ब्लैक एंड ह्वाइट' में भी काम किया।
हबीब तनबीर के प्रगतिशील विचारों को जब नाटकों में जगह मिलने लगी तो भगवा ब्रिगेड के कान खड़े हुए और जब मध्य प्रदेश में सन दो हजार तीन में पोंगा पंडित और लाहौर का मंचन शुरु हुआ तो भगवा ब्रगेड के कार्यकर्ताओं ने जमकर विरोध प्रदर्शन कर इन दोनों नाटको के मंचन को रुकवाने की कोशिश की । लेकिन हबीब की जिजीविषा पर कोई असर नहीं हुआ और अपने नाटकों के माध्यम से वो अलख जगाते रहे, बगैर डरे, बगैर घबराए । रंगमंच की इस महान विभूति को हमारी श्रद्धांजलि ।
टूटते सपनों की दास्तां
Sunday, May 17, 2009
बचपन पर हमला
Sunday, May 10, 2009
पत्रिकाओं के बहाने...
Thursday, May 7, 2009
एक खामोश मौत
भोजपुरी फिल्मों के शेक्सपियर कहे जानेवाले मोती ने गुमनामी में दम तोड़ दिया । मीडिया में कम ही लोग इस नाम से परिचित हैं । मोती बीए की खामोश मौत पर इकबाल रिजवी ने हाहाकार के लिए खासतौर पर ये लेख लिखा है ।
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आज़ादी से पहले उन्होंने एमए कर लिया था लेकिन कविता के मंच पर अपनी क्रांतिकारी रचनाओं की वजह से वे तब देश भर में चर्चित हो गए जब उन्होंने बीए किया था और तभी से उनके नाम के आगे बीए ऐसा जुड़ा कि वे हमेशा मोती बीए के नाम से ही जाने गए। वे मोती बीए ही थे जिन्होंने हिंदी सिनेमा में भोजपूरी की सर्वप्रथम जय जयकार करायी। हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी और भोजपुरी पर समान अधिकार रखने वाला और भोजपुरी के शेक्सपियर के नाम से याद किया जाने वाला वह गीतकार लंबी गुमनामी के बाद चुपके से सबको छोड़ कर चला गया।
मोती लाल बीए का पूरा नाम मोती लाल उपाध्याय था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के देवरिया ज़िले के बरेजी नाम के गांव में 1 अगस्त 1919 को हुआ। बचपन से ही कविता में उनकी दिलचस्पी बढ़ने लगी। वे मनपसंद कविताओं को ज़बानी याद कर लेते थे। फिर उन्होंने खुद कविताएं लिखनी शुरू कर दीं। उनकी पढ़ाई वाराणसी में हुई। 16 साल की उम्र में पहली बार उनकी कविता दैनिक आज में प्रकाशित हुई। जिसके बोल थे " बिखरा दो ना अनमोल - अरि सखि घूंघट के पट खोल "। जब उन्होंने बीए करा तब तक वे कवि सम्मेलनो में एक गीतकार के रूप में पहचान बना चुके थे। उन्होंने अपने नाम के आगे बीए लगाना शुरू कर दिया। उस समय आज़ादी की जंग जोरो पर थी। अंग्रेज़ों के खिलाफ़ पूरे देश में माहौल बहुत गर्म था। मोती जी भोजपुरी भाषा में क्रांतिकारी गीत लिख लिख कर लोगों को सुनाया करते थे। उसी दौर का उनका एक गीत था
"भोजपुरियन के हे भइया का समझेला
खुलि के आवा अखाड़ा लड़ा दिहे सा
तोहरी चरखा पढ़वले में का धईल बा
तोहके सगरी पहाड़ा पढ़ा दिये सा "
धीरे धीरे मोती की सक्रियता कलम के सहारे क्रांतिकारी विचारों को गति देने में बढ़ने लगी। सन् 1939 से 1943 तक "अग्रगामी संसार" तथा "आर्यावर्त" जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में कार्य के दौरान राष्ट्रीय विचारों एवं उससे जुडे़ लेखन के चलते कई बार जेल भी जाना पड़ा। 1943 में वे दो महीने की सज़ा काट कर जेल से रिहा किये गए फिर उन्होंने टीचर्स ट्रेनिंग कालेज वाराणसी में दाखिला ले लिया। इसी दौरान जनवरी 1944 में वाराणसी में हुए एक कवि सम्मेलन में पंचोली आर्ट पिक्चर संस्था के निर्देशक रवि दवे ने उन्हें सुना। मोती का गीत "रूप भार से लदी तू चली" उन्हें बहुत पसंद आए और उन्होंने मोती को फ़िल्मों में गीत लिखने के लिये निमंत्रण दिया। लेकिन मोती जी अचानक मिले इस निमंत्रण को फ़ौरन स्वीकार नहीं पाए और साहित्य रचना में ही जुटे रहे। 945 में वे फिर गिरफ़्तार कर लिये गए। उन्हें वाराणसी सेंट्रल जेल में भारत रक्षा क़ानून के तहत नज़र बंद कर दिया गया लेकिन पहले की ही तरह कुछ हफ़्तों बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।
मोती जी पत्रकारिता ओर साहित्य से ही जुड़े रहना चाहते थे। फ़िल्मों में जाना उनकी प्राथमिकता कभी नहीं रही फिर भी जेल से रिहाई के बाद रोज़गार के अवसर की तलाश में उन्हें रवि दवे का फ़िल्मों में गीत लिखने का निमंत्रण फिर याद आया। मोती जी ने लाहौर का रूख किया जहां पंचोली आर्ट पिक्चर संस्था थी। उनकी मुलाक़ात संस्ता के मालिक दलसुख पंचोली से हुई और पंचोली ने उन्हें 300 रूपए महीना वेतन पर गीतकार के रूप में रख लिया। मोती को गीत लिखने के लिये पहली फ़िल्म मिली "कैसे कहूं"। इसके संगीतकार थे पंडित अमरनाथ। इस फ़िल्म में मोती ने पांच गीत लिखे शेष गीत डी एन मधोक ने लिखे। इसके बाद आयी किशोर साहू निर्देशित और दिलीप कुमार अभीनीत फ़िल्म " नदिया के पार(1948)" जिसमें सात गीत मोती बीए ने लिखे। इस फ़िल्म के गीतों की सारे देश में धूम मच गयी। खास कर इसका एक गीत "मोरे राजा हो ले चल नदिया के पार " मोती बीए की पहचान बन गया। पहली बार किसी गीतकार ने हिंदी फ़िल्मों में भोजपुरी को प्रमुखता से स्थान दिया था।
नदिया के पार के बाद मोती जी की व्यस्तताएं बढ़ गयीं उन्होंने कई फ़िल्मों में गीत लिखे। उनकी चर्चित फ़िल्में रहीं "सुभद्रा (1946)", भक्त ध्रुव (1947)", "सुरेखा हरण(1947)", "सिंदूर(1947)", "साजन(1947)", "रामबान(1948)","राम विवाह(1949)", और "ममता(1952)",। साजन में लिखा उनका एक गीत "हमको तुम्हारा है आसरा तुम हमारे हो न हो" अपने समय में काफ़ी लोकप्रिय रहा।
मोती बीए को फ़िल्मों में काम की कमी नहीं थी। उनके लिखे गीतों को शांता आप्टे, शमशाद बेगम, गीता दत्त, लता मंगेशक, मोहम्मद रफ़ी, मन्ना डे, और ललिता देवलकर जैसे गायकों ने स्वर दिये। लेकिन उन्हें एहसास होने लगा था कि मुम्बई की फ़िल्मी दुनिया में सम्मान की रक्षा के साथ वहां अधिक समय तक टिक पाना संभव नहीं होगा। और एक दिन अचानक उन्होंने फ़ैसला किया वे अपने घर लौट जाएंगे। फिर यही हुआ। 1952 में मुम्बई से लौटकर वे देवरिया के श्रीकृष्ण इंटरमीडियेट कालेज में इतिहास के प्रवक्ता के रूप में पढ़ाने लगे। मुम्बई में रहने के दौरान उनकी अंतिम फ़िल्म ममता थी। कुछ सालों बाद जब चरित्र अभिनेता नज़ीर हुसैन, सुजीत कुमार और कुछ दूसरे कलाकारों ने भोजपूरी फ़िल्मों के निर्माण की गति को तेज़ किया तो मोती बीए फिर याद किये गए। मोती जी ने कई भोजपूरी फ़िल्मों "ई हमार जनाना" (1968), ठकुराइन (1984), गजब भइले रामा (1984), चंपा चमेली (1985), ममता आदि में गीत लिखे। 1984 में प्रदर्शित गजब भइले रामा में उन्होंने अभिनय भी किया। यह आखरी फ़िल्म थी जिससे मोती जी किसी रूप में जुड़े।
देवरिया में अध्यापन के दौरान मोती जी साहित्य सृजन में लगे रहे। उन्होंने शेक्सपियर के सानेट्स का हिंदी में सानेट्स की शैली में ही अनुवाद किया। कालीदास के संस्कृत में लिखे मेघदूत का भोजपूरी में अनिवाद किया इसेक अलावा हिंदी में 20 पुस्तकें और उर्दू में शायरी के तीन संग्रह "रश्के गुहर", "दर्दे गुहर" और "एक शायर" की रचना की। उन्होंने भोजपूरी में भी काव्य रचना की और पांच संग्रह सृजित किये। उनकी करीब चार कृतियां अभी अप्रकाशित हैं। अध्यापन से सेवा निवृत्त होने के बाद मोती बीए जैसा गीतकार गुमनामी के अंधेरों में खोता चला गया। मोती बीए को कई सम्मान मिले लेकिन भोजपूरी के विद्वान के रूप में उनका मूल्यांकन कभी नहीं हुआ। उनके पुत्र भाल चंद्र उपाध्याय उनकी कृतियों को सहेज कर रखने का काम तो करते रहे लेकिन वे अपने पिता को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिलाने में नाकाम रहे।
शोहरत, सम्मान और अपनी शर्तों पर काम, सब कुछ मोती बीए को मिला लेकिन नौकरशाही ने अंत तक उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा नहीं दिया। हांलाकि इस बात का उल्लेख अनेक संवतंत्रता सेनानी और साहित्यकार समय समय पर करते रहे कि मोती बीए को उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों की वजह से कई बार अंग्रेज़ी शासन ने गिरफ़्तार कर जेल भेजा फिर भी उन्हें जेल भेजे जाने का रिकार्ड आज़ाद हिंदुस्तान की नौकरशाही को नहीं मिल पाया।
पिछले कुछ सालों से मोती जी की बोलने की ताकत खत्म हो गयी थी। उन्होंने 23 जनवरी 2009 को दुनिया से विदा लेली। उत्तर प्रदेश के एक दैनिक को छोड़ उनकी मौत किसी के लिये ख़बर तक नहीं बन सकी।
Sunday, May 3, 2009
लेखकों का शोषण करते संपादक
आज जब कि साहित्य में कोई भी व्यावसायिक पत्रिका नहीं बची है, लेकिन लघु पत्रिकाएं धड़ाधड़ निकल रही हैं, तो इसके पीछे के गणित पर विचार करना बी जरूरी है । साहित्यिक रुझानवाला और एक लेखक के रूप में स्थापित ना होने की कुंठा मन में संजोए लोगों के बीच संपादक बनने की होड़ सी लगी है । संपादक बनने का गणित है भी बेहद आसान । व्यक्तिगत संपर्कों और मित्रों की मदद से किसी तरह एक अंक निकालिए और बन जाइए संपादक । चूंकि साहित्यिक पत्रिकाएं अनियतकालीन होती है इसलिए यहां भूतपूर्व होने का खतरा भी नहीं है ।
लघु पत्रिकाओं के ज्यादातर संपादक आज आर्थिक तंगी का रोना रोकर लेखकों को पैसे नहीं देते लेकिन पत्रिकाओं के संपादकों के ठाठ में कोई कमी नहीं दिखाई देती है । इन साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों के सरोकार भी बेहद संकुचित और व्यक्ति केंद्रित हो गए हैं । लेखकीय गरिमा या फिर साथी लेखकों की प्रतिष्ठा का उन्हें कोई ख्याल नहीं है । साथी लेखकों को ये साहित्यिक संपादक ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ समझते हैं । न तो उनकी मेहनत का ध्यान रखते हैं और ना ही उनके लेख लिखने के दौरान हुए खर्चे, मसलन- कागज, स्याही, कंप्यूटर, प्रिंटर- आदि का । संपादक नामक ये जीव अपने सहयोगी लेखकों को पहले तो इमोशनल ब्लैकमेल करते हैं और जब उससे उनका स्वार्थ नहीं सधता तो फिर विचारधारा की धौंस देकर अपना काम निकालने की तिकड़म करते हैं ।
पत्रिका निकालने के साथ ये साहित्यिक संपादक एक और खेल खलते हैं । अब उनपर भी एक नजर डाल लेते हैं । आजकल आपको साहित्यिक पत्रिकाओं के मोटे-मोटे विशेषांक दिख जाएंगें – कोई समकालीन कविता पर, कोई उपन्यास पर , कोई कहानियों पर, कोई आलोचना की वर्तमान दशा-दिशा पर, तो कोई फिल्म पर तो कोई किसी लेखक विशेष पर केंद्रित होता है ।
दरअसल इन विशेषांको के पीछे भी धन कमाने की जुगत होती है । विशेषांक की योजना बनाते समय ही किसी प्रकाशक को इसका सहभागी बना लिया जाता है और उनसे तय हो जाता है कि पत्रिका प्रकाशन के कुछ दिनों बाद उसे पुस्तकाकार छाप दिया जाए । प्रकाशक तय होते ही किसी विषय विशेष पर पत्रिका का अंक प्रकाशित होता है । मोटी पत्रिका के प्रकाशन में आने वाला खर्च प्रकाशक वहन करते हैं । पत्रिका का मूल्य इतना अधिक होता है या रखा जाता है कि पाठक उसको कम से कम खरीदें । बची हुई पत्रिका को पहले से तय सौदे के आधार पर प्रकाशक हार्ड कवर में डालकर पुस्तक का रूप दे देते हैं । जिसे उंचे दामों पर थोक सरकारी खरीद में खपा दिया जाता है । बिक्री से जो रॉयल्टी मिलती है उसे संपादक खुद डकार जाता है और अगर लेखक किस्मतवाला हुआ तो उसे पुस्तक की एक प्रति मिल जाती है । इस प्रवृति के लाभ भी हैं लेकिन लेखकों को ईमानदारी से रायल्टी में हिस्सा तो मिलना ही चाहिए ।
इस खेल में छोटे मोटे संपादकों के अलावा कई नामचीन लेखक/ संपादक भी सक्रिय हैं और साथी लेखकों का जमकर शोषण कर रहे हैं । खुद तो पत्रिका के नाम पर ऐश करते हैं और साथी लेखकों को उनका वाजिब हक भी देना गंवारा नहीं । मेरे जानते ऐसी साहित्यिक पत्रिकाओं की एक लंबी फेहरिस्त है जो अपने लेखकों को एकन्नी भी नहीं देते उल्टे उनसे ये अपेक्षा रखते हैं कि कुछ विज्ञापन का जुगाड़ कर दें या फिर कुछ प्रतियां बेचने का इंतजाम करें ।
ये एक ऐसा सवाल है जिसपर पूरी लेखक बिरादरी को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है । आज हिंदी के प्रकाशकों पर गाहे बगाहे लेखकों की रॉयल्टी हड़पने का आरोप लगता है । कुछ लेखक तो बकायदा लिखकर भी इसके खिलाफ अपनी आवाज उठा चुके हैं, कुछ विवाद मित्रों के बीचबचाव की वजह से सामने आने से रह जाते हैं । लेकिन मेरे जानते किसी ने भी साहित्यिक लघु पत्रिकाओं के संपादकों द्वारा लेखकों के शोषण को विषय बनाकर इसे किसी भी मंच पर उठाने की कोशिश नहीं की है । संपादकों के इस छलात्कार का जोरदार विरोध लेखकों को हर उपलब्ध मंच पर करना चाहिए ताकि शोषण के खिलाफ अपनी रचनाओं में आवाज उठानेवाले खुद के शोषण को बेनकाब कर सके । अंत में मुझे वरिष्ठ साहित्यकार उपेन्द्र नाथ अश्क से जुड़ा एक दिलचस्प प्रसंग याद आ रहा है । अश्क जी को एक बार एक प्रतिष्ठित पत्रिका के संपादक ने समीक्षा के लिए एक पुस्तक भिजवाई । पत्रिका के साथ लिखे पत्र में संपादक ने आग्रह किया कि पुस्तक प्राप्ति की सूचना दें । अश्क जी ने पुस्तक प्राप्ति की सूचना का जो पत्र लिखा वो कुछ यों था – प्रिय भाई समीक्षा के लिए आप द्वारा प्रेषित पुस्तक प्राप्त हुई, आभार । लेकिन पुस्तक के साथ यदि आप समीक्षा लेखन के मानदेय का चेक भी संलग्न कर देते तो मैं हुलसकर समीक्षा लिखता और उत्साह के साथ उसे आपको प्रेषित करता, सादर आपका, अश्क ।
Wednesday, April 29, 2009
ख़ामोश हो गयी वो आवाज
इकबाल बानो पर इकबाल रिजवी का लेख हाहाकार के लिए
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विभाजन से पहले। रोहतक का गवर्मेंट गर्ल्स स्कूल। सब बच्चे पढ़ाई शुरू होने से पहले प्रार्थना गा रहे हैं " लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी "। पांचवीं क्लास में पढ़ने वाली इक़बाल बानो भी हाथ जोड़े आंखें बंद किये तल्लीनता से गा रही है। उसकी आवाज़ अपनी सहेलियों की आवाज़ से जुदा है यह एहसास उसकी सहेलियों को ही नहीं उसकी टीचरों को भी है।
इक़बाल बानो अपने पड़ोस के एक कायस्थ परिवार में बैठी गा रही है। इस परिवार की एक लड़की उसकी स्कूल की दोस्त है उसे संगीत सिखान ेके लिये रोज़ एक शिक्षक आते हैं। इक़बाल भी संगीत सीखना चाहती है लेकिन उसके पिता रूढ़िवादी विचारों के हैं उन्हें लड़कियों का गायकी के मैदान में आना गवारा नहीं यह बात नन्ही इक़बाल बानो जानती है इसलिये घर पर गायकी का शौक़ जाहिर नहीं करती। संगीत के प्रति उसके लगाव और उसकी बेहतरीन आवाज़ से प्रभावित उसकी सहेली के पिता अपने पड़ोसी इक़बाल बानो के पिता के पास जाते हैं और कहते हैं कि उनकी बेटी अच्छा गाती है लेकिन इक़बाल बानो को तो क़ुदरत ने बेहतरीन आवाज़ का तोहफ़ा दिया है अगर उसने मेहनत से रियाज़ कर लिया तो एक दिन वह बहुत मशहूर गायिका बनेगी। उनकी बात सुन कर इक़बाल बानो के पिता धर्म संकट में पढ़ जाते हैं उन्हें अपने खानदान की आलोचनाओं का डर हैं लेकिन बेटी की तारीफ़ के आगे आलोचनाओं का डर ख़त्म हो जाता है और वे इक़बाल बानो को संगीत सीखने की इज़ाज़त दे देते हैं।
हालात बदलेते हैं अब इक़बाला बानो का परिवार रोहतक से दिल्ली आ गया है। दिल्ली में इक़बाल बानो को दिल्ली घराने के उस्ताद चांद खां साहब के पास भेजा जाता है। आवाज़ सुन कर उस्ताद भी क़ायल हो गए और उनकी कोशिशों से इक़बाल बानो के अंदर वह कलाकार आकार लेने लगा जिसकी आवाज़ को एक दिन लाखों प्रशंसकों की फ़ौज तैयार करनी थी। उस्ताद चांद खां की कोशिशों से ही इक़बाल बानो को पहली बार दिल्ली रेडियों से गाने का मौक़ा मिला। यह मौक़ा उनके लिये तब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।
विभाजन के बाद रोहतक की गौहना तहसील के गांव हरसाना में इक़बाल बानो के परिवार की जायदाद पर लोगों ने क़ब्ज़ा कर लिया। खानदान के कई लोग पाकिस्तान जा चुके थे। इक़बाल बानो का परिवार भी पाकिस्तान चला गया। वे लोग मुलतान में बस गए। पड़ोस में ही पटियाला घराने के उस्ताद आशिक अली रहने के लिये पहुंचे । इक़बाल बानो का परिवार भले ही भारी परेशानियों के बीच सब कुछ दिल्ली और रोहतक में छोड़ कर मुलतान पहुंचा था लेकिन इक़बाल बानो की संगीत की तालीम जारी रखी गयी। वे उस्ताद आशिक अली से संगीत की तालीम लेने लगीं। 1952 में 17 साल की उम्र में इक़ाबल बानो की शादी पाकिस्तान के एक जदागीरदार से हो गयी। शादी से पहले ही उनके पति ने वादा किया कि वे इक़बाल बानो को कभी गाने से नहीं रोकेंगे और उन्होंने मरते दम तक अपना वादा निभाया।1980 में उनकी मृत्यु हो गयी।
इक़बाल बानो की आवाज़ सध चुकी थी। दादरा और ठुमरी गाने में उन्हें कमाल हासिल था साथ ही परंपरागत ग़ज़ल गायकी में भी वे परिपक्व होती जा रही थीं फिर भी उन्हें अपना हुनर दिखाने का मौक़ा नहीं मिल पा रहा था लेकिन उनकी आवाज़ की शोहरत ज़रूर फैल रही थी और एक दिन उनके पास रेडियों से बुलावा आया। वह 1955 का समय था। इक़बाल बानो रेडियो लाहौर बुलायी गयीं। उनकी गायी पहली ग़जल ही उनकी पहचान बन गयी। क़तील शिफ़ाई की लिखी हुई इस ग़ज़ल के बोल हैं
उल्फ़त की नई मंज़िल को चला है डाल के बाहें बाहों में
दिल तोड़ने वाले देख के चल हम भी तो पड़े हैं राहों में
वैसे तो बाद में इक़बाल बानो ने सैकड़ों ग़ज़लें, गीत , ठुमरियां दादरे, लोक गीत और सूफ़ियाना कलाम गाए लेकिन यह गज़ल उन्होंने सबस ेज़्यादा गयी , देश विदेश जहां भी गयीं इस ग़ज़ल की फ़रमाइश ज़रूर हुई। उनकी ग़ज़लों के ज़्यादातर कैसटों और रिकार्डों में उनकी यह ग़ज़ल ज़रूर शामिल की जाती थी।
बहरहाल इक़बाल बानो को अपना हुनर दिखाने के लिये एक मौक़े की तलाश थी और यह मौक़ा उन्हें रेडियो ने दे दिया। इसके बाद क़दम दर क़दम वो गायकी और शोहरत की बुलंदियां तय करती चली गयीं। रेडियो ने इक़बाल बानो को ऐसा प्लेटफ़ार्म दिया जिसके सहारे वो जनता के आम और ख़ास दोनो वर्गों तक पहुंचीं। जब 1957 में लाहौर आर्ट काउंसिल ने उनको पहली बार श्रोताओं से रूबरू कराने के लिये कार्यक्रम आयोजित किया तो पुलिस को भीड़ को क़ाबू में रखने के लिये भारी मशक्कत करनी पड़ी। लोगों को उनकी उम्मीद से ज़्यादा बेहतर ग़ज़लें सुनने को मिलीं और जिस आवाज़ में ग़ज़लें सुनी वो सबसे अलग और नयी थी।
फ़ैज़ की शायरी ने तो इकबाल बानो पर जादू कर दिया था। फ़ैज़ के कलाम को उन्होंने इतना डूब कर गाया कि उन्हें गायकी के मैदान में फ़ैज़ की ग़ज़लों के विशेषज्ञ गायक के रूप में पहचाना जाने लगा। फ़ैज़ के निधन के बाद 1985 में उनके जन्म दिन पर इक़बाल बानो ने लाहौर में फ़ैज़ की एक नज़्म " हम देखेंगे जब तख़्त गिराए जाएंगे, जब ताज उछाले जाएंगे " गायी। वह सैनिक तानाशाह ज़ियाउल हक की सरकार के दिन थे और उन दिनो चार लोगों से अधिक के एक जगह इकट्ठा होने पर प्रतिबंध था लेकिन इक़बाल बानो को सुनने के लिये 50 हज़ार की भीड़ जमा हो गयी। यह एक नमूना था पाकिस्तान में फ़ैज़ की शायरी और इक़बाल बानो की गायकी के संगम का। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ से अक्सर मुशायरों में लोग फ़रमाइश कर देते कि इक़बाल बानो वाली ग़ज़लें सुनाईये। फ़ैज़ खुद स्वीकार करते थे कि आम लोगों में उनकी शायरी को लोकप्रियाता दिलाने में इक़बाल बानो का बहुत योगदान था।
फ़ैज के अलावा इक़बाल बानो ने क़तील शिफ़ाई, नासिर काज़मी, अहमद फ़राज और पुराने दौर के शायर ग़ालिब, दाग़ सौदा की ग़ज़लें भी गायीं। उनकी गाई हुई कुछ गज़लों के मिसरे बेहतरीन गायिकी की वजह से लोगों की ज़बान पर चढ़ गए।
पचास के दशक में पाकिस्तान की विकसित हुई फ़िल्म इंडस्ट्री में एक पार्श्व गायिका के तौर पर इक़बाल बानो को कई संगीतकारों ने जगह दी। गुमान, क़ातिल, इंतक़ाम, सरफ़रोश, इश्क-ए-लैला और नागिन वो चुनीदा फ़िल्में हैं जो इक़बाल बानो की गायकी की वजह से भी याद की जाती हैं। लेकिन उनकी दिलचस्पी शास्त्रीय संगीत में ही रही। इसलिये जैसे जैसे पाकिस्तानी फ़िल्मी संगीत में सतहीपन आता गया इक़बाल बानो उससे विमुख होती गयीं और 1977 के बाद उन्होंने फ़िल्मों के लिये गाना बंद कर दिया।
उस समय तक पाकिस्तान में ग़ज़ल गायकी के मैदान में मेंहदी हसन सरताज गयाक के रूप में स्थापित हो चुके थे। ग़ुलाम अली और फ़रीदा ख़ानम ने भी अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था लेकिन ग़ज़ल में राग रागनियों की शुद्धता के साथ अदायगी के मामले में मेंहदी हसन के अलावा इक़बाल बानो का किसी से कोई मुक़ाबला नहीं था। अस्सी के दशक के बाद भारत और पाकिस्तान दोनो जगह उभरी आधुनिक ग़ज़ल गायकी को इक़बाल बानो ग़ज़ल गायकी के रूप में स्वीकार ही नहीं करती थीं। उनका मानना था ग़ज़ल को ऐसा बना दिया गया है कि जो चाहे वो गाने लगता है। कुछ दिनो में उसका कैसेट आजात है और वो ग़ज़ल गायक के तौर पर मशहूर हो जाता है लेकिन ग़ज़ल गाने के लिये रागों की जानकारी उनका कड़ा रियाज़ और ग़ज़ल का चयन सभी पहलुओं पर ध्यान देना पड़ता है। ग़ज़ल गायकों की नौजवान पीढ़ी को सुन कर ज़्यादातर मायूसी होती है।
इक़बाल बानो जितनी सहजता से वो उर्दू ग़ज़लें सुनाती थीं उतनी ही सहजता से फ़ारसी का कलाम भी। इस वजह से ग़ज़ल गायकी के सूरमाओं में इक़बाल बानो एक मात्र ऐसी गायिका थीं जिन्हें जितना उर्दू वालों ने सिर आंखों पर बैठाया उतना ही फ़ारसी जानने वालों ने भी भारत और पाकिस्तान के साथ साथ वे ईरान और अफ़ग़ानिस्तान में भी आदर से याद की जाती थीं। 1979 से पहले तक अफ़गानिस्तान में हर साल आयोजित होने वाला जश्न-ए-क़ाबुल में अफ़गानिस्तान के शाह ने इक़बाल बानो की मौजूदगी अनिवार्य बना दी थी। गायकी में रागों की शुद्धता पर कड़ा ध्यान रखने वाली इक़बाल बानो को कई संगीत आलोचक बेगम अख़्तर की गायकी के करीब मानते हैं। खुद इक़बाल बानो भी बेगम अख़तर से प्रभावित रहीं।
हांलाकि इक़बाल बानो दिल्ली में पली बढ़ीं लेकिन वे दूसरे पाकिस्तानी कलाकारों की तरह लगातार दिल्ली में गायकी के कार्यक्रमों में भाग लेने नहीं नहीं आ पाती थीं। 1980 से पहले पाकिस्तानी कलाकारों का भारत में आना कम ही हो पाता था। उसी दौर में इक़बाल बानो के पति का निधन हो गया। इसके बाद उन्होंने ग़ज़ल गायकी के कार्यक्रम बहुत सीमित कर दिये। भारत में अधिकतर इक़बाल बानो निजी तौर पर ही आयीं। 1991 में वे दिल्ली आयीं। होली के दिन शाम को दक्षिणी दिल्ली के तत्कालीन पुलिस उपायुक्त असद फ़ारूक़ी के घर इक़बाल बानो के सम्मान में महफ़िल सजायी गयी। चार दिन को अपने उस दौरे पर इक़बाल बानो पुरानी दिल्ली के उन इलाकों में ख़ूब घूमीं जहां वे बचपन में जाया करती थीं। ख़ासकर चांदनी चौक में मिठाई की मशहूर दुकान घंटेवाले के यहां जहां बचपन में उनके एक नाना उन्हें मिठाई दिलाने ले जाते थे। 1996 में वे फिर दिल्ली आयीं इस बार एक निजी समारोह में ग़ज़ल सुनाने के लिये।
21 अप्रैल को गज़ल गायकी की ये महारानी इस दुनिया को छोड़ गयी। इकबाल बानो के दो बेटे हुमायूं ,अफ़ज़ल और एक बेटी मालिहा है। इसे उनका दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि पांच दशक तक गायकी की दुनिया में पाकिस्तान का नाम रोशन करने वाली इक़बाल बानो के जनाज़े में उनके रिश्तेदारों और पड़ोसियों के अलावा सिर्फ़ पाकिस्तानी लोक गायक शौकत अली ही शामिल हुए।
Monday, April 27, 2009
वो सुबह कभी तो आएगी
Thursday, April 23, 2009
रेत में आग
दरअसल ये विवाद दिल्ली से प्रकाशित एक साप्ताहिक में इस उपन्यास की समीक्षा के बाद शुरु हुआ । प्रकाशित समीक्षा को ही इस पूरे विवाद की जड़ बना दिया गया है । न तो इस समुदाय के बारे में उपन्यास में कोई चर्चा है और न ही इस समीक्षा में कहीं भी गिहार समुदाय के बारे में कुछ कहा गया है । ये विवाद उपन्यास में ‘माना गुरु’ के नामोल्लेख की वजह से हुआ है । अगर हम उपन्यास के बलर्ब को देखें – उस उपन्यास के केंद्र में है ‘माना गुरु’ और ‘मां नलिन्या’ की संतान कंजर और उसका जीवन । कंजर यानि काननचर अर्थात जंगल में घूमनेवाला । अपने लोक विश्वासों व लोकाचारो की धुरी पर अपनी अस्मिता और अस्तित्व के लिए संघर्ष करती एक विमुक्त जनजाति । इस पूरे उपन्यास में कंजर समुदाय की स्त्रियों के स्याह संसार को श्रमपूर्वक, शोध के आधार पर उजागर किया गया है । लेकिन गिहार समुदाय के लोगों का मानना है कि ‘माना गुरु’ उनके इष्टदेव हैं और उनकी संतान यानि कि गिहार समाज की महिलाओं को इस कृति में वेश्यावृति करते दिखाया गया है जो कि घोर आपत्तिजनक है ।
मैंने भी इस उपन्यास को पूरा पढ़ा है । इसमें कहीं से भी ये ध्वनित नहीं होता है कि गिहार समुदाय को टारगेट किया गया है उनको जानबूझकर टारगेट किया गया है । कंजर समुदाय की स्त्रियों को जरूर वेश्वयावृति के धंधे में दिखाया गया है लेकिन वो भी रस लेने या अपमानित करने के इरादे से नहीं बल्कि उनकी समस्याओं को उजागर करने के लिए । इस पूरे उपन्यास में लेखक इस बात को लेकर अतिरिक्त सावधान दिखाई देता है कि कहीं से भी अश्लीललता को चित्रण न हो । ‘माना गुरु’ और वेश्यावृति का प्रसंग जब भी आया है स्त्रियों की बेबसी और इनकी अंधेरी जिंदगी को सामने लाने की कोशिशों के साथ ही ।
दरअसल अगर हम समग्रता में देखें तो ये पूरा का पूरा विवाद अज्ञानता की वजह से उठा प्रतीत होता है । लगता ये है कि किसी ने भी इस उपन्यास को समग्रता में न तो पढ़ने की कोशिश की और न ही उसे समझने की । सिर्फ एक समीक्षा के आधार पर बगैर किसी तार्किक आधार पर सिर्फ भावनाओं में बहकर इतना बड़ा वितंडा खड़ा कर दिया गया । इस पूरे मामले को स्थानीय अखबारों ने भी खूब हवा दी । अखबारों के संवाददाताओं की अज्ञानता उनकी ही रिपोर्ट से जाहिर हो गई । एक दैनिक इसे - गिहार समाज की स्त्रियों के देह व्यापार पर केंद्रित उपन्यास बता डाला तो दूसरे ने इसे – गिहार समाज की महिलाओं पर केंद्रित उपन्यास बतचा डाला । एक तो लोगों की भावनाएं भड़क रही थी उसपर से अखबारों में गलत तथ्यों का आना – आग में घी डालनमे जैसा साबित हुआ, और प्रदर्शन और बढ़ता गया । अखबारों के संवाददाताओं ने भी तथ्यों को परखने की कोई कोशिश नहीं की ।
इस पूरे मसले पर लेखक संगठनों की चुप्पी भी बेहद शर्मनाक है और उनको कठघरे में भी खडा़ करती है । महीनो से चल रहे इस विवाद में किसी भी लेखक संगठन ने इस पूरी घटना पर विचार करने की जहमत उठाई । हद तो तब हो गई जब किसी भी संगठन ने विरोध का बयान जारी करने की रस्म अदायगी भी नहीं की, भर्त्सना करने की बात तो दूर । राजेन्द्र यादव को छोड़कर किसी लेखक ने भी एक शब्द नहीं कहा । इससे पता चलता है कि समाज में क्रांति, बदलाव आदि आदि की बड़ी बड़ी बातें करनेवाले लेखकों के सरोकार कितने छोटे और संकुचित हो गए हैं । इस पूरे मसले पर मुझे मुक्तिबोध की लगभग विस्मृत और ओझल कविता का पूरा शीर्षक याद आ रहा है – ‘आलिमो फाजिल सिपहसालार, सब सरदार हैं खामोश !!’