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Thursday, April 23, 2009

रेत में आग

विश्व पुस्तक मेला में पिछले वर्ष जब भगवानदास मोरवाल का उपन्यास ‘रेत’ छपकर आया था तो उसकी खासी चर्चा हुई थी । प्रशंसा करने में खासे कंजूस ‘हंस’ संपादक राजेन्द्र यादव ने न केवल इस कृति की दिलखोलकर तारीफ की बल्कि इसे वर्ष की श्रेष्ठ कृतियों में शुमार भी किया । राजेन्द्र यादव के अलावा भी इस उपन्यास की प्रशंसा करनेवालों की एक लंबी फेहरिस्त है । आलोचकों और समीक्षकों के अलावा पाठकों ने भी ‘रेत’ को हाथों हाथ लिया और सालभर के अंदर ही इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित हो गया । लेकिन इन दिनों ये उपन्यास एक दूसरी ही वजह से चर्चा में है । इस उपन्यास से ‘गिहार’ समुदाय के लोग बुरी तरह से भड़के हुए हैं । उत्तर प्रदेश के छिबरामऊ में इस समुदाय की महिलाओं ने ‘रेत’ को काले कपड़े में बांधकर पहले तो फांसी पर लटकाया फिर इसे आग के हवाले कर उसका अंतिम संस्कार कर डाला । लेकिन विरोध की आग इससे भी ठंढी नहीं हुई तो महिलाओं ने सैयद बंगाले शाह की मजार के पास खड़े एक पेड़ पर रंग बिरंगे फीते बांधकर ‘रेत’ के लेखक भगवानदास मोरवाल के लिए ये मनौती मांगी कि वो धनहीन, यशहीन और विद्याहीन हो जाएं । बात यहीं तक नहीं रुकी । गिहार समाज के प्रतिनिधित्व का दावा करनेवाले एक संगठन- भारतीय आदिवासी गिहार विकास समिति के प्रदेश उपाध्यक्ष दिनेश गिहार ने छिबरामऊ के प्रथम श्रेणी ज्यूडीशियल मजिस्ट्रेट की अदालत में उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल समेत कई लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई की मांग कर डाली । लेकिन माननीय अदालत में अबतक इस याचिका पर सुनवाई नहीं हो पाई है ।
दरअसल ये विवाद दिल्ली से प्रकाशित एक साप्ताहिक में इस उपन्यास की समीक्षा के बाद शुरु हुआ । प्रकाशित समीक्षा को ही इस पूरे विवाद की जड़ बना दिया गया है । न तो इस समुदाय के बारे में उपन्यास में कोई चर्चा है और न ही इस समीक्षा में कहीं भी गिहार समुदाय के बारे में कुछ कहा गया है । ये विवाद उपन्यास में ‘माना गुरु’ के नामोल्लेख की वजह से हुआ है । अगर हम उपन्यास के बलर्ब को देखें – उस उपन्यास के केंद्र में है ‘माना गुरु’ और ‘मां नलिन्या’ की संतान कंजर और उसका जीवन । कंजर यानि काननचर अर्थात जंगल में घूमनेवाला । अपने लोक विश्वासों व लोकाचारो की धुरी पर अपनी अस्मिता और अस्तित्व के लिए संघर्ष करती एक विमुक्त जनजाति । इस पूरे उपन्यास में कंजर समुदाय की स्त्रियों के स्याह संसार को श्रमपूर्वक, शोध के आधार पर उजागर किया गया है । लेकिन गिहार समुदाय के लोगों का मानना है कि ‘माना गुरु’ उनके इष्टदेव हैं और उनकी संतान यानि कि गिहार समाज की महिलाओं को इस कृति में वेश्यावृति करते दिखाया गया है जो कि घोर आपत्तिजनक है ।
मैंने भी इस उपन्यास को पूरा पढ़ा है । इसमें कहीं से भी ये ध्वनित नहीं होता है कि गिहार समुदाय को टारगेट किया गया है उनको जानबूझकर टारगेट किया गया है । कंजर समुदाय की स्त्रियों को जरूर वेश्वयावृति के धंधे में दिखाया गया है लेकिन वो भी रस लेने या अपमानित करने के इरादे से नहीं बल्कि उनकी समस्याओं को उजागर करने के लिए । इस पूरे उपन्यास में लेखक इस बात को लेकर अतिरिक्त सावधान दिखाई देता है कि कहीं से भी अश्लीललता को चित्रण न हो । ‘माना गुरु’ और वेश्यावृति का प्रसंग जब भी आया है स्त्रियों की बेबसी और इनकी अंधेरी जिंदगी को सामने लाने की कोशिशों के साथ ही ।
दरअसल अगर हम समग्रता में देखें तो ये पूरा का पूरा विवाद अज्ञानता की वजह से उठा प्रतीत होता है । लगता ये है कि किसी ने भी इस उपन्यास को समग्रता में न तो पढ़ने की कोशिश की और न ही उसे समझने की । सिर्फ एक समीक्षा के आधार पर बगैर किसी तार्किक आधार पर सिर्फ भावनाओं में बहकर इतना बड़ा वितंडा खड़ा कर दिया गया । इस पूरे मामले को स्थानीय अखबारों ने भी खूब हवा दी । अखबारों के संवाददाताओं की अज्ञानता उनकी ही रिपोर्ट से जाहिर हो गई । एक दैनिक इसे - गिहार समाज की स्त्रियों के देह व्यापार पर केंद्रित उपन्यास बता डाला तो दूसरे ने इसे – गिहार समाज की महिलाओं पर केंद्रित उपन्यास बतचा डाला । एक तो लोगों की भावनाएं भड़क रही थी उसपर से अखबारों में गलत तथ्यों का आना – आग में घी डालनमे जैसा साबित हुआ, और प्रदर्शन और बढ़ता गया । अखबारों के संवाददाताओं ने भी तथ्यों को परखने की कोई कोशिश नहीं की ।
इस पूरे मसले पर लेखक संगठनों की चुप्पी भी बेहद शर्मनाक है और उनको कठघरे में भी खडा़ करती है । महीनो से चल रहे इस विवाद में किसी भी लेखक संगठन ने इस पूरी घटना पर विचार करने की जहमत उठाई । हद तो तब हो गई जब किसी भी संगठन ने विरोध का बयान जारी करने की रस्म अदायगी भी नहीं की, भर्त्सना करने की बात तो दूर । राजेन्द्र यादव को छोड़कर किसी लेखक ने भी एक शब्द नहीं कहा । इससे पता चलता है कि समाज में क्रांति, बदलाव आदि आदि की बड़ी बड़ी बातें करनेवाले लेखकों के सरोकार कितने छोटे और संकुचित हो गए हैं । इस पूरे मसले पर मुझे मुक्तिबोध की लगभग विस्मृत और ओझल कविता का पूरा शीर्षक याद आ रहा है – ‘आलिमो फाजिल सिपहसालार, सब सरदार हैं खामोश !!’

3 comments:

अखिलेश शुक्ल said...

प्रिय मित्र,
आपकी रवनाएं पठनीय व संग्रह योग्य हैं। मैं एक साहित्यिक पत्रिका का संपादक हूं। आप चाहे तो अपनी रचनाओं को प्रकाशन के लिए भेज सकते हैं। मेरे ब्लाग पर अवश्य ही विजिट करें।
अखिलेश शुक्ल्
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अनंत said...

शुक्रिया अखिलेश जी । अपना पता भेजिए अगर मन बना तो आपको लिखकर अनुमति ले लूंगा ।

Pankaj Parashar said...

प्रिय अनंत जी,
आज भटकते-भटकते आपके ब्लाग पर आया. बेहद सूचनाप्रद और अच्छा ब्लाग है. इस पोस्ट के नीचे जिन शब्द-गुच्छ को आप मुक्तिबोध की कविता का शीर्षक बता रहे हैं, दरअसल वह उनकी भूल-ग़लती कविता की पंक्तियां हैं. सादर,