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Tuesday, April 21, 2009

मेरी आवाज़ ही पहचान है

इकबाल रिजवी देश के उन गिने चुने पत्रकारों में हैं जिनकी फिल्म और कला की समझ बेहतरीन है । कल और फिल्म पर समान अधिकार से लेखन करते हैं । इनके लेख देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपते रहे हैं । हाहाकार के लिए विशेष रूप से उन्होंने शमशाद बेगम पर लिखा है - अनंत

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फिर पद्म अवार्ड बांटे गए। हर साल की तरह इस बार भी बंदर बांट हुई। कई लोग जो इस सम्मान के लायक नहीं थे उन्हें सम्मानित किया गया लेकिन एक हस्ती ऐसी भी है जिसे यह सम्मान अब दे कर उसका अपमान ही किया गया। इस बार के पद्म सम्मान में सबसे ज़्यादा नाइंसाफ़ी गायिका शमशाद बेगम के साथ हुई। गायकी के उच्चतम शिखर पर पहुंचकर लगभग चालीस साल पहले फिल्मी दुनिया को अलविदा कहने वाली शमशाद बेगम ने फ़िल्मी दुनिया को एक दो नहीं कई कालजयी गीत दिये हैं। 90 साल की उम्र में जब वो व्हील चेयर पर बैठ कर राष्ट्रपति से पुरस्कार लेने आयीं तो यह उनकी सादगी ही थी क्योंकि इस उम्र में उन्हें किसी सम्मान या पुरस्कार की ज़रूरत नहीं रह गयी है। न जाने क्यों उन्होंने यह पुरस्कार ग्रहण किया उनके प्रशंसकों का तो मानना है कि उन्हें यह पुरस्कार लेना ही नहीं चाहिये था। क्योंकि जो सम्मान उन्हें अब दिया गया है वो तो उन्हें बहुत पहले ही मिल जाना चाहिये था। वैसे भी शमशाद बेगम के गाए कालजयी गाने किसी भी पुरस्कार के मोहताज नहीं हैं।

ज़माने के तमाम उतार चढ़ाव की गवाह रहीं शमशाद बेगम स्वभाव से बहुत सरल हैं। उनकी आवाज़ ने जिन संगीतकारों को लोकप्रियता दिलायी उनमें से कई लोगों ने शमशाद से किनारा कर लिया लेकिन शमशाद बेगम ने कभी इसकी शिकायत किसी नहीं की। सत्तर के दश्क में जब उनके गायन की मांग कम होने लगी तो वो बिना किसी से शिकवा किये फ़िल्मी दुनिया से रूख़्सत हो गयीं और उन्होंने अपने आप को इस तरह गुम कर लिया कि तीन दशक तक किसी को उनका बारे में कुछ पता ही नहीं चला। उनके बारे में सिर्फ़ संगीतकार नौशाद और ओ पी नैयर को जानकारी थी लेकिन शमशाद बेगम ने उन्हें सख्ती से मना कर दिया था कि वे किसी को भी उनके बारे में कोई जानकारी न दें। वर्ष 2004 में सिनेमा के स्तंभकार शिशिर शर्मा ने डेढ़ साल की मेहनत के बाद एक दिन उन्हें ढूंढ ही निकाला। इसके बाद उन्हें शमशाद बेगम को बात चीत को राज़ी करने के लिये दो महीने लग गए।

14 अप्रैल को शमशाद बेगम 90 साल की हो गयीं। इस उम्र में याददाश्‍त का कमज़ोर हो जाना आम बात है यही उनके साथ भी हुआ है इसलिए उनसे बातें करना कठिन होता है, लेकिन फिर भी उन्हें अपने दौर की कई बातें याद हैं ख़ासकर वो लोग जिन्होंने शमशाद बेगम से मुंह मोड़ लिया और जिनकी उपेक्षा की वजह से उन्हें फ़िल्मों में गायकी बंद कर देनी पड़ी। संगीतकार मदन मोहन अपनी पहली फिल्म आंखें में उनकी आवाज़ का इस्तमाल किया। शमशाद के गाए गीत लोकप्रिय हुए। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि मदन मोहन को पहली कामियाबी दिलाने में शमशाद बेगम की आवाज़ का भी योगदान रहा लेकिन इसके बाद मदन मोहन ने कभी शमशाद बेगम को गाने का मौक़ा नहीं दिया। राजकपूर की निर्माता-निर्देशक के रूप में पहली फिल्म आग बहुत कामयाब रही और इस कामियाबी में शमशाद बेगम के गाए गीतों का उल्लेखनीय योगदान रहा लेकिन इस फिल्म के बाद राजकपूर ने उन्हें अपनी गिनी चुनी फिल्मों में ही गायन का मौका दिया। राजकपूर ने एक बार सार्वजनिक तौर पर माना था कि उनकी शुरूआती सफ़लता में शमशाद बेगम के गीतों का बहुत योगदान है लेकिन साथ ही उन्होंने अफसोस भी जताया था कि वह उनके लिए कुछ नहीं कर सके क्योंकि संगीत निर्देशक शंकर-जयकिशन उनकी आवाज़ को ज़्यादा पसंद नहीं करते थे। लेकिन शमशाद बेगम बिना किसी कटुता के बहुत सहजता से कहती हैं कि जिन्होंने उन्हें नज़र अंदाज़ किया उनसे उन्हें कोई शिकायत नहीं है क्योंकि उन्होंने मेरे साथ ऐसा कोई करार नहीं किया था कि प्रसिद्ध हो जाने के बाद वह उन्हें साइन करेंगे। शमशाद बेगम की आवाज़ का सबसे अधिक और सबसे अच्छा इस्तेमाल नौशाद और ए पी नैय्यर ने किया। ओ पी ने 23 फ़िल्मों में उनकी आवाज़ का इस्तेमाल किया। ओपी नय्यर का कहना था कि शमशाद बेगम की आवाज मंदिर की घंटी की तरह स्पष्ट और मधुर है।

हांलाकि उनके आखरी गीत को लेकर विवाद है। जिस फ़िल्म में अंतिम बार उनकी आवाज़ शामिल हुई वह थी 1981 में रिलीज़ हुई फिल्म "गंगा मांग रही बलिदान" लेकिन इस फ़िल्म के गीत रिलीज़ होने से काफ़ी पहले रिकार्ड हो गए थे। शमशाद बेगम के मुताबिक उनका गया अंतिम गीत कजरा मोहबब्त वाला था। जो फ़िल्म क़िस्मत के लिये उन्होंने 1968 में रिकार्ड करवाया था।

मिया हुसैन बख्श और गुलाम फातिमा की आठ संतानों में से एक शमशाद को प्रकृति ने सुरीला स्वर दिया था। लाहौर में उनके घर में रखा बड़ा सा ग्रामाफ़ोन नन्ही शमशाद के लिये हैरत की चीज़ हुआ करता था। ग्रामाफ़ोन बजने पर शमशाद उसके पास आकर बैठ जातीं और फिर उसमें से जो आवाज़ आती उसे दोहराया करतीं। इसके अलावा मोहर्रम के दौरान जब मर्सिये पढ़े जाते तो शमशाद उन्हें याद कर पढ़ा करती थीं। उनका ये शौक देख कर उनके चाचा उन्हें गाने के लिये प्रोत्साहित करते रहते थे। धीरे धीरे शमशाद बेगम की आवाज़ सुरों को साधने लगी और हज़ारों आवाज़ों के बीच अलग से पहचानी जाने वाली उनकी खनकदार आवाज़ सुनने वालों पर असर डालने लगी। एक दिन शमशाद के चाचा 13 साल की शमशाद को लेकर जीनोफ़ोन रिकार्डिंग कंपनी गए जहां शमशाद की आवाज़ बहुत पसंद की गयी और उनकी आवाज़ में एक पंजाबी गाना रिकार्ड हुआ जिसके बोल थे " हथ जोड़ परखियां दा " यह एक गैर फ़िल्मी गाना था जो बेहद लोकप्रिय हुआ। इस गीत की लोकप्रियता के कारण कंपनी ने साल भर में शमशाद बेगम की आवाज़ में करीब 200 गाने रिकार्ड किये। जीनोफ़न कंपनी के स्थायी संगीतकार ग़ुलाम हैदर थे। शमशाद के उच्चारण की शुद्धता से प्रभावित गुलाम हैदर ने शमशाद को गायकी की बारीकियों से परिचित कराया। उनके प्रति बेहद श्रद्धा रखेने वाली शमशाद बेगम का कहना है कि गुलाम हैदर जैसे संगीतकार सदियों में एक बार पैदा होते हैं।

1937 में शमशाद को लाहौर रेडियो स्टेशन से नियमित गाने का मौका मिला और उनकी शीशे जैसी साफ़ और खनकती आवाज़ घर घर लोकप्रिय होने लगी। इससे पहले ही 1939 में 15 की उमर में बैरिस्टर गणपतलाल बट्‌टो के साथ विवाह हो गया था। उन्हें पहली बार फ़िल्मों में गाने का मौका मिला पंजाबी फ़िल्म "यमला जट"(1940) में । इस फिल्म में शमशाद बेगम ने आठ गाने गाए। इसके बाद एक और पंजाबी फ़िल्म "चौधरी (1941) में उन्होंने गाने गाए दोनो फ़िल्में अपने गीत और संगीत के कारण हिट रहीं। इसके बाद पंचोली आर्ट फ़िल्म ने हिंदी में "खज़ांची" नाम की फ़िल्म बनायी। इसमें शमशाद के गाए गीत "लौट गयी पापी अंधियारिन" , " मन धीरे धीरे रोना " और "एक कली नाज़ों से पली" ने धूम मचा दी। खज़ांची के बाद शमशाद बेगम ने चार पांच और फ़िल्मों में गया और सभी अपने गीत संगीत की वजह से हिट रहीं।

शमशाद बेगम का यह सौभाग्य रहा कि कड़े परंपरागत परिवार में जन्म लेने और फिर शादी हो जाने के बाद भी उनके गाने के शौक़ पर किसी ने भी रोक नहीं लगायी। रेडियो स्टेशन पर उन्हें नियमित गाने के लिये जाना पड़ता था। यहां तक की पंजाबी फ़िल्मों के ज़रिये जब शमशाद बेगम की आवाज़ की खनक पूरे देश में गुंजने लगी तो मुम्बई की फ़िल्मी दुनिया से शमशाद को बुलावा मिला। सबसे पहले महबूब ने अपनी फ़िल्म "तक़दीर(1943) " में अंजुम पीलीभीती का लिखा गाना "बाबू जी दरोगा जी कौन कसूर पर धर लियो सैंया मोर" गवाने के लिये शमशाद बेगम को पूना बुलाया तब भी शमशाद को वहां जाने से किसी ने नहीं रोका। उनके इस सफ़र ने ही आगे चल कर मुम्बई की फ़िल्मी दुनिया में उनके लिये रास्ते खोले।

शमशाद बेगम के गायन का एक रोचक तथ्य यह भी है कि उन्होंने पुरूष अभिनेताओं के लिये भी पार्शव गायन किया। उन्होंने दारा सिंह के लिए एक फिल्म में गीत गाया। निर्माता-निर्देशक राजकुमार कोहली की 1965 में रिलीज़ हुई फिल्म लुटेरामें दारा सिंह एक समुद्री जहाज़ पर औरत के भेस में गीत गाते हैं- पतली कमर, नाज़ुक उमर, अरे, हट मुए मुझे लग जाएगी नज़र। यही बात उस दौर के चॉकलेटी हीरो विश्वजीत पर भी उसी तरह लागू होती है। 1968 की फिल्म किस्मतका मशहूर गीत कजरा मोहब्बत वालाका शमशाद बेगम वाला हिस्सा विश्वजीत पर और आशा भोंसले वाला हिस्सा बबिता पर फिल्माया गया था। विश्वजीत उस समय औरत के भेस में थे।

शमशाद बेगम ने अपने गायन काल के दौरान अपना फोटो कभी नहीं खिंचवाया। जब भी फ़ोटो खिंचने का मौक़ा आता वे बहुत सफ़ाई से बच निकलती। दरअसल उन्हें हमेशा यह एहसास रहा कि वे सुंदर नहीं हैं इसलिये उन्होंने चित्र नहीं खिंचवाए। बरसों तक लोग उन्हें उनकी सुरीली आवाज के जरिए ही उन्हें पहचानते रहे। 1965-66 के आस पास शमशाद के पास फ़िल्मों से गाने के प्रस्ताव आने बहुत कम हो गए। उनकी आवाज़ में कोई कमी नहीं आयी थी। ऐसा भी नहीं था कि फ़िल्म संगीत के क्षेत्र में आ रहे बदलाव में शमशाद बेगम की आवाज़ मिस फिट होने लगी थी।उनका व्यवहार भी बहुत सरल था। फिर भी शमशाद को नज़र अंदाज़ किया जाने लगा। संभवत: इसकी वजह थी फ़िल्मी दुनिया में बढ़ती खेमेबाज़ी और राजनीति। शमशाद इस मुद्दे पर बात करना पसंद नहीं करतीं कि आखिर उनके खिलाफ़ कौन सी ताकतें राजनीति कर रही थीं। फ़िल्मी दुनिया से अलग हो कर शमशाद पूरी तरह अपनी बेटी ऊषा और दामाद रिटायर लेफ़्टिनेन्ट कर्नल वाई रात्रा पर निर्भर हो गयीं। रात्रा का जहां भी तबादला होता शमशाद उनके साथ ही चली जातीं। बीच बीच में मुम्बई आने पर वे केवल नौशाद और ओ पी नैय्यर से ही संबंध साधती थीं। रिटाटर होने के बाद जब रात्रा नियमित रूप से मुम्बई में रहने आ गए तो शमशाद भी उन्हीं के साथ रहने लगीं और आज भी रह रही हैं।

कुछ समय पहले शमशाद बेगम के बारे में एक समाचार यह भी छप गया था कि उनका निधन हो गया। शमशाद बेगम के एक प्रशंसक और गणित के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर चंद्रकांत मोहन लाल ने सात सालों की मेहनत के बाद एक किताब लिखी है जिसका नाम है "खनकती आवाज़ .. शमशाद बेगम" इस किताब की सामग्री जुटाने के लिये वे लाहौर तक गए। यही नहीं उन्होंने शमशाद बेगम को भारतरत्न, दादा साहेब फालके सम्मान, पद्‌मविभूषण आदि दिलाने के लिए राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार से बार-बार संपर्क किया। फ़िलहाल शमशाद बेगम पद्म सम्मान लेकर वापस अपनी बेटी ऊषा रात्रा के साथ मुम्बई में रह रही हैं।


2 comments:

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

हुम्म्म!

अल्पना वर्मा said...

बहुत अच्छी जानकारी .आभार.