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Saturday, June 27, 2020

वेब सीरीज पर लगाम कसने का समय


‘दुख हुआ, वेब-सीरीज ‘रसभरी’ में असंवेदनशीलता में एक छोटी बच्ची को पुरुषों के सामने उत्तेजक नाच करते हुए, एक वस्तु की तरह दिखाना निंदनीय है। आज रचनाकार और दर्शक सोचें कि बात मनोरंजन की नहीं, यहां बच्चियों के प्रति दृष्टिकोण का प्रश्न है, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है या शोषण की मनमानी? यह प्रश्न उठा रहे हैं केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड, जिसको बातचीत में सेंसर बोर्ड भी कहा जाता है, के अध्यक्ष और मशहूर गीतकार प्रसून जोशी। प्रसून जोशी पहले भी अपनी आपत्तियों को सार्वजनिक करने से बचते रहे हैं और जब से प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष बने हैं तब से तो बिल्कुल ही नहीं बोलते हैं, लेकिन वेबसीरीज ‘रसभरी’ के इस दृष्य ने उनको इतना उद्वेलित कर दिया कि वो सामने आए। उनकी इस आपत्ति का उत्तर दिया ‘रसभरी’ वेबसीरीज की नायिका स्वरा भास्कर ने, ‘आदर सहित सर, शायद आप सीन को गलत समझ रहे हैं, सीन का जो वर्णन किया है वो उसके ठीक उल्टा है। बच्ची अपनी मर्जी से नाच रही है, पिता देखकर झेंप जाता है और शर्मिंदा होता है। नाच उत्तेजक नहीं है, बच्ची बस नाच रही है, वो नहीं जानती समाज उसे सेक्सुअलाइज करेगा-सीन यही दिखाता है।‘  स्वरा बचाव करने की लाख कोशिश करे लेकिन बच्ची से उत्तजेक गाने पर नाच करवाने की कहानी या कहानी में जो पृष्ठभूमि या संवाद है उससे ही मंशा का पता चलता है। बच्ची के नाच के पहले एक महिला का ये कहना कि, ‘थोड़ा बहुत नाच गाना लड़कियों को आना चाहिए, कल को अपने पति को रिझाए रखेगी’ और गाना देखकर फिर वही महिला कहती है कि ‘तेरी बेटी के लक्षण ठीक नहीं लग रहे’ तो दूसरी महिला खास अदा के साथ कहती है कि ‘ये सिर्फ अपने पति को नहीं बल्कि पूरे मुहल्ले को रिझाएगी।‘ अगर इन संवादों के साथ प्रसून जोशी की आपत्ति को देखेंगे तो उसमें एक गंभीरता दिखाई देती है और स्वरा की प्रतिक्रिया बेहद हल्की और तथ्यहीन। किसी भी मुद्दे पर विचार करने से पहले उसपर समग्रता से सोचना आवश्यक होता है अन्यथा प्रतिक्रिया सतही होती है।

‘रसभरी’ और उसमें स्वरा की भूमिका ऐसी है जिसको खुद स्वरा ही नहीं चाहती की उसके पिता इस वेब सीरीज को उस वक्त देखें जब वो उनके आसपास हो। ये तो स्वरा ने सार्वजनिक रूप से माना है। उसके पिता ने अपनी बेटी को शाबाशी देते हुए ट्वीट किया कि उनको अपनी बेटी की प्रतिभा पर गर्व है। इसके उत्तर में स्वरा ने लिखा कि ‘डैडी! कृपया इसको उस वक्त नहीं देखें जब मैं आपके आसपास रहूं।‘ अब जरा इस मानसिकता को समझिए कि एक पुत्री अपने पिता को सार्वजनिक रूप से कह रही है कि वो इस वेब सीरीज को अपनी बेटी के आसपास होने पर न देखें और वही प्रसून जोशी को समाज की मानसिकता आदि के बारे में नसीहत देती है और समझाती है कि बच्ची सिर्फ नाच रही है। वैसे भी ये वेब सीरीज इतना फूहड़ और इसके संवाद इतने स्तरहीन हैं कि इसको कोई भी संजीदा व्यक्ति परिवार के आसपास होने पर नहीं देखना पसंद करेगा। प्रसून जोशी ने एक वेब सीरीज में बच्ची के नाच को लेकर जो सवाल खड़ा किया है उसपर हमारे समाज को विचार करना चाहिए। क्या वेब सीरीज की दुनिया अब इतना नीचे गिर जाएगी कि वो यौन प्रसंगों से भी आगे बढ़कर अब बच्चियों को एक आब्जेक्ट के तौर पर पेश करेगी। लाभ कमाने के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाना कहां तक उचित है? दरअसल ये एक और संकेत है कि ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म पर कंटेंट को लेकर कितनी अराजकता बढ़ती जा रही है। इन सीरीज पर किसी भी प्रकार का कोई नियमन नहीं होने की वजह से अराजकता अपने चरम पर है। पता नहीं क्यों वेब सीरीज निर्माताओं को ये क्यों लगता है कि अगर इनकी भाषा स्तरहीन रखी जाएगी, यौन प्रसंग होंगे, भयंकर हिंसा होगी तभी इसको दर्शक मिलेंगे। कुछ शुरुआती वेब सीरीज बनानेवाले निर्देशकों की वजह इस तरह की भ्रांति बनी। ‘रसभरी’ भी इसकी शिकार हुई है क्योंकि प्रचारित ये किया जा रहा है ‘रसभरी के जादू से कोई बच नहीं सकता एक बार आजमा कर तो देखो।‘ दो हजार अठारह में ‘वीरे द वेडिंग’ फिल्म में अपनी भूमिका से स्वरा ने जो छवि बनाई उसको ‘रसभरी’ पुष्ट करती है। कई बार इन सीरीज की प्रचार सामग्री से भी इस बात का अंदाज लग जाता है कि इसमें क्या होगा। लेकिन इसके ठीक पहले हॉटस्टार पर रिलीज ‘आर्या’ और उसके पहले प्राइम वीडियो पर रिलीज ‘पंचायत’ ने इस भ्रांति को भी तोड़ा कि जुगुप्साजनक अश्लीलता, नग्नता और हिंसा ही किसी सीरीज को चर्चित बनाती है। ‘आर्या’ में जिस तरह से ड्रग के धंधे को दिखाया गया है उसमें अश्लील दृश्यों को दिखाने की पूरी संभावना थी लेकिन निर्माता उस रास्ते पर नहीं चले। इस सीरीज में सुष्मिता सेन को लेकर या फिर अन्य नायिकाओं की नग्नता का प्रदर्शन किया जा सकता था लेकिन ऐसा किया नहीं गया और बहुत साफ सुथरे तरीके से कहानी आगे बढ़ती चली गई। दर्शक कहानी के सम्मोहन में इसके साथ जुडा रहता है। आज हालत ये है कि ‘आर्या’ किसी भी सीरीज से कम लोकप्रिय नहीं है। सुष्मिता सेन की अदाकारी, कहानी और संवाद का कसावट दर्शकों को अंत तक बांधे रखता है। इसमें भी कहीं-कहीं निर्माता भटकते दिखते हैं लेकिन फौरन संभल जाते हैं।
वेब सीरीज की अराजकता का दायरा धीरे-धीरे बढता जा रहा है। जो किताबें दशकों पहले फुटपाथ पर पीली पन्नियों में छुपाकर बेची जाती थीं, अब उसी स्तर की कहानियां और उसपर बनी फिल्में इन प्लेटफॉर्म पर वेबसीरीज के रूप में मौजूद हैं। ‘मस्तराम’ के नाम की जो किताबें कई सालों पहले किशोर और युवा छुपा कर पढते थे, कभी अपनी कोर्स की किताबों के बीच छुपाकर तो कभी घर के किसी सूने कोने में छिपकर अब उसी मस्तराम के नाम से पूरी की पूरी सीरीज ओटीटी पर उपलब्ध हैं। जिसमें उन किताबों की कहानियों को फिल्मा दिया गया है। इतना ही नहीं ‘कविता भाभी’, ‘लाली भाभी’ जैसी सीरीज भी उपलब्ध हैं। इन सीरीज में जो नग्नता दिखाई जा रही है उसपर समाज को विचार करना चाहिए। देशभर में इसपर चर्चा होनी चाहिए कि क्या इस तरह की नग्नता किसी प्लेटफॉर्म पर दिखाया जाना उचित है। क्या हमारा समाज इस तरह की सामग्री को परोसने की इजाजत दे सकता है। क्या हमारा समाज इतना परिपक्व हो चुका है कि इस तरह की कामोद्दीपक सीरीज को स्वीकार किया जा सके। कुछ लोग ये तर्क दे सकते हैं कि ओटीटी प्लेटफॉर्म फिल्मों से अलग है क्योंकि फिल्में सार्वजनिक तौर पर प्रदर्शित की जाती हैं, उसको सामूहिक तौर पर देखते हैं और वेब सीरीज को अपने मोबाइल पर व्यक्तिगत तौर पर देखते हैं। यह तर्क अपनी जगह सही हो सकता है लेकिन क्या इन वेब सीरीज पर इतना कंट्रोल है कि जो लोग वयस्क नहीं हैं और किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रख रहे हैं या जिनको अभी यौनिकता की समझ विकसित नहीं हुई है वो इसको देख नहीं सके। वेब सीरीज की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए ऐसा लगता है कि अब समय आ गया है कि सरकार इसके बारे में कुछ सोचे। सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष की तरफ से बच्ची के नाच पर बयान आना क्या इस ओर कोई संकेत कर रहा है या फिर प्रसून जोशी के बयान को सिर्फ उनका व्यक्तिगत बयान माना जाए। तमाम नजरें सूचना प्रसारण मंत्रालय की ओर है।    

Wednesday, June 24, 2020

फिल्मी दुनिया पर इमरजेंसी की गाज


अभिव्यक्ति की आजादी की बात करनेवाले बहुधा ये भूल जाते हैं कि इमरजेंसी के दौरान सिर्फ समाचारपत्रों पर ही दबाव नहीं बनाया गया था बल्कि कलात्मक और रचनात्मक अभिव्यक्ति को भी बाधित किया गया था। दबाव था सरकार को समर्थन देने का, इमरजेंसी को सही ठहराने का। देवानंद अपनी आत्मकथा में विस्तार से इमरजेंसी के दौर के बारे में लिखते हैं। देवानंद के मुताबिक इमरजेंसी के दौर में यूथ कांग्रेस से जुड़ी एक आकर्षक युवा नेत्री मुंबई ( उस वक्त बांबे) आई थीं और बड़े फिल्मी सितारों से मिलकर संजय गांधी की दिल्ली में होनेवाली रैली में बुलाने आईं। वो जब उस नेत्री के आमंत्रण पर दिल्ली पहुंचे तो उनको वहां दिलीप कुमार भी मिले थे। जब वो लोग रैली में पहुंचे तो वहां कांग्रेस के सभी बड़े नेता कांग्रेस संजय गांधी की चमचागिरी कर रहे थे। रैली खत्म होने के बाद जब देवानंद और दिलीप कुमार वहां से बाहर निकल रहे थे तो दोनों को कांग्रेस के एक नेता ने टीवी स्टेशन जाकर यूथ कांग्रेस के समर्थन में बयान रिकॉर्ड करवाने का आदेश दिया। देवानंद को तब लगा था कि कोई फासीवादी प्रोपगंडा मशीनरी संजय गांधी के लिए काम कर रही है। जब देवानंद ने यूथ कांग्रेस के लिए बयान रिकॉर्ड करवाने से मना कर दिया तो सरकार ने दूरदर्शन पर उनकी फिल्मों के प्रदर्शन पर पाबंदी लगा दी। उसके बाद देवानंद ने तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री से बात भी लेकिन कुछ हुआ नहीं। मुंबई वापस लौटने पर देवानंद की मुलाकात नर्गिस से हुई तो उन्होंने देवानंद को यूथ कांग्रेस के पक्ष में टीवी के लिए बयान रिकॉर्ड करवाने की वकालत की। देवानंद लिखते हैं कि वो जानते थे कि नर्गिस, गांधी परिवार की करीबी है लेकिन उनका दिल इस बात के लिए तैयार नहीं था कि वो यूथ कांग्रेस और इमरजेंसी के लिए तत्कालीन सरकार के पक्ष में बयान दें। लिहाजा इमरजेंसी के दौर में उनकी फिल्में टीवी पर नहीं आईं।
इसी तरह का वाकया किशोर कुमार के साथ भी हुआ था। इमरजेंसी के बाद बीस सूत्री कार्यक्रम को प्रचारित करने के लिए हिंदी फिल्मों से जुड़े कलाकारों और सितारों को बुलाकर उनसे प्रचार करवाए जाने की योजना बनी। इसी कड़ी में किशोर कुमार को भी संदेश भेजा गया । सूचना प्रसारण मंत्रालय के उस वक्त के संयुक्त सचिव ने जब किशोर कुमार को फोन किया तो उन्होंने अपनी खराब तबीयत का हवाला देते हुए दिल्ली आने और सरकार के पक्ष में बयान देने से मना कर दिया। इससे खफा होकर मंत्रालय ने किशोर कुमार के गानों को दूरदर्शन और आकाशवाणी पर पाबंदी लगा दी। इतना ही नहीं उनकी फिल्मों पर भी नजर रखने का आदेश हुआ और उनके गाए गानों के ग्रामोफोन की बिक्री की राह में भी रोड़े अटकाए गए। किशोर कुमार को जब इतना तंग किया और दबाव डाला गया तो वो सहयोग को तैयार हो गए लेकिन तब भी सरकार ने कहा कि पाबंदी हटाने के पहले ये देखा जाए कि वो कितनी देर और दूर तक सहयोग करते हैं।

Saturday, June 20, 2020

चमकीली दुनिया का काला यथार्थ


फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत ने हिंदी फिल्मों की दुनिया की चमकीली छवि के पीछे की कालिख को सामने ला दिया है। कंगना रनौत जिस तरह से हर दिन सामने आकर एक के बाद एक खुलासे कर रही है उससे ये संदेश तो जा ही रहा है कि हिंदी फिल्मों की दुनिया में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। ताजा खुलासे में कंगना ने पटकथा लेखक जावेद अख्तर के साथ के अपने अनुभवों को साझा किया है। ऐसी खबरें हैं कि एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि जावेद अख्तर ने उनको अपने घर बुलाकर कहा था कि रोशन परिवार से समझौता कर लो नहीं तो तुम कहीं की नहीं रहोगी, वो तुमको जेल भिजवा देंगे या तुम आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाओगी। इस बात में अगर सचाई है तो जावेद अख्तर जैसे व्यक्ति से इस तरह के व्यवहार की अपेक्षा तो नहीं ही की जा सकती है। उनसे तो अपेक्षा ये की जाती है कि अगर दो कलाकारों के बीच किसी तरह की कोई गलतफहमी है तो बड़े होने के नाते वो उसको दूर करें ना कि एक का पक्ष लेकर दूसरे को ये कहें कि समझौता कर लो या जेल जाने के लिए तैयार रहो।  

कंगना रनौत पिछले दो तीन दिनों से काफी आक्रामक हैं। इस बीच 'दबंग' फिल्म के निर्देशक अभिनव सिंह कश्यप ने सलमान खान परिवार पर बेहद संगीन इल्जाम लगाए हैं। जिस तरह की खबरें आ रही हैं उससे तो लगता है कि ये मसले अब अदालतों तक जाएंगें और जो अबतक दबा छुपा था वो सार्वजनिक होगा।  लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये भी है कि क्या सचमुच बॉलीवुड में भाई भतीजावाद (नेपोटिज्म) का बोलबाला है। क्या बॉलीवुड में कोई माफिया काम करता है जो सितारों को बढ़ाने या उसको मिटाने की ठेके उठाता है। जो परिस्थितिजन्य बातें सामने आ रही हैं उससे तो साफ तौर पर ये लगता है कि ऐसा कोई तंत्र वहां काम करता है और ये तंत्र काफी मजबूत भी है। कई ऐसे कलाकार हैं जिनकी फिल्में लगातार फ्लॉप होती रहती हैं लेकिन उनको फिर भी बड़े बैनर की फिल्में मिलती रहती हैं लेकिन कई ऐसे भी कलाकार हैं जो अच्छी फिल्में करते हैं, उनकी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर बेहतर करती भी हैं लेकिन उनको अपेक्षाकृत कम फिल्में और प्रचार मिलते हैं। इसमें अगर हम सुशांत सिंह राजपूत का ही उदाहरण लें तो उनकी फिल्म 'छिछोरे' ने करीब ढ़ाई सौ करोड़ रुपए का कोरोबार किया लेकिन उसका इतना शोर नहीं मचा जितना मचना चाहिए था। कहा जाता है कि बॉलीवुड में एक रिच बॉय क्लब है जिसमे बांद्रा से लेकर मालाबार हिल के बीच रहनेवाले कुछ प्रोड्यूसर्स शामिल हैं।  
दरअसल अगर हम देखें तो कैंप तो हमेशा से बॉलीवुड में रहे हैं, पहले निर्देशकों, के अपने अपने कैंप हुआ करते थे। व्ही शांताराम की अपनी पसंद के नायक नायिकाएं हुआ करते थे, अशोक कुमार का अपना खेमा था जिसमें उनकी पसंद के कलाकार होते थे, फिर हिंदी फिल्मों न राज कपूर का खेमा देखा जिसमें उनकी एक खास मंडली होती थी जिसमें गीतकार, संगीतकार से लेकर कलाकार तक हुआ करते थे। कुछ दिनों तक सुभाष घई का कैंप भी चला। बाद में ये कैंप अभिनेताओं के इर्द गिर्द सिमटते गए और अब एक बार फिर से ये निर्देशकों या प्रोड्यूसर्स के कैंपों मे बदल गए हैं। पहले दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन के अलग अलग कैंपों की खबरें आती थीं, फिर अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान के अपने अपने खेमे बने। सलमान खान का अपना एक अलग ही दल होता है। अब धर्मा प्रोडक्शंस के करण जौहर का अपना खेमा है, उनकी अपनी पसंद नापसंद हैं। इसी तरह से यशराज फिल्म्स का अपना खेमा है, अपने कलाकार हैं। यहां तक तो ठीक है कि सभी प्रोडक्शंस हाउस के अपने सितारे हैं। लेकिन जिस ओर कंगना संकेत कर रही है अगर वो बातें सही हैं तो ये बहुत ही खतरनाक है। अपने पसंदीदा कलाकार के करियर को बनाने की कोशिश करना बुरा नहीं है, बुरा तब है जब आप अपने पसंदीदा कलाकार को आगे बढ़ाने के चक्कर में आप किसी प्रतिभाशाली कलाकार को पीछे धकेलने की कोशिश करते हैं।
सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद इस तरह की बातें सामने आ रही हैं कि उनको परेशान किया जा रहा था या वो अपनी उपेक्षा से परेशान थे। इसमें कितनी सच्चाई है ये तो शायद ही कभी सामने आ सकेगा लेकिन जिस तरह से कंगना अपनी आपबीती बता रही है वो बेहद ही हैरान करनेवाला है। ये तो कंगना की हिम्मत है कि ऐसी परिस्थिति में भी वो सामने आकर बेबाकी से अपनी बातें रख रही हैं। अन्यथा जिस तरह से उसको परेशान किया गया या जिस तरह से उसको परेशान किया जा रहा है उसमें तो स्थिति बहुत ही खराब होती है। मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक आत्महत्या करने की कई स्थितियां होती हैं। जब  कोई शख्स आत्महत्या करता है तो उसके लिए बहुत हद तक वो परिस्थितियां जिम्मेदार होती हैं जिनमें वो पले बढ़े और जिनमें वो रह रहे होते हैं। इन्ही परिस्थितियों में पहले वो हेल्पलेस (मजबूर) महसूस करते हैं फिर होपलेस (निराश) हो जाते हैं और उनको लगता है कि उनके सामने अब कोई विकल्प रह नहीं गया है और चरम अवस्था होती है जब व्यक्ति खुद को वर्थलेस (व्यर्थ) समझने लगता है। ये व्यर्थ समझने की स्थिति बेहद खतरनाक होती है। दुनियाभर के मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जब कोई व्यक्ति खुद को वर्थलेस समझने लगता है तो आत्महत्या के करीब पहुंच जाता है। कंगना जिस ओर संकेत कर रही है अगर स्थितियां उतनी हीं भयावह हैं तो कोई भी अपने को वर्थलेस समझने लग सकता है और फिर परिणाम की कल्पना की जा सकती है।
बॉलीवुड में किस हद तक कालिख है उसका संकेत समय समय पर मिलता भी रहा है। दो हजार सोलह में अजय देवगन की फिल्म ‘शिवाय’ और करण जौहर की फिल्म ‘ए दिल है मुश्किल’ को लेकर विवाद हुआ था। तब करण जौहर पर ये आरोप लगा था कि उन्होंने कमाल खान को फिल्म ‘शिवाय’ के खिलाफ प्रचार के काम में लगाया था। तब एक आडियो भी जारी हुआ था जिसमें कथित तौर पर पैसों के लेन देन की बात थी। विवाद इतना बढ़ा था कि करण और काजोल के बीच दोस्ती टूट गई थी। इस विवाद के बाद करण जौहर की आत्मकथा ‘एन अनसूटेबल बॉय छपी’ थी तो उसमें करण ने काजोल से अपनी दोस्ती टूटने की बात का उल्लेख किया था। उसके एक अध्याय में करण ने काजोल के साथ अपने रिश्तों पर लिखा जरूर, तमाम तरह के इशारों में बात की लेकिन साफ तौर पर सिर्फ इतना कहा कि उनका अब काजोल से कोई रिश्ता नहीं है और दोनों की राहें जुदा हो गई है । करण ने माना कि दोनों के बीच कुछ ऐसा हुआ जिसकी वजह से वो बुरी तरह से आहत हैं। करण के मुताबिक दोनों के बीच जो कुछ भी हुआ उसको वो सार्वजनिक नहीं करना चाहते हैं। वो बार बार ये कहते रहे कि पच्चीस सालों का रिश्ता खत्म हो गया । इसके पहले काजोल ने भी इशारों इशारों में करण को कठघरे में खड़ा किया था। खबरें तो इस तरह की भी आई थीं कि अजय देवगन और करण जौहर के बीच फोन पर शिवाय विवाद को लेकर गर्मागर्मी हुई थी। इस तरह के कई वाकए जबतक सामने आते रहते हैं लेकिन अब जिस तरह के कथित आपराधिक गठजोड़ की बातें सामने आ रही हैं वो अच्छे संकेत नहीं हैं। 

   

Saturday, June 13, 2020

साहित्य की नामवरी असावधानी के स्मारक

कोरोना के संकट के दौरान पुस्तकें पढ़कर समय बिताना एक बेहतर विकल्प है। बाजार आदि भले ही खुल गए हैं लेकिन बहुत आवश्यक होने पर ही वहां जाना होता है। लोगों से मिलने-जुलने वाली संस्कृति पर भी फिलहाल विराम लगा हुआ है। पिछले करीब अस्सी दिन में कई किताबें पढ़ने का सुयोग बना। नामवर सिंह की पुस्तक ‘दूसरी परंपरा की खोज’ को करीब बीस साल बाद दोबारा पढ़ी। इसी क्रम में नामवर सिंह की ही एक और पुस्तक ‘हिंदी का गद्यपर्व’ पढ़ी। यह किताब नामवर सिंह के जीवित रहते ही 2010 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई थी और इसका संपादन काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के शिक्षक आशीष त्रिपाठी ने किया है। मैंने इस पुस्तक की पहली आवृत्ति, जो 2011 में प्रकाशित हुई थी, पढ़ी। नामवर सिंह के आलोचनात्मक लेखन के साठ साल पूरे होने के अवसर पर प्रकाशित हुई थी। इसके संपादक आशीष त्रिपाठी ने लिखा है कि ‘यह पुस्तक साक्ष्य है नामवर जी के सक्रिय साठ वर्षों का-एक दस्तावेजी साक्ष्य। इसमें उनका पहला प्रकाशित निबंध है और अभी तक लिखित अंतिम निबंध द्वा सुपर्णा... और पुनर्नवता की प्रतिमूर्ति।‘ संपादक के इन दावों को पढ़कर इस पुस्तक को पढ़ने की रुचि और बढ़ गई।
इस किताब में एक लेख है ‘हिंदी साहित्य के पच्चीस वर्ष’। इस लेख के बारे में बताया गया है कि ‘स्वतंत्रता की पच्चीसवीं वर्षगांठ पर साहित्य अकादमी ने भारत की विभिन्न भाषाओं में साहित्यिक प्रगति का एक सर्वेक्षण अंग्रेजी में प्रकाशित किया गया था, इंडियन लिटरेर सिंस इंडिपेंडेंस। इस ग्रंथ के लिए हिंदी साहित्य का सर्वेक्षण किया था डॉ नामवर सिंह ने। उस सर्वेक्षण का हिंदी रूप।‘ इस पूरे लेख में कई त्रुटियां हैं। नामवर सिंह जैसी पकी आंखों वाले आलोचक जो तथ्यों को लेकर बहुत सावधान रहते थे उनसे एक लेख में इतनी तथ्यात्मक गलतियां चौंकाती हैं। इस लेख (पृ.71) में उन्होंने निर्मल वर्मा की मशहूर कहानी ‘परिंदे’ का प्रकाशन वर्ष 1960 बताया है। जबकि इस कहानी का प्रकाशन 1957 में हुआ था। प्रेमचंद के स्मृति दिवस 8 अक्तूबर 1957 को ‘हंस’ का साहित्य संकलन-1, प्रकाशित हुआ था, जिसके संपादक बालकृष्ण राव और अमृतराय थे। इस संकलन में पहली बार निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिंदे’ का प्रकाशन हुआ था। आश्चर्य की बात ये है कि ‘हंस’ के उस संकलन में नामवर सिंह का भी लेख प्रकाशित है। सिर्फ 15 वर्ष के अंतराल में नामवर सिंह से ये चूक हो जाती है। वो भी तब जब नामवर सिंह ने निर्मल की इस कहानी को ‘नई कहानी की पहली कृति’ घोषित करते हुए एक लंबा लेख लिखा था। अगर नामवर सिंह से ये चूक हुई है तो वो एक बेहद असावधान आलोचक थे और अगर अनुवाद और संपादन में ये भूल हुई है तो ये अक्षम्य है। महत्वपूर्ण ये है कि इस पुस्तक का प्रकाशन नामवर सिंह के जीवित रहते हो गया था, लेकिन इस भूल की ओर ध्यान नहीं दिया गया। साहित्य के शोधार्थियों को ध्यान में रखकर अगर विचार किया जाए तो ये गलती बहुत बड़ी नजर आती है। 
इस पुस्तक में सिर्फ एक गलती नहीं है बल्कि अनेक तथ्यात्मक भूलें हैं। अपने इसी लेख में नामवर सिंह लिखते हैं कि ‘रोमांटिक मोह के युग में भी मुक्तिबोध मोहभंग के प्रयास करते रहे। उन्होंने 1953 में यह लिखा था कि ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’।‘  नामवर सिंह अपने जीवनकाल में लगातार मुक्तिबोध की कविताओं पर बोलते-लिखते रहे थे। मुक्तिबोध को वामपंथी विचारधारा के अग्रणी कवि के तौर पर स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील भी रहे। वामपंथी विचारधारा के कवि के तौर पर मुक्तिबोध का रेखांकन करते-करते नामवर सिंह इस कविता का प्रकाशन वर्ष लिखने में चूक कर बैठे। मुक्तिबोध की ये प्रसिद्ध कविता ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ पटना से प्रकाशित काव्य संकलन ‘विविधा’ में छपी थी जिसका प्रकाशन 1956-57 में हुआ था। इस काव्य संकलन के संपादक राजेन्द्र किशोर और रणधीर सिन्हा थे। इस एक तथ्य के आधार पर भी यह कहा जा सकता है कि नामवर सिंह असावधान आलोचक थे। साहित्य के इतिहास में तिथियों का बहुत महत्व होता है और एक भी गलत तिथि का उल्लेख कालखंडों के आकलन के निष्कर्षों को गलत कर सकता है। इसी पुस्तक में एक लेख है ‘एक अन्तर्यात्रा के प्रदेश’ इस लेख की पहली पंक्ति है सन 1884 में भारतेन्दु हरिश्चंद्र का अवसान हुआ और रामचंद्र शुक्ल का उदय। ये तो बहुत ही बड़ी चूक है क्योंकि भारतेन्दु हरिश्चंद्र का निधन 1884 में नहीं बल्कि 1885 में हुआ। इसके आलोक में देखें तो पहली पंक्ति से वो जो स्थापित करना चाहते थे उसकी बुनियाद ही गलत थी। पता नहीं किन परिस्थितियों में नामवर सिंह ने अपने लेख में भारतेन्दु का अवसान उनकी मृत्यु के पहले ही मान लिया था। इसी लेख में ‘हंस’ के आत्मकथा अंक का प्रकाशन वर्ष 1931 बताया गया है जबकि इसका प्रकाशन 1932 में हुआ था। बाद में बनारस के एक प्रकाशक ने भी ‘हंस’ के इस अंक को प्रकाशित किया था। इस पुस्तक में तथ्यात्मक भूलों के अलावा प्रूफ और नाम में भी ढेरों गलतियां हैं, ईश्वरचंद्र को रमेशचंद्र, नागेन्द्र को नरेन्द्र, रामकुमार को राजकुमार कह दिया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि न तो संपादक ने और न ही प्रकाशक ने तथ्यों के अलावा लेखों में उल्लिखित नामों को जांचने का कष्ट किया। 
2019 में राजकमल प्रकाशन से ही नामवर जी के साक्षात्कारों की एक पुस्तक प्रकाशित हुई जिसका नाम है ‘आमने सामने’। इस पुस्तक का संकलन संपादन नामवर सिंह के पुत्र विजय प्रकाश सिंह ने किया। इसमें विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा किया गया नामवर सिंह का एक साक्षात्कार प्रकाशित है जिसका शीर्षक है, ‘भैरव का सोंटा’। इसमें एक जगह विश्वनाथ त्रिपाठी साहित्य अकादमी के पुरस्कारों को छोड़ने और न छोड़ने पर उनकी राय पूछते हैं। इसके उत्तर में नामवर सिंह अपनी बात रखते हैं कि ये संस्था लेखकों की है, सरकार से क्या लेना देना। अपनी बात रखने के क्रम में वो बताते हैं कि साहित्य अकादमी का जब गठन हुआ तो कृष्णा कृपलानी इसकी सचिव थीं। इसको पढ़ते हुए स्पष्ट है कि नामवर सिंह ये कह रहे थे कि कृष्णा कृपलानी महिला थीं। जबकि साहित्य अकादमी से प्रकाशित डी एस राव की पुस्तक ‘फाइव डिकेड्स’ में भी और इसके हिंदी अनुवाद में भी इस बात का साफ उल्लेख है उनका नाम कृष्ण कृपलानी था और वो पुरुष थे। भारत सरकार ने 1954 में उनको दो वर्षों के लिए साहित्य अकादमी के पहले सचिव के रूप में नियुक्त किया था। बाद में अकादमी के कार्यकारी मंडल ने उनको कई सेवा विस्तार दिए और वो 1971 तक साहित्य अकादमी के सचिव पद पर बने रहे।  अब ये इतनी हास्यापद बात है कि नामवर सिंह की छवि को देखते हुए इसको स्वीकार कर पाना थोड़ा कठिन है कि नामवर सिंह को ये नहीं पता होगा कि साहित्य अकादमी के पहले सचिव पुरुष थे, महिला नहीं। पता तो इस बात का विश्वनाथ त्रिपाठी को भी होना ही चाहिए। फिर एक संपादक भी हैं जिन्होंने इस तथ्य पर गौर नहीं किया, क्या इतनी असावधानी होनी चाहिए थी ? और सबसे उपर तो प्रकाशक की भी जिम्मेदारी बनती है। एक अच्छा आलोचक वो होता है जिसकी स्मृति बहुत अच्छी हो, वो आलसी न हो और तथ्यों की जांच करने के लिए सिर्फ अपनी स्मृति पर भरोसा न रखे और संदर्भ ग्रंथ देखने के लिए बार बार अपनी मेज से उठे। क्या नामवर इतने सतर्क आलोचक थे? लगता तो नहीं।   


Thursday, June 11, 2020

अंगूठी और समंदर का खामोश अफसाना


कुछ दिनों पहले जब ऋषि कपूर का निधन हुआ था तो मनोरंजन चैनलों पर ऋषि कपूर के पुराने इंटरव्यू सोशल मीडिया पर वायरल हुए। कपिल शर्मा के शो में ऋषि और नीतू सिंह वाला एपिसोड भी खूब चला। उस एपिसोड में जब ऋषि कपूर की प्रेमिकाओं की बात हो रही थी तो कपिल शर्मा ने नीतू सिंह से एक अंगूठी के बारे में पूछा, जब नीतू सिंह ने कहा कि वो उनके पास है तो ऋषि ने कहा कि छोड़ो वो किस्सा यार वो किसी के पास नहीं है वो तो समंदर में है। दरअसल ये बात हो रही थी ऋषि कपूर की उस अंगूठी के बारे में जो उनको उनकी पहली प्रेमिका यासमीन मेहता ने अपने प्रेम की निशानी के तौर पर दी थी। ये एक बेहद साधारण अंगूठी थी लेकिन उसपर एक खास तरह का चिन्ह बना हुआ था। ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा ‘खुल्लम खुल्ला’ में लिखा है कि जब वो लोग बॉबी फिल्म की शूटिंग कर रहे थे तो डिंपल ने उस अंगूठी को उनकी उंगुली से निकालकर अपनी उंगली में पहन लिया था। फिर डिंपल ने उसको लौटाया नहीं और उस अंगूठी को पहनती रही। बॉबी फिल्म की शूटिंग के दौरान ही राजेश खन्ना ने डिंपल को देखा और उसको अपना दिल दे बैठे। उस समय राजेश खन्ना सुपर स्टार थे और उनकी लोकप्रियता चरम पर थी। राजेश खन्ना ने डिंपल को प्रपोज किया और दोनों शादी के बंधन में बंध गए। लेकिन इस बीच एक बेहद दिलचस्प किस्सा हुआ। जब राजेश खन्ना ने डिंपल को प्रपोज करने के लिए उनका हाथ अपने हाथ में लिया तो उनको वो अंगूठी दिखाई दी जो डिंपल ने ऋषि की उंगली से उतारकर अपनी उंगली में पहन रखा था। राजेश खन्ना को डिंपल की खूसूरत उंगली में वो अंगूठी नहीं भायी और उन्होंने डिंपल के हाथ से उस अंगूठी को उतारकर जूहू के अपने घर के नजदीक समंदर में उछाल दिया। ऋषि कपूर और यासमीन के प्यार की निशानी जो डिंपल की उंगली में चमकती थी वो समंदर के आगोश में समा गई। उस वक्त फिल्मी गॉसिप छापने वाली पत्रिकाओं में छपा भी था, राजेश खन्ना ने ऋषि कपूरी की अंगूठी समंदर में फेंकी। लेकिन ऋषि ने साफ तौर पर कहा है कि उनको डिंपल से कभी प्यार नहीं था, न ही उनको प्रति आकर्षित थे। हां उन्होंने इतना जरूर माना कि वो डिंपल को लेकर थोड़े पजेसिव थे।
बॉलीवुड सितारों की अंगूठी, उनकी मोहब्बत और समंदर का ये रोमांटिक जिक्र पहली बार नहीं हुआ। इसके पहले देवानंद ने भी अपनी आत्मकथा ‘रोमासिंग विद लाइफ’ में भी किया है। देवानंद और सुरैया का प्रेम परवान चढ़ रहा था लेकिन सुरैया की नानी को ये पसंद नहीं आ रहा था और उन्होंने साफ तौर पर सुरैया को ये संदेश दे दिया था कि अगर ये प्रेम सबंध आगे बढ़ा तो या तो सुरैया रहेगी या उनकी नानी। लेकिन सुरैया की मां अपनी बेटी और देवानंद के प्यार के पक्ष में थी। जब सुरैया के प्यार पर पहरा लगा था तो उनकी मां ने ही देवानंद और सुरैया को रात साढे ग्यारह बजे के बाद अपने अपार्टमेंट की छत पर मिलने का इंतजाम किया था। देवानंद ने अपनी आत्मकथा में बेहद रोचक तरीके से इस मुलाकात का उल्लेख किया है। उसी मुलाकात में सुरैया ने देवानंद से अपने प्रेम का इजहार किया था और उनसे आलिंगबद्ध होकर ‘आई लव यू’ कहा था। प्यार के इस मोड़ पर देवानंद इतने खुश थे कि उन्होंने अगले ही दिन मुंबई के झवेरी बाजार से सुरैया के लिए एक एक बेहद खूबसूरत अंगूठी खरीदी। अब समस्या ये थी कि सुरैया तक अंगूठी पहुंचे कैसे। देवानंद फोन करें तो सुरैया की नानी उठाएं और ये फोन रख दें। संपर्क का कोई सूत्र नजर नहीं आ रहा था। अचानक देवानंद को अपने सिनेमेटोग्राफर मित्र दिवेचा याद आए। दिवेचा पहले भी देवानंद और सुरैया के बीच प्रेम-पत्रों के आदान प्रदान का माध्यम बन चुके थे। जब दिवेचा को देवानंद ने फोन किया तो उन्होंने पूछा कि क्या फिर से प्रेम-पत्र पहुंचाना है। एक दिन पहले ही सुरैया से मिल चुके देवानंद ने बेहद खुशी के साथ कहा था कि नहीं इस बार इंगेजमेंट रिंग पहुंचाना है। फिर दिवेचा ने देवानंद की वो अंगूठी सुरैया तक पहुंचा दी। अब देवानंद की खुशी सातवें आसमान पर थी और वो ये मानकर बैठे थे कि उनकी इंगेजमेंट हो गई लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। सुरैया की नानी और उनके रिश्तेदारों ने मिलकर सुरैया पर इतना दबाव बनाया कि वो देवानंद से संबंध तोड़ने पर राजी हो गई। सुरैया जब इस बात के लिए राजी हो गई तो एक दिन वो देवानंद की अंगूठी लेकर समदंर के किनारे पहुंची। उसे अपनी उंगली से उतारा और आखिरी बार देखा, देवानंद के साथ के अपने प्यार को याद किया और फिर अंगूठी को सागर की लहरों पर उछाल दिया। उन लहरों ने देवानंद और सुरैया के प्यार की निशानी को अपने आगोश में ले लिया। फिर समंदर शांत हो गया और सुरैया अपने घर लौट आई।

Saturday, June 6, 2020

साहित्य के ‘लाइव काल’ का संकट

कोरोना वायरस के संकट के बीच जब पूर्ण लॉकडाउन चल रहा था और साहित्यिक सभाएं और गोष्ठियां बंद हो गई थीं, तो हिंदी साहित्य से जुड़े लेखकों ने फेसबुक पर एकल गोष्ठियां करनी शुरू कर दीं। कई साहित्यिक संस्थाओं और प्रकाशकों ने भी हिंदी की विभिन्न विधाओं के लेखकों का लाइव करना शुरू किया। धीरे धीरे तो ऐसा लगा कि संपूर्ण हिंदी साहित्य लाइव मोड में ही आ गया है। हर समय किसी ने किसी फेसबुक पेज पर या लोगों के व्यक्तिगत अकाउंट पर लाइव करते लेखक नजर आने लगे। जब भई आप अपने फेसबुक अकाउंट में लॉगइन करें तो आपकी टाइमलाइन पर लाइव होता दिखने लगा। क्या युवा, क्या अधेड़, क्या बुजुर्ग, सभी वय के लेखक फेसबुक पर अपनी मन की बात करते नजर आने लगे। कुछ लेखकों ने तो दिन में दो वक्त लाइव करना शुरू दिया। फेसबुक पर साहित्यिक लाइव की मानो बाढ़ सी आ गई। इस स्थिति को देखते हुए यह भी कहा गया कि आज अगर नामवर सिंह जीवित होते तो बेहद खुश होते क्योंकि जिस वाचिक परंपरा को उन्होंने अपनाया और लेखन को छोड़कर व्याख्यान की ओर गए उसको पल्लवित और पुष्पित होते देखकर वो आनंद से भर उठते। लेकिन कोरोना संकट के इस दौर में लेखकों के लाइव को देखने के बाद एक महत्वूपूर्ण तथ्य को भी रेखांकित किया जाना चाहिए। दरअसल आभासी माध्यम बेहद पारदर्शी है, वो हाथ के हाथ ये बता देता है कि आपको कितने लोग सुन रहे हैं या आपके लाइव का वीडियो कितने लोगों तक पहुंचा। तो हम जिस महत्वपूर्ण तथ्य की बात कह रहे थे वो ये कि बुजुर्ग और वरिष्ठ लेखकों को सुनने के लिए ही ज्यादा श्रोता या दर्शक फेसबुक पर पहुंचे। इनकी तुलना में युवाओं को बहुत ही कम दर्शक या श्रोता मिले। लगभग नगण्य। हिंदी की वरिष्ठ लेखिका ऊषाकिरण खान हों या मैत्रेयी पुष्पा या फिर विनोद कुमार शुक्ल या अशोक वाजपेयी ही क्यों न हों, इनको उन युवा लेखकों के मुकाबले ज्यादा लोगों ने सुना और देखा जो खुद को साहित्य का सितारा मानते हैं। अगर इस संख्या को लोकप्रियता का पैमाना माना जाए तो हमारे वरिष्ठ लेखक अब भी युवाओं पर भारी हैं। हिंदी साहित्य की आभासी दुनिया में जो भी उपस्थिति हो उसको ही पैमाना मानें तो ये बात और स्पष्ट हो जाती है। बहुत कम युवा लेखक ऐसे रहे जिनको सुनने के लिए सौ दर्शक फेसबुक पर लाइव जुड़े या फिर बाद में उनके वीडियो की पहुंच एक हजार लोगों तक हुई। साहित्य के भविष्य के लिए यह बहुत ही चिंता की बात है।
इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि हमारे युवा लेखक जो खुद को साहित्य का सितारा मानते हैं, श्रेष्ठता बोध इतना कि वो अपने आगे न तो रामचंद्र शुक्ल को कुछ मानते हैं और न ही प्रेमचंद को। एक वाक्य बोलकर या लिखकर अपने पूर्वज लेखकों का सब किया धरा लीप-पोत कर रखने की कोशिश करते हैं। हिंदी साहित्य के इसी लाइव काल में फेसबुक पर एक निरर्थक बहस चली जिसमें आचार्य रामचंद्र शुक्ल को लेकर न सिर्फ अनाप-शनाप कहा गया बल्कि उनके योगदान को खारिज करने जैसी बातें भी हुईं। रामचंद्र शुक्ल को खारिज करने के लिए कम से कम उनका लिखा पढ़ना आवश्यक है। बगैर रामचंद्र शुक्ल को पढ़े, सुनी सुनाई बातों के आधार पर और उनके नाम में लगे शुक्ल के आधार पर उनपर हमले किए गए। जिन लोगों ने भी रामचंद्र शुक्ल पर हमले किए या उनके साहित्यिक अवदान को न्यूनतम बताने की कोशिश की उनकी टिप्पणियां बेहद स्तरहीन और मूर्खतापूर्ण थीं। शुक्ल जी को कबीर विरोधी करार देनेवाले फेसबुक वीर अतिउत्साह में शुक्ल जी को ब्राह्मणवादी आलोचक तक करार देने में नहीं हिचके। काशी हिंदू विश्वविद्लय से जब हजारी प्रसाद द्विवेदी जी को जाना पड़ा था तब वो कुछ पंक्तियां कहा करते थे, उनमें से एक पंक्ति क्षमा सहित थोड़े बदलाव के साथ कि ‘वे द्विज और होंगे जो उल्लू के नखों की चोट से घायल हो जाते हैं।‘ 
आचार्य रामचंद्र शुक्ल की स्थापनाओं पर प्रश्न खड़े करने के लिए नामवर सिंह को भी ‘दूसरी परंपरा की खोज’ जैसी पुस्तक लिखनी पड़ी लेकिन उसमें भी नामवर सिंह ने बहुत संभलकर शुक्ल जी की आलोचना की। उद्धरणों के सहारे ही शुक्ल जी के लेखन पर सवाल उठाए। कई युवा लेखक आत्ममुग्धता में इतने पर भी नहीं रुकते हैं बल्कि वो इस बात में गौरव महसूस करते हैं कि वो हिंदी परंपरा को नहीं जानते हैं। वो बहुत गर्व से कहते हैं कि वो पंत और महादेवी को नहीं जानते या सिर्फ इतना जानते हैं कि वो हिंदी में ‘कुछ’ लिखते थे। इस तरह की टिप्पणियां अहंकारी लग सकती हैं पर दरअसल ये अज्ञान का सार्वजनिक प्रदर्शन है। अस्वीकार का साहस भी उन लेखकों के पास ही होता है जिसे अपनी परंपरा का ज्ञान होता है। नामवर सिंह ने भी दूसरी परंपरा की खोज लिखा था तो उसकी भूमिका में उल्लेख किया था, ‘अनपेक्षित प्रसंग वे कहे जा सकते हैं जहां अन्य विद्वानों की आलोचना है, लेकिन उसके बिना द्विवेदी जी के वैचारिक संघर्ष का संदर्भ अस्पष्ट और अमूर्त रह जाता। इसलिए शिष्टता पर स्पष्टता को तरजीह क्षम्य होनी चाहिए। कहने की आवश्यकता नहीं कि पूर्वपक्ष के ऋषि कुछ कम पूज्य नहीं-यह एहसास मुझमें है। लेकिन इन दिनों तो शिष्टता पर मूर्खता को तरजीह मिल रही है।‘ यह भी एक वजह हो सकती है कि जिससे उन युवा लेखकों को दर्शक या श्रोता नहीं मिल पा रहे हैं जिनको हिंदी साहित्य की परंपरा का ज्ञान नहीं है इसलिए जब वो विषय विशेष को उठाते हैं तो उसमें न तो गंभीरता रहती है और न ही कोई ऐसा रोचक प्रसंग जो दर्शक या श्रोता को समृद्ध कर सके। दरअसल लाइव अपने श्रोताओं से पाठकों से या दर्शकों के समझ जाना और उनको बांधे रखना एक अलग ही किस्म की कला है। या तो आपकी वक्तृत्व कला ऐसी हो जो दर्शकों को बांध सके या फिर आपके कहने में ऐसा कंटेंट हो जिसको सुनने के लिए लोग वक्ता के साथ जुड़े रह सकें। इन दोनों ही कसौटी पर हमारे दौर के वरिष्ठ लेखक युवाओं पर भारी पड़ते हैं।
किसी भी साहित्य में चलने वाले विमर्श, साहित्यकारों के बीच के नोंक-झोंक, हास परिहास और रचनात्मक आक्रमण उसकी जीवंतता को भी इंगित करते हैं लेकिन अगर फेसबुक पर चलनेवाले इन लाइव को हिंदी साहित्य का विमर्श मान लें तो जीवंतता कम आत्ममुग्धता ज्यादा दिखाई देती है। इसके अलावा एक और प्रवृत्ति है जिसको भी रेखांमकित करना आवश्यक है वो है युवा लेखकों में अपनी रचनाओं की कमी के बारे में सुनने का धैर्य नहीं होना। अपनी रचना में कमी या कमजोरी को वो सुनना नगीं चाहते हैं और अगर कोई वरिष्ठ साहित्यकार इस ओर ध्यान दिलाना चाहता है तो वो अपने मित्रों के साथ उनपर ही टूट पड़ते हैं। आलोचना और आलोचक को लेकर एक अजीब किस्म की उदासीनता और उपेक्षा का भाव दिखाई देता है। ज्यादातर युवा लेखक फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को आलोचकों की जगह रखते हैं और इसको लिखकर स्वीकार भी करते हैं। नतीजा यह है कि अभी अभी लिख रही युवा पीढ़ी का कोई अपना आलोचक तैयार नहीं हो सका जो उनकी रचनाओं के अर्थ खोलकर पाठकों तक पहुंचा सके। ऐसी परिस्थिति में अगर कोई युवा लेखक अपनी रचना को लेकर पाठकों के बीच भी जाता है और लाइव करता है तो उसको भी अपेक्षित संख्या नहीं मिल पाती है। इन स्थितियों पर विचार करने से स्थिति स्पष्ट होगी। 

Thursday, June 4, 2020

प्रयोगधर्मा फिल्मकार की कमी खलेगी

बासु भट्टाचार्य जब हिंदी के मशहूर उपन्यासकार फणीश्वर नाथ रेणु की कृति ‘तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम’ पर आधारित फिल्म ‘तीसरी कसम’ का निर्देशन कर रहे थे तो उनके साथ सहायक निर्देशक के रूप में जुड़े थे बासु चटर्जी। जब बासु चटर्जी ने फिल्म बनाने का फैसला लिया तो उन्होंने चुना हिंदी के उपन्यासकार राजेन्द्र यादव की कृति ‘सारा आकाश’ को। यह महज संयोग था एक प्रयोग इसका तो पता नहीं लेकिन बासु चटर्जी की इस फिल्म को मृणाल सेन की फिल्म ‘भुवन शोम’ के साथ समांतर सिनेमा की शुरुआती फिल्म माना जाता है। हिंदी फिल्मों की दुनिया में जब राजेश खन्ना का डंका बज रहा था, राजेश खन्ना की फिल्मों के रोमांस का जादू जब हिंदी के दर्शकों के सर चढ़कर बोल रहा था, लगभग उसी दौर में हिंदी फिल्मों में समांतर सिनेमा का बीज भी बोया जा रहा था। एक तरफ राजेश खन्ना का सपनों की दुनिया में ले जानेवाला रोमांस था तो दूसरी तरफ आम मध्यमवर्गीय परिवारों का अपने संघर्षों के बीच प्रेम का अहसास दिलानेवाली फिल्में। बासु चटर्जी ने अपनी पहली फिल्म सारा आकाश में इस तरह के प्रेम का ही चित्रण किया। जहां प्रेम तो है पर अपने खुरदरे अहसास के साथ। फिल्म ‘सारा आकाश’ को वो राजेन्द्र यादव के उपन्यास के पहले ही भाग पर केंद्रित कर बना रहे थे और राजेन्द्र यादव से लगातार उसपर ही चर्चा करते थे। राजेन्द्र यादव ने तब एक दिन बासु चटर्जी से कहा था कि यार तुम मेरे उपन्यास पर बालिका वधू सा क्या बना रहे हो? दरअसल राजेन्द्र यादव इस बात को लेकर चिंतित थे कि अगर उपन्यास पहले भाग पर केंद्रित रहा तो उनकी पूरी कहानी फिल्म में नहीं आ पाएगी। लेकिन बासु चटर्जी ने उनको समझा लिया था। बासु चटर्जी ने कई फिल्मों की पटकथा खुद ही लिखी थी क्योंकि वो मानते थे कि निर्देशक कहानी को सबसे अच्छे तरीके से समझ सकता है।
बासु चटर्जी ने फिर मन्नू भंडारी की कहानी ‘ये सच है’ पर ‘रजनीगंधा’ फिल्म बनाई जो दर्शकों को खूब पसंद आई। इस फिल्म में ही अमोल पालेकर और दिनेश ठाकुर जैसे आम चेहरे मोहरेवाले नायकों को लीड रोल देने का साहसी कदम बासु चटर्जी ने उठाया था। इस फिल्म से ही विद्या सिन्हा को अभिनेत्री के तौर पर पहचान मिली। फिर तो वो इस तरह के कई अन्य प्रयोग करते रहे। इसके बाद उन्होंने अमोल पालेकर और जरीना बहाव को लेकर ‘चितचोर’ बनाई। एक और प्रयोग बासु चटर्जी ने अपनी फिल्म ‘शौकीन’ में किया। इस फिल्म में तीन बुजुर्ग अशोक कुमार, ए के हंगल और उत्पल दत्त को लेकर उन्होंने बुजुर्ग मन के मनोविज्ञान को बहुत ही कलात्मक और सुंदर तरीके से दर्शकों के सामने पेश किया। शौकीन में बुजुर्ग मन के उस हिस्से को उभारा गया है जहां रोमांस शेष रह जाता है,अपने मन की करने की ललक बची रह जाती है। बासु चटर्जी ने कई कमर्शियल फिल्में भी की जिनमें अमिताभ बच्चन के साथ ‘मंजिल’ और राजेश खन्ना के साथ ‘चक्रव्यूह’ और अनिल कपूर के साथ ‘चमेली की शादी’ जैसी फिल्में भी शामिल हैं। 
एक निर्देशक के तौर पर बासु चटर्जी बहुत ही सख्त माने जाते हैं। सेट पर वो किसी तरह की अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं करते थे। एक फिल्म पत्रिका के संपादक रहे अरविंद कुमार ने बासु चटर्जी के सहायक के हवाले से एक वाकया लिखा है,  ‘दिल्लगी’ की शूटिंग के दिनों की बात है। शिफ़्ट सुबह नौ से चार तक थी। शत्रुघ्न सिन्हा को सुबह आना था वो आए शाम के चार से कुछ पहले। बासु चटर्जी ने किसी तरह अपने को संयमित किया और शत्रुघ्न सिन्हा को बोले “कॉस्ट्यूम पहन आएं।” शत्रुघ्न सिन्हा जबतक तैयार होकर आए इधर बासु चटर्जी और कैमरा निर्देशक मणि कौल में बहस हो रही थी। मणि कह रहे थे, “आधे घंटे में सूरज ढल जाएगा, तो दिन का यह सीन कैसे पूरा कर लेंगे आप?” बासु ने शत्रुघ्न को देखते ही कहा, अब तो पैकअप करना होगा... कल कोशिश करते हैं’ निर्देशक का कठोर और सहज संदेश। अगले दिन शत्रुघ्न सिन्हा ठीक दस बजे सेट पर मौजूद थे। 
बासु चटर्जी ने अपनी दूसरी पारी टीवी के साथ शुरू की थी। अभी हाल ही लॉकडाउन के दौरान जिस सीरियल ‘व्योमकेश बक्षी’ को दर्शकों ने खूब पसंद किया उसे भी बासु दा ने ही बनाया था। इलके अलावा बासु चटर्जी ने ‘रजनी’, ‘दर्पण’ और ‘कक्काजी कहिन’ जैसे टीवी सीरियल का भी निर्माण किया। वो मानते थे कि टी वी का एक्सपोजर बहुत है और उसको बहुत सारे लोग एक साथ देखते हैं। साथ ही वो ये भी कहते थे कि टीवी की इतनी ज्यादा पहुंच है कि कुछ ऐसा बनाना जो एकसाथ इतने सारे लोग को पसंद आए, बड़ी चुनौती है। बासु चटर्जी के निधन से हिंदी सिनेमा ने एक प्रयोगधर्मा वयक्तित्व को खो दिया जिसक जगह की भारपाई जल्दी संभव नहीं। 

Monday, June 1, 2020

न वो राज रहे, न वो राजघाराना

1942 में केदार शर्मा मुंबई के रंजीत स्टूडियोज के लिए एक फिल्म बना रहे थे, विषकन्या, जिसमें पृथ्वीराज कपूर, साधना बोस और सुरेन्द्र नाथ प्रमुख भूमिका में थे। केदार शर्मा और पृथ्वीराज कपूर में कलकत्ता (अब कोलकाता) के दिनों से बहुत दोस्ती थी और दोनों एक दूसरे के सुख-दुख के साथी थे। बाद में दोनों कोलकाता से मुबई आ गए थे। फिल्म विषकन्या की शूटिंग के दौरान केदार शर्मा ने इस बात को नोटिस किया कि पृथ्वीराज कपूर जब भी शूटिंग के लिए सेट पर पहुंचते हैं तो वो बहुत उदास रहते हैं। शूटिंग के पहले और बाद में भी गुमसुम रहते हैं और सेट पर किसी से बातचीत नहीं करते हैं। केदार शर्मा लगातार इस बात को नोट कर रहे थे लेकिन पृथ्वीराज कपूर से पूछ नहीं पा रहे थे। एक दिन अवसर मिल ही गया, पृथ्वीराज कपूर एक शॉट देने के बाद सेट पर एक कोने में जाकर बैठ गए। ये देखकर केदार शर्मा उनके पास पहुंचे उनका हाथ पकड़कर बोले कि अगर इसमें बहुत व्यक्तिगत कुछ नहीं हो तो मैं आपकी उदासी का कारण जानना चाहता हूं। मुझे लगता है कि आप किसी खास वजह से बेहद परेशान हैं। आप मुझपर भरोसा रखकर उदासी की वजह बताइए मैं उसको दूर करने की कोशिश करूंगा। इतना सुनकर पृथ्वीराज कपूर अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सके और जोर से केदार का हाथ पकड़कर बोले, केदार! मैं अपने बेटे राजू को लेकर बहुत चिंतित हूं। किशोरावस्था की उलझनों में वो मुझे भटकता हुआ लग रहा है, मैंने उसको पढ़ने के लिए कॉलेज भेजा लेकिन पर वहां पढ़ाई से ज्यादा वो लड़कियों में खो गया है। इतना बोलकर पृथ्वीराज कपूर चुप हो गए। केदार शर्मा ने पृथ्वीराज कपूर के कंधे पर अपना हाथ रखकर कहा कि अपने बेटे को मुझे सौंप दो लेकिन एक वादा करो कि मेरे और उसके बीच आप दखलअंदाजी नहीं करोगे। मैं उसको रास्ते पर लाऊंगा ठीक उसी तरह जिस तरह से कोई गुरू अपने चेले को लेकर आता है। मैं उसको अपना असिस्टेंट डायरेक्टर बनाने के लिए तैयार हूं। पृथ्वीराज कपूर का दुख कुछ कम हुआ। 
अगले दिन वो अपने बेटे राजू को लेकर केदार शर्मा के पास पहुंचे। कपूर खानदान की परंपरा के मुताबिक राजू ने केदार शर्मा के पांव छूकर आशीर्वाद लिया। केदार शर्मा ने राजू को उनके बचपन के दिनों की याद दिलाई जब वो कोलकाता में रहते थे और अपने पिता के साथ स्टूडियो आया करते थे। एक दिन जब केदार शर्मा रील देख रहे थे तो राजू ने उनसे जानना चाहा था कि रील में कैद चित्र पर्दे पर चलने कैसे लगते हैं। तब केदार शर्मा ने राजू को कहा था कि एक दिन मैं तुम्हें इसका रहस्य बताऊंगा। अब केदार शर्मा ने राजू से कहा कि रील का रहस्य जानने का समय आ गया है। तुम अब मेरे साथ काम करो आज से तुम मेरे असिस्टेंट डायरेक्टर हो। इसके बाद की कहानी बहुचर्चित है कि कैसे केदार शर्मा ने राजू को एक जोरदार थप्पड़ जड़ा था और फिर उसके बाद अपनी फिल्म में काम करने का ऑफर दिया था। जब राजू को केदार शर्मा ने फिल्म का ऑफर दिया था तब राजू ने उनसे कहा था कि हां अंकल! मैं कैमरे के आगे काम करना चाहता हूं और दुनिया को अपनी अभिनय की प्रतिभा दिखाना चाहता हूं। इतना सुनते ही केदार शर्मा ने राजू को गले लगा लिया था। गले लगते ही राजू ने उनकी कान में कहा था, प्लीज अंकल प्लीज मेरे साथ हीरोइन के तौर पर बेबी मुमताज तो रख लेना, वो बेहद खूबसूरत है। इसी बेबी मुमताज को लोगों ने बाद में मधुबाला के नाम से जाना। केदार शर्मा ने वादा तो कर दिया लेकिन बाद में बेबी मुमताज को फिल्म में लेने के लिए उनको अपने पार्टनर की नाराजगी भी झेलनी पड़ी थी। खैर ये अलहदा प्रसंग है जिसकी विस्तार से चर्चा केदार शर्मा ने अपनी आत्मकथा में की है।   
पर कौन जानता था कि जो बालक कोलकाता के स्टूडियो में केदार शर्मा से रील का रहस्य जानना चाहता था, जो किशोरावस्था में कॉलेज में पढ़ाई न करके अन्य सभी बदमाशियां किया करता था, जिसके पिता उसके करियर की चिंता में सेट पर उदास बैठा करते थे, वो रील की इस दुनिया में इतना डूब जाएगा, उसकी बारीकियों को इस कदर समझ लेगा या फिर रील में चलने फिरनेवाले इंसान के व्याकरण को इतना आत्मसात कर लेगा कि पहले अभिनेता राज कपूर के तौर पर और बाद में शोमैन राज कपूर के रूप में उनकी ख्याति पूरे विश्व में फैल जाएगी। आज राज कपूर हमारे बीच नहीं हैं लेकिन रील की उनकी समझ, रील के रूप में उनकी सृजनात्मकता आज भी लोगों को चमत्कृत करती है।  

Saturday, May 30, 2020

सेलिब्रिटी जोड़ियों का सियासी खेल

आचार्य विष्णुकांत शास्त्री के संस्मरणों की पुस्तक का विमोचन का समारोह था। अन्य वक्ताओं के साथ नामवर सिंह भी मंच पर थे। जब उनकी बारी आई तो उन्होंने संस्मरण विधा के बहाने से समाज पर भी एक टिप्पणी कर दी थी जो अब भी समीचीन प्रतीत होती है। उनकी कही वो बात अब-तक याद है। नामवर सिंह ने विमोचन समारोह में कहा था कि ‘इस भाग दौड़ के युग में हमलोग, यह पूरा देश और खासकर जब से यह हाईटेक और फास्टफूड वाली संस्कृति चल रही है, तब से हमलोग स्मृति-भ्रंश का शिकार हो गए हैं। यह देश आज और अब को याद करने में इतना बंधा हुआ है कि अतीत को याद करना पलायन माना जाता है।‘ नामवर सिंह ने तब भगवद्गीता को भी उद्धृत किया था, ‘जिस जाति, जिस समाज और जिस देश का स्मृति-भ्रंश हो जाए उसका विनाश निश्चित है।‘ उस समारोह में नामवर सिंह संस्मरण लेखन के संदर्भ में ये बात कह रहे थे और उनका जोर इस बात पर था कि संस्मरण लेखन स्मृति-भ्रंश के खिलाफ प्रतिरोध है। इस लेख में भी हम बात करेंगे स्मृति-भ्रंश की उस पृष्ठभूमि की जो फास्टफूड वाली संस्कृति के दौर में अपनी सुविधा के लिए आम जनता को भ्रमित करने के लिए तैयार की जाती है। पिछले सप्ताह इस स्तंभ में वेब सीरीज पाताल-लोक की चर्चा की गई थी जिसकी प्रोड्यूसर फिल्म अभिनेत्री अनुष्का शर्मा हैं। वेब सीरीज पाताल-लोक में हिंदू धर्म के प्रतीकों को अपराध और अपराधियों से जोड़ने की एक सायास कोशिश दिखाई देती है। इसके अलावा भारतीय और भारतीयता की बात करनेवाली विचारधारा को कमतर और मॉब लिंचिंग आदि से जोड़कर दिखाने का उपक्रम भी है। इस बात को लेकर अनुष्का शर्मा लगातार कई दिनों से सवालों के घेरे में है। अब जरा इसके दूसरे पहलू पर विचार करते हैं यानि कि अनुष्का के पति और क्रिकेटर विराट कोहली की। अनुष्का जहां एक ओर अपने वेब सीरीज के माध्यम से हिंदू धर्म प्रतीकों और हिंदुओं की राजनीति करनेवालों पर करारा प्रहार कर रही है वहीं उनके पति विराट कोहली राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तारीफों के पुल बांधते रहते हैं। अभी हाल ही में उन्होंने कोरोना संकट के दौरान संघ से जुड़े संगठन सेवा भारती के कामों की प्रशंसा करते हुए एक वीडियो जारी किया था जो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ था।कहना न होगा कि पति पत्नी अलग अलग विचारों को लेकर समाज के सामने आ रहे हैं। पति पत्नी के इस तरह के कृत्यों से भी स्मृति-भ्रंश की पृष्ठभूमि तैयार होती है। जनता यह भूल जाती है कि किसने क्या किया था। 
बॉलीवुड में देखें तो विराट कोहली और अनुष्का शर्मा ही सिर्फ ऐसे नहीं हैं जहां पति अलग विचारधारा का समर्थन और प्रचार करता है और पत्नी अलग विचारधारा के फैलाव के लिए प्रयत्नशील रहती है। ऐसी ही एक सुपरस्टार जोड़ी है रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण की। दीपिका पादुकोण मौजूदा सरकार के खिलाफ नजर आती है, नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पहले भी कांग्रेस के पक्ष में साक्षात्कार आदि दे चुकी है। पिछले दिनों भी जब उनकी फिल्म ‘छपाक’ रिलीज होनेवाली थी तो वो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आंदोलनकारी छात्रों के बीच जाकर मौन समर्थन दे आई थीं। भले ही तब वो अपनी फिल्म को हिट कराने का एक स्टंट था लेकिन सरकार विरोधियों के साथ खड़े होकर उन्होंने अपनी छवि और स्पष्ट कर दी थी। इसके अलावा भी दीपिका पादुकोण यदा-कदा ही सही लेकिन अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता स्पष्ट करती रही हैं। दूसरी तरफ उनके पति रणवीर सिंह भारतीय जनता पार्टी और उसके सर्वोच्च नेता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति अपना प्रेम प्रकट करने से कभी नहीं चूकते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ झप्पी लेते हुए तस्वीर अपने इंस्टाग्राम पर साझा करते हुए लिखते हैं, ‘जादू की झप्पी, अपने महान देश के माननीय प्रधानमंत्री से मिलने की खुशी।‘ तब रणवीर सिंह के उस फोटो को इकतीस लाख से अधिक लाइक्स मिले थे। इसके अलावा भी रणवीर सिंह मोदी को लेकर अपने प्रेम को सार्वजनिक करने में नहीं हिचकते हैं। इस तरह से अगर देखें तो पत्नी भारतीय जनता पार्टी के विरोध में और पति भारतीय जनता पार्टी के साथ। अजब राजनीति की गजब कहानी। पति पत्नी के अलग अलग राजनीतिक विचारधारा के समर्थन करने की कहानी इन्हीं दोनों पर आकर खत्म नहीं होती है। और भी कई सुपर स्टार हैं जो अलग-अलग समय पर अलग-अलग राजनीतिक दलों के साथ रहे हैं। अब अगर हम अपने एक और सुपर स्टार को देखें तो स्थिति और स्पष्ट होती है ये हैं अक्षय कुमार। अक्षय कुमार के बारे में ये साफ है कि वो भारतीय जनता पार्टी के साथ हैं, वो नरेन्द्र मोदी के प्रशंसक ही नहीं उनके समर्थक भी हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी भी उनको पसंद करते हैं। चुनाव के पहले अगर नरेन्द्र मोदी का इंटरव्यू करना होता है तो अक्षय कुमार का ही चयन किया जाता है। कोरोना के संकट में जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पीएम केयर फंड की स्थापना करते हैं तो अक्षय कुमार सबसे पहले पच्चीस करोड़ रुपए उस फंड में दान करते हैं। इसके अलावा भी वो हमेशा मोदी के पक्ष में खड़े रहते हैं। दूसरी तरफ उनकी पत्नी हैं ट्विकंल खन्ना। ट्विंकल खन्ना हमेशा से भारतीय जनता पार्टी या नरेन्द्र मोदी पर तंज कसने से लेकर विरोध में टिप्पणियां करती रही हैं। पिछले साल अप्रैल में जब अक्षय कुमार ने नरेन्द्र मोदी का बहुचर्चित इंटरव्यू किया था उसमें मोदी ने ट्विकंल के विरोध को रेखांकित भी किया था। मोदी ने तब मजाक में अक्षय कुमार से कहा भी था कि ‘जब मैं ट्विकंल खन्ना के ट्वीट्स देखता हूं तो कभी-कभी मुझे लगता है कि वो जिस प्रकार से अपना गुस्सा मुझ पर निकालती हैं उससे आपके पारिवारिक जीवन में बहुत शांति रहती होगी। उनका गुस्सा मुझपर निकल जाता है और आप सुकून से रह पाते हैं, मैं आपके किसी काम आ सका’। मोदी ने भले ही मजाक में ये बात कही थी लेकिन उन्होंने पूरी दुनिया को ये तो बता ही दिया था कि ट्विकंल खन्ना मोदी को लेकर विरोधी टिप्पणियां करती रहती हैं और अपना गुस्सा भी निकालती हैं। 
अगर हम सदी के महानायक और मेगास्टार अमिताभ बच्चन की बात करें तो वहां भी पति-पत्नी के बीच अलग-अलग विचार पलते हैं। अमिताभ बच्चन जब कांग्रेस के टिकट पर 1984 में प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) से चुनाव लड़े थे तब जया बच्चन ने उनके लिए चुनाव प्रचार किया था। जाहिर सी बात है कि तब उनको कांग्रेस के लिए प्रचार करना पड़ा था लेकिन जब बच्चन साहब का कांग्रेस से मोहभंग हुआ तो अमिताभ बच्चन, नरेन्द्र मोदी की ओर आकर्षित हुए।अमिताभ बच्चन ने मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए ही उनको समर्थन देना शुरू कर दिया था परोक्ष भी और प्रत्यक्ष भी। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद तो दोनों के बीच की नजदीकियों को पूरी दुनिया ने देखा। लेकिन जया बच्चन ने अमिताभ बच्चन के साथ भारतीय जनता पार्टी की ओर जाने से बेहतर समझा कि समाजवादी पार्टी की ओर रुख कर लिया जाए और वो मुलायम सिंह के साथ हो लीं। समाजवादी पार्टी ने भी उनको इज्जत बख्शी और वो 2004 से लगातार समाजवादी पार्टी के नुमाइंदे के तौर पर राज्यसभा की सदस्य हैं। बॉलीवुड का ये नया ट्रेंड चौंकाता तो है लेकिन साथ ही उनकी बदलती मानसिकता की ओर भी संकेत करता है। संकेतों को पकड़ा जाता है उसको व्याख्यित नहीं किया जा सकता है।       

Saturday, May 23, 2020

पाताल लोक में पक्षपात का समुच्चय

वेब सीरीज की स्वच्छंद दुनिया में एक नए सीरियल का पदार्पण हुआ है नाम है पाताल लोक। ये वेब सीरीज जिस प्लेटफॉर्म पर दिखाए जाते हैं वो प्लेटफॉर्म ही स्वच्छंद हैं तो जाहिर ही बात है इन वेब सीरीज में स्वच्छंदता होगी ही। जब कहीं से किसी प्रकार का बंधन नहीं होता और किसी प्रकार का कोई उत्तरदायित्व नहीं होता तो बहुधा ये स्वच्छंदता अराजकता में बदल जाती है। वेब सीरीज की दुनिया को देखने के बाद ये लग रहा है कि ये दुनिया स्वच्छंदता से स्वायत्ता की ओर न बढ़कर स्वच्छंदता से अकाजकता की ओर बढ़ने के लिए व्यग्र है। वेब सीरीज पर दिखाए जानेवाले कंटेंट को लेकर कई बार चर्चा हो चुकी है। इस स्तंभ में ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म (ओटीटी) पर दिखाए जाने वाले कई बेव सीरीज में दिखाए गए भयंकर हिंसा, जुगुप्साजनक यौनिक प्रसंग के अलावा समाज को बांटनेवाले कंटेंट को रेखांकित किया जा चुका है। अमेजन प्राइम पर वेब सीरीज पाताल लोक इन दिनों काफी चर्चित हो रहा है। इस वेब सीरीज की प्रोड्यूसर फिल्म अभिनेत्री अनुष्का शर्मा हैं और कहानी लिखी है सुदीप शर्मा और तीन अन्य लेखकों ने मिलकर। इस वेब सीरीज के कंटेंट पर बाद में आते हैं पहले बात कर लेते हैं कहानी की। इस वेब सीरीज की जो कहानी है वो पत्रकार तरुण तेजपाल के उपन्यास ‘द स्टोरी ऑफ माई एसेसिन्स’ पर बनाई गई प्रतीत होती है क्योंकि कहानी के प्लॉट से लेकर कुछ पात्रों के नाम और काम दोनों में समानता दिखाई देती है। अगर ऐसा है तो अबतक तरुण तेजपाल को इस वेब सीरीज पर अपनी साहित्यिक कृति की चोरी का आरोप लगा देना चाहिए था क्योंकु उनको कहीं क्रेडिट नहीं दिया गया है। साहित्यिक हलके में ऐसी चर्चा है कि तरुण तेजपाल की मर्जी से ऐसा हुआ है। सचाई या तो तरुण तेजपाल बता सकते हैं या फिर सुदीप शर्मा। एक स्टिंग ऑपरेशन के बाद तरुण तेजपाल की हत्या की साजिश की बात सामने आई थी और दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में बिहार के एक बाहुबली राजनेता का नाम भी आया था। इस बात की पर्याप्त चर्चा हुई थी कि दुबई में बैठे एक माफिया डॉन ने तरुण तेजपाल की सुपारी दी थी। उस वक्त की चर्चा में दोनों चरित्र मुसलमान थे लेकिन अगर कहानी तरुण तेजपाल के उपन्यास से प्रेरित है तो वेब सीरीज में दोनों को बदल दिया गया है, न तो सुपारी लेनेवाला और न ही देनेवाला मुसलमान है। ये कलात्मक सृजनात्मक की कैसी स्वतंत्रता है इसपर देशव्यापी बहस की आवश्यकता है।  
अब जब पाताल लोक रिलीज हुई तो एक बार फिर से इन बातों की चर्चा शुरू हो जाना स्वाभाविक है। कहानी चाहे तरुण के उपन्यास की हो, उससे प्रेरित हो या फिर सुदीप ने खुद लिखी हो इतना तो तय है कि इस कहानी के पीछे मंशा उस नैरेटिव को मजबूती देने की है जिसमें भगवा झंडा लेकर चलनेवाले मॉब लिंचिंग करते हैं। अपराधी अपराध करने के बाद मंदिर में जाकर शरण लेते हैं, आदि आदि। ये कहानी एक टेलीविजन संपादक की असफल हत्या के प्रयास की कहानी और हत्यारों की गिरफ्तारी को लेकर शुरू होती है। कहानी दिल्ली की जमीन पर चलती है। जिस न्यूज चैनल संपादक की हत्या का प्लॉट दिखाया गया है वो बेहद लोकप्रिय है। न्यूज चैनल के संपादक का उसके सहकर्मी के साथ इश्क और शारीरिक संबंध दोनों दिखाए गए हैं। परोक्ष रूप से किसी लड़की की अपने देह का उपयोग कर अपने करियर में आगे बढ़ने की बात को बल देने की हद तक। यहां तो संपादक और उसकी सहयोगी के बीच चलनेवाले संबंध बेहद सहजता के साथ दिखा दिए गए हैं लेकिन तरुण तेजपाल की असल जिंदगी में तो उनपर उनके साथ काम करनेवाली एक लड़की ने बेहद गंभीर आरोप लगाए थे जिसके बाद वो गिरफ्तार भी हुए थे और जेल में लंबे समय तक रहना भी पड़ा था। पूरी कहानी में टेलीविजन चैनल को लेकर जो कहानी बुनी गई है वो बहुत हद तक कमजोर सी लगती है और ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक और निर्देशक को न्यूज चैनलों के कामकाज करने के तरीके को लेकर और काम करने की जरूरत है। न्यूज रूम की वर्किंग भी वास्तविकता से थोड़ी दूर है। 
अब हम आते हैं पाताल लोक की उस कहानी पर या उन संवादों या दृष्यों पर जिसको लेकर ये धारणा बनती है कि इस वेब सीरीज का मकसद एक धर्म विशेष को बदनाम करना भी है। कला की सृजनात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर समाज को बांटने की छूट न तो लेनी चाहिए और ना ही दी जानी चाहिए। अब इस वेब सीरीज में साफ तौर पर पुलिस और सीबीआई दोनों को मुसलमानों के प्रति पूर्वग्रह से ग्रसित दिखाया गया। थाने में मौजूद हिंदू पुलिसवालों के बीच की बातचीत में मुसलमानों को लेकर जिस तरह के विशेषणों का उपयोग किया जाता है उससे ये लगता है कि पुलिस फोर्स सांप्रदायिक है। इसी तरह से जब इस वेब सीरीज में न्यूज चैनल के संपादक की हत्या की साजिश की जांच दिल्ली पुलिस से लेकर सीबीआई को सौंपी जाती है, और जब सीबीआई इस केस को हल करने का दावा करने के लिए प्रेस कांफ्रेंस करती है तो वहां तक उसको मुसलमानों के खिलाफ ही दिखाया गया है। मुसलमान हैं तो आईएसआई से जुड़े होंगे, नाम में एम लगा है तो उसका मतलब मुसलमान ही होगा आदि आदि। संवाद में भी इस तरह के वाक्यों का ही प्रयोग किया गया है ताकि इस नेरेटिव को मजबूती मिल सके। और अंत में ऐसा होता ही है कि सीबीआई मुस्लिम संदिग्ध को पाकिस्तान से और आईएसआई से जोड़कर उसे अपराधी साबित कर देती है। कथा इस तरह से चलती है कि जांच में क्या होना है ये पहले से तय है, बस उसको फ्रेम करके जनता के सामने पेश कर देना है। अगर किसी चरित्र को सांप्रदायिक दिखाया जाता तो कोई आपत्ति नहीं होती, आपत्तिजनक होता है पूरे सिस्टम को सांप्रदायिक दिखाना जो समाज को बांटने के लिए उत्प्रेरक का काम करती है। बात यहीं तक नहीं रुकती है, इस वेब सीरीज में तमाम तरह के क्राइम को हिंदू धर्म के प्रतीकों से जोड़कर दिखाया गया है। 
ये पहला मौका नहीं है जब कोई वेब सीरीज इस तरह से हिंदू धर्म और प्रतीकों के खिलाफ माहौल बनाने में जुटा है। नेटफ्लिक्स पर एक वेब सीरीज आई थी लैला, ये सीरीज प्रयाग अकबर के उपन्यास पर आधारित थी। इसको देखने के बाद ये बात साफ तौर पर उभर कर आई थी कि ये हिंदुओं के धर्म और उनकी संस्कृति की कथित भयावहता को दिखाने के उद्देश्य से बनाई गई है। लैला का निर्देशन दीपा मेहता ने किया था। अभी चंद दिनों पहले दैनिक जागरण के एक कार्यक्रम में सूचना और प्रसारण मंत्री ने जोरदार तरीके से वेब सीरीज के स्वनियमन पर बल दिया था। ये तो सरकार का काम है जब चाहे करे लेकिन वेब सीरीज के माध्यम से खड़ा किए जा रहे फेक नैरेटिव का रचनात्मक प्रतिकार जरूरी है। समय और समाज का सही चित्रण करें और यहां इस काम में सरकार पहल कर सकती हैं। उनके पास नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन है। उसका उपयोग किया जा सकता है। अगर ‘पाताल लोक’ या ‘लैला’ के माध्यम से हिंदू धर्म का काल्पनिक चित्रण हो रहा है तो किसी और वेब सीरीज के माध्यम से उसका यथार्थ चित्रण भी होना चाहिए जिसमें महिमामंडन की बजाए उन सकारात्मक पक्षों की बात हो जो लोक-कल्याणकारी है। 

Saturday, May 16, 2020

पुरस्कारों को लेकर उदासीनता का भाव


पिछले दिनों भारतीय ज्ञानपीठ से पुरस्कृत लेखकों के उन वक्तव्यों को पढ़ रहा था जो उन्होंने सम्मान समारोह में दिए थे। इसी क्रम में 27 जनवरी 2001 को निर्मल वर्मा का वक्तव्य पढ़ रहा था। उसमें एक जगह वो कहते हैं कि ‘आज अगर साहित्य के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए खड़ा हूं तो सिर्फ इसलिए नहीं कि उसने जीने के मरुस्थल को थोड़ा बहुत सहनीय बनाया है बल्कि इसलिए भी कि उसने उन सब मरीचिकाओं के सम्मोहन को तोड़ने का दुस्साहस किया है जिन्होंने इस सदी के मनुष्य को इतना आहत, इतना दिग्भ्रमित किया था।‘ उनके इस वाक्य से साहित्य की महत्ता तो समझ आती ही है परोक्ष रूप से किसी पुरस्कार की अहमियत भी समझी जा सकती है। इस तरह के स्वर ज्ञानपीठ से पुरस्कृत लेखकों के वकतव्यों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सुनाई देते हैं। वो किसी भी भाषा का लेखक हो उसके मन में ये आकांक्षा रहती है कि उसका काम रेखांकित किया जा सके। काम को पहचान मिले। इस पहचान को रेखांकित करने के लिए भारत सरकार की संस्थाएं और भारत सरकार सं संबद्ध संस्थाएं पुरस्कार देती रही हैं। साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, भारतीय प्रेस परिषद, केंद्रीय हिंदी संस्थान के अलावा कई मंत्रालय भी लेखकों-पत्रकारों को पुरस्कार देती रही हैं। इससे लेखकों-पत्रकारों के ‘जीने के मरुस्थल को थोड़ा सहनीय बनाने में मदद मिलती है’। सराकरी पुरस्कारों के अलावा निजी क्षेत्र में भी कई पुरस्कार दिए जाते हैं। इनमें से कई पुरस्कार तो बेहद प्रतिष्ठित भी हैं।

अब जरा इनमें से कुछ सरकारी पुरस्कारों पर नजर डाल लेते हैं। सबसे पहले विचार करते हैं सूचना और प्रसारण मंत्रालय के भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार पर। वेबसाइट्स पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक ये पुरस्कार हिंदी के पितामह भारतेन्दु हरिश्चंद्र के नाम पर 1983 में शुरू किया गया था। प्रतिवर्ष ये पुरस्कार कई श्रेणियों में दिया जाता था जिनमें पत्रकारिता और जनसंचार, महिलाओं के मुद्दों पर लेखन,और बच्चों पर लिखने के लिए दिया जाता था। आपको ये लग सकता है कि दिया जाता था क्यों लिखा। इसकी वजह ये है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय का ये पुरस्कार समारोह 2014 के बाद आयोजित नहीं किया जा सका है। 2014 में भी वर्ष 2011 और 2012 के लिए ये पुरस्कार दिया गया था। उस वक्त भी सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ही थे और संयोग से इस वक्त भी सूचना और प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी प्रकाश जी के कंधों पर ही है। इस बीच अरुण जेटली, वेंकैया नायडू, स्मृति इरानी और राज्यवर्धन राठौर सूचना और प्रसारण मंत्री बने। स्मृति इरानी के कार्यकाल में इस बात की चर्चा हुई थी कि भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार दिए जाएंगें लेकिन उनका कार्यकाल छोटा रहा और पुरस्कार पर काम नहीं हो सका। कार्यकाल तो वेंकैया जी का भी छोटा रहा था। सूचना और प्रसारण मंत्रालय का ये पुरस्कार पिछले छह साल से आयोजित नहीं हुआ है और अभी किसी प्रकार का कोई संकेत भी नहीं मिल रहा है कि इस वर्ष शुरू हो पाएगा या नहीं। 2014 में आयोजित भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार समारोह की बारे में प्रकाशित खबरों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि प्रकाश जावड़ेकर ने तब ये घोषणा की थी ये पुरस्कार नियमित रूप से दिया ही नहीं जाएगा बल्कि हर वर्ष 9 सितंबर को भारतेन्दु के जन्मदिन पर पुरस्कार समारोह आयोजित किया जाएगा। पर ऐसा हो नहीं सका। 2014 के बाद न तो पुरस्कार दिए गए न ही समारोह आयोजित हुआ। पुरस्कार नहीं दिए जाने की कोई वजह भी सामने नहीं आ पाई है, क्या ये पुरस्कार लालफीताशाही की भेंट चढ़ गया? या इस पुरस्कार को किसी नीति के तहत बंद कर दिया गया या फिर अफसरशाही की लापरवाही के चलते ये प्रतिष्ठित पुरस्कार लंबे समय से स्थगित है। बंद होने की घोषणा नहीं हुई है इस वजह से स्थगित लिखा। इस वर्ष भारतेन्दु के जन्मदिन आने में करीब चार महीने हैं। अगर मंत्रालय पहल करे तो इस वर्ष ये पुरस्कार भारतेन्दु के जन्मदिवस पर दिए जा सकते हैं। जरूरत इस बात की है कि मंत्रालय में बैठे ‘यथास्थितिवाद के देवताओं’ को सक्रिय होना पड़ेगा। हो सकता है कि कोरोना की वजह से उत्पन्न हालात में इसपर विचार नहीं हो लेकिन अगर हमें कोरोना के साथ जीने की आदत डालनी है तो इसपर भी विचार तो किया ही जाना चाहिए।

पत्रकारों और लेखकों को एक और संस्था पुरस्कार देती है, वो है आगरा का केंद्रीय हिंदी संस्थान। ये संस्थान मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत आता है। केंद्रीय हिंदी संस्थान बारह श्रेणियों में  देश विदेश के अलग अलग क्षेत्रों में कार्यरत हिंदी सेवियों को सम्मानित करता रहा है। अभी इस संस्थान ने 2017 के पुरस्कारों की घोषणा की है। जब 2017 के पुरस्कारों की घोषणा तो कर दी गई लेकिन 2016 में घोषित किए गए पुरस्कारों का वितरण नहीं हो पाया है। 2016 के पुरस्कारों का वितरण नहीं हो पाने की एक बेहद दिलचस्प वजह है। मसला ये है कि केंद्रीय हिंदी संस्थान जिन हिंदी सेवियों को पुरस्कार के लिए चयनित करता है उनको राष्ट्रपति के हाथों से ये सम्मान मिलता रहा है। पुरस्कारों की घोषणा की गई तो तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने 26 जून 2018 को अपने पत्र संख्या अ.शा.पत्र सं 2-1/हि.से.स/2018 के माध्यम से राष्ट्रपति से समय मांगा। इसके बाद 9 जुलाई 2019 को नए मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने भी राष्ट्रपति महोदय से पुरस्कार समारोह के लिए समय देने का अनुरोध किया। इस बीच मानव संसाधन वितास मंत्रालय के संयुक्त सचिव ने राष्ट्रपति के निजी सचिव को 15 मार्च 2019 को पत्र लिखकर मंत्री के अनुरोध पत्र का हवाला देते हुए समय की मांग की थी। पता चला है कि कुछ दिनों पहले राष्ट्रपति भवन से मंत्रालय को ये सलाह दी गई है कि उपराष्ट्रपति से अनुरोध कर उनके कर कमलों से पुरस्कार वितरण करवा लें। ये सलाह देने में काफी समय लग गया और इस वजह से 2017 के पुरस्कारों की घोषणा टलती रही। पता नहीं किन कारणों से राष्ट्रपति पुरस्कार देने से बचने लगे हैं। पिछले वर्ष राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी उपराष्ट्रपति के हाथों दिया गया। इतनी पुरानी परंपरा को किस आधार पर परिवर्तित किया गया इसकी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। हर लेखक, कलाकार की इच्छा होती है कि राष्ट्रपति के हाथों उसका सम्मान हो। कलाम साहब तो पुरस्कार समारोह में कई घंटे रुका करते थे, इस परंपरा का निर्वाह प्रणब मुखर्जी तक हुआ। खैर ये अलग विषय है जिसपर कभी विस्तार से चर्चा होगी।
ये सिर्फ केंद्रीय हिंदी संस्थान या सूचना और प्रसारण मंत्रालय का हाल नहीं है। संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध संगीत नाटक अकादमी के 2018 के पुरस्कारों की घोषणा भी पिछले साल जुलाई में हुई थी और परंपरा के मुताबिक दिसंबर तक पुरस्कार वितरण समारोह हो जाना चाहिए था पर वो हो न सका। अब मार्च से तो कोरोना संकट ही हम सबके सामने खड़ा है और अब तो ये अपेक्षा भी नहीं की जा सकती है कि सम्मान समारोह आयोजित किए जाएं। लेकिन कोरोना संकट शुरू होने के पहले की स्थितियों को देखते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का भीष्म पितामह पर लिखा एक वाक्य याद आता है, ‘जान पड़ता है कि भीष्म में कर्तव्य अकर्तव्य के निर्णय में कहीं कोई कमजोरी थी। वह उचित अवसर पर उचित निर्णय नहीं ले पाते थे’। पुरस्कारों के मामले में मंत्रियों को अपने मंत्रालयों में बैठे उन भीष्म पितामहों की पहचान करनी चाहिए जो उचित अवसर पर उचित निर्णय नहीं ले पा रहे हैं।

Thursday, May 14, 2020

बेहतर मंजिल की आस


कोरोना की वजह से सभी सिनेमा हॉल बंद हैं, नई फिल्मों की शूटिंग नहीं हो पा रही है, जिन फिल्मों की शूटिंग पूरी हो गई हैं उनकी एडिटिंग और डबिंग आदि नहीं हो पा रही हैं। सिनेमा हॉल्स के बंद होने की वजह से फिल्मों की रिलीज लगातार टलती जा रही है। फिल्मों में पैसे निवेश कर घर बैठे प्रोड्यूसर्स के लिए संकट बढ़ता जा रहा है। लेकिन संकट के इस समय अब एक नया रास्ता निकल कर सामने आया है। निर्देशक शूजित सरकार की फिल्म गुलाबो सिताबो अब ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म अमेजन प्राइम वीडियो पर 12 जून को रिलीज होने जा रही है। भारतीय फिल्मों के इतिहास में इस घटना को एक अहम मोड़ के तौर पर देखा जा सकता है। अभी तक के फिल्मों के व्याकरण में सिनेमा हॉल या मल्टीप्लैक्स की बड़ी भूमिका होती थी। फिल्मों की रिलीज के समय इस बात को लेकर रणनीति बनती थी कि किस फिल्म को देशभर में कितने स्क्रीन मिलेंगे? सौ करोड़ और दो सौ करोड़ के फिल्मों के अर्थतंत्र में स्क्रीन की संख्या की अहमियत बहुत ज्यादा होती थी। निर्माता निर्देशक से लेकर अभिनेता और अभिनेत्री सभी इस बात को लेकर सतर्क ही नहीं बल्कि प्रयासरत रहते थे कि उनकी फिल्म को ज्यादा से ज्यादा स्क्रीन मिले, मतलब ये कि उनकी फिल्में ज्यादा से ज्यादा स्थान पर और आवृत्ति में दर्शकों के लिए उपलब्ध हों। फिल्म ‘गुलाबो सिताबो’ के अमेजन प्राइम वीडियो पर रिलीज करने के फैसले के बाद अब फिल्मों के रिलीज होने का ट्रेंड बदल सकता है। अमेजन के प्लेटफॉर्म पर सीधे फिल्मों की स्ट्रीमिंग कर देने से अब दर्शकों को अपनी सुविधानुसार समय पर फिल्म देखने की सहूलियत भी मिलेगी।
इसका एक दूसरा असर थिएटर मालिकों और फिल्म प्रोड्यूसर्स के बीच के संबंधों पर भी पड़ सकता है। अमेरिका में इस तरह की एक घटना हो चुकी है जब एएमसी थिएटर्स ने यूनिवर्स पिक्चर्स को इस वजह से बैन कर दिया क्योंकि वो पहले ओटीटी प्लेटऑर्म पर चले गए थे। पिछले दिनों तमिलनाडू थिएटर और मल्टीप्लैक्स एसोसिएशन ने उन प्रोड्यूसर्स को धमकी दी थी कि जो थिएटर को छोड़कर दूसरे माध्यमों पर अपनी फिल्म रिलीज करने की सोच रहे हैं या रिलीज करने जा रहे हैं। दरअसल अब इस तरह की कई खबरें आने लगी हैं कि फिल्म प्रोड्यूसर्स अपनी फिल्मों के रिलीज के लिए वैकल्पिक माध्यम तलाश कर रहे हैं। पिछले दिनों ये खबर आई थी कि अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म लक्ष्मी बॉंब को डिज्नी हॉटस्टार पर रिलीज करने की बात हो रही है। इसी तरह से एक खबर ये भी आई थी कि नेटफ्लिक्स भी टी सीरीज से उनकी फिल्मों को अपने प्लेटफॉर्म पर रिलीज करने को लेकर बातचीत कर रही है। अब जब गुलाबो सिताबो के अमेजन पर रिलीज होने की डेट आ गई है तो इन चर्चाओं को एक बार फिर से बल मिलेगा। गुलाबो सिताबो के रिलीज का जो पोस्टर अमेजन प्राइम वीडियो ने जारी किया है उसमें सोनी टीवी का लोगो भी लगा है। क्या ये इस बात का संकेत है कि प्राइम पर फिल्म के रिलीज होने के बाद ये फिल्म सोनी पर भी रिलीज होगी।आनेवाले दिनों में स्थितियां साफ होंगी। लेकिन इस घटना से इतना तो साफ है कि जब भई किसी तरह का संकट आता है तो उससे ही रास्ता भी निकलता है और नया रास्ता बहुधा बेहतर मंजिल तक पहुंचाता है।    

Saturday, May 9, 2020

पुरानी कविता आज भी प्रासंगिक


कोरोना संकट के इस दौर में जब पूरे देश में लॉकडाउन चल रहा है तो लोगों का समय इंटरनेट पर अपेक्षाकृत ज्यादा बीतने लगा है। इंटरनेट पर इन दिनों एक कविता लोकप्रिय हो रही है। ये कविता लिखी है हरिवंश राय बच्चन ने और उसका पाठ किया है अमिताभ बच्चन ने। कविता का प्रकाशन काल ज्ञात नहीं है लेकिन उसको पढ़ने के बाद ये लगता है कि इसकी रचना 1957 के बाद की गई। 1957 इस वजह से क्योंकि कविता के केंद्र में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास है जिसका गठन 1957 में किया गया। अब जरा हरिवंश राय बच्चन की लिखी इस कविता पर गौर कर लेते हैं, ‘राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने/ एक बड़ा दफ्तर कायम कर/टेबल, कुर्सी, मेज, फाइलों, टेलीफोनों/ टाइप की दस-बीस मशीनों की प्रदर्शनी लगवा करके/ चपरासी से महासचिव तक/ कर्मचारियों की पूरी पलटन बिठला कर के/ सालों पत्राचार कराकर/ लिक्खाड़ों की मीटिंग पर मीटिंग बुलाकर/ सफर खर्च दैनिक भत्ते का बिल भुगतान कर/ अग्रिम रायल्टी की मोटी रकम चुकाकर/ भारत के सांपों के ऊपर पुस्तक एक प्रकाशित की है/ केंचुल से चिकने कागज पर कई तिरंगी तस्वीरों की/ जिल्द बंधी, जाहिर है महंगी/ और बहुत से लोग खफा हैं/ भारत की गरीब जनता तक कैसे ये पुस्तक पहुंचेगी/ भारत की नंगी, भूखी जनता के आगे/ खड़ी समस्यायें जितनी हैं उनमें क्यों दें/ प्राथमिकता इसको कि वो सांपों का ज्ञान बढ़ाएं/ सहमत उनसे किंतु नहीं मैं/भारत के इतिहास, धर्म, संस्कृति के पीछे/ सांपों ने भूमिका अदा की जो/ वो किससे छुपी हुई है/ टिकी हुई है भूमि सांप ही के फन पर तो/ ज्ञान मिले सांपों का कितनी ही कीमत पर/ वो सस्ता है/ अ से ज्ञ तक, मैंने पूरी पुस्तक पढ़ ली/ और मेरी और ही शिकायत/ कहने का अधिकार आपको सही गलत है/ पुस्तक भर में भारत के जहरीले सांपों का/ कोई जिक्र नहीं है।‘  

हरिवंश राय बच्चन अपनी कविता में उस संस्था के बारे में टिप्पणी कर रहे थे या उसकी कार्यशाली पर व्यंग्य कर रहे थे जिसकी स्थापना भारत में पुस्तक संस्कृति के विकास और उसको मजबूत करने के लिए की गई थी। ये संस्था केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था है। इस संस्था का उद्देश्य हिंदी, अंग्रेजी और अन्य भारतीय भाषाओं में उच्च कोटि की पुस्तकों का प्रकाशन और पाठकों तक उचित मूल्य पर पहुंचाना है। इसके अलावा इस संस्थान का दायित्व पुस्तक पढ़ने की प्रवृति को बढ़ावा देना भी है जिसके लिए ये पुस्तक मेलों का आयोजन आदि करती है। दिल्ली में प्रतिवर्ष आयोजित होनेवाला विश्व पुस्तक मेला इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाता है। लेखकों और संस्थाओं को आर्थिक अनुदान भी देती है। बच्चन जी की ये कविता तब लिखी गई थी जब इसकी स्थापना को ज्यादा समय नहीं बीता था। अब इस संस्था की स्थापना के साठ साल से अधिक हो चुके हैं लेकिन क्या ये संस्था बच्चन जी की कविता से आगे बढ़ पाई है इसपर विचार करने की जरूरत है। कांग्रेस के शासन काल में इस संस्था को चलाने के लिए जिन लोगों को जिम्मेदारी दी गई थी उन्होंने एक विचारधारा विशेष की पुस्तकों का प्रकाशन और उसका वितरण किया। अगर हम इतिहास में न भी जाएं और वर्तमान में इस संस्था के क्रियाकलापों पर नजर डालें तो भी बच्चन जी कविता लगभग सटीक ही प्रतीत होती है।
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के संचालन की जिम्मेदारी बोर्ड ऑफ ट्रस्टी के अलावा चेयरमैन और निदेशक की होती है। वर्तमान नियम के मुताबिक चेयरमैन ट्रस्ट का मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता है और नियमित कार्य करने/करवाने की जिम्मेदारी उसकी ही होती है। इस वक्त न्यास के चेयरमैन 81 वर्ष के प्रोफेसर गोविंद प्रसाद शर्मा हैं। यहां नियुक्त होने के पहले पहले गोविंद शर्मा मध्यप्रदेश के एक कॉलेज में प्राचार्य रहने के अलावा मध्य प्रदेश ग्रंथ अकादमी के निदेशक रह चुके हैं। प्रोफेसर गोविंद शर्मा नियमित रूप से न्यास आते नहीं है और ज्यादातर समय मध्य प्रदेश के अपने घर पर ही बिताते हैं। लिहाजा रोजमर्रा के कामों का जिम्मा निदेशक पर आ जाता है। निदेशक भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल हैं और प्रतिनियुक्ति पर न्यास में आए हैं। हाल ही में उनकी नियुक्ति हुई है और पुस्तक संस्कृति के बारे में, पुस्तकों के बारे में उनका अनुभव कितना है इस बारे में न्यास की बेवसाइट पर प्रकाशित उनकी प्रोफाइल में कुछ नहीं लिखा है। बताया गया है कि वो रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय, जम्मू कश्मीर के राज्यपाल के कार्यालय, संयुक्त राष्ट्र के अफ्रीका मिशन में प्रशासनिक दायित्वों को निभा चुके हैं। अब पुस्तक संस्कृति के निर्माण की जिम्मेदारी दी गई है। उनके लिए ये बड़ी चुनौती है।
अब अगर न्यास के इस वर्ष के कामकाज पर नजर डालें तो कोई उत्साहवर्धक पहल दिखाई नहीं देती है। पुस्तकों के प्रकाशन में भी वर्षों लग रहे हैं, नई पुस्तकों के प्रकाशन के लिए विचार विमर्श के लिए हर भाषा की एक सलाहकार समिति बनाई गई थी लेकिन उसकी बैठक दो साल से अधिक समय से नहीं हुई है। 2018 में हुई बैठक में इस तरह का सुझाव भी दिया गया था कि इस सलाहकार समिति की बैठक साल में एक की जगह दो बार की जाए ताकि पुस्तकों के विषयों पर सार्थक चर्चा हो सके, सुझाव आ सकें। लेकिन उस सुझाव पर तो अमल हुआ नहीं बल्कि बैठक ही बंद हो गई। निजी प्रकाशकों के साथ भी न्यास का संवाद लगभग समाप्त ही हो गया है। ऐसे माहौल में पुस्तक संस्कृति के निर्माण को कैसे मजबूती मिलेगी। पहले निजी प्रकाशकों के साथ ना केवल संवाद होता था बल्कि उनके साथ कारोबार भी होता था। अब वो बंद हो गया है और ट्रस्ट अपना सभी काम प्रिंटरों के साथ करने लगा है।
न्यास की एक काम में और रुचि है वो विदेशों में आयोजित पुस्तक मेलों में भाग लेने में। पेरिस, लंदन, फ्रैंकफर्ट, मैक्सिको से लेकर अबू धाबी तक के पुस्तक मेलों में न्यास के अधिकारी और कर्मचारी भाग लेते रहे हैं। इस वर्ष तो कोरोना की वजह से ये मेले स्थगित हो गए और करदाताओं के पैसे बच गए। इन पुस्तक मेलों में सार्थक कुछ होता नहीं है। जिन मेलों में पुस्तकों की बिक्री होती है वहां कितनी पुस्तकें बिकती हैं इसका हिसाब कभी सार्वजनिक नहीं होता और उन मेलों में जहां सिर्फ कारोबार होता है, दूसरे देशों के साथ प्रकाशन करार होते हैं वहां भी अब तक क्या और कैसे करार हुए इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है। ये जानना दिलचस्प होगा कि पिछले सालों में इन पुस्तक मेलों पर न्यास ने कितना व्यय किया और कितना ठोस काम हो सका। दूसरे देशों के प्रकाशकों के साथ कितने करार हो सके और उसके हिसाब से कितनी पुस्तकें प्रकाशित हुईं। दिल्ली के साहित्यिक हलकों में तो ये चर्चा होती है कि इन मेलों में सरकारी खर्चे पर मौज मस्ती होती है। इस स्तंभ में मैक्सिको में आयोजित मेले को लेकर सवाल खड़े किए गए थे। सवाल तो ये भी उठता है कि विदेशों में आयोजिक होनेवाले मेलों में जानेवालों का चयन कौन करता है, क्या चयन में इस बात का ख्याल रखा जाता है कि जो लेखक जा रहे हैं वो उस देश की भाषा या कम से कम अंग्रेजी में संवाद कर सकते हैं या नहीं।
आज देश भर में पुस्तकों की अनुपलब्धता एक गंभीर समस्या है, अब वक्त आ गया है कि राष्ट्रीय पुस्तक न्यास को देशभर में पुस्तकों की उपलब्धता के बारे में एक ठोस नीति बनाकर उसपर काम करना होगा ताकि पुस्तक संस्कृति को मजबूती मिल सके। 

Saturday, May 2, 2020

उदार या उधार की भाषा उर्दू


पिछले दिनों गीतकार जावेद अख्तर और कनाडा में रहनेवाले पाकिस्तानी मूल के विद्वान तारेक फतेह के बीच पहले ट्वीटर और बाद में न्यूज चैनल पर हुई बहस के बाद हिंदी-उर्दू को लेकर एक बार फिर से चर्चा आरंभ हो गई है। दरअसल जावेद अख्तर का उर्दू प्रेम पुराना है। प्रेम करना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन जब आप अपने प्रेम को ही सर्वश्रेष्ठ बताने लगते हैं तो फिर विवाद उत्पन्न होता है। जावेद अख्तर के साथ यही कठिनाई है कि वो उर्दू को सभी भारतीय भाषाओं में श्रेष्ठ मानते हैं, उस भाषा से भी जिसने उसे जन्म दिया। जावेद अख्तर के पिता जां निसार अख्तर ने 1973 में दो खंडों में उर्दू की राष्ट्रवादी कविताओं का संकलन ‘हिन्दोस्तां हमारा’ के नाम से किया था जिसका प्रकाशन हिन्दुस्तानी बुक ट्रस्ट, बंबई (अब मुंबई) ने किया था। जब 2006 में इस पुस्तक का पुर्नप्रकाशन हुआ तो जावेद अख्तर ने इसकी प्रस्तावना लिखी. उसकी पहली पंक्ति है,’अपनी प्रकृति से ही उर्दू तमाम भारतीय भाषाओं में सबसे अधिक तरक्कीपसंद, उदार और धर्मनिरपेक्ष भाषा है।‘ अब विवाद इस तरह के वाक्यों को लेकर ही शुरू होता है। जैसे ही आप किसी को सर्वश्रेष्ठ घोषित करते हैं तो इसे ये ध्वनित होता है कि आप दूसरों को कमतर कहने का प्रयास कर रहे हैं। जावेद अख्तर के इस वाक्य से भी इस तरह के अहंकार या कहें कि श्रेष्ठता का बोध होता है। उर्दू, भारतीय भाषाओं में सबसे तरक्कीपसंद कैसे है ? इस बात को लेकर जावेद अख्तर को कुछ तथ्य, कुछ तर्क पेश करने चाहिए थे। किसी भी भाषा के तरक्कीपसंद होने का अर्थ क्या होता है? क्या हिंदी या तमिल या तेलुगू या बंगाली या मराठी तरक्कीपसंद नहीं हैं या उर्दू से कम तरक्कीपसंद हैं? जावेद अख्तर को अपने कहे को पुष्ट करना चाहिए था पर अफसोस वो तो फतवेबाजी करके निकल गए। फिल्मी संवाद लिखते लिखते ये उनकी प्रकृति का हिस्सा बन गया लगता है कि अपनी बात कहो और निकल लो।

अब उर्दू के लिए दिए उनके दूसरे विशेषण पर विचार करते हैं जहां उन्होंने उर्दू को सबसे अधिक उदार कहा है। ‘हिन्दोस्तां हमारा’ की प्रस्तावना में जावेद अख्तर लिखते हैं ‘वाक्य विन्यास के नजरिए से इसकी (उर्दू) जड़ें खड़ी बोली की जमीन में गहराई तक डूबी है जबकि इसकी शब्दावली हिंदी और संस्कृत के अलावा फारसी, अरबी, टर्की, अंग्रेजी फ्रेंच, पुर्तगाली और उन तमाम भाषाओं के शब्दों को समाहित किए हुए है जो अविभाजित भारत में प्रचलित थीं। यह सब मिलकर उर्दू की जबान और अदब को शक्ल देते हैं’. जावेद अख्तर विद्वान आदमी हैं, उनको शब्दों की महत्ता का पता है लेकिन उनके उपर्युक्त वाक्य से तो यही ध्वनित होता है कि उर्दू उदार भाषा नहीं बल्कि उधार की भाषा है। इसने वाक्य विन्यास खड़ी बोली से लिय़ा और शब्द हिंदी और संस्कृत के अलावा अन्य भाषाओं से लिया। उदार और उधार का अंतर समझना होगा जावेद अख्तर जी। आपको अपने पिताश्री का उसी पुस्तक का अंश भी याद रखना चाहिए जिसकी प्रस्तावना आपने लिखी। उसी पुस्तक की भूमिका में जां निसार अख्तर लिखते हैं ‘मुसलमान सूफियों ने अपने विचार के प्रसार के लिए जो रास्ता निकाला वो स्थानीय बोलियों में तुर्की, अरबी और फारसी के शब्दों के मिलावट का था। वैसे तो ये मिलावट सिंध के जमाने से ही शुरू हो चुकी थी, सूफियों की कोशिश से इसे और बढ़ावा मिला। उस समय ये मिली जुली जुबान रेख्ता कहलाई।अमीर खुसरो के कलाम में इस रेख्ते का स्पष्ट रूप हमारे सामने आता है। यह रेख्ता खड़ी बोली में फारसी के शब्दों की मिलावट है जिसमें उन्होंने जिसमें उन्होंने गीत पहेलियां और मुकरनियां लिखीं।‘  अगर जां निसार अख्तर की बातों को सही मानें तो जावेद अख्तर जिस भाषा को उदार कह रहे हैं वो एक बार फिर से उधार पर आधारित भाषा प्रतीत होती है। उर्दू पर फिराक साहब ने जो कहा था उसको भी इसी आलोक में देखने और समझने की आवश्यकता है, ‘हमारी उर्दू जबान में कितनी विशालता और कितनी बड़ी संभावनाएं पैदा हो जाएंगी अगर उर्दू शब्दकोश में दो-ढाई हजार संस्कृत के शब्द भी शामिल कर लिए जाएं।‘ आगे भी फिराक साहब ने इसको उर्दू साहित्य के लिए बेहतर बताया है। कहने का अभिप्राय सिर्फ इतना है कि अगर जावेद अख्तर जैसे वरिष्ठ और विद्वान लोग उर्दू को लेकर अहंकारी वक्तव्य देंगे या उस भाषा की श्रेष्ठता साबित करना चाहेंगे तो फिर इस तरह की बातें भी सामने आएंगी ही कि उधार के शब्दों और वाक्य विन्यास से कोई भाषा सबसे अधिक उदार नहीं बन सकती।
तीसरा शब्द उन्होंने उर्दू के लिए उपयोग किया है वो ये कि ये सबसे अधिक धर्मनिरपेक्ष भाषा है। यहां भी वही समस्या है कि जब आप किसी भाषा को सबसे अधिक सबसे अधिक धर्मनिरपेक्ष कहते हैं तो तत्काल ये सवाल मन में कौंधता है कि बाकी भाषाएं या तो अपेक्षाकृत कम धर्मनिरपेक्ष हैं या फिर सांप्रदायिक हैं। अब यहां भी जावेद अख्तर को अपनी पिता की किताब से सहायता मिल सकती थी लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने इस पुस्तक को नहीं देखा, उसमें लिखा है ‘यह बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं कि जहां मुसलमान शाइरों ने हिंदुओं के त्योहार होली, दीवाली, वसंत वगैरा पर नज्में लिखीं वहां हिंदी और सिख शाइरों ने इस्लामी त्योहारों पर नज्में लिखीं। यह दरअसल उस मिली जुली सभ्यता का चमत्कार था जो हिंदू, मुसलमान, सिख सभी को प्यारी रही है‘। अब अगर ऐसा रहा है तो फिर जावेद अख्तर उर्दू को सबसे अधिक धर्मनिरपेक्ष कैसे घोषित कर रहे हैं। जावेद अख्तर की छवि एक तरक्कीपसंद व्यक्ति की है लेकिन जब वो उर्दू को लेकर इस तरह की बातें करते हैं तो परोक्ष रूप से उर्दू को लेकर दूसरी भाषा के लोगों के मन में चाहे अनचाहे उपेक्षा का भाव पैदा करते हैं।
एक और बयानवीर हैं मार्कण्डेय काटजू। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश हैं, उन्होंने भी जनवरी में उर्दू के पक्ष में एक लेख लिखा था। उस लेख में वो जावेद अख्तर से आगे चले गए और हिंदी और उर्दू की तुलना कर डाली। इस तुलना में वो इतने उत्साहित हो गए कि उन्होंने हिंदी साहित्य और साहित्यकारों को उर्दू साहित्य और उसके लेखकों की तुलना में कमतर करार दे दिया। उर्दू को बेहतर साबित करने के लिए उनको जो नाम याद आए वो हैं फैज और बिस्मिल। उनका एक मनोरंजक तर्क ये भी है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उर्दू कवियों के ही तराने गाए गए थे, हिंदी वालों के नहीं। टिप्पणी करने के क्रम में वो महादेवी वर्मा और सुमित्रानंदन पंत का उदाहरण दे बैठे। अब काटजू साहब को कौन बताए कि महादेवी जी और पंत जी की कविताओं का उदाहरण देकर वो अलग-अलग धरातल के रचनाकारों की तुलना कर रहे हैं। काटजू साहब अगर महादेवी और पंत की कविताओं में ओज खोज रहे हैं तो ये हिंदी कविता और कवियों को लेकर उऩका अज्ञान है जिसका वो सार्वजनिक प्रदर्शन कर रहे हैं। वो उर्दू की रचनाओं का हिंदी अनुवाद करते हुए भाषा के उपहास का प्रयास करने की कोशिश करते हैं लेकिन इस कोशिश में वो खुद का ही उपहास कर बैठते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मार्कण्डेय काटजू ने हिंदी की कुछ प्रवृत्तियों का नाम भर सुना है और उसके नामोल्लेख करने भर जानकारी उनको है। वीर रस के कवियों में उनको या तो भूषण का नाम पता है, जबकि हिंदी में वीर रस के कवियों की एक लंबी परंपरा है। स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी के कवियों के गीतों को लोकप्रिय नहीं होने का हवाला देकर भी काटजू अपने अज्ञान का ही परिचय देते हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदी के ज्यादातर कवियों ने स्वतंत्रता के गीत लिखे, जो गाए भी गए। नाम गिनाने का कोई अर्थ नहीं है।  दरअसल जब आप मोह में पड़ जाते हैं तो आपको सत्य दिखाई नहीं देता है और काटजू के साथ भी यही हुआ है। वो उर्दू के मोह में इतने ग्रसित हों गए हैं कि उनको अन्य भाषा की रचनाएं दिखाई नहीं दे रही हैं। मार्कण्डेय काटजू और जावेद अख्तर जैसे लोग ही भाषाई खाई पैदा करते हैं। 

Thursday, April 30, 2020

प्रेम और विद्रोह का नायक


कहते हैं कि पूत के पांव पलने में दिख जाते हैं लेकिन ऋषि कपूर के पांव तो खाट पर दिखे थे जब उन्होंने बचपन में ही अपने दादा पृथ्वीराज कपूर निर्देशित नाटक ‘पठान’ में अभिनय किया था। जिसने फिल्मों के सेट पर उसकी शूटिंग के दौरान चलना सीखा हो, जिसके लिए सेट पर लगाए गए सामान खिलौने की तरह हों, जो अपने बचपन में फिल्मों के सेट को ही वास्तविक दुनिया समझता हो उसके लिए फिल्मों में काम करना स्वाभाविक है। ऋषि कपूर का बचपन भी फिल्म ‘श्री 420’ और ‘मुगल ए आजम’ के सेट पर अपने भाई बहनों के साथ खेलते हुए बीता था। ‘मुगल ए आजम’ के सेट पर वो तलवार से खेलते थे। उन्होंने कहा भी था कि ‘सेट पर तलवारबाजी करना उन्हें बचपन में बहुत पसंद था’। फिल्मों और फिल्मकारों के बीच गुजर रहे बचपन से जब किशोरावस्था में पहुंचते हैं तो उनके पिता खुद उनको स्कूल से भगाकर फिल्म में काम करने ले जाने लगे। ये भी एक दिलचस्प तथ्य है कि राज कपूर साहब अपने बेटे को स्कूल से भगाकर फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ में काम करवाने ले जाते थे। जाहिर सी बात है जो अभिनय उनके रगों में दौड़ था वो इस तरह का वातावरण और सहयोग पाकर निखरने लगा था। तब किसे पता था कि एक ऐसा नायक गढ़ा जा रहा है जो हिंदी सिनेमा के इतिहास में पैंतालीस साल से अधिक समय तक दर्शकों के दिलों पर राज करेगा। अगर हम इसको थोड़ी सूक्षमता के साथ देखें तो पाते हैं कि 1973 में बॉबी के रिलीज होने से लेकर 1998 की फिल्म ‘कारोबार’ तक यानि पच्चीस साल तक ऋषि कपूर एक रोमांटिक हीरो के तौर पर दर्शकों के दिलों पर राज करते रहे। उसके बाद उन्होंने अपने लिए अलग तरह की भूमिकाएं चुनीं।   
साल 1973 को हिंदी फिल्मों के इतिहास में इस वजह से याद किया जाएगा कि उसने एक साथ हिंदी फिल्मों को एंग्री यंगमैन भी दिया और एक ऐसा हीरो भी दिया जिसकी मासूम रोमांटिक छवि के मोहपाश में दर्शक पचीस साल तक बंधे रहे। 1973 में जब ‘बॉबी’ फिल्म रिलीज हुई थी तो ऋषि कपूर एक रोमांटिक हीरो के तौर पर स्थापित हो गए थे, इस फिल्म में उनका किरदार युवाओं में मस्ती और मोहब्बत की दीवानगी का प्रतीक बन गया था। इस फिल्म में ऋषि कपूर और डिंपल के चरित्र को इस तरह से गढ़ा गया था कि वो उस दौर में युवाओं की बेचैनी और कुछ कर गुजरने की तमन्ना को प्रतिबिंबित कर सके। किशोरावस्था से जवानी की दहलीज पर कदम रख रहे युवा प्रेमी जोड़े के कास्टूयम को भी इस तरह से डिजायन किया गया था ताकि ऋषि और डिंपल युवा मन आकांक्षाओं को चित्रित कर सकें। जिस तरह से डिंपल के बालों में स्कार्फ और उसके ब्लाउज को कमर के ऊपर बांधकर ड्रेस बनाया गया था या फिर ऋषि कपूर को बड़े बड़े चश्मे पहनाए गए थे उसमें एक स्टाइल स्टेटमेंट था।इस फिल्म के बाद पोल्का डॉट्स के कपड़े खूब लोकप्रिय हुए थे। फिल्म में इन दोनों के चरित्र को टीनएज प्यार और उस प्यार को पाने के लिए विद्रोही स्वभाव का प्रतिनिधि बनाया गया था। ऋषि कपूर और डिंपल की ये सुपर हिट इस फिल्म के बाद जुदा हो गई क्योंकि फिल्म के हिट होते ही डिंपल और राजेश खन्ना ने शादी कर ली थी। ये दोनों फिर करीब बारह साल बाद एक साथ फिल्म ‘सागर’ में आए। बारह साल बाद भी इस जोड़ी ने सिल्वर स्क्रीन पर प्रेम का वही उत्स पैदा किया और दर्शकों ने दिल खोलकर इस फिल्म को पसंद किया।
ऋषि कपूर अपनी फिल्म ‘बॉबी’ की सफलता के बाद सातवें आसमान पर थे। 1974 में उनकी और नीतू सिंह की फिल्म आई ‘जहरीला इंसान’ जो फ्लॉप हो गई लेकिन इस जोड़ी के काम को सराहना मिली। उसके बाद इन दोनों ने कई फिल्मों में साथ काम किया। पर ‘बॉबी’ जैसी सफलता नहीं मिल पाई। ‘कर्ज’ को जब अपेक्षित सफलता नहीं मिली तो वो गहरे अवसाद में चले गए। ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा ‘खुल्लम खुल्ला’ में माना है कि ‘उनको कभी भी संघर्ष करने की जरूरत नहीं पड़ी। बहुत कम उम्र में ही ‘बॉबी’ फिल्म मिल गई और वो बेहद सफल रही। जब असफलताओं से उनका सामना हुआ तो वो लगभग टूट से गए। वो अपनी असफलता के लिए नीतू सिंह को जिम्मेदार मानने लगे थे इस वजह से पति-पत्नी के रिश्तों में तनाव आ गया था। यह उस वक्त हो रहा था जब नीतू सिंह गर्भवती थी। तब इस तनाव को दूर करने का बीड़ा राज कपूर ने उठाया और ऋषि को बैठाकर गीता का उपदेश देना शुरू किया। राज कपूर के प्रयासों से ऋषि इस अवसाद से ऊबर पाए। अवसाद के उबरने के बाद ऋषि कपूर ने ‘नसीब’ और ‘प्रेम रोग’ जैसी फिल्में की जो बॉक्स ऑफिस पर सुपर हिट रहीं। इसके पहले जब वो अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना के साथ फिल्म ‘अमर अकबर एंथोनी’ में काम कर रहे थे तो उनके सामने ये चुनौती थी कि दो इतने बड़े अभिनेताओं के सामने अपनी उपस्थिति को बचा भी पाएंगें या नहीं। लेकिन अकबर के रूप में जिस तरह से उन्होंने एक टपोरी चरित्र को निभाया उसने अमिताभ और विनोद खन्ना के समांतर खुद को खड़ा कर लिया।
फिर आया 1989 का साल जब ऋषि कपूर और यश चोपड़ा दोनों ने एक बेहद शानदार और सुपरहिट फिल्म से धमाकेदार मौजूदगी दर्ज कराई। धमाकेदार इसलिए कि सालभर पहले ही यश चोपड़ा की फिल्म ‘विजय’ में ऋषि ने काम किया था जो फ्लॉप हो गई थी। ‘चांदनी’ का रोल भी पहले अनिल कपूर को ऑफर हुआ था लेकिन बाद में ऋषि को मिला। ऋषि भी इस रोल को लेकर हिचक रहे थे लेकिन यश चोपड़ा के आश्वसान के बाद मान गए थे। इस फिल्म से ऋषि कपूर की लवर बॉय की इमेज पुख्ता हुई। आज भी दर्शकों को वो दृश्य याद है जब ऋषि कपूर हेलीकॉप्टर से अपनी प्रेमिका श्रीदेवी पर गुलाब की पंखुड़ियां उड़ाता है। लोगों को प्रेम का पाठ पढ़ानेवाला, अपने प्रेम को हासिल करने के लिए विद्रोह करनेवाला नायक अब नहीं रहा। उसके जाने से हिंदी फिल्मों का ये सृजनात्मक कोना सूना हो गया।