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Saturday, September 28, 2024

फिल्मों से गांधी की उदासीनता क्यों ?


कुछ सप्ताह पूर्व मुंबई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के सिलसिले में मुंबई जाना हुआ था। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम के परिसर में इस फेस्टिवल का आयोजन था। उसी परिसर में स्थित गुलशन महल में भारतीय सिनेमा के राष्ट्रीय संग्रहालय को जाने और उसको देखने का अवसर प्राप्त हुआ। संग्रहालय में एक जगह गांधी गांधी का पुतला बनाकर उसको कुर्सी पर बिठाया गया है। उनके सामने स्क्रीन पर राम राज्य फिल्म का एक स्टिल लगा हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि महात्मा गांधी राम राज्य फिल्म देख रहे हैं। कहा जाता है कि बापू ने अपने जीवनकाल में एक ही फिल्म देखी थी जिसका नाम है राम राज्य। इस बात का उल्लेख देश-विदेश के कई लेखकों ने किया है। एक बेहद दिलचस्प पुस्तक है ‘द चैलेंजेस आफ सिल्वर स्क्रीन’ जिसमें राम, जीजस और बुद्ध के सिनेमाई चित्रण पर विस्तार से लिखा गया है। इस पुस्तक के लेखक हैं फ्रीक एल बेकर। इस पुस्तक में भी गांधी के राम राज्य देखने की चर्चा की गई है। सिनेमा और संस्कृति पर विपुल लेखन करनेवाली रेचल ड्वायर ने भी अपनी पुस्तक में भी गांधी के राम राज्य देखने का उल्लेख किया है। गांधी और सिनेमा पर लिखी अपनी पुस्तक में इकबाल रिजवी ने विस्तार से और रोचक तरीके से इस प्रसंग पर लिखा है। 

इस पर बाद में चर्चा होगी लेकिन उसके पहले गांधी के फिल्मों और नाटक को लेकर विचार को जानना भी दिलचस्प होगा। फिल्म संग्रहालय में ही कुछ पट्टिकाएं लगी हैं जिनपर कुछ टिप्पणियां प्रकाशित हैं। ऐसी ही एक पट्टिका पर लिखा है, मद्रास (अब चेन्नई) के अत्यंत प्रतिष्ठित वकील बी टी रंगाचार्यार के नेतृत्व में इंडियन सिनेमैटोग्राफ कमेटी रिपोर्ट (आईसीसी) का गठन ब्रिटिश प्राधिकारियों द्वारा सेन्सरशिप विनिमयों में अमेरिकी आयात को रोकने के लिए किया गया था। इस वृहदाकर रिपोर्ट में ब्रिटिश इंडिया के सभी भागों को शामिल किया गया है तथा महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, दादासाहेब फाल्के जैसे सैकड़ों महान हस्तियों के मौखिक एवं लिखित राय शामिल हैं। इसका प्रकाशन 1928 में किया गया। इसके खंड संख्या 4 में पृष्ठ संख्या 56 पर महात्मा गांधी का दिनांक 12 नवंबर 1927 का बयान दर्ज है। जो इस प्रकार है- भले ही मुझे जितना भी बुरा लगा हो मुझे आपके प्रश्नों का उत्तर देना चाहिए। क्योंकि मैंने कभी सिनेमा देखा ही नहीं। लेकिन किसी बाहरी का भी इसने जितना अहित किया है और कर रहा है वो प्रत्यक्ष है। यदि इसने किसी का भला किसी भी रूप में किया है तो इसका प्रमाण मिलना अभी बाकी है। इस टिप्पणी से गांधी की फिल्मों को लेकर राय का स्पष्ट पता चलता है। ऐसा नहीं है कि गांधी जी की फिल्मों को लेकर ये राय अकारण बनी थी। वो जब स्कूली छात्र थे तब नाटक देखा करते थे और उससे प्रभावित भी थे।

संग्रहालय की एक दूसरी पट्टिका पर इसका उल्लेख है, मोहनदास करमचंद गांधी जब स्कूली विद्यार्थी थे उन्होंने एक गुजराती नाटक देखा था, जिसका नाम हरिश्चन्द्र था। इस नाटक का प्रभाव आजीवन उन पर रहा। अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है- मैंने किसी ड्रामा कंपनी द्वारा मंचित नाटक को देखने की अनुमति अपने पिता से प्राप्त कर ली थी। हरिश्चन्द्र नामक इस नाटक ने मेरा ह्रदय जीत लिया। मैं इसे देखकर कभी नहीं थकता। लेकिन उसे देखने की अनुमति मैं कितनी बार प्राप्त करता। इसने मुझे परेशान किया और मैं सोचता रहा कि मैंने स्वयं असंख्य बार हरिश्चन्द्र की भूमिका निभाई होती। हम सभी हरिश्चंद्र की भांति सत्यवादी क्यों नहीं होते? यही प्रश्न मुझे दिन रात परेशान किए रखता। हरिश्चन्द्र की भांति सत्य का अनुसरण करना और सारे कष्टों को झेलना एक ऐसा आदर्श था जिसने मुझे प्रेरित किया । मैं पूर्णत: हरिश्चन्द्र की कहानी में विश्वास करने लगा। इन सभी विचारों से बेचैन होकर मैं अक्सर रोने लगता। किशोरावस्था से ही गांधी को ये पता चल गया था कि फिल्मों या नाटकों का मानस पर कितना असर होता है। जब वो स्वाधीनता के संघर्ष के लिए मैदान में उतरे तो उन्होंने कई जगहों पर देखा कि कई युवा पार्सी नाटकों की महिला कलाकारों के चक्कर में घर बार छोड़कर नाटक कंपनी के पीछे चल देते थे। इसको देखकर गांधी के मन में इस माध्यम को लेकर उदासीनता बढ़ने लगी। उसके बाद एक और घटना घटी। मीराबेन की सिफारिश पर गांधी जी ने एक फिल्म देखने की हामी भरी। फिल्म का नाम था मिशन टू मास्को। रिजवी लिखते हैं कि इस फिल्म में तंग कपड़े पहनकर लड़कियां नाच रही थीं। थोड़ी देर तक तो बापू झेलते रहे लेकिन फिर बीच में ही उठकर चले गए। उस दिन उनका मौन व्रत था सो कुछ कहा नहीं। अगले दिन उन्होंने लिखा, ‘मुझे नंगे नाच दिखाने की कैसे सूझी। मैं तो दंग रह गया, मुझे तो कुछ पता ही नहीं था।‘ दरअसल मीराबेन को एक पारसी फोटोग्राफर ने गांधी को फिल्म दिखाने के लिए राजी कर लिया था। सबको इस घटना के बाद काफी अफसोस हुआ। फिल्म राम राज्य देखने के लिए बापू को कनु देसाई ने तैयार किया था। कनु देसाई गांधी की सेवा करते थे। वो विजय भट्ट की फिल्म राम राज्य के कला निदेशक रह चुके थे। उनकी बात बापू ने मान ली और कहा कि एक विदेशी फिल्म देखने की गलती कर चुका हूं इसलिए भारतीय फिल्म देखनी पड़ेगी। बापू की सहयोगी सुशीला नायर ने फिल्म के लिए गांधी के 40 मिनट तय किए थे, लेकिन कहा जाता है कि बापू को ये फिल्म इतनी अच्छी लगी थी कि वो पूरे डेढ़ घंटे तक बैठकर राम राज्य देखते रहे थे। फिर विजय भट्ट की पीठ थपथपाई और निकल गए। 

इन प्रसंगों को जानने के बाद ये लगता है कि बापू फिल्मों के विरोध में नहीं थे बल्कि फिल्मों में दिखाई जानेवाली सामग्री के विरोधी थे। 1927 का उनका बयान इसकी ओर ही संकेत करता है। उनको फिल्मों का जनमानस पर पड़नेवाले असर का अनुमान भी था। वो चाहते थे कि फिल्मों के माध्यम से लोगों को स्वाधीनता के लिए तैयार किया जाए। स्वाधीनता के संघर्ष में गांधी के पदार्पण के बाद कई ऐसी फिल्मों का निर्माण हुआ जिसने स्वाधीनता आंदोलन के दौरान गांधीवादी विचारों को फैलाने में बड़ा योगदान किया। 1939 में तमिल भाषा में बनी फिल्म त्यागभूमि को उस दौर की सर्वाधिक सफल फिल्मों में माना जाता है। ये फिल्म प्रख्यात तमिल लेखक आर कृष्णमूर्ति की कृति पर आधारित है। इस फिल्म में गांधीवादी विचारों को प्रमुखता से दिखाया गया था। बाद में इसको अंग्रेजों ने प्रतिबंधित कर दिया था। इसी तरह से अगर देखें तो तेलुगु में बनी फिल्म वंदे मातरम ने भी गांधी के विचारों को तेलुगु भाषी जनता के बीच पहुंचाने का बड़ा काम किया। भालजी पेंढारकर ने अपनी मूक फिल्म वंदे मातरम में अंग्रेजों की शिक्षा नीति की आलोचना की थी।  1943 में बनी हिंदी फिल्म किस्मत के गाना दूर हटो ये दुनियावालो हिंदुस्तान हमारा है बेहद लोकप्रिय हुआ था। ऐसा नहीं है कि गांधी को ये पता नहीं होगा कि इस तरह की फिल्में बन रही हैं। वो चाहते होंगे कि फिल्मकार राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को समझें और अपनी फिल्मों के कंटेंट के बारे में निर्णय लें। गांधी जैसा व्यापक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति सिनेमा विरोधी हो ये मानना कठिन है।  


Saturday, September 21, 2024

वैश्विक धरोहर पर लापरवाही का पौधा


पिछले दिनों ये आगरा के ताजमहल के गुंबद से पानी टपकने का समाचार चर्चा में आया। कारण ये बताया गया कि ताजमहल के गुंबद पर एक पौधा उग आया था और उसकी जड़ों से होकर पानी टपका। उस पौधे का वीडियो और फोटो इंटरनेट मीडिया पर खूब प्रचलित हुआ। तरह-तरह की टिप्पणियां की गईं। ताजमहल वैश्विक धरोहर की श्रेणी में आता है और इसके रख-रखाव का दायित्व भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण का है। गुंबद से पानी टपकने के समाचार को पढ़ने के बाद जिज्ञासा हुई कि देखा जाए भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण की वेबसाइट पर ताजमहल के सबंध में क्या जानकारियां हैं। भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण की वेबसाइट खोलते ही इसके मुख्य पृष्ठ पर ताजमहल की तस्वीर नजर आती है जहां लिखा भी है कि ये वैश्विक धरोहर है। वैश्विक धरोहर की देखरेख या रखरखाव इस तरह से की जाती है कि उसके ऊपर पौधा उग आए और अधिकारियों को हवा तक नहीं लगे। यहां ये बात ध्यान दिलाने योग्य है कि भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण का एक कार्यालय आगरा में भी है। इतना ही नहीं आगारा किला की एक दीवार पर भी छोटे-छोटे पौधे उग आए हैं और वो बढ़ रहे हैं। उसपर पता नहीं कब तक भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण के जिम्मेदार अफसरों का ध्यान जाएगा। दरअसल इस बात को संस्कृति मंत्रालय के रहनुमाओं को समझना होगा कि संस्कृति और सांस्कृतिक विरासत को संभालने और सहेजने के लिए संवेदनशील मानव संसाधन की आवश्यकता है। ऐसे मानव संसाधन की जिनको संस्कृति की समझ भी हो और उसको सहेजने को लेकर एक उत्साह भी हो।

ताजमहल की ही अगर बात करें तो ना सिर्फ गुंबद में पौधे उग आए हैं बल्कि ध्यान से देखें तो मुख्य मकबरे में पश्चिम की दिशा में जो पत्थरों के बीच बीच लगे हुए कई शीशे टूटे हुए हैं। शीशे के अलावा भी दीवारों और गुंबदों के अंदर की तरफ की गई पच्चीकारी के रंगीन पत्थर कई जगह से निकले हुए हैं। पच्चीकारी के उन पत्थरों के निकल जाने से उतना क्षेत्र अजीब सा लगता है। पच्चीकारी के पत्थरों की कीमत को कम ही होती है फिर क्या समस्या है। जानकारों का कहना है कि पत्थरों की कीमत भले ही कम होती है लेकिन उसको लगाने में बहुत श्रम और समय लगता है। इस कारण उसको तत्काल नहीं बनवाया जाता है। दूसरा पक्ष ये है कि अगर पच्चीकारी के पत्थरों के टूटने के बाद अविलंब उसकी मरम्मत नहीं की जाती है तो पत्थरों को जोड़ना और भी मुश्किल हो जाता है। क्या भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण के अधिकारी या कर्मचारी ताजमहल का चक्कर नहीं लगाते या उनको ये सब दिखाई नहीं देता है या देखकर अनदेखा किया जाता है। बात तो इसपर भी होनी चाहिए कि क्या भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण के पास इस वैश्विक धरोहर की देखभाल करने के लिए पर्याप्त धन है या नहीं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ ताजमहल में ही आपको इस तरह के लापरवाही दिखाई देगी बल्कि कई विश्व प्रसिद्ध धरोहरों में और सैकड़ों वर्षों से भारतीय शिल्पकला के उदाहरण के तौर पर सीना ताने खड़े इमारतों में भी इस तरह के उदाहरण आपको मिल सकते हैं।

इस स्तंभ में ही पूर्व में इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि किस तरह से ओडिशा के कोणार्क मंदिर के प्रवेश द्वार पर लगे हाथी की सूंढ में दरार आ जाने के बाद उसको सीमेंट-बालू से भर दिया गया था। कोणार्क सूर्य मंदिर भी यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में है। कोणार्क मंदिर में इस तरह की लापरवाही ना केवल भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण की लापरवाही बल्कि अपने धरोहर को सहेजने की असंवेदनशील प्रवृत्ति को भी सामने लाता है। इसी तरह कभी आप त्रिपुरा के उनकोटि चले जाइए। भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण की लापरवाही का उदाहरण आपको पूरे परिसर में सर्वत्र बिखरा हुआ नजर आएगा। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में लाल किला की प्राचीर से देशवासियों से  पंच प्रण की बात करते हैं जिसमें अपनी विरासत पर गर्व की बात करते हैं। विरासत पर गर्व करने के लिए यह बेहद आवश्यक है कि हम अपनी विरासत को संरक्षित करें। संस्कृति मंत्रालय के अधीन आनेवाली संस्था भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण की अपनी विरासत को सहेजने में लापरवाही और उदासीनता दिखाई देती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दूसरे कार्यकाल में 13 दिसंबर 2022 को राज्यसभा में संस्कृति मंत्रालय की स्टैंडिंग कमेटी ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध संसद की इस समिति ने अपनी रिपोर्ट संख्या 330 में भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण के कामकाज को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए थे। 

रिपोर्ट में समिति ने मंत्रालय/ भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण में धनराशि के उपयोग को लेकर बेहद कठोर टिप्पणी भी की थी। समिति के मुताबिक मंत्रालय ने अपने उत्तर में इस बात का उल्लेख नहीं किया है कि भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण को जो धनराशि आवंटित की गई थी उसका आवंटन और उपयोग किस तरह से किया गया। इसके अलावा भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण में खाली पदों को भरने में हो रहे बिलंब पर भी समिति ने कठोर टिप्पणियां की थी। पता नही उसके बाद क्या हुआ। क्या भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण में विशेषज्ञों की नियुक्ति हुई या अफसरों के भरोसे ही कार्य चलाया जा रहा है। तब समिति की रिपोर्ट में बताया गया था कि भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण के आर्कियोलाजी काडर में 420 पद स्वीकृत हैं जिसमें से 166 पद खाली थे। संरक्षण काडर में कुल स्वीकृत पद 918 थे जिनमें से 452 पद रिक्त थे। संस्कृति मंत्रालय के कामकाज को लेकर संसदीय समिति की इस रिपोर्ट में इस बात पर नाराजगी जताई गई थी कि करीब पचास फीसद पद कैसे खाली हैं। क्या मंत्रालय या भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण इस बात का आकलन नहीं कर पाई थी कि भविष्य में कितने पद खाली होनेवाले हैं। 

दरअसल संस्कृति मंत्रालय में कामकाज की एक अजीब सी संस्कृति पनप गई है। मंत्रालय में संवेदनहीन अधिकारियों के साथ साथ उन बाहरी संस्थाओं को कई कार्य करने का दायित्व दिया गया है जिनको संस्कृति की समझ ही नहीं है। किसी पब्लिक रिलेशन एजेंसी को भारतीय संस्कृति को वैश्विक स्तर पर छवि बनाने के काम में लगाया गया था। उनके लोग संस्कृति से संबंद्ध लेखकों-कलाकारों की बैठकों में नोट्स लेते हैं। उसके आधार पर पावर प्वाइंट बनाकर भारतीय संस्कृति की छवि बनाने का कार्य करने का प्रयास करते हैं। पता नहीं ये कार्य हो पाया नहीं लेकिन इन बैठकों में जब पब्लिक रिलेशन कंपनी से जुड़े लोग कलाकारों या शिक्षाविदों से पूछते कि नृत्य या संगीत की इतनी शैलियों को कैसे समेटा जाए तो हास्यास्पद स्थिति बन जाती। सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी ही नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक भारतीय सांस्कृतिक विरासत को लेकर गंभीरता से संवाद और कार्य करने के पक्षधर हैं। बावजूद इसके संस्कृति मंत्रालय के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। सिस्टम अपनी गति से ही चलता रहता है। संस्कृति मंत्रालय में यथास्थितिवाद को झकझोरनेवाला नेतृत्व चाहिए जो संस्कृति की बारीकियों को समझ सके, उसके विविध रूपों को लेकर गंभीर हो और अधिकारियों को प्रधानमंत्री की नीतियों को लागू करने के लिए ना केवल प्रेरित कर सके बल्कि कस भी सके।   

Saturday, September 14, 2024

संस्कृति मंत्रालय का अजीब फरमान


भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की वेबसाइट देखने से पता चलता है इस मंत्रालय के अंतर्गत कई श्रेणियों में संस्थाओं का वर्गीकरण है। कुछ संस्थाएं, जैसे राष्ट्रीय अभिलेखागार और पुरातत्व सर्वेक्षण मंत्रालय से संबद्ध हैं। इसी तरह से कोलकाता की केंद्रीय संदर्भ पुस्तकालय, दिल्ली स्थित नेशनल गैलरी आफ मार्डन आर्ट और राष्ट्रीय संग्रहालय आदि मंत्रालय के अधीनस्थ कार्यालय हैं। एक श्रेणी स्वायत्त संस्थाओं की है। जिसमें दिल्ली स्थित साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, इंदिरा गांधी कला केंद्र जैसी संस्थाएं हैं। इनके अलावा भई अन्य संस्थाएं भी स्वायत्त संस्थाओं की श्रेणी में हैं। वेबसाइट पर एक मजेदार बात पता चली कि साहित्य अकादमी का नाम साहित्य कला अकादमी है। ये गड़बड़ी हिंदी भाषा में है। अंग्रेजी में सही नाम है। ये भूल हो सकती है लेकिन मंत्रालय की वेबसाइट पर इस तरह की गलतियां लापरवाही को दर्शाती हैं। खैर...। मोटे तौर पर स्वायत्त संस्थाओं का अर्थ ये है कि संस्कृति मंत्रालय इन संस्थाओं को अनुदान देती है और ये संस्थाएं अपने उद्देश्यों के हिसाब के कार्य करती है। सैद्धांतिक रुप से यही व्यवस्था है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में इसके ट्रस्टी मिल बैठकर निर्णय लेते हैं। इसी तरह से साहित्य अकादमी की साधारण सभा और कार्यकारी परिषद निर्णय लेती है। संगीत नाटक अकादमी में भी यही व्यवस्था है। साहित्य अकादमी में तो हर पांच वर्ष में चुनाव होता है और साधारण सभा के सदस्यों के साथ साथ अध्यक्ष और उपाध्य़क्ष भी चुने जाते हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के ट्रस्टियों और अध्यक्ष का चयन भारत सरकार करती है। इसी तरह से ललित कला अकादमी के अध्यक्ष का चयन राष्ट्रपति करते हैं। 

संस्कृति मंत्रालय की स्वायत्त संस्थाओं की चर्चा करने के पीछे कारण ये है बीते 19 जुलाई को संस्कृति मंत्रालय के अकादमी प्रभाग के इन स्वायत्त संस्थाओं के अध्यक्षों और चेयरमैन को मिलनेवाली सुविधाओं को लेकर एक गाइडलाइन जारी किया है। गाइडलाइन में इस बात का उल्लेख किया गया है कि मंत्रालय का अकादमी प्रभाग सात संस्थाओं के प्रशासनिक मामलों को देखता है। मंत्रालय का ये भी कहना है कि इन सात अकादमियों का नेतृत्व अध्यक्ष या चेयरमैन के द्वारा किया जाता है जिसका चयन केंद्र सरकार करती है। उनकी चयन प्रक्रिया, उनके दायित्व, और उनकी शक्तियां अलग अलग संस्थाओं के संविधान में उल्लिखित हैं। लेकिन इन संस्थाओ के दस्तावेज में अध्यक्ष या चेयरमैन को मिलनेवाली सुविधाओं में भिन्नता है। इसमें एकरूपता लाने के लिए अकादमी प्रभाग ने कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग से मशिवरा करने के बाद एक गाइडलाइन जारी की। इस गाइडलाइन के बारे में निर्णय लेनेवालों की जानकारी का स्तर देखिए। साहित्य अकादमी के अध्यक्ष का चुनाव होता है। केंद्र सरकार उनको नियुक्त नहीं करती है। थोड़ी जांच कर ली जाती तो भद नहीं पिटती। लेकिन जहां संस्था का नाम ही सही न लिखा जाए उनसे इतनी जानकारी की उम्मीद बेमानी है। 

अब गाइडलाइन पर नजर डालते हैं। पहले बिंदु में कहा गया है कि इन सभी अध्यक्षों पर सेंट्रल सिविल सर्विसेज आचरण नियम लागू होंगे। इसका अर्थ ये हुआ कि संस्कृति मंत्रालय इन स्वायत्त संस्थाओं के अध्यक्षों और चेयरमैन को सरकारी कर्मचारी मानती है। जबकि इनके चेयरमैन और अध्यक्ष पद मानद है। इतना ही नहीं इन सबको गोपनीयता अधिनियम 1923 के अंतर्गत नियमों के पालन करने की सलाह दी गई है। अपेक्षा की गई है कि इनकी नियुक्ति के समय ही बताना चाहिए कि उनको सरकारी घर और वेतनभोगी कर्मचारियों को मिलनेवाली अन्य सुविधाएं नहीं मिलेंगी। उनको ना तो वेतन मिलेगा और ना ही वेतनभोगी जैसी सुविधाएं। सिर्फ वेतभोगियों वाले नियम लागू होंगे। आगे कहा गया है कि इनको मानदेय के रूप बड़ी धनराशि नहीं दी जा सकेगी लेकिन बैठकों में भाग लेने का जो मानदेय होता है वो संस्था की नीति निर्धारक समिति तय करेगी। इसमें भी सीमा तय की गई है कि महीने में दस से अधिक बैठक नहीं होगी। देश में यात्रा भी तभी कर सकेंगे जबकि फोन, ईमेल और वीडियो कांफ्रेंसिंग का विकल्प उपलब्ध नहीं होगा। ये भी स्पष्ट किया गया है कि चेयरमैन और अध्यक्ष भारत सरकार के कर्मचारियों के वेतनमान के स्तर 14 और उससे उच्च स्तर के वेतनमान वाले अधिकारियों के समकक्ष सुविधाएं ले सकेंगे। लेकिन ये नहीं बता गया है कि इसको तय कौन करेगा। बिजनेस या क्लब क्लास में हवाई यात्रा, होटल में प्रतिदिन रु 7500 का कमरा, रु 1200 का भोजन और टैक्सी भत्ता। इसके अलावा भी कुछ और हिदायतें दी गई हैं। 

गाइडलाइन को समग्रता में देखने पर ये प्रतीत होता है कि संस्कृति मंत्रालय के जिस भी अधिकारी ने इसको तैयार किया है उसका उद्देश्य संस्थाओं की स्वायत्तता को बाधित करना है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के चेयरमैन और सदस्य सचिव का उदाहरण लें तो सदस्य सचिव भारत सरकार के सचिव के समकक्ष होते हैं। उसी अनुसार उनका वेतन और अन्य सुविधाएं परिभाषित हैं। नई गाइडलाइ के मुताबिक अध्यक्ष को संयुक्त सचिव के बराबर सुविधाएं मिलेंगी। ये कैसी विडंबना और विसंगति है कि पदानुक्रम में ऊपर रहते हुए भी चेयरमैन को सुविधाएं कम मिलेंगी। अगर सुविधाएं नहीं दे सकते तो कम से कम अपमानित तो नहीं करना चाहिए। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक का पद संयुक्त सचिव के स्तर का होता है और चेयरमैन का पद मानद होता है लेकिन उनको भारत सरकार के सचिव के बराबर माना जाता रहा है। अब चेयरमैन और निदेशक को संस्कृति मंत्रालय ने बराबर कर दिया है। दरअसल जब मंत्रालयों में संस्कृति को लेकर संवेदनशील और जानकार अधिकारी नहीं होंगे तो इस तरह के कदम उठाए जाते रहेंगे। कोई रेलवे कैडर का, कोई वन या पोस्टल या आयकर कैडर का अधिकारी जब संस्कृति जैसे महकमे को संभालता है तो इसी तरह के निर्णय लिए जाते हैं। मंत्रालय के अधिकारियों को जिन प्रशासनिक मसलों पर ध्यान देना चाहिए उससे हटकर वो बेकार की चीजों में उलझे रहते हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के चेयरमैन परेश रावल का कार्यकाल समाप्त हो गया। बेहतर होता कि चेयरमैन का प्रभार लेने की आकांक्षा की जगह मंत्रालय के अधिकारी उनकी जगह नियुक्ति की प्रक्रिया आरंभ करते और समय रहते किसी नए व्यक्ति को चेयरमैन नियुक्त किया जाता। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश की संस्कृति और विरासत को लेकर बहुत गंभीर रहते हैं। भारतीय संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन को लेकर उनका अपना एक विजन है। वो निरंतर इस कोशिश में रहते हैं कि भारत की संस्कृति को वैश्विक पटल पर प्रचारित प्रसारित किया जाए। लेकिन अधिकारियों के ऊलजलूल निर्णय उनके विजन को जमीन पर उतारने में बाधा डालते रहते हैं। इस गाइडलाइन के बाद प्रश्न ये उठ रहा है कि क्या संस्कृति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत को इस निर्णय की जानकारी दी गई थी। क्या सरकार में उच्चतम स्तर पर ये निर्णय लिया गया है। क्या सरकार इन संस्थाओं को संस्कृति मंत्रालय के अधीन लाना चाहती है। क्या इन सभी संस्थाओं को एक साथ मिलाकर कोई नई संस्था बनाने की कोशिश कर रही है। कुछ वर्षों पूर्व बजट में इंडियन इंस्टीट्यूट आफ हेरिटेज की घोषणा की गई थी। क्या उसको प्राणवायु देने के लिए जमीन तैयार की जा रही है। इनसे बेहतर हो कि संस्कृति मंत्रालय से पर्यटन विभाग को अलग कर दिया जाए ताकि वहां के मंत्री संस्कृति पर पूरा ध्यान दे सकें। 


Monday, September 9, 2024

सवालों के घेरे में रचनात्मक स्वतंत्रता


आज से करीब छह दशक पहले एक फिल्म आई थी तीसरी मंजिल, जो मर्डर मिस्ट्री थी। इसमें एक लड़की की मौत होती है जिसे आत्महत्या समझा जाता है। कहानी में कई दिलचस्प और रोमांचक मोड़ आते हैं और अंत में मौत का भेद खुलता है। इस फिल्म में शम्मी कपूर और आशा पारेख थीं और निर्देशक विजय आनंद और निर्माता नासिर हुसैन। फिल्म बेहद सफल रही थी। इसमें कलाकारों ने बेहद सधा हुआ अभिनय किया था। इसके साथ कई संयोग जुड़े हुए बताए जाते हैं। इस फिल्म के बाद नासिर हुसैन और विजय आनंद ने कभी साथ काम नहीं किया। शम्मी और नासिर ने भी इस फिल्म के बाद साथ नहीं आए। इस फिल्म के गीतों ने भी ऐसी धूम मचाई थी कि छह दशक बाद भी उसके बोल युवाओं की जुबां पर है। ये वो समय था जब लता मंगेशकर अपनी गायकी की शीर्ष पर थीं और फिल्म में उनके गाने का मतलब फिल्म का हिट होना माना जाता था। लता मंगेशकर की लोकप्रियता के बीच हिंदी फिल्मों की दुनिया में एक ऐसी आवाज आई जिसे संगीतकार राहुल देब बर्मन के हुनर ने वो ऊंचाई दी जो आजतक बनी हुई है। तीसरी मंजिल में आशा भोंसले और मोहम्मद रफी के गाए युगल गीत अमर हो गए। चाहे ओ मेरे सोना रे सोना हो या ऐ हसीना जुल्फों वाली हो या आ जा आ जा मैं हूं प्यार तेरा। आज भी वेलेंटाइन डे पर तीसरी मंजिल फिल्म के ये गीत बजते ही बजते हैं। ये पहली बार नहीं था कि आशा ने आर डी बर्मन के धुनों पर गीत गाए थे। इसके पहले तीसरा कौन में भी दो गाने रिकार्ड किए गए थे, अच्छा सनम कर ले सितम और ओ दिलरुबा। लेकिन न तो फिल्म चली और ना ही गाने को अपेक्षित सफलता मिली। इसके पहले आशा भोंसले को फिल्म नया दौर के गानों से गायिका के तौर पर पहचान मिल चुकी थी।   

जब तीसरी मंजिल प्रर्दर्शित हुई और आशा भोंसले के गाए गीत बेहद लोकप्रिय हो गए तो लता और आशा के बीच तुलना होने लगी थी। तरह तरह की चर्चाओं ने भी जोर पकड़ा था। फिल्मी दुनिया से जुड़े कुछ लोग आशा और लता के बीच होड़ की बात भी फैलाने रहे थे। कुछ तो बात रही होगी कि दोनों बहनों के बीच दूरी या खिंचाव की खबरें आम होने लगी थीं। आशा की गनपत भोंसले के साथ शादी को लता ने पसंद नहीं किया था और मनभेद नहीं से आरंभ हो गए थे। पहले पति को छोड़कर जब आशा भोंसले अपने गले में संगितकार ओ पी नय्यर की फोटो लगी लाकेट पहनने लगी थी तो ये भी लता जी को पसंद नहीं आया था। काफी दिनों तक दोनों बहनों के बीच ये चलता रहा। एक सम्मान समारोह में दोनों ने अपनी भावनाओं का प्रदर्शन भी कर दिया था। कार्यक्रम में जब लता मंगेशकर थोड़ी देर से पहुंची थीं तो आशा ने कहा था आप जानबूझकर मेरे कार्यक्रमों में देर से आती हैं ताकि आपको मेरे गाने न सुनने पड़ें। तब लता जी ने अपने चिरपरिचित अंदाज में उत्तर दिया था कि आशा तुमने मुझे बहुत सताया है। बात हंसी मजाक में कही गई थी लेकिन दोनों ने संकेत तो दे ही दिए थे। दरअसल हुआ ये था कि 1950 से 60 के दशक को फिल्म संगीत का स्वर्णिम काल माना जाता है और जब भी इस कालखंड की बात होती थी तो सिर्फ लता का नाम लिया जाता था। संभव है कि आशा जी को ये बात अखरती हो। जबकि बाद के दिनों में आशा भोंसले को श्रोताओं का खूब प्यार मिला। ना सिर्फ गाने बल्कि जब मुजफ्फर अली की फिल्म में आशा भोंसले के गाए गजल गाए भी सुपर हिट रहे। दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए या इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं या ये क्या जगह है दोस्तों ये कौन सी दयार है को सुनते हुए ऐसा लगता है जाने आशा के कंठ से किशोर वय की गायिका की आवाज निकल रही हो। इस फिल्म में किशोरवय की पात्र अमीरन जब गाती है तो आशा की आवाज एक जादुई वातावरण का निर्माण करती है। आज जब आशा भोंसले नब्बे वर्ष की अवस्था को पार कर चुकी हैं तो लोग ये पूछने लगे हैं कि आशा के बाद कौन? यही प्रश्न लता मंगेशकर के गाना छोड़ने के बाद भी किया जाता था। इस प्रश्न का उत्तर कठिन है लेकिन इन दोनों बहनों ने भारतीय संगीत की दुनिया को इतना समृद्ध किया है कि जब भी पार्श्व गायकी की बात होगी लता और आशा शीर्ष पर होंगी। 

Saturday, September 7, 2024

सवालों के घेरे में रचनात्मक स्वतंत्रता


हिंदी में एक कहावत बेहद लोकप्रिय है कि पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं। मतलब कि आरंभ से ही भविष्य का अनुमान हो जाता है। नेटफ्लिक्स पर अनुभव सिन्हा निर्देशित एक वेब सीरीज आई है आईसी 814, कांधार हाईजैक। वेबसीरीज शुरु होती है तो नेपथ्य से आवाज आती है कि काठमांडू से विमान हाईजैक हो गया। आगे ये सवाल पूछा जाता है कि किसने किया वो हाईजैक, क्यों किया, ये सब भी पता करना था। नेपथ्य की ये आवाज चलती रहती है, इतना पेचीदा था ये सब कि सात दिन लग गए, क्यों लग गए सात दिन और क्या क्या हुआ उन सात दिनों में। इसके बाद कहानी आरंभ होती है उन सात दिनों की। हाईजैक से लेकर विमान में सवार लोगों के हिन्दुस्तान पहुंचने तक। अंत में फिर वही आवाज पर्दे पर गूंजती है, कांधार में सिर्फ एक अधूरी कड़ी छूट गई थी, वो 17 किलो आरडीएक्स। तालिबान के कहने पर हाईजैकर्स ने वो बैग हमारे प्लेन से निकलवाया। आगे बताया जाता है कि उस रात ओसामा बिन लादेन के घर तरनक किला में पांचों हाइजैकर्स और तीनों आतंकवादियों के वापस आने पर जश्न का इंतजाम था। इस हाईजैक का आईएसआई से इतना कम संबंध था कि उन्हें इस जश्न में शामिल होने से रोक दिया गया। हाईजैक खत्म हुआ पर ये तीनों (छोड़ गए आतंकवादी) न जाने आजतक कितनी मासूम मौतों और हादसों के जिम्मेदार हैं। इसके बाद संसद पर हमला, डैनियल पर्ल की गला रेतकर हत्या, मुंबई पर आतंकवादी हमला और पुलवामा की घटना का उल्लेख किया गया। परोक्ष रूप से ये संकेत किया जाता है कि अगर ये तीन आतंकवादी नहीं छोड़े गए होते तो आतंकवादी घटनाएं न होतीं।   

सीरीज के आरंभ में पूछे गए प्रश्न कि हाईजैक किसने किया और अंत में दिए उत्तर को मिलाकर देखें तो सीरीज निर्माण की मंशा साफ हो जाती है। उत्तर है कि इस हाईजैक में पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी का हाथ नहीं था या बहुत कम था। हाईजैक के बाद उस समय के गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने संसद में 6 जनवरी 2000 को एक बयान दिया था। उस बयान में ये कहा गया था कि हाईजैक की जांच करने में जुटी एजेंसी और मुंबई पुलिस ने चार आईएसआई के आपरेटिव को पकड़ा था। ये चारो इंडियन एयरलाइंस के हाईजैकर्स के लिए सपोर्ट सेल की तरह काम कर रहे थे। इन चारों आतंकवादियों ने पूछताछ में ये बात स्वीकार की थी कि आईसी 814 का हाईजैक की योजना आईएसआई ने बनाई थी और उसने आतंकवादी संगठन हरकत-उल-अंसार के माध्यम से इसको अंजाम दिया था। पांचों हाईजैकर्स पाकिस्तानी थे। हरकत उल अंसार पाकिस्तान के रावलपिडीं का एक कट्टरपंथी संगठन था जिसको 1997 में अमेरिका ने आतंकवादी संगठन घोषित किया था। उसके बाद इस संगठन ने अपना नाम बदलकर हरकत- उल- मुजाहिदीन कर लिया था। संसद में दिए इस बयान के अगले दिन पाकिस्तान के अखबारों में ये समाचार भी प्रकाशित हुआ था कि भारत ने जिन तीन आतंकवादियों को छोड़ा था वो कराची में देखे गए थे। इसके अलावा भी कई घटनाएं उस समय घटी थी जिससे ये स्पष्ट होता है कि आईसी 814 के हाईजैक को पाकिस्तान की सरपरस्ती में अंजाम दिया गया था। पाकिस्तान पहुंचकर मसूद अजहर ने एक भाषण में कहा था कि मैं यहां आपको ये बताने के लिए आया हूं कि मुसलमान तबतक चैन से नहीं बैठेंगे जबतक कि अमेरिका और भारत को बर्बाद न कर दें। इतने उपलब्ध सूबतों के बावजूद इस वेबसीरीज की कहानी में आईएसआई की भूमिका के नकार का क्या कारण हो सकता है। इसके बारे में निर्देशक को बताना चाहिए। ये सिनेमैटिक क्रिएटिव फ्रीडम नहीं कुछ और प्रतीत होता है। 

सिर्फ इतना ही नहीं जिस तरह से पूरे सीरीज में घटनाक्रम को दिखाया गया है वो भी स्थितियों के बारे में अल्पज्ञान पर आधारित प्रतीत होता है। ऐसा लगता है कि निर्देशक को इस बात का भान ही नहीं है कि समाचारपत्रों में किस तरह काम होता है या मंत्रालयों में संकट के समय किस प्रकार से योजनाएं बनाई जाती हैं। कांधार एयरपोर्ट पर हाईजैकर्स से बातचीत के प्रसंग को जिस तरह से दिखाया गया है वो फूहड़ता की श्रेणी में आता है। आतंवकादियों और अधिकारी के संवाद से ऐसा लगता ही नहीं है कि कोई देश इतने बड़े संकट से गुजर रहा है। कुछ घटनाओं को तो इस तरह से कमेंट्री में निबटा दिया गया है जैसे कि वो बेहद मामूली घटना हो। जैसे विमान में मौजूद एक लाल बैग के बारे में। फिल्म निर्देशक ने थोड़ी मेहनत की होती और इस्लामाबाद से कांधार भेजे गए भारतीय राजनयिक ए आर घनश्याम की डिस्पैच को पढ़ लिया होता। लाल बैग से जुड़ी जानकारी उनको मिलती और वो आईएसआई को क्लीन चिट देने की ‘रचनात्मक स्वतंत्रता’ लेने का दुस्साहस नहीं कर पाते। 31 दिसबंर की रात की घटना का बयान करते हुए घनश्याम लिखते हैं कि रात नौ बजे के करीब कैप्टन सूरी लाउंज में आए और बताया कि तालिबान आईसी 814 में ईंधन भरने में जानबूझकर देरी कर रहा है। वो हाईजैकर्स का लाग रंग का बैग ढूंढ रहे हैं। घनश्याम तुरंत तालिबान सरकार के मंत्री मुतवक्किल, जो उस समय तक एयरपोर्ट पर ही थे, के पास पहुंचते हैं और उनको सारी बात बताते हैं। थोड़ी देर बाद जब घनश्याम विमान के पास पहुंचते हैं तो देखते हैं कि मुतवक्किल की लाल रंग की पजैरो कार विमान के पास खड़ी थी। गाड़ी की हेडलाइट आन करके विमान से कुछ खोजा जा रहा था। कुछ लोग हर लाल रंग के बैग को गाड़ी के पास ले जा रहे थे और फिर थोड़ी देर में उसको वापस लाकर विमान में रख रहे थे। वहां काम कर रहे एक वर्कर ने बताया कि असली लाल बैग मिल गया। उसमें पांच हैंड ग्रेनेड रखे थे। लेकिन कहानी इससे गहरी थी। उस लाल बैग में हाइजैकर्स के पाकिस्तानी पासपोर्ट भी थे जिसमें उनका असली नाम पता दर्ज था। आईएसआई के हुक्म पर मुतवक्किल ने अपनी निगरानी में उस बैग को न सिर्फ खोजा बल्कि उसको अपने साथ लेकर गए। इसके बाद ही विमान के कैप्टन को विमान उड़ाने की अनुमति मिल सकी। विमान अगले दिन सुबह कांधार एयरपोर्ट से उड़ सका। 

यहां भी स्पष्ट होता है कि आईएसआई का इस हाईजैकिंग से कितना गहरा संबंध था । वो गुनाह का कोई निशान नहीं छोड़ना चाहता था। कांधार एयरपोर्ट की गतिविधियों पर पूरी तरह से आईएसआई का नियंत्रण था। उस समय के विदेश मंत्री जसवंत सिंह जब अफगानिस्तान जा रहे थे तो उन्होंने मुतवक्किल से फोन पर कहा था कि वो मुल्ला उमर से मिलना चाहते हैं। पहले तो उसने हां कर दी। थोड़ी देर में आईएसआई के अपने आकाओं के बात करने के बाद जसवंत सिंह को मना कर दिया। वेब सीरीज पर विवाद हुआ। नेटफ्लिक्स की प्रतिनिधि मंत्रालय में तलब हुईं। मंत्रालय ने डिसक्लैमर लगाने को कहा। वो लगा दिया गया। न तो कमेंट्री बदली गई न ही वो दृष्य सुधारे गए जिससे आईएसआई को क्लीन चिट दी गई। इतिहास ऐसे ही बिगाड़ा जाता है। ये मामला आतंकियों के नाम का नहीं बल्कि उनके आकाओं को बचाने का लगता है। 

Saturday, August 31, 2024

पुस्तकालयों पर समग्र नीति की दरकार


इंटरनेट मीडिया के इस दौर में रील्स की लोकप्रियता बढ़ रही है। कई बार छोटे छोटे वीडियो से महत्वपूर्ण जानकारियां मिल जाती हैं। पिछले दिनों इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म फेसबुक पर वीडियो देख रहा था तो राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के फेसबुक पेज पर इसी वर्ष 23 जुलाई को पोस्ट किया गया एक वीडियो पर रुक गया। ये संसद में प्रश्न काल का वीडियो है। इसमें ओडिशा से भारतीय जनता पार्टी की सांसद अपराजिता सारंगी ने नेशनल लाइब्रेरी मिशन की प्रगति जाननी चाही थी। अपराजिता सारंगी ने प्रश्न की भूमिका में ये कहा था कि पुस्तकालय किसी भी देश में ज्ञान तक पहुंचने की प्रक्रिया का एक अंग है। फरवरी 2014 में शुरु किए गए नेशनल लाइब्रेरी मिशन का उद्देश्य पूरे भारत में ज्ञान का प्रसार करना था। 2014 से लेकर अबतक इस प्रक्रिया में क्या किया गया और जनता को इसके बारे में बताने के क्या क्या उपक्रम किए गए। उत्तर संस्कृति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने दिया क्योंकि ये उनके ही मंत्रालय के अंतर्गत आता है। उन्होंने बताया कि संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार पुस्तकालय राज्यों का विषय है। इस कारण से लोगों को इसके साथ जोड़ना, जनजागरण करना आदि की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। केंद्र सरकार राष्ट्रीय पुस्तक मिशन के द्वारा राज्य सरकारों को धनराशि और संसाधन मुहैया कराती है। इस क्रम में उन्होंने सदन को जानकारी दी कि राजा राममोहन लाइब्रेरी फाउंडेशन के माध्यम से राज्य सरकारें सहायता प्राप्त कर सकती हैं। 

मंत्री जी ने जब संसद में राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन का नाम लिया तो लगा कि इस संस्थान के बारे में पता करना चाहिए। यह संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध एक स्वायत्तशासी संस्था है। देशभर में सार्वजनिक पुस्तकालयों को सहयोग करने और उसको मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार की नोडल एजेंसी है। इस संस्था का प्रमुख कार्य देशभर में पुस्तकालय संबंधित गतिविधियों को मजबूत करना तो है। इस संस्था के अध्यक्ष संस्कृति मंत्री या उसके द्वारा नामित व्यक्ति होते हैं। वर्तमान संस्कृति मंत्री इसके अध्यक्ष हैं। इसके महानिदेशक का अतिरिक्त प्रभार प्रो बी वी शर्मा के पास है। फाउंडेशन के नियमों के मुताबिक संस्कृति मंत्री किसी को इस संस्था का अध्यक्ष नामित कर सकते हैं। कंचन गुप्ता जी 2021 तक इसके अध्यक्ष रहे। उनके पद त्यागने के बाद संस्कृति मंत्री ने किसी भी व्यक्ति को नामित नहीं किया। यह संस्था केंद्रीय स्तर पर पुस्तकों की खरीद करती है। राज्य सरकारों को भी पुस्तकों की खरीद के लिए अनुदान देती है। अगर राज्य सरकार 25 लाख पुस्तकों की खरीद के लिए देती है तो फाउंडेशन भी 25 लाख की राशि उस राज्य सरकार को देती है। लंबे समय से ये संस्था पुस्तकों की खरीद और राज्य सरकारों को अनुदान देने तक सिमट गई। अब तो पुस्तकों की खरीद भी नहीं हो पा रही है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक एक अप्रैल 2021 से 31 मार्च 2024 तक पुस्तक चयन समिति की केवल एक बैठक हो सकी। खरीदी गई पुस्तकों की जो सूची वेबसाइट पर है उसको देखकर ही अनुमान हो जाता है कि खरीद में कुछ न कुछ गड़बड़ है। फाउंडेशन की समिति की आखिरी बैठक भी 24 नवंबर 2022 को हुई थी। फाउंडेशन के नियमों के अनुसार वर्ष में इस समिति की एक बैठक होना अनिवार्य है। पिछले दो वर्षों से बैठक का ना होना संस्थान के प्रति संस्कृति मंत्रालय की उदासीनता को दिखाता है। संस्कृति मंत्रालय के क्रियाकलापों पर भी प्रश्न चिन्ह लगाता है। इस वर्ष मार्च में फाउंडेशन के नए सदस्यों बनाए जा चुके हैं। छह महीने बीत जाने के बाद भी अबतक इसकी कोई बैठक नहीं हो पाई है। न ही संस्कृति मंत्री ने किसी को अध्यक्ष नामित किया जो उनकी अनुपस्थिति में बैठक कर सके। 

राजा राममोहन राय लाइब्रेकी फाउंडेशन में पुस्तकों की खरीद में भ्रष्टाचार की कई कहानियां साहित्य जगत में गूंजती रहती हैं। कई बार तो ऐसा सुनने को मिलता है कि ‘हरियाणा में कैसे करें खेती’ जैसी पुस्तक मणिपुर या सिक्किम के पुस्तकालयों के लिए खरीद ली गईं। हिंदी में एक चुटकुला चलता है। अगर कोई पुस्तक महंगी है तो लोग फटाक से पूछते हैं कि क्या ये राजा राममोहन राय लाइब्रेरी संस्करण है। जो पुस्तक बाजार में या विभिन्न ईकामर्स साइट्स पर चार सौ रुपए की है वो वहां आठ सौ रुपए की खरीदने का आरोप भी संस्था पर लगता रहता है। बड़ी संख्या में चर्च लिटरेचर की खरीद की खबरें भी आईं थीं। हिंदी प्रकाशन और साहित्य जगत में माना जाता है कि राजा राम मोहनराय लाइब्रेरी फाउंडेशन भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है। इस संस्थान को अगर बचाना है तो इसके क्रियाकलापों पर नए सिरे से विचार करना होगा। इसके नियमों में बदलाव करना होगा। अगर गंभीरता से देश में पुस्तकालय अभियान को चलाना है तो फाउंडेशन समिति की नियमित बैठक करनी होगी। अन्यथा करदाताओं की गाढ़ी कमाई का पैसा बर्बाद होता रहेगा।

पुस्तकालयों को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पिछले दस वर्षों से निरंतर बोल रहे हैं। याद पड़ता है कि किसी समारोह में तो उन्होंने घर में पूजा स्थान और पुस्तकालय दोनों की अनिवार्यता पर बल दिया था। उसके बाद भी कई अन्य अवसरों पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पुस्तकों और पुस्तकालयों की महत्ता पर बोलते रहे हैं। जब जी 20 शिखबर सम्मेलन होने वाला था तो उस दौर में पुडुचेरी में जी 20 लाइब्रेरी समिट हुआ था। उसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पुस्तकालयों को मानवता का सबसे अच्छा मित्र बताया था। उन्होंने कहा था कि पारंपरिक रूप से पुस्तकालय वो स्थान हैं जहां विचारों का आदान-प्रदान होता है और नए विचार जन्म लेते हैं। अपने उस भाषण में प्रधानमंत्री ने पुस्तकालयों को नई तकनीक से जोड़ने पर बल दिया था लेकिन पुस्तकों के प्रति युवाओं के मन में लगाव को बढ़ाने की कोशिश करने की अपील भी की थी। राजा राममोहन लाइब्रेरी फाउंडेशन की हालत को देखकर इस बात का अनुमान होता है कि वो संस्कृति मंत्रालय की प्राथमिकता में नहीं है। इस स्तंभ में पहले भी इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि देश में पुस्तकालयों को लेकर एक समग्र नीति बने। पुस्तकालयों को इस तरह से बनाया जाए कि उसमें बैठकर युवा पढ़ सकें। दिल्ली में एक कोचिंग सेंटर में पानी घुस जाने के कारण जब तीन छात्रों की दुखद मौत हो गई थी तब रीडिंग रूम की काफी चर्चा हुई थी। सिर्फ महानगरों में ही नहीं बल्कि छोटे शहरों में भी रीडिंग रूम की आवश्यकता है। वैसे अध्ययन कक्ष हों जहां कंप्यूटर और इंटरनेट की सुविधा हो। पढ़नेवाले छात्र अपने अध्ययन के साथ साथ जब मन चाहे तो अपनी मनपसंद पुस्तकें भी पढ़ सकें। राजा रामोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन को इस तरह के पुस्तकालयों को तैयार करने की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए। वो राज्य सरकारों से समन्वय करके इसको तैयार करे। व्यवस्था के सुचारू रूप से चलाने के लिए उन पुस्तकालयों के खाते में सीधे पैसे भेजे जाएं। इससे सिस्टम में पारदर्शिता आएगी। लेकिन सबसे अधिक आवश्यक है कि मंत्रालय के स्तर पर एक सोच बने जो पुस्तकालयों के विकास के लिए गंभीरता से काम करे। पुस्तकों की खरीद से लेकर अनुदान तक में पारदर्शिता स्थापित करने के मानदंड बनें। अन्यथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विजन को जमीन पर उतारना कठिन होगा। 


Saturday, August 24, 2024

पुस्तक महोत्सव से जगती आस


जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद पहली बार विधानसभा चुनाव की घोषणा हो गई है। 5 अगस्त 2019 को जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा दिया गया था। उसके एक वर्ष पहले जून 2018 में जम्मू कश्मीर में राजनीतिक उठापटक के बाद राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था। अनुच्छेद 370 हटने के बाद अक्तूबर 2019 में जम्मू कश्मीर राज्य का पुनर्गठन करते हुए इसको दो केंद्र शासित क्षेत्र में बांट दिया गया था। एक जम्मू कश्मीर और दूसरा लद्दाख। अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू कश्मीर में भारत के सभी कानून लागू हो गए थे। वहां के स्थानीय कानून जो भारत के संविधान से अलग थे वो भी समाप्त हो गए थे। पिछले लगभग पांच वर्षों से वहां जनहित के बहुत सारे कार्य हुए और जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के विष का असर कम हुआ। अब वहां करीब छह वर्षों के बाद फिर से विधानसभा का गठन होने जा रहा है। अनुच्छेद 370 हटने के बाद दो बार कश्मीर जाने का अवसर मिला। दो वर्ष पहले अक्तूबर 2022 में एक साहित्य महोत्सव में कश्मीर जाना हुआ था। श्रीनगर में आयोजित कुमांऊ लिट फेस्ट का आयोजन डल झील के किनारे शेर-ए-कश्मीर अंतराष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र में हुआ था। उस समय के हिसाब से आयोजन बहुत अच्छा रहा था। लेकिन तब सुरक्षा व्यवस्था सख्त थी। केंद्र के गेट से लेकर अंदर तक सुरक्षा के इंतजाम थे। तब भी स्थानीय लोगों की भागीदारी थी लेकिन आमंत्रण पर ही लोग आए थे। उस साहित्य उत्सव में भी कला, संस्कृति और फिल्मों से जुड़े देशभऱ के लोग आए थे। 

दूसरी बार इस सप्ताह जाना हुआ। अवसर था चिनार पुस्तक महोत्सव का जिसका आयोजन शिक्षा मंत्रालय के राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने किया था। नौ दिनों का ये आयोजन 17 अक्तूबर को आरंभ हुआ। ये भी शेर-ए-कश्मीर अंतराष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र में ही चल रहा है। इस बार लोगों की भागीदारी बहुत अधिक दिखी, विशेषकर महिलाओं और लड़कियों की। इस आयोजन में पूरा दिन बिताने के बाद और वहां उपस्थित छात्राओं और महिलाओं से बात करने के बाद ये लगा कि उनके भी अपने सपने हैं, उनकी भी अपनी आकांक्षाएं हैं। पहले भी रही होंगी। अब उनको लगने लगा है कि वो अपने सपनों को पूरा कर सकती हैं। फिल्म और साहित्य पर एक सत्र के दौरान जब वहां उपस्थित लड़कियों से पूछा गया कि कौन कौन फिल्म प्रोडक्शन के क्षेत्र में आना चाहती हैं तो दो लड़कियों ने अपने हाथ खड़े किए। सार्वजनिक रूप से श्रीनगर के एक आयोजन में लड़कियों का इस तरह से सामने आना और ये कहना कि वो फिल्म प्रोडक्शन के क्षेत्र में आना चाहती हैं, बड़ी बात थी। इन आयोजनों का सांस्कृतिक फलक तो बड़ा होता ही है इसका असर भी गहरा होता है। । कश्मीर के युवा पाठकों को बाहर की दुनिया से परिचय करवाने से लेकर भारत की सफलता की कहानी भी पुस्तक महोत्सव में दर्शाई गई थी। इसरो के बारे में, उसकी सफलता के बारे में और मंगलयान के बारे में जानने की जिज्ञासा प्रतिभागियों में प्रबल थी। अंतरिक्ष में इसरो की उड़ान से वो बेहद प्रभावित लग रही थीं। कुछ लड़कियां इस बारे में बात कर रही थीं कि कैसे इस संस्था से जुड़ा जा सकता है। सुरक्षा के इंतजाम रहे होंगे पर वो दिख नहीं रहे थे। प्रतिभागी खुले मैदान में बैठकर बातें कर रहे थे। अलग अलग पंडालों में करीब सवा सौ पुस्तकों की दुकानें थीं जिसमें कश्मीर की कला संस्कृति से जुड़ी पुस्तकों के अलावा हिंदी और अंग्रेजी की पुस्तकें भी प्रदर्शित की गई थीं। उर्दू प्रकाशकों के भी कई स्टाल लगे थे। युवाओं के हाथ में किताब देखकर कुछ अलग ही संकेत मिल रहे थे। कश्मीर के युवाओं की जो छवि बनाई गई थी उससे अलग पुस्तकों के प्रति उनका प्रेम अलग ही कहानी कह रहा था। ऐसा लग रहा था कि कश्मीर के युवा बंदूकों की आवाज या बारूद की गंध से ऊब चुके हैं। वो बेहतर जीवन के रास्ते तलाश रहे हैं। 

चिनार पुस्तक महोत्सव में सिर्फ पुस्तकों के स्टाल ही नहीं थे बल्कि स्थानीय कश्मीरी कलाकारों को भी मंच मिल रहा था। कश्मीरी संगीत, कश्मीरी वाद्य, कश्मीरी कलाकारों से लेकर कश्मीरी कवियों के कृतित्वों पर चर्चा हो रही थी। पुस्तक महोत्सव में शामिल होनेवाले लोग इसका आनंद उठा रहे थे। कला और संस्कृति के प्रति उनका लगाव नैसर्गिक था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वो हिंदुस्तान की मुख्यधारा में शामिल होना चाह रहे हैं। वहां इस बात की भी चर्चा हो रही थी कि इतने बड़े स्तर पर कला-संस्कृति और शिक्षा को लेकर कश्मीर में ये पहला अखिल भारतीय आयोजन था। अपने देश के स्वाधीनता सेनानियों के बारे में जानने के लिए भी वहां आए लोग उत्सुक थे। वहां लगी प्रदर्शनी में जुटी भीड़ से इसका पता चल रहा था। कश्मीर में इस तरह के आयोजन प्रतिवर्ष किए जाने चाहिए ताकि अधिक से अधिक युवाओं को जोड़ा जा सके। ऐसा नहीं था कि वहां सिर्फ श्रीनगर के प्रतिभागी ही आए थे। भद्रवाह से लेकर सोनमर्ग और गुलमर्ग के भी युवा भी वहां मिले। युवाओं के अलावा नागरिक संगठन के लोग भी इस आयोजन में दिखे। नागरिकों के समर्थन के बगैर इस तरह का और इतना बड़ा आयोजन संभव भी नहीं है। इस तरह के आयोजन का एक और लाभ है कि वो लोगों को मिलने जुलने और खुलकर बोलने बतियाने के अलावा अपने आयडिया साझा करने का अवसर भी प्रदान करता है। जब एक दूसरे के साथ विचारों का आदान प्रदान होता है तो बेहतर भविष्य का रास्ता निकलता है। लोग एक दूसरे से विचारों के माध्यम से जुड़ते हैं और विभाजन की लकीर धुंधली पड़ने लगती है।

नौ दिनों के इस आयोजन को एक इवेंट मानकर समाप्त नहीं करना चाहिए। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय को इसकी निरंतरता के बारे में विचार करना चाहिए। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की स्थापना 1957 में हुई थी। इसकी स्थापना के समय ये अपेक्षा की गई थी कि ये संस्था देश में पुस्तक संस्कृति को बढ़ावा देगी। पुस्तकों के प्रकाशन का कार्य राष्ट्रीय पुस्तक न्यास लंबे समय से कर रही है। पिछले कुछ वर्षों में गंभीर आयोजनों के माध्यम से पाठकों को पुस्तक तक पहुंचाने का उपक्रम किया जा रहा है जिसको रेखांकित किया जाना चाहिए। चिनार पुस्तक महोत्सव का आकलन वहां बिकी पुस्तकों की संख्या या बिक्री से हुई आय या आयोजन पर हुए व्यय से नहीं किया जा सकता है। इसके दीर्घकालीन प्रभाव के बारे में विचार करना चाहिए। भारत सरकार वर्षों से कश्मीर की बेहतरी के लिए और सुरक्षा इंतजामों पर करोड़ों रुपए खर्च करती रही है। कला संस्कृति पर खर्च करना भी उतना ही आवश्यक है क्योंकि ये एक ऐसा माध्यम है जो बिना किसी दावे के, बिना किसी शोर शराबे के लोगों को जोड़ती है। अब चुनाव की घोषणा हो गई है। नेताओं का कश्मीर आना जाना आरंभ हो गया है। दलों के बीच गठबंधन भी होने लगे हैं। जैसे जैसे चुनाव की तिथि नजदीक आएगी तो बयानवीर नेता अपने बयानों से वहां का माहौल खराब करेंगे। आवश्यकता इस बात की है कि कश्मीर के तीन हजार वर्ष के इतिहास को संजोकर रखा जाए और उस परंपरा को बढ़ाने की दिशा में कार्य हो।  

Sunday, August 18, 2024

कितने आदमी थे...


शोले जो भड़क न सका। करीब चार दशक पहले पढ़ा ये शीर्षक दिमाग पर इस कदर अंकित हो गया कि वर्षों बाद आज भी स्मृति में बना हुआ है। जब भी फिल्म शोले देखता हूं या इससे जुड़ी कोई चर्चा होती है तो ये शीर्षक कौंध जाता है। स्कूल में था, फिल्मों में रुचि थी। उसी समय फिल्म शोले पर एक समीक्षानुमा लेख देखा था। उसमें ये बताया गया था कि शोले फिल्म सफल नहीं हो सकी। बाद में शोले ने सफलता का इतिहास रच दिया। 15 अगस्त 1975 को शोले फिल्म के प्रदर्शन के 50 वर्ष पूरे हुए। एक बार फिर से इस शीर्षक की याद आई। इसी समय पता चला कि सलीम खान और जावेद अख्तर एक बार फिर से साथ आ रहे हैं। सलीम-जावेद की जोड़ी पर प्राइम वीडियो पर तीन पार्ट में एक डाक्यूमेंट्री आ रही है। ये सलीम जावेद की जोड़ी ही थी जिसने हिंदी सिनेमा के एंग्री यंगमैन को गढ़ा था। शोले फिल्म की कहानी और पटकथा सलीम- जावेद की है। जिसके प्रदर्शन पर लिखा गया था कि शोले जो भड़क न सका वो शोले ऐसा भड़का कि मुंबई (तब बांबे) के मिनर्वा सिनेमा हाल में लगातार पांच वर्षों तक दिखाई जाती रही। उस दौरे को जिसने देखा है उनका कहना है कि दो साल तो मिनर्वा के बाहर तक टिकट लेनेवालों की लाइनें लगा करती थी। इतना ही नहीं दिल्ली के प्लाजा सिनेमा में फिल्म देखने के लिए दूर दूर से लोग थे। पंजाब के दर्शकों को दिल्ली लाने के लिए चलनेवाली बस का नाम ही शोले एक्सप्रेस रख दिया गया था। 

यह बात सही है कि शोले फिल्म ने अपने प्रदर्शन के पहले सप्ताह में अच्छा बिजनेस नहीं किया था। रिव्यू भी अच्छे नहीं थे। तब फिल्मों के कारोबार के बारे में बताने वाली फिल्म पत्रिका द ट्रेड गाइड में सलीम-जावेद ने अपने नाम से एक विज्ञापन देकर भविष्यवाणी की थी। उन्होंने विज्ञापन में दावा किया था कि फिल्म हर वितरण के लिहाज से बनाए गए हर क्षेत्र में ये फिल्म एक करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार करेगी। ये इनका आत्मविश्वास था। इसी तरह से इन दोनों से जुड़ा एक और रोचक किस्सा है। एक फिल्म प्रदर्शित होनेवाली थी। फिल्म के पटकथा लेखक सलीम-जावेद ने निर्माताओं से कहा कि पोस्टर पर उनका भी नाम होना चाहिए। निर्माता नहीं माने। पूरे मुंबई में फिल्म के पोस्टर लग गए। सलीम-जावेद ने तय किया शहर के हर पोस्टर पर अपना नाम लिखवाएंगे। रातों रात उन्होंने कुछ पेंटर्स से संपर्क किया। अगले दिन अधिकतर पोस्टर्स पर सलीम जावेद का नाम लिखा था। परिणाम ये हुआ कि भविष्य में निर्माता पोस्टर पर पटकथा लेखक के तौर पर इस जोड़ी का नाम लिखने लगे। सलीम-जावेद की जोड़ी ने जिस तरह के संवाद लिखे वो भी बेहद लोकप्रिय हुए थे। चाहे फिल्म दीवार में अमिताभ और शशि कपूर के बीच का संवाद- आज मेरे पास बिल्डिंग है,प्रापर्टी है, बैंक बैलेंस है, बंगला है गाड़ी है तुम्हारे पास क्या है? उत्तर मिलता है- मेरे पास मां है। या फिल्म शोले में अमिताभ का ये पूछना कि तुम्हारा नाम क्या है बसंती अथवा गब्बर का ये कहना कि अरे ओ साभां, कितने आदमी थे। शोले के तो कई संवाद बेहद लोकप्रिय हुए, अब भी गाहे बगाहे लोग दोहराते हैं। संवाद के कैसेट तक बिके थे। सलीम-जावेद कि संवाद की एक और विशेषता है कि वो अश्लील या द्विअर्थी नहीं होते हैं। शोले में जब गब्बर बसंती को देखकर कहता है कि- अरे ओ साभां, ये रामगढ़ वाले अपनी बेटियों को कौन सी चक्की का आटा खिलाते हैं रे, जरा दारी के हाथ पांव देख, बहुत करारे हैं। इस संवाद पर तालियां बजी थीं किसी को गुस्सा नहीं आया था। सलीम जावेद एक कथा में कई उपकथा यानि कहानी के भीतर कहानी की कला में पारंगत हैं। शोले की कथा में कई गैप हैं लेकिन उन गैप्स को उपकथाएं भर देती हैं और दर्शक मनोरंजन की सपनीली दुनिया में चला जाता है। 


Saturday, August 17, 2024

विकसित भारत में वैश्विक संस्थान का स्वप्न


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वाधीनता दिवस के अवसर पर लालकिला की प्राचीर से विकसित भारत के सुझावों की चर्चा की थी। कई सुझावों का उल्लेख करने के क्रम में प्रधानमंत्री ने विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय की बात भी की थी। प्रधानमंत्री ने भले ही सुझावों के क्रम में इसकी चर्चा की लेकिन भारत में विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय या शैक्षणिक संस्थानों की कमी महसूस की जाती है। विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय या शैक्षणिक संस्थान के लिए तकनीक के अलावा भाषा या कला के क्षेत्र में प्रयास किया जाना चाहिए। इस प्रयास को फलीफूत करने के लिए 2020 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा की गई। शिक्षा नीति में भाषा और कला पर बहुत अधिक जोर दिया गया। विकसित भारत के लिए यह आवश्यक भी है कि हमारे देश में विश्वस्तरीय शिक्षा संस्थान हों। यहां एक विश्वविद्यालय है, जिसका नाम है महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय। ये विश्वविद्यालय महाराष्ट्र के वर्धा में है। 1997 में इस विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। इस विश्वविद्यालय के उद्देश्यों में तीन उद्देश्य ऐसे हैं जिसको हासिल करने के लिए अगर गंभीरता से प्रयास होता तो ये विश्वविद्यालय वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना चुका होता। ये तीन उद्देश्य हैं हिंदी को वैश्विक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने के लिए सुसंगत प्रयास, अंतराष्ट्रीय शोध केंद्र के रूप में विश्वविद्यालय का विकास और अंतराष्ट्रीय विमर्श केंद्र के रूप में विश्वविद्यालय का विकास। अपनी स्थापना के 27 वर्षों में विश्वविद्लाय में कोई भी ऐसा ठोस कार्य नहीं हुआ जिसके आधार पर कहा जा सके कि ये इन तीन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए गंभीर है। विश्वविद्यालय के पहले कुलपति अशोक वाजपेयी तो दिल्ली में बैठकर ही वर्धा स्थित विश्वविद्यालय चलाते रहे। पत्रिकाएं निकालते रहे। वैश्विक संस्थान बनाने के लिए कुछ नहीं किया। बाद के कुलपतियों ने नियुक्तियां की और भवन बनवाए। पिछले सालभर से यहां कोई स्थायी कुलपति नहीं है। 

अब बताया जा रहा है कि कुलपति की नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही है। प्रश्न यही उठता है कि किसी कुलपति के अचानक जाने के बाद भी इतना समय चयन में क्यों लगता है। महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय अपने आरंभिक दिनों से ही विवादों में रहा है। पिछले वर्ष जब विश्वविद्यालय के कुलपति ने पद छोड़ा था तब केंद्र सरकार ने आईआईएम, नागपुर के निदेशक को कुलपति का अतिरिक्त प्रभार दे दिया था। हाईकोर्ट ने इसको नियम विरुद्ध बताते हुए उनके प्रभार को रद कर दिया था। नए सिरे से विश्वविद्यालय को नियमानुसार कुलपति की नियुक्ति प्रक्रिया आरेभ करने को कहा था। नियमानुसार कुलपति की नियुक्ति के लिए जो समिति बनती है उसके दो सदस्यों के नाम का चयन करके विश्वविदयालय की कार्यपरिषद  शिक्षा मंत्रालय को भेजती है। कार्यपरिषद की बैठक कुलपति बुलाते हैं। हाईकोर्ट के आदेश के बाद होना ये चाहिए था कि नियमानुसार विश्वविद्यालय के वरिष्ठतम प्रोफेसर को कुलपति का प्रभार दिया जाता। वो कार्यपरिषद की बैठक बुलाते। ऐसा नहीं हुआ। विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलसचिव ने बैठक आहूत की। फाइल पर लिखा कि ‘सभी तथ्यों और शिक्षा मंत्रालय के मौखिक निर्देश और कार्यपरिषद के सदस्यों के साथ मोबाइल पर हुई वार्तानुसार सभी के मतानुसार तत्काल कार्यपरिषद की बैठक बुलाई जाने की सभी की सहमति बनी।“  कार्यपरिषद की बैठक हुई। दो नाम चयनित कर मंत्रालय को भेज दिए गए। चयन समिति बन गई । समिति ने योग्य उम्मीदवारों के साथ चर्चा कर संभावित कुलपति के नामों का पैनल तैयार कर लिया। अब प्रश्न उठ रहे हैं कि क्या शिक्षा मंत्रालय के मौखिक आदेश पर और कार्यपरिषद के सदस्यों से मोबाइल पर स्वीकृति लेकर बैठक बुलाई जा सकती है। जानकारों का कहना है कि ऐसा नहीं हो सकता। शिक्षा मंत्रालय का दखल अनावश्यक है और कुलसचिव को कार्यपरिषद की बैठक बुलाने का अधिकार नहीं है। अगर ऐसा है तो कुलपति की पूरी चयन प्रक्रिया ही संदिग्ध हो जाएगी। विश्वविद्यालय एक बार फिर से विवाद में घिर जाएगा। फाइल पर ये लिखना भी कि शिक्षा मंत्रालय के मौखिक आदेश पर ऐसा किया गया, भी कई प्रश्न खड़े करता है। 

विवादों के बारे में इस कारण चर्चा की गई क्योंकि इससे विश्वविद्यालय अपने मूल उद्देश्यों से भटकता रहता है। न तो शोध हो पाते हैं न ही किसी प्रकार का नैरेटिव बनाया जा सकता है। किसी भी संस्था में अगर उसका मुखिया नहीं होगा तो उसका अपने उद्देश्यों से भटकना स्वाभाविक है। प्रधानमंत्री मोदी निरंतर राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने के लिए प्रयासरत हैं, शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान भी गंभीरता से इसके क्रियान्वयन में लगे हैं लेकिन सिस्टम या कोई अदृष्य शक्ति बाधा बन रही है। महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय ही नहीं बल्कि शिमला का भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान भी कई वर्षों से स्थायी निदेशक की बाट जोह रहा है। कभी किसी तो कभी किसी कुलपति को प्रभार दे दिया जाता है। कई और केंद्रीय विश्वविद्यालय में कुलपति के पद खाली हैं। होना ये चाहिए कि जब किसी कुलपति या निदेशक के कार्यकाल का छह महीना शेष रहे तो नए कुलपति या निदेशक की चयन प्रक्रिया आरंभ कर दी जाए। ऐसा होने से प्रशासनिक और अकादमिक निरंतरता बनी रहती है। जैसे केंद्र सरकार में जब कोई सचिव अवकाश प्राप्त करनेवाला होता है तो उनका स्थान लेने वाले व्यक्ति को विशेष कार्याधिकारी बनाकर वहां पदस्थ कर दिया जाता है। व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहती है। कुलपतियों की नियुक्ति में भी ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है। कहा जा सकता है कि इस बार लोकसभा चुनाव के कारण देरी हुई लेकिन जहां सालभर और तीन वर्ष से नियुक्ति टल रही है उससे तो बचा सकता था। शिक्षा और संस्कृति मंत्रालयों के अधीन चलनेवाली संस्थाओं में नियुक्तियों में तुलनात्मक रूप से अधिक देरी क्यों होती है, इसपर विचार करना बहुत आवश्यक है।  

अगर हमें अपने देश में विश्वस्तरीय शिक्षा संस्थान बनाना है तो इन प्रशासनिक कार्यों की चूलें कसनी होंगी। शिक्षा के क्षेत्र में विशेषकर उच्च शिक्षा में संस्थानों में संसाधन की कमी बिल्कुल नहीं है, कमी है तो बेहतर प्रशासन की, बेहतर समन्वय की। राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा के चार वर्ष हो गए लेकिन अबतक स्कूली शिक्षा के अनुकूल सारी पुस्तकें तैयार नहीं की जा सकी हैं। कबतक होंगी ये भी ज्ञात नहीं हो सकता है। राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद का पुस्तकें तैयार करने का दायित्व है। अगर हम शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षण और शोध का स्तर बढ़ाना चाहते हैं तो उसको राजनीति और अफसरशाही के शिकंजे से भी मुक्त करना होगा। कुलपतियों को हमारे देश में बहुत अधिक अधिकार हैं लेकिन कम ही कुलपति ऐसे हैं जो शोध और शिक्षा के स्तर को बढ़ाने के लिए प्रयासरत दिखते हैं। इस बारे में भी एक मैकेन्जिम बनाया जाना चाहिए जिससे ये पता चल सके कि अमुक उच्च शिक्षा संस्थान में कितने नवाचर हुए, कितने नए विषयों के बारे में शोध हुए। हो ये रहा है कि अधिकतर विश्वविद्यालय आयोजनों में लगे हैं। सेमिनार आदि अगर नए विषय और ज्ञान की खोज के लिए हों तो संस्थान की प्रतिष्ठा बढ़ती है। अगर कार्यक्रम का उद्देश्य सिर्फ आयोजन करवा कर गितनी बढञना हो तो उससे कुछ हासिल नहीं होता सिर्फ करदाताओं के पैसे की बर्बादी होती है। विकसित भारत के लिए शिक्षा के क्षेत्र में भी ठो काम करने होंगे। 


Friday, August 16, 2024

शानदार किस्सागो का जाना


दिल्ली के विज्ञान भवन में गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन होना था। एक दिन अचानक उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने शिखर सम्मेलन के संयोजक नटवर सिंह से पूछा कि क्या गुटनिरपेक्ष देशों के राष्ट्राध्यक्षों और प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों को एशियाड विलेज के फ्लैट्स में रखा जा सकता है? नटवर सिंह ने छूटते ही कहा कि ये कैसे संभव है। इंदिरा गांधी ने अपनी गंभीर आवाज में कहा कि आप इस संभावना को तलाशिए और रिपोर्ट करिए। इंदिरा गांधी ने राजीव गांधी, पीसी एलेक्जेंडर, जी पार्थसारथी और उस समय के दिल्ली के एलजी जगमोहन को एशियाड विलेज जाकर सुविधाओं को जायजा लेने का हुक्म दिया। सबलोग एशियाड विलेज पहुंचे। फ्लैट्स आदि देखने के बाद न तो एलेक्जेंडर कुछ बोल रहे थे न ही जगमोहन। सब राजीव गांधी के बोलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। पार्थसारथी ने कहा कि एशियाड विलेज के फ्लैट्स में विदेश मंत्रियों को रुकवाया जा सकता है। नटवर सिंह इसके लिए राजी नहीं थे। राजीव कुछ बोल नहीं रहे थे। कोई फैसला नहीं हो पा रहा था। दरअसल राजीव गांधी के कुछ दोस्तों ने विदेशी अतिथियों को एशियाड विलेज में रुकवाने का आयडिया दे दिया था। उन्होंने इंदिरा जी को। बात फैलने लगी थी कि विदेशी प्रतिनिधिमंडल को एशियाड विलेज में रुकवाया जाएगा। ये बात उन देशों के राजदूतों तक भी पहुंची। उनमें से कइयों ने नटवर सिंह को स्पष्ट कर दिया कि अगर ऐसा होगा तो कोई नहीं आएगा। बात इंदिरा जी तक पहुंची और मामला किसी तरह से टला। 

इस तरह के सैकड़ों दिलचस्प किस्से नटवर सिंह के पास थे। जब भी आप उनसे उनके दिल्ली के जोरबाग वाले घर में मिलते और वो मूड में होते तो किस्सों का दौर आरंभ हो जाता। उनकी स्मरण शक्ति इतनी तेज थी और घटनाओं का वर्णन इतने दिलचस्प अंदाज में करते थे कि आप घंटों उनको सुन सकते थे। एक बार अपने घर पर हुई मुलाकात नें उन्होंने ऐसा ही एक किस्सा सुनाया था जो इंदिरा गांधी, फिडेल कास्त्रो और यासिर अराफात से जुड़ा था। 1983 में दिल्ली में गुट निरपेक्ष शिखर सम्मेलन के दौरान फिलीस्तीनी नेता यासिर अराफात इस बात से नाराज हो गए कि उनको सम्मेलन में जार्डन के राजा के बाद बोलने का अवसर मिला। इसको अराफात ने अपना अपमान माना और सम्मेलन छोड़कर वापस लौटने की बात की। नटवर सिंह ने तुरंत इंदिरा गांधी को सूचित किया। इंदिरा गांधी ने फिडेल कास्त्रो से बात की। इंदिरा और कास्त्रो दोनों फौरन विज्ञान भवन पहुंचे और अराफात को लेकर एक कमरे में गए। यासिर गुस्से से लाल पीले हो रहे थे। कास्त्रो और इंदिरा गांधी ने उनकी बातों को थोड़ी देर तक सुना। कास्त्रो ने अराफात से पूछा कि आप इंदिरा को अपना दोस्त समझते हो। गुस्से में अराफात ने कहा कि ये दोस्त नहीं मेरी बड़ी बहन है। इतना सुनते ही फिडेल बोले कि फिर छोटे भाई की तरह बर्ताव करिए और चुपचाप दोपहर के सत्र में शामिल होइए। एक बड़ा कूटनीतिक मसला हल हो गया। नटवर सिंह के निधन से दिल्ली में रहनेवाला एक बड़ा किस्सागो चला और साथ चली गईं उनकी स्मृतियों में बसी घटनाएं।    


Saturday, August 10, 2024

लोकतंत्र की आड़ में हित साधती शक्तियां


हमारे पड़ोसी देश बंगलादेश में हिंसक आंदोलन के बाद वहां की प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा। ये सबकुछ एक के बाद एक घटना की परिणति रहा। उसके बाद जिस तरह से नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त सामाजिक कार्यकर्ता और बैंकर मोहम्मद यूनुस की अगुवाई में सरकार बनी उससे कई प्रश्न खड़े हो गए। जब शेख हसीना ने देश छोड़ा था, तब सभी विशेषज्ञ इस मत के थे कि बंगलादेश में सेना ही सत्ता सेना संभालेगी। लोकतंत्र को फिर से स्थापित करने में समय लगेगा। उनके अनुमानों के विपरीत मोहम्मद यूनुस की अगुवाई में कार्यवाहक सरकार का गठन हो गया। मंत्री बन गए। सबने शपथ ले ली। कार्य आरंभ हो गया। क्या सबकुछ इतना आसान था। क्या इसकी बिसात पहले से नहीं बिछाई गई थी। बंगलादेश में कट्टरपंथी काफी समय से सक्रिय थे और जमात ए इस्लामी इसकी अगुवाई कर रहा था। पहले तो जमात के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा और फिर इस संगठन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया। आरोप शेख हसीना पर लगे और कहा जाने लगा कि वो तानाशाह हो गई है। वो विरोधियों को जेल भेज देती है। आज जो मोहम्मद यूनुस सरकार के कार्यवाहक प्रमुख हैं उनपर भी बंगलादेश में कई मुकदमे चल रहे हैं। एक मामले में तो उनको छह महीने की सजा भी हो चुकी है। इन सब मामलों को लेकर शेख हसीना सरकार के खिलाफ वातावरण बनाया गया। वातावरण बनाने में विदेश से सक्रिय संगठनों और इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म की बड़ी भूमिका रही। खास तौर पर उन संस्थाओं और संगठनों की जो अमेरिका से अपना कारोबार चलाते हैं। बंगलादेश में जिस तरह से माहौल बनाया गया उसी तरह का माडल कई अन्य देशों में भी देखा जा चुका है। इस माडल में होता ये है कि अगर उनकी पसंद की सरकार नहीं बनी तो उसको बदलने के लिए ये संस्थाएं अपना अलगोरिदम बदल देती हैं। सरकार के विरोध वाली पोस्ट अधिक दिखती हैं और समर्थन वाली पोस्ट को बाधित कर देते हैं। किसी एक छोटी घटना को इतना बड़ा कर दिया जाता है कि जनमत सरकार के विरोध में हो जाती है। पर ये तो किसी के हाथ के औजार भर हैं। 

योजना इस तरह से बनाई जाती है कि पहले इंटरनेट मीडिया के माध्यम से देश में सत्ता विरोधी माहौल बनाया जाए। माहौल बनाने के लिए चौतरफा व्यूह रचना की जाती है। किसी छोटे केस को इतना प्रचारित करवाया जाए कि लगे देश के सामने वही सबसे बड़ा मुद्दा है। फिर किसी नेता से उस घटना के विरोध में बयान दिलवाया जाता है। शासक को तानाशाह बताकर उसकी छवि गढ़ने का प्रयत्न किया जाता है। डिजीटल के माध्यम से इस तरह के बयानों को प्रसारित और प्रचलित करवा कर इस छवि को गाढ़ा करवाया जाता है। लोकतंत्र को बचाने की आड़ में ये सारा खेल खेला जाता है। अंतत:  इस तरह की कथित क्रांतियों से लोकतंत्र कमजोर ही होता है। हमें अरब स्प्रिंग को याद करना चाहिए। 2010 के आसपास मध्यपूर्व और उत्तरी अफ्रीका के देशों में अरब स्प्रिंग का खेल हुआ। इस क्षेत्र में कुछ देशों की सरकारों के मुखिया को तानाशाह बताकर डिजीटल के माध्यम से उनको गिराने की व्यूह रचना कि गई। 17 दिसंबर 2010 में ट्यूनीशिया में हुई घटना को याद करने की आवश्यकता है। एक ठेलेवाले के साथ हुए व्यवहार के कारण विरोध का स्वर उठा और पूरे देश में इतनी तेजी से फैला कि वहां के राष्ट्रपति को 14 जनवरी 2011 को देश छोड़कर भागना पड़ा। उसके बाद देश में लोकतंत्र की स्थापना के नाम पर तरह तरह की बातें होती रही। कभी कोई कार्यवाहक बना तो कभी कोई। सालभर तक ये सब चला रहा और फिर एक मानवाधिकार कार्यकर्ता को राष्ट्रपति बनाया गया। फिर वहां इस्लामिक कट्टरपंथियों, कथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों और अरब स्प्रिंग के पहले के राष्ट्रपति के समर्थकों में संघर्ष आरंभ हुआ। अबतक चल रहा है। कभी समय पर चुनाव हो जा रहे हैं कभी नहीं। लोकतंत्र स्थापित करने के नाम पर जो हुआ वो सबके सामने है। 

ये सिर्फ ट्यूनीशिया की कहानी नहीं है। ऐसा कई देशों में हुआ। सब जगह सत्ता परिवर्तन की स्क्रिप्ट एक जैसी है। हमार देश में 2024 के चुनाव में जिस तरह से चुनाव प्रचार के दौरान इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स ने अपना अलगोरिथम बदला, जिस तरह से मोदी विरोधियों को प्रमुखता मिली वो एक अलग शोध की मांग करता है। डिजीटल और सोशल सेक्टर को साथ लेकर जिस तरह से सरकार बनाने और गिराने का अंतराष्ट्रीय खेल खेला जाता है उसके बारे में सार्वजनिक रूप से चर्चा होनी चाहिए। रूस-यूक्रेन युद्ध के आरंभ होने क बाद पश्चिमी देशों को और दुनिया की महाशक्ति होने का दावा करनेवाले देशों को भारत का स्थायित्व और उसकी वैश्विक मंच पर बढ़ती धमक गले नहीं उतर रही थी। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि भारत का विदेश मंत्री पश्चिम को कहे कि यूरोप की समस्या पूरी दुनिया की समस्या नहीं हो सकती। भारत अपने निर्णय के लिए अपनी जनता का हित देखने लगा था, पश्चिम का मुंह जोहना छोड़ दिया था। परिणाम 2024 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिला। नरेन्द्र मोदी को तानाशाह बताया गया। नागरिक अधिकारों की कटौती औक संविधान बदलने जैसे विमर्श आरंभ हुए। मोदी भले ही बहुमत से दूर रह गए लेकिन सरकार बदलने का मंसुबा पाले बैठी वैश्विक ताकतों को मुंह की खानी पड़ी। अभी अमेरिकी चुनाव को देख लीजिए तो वहां कमला हैरिस जिस तरह के बयान दे रही हैं उससे मिलते जुलते बयान यहां भी लोकसभा चुनाव के समय सुनाई देते थे। 

ऐसा नहीं है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ये वैश्विक ताकतें निष्क्रिय हो गई हैं। हमारे देश में वो अब भी सक्रिय हैं। सरकार विरोधी माहौल बनाने में जुटी हैं। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। इन वैश्विक ताकतों को लगता है कि भारत को कमजोर करने का यही तरीका है कि चुनी हुई सरकार के खिलाफ जनता में आक्रोश पैदा करो। इसके लिए वो छात्रों का, अदालतों का, नीति निर्धारकों का सहारा लेते हैं। अभी बंगलादेश में मोहम्मद यूनुस को स्थापित करने के लिए अमेरिका के सामाजिक कार्यकर्ता, कुछ सीनेटर और विचारक एक्स पर अपनी राय रख रहे हैं। उनकी पोस्ट को पढ़ने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि मोहम्मद यूनुस बंगलादेश के उद्धारक हैं। दरअसल अमेरिका और अन्य वैश्विक ताकतों को दुनिया के अन्य देशों में अपनी चौधराहट स्थापित करने के लिए ये सब करना पड़ता है। वो चाहते हैं कि अन्य देशों की सरकार उनके मुताबिक चले। उनके व्यापारिक और सामरिक हितों की रक्षा होती रहे। किसी देश में अंदरुनी गड़बड़ी होगी तो उनको दखल देने का अवसर मिलेगा। चाहे वो इराक हो, लीबिया हो,सुडान हो या अन्य देश। पाकिस्तान चूंकि अब उनके किसी काम नहीं रहा तो इन शक्तियों ने बंगलादेश को अपना नया ठिकाना बनाने की योजना पर कार्य किया। लोकतंत्र के नाम पर चलनेवाले इन कथित आंदोलनों के अगुवा इन वैश्विक शक्तियों के हाथों की कठपुतली मात्र हैं। कठपुतलियां वही करती हैं जो उनकी डोर थामनेवाला चाहता है। बंगलादेश से लेकर भारतीय राजनीति में इस तरह की कई कठपुतलियां दिख रही हैं। 


Sunday, August 4, 2024

परिवार परंपरा को स्थापित करती फिल्म


देश में 1991 में आर्थिक उदारीकरण का दौर आरंभ हुआ तो उसने अर्थव्यवस्था के अलावा समाज पर भी गहरा प्रभाव छोड़ा था। उदारीकरण के कारण विदेशी फिल्में और सीरियल्स भी सुलभ हुए। इससे पश्चिम की खिड़की खुली। वहां की संस्कृति से परिचय हुआ। भारतीय मनोरंजन जगत पर भी प्रभाव पड़ा। पश्चिम को आधुनिक बताने का विमर्श आरंभ हुआ। परिणाम ये हुआ कि हमारा समाज संयुक्त परिवार से एकल परिवार की ओर बढ़ा। खान-पान, वेशभूषा में परिवर्तन दिखने लगा। हिंदी सिनेमा भी इससे अछूता नहीं रहा। नायिकाओं के कपड़े पश्चिम की तर्ज पर बनने लगे। कहना ना होगा कि समाज और सिनेमा दोनों जगह पश्चिम का अंधानुकरण आरंभ हुआ। ऐसे में 1994 में एक फिल्म आती है, हम आपके हैं कौन। यह फिल्म न केवल व्यावसायिक रूप से सफल हुई बल्कि इसने भारतीय परिवार परंपरा को स्थापित भी किया। सूरज बड़जात्या ने इस फिल्म को लिखा और निर्देशित किया। बड़जात्या परिवार पारिवारिक फिल्में बनाने के लिए ही जाने जाते हैं। फिल्म हम आपके हैं कौन में जिस प्रकार से विवाह, गोदभारई की रस्मों को दिखाया गया उसने भारतीय जनमानस को गहरे तक प्रभावित किया। इस फिल्म की नायिका माधुरी दीक्षित ने जिस तरह से चुलबुली लड़की निशा का अभिनय किया या जिस तरह से इन रस्मों में अपनी भागीदारी की उसने इन रस्मों को हिंदू परिवारों में स्थापित कर दिया। शादियों में वर का जूता छुपाना और साली का अपने होनेवाले जीजा से जूते के बदले पैसे की मांग करना, वर पक्ष के लड़कों का जूता खोजना फिर वर और दोनों पक्षों में नोंक-झोंक होना, ये इस फिल्म की विशेषता के तौर पर रेखांकित की गई। माधुरी दीक्षित ने तब एक इंटरव्यू में इस बात को स्वीकार भी किया था कि ये फिल्म दर्शकों को अपनी जड़ों की ओर लौटने के लिए प्रेरित करती है, पूरे परिवार का साथ रहने और जीने की सीख भी देती है। 

अगर इस फिल्म पर विचार करें तो इसमें न तो कोई खलनायक है, न ही मार-पीट, खून खराबा है, न ही गोलियों की तड़तड़ाहट है। इस फिल्म में है कर्णप्रिय संगीत और गाने। लता मंगेशकर के स्वर में माय नि माय और लता और एस पी बालासुब्रह्ण्यम का युगल गीत दीदी तेरा देवर दीवाना बेहद लोकप्रिय हुआ था। वर्षों तक और अब भी शादी के समय ये गीत अवश्य सुनाई पड़ जाते हैं। फिल्म निर्माण के समय जब ये बात सामने आई कि इस फिल्म में 14 गीत हैं तो फिल्मों के जानकार ने इसको बहुत ज्यादा बताया था। लेकिन दर्शकों ने इन सुरीले गानों को हाथों हाथ लिया था। गानों के अलावा इस फिल्म ने भारतीय वेशभूषा को स्थापित किया। आप याद कीजिए हम आपके हैं कौन में माधुरी दीक्षित ने जो बैंगनी रंग की कढाई की गई साड़ी पहनी थी वो कितनी लोकप्रिय हुई थी। साड़ी के साथ डोरी वाला मैचिंग बैकलेस ब्लाउज और कुंदन का भारी नेकलेस। साड़ी पहनने का माधुरी का अंदाज यानि सीधा पल्लू । यह अनायास नहीं था कि इस फिल्म के पोस्टर पर माधुरी दीक्षित को इसी साड़ी में दिखाया गया था। अब भी वो रंग, उस पर की गई कढ़ाई, बैकलेस डोरी वाला ब्लाउज विवाह समारोह के समय महिलाओं की पहली पसंद बनी हुई है। हम आपके हैं कौन फिल्म से माधुरी ने अपनी भारतीय नारी की छवि को पुख्ता तो किया ही पश्चिम वेशभूषा के बढ़ते चलन पर ब्रेक लगाई। इस फिल्म में भारतीय पारिवारिक मूल्यों को भी इस तरह से दिखाया गया है कि दर्शक प्रभावित हो सकें। गोदभराई की रस्म के बाद निशा की भूमिका निभा रही माधुरी दीक्षित की बड़ी बहन पूजा एक दुर्घटना का शिकार हो जाती है। परिवार में तय होता है कि पूजा के छोटे बच्चे की खातिर निशा का विवाह पूजा के पति से करवा दिया जाए। पूजा तैयार हो जाती है लेकिन नाटकीय घटनाक्रम में पूजा और प्रेम का विवाह हो जाता है। पूजा और प्रेम पहली ही मुलाकात से एक दूसरे की तरफ आकर्षित हो गए थे। भाभी की बहन से प्यार की कहानियां भी भारतीय समाज में बहुत सुनी जाती रही हैं। कुल मिलाकर अगर कहा जाए तो हम आपके हैं कौन संयुक्त परिवार की अवधारणा को मजबूत करती है। इस फिल्म के दृष्य, इसकी संवाद अदायगी, नायिकाओं के कपड़े और आभूषण, उनको पहनने का तरीका, गीत, संगीत सभी का एक ऐसा आकर्षक कोलाज था जिसने भारतीय दर्शकों को अबतक अपने मोहपाश में बांध रखा है। 


Saturday, August 3, 2024

सरकार और संगठन का द्वंद्व पुराना


इन दिनों उत्तर प्रदेश की राजनीति में संगठन बड़ा या सरकार को लेकर खूब चर्चा हो रही है। उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव मौर्य के बयान कि सरकार से संगठन बड़ा होता है, के बाद ये चर्चा तेज हो गई थी। उनके बयान के इस वाक्य की अलग अलग तरीके से व्याख्या की गई। इसको सरकार और संगठन के बीच मनमुटाव के तौर पर भी रेखांकित किया गया। राजनीतिक विश्लेषकों ने लोकसभा चुनाव परिणाम में भारतीय जनता पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिलने से जोड़कर इसकी व्याख्या प्रस्तुत की। सरकार और संगठन के बीच चल रही इस चर्चा के बीच उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो सत्यकाम ने पुरुषोत्तम दास टंडन की जयंती पर एक व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया। उस व्याख्यान की तैयारी के सिलसिले में जानकारी जुटाने के क्रम में एक टंडन और नेहरू ने जुड़ा एक बेहद रोचक प्रसंग मिला। वो प्रसंग भी सरकार और संगठन से जुड़ता है। स्वाधीनता के बाद 1950 में कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव होना था। पुरुषोत्तम दास टंडन कांग्रेस के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार होना चाहते थे। जबकि उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू नहीं चाहते थे कि पुरुषोत्तम दास टंडन कांग्रेस के अद्यक्ष बनें। टंडन अपनी उम्मीदावरी को लेकर अडिग थे। वो नेहरू की मुसलमानों की तुष्टीकरण की नीति को लेकर न केवल असहमत थे बल्कि उसका खुलकर विरोध भी करते थे। नेहरू ने कई नेताओं के जरिए टंडन को संदेश भिजवाया कि वो अध्यक्ष पद से अपनी उम्मीदवारी वापस ले लें। टंडन को सरदार पटेल से लेकर अन्य प्रदेशों के संगठन का समर्थन था। वो किसी भी कीमत पर अपनी उम्मीदावरी वापस लेने को तैयार नहीं थे। नेहरू को निरंतर ये संदेश मिल रहा था कि टंडन अपनी उम्मीदावरी वापस नहीं लेंगे। 

इस बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने इस मसले को सार्वजनिक करने का निर्णय लिया। उन्होंने 8 अगस्त 1950 को एक पत्र टंडन को लिखा। इस पत्र के टंडन तक पहुंचते ही सरकार और संगठन के बीच का झगड़ा सार्वजनिक हो गया। नेहरू ने जो पत्र लिखा था उसमें उन्होंने टंडन को नसीहत दी थी। नेहरू ने लिखा था कि इस वक्त कांग्रेस बुरे दौर से गुजर रही है और उसको अगर फिर से पार्टी में उर्जा का संचार नहीं किया गया तो इसकी बुरी हालत हो सकती है। पार्टी आतंरिक कलह से जूझ रही है और पार्टी नेताओं की लालसा बढ़ती जा रही है। नेहरू ने अपने पत्र में आगे लिखा कि ऐसा प्रतीत होता है कि आपको लगता है कि मैं जो कुछ कर और कह रहा हूं वो गलत है। मैं भी आपके भाषणों के बारे में सुनता और पढ़ता हूं और मेरा ये विश्वास दृढ़ होता जाता है कि आप भारत में उन ताकतों का समर्थन कर रहे हैं जो देश के लिए ठीक नहीं हैं। मुझे लगता है कि इस समय देश के सामने जो चुनौतियां हैं उसमें पार्टी में एकता आवश्यक है। हमें मुसलमानों की समस्याओं पर एकजुट होकर न सिर्फ विचार करना चाहिए बल्कि उनको सुलझाने का प्रयास भी करना चाहिए। हम ऐसा तो नहीं ही कर पा रहे हैं बल्कि अल्पसंख्यकों के प्रति पाकिस्तान के कदमों की आड़ में असहिष्णुता दिखा रहे हैं। अफसोस है कि आप उस जमात को समर्थन कर रहे हैं जो सांप्रदायिक है। नेहरू के इस पत्र के बाद संगठन में खेमेबंदी और तेज हो गई। जो बातें अबतक पार्टी में चल रही थीं वो खुलकर सामने आ गई। टंडन मजबूती के साथ अपनी उम्मीदवारी पर अड़े रहे। नेहरू को इस बात का अनुमान होने लगा था कि कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में उनका खेमा कमजोर पड़ रहा है। पटेल समेत दक्षिण के कई नेता टंडन के समर्थन में थे।  

अब जवारलाल नेहरू के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया क्योंकि उन्होंने तो सार्वजनिक रूप से टंडन की उम्मीदवारी का विरोध कर दिया था। अध्यक्ष का चुनाव उनकी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था। जवाहरलाल नेहरू ने टंडन के विरोध नें जे बी कृपलानी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया था। अब नेहरू ने एक ऐसा दांव चला जिसकी कल्पना उस समय के कांग्रेस के नेताओं को नहीं था। उन्होंने घोषणा कर दी कि अगर टंडन जीत जाते हैं तो वो उनकी अध्यक्षता वाली कांग्रेस कार्य समिति में किसी कीमत पर नहीं रहेंगे। नेहरू की इस घोषणा के बाद इस बात की चर्चा होने लगी थी कि संगठन बड़ा या सरकार। यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि ये सब तब हो रहा था जब देश को स्वाधीन हुए लगभग तीन वर्ष हुए थे। विभाजन की विभीषिका का दंश पूरा देश झेल रहा था। पुरुषोत्तम दास टंडन विभाजन का दंश झेल रही बहुसंख्यक हिंदू जनता के पक्ष में खड़े थे। वो निरंतर उनकी समस्याओं को उठा रहे थे और मुसलमान और उनके समर्थक नेताओं को प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर रहे थे। मुसलमान नेताओं पर उनके प्रहार से नेहरू नाखुश थे लेकिन कांग्रेस में टंडन का समर्थन बढ़ता जा रहा था। गोविंद वल्लभ पंत ने भी टंडन का समर्थन कर दिया था। तत्कालीन मैसूर प्रांत के मुख्यमंत्री के हुनुमंथैय्या ने तो पत्र लिखकर टंडन को समर्थन दिया था। अपने पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया था कि नेहरू सरकार ने स्वाधीन भारत के लिए जो राह चुनी है उससे वो असहमत हैं और चाहते हैं कि टंडन और पटेल मिलकर भारत को एक ऐसा नेतृत्व प्रदान करें जो नेहरू की नीतियों से पृथक हो। 

नेहरू की तमाम कोशिशों के बावजूद पुरुषोत्तम दास टंडन ने उनके उम्मीदवार जे बी कृपलानी को संगठन चुनाव में पराजित कर दिया। ये कृपलानी की हार से अधिक नेहरू की हार थी। टंडन की जीत के बाद नेहरू बेहद खफा हुए थे। पर न तो उन्होंने सरकार में पद छोड़ा था और न ही कांग्रेस कार्य समिति की सदस्यता। कार्य समिति में वो टंडन के निर्णयों पर निरंतर प्रश्न चिन्ह लगाते रहते थे। उन्होंने अपनी हार के लिए सरदार पटेल और हनुमंथैय्या को भी जिम्मेदार माना था और दोनों के विरुद्ध लगातार काम करने लगे थे। टंडन करीब एक वर्ष से कुछ अधिक समय तक पार्टी के अध्यक्ष रहे पर नेहरू ने उनके खिलाफ ऐसा माहौल बनाया कि उन्हें आखिरकार इस्तीफा देना पड़ा। उन्होंने नेहरू की राजनीतिक चालों को समझते हुए भी पद छोड़ दिया था। वो नहीं चाहते थे कि सरकार और संगठन के बीच निरंतर हो रहे झगड़े के कारण पार्टी की छवि खराब हो। पहले आमचुनाव में पार्टी को नुकसान हो। टंडन के इस्तीफे के बाद नेहरू खुद पार्टी के अध्यक्ष बने। लंबे समय तक प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष दोनों पद पर रहे। 

टंडन ने ये साबित किया था कि संगठन सरकार से बड़ा होता है लेकिन नेहरू ने टंडन को घेरकर इस्तीफा करवाकर ये दिखा दिया कि सरकार संगठन से बड़ा होता है। कालांतर में नेहरू ने पार्टी पर भी अपना दबदबा कायम कर लिया और अपनी मर्जी के अध्यक्ष बनवाते रहे। टंडन पर दबाव बनाकर नेहरू ने इस्तीफे तो ले लिया लेकिन पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र समाप्त होने की राह भी खोल दी।   


Saturday, July 27, 2024

मानवीय संबंधों-मूल्यों का कोलाज


आज से बासठ वर्ष पहले एक फिल्म आई थी, साहिब, बीबी और गुलाम। विमल मित्र के उपन्यास पर आधारित इस फिल्म को गुरुदत्त ने बनाया था। जब ये फिल्म प्रदर्शित हुई थी तो इसको अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। दर्शकों ने बहुत पसंद नहीं किया लेकिन समीक्षकों ने इस फिल्म की बहुत प्रशंसा की थी। इसको समय से आगे की फिल्म बताया गया था । बहुत हद तक यह बात सही भी है। गुरुदत्त ने इस फिल्म में ‘छोटी बहू’ के चरित्र के माध्यम से स्त्री के सेक्सुअल डिजायर को पर्दे पर चित्रित किया था। आज से छह दशक पहले इस तरह के विषयों को फिल्मी पर्दे पर उतारने की बात सोच पाना भी मुश्किल था। गुरुदत्त ने सोचा भी और किया भी। छोटी बहू के रूप में मीना कुमारी ने जब शादी करके जमींदार चौधरी के परिवार में हवेली में प्रवेश करती है तो उसकी पहचान बदल जाती है। उसका नाम हवेली की देहरी के बाहर रह जाता है और वो बन जाती है छोटी बहू। जिससे ये अपेक्षा की जाती है कि वो जमींदार चौधरी खानदान की स्त्रियों की तरह हवेली की चौखट के अंदर ही रहे। वो रहती भी है। परिवार और विवाह को निभाने के लिए सारे जतन करती है। पति पर पूरा भरोसा करती है लेकिन उसका जमींदार पति कहता है कि चौधरियों की काम वासना को उनकी पत्नियां कभी तृप्त नहीं कर सकती हैं। यह सुनकर छोटी बहू के अंदर कुछ दरकता है। वो पति का ध्यान आकृष्ट करने के लिए तमाम तरह के जतन करती है। स्त्री यौनिकता के बारे में भी पति से खुल कर बात करती है जिसमें उसकी स्वयं की संतुष्टि की अपेक्षा भी शामिल है। इन दृष्यों को साहब बीबी और गुलाम में जिस संवेदनशीलता के साथ फिल्माया गया है उसको रेखांकित किया जाना चाहिए। पहले भी कुछ लोगों ने इसपर चर्चा की होगी। 

इस तरह के विषय आज सामान्य लग सकते हैं। लेकिन 1962 की फिल्म में नायिका के संवाद में आता है कि मर्दानगी की डींगे हांकने के बावजूद छोटे बाबू नपुंसक हैं। इस संवाद और दृष्य को उस समय के दर्शक पचा नहीं पाते। उनको झटका लगा था। आज ये सामान्य बात है। मिर्जापुर वेबसरीजीज में भी नायिका और उसके पति के बीच इस तरह के संवाद है। जिसका नोटिस भी नहीं लिया जाता। अभिनेता पंकज त्रिपाठी जिसने अखंडानंद त्रिपाठी का अभिनय किया है और उसकी पत्नी बीना त्रिपाठी की भूमिका निभाने वाली रसिका दुग्गल के बीच भी कुछ दृश्यों में साहिब बीबी और गुलाम के छोटे बाबू और छोटी बहू जैसा संवाद है। यहां भी स्त्री कामोत्तजना से लेकर कामोद्वेग तक के दृष्य हैं लेकिन अब दर्शकों को झटका नहीं लगता है। दर्शक इन दृष्यों को और संवाद को सहजता के साथ लेता है। समाज बदल गया है। दर्शकों की मानसिकता बदल गई है। स्त्री यौनिकता पर समाज में खुलककर बात होने लगी है। जब गुरुद्दत ने ये सोचा था तब भारतीय समाज इस विषय पर सार्वजनिक रूप से चर्चा करने को तैयार नहीं था। विमल मित्र ने तो फिल्म के प्रदर्शन से वर्षों पहले अपने उपन्यास में ये सब लिख दिया था। माना जाता है कि साहित्य में जो विषय पहले आते हैं वो फिल्मों में बाद में आते हैं। उस समय का भारतीय समाज ऐसा था कि वो विवाह से बाहर के संबंध भी पर्दे पर देखना नहीं चाहता था। कम से कम साहब बीबी और गुलाम में तो ऐसा ही प्रतीत हुआ था। 

गुरुदत्त की फिल्में जब रिलीज होती थीं तो वो दर्शकों की प्रतिक्रिया जानने के लिए बेहद उत्सुक रहते थे। साहिब बीबी और गुलाम जब प्रदर्शित हुई तो उन्होंने अपने मित्र राज खोसला को फिल्म देखने के लिए भेजा। राज खोसला बांबे (अब मुंबई) के मिनर्वा सिनेमा में दोपहर का शो देखने के लिए पहुंचते हैं। दर्शकों की मिली-जुली प्रतिक्रिया होती है। फिल्म के उत्तरार्ध के एक दृश्य में गुरुदत्त अभिनीत पात्र भूतनाथ और छोटी बहू मीना कुमारी बग्घी में जा रही होती हैं। अचानक छोटी बहू अपना सर भूतनाथ की गोद में रख देती है। इस सीन पर दर्शकों की प्रतिक्रिया अच्छी नहीं होती। अगले दिन गुरुद्दत स्वयं फिल्म देखने पहुंचते हैं। उस दिन भी जब ये दृश्य पर्दे पर आता है तो दर्शक अपनी नाराजगी प्रकट कर देते हैं। सिनेमा हाल में बैठे- बैठे ही गुरुदत्त ये निर्णय लेते हैं कि इस दृष्य को फिल्म से हटाकर दूसरा दृष्य पिरोना है। वहीं से वो मीना कुमारी को फोन करके अगले दिन शूटिंग के लिए आने का आग्रह करते हैं। अगले दिन नया शूट होता है और फिल्म के सभी प्रिंट में उसको जोड़ा जाता है। इस बारे में गुरुदत्त ने 1963 में सेल्यूलाइड पत्रिका में लिखे अपने लेख कैश एंड क्लासिक्स में लिखा- विमल मित्र के उपन्यास पर साहिब, बीबी और गुलाम नाम से फिल्म बनाने को फिल्म समीक्षकों ने उचित तरीके से नहीं लिया। धर्म कर्म में आस्था रखनेवाली घरेलू महिला का अपने पति का दिल जीतने के लिए शराब पिते दिखाना बेहद जोखिम भरा निर्णय था। मेरे इस फैसले का प्रेस ने स्वागत किया था। दर्शकों की प्रतिक्रिया भी उत्साहवर्धक रही। इस फिल्म के प्रदर्शन पर बंबई के दर्शकों में केवल दो सीन को लेकर गुस्सा दिखा। पहला जब छोटी बहू आकर्षण में आकर अपना सर भूतनाथ की गोद में रख देती है और दूसरा सीन वो जिसमें वो अपने पति से कहती है कि मुझे शराब का घूंट पीने दो केवल अंतिम बार। मैंने छोड़ने का निश्चय किया है, पूरी तरह से छोड़ने का फैसला किया है। हमने दोनों सीन फिल्म से निकाल दिए।

साहिब बीबी और गुलाम एक असाधारण फिल्म है। इसका निर्देशन भले ही अबरार अल्वी ने किया है लेकिन इस पूरी फिल्म पर गुरुदत्त की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। असाधारण फिल्म असाधारण घटनाओं से बनती है। ये इस कारण कह रहा हूं कि इस फिल्म को लेकर गुरुदत्त की योजनाएं कुछ और थीं लेकिन नियति कुछ और ही मंजूर था। गुरुदत्त चाहते थे कि भूतनाथ की भूमिका शशि कपूर करें लेकिन वो संभव नहीं हो पाया। इस भूमिका के लिए विश्वजीत को भी संपर्क किया गया था पर वो भी नहीं आए। अंत में उन्होंने खुद ये भूमिका निभाई। इसी तरह से छोटी बहू को लेकर कई नायिकाओं के नाम पर विचार करने के बाद मीना कुमारी तय हुईं। इस भूमिका के लिए नर्गिस से भी गुरुदत्त ने संपर्क किया था। उन्होंने मना कर दिया। तब ये चर्चा हुई थी कि गुरुदत्त और सुनील दत्त के संबंघ ठीक नहीं होने के कारण नर्गिस ने इंकार किया। गुरुदत्त ने इस फिल्म के लिए लंदन में रह रहे अपने सिनेमेटोग्राफर मित्र जितेन्द्र आर्य की पत्नी छाया को तैयार कर लिया। वो लोग लंदन से मुंबई शिफ्ट भी हो गए। गुरुदत्त के सामने जब छोटी बहू के गेटअप में छाया की तस्वीरें आईं तो वो निराश हो गए और उनको मना कर दिया। इतना ही नहीं गुरुदत्त इस फिल्म का संगीत निर्देशन एस डी बर्मन से करवाना चाहते थे लेकिन वो अपनी बीमारी के कारण कर नहीं सके तो हेमंत कुमार को लिया गया। साहिर ने मना कर दिया तो शकील बदायूंनी से गीत लिखवाए गए। सिर्फ जब्बा की भूमिका के लिए वहीदा रहमान पहले दिन से तय थीं। जो टीम बनी उसने एक ऐसी फिल्म दी जो आज पूरी दुनिया में फिल्म निर्माण कला के लिए न सिर्फ देखी जाती है बल्कि छात्रों को दिखाकर फिल्म निर्माण की बारीकियां बताई भी जाती हैं। गुरुदत्त का छोटा जीवन मिला लेकिन उनकी दो फिल्में प्यासा और साहिब बीबी और गुलाम ने उनको अमर कर दिया। उनकी शैली को देखकर लोग कहा करते थे कि वो पर्दे पर कविता लिखते हैं।  


Saturday, July 20, 2024

हिंदू-मुसलमान के चक्रव्यूह में शासनादेश


उत्तर प्रदेश सरकार के एक आदेश की इन दिनों बहुत चर्चा है। कई विपक्षी दल और बयान बहादुर किस्म के नेता इस आदेश को समाज को बांटनेवाला बता रहे हैं। आदेश ये है कि कांवड़ यात्रियों के मार्ग में पड़नेवाले सभी दुकानों, ढाबों और ठेलों पर दुकान मालिक का नाम, रेट लिस्ट और दुकान मालिक का मोबाइल नंबर लिखना अनिवार्य कर दिया गया है। यह आदेश समान रूप से सभी दुकानों के लिए है। किसी जाति और मजहब के दुकानदारों के लिए नहीं। इस आदेश के बाद तथाकथित सेक्युलर ब्रिगेड को लगने लगा कि ये मुसलमानों को चिन्हित करने के लिए किया जा रहा है। जमीयत उलमा-ए-हिंद ने भी एक बयान जारी कर सरकार से इस फैसले को वापस लेने की मांग की है। जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने इस निर्णय को अनुचित, पूर्वाग्रह पर आधारित और भेदभावपूर्ण बताया है। उन्होंने अपने बयान में आगे ये भी कहा कि ये फैसला मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की घिनौनी साजिश है। अपने बयान में मदनी ने सभी धर्म के लोगों से अपील की है कि वो एकजुट होकर इसके विरुद्ध आवाज उठाएं। अब जरा निर्णय की बात कर ली जाए। खानपान व्यवसाय के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने 2006 में एक नियम बनाया था। उसको खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम कहा गया। इस अधिनियम के अनुसार प्रत्येक रेस्तरां या ढाबा संचालक को अपनी फर्म का नाम, अपना नाम और लाइसेंस संख्या लिखना अनिवार्य है। ग्राहक जागो अभियान के अंतर्गत भी इस बात की अनिवार्यता की गई थी कि हर प्रतिष्ठान पर उसके मालिक का नाम, पंजीयन संख्या और वहां की सेवाओं या वस्तुओं का रेट कार्ड लगाया जाएगा। तब किसी भी कोने अंतरे से इसके विरोध की आवाज नहीं आई थी। कारण कि तब तथाकथित सेक्यूलरों की सरकार थी। अब योगी आदित्यनाथ की सरकार है तो उनको घेरने के लिए इसका एक राजनीतिक औजार की तरह उपयोग हो रहा है। पुराने कानून को लागू करने से कैसे समाज में हिंदू-मुसलमान विभेद उत्पन्न हो जाएगा, ये समझ से परे है। 

स्वाधीनता के 75 वर्षों बाद भी अगर समाज में हिंदू और मुसलमान के बीच सिर्फ नाम जानने के बाद विभेद पैदा हो रहा है तो इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि हमने कैसा समाज बनाया। गंगा-जमुनी संस्कृति को नारे की तरह उपयोग करनेवालों को ये सोचना चाहिए कि इस कथित गंगा-जमुनी संस्कृति की नींव कितनी कमजोर थी जो सिर्फ नाम जान लेने से दरक जा रही है। नाम उजागर करने से मुसलमान चिन्हित कैसे हो जाएंगे। जमीयत के नेता इसको घिनौनी साजिश बता रहे हैं, लेकिन कैसे, ये नहीं बता पा रहे हैं। जहां तक नाम के सार्वजनिक करने का प्रश्न है तो नाम तो हर जगह सार्वजनिक होता है। किसी जिलाधिकारी के कमरे में जाइए तो उसकी मेज पर उसकी नाम पट्टिका रखी होती है। यहां तक कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की भी नेमप्लेट, जहां आवश्यक होता है, वहां लगाई जाती है। हर पुलिस आफिसर और सैनिक की वर्दी पर उसका नाम लगा होता है। नाम जान लेने से समाज के बंटने का तर्क बेहद सतही है। समाज को इस बात पर चिंता करनी चाहिए कि कुछ लोग हर बात को हिंदू-मुसलमान के चश्मे से देखने लगते हैं। 

शास्त्रीय संगीत की बात करें। क्या कभी भी उस्ताद बिस्मिल्ला खां की शहनाई को इस कारण से सुनना बंद किया कि वो मुसलमान हैं। किसी ने उस्ताद अल्लारखा खान से लेकर उस्ताद अलाउद्दीन खान, बड़े गुलाम अली खां, विलायत खां, बेगम अख्तर, रसूलन बाई जैसे दिग्गज कलाकारों के सम्मान में कोई कमी की। सबके नाम सार्वजनिक थे हैं और सभी कलाकार समान रूप से हिंदुओं को भी पसंद हैं। नाम को लेकर जो फिजूल की बातें हो रही हैं वो विरोध करनेवालों की मानसिकता को ही दर्शाते हैं। सवाल मुसलमान नाम का नहीं है मानसिकता का है, राजनीति का है। जिन मुस्लिम कलाकारों ने अपना नाम बदलकर हिंदू नाम रख लिए उनको भी हमारे देश की जनता ने इतना सम्मान और प्यार दिया जिसका हिसाब नहीं लगाया जा सकता है। आज भी जब सिनेमा के दमदार कलाकारों की बात होती है तो दिलीप कुमार का नाम लिया जाता है। युसूफ खान जब फिल्मों में आए तो दिलीप कुमार बन गए। लोगों को इस बात का पता भी चला लेकिन उनकी लोकप्रियता में किसी प्रकार की कमी नहीं आई। इसी तरह जब हमारे देश के दर्शकों को पता चला कि अभिनेत्री मीना कुमारी का नाम महजबीन बानो है तब भी कोई अंतर नहीं आया। मधुबाला भी मुमताज जहां बेगम देहलवी थीं लेकिन आज भी हिंदी फिल्मों की सबसे सुंदर अभिनेत्री के तौर पर समादृत है। इन सबके प्रशंसक हैं, न हिंदू न मुसलमान। दर्जनभर से अधिक मुसलमान अभिनेता और अभिनेत्रियों ने अपना नाम बदलकर हिंदू नाम रख लिया था। देश की जनता को पता भी चला लेकिन किसी को कुछ फर्क नहीं पड़ा। इसी तरह से शाहरुख खान या सलमान खान अपने मुस्लिम नाम और पहचान के साथ ही फिल्मों में आए लेकिन उनके नाम से न तो फिल्म हिट हुई न ही उनके नाम और मजहब को देखकर दर्शक फिल्म देखने गए। यहां तक कि 2002 के गुजरात के सांप्रदायिक दंगों के बाद आमिर खान एक पार्टी विशेष के एजेंडा को बढ़ाने के लिए एक्टिविस्ट बन गए थे लेकिन जनता ने न तो उनकी राजनीति देखी और न ही उनका नाम। देखा तो सिर्फ उनका काम। आज भी फैज से लेकर मीर तक की शायरी भारत में लोगों की जुबान पर है। तो फिर कैसी बात करते हैं कि दुकान पर मुस्लिम नाम लिखे होने के कारण हिंदू वहां नहीं जाएंगे। या दुकानों पर नाम लिखने का नियम लागू होने से मुसलमान इस देश में दोयम दर्ज के नागरिक हो जाएंगे।

जब भी हमारे देश में इस तरह की बातें होती है तो लगता है कि जो लोग धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदार होने का दावा करते हैं उनका सोच कितना संकुचित है। जो लोग इस तरह के नियमों से सामाजिक समरसता खत्म होने की बात करते हैं उनको न तो हिंदुओं पर भरोसा है न मुसलमानों पर विश्वास। दरअसल जबसे संविधान की प्रस्तावना में पंथनिरपेक्ष शब्द को अवैध तरीके से जोड़ा गया तब से ही सायास इस तरह का वातावरण बनाया गया जिससे हिंदुओं और मुसलमानों के बीच वैमनस्यता बढ़े। पिछले दस वर्षों से ये प्रवृत्ति और बढ़ी है। कांग्रेस और उसके इकोसिस्टम को ये लगता है कि मुसलमानों को इस तरह से डराकर ही अपने पाले में ला सकती है। उनका वोट एकमुश्त उनकी पार्टी को मिल सकता है। 2024 के चुनाव में हलांकि कांग्रेस पार्टी को सफलता नहीं मिली लेकिन मुसलमानों को एक वोटबैंक के तौर पर अपने गठबंधन में लाने में सफल रहे। अब उनके सामने इस वोटबैंक को अपने साथ बनाए रखने की चुनौती है। इस चुनौती से निबटने के लिए वो दुकानों पर नाम लिखने के सरकारी आदेश को राजनीति के टूल की तरह उपयोग कर रहे हैं। हिंदू मुसलमान में देश को उलझानेवाली इन कोशिशों से तात्कालिक रूप से वोट मिल सकता है, कहीं कहीं सत्ता भी लेकिन देश कहीं पीछे छूट जाएगा। इसके बारे में समाज को सोचना होगा।  

Saturday, July 13, 2024

हिटलर से बड़ा तानाशाह स्टालिन


लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद से फेसबुक पर हिंदी साहित्य से जुड़े लोगों ने ऐसा स्तरहीन विवाद छेड़ा हुआ है जिससे साहित्य जगत शर्मसार हो रहा है। सतही, व्यक्तिगत और अश्लील टिप्पणियों की भरमार है। लोग एक दूसरे से अपनी खुंदक में किसी भी हद तक जा रहे हैं। हिंदी साहित्य से जुड़े युवा और नवोदित वृद्ध पीढ़ी के अनेक लेखक व्यक्तिगत कुंठा का सार्वजनिक प्रदर्शन करते हुए स्ततरहीन टिप्पणियां कर रहे हैं। इन टिप्पणियों से साहित्य जगत बजबजा रहा है। आभासी दुनिया के इस घटिया वातावरण में जनवादी लेखक संघ (जलेस) से जुड़े संजीव कुमार ने फेसबुक पर बहुत ही चतुराई से एक बहस को आरंभ करने का प्रयास किया। चतुराई इस कारण कि उन्होंने हिटलर और स्टालिन की तुलना करने के लिए एक पुस्तक के अनुदित अंश का हवाला दिया। हिटलर और स्टालिन को लेकर अंतराष्ट्रीय स्तर पर कई बार बहस हो चुकी है और हर बार निष्कर्ष यही निकला था कि दोनों क्रूर तानाशाह थे। परंतु यह माना जाता है कि वैचारिक मुद्दे बीस साल बाद हर पीढ़ी के सामने अपने अपने तरीके से रखे जाने चाहिए। इससे युवाओं के विचारों को प्रभावित करने और उसको गढ़ने में मदद मिलती है। कम्युनिस्ट प्रचारक बहुधा इस प्रविधि का उपयोग करते रहते हैं। अब भी कर रहे हैं। परंतु संजीव की इस बात के लिए प्रशंसा करनी चाहिए कि फेसबुक पर साहित्य को लेकर जिस तरह की गंदगी हो रही है उसमें उन्होंने एक वैचारिक मुद्दा तो उठाया। संजीव कुमार की इस टिप्पणी पर जिस प्रकार की प्रतिक्रिया आ रही है वो भी निराश ही करती है। वामपंथ से जुड़े छोटे और मंझोले लेखकों की उनकी पोस्ट पर टिप्पणियों को पढ़कर लगता है कि वो लहालोट हो रहे हैं 

अब हिटलर और स्टालिन की तुलना पर आते हैं। संजीव ने अनुवाद का अंश लगाने के पहले एक टिप्पणी लिखी- एक ही सांस में हिटलर और स्टालिन दोनों का नाम लेना इन दिनों बहुत आम है। कई उदारपंथी बुद्धिजीवियों ने तो बीच में ठीक-ठाक कोशिश की कि नरेंद्र मोदी के प्रसंग में बार-बार याद किये जाने वाले हिटलर को स्टालिन से रिप्लेस कर दिया जाए। इसे देखते हुए आइजक डाटशर की किताब ‘स्टालिन: अ पोलिटिकल बायोग्राफी’ का एक हिस्सा बहुत दिनों से अनुवाद करके साझा करना चाहता था। टलते-टलते आज संयोग बना है। जो लोग आइजक डाटशर से परिचित न हों, उनके लिए इतना जानना काफी होगा कि वे एक पोलिश मार्क्सवादी थे जो 1932 में वहां की कम्युनिस्ट पार्टी से निष्कासित हुए। 1939 में इंगलैंड चले गए और फिर आजीवन आत्मारोपित निर्वासन में ही रहे। वे ट्रोट्स्की के मुरीद थे और तीन खण्डों में उन्होंने ट्रोट्स्की की जो जीवनी लिखी है, वह आधुनिक क्लासिक मानी जाती है उससे पहले, 1949 में उन्होंने स्टालिन की जीवनी लिखी जो, जाहिर है, काफ़ी आलोचनात्मक है। यह अंश उसी के आखिरी अध्याय से है। अनुवाद का अंश लंबा है लेकिन संजीव उसके बहाने ये साबित करना चाहते हैं कि हिटलर की क्रूरता विध्वंस के लिए थी जबकि स्टालिन की निर्माण के लिए। अनुवाद में कहा गया है कि हिटलर जिस जर्मनी को छोड़कर गया वो दरिद्र और वहशी था। वहीं स्टालिन के शासनकाल में रूस का विकास हुआ। अब जरा इसकी पड़ताल करनी चाहिए। आगे बढ़ने से पहले ये देख लेते हैं कि हिटलर का कालखंड क्या था और स्टालिन का क्या था। हिटलर 1933-1939 तक सत्ता में रहा। जबकि स्टालिन ने 1924 से 1953 तक सोवियत रूस पर राज किया। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि संजीव स्टालिन के संबंध में एक मार्क्सवादी लेखक का ही उद्धरण दे रहे हैं। 

असली कहानी तो इसी कालखंड में है। स्टालिन और हिटलर में कोई दुश्मनी नहीं थी। बल्कि कहा तो ये जाता है कि हिटलर ने बर्बरता के बहुत से तरीके जोसेफ स्टालिन से सीखे। जब हिटलर जर्मनी का चासंलर बना तबतक स्टालिन ने रूस में अपनी सत्ता की जड़ें काफी मजबूत कर ली थीं। दोनों एक दूसरे से बर्बरता और अधिकनायकवाद सीख रहे थे। अगर होलोकास्ट ब्रिटानिका को देखें तो पता चलता है कि 23 अगस्त 1939 में हिटलर और स्टालिन ने एक समझौता किया। इस समझौते पर जर्मनी और सोवियत रूस के विदेश मंत्रियों ने हस्ताक्षर किए। इस समझौते को हिटलर-स्टालिन समझौता कहा जाता है। हिटलर और स्टालिन के बीच हुए इस समझौते के दो भाग थे। एक भाग जो सार्वजनिक किया गया और दूसरे को गोपनीय रखा गया। जो भाग सार्वजनिक किया गया उसमें समझौता ये था कि दोनों देश एक दूसरे पर आक्रमण नहीं करेंगे। पर खतरनाक वो हिस्सा था जिसको उस समय गोपनीय रखा गया था। गोपनीय हिस्सा था पूर्वी यूरोप में दोनों देशों का दबदबा बनाना और पोलेंड का आपस में बंटवारा करना। ये समझौता दस वर्षों के लिए किया गया था और अगर दोनों में से किसी देश से आपत्ति नहीं आती तो अगले पांच वर्षों तक ये स्वत: बढ़ जाता । समझौते के एक ही सप्ताह बाद जर्मनी ने पोलैंड पर हमला कर दिया। युद्ध चल ही रहा था कि सोवियत रूस ने पूर्वी दिशा से पोलैंड पर हमला कर दिया। फिर दोनों ने गोपनीय समझौते के अनुसार पोलैंड को आपस में बांट लिया। कई इतिहासकार हिटलर को द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए जिम्मेदार मानते हैं लेकिन कुछ लोग हिटलर-स्टालिन समझौते को विश्वयुद्ध की जमीन तैयार करनेवाला बताते हैं क्योंकि इस समझौते के बाद ही सोवियत रूस ने फिनलैंड, लातिविया आदि पर कब्जा किया। इससे ये साबित होता है कि स्टालिन और हिटलर में सहमति थी। दोनों ने पूर्वी यूरोप को आपस में बांट लेने पर सहमति जताई थी और उसके लिए समझौता भी किया था। 

अब रही बात देश के निर्माण और विध्वंस की। जर्मनी के विश्वविद्यालयों और विज्ञानियों को खत्म करने की बात होती है और हिटलर को जिम्मेदार बताया जाता है। ये बताते हुए वामपंथी लेखक इस बात को सुविधानुसार तरीके से भुला देते हैं कि हिटलर यहूदियों को समाप्त कर रहा था। उस समय के जर्मनी में शिक्षा, विज्ञान, साहित्य, मनोरंजन के क्षेत्र में यहूदियों का बोलबाला था। हिटलर को यहूदियों को मारना था तो जो उसके सामने आया मारा गया। इससे भी खतरनाक और बर्बर कार्रवाई तो स्टालिन ने की। 1937 में स्टालिन ने द ग्रेट पर्ज की आड़ में अपने राजनीतिक विरोधियों, किसानों का जो नरसंहार किया उसको नहीं भूलना चाहिए। स्टालिन इतने पर ही नहीं रुका था उसने तो जातीय नरसंहार किया जिसमें एक अनुमान के मुताबिक दस लाख से अधिक लोगों का कत्ल किया गया। देश के बाहर निर्वासित जीवन जी रहे लोगों को मरवाया गया। जब भी किसी दो व्यक्ति में तुलना होती है तो उसका पैमाना तय किया जाता है। किसी भी पैमाने पर स्टालिन जर्मन तानाशाह हिटलर से अधिक बर्बर, क्रूर, शातिर और वैश्विक समाज के लिए खतरनाक दिखाई देता है। स्टालिनवादी राजनीति मार्क्सवादियों से अधिक हिंसक है। बार बार इस बात का प्रयास किया जाता है कि हिटलर की तुलना में स्टालिन रचनात्मक दिखे। 25 जून को केंद्र सरकार ने संविधान हत्या दिवस घोषित किया है। उसके बाद से ही ये प्रयास दिखाई देने लगा है कि कैसे आपातकाल को उचित ठहराया जाए। ऐसे तर्क गढ़े जाएं जिससे ये लगे कि इंदिरा गांधी ने परिस्थियों से मजबूर होकर देश पर इमरजेंसी थोपी। 

Saturday, July 6, 2024

रणभूमि बदल गई युद्ध नहीं


पिछले दिनों देहरादून में दैनिक जागरण के ‘हिंदी हैं हम’ अभियान के अंतर्गत अभिव्यक्ति का उत्सव ‘जागरण संवादी’ का आयोजन हुआ। देशभर के लेखकों ने इस आयोजन में हिस्सा लिया था। जागरण संवादी के दूसरे दिन समापन सत्र के बाद रात्रि भोज था। खाना खत्म करने के बाद कुछ लेखक बाहर बैठ गए। साहित्यिक किस्सों का दौर आरंभ हुआ। रोचक संस्मरण का दौर चला तो समय का ध्यान नहीं रहा। साहित्य से होते होते बात फिल्मों तक आ पहुंची। इस चर्चा में ही हाल में ही ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म नेटफ्लिक्स पर आई फिल्म महाराज की चर्चा आरंभ हो गई। इस फिल्म से प्रभावित एक लेखक मित्र ने इसकी काफी प्रशंसा की। कहने लगे कि बहुत दिनों बाद भारतीय संस्कृति और धर्म से जुड़ी प्रथा और कुरीतियों को लेकर एक फिल्म आई है। इसमें अभिनेता आमिर खान के पुत्र जुनैद खान और जयदीप अहलावत के अभिनय की जमकर प्रशंसा हुई। जोश में उन्होंने इस फिल्म की संक्षिप्त कहानी भी बताई। पता चला कि ये फिल्म चरण पूजा जैसी प्रथा और उसके विरुद्ध एक समाज सुधारक-पत्रकार के संघर्ष की गाथा है। 

पत्रकार जब अपनी प्रेमिका और मंगेतर को वैष्णव संप्रदाय के बाबा की चरण पूजा करते देखता है तो अपना आपा खो देता है। दरअसल चरण पूजा उन्नीसवीं शताब्दी की एक ऐसी कुप्रथा थी जिसमें वैष्णव संप्रदाय का बाबा किसी लड़की को चुन लेता था। उसके साथ शारीरिक संबंध बनाता था। बांबे (अब मुंबई) के जिस हवेली की कहानी है उसमें भी बाबा लड़कियों को चरण पूजा के लिए चुनता था। कहीं न कहीं ये देवदासी प्रथा से मिलती जुलती कुरीति थी। इस फिल्म से प्रभावित मित्र जब कहानी सुना रहे थे तो वो इस बात को लेकर आह्लादित थे कि कैसे एक पत्रकार ने इतने बड़े संप्रदाय के खिलाफ लड़ाई का बिगुल फूंका था। वो बार-बार इस बात पर जोर दे रहा था कि हिंदू धर्म में कैसी कैसी कुरीतियां थीं। वो फिल्म के संवाद पर भी लहालोट थे। बता रहे थे कि कैसे वो पत्रकार करसनदास जब अपनी मंगेतर से संबंध तोड़ता है तो कहता है कि सही और गलत का भेद जानने में धर्म की नहीं बुद्धि की जरूरत होती है। आपको बताते चलें कि इस फिल्म के प्रदर्शन पर पहले गुजरात हाईकोर्ट ने रोक लगाई थी लेकिन बाद में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं पाते हुए इसके प्रदर्शन की अनुमति दे दी थी। 

जब वो ये बातें कह रहे थे तो साथ बैठे एक युवा लेखक बहुत ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे। उसने बहुत धीमे से कहा कि अच्छा ये बताइए कि बाबा के खिलाफ जो पत्रकार या समाज सुधारक खड़ा हुआ था वो किस धर्म का था। वो भी तो हिंदू ही था। इस फिल्म में दिखाई गई सारी कुरीतियों, विधवाओं के साथ समाज का गलत रवैया, छूआछूत, चरण सेवा, दक्षिण के मंदिरों में देवदासी प्रथा आदि के खिलाफ तो हिंदू समाज ही खड़ा हुआ था। चाहे वो राजा राममोहन राय हों, रख्मादेवी हों, ज्योति बा फुले हों या बाद के दिनों में महात्मा गांधी हों। सबने अपने धर्म में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने के लिए संघर्ष किया था। यह किसी अन्य धर्म में दिखता है क्या। उसका तर्क था कि जब ये कुरीतियां समाप्त हो गईं तो इसको फिल्म के माध्यम से दिखाकर निर्माता क्या हासिल करना चाहते हैं। वो भी सत्य घटना पर आधारित कहकर प्रचारित करते हुए। बाबा के मुंह से इस तरह के संवाद कहवा कर कि चरण सेवा के भक्ति रस को श्रृंगार रस क्यों समझ बैठे। दोनों में बहस होने लगी। 

बाकी लोग इस चर्चा को बड़े गौर से सुन रहे थे। बीच बीच में कुछ बोल भी रहे थे। पर इन दोनों के बीच चर्चा आगे बढने लगी। पहले वाले लेखक मित्र ने कहा कि जबतक अतीत को याद रखा जाएगा तभी भविष्य और वर्तमान को बेहतर बनाया जा सकता है। इसपर फटाक से युवा लेखक ने कहा कि जब वर्तमान राजनीति में नेहरू की गलत नीतियों की बात की जाती है तो आप ही लोग कहने लगते हैं कि गड़े मुर्दे क्यों उखाड़ रहे हो। यहां तो करीब दो सौ वर्ष पुरानी कुरीति को उखाड़ा गया। इसको दिखाने का उद्देश्य क्या है। अब धीरे-धीरे बात फिल्मों से राजनीति और नैरेटिव पर पहुंच गई। 

जब बात नैरेटिव पर पहुंची तो एक लेखिका ने हस्तक्षेप किया। उसका कहना था कि कुरीतियों को दिखाओ। लेकिन संवाद के माध्यम से जब आप किसी बच्चे से ये कहलवाते हो कि क्या भगवान गुजराती समझते हैं। या जब उसकी मां कहती है कि मन में इतने सवाल होंगे तो पूजा कैसे करोगे। या बाबा जब कहता है कि धर्म का पालन डर से करवाना पड़ता है। तो फिल्म के उद्देश्य पर बात तो होगी ही। बात इसलिए भी होगी कि पूरा संदर्भ हिंदू धर्म से जुड़ा हुआ है। जबकि हिंदू धर्म में सनातन काल से प्रश्न करने की स्वतंत्रता है। आप ईश्वर पर भी प्रश्न कर सकते हैं। देहरादून के मौसम में चर्चा थोड़ी गर्म होने लगी थी। लेखिका ने कहा कि इस तरह तो वेब सीरीज लैला में भी कुरीतियों को ही दिखाया गया था। फिर उसकी आलोचना क्यों हुई थी। जिस तरह से लैला में हिंदू धर्म का चित्रण हुआ था या जिस तरह से उसमें राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की गई थी वो कुरीतियों पर भारी पड़ गया था। उसने कहा कि फिल्म कुछ लोगों को अच्छी लग सकती है लेकिन जिस तरह इसको नेटफ्लिक्स के कारण इस फिल्म को वैश्विक दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया गया उससे भारत की छवि पर क्या असर पड़ेगा। वो बहुत मजबूती से अपनी बात रख रही थीं। इस तरह की फिल्मों से एक नैरेटिव बनता है, एक एजेंडा सेट होता है। महाराज फिल्म पर सबके अपने अपने तर्क थे। रात काफी हो गई थी तो बैठकी समाप्त की गई। 

चर्चा समाप्त कर होटल के अपने कमरे में जाकर काफी देर तक उपरोक्त तर्कों पर विचार करता रहा। किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पा रहा था। वापस दिल्ली लौटने पर पता चला कि फिल्म महाराज वैश्विक स्तर पर बहुत अच्छा परफार्म कर रही है, विशेषकर इस्लामिक देशों में। इस फिल्म की कई इस्लामिक देशों में रेटिंग और रैकिंग दोनों अच्छी है। बताय गया कि नेटफ्लिक्स का दावा है कि 20 से अधिक देशों में इस फिल्म को लाखों दर्शकों ने देखा है। इस सब जानने के बाद मुझे लैला वेब सीरीज की याद आई। तब भी इसकी खूब चर्चा हुई थी कि  इस वेब सीरीज को वैश्विक दर्शकों ने खूब पसंद किया था। अब दोनों में एक समानता तो है। दोनों वेब सीरीज की कहानी हिंदू धर्म की कुरीतियों पर आधारित है। वैसी कुरीतियां जो अब हिंदू धर्म में नहीं हैं। जब वैश्विक स्तर पर भारत की छवि मजबूत हो रही हो तो दो सौ वर्ष व्याप्त कुरीतियों पर फिल्म बनाकर उसको ओटीटी पर रिलीज करने का उद्देश्य और औचित्य समझने का प्रयास करना चाहिए। अचानक से देहरादून की चर्चा के दौरान लेखिका मित्र की कही एक बात दिमाग में कौंध गई, रणभूमि भले ही बदल गई लेकिन युद्ध नहीं। संदर्भ नैरेटिव का था।