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Monday, October 12, 2015

विरोध का पाखंड पर्व

 
नयनतारा सहगल अंग्रेजी साहित्य का बड़ा नाम है । माना जाता है कि आजाद भारत की पहली भारतीय अंग्रेजी लेखिका हैं जिन्हें इतनी शोहरत मिली । साठ और सत्तर के दशक में उन्होंने अपने स्तंभों से भारतीय राजनीति में अपनी पारिवारिक विरासत से इतर अपनी पहचान बनाई थी । नयनतारा सहगल जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित की बेटी हैं । अभी हाल ही में उन्होंने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान कर सुर्खियां बटोरी हैं । नयनतारा सहगल का मानना है कि इस वक्त देश का माहौल ठीक नहीं है और यहां आतंक का राज है । उनके शब्द है – रेन ऑफ टेरर । नयनतारा के मुताबिक इस वक्त देश में असहमति के स्वर को साजिशन दबाया जा रहा है और विरोध की आवाज का कत्ल किया जा रहा है । नयनतारा सहगल ने अपने बयान में कहा है कि मौजूदा वक्त में असहमति के अधिकार की लड़ाई लड़नेवालों को भय के वातावरण में जीना पड़ रहा है । भारत की बहुलतावादी संस्कृति पर आए इस खतरे के विरोध स्वरूप उन्होंने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का फैसला किया है । नयनतारा सहगल का कहना है कि साहित्य अकादमी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बचाने के लिए कुछ नहीं कर रही है और साहित्य अकादमी की खामोशी उनको पुरस्कार लौटाने को मजबूर कर रही है । नयनतारा सहगल की अपेक्षा है कि साहित्य अकादमी मौजूदा हालात में लेखकों के पक्ष में खड़े होकर उसकी सियासत का हिस्सा बने । नयनतारा सहगल की इस चाहत पर आगे बात होगी लेकिन पहले कुछ तथ्यों पर नजर डाले लेते हैं । दरअसल नयनतारा सहगल को उन्नीस सौ छियासी में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था । यह सम्मान उनको उनकी अंग्रेजी में छपी किताब रिच लाइक अस पर दिया गया था । साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलने के करीब तीन दशक के बाद नयनतारा सहगल की संवेदना जागी और उन्होंने देश की मौजूदा हालात के मद्देनजर विरोध दर्ज करवाने का फैसला लिया । अब जरा कुछ और तथ्य़ों पर गौर करते हैं । उन्नीस सौ छियासी में नयनतारा सहगल को साहित्य अकादमी ने अपने पुरस्कार से नवाजा । उसके दो साल पहलेउनकी ममेरी बहन और उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनके सुरक्षा गार्डों ने गोलियों से भून डाला था । इंदिरा गांधी की हत्या के विरोध में दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में सिख विरोधी दंगे हुए थे । दिल्ली के सिख विरोधी दंगों में हजारों सिखों का कत्ल कर दिया गया था । उनमें से कइयों को जिंदा जला दिया गया था । इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिख विरोधी दंगों के बाद देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बयान दिया था कि जब बड़ा पेड़ गिकता है तो आसपास की जमीन हिलती ही है । सिखों के नरसंहार और उसके बाद उस वक्त के प्रधानमंत्री के इस संवेदनहीन बयान के बाद भी नयनतारा सहगल जी की संवेदना नहीं जगी थी । संभव है कि हाल में मिला साहित्यक पुरस्कार और उससे मिल रहा यश उनकी संवेदना पर भारी पड़ गया हो । खैर नयनतारा सहगल की संवेदना तो उनको पुरस्कार मिलने के तीन साल बाद हुए भागलपुर में हुए सांप्रदायिक दगों के बाद भी नहीं जगी । भागलपुर दंगे में भी सैकड़ों लोग मारे गए थे । इस तरह के हादसों की बड़ी लंबी फेहरिश्त है । दो हजार दो के गुजरात दंगों के वक्त भी वो खामोश रहीं । अब पुरस्कार मिलने के उनतीस साल बाद साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान करना सवाल खड़े करता है । उन्होंने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने के अपने बयान में दादारी हत्याकांड से लेकर नरेन्द्र डाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम एम कालबुर्गी तक की हत्या पर चिंता जताई है । उनकी चिंता जायज है । किसी भी सभ्य समाज में हिंसा का कोई स्थान नहीं होता है । विचारों की लड़ाई सिर्फ और सिर्फ कलम से लड़ी चली जानी चाहिए । उसमें गोली बंदूक का कोई स्थान नहीं होना चाहिए । गोी बंदूक से विचारों की लड़ाई लड़ने का इतिहास या तो वामपंथियों के नाम है या फिर इन दिनों आतंकवादी संगठन आईएसआईएस के नाम । इसी तरह से हिंसा के बाद उसपर सियासत करना या उसको आधार बनाकर सुर्खियां बटोरने की कोशिश करना भी उचित नहीं है । नयनतारा सहगल ने अपनी संवेदना आहत होने की जो वजह बताई है वो कम से कम उन्नीस सौ चौरासी के सिख दंगे और भागलपुर या गुजरात के सांप्रदायिक दंगे से कम भयावह है । उस वक्त देश का जो माहौल था क्या अब उससे अधिक खराब है । अतीत को आधार बनाकर वर्तमान की गड़बड़ियों को सही नहीं ठहराया जा सकता है लेकिन जब संवेदना जगने की बात होगी तो तुलनात्मक विश्लेषण होना तय है ।

नयनतारा सहगल ने अपने बयान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर भी निशाना साधा और दादरी से लेकर प्रोफेसर कालबुर्गी की हत्या तक पर उनकी खामोशी पर सवाल खड़े किए । सवाल खड़े करने के बाद भी वो नहीं रुकीं और उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को अपनी विचारधारा को समर्थन करनेवाले शैतानों तक के खिलाफ नरमी बरतनेवाला करार दिया या कहें कि उन्होंने साफ कर दिया कि अगर शैतान भी मोदी की विचारधारा का समर्थन करता हो तो मोदी उसके खिलाफ कार्रवाई से आंखें मूंद लेंगे । दरअसल नयनतारा सहगल का संघ विरोध पुराना है । उन्नीस सौ उनहत्तर-सत्तर में उन्हॆंने अपने एक स्तभ में जनसंघ के नारे – हिंदी-हिंदू-हिन्दुस्तान पर जनमकर वार किया था और इसको भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा करार दिया था। उसके बाद भी उन्होंने लगातार जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर अपने स्तंभों में हमले किए । कालांतर मे वो इंदिरा गांधी के विरोध में लग गईं थी जो कि एक अवांतर और बेहद लंबा प्रसंग है । अपने बयान में नयनतारा सहगल ने कहा है कि इस वक्त देश में आतंक का राज है । नयनतारा सहगल बहुत ही अनुभवी पत्रकार, स्तंभ लेखक और राजनीति को बेहद करीब से देखनेवाली रही हैं । वो जब इस तरह के शब्दों या जुमलों का इस्तेमाल करती हैं तो हैरानी होती है । अचरच इस बात पर होता है कि इतनी वरिष्ठ लेखिका भारतीय लोकतंत्र को इतना कमजोर समझती हैं कि कोई भी शख्स पूरे देश में आतंक का राज कामयम कर ले जाएगा।  नयनतारा सहगल ने तो इमरजेंसी और उसके बाद के हालात को बहुत करीब से देखा है और उसपर एक किताब भी लिखी है । उन्हें इस तरह की गलतफहमी किस वजह से हो रही है ये समझ से परे है । नयनतारा सहगल और उनके एलान के बाद उनको लाल सलाम कर लहालोट होनेवाले उनके समर्थकों को यह समझने की आवश्यकता है कि हर घटना को अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़कर देखने का चुनिंदा फैशन बंद होना । नयनतारा सहगल की संवेदना उस वक्त क्यों नहीं जागी जब वामपंथी सरकार ने तसलीमा नसरीन के साथ अन्याय किया, वोटबैंक की खातिर उनको राज्य से बाहर का रास्ता दिखा दिया। कांग्रेस ने भी उसको कायम रखा ।

हाल के दिनों में पुरस्कार लौटाने के पाखंड पर्व की शुरुआत जादुई यथार्थवादी कथाकार उदय प्रकाश ने की । काफी लंबे समय से उदय प्रकाश की लेखनी ठंडी पड़ी थी ऐसे में साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का दांव चलकर उन्होंने प्रचार तो हासिल कर ही लिया । साहित्य अकादमी से लेखकों की अपेक्षा है कि वो हत्या और हिंसा के विरोध में प्रस्ताव पारित करे । दअसल ऐसी मांग करनेवाले लेखक और लोग साहित्य अकादमी की परंपरा और उसके संविधान आदि से अनजान हैं ।  लेखकों से साहित्य अकादमी की अपेक्षा विशुद्ध राजनैतिक है और वो अपनी राजनीति को साहित्य अकादमी के कंधे पर चलाना चाहते हैं । क्या ये संभव है । इन लेखकों को डी एस राव की किताब फाइव डिकेड्स ऑफ साहित्य अकादमी पढ़नी चाहिए जिसमें उन्होंने विस्तार से अकादमी के गठन और उसकी परंपरा का उल्लेख किया है । यह अलहदा बात है कि वामपंथी विचारधारा के लोग कांग्रेस के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह काम कर रहे थे उस दौर में ही साहित्य अकादमी का पतन शुरू हुआ था । साहित्य अकादमी पर वाम विचारधारा के लोगों ने कब्जा जमाए रखा और उसके बाद भी ऐसी व्यवस्था कर दी कि लेखकों की बजाए विश्वविद्यालयों के शिक्षकों का कब्जा रहेगा । विश्वविद्यालयों के उन शिक्षकों का जिनका समकालीन साहित्य में कम से कम लेखन के माध्यम से कोई हस्तक्षेप नहीं है । अब उन लोगों से यह अपेक्षा करना कि वो सरकार के खिलाफ या किसी घटना विशेष के खिलाफ तनकर खड़े हो जाएंगे, बेमानी है, बचपना है । पुरानी कहावत है कि बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय । साहित्य अकादमी के पतन के जिम्मेदार लोग आज अकादमी से उच्च मानदंडों की अपेक्षा कर रहे हैं । इसी अपेक्षा की बुनियाद पर खड़ा विरोध हवाई लगता है ।  

 

Sunday, October 11, 2015

सवाल पैदा करते जवाब

पहले उदय प्रकाश, फिर नयनतारा सहगल और अब असोक वाजपेयी ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान कर साहिकत्य जगत को झकझोरने की कोशिश की । तीनों लेखकों के विरोध का आधार कमोबेश एक ही है । इन तीनों को लगता है कि इस वक्त देश का वातावरण बहुत खराब हो गया है और साहित्यकारों को प्रतिरोध में उठ खड़ा होना चाहिए । गोविंद पानसरे, प्रोफेसर कालबुर्गी आदि की हत्या और दादरी कांड में गोमांस की अपवाह की हत्या के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चुप्पी पर भी नयनतारा सहगल और इशोक वाजपेयी ने सवाल खड़े किए हैं । नयनतारा सहलग ने तो यहां तक कह दिया कि इस वक्त देश में आतंक का राज है । इन तीनों को लगता है कि साहित्य अकादमी को इस आतंक के माहौल में लेखकों के साथ खड़ा होना चाहिए । यह ठीक है हर किसी की अपनी अपेक्षा और अपनी चाहत होती है लेकिन जब आपकी चाहत सार्वजनिक हो या जब आप अपनी चाहत से एक बड़े समुदाय को प्रभावित करने की आकांक्षा रखते हों तो उसकी परख आवश्यक है । अब जरा अकादमी पुरस्कार लौटानेवालों के तर्क को देखिए । उनका कहना है कि साहित्य अकादमी स्वायत्त संस्था है लिहाजा उसको इस वक्त के कथित खराब माहौल के खिलाफ प्रस्ताव आदि पास कर विरोध जताना चाहिए । चूंकि साहित्य अकादमी ऐसा नहीं कर रही है लिहाजा वो पुरस्कार वापस कर रहे हैं । दूसरी तरफ ये भी कहा जा रहा है कि विरोध की वजह प्रधानमंत्री का मौन हैं । एक तरफ तो आप अकादमी को स्वायत्त मानते हैं और दूसरी तरफ सरकार के कृत्यों के लिए भी उसको जिम्मेदार मानते हैं । साहित्य अकादमी का पुरस्कार सरकार नहीं देती है । पुरस्कार के लिए लेखकों का चुनाव लेखकों की ही एक कमेटी करती है । पुरस्कार लौटाना एक तरह से उन लेखकों का भी अपमान है जिन्होंने आपको उस वक्त पात्र माना था । जवाहरलाल नेहरू ने साहित्य अकादमी को राजनीतिक दखलअंदाजी से मुक्त रखा था । उनका साफ कहना था कि प्रधानमंत्री भी इस मसले में दखल नहीं दे सकता है । जवाहरलाल नेहरू जब अकादमी से जुड़े थे तब भी उन्होंने इसके कामकाज में कोई दखल आदि नहीं दिया था ।
दूसरी बात ये कि पुरस्कार लौटानेवाले लेखक और उनके समर्थकों ने इस तरह का माहौल बना दिया है कि जो लेखक पुरस्कार नहीं लौटाएंगे या फिर पुरस्कार लौटानेवालों का समर्थन नहीं करेंगे वो संघी या भाजपाई हैं । उन्हें यह कहकर लांछित आदि करने का प्रयास किया जा रहा है कि वो कट्टरपंथी हिंदूवादी ताकतों का समक्थन कर रहे हैं । इस तरह का माहौल बनाना उचित नहीं है । एक तरफ तो आप असहमति के अधिकार की लड़ाई लड़ने का दावा कर रहे हैं लेकिन परोक्ष रूप से आपसे असहमत होनेवालों को कठघरे में भी खड़ा कर रहे हैं । लेखकों को पुरस्कार आदि लौटाने का एलान कर सनसनी फैलाने से ज्यादा जरूरी है कि वो अपनी लेखनी से इस तरह का माहौल का मुकाबला करे । दरअसल अगर हम देखें तो पिछले चार पांच दशकों में लेखकों ने अपनी साख को कम किया है । सार्वजनिक मसलों पर राय प्रकट नहीं कर या फिर चुनिंदा मसलों पर लिख या बोलकर लेखकों ने अपनी क्रेडिबिलिटी कम कर ली है । राजेन्द्र यादव के बाद हिंदी में कोई सार्वजनिक बुद्धिजीवी बचा नहीं । अशोक वाजपेयी कभी कभार बोलते लिखते रहे हैं । इसके अलावा अगर हम देखें तो लेखकों ने देश और समाज के मसलों पर लिखना बोलना कम कर दिया है । अपनी विचारधारा वाली पार्टी के पिछलग्गू बनकर लेखकों ने अपनी साख को दांव पर लगा दिया । उसका हीनतीजा हुआ है कि साहित्य अकादमी पुरस्कार आदि लौटाने के फैसलों पर सवाल खड़े हो रहे हैं । साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने के बाद अशोक वाजपेयी ने कहा कि वो काफी दिनों से अपने स्तंभ में सरकार की नीतियों के खिलाफ लिख रहे थे लेकिन कहीं कोई हलचल नहीं हो रही थी इस वजह से उन्होंने कुछ नाटकीय करने की सोची और पुरस्कार लौटा दिया । वाजपेयी जी बेहद सम्मानित लेखक हैं, बहुपठित भी, लेकिन अगर उनका साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का कदम नाटकीय है तो फिर इसका उतना ही असर होगा जितना कि किसी भी नाटकीय कदम का हो सकता है ।
साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने के तीन लेखकों के फैसलों के बाद एक बार फिर से अकादमी पुरस्कार के चयन को लेकर बातें शुरू हो गई हैं । कहते हैं ना कि बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी । उदय प्रकाश से लेकर कई लेखकों को साहिय् अरादमी पुरस्कार दिए जाने पर सवाल खड़े होते रहे हैं । विवाद भी हुए हैं । कई लेखकों को पुरस्कार मिलने के पहले से ही उनके नाम सार्वजनिक होते रहे हैं । बात तो यहां तक सामने आती रही है कि अमुक लेखक को इस साल पुरस्कार देने का आश्वासन अध्यक्ष या संबंधित भाषा के संयोजक ने दे दिया है । दरअसल ये पूरा विवाद विचारधारा की लड़ाई है । हिंदी के एक वरिष्ठ आलोचक से जब मैंने बातों बातों में कहा कि ये विचारधारा की लड़ाई है तो उन्होंने कहा कि विचारधारा के साथ साथ स्वार्थ की भी लड़ाई है । हर कोई अपनी गोटी सेट करना चाहता है और फिट नहीं होने की स्थिति में बागी हो जाता है । हम ये तो नहीं कह सकते क्योंकि इस बात के प्रमाण हमारे पास नहीं हैं लेकिन अकादमी पुरस्कार लौटाने के फैसले पर लेखक समाज में ही मतभेद हैं । लेखकीय स्वंतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी पर मंडरा रहे खतरे, अगर कोई खतरा है तो, को लेकर लेखकों को एक जुट किया जाना चाहिए था । इसका असर भी व्यापक होता ।  

Sunday, October 4, 2015

साहित्यक ठगी से दूर होते पाठक

एक लंबे अर्से से हिंदी साहित्य में पाठकों की कमी का रोना रोया जाता रहा है । इस बात को हर सभा गोष्ठी में बहुत जोर शोर से रेखांकित किया जाता रहा है कि हिंदी साहित्य के पाठक घट रहे हैं, लिहाजा साहित्य पर बड़ा संकट आन पड़ा है । यह बहुत हद तक सही भी हो सकता है क्योंकि बहुत सारे मित्रों का अनुभव है कि जब भी रचनाएं छपती हैं तो उसपर ज्यादातर प्रतिक्रियाएं साठ पार के पाठकों की आती हैं । ऐसे लोगों का कहना है कि युवा पाठकों को जोड़ने का काम हिंदी साहित्य में नहीं किया जा रहा है । हो सकता है इसमें सचाई हो लेकिन इसका एक और पक्ष भी है । वह है साहित्यकारों का युवा मन को पकड़ पाने में नाकामी । आज भी हमारे देश के हिंदी साहित्य में रुचि रखनेवाले युवा धर्मवीर भारती का उपन्यास – ‘गुनाहों का देवता’ और मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास ‘कसप’ पढ़ते हैं । ये दोनों उपन्यास जब लिखे गए थे तब भारती और जोशी दोनों पाठकों को समझ रहे थे । हिंदी साहित्य के पाठकों की कमी का रोना रोनेवाले लेखकों को समझना होगा कि वो पाठकों की ना तो रुचि को समझ पा रहे हैं और ना ही देश काल और परिस्थिति के मुताबिक लेखन कर रहे हैं । पाठकों की रुचि का उत्तरोत्तर विकास होता जा रहा है और हमारी कहानियां अब भी ‘यथार्थ की नई जमीन’ तोड़ रही हैं । करीब साल भर पहले पटना पुस्तक मेले के एक सेमिनार में मैंने कह दिया था कि हिंदी का लेखक लगभग तानाशाह होता है । मेरे इस कथन पर उस वक्त बहुत लानत मलामत हुई थी लेकिन अब तो कमोबेश इसी तरह के स्वर अशोक वाजपेयी जैसे लेखकों की लेखनी से भी उठने लगे हैं । लेखकों के तानाशाह होने का अर्थ है कि उनको पाठकों की रुचि आदि का ध्यान नहीं है वो बस अपने मन मुताबिक लेखन करते चलते हैं । यह तर्क ठीक हो सकता है कि लेखन पाठकों की रुचि को ध्यान में रखकर नहीं किया जा सकता है , वो तो लेखक की संवेदना और जीवन जगत के अनुभवों के आधार पर ही होता है । लेकिन यह भी उतना ही वाजिब है कि लेखक को जमाने के साथ कदमताल करना चाहिए । अगर जमाना आगे बढ़ता चला जा रहा है और आप अपने अनुभवों और संवेदनाओं के साथ उसी जगह पर स्थापित होकर अपनी बात कह रहे हैं तो बहुत संभव है कि आप पिछड़ जाएं । कमोबेश हिंदी साहित्य लेखन के साथ यही हो रहा है । पाठकों की रुचियां पंख लगाकर उड़ रही हैं और लेखक अपने यथार्थ को थामे बैठे हैं । दूसरी बात जो पाठकों को साहित्य से दूर कर रही हैं वो है भाषा को लेकर प्रयोग करने की झिझक । अब अगर आप इन दिनों भी भारतेंदु युग की या फिर किशोरी दास वाजपेयी के वक्त की भाषा का इस्तेमाल करेंगे तो पाठको को दिक्कत होगी क्योंकि वो उस भाषा में संस्कारित नहीं हो रहा है । अब सरिता, नदी और जल, पानी बन चुका है । ये तो सिर्फ उदाहरण हैं । भाषा के साथ खिलवाड़ का पक्षधर मैं भी नहीं हूं, लेकिन भाषा के साथ खिलंदड़ी को होनी चाहिए । समय की नब्ज पर हाथ रखनेवाले लेखक अपनी भाषा को इस तरह से इस्तेमाल करते हैं कि वो आधुनिक हो जाती है और अब तो उत्तर आधुनिक काल भी पीछे छूटता नजर आ रहा है । दूसरे हिंदी के लेखकों, जब मैं लेखकों कहता हूं तो उसमें कहानीकार, उपन्यासकार के अलावा कवि भी शामिल होते हैं, को एक खास किस्म के फॉर्मूलाबद्ध विचारधारा के बोझ तले लेखन की गुलामी से भी खुद को मुक्त करना होगा । कविताओं में नारेबाजी और कहानियों में वर्ग संघर्ष के चित्रण से बचना होगा । कहना ना होगा कि इन दो चीजों का लंबे समय तक ओवरडोज पाठकों को साहित्य से दूर लेकर गया । इसका मतलब यह नहीं है कि रचना विचारशून्य हो लेकिन विचार-प्रधान रचनाओं की बहुलता साहित्य के लिए घातक साबित हुई है और अब भी हो रही है । नतीजा यह है कि अब साहित्य के प्रकाशकों ने कविता संग्रह छापने से लगभग तौबा कर ली है । कहानी संग्रह को छापने को लेकर भी उनके अंदर खासा उत्साह नहीं देखने को मिलता है । हां साहित्य से इतर विषयों को लेकर प्रकाशक अब भी उत्साहित रहते हैं । इसकी वजह की पड़ताल की आवश्यकता नहीं है । प्रकाशक तो कारोबारी है उसको जहां लाभ दिखाई देगा वो उसको छापेगा ।
दूसरे पिछले कई दशकों में प्रकाशकों और लेखकों ने मिलकर पाठकों को जबरदस्त तरीके से ठगा है । इस शब्द के इस्तेमाल पर दोनों समुदाय के लोगों को आपत्ति हो सकती है लेकिन यह हुआ है । उदाहरण के तौर पर अगर हम हिंदी कहानी को लें तो पहले किसी कहानीकार का संग्रह छपता है, थोड़े दिनों बाद किसी अन्य प्रकाशक से मेरी प्रिय कहानियां नाम से संग्रह छपकर आता है, फिर थोड़े वक्त के बाद मेरी चुनिंदा कहानियां छपकर आता है, फिर प्रतिनिधि कहानियां, चर्चित कहानियां आदि के नाम से संग्रह छपकर आते हैं । इन सभी संग्रहों में कहानियां लगभग वही रहती हैं । मतलब यह कि अगर आपने दस कहानियां लिखी है तो इस बात की संभावना आपके सामने है कि आपके बारह संग्रह छप सकते हैं । इतना सब होने के बाद संपूर्ण कहानियों के साथ सभी कहानियां एक जिल्द में छपकर आ जाती हैं ।  अब अगर पाठक किसी लेखक की प्रिय कहानियां खरीद लेता है और साल भर उसी लेखक की चर्चित कहानियां खरीदता है तो अपने को ठगा महसूस करता है क्योंकि उसकी ज्यादातर कहानियां उसकी पढ़ी होती हैं । यह गड़बड़ी क्यों होती है ? इसके लिए कौन जिम्मेदार है ? इस पर अगर विचार करते हैं तो लेखक और प्रकाशक दोनों कठघरे में नजर आते हैं । प्रकाशक इस तरह की जुगत इस वजह से करते हैं ताकि पाठकों को अपनी ओर आकृष्ट करते हुए मुनाफा कमा सकें । प्रकाशक कारोबारी है लिहाजा उनका दोष कम है, लेकिन उनको भी समझना होगा कि इस तरह के शॉर्ट कट कालांतर में उनको नुकसान पहुंचा सकते हैं । परंतु लेखकों का यह कृत्य समझ से परे हैं । सतह पर जो दिखता है वो है लेखक की लालच । लेखक की भी आकांक्षा पैसे कमाने की होती है, लिहाजा वो इस तरह की ठगी को ना तेवल प्रोत्साहित करता है बल्कि उसके साथ भी हो जाता है । लेखक पैसे कमाने की अपनी चाहत को भले ही वृहत्तर पाठक समुदाय तक पहुंचने के तर्क के आवरण में ढकें, लेकिन वो हास्यास्पद होता है । अब तो एक और नया ट्रेंड शुरू हो गया है कि कोई बड़ा लेखक अपनी पसंद की कहानियां छांट कर किताबें बना दे रहा है जिनमें कई कहानीकारों की कहानियां होती हैं ।

अंग्रेजी के सलेक्टेड वर्क्स की तर्ज पर हिंदी में भी संचयन छपने लगे हैं । संचयन हिंदी में अंग्रेजी के रास्ते आया है जहां सलेक्टेड वर्क्स की लंबी और समृद्धशाली परंपरा रही है । हिंदी में संचयन को बहुत कैजुअली लिया जाता है और किताब बनाने की गरज से संचयन छाप दिया जाता है । संचयन के संपादनकर्ता लेखक को समग्रता में देख-पढ़कर उसमें से उनकी रचनाएं छांटने में अबतक लगभग असफल रहे हैं या उसको करना नहीं चाहते हैं ये शोध का विषय है। हिंदी में संचयन के प्रकाशन की परंपरा का पूर्णत विकास होना शेष है । इसके अलावा संचयन के साथ जो एक बड़ी दिक्कत है वो है उसकी कीमत की । किसी लेखक के संचयन और उसके समग्र में ज्यादा का फर्क नहीं है । उदाहरण के तौर पर अगर हम मुक्तिबोध संचयन और मुक्तिबोध रचनावली को देखें तो संचयन सात सौ रुपए में मिल रहा है और छह खंडो में प्रकाशित पेपरबैक रचनावली की कीमत बारह सौ रुपए है । अब मुक्तिबोध के पाठकों के सामने द्वंद की स्थिति होती है । प्रिय, चर्चित, पसंदीदा, दस, ग्यारह आदि के नाम प्रकाशित होने के बाद संचयन और सबकुछ चुक जाए तो समग्र या संपूर्ण कहानियां प्रकाशित होती हैं और उसके बाद रचनावली । यह क्या है । क्या कभी लेखकों ने इसपर विचार करने की जहमत उठाई । क्या कभी जनपक्षधरता के पैरोकारों ने आम पाठकों के लिए इस तरह की आवाज बुलंद की । क्या कभी किसी लेखक संगठन के वार्षिक सम्मेलन आदि में पाठकों के साथ इस छल के खिलाफ प्रस्ताव पारित हुआ । साहित्य के किसी फोरम पर इसपर बात हुई । रॉयल्टी के नाम पर छाती कूटनेवाले भी इस ठगी पर खामोश रहे । लंबे समय तक ठगा जानेवाला पाठक अगर अब साहित्य से दूर जा रहा है तो इसकी जिम्मेदारी किस पर है । अब वक्त आ गया है कि हिंदी साहित्य से जुड़े तमाम लोग इस साहित्यक गड़बड़झाले पर विमर्श करें और इसको रोकने की पहल भी शुरू की जानी चाहिए । 

अलविदा वीरेन दा

हिंदी साहित्य जगत के वीरेन दा का जाना हिंदी कविता को सूना कर देने जैसा है । उनके निधन से हिंदी कविता को तो भारी क्षति हुई ही है, हिंदी समाज को जोड़कर आगे बढ़नेवाला एक अद्भुत व्यक्तित्व की कमी भी हिंदी जगत में लंबे समय तक महसूस होगी । साहित्यकारों, साहित्यप्रेमियों और पत्रकारों के बीच वीरेन दा के नाम से लोकप्रिय वीरेन्द्र डंगवाल एक ऐसी शख्सियत थे जिनसे जो एक बार मिला तो फिर उनका ही होकर रह गया । बरेली में अध्यापन के अलावा उन्होंने एक अखबार में भी अपना योगदान दिया और उस दौर के लोग उनकी पत्रकारीय संवेदना और सूझबूझ की अब भी तारीफ करते हैं । उस दौरे के उनके साथ के पत्रकार सालों बाद भी उनको इतनी इज्जत देते हैं जिसकी अपेक्षा उन्होंने कभी नहीं की थी । मेरा वीरेन्द्र डंगवाल से कभी कोई परिचय नहीं था । मैं साहित्य अकादमी के पुरस्कारों और उसमें होनेवाली गड़बड़ियों पर लंबे समय से लिखता रहा हूं ।  दो हजार चार में जब वीरेन डंगवाल को उनके कविता संग्रह दुश्चक्र में स्रष्टा पर पुरस्कार मिला था तो चयन समिति की हड़बड़ी पर सवाल उठाते हुए मैंने एक लेख लिखा था । उस वक्त हिंदी भाषा के संयोजक थे उपन्यासकार गिरिराज किशोर और आधार सूची तैयार की थी कहानीकार प्रियंवद ने । मैंने उस वक्त साहित्य अकादमी के दस्तावेजों के हवाले से लिखा था कि निर्णायक मंडल के तीन सदस्यों में से दो कमलेश्वर और श्रीलाल शुक्ल बैठक में उपस्थित ही नहीं हो सके थे । अपनी टिप्पणी में निर्णायक मंडल के तीसरे सदस्य से रा यात्री ने लिखा- दुश्चक्र में स्रष्टा- काव्य कृति को हम सभी निर्णायक मंडल के सदस्य एक समान प्रथम वरीयता देते हैं और साहित्य अकादमी के दो हजार चार के पुरस्कार के लिए सहर्ष प्रस्तुत करते हैं । उसी जगह हिंदी भाषा के तत्कालीन संयोजक गिरिराज किशोर ने लिखा- श्री श्रीलाल शुक्ल एवं कमलेश्वर जी उपस्थित नहीं हो सके । उन्होंने अपनी लिखित संस्तुति बंद लिफाफे में भेजी है । श्रीलाल जी ने ज्यूरी के उपस्थित सदस्य से रा यात्री से फोन पर लंबी बातकर दुश्चक्र में स्रष्टा को 2004 के पुरस्कार के लिए समर्थन दिया । हलांकि साहित्य अकादमी के दस्तावेजों में श्रीलाल जी की संस्तुति मौजूद नहीं थी । कमलेश्वर का बीस दिसंबर खत था जो इक्कीस दिसंबर की बैठक के पहले प्राप्त हो गया था । इन तमाम तथ्यों के आधार पर मैंने साबित किया था कि साहित्य अकादमी ने डंगवाल को पुरस्कृत करने में हड़बड़ी दिखाई । बात आई गई हो गई थी । अभी तीन साल पहले वीरेन जी दिल्ली में एक कार्यक्रम में मिले थे । मैंने उनको अपना परिचय देकर अभिवादन किया तो उन्होंने मुझे गले से लगा लिया और कहा कि साहित्य अकादमी पुरस्कार पर तुमने अकादमी की खूब खबर ली थी । आठ साल बाद भीउनको मेरा लेख याद था । उन्होंने कहा कि उस लेख में उन्हें सबसे अच्छी बात ये लगी थी तमाम बड़े लोगों के होने के बावजूद उनको कठघरे में खड़ा करने में कोताही नहीं बरती गई थी । तो ऐसे थे वीरेन दा ।

वीरेन्द डंगवाल ने कम लिखा, लेकिन जो लिखा उससे समकालीन साहित्य में सार्थक हस्तक्षेप किया । वीरेन दा के बारे में कहा जा सकता है कि उन्होंने साहित्य और पत्रकारिता की दो पीढ़ी को संस्कारित किया । अपनी लेखनी से,अपनी रहनुमाई से, अपने विजन से । उनके फेसबुक वॉल पर और उनकी याद में लिखे जा रहे तमाम लेखों में इस बात को रेखांकित किया जा सकता है कि किस तरह से उन्होंने अपने संपर्क में आनेवाले हर इंसान की जिंदगी को प्रभावित किया । जनपक्षधरता के स्वर उनकी कविताओं में अंत तक मुखर रहे । और यही अपनापन और जनपक्षधरता उनकी पहचान है जिसको मृत्यु कभी मिटा नहीं पाएगी । 

Tuesday, September 29, 2015

सोशल मीडिया पर हिंदी का दबदबा

सोशल मीडिया और हिंदी । यह बात चंद सालों पहले तक सुनने में बहुत अजीब लगती थी । हिंदी के लोग सोशल मीडिया को अंग्रेजी और अंग्रेजीवालों का एक ऐसा औजार समझते थे जिसमें वो संवाद करते थे । हिंदी के लोगों को लगता का तर्क होता था कि फोन उठाकर या आमने सामने संवाद की स्थिति को छोड़ सोशल मीडिया को अपनाना अंतरवैयक्तिक संबंधों में बड़ी बाधा है । हिंदी के चंद उत्साही लोग तो इसको सामाजिक तानेबाने पर बाजारवाद का बड़ा हमला मानते थे । सोशल मीडिया को आपसी भड़ास निकालने का मंच माननेवालों की तादाद भी हिंदी में कम नहीं थी, अब भी कुछ लोग हैं  । दरअसल शुरुआत में सोशल मीडिया पर अंग्रेजी का बर्चस्व था । फेसबुक से लेकर ट्वीटर तक । इस बात को लेकर हिंदी के लोग सशंकित रहते थे । उनको लगता था कि यह माध्यम अंग्रेजीवालों के चोंचले हैं । लेकिन हमारे यहां कहते हैं ना कि मनुष बली नहीं होत है समय होत बलवान । तो वक्त बदला और सारी स्थितियां भी बदलती चली गईं । पिछले एक दशक में देश में तकनीक का फैलाव काफी तेजी से हुआ है । हर हाथ को काम मिले ना मिले हर हाथ को मोबाइल फोन जरूर मिल गया है । घर में काम करनेवाली मेड से लेकर रिक्शा चलानेवाले तक अब मोबाइल पर उपलब्ध हैं । किसी भी देश के लिए यह एक बेहतर स्थिति है जहां समाज के सबसे निचले पायदान पर रहनेवालों को भी तकनीक का फायदा मिल रहा है । तकनीक के इस विस्तार से उनकी हालात में तो सुधार हुआ ही उसका उपयोग करनेवाले बड़ी संख्या में अपनी भाषा में संवाद करने को आतुर दिखाई देने लगे । कुछ दिनों पहले एक कार्यक्रम के दौरान हिंदी की वरिष्ठ लेखिका और महिला अधिकारों को लेकर अपने लेखन में बेहद सजग मैत्रेयी पुष्पा ने तकनीक की ताकत के बारे में बताया था । मैत्रेयी ने तब कहा था कि आज गांव घर की बहुओं की ज्यादातर समस्याएं मोबाइल फोन ने हल कर दी हैं । उन्होंने कहा कि आज बहुएं घूंघट के नीचे से फोन पर अपनी समस्याओं के बारे में अपने मां बाप को या फिर शुभचिंतकों को संकट के सामय अपनी व्यथा बता सकती हैं । इसमें यह जोड़ा जा सकता है कि सोशल मीडिया ने उनको और ज्यादा ताकत दी । मोबाइल फोन की क्रांति के बाद जो विकास हुआ वह था इंटरनेट का फैलाव । तकनीक के विकास ने आज लोगों के हाथ में इंटरनेट का एक ऐसा अस्त्र पकड़ा दिया है जो उनको अपने आपको अभिव्यक्त करने के लिए एक बड़ा प्लेटफॉर्म प्रदान करता है । स्मार्ट फोन के बाजार में आने और उसकी कीमत मध्यवर्ग के दायरे में आने और थ्री जी जैसे इंटरनेट तकनीक के लागू होने से यह और भी आसान हो गया है । हाथ में इंटरनेट के इस औजार ने सोशल मीडिया पर लोगों की सक्रियता बेहद बढ़ा दी है । पहले तो ऑरकुट हुआ करता था जो नेट यूजर्स के बीच खासा लोकप्रिय था । बाद में सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक ने जोर पकड़ा और हर वर्ग के लोगों के बीच फेसबुक पर होने की होड़ लग गई । सोशल नेटवर्किंग साइट सोशल स्टेटस साइट में तब्दील हो गया । महानगरों के अलावा छोटे शहरों में फेसबुक पर होना अनिवार्य माना जाने लगा । जो लोग यह कहकर फेसबुक की खिल्ली उड़ाते थे कि फोन पर बात नहीं कर सकते वो वर्चुअल प्लेटफॉर्म पर बात करेंगे वो लोग भी अब फेसबुक पर घंटों गुजारते हैं । दरअसल यह होता है कि किसी भी तरह की नई तकनीक का पहले तो विरोध होता है और बाद में वह लोगों की आदतों में शुमार हो जाता है । आपको याद हो कि जब अस्सी के दशक में कंप्यूटर आया था तो उसका जमकर विरोध हुआ था । तब इस बात को लेकर खासा बवाल मचा था कि कंप्यूटर से बेरोजगारी बढ़ेगी । लोगों के हाथों से काम छिन जाएगा आदि आदि । लेकिन बाद में वो सारे तर्क धरे रह गए । कंप्यूटर ने भारत के लोगों के लिए संभावनाओं के नए क्षितिज खोले । सॉफ्टवेयर में भारत आज एक सुपर पॉवर है । दुनिया के हर कोने में भारत के लोग सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में बेहतर काम कर रहे हैं । तकनीक का विरोध या यो कहें कि यथास्थिति का विरोध हमेशा से समाज में होता रहा है । जो चल रहा है वैसा ही चलने दो की मनस्थिति चलती रहती है । बहुधा लोग यथास्थितिवाद के खूंटे से बंधे रहना चाहते हैं लेकिन होता यह है कि तकनीक का विकास उनको खूंटे से आजाद करने के लिए बेताव रहता है । यही जो संघर्ष होता है उसका परिणाम विरोध के तौर पर सामने आता है ।  
हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर हिंदी का प्रभाव काफी बढ़ा है इसकी वजह है उसके उपभोक्ता । दरअसल हुआ यह है कि सोशल मीडिया ने राजनीति से लेकर पत्रकारिता के स्वरूप को बदला है । अब अगर हम खबरों की ही बात करें तो सोशल मीडिया पर भाषाई बदलाव के बाद पाठकों या दर्शकों में भी बड़ा बदलाव लक्षित किया जा सकता है । अगर हम खबर के पाठकों या दर्शकों की बात करें तो यह साफ तौर पर दिखाई देता है । पहले पाठकों को एक सेट ऑफ न्यूज मिलता था लेकिन सोशल मीडिया के फैलाव के बाद स्थिति बदल गई है । सोशल मीडिया ने उसको उल्टा कर दिया है । अब खबरों के इतने स्त्रोत और इतनी वेरायटी मौजूद है कि एक ही तरह के खबरों से पाठकों को आजादी मिली । ट्विटर न्यूजरूम का एजेंडा सेट करने लगा है । सोशल मीडिया पर जो ट्रेंड करता है वह न्यूजरूम का एजेंडा तय करता है । पहले पाठकों को क्या मिलेगा ये संपादक तय करता था और हिंदी में कई संपादक ये कहा करते थे कि खबर वही है जो उनका अखबार छापता है । उस वक्त संपादक इस दंभ में रहा करते थे कि खबर वही जो संपादक चाहे । दरअसल उस दौर में पाठकों से संवाद बिल्कुल नहीं होता था या उनकी रचियों को लेकर कभी कभार सर्वे आदि हो जाते थे । सोशल मीडिया ने यहां भी स्थिति उलट कर रख दी । अब सोशल मीडिया की वजह से पाठकों से बेहतर  संवाद हो रहा है । पाठक अपनी राय पोस्ट कर रहे हैं और उनको अहमियत भी मिल रही है । सोशल मीडिया ने एक और बदलाव किया । सोशल मीडिया ने पत्रकारों को ब्रांड बनाया जो कि ट्रांसफरेबल एसेट होते चले गए । या कह सकते हैं कि ट्रेडेबल असेट हो गए । ट्विटर पर बरखा दत्त और राजदीप सरदेसाई के करीब बीस-बाइस लाख से ज्यादा फ़ॉलोअर है । वो जहां जाएंगे वो साथ जाएंगे । इसका मतलब यह हुआ कि भाषा भी उनके साथ जाएगी । पहले यह अमेरिका में हो रहा था लेकिन इंटरनेट के फैलाव ने इसको भारत में भी संभव बना दिया । इन दोनों के अलावा कई हिंदी के पत्रकारों के भी फॉलोवर लाख से ज्यादा हैं तो यह जो उनके फॉलोवर हैं एक तरीके से उनको पाठक भी हैं । ये पाठक किसी एक भाषा के नहीं हैं लेकिन जब राजदीप सरदेसाई हर रात एक हिंदी फिल्म का गाना ट्वीट करते हैं तो उसके बारे में जानने की इच्छा गैर हिंदी भाषी फॉलोवर को भी होती होगी । तीसरा जो अहम बदलाव देखने को मिल रहा है वह यह है कि अब यह उपभोक्ता तय कर रहा है कि वो किस प्लेटफॉर्म पर या किस भाषा में खबर या अन्य चीजें पढ़े । स्मार्ट फोन के बढ़ते चलन से अब पाठकों को चलते फिरते पढ़ने की आदत बढ़ती जा रही है । बाजार की भाषा में कहते हैं कि उपभोक्ता आन द मूव पढ़ना, देखना चाहता है । अब एक जगह बैठकर पढ़ना या टीवी देखना यूजर के मूड पर है । सहूलियत पर है । अब टीवी या अखबार की बाध्यता नहीं रही । टीवी खराब हो गया या अखबार नहीं आया तो पाठक अब सर्च इंजन के माध्यम से या फिर सोशल मीडिया पर देशदुनिया की हलचलों से अपडेट रहता है । मोबाइल पर हर तरह के ऐप मौजूद हैं जहां पाठक अपनी रुचि की चीजें अपनी पसंदीदा भाषा में देख पढ़ सकता है ।  चंद सालों पहले सोशल मीडिया के बढ़ते कदम के मद्देनजर मोबाइल फर्स्ट का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया था लेकिन अब तो वो आगे बढ़कर मोबाइल ओनली तक पहुंच गया है । यही वजह है कि - अब सभी स्मार्टफोन में स्क्रीन साइज बढ़ा रहे हैं । एप्पल जैसा ब्रांड भी स्क्रीन साइज बढ़ाने को मजबूर हो गया । इसी तरह सोशल मीडिया में सक्रिय कंपनियों को हिंदी में अपार संभावनाएं नजर आईं । धीरे-धीरे सबने हिंदी को अपनाना शुरू किया । अभी हाल ही में ट्विटर ने हैशटैग के लिए भी हिंदी समेत कई भारतीय भाषाओं को अपने प्लेटफॉर्म पर शामिल किया । अब हिंदी में किए गए ट्वीट ट्रेंड कर सकते हैं, करने लगे भी है । अगर आप फेसबुक पर देखें तो भाषा के तौर पर हिंदी को लेकर कई तरह की सहूलियतें दी गई हैं । पांच साल पहले जिस तरह से सोशल मीडिया साइट्स पर लोग रोमन में लिख रहे थे उसमें से ज्यादातर अब नागरी में लिखने लगे हैं ।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने कहा था कि सरकार का धर्म है कि वह काल की गति को पहचाने और युगधर्म की पुकार का बढ़कर आदर करे । दिनकर ने यह बात साठ के दशक में संसद में भाषा संबंधी बहस के दौरान कही थी । अपने उसी भाषण में दिनकर ने एक और अहम बात कही थी जो आज के संदर्भ में भी एकदम सटीक है । दिनकर ने कहा था कि हिंदी को देश में उसी तरह से लाया जाना चाहिए जिस तरह से अहिन्दी भाषी भारत के लोग उसको लाना चाहें । यही एक वाक्य हमारे देश में हिंदी के प्रसार की नीति का आधार है भी और भविष्य में भी होना चाहिए । पिछले साल गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग ने अपने सर्कुलर में कहा था कि सरकारी विभागों के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट में हिंदी अथवा अंग्रेजी और हिंदी में लिखा जाना चाहिए । अगर अंग्रेजी और हिंदी में लिखा जा रहा है तो हिंदी को प्राथमिकता मिलनी चाहिए । इस सर्कुलर में यह बात साफ तौर पर कही गई है कि अंग्रेजी पर हिंदी को प्राथमिकता मिलनी चाहिए । हमारा देश फ्रांस या इंगलैंड की तरह नहीं है जहां एक भाषा है । विविधताओं से भरे हमारे देश में दर्जनों भाषा और सैकड़ों बोलियां हैं लिहाजा यहां एक भाषा का सिद्धांत लागू नहीं हो सकता है । इतना अवश्य है कि राजकाज की एक भाषा होनी चाहिए । इस बात को भी हमारे देश में सक्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने समझा और हिदी को प्रमुखता मिलनी शुरू हो गई । इसके अलावा हिंदी में उनको कारोबारी संभावनाएं नजर आईं, लिहाजा उन्होंने इस भाषा को बढ़ाना शुरू कर दिया । कहने का तात्पर्य यह है कि बाजार ने हिंदी को अपनाया ।

अब अगर साहित्य के लिहाज से देखें तो सोशल मीडिया का श्वेत और श्याम पक्ष दोनों हैं । इसकी तात्कालिकता और सतहीपन इसकी खास कमियां हैं । मनगढंत और काल्पनिक भ्रम, अफवाह, विकृति और विद्रूपता फैलाने में भी इसकी नकारात्मक भूमिका बहुधा उजागर होती है । सोशल मीडिया खासकर फेसबुक ने दो काम किए हैं । एक तो इसने तमाम हिंदी जाननेवालों को रचनाकार बना दिया है । जिसे भी थोड़ी बहुत साहित्य में रुचि है वो लिख कर पोस्ट कर दे रहा है । उनके दोस्त बहुधा उसको लाइक भी कर देते हैं, कई बार पढ़कर कई बार बिना पढ़े । उनकी रचना पर मिली तारीफ उनको भ्रमित भी करती हैं । सोशल मीडिया के लिए यह अच्छा भी है और बुरा भी । अच्छा इसलिए को रचने वाले को मंच मिला । बुरा इस वजह से कि अच्छे बुरे लेखन का भेद मिटता जा रहा है । कई लेखकों को सोशल साइट्स खास कर फेसबुक पर निराशाजनक माहौल दिखाई देता है । उनको लगता है कि इस आभासी माध्यम ने कागज और कलम की भूमिका खत्म कर दी है । वहां स्तरीयता को जांचने का कोई पैमाना नहीं है जिसने भी जो लिखा उसको फौरन पोस्ट कर दिया । उनका मानना है कि इस सुविधा से रचनाशीलता के विकास में बाधा पहुंचती है । इस तर्क के समर्थन में पहल, धर्मयुग आदि पत्रिकाओं का उदाहरण दिया जाता है जहां छपने के लिए लेखक मेहनत करते थे । फेसबुक आदि पर तो यह संभव नहीं है । इस तरह की बात करनेवालों का मानना है कि फेसबुक स्तरहीन रचनाओं के प्रति सहमति बनाने का एक मंच बन गया है । सोशल मीडिया पर इतना ज्यादा बुरा लिखा जा रहा है कि अच्छा दिखता ही नहीं है । उसके लिए हंस जैसी नजर होनी चाहिए जो दूध पी ले और पानी छोड़ दे । सोशल मीडिया पर जिस तरह से वाहवाही का दौर चलता है उससे रचनाओं पर विमर्श नहीं हो पाता है । अच्छा, बहुत अच्छा, कमाल, वाह, शानदार, छा गए जैसी टिप्पणियां लगातार देखने को मिलती हैं । लेखकों को सोशल मीडिया पर अपनी तारीफ सुनने के व्यामोह से उबरना होगा । इसके अलावा सोशल मीडिया पर आत्मानुशासन की सख्त आवश्यकता है । लेखक को टिप्पणी करने के पहले यह सोचना चाहिए कि वो क्या लिख रहा है और उसके क्या निहितार्थ हैं
इससे इतर हिंदी में एक और वर्ग है जो सोशल मीडिया को अभिव्यक्ति का बेहतर माध्यम मानता है । उनका मानना है कि सोशल मीडिया अपने आप को उद्घाटित करने का बेहतर मंच है और वो हिंदी के फैलाव के हित में है । सोशल मीडिया की वजह से हिंदी तो वृहत्तर पाठक वर्ग तक पहुंच ही रही है , साहित्य भी लगातार लोगों तक पहुंचकर स्वीकृति पा रहा है । इस वक्त कई ब्लॉग चल रहे हैं जहां गंभीर साहित्य सृजन हो रहा है । फेसबुक और इंटरनेट के फैलाव का स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जहां आपको कबीर सूर से लेकर अब के एकदम नए रचनाकारों की कृतियां एक साथ पढ़ने को उपलब्ध हैं । सोशल साइट्स के फैलाव से साहित्य लिखना आसान हुआ है  । अगर किसी कवि या कहानीकार की रचना किसी कारणवश नहीं छप सकती है तो उसके पास अपने पाठकों तक पहुंचने का एक वैकल्पिक मंच है । सोशल मीडिया भविष्य का माध्यम हैं । दरअसल जो लोग सोशल मीडिया को लेकर सशंकित हैं उनको समझना होगा कि कोई भी चीज पक्का होने के पहले कच्चा ही होता है । इसी तरह से सोशल मीडिया पर साहित्य इस वक्त अपने कच्चेपन के साथ मौजूद है । लेकिन तकनीक का इस्तेमाल हमेशा से भाषा के हित में रहा है । अब अगर हम सोशल मीडिया के एक और उजले पक्ष को देखें तो वह विमर्श और संवाद का एक बेहतरीन मंच है । जिस तरह से हिंदी पट्टी में कॉफी हाउस संस्कृति खत्म हो गई, साहित्यक रुति वाली पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन धीरे-धीरे बंद होता गया ऐसे में फेसबुक ने हिंदी के गंभीर मुद्दों को बहस के लिए एक मंच दिया है । वहां हर तरह के विषय पर बहस होती है । कई बार निष्कर्ष भी निकलता है । वहां हिंदी के सवालों पर टकराहट भी होती है जिसकी गूंज इंटरनेटसे बाहर भी सुनाई देती है । कुल मिलाकर अगर हम देखें तो सोशल मीडिया के फैलाव से हिंदी का हित ही हो रहा है । जरूरत इस बात की है कि हिंदी के लोग इस माध्यम को अपनाएं और वहां अपनी भाषा को लेकर आगे बढ़ें ।


Sunday, September 27, 2015

मुक्तिबोध संचयन

वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने एक बार हिंदी कविता को लेकर बेहद दिलचस्प बात की । उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध की कविताओं के सामने आने के पहले हिंदी कविता के ज्यादातर महत्वूपूर्ण कवि उत्तरप्रदेश से होते थे । उनकी स्थापना के मुताबिक जब मुक्तिबोध की कविताओं ने हिंदी कविता में अपने को मजबूती से स्थापित किया तो उसके बाद से हिंदी कविता में मध्यप्रदेश के कवियों का दबदबा बढने लगा । अपने तर्क के समर्थन में नरेश जी ने उन्होंने अशोक वाजपेयी से लेकर राजेश जोशी और भगवत रावत तक के नाम गिनाए । इस बारे में मुक्तिबोध के एक और मित्र अशोक वाजपेयी से जब मैंने सवाल किया तो उन्होंने हंसते हुए कहा कि ये बहुत दूर की कौड़ी है लेकिन कौड़ी है अच्छी । अशोक वाजपेयी ने नरेश सक्सेना की बात को अपने अंदाज में लगभग स्वीकार कर किया । मुक्तिबोध को लेकर हिंदी कविता में लंबे समय से बहस चल रही है । उनकी कविताओं को अनेक तरह से व्याख्यायित किया जा रहा है । उनके निधन के बाद से लगातार उनकी कविताओं को लेकर आलोचकों के बीच विमर्श होता रहा है । डॉ रामविलास शर्मा ने उन्नीस सौ अठहत्तर में प्रकाशित अपनी किताब- नई कविता और अस्तित्ववाद में मुक्तिबोध की कविताओं का विस्तार से मूल्यांकन किया था । अपनी किताब में रामविलास शर्मा ने मुक्तिबोध की कविताओं को अस्तित्ववाद और रहस्यवाद से प्रभावित साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी । डॉ शर्मा ने तो मुक्तिबोध को सिजोफ्रेनिया नामक बीमारी से ग्रस्त बताकर एक धुंध का वातावरण बना दिया । बाद में नामवर सिंह ने डॉ रामविलास शर्मा की मुक्तिबोध को लेकर स्थापना का जबरदस्त विरोध किया । इन दो आलोचकों के बीच इस बात को लेकर लंबे समय तक बहस हुई कि कि मुक्तिबोध की रचनाओं में संघर्ष दिखाई देता है वह उनका अपना संघर्ष है या फिर पूरे मध्यवर्ग का संघर्ष है । कालांतर में अन्य आलोचकों ने रामविलास शर्मा की स्थापनाओं पर सवाल उठाए । मुक्तिबोध पर रामविलास शर्मा की स्थापनाओं को आलोचक नंदकिशोर नवल उनके संकीर्णतावादी मार्क्सवादी होने का परिणाम करार देते हैं और कहते हैं कि मुक्तिबोध ना केवल मानसिक रोगी नहीं थे बल्कि अपने युग के सर्वाधिक सुगठित व्यक्तित्ववाले रचनाकार थे । यह मुक्तिबोध की कविताओं की ताकत है कि वो अब तक आलोचकों को चुनौती दे रही है । सितंबर उन्नीस सौ पैंसठ के ज्ञानोदय में कवि श्रीकांत वर्मा का एक लेख छपा था जिसमें उन्होंने कहा था – ‘अप्रिय’ सत्य की रक्षा का काव्य रचनेवाले कवि मुक्तिबोध को अपने जीवन में कोई लोकप्रियता नहीं मिली और आगे भी, कभी भी, शायद नहीं मिलेगी । श्रीकांत वर्मा ने अपने उसी लेख में आगे मुक्तिबोध के कवित्व के वैशिष्ट्य को व्याखायित भी किया था । कालांतर में श्रीकांत वर्मा की आशंका गलत साबित हुई और मुक्तिबोध को उनकी मृत्यु के बाद पर्याप्त ख्याति मिली ।  अब भीमिल रही है । पिछले साल उनकी जन्म शताब्दी के मौके पर हफ्ते भर का कार्यक्रम आदि हुए ।
अभी हाल ही में कवि राजेश जोशी ने मुक्तिबोध संचयन का संपादन किया है । इस संचयन में मुक्तिबोध की कविताओं के अलावा उनकी कहानियां और उनका एक उपन्यास विपात्र संकलित है । इस किताब को देखने के बाद यह लगा कि हिंदी में संचयन के प्रकाशन की परंपरा का पूर्णत विकास होना शेष है । संचयन हिंदी में अंग्रेजी के रास्ते आया है जहां सलेक्टेड वर्क्स की लंबी और समृद्धशाली परंपरा रही है । हिंदी में संचयन को बहुत कैजुअली लिया जाता है । अब अगर हम समीक्ष्य संचयन को ही देखें तो इसमें मुक्तिबोध की एक साहित्यक की डायरी से कुछ भी नहीं लिया गया है जबकि मुक्तिबोध के संचयन की कल्पना उन लेखों के बगैर कैसे की जा सकती है । इस किताब में राजेश जोशी ने दस पन्नों की छोटी से भूमिका लिखी है जिसमें मुक्तिबोध से जुड़े प्रसंगों को ज्यादातर अन्य लेखकों के हवाले से कहा गया है । साहित्यक कृतियों के अलावा उनके व्यक्तिगत प्रसंगों की चर्चा है । मुक्तिबोध का चाय प्रेम और गिरे हुए घर से उबलते हुए चाय को उठा लाना दिलचस्प प्रसंग है । इसी तरह शादी के दौरान चाय पीने के लिए उतर जाना और बारात का उनको छोड़कर आगे बढ़ जाना जैसा प्रसंग पाठकों के लिए रुचिकर है । लेकिन ये सब ऐसे प्रसंग है जो पहले ही विस्तार से लिखे जा चुके हैं ।  
संचयन के संपादक राजेश जोशी का आग्रह है कि मुक्तिबोध की कविताओं को उनकी अन्य रचनाओं के साथ मिलाकर पढ़ा जाना चाहिए । जैसे अपनी भूमिका की शुरुआत में ही राजेश जोशी ने एक कविता उद्धृत की है – अगर मेरी कविताएं पसंद नहीं/उन्हें जला दो/ अगर उनका लोहा पसंद नहीं/उसे गला दो/अगर उसकी आग बुरी लगती है/दबा डालो/इस तरह बला टालो !/  । राजेश जोशी का आग्रह है कि इस कविता के के साथ ‘आत्म वक्तव्य’ शीर्षक कविता को मिलाकर पढ़ा जाए तो मुक्तिबोध की काव्य प्रक्रिया  और कविता के साथ उनके सरोकारों को समझा जा सकता है । उनकी बेचैनी, उऩके तनाव, उनकी कविता के बार-बार बनते बदलते, कई कई प्रारूप और उलके लंबे होते जाने को कुछ हद तक समझा जा सकता है । लेकिन इस संचयन के संपादक राजेश जोशी ने इस किताब में मुक्तिबोध की कविता- एक टीले और डाकू की कहानी को नहीं रखा । माना जाता है कि इस कविता में पहली बार आत्मसंघर्ष पहलीबार बहुत तीखे रूप में सामने आया था । दरअसल इस पूरी भूमिका में राजेश जोशी बहुधा एक पंक्ति लिखकर पूर्ववर्ती लेखको के मुक्तिबोध पर लिखे को कोट करते हैं । पाठकों की यह जिज्ञासा ये जानने में हो सकती है कि राजेश जोशी मुक्तिबोध के बारे में क्या सोचते हैं । एक कवि अपने पूर्ववर्ती कवि के बारे में क्या सोचता है । लेकिन ऐसा हो नहीं सका । मुक्तिबोध की राजनीतिक कविता के बारे में राजेश जोशी क्या सोचते हैं । इस बात पर प्रकाश डाला जाना चाहिए था कि मार्क्सवादी आलोचना से मुक्तिबोध की क्या शिकायत थी । यह जानना भी दिलचस्प होता कि राजेश जोशी इस बारे में क्या सोचते हैं । इस पूरे संचयन को देखने के बाद यह लगता है कि संपादक ने मुक्तिबोध की रचनाओं का चयन कर पाठकों के सामने पेश कर दिया । अच्छा होता अगर राजेश जोशी अपने इस चयन के आधार को विस्तार से सामने रखते । दरअसल येसंचयन ना होकर मुक्तिबोध की कहानियों, कविताओं और एक उपन्यास का संग्रह कहा जा सकता है जो लगभग साढे पांच सौ पन्नों का है । 

अभिव्यक्ति की आजादी की राजनीति

कन्नड़ के साहित्यकार प्रोफसेर कालबुर्गी की हत्या के बाद दक्षिण भारत खासकर कर्नाटक में साहित्यक विवाद लगातार गहराता जा रहा है । हिंदी जगत में भी जादुई यथार्थवादी कथाकार उदय प्रकाश ने भी इसको एक अवसर की तरह देखते हुए अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान कर, गर्माने की कोशिश की । साहित्य से जुड़े कुछ लोगों का कहना है कि गर्माने की नहीं भुनाने की कोशिश की । इसी तरह से जनवादी लेखक संघ और चंद लेखकों ने भी इसपर एतराज जताते हुए आंदोलन खड़ा करने की कोशिश की, लेकिन खास विचारधारा के इन लेखकों की साख इतनी नहीं है कि हिंदी जगह आंदोलित हो सके । खैर ये मुद्दा नहीं है । मुद्दा ये है कि कालबुर्गी की हत्या के बाद कर्नाटक के जो तमाम छुटभैये संगठन हैं, जो हिंदुत्व के नाम पर अपनी दुकान चला रहे हैं, उन्होंने भी इसको एक अवसर की तरह देखा और प्रचार पिपासा ने उनको आक्रामक कर दिया । ताजा मामला है कथित तौर पर बजरंग दल से जुड़े एक कार्यकर्ता की धमकी से । बजरंग दल से जुड़े होने का दावा करनेवाले एक शख्स ने कर्नाटक के रैशनलिस्ट माने जाने वाले लेखक के एस भगवान को जान से मारने की धमकी देते हुए एक ट्वीट किया है । खबर के आम होने के बाद पुलिस ने के एस भगवान को पर्याप्त सुरक्षा मुहैया करवा दी । हिंदी जगत के कई उत्साही लेखकों ने इसको फासीवाद के आसन्न खतरे की तरह देखा और इसको केंद्र की सरकार से जोड़कर छाती कूटने लगे । फासीवाद का राग बहुत लंबे समय से भारत में बजाया जा रहा है लेकिन अब तक फासीवाद आ नहीं पाया है । दरअसल फासीवाद-फासीवाद चिल्लाने वाले लोगों को भारतीय लोकतंत्र में आस्था और उसकी ताकत में भरोसा नहीं है । भारतीय लोकतंत्र अब इतना मजबूत हो चुका है कि उसको किसी भी तरह से भटकाना या भरमाना बहुत मुश्किल है । इंदिरा गांधी ने उन्नीस सौ पचहत्तर में एक कोशिश की थी लेकिन देश की जनता ने दो साल में ही उनको सबक सिखा दिया था । अब शायद ही कोई ऐसा करने की हिम्मत जुटा पाए ।
कर्नाटक या यों कहें कि पूरे दक्षिण भारत में साहित्यिक कृतियों के खिलाफ इस तरह की घटनाएं पहले भी घटती रही हैं । धमकियां आदि भी दी जाती रही हैं लेकिन प्रोफेसर कालबुर्गी की हत्या के बाद खतरा अवश्य बढ़ गया है । एक लोकतांत्रिक देश होने के नाते यहां हर किसी को अपनी बात कहने का जितना हक है उतना ही उसपर विरोध जताने का हक भी है, लेकिन हत्या करना या कानून को अपने हाथ में लेना बेहद आपत्तिजनक और घोर निंदनीय है । अब अगर हम दक्षिण भारत में इस तरह की बढ़ती घटनाओं की वजहों की तह में जाएं तो लगता है कि वहां की सामाजिक संरचना और कुरीतियां बहुत हद तक जिम्मेदार हैं । वहां के कई लेखकों ने इस सामाजिक विषमता के मद्देनजर अपनी लेखनी से उसपर जोरदार प्रहार किया । लेखकों ने समाज में व्याप्त इन विसंगतियों के लिए धर्म को जिम्मेदार मानते हुए विरोध की ध्वजा थामी । संभव है कि उनको ये बेहतर आधार लगा हो । धर्म के इस विरोध में कई बार तो लेखन की मर्यादा की लक्ष्मण रेखा पार हो गई ।  जैसे अगर हम के एस भगवान की ही बात करें तो उन्होंने 1985 में एक किताब लिखी थी शंकराचार्य एंड रिएक्शनरी फिलॉसफी । इस किताब में उन्होंने शंकराचार्य को जातिवाद की वकालत करनेवाला साबित करने की कोशिश की थी । संस्कृत के श्लोकों के आधार पर उन्होंने प्रतिपादित किया था कि शंकराचार्य दलितों और स्त्रियों के खिलाफ थे । के एस भगवान का कहना था कि शंकराचार्य दलितों और स्त्रियों की शिक्षा के खिलाफ थे । उस वक्त जब उनकी किताब आई थी तब भी उनका विरोध हुआ था । धरने प्रदर्शन हुए थे । उसके बाद भी प्रोफेसर भगवान अपने स्टैंड पर कायम रहे थे और यह सही भी था । हाल ही में उन्होंने फरवरी में एक सेमिनार में कहा कि भगवद गीता के नवें अध्याय को जला दिया जाना चाहिए, क्योंकि उसमें स्त्री, वैश्य, शूद्र को पापी कहा गया है । आरोप है कि अभी हाल ही में सितंबर में एक सेमिनार में भी प्रोफेसर भगवान ने एक सेमिनार में कथित तौर पर कहा कि भगवत गीता पढ़नेवाला आतंकवादी बन सकता है । उनके खिलाफ केस करनेवालों का इल्जाम है कि एक सेमिनार में प्रोफेसर भगवान ने राम और कृष्ण के बारे में भी आपत्तिजनक टिप्पणी की और कहा कि वो अपने जैविक पिता की संतान नहीं थे । इस तरह के वक्तव्य के बाद उनको विरोध हुआ और उनके खिलाफ धार्मिक भावनाएं भड़काने का केस भी दर्ज किया गया । भारत के संविधान में हर किसी को अपनी बात कहने का हक मिला है लेकिन उसी संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा भी तय की गई है । दोनों के बीच एक बहुत ही बारीक सी रेखा है जिसे बहुधा, जोश में लोग लांघा जाता है । इसका परिणाम यह होता है कि परिधि पर बैठे लोगों को केंद्र में आने का मौका मिल जाता है और वो उग्र और हिंसक होने लगते हैं जो कानून सम्मत नहीं है और जिसकी सभ्य समाज में कोई जगह नहीं है । विचारों की लड़ाई विचार से लड़ी जा सकती है बंदूक से नहीं । बंदूक से विचार को मानने के लिए बाध्य करने का सोवियत रूस और चीन का लंबा इतिहास रहा है जो कि भारत के लिए मुफीद नहीं है । भारत की जनता बार बार इसको ठुकरा भी चुकी है ।
विचारों की लड़ाई का एक उदाहरण गांधी जी के हवाले से समझा जा सकता है । उन्नीस सौ सत्ताइस में एक अमेरिकी लेखिका कैथरीन मेयो ने ‘मदर इंडिया’ के नाम से एक किताब लिखी थी जिसमें भारत के बारे में बहुत ही गलत बातें लिखी गई थी । उस किताब के प्रकाशन के बाद विंस्टन चर्चिल बेहद खुश हुए थे और उन्होंने अपनी खुशी का सार्वजनिक इजहार भी किया था। तब महात्मा गांधी ने उस किताब की समीक्षा लिखकर अपना तगड़ा एतराज जताया था । महात्मा गांधी ने तब लिखा था- ‘अगर मिस मेयो भारत में सिर्फ यहां की खुली नालियां और गंदगी देखने के नजरिए से आई थी तो उनकी इस किताब के बारे में कुछ भी कहना व्यर्थ होगा । पर अगर वो अपने घृणित और बेहद आपत्तिजनक गलत निष्कर्षों को अपनी जीत और महान खोज की तरह देखती हैं तो लेखिका की मंशा जानने के बाद कुछ कहने को शेष नहीं रहता।‘ इस तरह से उन्होंने उस किताब को दो तीन वाक्यों में खारिज कर दिया था और विंस्टन चर्चिल को भी जवाब दे दिया था । विचारों से लड़ने का यह तरीका ही सबसे अच्छा है । तर्कों को तर्कों से काटा जाए । तर्कों अपने विचारों से खारिज किया जाए ।

आज जो लोग अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर बीजेपी और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को घेरने की कोशिश करते हैं और उनको आजादी के लिए खतरा बताते हैं उनको एक और संदर्भ याद रखना चाहिए । संविधान में पहले संशोधन को लेकर बहुत जोरदार बहस हो रही थी मसला कुछ मौलिक अधिकारों को लेकर संशोधन का था । कई मसलों के अलावा संविधान के अनुच्छेद 19 में जो अभिव्यक्ति की आजादी का प्रावधान है उस पर कुछ अंकुश लगाए जाने की बात हो रही थी । संविधान इसमें जवाहरलाल नेहरू, सी राजगोपालाचारी, अंबेडकर समेत कई नेता इस पक्ष में थे कि अभिव्यक्ति की आजादी पूर्ण नहीं होनी चाहिए । बहस के दौरान जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि आजाद प्रेस युवाओं के दिमाग में जहर भर रहा है । तब श्यामा प्रसाद मुखर्जी अकेले ऐसे शख्स थे जिन्होंने इस लड़ाई को लड़ा था और कहा था कि अभिव्यक्ति की आजादी पर किसी भी तरह का अंकुश जायज नहीं होगा । कालंतर में इस तथ्य को बेहद चालाकी से दबा दिया गया। दरअसल इसके पीछे की पृष्ठभूमि ये थी कि उन्नीस सौ पचास में क्रास रोड नामक पत्रिका में नेहरू की नीतियों की जमकर आलोचना हुई थी और नेहरू इससे खफा होकर प्रेस पर अंकुश लगाना चाहते थे । उस वक्त की मद्रास सरकार ने क्रास रोड पर पाबंदी लगाई थी । आजाद भारत में ये पहली पाबंदी थी । क्रास रोड इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई थी और यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोमेश थापर का केस अब भी कई मामलों में नजीर बनता है । अब वक्त आ गया है कि अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर एक बार फिर से राष्ट्रव्यापी बहस हो जिसमें तथ्यों को समग्रता में रखकर बहस हो और देश किसी ठोस नतीजे पर पहुंचे तभी विचारों की लड़ाई में खून खराबा नहीं होगा ।   

Sunday, September 20, 2015

पर्दे पर 'गुनाहों का देवता'

हिंदी साहित्य की दुनिया में कदम रखनेवालों को या हिंदी साहित्य को पढ़ने की शुरुआत करनेवालों को एक किताब खास तौर पर लुभाती है । ये किताब है – गुनाहों का देवता जिसके लेखक हैं धर्मवीर भारती । गुनाहों का देवता एक ऐसा उपन्यास है जिसको हिंदी में सही अर्थों में बेस्टसेलर कहा जा सकता है । उन्नीस सौ उनचास में प्रकाशित इस उपन्यास को अबतक अस्सी या उससे ज्यादा संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं । किसी भी पुस्तक मेले में धर्मवीर भारती का ये उपन्यास अच्छी खासी संख्या में बिकता रहा है । सुधा और चंदर की प्रेम कहानी में युवा पाठक अपना अक्श ढूंढता है और उसके पात्रों में अपने को पाता है, यही इस उपन्यास की सफलता की वजह है । हिंदी के इस बेहद लोकप्रिय उपन्यास पर अब एक निजी मनोरंजन चैनल पर धारावाहिक की शुरुआत हो रही है जिसका नाम है एक था चंदर और एक थी सुधा । सुधा और चंदर धर्मवीर भारती के उपन्यास गुनाहों के देवता के मुख्य किरदार हैं और उनकी ही प्रेम कहानी के इर्द गिर्द ये उपन्यास शुरू होकर खत्म होता है । पहले भी साहित्यक कृतियों पर धारावाहिक और फिल्में बनती रही हैं लेकिन गुनाहों का देवता को लेकर हिंदी पट्टी के दर्शकों में खासी उत्सकुकता है । सोशल मीडिया पर भी इसको लेकर खूब चर्चा हो रही है । हिंदी के पाठकों के अलावा आलोचकों में भी इस सीरियल को लेकर उत्सुकता बनी हुई है । फिल्म समीक्षा के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित विनोद अनुपम ने लिखा है कि- गुदगुदी सी हो रही है, अचानक दिखा कि धर्मवीर भारती के उपन्यास गुनाहों का देवता पर धारावाहिक प्रसारण को तैयार है, मन से हट ही नहीं रहा है कि कैसे दिखेंगे सुधा और चंदर । विनोद अनुपम ने हिंदी के उन लाखों पाठकों की आकांक्षा को वाणी दी है जो गुनाहों के देवता के नायक और नायिका सुधा और चंदर की कल्पना करते हुए जवान और प्रौढ हो गए हैं । सुधा और चंदर की रूमानी कहानी को पर्दे पर उतारना एक बड़ी चुनौती है । पिछले पैंसठ साल में इस उपन्यास पर फिल्म बनाने की कई लोगों ने कोशिश की लेकिन सुधा और चंदर के उलझे हुए प्रेम संबंधों को पर्दे पर उतारने की चुनौती किसी निर्देशक ने स्वीकार नहीं की । जहां तक मुझे याद है कि एक बार किसी निर्देशक ने अमिताभ बच्चन और जया बच्चन को लेकर – एक थी सुधा और एक था चंदर- फिल्म बनाने का एलान किया था लेकिन वो सिर्फ घोषणा ही रह गई ।
दरअसल धर्मवीर भारती के इस उपन्यास गुनाहों का देवता भावप्रधान है । हलांकि आलोचक गोपाल राय कहते हैं कि – गुनाहों का देवता कैशोर भावुकता से भरा उपन्यास है जिसमें प्रेम की उत्कटता भावुकता के स्तर पर दम तोड़ देती है । लिहाजा यह कहा जा सकता है कि इस उपन्यास के भावों और भावुकता को पर्द पर उतारना बहुत मुश्किल काम है । भाव को लिखा जा सकता है, भाव को महसूस किया जा सकता है लेकिन भाव को दृश्यों में उतारकर पेश करना बेहद चुनौती भरा काम है । मुझे लगता है कि इसी कठिन चुनौती को ध्यान में रखते हुए अबतक इस उपन्यास पर कोई फिल्म नहीं बन सकी । हिंदी जगत की उत्सकुता की वजह भी यही है कि धारावाहिक निर्माता ने सुधा और चंदर के भावों को किस तरह से सामने रखा । इलाहाबाद की पृष्ठभूमि में लिखे गए इस उपन्यास की कहानी बेहद साधारण है लेकिन सुधा औप चंदर के मनोभावों को जिस तरह से धर्मवीर भारती ने पेश किया था वह अद्वितीय है । 

आचार्य पर अद्भुत ग्रंथ

हिंदी की बहुत सारी ऐसी महत्वपूर्ण किताबें हैं जो अब लगभग अप्राप्य हैं, जिसकी वजह से नए जमाने के पाठकों का उनसे और उसके लेखक से परिचय नहीं है । ये ऐसे ग्रंथ हैं जिनके पुनर्प्रकाशन से हिंदी को आगे बढ़ाने में मदद मिलती या फिर हिंदी के पाठकों को समृद्ध करने में मदद मिलती । एक जमाने में काशी नागरी प्रचारिणी, नागिरी प्रचारणी सभा,खडगविलास प्रेस, नवल किशोर प्रेस आदि से इतनी महच्वपूर्ण किताबें छपी थी जो कि इस वक्त लगभग अप्राप्य हैं । पिछले दिनों पं किशोरीदास वाजपेयी की किताब ‘हिंदी शब्दानुसान’ पढ़ने की जरूरत महसूस हुई । इस किताब को खोजने का प्रयास शुरू हुआ, दिल्ली से लेकर वाराणसी तक के अपने संपर्कों को खटखटाया लेकिन किताब उपलब्ध नहीं हो सकी । बाद में मित्र अरुण माहेश्वरी ने वो पुस्तक उपलब्ध करवाई । हिंदी लिखनेवालों के लिए पंडित किशोरी दास वाजपेयी की यह किताब उतनी ही आवश्यक है जितनी जिंदगी को चलाने के लिए खाना या पानी । हो सकता है मेरी यह तुलना कुछ लोगों को अतिशयोक्ति लगे लेकिन जिस तरह से किशोरीदास वाजपेयी ने हिंदी और अन्य भाषा को जोड़कर शब्दों के उपयोग को सिखाया है वह अद्भुत है । अफसोस कि यह किताब लगभग अनुपलब्ध है । अब संभवत वाणी प्रकाशन से इसके छापने की योजना बन रही है । इसी तरह से कई किताबें हैं जिसका फिर से अगर प्रकाशन किया जाना चाहिए । दूसरी बड़ी समस्या है कि जिन किताबों का फिर से प्रकाशन हुआ उसमें धीरे-धीरे खुद ही बदलाव होते चले गए । जैसे प्रेमचंद का मशहूर उपन्यास ‘गो-दान’ से ‘गोदान’ हो गया । जब दस जून उन्नीस सौ छत्तीस में प्रेमचंद का उपन्यास ‘गो-दान’ छपा था तब ‘गो’ और ‘दान’ के बीच हाइफन था । इसके आवरण पृष्ठ पर यह शीर्षक अंकित है. साथ ही नीचे सरस्वती प्रेस, बनारस और हिंदी ग्रंथ रत्नाकर कार्यालय, बम्बई छपा हुआ है । अभी प्रेमचंद साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान कमल किशोर गोयनका के संपादन में प्रकाशित हुई गो-दान में कई दिलचस्प बातें हैं । जैसे कमल किशोर गोयनका ने जनार्दन प्रसाद झा द्विज को उद्धृत करते हुए लिखा है – जनार्दन प्रसाद झा द्विज ने अपनी पुस्तक ‘प्रेमचंद की उपन्यास कला’ में लिखा है कि प्रेमचंद ने इसका नाम ‘गौ-दान’ रखा था, परंतु मेरे कहने से ‘गौ’ के स्थान पर ‘गो’ अर्थात ‘गो-दान’ कर दिया । अब ये सब हिंदी के पाठकों के लिए दिलचस्प प्रसंग हैं । हलांकि इस प्रसंग में तो विस्तृत शोध की आवश्यकता है कि क्योंकर और कैसे गो-दान से गोदान हो गया । अपनी इस किताब में कमल किशोर गोयनका ने इस बात के पर्याप्त संकेत किए हैं कि प्रेमचंद के इस उपन्यस के मूल पाठ में भी बदलाव हुआ है । यह विषय एक अलग लेख का है, ज्सपर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी ।
अभी हाल ही में हिंदी के एक और पुराने  और दुर्लभ ग्रंथ का पुनर्मुद्रण हुआ है । यह है आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ । यह किताब आज से करीब बयासी साल पहले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सत्तरवें वर्ष में प्रवेश के मौके पर उन्नीस सौ तैंतीस में छपा था । दरअसल इस ग्रंथ के छपने के पीछे की भी एक दिलचस्प कहानी है । बात 1932 की है आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी एक दिन के लिए काशी पधारे थे । उस वक्त काशीनागिरी प्रचारिणी सभा की ओर से उनको एक अभिनंदन पत्र दिया गया था । बात आई गई हो गई थी । कई दिनों बाद शिवपूजन सहाय ने काशी नागिरी प्रचारिणी सभा के मंत्री से चर्चा की कि सभा को केवल मानपत्र देकर ही नहीं रह जाना चाहिए, आचार्य के अभिनंदन के लिए एक सुंदर ग्रंथ का भी प्रकाशन होना चाहिए । सभा ने आचार्य शिवपूजन सहाय के इस प्रस्ताव पर सहमति दे दी और किताब छपने का काम शुरू कर दिया गया । आर्थिक संकट से निबटने के अलावा देश दुनिया के विद्वानों की आचार्यमहावीर प्रसाद द्विवेदी के बारे में राय मंगवाने की भी बड़ी चुनौती थी । काम शुरू हुआ तो आगे चलता चला गया । आचार्य अभिनंदन ग्रंथ के प्रकाशन के लिए इसके कर्ताधर्ताओं ने बेहद बारीकी से योजना बनाई थी । उस वक्त के अखबारों में इस योजना की चर्चा शुरू की गई ताकि इस किताब के बारे में उत्सकुता का एक वातावरण तैयार हो सके । यह योजना काम कर गई थी और हिंदी पट्टी में आचार्य के उपर प्रस्तावित ग्रंथ की चर्चा शुरू हो गई थी । एक समय तो ऐसा आया था कि लगा कि अब इस किताब के प्रकाशन की योजना पर ग्रहण लग जाएगा । जब इस किताब को छापने के लिए सभा के सामने आर्थिक संकट उत्पन्न हुआ तो वो उस वक्त देश के तमाम बड़े और धनवान लोगों के पास आर्थिक सहायता के लिए पत्र भेजा गया लेकिन बड़े-बड़े लोगों ने कोई मदद नहीं की । सबने योजना को अच्छा बताते हुए उसकी तारीफ की लेकिन आर्थिक मदद करने में असमर्थता जाहिर कर दी थी । इसके बाद राजाओं के पास संदेश भेजा गया । अखबारों में चर्चा का एक लाभ यह हुआ कि राजाओं के पास इस योजना की जानकारी पहुंच चुकी थी । उस वक्त के कई राजाओं ने इस किताब को छापने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की । सीतामऊ के राजपरिवार ने ना केवल सौ रुपए की आर्थिक मदद की बल्कि देश भर के राजघरानों से आर्थिक मदद दिलाने में सभा की  सहायता की । उस ग्रंथ की भूमिका में भी इस बात का उल्लेख मिलता है – ‘विषम आर्थिक परिस्थिति के कारण हमें आर्थिक सहायता प्राप्त करने में बड़ी अड़चन पड़ी । हमारे उद्देश्यों से सहानुभूति रखते हुए भी बड़े-बड़े श्रीमानों तक ने हमें कोरा उत्तर दे दिया । यदि सीतामऊ के राजकुल ने हमारा हाथ ना पकड़ा होता तो संभवत: हमें यह प्रस्ताव स्थगित कर देना पड़ता । हमारी प्रार्थना पहुंचते ही वहां के विद्या रसिक महाराज महोदय ने सौ रुपए का दान देकर हमें प्रोत्साहित किया । इसके अनंतर वहां के विद्वान राजकुमार ने, जिन्होंने हिंन्दी सेवा का व्रत धारण किया है और जो हिंदी के एक श्रेष्ठ उदयीमान लेखक हैं, अपने कई इष्ट मित्र नरपतियों से हमें सहायता दिलवाई ।‘ अब इस तरह के वाकयों से हिंदी जगत लगभग अपरिचित है । इस तरह के ऐतिहासिक महत्व की किताबों को छापने का काम साहित्य अकादमी या नेशनल बुक ट्रस्ट को करना चाहिए ।

अभी हाल ही में नेशनल बुक ट्रस्ट ने आचार्य द्विवेदी के जन्मस्थान दौलतपुर में सक्रिय संस्था आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति के सौजन्य से हासिल इस दुर्लभ ग्रंथ को फिर से छापा है । दरअसल आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के एक सौ पचासवीं वर्षगांठ पर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति, रायबरेली ने इस दुर्लभ ग्रंथ को फिर से छपवाने का बीड़ा उठाया था । जिस तरह से पहली बार इस ग्रंथ को छपने में बाधा आई थी उसी तरह से कई कठिनाइयों का सामना इसके पुनर्प्रकाशन में भी करना पड़ा । साहित्यप्रेमी और पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने भी इसमें पहल की और नेशनल बुक ट्रस्ट इसको छापने के लिए तैयार हुआ । पुनर्प्रकाशित इस ग्रंथ के महत्व को रेखांकित करते हुए आलोचक मैनेजर पांडे ने विस्तार से एक लेख लिखा है । मैनेजर पांडे ने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को युगद्रस्टा और युगस्रस्टा करार दिया है । मैनेजर पांडे ने साफ तौर पर कहा है कि आचार्य जी की साहित्य की धारणा बहुत ही व्यापक थी । वे केवल कविता, कहानी, उपन्यास नाटक, और आलोचना को ही साहित्य नहीं मानते थे । उनके अनुसार किसी भी भाषा में मौजूद ज्ञानराशि साहित्य है । द्विवेदी जी की यही धारणा उनके लेखन में भी दिखाई देती है जब वो उस वक्त के लगभग हर विषय पर अपनी लेखनी चलाते नजर आते हैं । उनकी किताब ‘संपत्तिशास्त्र’ इसका बेहतरीन नमूना है । कहा जाता है कि हिंदी में इस किताब की टक्कर की दूसरी किताब नहीं है । आचार्य अभिनंदन ग्रंथ को देखकर इस बात का अंदाज लगाया जा सकता है कि उनके समकालीन उनके बारे में क्या सोचते थे । ये अभिनंदन ग्रंथ हाल के दिनों में छप रहे अभिनंदन ग्रंथ की तरह नहीं है बल्कि यह कहा जा सकता है कि इसमें जिन लोगों की राय है उससे आचार्य की एक लेखक के तौर पर और एक व्यक्ति के तौर पर छवि का निर्माण होता है । इस किताब में मैथिलीशरण गुप्त, सियाराम शरण गुप्त, वासुदेव शरण अग्रवाल, मौलाना सैयद हुसैन शिबली, संत निहाल सिंह, जार्ज ग्रियर्सन से लेकर महादेवी वर्मा, प्रेमचंद के अलावा महात्मा गांधी की राय भी है । पिछले दिनों वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने हनुमान प्रसाद पोद्दार के पत्रों को संग्रहित संपादित किया था – पत्रों में समय संस्कृति । इसके बाद अब आचार्य अभिनंदन ग्रंथ का प्रकाशन हिंदी के लिए एक शुभ संकेत है । हलांकि ये आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति के गौरव द्विवेदी और पत्रकार अरविंद सिंह की पहल पर हुआ है, लेकिन नेशनल बुक ट्रस्ट को इस दिशा स्वतंत्र रूप से खोजबीन कर दुर्लभ ग्रंथों के प्रकाशन की पहल करनी होगी ताकि हिंदी के नए पाठकों को अपने गौरवशाली अतीत से परिचय हो सके ।