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Monday, November 21, 2011
सपने सच नहीं होते, काटजू साहब
न्यूज चैनल में काम करते हुए मैं अपने अनुभवों से यह मानता हूं कि कुछ चैनलों ने गलतिया की हैं । खबरों के नाम पर मनोरंजन, खबरों के नाम फिक्शन, खबरों के नाम पर नाच गाना, खबरों के नाम पर मरते लोगों की तस्वीरें, खबरों के नाम पर फिल्मों के विवाद, खबरों के नाम पर ज्योतिष के कार्यक्रम आदि दिखाए गए और अब भी दिखाए जा रहे हैं। कुछ चैनलों पर ऐश्वर्या राय के बच्चे के जन्म को लेकर भी आपत्तिजनक और निजता का हनन करनेवाले कार्यक्रम दिखाए गए । उन कार्यक्रमों की आलोचना भी हुई और खुद मीडिया के लोगों ने उस पर आपत्ति उठाई । ना सिर्फ आपत्ति उठाई बल्कि उसको लेकर संपादकों के बीच जमकर बहस भी हुई । लेकिन ये बातें सार्वजनिक नहीं होती इस वजह से लोगों को लगता है कि न्यूज चैनलवाले तो बस खबरों के अलावा सबकुछ करते हैं । लोगों के बीच बन रहे इसी परसेप्शन का प्रतिरोध करने के लिए संपादकों की संस्था ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन ने ऐश्वर्या राय के बच्चे के जन्म को लेकर जो गाइडलाइन बनाई उसको जारी कर दिया । यह पहली बार नहीं हुआ है कि मीडिया ने खुद को नियंत्रित करने के लिए इस तरह की गाइडलाइन जारी की है । पहले भी कई बार इस तरह के गाइडलाइंस बने और उसका सभी ने पालन भी किया ।
कुछ चैनलों पर इस तरह के कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं तो कुछ चैनलों पर बुंदेलखंड में भूख से मरते किसानों की व्यथा, बुंदेलखंड में ही रोटी के लिए जिस्म बेचती औरतें, सूखे की भयावहता से परेशान किसानों पर स्पेशल सीरीज से लेकर समसामयिक मुद्दों पर घंटे घंटे भर के कार्यक्रम भी दिखाए गए हैं । लेकिन जब आपने तय कर लिया है कि न्यूज चैनल सिर्फ कूड़ा परोसते हैं तो फिर आपको ये कार्यक्रम नहीं दिखाई देंगे । पिछले तकरीबन साल भर से जिस तरह से न्यूज चैनलों ने भ्रष्टाचार को उजागर करने में आक्रामकता दिखाई है क्या वो भी भारतीय प्रेस परिषद के नवनियुक्त अध्यक्ष को दिखाई नहीं देता । न्यूज चैनलों पर जिंदगी लाइव जैसे कार्यक्रम भी आते हैं जहां समाज के उन तबके के लोगों के दुखदर्द शेय़र किए जाते हैं जिनकी और ना तो सरकार का और ना ही किसी और का ध्यान जाता है । पिछले गुरुवार को दिल्ली में समारोह पूर्वक जिंदगी लाइव अवॉर्ड्स दिए गए । जिन दस लोगों को इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया उनके बारे में, उनके अनुभवों के बारे में जस्टिस काटजू जैसे लोगों को बताना और जानना जरूरी है । मक्का मस्जिद धमाके का आरोपी कैसे करीब दो साल तक जेल में रहता है और फिर अदालत से बरी होने के बाद जब अपने परिवेश में वापस लौटना चाहता है तो समाज उसे अस्वीकार कर देता है । उसी दौर में जिंदगी लाइव के शो में उससे बातचीत होती है । कार्यक्रम में बातचीत के दौरान इमरान अपना दर्द, अपनी पीड़ा और समाज से अस्वीकार होने की व्यथा बयान करते है । उसने पुरस्कार को स्वीकार करते हुए यह बात बताई कि जिंदगी लाइव कार्यक्रम पर आने के बाद उसकी जिंदगी बदल गई । उसे न केवल समाज ने स्वीकार किया बल्कि उसे कॉलेज में वापस दाखिला भी मिला। पढ़ाई खत्म करते ही उसे नौकरी मिली और आज वो आतंकवादी होने के सदमे से उबर पाया है । जस्टिस काटजू साहब यही है मीडिया की ताकत और यही है मीडिया के सामाजिक सरोकार जिसका निर्वहन वो पूरी जिम्मदारी से कर रहा है । लेकिन जब अच्छी चीजों की तरफ से मुंह मोड़ लेंगे और सिर्फ वही देखना चाहेंगे जिसके बारे में राय बना चुके हैं तो जिंदगी लाइव जैसे कार्यक्रम आपको दिखाई नहीं देंगे । इसी कार्यक्रम में सामने आकर कई घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत मिली । बाल यौन शोषण के शिकार लड़के की कहानी सुनकर इस अपराध के शिकार बच्चों को वाणी मि्ली और उन्होंने प्रतिकार करना शुरू कर दिया । दंगा पीड़तों के दर्द को भी इस मंच ने अपनी आवाज उठाने की सहूलियत दी । मुझे अब भी याद है कि 1984 के सिख दंगों की शिकार एक महिला किस तरह से कार्यक्रम के अंत में खड़ी होती हैं और भावनाओं के ज्वार में उसकी एंकर ऋचा से कहती हैं- जा बेटी जा ! तु्म्हें मेरी उमर लग जाए । आजतक किसी ने मेरी बात नहीं सुनी थी तुमने मेरा दर्द सुनकर कलेजा हल्का कर दिया । जस्टिस काटजू साहब अगर आपने दंगा पीड़ित उस महिला की वो आवाज सुनी होती तो आपकी राय बदल गई होती, शायद आंखें भी खुल गई होती । लेकिन क्या करें आपको तो सिर्फ राखी सावंत और नाच गाना ही दिखता है ।
काटजू ने एक और घोर आपत्तिजनक और निहायत ही गैरजिम्मदाराना बयान दे डाला । उन्होंने तहा कि मीडिया समाज को बांटने का काम कर रहा है । काटजू जैसे विद्वान और सुप्रीम कोर्ट जैसी सर्वोच्च गरिमामय संस्थान में रहने के बाद भी काटजू से इस तरह के हल्के बयान की अपेक्षा तो दूर की बात कल्पना भी नहीं की जा सकती थी । अपने इस बयान के समर्थन में काटजू ने जो तर्क दिए वो भी बेहद हास्यास्पद और लचर थे । काटजू साहब को अयोध्या के बाबरी विवाद के समय इलाहाबाद होईकोर्ट की लखनऊ बेंच के फैसले के वक्त की न्यूज चैनलों की कवरेज भी याद नहीं रही । अयोध्य़ा विवाद के फैसले की जिस तरह से रिपोर्टिंग की गई या उसके पहले संपादकों और न्यूज चैनल में काम करनेवाले पत्रकारों ने माथापच्ची की उसका एहसास काटजू को नहीं है । होना भी नहीं चाहिए । क्योंकि ये तो हमारा काम है । लेकिन जब प्रेस काउंसिल का अध्यक्ष इस तरह का गैर जिम्मेदाराना बयाने देकर समाज में एक भ्रम का वातावरण तैयार करे तो उसका प्रतिकार और प्रतिरोध हर स्तर पर किया जाना चाहिए । प्रेस काउंसिल का अध्यक्ष बनने के बाद काटजू मुंगेरी लाल की तरह हसीन सपने भी देखने लगे हैं । वो मीडिया पर अंकुश लगाने और उसे डंडे के जोर पर चलाने की वकालत कर रहे हैं । सरकार से पद मिलने के बाद अब वो मीडिया पर अंकुश लगाने की ताकत भी पाना चाहते हैं । लेकिन जस्टिस काटजू यह भूल गए हैं कि सपने सपने ही होते हैं और वो कभी सच नहीं होते । काटजू तो मीडिया पर अंकुश लगाने का सपना दिन के उजाले में देख रहे हैं । काटजू जैसा विद्वान यह कैसे भूल सकता है कि इमरजेंसी के दौर को भी भारतीय मीडिया ने देखा और उस समय भी अपनी साख और प्रतिरोध की ताकत के बल पर अपने को बचाए रखने में कामयाब हो गया । इमरजेंसी के दौर में भी मीडिया पर अंकुश लगाया गया था । अंकुश लगाने का सपना देखने वाले तो इतिहास के पन्नों में गुम हो गए हैं लेकिन प्रतिरोध करनेवाले आज भी समाज के हीरो हैं । मीडिया पर अंकुश या उसे डंडे के जोर पर हांकने का दिवास्वपन देखना छोड़ दीजिए । रही बात न्यूज चैनलों की गलतियों की तो उसमें हर दिन सुधार किया जा रहा है । ब्रॉडकास्टर्स की आत्म नियंत्रण की एक संस्था है जिसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जे एस वर्मा है । इसके अलावा संपादकों की संस्था बीईए ने भी इस दिशा में मजबूती से कदम उठाए हैं । जनता के प्रति हमारी जवाबदेही है और हम लोकतंत्र के प्रहरी के तौर पर इस जिम्मेदारी को बखूबी समझते हैं । आपके उपदेश की हमें जरूरत नहीं है ।
Monday, November 14, 2011
लेखको, माफी मांगो !
श्रीलाल जी के निधन से एक और हसरत मन में ही रह गई । दो हजार दो में मेरे श्वसुर (अब स्वर्गीय) प्रो प्रियवत नारायण सिंह जी ने मुझे रागदरबारी का पहला संस्करण भेंट किया । मेरे लिए यह एक अमूल्य भेंट थी । मेरे पास राग दरबारी का पेपर बैक संस्करण था । राग दरबारी का पहला संस्करण 1968 में राजकमल प्रकाशन प्रा लिमिटेड दिल्ली-6 से छपा था । उस संस्करण पर उपन्यास का मूल्य 15 रु अंकित है । पहले संस्करण का कवर रिफार्मा स्टूडियो, दिल्ली ने बनाया था । लेकिन जब मुझे राग दरबारी का पहला संस्करण मिला तो उसका कवर नहीं था । मैंने यूं ही राजकमल प्रकाशन के मालिक अशोक महेश्वरी को पहले संस्करण की प्रति के बारे में चर्चा की । उन्होनें सुनते ही प्रस्ताव रखा कि मैं उनको पहले संस्करण की प्रति दे दूं, बदले में वो मुझे राग दरबारी की पांच प्रतियां दे देंगे । मैंने विनम्रतापूर्वक उनके प्रस्ताव को मना कर दिया । थोड़ी निराशा उनके चेहरे पर अवश्य दिखी लेकिन मेरी भावनाओं को उन्होंने समझा । मेरे पास राग दरबारी का कवर नहीं था। मैंने अशोक जी से एक कवर मांग लिया । अब मेरे पास जो राग दरबारी है वो पहला संस्करण है लेकिन कवर बाद के संस्करण का है । मैं जब भी लखनऊ जाता था तो सोचता था कि इस बार श्रीलाल शुक्ल से मिलूंगा और उनसे किताब पर दस्तखत लूंगा और कवर के बारे में मालूम करूंगा । लेकिन श्री लाल जी के निधन के बाद ये इच्छा पूरी नहीं हो सकी ।
लेकिन श्रीलाल जी की बीमारी और उनके निधन के बहाने मैं एक और बात शिद्दत से उठाना चाहता हूं । जब श्रीलाल जी बीमार थे और लखनऊ के अस्पताल में भर्ती थे तो अचानक से एक दिन दिल्ली के कुछ लेखकों की ओर से एक अपील जारी हुई । जिसमें सरकार से श्रीलाल जी की बीमारी के मद्देनजर सरकार से उनके समुचित इलाज की व्यवस्था करवाने की अपील की गई थी । अपील पर दस्तखत करनेवालों में सर्वश्री अशोक वाजपेयी, राजेन्द्र यादव, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, चंचल चौहान, पंकज विष्ट और रेखा अवस्थी के नाम प्रमुख हैं । इस मुहिम के अगुवा मुरली मनोहर प्रसाद थे । श्रीलाल जी वरिष्ठ आईएएस अफसर थे और उत्तर प्रदेश में प्रमुख सचिव के पद से रिटायर हुए थे । लिहाजा उनके पास सीजीएचएस की सुविधा होनी चाहिए । उसके अलावा उनका भरा पूरा समृद्ध परिवार है जो उनके इलाज के लिए स्वत सक्षम है । दिल्ली में 3 नवंबर को श्रीलाल जी की श्रद्धांजलि सभा का भव्य आयोजन हुआ था । उससे भी जाहिर होता है कि परिवार को कोई कमी नहीं है । लेखकों ने इस तरह की अपील जारी कर श्रीलाल जी का अपमान किया । बेवजह उनको दयनीय बनाने की कोशिश की गई । मुझे लगता है कि अगर जीते जी श्रीलाल जी को इस बात का पता चल गया होता तो तो वो बेहद नाराज होते । लखनऊ के उनके कई करीबी लोगों से मेरी बात हुई सबने यही कहा कि श्रीलाल जी बेहद स्वाभिमानी व्यक्ति थे और अगर वो इसका प्रतिरोध करने की स्थिति में होते तो जरूर करते । मेरे हिसाब से सरकार से मदद की अपील अनावश्यक और गैरजरूरी थी । यह अपील जारी करके लेखकों ने श्रीलाल जी का घोर अपमान किया है और उसको माफी मांग कर अपनी गलती को सुधारना चाहिए । क्या अशोक वाजपेयी, राजेन्द्र यादव, पंकज बिष्ठ, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह यह साहस दिखा पाएंगे और श्रीलाल जी और उनके परिवार से माफी मांग कर मिसाल कायम करेंगे । करना चाहिए । बड़प्पन इसी में है ।
Friday, October 28, 2011
उच्च मानदंड की अपेक्षा
दूसरा संगीन इल्जाम लगा है टीम अन्ना के एक और अहम सदस्य डॉक्टर कुमार विश्वास पर । अन्ना आंदोलन के दौरान कुमार विश्वास बड़े जोश-ओ-खरोश के साथ रामलीला मैदान में मंच संचालन करते नजर आए थे । उसके बाद गाहे बगाहे खबरिया चैनलों ने भी उनको तवज्जो दी । कुमार विश्वास ने भी खुद को टीम अन्ना का प्रवक्ता साबित करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी । कुमार विश्वास ने खुद को टीम अन्ना के अहम सदस्य के तौर पर स्थापित भी कर लिया । लेकिन इन सबके बीच कुमार यह भूल गए कि वो गाजियाबाद के लाजपत राय कॉलेज में शिक्षक भी हैं । आरोप है कि बेईमानी के खिलाफ ईमानदारी का झंडा थामे कुमार विश्वास ने क्लास लेना बंद कर दिया । देश के लिए बड़ी जिम्मदारी निभाने वाला शख्स छात्रों के प्रति अपनी जिम्मेदारी भुला बैठा । छात्र कॉलेज आते रहे और शिक्षक के गैरहाजिर रहने पर मायूस होकर लौटते रहे । कॉलेज प्रशासन के मुताबिक कुमार विश्वास बगैर किसी जानकारी से अनुपस्थित रहते हैं । कुमार विश्वास कवि सम्मेलनों में जाकर ज्ञान का अलख जगा रहे हैं, पैसे भी कमा रहे हैं । पैसा कमाना गलत नहीं है लेकिन नौकरी करते हुए बगैर छुट्टी के आंदोलन में शामिल होना, चुनाव में दौरे पर जाना कितना जायज है । क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है कि जिस काम के लिए आपको पैसे मिलते हैं उसको आप उचित ढंग से नहीं कर रहे हैं । अरविंद केजरीवाल ने कुमार विश्वास के मसले पर भी सफाई देने की कोशिश की और इस मुद्दे को भी जनलोकपाल से ध्यान भटकाने वाला करार दिया । लेकिन क्या टीम अन्ना पर उठनेवाला हर सवाल जनलोकपाल से भटकाने के लिए उठाया जा रहा है । अरविंद जैसे समझदार आदमी से इस तरह के लचर तर्क की अपेक्षा नहीं थी। यहां यह जानना दिसचस्प होगा कि कुमार विश्वास ने अगर अपने कॉलेज से छुट्टी ली तो वजह क्या बताई । सवाल यह है कि टीम अन्ना अगर ईमानदारी और नैतिकता की बात करेंगे तो उन्हें पहले खुद ही उसका पालन करना होगा ।
टीम अन्ना ने जब भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का ऐलान किया था तो पूरे देश ने उन्हें सर आंखों पर बिठा लिया था । टीम अन्ना के हर सदस्य को लेकर, टीम अन्ना के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं को लेकर समाज में एक इज्जत बनी थी । जब दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना हजारे अनशन पर बैठे थे तो तिरंगा हाथ में लिए लोगों को, बाइक सवार युवकों को लोग अपनी गाड़ियां रोककर रास्ता देते थे । यह उसी प्रकार की श्रद्धा का प्रदर्शन था जैसा कि लोग कांवड़ियों को रुककर रास्ता देते वक्त करते हैं । कहने का मतलब यह कि देश की जनता के मन में टीम अन्ना और उसकी विश्वसनीयता की बेहद उंची जगह बनी थी । टीम अन्ना भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ऐसे प्रतीक के तौर पर उभरी थी जिसपर पूरा देश आंख मूंदकर श्रद्धाभाव से यकीन कर रहा था । आंदोलन शुरू होने के बाद टीम अन्ना के कई सदस्यों पर संगीन इल्जाम लगने शुरू हो गए । सबसे पहले प्रशांत भूषण को नोएडा में फॉर्म हाउस के लिए जमीन आवंटन का मामला उछला । उस जमीन का आवंटन भी टेलीकॉम स्पेक्ट्रम की तरह पहले आओ पहले पाओ की नीति के तहत किया गया था । नोएडा की जमीन का मामला थमा भी नहीं था कि इलाहाबाद के उनके घर की रजिस्ट्री की फीस का मामला सामने आया । प्रशांत भूषण के बाद अरविंद केजरीवाल को इंकम टैक्स विभाग की तरफ से बकाया राशि चुकाने का नोटिस मिला । लेकिन जब ये आरोप लग रहे थे तो अन्ना आंदोलन अपने चरम पर था और लोगों को लगा कि सरकार और चंद लोग टीम अन्ना को बदनाम करने की साजिश रच रहे हैं । प्रशांत और अरविंद पर लग रहे आरोपों का असर उल्टा हुआ था । देश की जनता और मजबूती के साथ टीम अन्ना से जुड़ती चली गई ।
अब वक्त आ गया है कि टीम अन्ना को उन्हीं उच्च मानदंडों पर खरा उतरना होगा जिसके लिए वो आंदोलन कर रहे हैं । गांधी जब कोई बात कहते थे तो पहले खुद उसपर अमल करते थे । गांधी उपदेश कम देते थे मिसाल कायम करके जनता को वो काम करने के लिए प्रेरित ज्यादा करते थे । गांधी के अनुयायियों ने भी उसी सिद्धांत पर अमल किया । टीम अन्ना से भी देश उसी ईमानदारी और नैतिकता की अपेक्षा रखता है ।
Monday, October 24, 2011
अमिताभ का विरोध क्यों ?
हिंदी के एक और लेखक अशोक वाजपेयी -जिनका दायरा और एक्सपोजर किसी भी अन्य लेखक से बड़ा है- ने भी अमिताभ बच्चन के हाथों ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने को संस्थान की एक दयनीय कोशिश करार दिया है । अशोक वाजपेयी ने अपने साप्ताहिक कॉलम में लिखा कि – यह समझना मुश्किल है कि अब अपने को सिनेमाई चमक से जोड़ने की जो दयनीय कोशिश भारतीय ज्ञावपीठ कर रहा है, उसका कारण क्या है । अशोक वाजपेयी जी को यह समझना होगा कि ज्ञानपीठ की यह कोशिश अपने को सिनेमाई चमक से जोड़ने की नहीं बल्कि हिंदी के बड़े लेखक को एक बड़े कलाकार के हाथो सम्मानित करवाने की हो सकती है । मुझे नहीं मालूम कि ज्ञानपीठ की मंशा क्या थी । वो सिनेमाई चमक से जुड़कर क्या हासिल कर लेगा । इस मंशा और वजह को अशोक वाजपेयी बेहतर समझते होंगे । अशोक जी के मुताबिक ज्ञानपीठ का किसी अभिनेता को बुलाने का निर्णय किसी कलामूर्धन्य को बुलाने की इच्छा से नहीं जुड़ा है क्योंकि ऐसी इच्छा के ज्ञानपीठ में सक्रिय होने का कोई प्रमाण या परंपरा नहीं है । प्रसंगव श उन्होंने भारत भवन में कालिदास सम्मान के लिए तीन कलामूर्धन्यों को बुलाने की बात कहकर अपनी पीठ भी थपथपा ली । वाजपेयी जी के इन तर्कों में कोई दम नहीं है और ज्ञानपीठ की परंपरा की दुहाई देकर वो अमिताभ बच्चन के योदगान को कम नहीं कर सकते । अमिताभ का हिंदी के विकास में जो योदगान है उसे अशोक वाजपेयी के तर्क नकार नहीं सकते । अमिताभ बच्चन ने हिंदी के फैलाव में जिस तरह से भूमिका निभाई उसको बताने की कोई आवश्यकता नहीं है । लेकिन वह उनके आलोचकों को वह भी दिखाई नहीं देता । अमिताभ बच्चन हिंदी फिल्मों के एकमात्र कलाकार हैं जो हिंदी में पूछे गए सवालों का हिंदी में ही जवाब देते हैं । मुझे तो लगता है कि हाल के दिनों में जिस तरह से घोटालों के छीटें यूपीए सरकार पर पड़ रहे हैं उस माहौल में मनमोहन सिंह से बेहतर विकल्प तो निश्चित तौर पर अमिताभ बच्चन हैं । दरअसल अशोक वाजपेयी जैसा संवेदनशील लेखक जो कला और कलाकारों की इज्जत करते रहे हैं उनकी लेखनी से जब एक बड़े कलाकार के लिए छोटे शब्द निकलते हैं तो तकलीफ होती है । अशोक वाजपेयी को अमिताभ बच्चन के हाथों ज्ञानपीठ पुरस्कार दिलवाने पर तो आपत्ति है लेकिन जब हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार उदय प्रकाश को कट्टर हिंदूवादी नेता योगी आदित्यनाथ अपने कर कमलों से पुरस्कृत करते हैं तो अशोक वाजपेयी चुप रह जाते हैं । अशोक वाजपेयी जैसे बड़े लेखक की जो ये सेलेक्टेड चुप्पी होती है वह साहित्य और समाज के लिए बेहद खतरनाक है ।
मुझे लगता है कि अशोक वाजपेयी का विरोध अमिताभ से कम ज्ञानपीठ से ज्यादा है । उसी विरोध के लपेटे में अमिताभ बच्चन आ गए हैं । जिस तरह से किसी जमाने में प्रतिष्ठित रहा अखबार ज्ञानपीठ के खिलाफ मुहिम चला रहा है उससे यह बात और साफ हो जाती है । अशोक वाजपेयी की देखादेखी कुछ छुटभैये लेखक भी अमिताभ बच्चन और ज्ञानपीठ के विरोध में लिखने लगे । अखबार ने उन्हें जगह देकर वैधता प्रदान की कोशिश की लेकिन अखबार के कर्ताधर्ताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि पाठक मूर्ख नहीं होते हैं । उन्हें प्रायोजित चर्चाओं में और स्वत:स्फूर्त स्वस्थ साहित्यिक बहस में फर्क मालूम होता है । वो यह भांप सकता है कि कौन सा विवाद अखबार द्वारा प्रायोजित है और उसके पीछे की मंशा और राजनीति क्या है । कहना ना होगा कि ज्ञानपीठ और अमिताभ को विवादित करने के पीछे की मंशा भी साफ तौर पर लक्षित की जा सकती है । इस विवाद को उठाने के पीछे की मंशा के सूत्र आप छिनाल विवाद से भी पकड़ सकते हैं । लेकिन इतना तय मानिए कि हिंदी के लोगों का फिल्म के कलाकारों को लेकर जो एक ग्रंथि है वो उनके खुद के लिए घातक है । फिल्म में काम करनेवाला भी कलाकार होता है और किसी भी साहित्यकार, गायक, चित्रकार से कम नहीं होता । मेरा तो मानना है कि अमिताभ बच्चन को बुलाकर ज्ञानपीठ ने एक ऐसी परंपरा कायम की है जिससे हिंदी का दायरा बढेगा । इस बात का विरोध करनेवाले हिंदी भाषा के हितैषी नहीं हो सकते । उनसे मेका अनुरोध है कि वयक्तिगत स्कोर सेट करने के लिए किसी का अपमान नहीं होना चाहिए ।
Sunday, October 23, 2011
क्यों मिलता अन्ना को समर्थन
तकरीबन चार महीने पहले किसी काम की वजह से स्टैंप पेपर खरीदना पड़ा था । गलत गणित की वजह से तकरीबन दस हजार रुपए के स्टैंप पेपर की ज्यादा खरीद हो गई । हमें लगा कि पैसे बर्बाद हो गए लेकिन हमारे वकील ने बताया कि स्टैंप पेपर वापस लौटाने का भी प्रावधान है । उसके लिए एडीएम के कार्यालय में जाना पड़ेगा । वकील साहब ने आनन- फानन में इस बाबत एक आवेदनपत्र तैयार कर दिया और कहा कि उसको जाकर एडीएम के दफ्तर में जमा करवा दीजिए । मैं रजिस्ट्रार के दफ्तर से एडीएम साहब के दफ्तर में पहुंचा । वहां संबंधित बाबू से मिला तो उन्होंने बताया कि जिस वेंडर से स्टैंप पेपर खरीदा गया है उससे प्रमाणित करवा कर लाना होगा कि उक्त स्टैंप पेपर उसने ही बेचा है । मैंने उनको ये बताने की कोशिश की कि स्टैंप पेपर के पीछे तो बेचनेवाले वेंडर की मुहर लगी है और उसका पूरा पता भी अंकित है लिहाजा फिर से प्रमाणित करवाने की आवश्कता नहीं है । लेकिन बाबू तो ठहरे बाबू । लकीर के फकीर । टस से मस नहीं हुए और फिर से वही दुहरा दिया । मेरे पास कोई विकल्प नहीं था । घर लौट आया । हफ्ते भर बाद जब दफ्तर से साप्ताहिक अवकाश मिला तो सुबह सुबह तकरीबन ग्यारह बजे रजिस्ट्रार के दफ्तर पहुंचा । वहां स्टैंप विक्रेता से मिला तो उसने कहा कि दो बजे आइए । मेरे पास इंतजार करने के अलावा कोई चारा नहीं था । तपती दुपहरी में कचहरी परिसर में इंतजार करता रहा । ठीक दो बजे उनके पास पहुंचा तो उन्होंने वादे के मुताबिक स्टैंप पेपर पर लिख कर दे दिया । अब मैं विजेता के भाव से कचहरी परिसर से निकला और तीन चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित एडीएम के दफ्तर पहुंचा और वहां बाबू के टेबल पर उसी विजयी भाव से स्टैंप पेपर रखा और कहा कि चलिए इसको लौटाने की कार्रवाई शुरू करिए । मेरे उत्साह पर चंद पलों में पानी फेरते हुए उन्होंने कहा कि आप पोस्ट ऑफिस से एक रजिस्ट्री का लिफाफा खरीद कर और उसपर अपना पता लिखकर दे दीजिए । मैं भागकर नीचे पोस्ट ऑफिस पहुंचा् तबतक पोस्ट ऑफिस बंद हो चुका था । मैं हारे हुए योद्धा की तरह बाबू के पास पहुंचा । उनसे बताया कि पोस्ट ऑफिस बंद हो चुका है । बाबू साहब जल्दी में लग रहे थे । उन्होंने बेहद अनौपचारिक अंदाज में कहा कि कोई बात नहीं कल दे जाना । मेरे बहुत अनुरोध करने पर वो इस बात के लिए राजी हो गए कि मैं किसी और से वो लिफाफा भिजवा दूंगा । मैंने अपने एक मित्र से अनुरोध किया और उनको वो लिफाफा भिजवा दिया । मेरे मित्र को साहब बहादुर ने बताया कि अब तीन महीने बाद आकर रिफंड ले जाएं । मुझे संतोष हुआ कि चलो तीन महीने बाद पैसे मिल जाएंगे । तब तक कचहरी और एडीएम ऑफिस के चार चक्कर लग चुके थे ।
तकरीबन साढे तीन महीने बाद एक दिन मेरी पत्नी ने मुझे याद दिलाया कि हमें स्टैंप का कुछ रिफंड मिलना है । अगले ही साप्ताहिक अवकाश में मैं एडीएम साहब के दफ्तर पहुंचा । बाबू साहब अपनी सीट पर मौजूद थे । मैंने नमस्कार कर अपना नाम बताया । बेहद ही तत्परता से उन्होंने फाइल निकाली और कहा कि मैं अपने किसी परिचय पत्र की फोटो कॉपी उन्हें दूं । मैं मूर्ख अज्ञानी बगैर फोटो कॉपी लिए वहां चला गया था । खैर पास की ही एक दुकान से फोटो कॉपी करवाकर उनको सौंप दिया । उन्होंने भी मुझे स्टैंप पेपर के पीछे लिखकर दे दिया और कहा कि नीचे की मंजिल पर कोषागार कार्यालय है वहां जाकर जमा करवा दूं । जब मैं उठने को हुआ तो बाबू साहब ने मुझे पोस्ट ऑफिस की रजिस्ट्री वाला लिफाफा पकड़ाया और कहा कि रख लो तुम्हारे काम आएगा । मैं हैरान कि अगर वापस ही करना था तो फिर मंगवाया क्यों । लेकिन ये बात पूछने का साहस नहीं था सो लिफाफा लेकर नीचे उतर आया ।
नीचे आकर जब मैं कोषागार के काउंटर पर पहुंचा और वहां मौजूद साहब को स्टैंप पेपर देकर कहा कि मेरा रिफंड दे दीजिए । उन्होंने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मैंने कोई जुर्म कर दिया है । उन्होंने कहा कि आपके रिफंड का चेक बनेगा । और चेक बनने के लिए आपको बैंक से अपने दस्तखत को प्रमाणित करवा कर लाना पड़ेगा । मैं झल्लाया और कहा कि अगर आप अकाउंट पेयी चेक बना रहे हैं तो दस्तखत को प्रमाणित करवाने की क्या जरूरत है । बाबू बहस करने के मूड में नहीं था । उन्होंने मुझे सहायक कोषाधिकारी के पास भेज दिया । वहां पहुंचा तो सफारी शूट में एक बुजुर्ग शख्स बैठे थे । मैंने उनसे अपनी व्यथा सुनाई और अनुरोध किया कि रिफंड का चेक बनवा दें । उन्होंने बड़े रौब से और अहसान जतानेवाले अंदाज में कहा कि कि बैंक से प्रमाणित करवा कर ला दीजिए तो दो एक दिन में चेक बनवा दूंगा । अब तक मेरा धैर्य मेरा साथ छोड़ने लगा था । मैंने सहायक कोषाधिकारी महोदय से पूछा कि किस नियम के तहत वो ऐसा कर रहे हैं, मुझे वो नियम दिखाएं । मेरे इतना पूछते ही वो भड़क गए । कहा पंद्रह साल पहले का शासनादेश है मैं कहां से लाउं । बहस होते होते गर्मागर्मी हो गई । मैंने कहा कि मैं आठ चक्कर लगा चुका हूं लेकिन अभी तक रिफंड नहीं मिला है । लिफाफे की बात भी उन्हें बताई । उनका तर्क था कि उनके विभाग में तो मैं पहली बार आया हूं, इसलिए मेरी नाराजगी नाजायज है । वो सरकारी नियमों का हवाला देकर बैंक से दस्तखत प्रमाणित करवा कर जमा करवाने पर अड़े रहे । इसी बहस के दौरान मैंने उनसे कहा कि आप जैसे लोगों की वजह से ही अन्ना हजारे को अनशन करना पड़ता है । इतना सुनते ही वो ऐसे भड़के जैसे सांड को लाल कपड़ा दिखा दिया हो । अन्ना के नाम पर ही वो अड़ गए, उनकी इच्छा थी कि मैं अन्ना वाली बात वापस लूं । लेकिन मैं उसपर कायम रहा । लाख बहस करने के बाद भी अधिकारी महोदय नहीं माने । मुझे दो चक्कर और लगाने पड़े । तब जाकर मुझे रिफंड का चेक मिला । मेरे घर से कोषागार कार्यालय की दूरी बारह किलोमीटर है । इस चक्कर में मैं बुरी तरह से खिन्न हो चुका था । लेकिन इस बात की खुशी थी कि मुझे मेरे प्रश्न का जवाब मिल चुका था कि अन्ना हजारे को समर्थन क्यों मिला और हर तबके के लोग उनके साथ क्यों जुडे़ । अन्ना का विरोध करनेवालों को ना तो ये वजह समझ आएगी और ना ही जनता का मिजाज ।
Saturday, October 15, 2011
संस्मरणों से बनता इतिहास
समीक्ष्य पुस्तक ऑफ अ सर्टेन एज ट्वेंटी लाइफ स्केचेज - गोपाल कृष्ण गांधी की नई किताब है । इस किताब में आधुनिक बारत की बीस हस्तियों के जीवन पर गोपाल कृष्ण गांधी ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर टिप्पणी की है । ये बीस लेखनुमा टिप्पणी समय समय पर लिखे गए हैं । इस किताब की भूमिका में लेखक ने स्वीकार किया है कि उनके ये लेख 1981 से 2001 के बीच लिखे गए हैं । अभी कुछ दिनों पहले ही इतिहासकार और स्तंभकार रामचंद्र गुहा की भी एक किताब-मेकर्स ऑफ मॉडर्न इंडिया प्रकाशिकत हुई थी । गुहा ने अपनी किताब में उन्नीस लोगों पर लिखा था । रामचंद्र गुहा के मुताबिक उन्होंने उन महिला और पुरुष नेता या सामाजिक कार्यकर्ता या समाज सुधारक को अपनी किताब में जगह दी जिन्होंने स्वतंत्रतापूर्व और स्वातंत्रोत्तर भारत को अपने लेखन और भाषण से गहरे तक प्रभावित किया । लेखक के मुताबिक ये उन्नीस भारतीय लोग सिर्फ राजनेता ही नहीं थे बल्कि उन्होंने अपने लेखन से भी समाज और देश को एक नई दिशा दी । लेकिन गोपाल कृष्ण के चयन का आधार अलहदा है, सैली भी जुदा और ज्यादा रोचक ।
गोपाल कृष्ण गांधी के संस्मरणों की इस किताब की विशेषता यह है कि इसमें आजाद भारत के प्रमुख हस्तियों के बारे में कुछ बेहद ही दिलचस्प और अज्ञात तथ्य सामने आते हैं । इस किताब में गांधी के बाद सबसे दिलचस्प संस्मरण या कहें कि जीवनीचित्र जयप्रकाश नारायण का है । जयप्रकाश नारायण को गांधी जी जमाई राजा मानते थे क्योंकि उच्च शिक्षा के लिए जयप्रकाश के अमेरिका चले जाने के बाद प्रभावती जी गांधी के साथ वर्धा में ही रहने लगी थी और बा और बापू दोनों उन्हें पुत्रीवत स्नेह देते थे । जयप्रकाश नारायण जब सात साल के बाद भारत आए तो अपनी पत्नी और गांधी से मिलने वर्धा गए । वहीं उनकी मुलाकात जवाहरलाल नेहरू से भी हुई । पहली मुलाकात में गांधी ने जयप्रकाश से देश में चल रहे आजादी के आंदोलन के बारे में कोई बात नहीं कि बल्किन उन्हें ब्रह्मचर्य पर उपदेश दिया । बताते हैं कि गांधी जी ने प्रभावती जी के कहने पर ही ऐसा किया क्योंकि प्रभावती जी शादी तो कायम रखना चाहती थी लेकिन ब्रह्मचर्य के व्रत के साथ । जयप्रकाश नरायण ने अपनी पत्नी की इस इच्छा का आजीवन सम्मान किया । तभी तो गांधी जी ने एक बार लिखा- मैं जयप्रकाश की पूजा करता हूं । गांधी जी की ये राय 25 जून 1946 के दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित भी हुई । गांधी से जयप्रकाश का मतभेद भी था, गांधी जयप्रकाश के वयक्तित्व में एक प्रकार की अधीरता भी देखते थे लेकिन बावजूद इसके वो कहते थे कि जयप्रकाश एक फकीर हैं जो अपने सपनों में खोए रहते हैं । मोहनदास करमचंद गांधी के बड़े बेटे हरीलाल पर भी गोपाल कृष्ण का आकलन कुछ ज्ञात और अज्ञात तथ्यों के साथ सामने आता है । हरीलाल गांधी न केवल अपने पिता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष कर रहे थे बल्कि उनके विकल्प के तौर पर भी उभर रहे थे और दक्षिण अफ्रीका में लोग उन्हें छोटे गांधी भी कहने लगे थे । लेकिन बाद में पिता पुत्र के बीच मतभेद गहरा गए। गांधी का अपने बेटे की जगह एक पारसी युवक सोराबजी को बैरिस्टरी की पढ़ाई के लिए भेजने का फैसला हरीलाल को चुभ गया । यह घाव इतना गहरा हुआ कि उसने बापू समते सबकुछ त्याग दिया । थोड़े समय के लिए इस्लाम भी स्वीकार कर लिया । यह तो ज्ञात तथ्य है और कई विद्वानों ने इसपर लिखा है । कुछ दिनों पहले मैंने दिनकर जोशी की किताब में महात्मा बनाम गांधी में इसपर विस्तार से पढ़ा था । लेकिन समीक्ष्य पुस्तक में हरीलाल के भाई देवदास का हिंदुस्तान टाइम्स में लिखा संपादकीय भी है । देवदास ,गांधी जी के पुत्र थे और बाद में हिदुस्तान टाइम्स के संपादक भी रहे ।
इन तीन के अलावा गोपालकृष्ण गांधी ने और सत्रह लोगों पर लिखा है जिनमें खान अब्दुल गफ्फार खान, हरीलाल गांधी, प्यारेलाल, ज्योति बसु. पुपुल जयकर, रमलादेवी चट्टोपाध्याय, सुबुल्क्ष्मी,दलाई लामा, सिरिमाओ भंडारनायके, दलाई लामा ,आर वेंकटरमण और के आर नाराय़नण शामिल हैं । अपनी इस किताब के अंत में अपने बचपन के दिनों को भी गोपालकृष्ण गांधी ने शिद्दत के साथ याद किया है । सेंट स्टीफन से अंग्रेजी साहित्य में एम गोपाल कृष्ण गांधी की भाषा में एक प्रवाह है जो इन संस्मरणों को एक नई उंचाई देता है और महानुभावों के वयक्तित्व के कुछ अनछुए पहलुओं को उद्घाटित भी करता है । अंग्रेजी में संस्मरण साहित्य की बेहद समृद्ध परंपरा है और मेरा मानना है कि गोपाल कृष्ण गांधी की ये किताब उसे और समृद्ध करेगी ।
Wednesday, September 28, 2011
वरिष्ठ संपादक की लचर किताब

लंबे समय तक कई अंग्रेजी अखबारों के संपादक रहे एस निहाल सिंह की संस्मरणात्मक आत्मकथा- इंक इन माई वेन- अ लाइफ इन जर्नलिज्म। उसमें देश पर इंदिरा गांधी द्वारा थोपे गए इमरजेंसी पर लिखते हुए निहाल सिंह ने जयप्रकाश नारायण को रिलक्टेंट रिवोल्यूशनरी (अनिच्छुक क्रांतिकारी)कहा है । एक लेखक को शब्दों के चयन में सावधान रहना चाहिए और अगर वो दो दशक से ज्यादा समय तक संपादक रहा है तो यह अपेक्षा और बढ़ जाती है । कोई भी क्रांतिकारी अनिच्छुक नहीं हो सकता । क्रांति का पथ तो वो खुद चुनता है तो फिर अनिच्छा कहां से । आगे निहाल सिंह लिखते हैं कि अगर इंदिरा गांधी बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री को हटाने और बिहार विधानसभा को भंग करने की मांग मान लेती तो जेपी संतुष्ट हो जाते । मुझे लगता है कि निहाल सिंह ने जयप्रकाश नारायण के आंदोलन और उनके विजन को बेहद हल्के ढंग से लिया है और दिल्ली में बैठकर अपनी राय बनाई है । जयप्रकाश नारायण को समझने की भूल अक्सर लोग कर जाते हैं । निहाल सिंह भी उसी दोष के शिकार हो गए हैं । ना तो उन्होंने संपूर्ण क्रांति आंदोन को समझा और ना ही जयप्रकाश के योगदान को । किस तरह से गुजरात के विद्यार्थियों ने उन्हें अहमदाबाद बुलाया था और उनसे मार्गदर्शन की अपील की थी ये सर्वविदित तथ्य है । निहाल सिंह की राय उसी तरह की है कि बगैर दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना हजारे के अनशन के मूड को महसूस किए लोग अन्ना पर टिप्पणी कर रहे हैं । जयप्रकाश नारायण के बारे में निहाल सिंह की चाहे जो राय हो लेकिन गांधी ने कहा था कि - जयप्रकाश एक फकीर हैं जो अपने सपनों में खोए रहते हैं । इसके अलावा 25 जून 1946 को लिखा कि मैं जयप्रकाश की पूजा करता हूं । इसके बाद कुछ कहने को शेष रहता नहीं है ।
लेखक मोरार जी देसाई से काफी प्रभावित लगते हैं । जब भी उनका कोई प्रसंग उठता है तो लेखक यह बताना नहीं भूलते हैं कि मोरार जी भाई बेहद शुद्धतावादी थे । जब वो प्रधानमंत्री थे तो उस वक्त का एक दिलचस्प प्रसंग है - उस वक्त के विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री के सामने ये प्रस्ताव रखा कि विजयलक्ष्मी पंडित की बेटी और लेखिका नयनतारा सहगल को रोम में राजदूत बना दिया जाए । लेकिन मोरार जी भाई ने कहा कि राजदूत बनने से पहले नयनतारा को मंगत राय से शादी करनी होगी । मंगत राय और नयनतारा उस वक्त लिव इन रिलेशनशिप में थे । नयनतारा ने यह बात मान ली लेकिन दुर्भाग्य से मोरार जी भाई की सरकार ही गिर गई और वो राजदूत बन ना सकी । लेकिन 27 अगस्त 1978 को रविवार के अंक में संतोष भारतीय का एक लेख छपा था जिसमें लिखा गया था- मोरार जी भाई का इतिहास एक अक्खड़ वयक्तिवादी और परंपरावादी शुद्धता के आवरण को ओढे हुए एक जिद्दी आदमी का इतिहास रहा है । संतोष भारतीय ने उस लेख में तर्कों के आधार पर अपनी बात साबित भी की है जबकि निहाल सिंह टिप्पणी करके निकल जाते हैं । शायद निहाल सिंह को यह मालूम हो कि जब जयप्रकाश नारायण देश के अग्रिम पंक्ति के नेताओं में शुमार हो चुके थे उस वक्त मोरार जी भाई अंग्रेजी सरकार में डिप्टी कलेक्टर थे । मोरार जी देसाई से ऑबसेस्ड लगते हैं । क्यों इस बात के संकेत भी इस किताब में हैं लेकिन वो अवांतर प्रसंग है ।
एस निहाल सिंह- पत्रकारिता का एक ऐसा प्रतिष्ठत नाम, एक ऐसा बड़ा संपादक जिसने लंबे समय तक देस विदेश में पत्रकारिता की । कईयों का कहना है कि उनके लिखे को पढ़कर उन्होंने पत्रकारिता सीखी । अपने छात्र जीवन के दौरान मैंने भी द स्टेट्समैन में निहाल सिंह के कई लेख पढ़े थे । स्कूल में हमें यह बताया जाता था कि अगर अंग्रेजी अच्छी करनी है तो स्टेट्समैन के लेख पढ़ा करो । उस जमाने से एस निहाल सिंह और उनके लेखन को लेकर मन में एक इज्जत थी । इमरजेंसी के दौरान उनके और उनके अखबार के स्टैंड के बारे में पढ़कर ये इज्जत और बढ़ गई थी । उनका कुछ भी लिखा हुलसकर पढता था । मैंने निहाल सिंह की किताब इंक इन माई वेन- अ लाइफ इन जर्नलिज्म इस उम्मीद से पढ़नी शुरू की कि उन्होंने आजादी के बाद के देश की राजनीति को परखा होगा और कुछ नए तरीके से उस कालखंड को व्याख्यायित भी किया होगा । पाठकों की भी यही अपेक्षा रही होगी कि निहाल सिंह देश की राजनीति के अपने कुछ ऐसे अनुभवों को लिखेंगे जो अबतक सामने नहीं आए थे । लेकिन पाठकों को इस किताब से घोर निराशा होगी, मुझे भी हुई ।
निहाल सिंह ने अपनी इस किताब को संस्मरणात्मक आत्मकथा बना दिया है जिस वजह से इसका कोई निश्चित स्वरूप नहीं बन पाया है । इस किताब के बहुत से पन्ने उन्होंने अपने, अपने परिवार और अपने परिवेश के बारे में निहायत गैरजरूरी विवरणों से भर दिया है । अब पाठकों को इन बातों से क्या लेना देना कि आपका पहला सेक्स एनकाउंटर किससे हुआ और उसने आपके अंगों की तुलना किन प्रतीकों से की । पाठक की इस बात में क्यों रुचि होगी लेखक बचपन में इतने खूबसूरत थे कि स्कूल के बाहर आइसक्रीम का ठेला लगानेवाला उनको गुलाब (द रोज) कहकर पुकारता था । इस तरह की कई बातें इस किताब में भरी पड़ी है। तकरीबन तीन सौ पन्नों की इस किताब में लगभग डेढ सौ पन्नों में निहाल सिंह के निहायत ही निजी और पारिवारिक प्रसंग हैं । जिसमें उनकी अमेरिका यात्रा, मास्को प्रवास के संस्मरण, खलीज टाइम्स के दौरान उनका रहना सहना, दिल्ली की पार्टियों में शराब और शबाब के किस्से आदि है । किताब के प्राक्कथन में निहाल सिंह लिखते हैं कि कोई भी व्यक्ति जब अपने बारे में लिखता है तो उसे यह विश्वास होता है कि उसका लेखन उसके परिचितों और मित्रों से अलग एक बृहत्तर समुदाय के लिए रुचिकर होगा । इसके अलावा आत्मकथा लेखन में एक और बात होती है कि लेखक जीवन और मृत्यु के अपने दर्शन के बारे में भी अपना मत प्रकट करता है । हो सकता है कि निहाल सिंह ये सोच रहे हों कि उनकी इस आत्मकथा में वृहत्तर पाठक वर्ग की रुचि होगी लेकिन उनकी इस सोच को अगर वस्तुनिष्ठता की कसौटी पर कसेंगे तो कम से कम आधी सोच गलत साबित होती है ।
लेकिन ऐसा नहीं है कि निहाल सिंह की इस आत्मकथा को पूरे तौर पर खारिज कर दिया जाए । जब भी निहाल सिंह अपनी व्यक्तिगत चीजें छोड़कर राजनीति और राजनीतिक घटनाक्रम पर आते हैं तो किताब पटरी पर लौटती नजर आती है । इमरजेंसी की घटनाओं पर निहाल सिंह ने विस्तार से लगभग एक पूरा अध्याय लिखा है । इस अध्याय में निहाल सिंह ने इंदिरा गांधी के बारे में उनके स्वभाव के बारे में कई जगहों पर बेहद संजीदगी से टिप्पणी की है । इंदिरा गांधी के साथ की अपनी मुलाकात का जिक्र भी किया है । जिक्र तो अतुल्य घोष, एस के पाटिल से लेकर बाबू जगजीवन राम तक का है । लेकिन निहाल सिंह की इस किताब में दो अध्याय अहम हैं - द इमरजेंसी और इंदिरा'ज पॉलिटिकल रिबर्थ । अहम इस वजह से कि इसमें लेखक के अपने कुछ विचार सामने आते हैं । इसके अलावा जो अन्य अध्याय है उसमें सामान्य बातें हैं । दूसरी जो कमजोरी इस किताब की है वो कि इसके लेखों में तारतम्यता का अभाव है । लंबे समय तक संपादक रहे निहाल सिंह की किताब को संपादन की सख्त आवश्यकता थी क्योंकि कई जगह घटनाएं गड्ड-मड्ड हैं, आगे-पीछे आती जाती है, जो पाठकों को कंफ्यूज करती है ।
Sunday, September 11, 2011
राजेन्द्र यादव की 'पाखी'
मैं जब स्तंभ लिखने बैठा तो एक बार फिर से राजेन्द्र यादव मेरे ध्यान में आए । लेकिन मैं अभी दो पहफ्ते पहले ही यादव जी के इर्द गिर्द दो लेख लिख चुका हूं । इस वजह से एक बार फिर से उनपर लिखते हुए सोचने को मजबूर हूं कि लिखूं या नहीं लिखूं । दरअसल पहला लेख तो हंस पत्रिका के पच्चीस वर्ष पूरे होने और छब्बीसवें वर्ष में प्रवेश करने पर था और दूसरा लेख दिल्ली में आयोजित हंस के सालाना गोष्ठी पर । लेकिन दोनों के ही केंद्र में राजेन्द्र यादव थे । साहित्य की दुनिया में हर वर्ष का जुलाई और अगस्त का अंतिम सप्ताह राजेन्द्र यादव के नाम ही होता है । जुलाई के अंत में हंस की सालाना गोष्ठी और अगस्त के अंत में राजेन्द्र यादव का जन्मदिन समारोह । इस साल भी हर वर्ष की भांति राजेन्द्र यादव का जन्मदिन दिल्ली में कांग्रेस के युवा सांसद संजय निरुपम के घर के लॉन में मनाया गया । पिछले वर्ष की तुलना में इस बार का आयोजन भव्य था । लोगों की उपस्थिति भी ज्यादा । रसरंजन करते टुन्न होते लोग भी ज्यादा । लेकिन इस बार मैं यादव जी के जन्मदिन समारोह पर नहीं लिख रहा हूं । जिक्र इस वजह से कि जिस पत्रिका पर लिखने जा रहा हूं वो पत्रिका मुझे यादव जी के जन्मदिन समारोह में मिली । पत्रिका का नाम है –पाखी जिसके संपादक हैं- प्रेम भारद्वाज । प्रेम भारद्वाज जी से मेरी फोन पर कई बार बात हुई थी लेकिन कभी आमने सामने की मुलाकात नहीं थी । मुझे पता नहीं उन्होंने कैसे पहचाना और बेहद ही गर्मजोशी से मुझसे मिले । मिलने के बाद उन्होंने मुझे पाखी का राजेन्द्र यादव पर केंद्रित भारी भरकम अंक दिया जो कि एक दिन पहले ही लोकार्पित हुआ था । वहां तो कवर पर यादव जी की भव्य तस्वीर ही देख पाया । पाखी के इस अंक का विज्ञापन कई अंकों से संभावित लेखकों के नाम के साथ छप रहा था। इसके अलावा मैत्रेयी जी,भारत भार्दवाज जी से भी कई बार इस प्रस्तावित अंक पर बात हुई थी । यादव जी का वयक्तित्व इतना तिलिस्मी है कि वो मुझे बार बार खींचता है और जब भी उनके बारे में कुछ पढ़ता हूं या उनके आस पास के लोगों से बात होती है तो कुछ न कुछ नया मिल ही जाता है – चाहे वो लोगों के अनुभव हो या फिर यादव जी के दिलचस्प कारनामे ।
जन्मदिन की पार्टी से जब घर लौटा तो पाखी को पढ़ना शुरू किया । कई लेख पुराने थे लेकिन नए लेखों की संख्या ज्यादा है । सबसे पहले मैंने संपादकीय पढ़ा। संपादकीय पहले पढ़ने का फायदा यह होता है कि अंक का अंदाजा लग जाता है । पाखी के इस अंक का संपादकीय अद्भुत है । नए तरीके से प्रेम भारद्वाज ने राजेन्द्र यादव के वयक्तित्व को राजकपूर से जोड़कर अनोखे तरीके से व्याख्यायित किया है । प्रेम भारद्वाज लिखते हैं- राज कपूर की पहली निर्देशित फिल्म आग की शुरुआत 6 जुलाई 1947 को होती है । राजेन्द्र यादव की पहली कहानी प्रतिहिंसा भी इसी साल कर्मयोगी में प्रकाशित होती है । आग दोनों में है- रचनात्मकता की । आग का नायक जीवन में कुछ नया कर गुजरना चाहता था । जलती हुई महात्वाकांक्षा उसका ईंधन बनी । क्या यही सच राजेन्द्र यादव का नहीं है । राजू को स्त्री की देह (अनावृत्त स्त्री) पसंद है जिसे चलती भाषा में नंगापन कहा जाता है । ......नंगापन को वह रचनाओं में दिखाता है...थोड़ा ज्यादा उम्र बढ़ने पर स्त्री सौंदर्य के प्रति उसका नजरिया मांसल हो जाता है – सत्यम शिवम सुंदरम और राम तेरी गंगा मैली ....हासिल और होना सोना एक दुश्मन साथ ऐसी ही रचनाएं हैं । वह आवारा , छलिया, श्री 420 है । बहुत दिनों बाद नए तरीके से लिखा गया संपादकीय पढ़कर मजा आ गया । प्रेम भारद्वाज को बधाई देने के लिए फोन भी किया लेकिन फोन बंद था । खैर....
आमतौर पर ऐसे विशेषांकों में लेखक की प्रशस्ति करते लेखों को संग्रहित किया जाता है और वह लगभग अभिनंदन ग्रंथ बनकर रह जाता है । लेकिन पाखी का राजेन्द्र यादव पर केंद्रित यह अंक इस दोष का शिकार होने से बच गया । इसमें कई लेख ऐसे हैं जो यादव जी के वयक्तित्व की तो धज्जियां उड़ाते ही हैं उनके लेखन को भी कसौटी पर कसते हैं । पुराने लेखों की चर्चा मैं यहां नहीं करूंगा । लेकिन चाहे वो निर्मला जैन का लेख हो या फिर यादव जी के भाई भूपेन्द्र सिंह यादव या फिर उनकी बेटी रचना के लेख हों सबमें एक ही स्वर है कि यादव जी पारिवारिक वयक्ति नहीं हैं और उन्होंने अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वाह नहीं किया । ये बातें जब बेटी और भाई कहें तो मान लेना चाहिए ।
मैत्रेयी पुष्पा को अबतक राजेन्द्र यादव की पसंदीदा लेखिका माना जाता था । दिल्ली के साहित्यिक हलके में यह बात बार-बार उठती रहती थी कि मैत्रेयी पुष्पा अब यादव जी के खेमे में नहीं रही और उन्होंने अशोक वाजपेयी के कैंप में अपनी जगह बना ली है । अफवाहों को नित नए पंख लगते रहे । लेकिन पाखी के इस अंक में मैत्रेयी पुष्पा ने साफ साफ ऐलान कर दिया है कि उन्हें अब राजेन्द्र यादव से कुछ लेना-देना नहीं । छिनाल विवाद के बाद जिस तरह से मैत्रेयी जी ने विभूति नारायण राय के खिलाफ मोर्चा खोला था उसमें यादव जी के साथ नहीं आने से आहत मैत्रेयी कहती हैं कि – राजेन्द्र जी भरोसे को तोड़ा है । विभूति नारायण राय के खिलाफ उस वक्त मैत्रेयी ने मोर्चा खोला हुआ था लेकि साल भर बीतते बीतते हालत यह हो गई कि उनके बड़े से बड़े सिपहसालार ने राय का दामन थाम लिया । विरोध तो हवा में गुम ही गया कुछ तो राय साहब के प्रशंसक तक बन बैठे हैं । सुधा अरोड़ा का साक्षात्कार सामान्य है । दामोदर दत्त दीक्षित और भारत यायावर ने यादव जी को जरा ज्यादा ही कस दिया है । साहित्यिक पत्रकारिता के पच्चीस वर्ष पर प्रेम पाल शर्मा का छोटा लेकिन गंभीर लेख है । प्रेमपाल शर्मा चाहें तो उस लेख को और विस्तार दे सकते हैं, अभी उसमें काफी गुंजाइश है । इस अंक का जो सबसे कमजोर पक्ष है वो है संस्मरण । सभी में लगभग एक जैसी बात हैं और लोग अपने बारे में ज्यादा यादव जी के बारे में कम लिख रहे हैं । भारत भारद्वाज के संस्मरण में मृत्यु को लेकर लेखक और यादव जी का संवाद दिलचस्प है - भारत भारद्वाज पूछते हैं – आप नहीं रहेंगे तो जनसत्ता में क्या शीर्षक छपेगा । पहले तुम बताओ । मैंने कहा –खलनायक नहीं रहे । उन्होंने प्रतिवाद किया –अच्छा और उपयुक्त शीर्षक रहेगा – अब खलनायक नहीं रहे । दो रचनाकार अपनी मृत्यु को लेकर इतने खिलंदड़े अंदाज में बात कर रहे हों और मौत के बाद अखबार का शीर्ष तय कर रहे हों, कमाल है । पाखी के इस अंक में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि पिछले बीस सालों से हंस में प्रकाशित लोकप्रिय स्तंभ- समकालीन सृजन संदर्भ – अब बंद हो गया है । अब लोग हंस को आगे से खोला करेंगे (काशीनाथ जी समेत कई लेखकों ने मुझसे वयक्तिगत बातचीत में कहा था कि वो हंस को पीछे से खोलते हैं )
पाखी का राजेन्द्र यादव पर निकला तीन सवा तीन सौ पृष्ठों का यह अंक हिंदी के पाठकों के लिए एक थाती है और उसे संभाल कर रखना चाहिए । हिंदी के नए पाठकों के लिए ये एक ऐसे वयक्ति के वयक्तित्व की परतें उघाड़ता है जो नए से नए लोगों को भी लिखने और पढ़ने के लिए लगातार प्रेरित करता है । इस अंके के लिए संपादक- प्रेम भारद्वाज- की मेहनत की जितनी भी सराहना की जाए वो कम है ।
Sunday, September 4, 2011
लोक से दूर लेखक
बचपन से सुनता था कि उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद कहा करते थे कि साहित्य समाज का दर्पण होता है । एक और बात सुनता था कि साहित्य राजनीति के पीछे नहीं बल्कि समाज के आगे चलनेवाली मशाल है । मैं इसे सुनकर यह सोचता था कि अगर साहित्य मशाल हैं तो साहित्यकार उस मशाल की लौ को लगातार जलाए रखने का काम करते हैं । भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे का दिल्ली में ऐतिहासिक अनशन खत्म हो गया है । अब तमाम तरीके से लोग उस जन उभार और आंदोलन को मिले व्यापक जनसमर्थन का आकलन कर रहे हैं । यह वो वक्त था जब साहित्य और साहित्यकारों के सामने यह चुनौती थी कि वो साबित करे कि राजनीति के पीछे चलनेवाली मशाल नहीं है । लेकिन अन्ना के आंदोलन के दौरान कमोबेश साहित्यकारों का जो ठंडा या विरोध का रुख रहा उससे घनघोर निराशा हुई । हंस के संपादक और दलित विमर्श के पुरोधा राजेन्द्र यादव को को अन्ना के आंदोलन में आ रहे लोग भीड़ और उनका समर्थन एक उन्माद नजर आता है । उस भीड़ और उन्माद को दिखाने-छापने के लिए वो मीडिया को कोसते नजर आते हैं । उनका मानना है कि अन्ना के आंदोलन के पीछे व्यवस्था परिवर्तन का विचार कम और एक समांतर सत्ता कायम करने की आकांक्षा ज्यादा है । पता नहीं राजेन्द्र यादव को इसमें समानंतर सत्ता खड़ा करने के संकेत कहां से मिल रहे हैं, जबकि अन्ना हजारे और उनके लोग मंच से कई कई बार ऐलान कर चुके हैं कि वो चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं । अन्ना हजारे ने तो कई बार अपने साक्षात्कार में इस बात को दोहराया है कि अगर वो चुनाव लड़ते हैं तो उनकी जमानत जब्त हो जाएगी । टीम अन्ना भी हर बार व्यवस्था परिवर्तन की बात करती है । दरअसल ये जो सोच है वो अपने दायरे से बाहर न निकलने की जिद पाले बैठे है । राजेन्द्र यादव तो दूसरी शिकायत है कि अन्ना हजारे का जो आंदोलन है वो लक्ष्यविहीन है और जिस भ्रष्टाचार खत्म करने की बात की जा रही है वो एक अमूर्त मुद्दा है । उनका मानना है कि जिस तरह से आजादी का लड़ाई में हम अंग्रेजों की सत्ता के खिलाफ लड़े थे या फिर जयप्रकाश आंदोलन के दौरान इंदिरा गांधी की निरंकुश सत्ता के खिलाफ पूरा देश उठ खड़ा हुआ था वैसा कोई साफ लक्ष्य अन्ना के सामने नहीं है । भ्रष्टाचार के खिलाफ जो लड़ाई लड़ी जा रही है वह अदृश्य है । करप्शन व्यापक रूप से समाज और नौकरशाही की रग रग में व्याप्त है, उसे खत्म करना आसान नहीं है । एक तरफ तो राजेन्द्र यादव कहते हैं कि ये समांतर सत्ता कायम करने की आंकांक्षा है तो दूसरी तरफ उन्हें कोई मूर्त लक्ष्य दिखाई नहीं देता है । राजेन्द्र यादव को अन्ना का आंदोलन बड़ा तो लगता है लेकिन इसके अलावा उन्हें सबसे आधारभूत आंदोलन नक्सलवाद का लगता है । उनका मानना है कि नक्सलवादी आंदोलन सारे सरकारी और अमानवीय दमन के बावजूद व्यवस्था परिवर्तन के लिए सैकड़ों लोगों को बलिदान के लिए प्रेरित कर रहा है । यादव जी को नक्सलवादी आंदोलन व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लगता है जबकि अन्ना का आंदोलन समांतर सत्ता कायम करने की आकांक्षा । क्या यादव जी यह भूल गए कि भारतीय सत्ता को सशस्त्र विद्रोह में उखाड़ फेंकने के सिद्धांत पर ही नक्सवाद का जन्म हुआ लगभग पांच दशक बाद भी नक्सलवादी उसी सशस्त्र विद्रोह के सिद्धांत के लिए प्रतिबद्ध हैं और उनका अंतिम लक्ष्य दिल्ली की सत्ता पर काबिज होना है । जबकि अन्ना का आंदोलन ना तो कभी सत्ता परिवर्तन की बात करते है और न ही हिंसा की ।
दरअसल राजेन्द्र यादव भी उसी तरह की भाषा बोल रहे हैं जिस तरह की माओवादियों की समर्थक लेखिका अरुंधति राय बोल रही हैं । अरुंधति राय को भी जनलोकपाल बिल में समानंतर शासन व्यवस्था की उपस्थिति दिखाई देती है । अन्ना के आंदोलन में पहले भारत माता की तस्वीर लगाने और उसके बाद गांधी की तस्वीर लगाने और वंदे मातरम गाने पर भी ऐतराज है । ऐतराज तो अन्ना के मंच पर तमाम मनुवादी शक्तियांयों के इकट्ठा होने पर भी है । लेकिन अन्ना के साथ काम कर रहे स्वामी अग्वनवेश और प्रशांत भूषण तो अरुंधति के भी सहयोगी हैं । अरुंधति को इस बात पर आपत्ति थी कि अनशन के बाद अन्ना एक निजी अस्पताल में क्यों गए । इन सब चीजों को अरुंधति एक प्रतीक के तौर पर देखती हैं और उन्हें यह सब चीजें एक खतरनाक कॉकटेल की तरह नजर आता है । पता नहीं हमारे समाज के बुद्धिजीवी किस दुनिया में जी रहे हैं । अन्ना के समर्थन में उमड़े जनसैलाब में दलितो,अल्पसंख्यकों और आदिवासियों को ढूंढने में लगे हैं । बड़े लक्ष्य को लेकर चल रहे अन्ना हजारे के आंदोलन में जिस तरह से स्वत: स्फूर्त तरीके से लोग शामिल हो रहे हैं वह आंखें खोल देनेवाला है । घरों में संस्कार और आस्था जैसे धार्मिक चैनलों की जगह न्यूज चैनल देखे जा रहे थे, जिन घरों से सुबह-सुबह भक्ति संगीत की आवाज आया करती थी वहां से न्यूज चैनलों के रिपोर्टरों की आवाज या अन्ना की गर्जना सुनाई देती थी। अन्ना के समर्थन में सड़कों पर निकले लोगों के लिए ट्रैफिक खुद ब खुद रुक जाता था और आंदोलनकारियों को रास्ता देता था । ये सब एक ऐसे बदलाव के संकेत थे जिसे पकड़ पाने में राजेन्द्र यादव और अरुंधति जैसे लोग नाकाम रहे । अन्ना हजारे के आंदोलन से तत्काल कोई नतीजा न भी निकले लेकिन इसके दूरगामी परिणाम होंगे जिसको समझने में राजेन्द्र-अरुंधति जैसे महान लेखक चूक गए ।
लेखकों के अलावा हिंदी में काम कर रहे लेखक संगठनों की भी कोई बड़ी भूमिका अन्ना के आंदोलन के दौरान देखने को नहीं मिली । अगर किसी लेखक संगठन ने चुपके से कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी हो तो वह ज्ञात नहीं है । यह एक ऐतिहासिक मौका था जिसमें शामिल होकर हिंदी के मृतप्राय लेखक संगठन अपने अंदर नई जान फूंक सकते थे । लेकिन विचारधारा के बाड़े से बाहर न निकल पाने की जिद या मूर्खता उन्हें ऐसा करने से रोक रही है । समय को न पहचान पाने वाले इन लेखक संगठनों की निष्क्रियता पर अफसोस होता है ।प्रगतिशील लेखक संघ अपने शुरुआती सदस्य प्रेमचंद की बात को भी भुला चुका है । साहित्य समाज का दर्पण तो है पर आज के साहित्यकार उस दर्पण से मुंह चुराते नजर आ रहे हैं । जब लेखकों के सामने यह साबित करने की चुनौती थी कि साहित्य राजनीति का पिछलग्गू नहीं है तो वो खामोश रहकर इस चुनौती से मुंह चुरा रहे हैं । इस खामोशी से लेखकों और लेखक संगठनों ने एक ऐतिहासिक अवसर गंवा दिया है । ऐसा नहीं है कि हिंदी के सारे साहित्यकार अन्ना के आंदोलन के विरोध में हैं – कई युवा और उत्साही लेखकों के अलावा नामवर सिंह और असगर वजाहत जैसे वरिष्ठ लेखकों को अन्ना का आंदोलन अहम लगता है । नामवर सिंह कहते हैं कि अन्ना का आंदोलन समाज को एक नई दिशा दे सकता है,यह सदिच्छा से किया गया आंदोलन है और इसका अच्छा परिणाम होगा । वहीं असगर वजाहत को भी लगता है कि अन्ना का आंदोलन एक नया रास्ता खोल रहा है । नामवर और असगर जैसे और कुछ लेखक हो सकते हैं, होंगे भी लेकिन बड़ी संख्या में जन और लोक की बात करनेवाले लेखक जन और लोक की आंकांक्षाओं को पकड़ने में नाकाम रहे ।
Wednesday, August 31, 2011
सपाट बयानी की कविता
कवयित्री ने अपनी भूमिकानुमा लेख- कविता से पहले लिखा है –वैसे कविताएं निजी दस्तावेज की तरह होती है । आमतौर पर वो तकिए के नीचे छिपी रहती हैं या अकेलेपन का साथी बनती हैं और जब हवाओं का रुख आसमान की तरफ ले जा रहा होता है, तब भी ये घास की तरह जमीन पर रहकर मजबूत बनी रहती है । कवयित्री ने कविता को भावुकता की जमीन दे दी है – मन के करीब रहनेवाली, साथ साथ चलनेवाली, ओढनी बनी और तकिया भी । कविता को ओढनी बताने का उनका निहितार्थ क्या है इसके साफ संकेत कहीं नहीं मिल पा रहे हैं लेकिन प्रचलित अर्थ में ओढनी लड़कियां और औरतें अपने को ढकने के लिए इस्तेमाल करती है । मुझे ये समझ नहीं आया कि कविता ओढनी कैसे बन सकती है और किस लाज को ढ़कने के काम आ सकती है । कविता में शब्दों का चयन उसे चमका देती है लेकिन अगर वही शब्द अगर जबरदस्ती ठूंसे जाते हैं तो स्पीड ब्रेकर की तरह झटके भी देते हैं । अपनी कविता को लेकर इमोशनल कवयित्री इतने पर ही नहीं रुकती हैं- पाठकों से भी आग्रह करती है कि – इन्हें मैंने नजाकत से रखा था । आप भी इन्हें नजाकत से ही पढ़िएगा । कवयित्री का यह आग्रह उनकी कविताओं में एक जबरदस्त मोह के रूप में लामने आता है – ख्याल ही तो है- में वो कहती है – क्या वो कविता ही थी/ जो उस दिन कपड़े धोते-धोते/साबुन के साथ घुलकर बह निकली थी/एक ख्याल की तरह आई /ख्याल की ही तरह/धूप की आंच के सामने बिछ गई/पर बनी रही नर्म ही/ । यहां भी वर्तिका के लिए कविता नर्म और नाजुक है ।
एक कवयित्री का अपनी कविताओं को लेकर मोह तो जायज है लेकिन पाठक तो कविता को कविता की कसौटी पर कसेंगे ही । वर्तिका नंदा की कविताओं को पढ़ते हुए एक बार फिर से मेरे मन में पुराना सवाल कौंधा - कविता क्या है । जवाब में फिर से कविता के नए प्रतिमान में नामवर सिंह का लिखा याद आया- किसी काव्य कृति का कविता होने के साथ ही नई होना अभीष्ट है । वह नई हो और कविता ना हो, यह स्थिति साहित्य में कभी स्वीकार्य नहीं हो सकती । वर्तिका की कविताएं पढ़ते हुए मुझे कुछ भी नया नहीं लगा, ना तो कविता की भावभूमि और ना ही कथन और ना ही बिंब । इनकी कविताओं में अक्सर घूमफिर कर घर,परिवार और उनका पेशा और परिवेश आता रहता है और कवयित्री, लगता है, उसके ही चारो ओर चक्कर लगाती रहती है । वर्तिका की कविताओं को पढ़ते हुए मुझे लगा कि अपनी कविताओं में वो कई बार बेहद सपाट हो जाती है और कविता और नारो के बीच का फर्क भी भूल जाती है । उदाहरण के तौर पर अगर हम उसकी कविता –क्यों भेजूं स्कूल को देखें- नहीं भेजनी अपनी बेटी मुझे स्कूल /नहीम बनाना उसे पत्रकार/क्या करेगी वह पत्रकार बनकर/अगर नाम कमा लेगी तो नहीं बन पाएगी पूरी औरत/ । यह एक कवि का अपने पेशे से मोहभंग की अभिवयक्ति है जो उसकी कविताओं में नारे की शक्ल में उपस्थित होता है । नारे भीड़ में जोश तो भर सकते हैं लेकिन जब वो कविता की जमीन पर पहुंचते हैं तो औंधे मुंह गिर जाते हैं । समीक्ष्य संग्रह में यह कई बार घटता है । इसके अलावा मरजानी की अन्य कविताओं में भी जो बिंब उठाए गए हैं वो भी पहली नजर में वास्तविकता को मूर्त करती प्रतीत होती है लेकिन अगर उसपर गंभीरता से विचार किया जाए तो वास्तविकता का अनावश्यक भार उठाते हुए कविताएं हांफती नजर आती है –चाहे वो टीवी एंकर और तुम हो या फिर कसाईगिरी । निष्कर्ष यह कि बिंब के बोझ तले कविता इतनी दब गई है कि वो उठ ही नहीं पाई ।
वर्तिका नंदा की छोटी बड़ी कविताओं को पढ़ने के बाद मुझे लगा कि इन कविताओं में जो भावुकता है या जो वैयक्तिकता है वह संरचना में शिथिलता और काव्यानुभूति की कमजोरी का परिणाम है । इस संग्रह में जिस तरह से तात्कालिक परिवेश की जमीन पर कवयित्री ने सपाटबयानी की है उससे भी उनकी कविताओं की दुर्बलता सामने आती है । घटनाओं को यथार्थपरकता की चाशनी में डुबाकर कविता गढ़ने की जो एक प्रवृत्ति हाल के दिनों में सामने आई हैं, वर्तिका की कविताएं उसका सर्वोत्तम उदाहरण है । वर्तिका नंदा का यह कविता संग्रह एक कमजोर और सपाट कविताओं का संग्रह है जो हिंदी साहित्य में जगत में अगर अननोटिस्ड रह जाए तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा । अंत में एक और चौंकाने वाली बात राजकमल प्रकाशन ने अब अपनी किताबों का मूल्य डॉलर में भी देना शुरू कर दिया है । इस संग्रह का दाम है आठ डॉलर ।
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Saturday, August 13, 2011
मंजिल से भटका सफर
ऐसा नहीं है कि देश में सिर्फ कांग्रेस पार्टी और उसके नेता ही भ्रष्ट हैं । देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी में भी येदुरप्पा जैसे लोग हैं जिनका दामन दागदार है । येदुरप्पा पर जमीन घोटाले के आरोप लगे लेकिन बीजेपी को उनपर कार्रवाई करने में लोकायुक्त की रिपोर्ट का इंतजार करना पड़ा । सार्वजनिक जीवन में शुचिता और उच्च सामाजिक मानदंड की वकालत करनावली पार्टी बीजेपी, झारखंड में शिबू सोरेने के साथ मिलकर सरकार चला रही है । शिवू सोरेन पर पहले भी भ्रष्टाचार समेत हत्या और हत्य़ा की साजिश रचने के संगीन इल्जाम लग चुके हैं । उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की सरकार पर भी राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन समेत कई सरकारी योजनाओं में घपले घोटाले की जांच चल रही है । मायावती पर आय से अधिक संपत्ति का मुकदमा विचाराधीन है । उत्तर प्रदेश सरकार पर कैग की ताजा रिपोर्ट में बेहद गंभीर आरोप लगे हैं । तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता पर भी भ्रष्टाचार का मुकदमा चल रहा है । समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और हरियाणा के चौटाला पिता पुत्र के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट में आय से अधिक संपत्ति का केस जारी है । लालू यादव और कई सूबों के और नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच चल रही है, यह सूची बहुत लंबी है । अभी-अभी आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी के बेटे जगनमोहन रेड्डी की संपत्ति की जांच के आदेश दिए हैं ।
यह अकारण नहीं है कि देश के तीस मुख्यमत्रियों की कुल संपत्ति करीब ढाई सौ करोड़ रुपये हैं । इस अनुमान के मुताबिक राज्यों के मुख्यमंत्रियों की औसत संपत्ति आठ करोड़ रुपये है । लेकिन अगर उसमें से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और तमिलनाडू के मुख्यमंत्री(अब पूर्व) करुणानिधि की संपत्ति हटा दी जाए तो देश के मुख्यमंत्रियों की औसत संपत्ति घटकर करीब चार करोड़ रुपए रह जाएगी । तकरीबन 87 करोड़ रुपये की संपत्ति के साथ उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और दलित नेता मायावती देश की सबसे अमीर मुख्यमंत्री हैं । दो हजार दस में मायावती ने बताया था कि उनकी संपत्ति तीन साल में 35 करोड़ रुपये बढ़ गई है यानि की तीन साल में बावन करोड़ से बढ़कर सत्तासी करोड़, तकरीबन सड़सठ फीसदी का इजाफा । केंद्रीय मंत्रियों की लिस्ट पर भी अगर नजर डालेंगे तो यह अमीरी नजर आएगी । कहां से आ रहे हैं ये पैसे, ये तो घोषित संपत्ति है, क्या कोई अघोषित संपत्ति भी है । इस तरह के सवाल पूरे देश को मथ रहे हैं । कोई कहता है कि उनके समर्थक चंदा देते हैं तो कोई अपने कारोबार के बूते करोड़पति बनने की बात कर रहा है । नतीजा यह हो रहा है कि पूरे देश में इस वक्त पॉलिटिकल क्लास को लेकर जनता के मन में एक गंभीर सवाल खड़ा हो गया है । आजादी के तकरीबन चौंसठ साल बाद भी आज देश की जनता अपने चुने हुए नेताओं पर भरोसा नहीं कर पा रही है तो यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक बात है । देश की आजादी की वर्षगांठ पर पॉलिटिकल क्लास के लोगों के लिए आत्ममंथन का भी वक्त है ।
इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि सत्ताधरी पार्टी भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करनेवाली संस्थाओं पर ही हमले करने लगे हैं । जब सीएजी की रिपोर्ट में दिल्ली की मुख्यमंत्री के खिलाफ आता है तो कांग्रेस के प्रवक्ता उस संस्था को ही सवालों के घेरे में ले लेते हैं । उसके पहले टेलीकॉम घोटाले में कैग की रिपोर्ट की जांच कर रही संसद की लोकलेखा समिति पर भी कांग्रेस के लोगों ने इस तरह से ही सवाल खड़े कर दिए थे । भ्रष्टाचारियों को बचाने या फिर उनके समर्थन के लिए लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं पर हमले से ऐसा लगता है कि कांग्रेस को भ्रष्ट लोगों की ज्यादा चिंता है बजाए संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादा की । आजादी के बाद जिस तरह से उन्नीस सौ पचास में सीएजी को बनाकर उसे संवैधानिक आजादी दी गई और जिसे जवाहरलाल नेहरू ने अपने शासनकाल में मजबूकी दी आज उसपर ही इस वक्त के कांग्रेसी उंगली उठा रहे हैं ।
पूरा देश यह भी देख रहा है कि किस तरह से अन्ना हजारे, जो कि आज भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के प्रतीक बन चुके हैं, को परेशान किया जा रहा है । उनकी आवाज को दबाने या फिर उनको या उनकी टीम को परेशान करने का कोई मौका सरकार नहीं छोड़ रही है । चाहे वो दिल्ली में अनशन करने देने के लिए जगह देना का मामला हो या फिर लोकपाल बिल में मनमानी करने का । अन्ना के खिलाफ खड़े होकर सरकार ने इतनी बड़ी गलती कर दी है जिसकी भरपाई निकट भविष्य में संभव नहीं है । दरअसल आज कांग्रेस के पास आजादी के आंदोलन से तपकर निकले जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, एस राधाकृष्णन और डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद जौसे नेता नहीं हैं जो एक नैतिक उदाहरण पेश कर सकें । अन्ना ने ईमानदारी की जो नैतिक चुनौती सरकार को दी है उसका जवाब देने के लिए कांग्रेस के पास कोई नेता नहीं है । कपिल सिब्बल हों या फिर चिदंबरम या फिर विवादित बयानों के लिए चर्चित दिग्विजय सिंह- इन सबमें वो नैतिक ताकत नहीं है जो अन्ना हजारे का मुकाबला कर सके । लेकिन उससे भी चिंता की बात यह है कि देश में इन भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ कार्रवाई ना होते देख जनता क्षुब्ध होने लगी है, उनका धैर्य जवाब देने लगा है । आज जश्ने आजादी के बीच पॉलिटिकल क्लास को जनता की इस नाराजगी का संज्ञान लेना चाहिए ।
Friday, August 12, 2011
...किसी से हो नहीं सकता
हर साल 31 जुलाई हिंदी साहित्य के लिए एक बेहद खास दिन होता है । इस दिन हिंदी के महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद का जन्मदिन होता है । लेकिन हिंदी पट्टी में अपने इस गौरव को लेकर कोई उत्साह देखने को मिलता हो यह ज्ञात नहीं है । प्रेमचंद के गांव लमही में कुछ सरकारी टाइप के कार्यक्रम हो जाते हैं जिसमें मंत्री वगैरा भाषण आदि देकर रस्म अदायगी कर लेते हैं । इस बार भी वहां कुछ वैसा ही हुआ । लेकिन तकरीबन पिछले पच्चीस साल से हंस पत्रिका प्रेमचंद के जन्मदिन पर दिल्ली में एक विचार गोष्ठी का आयोजन करती रही है । इस बार भी किया । राजेन्द्र यादव के संपादन में निकलते हुए इस पत्रिका के पच्चीस साल हो गए हैं, लिहाजा मौका खास था । हंस की रजत जयंती वर्ष और प्रेमचंद की जयंती । दिल्ली के ऐवान-ए-गालिब के हॉल में हंस और साहित्यिक पत्रकारिता पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया था । हर साल की तरह इस वर्ष भी साहित्यक जमात का ठीक-ठाक जमावड़ा लगा था । हर तबके के लेखक वहां मौजूद थे। दो तीन पीढ़ी के लेखक तो थे ही । मैं जब पहुंचा तो उसके कुछ देर बाद बांग्लादेश की विवादास्पद लेखिका तस्लीमा नसरीन भी वहां आईं । तसलीमा के साथ एक सुरक्षाकर्मी भी था । लेकिन मैं ये देखकर हैरान रह गया कि तसलीमा को काफी देर तक खड़ा रहकर इधर उधर देखना पड़ा । उनको लेकर वहां मौजूद लोगों में कोई उत्साह नहीं दिखा । लेकिन कुछ देर जब वो अकेली खड़ी रहीं तो फिर किसी ने उन्हें हॉल का रास्ता दिखाया । ये वही तसलीमा थी जो तकरीबन दस साल पहले वाणी प्रकाशन के एक कार्यक्रम में दिल्ली आई थी तो लगा था कि राजधानी में कोई घटना घटी हो । दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के हॉल में तिल रखने की जगह नहीं थी । देशी-विदेशी मीडिया के दर्जनों कैमरे और पत्रकार तो वहां मौजूद थे ही, हिंदी का बड़ा से बड़ा लेखक भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने को बेताब था । तस्लीमा की एक झलक पाने के लिए लोग उतावले हो रहे थे, तस्लीमा के साथ फोटो खिंचवाने के लिए लोग सिफारिश कर रहे थे । हमारे मित्र अरुण महेश्वरी से । लेकिन उस वक्त अपने आयोजन की सफलता से गदगद अरुण जी ने लोगों को छोड़ दिया और तसलीमा के साथ अशोक वाजपेयी और कुंवर नारायण को लेकर लंच के लिए चले गए । जबतक तसलीमा वहां रही कैमरे का फ्लैश बंद होने का नाम नहीं ले रहा था । जींस और टी शर्ट पहने छरहरी काया की तस्लीमा अपने स्वागत से भाव विभोर थी । लेकिन सिर्फ दस साल में माहौल कितना बदल गया । तस्लीमा दिल्ली की उसी साहित्यिक जमात के बीच खड़ी थी लेकिन उनका कोई नोटिस नहीं ले रहा था । वजह चाहे जो भी हो । खैर ये एक अलग बात है जो प्रसंगवश मैं कह गया ।
हम बात कर रहे थे हंस के 25 साल पूरे होने की ।राजेन्द्र यादव जी ने कार्यक्रम की शुरूआत की और हंस के शुरुआती दिनों के अपने दोस्तो- लालानी जी और गौतम नवलखा आदि को शिद्दत से याद किया । छोटा सा भाषण भी दिया और टॉलस्टॉय की एक कहानी भी सुनाई । मैं लंबे समय से राजेन्द्र जी को सुनते आ रहा हूं उस दिन पहली बार लगा कि पाइप और सिगरेट के कश ने उनको काफी कमजोर कर दिया है । हिंदी साहित्य का अस्सी साल का ये जवान शारीरिक रूप से भले ही कमजोर लग रहा हो लेकिन हौसले अब भी बुलंद नजर आ रहे थे । राजेन्द्र यादव ने अपना भाषण समाप्त कर हिंदी के दलित लेखक अजय नावरिया को मंच संचालन के लिए बुला लिया । यहीं से समारोह की गरिमा के खत्म होने की शुरूआत हो गई । अजय नावरिया ने बेहद मसखरेपन के साथ मंच संचालन शुरू किया । मंच संचालन इतना खराब था कि उसकी चर्चा करना समय बर्बाद करना है । लेकिन जिस अपमानजनक तरीके की टिप्पणी अजय ने अपने मंच संचालन के दौरान की उसके लिए उसे कम से कम दुर्गा से तो माफी मांगनी ही चाहिए । दुर्गा प्रसाद राजेन्द्र जी के पुराने सहयोगी हैं । उन्हें भी इस मौके पर सम्मानित किया गया । स्मृति चिन्ह के साथ एक लिफाफा दिया गया । गिफ्ट देते वक्त अजय ने कहा – दुर्गा जी तो दो पैंट शर्ट के कपड़ा दिया जा रहा है जो उनके लिए उपयोगी है । वो इतने पर ही नहीं रुके उन्होंने सार्वजनिक रूप से दुर्गा की खुराक के बारे में टिप्पणी कर डाली। काफी देर तक साहित्यिक जमात ने अजय तो झेला लेकिन जब लोगों का धैक्य जवाब दे गया तो कुछ उत्साही लोगों ने उसे हूट कर बैठा दिया । भीड़ जबतक इंसाफ कर पाती तबतक अजय नावरिया ने साहित्यिक समारोह की गरिमा को समूल रूप से नष्ट कर दिया था । काफी देर तक चले मसखरेपन के बाद लालानी जी ने बोलना शुरू किया । उन्होंने राजेन्द्र यादव के साथ अपने शुरुआती दिनों को याद किया । बोले तो गौतम नवलखा और अर्चना वर्मा भी । दोनों ने बेहद संक्षिप्त बोला और सिर्फ हंस की तारीफों के पुल बांधे । अर्चना वर्मा ने हंस के साथ के अपने दिनों को बताया कि किस तरह से वो सिर्फ परख देखने के लिए हंस में आई थी और किस तरह से उन्हें कहानी और फिर कम पड़ रहे लेख भी लिखवाया जाने लगा ।
इसके बाद बारी थी हिंदी के हिरामन नामवर सिंह की । नामवर जी को हंस और साहित्यिक पत्रकारिता पर बोलना था लेकिन बोले वो सिर्फ हंस पर । शुरुआत तो उन्होंने – मेरे दुश्मन राजेन्द्र यादव से की लेकिन उसके बाद उन्होंने राजेन्द्र यादव के हौसले की जबरदस्त तारीफ की । सार्वजनिक रूप से अपनी तारीफ सुनकर मंच पर बैठे यादव जी का चेहरा लाल-लाल हो रहा था । शरमा इस तरह रहे थे जैसे कोई नई नवेली दुल्हन शर्माती है । लेकिन नामवर जी तो अपनी रौ में थे । अपने विरोधियों को अपनी पत्रिका में जगह देने के लिए भी उन्होंने यादव जी की नामवरी अंदाज में सराहना की । उसी नामवरी अंदाज में अशोक वाजपेयी पर हमला भी बोला । नामवर जी ने कहा कि अशोक जब पूर्वग्रह के संपादक थे तो अपने पूर्वग्रहों के साथ उसका संपादन करते थे । उन्होंने कभी राजेन्द्र यादव को पत्रिका में नहीं छापा लेकिन राजेन्द्र ने हंस के छब्बीसवें वर्ष के पहले अंक में अशोक वाजपेयी से ही लिखवाया । बोलते बोलते नामवर सिंह ने अशोक वजपेयी को कायर और यादव जी को बहादुर करार दे दिया । नाम तो रवीन्द्र कालिया और अखिलेश का भी आया है । नामवर सिंह बहुत कम बोले । साहित्यिक पत्रकारिता पर भी प्रकाश डालते तो मौजूद श्रोताओं का ज्ञानवर्धन होता । उसके बाद कुछ सवाल जवाब भी हुए । लेकिन नामवर सिंह ने एक जोरदार शेर के साथ अपनी बात खत्म की – जो हो सकता है इससे वो किसी से हो नहीं सकता, मगर देखो तो जो हो सकता है वो आदमी से हो नहीं सकता ।
दिल्ली में हुए इस साहित्यक जलसे से एक बात साफ हो गई कि राजेन्द्र यादव हर उम्र के बीच खासे लोकप्रिय हैं । कार्यक्रम से बाहर निकलते हुए मैं एक बार फिर से सोच रहा था कि अंग्रेजी में अगर किसी लिटरेरी मैगजीन के प्रकाशन के पच्चीस साल पूरे होते तो क्या इस तरह का ही समारोह मनाया जाता । जवाब मिला नहीं । तो फिर हम हिंदी के लोग क्यों नहीं अपने गौरव का सम्मान कर पाते हैं । क्यों नहीं हमारा मीडिया इस तरह की समारोह को कवरेज देता है । इन सवालों से जूझता हुआ मैं घर लौट आया । सवाल अब भी मेरा पीछा कर रहे हैं ।
Friday, August 5, 2011
सफलता के नशे में बेअंदाज धोनी
जब लंदन के भारतीय उच्चायोग ने विदेश मंत्रालय से धौनी के इस वर्ताव की शिकायत की तो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड धौनी के बचाव में उतर आया । दरअसल भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड हमेशा अपनी सुविधा के अनुसार तर्क गढ़ता रहता है । जब उस संस्था पर मनोरंजन कर और इंकम टैक्स लगाने की बात होती है तो वह अपने आपको देश के गौरव से जोड़कर इन करों में रियायत की वकालत करता है । लेकिन जब यही अपेक्षा देश उनसे करता है तो वो अपने आपको निजी संस्था बताने में लग जाते हैं । इस तरह के कई वाकए हुए हैं जब बीसीसीआई ने अलग अलग वक्त पर अलग अलग स्टैंड लिया है । जहां तक मुझे याद है कि किसी मामले में अदालत में भी बीसीसीआई ने इस तर्क का सहारा लिया था कि वह एक निजी संस्था है और लोकहित के नाम पर उसपर दबाव नहीं बनाया जा सकता है । देश के लिए गौरव की बात करनेवाले क्रिकेट बोर्ड को देश के गौरव की अगर फिक्र होती तो धौनी और टीम इंडिया को उच्चायोग के डिनर में जाना होता । लेकिन खिलाड़ियों को भी लगता है कि जब बोर्ड को ही देश की फिक्र नहीं है तो उन्हें क्यों हो । हमारे क्रिकेट के खिलाड़ी सिर्फ और सिर्फ पैसा के लिए खेलते हैं । देश के गौरव का तो वो पैसा कमाने के लिए एक प्लेटफॉर्म की तरह इस्तेमाल करते हैं और यह सीख उन्हें उनके संस्था यानि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड से मिलती है । दरअसल क्रिकेट खेलनेवाले खिलाड़ी पैसा कमाने की अंधी दौड़ में इस कदर मुब्तिला हो चुके हैं कि उन्हें विदेशों में भी देश के गौरव और सम्मान की चिंता नहीं रहती । महेन्द्र सिंह धौनी देश के पिछड़े राज्यों में एक झारखंड से आते हैं और बेहद संघर्षों के बाद अपनी काबिलियत के बूते पर एक मुकाम हासिल किया लेकिन अब लगता है कि सफलता के शीर्ष पर पहुंचकर या तो वो असुरक्षा बोध से ग्रस्त हो गए हैं या फिर सफलता का ऐसा नशा उनपर चढ़ा है कि वो अपने आगे किसी को कुछ समझते ही नहीं है । ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब पद्म पुरस्कार वितरण समारोह में भी महेन्द्र सिंह धौनी नहीं पहुंचे थे । जिस दिन महामहिम राष्ट्रपति महेन्द्र सिंह धौनी समेत देश के अन्य विशिष्ट वयक्तियों को पद्म पुरस्कारों से नवाजनेवाली थी उस दिन धोनी साहब के किसी विज्ञापन फिल्म की शूटिंग में वयस्त होने की खबर आई थी । उस वक्त भी महेन्द्र सिंह धौनी के पद्म पुरस्कार नहीं लेने के लिए पहुंचने पर खासी आलोचना हुई थी । तब भी बीसीसीआई ने धौनी का बचाव किया था और अब भी वो लचर दलीलों के साथ अपने कप्तान का बचाव कर रही है ।
लेकिन ऐसा लगता है कि धोनी को पैसे के आगे ना तो अपनी प्रतिष्ठा का ख्याल है और ना ही देश और उसकी संवैदानिक मान्यताओं और संस्थाओं का । अब वक्त आ गया है कि देश के कर्ता-धर्ताओं को या भारत सरकार को बीसीसीआई को एकदम से नितांत निजी संस्था की तरह ट्रीट करना चाहिए और ना तो उन्हें टैक्स में किसी तरह की रियायत मिलनी चाहिए और ना ही आईपीएल के तमाशे में मनोरंजन कर में छूट मिलनी चाहिए । दरअसल इतना कड़ा स्टैंड हम तभी ले पाएंगे जब देश के शीर्ष नेतृत्व में दृढ राजनैति इच्छा शक्ति हो । अबतक बीसीसीआई पर उन्हीं लोगों का कब्जा है जो या तो सरकार में शामिल रहे हैं या फिर सरकार में शामिल लोगों के पिट्ठू रहे हैं । नतीजा यह होता है कि देश की एक निजी संस्था को पैसा कमाने के लिए देश का नाम का इस्तेमाल करने की छूट मिली हुई है । उनसे तत्काल यह छूट वापस ली जानी चाहिए और उन्हें भारतीय क्रिकेट टीम की बजाए बीसीसीआई की टीम माना जाना चाहिए । और सिर्फ देश की सरकार को नहीं बल्कि देश की जनता को भी क्रिकेटरों को किसी निजी संस्था के लिए खेलनेवाले खिलाड़ियों की तरह मानना चाहिए और उनके साथ भी उसी तरह का व्यवहार करना चाहिए । वो किसी क्लब के हीरो हो सकते हैं किसी देश के नहीं । देश का नायक होने के लिए देश की इज्जत, उसकी मान मर्यादा, उसकी मान्यताओं, उसकी परंपराओं में ना केवल विश्वास और आस्था होना जरूरी है बल्कि समय आने पर यह दिखाना भी पडता है कि मान्यताओं में आस्था और विश्वास भी है
Wednesday, August 3, 2011
आतंक के आका की जीवनी
Tuesday, August 2, 2011
साहित्यिक “डॉन” का कारनामा
हंस के छब्बीसवें वर्ष के पहले अंक को देखकर मैं थोड़ा नॉस्टेलिक भी हो गया । मुझे अपने कॉलेज के दिनों और अपने शहर जमालपुर की याद आ गई । हमाके शहर में रेलवे स्टेशन पर ए एच व्हीलर का स्टॉल ही हमारे लिए उम्मीद की एकमात्र किरण हुआ करता था । अस्सी के दशक के अंत में जमालपुर का व्हीलर स्टॉल इलाहाबाद के पांडे जी का हुआ करता था । वो साहित्यप्रेमी थे इस वजह से उनके स्टॉल पर साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं मिल जाया करती थी । राजस्थान से निकलनेवाली पत्रिका मधुमती तक उनके पास पहुंचती थी, पहल, वसुधा इंद्रपर्स्थ भारती आदि-आदि तो आती ही थी । मैंने पहली बार हंस वहीं से खरीदा था । महीना और साल ठीक से याद नहीं है । लेकिन फिर तो हंस का हर अंक खरीदने लगा, पढ़ने लगा । मंडल आंदोलन के दौरान और उसके बाद राजेन्द्र यादव के स्टैंड से घनघोर असहमतियां रही लेकिन कभी हंस खरीदना बंद नहीं किया । जमालपुर में हंस की दस प्रतियां आती थी जो महीने ती सात या फिर आठ तारीख को पहुंचती थी । दिल्ली से प्रतियां वी पी पी से आया करती थी । इस पद्धति में डाकघर जाकर वहां पैसे जमा करने के बाद ही बंडल मिलता था । व्हीलर के हमारे पंडित जी के लिए हंस का बंडल भी अन्य किताबों के बंडल की तरह से होता था । जब वक्त मिलता था तो किसी को भेजकर डाकघर से बंडल मंगवा लेते थे । लेकिन होता ये था कि पटना में हंस रेल से आता था जो दो तीन दिन पहले आ जाया करता था । वहां से मित्रों का फोन आना शुरू हो जाता था कि हंस में फलां लेख या फलां कहानीकार की कहानियां देखी । जो हमारी बेचैनी बढ़ा दिया करती थी । मुझे याद है कि कई बार मैं खुद डाकघर जाकर हंस के बंडल छुड़वा कर व्हीलर के स्टॉल पर पहुंचाया करता था । बाद में हमने हमने हंस को जल्दी पाने का एक विकल्प निकाला । हमने डाकिया को पटाया और उससे अनुरोध किया कि वो अपनी साइकिल पर हंस के बंडल डाकघर से उठा लाया करे और व्हीलर के पंडित जी को सौंप दे । फायदा यह हुआ कि हंस जिस दिन हमारे शहर के डाकघर में आता उस दिन ही हमें उपलब्ध हो जाता था । लेकिन फिर भी पटना से लेट ही मिलता था । हंस को खरीदने की यह बेचैनी अबतक बरकरार है । महीने की 23-24 तारीख से ही राजेन्द्र जी के प्राण लेने लग जाता हूं कि हंस जनहित में कब जारी हो रहा है । जनहित का मतलब है कि बिक्री के लिए दिल्ली के स्टॉल्स पर कब पहुंच रहा है । कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि हंस लेने राजेन्द्र जी के दफ्तर या फिर घर तक पहुंच गया ।
हंस ने छब्बीसवें साल में कदम रखते हुए जो पहला अंक निकाला है उसमें हंस और साहित्यिक पत्रिकाओं पर अशोक वाजपेयी, रवीन्द्र कालिया, जनसत्ता के कार्यकारी संपादक ओम थानवी, पंकज बिष्ट, अखिलेश और शैलेन्द्र सागर के लेख छपे हैं । लगभग सभी लेखों का केंद्रीय भाव एक ही है । अशोक वाजपेयी ने लिखा है कि – इसे भी निसंकोच स्वीकार किया जाना चाहिए कि हिंदी में नारी विमर्श और दलित विमर्श की आज जो जगह है, लगभग केंद्रीय, उसे वह दिलाने में हंस ने बड़ी भूमिका निभाई है । ऐसा करके उसने ना सिर्फ हिंदी साहित्य में इन दोनों विमर्शों और उनसे जुड़ी और प्रेरित रचनात्मकता को स्थापित किया, पोसा और बढाया । आगे लिखते हैं- यह नोट करना सुखद है कि पच्चीस वर्षों तक चलने के बाद भी हंस एक पठनीय पत्रिका है, वह आज भी प्रासंगिक बनी हुई है । ज्ञानोदय के संपादक रवीन्द्र कालिया ने लिखा है – हंस के अवदान को नजरअंदाज किया ही नहीं जा सकता । हंस दीर्घजीवी ना होता तो आज हिंदी कहानी बुत पिछड़ चुकी होती । हिंदी कहानी को जिंदा रखने और बोल्डनेस को डिफेंड करने में राजेन्द्र जी की अपूर्व भूमिका है । .....राजेन्द्र जी ने यथास्थितिवाद पर लगातार प्रहार किए और दलित तथा नारी विमर्श को सामने लाने और निरंतर उसे गतिशीलता प्रदान करने में अपनी पूरी उर्जा लगा दी । तद्भव के संपादक अखिलेश भी यह मानते हैं कि- कह सकते हैं कि हंस ने हिंदी साहित्य का एजेंडा बदल दिया । दलित,स्त्री, पिछड़ा और अल्पसंख्यक यदि आज समाज और साहित्य के सरोकार बने हैं तो इसके पीछे हंस का भी पसीना है । तो हम यह देख रहे हैं कि हंस के बारे में हिंदी जगक की कमोबेश एक ही राय है । पिछले पच्चीस सालों में हंस ने हिंदी साहित्य को ना केवल एक नई दिशा दी बल्कि उसने दलित और स्त्री विमर्श के साथ-साथ तत्कालीन प्रासंगिक मुद्दों को उठाकर हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता का एक नया इतिहास भी लिखा और साहित्यिक पत्रकारिता के कुछ नए मानक भी स्थापित किए तरह की खुली बहस से दूसरी पत्रिका के संपादकों के हाथ पांव फूल जाते थे उसे राजेन्द्र यादव ने हंस में जोरदार तरीके से उठाया । खुद अपने संपादकीय में बिना किसी डर-भय और लाग लपेट के यादव जी ने अपनी बातें कहकर बहस में सार्थक हस्तक्षेप किया । अपने प्रकाशन के शुरुआती दिनों से ही हंस ने साहित्यिक माहौल को गर्मागर्म बनाए रखा और जो मुर्दनीछाप शास्त्रीय किस्म का माहौल था उसे सक्रिय करते हुए जुझारू तेवर भी प्रदान किए । इसके अलावा हंस ने कहानीकारों की कई पीढियां भी तैयार कर दी । हंस ने अपने प्रकाशन के शुरुआती वर्षों में ही उदय प्रकाश की तिरिछ, शिवमूर्ति की तिरिया चरित्तर, ललित कार्तिकेय का तलछट का कोरस, रमाकांत का कार्लो हब्शी का संदूक, चंद्रकिशोर जायसवाल की हंगवा घाट में पानी रे और आनंद हर्षुल की उस बूढे आदमी के कमरे में छापकर हिंदी कथा साहित्य में हलचल मचा दी थी । कालांतर में भी हंस में ही छपी उदय प्रकाश की चर्चित कहानियां – और अंत में प्रार्थना, पीली छतरी वाली लड़की, अरुण प्रकाश की जल प्रांतर, अखिलेश की चिट्ठी, स्वयं प्रकाश की अविनाश मोटू उर्फ..., सृंजय की कॉमरेड का कोट आदि कहानियों ने भी कथा साहित्य को झकझोर दिया था ।
तो हंस को पच्चीस साल पूरे करने पर बधाई और उसके संपादक की जिजिविषा और उनकी दृढ इच्छा शक्ति को सलाम । ईश्वर से प्रार्थना इस बात की कि राजेन्द्र यादव जी को लंबी उम्र मिले और हंस निर्बाध गति से निकलता रहे ।
Wednesday, July 27, 2011
साहित्य की क्लियोपेट्राएं
ऐसा नहीं है कि इस तरह की महिलाएं, जो अपनी देह को सत्ता हासिल करने का जरिया बनाती हैं, सिर्फ विदेशों या पश्चिमी देशों में ही हैं । इस तरह के कई उदाहरण हमारे देश में भी मिल जाएंगे लेकिन हमारे यहां सेक्स या फिर इस तरह के संबंधों पर बातें तो खूब की जाती हैं लेकिन उसके बारे में लिखना गुनाह माना जाता है । अपने राजनेताओं और उनकी महिला मित्र के बारे में सत्ता के गलियारे में खूब चर्चा होती है लेकिन उसके बारे में सार्वजनिक रूप से कोई बहस नहीं होती । हमारे यहां यह समझा जाता है कि यह उनका वयक्तिगत जीवन है जिसमें झांकना उनकी निजता के अधिकार का हनन होगा । लेकिन उस वक्त हम भूल जाते हैं कि जिस वयक्ति का जीवन ही सार्वजनिक हो गया है उसका निजी कुछ नहीं रह जाता । गांधी जी भी कहा करते थे कि सार्वजनिक जीवन व्यतीत करनेवालों का निजी कुछ भी नहीं रह जाता । खैर यह एक अलग विषय है जिसपर विस्तार से बहस की जा सकती है ।
राजनीति के अलावा अगर हम हिंदी साहित्य की बात करें तो यहां भी आपको कई क्लियोपेट्रा मिल जाएंगी । जिन्होंने अपनी देह का इस्तेमाल साहित्य में अपने करियर को नई ऊंचाई तक पहुंचाने में बखूबी किया । यहां मैं भी किसी एक या दो का नाम लेकर नाहक विवाद खड़ा करना नहीं चाहता लेकिन साहित्य के हलके में लोग इस तरह की क्लियोपेट्राओं को बखूबी जानते हैं । हिंदी साहित्य में देह मुक्ति आंदोलन के प्रणेता हंस के यशस्वी संपादक राजेन्द्र यादव तो इन क्लियोरेट्राओं से घिरे ही रहे है, कई को तो बढ़ावा भी दिया है (क्षमा सहित ये बात कह रहा हूं,लेकिन पूरा साहित्य जगत उन नामों से वाकिफ है ) । मैं यह नहीं कह रहा राजेन्द्र जी साहित्य के सीजर हैं लेकिन उनके दरबार में समय समय पर इस तरह की एक दो महिला लेखिका हमेशा से रही हैं । कई ने तो, जिनमें कुछ प्रतिभा थी, आगे चलकर लेखन में खूब नाम और यश दोनों कमाया । लेकिन जिनमें प्रतिभा नहीं सिर्फ महात्वाकांक्षा थी वो कुछ समय के लिए हिंदी साहित्य के आकाश पर धूमकेतु की तरह चमककर गायब हो गई। किसी के एक संग्रह आए तो किसी को कोई छोटा मोटा पुरस्कार मिल गया । उनके साहित्य के आकाश पर चमकने के साहित्येत्तर कारण रहे हैं । इन वजहों को राजेन्द्र जी चाहें तो खोल सकते हैं और साहित्य के क्लियोपेट्राओं का नाम भी बता सकते हैं, बता देना भी चाहिए । लेकिन जिस तरह से उन्होंने अपनी आत्मकथा में स्थितियों और नामों को काल्पनिक रूप देकर वास्तविकता को छुपा दिया उसके बाद उनसे तो यह उम्मीद बिल्कुल नहीं की जा सकती है कि वो हिंदी साहित्य की क्लियोरेट्राओं का नाम उजागर करें । जानते वो सबकुछ हैं । राजेन्द्र यादव के बाद लोगों की उम्मीद अशोक वाजपेयी से भी हो सकती है लेकिन सार्वजनिक तौर पर अशोक जी की जो छवि है उसमें उनसे यह अपेक्षा करना बेमानी है कि वो हिंदी की इन क्लियोपेट्राओं का नाम लेंगे । अपनी बेबाक बयानी के लिए जाने जानेवाले प्रसिद्ध उपन्यासकार और महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय जिस तरह से छिनाल विवाद में अपना हाथ जला चुके हैं उसके बाद तो उनसे इस स्त्रियों के मामले में कुछ भी अपेक्षा नहीं की जा सकती है ।
हिंदी साहित्यिक परिदृश्य में अब काफी बदलाव देखा जा सकता है । कई लेखिकाएं तो खुले तौर पर दैहिक उदारवाद की बात करती हैं । बातचीत में जो बिंदासपन और खुलापन है वो उनके स्वभाव में भी देखा जा सकता है । उनके लिए सेक्स अब टैबू नहीं है, देह उनके लिए भी उसकी तरह उपभोग की वस्तु है जिस तरह से मर्दों के लिए । अपने परुष मित्रों के साथ सेक्स संबंध बनाने में उन्हें ना तो कोई एतराज होता है और ना ही झिझक । लेकिन नाम और यश कमाने के लिए जिस तरह से उसका उपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ी है वो चिंता की बात है । हमारे यहां क्लियोपेट्रा अब एक नाम नहीं रही बल्कि यह एक प्रवृत्ति के तौर पर स्थापित हो चुकी है । एक संज्ञा के प्रवृत्ति में बदलने की जो प्रक्रिया है वो चिंता की बात है । कई नवोदित लेखिकाएं इस राह पर चलकर शॉर्टकट में सफलता हासिल करना चाहती हैं जो साहित्य के लिए चिंता की बात है । लेकिन उन लेखिकाओं को शॉर्टकट में सफलता की राह दिखाने के लिए कई कवि मित्र सदैव तत्पर रहते हैं । उन्हें तो तलाश रहती है बस मौके की । मेरा यह कहने का मतलब कतई नहीं है कि साहित्य में सफलता की सीढ़ी चढ़ने के लिए सभी लेखिकाएं अपने शरीर का इस्तेमाल करती हैं । ना ही मैं स्त्रियों या लेखिकाओं को अपमानित करने के लिए ये लेख लिख रहा हूं । मेरी मंशा उस तरह की लेखिकाओं को हतोत्साहित करने की है जो बगैर किसी प्रतिभा के सिर्फ अपनी देह के बूते हिंदी साहित्य का सारा आकाश झेकना चाहती है ।