विरासत पर संग्राम
तमिलनाडु की राजनीति में आजकल भूचाल आया हुआ है और ये भूचाल विरोधी दलों की वजह से नहीं बल्कि सत्ता पक्ष की तरफ से ही है । तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि के बड़े बेटे और केंद्रीय रसायन मंत्री अझागिरी के एक तमिल साप्ताहिक को दिए गए साक्षात्कार से द्रविड़ मुनेत्र कड़गम में तूफान उठ खड़ा हुआ है । अझागिरी ने साफ तौर पर यह कह दिया है कि वो अपने पिता और सूबे के मुख्यमंत्री के बाद किसी को अपना नेता स्वीकार नहीं करेंगे । अझागिरी ने कहा- जब तक करुणानिधि जीवित हैं तबतक किसी और के डीएमके के नेता होने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है । किसी और व्यक्ति का ना तो इतना बड़ा कद है और ना ही उसमें वो नेतृत्व क्षमता है जो करुणानिधि की जगह ले सके । लेकिन उनके बाद मैं किसी को भी अपना नेता नहीं मानूंगा । दरअसल अझागिरी के निशाने पर हैं उनके छोटे भाई और तमिलनाडू के उपमुख्यमंत्री एम के स्तालिन ।
लेकिन इस पूरे झगड़े को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा । जब दूसरी बार यूपीए की सरकार बनी तो मंत्रिमंडल गठन के वक्त करुणानिधि की पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने खासा पच्चर फंसाया था । मालदार मंत्रालय के लिए कांग्रेस के सहयोगी दलों में होड़ लगी थी । उस वक्त करुणानिधि ने लोकसभा के सदस्यों के संख्या बल के आधार पर जमकर सौदेबाजी की थी । अपने खास सांसदों के अलावा अपने बड़े बेटे अझागिरी को केंद्र में कैबिनेट मंत्री बनवा दिया था । अझागिरी के केंद्र में मंत्री बनने के अगले ही दिन उन्होंने अपने छोटे बेटे एम के स्तालिन को तमिलनाडु का उपमुख्यमंत्री मनोनीत कर कई संकेत एक साथ दे दिए थे । करुणानिधि ने स्तालिन को ना केवल उपमुख्यमंत्री बनाया बल्कि सरकार और पार्टी में भी उनको प्रयत्नपूर्वक स्थापित करने लगे ताकि दो हजार ग्यारह में होनेवाले विधानसभा चुनाव के पहले स्तालिन को राज्य के मुख्यमंत्री की गद्दी सौंप सकें । इस योजना के तहत सबकुछ ठीक ठाक चल रहा था । लेकिन अचानक करुणानिधि के एक बयान से सारा मामला बदल गया । करुणानिधि ने जोर देकर कहा कि वो जून में होनेवाले विश्व तमिल सम्मेलन के बाद अपने दायित्व से मुक्त होकर लोगों के बीच रहना चाहते हैं ।
इस बयान और स्तालिन के पार्टी और सरकार में बढ़ते रसूख से साफ था कि करुणानिधि तमिलनाडु को लेकर अपने छोटे बेटे पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं । इन साफ संकेतों को समझते हुए अझागिरी ने अपना विरोध तेज कर दिया और पिता पर दवाब भी बढ़ाया । अझागिरी केंद्र में कैबिनेट मंत्री बनकर खुश तो हैं लेकिन वो चाहते हैं कि पार्टी में भी उन्हें अहम ओहदा मिले ताकि वो अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार दक्षिण तमिललाडु से आगे जाकर कर सकें । दक्षिण तमिलनाडु में अझागिरी का दबदबा है और पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने इस बात को साबित भी किया । इस इलाके की सभी दस लोकसभा सीटों पर डीएमके को जीत दिलाकर अपनी धमक भी दिखाई ।
पारिवार के बढ़ते दबाव और घर में मचे कलह को देखते हुए करुणानिधि ने एक शातिर राजनेता की तरह एक बार फिर से बयान बदला । करुणा ने कहा कि हलांकि पीठ में तकलीफ की वजह से वो व्हील चेयर पर हैं लेकिन दिमागी तौर पर पूरी तरह से स्वस्थ हैं और निकट भविष्य में रिटायर होने की उनकी कोई योजना नहीं है और ना ही वो मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली करनेवाले हैं । हलांकि एक बार फिर से करुणानिधि ने ये कहकर कि स्तालिन उनके लिए प्राणवायु हैं ये संकेत दे दिया है कि सूबे की कमान वो अपने छोटे बेटे को ही सौंपनेवाले हैं ।
राज्य में मुख्यमंत्री पद को लेकर जिस तरह से परिवार में घमासान मचा है उससे ये प्रतीत होता है कि तमिलनाडु करुणानिधि की पारिवारिक जागीर है जिसकी विरासत को लेकर दोनों पुत्रों में जंग छिड़ा है । राजनीति में परिवारवाद और वंशवाद का ये एक विद्रूप चेहरा है जो लोकतंत्र के मुंह पर एक बदनुमा दाग है । मुख्यमंत्री चुनने का अधिकार प्रत्यक्ष रूप से तो चुने हुए विधायको के पास होता है लेकिन परोक्ष रूप से तो सूबे की जनता ही यह तय करती है कि उनका सीएम कौन होगा ।
उन्नीस सौ सत्तावन में पहली बार विधायक बने और सड़सठ में मंत्री बने करुणानिधि ने संघर्ष के बूते अपनी पहचान बनाई थी । अपने संघर्ष और सांगठनिक क्षमता की बदौलत करुणानिधि ने तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री अन्नादुरै के मन पर गहरी छाप छोड़ी थी । अन्ना इनसे बेहद प्रभावित थे और बेइतहां भरोसा भी । समय के साथ उन्होंने अघोषित तौर पर करुणानिधि को अपने उत्तराधिकारी के तौर पर प्रोजेक्ट भी करने शुरू कर दिया था । नतीजा यह हुआ कि जूनियर होते हुए भी करुणानिधि को उनके मंत्रिमंडल में अहम जगह मिली । जब उन्नीस सौ उनहत्तर में अन्नादुरै की मौत हुई तो करुणानिधि ने सूबे के मुख्यमंत्री का पद संभाला ।
अपने संघर्ष और द्रविड़ राजनीति की बदौलत पार्टी में अपनी जगह बनाने वाले करुणानिधि अब अपनी ही पार्टी के समर्पित और संघर्षशील कार्यकर्ताओं को भुलाकर अपने संतान मोह में डूब से गए लगते हैं । सत्ता सुख और पुत्र मोह में जिस तरह से धृतराष्ट्र को कुछ नहीं दिखाई देता था उसी तरह करुणानिधि को भी तमिलनाडु और देश की राजनीति में बेटे-बेटियों के अलावा कोई और दिखाई नहीं देता । यह एक ऐसे महान राजनेता का पतन है जिसने द्रविड़ आंदोलन में ना केवल जमकर हिस्सा लिया बल्कि उसे अपनी नेतृत्व क्षमता से एक दिशा भी दी । लेकिन सत्ता सुख और पुत्र मोह ऐसी चीज है जो बड़े से बड़े क्रांतिकारी को भी डिगा देती है । डिगे तो करुणानिधि भी थे जब उनपर भ्रष्टाचार के संगीन इल्जाम लगे और सरकारिया कमीशन ने उनको इन तमाम भ्रष्टाचार के लिए दोषी भी पाया था । उन आरोपों में घिरे करुणानिधि की सरकार को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बरखास्त भी किया था । सत्ता नेता को भ्रष्ट और कमजोर बनाती है और शायद यही वजह रही कि गांधी जी और जयप्रकाश नारायण ने पूरे जीवन में कोई सरकारी पद नहीं लिया, किसी सरकार में शामिल नहीं हुए । जिसकी वजह से इनकी विश्वसनीयता बरकरार रह सकी और लोग इनकी एक आवाज पर जान लेने और देने दोनों के लिए तैयार रहते थे ।
अझागिरी तमिल पत्रिका को दिए इंटरव्यू के बाद जब बवाल बढ़ा तो अझागिरी ने तमाम अटकलों को खारिज करते हुए सफाई दी कि वो और स्तालिन एक दुनाली बंदूक की तरह हैं जो एक साथ अपने दुश्मनों पर वार करते हैं । लेकिन तमिलनाडु की राजनीति और करुणानिधि के परिवार को लंबे अरसे से नजदीक से देखनेवालों का मानना है कि दोनों दुनाली बंदूक नहीं बल्कि एक दूसरे की तरफ तनी हुई बंदूक हैं । झगड़ा का तीसरा कोण करुणानिधि की बेटी कनीमोझी का भी है । अपनी तीसरी पत्नी के दबाव में करुणानिधि ने कनीमोझी को राज्यसभा का सदस्य तो बनवा दिया लेकिन कनिमोझी और उसकी मां इतने से संतुष्ट नहीं हैं । कनीमोझी की भी राजनैतिक महात्वाकांक्षा हिलोरे ले रही हैं, वो भी मंत्री पद और पार्टी में अहम ओहदा चाहती है । उनका तर्क है कि राजनीतिक विरासत में औलाद को बराबर हक मिलना चाहिए और हो भी क्यों ना क्योंकि करुणानिधि ने तो पूरी डीएमको अपनी जागीर बना रखी है जहां मलाई तो सिर्फ परिवार में ही बंटती है आम कार्यकर्ता के हिस्से तो आता है आंदोलन और संघर्ष । तमिलनाडु की राजनीति पर अगर हम बारीकी से नजर डालें तो ये बात साफ तौर पर दिखती है कि करुणानिधि के बाद डीएमके में उनकी राजनीतिक विरासत को लेकर संग्राम तय है, इंतजार बस समय का है । पारिवारिक कलह और पुत्रमोह में फंसे करुणा पर तो बस दया की जा सकती है, क्योंकि पचासी पार इस राजनीतिक पुरोधा के आंखों पर मोह की पट्टी है ।
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Tuesday, March 30, 2010
Tuesday, March 23, 2010
मकबूल पर फिदा क्यों हों ?
जब मैंने मकबूल फिदा हुसैन के भारत छोड़ने और कतर की नागरिकता स्वीकार करने पर सेक्युलरवादियों के दोहरे चरित्र को उजागर करता हुआ लेख हाहाकार पर लिखा तो मेरे विवेक और मेरी समझ,मेरी विचारधारा, मेरी शिक्षा, मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि को लेकर लोगों ने सवाल किए ।मुझे कालिदास का कुमार संभव पढ़ने की और खजुराहो की प्रसिद्ध मूर्तियां देखने समझने के अलावा प्राचीन भारतीय मूर्तिकला के बारे में अपने ज्ञान को बढ़ाने का उपदेश दिया गया । मुझे इस बात पर घेरने की कोशिश की गई कि मेरी बातें भगवा ब्रिगेड या संघियों से क्यों मिलती जुलती हैं । जिन लोगों ने मुझे इस तरह की सलाह दी मुझे नहीं मालूम कि उनकी समझ कितनी बेहतर है, उन्होंने कालीदास को कितना पढ़ा है । उन्होंने कितनी बार खजुराहो की मूर्तियां देखी है, लेकिन उन्हें मैं ये बता दूं कि हुसैन ने अपनी जीवनी और अपनी एक पेंटिंग दस्तखत करके मुझे दिए हैं जो मेरे लिए अमूल्य धरोहर हैं । हुसैन की पेंटिंग को समझने का दावा करनेवाले उनके तथाकथित समर्थकों में अभिवयक्ति की आजादी को लेकर घोर चिंता है और उन्हें लगता है कि हुसैन के भारत चोड़कर चले जाने से संविधान द्वारा प्रदत्त इस अधिकार पर हमला हुआ है । उन्हें यह सोचने समझने की जरूरत है कि जब भी कोई अपने आपको अभिव्यक्त करने के लिए ज्यादा स्वतंत्रता की अपेक्षा करता है तो स्वत: उससे ज्यादा उत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार भी अपेक्षित हो जाता है । भारत माता का नंगा चित्र बनाने पर हुसैन के खिलाफ दायर याचिका को दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस संजय किशन कौल ने खारिज कर दिया, साथ ही अपने फैसले में कला और उसकी समझ को लेकर कुछ कठोर टिप्पणियां भी की । लेकिन हुसैन के उन्नीस सौ सत्तर में बनाए गए सरस्वती और दुर्गा की नंगी तस्वीरों के एक दूसरे मामले में दो हजार चार में दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस जे डी कपूर का भी एक फैसला आया था । जस्टिस कपूर ने आठ अप्रैल दो हजार चार के अपने फैसले में लिखा-
इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि देश के करोड़ो हिंदुओं की इन देवियों में अटूट श्रद्धा है- एक ज्ञान की देवी हैं तो दूसरी शक्ति की । इन देवियों की नंगी तस्वीर पेंट करना इन करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना तो है ही साथ ही उन करोड़ों लोगों की धर्म और उसमें उनकी आस्था का भी अपमान है ।
शब्द, पेंटिंग, रेखाचित्र और भाषण के माध्यम से अभिव्यक्ति की आजादी को संविधान में मौलिक अधिकार का दर्जा हासिल है जो कि हर नागरिक के लिए अमूल्य है । कोई भी कलाकार या पेंटर मानवीय संवेदना और मनोभाव को कई तरीकों से अभिवयक्त कर सकता है । इन मनोभावों और आइडियाज की अभिवयक्ति को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता है । लेकिन कोई भी इस बात को भुला या विस्मृत नहीं कर सकता कि जितनी ज्यादा स्वतंत्रता होगी उतनी ही ज्यादा जिम्मेदारी भी होती है । अगर किसी को अभिवयक्ति का असीमित अधिकार मिला है तो उससे यह अपेक्षित है कि इस अधिकार का उपयोग अच्छे कार्य के लिए करे ना कि किसी धर्म या धार्मिक प्रतीकों या देवी देवताओं के खिलाफ विद्वेषपूर्ण भावना के साथ उन्हे अपमानित करने के लिए । हो सकता है कि ये धर्मिक प्रतीक या देवी देवता एक मिथक हों लेकिन इन्हें श्रद्धाभाव से देखा जाता है और समय के साथ ये लोगों के दैनिक धर्मिक क्रियाकलापों से इस कदर जुड़ गए हैं कि उनके खिलाफ अगर कुछ छपता है, चित्रित किया जाता है या फिर कहा जाता है तो इससे धार्मिक भावनाएं बेतरह आहत होती है । किसी भी खास धर्म के देवी देवताओं की आपत्तिजनक या नीचा दिखाने वाले रेखाचित्र या फिर पेंटिंग समाज में वैमनस्यता और एक दूसरे के प्रति नफरत पैदा करते हैं ।
अगर यह मान लिया जाए कि इस तरह के कार्य कला का एक नमूना है तब भी इस बात को विस्मृत नहीं किया जा सकता है कि इस तरह के कृत्य जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने या फिर अपमानित करने के दायरे में आता है, क्योंकि ये देवी देवता करोड़ों लोगों के अराध्य हैं । एक बार फिर मैं ये कहता हूं कि ये देवी देवता एक मिथक हो सकते हैं लेकिन जब भी इस तरह से नग्न रूप में उनको चित्रित किया जाता है तो लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं ।
अभिवयक्ति की आजादी के नाम पर किसी व्यक्ति को किसी भी वर्ग या समाज की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ की इजाजत नहीं दी जा सकती है । यह बात याचिकाकर्ता ( हुसैन) को समझनी चाहिए कि वो एक अलग धर्म से संबंधित हैं । अगर याचिकाकर्ता को लोगों की धार्मिक भावनाओं की गहराई का एहसास नहीं है तो वो अपने धर्म या फिर किसी और धर्म पर हाथ अजमाकर देखें तो उन्हें पता चल जाएगा कि धार्मिक भवानाओं की जड़ें कितनी गहरी होती हैं । इस तरह के काम दो अलग-अलग धर्मों को मानने वालों के बीच वैमनस्यता की खाई को और गहरा करती हैं, साथ ही सामाजिक सदभाव और आपसी भाईचारे के बीच बाधा बनकर खड़ी हो जाती है ।
याचिकाकर्ता ने महाभारत की पात्र द्रोपदी, जिन्हें हिंदू धर्म को मानने वाले लोग इज्जत की नजरों से देखते हैं, को भी पूरी तरह से निर्वस्त्र चित्रित किया है, जबकि चीरहरण के वक्त भी द्रोपदी निर्वस्त्र नहीं हो पाई थी । इस पेंटिंग में जिस तरह से द्रोपदी का चित्रण हुआ है वह साफ तौर से हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचानेवाला और नफरत पैदा करनेवाला है । अपने बारह पन्नों के जजमेंट में विद्वान न्यायाधीश ने और कई बातें कही और अंत में आठ शिकायतकर्ताओं की याचिका खारिज कर दी क्योंकि धार्मिक भावनाओं को भड़काने, दो समुदायों के बीच नफरत फैलाने आदि के संवंध में जो धाराएं (153 ए और 295 ए) लगाई जाती हैं उसमें राज्य या केंद्र सरकार की पू्र्वानुमति आवश्यक होती है, जो कि इस केस में नहीं थी । सनद रहे कि जब केस चल रहा था तो केंद्र में बीजेपी की सरकार थी । ये तो हुई अदालत और न्यायाधीश की बात । आपको एक और उदाहरण देते चलें जिससे कि हुसैन की महानता(?) और उनके पूर्वाग्रह पर से परदा हटता है । हुसैन ने एक बार महात्मा गांधी, कार्ल मार्क्स, अलबर्ट आइंस्टीन और हिटलर की पेंटिंग बनाई जिसमें हिटलर को उन्होंने नंगा दिखाया । जब उनसे इसके बार में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि किसी को अपमानित करने का यह उनका यह अपना तरीका है । इसके बाद मुझे लगता नहीं है कि कुछ कहने की जरूरत है । मार्क्स के अंध भक्तो धर्मनिरपेक्षता और अभिवयक्ति की आजादी के खतरे पर विलाप करना बंद करो । अपनी आंखों पर चढ़ा लाल चश्मा उतारो, तभी तर्क संगत बातें भी होंगी और विमर्श भी ।
( जस्टिस कपूर के जजमेंट के चुनिंदा अंशों के अनुवाद में हो सकता है कोर्ट की भाषा में कोई त्रुटि रह गई हो लेकिन भाव वही हैं )
Monday, March 22, 2010
शीला, श्लाका और बवाल
हिंदी में साहित्यिक पुरस्कारों की स्थिति बेहद खराब है । पुरस्कारों की विश्वसनीयता और उसके दिए जाने के तरीके को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं । हालत तो यहां तक पहुंच गए हैं कि साहित्य अकादमी पुरस्कारों की साख पर बट्टा लगा है । लेकिन ताजा विवाद तो दिल्ली की हिंदी अकादमी के श्लाका सम्मान को लेकर उठा है । दिल्ली की हिंदी अकादमी की अध्यक्ष वहां की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित हैं और उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर हैं । हिंदी अकादमी हर साल श्लाका सम्मान के अलावा कई और अन्य पुरस्कार देती है । वर्ष 2008-09 के लिए अकादमी की कार्यकारिणी ने हिंदी के वरिष्ठ और प्रतिष्ठित लेखक कृष्ण बलदेव वैद को श्लाका सम्मान देने की संस्तुति की थी । उसके बाद अकादमी की अध्यक्ष की हैसियत से तत्कालीन कार्यकारिणी के फैसलों पर मुहर लगा थी । लेकिन बाद के दिनों में हिंदी अकादमी में प्रशासनिक अराजकता की वजह से उस वर्ष के सम्मान नहीं दिए जा सके । लेकिन अब जब अकादमी ने वर्ष 2009-10 के पुरस्कारों के साथ 2008-09 के पुरस्कारों का ऐलान किया तो 2008-09 के लिए श्ललाका सम्मान के लिए किसी का नाम घोषित नहीं किया गया । सूची से कृष्ण बलदेव वैद का नाम गायब था । बताया जा रहा है कि एक अनाम से कांग्रेसी नेता ने अकादमी की अध्यक्ष दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को पत्र लिखकर कृष्ण बलदेव वैद को श्लाका सम्मान नहीं देने का अनुरोध किया था । कांग्रेसी नेता का आरोप है कि वैद के उपन्यास नसरीन में कई जगह अश्लील शब्दों और स्थितियों का चित्रण किया गया है । कांग्रेसी नेता की आपत्ति को कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने इस तरह स्वीकार कर लिया जैसै ये दस जनपथ का फरमान हो और ना मानने पर उनकी कुर्सी जाने का खतरा हो । शीला दीक्षित, जो कला और संस्कृति को लेकर संवेदनशील और समझदार मानी जाती है उनका यह निर्णय चौंकानेवाला है क्योंकि वैद जी को पुरस्कार देने का निर्णय हिंदी के लब्धप्रतिष्ठित लेखकों की एक कमिटी ने किया था । यहां यह बात भी समझ से परे हैं कि शुचिता और पवित्रता का ठेका कांग्रेसियों ने कब से ले लिया । यह ठेका तो भगवा खेमे के पास था । क्या धर्मनिरपेक्षता और अभिवयक्ति की आजादी का नारा देनेवाली कांग्रेस पार्टी भी भगवा रंग में रंगने लगी है । या फिर मुख्यमंत्री अपनी अधिकारियों की राय को तरजीह देने के क्रम में भगवा विचारधारा के साथ नजर आने की गलती कर बैठी । दरअसल ज्योतिष जोशी के हिंदी अकादमी के सचिव पद से इस्तीफे के बाद किन्हीं परिचयदास को अकादमी का सचिव का प्रभार दे दिया गया । परिचयदास अपने नाम के आगे कभी प्रोफेसर तो कभी डॉक्टर लिखकर लगातार हिंदी अकादमी के विज्ञापनों में छपते रहते हैं । लेकिन असली खेल तो प्लेयर बिलंडिग में बैठने वाले एक अफसर का चल रहा है, परिचयदास तो इस वजह से कुर्सी पर बैठे हैं कि वो एक कमजोर सचिव हैं जो अपने आकाओं के हुक्म को बगैर किसी सवाल जबाव के बजाते रहते हैं । अब ये मुख्यमंत्री को तय करना है कि दिल्ली की हिंदी अकादमी को सचिवालय में बैठे अफसर चलाएंगे या फिर साहित्यकारों की संचालन समिति । क्या अकादमी को स्वायत्ता मिल पाएगी या फिर यह दिल्ली सरकार का भोंपू बन कर रह जाएगा । खैर ये तो एक अवांतर प्रसंग है ।
कृष्ण बलदेव वेद को श्ललाका सम्मान नहीं दिए जाने पर हिंदी साहित्य में भूचाल आ गया । सबसे पहले हिंदी के आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने हिंदी अकादमी के साहित्यकार सम्मान लेने से इंकार कर दिया और अकादमी के सचिव को एक पत्र लिखकर अग्रवाल ने अपना विरोध भी जताया और कहा कि – साहित्य और कला में श्लीलता और अश्लीलता के फैसले इतने सपाट ढंग से नहीं किए जा सकते । साहित्येतर कारणों से जूरी की संस्तुति की उपेक्षा करना अनुचित है । यह स्थिति केवल एक वरिष्ठ लेखक के ही प्रति नहीं, साहित्य मात्र के प्रति संवेदनशीलता और सम्मान के आभाव की सूचना देती है । अपने विरोध पत्र में पुरुषोत्तम अग्रवाल ने लिखा- साहित्य के सामाजिक दायित्व की चर्चा बहुत की जाती है । इसी के साथ यह भी जरूरी है कि समाज और सामाजिक-राजनैतिक सत्ता की विभिन्न संस्थाएं भी साहित्य, कला, ज्ञान और विचार की साधना और उसकी स्वायत्तता का सम्मान करना सीखें ।
पुरुषोत्तम अग्रवाल के इस्तीफे की खबर अखबारों में छपते ही हिंदी अकादमी का विरोध और तेज हो गया । 2009-10 के श्ललाका सम्मान के लिए तुने गए वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने भी पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया । उनका कहना है कि वैदजी हिंदी के बेहद अहम रचनाकार हैं, उनसे श्लाका सम्मान की स्वकीकृति हासिल करने के बाद उन्हें पुरस्कार से वंचित कर उनका अपमान किया गया है । इस खुलासे के बाद स्थितियां बिल्कुल बदल गई हैं और उनका जमीर श्लाका सम्मान लेने की इजाजत नहीं देता । केदार जी के इस कदम के बाद तो जैसे पुरस्कार ठुकरानेवालों की लाइन लग गई । कवि-पत्रकार विमल कुमार, कवि पंकज सिंह, कवयित्रि और स्वर्गीय निर्मल वर्मा की पत्नी गगन गिल, रेखा जैन ने भी हिंदी अकादमी द्वारा घोषित पुरस्कार लेने से मना कर दिया है । इसके अलावा पूरा का पूरा हिंदी साहित्य वैद जी के अपमान के बाद उद्वेलित है और दिल्ली सरकार की जमकर थुक्का फजीहत हो रही है । अब तो हालात ऐसे बन रहे हैं कि हिंदी अकादमी को सम्मान समारोह करना मुश्किल हो रहा है ।
लेकिन इस सारे विवाद की एक अवांतर कथा भी है । बताया जा रहा है कि कृष्ण बलदेव वैद के खिलाफ मुख्यमंत्री को कांग्रेस के नेता से चिट्ठी लिखवाने के पीछे हिंदी की एक वरिष्ठ आलोचक हैं । जिस वर्ष जूरी ने वैद जी का नाम तय किया था उस वर्ष उक्त महिला आलोचक भी अपनी दावेदारी को लेकर लॉबिंग कर रही थी । जब उनकी बात नहीं बनी और जूरी ने वैद जी का नाम तय कर दिया तो उन्होंने एक कांग्रेसी से कृष्ण बलदेव वैद जी के खिलाफ पत्र लिखवा दिया । नतीजा यह हुआ कि अपसरशाही में जकड़ी हिंदी अकादमी ने उस पत्र के आधार पर वैद जी को पुरस्कार देने से मना कर दिया बिना ये सोचे समझे, बिना यह जाने की आपत्ति का आधार क्या है । दरअसल अकादमी के अफसरों को लगता है कि हिंदीवालों का विरोध फौरी होता है । जब अशोक चक्रधर को हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाया गया था तो हिंदी के कई वरिष्ठ लेखकों ने घोर आपत्ति जताई थी । लेकिन चंद दिनों बाद वही साहित्यकार अशोक चक्रधर के सानिध्य में मंचासीन हो रहे थे । ना विरोध रहा और ना ही कोई दूरी । उस घटना के बाद अकादमी के अफसर बेपरवाह हो गए हैं । लेकिन अफसरों का इस बात का अंदाजा नहीं था कि इस बार इतनी संख्या में पुरस्कार ठुकरा दिए जाएंगे और मामला इतना संगीन हो जाएगा । शीला जी अब भी वक्त है अकादमी को कहिए कि अपनी गलती माने और कृष्ण बलदेव वैद जी माफी मांगकर उन्हें सम्मानित करे वर्ना होगा यह कि आप भी साहित्य और कला के मामले में भगवा खेमे में नजर आएंगी ।
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कृष्ण बलदेव वेद को श्ललाका सम्मान नहीं दिए जाने पर हिंदी साहित्य में भूचाल आ गया । सबसे पहले हिंदी के आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने हिंदी अकादमी के साहित्यकार सम्मान लेने से इंकार कर दिया और अकादमी के सचिव को एक पत्र लिखकर अग्रवाल ने अपना विरोध भी जताया और कहा कि – साहित्य और कला में श्लीलता और अश्लीलता के फैसले इतने सपाट ढंग से नहीं किए जा सकते । साहित्येतर कारणों से जूरी की संस्तुति की उपेक्षा करना अनुचित है । यह स्थिति केवल एक वरिष्ठ लेखक के ही प्रति नहीं, साहित्य मात्र के प्रति संवेदनशीलता और सम्मान के आभाव की सूचना देती है । अपने विरोध पत्र में पुरुषोत्तम अग्रवाल ने लिखा- साहित्य के सामाजिक दायित्व की चर्चा बहुत की जाती है । इसी के साथ यह भी जरूरी है कि समाज और सामाजिक-राजनैतिक सत्ता की विभिन्न संस्थाएं भी साहित्य, कला, ज्ञान और विचार की साधना और उसकी स्वायत्तता का सम्मान करना सीखें ।
पुरुषोत्तम अग्रवाल के इस्तीफे की खबर अखबारों में छपते ही हिंदी अकादमी का विरोध और तेज हो गया । 2009-10 के श्ललाका सम्मान के लिए तुने गए वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने भी पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया । उनका कहना है कि वैदजी हिंदी के बेहद अहम रचनाकार हैं, उनसे श्लाका सम्मान की स्वकीकृति हासिल करने के बाद उन्हें पुरस्कार से वंचित कर उनका अपमान किया गया है । इस खुलासे के बाद स्थितियां बिल्कुल बदल गई हैं और उनका जमीर श्लाका सम्मान लेने की इजाजत नहीं देता । केदार जी के इस कदम के बाद तो जैसे पुरस्कार ठुकरानेवालों की लाइन लग गई । कवि-पत्रकार विमल कुमार, कवि पंकज सिंह, कवयित्रि और स्वर्गीय निर्मल वर्मा की पत्नी गगन गिल, रेखा जैन ने भी हिंदी अकादमी द्वारा घोषित पुरस्कार लेने से मना कर दिया है । इसके अलावा पूरा का पूरा हिंदी साहित्य वैद जी के अपमान के बाद उद्वेलित है और दिल्ली सरकार की जमकर थुक्का फजीहत हो रही है । अब तो हालात ऐसे बन रहे हैं कि हिंदी अकादमी को सम्मान समारोह करना मुश्किल हो रहा है ।
लेकिन इस सारे विवाद की एक अवांतर कथा भी है । बताया जा रहा है कि कृष्ण बलदेव वैद के खिलाफ मुख्यमंत्री को कांग्रेस के नेता से चिट्ठी लिखवाने के पीछे हिंदी की एक वरिष्ठ आलोचक हैं । जिस वर्ष जूरी ने वैद जी का नाम तय किया था उस वर्ष उक्त महिला आलोचक भी अपनी दावेदारी को लेकर लॉबिंग कर रही थी । जब उनकी बात नहीं बनी और जूरी ने वैद जी का नाम तय कर दिया तो उन्होंने एक कांग्रेसी से कृष्ण बलदेव वैद जी के खिलाफ पत्र लिखवा दिया । नतीजा यह हुआ कि अपसरशाही में जकड़ी हिंदी अकादमी ने उस पत्र के आधार पर वैद जी को पुरस्कार देने से मना कर दिया बिना ये सोचे समझे, बिना यह जाने की आपत्ति का आधार क्या है । दरअसल अकादमी के अफसरों को लगता है कि हिंदीवालों का विरोध फौरी होता है । जब अशोक चक्रधर को हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाया गया था तो हिंदी के कई वरिष्ठ लेखकों ने घोर आपत्ति जताई थी । लेकिन चंद दिनों बाद वही साहित्यकार अशोक चक्रधर के सानिध्य में मंचासीन हो रहे थे । ना विरोध रहा और ना ही कोई दूरी । उस घटना के बाद अकादमी के अफसर बेपरवाह हो गए हैं । लेकिन अफसरों का इस बात का अंदाजा नहीं था कि इस बार इतनी संख्या में पुरस्कार ठुकरा दिए जाएंगे और मामला इतना संगीन हो जाएगा । शीला जी अब भी वक्त है अकादमी को कहिए कि अपनी गलती माने और कृष्ण बलदेव वैद जी माफी मांगकर उन्हें सम्मानित करे वर्ना होगा यह कि आप भी साहित्य और कला के मामले में भगवा खेमे में नजर आएंगी ।
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Thursday, March 18, 2010
महिलाओं से दुश्मनी क्यों
देशभर में महिलाओं को संसद में आरक्षण दिए जाने पर जोरदार बहस चल रही है । महिलाओं को और अधिकार देने और उसे भारतीय पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों के बराबर दर्जा हासिल हो इस प्रयास को महिला आरक्षण बिल से बल मिला । लेकिन भारतीय महिला को ताकत मिले, वो देश की भागयविधाता बने, नीति-निर्धारण करे, यह बात हमारके देश में मौजूद धर्म के ठेकेदारों को मंजूर नहीं । महिला आरक्षण के समर्थन और विरोध के कोलाहल के बीच अयोध्या के राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंथ नृत्यगोपाल दास ने एक बेहद आपत्तिजनक और अव्यावहारिक बयान जारी कर दिया । नृत्यगोपाल दास ने कहा कि महिलाओं को अकेले मंदिर, मठ या देवालय में नहीं जाना चाहिए । अगर वो मंदिर, मठ या देवालय जाती हैं तो उन्हें पिता, पुत्र या भाई के साथ ही जाना चाहिए । राम जन्मभूमि न्यास के ही वरिष्ठ सदस्य रामविलास वेदांती तो इससे भी एक कदम आगे जाकर कहते हैं कि महिलाओं के अकेले मंदिर में जाने पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए । मेरे जानते सनातन धर्म के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी हिंदू धर्म गुरू ने महिलाओं के मंदिर या मठ में जाने को लेकर ऐसी बात कही है । धर्म के इन दो ठेकेदारों के बयान के पीछे की मानसिकता और मनोविज्ञान पर विचार करने की आवश्यकता है । नृत्य गोपाल दास और वेदांती के ये विचार भारतीय परुष प्रधान समाज की जड़ मानसिकता और मनोविज्ञान का प्रतिनिधित्व करते हैं । इन्हें लगता है कि हर समस्या की जड़ में नारी और उसका सौंदर्य है । इन दो धर्मानुभावों को यह लगता है कि अगर महिलाएं मंदिर में अकेले गई तो साधुओं और पुजारियों का मन डोल जाएगा और कुछ भी अनहोनी घटित हो जाएगा । इन जैसे महंथों और वेदांतियों को लगता है कि दुनिया के सारे पापों की जड़ में नारी है ।बजाए साधुओं और महात्माओं को संयम का उपदेश देने के बजाए ये लोग महिलाओं को ही सावधानी बरतने की सालह दे रहे हैं । यहां ये यह भी भूल जाते हैं कि मन तो सनातन धर्म के सबसे श्रद्धेय मुनि विश्वामित्र का भी डोल गया था ।
लेकिन ये धर्मानुभाव भारतीय सनातन परंपरा को भूल गए हैं जहां मंदिरों में नारियों को सदियों से सम्मान मिलता रहा है । दक्षिण भारत में तो महिलाएं मंदिरों में रहती भी हैं । भगवान को समर्पित ये महिलाएं मंदिरों और देवालयों में देवदासी कहलाती है । कालांतर में धर्म के ठेकेदारों और मठाधीशों की वजह से देवदासी परंपरा भी बदनाम हुई और उसमें कुछ ऐसे तत्व घुस आए जो स्त्रियों का शोषण करने लगे और उस पवित्र परंपरा को देह व्यापार में तब्दील कर दिया ।
हद तो तब हो जाती है जब धर्म के ये ठेकेदार अपने बयानों के लिए शास्त्रों को आधार बनाते हैं । लेकिन धर्म के नाम पर अपनी दुकान चलानेवाले इन आचार्यों को कौन बताए कि शास्त्रों और धर्मग्रंथों में तो मंदिरों का उल्लेख ही नहीं मिलता है । आश्रमों का जिक्र अवश्य है । शास्त्रों में तो गंगा की पूजा होती थी, सूर्य की आराधना होती थी, शिव की पूजा का उल्लेख है लेकिन मंदिरों का उल्लेख नहीं है । रावण को भी जब शिव की पूजा करना था तो वो कैलाश पर्वत गया था किसी मंदिर या मठ में नहीं । पहली बार किसी मंदिरनुमा चीज का उल्लेख रामायण में मिलता है जब राम ने लंका जाने के क्रम में शिवलिंग की पूजा की थी, जो बाद में सेतुबंध शिवलिंग के नाम से जाना गया । कहना ना होगा कि धर्म के ये ठेकेदार शास्त्रों और धर्मग्रंथों को आधार बनाकर देश की भोली भाली जनता को बेवकूफ बनाते हैं, और यह कोई नई प्रवृत्ति नहीं है, ये सालों से चल रहा है । जरूरत इस बात की है कि महंथ और वेदांती के बयानों की जोरदार शब्दों में निंदा करनी चाहिए क्योंकि इस तरह के बयान स्त्रियों को पीछे धकेलने की साजिश है । क्या यह महज संयोग है कि नृत्य गोपाल दास के बयान के चंद दिनों बाद ही शिया धर्म गुरू कल्बे जव्वाद का भी स्त्रियों को लेकर एक बयान आता है जिसमें वो कहते हैं कि लीडर बनना औरतों का काम नहीं है, उनका काम लीडर पैदा करना है । जव्वाद के मुताबिक कुदरत ने अल्लाह ने उन्हें इसलिए बनाया है कि वो घर संभालें, अच्छी नस्ल के बच्चे पैदा करें । कल्बे जव्वाद के इस बयान के समर्थन देश के सबसे बड़े मदरसे नदवा कॉलेज के आला मौलाना ने भी किया । सवाल यह उठता है कि क्या हर धर्म के ठेकेदारों को सशक्त महिलाओं से डर क्यों लगता है । वो क्या वजह है जो धर्म, मजहब, जाति के नाम पर एक दूसरे के खिलाफ जहर उगलनेवाले तत्व महिलाओं को अधिकार देने के खिलाफ एक ही प्लेटफॉर्म पर साथ खड़े नजर आते हैं । इस सवाल का जबाव बेहद जरूरी है ।
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लेकिन ये धर्मानुभाव भारतीय सनातन परंपरा को भूल गए हैं जहां मंदिरों में नारियों को सदियों से सम्मान मिलता रहा है । दक्षिण भारत में तो महिलाएं मंदिरों में रहती भी हैं । भगवान को समर्पित ये महिलाएं मंदिरों और देवालयों में देवदासी कहलाती है । कालांतर में धर्म के ठेकेदारों और मठाधीशों की वजह से देवदासी परंपरा भी बदनाम हुई और उसमें कुछ ऐसे तत्व घुस आए जो स्त्रियों का शोषण करने लगे और उस पवित्र परंपरा को देह व्यापार में तब्दील कर दिया ।
हद तो तब हो जाती है जब धर्म के ये ठेकेदार अपने बयानों के लिए शास्त्रों को आधार बनाते हैं । लेकिन धर्म के नाम पर अपनी दुकान चलानेवाले इन आचार्यों को कौन बताए कि शास्त्रों और धर्मग्रंथों में तो मंदिरों का उल्लेख ही नहीं मिलता है । आश्रमों का जिक्र अवश्य है । शास्त्रों में तो गंगा की पूजा होती थी, सूर्य की आराधना होती थी, शिव की पूजा का उल्लेख है लेकिन मंदिरों का उल्लेख नहीं है । रावण को भी जब शिव की पूजा करना था तो वो कैलाश पर्वत गया था किसी मंदिर या मठ में नहीं । पहली बार किसी मंदिरनुमा चीज का उल्लेख रामायण में मिलता है जब राम ने लंका जाने के क्रम में शिवलिंग की पूजा की थी, जो बाद में सेतुबंध शिवलिंग के नाम से जाना गया । कहना ना होगा कि धर्म के ये ठेकेदार शास्त्रों और धर्मग्रंथों को आधार बनाकर देश की भोली भाली जनता को बेवकूफ बनाते हैं, और यह कोई नई प्रवृत्ति नहीं है, ये सालों से चल रहा है । जरूरत इस बात की है कि महंथ और वेदांती के बयानों की जोरदार शब्दों में निंदा करनी चाहिए क्योंकि इस तरह के बयान स्त्रियों को पीछे धकेलने की साजिश है । क्या यह महज संयोग है कि नृत्य गोपाल दास के बयान के चंद दिनों बाद ही शिया धर्म गुरू कल्बे जव्वाद का भी स्त्रियों को लेकर एक बयान आता है जिसमें वो कहते हैं कि लीडर बनना औरतों का काम नहीं है, उनका काम लीडर पैदा करना है । जव्वाद के मुताबिक कुदरत ने अल्लाह ने उन्हें इसलिए बनाया है कि वो घर संभालें, अच्छी नस्ल के बच्चे पैदा करें । कल्बे जव्वाद के इस बयान के समर्थन देश के सबसे बड़े मदरसे नदवा कॉलेज के आला मौलाना ने भी किया । सवाल यह उठता है कि क्या हर धर्म के ठेकेदारों को सशक्त महिलाओं से डर क्यों लगता है । वो क्या वजह है जो धर्म, मजहब, जाति के नाम पर एक दूसरे के खिलाफ जहर उगलनेवाले तत्व महिलाओं को अधिकार देने के खिलाफ एक ही प्लेटफॉर्म पर साथ खड़े नजर आते हैं । इस सवाल का जबाव बेहद जरूरी है ।
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Thursday, March 4, 2010
हुसैन पर विधवा विलाप क्यों ?
दुनिया भर में मशहूर कूची के जादूगर मकबूल फिदा हुसैन के कतर की नागरिकता स्वीकार करने पर देशभर में कुछ चुनिंदा वामपंथी सेकुलर लेखकों और कार्यकर्ताओं ने हो हल्ला मचाया । हुसैन के भारत छोड़ने को इन परम सेकुलरवादियों ने अभिवयक्ति की आजादी से जोड़ दिया । उन्हें लगने लगा कि भारत ने यह नायाब हीरा देश में संघ और उससे जुड़े अतिवादी हिंदुओं की वजह से खो दिया । वो इस बात को लेकर चिंतित दिखाई दिए कि हुसैन का विरोध इसलिए हो रहा है कि वो एक मुसलमान हैं । हुसैन के विरोधियों की इस बात के लिए भी लानत मलामत की गई कि वो कौन होते हैं यह कहने वाले कि हुसैन पैगंबर की तस्वीर बना कर दिखाएं । तर्क यह कि एक कलाकार को इस बात की स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वो जो चाहे उसे चित्रित करे । लेकिन हुसैन के इस्लाम से संबंधित कोई भी चित्र नहीं बनाने से तथाकथित सेकुलरवादियों का यह तर्क कमजोर होता है । कुछ लोग यह भी कहते हैं कि कुरान इस बात कि इजाजत नहीं देता कि किसी भी वस्तु या व्यक्ति का चित्रण हो । लेकिन सवाल यह उठ खडा़ होता है कि क्या एक कलाकार की अभिव्यक्ति पवित्र कुरान और इस्लाम की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकता ।
जबतक भारत में इन सवालों पर बहस होती या फिर कला और कलाकार के पक्ष में खड़े होने का दंभ भरनेवाले प्रगतिवादी-जनवादी लेखक विरोध का डंडा-झंडा संभालते हुसैन के एक इंटरव्यू ने उसकी हवा निकाल दी । हुसैन ने कतर से दिए एक इंटरव्यू में यह स्वीकार किया कि उनके भारत छोड़ने की वजह कुछ और भी है । हुसैन ने माना कि भारत में उनका रहना मुमकिन नहीं था लेकिन इसके बाद जो बात हुसैन ने कही उसपर तो छातीकूट अभियान चला रहे इन प्रगतिवादियों के पांव तले से भी जमीन खिसक गई । हुसैन ने अपने साक्षात्कार में कहा कि वो तीन मुख्य प्रोजेक्ट पर काम करना चाहते थे- पहला मोहनजोदाड़ो से लेकर मनमोहन सिंह तक के भारतीय सभ्यता का इतिहास, बेबीलोन और विश्व की दूसरी अन्य सभ्यताओं का इतिहास और भारतीय सिनेमा के सौ वर्षों का इतिहास । हुसैन ने माना कि भारत में इन प्रोजेक्ट्स पर काम करने के लिए उनको प्रायोजक नहीं मिल रहे थे । इसलिए जब कतर के शेख मोज़ा ने उनकी इस योजना को प्रायोजित करने की इच्छा जताई तो वो मना नहीं कर सके । मकबूल फिदा हुसैन ने यह भी माना कि भारत में कला के लिए उचित माहौल नहीं है लेकिन उसके पहले प्रायोजक नहीं मिले की बात कहकर हुसैन ने अपनी असली परेशानी जाहिर कर दी । इसके अलावा हुसैन ने जो एक बात और साफगोई से मानी वो यह कि भारत में टैक्स का ढांचा बेहद जटिल और परेशान करनेवाला है और यह भी उनके देश छोड़ने की वजहों में से एक है ।
हुसैन के इन बयानों से यह साफ हो गया कि हुसैन ने अतिवादियों से परेशान होकर तो भारत छोड़ा लेकिन उनकी परेशानी की वजह सिर्फ उनकी अभिवयक्ति की आजादी पर हमला नहीं था । अगर सिर्फ यह वजह होती तो हुसैन भारत जैसे सहिष्णु समाज को छोड़कर कतर जैसे कट्टर देश को नहीं चुनते । भारत में हुसैन को मुट्ठी भर लोगों का विरोध झेलना पड़ रहा था, कमोबेश वो अपनी कलाकृतियों में अपनी जादुई कूची का रंग भर सकते थे लेकिन कतर में वो सिर्फ एक दरबारी पेंटर भर होकर रह जाएंगे । अगर हुसैन को भारत में अभिव्यक्ति की आजादी नहीं मिल रही थी और वो भगवा ब्रिगेड की गुंडागर्दी से परेशान थे तो कतर में उन्हें कौन सी आजादी मिलेगी । भारत में जितने हुसैन के विरोधी हैं उनसे ज्यादा उनके समर्थक हैं । लेकिन पैसे और व्यावसायिक कारणों से हुसैन ने भारत को छोड़ने का फैसला लिया और उसे अभिव्यक्ति की आजाजदी से जोड़ने का खेल खेला गया । अब कतर में हुसैन मजे में हिंदू देवी देवताओं के नंगे और शर्मसार करनेवाले चित्र बेखौफ होकर बना पाएंगे , वहां के शासकों के पसंद का ख्याल रखेंगे । लेकिन क्या हुसैन वहां रहकर कतर के शासकों के चित्र में प्रयोग कर पाएंगे । क्या कतर की खूबसूरत औरतों में उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी दिखाई देगी । क्या वहां के समाज की रूढिवादिता पर हुसैन की कूची चल सकेगी । या फिर भारी भरकम रकम के नीचे एक कलाकार की कला दब कर रह जाएगी ।
ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनपर भारत के बयानवीर लेखकों को विचार करना चाहिए । दरअसल मार्क्स के इन आधुनिक चेलों को मार्क्सवाद ने हर चीज को देखने की एक नई दृष्टि तो दी लेकिन उनकी दूसरी आंख से सचाई देखने की दृष्टि छीन ली । वो हर चीज को अब मार्क्सवाद के लाल चश्मे से देखने लगे । तस्लीमा का मामला अभी ताजा है । कर्नाटक के एक अखबार ने तस्लीमा के पुराने लेख को छाप दिया । जिसपर वहां कई जिलों में जमकर हिंसा हुई, विरोध इतना बढ़ा कि पुलिस को फायरिंग करनी पड़ी जिसमें दो लोगों की जान चली गई और लाखों की संपत्ति का नुकसान हुआ । विरोध बढ़ता देखकर कर्नाटक सरकार ने आनन-फानन में तस्लीमा के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया । जबकि तस्लीमा यह सफाई दे चुकी थी कि उन्होंने कन्नड़ के अखबार के लिए कोई लेख लिखा ही नहीं था । हुसैन के भारत छोड़ने पर बुक्का फाड़कर विलाप करनेवाले इन प्रगतिवादियों को तस्लीमा पर हो रहा अत्याचार नहीं दिखाई दे रहा । दरअसल मार्क्स के इन चेलों ने सबसे आधुनिक होने का दावा करनेवाले इस वाद को उतना ही भ्रष्ट किया है जितना हिंदू धर्म को पोंगा पंडितों ने । इन कथित मार्क्सवादियों के दोहरे रवैये की वजह से ही हिंदुओं, जो कि साधारणतया सहिष्णु होते हैं, के मन में भी यह सवाल उठने लगता है कि बुद्दिजीवियों का एक वर्ग सिर्फ हिंदुओं के खिलाफ ही सेकुलर क्यों होता है । प्रगतिशीलता का ताना-बाना धारण किए इन बुद्धिजीवियों को यह लगता है कि अगर वो हिंदुओं का विरोध नहीं करेंगे तो वो ना तो प्रगतिशील रह पाएंगे और ना ही सेकुलर ।
अंत में इतना कहना चाहता हूं कि हुसैन ने अपने इंटरव्यू में यह भी कहा कि भारतीय संविधान सिर्फ एक कागज का टुकडा़ है । अगर किसी भी देशवासी के मन में उसके संविधान को लेकर इतनी ही इज्जत है तो फिर वो देश छोड़कर जाए या रहे कोई फर्क नहीं पड़ता ।
जबतक भारत में इन सवालों पर बहस होती या फिर कला और कलाकार के पक्ष में खड़े होने का दंभ भरनेवाले प्रगतिवादी-जनवादी लेखक विरोध का डंडा-झंडा संभालते हुसैन के एक इंटरव्यू ने उसकी हवा निकाल दी । हुसैन ने कतर से दिए एक इंटरव्यू में यह स्वीकार किया कि उनके भारत छोड़ने की वजह कुछ और भी है । हुसैन ने माना कि भारत में उनका रहना मुमकिन नहीं था लेकिन इसके बाद जो बात हुसैन ने कही उसपर तो छातीकूट अभियान चला रहे इन प्रगतिवादियों के पांव तले से भी जमीन खिसक गई । हुसैन ने अपने साक्षात्कार में कहा कि वो तीन मुख्य प्रोजेक्ट पर काम करना चाहते थे- पहला मोहनजोदाड़ो से लेकर मनमोहन सिंह तक के भारतीय सभ्यता का इतिहास, बेबीलोन और विश्व की दूसरी अन्य सभ्यताओं का इतिहास और भारतीय सिनेमा के सौ वर्षों का इतिहास । हुसैन ने माना कि भारत में इन प्रोजेक्ट्स पर काम करने के लिए उनको प्रायोजक नहीं मिल रहे थे । इसलिए जब कतर के शेख मोज़ा ने उनकी इस योजना को प्रायोजित करने की इच्छा जताई तो वो मना नहीं कर सके । मकबूल फिदा हुसैन ने यह भी माना कि भारत में कला के लिए उचित माहौल नहीं है लेकिन उसके पहले प्रायोजक नहीं मिले की बात कहकर हुसैन ने अपनी असली परेशानी जाहिर कर दी । इसके अलावा हुसैन ने जो एक बात और साफगोई से मानी वो यह कि भारत में टैक्स का ढांचा बेहद जटिल और परेशान करनेवाला है और यह भी उनके देश छोड़ने की वजहों में से एक है ।
हुसैन के इन बयानों से यह साफ हो गया कि हुसैन ने अतिवादियों से परेशान होकर तो भारत छोड़ा लेकिन उनकी परेशानी की वजह सिर्फ उनकी अभिवयक्ति की आजादी पर हमला नहीं था । अगर सिर्फ यह वजह होती तो हुसैन भारत जैसे सहिष्णु समाज को छोड़कर कतर जैसे कट्टर देश को नहीं चुनते । भारत में हुसैन को मुट्ठी भर लोगों का विरोध झेलना पड़ रहा था, कमोबेश वो अपनी कलाकृतियों में अपनी जादुई कूची का रंग भर सकते थे लेकिन कतर में वो सिर्फ एक दरबारी पेंटर भर होकर रह जाएंगे । अगर हुसैन को भारत में अभिव्यक्ति की आजादी नहीं मिल रही थी और वो भगवा ब्रिगेड की गुंडागर्दी से परेशान थे तो कतर में उन्हें कौन सी आजादी मिलेगी । भारत में जितने हुसैन के विरोधी हैं उनसे ज्यादा उनके समर्थक हैं । लेकिन पैसे और व्यावसायिक कारणों से हुसैन ने भारत को छोड़ने का फैसला लिया और उसे अभिव्यक्ति की आजाजदी से जोड़ने का खेल खेला गया । अब कतर में हुसैन मजे में हिंदू देवी देवताओं के नंगे और शर्मसार करनेवाले चित्र बेखौफ होकर बना पाएंगे , वहां के शासकों के पसंद का ख्याल रखेंगे । लेकिन क्या हुसैन वहां रहकर कतर के शासकों के चित्र में प्रयोग कर पाएंगे । क्या कतर की खूबसूरत औरतों में उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी दिखाई देगी । क्या वहां के समाज की रूढिवादिता पर हुसैन की कूची चल सकेगी । या फिर भारी भरकम रकम के नीचे एक कलाकार की कला दब कर रह जाएगी ।
ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनपर भारत के बयानवीर लेखकों को विचार करना चाहिए । दरअसल मार्क्स के इन आधुनिक चेलों को मार्क्सवाद ने हर चीज को देखने की एक नई दृष्टि तो दी लेकिन उनकी दूसरी आंख से सचाई देखने की दृष्टि छीन ली । वो हर चीज को अब मार्क्सवाद के लाल चश्मे से देखने लगे । तस्लीमा का मामला अभी ताजा है । कर्नाटक के एक अखबार ने तस्लीमा के पुराने लेख को छाप दिया । जिसपर वहां कई जिलों में जमकर हिंसा हुई, विरोध इतना बढ़ा कि पुलिस को फायरिंग करनी पड़ी जिसमें दो लोगों की जान चली गई और लाखों की संपत्ति का नुकसान हुआ । विरोध बढ़ता देखकर कर्नाटक सरकार ने आनन-फानन में तस्लीमा के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया । जबकि तस्लीमा यह सफाई दे चुकी थी कि उन्होंने कन्नड़ के अखबार के लिए कोई लेख लिखा ही नहीं था । हुसैन के भारत छोड़ने पर बुक्का फाड़कर विलाप करनेवाले इन प्रगतिवादियों को तस्लीमा पर हो रहा अत्याचार नहीं दिखाई दे रहा । दरअसल मार्क्स के इन चेलों ने सबसे आधुनिक होने का दावा करनेवाले इस वाद को उतना ही भ्रष्ट किया है जितना हिंदू धर्म को पोंगा पंडितों ने । इन कथित मार्क्सवादियों के दोहरे रवैये की वजह से ही हिंदुओं, जो कि साधारणतया सहिष्णु होते हैं, के मन में भी यह सवाल उठने लगता है कि बुद्दिजीवियों का एक वर्ग सिर्फ हिंदुओं के खिलाफ ही सेकुलर क्यों होता है । प्रगतिशीलता का ताना-बाना धारण किए इन बुद्धिजीवियों को यह लगता है कि अगर वो हिंदुओं का विरोध नहीं करेंगे तो वो ना तो प्रगतिशील रह पाएंगे और ना ही सेकुलर ।
अंत में इतना कहना चाहता हूं कि हुसैन ने अपने इंटरव्यू में यह भी कहा कि भारतीय संविधान सिर्फ एक कागज का टुकडा़ है । अगर किसी भी देशवासी के मन में उसके संविधान को लेकर इतनी ही इज्जत है तो फिर वो देश छोड़कर जाए या रहे कोई फर्क नहीं पड़ता ।
Saturday, February 20, 2010
अभिवयक्ति की अराजकता
साहित्य अकादमी के पुरस्कार वितरण समारोह में कुछ हिंदू सगंठनों के विरोध से साहित्यिक जगत में तूफान उठ खड़ा हुआ है । प्रगतिवाद और जनवाद के तथाकथित ठेकेदार इसको लेखकीय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भगवा हमला करार दे रहे हैं । इन बयानवीर जनवादियों को समारोह के दौरान हुए विरोध प्रदर्शन में फासीवाद की आहट भी सुनाई दे रही है । लेकिन किसी भी विरोध पर हल्ला मचानेवाले ये प्रगितवादी लेखक यह भूल जाते हैं कि विरोध और विवाद के पीछे की वजह क्या है । दरअसल इस विवाद के पीछे पूर्व सांसद और लेखक वाई लक्ष्मी प्रसाद का उपन्यास द्रौपदी है, जिसपर उन्हें इस वर्ष साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला है । इस उपन्यास में लक्ष्मी प्रसाद ने द्रौपदी के चरित्र और कृष्ण से उसके संबंधों को कल्पना के आधार पर एक बेहद घिनौना रूप दिया है । भारतीय जनमानस में महाभारत और उसके पात्रों को लेकर सदियों से एक स्थापित मान्यता है । हिंदू जनमानस में द्रोपदी को सम्मान और श्रद्धा की नजर से देखा जाता है । लेकिन लक्ष्मी प्रसाद ने पौराणिक आख्यानों के आधार पर बुनी गई या स्थापित द्रौपदी की छवि को ध्वस्त करने की घृणित कोशिश की है । अभिवयक्ति की आजादी के नाम पर पौराणिक आख्यानों या फिर धार्मिक चरित्रों के साथ छेड-छाड़ की इजाजत किसी भी लेखक को नहीं है । मिथकों की जड़े लोकमानस में बहुत गहरी और व्यापक हैं इस वजह से रचनाकार से विवेकपू्र्ण सतर्कता अपेक्षित है । हर मिथक और प्रतीक की एक संभावना होती है, उस संभावना की दिशा में ही लेखक को उसका इस्तेमाल करना चाहिए और एक सीमा के बाद उसे विरुपित नहीं किया जाना चाहिए । जिस लेखक को मिथक की विराटता में अपनी क्षुद्रता भरनी हो उसे मिथक का इस्तेमाल सृजनात्मक लेखन में नहीं करना चाहिए ।
सृजनात्मक लेखन में अनेकों ऐसे उदाहरण हैं जहां धार्मिक प्रतीकों, पौराणिक मिथकों या फिर धार्मिक चरित्रों का इस्तेमाल किया गया है । ईसा, राम, कृष्ण, द्रौपदी, सीता, अहिल्या कर्ण आदि अनेक पात्रों का उपयोग हिंदी के कई लेखकों ने किया है । आधुनिक हिंदी काव्य की दो बड़ी रचनाएं कामायनी और राम की शक्ति पूजा पौराणिक धार्मिक मिथकों को आधार बनाकर मानवीय और राष्ट्रीय संदर्भों में उनकी युगीन व्याख्या करते हैं । शिवाजी सावंत ने अपने उपन्यास मृत्युंजय में कर्ण को समूची पीड़ित, दलित और शोषित जनता का प्रतीक बना दिया है । रांगेय राघव के अलावा भी कई प्रगतिशील लेखकों ने अपने लेखन में पौराणिक और धार्मिक प्रतीकों का उपयोग किया है, लेकिन इन सभी लेखकों ने प्रचलित और स्थापित मान्यताओं के खिलाफ जाकर किसी का भी चरित्र हनन नहीं किया है । तर्कसंगत तरीके से उनके व्यक्तित्व की कमियों को उजागर अवश्य किया है । हर युग में कवियों ने भी पौराणिक मिथकों को नए ढंग से रचा है । तुलसीदास जो रामकथा में पाते हैं वो नरेश मेहता नहीं पाते । सूरदास के यहां जो कृष्णकथा है वो धर्मवीर भारती के यहां नहीं है । अमेरिका में हॉवर्ड फास्ट ने भी पौराणिक और ऐतिहासिक प्रतीकों का उपयोग किया है लेकिन उनके संदर्भ बेहद आधुनिक हैं ।
लेकिन लक्ष्मी प्रसाद की इस कृति के समर्थन में खडे होकर एक बार फिर से इन प्रगतिवादी और जनवादियों का दोहरा चरित्र उजागर हुआ है । अभिवयक्ति की आजादी के नाम पर कुछ लेखकों ने हिंदू धर्म, उसकी मान्यताएं और उनके देवी देवताओं पर किसी भी तरह की टिप्पणी की स्वतंत्रता ले रखी है । राजेन्द्र यादव कभी हनुमान को आतंकवादी कह देते हैं, एफएम हुसैन भारत माता की नंगी तस्वीर बना देते हैं । जब इनका विरोध होता है तो उसपर छाती पीटते हैं और देश पर संकटकाल की डुगडुगी बजाते हैं । क्या इन लेखकों में हिम्मत है कि वो इस्लाम या मोहम्मद साहब के बारे में कुछ लिख सकें । क्या एम एफ हुसैन में यह हिम्मत है कि जिस तरह की पेंटिंग वो हिंदू देवी-देवताओं की बनाते हैं उसी स्वतंत्रता के साथ वो इस्लाम धर्म से जुड़े पात्रों या चरित्रों का चित्रण कर सकें । सलमान रश्दी और तस्लीमा नसरीन ने इस्लाम के खिलाफ लिखने की हिम्मत दिखाई तो आज उनकी स्थिति किसी से छुपी नहीं है । सलमान भारी सुरक्षा के बीच जिंदगी बिता रहे हैं और तसलीमा दर-बदर की ठोकरें खा रही हैं । अभी बहुत ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब कि एक डेनिश कार्टूनिस्ट ने पैगंबर साहब का कार्टून बना दिया था । नतीजा यह हुआ कि अल कायदा तक के लोग उसकी जान के पीछे पड़ गए थे । भारत में भी एक पत्रिका के संपादक और उसके मालिक को इस कार्टून को छापने पर जेल की हवा खानी पड़ी थी । तब तो किसी भी प्रगतिशील लेखक को अभिवयक्ति की स्वतंत्रता की याद नहीं आई थी । मेरा सवाल सिर्फ इतना सा है कि ये जो जनवाद और प्रगतिवाद का झंडा बुलंद करनेवाले लेखक और प्रोफेसर हैं वो बार-बार हिंदुओं की सहिष्णुता की परीक्षा क्यों लेना चाहते हैं । इन जैसे दोहरे चरित्र के लोगों की वजह से ही हिंदुओं का मन खट्टा होता है और उनमें कट्टरता बढ़ती है और समाज में वैमनस्यता फैलती है । कोई भी चीज अगर गलत है तो इसका आधार तो समान रूप से हर समुदाय और धर्म के लोगों पर लागू होता है या फिर हिंदुओं के लिए अभिव्यक्ति की आजादी का आधार कुछ और होता है और इन्य समुदाय के लोगों के लिए कुछ और ।
किसी भी कृति में मिथक या धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल वहां तक ही ठीक होता है जहांतक वो मनुष्य के अंतर्जगत को व्याख्यायित कर सके या फिर मनुष्यों के आपसी संवंधों को एक नई दिशा दे सके । अभिव्यक्ति के आजादी के नाम पर अभिवयक्ति की अराजकता की इजाजत किसी को भी नहीं दी जा सकती है । साहित्य अकादमी एक स्वायत्त संस्था है और प्रगतिशील लेखकों ने ही इस पर दक्षिणपंथी होने का आरोप जड़ा था लेकिन अब वही जनवादी और प्रगतिवादी लेखक और संगठन साहित्य अकादमी के पक्ष में खड़े दिखाई दे रहे हैं । ये तो जनवाद की मौकापरस्ती का एक ताजा नमूना है, इतिहास में इसके सैकड़ों उदाहरण हैं । अब वक्त आ गया है कि इन लोगों और संगठनों को अपने गिरेबां में झांककर आत्ममंथन करना चाहिए । अगर ये समय रहते नहीं चेते तो अभी तो सिर्फ अप्रासंगिक हुए हैं, आनेवाले दिनों में वो इतिहास के पन्नों में भी जगह नहीं पा सकेंगे
सृजनात्मक लेखन में अनेकों ऐसे उदाहरण हैं जहां धार्मिक प्रतीकों, पौराणिक मिथकों या फिर धार्मिक चरित्रों का इस्तेमाल किया गया है । ईसा, राम, कृष्ण, द्रौपदी, सीता, अहिल्या कर्ण आदि अनेक पात्रों का उपयोग हिंदी के कई लेखकों ने किया है । आधुनिक हिंदी काव्य की दो बड़ी रचनाएं कामायनी और राम की शक्ति पूजा पौराणिक धार्मिक मिथकों को आधार बनाकर मानवीय और राष्ट्रीय संदर्भों में उनकी युगीन व्याख्या करते हैं । शिवाजी सावंत ने अपने उपन्यास मृत्युंजय में कर्ण को समूची पीड़ित, दलित और शोषित जनता का प्रतीक बना दिया है । रांगेय राघव के अलावा भी कई प्रगतिशील लेखकों ने अपने लेखन में पौराणिक और धार्मिक प्रतीकों का उपयोग किया है, लेकिन इन सभी लेखकों ने प्रचलित और स्थापित मान्यताओं के खिलाफ जाकर किसी का भी चरित्र हनन नहीं किया है । तर्कसंगत तरीके से उनके व्यक्तित्व की कमियों को उजागर अवश्य किया है । हर युग में कवियों ने भी पौराणिक मिथकों को नए ढंग से रचा है । तुलसीदास जो रामकथा में पाते हैं वो नरेश मेहता नहीं पाते । सूरदास के यहां जो कृष्णकथा है वो धर्मवीर भारती के यहां नहीं है । अमेरिका में हॉवर्ड फास्ट ने भी पौराणिक और ऐतिहासिक प्रतीकों का उपयोग किया है लेकिन उनके संदर्भ बेहद आधुनिक हैं ।
लेकिन लक्ष्मी प्रसाद की इस कृति के समर्थन में खडे होकर एक बार फिर से इन प्रगतिवादी और जनवादियों का दोहरा चरित्र उजागर हुआ है । अभिवयक्ति की आजादी के नाम पर कुछ लेखकों ने हिंदू धर्म, उसकी मान्यताएं और उनके देवी देवताओं पर किसी भी तरह की टिप्पणी की स्वतंत्रता ले रखी है । राजेन्द्र यादव कभी हनुमान को आतंकवादी कह देते हैं, एफएम हुसैन भारत माता की नंगी तस्वीर बना देते हैं । जब इनका विरोध होता है तो उसपर छाती पीटते हैं और देश पर संकटकाल की डुगडुगी बजाते हैं । क्या इन लेखकों में हिम्मत है कि वो इस्लाम या मोहम्मद साहब के बारे में कुछ लिख सकें । क्या एम एफ हुसैन में यह हिम्मत है कि जिस तरह की पेंटिंग वो हिंदू देवी-देवताओं की बनाते हैं उसी स्वतंत्रता के साथ वो इस्लाम धर्म से जुड़े पात्रों या चरित्रों का चित्रण कर सकें । सलमान रश्दी और तस्लीमा नसरीन ने इस्लाम के खिलाफ लिखने की हिम्मत दिखाई तो आज उनकी स्थिति किसी से छुपी नहीं है । सलमान भारी सुरक्षा के बीच जिंदगी बिता रहे हैं और तसलीमा दर-बदर की ठोकरें खा रही हैं । अभी बहुत ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब कि एक डेनिश कार्टूनिस्ट ने पैगंबर साहब का कार्टून बना दिया था । नतीजा यह हुआ कि अल कायदा तक के लोग उसकी जान के पीछे पड़ गए थे । भारत में भी एक पत्रिका के संपादक और उसके मालिक को इस कार्टून को छापने पर जेल की हवा खानी पड़ी थी । तब तो किसी भी प्रगतिशील लेखक को अभिवयक्ति की स्वतंत्रता की याद नहीं आई थी । मेरा सवाल सिर्फ इतना सा है कि ये जो जनवाद और प्रगतिवाद का झंडा बुलंद करनेवाले लेखक और प्रोफेसर हैं वो बार-बार हिंदुओं की सहिष्णुता की परीक्षा क्यों लेना चाहते हैं । इन जैसे दोहरे चरित्र के लोगों की वजह से ही हिंदुओं का मन खट्टा होता है और उनमें कट्टरता बढ़ती है और समाज में वैमनस्यता फैलती है । कोई भी चीज अगर गलत है तो इसका आधार तो समान रूप से हर समुदाय और धर्म के लोगों पर लागू होता है या फिर हिंदुओं के लिए अभिव्यक्ति की आजादी का आधार कुछ और होता है और इन्य समुदाय के लोगों के लिए कुछ और ।
किसी भी कृति में मिथक या धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल वहां तक ही ठीक होता है जहांतक वो मनुष्य के अंतर्जगत को व्याख्यायित कर सके या फिर मनुष्यों के आपसी संवंधों को एक नई दिशा दे सके । अभिव्यक्ति के आजादी के नाम पर अभिवयक्ति की अराजकता की इजाजत किसी को भी नहीं दी जा सकती है । साहित्य अकादमी एक स्वायत्त संस्था है और प्रगतिशील लेखकों ने ही इस पर दक्षिणपंथी होने का आरोप जड़ा था लेकिन अब वही जनवादी और प्रगतिवादी लेखक और संगठन साहित्य अकादमी के पक्ष में खड़े दिखाई दे रहे हैं । ये तो जनवाद की मौकापरस्ती का एक ताजा नमूना है, इतिहास में इसके सैकड़ों उदाहरण हैं । अब वक्त आ गया है कि इन लोगों और संगठनों को अपने गिरेबां में झांककर आत्ममंथन करना चाहिए । अगर ये समय रहते नहीं चेते तो अभी तो सिर्फ अप्रासंगिक हुए हैं, आनेवाले दिनों में वो इतिहास के पन्नों में भी जगह नहीं पा सकेंगे
Thursday, February 18, 2010
निराशा की किरण
भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है , भारत विकास कर रहा है, आनेवाले कुछ वर्षों में भारत विश्व की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था हो जाएगी, विश्व मंच पर भारत की बात गंभीरता से सुनी जाने लगी है, आदि-आदि जाने कितनी बातें पढ़ते सुनते जानते यह लगता है कि देश सचमुच तरक्की कर रहा है, हम मजबूत हो रहे हैं । सरकार भी इस बात का एहसास कराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती कि देश की जनता खुशहाल हो रही है और सरकार आम आदमी का ध्यान रख रही है । लेकिन देश के प्रधानमंत्री के आवास और कार्यालय से तकरीबन बीस किलोमीटर की दूरी पर औसतन हर दो दिन पर मानसिक रूप से बीमार रोगी बेहतर इलाज और रहन सहन के आभाव में दम तोड़ रहे हैं । राजधानी दिल्ली में मानसिक रूप से बीमार लोगों की आश्रय स्थली आशा किरण में लगातार हो रही मौत से विकास और खुशहाली के सारे दावों की पोल खुल रही है । दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार चाहे लाख दावे करे लेकिन राजधानी में लगभग दो महीने में 26 मंदबुद्धि और मानसिक रूप से कमजोर और बीमार लोगों की मौत ने उनकी सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए है । दिल्ली सरकार के समाज कल्याण मंत्रालय की यह जिम्मेदारी है कि वो ये सुनिश्चित करे कि मानसिक रूप से बीमार लोगों को पर्याप्त सुविधाएं मिले । लेकिन आशा किरण होम में क्षमता से दुगने मरीज ठूंस दिए गए हैं, और भ्रष्टाचार की वजह से उनके रहन सहन और बीमारी के इलाज की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है । हर मौत के बाद जब सवाल खड़े होते हैं तो जांच की बात कर सरकार अपना पल्ला झाड़ लेती है । देश की राजधानी दिल्ली में मानसिक रूप से बीमार लोगों की यह हालत है तो देश के अन्य इलाकों और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में इन रोगियों की हालत क्या होगी आप अंदाजा लगा सकते हैं ।
दरअसल ऐसा करके शीला दीक्षित की सरकार संविधान का भी अनादर कर रही है । देश के संविधान की प्रस्तावना भारतवासियों को समानता का अधिकार प्रदान करती है । संविधान साफ तौर पर यह कहता है कि धर्म, जाति, जन्म स्थान, लिंग के आधार पर कोई भी भेदभाव नहीं किया जा सकता है । राइट टू लिव विद डिगनिटी भी भारतवासी का अधिकार है । और सरकार को इन अधिकारों को सुरक्षित करना है । प्रतिष्ठापूर्वक जीवन के अधिकार की गारंटी सिर्फ भारतीय संविधान ही नहीं बल्कि कई अंतराष्ट्रीय संधियां भी देती है । अस्सी के दशक में मानसिक रूप से बीमार लोगों के अधिकारों को लेकर अंतराष्ट्रीय स्तर पर जोरदार मुहिम चली थी । नतीजा यह हुआ कि संयुक्त राष्ट्र संघ की साधारण सभा ने मानसिक रूप से बीमार लोगों को सम्मानपूर्व जीने के अधिकारो को लेकर एक घोषणा पत्र को मंजूरी दी । इस घोषणा-पत्र की धारा पच्चीस के मुताबिक हर व्यक्ति को बेरोजगारी, बीमारी, विकलांगता, बुढापा या फिर कोई ऐसी वजह जिसपर उसका नियंत्रण ना हो, की हालात में जीने के अधिकार की सुरक्षा दी जाएगी । और संयुक्त राष्ट्र के सदस्य होने के नाते हमारे देश पर भी इसे लागू करने की जिम्मेदारी है । लेकिन दिल्ली सरकार देश के संविधान के साथ-साथ अंतराष्ट्रीय मानकों की भी धज्जियां उड़ा रही है ।
मानसिक रोग एक ऐसी ही परिस्थिति है जिसमें बीमार व्यक्ति को यह नहीं पता होता है कि वो क्या और क्यों कर रहा है । उसे एक ऐसे वातावरण की जरूरत होती है जहां वो अपने आपको सहज और सुरक्षित महसूस कर सके । इसी तरह के वातावरण के निर्माण के लिए बनाए गए आशा किरण में इन रोगियों को सिर्फ निराशा की किरण ही नजर आती है । मानसिक रूप से बीमार लोगों को लेकर सरकार बेहद सवंदनहीन रहती है और वोट बैंक की राजनीति करने वाली राजनीतिक पार्टियों को भी इन मंदबुद्धि लोगों की पीड़ा का एहसास तक नहीं होता है । हमारा समाज भी इनके प्रति बहुधा उदासीन ही रहता है और मंदबुद्धि और मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को परिवार पर बोझ समझा जाता है । उन्हें पागल मानकर मानसिक आरोग्यशाला में भर्ती करवाकर परिवार के लोग जैसे छुटकारा पाना चाहते हैं जबकि उन्हें यह नहीं मालूम कि अगर मानसिक रूप से बीमार मरीज अपने घर में रहेगा तो उसमें सुधार जल्द आने की संभावना बढ़ जाती है । यहां हम याद दिलाते चलें कि रामनाथपुरम के पास दिमागी तौर पर बीमार लोगों के एक हॉस्टल में लगी आग में 25 मरीज जिंदा जल कर मर गए थे, क्योंकि उनकी मानसिक स्थिति के मद्देनजर रात में उन्हें बिस्तर से बांध दिया जाता था । इसलिए जब आग लगी तो लोहे की जंजीर में जकड़े ये मरीज बिस्तर पर ही खाक हो गए ।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार इस तरह के बीमार लोगों के प्रति संवेदनशीव रवैया अपनाए और उन्हें हर तरह की सुरक्षा की गारंटी देने का इंतजाम करे । अगर ऐसा नहीं होता है तो विकास और सामाजिक बदलाव की बात बेमानी और हवाई ही रहेगी ।
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दरअसल ऐसा करके शीला दीक्षित की सरकार संविधान का भी अनादर कर रही है । देश के संविधान की प्रस्तावना भारतवासियों को समानता का अधिकार प्रदान करती है । संविधान साफ तौर पर यह कहता है कि धर्म, जाति, जन्म स्थान, लिंग के आधार पर कोई भी भेदभाव नहीं किया जा सकता है । राइट टू लिव विद डिगनिटी भी भारतवासी का अधिकार है । और सरकार को इन अधिकारों को सुरक्षित करना है । प्रतिष्ठापूर्वक जीवन के अधिकार की गारंटी सिर्फ भारतीय संविधान ही नहीं बल्कि कई अंतराष्ट्रीय संधियां भी देती है । अस्सी के दशक में मानसिक रूप से बीमार लोगों के अधिकारों को लेकर अंतराष्ट्रीय स्तर पर जोरदार मुहिम चली थी । नतीजा यह हुआ कि संयुक्त राष्ट्र संघ की साधारण सभा ने मानसिक रूप से बीमार लोगों को सम्मानपूर्व जीने के अधिकारो को लेकर एक घोषणा पत्र को मंजूरी दी । इस घोषणा-पत्र की धारा पच्चीस के मुताबिक हर व्यक्ति को बेरोजगारी, बीमारी, विकलांगता, बुढापा या फिर कोई ऐसी वजह जिसपर उसका नियंत्रण ना हो, की हालात में जीने के अधिकार की सुरक्षा दी जाएगी । और संयुक्त राष्ट्र के सदस्य होने के नाते हमारे देश पर भी इसे लागू करने की जिम्मेदारी है । लेकिन दिल्ली सरकार देश के संविधान के साथ-साथ अंतराष्ट्रीय मानकों की भी धज्जियां उड़ा रही है ।
मानसिक रोग एक ऐसी ही परिस्थिति है जिसमें बीमार व्यक्ति को यह नहीं पता होता है कि वो क्या और क्यों कर रहा है । उसे एक ऐसे वातावरण की जरूरत होती है जहां वो अपने आपको सहज और सुरक्षित महसूस कर सके । इसी तरह के वातावरण के निर्माण के लिए बनाए गए आशा किरण में इन रोगियों को सिर्फ निराशा की किरण ही नजर आती है । मानसिक रूप से बीमार लोगों को लेकर सरकार बेहद सवंदनहीन रहती है और वोट बैंक की राजनीति करने वाली राजनीतिक पार्टियों को भी इन मंदबुद्धि लोगों की पीड़ा का एहसास तक नहीं होता है । हमारा समाज भी इनके प्रति बहुधा उदासीन ही रहता है और मंदबुद्धि और मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को परिवार पर बोझ समझा जाता है । उन्हें पागल मानकर मानसिक आरोग्यशाला में भर्ती करवाकर परिवार के लोग जैसे छुटकारा पाना चाहते हैं जबकि उन्हें यह नहीं मालूम कि अगर मानसिक रूप से बीमार मरीज अपने घर में रहेगा तो उसमें सुधार जल्द आने की संभावना बढ़ जाती है । यहां हम याद दिलाते चलें कि रामनाथपुरम के पास दिमागी तौर पर बीमार लोगों के एक हॉस्टल में लगी आग में 25 मरीज जिंदा जल कर मर गए थे, क्योंकि उनकी मानसिक स्थिति के मद्देनजर रात में उन्हें बिस्तर से बांध दिया जाता था । इसलिए जब आग लगी तो लोहे की जंजीर में जकड़े ये मरीज बिस्तर पर ही खाक हो गए ।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार इस तरह के बीमार लोगों के प्रति संवेदनशीव रवैया अपनाए और उन्हें हर तरह की सुरक्षा की गारंटी देने का इंतजाम करे । अगर ऐसा नहीं होता है तो विकास और सामाजिक बदलाव की बात बेमानी और हवाई ही रहेगी ।
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Thursday, February 11, 2010
कांग्रेस का नया अर्जुन
आजादी के बाद के चुनावों में उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों के वोट कमोबेश कांग्रेस पार्टी को ही मिलते रहे हैं । सन बानवे में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद मुसलमानों का कांग्रेस से मोहभंग हुआ और उसका वोट कांग्रेस की झोली से निकलकर मुलायम के पास पहुंच गया । लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव के वक्त मुलायम सिंह यादव ने बाबरी मस्जिद विध्वंस के वक्त उत्तर प्रदेश के मुखयमंत्री रह चुके पूर्व भाजपा नेता कल्याण सिंह को अपना सहयोगी बना लिया । लोकसभा चुनाव के नतीजों ने यह साफ कर दिया कि मुलायम के लिए कल्याण की यह दोस्ती भारी पड़ी । उत्तर प्रदेश में ढाई साल बाद एक बार फिर से विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं और लोकसभा चुनावों में पार्टी की सफलता से उत्साहित कांग्रेसियों की नजर एक बार फिर से मुस्लिम मतदाताओं पर है । पार्टी नेताओं को यह लगने लगा है कि अगर मुसलमानों को एक बार फिर से साध लिया गया तो प्रदेश में मरणासन्न पार्टी को नई संजीवनी मिल सकती है ।
अपनी इसी योजना को लेकर पार्टी के उत्तर प्रदेश प्रभारी दिग्विजय सिंह आजमगढ़ के संजरपुर पहुंचते हैं । संजरपुर वो कस्बा है जहां के कुछ युवकों पर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगता रहा है । वहां पहुंचकर दिग्विजय सिंह को अचानक दिल्ली ब्लास्ट के बाद हुए बटला एनकाउंटर की याद आती है । स्थानीय लोगों का जोरदार विरोध और काले झंडे के बावजूद जब दिग्विजय सिंह को बोलने का मौका मिला तो उन्होंने एक शातिर राजनेता की तरह लोगों की दुखती रग पर हाथ रख दिया । इशारों-इशारों में बटला हाउस एनकांउटर के फर्जी होने की बात कर डाली । दिग्विजय ने कहा कि उन्होंने बटला हाउस एनकाउंटर के फोटोग्राफ्स देखे हैं जिनमें आतंकवादियों के सर में गोली लगी है । उनके मुताबिक दहशतगर्दों के खिलाफ एनकाउंटर में इस तरह से गोली लगना नामुमकिन है । जाहिर है इशारा और इरादा दोनों साफ था । दिग्विजय सिंह को अगर बटला हाउस एनकाउंटर की सत्यता पर संदेह था तो डेढ साल से चुप क्यों थे । संजरपुर पहुंचकर ही दिग्गी राजा को बटला हाउस की याद क्यों आई । आपको याद दिलाते चलें कि दो हजार आठ के सितंबर में दिल्ली के बटला हाउस इलाके में हुए एक एनकाउंटर में दिल्ली पुलिस के जांबाज सिपाहियों ने दो आतंकवादियों को ढेर कर दिया था । आतंकवादियों से लड़ते हुए उस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के जांबाज इंसपेक्टर मोहन चंद्र शर्मा शहीद हो गए थे और एक हेड कांस्टेबल बुरी तरह से जख्मी हो गया था । दो साल पहले जब यह एनकाउंटर हुआ था, उस वक्त भी इसपर सवाल खड़े हुए थे । लेकिन बाद में अदालत और सरकारी जांच में ये साबित हो गया कि मुठभेड़ सही था ।
जब दिग्विजय सिंह संजरपुर में ये बयान दे रहे थे उसके दो दिन पहले यूपी एसटीएफ ने दिल्ली समेत कई शहरों में हुए बम धमाकों के आरोपी आतंकवादी शहजाद को धर दबोचा था । शहजाद ने इस सिलसिले में कई सनसनीखेज खुलासे भी किए और यह भी माना कि दिल्ली पुलिस के इंसपेक्टर मोहनचंद शर्मा उसकी ही गोली का निशाना बने । लेकिन एनकाउंटर के फोटग्राफ्स को ध्यान से देखनेवाले कांग्रेस पार्टी के इस वरिष्ठ नेता को शहजाद के बयानों को पढने की फुर्त कहां । इन बातों से बेखबर दिग्विजय ने संजरपुर में बटला हाउस एनकाउंटर को ही संदेहास्पद करार दे दिया । ये इस एनकाउंटर में मारे गए शहीद मोहनचंद शर्मा का अपमान भी है ।
जाहिर था दिग्विजय सिंह के इस बयान के बाद सियासी गलियारों में हड़कंप मचा और भारतीय जनता पार्टी ने दिग्विजय सिंह के बहाने कांग्रेस पार्टी पर निशाना साधा । आनन फानन में कांग्रेस ने दिग्विजय के बयान से खुद को अलग कर लिया । दरअसल कांग्रेस में अल्पसंख्यकों को लुभाने की यह चाल बहुत पुरानी है । एक जमाने में दिग्विजय सिंह के गुरू और उनके ही प्रदेश के कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह भी इस तरह के राजनीतिक दांव चला करते थे । एक जमाने में जब सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष थे उस वक्त अर्जुन सिंह ने अल्पसंख्यकों को खुश करने के लिए आरएसएस पर गांधी की हत्या का आरोप जड़ दिया था । जब आरएसएस ने कानूनी कार्रवाई की धमकी दी तो अर्जुन के तेवर नरम पड़े थे और बयान में संशोधन करते हुए कहा था कि संघ ने जो वातावरण तैयार किया था वही गांधी हत्या की वजह बना । लेकिन उस वक्त बयान देते वक्त अर्जुन सिंह यह भूल गए थे कि जस्टिस कपूर की रिपोर्ट, कांग्रेस के नेता डी पी मिश्रा की आत्मकथा और सरदार पटेल के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के पत्रों में भी आरएसएस को गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया गया था । लेकिन अर्जुन सिंह अपने राजनैतिक लाभ के लिए गांधी की हत्या का इस्तेमाल करते रहे । लेकिन आरएसएस के तत्कालीन प्रवक्ता राम माधव ने अर्जुन सिंह को हकीकत का आईना भी दिखाया था । राम माधव ने बताया था कि अर्जुन सिंह के परिवार के संबंध संघ के साथ कितने गहरे रहे हैं और उनके भाई राणा बहादुर सिंह एक जमाने में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के जिला प्रमुख हुआ करते थे । लेकिन इन सबसे बेखबर अर्जुन सिंह ने अल्पसंख्यकों पर डोरे डालना नहीं छोड़ा ।
इसके बाद जब अर्जुन सिंह केंद्र में मानव संसाधन विकास मंत्री बने तो पाठ्य पुस्तकों को भगवा रंग से मुक्त करने की मुहिम के नाम पर भी अपनी राजनीति चमकाते रहे । इसपर भी जमकर विवाद हुआ था । जिसमें बाद में प्रधानमंत्री को दखल देना पड़ा था । अर्जुन सिंह ने एक वक्त अपने वक्तव्यों और सहयोगियों के साथ मिलकर ऐसा समां बांध दिया था कि लगने लगा था कि सेक्युलरिज्म के वो सबसे बड़े पैरोकार हैं । अपन बयानवीरता से उत्साहित अर्जुन सिंह यहीं नहीं रुके थे उन्होंने एक वक्तव्य में संघ और हिंदू महासभा को भारत के विभाजन का जिम्मेदार भी ठहरा दिया था । अर्जुन सिंह ने संघ पर इतिहास को गलत दिशा देने का आरोप भी जड़ा था । अल्पसंख्यकों को लुभाने के चक्कर में सिंह ने कई बचकाने तर्क दिए और यह भूल गए कि विभाजन का असली जिम्मेदार तो जिन्ना थे जिन्होंने द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत का ना केवल प्रतिपादन किया बल्कि उसको मूर्त रूप भी दिलवाया, जिसको कांग्रेस के नेताओं का भी मूक समर्थन प्राप्त था । द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत पर इतिहासकारों में मतैक्य नहीं है विद्वानों ने जमकर लिखा है ।
अब अर्जुन सिंह अस्वस्थ हैं और पार्टी में उनकी कोई पूछ नहीं रह गई है । कांग्रेस में कोई बड़ा अल्पसंख्यक नेता भी नहीं है जिसपर पार्टी को ये भरोसा हो कि वो अपने समुदाय का वोट पार्टी को दिला सकता है । मौका माकूल देखकर दिग्विजय सिंह ने अपने गुरू अर्जुन सिंह की राह पर चलने का फैसला कर लिया प्रतीत होता है । दिग्विजय सिंह को इसके दो फायदे हो सकते हैं एक तो पार्टी में उसकी पूछ बढ़ जाएगी और दूसरे अगर खुदा ना खास्ते उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कोई फायदा होता है तो पार्टी आलाकमान की नजर में उनका ग्राफ भी उपर चढ़ जाएगा । कांग्रेस पार्टी में अपने प्रतिद्वदियों की राजनीति से राहुल के नाम के सहारे जूझ रहे दिग्गी राजा को अल्पसंख्यकों की पैरोकारी का ये फॉर्मूला बेहतर लगा और संजरपुर पहुंचकर उन्होंने इसकी शुरुआत कर दी । भविष्य में यह देखना और भी दिलचस्प होगा कि अल्पसंख्यकों के किन-किन मुद्दों पर दिग्विजय सिंह अपनी राय देते हैं और कांग्रेस उससे अपना पल्ला झाड़ लेती है । लेकिन दिग्विजय सिंह को यह याद रखना चाहिए कि अर्जुन सिंह के जमाने में राजनैतिक फिजां कुछ और थी और अब का राजनैतिक परिदृश्य अलहदा है । अब मुसलमानों को सिर्फ बयानबाजी से बरगलाना मुश्किल है उन्हें कुछ ठोस करके दिखाना होगा ।
अपनी इसी योजना को लेकर पार्टी के उत्तर प्रदेश प्रभारी दिग्विजय सिंह आजमगढ़ के संजरपुर पहुंचते हैं । संजरपुर वो कस्बा है जहां के कुछ युवकों पर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगता रहा है । वहां पहुंचकर दिग्विजय सिंह को अचानक दिल्ली ब्लास्ट के बाद हुए बटला एनकाउंटर की याद आती है । स्थानीय लोगों का जोरदार विरोध और काले झंडे के बावजूद जब दिग्विजय सिंह को बोलने का मौका मिला तो उन्होंने एक शातिर राजनेता की तरह लोगों की दुखती रग पर हाथ रख दिया । इशारों-इशारों में बटला हाउस एनकांउटर के फर्जी होने की बात कर डाली । दिग्विजय ने कहा कि उन्होंने बटला हाउस एनकाउंटर के फोटोग्राफ्स देखे हैं जिनमें आतंकवादियों के सर में गोली लगी है । उनके मुताबिक दहशतगर्दों के खिलाफ एनकाउंटर में इस तरह से गोली लगना नामुमकिन है । जाहिर है इशारा और इरादा दोनों साफ था । दिग्विजय सिंह को अगर बटला हाउस एनकाउंटर की सत्यता पर संदेह था तो डेढ साल से चुप क्यों थे । संजरपुर पहुंचकर ही दिग्गी राजा को बटला हाउस की याद क्यों आई । आपको याद दिलाते चलें कि दो हजार आठ के सितंबर में दिल्ली के बटला हाउस इलाके में हुए एक एनकाउंटर में दिल्ली पुलिस के जांबाज सिपाहियों ने दो आतंकवादियों को ढेर कर दिया था । आतंकवादियों से लड़ते हुए उस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के जांबाज इंसपेक्टर मोहन चंद्र शर्मा शहीद हो गए थे और एक हेड कांस्टेबल बुरी तरह से जख्मी हो गया था । दो साल पहले जब यह एनकाउंटर हुआ था, उस वक्त भी इसपर सवाल खड़े हुए थे । लेकिन बाद में अदालत और सरकारी जांच में ये साबित हो गया कि मुठभेड़ सही था ।
जब दिग्विजय सिंह संजरपुर में ये बयान दे रहे थे उसके दो दिन पहले यूपी एसटीएफ ने दिल्ली समेत कई शहरों में हुए बम धमाकों के आरोपी आतंकवादी शहजाद को धर दबोचा था । शहजाद ने इस सिलसिले में कई सनसनीखेज खुलासे भी किए और यह भी माना कि दिल्ली पुलिस के इंसपेक्टर मोहनचंद शर्मा उसकी ही गोली का निशाना बने । लेकिन एनकाउंटर के फोटग्राफ्स को ध्यान से देखनेवाले कांग्रेस पार्टी के इस वरिष्ठ नेता को शहजाद के बयानों को पढने की फुर्त कहां । इन बातों से बेखबर दिग्विजय ने संजरपुर में बटला हाउस एनकाउंटर को ही संदेहास्पद करार दे दिया । ये इस एनकाउंटर में मारे गए शहीद मोहनचंद शर्मा का अपमान भी है ।
जाहिर था दिग्विजय सिंह के इस बयान के बाद सियासी गलियारों में हड़कंप मचा और भारतीय जनता पार्टी ने दिग्विजय सिंह के बहाने कांग्रेस पार्टी पर निशाना साधा । आनन फानन में कांग्रेस ने दिग्विजय के बयान से खुद को अलग कर लिया । दरअसल कांग्रेस में अल्पसंख्यकों को लुभाने की यह चाल बहुत पुरानी है । एक जमाने में दिग्विजय सिंह के गुरू और उनके ही प्रदेश के कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह भी इस तरह के राजनीतिक दांव चला करते थे । एक जमाने में जब सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष थे उस वक्त अर्जुन सिंह ने अल्पसंख्यकों को खुश करने के लिए आरएसएस पर गांधी की हत्या का आरोप जड़ दिया था । जब आरएसएस ने कानूनी कार्रवाई की धमकी दी तो अर्जुन के तेवर नरम पड़े थे और बयान में संशोधन करते हुए कहा था कि संघ ने जो वातावरण तैयार किया था वही गांधी हत्या की वजह बना । लेकिन उस वक्त बयान देते वक्त अर्जुन सिंह यह भूल गए थे कि जस्टिस कपूर की रिपोर्ट, कांग्रेस के नेता डी पी मिश्रा की आत्मकथा और सरदार पटेल के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के पत्रों में भी आरएसएस को गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया गया था । लेकिन अर्जुन सिंह अपने राजनैतिक लाभ के लिए गांधी की हत्या का इस्तेमाल करते रहे । लेकिन आरएसएस के तत्कालीन प्रवक्ता राम माधव ने अर्जुन सिंह को हकीकत का आईना भी दिखाया था । राम माधव ने बताया था कि अर्जुन सिंह के परिवार के संबंध संघ के साथ कितने गहरे रहे हैं और उनके भाई राणा बहादुर सिंह एक जमाने में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के जिला प्रमुख हुआ करते थे । लेकिन इन सबसे बेखबर अर्जुन सिंह ने अल्पसंख्यकों पर डोरे डालना नहीं छोड़ा ।
इसके बाद जब अर्जुन सिंह केंद्र में मानव संसाधन विकास मंत्री बने तो पाठ्य पुस्तकों को भगवा रंग से मुक्त करने की मुहिम के नाम पर भी अपनी राजनीति चमकाते रहे । इसपर भी जमकर विवाद हुआ था । जिसमें बाद में प्रधानमंत्री को दखल देना पड़ा था । अर्जुन सिंह ने एक वक्त अपने वक्तव्यों और सहयोगियों के साथ मिलकर ऐसा समां बांध दिया था कि लगने लगा था कि सेक्युलरिज्म के वो सबसे बड़े पैरोकार हैं । अपन बयानवीरता से उत्साहित अर्जुन सिंह यहीं नहीं रुके थे उन्होंने एक वक्तव्य में संघ और हिंदू महासभा को भारत के विभाजन का जिम्मेदार भी ठहरा दिया था । अर्जुन सिंह ने संघ पर इतिहास को गलत दिशा देने का आरोप भी जड़ा था । अल्पसंख्यकों को लुभाने के चक्कर में सिंह ने कई बचकाने तर्क दिए और यह भूल गए कि विभाजन का असली जिम्मेदार तो जिन्ना थे जिन्होंने द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत का ना केवल प्रतिपादन किया बल्कि उसको मूर्त रूप भी दिलवाया, जिसको कांग्रेस के नेताओं का भी मूक समर्थन प्राप्त था । द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत पर इतिहासकारों में मतैक्य नहीं है विद्वानों ने जमकर लिखा है ।
अब अर्जुन सिंह अस्वस्थ हैं और पार्टी में उनकी कोई पूछ नहीं रह गई है । कांग्रेस में कोई बड़ा अल्पसंख्यक नेता भी नहीं है जिसपर पार्टी को ये भरोसा हो कि वो अपने समुदाय का वोट पार्टी को दिला सकता है । मौका माकूल देखकर दिग्विजय सिंह ने अपने गुरू अर्जुन सिंह की राह पर चलने का फैसला कर लिया प्रतीत होता है । दिग्विजय सिंह को इसके दो फायदे हो सकते हैं एक तो पार्टी में उसकी पूछ बढ़ जाएगी और दूसरे अगर खुदा ना खास्ते उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कोई फायदा होता है तो पार्टी आलाकमान की नजर में उनका ग्राफ भी उपर चढ़ जाएगा । कांग्रेस पार्टी में अपने प्रतिद्वदियों की राजनीति से राहुल के नाम के सहारे जूझ रहे दिग्गी राजा को अल्पसंख्यकों की पैरोकारी का ये फॉर्मूला बेहतर लगा और संजरपुर पहुंचकर उन्होंने इसकी शुरुआत कर दी । भविष्य में यह देखना और भी दिलचस्प होगा कि अल्पसंख्यकों के किन-किन मुद्दों पर दिग्विजय सिंह अपनी राय देते हैं और कांग्रेस उससे अपना पल्ला झाड़ लेती है । लेकिन दिग्विजय सिंह को यह याद रखना चाहिए कि अर्जुन सिंह के जमाने में राजनैतिक फिजां कुछ और थी और अब का राजनैतिक परिदृश्य अलहदा है । अब मुसलमानों को सिर्फ बयानबाजी से बरगलाना मुश्किल है उन्हें कुछ ठोस करके दिखाना होगा ।
Saturday, January 30, 2010
विश्व पुस्तक मेला- सरकारी लापरवाही का नमूना
पंद्रहवीं शताब्दी में जब पुस्तक मेले की शुरुआत हुई थी तो उसके पीछे अवधारणा यह थी कि विश्व के देशों के प्रकाशकों को एक मंच मिले जहां वो किताबों के प्रकाशन अधिकार का सौदा कर सकें । प्रारंभिक अवधारणा में समय के साथ बदलाव आया और कालांतर में इस तरह का मेला पुस्तक प्रेमियों के लिए उत्सव सरीखा बन गया जिस्का वो शिद्दत से इंतजार करने लगे । पश्चिम की यह अवधारणा जब हिंदुस्तान आई तो पुस्तक मेले की जो तस्वीर उभरी उसके केंद्र में सिर्फ पाठक ही थे । किताबों के प्रकाशन अधिकार के कारोबार को ना तो मंच मिला और ना ही प्रकाशकों के स्तर पर इसके के लिए कोई गंभीर कोशिश की गई । भारत में विश्व पुस्तक मेले का आयोजन नेशनल बुक ट्रस्ट के जिम्मे है और हर दो साल पर दिल्ली के प्रगति मैदान में एनबीटी इसे आयोजित करती है । इस वर्ष भी शनिवार से फरवरी के पहले हफ्ते तक चलनेवाले विश्व पुस्तक मेले की सउरुआत हो चुकी है । भारत में बदले हुए चरित्र के साथ आयोजित होनेवाले विश्व पुस्तक मेले को लेकर पहले प्रकाशकों और पाठकों में खासा उत्साह रहता था । लेकिन समय के साथ लगातार इस उत्साह में कमी आती गई । दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले को मैं लगभग बीस वर्षों से देख रहा हूं । हर बार इसमें पाठकों और प्रकाशकों के उत्साह में ह्रास ही होता दिख रहा है । पुस्तक मेले का आयोजन करनेवाली संस्था पर यह जिम्मेदारी होती है कि वो पाठकों या पुस्तक प्रेमियों के बीच पुस्तक मेले को लेकर जागरुकता या फिर एक उत्साह पैदा करे लेकिन दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले को लेकर एनबीटी ना तो कोई माहौल बना पाई और ना ही लोगों तक इसकी जानकारी पहुंच पाई । कुछ इलाकों में छोटे होर्डिंग लगाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली । हद तो तब हो गई जब शनिवार से शुरू होनेवाले मेले में दिल्ली के प्रकाशकों को स्टाल आवंटन की जानकारी भी बुधवार को दी गई । दिल्ली के बाहर के प्रकाशकों के हाल का अंदाजा भर लगाया जा सकता है । नेशनल बुक ट्रस्ट ने खुद तो विश्व पुस्तक मेला के प्रचार प्रसार के लिए कुछ किया नहीं प्रकाशकों को भी इतना वक्त नहीं दिया कि वो अपने स्तर पर इसकी जानकारी पाठकों और पुस्तक प्रेमियों तक पहुंचा सकें । पिछले पुस्तक मेले में रूस को अतिथि देश का दर्जा दिया गया था लेकिन उस वक्त एनबीटी की बेहद भद पिटी थी जब रूस के प्रकाशकों ने मेला खत्म होने के पहले ही अपना बोरिया बिस्तर समेट लिया था । एनबीटी के इस रवैये से भारत की खूब भद पिटी थी ।
लेकिन भारत के प्रकाशकों में अब भी विश्व पुस्तक मेले को लेकर उत्साह बचा है और वो हर बार कुछ नया करने की जिद पाले बैठे हैं । कुछ ऐसे प्रकाशक भी हैं जिन्होंने बजाप्ता योजना बनाकर किताबों की तैयारी करवाई। प्रकाशकों के अलावा लेखकों ने भी योजनाबद्ध तरीके से काम किया ताकि उनकी किताबें मेले में रिलीज हो सके । नामवर सिंह हमारे वक्त के हिंदी के सबसे बड़े लेखक हैं । लेकिन उनपर लगातार यह आरोप लगता रहा है कि पिछले सत्ताइस साल से उन्होंने कुछ नहीं लिखा । उनकी आखिरी किताब- दूसरी परंपरा की खोज- सन उन्नीस सौ बयासी में छपी थी । उसके बाद से नामवर सिंह ने अपने आप को वाचिक परंपरा में सिद्ध कर लिया और लेखन से विरक्त हो गए । लेकिन हिंदी में उनके आलोचकों के साथ-साथ इनके प्रशंसकों को भी इस बात का इंतजार रहा कि नामवर शायद लेखन की ओर लौटें । विश्व पुस्तक मेले के अवसर पर उनका यह इंतजार खत्म होगा । राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से नामवर सिंह की एक साथ छह किताबें प्रकाशित हैं । हिंदी और हिंदीवालों को इसपर सहसा विश्वास नहीं होगा । लोग सोच रहे हैं कि नामवर सिंह के भाषणों का संकलन है । यह आंशिक रूप से सही भी है कि इन छह किताबों में से दो उनके भाषणों का संकलन है लेकिन बाकी चार उनके खुद की लिखी किताबें हैं । विश्व पुस्तक मेले की यह सबसे बड़ी उपलब्धि है जब पाठकों को एक साथ नामवर सिंह की छह किताबें उपलब्ध है । नामवर सिंह के अलावा एक और आलोचक नंदकिशोर नवल की कविता की किताब प्रकाशित है जिन्होंने सियाराम तिवारी के साथ संयुक्त रूप से प्रकाशन संस्थान ने द्वाभा के नाम से छापा है । नंदकिशोर नवल की आलोचनात्मक दृष्टि और उनका काम उल्लेखनीय है लेकिन मन के कोने अंतरे में कवि होने की लालसा उन्हें बार-बार कविता संग्रह छपवाने की ओर प्रेरित करती है । विश्व पुस्तक मेले के मौके पर जो एक बेहद विस्फोटक किताब प्रकाशित हुई है वह है इंदौर की लेखिका कृष्णा अग्निहोत्री की । सामयिक प्रकाशन, दिल्ली से कृष्णा अग्निहोत्री की आत्मकथा दो खंडो में प्रकाशित हुई है - लगता नहीं है दिल मेरा तथा और...और...औरत । कृष्णा अग्निहोत्री अपने जमाने की बेहद खूबसूरत और बिंदास लेखिका थी । अपनी इस आत्मकथा में उन्होंने दिल्ली के साहित्यकारों-संपादकों के साथ अपने हर तरह के रिश्तों पर बेहद बेबाकी और साहसपूर्वक लिखा है । कृष्णा जी जिस तरह स्वभाव से विंदास थी वही बिंदासपना इस आत्मकथा में भी रेखांकित की जा सकती है । इसमें स्त्री लेखिका और पुरुष लेखक के संबंधों का जो द्वंद या फिर छल-छद्म है उससे एक बारगी साहित्य जगत में हड़कंप मचना तय है । हिंदी में लेखक-लेखिका संबंधों पर कलम की जगह तलवार लेकर लिखनेवाली कुछ लेखिकाओं को इस किताब से एक नई जीवनी शक्ति मिलेगी और वो फिर से पुरुषों को कठघरे में खड़ा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगी । इन किताबों के अलावा कई प्रकाशकों ने साहित्य से इतर हटकर बेहद उल्लेखनीय किताबें प्रकाशित की है । वाणी प्रकाशन ने अमेरिकी अर्थशास्त्री पॉल कुर्गमैन की किताब का पत्रकार अरविंद मोहन से अनुवाद करवाया है । मंदी के दौर में यह एक अहम किताब साबित होगी । लेकिन किताबों के अलावा जो सबसे बड़ा और अहम सवाल है वो यह कि क्या इस पुस्तक मेले को पाठक तवज्जो देंगे । क्या एनबीटी पाठकों के बीच बाकी बचे दिनों में उत्साह पैदा करने में कामयाब हो पाएगी । अगर ऐसा होता है तो प्रकाशक लेखक के लिए संतोष की बात होगी लेकिन अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो विश्व पुस्तक मेले के औचित्य के साथ-साथ एनबीटी के कर्ता-धर्ताओं पर भी बड़ा प्रश्न चिन्ह लगेगा ।
लेकिन भारत के प्रकाशकों में अब भी विश्व पुस्तक मेले को लेकर उत्साह बचा है और वो हर बार कुछ नया करने की जिद पाले बैठे हैं । कुछ ऐसे प्रकाशक भी हैं जिन्होंने बजाप्ता योजना बनाकर किताबों की तैयारी करवाई। प्रकाशकों के अलावा लेखकों ने भी योजनाबद्ध तरीके से काम किया ताकि उनकी किताबें मेले में रिलीज हो सके । नामवर सिंह हमारे वक्त के हिंदी के सबसे बड़े लेखक हैं । लेकिन उनपर लगातार यह आरोप लगता रहा है कि पिछले सत्ताइस साल से उन्होंने कुछ नहीं लिखा । उनकी आखिरी किताब- दूसरी परंपरा की खोज- सन उन्नीस सौ बयासी में छपी थी । उसके बाद से नामवर सिंह ने अपने आप को वाचिक परंपरा में सिद्ध कर लिया और लेखन से विरक्त हो गए । लेकिन हिंदी में उनके आलोचकों के साथ-साथ इनके प्रशंसकों को भी इस बात का इंतजार रहा कि नामवर शायद लेखन की ओर लौटें । विश्व पुस्तक मेले के अवसर पर उनका यह इंतजार खत्म होगा । राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से नामवर सिंह की एक साथ छह किताबें प्रकाशित हैं । हिंदी और हिंदीवालों को इसपर सहसा विश्वास नहीं होगा । लोग सोच रहे हैं कि नामवर सिंह के भाषणों का संकलन है । यह आंशिक रूप से सही भी है कि इन छह किताबों में से दो उनके भाषणों का संकलन है लेकिन बाकी चार उनके खुद की लिखी किताबें हैं । विश्व पुस्तक मेले की यह सबसे बड़ी उपलब्धि है जब पाठकों को एक साथ नामवर सिंह की छह किताबें उपलब्ध है । नामवर सिंह के अलावा एक और आलोचक नंदकिशोर नवल की कविता की किताब प्रकाशित है जिन्होंने सियाराम तिवारी के साथ संयुक्त रूप से प्रकाशन संस्थान ने द्वाभा के नाम से छापा है । नंदकिशोर नवल की आलोचनात्मक दृष्टि और उनका काम उल्लेखनीय है लेकिन मन के कोने अंतरे में कवि होने की लालसा उन्हें बार-बार कविता संग्रह छपवाने की ओर प्रेरित करती है । विश्व पुस्तक मेले के मौके पर जो एक बेहद विस्फोटक किताब प्रकाशित हुई है वह है इंदौर की लेखिका कृष्णा अग्निहोत्री की । सामयिक प्रकाशन, दिल्ली से कृष्णा अग्निहोत्री की आत्मकथा दो खंडो में प्रकाशित हुई है - लगता नहीं है दिल मेरा तथा और...और...औरत । कृष्णा अग्निहोत्री अपने जमाने की बेहद खूबसूरत और बिंदास लेखिका थी । अपनी इस आत्मकथा में उन्होंने दिल्ली के साहित्यकारों-संपादकों के साथ अपने हर तरह के रिश्तों पर बेहद बेबाकी और साहसपूर्वक लिखा है । कृष्णा जी जिस तरह स्वभाव से विंदास थी वही बिंदासपना इस आत्मकथा में भी रेखांकित की जा सकती है । इसमें स्त्री लेखिका और पुरुष लेखक के संबंधों का जो द्वंद या फिर छल-छद्म है उससे एक बारगी साहित्य जगत में हड़कंप मचना तय है । हिंदी में लेखक-लेखिका संबंधों पर कलम की जगह तलवार लेकर लिखनेवाली कुछ लेखिकाओं को इस किताब से एक नई जीवनी शक्ति मिलेगी और वो फिर से पुरुषों को कठघरे में खड़ा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगी । इन किताबों के अलावा कई प्रकाशकों ने साहित्य से इतर हटकर बेहद उल्लेखनीय किताबें प्रकाशित की है । वाणी प्रकाशन ने अमेरिकी अर्थशास्त्री पॉल कुर्गमैन की किताब का पत्रकार अरविंद मोहन से अनुवाद करवाया है । मंदी के दौर में यह एक अहम किताब साबित होगी । लेकिन किताबों के अलावा जो सबसे बड़ा और अहम सवाल है वो यह कि क्या इस पुस्तक मेले को पाठक तवज्जो देंगे । क्या एनबीटी पाठकों के बीच बाकी बचे दिनों में उत्साह पैदा करने में कामयाब हो पाएगी । अगर ऐसा होता है तो प्रकाशक लेखक के लिए संतोष की बात होगी लेकिन अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो विश्व पुस्तक मेले के औचित्य के साथ-साथ एनबीटी के कर्ता-धर्ताओं पर भी बड़ा प्रश्न चिन्ह लगेगा ।
Monday, January 18, 2010
नदियों के गुनहगार
नदियों के गुनहगार
पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश कहते हैं कि गंगा इतनी मैली है इस बात का अंदाजा उन्हें नहीं है । क्या उन्होंने ये जुमले भी नहीं सुने कि गंगा मैली हो रही है, गंगा रास्ता बदल रही है, गंगा के किनारों का कटाव हो रहा है , गंगा को बचाना है, गंगा को बचाने के लिए सरकारी स्तर प्रयास किए जा रहे हैं । ये ऐसे जुमले हैं जो वर्षों से सुर्खियां बन रहे हैं लेकिन हालात में कोई बदलाव नहीं आता दिख रहा है । गंगा नदी से देश की आबादी का बड़ा हिस्सा जुडा़ है और वही आबादी उसे बरबाद करने पर तुली है । जाने या अनजाने लोग गंगा को कूड़ेदान की तरह इस्तेमाल करते हैं और व्यक्तिगत और औद्योगिक कचड़े का एक बड़ा हिस्सा गंगा में प्रवाहित कर देते हैं । यही हालत देश की राजधानी से गुरनेवाली नदी यमुना की भी है बल्कि यों कहें कि यहां तो हालत और भी बदतर है । नब्बे के दशक के शुरुआती वर्षों में जब दिल्ली आया था तो यमुना में कुछ पानी होता था और कहीं -कहीं साफ पानी के भी दर्शन हो जाते थे लेकिन दो दशकों में यमुना पूरे तरीके से गंदे नाले में तब्दील हो गई है ।
हालात बदतर होते देख प्रधानमंत्री ने भी इसपर चिंता जताई और गंगा को बचाने के लिए सरकारी स्तर पर भी ठोस उपाय करने के इरादों का इजहार किया । इसी तर्ज पर दिल्ली सरकार ने एक बार फिर यमुना का उद्धार करने की योजना बनाई है । सरकारी स्तर पर नदियों को बचाने के लिए सत्तर के दशक में भी एक मुहिम शुरू हुई थी और उन्नीस सौ चौहत्तर में पर्यावरण संरक्षण कानून और जल ( प्रदूषण और रोकथाम ) कानून बनाया गया था । इस कानून में नदियों को गंदा करने और उसके स्वरूप में बदलाव लाने की कोशिशों को रोकने के लिए दंड का प्रावधान किया था । इस कानून की धाराओं के मुताबिक नदियों के पानी को प्रदूषित करनेवाले को अठारह महीने से छह साल तक की सजा का प्रावधान किया गया था । लेकिन इस कानून के बनने के पच्चीस साल बाद भी किसी को उसके तहत सजा हुई हो और उसे जेल भेजा गया हो ऐसा ज्ञात नहीं है । यह कानून सिर्फ सरकारी अधिकारियों की कमाई का एक जरिया बनकर रह गया है । होता यह है कि सरकारी अधिकारी यह मानकर चलते हैं कि यह कानून सिर्फ प्रदूषण फैलानेवाले फैक्ट्रियों पर लागू होता है और वहां वो सजा का भय दिखाकर मोटी कमाई करते हैं ।
इस कानून के अंतर्गत आम जनता को भी सजा हो सकती है । ऐसे किसी भी शहर में जाइये जहां से कोई नदी गुजर रही हो और आप उसके पुल पर पांच मिनट खड़े हो जाइये, आपको कई भक्त ऐसे मिलेंगे जो पॉलीबैग में फूल,धूप, अगरबत्ती और अन्य पूजा का सामान प्रवाहित करते नजर आ जाएंगे । चाहे वो दिल्ली का निजामुद्दीन पुल हो, लखनऊ में गोमती नदी पर बना लोहिया ब्रिज हो या फिर अयोध्या में राम की पैड़ी के पास का सरयू नदी का पुल हो, सरेआम कानून की धज्जियां उड़ाते लोग आपको नजर आएंगे । लेकिन कानून का पालन करवानेवालों को कानून का सरेआम उल्लंघन दिखाई नहीं देता । दिल्ली में तो हालात इतने बदतर हो गए कि लोगों को रोकने के लिए सरकार ने निजामुद्दीन पुल पर लोहे का पच्चीस फुट उंचा जाल लगवाया । लेकिन फिर भी लोग कहां मानने वाले कहीं जाली तोड़ दी गई तो कहीं उस जाल के उपर से गंदा फेंकने की कोशिश की गई । नतीजा यह हुआ कि जो पुल साफ सुथरा दिखता था वह बेहद गंदा और बदसूरत दिखने लगा ।
नदियों को बचाने की सरकारी नीति और कानून बनाकर इसे नहीं बचाया जा सकता है, जरूरत इस बात की है कि लोगों को जागरूक किया जाए और उन्हें उनके कृत्य से होनेवाले खतरों से आगाह करने की मुहिम चलाई जाए । कानून तो सिर्फ एक हथियार हो सकता है जिससे नासमझ लोगों को डराकर इस प्रवृति को रोका जा सके, ताकि आनेवाली पीढियां हमें नदियों के गुनहगार के तौर पर याद ना करें
पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश कहते हैं कि गंगा इतनी मैली है इस बात का अंदाजा उन्हें नहीं है । क्या उन्होंने ये जुमले भी नहीं सुने कि गंगा मैली हो रही है, गंगा रास्ता बदल रही है, गंगा के किनारों का कटाव हो रहा है , गंगा को बचाना है, गंगा को बचाने के लिए सरकारी स्तर प्रयास किए जा रहे हैं । ये ऐसे जुमले हैं जो वर्षों से सुर्खियां बन रहे हैं लेकिन हालात में कोई बदलाव नहीं आता दिख रहा है । गंगा नदी से देश की आबादी का बड़ा हिस्सा जुडा़ है और वही आबादी उसे बरबाद करने पर तुली है । जाने या अनजाने लोग गंगा को कूड़ेदान की तरह इस्तेमाल करते हैं और व्यक्तिगत और औद्योगिक कचड़े का एक बड़ा हिस्सा गंगा में प्रवाहित कर देते हैं । यही हालत देश की राजधानी से गुरनेवाली नदी यमुना की भी है बल्कि यों कहें कि यहां तो हालत और भी बदतर है । नब्बे के दशक के शुरुआती वर्षों में जब दिल्ली आया था तो यमुना में कुछ पानी होता था और कहीं -कहीं साफ पानी के भी दर्शन हो जाते थे लेकिन दो दशकों में यमुना पूरे तरीके से गंदे नाले में तब्दील हो गई है ।
हालात बदतर होते देख प्रधानमंत्री ने भी इसपर चिंता जताई और गंगा को बचाने के लिए सरकारी स्तर पर भी ठोस उपाय करने के इरादों का इजहार किया । इसी तर्ज पर दिल्ली सरकार ने एक बार फिर यमुना का उद्धार करने की योजना बनाई है । सरकारी स्तर पर नदियों को बचाने के लिए सत्तर के दशक में भी एक मुहिम शुरू हुई थी और उन्नीस सौ चौहत्तर में पर्यावरण संरक्षण कानून और जल ( प्रदूषण और रोकथाम ) कानून बनाया गया था । इस कानून में नदियों को गंदा करने और उसके स्वरूप में बदलाव लाने की कोशिशों को रोकने के लिए दंड का प्रावधान किया था । इस कानून की धाराओं के मुताबिक नदियों के पानी को प्रदूषित करनेवाले को अठारह महीने से छह साल तक की सजा का प्रावधान किया गया था । लेकिन इस कानून के बनने के पच्चीस साल बाद भी किसी को उसके तहत सजा हुई हो और उसे जेल भेजा गया हो ऐसा ज्ञात नहीं है । यह कानून सिर्फ सरकारी अधिकारियों की कमाई का एक जरिया बनकर रह गया है । होता यह है कि सरकारी अधिकारी यह मानकर चलते हैं कि यह कानून सिर्फ प्रदूषण फैलानेवाले फैक्ट्रियों पर लागू होता है और वहां वो सजा का भय दिखाकर मोटी कमाई करते हैं ।
इस कानून के अंतर्गत आम जनता को भी सजा हो सकती है । ऐसे किसी भी शहर में जाइये जहां से कोई नदी गुजर रही हो और आप उसके पुल पर पांच मिनट खड़े हो जाइये, आपको कई भक्त ऐसे मिलेंगे जो पॉलीबैग में फूल,धूप, अगरबत्ती और अन्य पूजा का सामान प्रवाहित करते नजर आ जाएंगे । चाहे वो दिल्ली का निजामुद्दीन पुल हो, लखनऊ में गोमती नदी पर बना लोहिया ब्रिज हो या फिर अयोध्या में राम की पैड़ी के पास का सरयू नदी का पुल हो, सरेआम कानून की धज्जियां उड़ाते लोग आपको नजर आएंगे । लेकिन कानून का पालन करवानेवालों को कानून का सरेआम उल्लंघन दिखाई नहीं देता । दिल्ली में तो हालात इतने बदतर हो गए कि लोगों को रोकने के लिए सरकार ने निजामुद्दीन पुल पर लोहे का पच्चीस फुट उंचा जाल लगवाया । लेकिन फिर भी लोग कहां मानने वाले कहीं जाली तोड़ दी गई तो कहीं उस जाल के उपर से गंदा फेंकने की कोशिश की गई । नतीजा यह हुआ कि जो पुल साफ सुथरा दिखता था वह बेहद गंदा और बदसूरत दिखने लगा ।
नदियों को बचाने की सरकारी नीति और कानून बनाकर इसे नहीं बचाया जा सकता है, जरूरत इस बात की है कि लोगों को जागरूक किया जाए और उन्हें उनके कृत्य से होनेवाले खतरों से आगाह करने की मुहिम चलाई जाए । कानून तो सिर्फ एक हथियार हो सकता है जिससे नासमझ लोगों को डराकर इस प्रवृति को रोका जा सके, ताकि आनेवाली पीढियां हमें नदियों के गुनहगार के तौर पर याद ना करें
Thursday, January 14, 2010
गैर जिम्मेदार पत्रकारिता की हद
तेलंगाना की आग में जल रहे आंध्र प्रदेश में एक खबर ने फिर से आग लगा दी। सूबे के एक स्थानीय न्यूज चैनल ने चार महीने पहले रूस की एक वेबवसाइट पर प्रकाशित खबर को उठाकर अचानक से चलाना शुरू कर दिया। सिर्फ खबर ही नहीं चलाई बल्कि उसपर स्टूडियो में तीन चार लोगों को बिठाकर चर्चा भी शुरू कर दी । कहने का तात्पर्य यह कि उक्त खबर को बड़े स्तर पर चलाया जाने लगा । खबर यह थी कि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी की मौत एक हादसा नहीं बल्कि एक वृहत्तर षडयंत्र का हिस्सा थी । न्यूज चैनल की खबर के मुताबिक इस षडयंत्र में देश का एक बड़ा औद्योगिक घराना शामिल था । जैसे ही इस खबर का प्रसारण शुरू हुआ आंध्र प्रदेश के कई इलाकों में हड़कंप मच गया । वाई एस राजशेखर रेड्डी के समर्थक सड़कों पर उतर आए और कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन का आगाज हो गया । कुछ ही घंटों में लोगों का गुस्सा उबाल खाने लगा और उस खबर में जिस औद्योगिक प्रतिष्ठान को षडयंत्र के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा था उसके प्रतिष्ठानों पर हमले होने लगे । जबतक सरकारी मशीनरी चेतती तब तक कई शहरों में आगजनी शुरू हो गई । उस स्थानीय चैनल की देखादेखी दो और लोकल चैनलों ने भी इस खबर को प्रसारित करना शुरू कर दिया जिसने गुस्से की आग में घी की तरह काम किया, जिससे बवाल और बढ गया । लेकिन बगैर किसी तरह की जांच पड़ताल के चलाई जा रही इस खबर की आग में पत्रकारिता के तमाम स्थापित मूल्य और मान्यताएं भी जलकर खाक हो गए । एक अनाम सी बेवसाइट पर छपी लगभग चार महीने पुरानी अफवाह को उठाकर खबर की तरह पेश कर एक सूबे को आग में झोंकने की जितनी भी निंदा की जाए कम है । किसी ने भी इस खबर को जांचने और संबंधित पक्ष से बात करने की कोशिश नहीं की । बगैर किसी पक्ष से कोई प्रतिक्रिया लिए इतना बड़ा आरोप लगा देना पत्रकारिता के सिद्धांत के खिलाफ है, जिसकी जमकर निंदा की जानी चाहिए । किसी बेवसाइट की कल्पना को जस का तस उठाकर उससे खबर बनाकर घंटो प्रसारित करने से सूबे में कानून व्यवस्था की समस्या पैदा हो गई । इसके अलावा उस औद्योगिक घराने की प्रतिष्ठा पर भी इससे आंच आई ।
किसी न्यूज चैनल की गैरजिम्मेदाराना खबर के प्रसारण का यह पहला मौका नहीं है । अब से लगभग दो साल पहले दिल्ली में एक राष्ट्रीय चैनल ने भी इस तरह की एक खबर दिखाकर सनसनी फैला दी थी । उस चैनल ने दिल्ली की एक स्कूल की शिक्षिका पर स्टिंग के जरिए उसके सेक्स ट्रेड में शामिल होने की खबर प्रसारित की थी । उस वक्त भी खबर के प्रसारण के साथ ही राजधानी दिल्ली में जबरदस्त हंगामा और आगजनी हुई थी। उत्तेजित भीड़ ने उस स्कूल में घुसकर जमकर तोड़फोड़ की थी और दबाव में आई पुलिस ने शिक्षिका को गिरफ्तार कर लिया था। आनन-फानन में दिल्ली सरकार भी हरकत में आई थी और उस शिक्षिका को नौकरी से हटाने का एलान कर दिया था। बाद में हुई जांच में शिक्षिका पर लगे तमाम आरोप निराधार पाए गए थे । कोर्ट में पहुंचे इस मामले के बाद भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने उक्त चैनल के प्रसारण पर तीन हफ्ते का प्रतिबंध भी लगा था । इन दो वाकयों के अलावा झारखंड की राजधानी से प्रसारित होनेवाले एक लोकल चैनल के संपादक को ब्लैकमेलिंग के आरोप में जेल भी जाना पड़ा था।
इस तरह की गैर जिम्मेदार पत्रकारिता ने एक साथ कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या किसी भी न्यूज चैनल को बगैर खबरों की जांच किए उसे प्रसारित करने का अधिकार है। क्या उस न्यूज चैनल के संपादक को इस खबर की पड़ताल नहीं करनी चाहिए थी । खबरों के बाद मचनेवाले बवाल और सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की जिम्मेदारी किसकी है। किसी के चरित्र हनन का जिम्मेदार कौन है। क्या भारत सरकार को इसपर काबू करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाना चाहिए । क्या इन चैनलों को लाइसेंस देने के पहले उसे ठोक बजाकर देखा जाता है । टीवी न्यूज चैनलों पर भारत सरकार एक गाइडलाइन बनाकर लगाम लगाने की हर मुमकिन कोशिश कर रही है । इस माहौल में इस तरह की घटिया हरकतें सरकार के हाथ में प्रेस की आजादी पर लगाम लगाने का औजार मुहैया कराती है । सरकार के इस कदम का पत्रकारों के संगठन लगातार और पुरजोर विरोध कर रहे हैं, उनकी इस मुहिम को इस तरह की घटनाओं से झटका भी लगता है ।
भारत में प्रेस और मीडिया को लोकतंत्र का प्रहरी माना जाता है और उसकी स्वतंत्रता के लिए सभी लोग सजग भी रहते हैं । लॉर्ड डेनिंग ने अपनी प्रसिद्ध किताब रोड टू जस्टिस में कहा है कि प्रेस एक वॉचडॉग है । उसकी जिम्मेदारी है कि वो यह देखे कि हर काम सही तरीके से बगैर किसी दबाव और पक्षपात के हो रहा है। लेकिन कभी कभार यह वॉचडॉग अपनी सीमाओं से आगे चला जाता है जिसके लिए इसे दंडित करना आवश्यक है। भारत के संविधान में प्रेस की आजादी के लिए अलग से कोई प्रावधान नहीं है वह भी राइट टू फ्रीडम ऑफ स्पीच और एक्सप्रेशन के अंतर्गत ही आता है। संविधान में अभिव्यक्ति की यह स्वतंत्रता असीमित नहीं है । संविधान में इस पर अंकुश लगाने और इसके बेजा इस्तेमाल को रोकने का भी प्रावधान है । हमारे संविधान की अनुच्छेद उन्नीस दो में अभिव्यक्ति की आजादी पर कई वंदिशें भी है । उसके अनुसार अगर इससे देश की सुरक्षा को खतरा उत्पन्न होता है, समाज में अशांति फैलती है, कानून व्यवस्था भंग होती है, देश की किसी भी अदालत की अवमानना होती है या फिर किसी की अभिव्यक्ति की आजादी से दूसरे व्यक्ति की मानहानि होती है या फिर उससे कोई भी व्यक्ति या समूह को अपराध के लिए प्रवृत्त होता है तो उस स्थिति में अभिव्यक्ति की आजादी की इजाजत नहीं दी जा सकती है। आंध्र प्रदेश के न्यूज चैनल ने जिस तरह की खबर प्रसारित की उससे समाज में अशांति भी फैली, किसी व्यक्ति और संस्था की मानहानि भी हुई और उस खबर के असर में लोगों ने कानून भी तोड़ा । इस वजह से भी उक्त न्यूज चैनल के खिलाफ आपराधिक मामला बनता है । इसकी सजा तो उस न्यूज चैनल को हर हाल में मिलनी चाहिए ताकि प्रेस और मीडिया की निष्पक्षता पर कोई सवाल खड़ा ना हो । साथ ही भविष्य में कोई भी चैनल इस तरह की खबरों को ना दिखाए जिससे की मीडिया की विश्वसनीयता पर गंभीर संकट खडा़ हो जाए ।
लेकिन बड़ा सवाल अब भी मुंह बाए खड़ा है कि इस तरह की हरकतों को रोकने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं। देश में न्यूज चैनलों की बाढ़ आई हुई है और एक अनुमान के मुताबिक इस वक्त देशभर में लगभग पांच सौ के करीब न्यूज चैनल या तो चल रहे हैं या फिर प्रसारण की तैयारी कर रहे हैं। पत्रकारिता के इस पेशे में ऐसे भी लोग आ रहे हैं जिन्हें ना तो पत्रकारिता की गौरवशाली परंपरा का एहसास है और ना ही उसकी पवित्रता को लेकर कोई प्रतिबद्धता । कोई ठेकेदार है तो कोई बिल्डर तो कोई राजनेता खबरों के इस धंधे में शामिल हो रहा है। उनकी मंशा साफ नहीं है । वो अपने लाभ लोभ के लिए इस धंधे में आ रहे हैं । समाज या फिर उसकी बेहतरी से उनका कोई लेना देना नहीं है ।
देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने के लिए प्रेस और मीडिया की आजादी बेहद आवश्यक है । और मीडिया ने इसे साबित भी किया है । ओर जब देशभर में रुचिका को इंसाफ दिलाने के मामले में न्यूज चैनलों और अखबारों की भूमिका की प्रशंसा हो रही है और लोग यह कह रहे हैं कि अगर मीडिया नहीं होती तो राठौर जैसा शक्तिशाली वयक्ति गुनाह कर बच निकलता । वहीं दूसरी ओर आंध्र प्रदेश जैसी घटनाएं मीडिया को शर्मसार करती है जिससे कानून तो निबटेगा ही लेकिन इस तरह के लोगों को चिन्हित करना और उन्हें मीडिया की जमात से बाहर करवाने की महिम चलाना भी मीडिया से जुड़े तमाम संगठनों का काम है ताकि उसकी साख बची रह सके ।
किसी न्यूज चैनल की गैरजिम्मेदाराना खबर के प्रसारण का यह पहला मौका नहीं है । अब से लगभग दो साल पहले दिल्ली में एक राष्ट्रीय चैनल ने भी इस तरह की एक खबर दिखाकर सनसनी फैला दी थी । उस चैनल ने दिल्ली की एक स्कूल की शिक्षिका पर स्टिंग के जरिए उसके सेक्स ट्रेड में शामिल होने की खबर प्रसारित की थी । उस वक्त भी खबर के प्रसारण के साथ ही राजधानी दिल्ली में जबरदस्त हंगामा और आगजनी हुई थी। उत्तेजित भीड़ ने उस स्कूल में घुसकर जमकर तोड़फोड़ की थी और दबाव में आई पुलिस ने शिक्षिका को गिरफ्तार कर लिया था। आनन-फानन में दिल्ली सरकार भी हरकत में आई थी और उस शिक्षिका को नौकरी से हटाने का एलान कर दिया था। बाद में हुई जांच में शिक्षिका पर लगे तमाम आरोप निराधार पाए गए थे । कोर्ट में पहुंचे इस मामले के बाद भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने उक्त चैनल के प्रसारण पर तीन हफ्ते का प्रतिबंध भी लगा था । इन दो वाकयों के अलावा झारखंड की राजधानी से प्रसारित होनेवाले एक लोकल चैनल के संपादक को ब्लैकमेलिंग के आरोप में जेल भी जाना पड़ा था।
इस तरह की गैर जिम्मेदार पत्रकारिता ने एक साथ कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या किसी भी न्यूज चैनल को बगैर खबरों की जांच किए उसे प्रसारित करने का अधिकार है। क्या उस न्यूज चैनल के संपादक को इस खबर की पड़ताल नहीं करनी चाहिए थी । खबरों के बाद मचनेवाले बवाल और सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की जिम्मेदारी किसकी है। किसी के चरित्र हनन का जिम्मेदार कौन है। क्या भारत सरकार को इसपर काबू करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाना चाहिए । क्या इन चैनलों को लाइसेंस देने के पहले उसे ठोक बजाकर देखा जाता है । टीवी न्यूज चैनलों पर भारत सरकार एक गाइडलाइन बनाकर लगाम लगाने की हर मुमकिन कोशिश कर रही है । इस माहौल में इस तरह की घटिया हरकतें सरकार के हाथ में प्रेस की आजादी पर लगाम लगाने का औजार मुहैया कराती है । सरकार के इस कदम का पत्रकारों के संगठन लगातार और पुरजोर विरोध कर रहे हैं, उनकी इस मुहिम को इस तरह की घटनाओं से झटका भी लगता है ।
भारत में प्रेस और मीडिया को लोकतंत्र का प्रहरी माना जाता है और उसकी स्वतंत्रता के लिए सभी लोग सजग भी रहते हैं । लॉर्ड डेनिंग ने अपनी प्रसिद्ध किताब रोड टू जस्टिस में कहा है कि प्रेस एक वॉचडॉग है । उसकी जिम्मेदारी है कि वो यह देखे कि हर काम सही तरीके से बगैर किसी दबाव और पक्षपात के हो रहा है। लेकिन कभी कभार यह वॉचडॉग अपनी सीमाओं से आगे चला जाता है जिसके लिए इसे दंडित करना आवश्यक है। भारत के संविधान में प्रेस की आजादी के लिए अलग से कोई प्रावधान नहीं है वह भी राइट टू फ्रीडम ऑफ स्पीच और एक्सप्रेशन के अंतर्गत ही आता है। संविधान में अभिव्यक्ति की यह स्वतंत्रता असीमित नहीं है । संविधान में इस पर अंकुश लगाने और इसके बेजा इस्तेमाल को रोकने का भी प्रावधान है । हमारे संविधान की अनुच्छेद उन्नीस दो में अभिव्यक्ति की आजादी पर कई वंदिशें भी है । उसके अनुसार अगर इससे देश की सुरक्षा को खतरा उत्पन्न होता है, समाज में अशांति फैलती है, कानून व्यवस्था भंग होती है, देश की किसी भी अदालत की अवमानना होती है या फिर किसी की अभिव्यक्ति की आजादी से दूसरे व्यक्ति की मानहानि होती है या फिर उससे कोई भी व्यक्ति या समूह को अपराध के लिए प्रवृत्त होता है तो उस स्थिति में अभिव्यक्ति की आजादी की इजाजत नहीं दी जा सकती है। आंध्र प्रदेश के न्यूज चैनल ने जिस तरह की खबर प्रसारित की उससे समाज में अशांति भी फैली, किसी व्यक्ति और संस्था की मानहानि भी हुई और उस खबर के असर में लोगों ने कानून भी तोड़ा । इस वजह से भी उक्त न्यूज चैनल के खिलाफ आपराधिक मामला बनता है । इसकी सजा तो उस न्यूज चैनल को हर हाल में मिलनी चाहिए ताकि प्रेस और मीडिया की निष्पक्षता पर कोई सवाल खड़ा ना हो । साथ ही भविष्य में कोई भी चैनल इस तरह की खबरों को ना दिखाए जिससे की मीडिया की विश्वसनीयता पर गंभीर संकट खडा़ हो जाए ।
लेकिन बड़ा सवाल अब भी मुंह बाए खड़ा है कि इस तरह की हरकतों को रोकने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं। देश में न्यूज चैनलों की बाढ़ आई हुई है और एक अनुमान के मुताबिक इस वक्त देशभर में लगभग पांच सौ के करीब न्यूज चैनल या तो चल रहे हैं या फिर प्रसारण की तैयारी कर रहे हैं। पत्रकारिता के इस पेशे में ऐसे भी लोग आ रहे हैं जिन्हें ना तो पत्रकारिता की गौरवशाली परंपरा का एहसास है और ना ही उसकी पवित्रता को लेकर कोई प्रतिबद्धता । कोई ठेकेदार है तो कोई बिल्डर तो कोई राजनेता खबरों के इस धंधे में शामिल हो रहा है। उनकी मंशा साफ नहीं है । वो अपने लाभ लोभ के लिए इस धंधे में आ रहे हैं । समाज या फिर उसकी बेहतरी से उनका कोई लेना देना नहीं है ।
देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने के लिए प्रेस और मीडिया की आजादी बेहद आवश्यक है । और मीडिया ने इसे साबित भी किया है । ओर जब देशभर में रुचिका को इंसाफ दिलाने के मामले में न्यूज चैनलों और अखबारों की भूमिका की प्रशंसा हो रही है और लोग यह कह रहे हैं कि अगर मीडिया नहीं होती तो राठौर जैसा शक्तिशाली वयक्ति गुनाह कर बच निकलता । वहीं दूसरी ओर आंध्र प्रदेश जैसी घटनाएं मीडिया को शर्मसार करती है जिससे कानून तो निबटेगा ही लेकिन इस तरह के लोगों को चिन्हित करना और उन्हें मीडिया की जमात से बाहर करवाने की महिम चलाना भी मीडिया से जुड़े तमाम संगठनों का काम है ताकि उसकी साख बची रह सके ।
Thursday, January 7, 2010
गरीबों की भी सुन लो
इन दिनों राजस्थान से गरीबों और दलितों को लेकर कुछ चिंताजनक खबरें आ रही हैं । तकरीबन पखवाड़े भर पहले जयपुर के पास केंद्र सरकार की पसंदीदा स्कीम नरेगा में दलितों के साथ भेदभाव की बात सामने आई । आरोप यह लगा कि नरेगा में दलितों को उनके गांव से कई किलोमीटर दूर काम दिया जा रहा है । इस वजह से गरीब दलित परिवारों को इस योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है । दूसरी खबर राजस्थान के ही चित्तौड़गढ़ से आई कि नरेगा में मेहनताना मिलने में हो रही देरी और काम ना मिल पाने की वजह से एक व्यक्ति भुखमरी का शिकार हो गया । आजादी के साठ साल से भी ज्यादा बीत जाने के बाद भी इस तरह की घटनाएं लोकतंत्र को शर्मसार करती हैं । ये दोनों ही वाकए राहुल गांधी के पसंदीदा कार्यक्रम नरेगा से जुड़े हैं । नरेगा को देशभर में लागू करने की जिम्मेदारी भी राहुल के ही पसंदीदा मंत्री सीपी जोशी पर है और सूबे में कांग्रेस की सरकार है जिसके मुखिया अशोक गहलोत हैं । लेकिन बात सिर्फ राजस्थान की नहीं है ऐसी ही खबरें झारखंड और उड़ीसा से भी आ रही हैं । यहां सवाल यह उठता है कि क्या हम हमारा समाज और हमारी सरकार गरीबों पर समुचित ध्यान दे रही है । क्या गरीबी दूर करने के ठोस उपाय किए जा रहे हैं ।
दरअसल हो ये रहा है कि हमारा देश पूंजीवाद और उपभोक्तवाद की राह पर बेहद तेजी से बढ़ रहा हैं और इस राह को चुननेवाली सरकार अपनी इस तेजी में लोगों के प्रति जो सामाजिक जिम्मेदारियां हैं उससे दूर होते जा रही है । गरीबों को अनाज उपलब्ध करने में नाकाम रहनेवाली सरकार अब आम जनता को पानी भी मुफ्त में नहीं देना चाहती । आम आदमी के लिए काम करने का दंभ भरनेवाली दिल्ली की कांग्रेसी सरकार ने तो यह व्यवस्था लागू भी कर दी । जिस देश में लोग भूख से मर रहे हैं वहां सरकार पानी के दाम वसूल कर पानी पीकर जिंदा रहने के अधिकार से भी उसे महरूम कर देना चाहती है । योजनाबद्ध तरीके से गरीबों और किसानों को खाद बीज और अन्य सामनों पर सब्सिडी खत्म कर रही है । दूसरी तरफ उद्योग और उद्योगपतियों को सस्ती दरों पर जमीन और करों में छूट दिया जा रहा है । उद्योग और उद्योगपतियों को छूट देना गलत नहीं है लेकिन मापदंड जब दो हो जाते हैं तो सरकार की नीयत पर सवाल खड़े हो जाते हैं । दस हजार रुपये की कृषि ऋण वसूली के लिए सरकारी अफसर किसानों के घर तक जब्त करने में नहीं हिचकिचाते जबकि उद्योगपतियों से करोड़ों रुपये की ऋण वसूलने के लिए कुछ नहीं कर पाते हैं ।
बहुत दिनों से यह सुन रहा हूं कि भारत और इंडिया के बीच की खाई बढ़ती जा रही है लेकिन अब यह खाई इतनी गहरा गई है कि समाज का एक वर्ग ऐसा है जो यह कहता है कि गरीबी तो नैचुरल फैनोमिना है जिससे निबटना सरकार का काम नहीं है, खुद उस वयक्ति को इस फैनोमिना से निबटना होगा । अगर वह गरीब रहना चाहता है तो कोई भी उसकी मदद नहीं कर पाएगा । ऐसी बातें कहनेवाली जो पीढ़ी है उसके लिए गरीबी तो एक शब्द मात्र है । उसने ना तो कभी गरीबी देखी और ना ही कभी गरीबी महसूस की । अगर आपको इस पीढ़ी को देखना हो तो किसी भी शॉपिंग मॉल के मेगा स्टोर में चले जाइए । कपड़ों और अपनी साज सज्जा पर बेतहाशा खर्च करनेवाले कई युवक –युवतियां नजर आ जाएंगें । जिनके लिए पैसे कोई मायने ही नहीं रखते । हमारे ताकतवर नेताओं, बेशुमार दौलत के मालिक उद्योगपतियों, प्राइवेट सेक्टर में शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारियों के लिए पैसा की कोई अहमियत ही नहीं है ।
इस देश का दुर्भाग्य है कि हमारे जो नीति नियंता हैं उन्हें भी गरीबों की फिक्र नहीं है । गरीबों की समस्याएं किसी के लिए चिंता का सबब नहीं बनती । उन्हें गरीबों और आम आदमी की याद सिर्फ चुनाव के वक्त आती है । गरीबों को सत्ता की सीढ़ी की तरह इंदिरा गांधी ने भी गरीबी हटाओ का इमोशनल नारा देकर इस्तेमाल किया था और फिर दशकों बाद कांग्रेस ने आम आदमी को लुभाकर सत्ता हासिल की । आम आदमी को साल भर में एक खास अवधि के लिए रोजगार मिले इसके लिए ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना लाया गया । इस बात का जोरशोर से प्रचार किया गया कि इस ऐतिहासिक योजना से भारत की गरीबी दूर हो जाएगी । कई चुनाव विश्लेषकों और पंडितों का यह दावा है कि यूपीए-2 की जीत के लिए यही योजना जिम्मेदार है । लेकिन इस योजना में जिस तरह की भयंकर गड़बड़ियों की शिकायतें मिल रही है, जिस पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा है उससे तो यही लगता है कि इस योजना का लाभ इसे लागू करनेवालों को ज्यादा हो रहा है । इसके प्रमाण राजस्थान से लेकर मध्यप्रदेश और झारखंड से लेकर उड़ीसा के किसी भी गांव में बगैर ढूंढे आपको मिल सकते हैं । जरूरत इस बात कि है कि देश के हुक्मरान गरीबों के लिए सिर्फ योजना ना बनाएं उसे गरीबों तक पहुंचाने के लिए प्रयास भी करें । दलितों के घर में रात बिताने से उनका उद्धार नहीं होगा, जरूरत इस बात कि देश का हर दलित और गरीब सम्मान के साथ जी सके इसका इंतजाम करने की सार्थक पहल होनी चाहिए ।
दरअसल हो ये रहा है कि हमारा देश पूंजीवाद और उपभोक्तवाद की राह पर बेहद तेजी से बढ़ रहा हैं और इस राह को चुननेवाली सरकार अपनी इस तेजी में लोगों के प्रति जो सामाजिक जिम्मेदारियां हैं उससे दूर होते जा रही है । गरीबों को अनाज उपलब्ध करने में नाकाम रहनेवाली सरकार अब आम जनता को पानी भी मुफ्त में नहीं देना चाहती । आम आदमी के लिए काम करने का दंभ भरनेवाली दिल्ली की कांग्रेसी सरकार ने तो यह व्यवस्था लागू भी कर दी । जिस देश में लोग भूख से मर रहे हैं वहां सरकार पानी के दाम वसूल कर पानी पीकर जिंदा रहने के अधिकार से भी उसे महरूम कर देना चाहती है । योजनाबद्ध तरीके से गरीबों और किसानों को खाद बीज और अन्य सामनों पर सब्सिडी खत्म कर रही है । दूसरी तरफ उद्योग और उद्योगपतियों को सस्ती दरों पर जमीन और करों में छूट दिया जा रहा है । उद्योग और उद्योगपतियों को छूट देना गलत नहीं है लेकिन मापदंड जब दो हो जाते हैं तो सरकार की नीयत पर सवाल खड़े हो जाते हैं । दस हजार रुपये की कृषि ऋण वसूली के लिए सरकारी अफसर किसानों के घर तक जब्त करने में नहीं हिचकिचाते जबकि उद्योगपतियों से करोड़ों रुपये की ऋण वसूलने के लिए कुछ नहीं कर पाते हैं ।
बहुत दिनों से यह सुन रहा हूं कि भारत और इंडिया के बीच की खाई बढ़ती जा रही है लेकिन अब यह खाई इतनी गहरा गई है कि समाज का एक वर्ग ऐसा है जो यह कहता है कि गरीबी तो नैचुरल फैनोमिना है जिससे निबटना सरकार का काम नहीं है, खुद उस वयक्ति को इस फैनोमिना से निबटना होगा । अगर वह गरीब रहना चाहता है तो कोई भी उसकी मदद नहीं कर पाएगा । ऐसी बातें कहनेवाली जो पीढ़ी है उसके लिए गरीबी तो एक शब्द मात्र है । उसने ना तो कभी गरीबी देखी और ना ही कभी गरीबी महसूस की । अगर आपको इस पीढ़ी को देखना हो तो किसी भी शॉपिंग मॉल के मेगा स्टोर में चले जाइए । कपड़ों और अपनी साज सज्जा पर बेतहाशा खर्च करनेवाले कई युवक –युवतियां नजर आ जाएंगें । जिनके लिए पैसे कोई मायने ही नहीं रखते । हमारे ताकतवर नेताओं, बेशुमार दौलत के मालिक उद्योगपतियों, प्राइवेट सेक्टर में शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारियों के लिए पैसा की कोई अहमियत ही नहीं है ।
इस देश का दुर्भाग्य है कि हमारे जो नीति नियंता हैं उन्हें भी गरीबों की फिक्र नहीं है । गरीबों की समस्याएं किसी के लिए चिंता का सबब नहीं बनती । उन्हें गरीबों और आम आदमी की याद सिर्फ चुनाव के वक्त आती है । गरीबों को सत्ता की सीढ़ी की तरह इंदिरा गांधी ने भी गरीबी हटाओ का इमोशनल नारा देकर इस्तेमाल किया था और फिर दशकों बाद कांग्रेस ने आम आदमी को लुभाकर सत्ता हासिल की । आम आदमी को साल भर में एक खास अवधि के लिए रोजगार मिले इसके लिए ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना लाया गया । इस बात का जोरशोर से प्रचार किया गया कि इस ऐतिहासिक योजना से भारत की गरीबी दूर हो जाएगी । कई चुनाव विश्लेषकों और पंडितों का यह दावा है कि यूपीए-2 की जीत के लिए यही योजना जिम्मेदार है । लेकिन इस योजना में जिस तरह की भयंकर गड़बड़ियों की शिकायतें मिल रही है, जिस पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा है उससे तो यही लगता है कि इस योजना का लाभ इसे लागू करनेवालों को ज्यादा हो रहा है । इसके प्रमाण राजस्थान से लेकर मध्यप्रदेश और झारखंड से लेकर उड़ीसा के किसी भी गांव में बगैर ढूंढे आपको मिल सकते हैं । जरूरत इस बात कि है कि देश के हुक्मरान गरीबों के लिए सिर्फ योजना ना बनाएं उसे गरीबों तक पहुंचाने के लिए प्रयास भी करें । दलितों के घर में रात बिताने से उनका उद्धार नहीं होगा, जरूरत इस बात कि देश का हर दलित और गरीब सम्मान के साथ जी सके इसका इंतजाम करने की सार्थक पहल होनी चाहिए ।
Tuesday, January 5, 2010
मरने का तो हक दे दो
मुंबई के केईएम अस्पताल में छत्तीस साल से मौत की आगोश में सो रही अरुणा सौनवाग की वकील ने जब सुप्रीम कोर्ट में अपने क्लाइंट की ओर से इच्छामृत्यु की याचिका दायर की तो माननीय न्यायाधीशों ने उस याचिका को स्वीकार करने से इंकार कर दिया । जब अरुणा के वकील ने अपनी याचिका से इच्छामृत्यु शब्द को हटाकर उसकी जगह अपने मुवक्कलिल की मरनासन्न हालत का हवाला दिया और उसकी दवाएं रोकने की इजाजत मांगी तब जाकर याचिका सुनवाई के लिए स्वीकृत हुई । यह अपनी तरह का अकेला केस नहीं है । समय समय पर बारतीय न्यायपालिका के सामने इस तरह के केस आते रहे हैं । इन केसों का निबटारा भी होता रहा है लेकिन अभी तक हमारे देश में इच्छामृत्यु को कानूनी दर्जा प्राप्त नहीं हो सका है । जब भी इस तरह की कोई याचिका दायर होती है तो इच्छामृत्यु को लेकर राष्ट्रव्यापी बहस छिड़ जाती है । ठीक उसी तरह अरुणा सौनवाग की इस याचिका के स्वीकृत होने के बाद एक बार फिर से इच्छामृत्यु पर नए सिरे से बहस छिड़ गई है । हलांकि हम अगर देखें तो हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों में इच्छामृत्यु के कई उदाहरण मिलते हैं । सबसे बड़ा उदाहरण को महाभारत काल में भीष्म पितामह का ही । भीष्म पितामह ने जब मरना तय किया तो उस वक्त सूर्य दक्षिणायण था और सनातन धर्म के मुताबिक जब सूर्य दक्षिणायण हो तो उस वक्त प्राण त्यागना अच्छा नहीं माना जाता । इस धारमिक मान्यता को ध्यान में रखते हुए भीष्म पितामह ने मौत को वरण करने के पहले कई दिनों तक तीरों की शय्या पर अपनी मौत का इंतजार किया था । इसके अलावा जैन धर्म में तो इच्छामृत्यु की एक लंबी परंपरा रही है । साधुओं और साध्वियों के प्राणोत्सर्ग को एक उत्सव की तरह लिया जाता है और उसे धार्मिक मान्यता भी प्राप्त है । जैन धर्म के अनुयायी संथारा या सल्लेखना की इस प्रक्रिया को तपस्या की पराकाष्ठा मानते हैं । उनके मुताबिक अगर कोई जैन साधक या साध्वी अपने प्राण त्यागना चाहता है तो यह तपस्या का सबसे उच्च विंदु है और संथारा लेनेवाले को धर्म में अत्यधिक उच्च स्थान प्राप्त है । अभी-अभी प्रकाशित विलियम डेलरिंपल की किताब – नाइन लाइव्स में एक जैन साध्वी यह स्वीकार करती है कि सल्लेखना या मरना उनके लिए परम आनंददायक कर्म है ।
धर्म और धार्मिक मान्यताओं में इच्छामृत्यु या फिर मर्सी कीलिंग को तो एक तरीके से मान्यता प्राप्त है लेकिन भारतीय संविधान और कानून में इसको अबतक मान्यता नहीं मिल पाई है । इच्छामृत्यु के संबंध में कई मामले देश की अन्य अदालतों में आ चुके हैं, जिसपर माननीय न्यायधीशों ने संविधान के अनुसार फैसला सुनाया है । इस मामले में सबसे अहम जजमेंट ज्ञान कौर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया का जजमेंट है । सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इस मामले में फैसाल सुनाते हुए कहा था- संविधान की धारा इक्कीस में जीवित रहने के अधिकार में मौत का अधिकार समाहित नहीं है । ठीक उसी तरह सम्मानपूर्वक जीवित रहने का अधिकार सम्मानपूर्वक मरने का अधिकार नहीं देता । पांच जजों की पीठ ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए यह भी कहा था कि किसी को भी इस तरह की मौत देने के लिए एक कानून की जरूरत है, जो कि ऐसे मामलों पर ना केवल नियंत्रण रखे बल्कि उसपर नजर भी रखे । जाहिर है फैसला सुनाते समय जजों के दिमाग में इसके बेजा इस्तामाल पर रोक लगाने की बात रही होगी । सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद यह बात पूरी तरह साफ हो गई थी कि अगर कोई भी वयक्ति या परिवार अपने किसी रिश्तेदार को इच्छामृत्यु या मर्सी कीलिंग में मदद करता है तो उसके खिलाफ भारतीय दंड विधान की धारा तीन सौ नौ के तहत आत्महत्या करने के लिए उकसाने और मदद करने का आरोप लगेगा ।
लेकिन एक और केस में इच्छामृत्यु को आत्महत्या से अलग बताया गया है । जस्टिस लोढा ने नरेश मारुतराव शेखरे बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में अपने एक लैंडमार्क जजमेंट में इच्छामृत्यु को आत्महत्या से अलग करार दिया था । जस्टिस लोढ़ा के फैसले के मुताबिक आत्महत्या और मर्सी किलिंग दोनों अलग-अलग हैं । उनके मुताबिक आत्महत्या बगैर किसी के सहयोग के किया जानेवाला कृत्य है जिसमें मरनेवाला खुद अपनी जिंदगी खत्म करने का फैसला लेता है । वहीं इच्छामृत्यु या मर्सी कीलिंग में किसी के मरने का फैसला उसके परिवार के लोग या फिर नजदीकी रिश्तेदार डॉक्टरों की सलाह के आधार पर लेते हैं । यह दोनों अवधारणा तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर भी अलग-अलग हैं ।
लेकिन हाल के वर्षों में इच्छामृत्यु पर सरकार और न्यायपालिका भी थोड़ी नरम दिखाई पड़ने लगी है और उस दिशा में भी सोचविचार शुरू हो गया है । इस साल जनवरी में केरल लॉ रिफॉर्म कमीशन ने केरल टरमिनली इल पेशेंट्स ( मेडिकल ट्रीटमेंट एंड प्रोटेक्शन ऑफ प्रैक्टिशनर्श एंड पेशेंट्स ) बिल का प्रस्ताव किया । इस बिल में बेहद दयनीय हालत में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे गंभीर रूप से बीमार मरीजों, जिनके बचने की उम्मीद लगभग ना के बराबर हो और वो सिर्फ दवाओं और चिकत्सकीय उपकरणों के सहारे जीवित हों, को डॉक्टरों और रिश्तेदारों की सहमति से दवाएं रोककर और मेडिकल उपकरण हटाकर दयनीय जिंदगी से मुक्त करने की वकालत की गई है । केरल लॉ रिफॉर्म कमीशन के चेयरमैन और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज वी आर कृष्ण अय्यर इच्छामृत्यु की जोरदार वकालत करते नजर आते हैं और कहते हैं कि जीवन पवित्र है लेकिन असह्नीय दर्द और पीड़ा, जिससे छुटकारा की कोई उम्मीद नहीं, किसी के जीवित रहने पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा देता है । यहां जस्टिस अय्यर के विचारों से असहमत होने का कोई कारण नजर नहीं आता । अगर कोई गंभीर रूप से बीमार हो और जिंदगी और मौत के बीच झूलते हुए उसका बचना नामुमकिन हो तो उसके परिवार या रिश्तेदार को यह अधिकार होना चाहिए कि उसे मुक्त करने का फैसला लिया जा सके ।
लॉ कमीशन ऑफ इंडिया ने भी दो हजार आठ में अपनी रिपोर्ट में इच्छामृत्यु के पक्ष में अपनी राय जाहिर की थी । रिपोर्ट ने संविधान में प्रदत्त जीवित रहने के अधिकार की व्याख्या करते हुए कहा कि किसी भी वयक्ति की प्राकृतिक मौत तक उसे सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार है । इस की व्याख्या करते हुए लॉ कमीशन ने सम्मानपूर्वक जीने के अधिकार में सम्मानपूर्वक मरने के अधिकार को भी शामिल माना । लेकिन उस रिपोर्ट में यह बात साफ की गई थी कि इस अधिकार में अप्राकृतिक मौत कतई नहीं है । इसमें साफ तौर पर यह व्याख्यायित किया गया कि अगर कोई व्यक्ति बेहद बीमार है और उसके जीने की उम्मीद बिल्कुल क्षीण हो चुकी है, लेकिन मरने के पहले वो असह्नीय तकलीफ और दर्द से गुजर रहा है तो उसे इससे मुक्ति के लिए मौत की प्रक्रिया को तेज करने की इजाजत दी जा सकती है । क्योंकि यह प्रक्रिया किसी की जान लेना नहीं है बल्कि सिर्फ सम्मानपूर्नक मरने की प्रक्रिया का एक हिस्साभर है ।
इच्छामृत्यु पर ना केवल भारत बल्कि पूरे विश्व में बहस चलती ही रहती है । विदेशों में तो अब भी इस विषय पर गहन विचार-विमर्श जारी है । लेकिन अबतक सिर्फ नीदरलैंड में इच्छामृत्यु को कानूनी जामा पहनाया जा चुका है और वहां मर्सी कीलिंग कानूनन जायज है । नीदरलैंड में इस काम के लिए मौत के मुहाने पर खड़े मरीज का डॉक्टर एक अन्य डॉक्टर की मदद लेता है और गंभीर यंत्रणा झेल रहे मरीज को उसके परिवार या रिश्तेदार की सहमति के आदार पर जिंदगी से मुक्त कर देता है । चूंकि इस काम में डॉक्टरों की मदद ली जाती है इसलिए डॉक्टरों के इस कृत्य पर वहां विशेषज्ञों में दो राय है । एक वर्ग डॉक्टरों की यह कहकर आलोचना करता है कि यह डॉक्टरी पेशे के खिलाफ है । उनका तर्क है कि पेशा शुरू करने के पहले डॉक्टरों को एक शपथ दिलाई जाती है जिसमें उन्हें यह वादा करना पड़ता है कि – किसी को खुश करने के लिए मैं कोई ऐसी दवा नहीं लिखूंगा जिससे किसी मरीज की जान जाए या फिर कोई ऐसा काम नहीं करूंगा जो किसी मरीज की मौत का कारण बने । इस शपथ के आधार पर ही मर्सी कीलिंग में मददगार बबनेवाले डॉक्टरों की आलोचना होती है । तो यह एक ऐसा विषय है जो दुधारी तलवार की तरह है, जिसपर बेहद सावधानीपूर्व चलने की जररूत है । भारत में सरकार को चाहिए कि इस विषय पर एक ड्रॉफ्ट पेपर तैयार कर राष्ट्रव्यापी बहस करवाई जाए और जो कुछ ठोस निकले उसपर अमल किया जाए । क्योंकि अब हमारे यहां भी वक्त आ गया है कि इच्छामृत्यु पर सरकार कोई फैसला ले क्योंकि अरुणा सौनवाग जैसे कई मरीज सालों से अपनी मौत का इंतजार कर रहे हैं और उनके इस इंतजार में उनके रिश्तेदार भी हर रोज मर रहे हैं ।
धर्म और धार्मिक मान्यताओं में इच्छामृत्यु या फिर मर्सी कीलिंग को तो एक तरीके से मान्यता प्राप्त है लेकिन भारतीय संविधान और कानून में इसको अबतक मान्यता नहीं मिल पाई है । इच्छामृत्यु के संबंध में कई मामले देश की अन्य अदालतों में आ चुके हैं, जिसपर माननीय न्यायधीशों ने संविधान के अनुसार फैसला सुनाया है । इस मामले में सबसे अहम जजमेंट ज्ञान कौर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया का जजमेंट है । सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इस मामले में फैसाल सुनाते हुए कहा था- संविधान की धारा इक्कीस में जीवित रहने के अधिकार में मौत का अधिकार समाहित नहीं है । ठीक उसी तरह सम्मानपूर्वक जीवित रहने का अधिकार सम्मानपूर्वक मरने का अधिकार नहीं देता । पांच जजों की पीठ ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए यह भी कहा था कि किसी को भी इस तरह की मौत देने के लिए एक कानून की जरूरत है, जो कि ऐसे मामलों पर ना केवल नियंत्रण रखे बल्कि उसपर नजर भी रखे । जाहिर है फैसला सुनाते समय जजों के दिमाग में इसके बेजा इस्तामाल पर रोक लगाने की बात रही होगी । सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद यह बात पूरी तरह साफ हो गई थी कि अगर कोई भी वयक्ति या परिवार अपने किसी रिश्तेदार को इच्छामृत्यु या मर्सी कीलिंग में मदद करता है तो उसके खिलाफ भारतीय दंड विधान की धारा तीन सौ नौ के तहत आत्महत्या करने के लिए उकसाने और मदद करने का आरोप लगेगा ।
लेकिन एक और केस में इच्छामृत्यु को आत्महत्या से अलग बताया गया है । जस्टिस लोढा ने नरेश मारुतराव शेखरे बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में अपने एक लैंडमार्क जजमेंट में इच्छामृत्यु को आत्महत्या से अलग करार दिया था । जस्टिस लोढ़ा के फैसले के मुताबिक आत्महत्या और मर्सी किलिंग दोनों अलग-अलग हैं । उनके मुताबिक आत्महत्या बगैर किसी के सहयोग के किया जानेवाला कृत्य है जिसमें मरनेवाला खुद अपनी जिंदगी खत्म करने का फैसला लेता है । वहीं इच्छामृत्यु या मर्सी कीलिंग में किसी के मरने का फैसला उसके परिवार के लोग या फिर नजदीकी रिश्तेदार डॉक्टरों की सलाह के आधार पर लेते हैं । यह दोनों अवधारणा तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर भी अलग-अलग हैं ।
लेकिन हाल के वर्षों में इच्छामृत्यु पर सरकार और न्यायपालिका भी थोड़ी नरम दिखाई पड़ने लगी है और उस दिशा में भी सोचविचार शुरू हो गया है । इस साल जनवरी में केरल लॉ रिफॉर्म कमीशन ने केरल टरमिनली इल पेशेंट्स ( मेडिकल ट्रीटमेंट एंड प्रोटेक्शन ऑफ प्रैक्टिशनर्श एंड पेशेंट्स ) बिल का प्रस्ताव किया । इस बिल में बेहद दयनीय हालत में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे गंभीर रूप से बीमार मरीजों, जिनके बचने की उम्मीद लगभग ना के बराबर हो और वो सिर्फ दवाओं और चिकत्सकीय उपकरणों के सहारे जीवित हों, को डॉक्टरों और रिश्तेदारों की सहमति से दवाएं रोककर और मेडिकल उपकरण हटाकर दयनीय जिंदगी से मुक्त करने की वकालत की गई है । केरल लॉ रिफॉर्म कमीशन के चेयरमैन और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज वी आर कृष्ण अय्यर इच्छामृत्यु की जोरदार वकालत करते नजर आते हैं और कहते हैं कि जीवन पवित्र है लेकिन असह्नीय दर्द और पीड़ा, जिससे छुटकारा की कोई उम्मीद नहीं, किसी के जीवित रहने पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा देता है । यहां जस्टिस अय्यर के विचारों से असहमत होने का कोई कारण नजर नहीं आता । अगर कोई गंभीर रूप से बीमार हो और जिंदगी और मौत के बीच झूलते हुए उसका बचना नामुमकिन हो तो उसके परिवार या रिश्तेदार को यह अधिकार होना चाहिए कि उसे मुक्त करने का फैसला लिया जा सके ।
लॉ कमीशन ऑफ इंडिया ने भी दो हजार आठ में अपनी रिपोर्ट में इच्छामृत्यु के पक्ष में अपनी राय जाहिर की थी । रिपोर्ट ने संविधान में प्रदत्त जीवित रहने के अधिकार की व्याख्या करते हुए कहा कि किसी भी वयक्ति की प्राकृतिक मौत तक उसे सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार है । इस की व्याख्या करते हुए लॉ कमीशन ने सम्मानपूर्वक जीने के अधिकार में सम्मानपूर्वक मरने के अधिकार को भी शामिल माना । लेकिन उस रिपोर्ट में यह बात साफ की गई थी कि इस अधिकार में अप्राकृतिक मौत कतई नहीं है । इसमें साफ तौर पर यह व्याख्यायित किया गया कि अगर कोई व्यक्ति बेहद बीमार है और उसके जीने की उम्मीद बिल्कुल क्षीण हो चुकी है, लेकिन मरने के पहले वो असह्नीय तकलीफ और दर्द से गुजर रहा है तो उसे इससे मुक्ति के लिए मौत की प्रक्रिया को तेज करने की इजाजत दी जा सकती है । क्योंकि यह प्रक्रिया किसी की जान लेना नहीं है बल्कि सिर्फ सम्मानपूर्नक मरने की प्रक्रिया का एक हिस्साभर है ।
इच्छामृत्यु पर ना केवल भारत बल्कि पूरे विश्व में बहस चलती ही रहती है । विदेशों में तो अब भी इस विषय पर गहन विचार-विमर्श जारी है । लेकिन अबतक सिर्फ नीदरलैंड में इच्छामृत्यु को कानूनी जामा पहनाया जा चुका है और वहां मर्सी कीलिंग कानूनन जायज है । नीदरलैंड में इस काम के लिए मौत के मुहाने पर खड़े मरीज का डॉक्टर एक अन्य डॉक्टर की मदद लेता है और गंभीर यंत्रणा झेल रहे मरीज को उसके परिवार या रिश्तेदार की सहमति के आदार पर जिंदगी से मुक्त कर देता है । चूंकि इस काम में डॉक्टरों की मदद ली जाती है इसलिए डॉक्टरों के इस कृत्य पर वहां विशेषज्ञों में दो राय है । एक वर्ग डॉक्टरों की यह कहकर आलोचना करता है कि यह डॉक्टरी पेशे के खिलाफ है । उनका तर्क है कि पेशा शुरू करने के पहले डॉक्टरों को एक शपथ दिलाई जाती है जिसमें उन्हें यह वादा करना पड़ता है कि – किसी को खुश करने के लिए मैं कोई ऐसी दवा नहीं लिखूंगा जिससे किसी मरीज की जान जाए या फिर कोई ऐसा काम नहीं करूंगा जो किसी मरीज की मौत का कारण बने । इस शपथ के आधार पर ही मर्सी कीलिंग में मददगार बबनेवाले डॉक्टरों की आलोचना होती है । तो यह एक ऐसा विषय है जो दुधारी तलवार की तरह है, जिसपर बेहद सावधानीपूर्व चलने की जररूत है । भारत में सरकार को चाहिए कि इस विषय पर एक ड्रॉफ्ट पेपर तैयार कर राष्ट्रव्यापी बहस करवाई जाए और जो कुछ ठोस निकले उसपर अमल किया जाए । क्योंकि अब हमारे यहां भी वक्त आ गया है कि इच्छामृत्यु पर सरकार कोई फैसला ले क्योंकि अरुणा सौनवाग जैसे कई मरीज सालों से अपनी मौत का इंतजार कर रहे हैं और उनके इस इंतजार में उनके रिश्तेदार भी हर रोज मर रहे हैं ।
Thursday, December 31, 2009
न्यायपालिका की साख का सवाल
इन दिनों न्यायपालिका उन वजहों से चर्चा में है जिसने उसकी साख पर बट्टा लगाया। पहले गाजियाबाद के करोड़ों के पीएफ घोटाले में माननीय न्यायाधीशों पर सवाल खड़े हुए, उसके बाद कलकत्ता हाईकोर्ट के जज सौमित्र मोहन पर आरोप लगे और उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की गई। अब राज्यसभा के सभापति ने कर्नाटक के चीफ जस्टिस पी डी दिनाकरन के खिलाफ पचहत्तर सांसदों की उस याचिका को मंजूरी दी है जिसमें उनके खिलाफ महाभियोग की मांग की गई। न्यायिक इतिहास में यह तीसरा मौका है जब किसी भी जज के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की गई है। इसके पहले जस्टिस वी रामास्वामी के खिलाफ संसद में महाभियोग की प्रक्रिया चली थी, लेकिन कांग्रेसी सांसदों के सदन से वॉक आउट करने के बाद ये प्रस्ताव गिर गया था। माननीय न्यायाधीशों पर इस तरह के इल्जाम से देश की जनता न्याय के मंदिर से विश्वास दरकने लगा है। भारत के लोगों की अपने देश की न्यायपालिका की ईमानदारी और साख पर जबरदस्त आस्था है । यही आस्था भारतीय लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करती है । लेकिन इस तरह के आरोपों से इस आस्था को ठेस लगती है । इसलिए यह बेहद जरूरी है कि न्यायाधीशों पर किसी भी तरह के आरोप लगाने से पहले ठोंक बजाकर तथ्यों को पुख्ता कर लिया जाए।
अगर हम कर्नाटक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस दिनाकरन पर लगे आरोपों की बात करें तो इस विवाद की शुरूआत तब हुई जब उनको सुप्रीम कोर्ट के जज बनाए जाने की प्रक्रिया शुरू हुई । उनके खिलाफ जो महाभियोग की अर्जी राज्यसभा के सभापति को सौंपी गई है, उसमें बारह आरोपों की एक लंबी फेहरिस्त संलग्न है । इन आरोपों के मुताबिक जस्टिस दिनाकरन पर आय के ज्ञात स्त्रोत से ज्यादा संपत्ति अर्जित करने के अलावा पांच हाउसिंग बोर्ड के प्लॉट आवंटित करवाने के साथ-साथ अपने और अपने रिश्तेदारों के नाम से अकूत संपत्ति अर्जित करने का आरोप है। दिनाकरन पर एक गंभीर आरोप यह है कि थिरुवल्लूर के कावेरीराजपुरम और वेल्लोर के अनाइपक्कम, मुलवॉय और पुवलई में उनके पास पांच सौ पचास एकड़ जमीन है । इस जमीन का मालिकाना हक खुद उनके, उनकी पत्नी और दो अन्य के नाम है । पांच सौ पचास एकड़ के अलावा जस्टिस दिनाकरन के पास थिरुव्ललूर जिले के तिरुतानी तालुका में और चार सौ चालीस एकड़ जमीन है, जिसमें से तीन सौ दस दशमलव तेरह एकड़ जमीन पट्टे पर ली गई है और बाकी के एकतालीस दशमलव सत्ताइस एकड़ सरकारी गैरमजरुआ ( पोरोमबोक) जमीन है । उनपर यह इल्जाम भी है कि तिरासी दशमलव तैंतीस एकड़ वैसी सरकारी जमीन पर कब्जा किया गया है, जिसे सरकार ने भूमिहीन गरीबों के बीच बांटे जाने के लिए चिन्हित किया था । खबरों के मुताबिक इलाके के जिलाधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को जो रिपोर्ट सौंपी उनमें इन तथ्यों की पुष्टि हुई है । माना यह जाता है कि इस रिपोर्ट के बाद ही कॉलेजियम ने सुप्रीम कोर्ट में उनके प्रमोशन को ठंडे बस्ते में डालने का फैसला लिया ।
लेकिन जहां तक तमिलनाडु में सरकारी गैरमजरुआ ( पोरोमबोक) जमीन पर कब्जे के आरोप का सवाल है, उसे वहां अपराध नहीं माना जाता । यह एक सिविल मैटर है । दरअसल अंग्रेजों के जमाने में ब्रिटिश राज ने मद्रास प्रेसिडेंसी में लैंड सेटलमेंट स्कीम लागू की थी क्योंकि उस वक्त सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण बेहद आम था। उस वक्त सरकारी जमीन पर कब्जे से निबटने के लिए द वेरिटेबल बोर्ड स्टैंडिंग ऑर्डर था जो अब रेवेन्यू स्टैंडिंग ऑर्डर कहलाता है । ब्रिटिश राज में अंग्रेजों ने जब अपना पांव जमाना शुरू किया तो राजे रजवाड़ों की जमीनों को सरकारी जमीन घोषित करने लगे । बाद में लैंड सेटलमैंट स्कीम लागू कर जमीन पर रहनेवाली जनता या फिर मालिकाना हक वाली जमीन को पट्टा भूमि के अंदर वर्गीकरण कर दिया गया । इसके अलावा दो और श्रेणियों में जमीन का वर्गीकरण हुआ- सरकारी गैरमजरुआ और बंजर या ऊसर भूमि । गैरमजरुआ जमीन वो थी जो आम जनता के काम आती थी जिसमें सामाजिक कार्य करने की छूट होती थी लेकिन अगर कोई व्यक्ति उसपर कब्जा करता था तो गांव में मौजूद तहसीलदार उसे बी मेमो जारी कर जबाव तलब करता था । लेकिन उस वक्त भी इस बात का ध्यान रखा जाता था कि वो जमीन आम जनता के काम आती थी या फिर बेकार पड़ी थी । अगर उसका कोई इस्तेमाल नहीं था तो मसला सिर्फ रेवेन्यू का होता था और इस गैरमजरूआ जमीन पर कर लगाकर उसके इस्तेमाल की इजाजत अतिक्रमण करनेवाले को दे दी जाती थी । लेकिन अगर उसका सार्वजनिक या सामाजिक कार्य के लिए उपयोग होता था तो उसपर से अतिक्रमण हटाने के लिए कानूनी प्रक्रिया तत्काल शुरू की जाती थी ।
जस्टिस दिनाकरन के केस में ये जानना जरूरी है कि जिस गैरमजरुआ जमीन को कब्जाने का आरोप उनपर लगा है उसमें जिला प्रशासन ने मेमो जारी किया है या नहीं । अगर मेमो जारी किया है तो उस पर फाइन लगाकर उसे नियमित किया जा सकता है । लेकिन अगर उस जमीन का सार्वजनिक उपयोग होता था तो तो उसे खाली कराने के लिए जिला प्रशासन ने कोई कदम क्यो नहीं उठाया । आरोप लगानेवालों का तर्क यह है कि जस्टिस दिनाकरन ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर इस प्रक्रिया को रुकवाया हुआ है। दरअसल तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले में गैरमजरुआ सरकारी जमीन पर कब्जा करना आम है । लेकिन एक सूबे के हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस आम अतिक्रमणकारी नागरिक की तरह व्यवहार नहीं कर सकता । एक न्यायाधीश से उसके आचरण और व्यवहार में ईमानदारी के साथ संविधान और कानून के प्रति निष्ठा का सार्वजिन प्रदर्शन अपेक्षित है ।
जस्टिस दिनाकरन के खिलाफ महाभियोग की अर्जी में और भी कई संगीन इल्जाम हैं । इन आरोपों में से एक है - ऊटी और नीलगिरी जिले में दिनाकरन की अस्सी साल की सास एम जी परिपूर्णम के नाम से बेहद महंगे प्लॉट खरीदे गए जो उनकी आय के ज्ञात स्त्रोत से कहीं ज्यादा की है । इसके अलावा दिनाकरन पर अपने घरों की साज सज्जा पर भी बेशुमार खर्च करने का आरोप लगाया गया है । आरोपों की इस लंबी फेहरिश्त की जांच तो अब राज्यसभा के सभापति द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति करेगी जिसमें सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, किसी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और मशहूर न्यायविद शामिल होंगे । लेकिन कांग्रेस पार्टी की उदासीनता की वजह से यह लगता नहीं है कि दिनाकरन पर महाभियोग साबित हो पाएगा और उन्हें पद छोड़ना पड़ेगा ।
जस्टिस दिनाकरन के पीछे लग रहे इन आरोपों का एक दूसरा पहलू भी सामने आ रहा है । खबरों के मुताबिक मद्रास हाईकोर्ट के कुछ वकीलों ने जस्टिस कन्नादासन के खिलाफ मुहिम चलाकर राज्य उपभोक्ता फोरम में उनकी नियुक्ति रुकवा दी थी। न्यायपालिका पर नजर रखनेवालों का कहना है कि वकीलों की उसी जमात ने दिनाकरन के खिलाफ भी मोर्चा खोला था । दूसरी बात ये कि मद्रास हाईकोर्ट में जिन लोगों ने दिनाकरन पर जमीन कब्जाने का केस किया है उसके याचिकार्ताओं के वकीलों ने भी दिनाकरन के खिलाफ मुहिम को जोरदार समर्थन दिया है। इन बातों में आंशिक सच्चाई भी है तो इसकी पूरी तफ्तीश की जानी चाहिए । क्योंकि अगर ऐसा हो रहा है तो यह भारतीय न्यायिक प्रक्रिया को दबाब में लेने की कोशिश है जिसपर तत्काल रोक लगाने के लिए सरकार को आवश्यक कदम उठाना चाहिए। जस्टिस दिनाकरन पर लगे इल्जाम संगीन है, उसकी गंभीरता से जांच होनी ही चाहिए और होगी भी । लेकिन अगर इस केस में किसी खास समूह का कोई मोटिव नजर आता है तो उसकी जांच भी उतनी ही गंभीरता से होनी चाहिए ताकि देश की न्यायपालिका बगैर किसी दबाव के संविधान और कानून की रक्षा कर सके, ताकि देश की सवा करोड़ जनता की जो आस्था देश की न्यायिक प्रणाली में है वो अक्षुण्ण रह सके ।
अगर हम कर्नाटक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस दिनाकरन पर लगे आरोपों की बात करें तो इस विवाद की शुरूआत तब हुई जब उनको सुप्रीम कोर्ट के जज बनाए जाने की प्रक्रिया शुरू हुई । उनके खिलाफ जो महाभियोग की अर्जी राज्यसभा के सभापति को सौंपी गई है, उसमें बारह आरोपों की एक लंबी फेहरिस्त संलग्न है । इन आरोपों के मुताबिक जस्टिस दिनाकरन पर आय के ज्ञात स्त्रोत से ज्यादा संपत्ति अर्जित करने के अलावा पांच हाउसिंग बोर्ड के प्लॉट आवंटित करवाने के साथ-साथ अपने और अपने रिश्तेदारों के नाम से अकूत संपत्ति अर्जित करने का आरोप है। दिनाकरन पर एक गंभीर आरोप यह है कि थिरुवल्लूर के कावेरीराजपुरम और वेल्लोर के अनाइपक्कम, मुलवॉय और पुवलई में उनके पास पांच सौ पचास एकड़ जमीन है । इस जमीन का मालिकाना हक खुद उनके, उनकी पत्नी और दो अन्य के नाम है । पांच सौ पचास एकड़ के अलावा जस्टिस दिनाकरन के पास थिरुव्ललूर जिले के तिरुतानी तालुका में और चार सौ चालीस एकड़ जमीन है, जिसमें से तीन सौ दस दशमलव तेरह एकड़ जमीन पट्टे पर ली गई है और बाकी के एकतालीस दशमलव सत्ताइस एकड़ सरकारी गैरमजरुआ ( पोरोमबोक) जमीन है । उनपर यह इल्जाम भी है कि तिरासी दशमलव तैंतीस एकड़ वैसी सरकारी जमीन पर कब्जा किया गया है, जिसे सरकार ने भूमिहीन गरीबों के बीच बांटे जाने के लिए चिन्हित किया था । खबरों के मुताबिक इलाके के जिलाधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को जो रिपोर्ट सौंपी उनमें इन तथ्यों की पुष्टि हुई है । माना यह जाता है कि इस रिपोर्ट के बाद ही कॉलेजियम ने सुप्रीम कोर्ट में उनके प्रमोशन को ठंडे बस्ते में डालने का फैसला लिया ।
लेकिन जहां तक तमिलनाडु में सरकारी गैरमजरुआ ( पोरोमबोक) जमीन पर कब्जे के आरोप का सवाल है, उसे वहां अपराध नहीं माना जाता । यह एक सिविल मैटर है । दरअसल अंग्रेजों के जमाने में ब्रिटिश राज ने मद्रास प्रेसिडेंसी में लैंड सेटलमेंट स्कीम लागू की थी क्योंकि उस वक्त सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण बेहद आम था। उस वक्त सरकारी जमीन पर कब्जे से निबटने के लिए द वेरिटेबल बोर्ड स्टैंडिंग ऑर्डर था जो अब रेवेन्यू स्टैंडिंग ऑर्डर कहलाता है । ब्रिटिश राज में अंग्रेजों ने जब अपना पांव जमाना शुरू किया तो राजे रजवाड़ों की जमीनों को सरकारी जमीन घोषित करने लगे । बाद में लैंड सेटलमैंट स्कीम लागू कर जमीन पर रहनेवाली जनता या फिर मालिकाना हक वाली जमीन को पट्टा भूमि के अंदर वर्गीकरण कर दिया गया । इसके अलावा दो और श्रेणियों में जमीन का वर्गीकरण हुआ- सरकारी गैरमजरुआ और बंजर या ऊसर भूमि । गैरमजरुआ जमीन वो थी जो आम जनता के काम आती थी जिसमें सामाजिक कार्य करने की छूट होती थी लेकिन अगर कोई व्यक्ति उसपर कब्जा करता था तो गांव में मौजूद तहसीलदार उसे बी मेमो जारी कर जबाव तलब करता था । लेकिन उस वक्त भी इस बात का ध्यान रखा जाता था कि वो जमीन आम जनता के काम आती थी या फिर बेकार पड़ी थी । अगर उसका कोई इस्तेमाल नहीं था तो मसला सिर्फ रेवेन्यू का होता था और इस गैरमजरूआ जमीन पर कर लगाकर उसके इस्तेमाल की इजाजत अतिक्रमण करनेवाले को दे दी जाती थी । लेकिन अगर उसका सार्वजनिक या सामाजिक कार्य के लिए उपयोग होता था तो उसपर से अतिक्रमण हटाने के लिए कानूनी प्रक्रिया तत्काल शुरू की जाती थी ।
जस्टिस दिनाकरन के केस में ये जानना जरूरी है कि जिस गैरमजरुआ जमीन को कब्जाने का आरोप उनपर लगा है उसमें जिला प्रशासन ने मेमो जारी किया है या नहीं । अगर मेमो जारी किया है तो उस पर फाइन लगाकर उसे नियमित किया जा सकता है । लेकिन अगर उस जमीन का सार्वजनिक उपयोग होता था तो तो उसे खाली कराने के लिए जिला प्रशासन ने कोई कदम क्यो नहीं उठाया । आरोप लगानेवालों का तर्क यह है कि जस्टिस दिनाकरन ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर इस प्रक्रिया को रुकवाया हुआ है। दरअसल तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले में गैरमजरुआ सरकारी जमीन पर कब्जा करना आम है । लेकिन एक सूबे के हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस आम अतिक्रमणकारी नागरिक की तरह व्यवहार नहीं कर सकता । एक न्यायाधीश से उसके आचरण और व्यवहार में ईमानदारी के साथ संविधान और कानून के प्रति निष्ठा का सार्वजिन प्रदर्शन अपेक्षित है ।
जस्टिस दिनाकरन के खिलाफ महाभियोग की अर्जी में और भी कई संगीन इल्जाम हैं । इन आरोपों में से एक है - ऊटी और नीलगिरी जिले में दिनाकरन की अस्सी साल की सास एम जी परिपूर्णम के नाम से बेहद महंगे प्लॉट खरीदे गए जो उनकी आय के ज्ञात स्त्रोत से कहीं ज्यादा की है । इसके अलावा दिनाकरन पर अपने घरों की साज सज्जा पर भी बेशुमार खर्च करने का आरोप लगाया गया है । आरोपों की इस लंबी फेहरिश्त की जांच तो अब राज्यसभा के सभापति द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति करेगी जिसमें सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, किसी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और मशहूर न्यायविद शामिल होंगे । लेकिन कांग्रेस पार्टी की उदासीनता की वजह से यह लगता नहीं है कि दिनाकरन पर महाभियोग साबित हो पाएगा और उन्हें पद छोड़ना पड़ेगा ।
जस्टिस दिनाकरन के पीछे लग रहे इन आरोपों का एक दूसरा पहलू भी सामने आ रहा है । खबरों के मुताबिक मद्रास हाईकोर्ट के कुछ वकीलों ने जस्टिस कन्नादासन के खिलाफ मुहिम चलाकर राज्य उपभोक्ता फोरम में उनकी नियुक्ति रुकवा दी थी। न्यायपालिका पर नजर रखनेवालों का कहना है कि वकीलों की उसी जमात ने दिनाकरन के खिलाफ भी मोर्चा खोला था । दूसरी बात ये कि मद्रास हाईकोर्ट में जिन लोगों ने दिनाकरन पर जमीन कब्जाने का केस किया है उसके याचिकार्ताओं के वकीलों ने भी दिनाकरन के खिलाफ मुहिम को जोरदार समर्थन दिया है। इन बातों में आंशिक सच्चाई भी है तो इसकी पूरी तफ्तीश की जानी चाहिए । क्योंकि अगर ऐसा हो रहा है तो यह भारतीय न्यायिक प्रक्रिया को दबाब में लेने की कोशिश है जिसपर तत्काल रोक लगाने के लिए सरकार को आवश्यक कदम उठाना चाहिए। जस्टिस दिनाकरन पर लगे इल्जाम संगीन है, उसकी गंभीरता से जांच होनी ही चाहिए और होगी भी । लेकिन अगर इस केस में किसी खास समूह का कोई मोटिव नजर आता है तो उसकी जांच भी उतनी ही गंभीरता से होनी चाहिए ताकि देश की न्यायपालिका बगैर किसी दबाव के संविधान और कानून की रक्षा कर सके, ताकि देश की सवा करोड़ जनता की जो आस्था देश की न्यायिक प्रणाली में है वो अक्षुण्ण रह सके ।
Tuesday, December 22, 2009
कैलाश वाजपेयी को मिला साहित्य अकादमी पुरस्कार
आखिरकार इस वर्ष का साहित्य अकादमी पुरस्कार कैलाश वाजपेयी को मिल ही गया । हमने ये जानकारी ऐलान होने के पहले ही दे दी थी । इस बार के निर्णायक मंडल में हिंदी के वरिष्ठ कथाकार और नया ज्ञानोदय के संपादक रवीन्द्र कालिया, वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह और गुजरात के रघुबीर चौधरी थे । बैठक की शुरुआत में रघुबीर चौधरी ने रामदरश मिश्र, अनामिका और उदय प्रकाश का नाम प्रस्तावित किया । लेकिन इन नामों पर सहमति नहीं बन पाई । इसके बाद कैलाश वाजपेयी के नाम का प्रस्ताव आया जिसपर केदार नाथ सिंह और रवीन्द्र कालिया ने अपनी सहमति जता दी । रघुबीर चौधरी तो जैसे तैयार ही बैठे थे और सर्वसम्मति से कैलाश वाजपेयी के नाम पर सहमति बन गई ।
दरअसल जैसे कि मैं पहले ही लिख चुका था- अकादमी पुरस्कार के लिए जो खेल होता है उसके लिए निर्णायक मंडल के चयन में अपने लोगों को रखने का खेल सबसे बड़ा होता है । रघुबीर चौधरी का नाम ही इसलिए डाला गया था कि हिंदी के संयोजक की मर्जी चल सके । और हुआ भी वही । कैलाश वाजपेयी को पुरस्कार देने की भूमिका या यों कहें कि डील पहले ही हो चुकी थी । जब गोपीचंद नारंग पद से हटे थे और सुनील गंगोपाध्याय ने अकादमी अध्यक्ष पद की कुर्सी संभाली थी तो कैलाश वाजपेयी ने हिंदी भाषा के संयोजक के लिए अपनी दावेदारी पेश की थी । लेकिन उस वक्त उनको समझाय़ा गया था कि अगर वो संयोजक हो जाएंगे तो पुरस्कार नहीं मिल पाएगा । कैलाश जोशी ने पुरस्कार के आश्वासन के बाद अपना नाम वापस ले लिया था और गोरखपुर के विश्वनाथ तिवारी हिंदी के संयोजक बने थे । उस वक्त हुई डील अब पूरी हो पाई है और कैलाश वाजपेयी को अकादमी पुरस्कार देने का फैसला हो गया है ।
दरअसल जैसे कि मैं पहले ही लिख चुका था- अकादमी पुरस्कार के लिए जो खेल होता है उसके लिए निर्णायक मंडल के चयन में अपने लोगों को रखने का खेल सबसे बड़ा होता है । रघुबीर चौधरी का नाम ही इसलिए डाला गया था कि हिंदी के संयोजक की मर्जी चल सके । और हुआ भी वही । कैलाश वाजपेयी को पुरस्कार देने की भूमिका या यों कहें कि डील पहले ही हो चुकी थी । जब गोपीचंद नारंग पद से हटे थे और सुनील गंगोपाध्याय ने अकादमी अध्यक्ष पद की कुर्सी संभाली थी तो कैलाश वाजपेयी ने हिंदी भाषा के संयोजक के लिए अपनी दावेदारी पेश की थी । लेकिन उस वक्त उनको समझाय़ा गया था कि अगर वो संयोजक हो जाएंगे तो पुरस्कार नहीं मिल पाएगा । कैलाश जोशी ने पुरस्कार के आश्वासन के बाद अपना नाम वापस ले लिया था और गोरखपुर के विश्वनाथ तिवारी हिंदी के संयोजक बने थे । उस वक्त हुई डील अब पूरी हो पाई है और कैलाश वाजपेयी को अकादमी पुरस्कार देने का फैसला हो गया है ।
Monday, December 21, 2009
साहित्य अकादमी पुरस्कारों का खेल खुला
रामदरश मिश्र को मिलेगा अकादमी पुरस्कार !
साल के आखिरी दिनों में साहित्यिक हलके में अकादमी पुरस्कारों को लेकर सरगर्मियां तेज हो जाती हैं । राजधानी दिल्ली में तो अटकलों का बाजार इस कदर गर्म हो जाता है कि तथाकथित साहित्यिक ठेकेदारों की जेब में पुरस्कृत होनेवाले लेखकों की सूची रहती है । जहां भी तीन चार लेखक जुटते हैं कयासबाजी का दौर शुरू हो जाता है और गिनती चालू हो जाती है कि किस लेखक की पुस्तक पिछले तीन वर्षों में आई और किसका जुगाड़ इस बार फिट बैठ रहा है । किसने अपनी गोटी सेट कर ली है । साहित्य अकादमी और उसके अध्यक्ष को नजदीक से जानने वालों का मानना है कि इस बार हिंदी लेखक को मिलनेवाले पुरस्कार में हिंदी के भाषा संयोजक विश्वनाथ तिवारी की चलेगी । पिछले अध्यक्ष गोपीचंद नारंग के कार्यकाल में उनकी चलती थी और उन्होंने हिंदी के संयोजक और वरिष्ठ लेखक गिरिराज किशोर को पुरस्कारों के मामले में पैदल कर दिया था । गिरिराज किशोर को जब ये इलहाम हुआ था तो उन्होंने विरोध का झंडा तो उठाया था पर कुछ कर नहीं सके थे और गोपीचंद नारंग ने जिसे चाहा उसे पुरस्कार दे दिया ।
अगर अकादमी के अंदर के सूत्रों की मानें तो इस बार साहित्य अकादमी के पुरस्कारों की दौड़ में हिंदी के वरिष्ठ कवि कैलाश वाजपेयी और रामदरश मिश्र रेस में सबसे आगे चल रहे हैं । माना जा रहा है कि कैलाश वाजपेयी को उनके कविता संग्रह हवा में हस्ताक्षर पर इस बार का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल सकता है । दूसरे मजबूत दावेदार रामदरश मिश्र हैं । उनकी उम्र और वरिष्ठता को देखते हुए जूरी उनपर भी मेहरबान हो सकती है । साहित्य अकादमी की परंपरा के मुताबिक इस बार कविता का नंबर है, क्योंकि पिछले साल गोविन्द मिश्र को उनके उपन्यास पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था । संयोग यह था कि गोविन्द मिश्र और हिंदी के संयोजक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी दोनों गोऱखपुर इलाके के हैं । हलांकि इस बार परंपरा के मुताबिक कविता संग्रह को अकादमी पुरस्कार मिलना चाहिए लेकिन भगवानदास मोरवाल का उपन्यास रेत भी एक प्रमुख दावेदार है । पिछले दिनों जब रेत को लेकर विवाद हुआ और मामला अदालत तक जा पहुंचा तो तो इस बात की भी जोर शोर से चर्चा हुई कि साहित्य अकादमी ने अबतक किसी दलित लेखक को हिंदी के लिए पुरस्कार नहीं दिया । अगर साहित्य अकादमी अपने उपर लगे इस कलंक को धोना चाहती है तो भगवानदास नोरवाल को इस बार अकादमी अवार्ड मिल सकता है । लेकिन इस किताब पर अदालत में चल रहा मामला मोरवाल को इस रेस में पीछे धकेल सकता है ।
दरअसल साहित्य अकादमी के पुरस्कारों का खेल काफी पहले से शुरू हो जाता है । प्रक्रिया के मुताबिक अकादमी पिछले तीन वर्षों में प्रकाशित कृतियों की एक आधार सूची बनाती है और हिंदी भाषा की जो सलाहकार समिति या एडवायजरी बोर्ड होती है उसके सदस्यों से उसमें से तीन किताबों का चयन कर सुझाव देने का अनुरोध करती है । एडवायजरी बोर्ड के सदस्य को तीन से ज्यादा कृतियों की सिफारिश करने की भी छूट होती है । जब इन सदस्यों की सिफारिश अकादमी को प्राप्त हो जाती है उसके बाद हर विधा अलग अलग सूची बनाई जाती है । मोटे तौर पर एडवायजरी बोर्ड के सदस्यों की राय मिलने के बाद हर विधा की तीन तीन किताबों को पुरस्कार के लिए चुना जाता है । इन तीन किताबों में से तीन सदस्यीय जूरी एक कृति का चुनाव करती है जिसको पुरस्कृत किया जाता है । लेकिन किताबों की आधार सूची से लेकर जूरी के चयन तक में जो़ड-तोड़ और तिकड़मों का ऐसा खेल खेला जाता है कि सियासत भी शरमा जाती है । अपनी या अपने गैंग के लेखकों की किताब को आधार सूची में डलवाने इस खेल की शुरुआत होती है । उसके बाद की सारी मशक्कत एडवायजरी बोर्ड के सदस्यों के पास से अपने नाम की सिफारिश भिजवाने की होती है । पुरस्कार की चाह में लेखक इसके लिए दिन रात एक कर देते हैं । इस किले की घेरेबंदी के बाद शुरु होती है कि किसे फाइनल जूरी का सदस्य बनवाया जाए । इस कमिटी के सदस्यों का चुनाव अध्यक्ष की मर्जी से होता है, लेकिन अगर अध्यक्ष की रुचि हिंदी भाषा में ना हो या फिर वो इसको लेकर तटस्थ रहे तो फिर हिंदी भाषा के संयोजक का काम आसान हो जाता है और वो अपनी मर्जी के लोगों को जूरी में नामित करवा लेता है । पुरस्कार के लिए किताबों के अंतिम चयन के लिए जूरी की जो बैठक होती है उसमें भाषा के संयोजक की कोई भूमिका नहीं होती वो सिर्फ बैठक का संयोजन और शुरुआत करते हैं । हलांकि जब नामवर सिंह हिंदी के संयोजक हुआ करते थे तो ये स्थिति नहीं थी । तब नामवर जी की ही मर्जी चला करती थी । एक बार फिर से गोपीचंद नारंग के अध्यक्ष पद से हटने और विश्वनाथ तिवारी के हिंदी के संयोजक बनने के बाद स्थिति लगभग वैसी ही हो गई है । नामवर जी जैसी दबंगई से तो तिवारी जी काम नहीं करते हैं लेकिन लेकिन अंदरखाने चलती तो उनकी ही है। जब से विश्वनाथ तिवारी हिंदी भाषा के संयोजक बने हैं तब से हिंदी में तो उनकी ही मर्जी चल रही है । अपने पसंदीदा लेखक गोविंद मिश्र को उनकी कमजोर कृति पर पुरस्कार दिलवा कर उन्होंने पिछले वर्ष इसे साबित भी किया । जब जूरी के सदस्य फैसला ले लेते हैं उसके बाद उस फैसले को एक्जीक्यूटिव कमिटी की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है और वहां से स्वीकृति मिलने के बाद अंतिम मुहर अध्यक्ष लगाते हैं,जोसिर्फ एक प्रक्रिया का हिस्सा भर है ।
साल के आखिरी दिनों में साहित्यिक हलके में अकादमी पुरस्कारों को लेकर सरगर्मियां तेज हो जाती हैं । राजधानी दिल्ली में तो अटकलों का बाजार इस कदर गर्म हो जाता है कि तथाकथित साहित्यिक ठेकेदारों की जेब में पुरस्कृत होनेवाले लेखकों की सूची रहती है । जहां भी तीन चार लेखक जुटते हैं कयासबाजी का दौर शुरू हो जाता है और गिनती चालू हो जाती है कि किस लेखक की पुस्तक पिछले तीन वर्षों में आई और किसका जुगाड़ इस बार फिट बैठ रहा है । किसने अपनी गोटी सेट कर ली है । साहित्य अकादमी और उसके अध्यक्ष को नजदीक से जानने वालों का मानना है कि इस बार हिंदी लेखक को मिलनेवाले पुरस्कार में हिंदी के भाषा संयोजक विश्वनाथ तिवारी की चलेगी । पिछले अध्यक्ष गोपीचंद नारंग के कार्यकाल में उनकी चलती थी और उन्होंने हिंदी के संयोजक और वरिष्ठ लेखक गिरिराज किशोर को पुरस्कारों के मामले में पैदल कर दिया था । गिरिराज किशोर को जब ये इलहाम हुआ था तो उन्होंने विरोध का झंडा तो उठाया था पर कुछ कर नहीं सके थे और गोपीचंद नारंग ने जिसे चाहा उसे पुरस्कार दे दिया ।
अगर अकादमी के अंदर के सूत्रों की मानें तो इस बार साहित्य अकादमी के पुरस्कारों की दौड़ में हिंदी के वरिष्ठ कवि कैलाश वाजपेयी और रामदरश मिश्र रेस में सबसे आगे चल रहे हैं । माना जा रहा है कि कैलाश वाजपेयी को उनके कविता संग्रह हवा में हस्ताक्षर पर इस बार का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल सकता है । दूसरे मजबूत दावेदार रामदरश मिश्र हैं । उनकी उम्र और वरिष्ठता को देखते हुए जूरी उनपर भी मेहरबान हो सकती है । साहित्य अकादमी की परंपरा के मुताबिक इस बार कविता का नंबर है, क्योंकि पिछले साल गोविन्द मिश्र को उनके उपन्यास पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था । संयोग यह था कि गोविन्द मिश्र और हिंदी के संयोजक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी दोनों गोऱखपुर इलाके के हैं । हलांकि इस बार परंपरा के मुताबिक कविता संग्रह को अकादमी पुरस्कार मिलना चाहिए लेकिन भगवानदास मोरवाल का उपन्यास रेत भी एक प्रमुख दावेदार है । पिछले दिनों जब रेत को लेकर विवाद हुआ और मामला अदालत तक जा पहुंचा तो तो इस बात की भी जोर शोर से चर्चा हुई कि साहित्य अकादमी ने अबतक किसी दलित लेखक को हिंदी के लिए पुरस्कार नहीं दिया । अगर साहित्य अकादमी अपने उपर लगे इस कलंक को धोना चाहती है तो भगवानदास नोरवाल को इस बार अकादमी अवार्ड मिल सकता है । लेकिन इस किताब पर अदालत में चल रहा मामला मोरवाल को इस रेस में पीछे धकेल सकता है ।
दरअसल साहित्य अकादमी के पुरस्कारों का खेल काफी पहले से शुरू हो जाता है । प्रक्रिया के मुताबिक अकादमी पिछले तीन वर्षों में प्रकाशित कृतियों की एक आधार सूची बनाती है और हिंदी भाषा की जो सलाहकार समिति या एडवायजरी बोर्ड होती है उसके सदस्यों से उसमें से तीन किताबों का चयन कर सुझाव देने का अनुरोध करती है । एडवायजरी बोर्ड के सदस्य को तीन से ज्यादा कृतियों की सिफारिश करने की भी छूट होती है । जब इन सदस्यों की सिफारिश अकादमी को प्राप्त हो जाती है उसके बाद हर विधा अलग अलग सूची बनाई जाती है । मोटे तौर पर एडवायजरी बोर्ड के सदस्यों की राय मिलने के बाद हर विधा की तीन तीन किताबों को पुरस्कार के लिए चुना जाता है । इन तीन किताबों में से तीन सदस्यीय जूरी एक कृति का चुनाव करती है जिसको पुरस्कृत किया जाता है । लेकिन किताबों की आधार सूची से लेकर जूरी के चयन तक में जो़ड-तोड़ और तिकड़मों का ऐसा खेल खेला जाता है कि सियासत भी शरमा जाती है । अपनी या अपने गैंग के लेखकों की किताब को आधार सूची में डलवाने इस खेल की शुरुआत होती है । उसके बाद की सारी मशक्कत एडवायजरी बोर्ड के सदस्यों के पास से अपने नाम की सिफारिश भिजवाने की होती है । पुरस्कार की चाह में लेखक इसके लिए दिन रात एक कर देते हैं । इस किले की घेरेबंदी के बाद शुरु होती है कि किसे फाइनल जूरी का सदस्य बनवाया जाए । इस कमिटी के सदस्यों का चुनाव अध्यक्ष की मर्जी से होता है, लेकिन अगर अध्यक्ष की रुचि हिंदी भाषा में ना हो या फिर वो इसको लेकर तटस्थ रहे तो फिर हिंदी भाषा के संयोजक का काम आसान हो जाता है और वो अपनी मर्जी के लोगों को जूरी में नामित करवा लेता है । पुरस्कार के लिए किताबों के अंतिम चयन के लिए जूरी की जो बैठक होती है उसमें भाषा के संयोजक की कोई भूमिका नहीं होती वो सिर्फ बैठक का संयोजन और शुरुआत करते हैं । हलांकि जब नामवर सिंह हिंदी के संयोजक हुआ करते थे तो ये स्थिति नहीं थी । तब नामवर जी की ही मर्जी चला करती थी । एक बार फिर से गोपीचंद नारंग के अध्यक्ष पद से हटने और विश्वनाथ तिवारी के हिंदी के संयोजक बनने के बाद स्थिति लगभग वैसी ही हो गई है । नामवर जी जैसी दबंगई से तो तिवारी जी काम नहीं करते हैं लेकिन लेकिन अंदरखाने चलती तो उनकी ही है। जब से विश्वनाथ तिवारी हिंदी भाषा के संयोजक बने हैं तब से हिंदी में तो उनकी ही मर्जी चल रही है । अपने पसंदीदा लेखक गोविंद मिश्र को उनकी कमजोर कृति पर पुरस्कार दिलवा कर उन्होंने पिछले वर्ष इसे साबित भी किया । जब जूरी के सदस्य फैसला ले लेते हैं उसके बाद उस फैसले को एक्जीक्यूटिव कमिटी की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है और वहां से स्वीकृति मिलने के बाद अंतिम मुहर अध्यक्ष लगाते हैं,जोसिर्फ एक प्रक्रिया का हिस्सा भर है ।
Sunday, December 20, 2009
दर्द को भुनाने की कोशिश
इंदिरा गांधी की हत्या के पच्चीस साल पूरे हुए । साथ ही दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में सिखों के कत्लेआम के भी पच्चीस साल पूरे हुए । 31 अक्तूबर 1984 की सुबह दिल्ली में सफदरजंग रोड के पीएम निवास पर इंदिरा गांधी की सुरक्षा में लगे दो लोगों ने इंदिरा गांधी को गोलियों से छलनी कर दिया था । लेकिन उसके बाद दिल्ली में सिखों को योजनाबद्ध तरीके से कत्ल किया गया । पच्चीस सालों से कई कमीशन और आयोग ने इसकी जांच की लेकिन अबतक इंसाफ हुआ हो ऐसा लगता नहीं है । सिखों के नरसंहार के पच्चीस साल पूरे होने के मौके पर पत्रकार जरनैल सिंह की किताब- कब कटेगी चौरासी , सिख कत्लआम का सच प्रकाशित हुई है । पेंग्विन प्रकाशन से आई ये किताब एक साथ तीन भाषाओं में छपी है, अंग्रेजी, हिंदी के अलावा इसका प्रकाशन पंजाबी में भी हुआ है । जरनैल सिंह वही पत्रकार हैं जिन्होंने इस वर्ष हुए आम चुनाव के पहले देश के गृहमंत्री पी चिदंबरम पर जूता फेंका था । बाद में जरनैल ने अपने इस कृत्य पर अफसोस तो नहीं जताया था लेकिन उन्होंने ये जरूर कहा था कि उसे इस कृत्य पर गर्व नहीं है ।
1984 के सिख कत्लेआम के पीडितों को समर्पित जरनैल की इस किताब की प्रस्तावना वरिष्ठ पत्रकार खुशवंत सिंह ने लिखी है । खुशवंत सिंह ने लिखा है कि- कब कटेगी चौरासी ...एक चौंका देनेवाली किताब है, जिसे पढ़ने के बाद हर भारतीय को शर्मसार हो जाना चाहिए । यह दस्तावेज है दिल्ली और उत्तरी भारत के कई भागों में सिखों पर हुए नृशंस कत्लेआम का, जो श्रीमती इंदिरा गांधी की उनके दो सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या किए जाने के बाद हुआ । खुशवंत सिंह ने अपनी छोटी सी प्रस्तावना में इस किताब को उन लोगों के लिए एक बड़ा अभियोग करार दिया है जिन्होंने इस कत्लेआम की साजिश रची और अपने कारिंदों के मार्फत इसे अंजाम दिया ।
इस किताब की भूमिका में लेखक ने अपने पत्रकार बनने की कथा विस्तार से लिखी है । जब जरनैल पत्रकारिता के कोर्स में दाखिला के लिए इंटरव्यू देने पहुंचे दो यू एन आई के पत्रकार बी बी नागपाल ने उनसे पंजाब में उग्रवाद के बारे में सवाल पूछे । जरनैल के जबाव से नागपाल संतुष्ट हुए और उसे दाखिला मिल गया लेकिन जरनैल के मन में ये सावल मुंह बाए खड़ा था कि क्या किसी दूसरे प्रत्याशी से भी यह सवाल पूछा गया होगा । जरनैल के मन में ये सवाल उठना जायज है लेकिन सवाल तो इस किताब की खुशवंत सिंह से भूमिका लिखवाने पर मेरे मन में भी उठ रहे हैं । क्या जरनैल को खुशवंत सिंह से इतर कोई व्यक्ति नजर नहीं आया । यह एक मानसिकता है जिसका कोई इलाज नहीं है । हम हर मुस्लिम सहयोगी को भाई लगाकर ही संबोधित करते हैं । इसमें सांप्रदायिकता ढूंढना गलत है ।
जरनैल सिंह का कहना है कि ये किताब इसलिए लिखी गयी कि उस वक्त मीडिया ने सही तरीके से अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभायी। इस कत्लेआम को जितनी कवरेज मिलनी चाहिए थी उतनी मिली नहीं और पीड़ितों का पक्ष संवेदनशील तरीके से सामने नहीं आ पाया । जरनैल ने इस मामले में दूरदर्शन के संदिग्ध रवैये पर भी सवाल खड़ा किया है । जरनैल ने लिखा है कि दूरदर्शन नरसंहार भड़काने में जुटा था । पूरे समय इंदिरा गांधी का शव और उसके आसपास खून का बदला खून के लग रहे नारों को टेलिकास्ट किया जा रहा था । अख़बार भी सही खबर देने के अपने धर्म को भूल चुके थे। हो सकता है उनकी आपत्ति जायज हो लेकिन उस वक्त जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस में आलोक तोमर और अश्विन सरीन जैसे पत्रकारों ने जान की बाजी लगाकर रिपोर्टिंग की थी । फोटोग्राफर संदीप शंकर की दंगाईयों ने जमकर पिटाई की थी । जरनैल को मीडिया पर सवाल करने के पहले उस दौर के रविवार के अंक भी देखने चाहिए । उन दिनों दिल्ली से उदयन शर्मा और उत्तर प्रदेश से संतोष भारतीय की रिपोर्ट ने देश को हिलाकार रख दिया था । चंद लोगों के लिखे पर पूरी मीडिया को कठघरे में खड़ा कर देने से जरनैल की हड़बड़ी दिखाई देती है ।
इस किताब का एक बड़ा हिस्सा उन लोगों के दर्द का है जिन्हें इस कत्ले आम के 25 साल बाद भी न्याय नहीं मिला। दो महीने के बच्चे को चूल्हे पर रखकर जला दिया गया, लोगों को टायर में फंसा कर आग लगा दी गयी। बेटे का सामने पिता को, पत्नी के सामने पति को, बहन के सामने भाई को कत्ल कर दिया गया । किस तरह से एक शहर से एक पूरी कौम को खत्म करने की कोशिश की गई । किताब के पहले हिस्से में इस दर्द को जगह मिली है । दूसरे हिस्से में न्याय कर्ता और अन्यायकर्ता की चर्चा की गई है । इस हिस्से में जरनैल ने एच के एल भगत, सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर की भूमिका पर लिखा है है साथ ही उस दौर में पूर्नी दिल्ली के त्रिलोकपुरी इलाके के एसएचओ त्यागी के कारनामों को भी बयान किया है । जरनैल ने मौन साधे रहने पर तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और गृहमंत्री नरसिम्हा राव पर भी उंगली उठाई है । लेकिन जरनैल की इस किताब में नया कुछ भी नहीं है । सिर्फ आयोग की फाइलों से केस स्टडीज को निकालकर सामने रखा गया है । दरअसल इस कत्लेआम पर इतनी हृदय विदारक घटनाएं और परिस्थितियां हैं कि पाठक उसे पढ़ते वक्त भाषा और शैली को बिल्कुल ही भूल जाता है । लेकिन अगर चंद पलों के लिए हम एक किताब के तौर पर इसपर विचार करें को जिस तरह से जल्दबाजी में लोगों के दर्द को बयां किया गया है वो यह महसूस कराता है कि इसमें पर्याप्त शोध की जरूरत थी । इस विषय पर ही दो हजार सात के अक्तूबर में रोली बुक्स से वरिष्ठ पत्रकार मनोज मिट्टा और वकील एच एस फुल्का की किताब -व्हेन ए ट्री शुक डेल्ही- आई थी । जो कि इस विषय पर लिखी गई एक बेहतीन किताब है । मनोज मिट्टा की किताब का फलक बहुत बडा़ है और उसमें जो दर्द है, उसमें जो घटनाएं और परिस्थियां बयान की गई हैं वो सचमुच दिल दहला देनी हैं । शाहदरा स्टेशन पर एक नवविवाहिता के पति को मार देनेवाली घटना दो साल पहले पढ़ी थी लेकिन अब भी मेरे जेहन में बरकरार है । मिट्टा और फुल्का की उक्त किताब में ना केवल कत्लेआम के शिकार हुए परिवार के दुखों की दास्तां है बल्कि उसमें न्याय के लिए उनका संघर्ष भी प्रमुखता से सामने रखकर पूरी व्यवस्था पर चोट की गई है । मुझे नहीं मालूम कि जरनैल ने वह किताब देखी थी या वहीं लेकिन इतना जरूर तय है कि जरनैल ने बेहद हड़बड़ी में यह किताब लिखी है और जल्दबाजी पूरी किताब में हर जगह दिखाई देती है । हो सकता है कत्लेआम के पच्चीस साल पूरे होने पर किताब के बाजार में लाने की जल्दबाजी हो या फिर कोई और वजह जिसपर से पर्दा तो सिर्फ लेखक ही उठा सकता है ।
1984 के सिख कत्लेआम के पीडितों को समर्पित जरनैल की इस किताब की प्रस्तावना वरिष्ठ पत्रकार खुशवंत सिंह ने लिखी है । खुशवंत सिंह ने लिखा है कि- कब कटेगी चौरासी ...एक चौंका देनेवाली किताब है, जिसे पढ़ने के बाद हर भारतीय को शर्मसार हो जाना चाहिए । यह दस्तावेज है दिल्ली और उत्तरी भारत के कई भागों में सिखों पर हुए नृशंस कत्लेआम का, जो श्रीमती इंदिरा गांधी की उनके दो सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या किए जाने के बाद हुआ । खुशवंत सिंह ने अपनी छोटी सी प्रस्तावना में इस किताब को उन लोगों के लिए एक बड़ा अभियोग करार दिया है जिन्होंने इस कत्लेआम की साजिश रची और अपने कारिंदों के मार्फत इसे अंजाम दिया ।
इस किताब की भूमिका में लेखक ने अपने पत्रकार बनने की कथा विस्तार से लिखी है । जब जरनैल पत्रकारिता के कोर्स में दाखिला के लिए इंटरव्यू देने पहुंचे दो यू एन आई के पत्रकार बी बी नागपाल ने उनसे पंजाब में उग्रवाद के बारे में सवाल पूछे । जरनैल के जबाव से नागपाल संतुष्ट हुए और उसे दाखिला मिल गया लेकिन जरनैल के मन में ये सावल मुंह बाए खड़ा था कि क्या किसी दूसरे प्रत्याशी से भी यह सवाल पूछा गया होगा । जरनैल के मन में ये सवाल उठना जायज है लेकिन सवाल तो इस किताब की खुशवंत सिंह से भूमिका लिखवाने पर मेरे मन में भी उठ रहे हैं । क्या जरनैल को खुशवंत सिंह से इतर कोई व्यक्ति नजर नहीं आया । यह एक मानसिकता है जिसका कोई इलाज नहीं है । हम हर मुस्लिम सहयोगी को भाई लगाकर ही संबोधित करते हैं । इसमें सांप्रदायिकता ढूंढना गलत है ।
जरनैल सिंह का कहना है कि ये किताब इसलिए लिखी गयी कि उस वक्त मीडिया ने सही तरीके से अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभायी। इस कत्लेआम को जितनी कवरेज मिलनी चाहिए थी उतनी मिली नहीं और पीड़ितों का पक्ष संवेदनशील तरीके से सामने नहीं आ पाया । जरनैल ने इस मामले में दूरदर्शन के संदिग्ध रवैये पर भी सवाल खड़ा किया है । जरनैल ने लिखा है कि दूरदर्शन नरसंहार भड़काने में जुटा था । पूरे समय इंदिरा गांधी का शव और उसके आसपास खून का बदला खून के लग रहे नारों को टेलिकास्ट किया जा रहा था । अख़बार भी सही खबर देने के अपने धर्म को भूल चुके थे। हो सकता है उनकी आपत्ति जायज हो लेकिन उस वक्त जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस में आलोक तोमर और अश्विन सरीन जैसे पत्रकारों ने जान की बाजी लगाकर रिपोर्टिंग की थी । फोटोग्राफर संदीप शंकर की दंगाईयों ने जमकर पिटाई की थी । जरनैल को मीडिया पर सवाल करने के पहले उस दौर के रविवार के अंक भी देखने चाहिए । उन दिनों दिल्ली से उदयन शर्मा और उत्तर प्रदेश से संतोष भारतीय की रिपोर्ट ने देश को हिलाकार रख दिया था । चंद लोगों के लिखे पर पूरी मीडिया को कठघरे में खड़ा कर देने से जरनैल की हड़बड़ी दिखाई देती है ।
इस किताब का एक बड़ा हिस्सा उन लोगों के दर्द का है जिन्हें इस कत्ले आम के 25 साल बाद भी न्याय नहीं मिला। दो महीने के बच्चे को चूल्हे पर रखकर जला दिया गया, लोगों को टायर में फंसा कर आग लगा दी गयी। बेटे का सामने पिता को, पत्नी के सामने पति को, बहन के सामने भाई को कत्ल कर दिया गया । किस तरह से एक शहर से एक पूरी कौम को खत्म करने की कोशिश की गई । किताब के पहले हिस्से में इस दर्द को जगह मिली है । दूसरे हिस्से में न्याय कर्ता और अन्यायकर्ता की चर्चा की गई है । इस हिस्से में जरनैल ने एच के एल भगत, सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर की भूमिका पर लिखा है है साथ ही उस दौर में पूर्नी दिल्ली के त्रिलोकपुरी इलाके के एसएचओ त्यागी के कारनामों को भी बयान किया है । जरनैल ने मौन साधे रहने पर तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और गृहमंत्री नरसिम्हा राव पर भी उंगली उठाई है । लेकिन जरनैल की इस किताब में नया कुछ भी नहीं है । सिर्फ आयोग की फाइलों से केस स्टडीज को निकालकर सामने रखा गया है । दरअसल इस कत्लेआम पर इतनी हृदय विदारक घटनाएं और परिस्थितियां हैं कि पाठक उसे पढ़ते वक्त भाषा और शैली को बिल्कुल ही भूल जाता है । लेकिन अगर चंद पलों के लिए हम एक किताब के तौर पर इसपर विचार करें को जिस तरह से जल्दबाजी में लोगों के दर्द को बयां किया गया है वो यह महसूस कराता है कि इसमें पर्याप्त शोध की जरूरत थी । इस विषय पर ही दो हजार सात के अक्तूबर में रोली बुक्स से वरिष्ठ पत्रकार मनोज मिट्टा और वकील एच एस फुल्का की किताब -व्हेन ए ट्री शुक डेल्ही- आई थी । जो कि इस विषय पर लिखी गई एक बेहतीन किताब है । मनोज मिट्टा की किताब का फलक बहुत बडा़ है और उसमें जो दर्द है, उसमें जो घटनाएं और परिस्थियां बयान की गई हैं वो सचमुच दिल दहला देनी हैं । शाहदरा स्टेशन पर एक नवविवाहिता के पति को मार देनेवाली घटना दो साल पहले पढ़ी थी लेकिन अब भी मेरे जेहन में बरकरार है । मिट्टा और फुल्का की उक्त किताब में ना केवल कत्लेआम के शिकार हुए परिवार के दुखों की दास्तां है बल्कि उसमें न्याय के लिए उनका संघर्ष भी प्रमुखता से सामने रखकर पूरी व्यवस्था पर चोट की गई है । मुझे नहीं मालूम कि जरनैल ने वह किताब देखी थी या वहीं लेकिन इतना जरूर तय है कि जरनैल ने बेहद हड़बड़ी में यह किताब लिखी है और जल्दबाजी पूरी किताब में हर जगह दिखाई देती है । हो सकता है कत्लेआम के पच्चीस साल पूरे होने पर किताब के बाजार में लाने की जल्दबाजी हो या फिर कोई और वजह जिसपर से पर्दा तो सिर्फ लेखक ही उठा सकता है ।
Wednesday, December 16, 2009
निर्मल वर्मा का मेडल चोरी
मशहूर साहित्यकार स्वर्गीय निर्मल वर्मा के दिल्ली के पटपड़गंज स्थित घर से उनका पद्मभूषण मेडल चोरी हो गया है । चोरों ने पटपड़गंज के सहविकास सोसाइटी के उनके घर से लाखों के गहने के साथ उनके मेडल भी चुरा लिए । निर्मल वर्मा की पत्नी कवयित्री गगन गिल ने दिल्ली में इस बाबत एफ आईआर दर्ज करवा दिया है । गगन गिल ने आज दिनभर पुलिस थानों के चक्कर लगाए लेकिन पुलिस को अबतक कोई सुराग नहीं मिल पाया है । रविन्द्र नाठ टैगोर के नोबेल मैडल के बाद यह दूसरी बड़ी वारदात है जिसमें चोरों ने एक मशहूर साहित्यकार के मेडल पर हाथ साफ किया है । इस वारदात के बाद साहित्य जगत सकते में है ।
Tuesday, December 15, 2009
कांग्रेस का महिला (अ)प्रेम
देश की प्रथम नागरिक यानि राष्ट्रपति महिला, लोकसभा की अध्यक्ष महिला, देश की सत्तरूढ पार्टी की अध्यक्ष महिला ...कांग्रेस पार्टी हर वक्त इस बात का दंभ भरती है कि उसने महिलाओं को आगे बढ़ाने और उसको अवसर देने के लिए पर्याप्त कदम उठाए हैं । यह ठीक है कि राष्ट्रपति और लोकसभा अध्यक्ष के पद पर महिलाओं को चुनवाकर कांग्रेस ने एक प्रतीकात्मक काम किया लेकिन अगर हम इसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो कांग्रेस के महिला सशक्तिकरण का दावा खोखला नजर आता है, और ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस की रुचि कुछ खास महिलाओं को आगे बढाने में है जिससे उसे इस बात का दावा करने में सहूलियत होती रहे कि पार्टी महिलाओं के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध है ।
नौकरी के दौरान महिलाओं के सेक्सुअल हेरसमेंट के खिलाफ लंबे समय से बहस चल रही है । लगभग बारह साल पहले यानि उन्नीस सौ सनतानवे में सुप्रीम कोर्ट ने कार्यस्थल पर महिलाओं के सेक्सुअल हेरासमेंट को लेकर एक गाइडलाइन जारी किया था और हर कंपनी, विश्वविद्यालय और कॉलेजों के लिए यह अनिवार्य कर दिया था कि वहां इन शिकायतों पर गौर करने के लिए एक कमिटी बनाई जाए । इस कमेटी में आधी हिस्सेदारी महिलाओं की हो और इसमें एक वकील की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाए । सर्वोच्च न्यायलय के मुताबिक इस कमिटी की प्रमुख का महिला का होना अनिवार्य है । इस गाइडलाइन के जारी होने के बाद राष्ट्रीय महिला आयोग ने संबंद्ध पक्षों से बातचीत शुरू की और लगभग नौ साल बाद प्रस्तावित कानून के लिए एक ड्राफ्ट तैयार हो पाया ।
बिल के ड्राफ्ट को तैयार हुए भी तीन साल हो गए लेकिन अब तक इसे संसद में पेश नहीं किया जा सका । पिछले दिनों प्रधानमंत्री से जब एक प्रतिनिधिमंडल ने मुलाकात की तो मनमोहन सिंह ने जल्द ही इस विषय में कुछ करने का आश्वासन देकर इससे पल्ला झाड़ लिया । दरअसल द प्रीवेंशन ऑफ द सेक्सुअल हेरासमेंट एट द वर्कप्लेस बिल दो मंत्रालयों के बीच झूल रहा है और शास्त्री भवन के कमरों में धूल चाट रहा है । बाल और महिला क्लयाण मंत्री कृष्णा तीरथ का दावा है कि इस बिल को जल्द से जल्द कानूनी जामा पहना दिया जाएगा । कृष्णा तीरथ का दावा है कि बिल तैयार है और उसपर कानून मंत्रालय की सलाह ली जा रही है । लेकिन देश के कानून मंत्री से जब पूछा जता है तो उनका कहना है कि अभी प्रस्तवित बिल को देखा जाना बाकी है । संकेत साफ है कि सरकार अभी इस बिल को लेकर गंभीर नहीं है। इस तरह के बयानों से इस प्रस्तावित बिल को सरकार का उपेक्षा भाव साफ तौर पर परिलक्षित किया जा सकता है । कानून के जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के गाइडलाइंस से काम की जगह पर यौन शोषण से निबटना आसान नहीं है । इस गाइडलाइंस में यौन शोषण को परिभाषित करना मुश्किल है और दंड का कोई प्रावधान नहीं है, सिर्फ सिफारिश की जा सकती है , कार्रवाई तो अभी के कानून के मुताबिक ही संभव है । इस गाइडला के मुताबिक बनी जांच कमिटी में शिकायतकर्ता को भी बुलाकर पूछताछ की जाती है और उसके आरोपों के बहाने ऐसे तेजाब बुझे शब्दों के प्रयोग किया जाता है कि शिकतायत करनेवाली महिला के होश उड़ जाते हैं । जिस महिला ने यौन शोषण की शिकायत की हो उससे फिर से पूरी घटना को बयान करने को कहना कितना बड़ा मानसिक उत्पीड़न है ।
प्रस्तावित बिल में जिसके बारे में शिकायत की गई है उसको यह साबित करना होगा कि वो निर्दोष है । य़ह एक बड़ी राहत है क्योंकि अभी हो यह रहा है कि जिसने शिकायत की उसे ही दोष साबित करना पड़ता है । और शिकायतकर्ता को अपने साथियों के तानों का भी शिकार होना पड़ता है । प्रस्तवित बिल में इससे भी बचाव का प्रावधान है ।
आईपीसी में बलात्कार और महिलाओं से छेड़छाड़ के लिए सजा का प्रावधान है लेकिन अगर किसी महिला को उसका बॉस हर दो मिनट पर अपने केबिन में बुलाता है या फिर बड़े ही शातिराना अंदाज में उसके कंधे पर हाथ रखकर उसको तंग करता है तो इसके लिए कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीड्यूर या आईपीसी की किसी धारा में ना तो शिकायत का प्रावधान है और ना ही सजा का । ऐसी किसी शिकायत को लेकर कोई भी लड़की या महिला पुलिस थाने जाती भी है तो पुलिसवाले ही उसका मजाक उड़ाकर बात को हवा में उड़ा देते हैं । लेकिन प्रस्तावित कानून में इस तरह की ज्यादतियों को भी ध्यान में ऱखकर धाराएं और सजा निर्धारित की गई हैं ।
अगर सरकार कामकाजी महिलाओं के अधिकारों को लेकर सचमुच गंभीर है तो इस प्रस्तावित बिल को तत्काल संसद के चालू सत्र में पेश कर इसपर बहस करवाई जाए । सरकार की यह भी जिम्मेदारी बनती है कि इस बिल को संसद से पास करवाकर कानून बनवाए ताकि महिलाओं को कार्य स्थल पर सुरक्षा का माहौल मिल सके । नहीं तो यूपीए सरकार और उसकी चेयरपर्सन सोनिया गांधी पर भी सवाल खड़े होंगे क्योंकि महिला आरक्षण बिल पर भी कांग्रेस कोई टोस कदम अबतक उठा नहीं पाई है ।
नौकरी के दौरान महिलाओं के सेक्सुअल हेरसमेंट के खिलाफ लंबे समय से बहस चल रही है । लगभग बारह साल पहले यानि उन्नीस सौ सनतानवे में सुप्रीम कोर्ट ने कार्यस्थल पर महिलाओं के सेक्सुअल हेरासमेंट को लेकर एक गाइडलाइन जारी किया था और हर कंपनी, विश्वविद्यालय और कॉलेजों के लिए यह अनिवार्य कर दिया था कि वहां इन शिकायतों पर गौर करने के लिए एक कमिटी बनाई जाए । इस कमेटी में आधी हिस्सेदारी महिलाओं की हो और इसमें एक वकील की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाए । सर्वोच्च न्यायलय के मुताबिक इस कमिटी की प्रमुख का महिला का होना अनिवार्य है । इस गाइडलाइन के जारी होने के बाद राष्ट्रीय महिला आयोग ने संबंद्ध पक्षों से बातचीत शुरू की और लगभग नौ साल बाद प्रस्तावित कानून के लिए एक ड्राफ्ट तैयार हो पाया ।
बिल के ड्राफ्ट को तैयार हुए भी तीन साल हो गए लेकिन अब तक इसे संसद में पेश नहीं किया जा सका । पिछले दिनों प्रधानमंत्री से जब एक प्रतिनिधिमंडल ने मुलाकात की तो मनमोहन सिंह ने जल्द ही इस विषय में कुछ करने का आश्वासन देकर इससे पल्ला झाड़ लिया । दरअसल द प्रीवेंशन ऑफ द सेक्सुअल हेरासमेंट एट द वर्कप्लेस बिल दो मंत्रालयों के बीच झूल रहा है और शास्त्री भवन के कमरों में धूल चाट रहा है । बाल और महिला क्लयाण मंत्री कृष्णा तीरथ का दावा है कि इस बिल को जल्द से जल्द कानूनी जामा पहना दिया जाएगा । कृष्णा तीरथ का दावा है कि बिल तैयार है और उसपर कानून मंत्रालय की सलाह ली जा रही है । लेकिन देश के कानून मंत्री से जब पूछा जता है तो उनका कहना है कि अभी प्रस्तवित बिल को देखा जाना बाकी है । संकेत साफ है कि सरकार अभी इस बिल को लेकर गंभीर नहीं है। इस तरह के बयानों से इस प्रस्तावित बिल को सरकार का उपेक्षा भाव साफ तौर पर परिलक्षित किया जा सकता है । कानून के जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के गाइडलाइंस से काम की जगह पर यौन शोषण से निबटना आसान नहीं है । इस गाइडलाइंस में यौन शोषण को परिभाषित करना मुश्किल है और दंड का कोई प्रावधान नहीं है, सिर्फ सिफारिश की जा सकती है , कार्रवाई तो अभी के कानून के मुताबिक ही संभव है । इस गाइडला के मुताबिक बनी जांच कमिटी में शिकायतकर्ता को भी बुलाकर पूछताछ की जाती है और उसके आरोपों के बहाने ऐसे तेजाब बुझे शब्दों के प्रयोग किया जाता है कि शिकतायत करनेवाली महिला के होश उड़ जाते हैं । जिस महिला ने यौन शोषण की शिकायत की हो उससे फिर से पूरी घटना को बयान करने को कहना कितना बड़ा मानसिक उत्पीड़न है ।
प्रस्तावित बिल में जिसके बारे में शिकायत की गई है उसको यह साबित करना होगा कि वो निर्दोष है । य़ह एक बड़ी राहत है क्योंकि अभी हो यह रहा है कि जिसने शिकायत की उसे ही दोष साबित करना पड़ता है । और शिकायतकर्ता को अपने साथियों के तानों का भी शिकार होना पड़ता है । प्रस्तवित बिल में इससे भी बचाव का प्रावधान है ।
आईपीसी में बलात्कार और महिलाओं से छेड़छाड़ के लिए सजा का प्रावधान है लेकिन अगर किसी महिला को उसका बॉस हर दो मिनट पर अपने केबिन में बुलाता है या फिर बड़े ही शातिराना अंदाज में उसके कंधे पर हाथ रखकर उसको तंग करता है तो इसके लिए कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीड्यूर या आईपीसी की किसी धारा में ना तो शिकायत का प्रावधान है और ना ही सजा का । ऐसी किसी शिकायत को लेकर कोई भी लड़की या महिला पुलिस थाने जाती भी है तो पुलिसवाले ही उसका मजाक उड़ाकर बात को हवा में उड़ा देते हैं । लेकिन प्रस्तावित कानून में इस तरह की ज्यादतियों को भी ध्यान में ऱखकर धाराएं और सजा निर्धारित की गई हैं ।
अगर सरकार कामकाजी महिलाओं के अधिकारों को लेकर सचमुच गंभीर है तो इस प्रस्तावित बिल को तत्काल संसद के चालू सत्र में पेश कर इसपर बहस करवाई जाए । सरकार की यह भी जिम्मेदारी बनती है कि इस बिल को संसद से पास करवाकर कानून बनवाए ताकि महिलाओं को कार्य स्थल पर सुरक्षा का माहौल मिल सके । नहीं तो यूपीए सरकार और उसकी चेयरपर्सन सोनिया गांधी पर भी सवाल खड़े होंगे क्योंकि महिला आरक्षण बिल पर भी कांग्रेस कोई टोस कदम अबतक उठा नहीं पाई है ।
Sunday, December 13, 2009
स्त्री आकांक्षा की नई उड़ान
हमेशा संपूर्ण भारतीय परिधान में रहनेवाली महामहिम राष्ट्रपति को जब अचानक वायुसेना की खास वर्दी में पुणे के लोहेगांव एयरबेस पर लड़ाकू विमान सुखोई की ओर बढ़ते देखा तो सहसा यकीन नहीं हुआ कि एक भारतीय नारी इस सुपरसोनिक विमान में यात्रा कर सकती है । वायुसेना की वर्दी में जब प्रतिभा पाटिल सुखोई की सीढियां चढ़ रही थी तो वो एक नए इतिहास की ओर कदम बढ़ा रही थी । शांत, सौम्य चेहरे में प्रतिभा पाटिल जब सुखोई में बैठकर हाथ हिला रही थी वह दृश्य बुलंद होते भारत की एक ऐसी तस्वीर थी जिसपर हर भारतवासी गर्व कर सकता था । कहते हैं जब कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है । और हुआ भी वही- उम्र के चौहत्तर साल पूरे कर चुकी महामहिम प्रतिभा पाटिल ने आसमान में आठ हजार फीट की उंचाई पर आधे घंटे तक उड़ानभर कर इतिहास रच दिया । वो भारतीय गणतंत्र की पहली महिला राष्ट्रपति बन गई जिन्होंने सुपरसोनिक लडाकू विमान में इतनी ऊंचाई पर उडी । इस उड़ान के लिए महामहिम ने दो महीने तक जबरदस्त तैयारी की। उन्हें विमान में उड़ने के तौर तरीकों को बताया गया था । आपातस्थति से तैयार रहने के हर नुस्खे की बारिकियों को बताया गया। जोखिमों से निबटने की हर ट्रेनिंग लेने के बाद प्रतिभा पाटिल ने पुणे के लोहेगांव एयरबेस से उडान भरी । लगभग आधे घंटे तक आठ हजार फीट की उंचाई पर उड़ान भरने के बाद प्रतिभा पाटिल ने माना कि योग और नियमित व्याययाम से उन्हें इस कठिन उड़ान में मदद मिली । तो एक बार फिर साबित हुआ कि कड़ी मेहनत और हौसले के आगे कोई भी लक्ष्य बौना है ।
इस उड़ान का सिर्फ प्रतीकात्मक महत्व नहीं है बल्कि इसके गंभीर निहितार्थ हैं । प्रतिभा पाटिल ने सुखोई में यात्रा कर भारतीय महिलाओं की आकांक्षाओं को भी एक नई उड़ान दे दी है । एक ऐसे देश में जहां आज भी महिलाओं के साथ लगातार और हर रोज नाइंसाफी होती है, उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखा जाता हो, वहां एक उस देश की प्रथम नागरिक ने अपने देश की आधी आबादी को यह संकेत दे दिया कि अगर कड़ी मेहनत का जज्बा हो और हौसले बुलंद हो तो कुछ भी किया जा सकता है । प्रतिभा पाटिल ने यह भी माना कि इस देश की महिलाओं की योग्यता में उन्हें पूरा यकीन है । तकनीकी और अन्य दिक्कतों को दरकिनार कर अगर महिलाओं को मौका मिले तो वो हर क्षेत्र में अपनी सफलता के झंडे गाड़ सकती हैं । राष्ट्रपति जब यह कह रही थी देश की महिलाओं को एक ऐसा आत्मबल मिल रहा था जो उनके उत्थान के लिए बहुत मददगार साबित हो सकता है । इस प्रतीकात्मक उड़ान के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं, जो देश में महिलाओं को नए -नए क्षेत्र में हाथ आजमाने के लिए प्ररित कर सकते हैं । और जब भी इस देश में किसी महिला ने किसी भी काम के लिए कमर कसी तो उसे सफलता ही मिली, राष्ट्रपति का यह विश्वास गलत भी नहीं है ।
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से पहले आठ जून दो हजार छह को उस वक्त के राष्ट्रपति ए पी जे अबुल कलाम ने सुखोई में य़ात्रा की थी । चालीस मिनट की य़ात्रा के बाद उस वक्त के राष्ट्रपति कलाम ने भी यही कहा था कि उन्हें यकीन हो गया है कि देश सुरक्षित हाथों में है । अब कलाम के बाद प्रतिभा पाटिल ने भी सुपरोसिनक विमान में यात्रा कर भारतीय सेना को ये संदेश दे दिया है कि राष्ट्रपति सिर्फ नाम मात्र के लिए तीनों सेना का सुप्रीम कमांडर नहीं है बल्कि वो हर कदम पर अपनी सेना के साथ है । चौहत्तर साल में इस अदम्य साहस के लिए देश के राष्ट्रपति की जितनी प्रशंसा की जाए वो कम है ।
इस उड़ान का सिर्फ प्रतीकात्मक महत्व नहीं है बल्कि इसके गंभीर निहितार्थ हैं । प्रतिभा पाटिल ने सुखोई में यात्रा कर भारतीय महिलाओं की आकांक्षाओं को भी एक नई उड़ान दे दी है । एक ऐसे देश में जहां आज भी महिलाओं के साथ लगातार और हर रोज नाइंसाफी होती है, उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखा जाता हो, वहां एक उस देश की प्रथम नागरिक ने अपने देश की आधी आबादी को यह संकेत दे दिया कि अगर कड़ी मेहनत का जज्बा हो और हौसले बुलंद हो तो कुछ भी किया जा सकता है । प्रतिभा पाटिल ने यह भी माना कि इस देश की महिलाओं की योग्यता में उन्हें पूरा यकीन है । तकनीकी और अन्य दिक्कतों को दरकिनार कर अगर महिलाओं को मौका मिले तो वो हर क्षेत्र में अपनी सफलता के झंडे गाड़ सकती हैं । राष्ट्रपति जब यह कह रही थी देश की महिलाओं को एक ऐसा आत्मबल मिल रहा था जो उनके उत्थान के लिए बहुत मददगार साबित हो सकता है । इस प्रतीकात्मक उड़ान के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं, जो देश में महिलाओं को नए -नए क्षेत्र में हाथ आजमाने के लिए प्ररित कर सकते हैं । और जब भी इस देश में किसी महिला ने किसी भी काम के लिए कमर कसी तो उसे सफलता ही मिली, राष्ट्रपति का यह विश्वास गलत भी नहीं है ।
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से पहले आठ जून दो हजार छह को उस वक्त के राष्ट्रपति ए पी जे अबुल कलाम ने सुखोई में य़ात्रा की थी । चालीस मिनट की य़ात्रा के बाद उस वक्त के राष्ट्रपति कलाम ने भी यही कहा था कि उन्हें यकीन हो गया है कि देश सुरक्षित हाथों में है । अब कलाम के बाद प्रतिभा पाटिल ने भी सुपरोसिनक विमान में यात्रा कर भारतीय सेना को ये संदेश दे दिया है कि राष्ट्रपति सिर्फ नाम मात्र के लिए तीनों सेना का सुप्रीम कमांडर नहीं है बल्कि वो हर कदम पर अपनी सेना के साथ है । चौहत्तर साल में इस अदम्य साहस के लिए देश के राष्ट्रपति की जितनी प्रशंसा की जाए वो कम है ।
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