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Sunday, January 3, 2016

साहित्यक सर्वे में लापरवाही का “खेल’

आज से करीब सोलह साल पहले की बात है । दिल्ली के एक प्रतिष्ठित दैनिक में साहित्यक पुस्तकों के प्रकाशन का सालाना लेखा-जोखा छपा था । उस अखबार के सालाना लेखा जोखा का पूरे हिंदी जगत को इंतजार रहता था । वर्ष 1999 के उस साहित्यक सर्वे में उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल के पहले उपन्यास काला पहाड़ का भी उल्लेख सर्वेकार ने किया था । सर्वे करनेवाले लेखक ने लिखा था कि भगवानदास मोरवाल का ये उपन्यास काला पहाड़ पहाड़ी जीवन पर लिखा गया बेहतरीन उपन्यास है । इस टिप्पणी को पढ़ने के बाद उस समय हिंदी के सजग पाठकों ने अपन सर धुन लिया था क्योंकि ये टिप्पणी उपन्यास पर ना होकर उसके शीर्षक को ध्यान में रखकर लिखा गया था । दरअसल भगवानदास मोरवाल का उपन्यास काला पहाड़ हरियाणा के मेवात इलाके की सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि पर लिखा गया उपन्यास है. उस उपन्यास नमे पहाडी जीवन कहां है या फिर समीक्षक महोदय की वो कौन सी दिव्य दृष्टि थी जिसने उसमें पहाड़ी जीवन ढूंढ निकाला ये बात उपनयास के लेखक भी नहीं बता पाए ।   सालभर प्रकाशित पुस्तकों का लेखा-जोखा करनेवाले माननीय लेखक को लगा कि शीर्षक में पहाड़ है तो कहानी पहाड़ से संबंधित होगी, लिहाजा उन्होंने बगैर उसको पढ़े लिख दिया और वो छप भी गया । करीब डेढ़ दशक बाद इस प्रसंग की याद इस वजह से आई कि इस साल भी अखबारों और बेवसाइट्स पर प्रकाशित सालाना सहित्यक लेखा-जोखा को पढ़ने के बाद यह लग कि टिप्पणीकारों ने या तो किताब को पढ़ा नहीं है या फिर जल्दबाजी में अपने पहचानवालों का नाम लेने में पुस्तक का प्रकाशन वर्ष तक भी भुला कर घालमेल कर दिया है । दरअसल अखबारों में होनेवाले इस आयोजन की अपनी एक अहमियत है । इन आयोजनों में की गई गलतियां भविष्य में किए जानेवाले शोध को प्रभावित करते हैं और गलत इतिहास पेश करने का आधार तैयार करते हैं । इस साल भी साहित्यक सर्वे को देखकर यही लगता है कि टिप्पणीकारों ने बहुत कैजुअल तरीके से इस तरह की टिप्पणियां की या लिखीं । इस वर्ष के सर्वे में थोक के भाव में बगैर पढ़े किताबों की सूची पेश कर दी गई । अखबारों में इस तरह के सर्वे में टिप्पणी लिखने में एक सहूलियत रहती है कि किसी भी कृति के बारे में दो या तीन लाइन से ज्यादा नहीं लिखना पड़ता है । दो हजार पंद्रह मे प्रकाशित सर्वे में भी इस तरह की कई असावधान टिप्पणियां गई हैं जिसको रेखांकित किए जाने की जरूरत है । एक आलोचक ने अल्पना मिश्र के उपन्यास अन्हियारे चलछट में चमका को दो हजार पंद्रह में प्रकाशित कृति करार दे दिया । यह एक भयंकर भूल है जो कि यह दिखाता है कि हिंदी के वरिष्ठ लेखक और आलोचक प्रकाशित कृतियों को लेकर कितने अगंभीर हैं । इस कृति को लेकर दो एक लोगों को और भ्रम हुआ । इसी तरह से एक मशहूर अंतराष्ट्रीय बेवसाइट ने भी हिंदी साहित्य के साल दो हजार पंद्रह का लेखा जोखा प्रस्तुत किया । उसको पढ़कर ये प्रतीत हो रहा था कि लेखक साहित्य की इस परंपरा से अनभिज्ञ हैं । इसके अलावा इस तरह के सर्वे में यह भी देखा गया कि पंद्रह बीस दिन पहले प्रकाशित पुस्तक भी चर्चित पुस्तकों की श्रेणी में आ गया । जो कहानी संग्रह पटना पुस्तक मेला में पिछले वर्ष दिसंबर में विमोचित हुआ और ठीक से पाठकों के बीच पहुंच भी नहीं पाया उसको भी टिप्पणीकारों ने उल्लेखनीय कृति के रूप में रेखांकित कर दिया । यह असावधानी है या अज्ञानत या फिर पक्षपात इसका फैसला हिंदी साहित्य के सुधीजनों को कर देना चाहिए । इसी तरह के करीब महीने भर पहले छपी एक आत्मकथा को भी टॉप टेन आत्मकथा में शुमार कर दिया गया । ये जल्दबाजी क्यों । संभव है इन किताबों का प्रकाशन वर्ष भी सही नहीं हो क्योंकि दिसंबर में छपनेवाली अधिकांश किताबों में प्रकाशन वर्ष अगले ही साल का होता है ।

पिछले दिनों हिंदी साहित्य में समीक्षा लिखनेवालो पर ऊंगली उठी थी जब एक युवा आलोचक ने युवा लेखिका के उपन्यास पर समीक्षा लिखी थी । उस समीक्षा में आलोचक महोदय ने उपन्यास की उस पृष्ठभूमि की चर्चा की थी जो वहां मौजूद नहीं है । इसके अलावा भी अखबार में लिखी जानेवाली समीक्षाओं में असावधानियां या लापरवाहियां की बातें सामने आती रहती हैं । समीक्षा एक गंभीर कर्म है वहां छूट नहीं लिया जा सकता है । इसल तरह की असावधानी या लापरवाहियों से समीक्षा लिखनेवाले तमाम समीक्षक संदेह क घेरे में आ जाते हैं ।  साहित्यक सर्वे लिखनेवालों को यह सहूलियत रहती है कि लेखक ब्लर्ब लिखकर टिप्पणी कर दे । ज्यादातर मामलों में यही होता भी है लेकिन यह साहित्यक बेइमानी है । इस बार तो कई लेखकों ने सोशल मीडिया पर इन लापरवाह सर्वेकारों और सर्व में टिप्पणी करनेवालों की खासी लानत मलामत की । सोशल मीडिया के दौर में इस तरह की चूक को सार्वजनिक होने में जरा भी देर नहीं लगती है । सोशल मीडिया पर सार्वजनिक होने के बाद पाठकों को ठगे जाने का एहसाल होता है । पाठकों को साहित्य की राजनीति से कोई लेना देना नहीं है । मतलब तो उनको इस बात से भी नहीं होता है कि कोई लेखक किसी को उठाने या गिराने के लिए नाम लेता या नहीं लेता है । वो तो बस लेखकों को सही मानकर उनपर भरोसा करता है । जब आलोचक का तमगा लगाए लोग इस तरह की लापरवाहियों में चिन्हित किए जाते हैं तो साहित्य की साख को धक्का लगता है । पाठकों का विश्वास दरकता है । जब पाठकों का साहित्यकारों को लेकर विश्वास दरकता है तो वो स्थिति साहित्य क विकास में बाधा बनती है । इस साल की घटनाओं को देखकर चिंता होती है । अखबारों की भी ये जिम्मेदारी है कि वो सर्वेकारों या टिप्पणीकारों की लापरवाही सामने आने के बाद गलतियों को प्रकाशित करे और भविष्य में उनको इस काम से अलग रखें । जिस तरह से चुनावों के सर्वेक्षणों को लेकर लोगों के विश्वास में कमी आई है उसी तरह से साहित्य के इन सर्वेक्षणों में भी पाठकों का विश्वास घटने लगा है । सालभर के साहित्य का सर्वेक्षण करना अपने आप मे एक श्रमसाध्य काम है और सर्वेकार को सालभर सजग रहना पड़ता है । साहित्यक घटनाओं से लेकर चर्चित प्रकाशनों तक का खाता-बही संभालना पड़ता है । सैकड़ों किताबें पढ़नी पड़ती हैं तब जाकर सर्वेक्षण संभव हो पाता है । 

Saturday, January 2, 2016

सियासत के बीच साहित्य

दो हजार पंद्रह के आखिरी दिनों में साहित्य के सालाना लेखा-जोखा को पढ़ते हुए यह बात फिर से उभर कर सामने आई कि हमारे यहां के नेता साहित्य संस्कृति आदि से दूर होते जा रहे हैं । साहित्य से उनको बहुत ज्यादा मतलब रह नहीं गया है और संस्कृति से वहां तक मतलब है जहां तक वो वोट बैंक की राजनीति के लिए उर्वरक का काम करती है । बार बार संस्कृति की दुहाई देकर ध्रुवीकरण करने की कोशिश करती है । पुरस्कार वापसी के दौर में जिस तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिली थीं उससे लगा था कि राजनीतिक दल और नेता साहित्य को बहुकत गंभीरता से लेते नहीं हैं । साहित्य को लेकर राजनीतिक जमात की इस उदासीनता के पीछे की वजहों को तलाश करने की जरूरत है । एक जमाना होता था जब साहित्य में क्या कुछ लिखा-पढ़ा जा रहा है इसको लेकर देश की राजनीतिक जमात में जानने की उत्सुकता होती थी । ना सिर्फ हमारे राजनेता उत्सुक होते थे बल्कि वक्त निकालकर साहित्यक कृतियों को पढ़ते भी थे । गांधी जी तो बकायदा साहित्यक विवादों में हिस्सा लेकर अपना मत तक रखा करते थे । आजादी पूर्व से लेकर यह स्थिति कमोबेश साठ के दशक के अंतिम वर्षों तक बनी रही । कहना ना होगा कि सत्तर के दशक और खासकर इमरजेंसी के बाद तो नेता साहित्य से दूर होते चले गए । इस बात की पड़ताल किए जाने की आवश्यकता है कि जिस इमरजेंसी के खिलाफ कुछ साहित्यकारों ने सक्रिय भूमिका निभाई उसी इमरजेंसी के बाद साहित्य और राजनीतिक बिरादरी के बीच खाई इतनी चौड़ी कैसे हो गई । यहां एक बार फिर से यह याद दिलाना जरूरी है कि प्रगतिशील लेखक संघ ने इमरजेंसी का समर्थन किया था । प्रगतिशील लेखक संघ अपनी स्थापना के कई साल बाद कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया का बौद्धिक प्रकोष्ठ बनकर रह गया और इससे जुड़े लेखक पार्टी के कार्यकर्ता । इमरजेंसी के समर्थन के एवज में कांग्रेस की सरकारों ने इस संगठन के लोगों को साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में खुली छूट दी । इस संगठन के बोलबाला के बाद साहित्य लेखन एक खास दिशा में और एक खास विचार के इर्द-गिर्द प्रमुखता से होने लगा । इस बात का संबंध राजनीतिक जमात के साहित्य से दूर जाने से है या नहीं यह गहन शोध का विषय है । आज स्थिति यह है कि हमारे देश के नेता निजी बातचीत से लेकर सार्वजनिक बातचीत में यह कहते पाए जाते हैं कि साहित्य और साहित्यकारों की हैसियत क्या है । कौन जानता है इनको । कितने लोग इनको पढ़ते हैं । याद कीजिए पुरस्कार वापसी का दौर जब इस तरह के जुमले सुनने को मिलते थे । यह स्थिति किसी भी समाज के लिए अच्छी नहीं है । देश के रहनुमा अगर साहित्य से दूर चले जाएं या फिर वो साहित्य को इस नजरिए से देखें तो साहित्य से जुड़े लोगों को इस बात के लिए आत्ममंथन करना चाहिए । मंथन तो नेताओं को भी करना चाहिए कि क्यों कर वो रचनात्मकता से दूर होते चले गए ।
अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कविताओॆ की किताब प्रकाशित हुई थी । हिंदी साहित्य के लोगों ने उस किताब पर बात ही नहीं की । नरेन्द्र मोदी की कविताओं को लेकर हिंदी साहित्य जगत में उसी तरह की उपेक्षा का भाव दिखाई देता है जिस तरह से अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं को लेकर दिखाई देता था । अगर कविताएं कमजोर हैं तो उसको तर्कों के साथ खारिज किया जाना चाहिए लेकिन उसपर बात ही ना हो यह तो एक तरह की अस्पृश्यता है । मेरी समझ से यह अस्पृश्यता भी राजनीतिक जमात के साहित्य से लगातार दूर होते जाने की वजह रही है । इस तरह की अस्पृश्यता भाव से लेखकों को लेकर पाठकों के मन में सवाल खडे़ होते हैं और उनकी वस्तुनिष्ठता संदिग्ध हो जाती है । लेकिन अब भी कई नेता हैं जो साहित्य और लेखन से अपना नाता जोड़े हुए हैं । चंद सालों पहले कपिल सिब्बल मोबाइल पर कविताएं लिखा करते थे जिसकी उन दिनों चर्चा भी हुई थी, बाद में उनका संग्रह भी प्रकाशित हुआ था । सलमान खुर्शीद और शशि थरूर तो नियमित रूप से लेखन करते ही रहते हैं । उनकी किताबें निश्चित अंतराल पर आती हैं और ये दोनों साहित्यक आयोजनों में भी दिखाई देते हैं । एक और नेता वीरप्पा मोइली भी साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय हैं और उनकी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं । कुछ दिनों पहले बीजेपी के सांसद वरुण गांधी की कविता की किताब भी प्रकाशित हुई थी । गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा भी अच्छी लेखिका हैं और उनकी भी कई किताबें प्रकाशित हैं । लेकिन विशाल राजनीतिक जमात में ये चंद नाम हैं । देश की राजनीति में सबसे नई पार्टी आम आदमी पार्टी के नेता दिलीप पांडे भी साहित्यक लेखन में खासे सक्रिय हैं । दिलीप पांडे पार्टी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष और राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं । बावजूद अपनी व्यस्तताओं के वो लगातार लेखन कर रहे हैं । दिलीप पांडे और उनकी सहयोगी चंचल शर्मा की पहली किताब दहलीज पर दिल प्रकाशित हो चुकी है और उनका दूसरा उपन्यास खुलती गिरहें अभी अभी प्रकाशित हुआ है । दिलीप पांडे युवा हैं और साहित्यक लेखन में उनकी रुचि है तो यह अच्छी बात है । मैंने उनसे पूछा कि आम आदमी पार्टी की राजनीति करते हुए साहित्यक सृजन कैसे कर लेते हैं तो उन्होंने बताया कि वो तकनीक का सहारा लेते हैं और अपने सहयोगी के साथ लेखन को अंजाम देते हैं । दिलीप पांडे गूगल ड्राइव का उपयोग कर लिखते हैं जिसमें ये सहूलियत होती है कि वो और चंचल शर्मा एक दूसरे के लेखन को देख सकते हैं और साथ ही लिख भी सकते हैं । अपने पहले उपन्यास दहलीज पर दिल में अन्ना आंदोलन के दौरान अपने अनुभवों को कलमबद्ध किया था । अब अपने दूसरे उपन्यास खुलती गिरहें को वो मन और मान्यताओं की गिरह खोलतीं स्त्रियों को सामने लाता उपन्यास बताते हैं ।
खुलती गिरहें की छोटी सी भूमिका में दिल्ली हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष और वरिष्ठ उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा लिखती हैं रिश्ते-नाते वसुधा की गांठ आ बंधे तो अजूबा क्या है । ग्रह-नक्षत्रों के झिलमिलाते महूरतों भरे धरती, आकाश और वसुधा का पाणिग्रहण । यह लड़की पति चाहती है या प्रेमी ? स्त्री मन की गिरहें कौन खोल पाया है, हार गए ऋषि-मुनि, पस्त पड़ी हैं स्मृतियां और स्त्री की गर्दन धड़ से अलग उड़ाने का एलान कर रहे हैं याज्ञवल्क्य । खीझ, कुंठा और क्रोध का लावा कितना ही फैले, धरा और देवयानी को कौन समझ पाएगा, जब तक कि वो खुद उन रहस्यों को न खोल दें जो महान कवयित्री महादेवी वर्मा की गिरह में बंधे रहे । सारे विद्रोह के बावजूद जिसको मीरा भी कृष्ण रूप में पति ही पूजतीं मिली । मैत्रेयी पुष्पा की इन टिप्पणियों से साफ है कि उपन्यास के पात्र किस तरह से और किन परिस्थियों में रचे गए हैं । मैत्रेयी पुष्पा अपनी भूमिका में यह भी सवाल उठाती हैं कि मुख्तसर सी बात है,प्रेम करती है युवती, अपराध क्यों माना जाता है । स्वर्ग नरक किसने देखा है, यह कृति सचमुच का संसार दिखाती है जो न स्वर्ग होता है न नरक । तथाकथित नैतिकतावादी इन स्त्रियों को समाज की बदनाम और गुमराह औरतें कहकर सजा बोल सकते हैं क्योंकि इन्होंने अपने शरीर और मन को उन लोगों की इच्छाओं तक सीमित नहीं रहने दिया जो उनके पति या मालिक थे । हो सकता है कि ये आपको षडयंत्रकारिणी भी लगें क्योंकि ये अपनी जिंदगी को लेकर बच निकलीं ।इन पंक्तियों से साफ है कि उपन्यास स्त्रियों के संघर्ष पर है । संभव है कि इसमें सचाई भी हो और उसको लेखकों ने फिक्शनलाइज भी किया हो । अच्छी बात यह है कि इस उपन्यास में महिलाएं सिर्फ अपने मन की गिरहें ही नहीं खोलती हैं बल्कि वो सचमुच का संसार दिखाती हुई अपने मन का करती भी हैं । इस उपन्यास की एक और अच्छी बात यह भी है कि नायिकाएं पूर्ववर्ती लेखकों की नायिकाओं की छवि को तोड़कर आगे बढ़ती है और कहानी को या अपने संघर्ष को अंजाम तक पहुंचाती भी हैं । पहले के उपन्यासों में ज्यादातर महिलाओं के संघर्ष का चित्रण होता था जहां नायिकाएं दुख और पीड़ा के साथ साथ ही खत्म हो जाती थी । इस उपन्यास में इस लिहाज से नायिकाएं साहस दिखाती हैं और अपना रास्ता तलाशती हैं । संभव है कि पाठकों को किसी पात्र के साथ यह लगे कि उसने भी तो सारे विद्रोह के बावजूद पति में ही अपना भविष्य तलाशा । कुल मिलाकर देखें तो यह उपन्यास स्त्री विमर्श को एक नया आयाम तो देता ही है साथ ही विमर्श को एक नई जमीन पर ले जाकर चुनौती भी देता है ।अपेक्षा यही की जाती है कि राजनीतिक जमात के इस युवा लेखक की दूसरी कृति पर गंभीरता से हिंदी के आलोचक विचार करेंगे और इसको नेता की कृति मानकर किनारे नहीं कर देंगे ।
 

Monday, December 28, 2015

पुस्तक संस्कृति के लिए जरूरी मेले

साल भले ही सर्दियों में खत्म होता है लेकिन पुस्तक प्रेमियों के लिए पुस्तक मेले उष्मा प्रदान करते रहते हैं । पुस्तक मेलों की शुरुआत नई दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले से होती है । दिल्ली विश्व पुस्तक मेले से इस साल जो रचनात्मक ऊर्जा और उष्मा साहित्य जगत में पैदा होनी चाहिए थी उसपर भी मौसम का असर दिखा था । साहित्यकारों और लेखकों के बीच पुस्तक मेले में हुए विमर्श की गर्माहट गायब सी दिखी थी । दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले के दौरान नौ दिनों तक अलग अलग विषयों और पुस्तकों के विमोचवन के बहाने से तकरीबन सौ गोष्ठियां और संवाद हुए थे । पुस्तक मेला के आयोजक नेशनल बुक ट्रस्ट ने मेला का चरित्र बदलकर साहित्य उत्सव करने की भरसक कोशिश भी की थी। हाल ही में खत्म हुए पटना पुस्तक मेले को देश का दूसरा बड़ा पुस्तक मेला कहा जा सकता है । यह एक तथ्य है कि बिहार में सबसे ज्यादा पत्र-पत्रिकाएं बिकती हैं । लोग सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यक रूप से बहुत ज्यादा जागरूक हैं । यहां के लोग किताबें पढ़ने के बाद उसपर प्रतिक्रिया भी देने में नहीं हिचकते हैं । बिहार में इस जागरूकता को और फैलाने और नई पीढ़ी की पढ़ने की रुचि को संस्कारित करने में पटना पुस्तक मेला की सकारात्मक भूमिका रही है । पटना पुस्तक मेले के आयोजकों ने पुस्तक मेले को सांस्कृतिक उत्सव में तब्दील कर दिया है । पटना पुस्तक मेला में देशभर के बुद्धिजीवियों की भागीदारी उसको एक व्यापक फलक भी प्रदान करती है । इस साल तो कॉफी हाउस के नाम से एक खास कार्यक्रम भी शुरू किया गया जिसमें पाठकों को संपादकों, फिल्मकारों और साहित्यकारों से रू ब रू होने का मौका मिला । कविता पर गंभीर विमर्श के दौरान वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह और आलोक धन्वा ने मंचों पर कविता की वापसी की जरूरत को रेखांकित किया था 

इस साल पटना पुस्तक मेले को अपने पूर्व सहयोगी नेशनल बुक ट्रस्ट से ही टक्कर मिली । पटना पुस्तक मेले के ऐन पहले ही नेशनल बुक ट्रस्ट ने उसी स्थान पर अपना अलग से पुस्तक मेला लगाया । इसका असर भी दिखा । नेशनल बुक ट्रस्ट की स्थापना देशभर में पाठक संस्कृति के विकास के लिए किया गया था लेकिन पटना में आयोजित उनके पुस्तक मेले ने एक स्थापित मेले के अस्तित्व को संकट में डाला । नेशनल बुक ट्रस्ट को करना यह चाहिए कि वो देश के उन हिस्सों में पुस्तक मेले लगाए जहां कि पुस्तकों की पहुंच नहीं है ।  महानगरों और हवाई मार्ग से जुड़े शहरों में तो फिर भी पुस्तकें मिल जाती है लेकिन देश के कोने अंतरे में अब भी पुस्तकें  पहुंच नहीं पाती हैं । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक कार्यक्रम में कहा था कि घर में पुस्तकों के लिए अलग जगह नहीं होती । हर घर में पुस्तकों के लिए अलग जगह हो इसकी लिए जरूरी है पुस्तकों की उपलब्धता को अनबीटी सुनिश्चित करे। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत विश्व का छठा सबसे बड़ा किताबों का बाजार है । उस रिपोर्ट के मुताबिक इस वक्त भारत में किताबों का बाजार इक्कसी हजार छह सौ करोड़ रुपए का है । अनुमान के मुताबिक किताबों का ये बाजार सालाना करीब साढे उन्नीस फीसदी की दर से बढ़ेगा और 2020 तक इस बाजार का आकार तेहत्तर हजार नौ सौ करोड़ तक पहुंच जाएगा । किताबों के बाजार में हिंदी किताबों का शेयर पैंतीस फीसदी है और अन्य भारतीय भाषाओं की किताबों की हिस्सेदारी मात्र दस फीसदी है । पुस्तक मेलों से पुस्तक बाजार में भारतीय भाषाओं की हिस्सेदारी बढ़ाई जा सकती है । यह बात अभी जारी इलाहाबाद पुस्तक मेले में भी देखी जा सकती है जहां किताबों की जमकर बिक्री हो रही है । उत्तर प्रदेश में गोरखपुर, कानपुर और लखनऊ के पुस्तक मेले पाठकों के बीच खासे लोकप्रिय रहे हैं और पाठक उनका इंतजार भी करते हैं । जमशेदपुर और रायपुर के पुस्तक मेले भी अपने छोटे कलेवर के बावजूद पाठकों को आकर्षित कर रहे हैं । 

Sunday, December 27, 2015

पुरस्कार वापसी अभियान के नाम साल

वर्ष दो हजार पंद्रह को पुकस्कार वापसी विवाद की वजह से समकालीन साहित्य में याद रखा जाएगा । भारत में बढ़ते असिहुष्णता का आरोप लगाते हुए हिंदी के विवादप्रिय, प्रचारप्रिय लेखक उदय प्रकाश ने इसकी शुरुआत की, लेकिन इसका बड़ा असर तब हुआ जब अशोक वाजपेयी और नयनतारा सहगल ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान कर दिया । इन दोनों के पुरस्कार लौटाने के बाद पुरस्कार वापसी अभियान ने जोर पकड़ा । पंजाब से लेकर कश्मीर और कर्नाटक से लेकर केरल तक के साहित्य अकादमी से पुरस्कृत कई लेखकों ने विरोधस्वरूप पुरस्कार लौटाने का एलान किया। मशहूर शायर मुनव्वर राणा ने तो एक खबरिया चैनल के शो के दौरान ही नाटकीय ढंग से पुरस्कार लौटाया । पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों का प्राथमिक आरोप ये था कि कन्नड़ के लेखक कालबुर्गी की हत्या के बाद साहित्य अकादमी ने उनकी शोकसभा आयोजित नहीं की । जब ये आरोप जोरशोर से उठा तब जाकर साहित्य अकादमी ने बेंगलुरू में आयोजित शोकसभा की तस्वीरें और अखबारों में छपी खबरें जारी की लेकिन तब तकक काफी देर हो चुकी थी । साहित्य अकादमी के अध्यक्ष ने भी संवेदनहीन बयान से लेखकों का गुस्सा भड़का दिया ।लेखकों के पुरस्कार वापसी के विरोध में भी सैकड़ों लेख लिखे गए । सत्ताधारी दल के नेताओं ने इसको बिहार चुनाव से जोड़ने की कोशिश की । वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसके खिलाफ ब्लॉग लिखा लेकिन पुरस्कार वापसी का सिलसिला जारी रहा । लेखकों का आरोप था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी असहिष्णुता के मसले पर खामोश हैं । बाद में प्रधानमंत्री ने अपने लंदन दौरे के वक्त और राष्ट्रपति ने कई बार भारतीय समाज में सहिष्णुता को लेकर बयान दिए  । पुरस्कार वापसी से दबाव में आई साहित्य अकादमी ने कार्यकारिणी की आपात बैठक की और कालबुर्गी की हत्या की निंदा तो की ही पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों के आरोपों का जवाब देने का काम भी किया । इस बीच साहित्य अकादमी के दिल्ली मुख्यालय पर वामपंथी लेखकों ने मुंह पर कालीपट्टी बांधकर विरोध प्रदर्शन किया तो राष्ट्रवादी लेखकों के समूह ने भी पुरस्कार वापसी के खिलाफ प्रदर्शन किया । इस बीच कुछ युवा उत्साही लेखकों ने किताब वापसी अभियान की शुरुआत की और साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटानेवाले लेखकों की किताबें वापस लौटाने उनके घर तक जा पहुंचे । अभी हाल ही में साहित्य अकादमी की कार्यकारिणी ने लेखकों से पुरस्कार नहीं लौटाने की अपील की और ये भी फैसला किया कि जिन लेखकों ने पुरस्कार राशि के चेक अकादमी को भेजे हैं उनको नहीं भुनाया जाएगा । उसी दौर में कुछ फिल्मकारों ने भी राष्ट्रीय पुरस्कार लौटाकर लेखकों का समर्थन किया था ।

दो हजार चौदह के दिसबंर में छत्तीसगढ़ सरकार ने रायपुर साहित्य महोत्सव का आयोजन किया था । इस आयोजन को लेकर दो-एक वामपंथी समीक्षकों ने वितंडा खड़ा करने की कोशिश की । वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना और विनोद कुमार शुक्ल की रायपुर साहित्य महोत्सव में उपस्थिति पर सवाल खड़े करते हुए अखबारों और पत्रिकाओं में लेख और जवाबी लेख लिखे गए । तीन चार महीने तक ये विवाद हिंदी साहित्य में गूंजता रहा था । वीरेन्द्र यादव के आरोपों का नरेश सक्सेना ने जोरदार तरीके से जवाब दिया था । इसके अलावा आलोचना पत्रिका के नए संपादक अपूर्वानंद ने पत्रिका के स्वरूप में बदलाव किया तो हिंदी में उसपर सवालिया निशान लगे । आलोचना में समाजशास्त्रीय लेखों की भरमार पर शंभुनाथ ने सवाल खड़े किए थे तो कुछ लोगों ने इसको वाणी प्रकाशन से अभय कुमार दूबे के संपादन में निकलने वाली पत्रिका प्रतिमान की अनुकृति करार दिया । साहित्य अकादमी ने गैंगटोक में भारतीय भाषा के लेखकों और प्रकाशकों के बीच संवाद का एक आयोजन किया था । इस कार्यक्रम में नेशनल बुक ट्रस्ट के चेयरमैन बल्देव भाई शर्मा,वरिष्ठ कवि अरुण कमल, लीलाधर जगूड़ी, उपन्यासकार अखिलेश, वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी के अलावा तमिल और तेलुगू के लेखकों और प्रकाशकों ने हिस्सा लिया था । उस गोष्ठी में बेहद सकारात्मक चर्चा हुई थी । यह वर्ष भीष्म साहनी का जन्म शताब्दी वर्ष था जिसको लेकर कई अहम आयोजन हुए । मशहूर लेखक शानी की रचनावली का विमोचन इस साल की अहम साहित्यक घटना रही ।  

साहित्य जगत का सफरनामा

साल दो हजार पंद्रह विदा होनेवाला है । यह एक ऐसा मुकाम होता है जिसमें हमे पीछे मुड़कर यह देखने की कोशिश रनी चाहिए कि पिछले साल भर में हमने क्या खोया क्या पाया । रचनात्मक दृष्टि से देखें तो दो हजार पंद्रह बहुत उत्साहजनक नहीं कहा जा सकता है । यह सुनने में अतिशयोक्ति लग सकती है लेकिन इस साल कोई ऐसीमहत्वपूर्ण कृति नहीं आई जिसने साहित्य जगत को एकदम से झकझोरकर रख दिया या उस कृति को पाठकों और आलोचकों ने समान रूप से पसंद किया। कुछ कृतियां अवश्य छिटपुट तरीके से अपनी धमक दिखाने में सफल रहीं लेकिन लंबे वक्त तक उसकी अनुगूंज साहित्य में सुनाई नहीं दी । इस साल कम ही पुस्तकों ने पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा । कहानी संग्रह में वंदना राग का संग्रह हिजरत से पहले, गीताश्री की कहानियों का संग्रह स्वप्न साजिश और स्त्री, पंकज सुबीर का संग्रह कसाब.गांधी @ यरवदा.in, इंदिरा दांगी का शुक्रिया इमरान साहब, ह्षीकेश सुलभ का संग्रह हलंत, जयश्री राय का संग्रह कायान्तर ने पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा । निलय उपाध्याय का बिहार के सपूत दशरथ मांझी के जीवन पर आधारित उपन्यास पहाड़ विषय के अलावा शैली को लेकर भी बेहतर रहा । इसी तरह से अलका सरावगी का उपन्यास जानकीदास तेजपाल मैनशन ने भी राजकमल चौधरी के लेखन को आगे बढाने वाला रहा । युवा लेखक प्रभात रंजन की किताब कोठागोई की भी खासी चर्चा रही । हिंदी की तुलना में अंग्रेजी में कई बेहतरीन किताबें आईं । आत्मकथा और जीवनी पर अगर हम देखें तो मशहूर अदाकारा स्मिता पाटिल और व्ही शांताराम की जीवनी को पाठकों ने खूब पसंद किया । वरिष्ठ पत्रकार कूमी कपूर ने इमरजेंसी पर एक बेहतरीन किताब लिखी । इसके अलावा जॉन इलियट की किताब इंप्लोजन, ट्रायस्ट ऑफ रियलिटी प्रकाषित हुई । इस किताब में जॉन इलियट ने भारतीय राजनीति परखने की कोशिश की है । पंकज दूबे का उपन्यास इश्कियापा युवा पाठकों को भा रहा है । हां इस बार प्रकाशकों की सूची में बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े विषयों की किताबों ने प्रमुखता से अपनी जगह बनाई । ये कारोबार का हिस्सा हो सकता है लेकिल बगैर पर्याप्त मेहनत के लिखी या बनाई गई इन किताबों का कई स्थायी महत्व नहीं है । जिन प्रकाशकों को इन विषयों पर मूल किताबें नहीं मिल पाईं उन्होंने संघ या बीजेपी से जुड़े लोगों के लेखों और भाषणों की किताबें छापकर कारोबार में बने रहने की जुगत अपनाई ।  
दो हजार पंद्रह को पुरस्कार वापसी विवाद की वजह से समकालीन साहित्य में याद रखा जाएगा । भारत में बढ़ते असिहुष्णता का आरोप लगाते हुए हिंदी के विवादप्रिय, प्रचारप्रिय लेखक उदय प्रकाश ने इसकी शुरुआत की थी लेकिनमजमा लूट लिया अशोक वाजपेयी ने । इसका बड़ा असर तब हुआ जब अशोक वाजपेयी और नयनतारा सहगल ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान कर दिया । इन दोनों के पुरस्कार लौटाने के बाद पुरस्कार वापसी अभियान ने जोर पकड़ा । पंजाब से लेकर कश्मीर और कर्नाटक से लेकर केरल तक के साहित्य अकादमी से पुरस्कृत कई लेखकों ने विरोधस्वरूप पुरस्कार लौटाने का एलान किया। मशहूर शायर मुनव्वर राणा ने तो एक खबरिया चैनल के शो के दौरान ही नाटकीय ढंग से पुरस्कार लौटाया । पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों का प्राथमिक आरोप ये था कि कन्नड़ के लेखक कालबुर्गी की हत्या के बाद साहित्य अकादमी ने उनकी शोकसभा आयोजित नहीं की । जब ये आरोप जोरशोर से उठा तब जाकर साहित्य अकादमी ने बेंगलुरू में आयोजित शोकसभा की तस्वीरें और अखबारों में छपी खबरें जारी की लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी । साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी के संवेदनहीन बयान से लेखकों का गुस्सा भड़का दिया ।लेखकों के पुरस्कार वापसी के विरोध में भी सैकड़ों लेख लिखे गए । सत्ताधारी दल के नेताओं ने इसको बिहार चुनाव से जोड़ने की कोशिश की । वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसके खिलाफ ब्लॉग लिखा लेकिन पुरस्कार वापसी का सिलसिला जारी रहा । लेखकों का आरोप था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी असहिष्णुता के मसले पर खामोश हैं । बाद में प्रधानमंत्री ने अपने लंदन दौरे के वक्त और राष्ट्रपति ने कई बार भारतीय समाज में सहिष्णुता को लेकर बयान दिए  । पुरस्कार वापसी से दबाव में आई साहित्य अकादमी ने कार्यकारिणी की आपात बैठक की और कालबुर्गी की हत्या की निंदा तो की ही पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों के आरोपों का जवाब देने का काम भी किया । इस बीच साहित्य अकादमी के दिल्ली मुख्यालय पर वामपंथी लेखकों ने मुंह पर कालीपट्टी बांधकर विरोध प्रदर्शन किया तो राष्ट्रवादी लेखकों के समूह ने भी पुरस्कार वापसी के खिलाफ प्रदर्शन किया । कुछ युवा उत्साही लेखकों ने किताब वापसी अभियान की शुरुआत की और साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटानेवाले लेखकों की किताबें वापस लौटाने उनके घर तक जा पहुंचे । अभी हाल ही में साहित्य अकादमी की कार्यकारिणी ने लेखकों से पुरस्कार नहीं लौटाने की अपील की और ये भी फैसला किया कि जिन लेखकों ने पुरस्कार राशि के चेक अकादमी को भेजे हैं उनको नहीं भुनाया जाएगा । उसी दौर में कुछ फिल्मकारों ने भी राष्ट्रीय पुरस्कार लौटाकर लेखकों का समर्थन किया था ।
दो हजार चौदह के दिसबंर में छत्तीसगढ़ सरकार ने रायपुर साहित्य महोत्सव का आयोजन किया था । इस आयोजन को लेकर दो-एक वामपंथी समीक्षकों ने वितंडा खड़ा करने की कोशिश की । वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना और विनोद कुमार शुक्ल की रायपुर साहित्य महोत्सव में उपस्थिति पर सवाल खड़े करते हुए अखबारों और पत्रिकाओं में लेख और जवाबी लेख लिखे गए । तीन चार महीने तक ये विवाद हिंदी साहित्य में गूंजता रहा था । वीरेन्द्र यादव के आरोपों का नरेश सक्सेना ने जोरदार तरीके से जवाब दिया था । इसके अलावा आलोचना पत्रिका के नए संपादक अपूर्वानंद ने पत्रिका के स्वरूप में बदलाव किया तो हिंदी में उसपर सवालिया निशान लगे । आलोचना में समाजशास्त्रीय लेखों की भरमार पर शंभुनाथ ने सवाल खड़े किए थे तो कुछ लोगों ने इसको वाणी प्रकाशन से अभय कुमार दूबे के संपादन में निकलने वाली पत्रिका प्रतिमान की अनुकृति करार दिया । साहित्य अकादमी ने गैंगटोक में भारतीय भाषा के लेखकों और प्रकाशकों के बीच संवाद का एक आयोजन किया था । इस कार्यक्रम में नेशनल बुक ट्रस्ट के चेयरमैन बल्देव भाई शर्मा,वरिष्ठ कवि अरुण कमल, लीलाधर जगूड़ी, उपन्यासकार अखिलेश, वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी के अलावा तमिल और तेलुगू के लेखकों और प्रकाशकों ने हिस्सा लिया था । उस गोष्ठी में बेहद सकारात्मक चर्चा हुई थी । यह वर्ष भीष्म साहनी का जन्म शताब्दी वर्ष था जिसको लेकर कई अहम आयोजन हुए । मशहूर लेखक शानी की रचनावली का विमोचन इस साल की अहम साहित्यक घटना रही ।
एक तरफ जहां पुरस्कार वापसी की धूम रही वहीं इस बार हिंदी के पुरस्कार विवादित नहीं हुए । हिंदी के वरिष्ठ लेखक और प्रेमचंद साहित्य के अध्येता कमल किशोर गोयनका को व्यास सम्मान से सम्मानित किया गया ।मराठी लेखक भालचंद्र नेमाड़े को ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया । भारतीय ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार कविता के लिए बाबुशा कोहली को उसकी पांडुलिपि प्रेम गिलहरी, दिल अखरोट और कहानी के लिए उपासना को प्रदान किया गया । साहित्य अकादमी का हिंदी भाषा के लिए युवा पुरस्कार भोपाल की कथाकार इंदिरा दांगी को दिया गया । इस साल का साहित्य अकादमी पुरस्कार वयोवृद्ध लेखक रामदरश मिश्र को उनके कविता संग्रह आग की हंसी पर दिया गया । इस वर्ष का कथाक्रम सम्मान मशहूर उपन्यासकार कथाकार अखिलेश को दिया गया । इसके अलावा उत्तर प्रदेश सरकार ने एक बार फिर से थोक के भाव से सरकारी पुरस्कार बांटे । हर साल पटना पुस्तक मेले में कविता के लिए दिया जानेवाला पुरस्कार इस बार युवा कवयित्री अर्चना राजहंस मधुकर को दिया गया ।

इस साल को काल के साल के तौर पर भी याद किया जाएगा । इस साल मशहूर साहित्यक हस्तियां एक एक करके दुनिया से चले गए । इस वर्ष इतना बड़ा साहित्यक खालीपन हुआ जिसकी भारपाई मुश्किल है । हिंदी के वरिष्ठ लेखक कृष्णदत्त पालीवाल, अपनी आत्मकथा लिखकर साहित्य जगत को झकझोर देनेवाले दलित लेखक प्रोफेसर तुलसीराम, मशहूर आलोचक विजय मोहन सिंह, वरिष्ठ कवि कैलाश वाजपेयी, वीरेन डंगवाल, सारिका पत्रिका के संपादक अवध नारायण मुदगल, उपन्यासकार महेन्द्र भल्ला, पंजाब के लेखक पुष्पपाल सिंह, वरिष्ठ लेखक कमलेश, नई कविता के दौर के चर्चित रही तिकड़ी में से एक जगदीश चतुर्वेदी का इस वर्। निधन हुआ जोकि साहित्य जगत के लिए बड़ा झटका रहा । वरिष्ठ आलोचक डॉ गोपाल राय, वरिष्ठ कथाकार डॉ महीप सिंह के अलावा समाजवादी चिंतक कृष्णनाथ का निधन भी साहित्य के लिए बड़ी क्षति रही । हिंदी के लेखकों के अलावा तमिल लेखक जयकांतन, जर्मन लेखक गुंटर ग्रास, लाठोर लुत्से, उर्दू के लेखक अब्दुल्ला हुसैन के निधन से भी विश्व साहित्य का कोना सूना हो गया । पत्रकारिता जगत से वरिष्ठ पत्रकार विनोद मेहता, प्रफुल्ल बिदबई और चंदामामा पत्रिका के लंबे समय तक संपादक रहे बालशौरी रेड्डी का निधन भी हमें झकझोर गया । मशहूर कार्टूनिस्ट और आम आदमी को अपने स्केच के माध्यम से उकेरने वाले आर के लक्ष्मण भी नहीं रहे । 

Wednesday, December 23, 2015

आतंक से मुक्त हो सोशल साइट्स

देश में इंटरनेट के फैलाव के बाद तेजी से सोशल मीडिया ने अपने पांव-पसारे हैं । शहरों से लेकर गांवों तक में फेसबुक के कंज्यूमरों की संख्या में खासा इजाफा हुआ है । ट्विटर के यूजर्स भी लगातार बढ़ रहे हैं । प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के मंत्रियों और विभागों के ट्विटर पर सक्रिय होने की वजह से आम आदमी के बीच भी इस माध्यम को लेकर उत्सुकता बढ़ी है । इसका नतीजा यह हुआ है कि फेसबुक और ट्विटर हमारे देश के गांवों तक अपनी पैठ बनाने में कामयाब हो चुका है । स्मार्ट फोन और इंटरनेट पैक के सस्ता होने से भी फेसबुक की लोकप्रियता में खासा इजाफा हुआ है । डिजीटल क्रांति के इस दौर में ये बेहतर है कि हम भी दुनिया के अन्य देशों की तरह ही सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म का उपयोग करने में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं । लेकिन इस मीडिया के अपने खतरे भी हैं । इन खतरों से सचेत रहने और उसको रोकने की दिशा में भी कदम उठाने की आवश्यकता है । अभी हाल ही में खबर आई कि जयपुर में रहने वाला एक तीस साल का मार्केटिंग मैनेजर खूंखार आतंकवादी संगठन आई एस के संपर्क में था और उसके लिए काम कर रहा था । उसकी गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में ये बात सामने आई कि वो देश के युवाओं को सोशल मीडियाके माध्यम से प्रतिबंधिक आतंकवादी संगठन आई एस में भर्ती करने का काम कर रहा था । उसके फेसबुक पर अपनी कई फेक आईडी बनाई हुई थी जिसके मार्फत वो हजारों लोगों के संपर्क में था और आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दे रहा था । वो ना केवल फेसबुक पर सक्रिय था बल्कि व्हाट्स एप और टेलीग्राम जैसे नेटवर्किंग टूल्स का भी इस्तेमाल कर रहा था । वो फेसबुक पर डायरी ऑफ अ मुजाहदीन के नाम से एक पेज भी चला रहा था । इस पेज के माध्यम से वो सिस्टम से खपा युवकों की तलाश कर उसको आतंकवादी बनाने की कोशिश करता था । पुलिस की आगे की जांच में पता चलेगा कि उसके मंसूबे क्या थे लेकिन जो जानकारियां छन कर आ रही हैं उसके हिसाब से उसके मंसूबे बेहद खतरनाक थे । इसी तरह से पुणे की एक सोलह साल की लड़की को आई एस ने अपने चंगुल में ले लिया । कॉंन्वेंट स्कूल की छात्रा को आई एस के श्रीलंका के एक ऑपरेटिव ने पहले अपने चंगुल में फंसाया और फिर उससे फेसबुक और ट्विटर के जरिए उसका ब्रेनवॉश शुरू हो गया । उसके बाद कई मैसेज इस बात की पुष्टि करते हैं कि आई एस ने उस नाबालिग लड़की को सीरिया में आतंकवादी संगठन ज्वाइन करने के लिए राजी कर लिया था और वो चंद दिनों बाद वहां जाने को तैयार हो गई थी । इससे भी खतरनाक बात यह हुई कि जब से वो आई एस के आतंकवादियों के संपर्क में आई तो उसने जीन्स और शर्ट पहनना छोड़कर बुर्का पहनना शुरू कर दिया । ये दो उदाहरण है कि किस तरह से सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर आतंकवादी संगठन हमारे देश में पांव पसार रहे हैं । इस साल फरवरी में केंद्र सरकार ने आई एस पर बैन लगा दिया था और कहा था कि ये आतंकवादी संगठन भारत समेत पूरी दुनिया के युवाओं को दिग्भ्रमित कर रैडिकलाइज कर रहा है । इस प्रतिबंध के बावजूद सोशल मीडिया के जरिए ये आतंकवादी संगठन पूरे देश में सक्रिय है

बावजूद इसके सोशल मीडिया आतंकवादी संगठन आई एस और उसके समर्थकों के पेज को हटाने को तैयार नहीं है । खबरों के मुताबिक पैरिस में हुए आतंकवादी हमले के बाद एक शख्स ने आई एस के पेज को लेकर शिकायत भेजी थी लेकिन फेसबुक ने कहा था कि वो उसके कम्युनिटि स्टैंडर्ड और नीतियों के खिलाफ नहीं है । दरअसल इन फैन पेज पर जाने के बाद वहां सक्रिय लोग विजिटर को आई एस के नियंत्रण वाले बेवसाइटस पर रिडायरेक्टर कर देते हैं । यही हालत ट्विटर की भी है जहां कोई भी खलीफा न्यूज जैसे कई हैंडल सक्रिय हैं जो आई एस की जानकारियां साझा करते रहते हैं । ट्विटर पर आई एस के समर्थकों की पूरी फौज है जिनकी पहचान करना आसान नहीं है लेकिन वो खामोशी के साथ अपने काम को अंजाम देते रहते हैं । कुछ दिनों पहले तक पाकिस्तानी आतंतवादी हाफिज सईद भी ट्विटर पर खासा सक्रिय था बाद में उसके अकाउंट को सस्पेंड किया गया । इसी तरह से यूट्यूब पर आई एस की आतंकवादी करतूतों के कई दिल दहलाने वाले वीडियो मौजूद हैं । इस वक्त हमारे देश को आतंकवादियों से जबरदस्त खतरा है ऐसे में सोशल मीडिया साइट्स की निगरानी आवश्यक है । इसका मतलह यह कतई नहीं है कि इन साइट्स पर किसी भी तरह की सेंसरशिप होनी चाहिए बल्कि सोशल मीडिया पर आतंकवादी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए कोई मैकेनिज्म बनाया जाना चाहिए । दरअसल ये साइट्स पूरी दुनिया में लोग उपयोग करते हैं, लिहाजा आतंकवादी संगठनों के समर्थकों पर नजर रखना काफी मुश्किल काम है । परंतु हमारे देश में फेसबुक पर फेक आईडी बनाकर आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देनेवालों और अफवाह फैलाने वालों पर लगाम लगाने के लिए फोन नंबर या आधार कार्ड नंबर को प्रोफाइल के साथ अनिवार्य किया जा सकता है । मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक दंगों के दौरान फेसबुक का कितना गलत इस्तेमाल हुआ ये पूरी दुनिया ने देखा । कई बार तो अफवाह फैलाने वालों की पहचान हो जाती है लेकिन कई बार जब फेक आई डी विदेश से बनाई जाती है और उसका इस्तेमाल किया जाता है तब उसको ट्रैक करना बहुत मुश्किल होता है । कार्रवाई करना तो लगभग नामुमकिन ही होता है । इसके अलावा इन सोशल साइट्स को भारत में अपने सर्वर लगाने की भी आवश्यकता है । फेसबुक और ट्विटर भारत सरकार के साथ कई महात्वाकांक्षी योजनाओं को आगे बढ़ाने का मंसूबा पाले बैठे हैं लेकिन उनको पहले बारत की इन चिंताओं पर भी ध्यान देना होगा । 

Sunday, December 20, 2015

नियम से उठता विवाद

साल खत्म होने के पहले दिसंबर माह में साहित्य अकादमी पुरस्कार का एलान होने की परंपरा है । अपने उसी परंपरा के निर्वाह में साहित्य अकादमी ने इस वर्ष के पुरस्कारों का एलान कर दिया है । इस वर्ष हिंदी भाषा के लिए साहित्य अकादमी का पुरस्कार वरिष्ठतम कवि, कथाकार, उपन्यासकार, निबंधकार रामदरश मिश्र को उनके कविता संग्रह- आग की हंसी - पर दिया गया । रामदरश मिश्र जी नब्बे पार के लेखक हैं और उनको बहुत पहले अकादमी पुरस्कार मिल जाना चाहिए था लेकिन उस वक्त अकादमी में कुछ खास लोगों और विचारधारा का दबदबा था, लिहाजा रामदरश जी की अनदखी होती रही । अब उम्र के इस पड़ाव पर अपेक्षाकृत कमजोर कृति पर जब उनको पुरस्कार देने का एलान हुआ है तो अकादमी के नियमों को लेकर सवाल खड़े होते हैं । रामदरश जी के चयन पर सवाल खड़ा करना उचित नहीं है लेकिन जिस तरह से अकादमी ने अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए उनको पुरस्कृत किया उसपर तो प्रश्नचिन्ह लगता ही है । अकादमी पुरस्कार में तमाम गोपनीयता के दावों के बावजूद साहित्यक हलके में इस बात की चर्चा थी कि इस बार का पुरस्कार रामदरश जी को दिया जाएगा। पुरस्कार के एलान के पहले सोशल मीडिया पर ये नाम खुल भी चुका था । दरअसल साहित्य अकादमी की मजबूरी थी कि पुरस्कार वापसी के कोलाहल के बीच वो ऐसे लेखक को पुरस्कृत करे जो पुरस्कार लेने से इंकार ना करे । रामदरश मिश्र इस कसौटी पर खड़े उतरते थे । पुरस्कार वापसी के एलान के बाद से ही अकादमी के कर्ता-धर्ता इस जुगाड़ में लग गए थे कि ऐसे लेखक को पुरस्कृत करने के लिए खोजा जाए जो विवादित ना हो । इस बात की तैयारी आधार सूची बनाने के वक्त से ही शुरू कर दी गई थी । खबर है कि जिस लेखक को आधार सूची बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी उसको पर्याप्त संकेत दे दिए गए थे । फिर हिंदी भाषा के लिए पुरस्कार देने के लिए जूरी बनाते वक्त भी इस बात का ध्यान रखा गया । विश्वनाथ तिवारी के बाद हिंदी भाषा के संयोजक बनाए गए गजलकार माधव कौशिक इसके जूरी में रखे गए । माधव कौशिक अकादमियों के माहिर खिलाड़ी रहे हैं और उनको मालूम है कि कौन सा काम किस तरीके से किया जाता है । माधव कौशिक के अलावा रामजी तिवारी और महेन्द्र मधुकर जूरी के सदस्य बनाए गए जिन्होंने रामदरश मिश्र के नाम पर मुहर लगाई  । जूरी के सदस्यों के नाम को देखकर इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि तैयारी कितनी पुख्ता रही थी । साहित्य अकादमी पुरस्कारों और उसके क्रियाकलापों में पारदर्शिता की सख्त आवश्कता है ।

लगभग बानवे साल के रामदरश मिश्र को पुरस्कृत करने के बाद अब लगता है कि साहित्य अकादमी को पुरस्कार के नियमों में परिवर्तन कर कृति के बजाय लेखकों को उनके अवदान पर पुरस्कार देना चाहिए यानि कि लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड । जिस तरह से मृदुला गर्ग को, गोविन्द मिश्र आदि को उनकी कम महत्वपूर्ण कृतियों पर पुरस्कृत किया गया उससे तो यही लगता है । नियमानुसार अकादमी को पिछले तीन साल में चर्चित किताबों पर पुरस्कार देना होता है । विश्वनाथ तिवारी के अध्यक्ष बनने के बाद से उन लेखकों को पुरस्कृत किया जाने लगा है जो प्रतिष्ठित हैं, पूर्व में बेहतर किताबें लिख चुके हैं, जिनकी काफी लंबी उम्र है और जिनकी कोई ना कोई किताब उस दौरान छपी हो । इसके कई फायदे होते हैं । लेखक की उम्र और लेखकीय प्रतिष्ठा के मद्देनजर पुरस्कार के चयन पर विवाद नहीं होता है । दूसरा अकादमी यह भी दिखाने में सफल हो जाती है कि उसने उस लेखक को पुरस्कृत कर दिया जिनकी पूर्व में अनदेखी हुई थी । वक्त आ गया है कि अकादमी के संविधान की पुनर्समीक्षा की जाए । 

साहित्य में अश्लीलता

साहित्य में भाषा का सवाल गाहे बगाहे उठता रहा है । जब भी कोई ऐसी कृति आती है जिसमें भाषा की स्थापित मर्यादा टूटती है तो साहित्य जगत में उसपर व्यपक विचार विमर्श होता है । कृतियों के अलावा भी अगर कोई लेखक या साहित्यकार अपने साक्षात्कार में कथित तौर पर आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग करता है तो उसपर भी साहित्यक जगत में प्रतिक्रिया होती है । बहुधा लेख आदि लिखकर तो कभी कभार धरना और विरोध प्रदर्शन भी होते रहे हैं । साहित्यक पत्रिका नया ज्ञानोदय में उस वक्त के महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने अपने साक्षात्कार में छिनाल शब्द का प्रयोग किया था तो मामला सरकार और मंत्री तक पहुंचा था । धरना और विरोध प्रदर्शन तो हुआ ही था और उनको खेद प्रकट करना पड़ा था । अभी कुछ दिनों पहले मराठी के मशहूर लेखक भालचंद नेमाड़े की किताब हिन्दू, जीने का समृद्ध कबाड़ अनुदित होकर प्रकाशित हुआ है । नेमाड़े मराठी के बेहद सम्मानित लेखक हैं और उनको ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है । नेमाडे अंग्रेजी के शिक्षक रहे हैं और लंदन के मशहूर स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज में अध्यापन कर चुके हैं । कुछ दिनों पहले उनका सलमान रश्दी से विवाद भी हुआ था । रश्दी ने अपने एक ट्वीट में उनके बारे में लिखा था- ग्रम्पी ओल्ड बास्टर्ड, जस्ट टेक योर प्राइज एंड से थैंक यू नाइसली । आई डाउट यू हैव इवन रेड द वर्क यू अटैक । दरअसल नेमाडे ने एक कार्यक्रम में सलमान रश्दी की किताब मिडनाइट चिल्ड्रन को औसत साहित्यक कृति करार दिया था । नेमाडे ने कहा था कि सलमान रश्दी और वी एस नायपॉल पश्चिम के हाथों खेल रहे हैं । सलमान रश्दी को नेमाडे की बातें नागवार गुजरीं थी और उन्होंने भाषिक मर्यादा को ताक पर रखते हुए गाली गलौच की भाषा में ट्वीट किया था । उसके बाद समकालीन साहित्यक परिदृश्य में उबाल आया था और सलमान रश्दी की जमकर लानत मलामत की गई थी । इस प्रसंग को बताने का मकसद सिर्फ इतना है कि भालचंद्र नेमाड़े के कहने का वैश्विक साहित्य जगत में असर होता है ।
उनकी ताजा किताब- हिन्दू, जीने का समृद्ध कबाड़, जो मूल कृति का हिंदी अनुवाद है, की खासी चर्चा रही लेकिन उनके इस किताब में कई प्रसंगों में इस्तेमाल किए गए शब्द अलक्षित रह गए । इस किताब के ब्लर्ब पर लिखा है देसी अस्मिता का महाकाव्य यह उपन्यास भारत के जातीय स्व का बहुस्तरीय, बहुमुखी, बहुवर्णी उत्खनन है । यह ना गौरव के किसी जड़ और आत्मुग्ध आख्यान का परिपोषण करता है, न अपने के नाम पर संस्कृति के रगों में रेंगती उन दीमकों का तुष्टीकरण, जिन्होंने भारतवर्षको भीतर से खोखला कर दिया है । यह उस विराट इकाई को समग्रता में देखते हुए चलते हुए देखता है जिसे भारतीय संस्कृति कहते हैं ।ब्लर्ब लेखक का नाम नहीं होने से यह माना जाता है कि लेखक और प्रकाशक दोनों इससे सहमत होंगे और ये पाठकों को कृति की ओर खींचने के लिए लिखा गया है । इस कृति को देसी अस्मिता का महाकाव्य बताया गया है । नेमाड़े जी से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि इस कृति में करीब आधा दर्जन जगहों पर आपने जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया है वो किस देसी अस्मिता को प्रतिबिंबित करता है । अगर एक बार को यह मान भी लिया जाय कि इस तरह की भाषा कभी कभार निजी बातचीत में बोली जाती है तो क्या उसको हम अपने देश की संस्कृति के तौर पर पेश कर सकते हैं जिसका दावा भालचंद नेमाड़े करते हैं । एक जगह पुलिस वाले गश्ती के दौरान युवकों को मां की गाली देते हैं जिसको अक्षरश: प्रकाशित कर दिया है । उसी बातचीत के क्रम में लेखक ने लिखा है कि- उसे पारधी लड़कों ने बताया था कि पुलिसवाले थाने ले जाकर गXX में डंडा घुसेड़ते हैं । इसी तरह से एक दूसरा प्रसंग कहार बस्ती की एक औरत का संवाद है । यहां तो हद कर दी गई है । अपने और लड़के की जननांगों के बारे में कहते कहते लेखक का पात्र महात्मा गांधी के जननांगों का हवाला देते हुए उसकी बहन के साथ संबंध बनाने की गाली देने लग जाता है । यह अंश बेहद आपत्तिजनक है और पात्रों की आपसी बातचीत में सहजता से आनेवाली बातचीत से ज्यादा प्रचार पाने के लिए ठूंसा गया प्रसंग अधिक लगता है । गाली में महात्मा गांधी का प्रयोग अबतक साहित्य में नहीं देखा गया था और इस मामले में भालचंद्र नेमाड़े को इसका प्रणेता कहा जा सकता है ।
नेमाड़े को और इस किताब के प्रकाशक, राजकमल प्रकाशन, को लगता है कि हाल के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की जानकारी नहीं है । इस साल मई में सुप्रीम कोर्ट ने एक संपादक के खिलाफ आरोप हटाने से इंकार कर दिया था । एक पत्रिका ने उन्नीस सौ चौरानवे में महात्मा गांधी के बारे में एक अश्लील और भद्दी कविता प्रकाशित की थी । सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने साफ तौर पर कहा था कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश के ऐतिहासिक आदरणीय महापुरुषों के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल की इजाजत नहीं देता है । सुप्रीम कोर्ट ने बांबे हाईकोर्ट के फैसले को बरकार रखा था जिसमें संपादक की याचिका खारिज करने की मांग को रद्द कर दिया गया था । इसके अलावा भी सुप्रीम कोर्ट कई मौकों पर इस तरह की टिप्पणी कर चुका है । गांधी हमारे पूरे देश में समादृत हैं और उनको लेकर इस तरह की घोर आपत्तिजनक टिप्पणी भालचंद्र नेमाड़े और उनके प्रकाशक को मुश्किल में डाल सकती है । लगभग साढे पांच सौ पन्नों के इस उपन्यास में नेमाड़े ने भाषा की मर्यादा को तार-तार किया है ।
हिंदी में साहित्यक कृतियों में अश्लीलता के सवाल पर कई बार लंबी लंबी बहसें भी हुई हैं । द्वारका प्रसाद मिश्र की कृति -घेरे के बाहर- की भाषा और उसके विषय को लेकर उसको प्रतिबंधित भी किया गया था जो काफी बाद में प्रकाशित हुआ । अज्ञेय की कृति -शेखर एक जीवनी - भी जब प्रकाशित हुई थी तब भी उसमें भाई-बहन के संबंधों के चित्रण को लेकर खासा हंगामा मचा था । उसी तरह से कृष्णा सोबती को अपने उपन्यास में एक शब्द के इस्तेमाल पर बोल्ड लेखिका करार दे दिया गया था । मृदुला गर्ग के उपन्यास चितकोबरा के प्रकाशन के बाद सेक्स संबंधों और उसके उपन्यासों में चित्रण को लेकर हिंदी साहित्य में खासा विवाद हुआ था । मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास इदन्नमम और अलमा कबूतरी में वर्णित सेक्स प्रसंगों को लेकर अब भी उनकी लानत मलामत की जाती है । शरद सिंह ने अपने एक उपन्यास पिछले पन्ने की औरतों में भी एक प्रसंग में स्त्री के निजी अंगों के बारे में लिखा था जिसको लेकर भी बहस हुई थी । कृष्णा अग्निहोत्री की आत्मकथा में संबंधों को लेकर विवाद उठा था । हिंदी साहित्य में इस पर लंबे समय से वाद-विवाद होता रहा है कि भाषा कैसी हो । कई लेखक तो अपनी कृतियों में उसी तरह से जबरदस्ती सेक्स प्रसंगों को ठूंसते हैं जिस तरह से कहानी की बगैर मांग के हिंदी फिल्मों में नायक नायिका के बारिश में भीगते हुए गाने फिल्माए जाते हैं । हाल के दिनों में सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए कहानी और उपन्यासों में जबरदस्ती सेक्स प्रसंग ठूसने की प्रवृ्ति ने जोड़ पकड़ा है । जिस तरह से फिल्म में काम करनेवाली नायिकाओं को लगता है कि कम कपड़े पहनने से वो जल्द से जल्द स्टारडम हासिल कर लेगी उसी तरह से हिंदी के चंद युवा लेखकों को भी लगता है कि कथित तौर पर बोल्ड प्रसंगों को लिखकर स्थापित हो जाएंगे । अभी हाल ही में हिंदी की एक वयोवृद्ध लेखिका रमणिका गुप्ता की आत्मकथा आपहुदरी प्रकाशित हुई है जिसमें सेक्स प्रसंगों की भरमार है जो जुगुप्साजनक है । पोर्न साहित्य का भी एक सौंदर्यशास्त्र होता है लेकिन रमणिका गुप्ता ने तो पता नहीं क्या लिखा है । उसको परिभाषित करने के लिए वक्त देना वक्त जाया करने जैसा है ।
बावजूद इसके उक्त कृतियों में किसी महापुरुष को लेकर भद्दी टिप्पणी नहीं की गई है । नेमाड़े ने महात्मा गांधी पर तो टिप्पणी की ही है गालियों में भी उन शब्दों को लिख डाला है जो अबतक वर्जित रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ भी हैं । काशी का अस्सी में काशी नाथ सिंह ने भी गालियों का इस्तेमाल किया है, राही मासूम रजा ने आधा गांव में गालियों का उपयोग किया है लेकिन इस तरह से नहीं जिस तरह से नेमाड़े ने अपने उपन्यास में किया है । नेमाड़े ने तो फुटपाथ पर पीली पन्नी में बिकनेवाली किताबों की भाषा का इस्तेमाल कम से कम आधे दर्जन जगहों पर किया है ।  नेमाड़े के इस उपन्यास में उन शब्दों के उपयोग के बाद एक बार फिर से ये सवाल खड़ा हो गया है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर लेखकों को कितनी और कहां तक जाने की छूट मिली चाहिए ।  



Monday, December 14, 2015

रॉयल्टी का रगड़ा

असम की एक लेखिका शर्मिष्ठा प्रीतम, जो व्हीलचेयर के सहारे अपनी जिंदगी गुजार रही हैं, ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खत लिखकर नेशनल बुक ट्रस्ट से छपी अपनी किताब की रॉयल्टी दिलवाने की मांग की है । शर्मिष्ठा ने प्रधानमंत्री को लिखे अपने खत में बताया है कि साल दो हजार चौदह में उनकी किताब प्रकाशित हुई थी, लेकिन करीब डेढ साल बीत जाने के बाद भी उनको ना तो एग्रीमेंट की कॉपी मिली और ना ही रॉयल्टी ।उनका आरोप है कि किताब छपने के पहले ये वादा किया गया था कि एडवांस रॉयल्टी दी जाएगी जिसका उनको अबतक इंतजार है । शर्मिष्ठा का कहना है कि उन्होंने जब भी नेशनल बुक ट्र्स्ट के अफसरों से संपर्क किया तो उनको रटा रटाया जवाब मिला कि कार्यवाही चल रही है । उनका कहना है कि वो आठ साल की उम्र से चल फिर नहीं सकती हैं जिसकी वजह से वो बार बार दिल्ली जाकर इस काम को करवाने की स्थिति में नहीं हैं । यह एक ऐसी स्थिति है जिसका सामना हर भाषा के लेखक को करना पड़ता है । यह स्थिति है नेशनल बुक ट्रस्ट की. जो भारत सरकार यानि कि करदाताओं के पैसे से चलती है । रॉयल्टी के मुद्दे पर विवाद की गूंज गाहे बगाहे हिंदी में भी सुनाई देती रहती है । लेखकों की हमेशा से शिकायत रहती है कि प्रकाशक उनकी किताबों की बिक्री का आंकड़ा सही तरीके से उनके सामने पेश नहीं करते हैं । नतीजा यह होता है कि उनको अपेक्षित रॉयल्टी नहीं मिल पाती है ।  रॉयल्टी का ये झगड़ा बहुत पुराना है लेकिन इसकी तरफ गंभीरता से कभी भी लेखकों और प्रकाशकों ने साथ मिलकर नहीं सोचा ।
दरअसल अगर हम गंभीरता से विचार करें तो ये लगता है कि हिंदी में लेखकों और प्रकाशकों के संबंध बहुत प्रोफेशनल कभी नहीं रहे । ज्यादातर किताबें मौखिक सहमति और लेखक-प्रकाशक संबंधों के आधार पर छपती रही हैं । कई बार एग्रीमेंट हो जाता है पर बहुधा छपने के पहले एग्रीमेंट नहीं होता है । किताब छपने के पहले लेखकों को लगता है कि किसी तरह से बड़े प्रकाशक के यहां से किताब छप जाए । ज्यादातर प्रकाशकों की तरफ से भी एग्रीमेंट को लेकर ढिलाई बरती जाती रही है । हिंदी के एक दो अग्रणी प्रकाशकों ने अब इस दिशा में गंभीरता से काम शुरू कर दिया है और अपने कारोबार को बेहद प्रोफेशनल तरीके से चलाने की राह पर बढ़े है। लेकिन सवाल यही है कि यह एक इतना सरल मुद्दा नहीं है कि एक दो प्रकाशकों के आगे बढ़ने से ये हल हो जाए । हिंदी में लंबे समय से ये समस्या रही है । लोक और जन की बात करनेवाले लेखकों के दबदबे वाले काल में भी इस दिशा में कुछ नहीं सोचा गया । आजादी पूर्व बने प्रगतिशील लेखक संघ से लेकर जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच ने इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की । अपने अपने संगठनों से संबद्ध लेखकों को आगे बढ़ाने का इन लेखक संघों ने किया लेकिन उनके बुनियादी अधिकारों के लिए कोई लड़ाई उन्होंने नहीं लड़ी । ना तो लेखकों और प्रकाशकों के बीच के एग्रमेंट को बेहतर बनाने की कोशिश की गई और ना ही लेखकों के हितों के लिए प्रकाशकों के साथ बैठक कर हल निकालने की कोशिश की गई । असहिष्णुता के नाम पर मुंह पर पट्टी बांधकर साहित्य अकादमी की परिक्रमा करनेवाले लेखकों को भी कभी अपने अधिकारों की याद नहीं आई । साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटानेवाले लेखकों ने कभी भी अकादमी पर इस बाबत दबाव बनाया हो यह बात सामने नहीं आई । लेखकों के मुद्दे पर लेखक संगठनों की निष्क्रियता और लेखकों के बीच एक दूसरे को लेकर उपेक्षा का भाव इस समस्या के जड़ में है । हिंदी के ज्यादातर लेखकों की सोच बहुत सीमित हो गई है । आवश्यकता है अपने सोच का दायरा बढ़ाने की ।


Sunday, December 13, 2015

कविता में इमरजेंसी जैसे हालात

इन दिनों पूरे देश में साहित्य उत्सवों की धूम है, दिल्ली से लेकर पटना तक, बंगलुरू से लेकर मुंबई तक । दरअसल हर साल दिसंबर  से लेकर फरवरी तक ज्यादातर साहित्यक मेलों का आयोजन होता हैं । इन साहित्यक आयोजनों में विवादों को सायास उठाया जाने लगा है बावजूद इसके कुछ आयोजनों में सार्थक विमर्श भी होते हैं । साहित्यक प्रवृतियों के बारे में वरिष्ठ लेखकों की राय सामने आती है । साहित्य पर मौजूदा या आसन्न खतरों पर बात की जाती है । पटना में जारी पटना पुस्तक मेला के जनसंवाद कार्यक्रम में एक सत्र था- नई सदी की कविताई । इस सत्र में युवा कवियों राकेश रंजन, नताशा, संजय कुंदन, और स्मिता पारिख ने अपनी कविताओं का पाठ किया । लेकिन असली बात हुई कविता पाठ के बाद जब इन युवा कवियों को सुनने के बाद हिंदी के वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा से इस विषय पर बोलने का आग्रह किया गया । आलोक जी ने कविता को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए । उन्होंने इशारों में यह सवाल उठाया कि किस वजह से कविता आज पाठकों से दूर होती जा रही है और पाठकों को कविता की ओर लाने के लिए क्या प्रयास किए जाने चाहिए ।  इस संदर्भ में आलोक धन्वा ने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिन की कविताओं और उनके मंच पर उसके पाठ करने से पैदा होनेवाले प्रभाव का उल्लेख किया । आलोक धन्वा ने रामधारी सिंह दिनकर की मशहूर कविताओं का पाठ भी किया । उन्होंने दिनकर की मशहूर काव्य कृति रश्मिरथी के उस प्रसंग को बताया जहां कर्ण का निकट अंत आ गया था और वो शल्य से कहता है कि घोडों को तेज चलाकर उस जगह पर ले चले जहां कृष्ण और अर्जुन मौजूद हैं । कर्ण के रथ का पहिया रक्त से पंकिल जमीन में इस कदर फंसा गया कि वो कर्ण के निकाले भी नहीं निकल रहा था । अपनी काव्य कृति रश्मि रथी में दिनकर इस स्थिति को यूं कहते हैं महि डोली/ससिल-आगार डोला/भुजा के जोर से संसार डोला/न डोला, किंतु , जो चक्का फंसा था /चला वह जा रहा नीचे धंसा था । इस स्थिति को देखते हुए युद्ध के मैदान में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि यही मौका है और कर्ण का वध कर दो । अर्जुन यहां भी तर्क करने लग जाते हैं कि ये उचित नहीं होगा क्योंकि कर्ण विरथ है । कृष्ण एक बार फिर से अर्जुन को समझाते हैं जिसको दिनकर अपनी कविता में यूं वयक्त करते हैं खड़ा है देखता क्या मौन भोले?/शरासन तान, बस, अवसर यही है/घड़ी फिर और मिलने को नहीं है/विशिख कोई गले के पार कर दे /अभी ही शत्रु का संहार कर दे । आलोक धन्वा ने कहा कि दिनकर जब इन कविताओं का पाठ करते थे तो ऐसा प्रतीत होता था कि युद्ध का वो पूरा प्रसंग पाठकों की आंखों के सामने जीवंत हो उठा है । आलोक जी भी जब दिनकर की कविताओं का पाठ कर रहे थे तो पूरे सभागार में सन्नाटा छाया था और कविता रसिक श्रोता मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे । आलोत धन्वा का मानना था कि जब कविताएं कवियों से सुनी जाती हैं तो उलका एक अलग प्रभाव पाठकों के मन पर पड़ता है । कविता पाठकों को अपने साथ बहाने लग जाती है । उनके मुताबिक कवि और कविता को पाठकों के साथ सीधे संवाद करना चाहिए और यह कविता पाठ से ही संभव है । अपनी बात को मजबूती देने के लिए आलोक धन्वा ने हरिवंश राय बच्चन, जयशंकर प्रसाद आदि की कविताओं को उद्धृत किया । बच्चन की कविताओं की लोकप्रियता की वजह भी उनका पाठ था । आलोक धन्वा के पहले मुंबई की कवयित्री स्मिता पारिख के संग्रह नज्मे इंतजार की का विमोचन करते हुए हिंदी के वरिष्ठतम कवियों में से एक केदारनाथ सिंह ने भी कुछ इसी तरह की बात की थी । केदार जी ने कहा कि कविता लिखे से ज्यादा पढ़े जाने की चीज है । पहले तो वहां मौजूद दर्शकों को लगा कि केदार जी पता नहीं क्या कहना चाह रहे हैं लेकिन बाद में उन्होंने साफ किया कि कवि के लिए कविता लिखना जितना महत्वपूर्ण है पाठकों के लिए उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि कवि उन कविताओं का पाठ करे । उन्होंने कहा कि स्मिता की कविताएं मंचों पर पढ़ी जानी चाहिए ।

कविता को लेकर कई वरिष्ठ कवियों और लेखकों ने चिंताएं व्यक्त की हैं । कवि नरेश सक्सेना ने भी कुछ दिनों पहले अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि एक छोटी लाइन और एक बड़ी लाइन लिखकर लोग समझते हैं कि वो कवि हो गए हैं । उनके मुताबिक इस तरह की कविताओं ने छंदशास्त्र को भी निगेट किया । इसी तरह की बात कई वरिष्ठ कवि लेखक अलग अलग मंचों पर अलग अलग तरीके से कह चुके हैं । इन कवियों की चिंताओं के केंद्र में कविता का पाठकों से दूर होते जाना है । केदार नाथ सिंह जब यह कहते हैं कि कविता लिखे से ज्यादा पढे जाने की चीज है तो वो मंच से कविता पाठ की वकालत करते हुए नजर आते हैं । मंच से कविता पाठ की संस्कृति का लगभग खत्म हो जाने का हिंदी कविता को बहुत नुकसान हुआ । साठ के अंतिम वर्षों या सत्तर के दशक की शुरुआत के बाद मंच पर कविता पाठ करनेवालों कवियों को मंचीय कवि कहकर हेय दृष्टि से देखे जाने की प्रवृत्ति ने जोर पकड़ा । इसका नतीजा यह हुआ कि बड़े पैमाने पर आयोजित किए जानेवाले कवि सम्मेलनों में बड़े कवियों ने जाना पहले कम किया और फिर बंद कर दिया । क्योंकि माहौल ही ऐसा बना दिया गया कि जो मंच पर कविता पाठ करेगा उसको प्रतिष्ठा नहीं मिल सकती है । इस प्रचार से कुछ तुकबंदी करनेवाले कवियों की पौ बारह हो गई । संजीदगी से कविताई करनेवाले नेपथ्य में चले गए और कविता के नाम पर चुटकुले सुनानेवाले बढ़ते गए । इससे उस दुष्प्रचार को बल मिला कि मंच पर गंभीर कवि कविता पाठ नहीं करते हैं । बहुत दिन नहीं बीते हैं जब हिदी की साहित्यक पत्रिका पाखी में मंचीय कवि कुमार विश्वास का एक साक्षात्कार छपा था तो कविता के मठधीशों और उनके चेलों ने बवाल खड़ा कर दिया था । कुमार को और पाखी के संपादक प्रेम भारद्वाज को इस बावत सफाई देनी पड़ी थी । कुमार ने तो बेहद तल्ख अंदाज में अपनी बात रखी और साहित्यक लॉबियों पर सवाल खड़ा कर दिया । यह ठीक है कि कुमार कई बार तुकबंदियां करते हैं लेकिन उनकी कविताओं ने हिंदी कविता को एक नया पाठक वर्ग तो दिया ही है । हिंदी में मंचीय कवि, लुगदी साहित्य, पॉपुलर कल्चर, पॉपुलर सिनेमा आदि शब्द नकारात्मकता के साथ प्रचारित कर दिए गए । ये शब्द उस दौर में नकारात्मक हुए जिस दौर में हिंदी साहित्य में प्रगतिशीलता, जनवादिता का जोर चल रहा था । इस बात की गंभीरता से पड़ताल होनी चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ कि मंच पर कविता पाठ करनेवाले कवियों को मुख्यधारा का कवि नहीं माना गया, बल्कि उनके मूल्यांकन में भी भेदभाव बरता गया । दिनकर जी जैसे बड़े कवि को प्रगतिशील आलोचकों ने वो स्थान नहीं दिया जिसके वो हकदार थे । निराला के उन लेखों को सायास छुपा दिया गया जो कि उन्होंने कल्याण पत्रिका में लिखे थे । निराला के कल्याण में छपे लेखों को दबा देने के पीछे की मंशा सिर्फ इतनी नजर आती है कि उनका वामपंथ की तरफ के झुकाव को उभार कर स्थापित किया जा सके  । वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र की किताब -पत्रों में समय संस्कृति- से यह बात साफ है कि निराला जी ने कल्याण पत्रिका में हनुमान प्रसाद पोद्दार जी के अनुरोध पर कई लेख लिखे थे । उनको सामने आना चाहिए ।   इस तरह की हरकतों या तिकड़मों का नतीजा यह हुआ कि पाठकों के बीच कविता को लेकर एक संस्कार या पढ़ने की संस्कृति का विकास बाधित हो गया । लंबे समय तक इस पर ध्यान नहीं दिया गया जिसकी वजह से कविता के नए पाठक बनने बंद हो गए । आज हिंदी में कविता की इतनी बुरी गत हो चुकी है कि कोई भी प्रकाशक कविता संग्रह छापने में रुचि नहीं दिखाता है । वरिष्ठ कवियों को भी इस दिक्तत का सामना करना पड़ता है युवाओं की तो बात ही छोड़ दीजिए । कवियों को पैसे देकर अपनी किताबें छपवानी पड़ रही हैं । अब जब कविता को लेकर साहित्य में इमरजेंसी जैसे हालात हो गए हैं तो वरिष्ठ जनों का ध्यान इस ओर गया है जो कि साहित्य में कविता की वापसी के लिए किए जा रहे प्रयत्नों के संकेत के तौर पर देखा जाना चाहिए । लेकिन वरिष्ठ कवियों का इतना कहना भर ही काफी नहीं है उनको मंचों पर जाकर अपनी कविताओं का पाठ कर पाठकों को कविता की ओर वापस लाने का भागीरथ प्रयास करना होगा । अगर वो इस तरह की पहल करते हैं तो युवा कवियों को भी बल मिलेगा और संभव है कि साहित्य में कविता की वापसी हो जाए । 

Saturday, December 12, 2015

सियासी संग्राम में GST की बलि !

नेशनल हेराल्ड केस और जीएसटी में यूं तो प्रत्यक्ष रूप से कोई तार जुड़ता नहीं है क्योंकि एक तो कोर्ट में चल रहा केस है तो दूसरा देश में आर्थिक सुधार के लिए सरकार का एक ऐसा कदम है जिसको संसद की मंजूरी चाहिए । लोकतंत्र में कानूनी मुकदमों और विधायी कार्य के बीच कोई रिश्ता होता नहीं है बल्कि संविधान इस बात को मजबूती से कहता है कि विधायिका और न्यायपालिका स्वतंत्र रूप से काम करते हैं । लेकिन नेशनल हेराल्ड में सोनिया गांधी और राहुल गांधी की व्यक्तिगत पेशी से छूट के बाद जिस तरह से कांग्रेस सांसद दोनों सदनों में आक्रामक हुए हैं उससे जीएसटी बिल पर संकट के बादल छा गए हैं । संसद में जारी हंगामे के बीच जीएसटी बिल पर पक्ष और विपक्ष के बीच दूसरे राउंड की बातचीत नहीं हो सकी है । कांग्रेस का आरोप है कि बीजेपी सुब्रह्ण्यम स्वामी के कंधे पर बंदूक रखकर सोनिया-राहुल पर निशाना साध रही है । नेशनल हेराल्ड केस में पैसों की हेराफेरी का आरोप लगाकर स्वामी ने सोनिया और राहुल को केंद्र में बीजेपी की सरकार के आने के पहले ही अदालत में खींचा था । काफी लंबे वक्त तक इस मामले की सुनवाई चली । इस बीच सोनिया, राहुल और अन्य कांग्रेसी नेताओं ने दिल्ली हाईकोर्ट में इस केस में व्यक्तिगत पेशी से छूट के लिए याचिका दायर की । इस याचिका को खारिज करते हुए अदालत ने सोनिया और राहुल को दिल्ली की पटियाला हाउस अदालत में पेश होने का आदेश दिया । इस आदेश के बाद शुरुआत में कांग्रेस नेताओं के बीच भ्रम की स्थिति दिखाई दी । पहले ये बात सामने आई कि हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जाएगी लेकिन अदालत में सोनिया और राहुल ने साफ तौर पर कहा कि वो कोर्ट के सामने पेश होने के लिए तैयार हैं । अब उन्नीस दिसबंर को दोपहर तीन बजे सोनिया-राहुल दोपहर तीन बजे अदालत के सामने हाजिर होंगे । इस पूरे मामले को विस्तार से बताने का मकसद सिर्फ इतना है कि यह एक कानूनी प्रक्रिया है जिसके तहत सोनिया और राहुल को समन किया गया है । लेकिन कांग्रेस को इसमें राजनीति नजर आती है और वो सरकार पर राजनीतिक बदले की भावना का आरोप लगाते हुए संसद को ठप कर देती है । पार्टी के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद तो यहां तक कह देते हैं कि बीजेपी सरकार गांधी परिवार, बिमाचल के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह, पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम शंकर सिंह वाघेला आदि को जानबूझकर फंसाने की कोशिश कर रही है । कोर्ट के फैसले पर संसद ठप करने की यह पहली घटना है इसके पहले भी ऐसा हुआ है लेकिन कोर्ट के फैसले पर कई अहम बिल के ठप हो जाने की यह संभवत: पहली घटना हो सकती है । जीएसटी ही नहीं बल्कि कई और अहम बिल हैं जिनको संसद की मंजूरी चाहिए जिनमें रियलिटी सेक्टर में सुधार का बिल इस सेक्टर में आई मंदी को दूर करने के लिए बेहद अहम है ।  
जीएसटी पर सरकार और कांग्रेस के बीच बेहतर तालमेल की संभवना बन रही थी और उम्मीद की जा रही थी कि इस सत्र में ये बि पास हो जाएगा । सरकार की तरफ से बनाई गई विशेषज्ञों के पैनल ने सत्रह अठारह फीसदी की स्टैंडर्ड जीएसटी रेट की सिफारिश कर दी थी । इसके अलावा इस पैनल ने सर्विसेज की सप्लाई पर एक फीसदी के अतिरिक्त टैक्स को भी खत्म करने का सुझाव दिया था । ये दोनों कांग्रेस की मांग थी लेकिन कोर्ट के फैसले के बाद चेन्नई से राहुल गांधी ने साफ संदेश दे दिया कि वो सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम करेंगे । राहुल ने कहा कि सरकार सोचती है कि वो बदले की राजनीति से उनका मुंह बंदकर देगी लेकिन ऐसा होगा नहीं । उन्होंने जोर देकर कहा कि वो सरकार पर दबाव बनाते रहेंगे और अपना काम करते रहेंगे । राहुल के इस बयान से साफ है कि वो किस तरह का दबाव सरकार पर बनाते रहेंगे । लेकिन ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस ने देश की न्यायिक प्रक्रिया को संसद की कार्यवाही से जोड़ दिया है । जिसका असर आर्थिक सुधारों पर पड़ना तय है । जीएसटी बिल पर आए संकट के मद्दनदर मंगलवार को सेंसेक्स में करीब सवा दो सौ प्लाइंट की गिरावट दर्ज की गई जो पिछले तीन महीनों का निम्नतम स्तर रहा । शेयर बाजार में ये गिरावट लास्ट ट्रेडिंग सेशन में दर्ज की गई । आर्थिक मामलों के जानकारों का कहना है कि संसद में नेशनल हेराल्ड मसले पर जारी हो हल्ले के बीच बाजार में निगेटिव सेंटिमेंट चला गया । इसका असर रुपए की कीमत पर भी देखने को मिला और वो भी करीब ग्यारह पैसे टूटकर दो साल के निम्नतम स्तर पर जा पहुंचा । यह बात समझ से परे हैं कि कांग्रेस संसद को ठप अर्थव्यवस्था को क्या संकेत देना चाहती है । सोनिया गांधी ने संसद भवन के परिसर में संवाददातओं से कहा कि उनको किसी से डर नहीं लगता है क्योंकि वो इंदिरा गांधी की बहू हैं । सोनिया गांधी के इस बयान से साफ है कि कांग्रेस इस पूरे मसले को राजनीतिक तौर पर भुनाना चाहती है । इमरजेंसी के बाद जब इंदिरा गांधी को गिरफ्तार किया गया था तो कांग्रेसियों को उसको एक पॉलिटिकल इवेंट बना दिया था । जब जब इंदिरा गांधी शाह कमीशन के सामने पेश होती थी तब तब कांग्रेस के नेता देश को यह संदेश देते थे कि जनता पार्टी की सरकार बदले की भावना से काम कर रही है । इसी तरह से सोनिया ने जब एलान कि उनको डर नहीं लगता तो एक एक करके कांग्रेस के तमाम दिग्गजों ने मंगलवार को प्रेस कांफ्रेंस की और सरकार पर बदले की राजनीति का आरोप जड़ा । यह बहुत मशहूर कहावत है कि हिस्ट्री रिपीट इटसेल्फ और कांग्रेस को लगता है कि इतिहास खुद को दोहराने वाला है । पर कांग्रेस एक और कहावत भूल गई है कि राजनीति में काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती ।

Sunday, December 6, 2015

उपस्थिति से बढ़ेगी साझेदारी

जब से कॉफी हाउस की संस्कृति बंद हुई है तब से साहित्यक समाचार ज्यादातर सोशल मीडिया पर ही नजर आते हैं । साहित्यक गॉसिप से लेकर विवाद तक, गंभीर टिप्पणियों से लेकर फूहड़ कमेंट तक, साहित्यक समाचार से लेकर साहित्येतर कानाफूसी तक सब-कुछ सोशल मीडिया से सामने आने लगा है । कॉफी हाउस में तो बोलकर निकल जाने की सहूलियत थी और उसका उतना विस्तार भी नहीं था लेकिन जितना कि सोशल मीडिया है । यहां आप पोस्ट कर निकल नहीं सकते हैं । सोशल मीडिया पर एक और सहूलियत है कि जैसे ही आपकी पोस्ट को कोई लाइक करता है या उसपर अपनी टिप्पणी देता है तो वो टाइम लाइन पर सबसे उपर आ जाता है । इसका नतीजा यह होता है कि किसी भी तरह की खबर लंबे समय तक सोशल मीडिया पर बनी रहती है । बहुधा तो ऐसा होता है कि साल दो साल पहले की पोस्ट भी अगर किसी ने लाइक कर दी तो वो फौरन टाइम लाइन पर आ जाता है । इसके फायदे और नुकसान दोनों हैं । पायदा ये कि सकारात्मक खबरें वहां आती जाती रहती हैं और नुकसान येकि आरोपों की शक्ल में लिखे गए पोस्ट की भी उपस्थिति बनी रहती है । हाल ही में सोशल मीडिया पर एक खबर देखकर मैं चौंका । ये खबर थी पटना के लेखक रत्नेश्वर से जुड़ी । रत्नेश्वर ने अपनी वॉल पर अपनी किताब के पटना में होनेवाले लोकार्पण समारोह का कार्ड लगाया था । यह कोई अहम बात नहीं थी, हर किताब के लोकार्पण का कार्ड लोग फेसबुक आदि पर शेयर करते ही ही हैं । अब तो ये रिवाज भी हो चला है ।  लेकिन उस कार्ड पर प्रकाशित एक सूचना ने मुझे चौंकाया । मैजिक इन यू नाम की इस किताब की बीस हजार प्रतियों की प्री बुकिंग होने का दावा करते हुए प्रचारित किया जा रहा है । चौंका इस वजह से कि अंग्रेजी में लिखी इस किताब को छापा है कि हिंदी के प्रकाशक प्रभात प्रकाशन ने । इस लिहाज से यह एक बड़ी घटना है कि किसी किताब के लोकार्पित होने के पहले ही बीस हजार प्रतियों की बुंकिंग हो जाना । भारतीय प्रकाशन जगत के लिहाज से यह एक अहम घटना है । इसके पहले चेतन भगत की किताब हॉफ गर्ल फ्रेंड की साल लाख प्रतियों की एडवांस बुकिंग हुई थी परंतु वो बुकिंग एक ऑनलाइन कारोबार करनेवाली बेवसाइट ने की थी जिसके पास उक्त किताब को एक तय समय सीमा तक बेचने का एक्सक्लूसिव अधिकार था । अंग्रेजी के कई प्रकाशकों और लेखकों से मैंने इस बारे में बात कर यह समझने की कोशिश कि प्रकाशन जगत के लिहाज से यह कितनी बड़ी घटना है । प्रकाशकों और लेखकों, दोनों ने बताया कि यह घटना महत्वपूर्ण है जिसको रेखांकित किया जाना चाहिए । दूसरी जिस बात ने मुझे चौंकाया वह ये कि रत्नेश्वर की यह किताब मैजिक इन यू साहित्यक कृति नहीं हैं बल्कि ये किताब आपके अंदर की ताकत को पहचानने और उसको उजागर करने की बात करता है यानि कि यह व्यक्तित्व विकास की  किताब है । इस बात को समझने की आवश्यकता है कि किताब छपने और बाजर में आने के पहले ही उसकी बीस हजार प्रतियों की बुकिंग कैसे हो गई । भारत में जहां किताबों की बिक्री को लेकर रोना गाना मचा रहता है वैसे परिदृश्य में सुदूर बिहार के एक लेखक की लिखी किताब छपने के पहले इतनी लोकप्रिय हो जाए तो आश्चर्य भी होता है और इस बात का संतोष भी होता है कि भारत में किताबों की बिक्री का बड़ा बाजार है । रत्नेशवर पहले हिंदी में लिखते रहे हैं । उनकी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं । पिछले साल नेशनल बुक ट्रस्ट से आई उनकी किताब मीडिया लाइव के भी कई संस्करण हो चुके हैं । एक जमाने में कहानियां लिखनेवाले रत्नेश्वर कालांतर में नॉन फिक्शन की ओर मुड़े । कुछ दिनों पहले एक साक्षात्कार में रत्नेश्वर ने कहा  था कि सैद्धांतिक साहित्य को पाठक पूरी तरह नकार रहे हैं क्योंकि उनमें कहानी से ज्यादा विचार प्रबल होते हैं। उन्होंने माना था कि आजकल मोटे-मोटे उपन्यासों का लेखन भी खूब हो रहा है, पर अधिकांश उपन्यास विवरणात्मक शैली में लिखे जा रहे है वो कहते हैं कि उपन्यास या कहानी किस्सागोई की चासनी में ऐसे लिपटे हों कि पाठक अंत तक बहता चला जाय, आज के अधिकांश उपन्यासों और कहानियों के विवरण शैली को पाठक झेल ही नहीं पाते और उनमें ऊब पैदा होती है। मतलब साफ़ है - शायद आज के साहित्यकार का टारगेट आलोचक और पुरस्कार होते हैं ! जो साहित्य उनके लिए लिखा नहीं गया, ऐसे में भला पाठक आपको क्यों तरजीह देने लगे । वो इस बात पर भी चिंता प्रकट करते हैं कि हिन्दी पढ़ने-जानने वालों की संख्या करीब साठ सत्तर करोड़ है तो हमारे संस्करण तीन चार सौ के क्यों होते हैं । वो सवाल उठाते हैं कि क्या हमारा लक्ष्य उनमें से कम-से-कम सात लाख हिंदी प्रेमियों को पाठक बनाने का नहीं होना चाहिए?  उनका मानना है कि लेखक का दायित्व अच्छा साहित्य लिखना तो है ही उसे पाठकों तक पहुंचाना भी है। अभी हाल ही में रत्नेश्वर ने अपना पहला उपन्यास रेखना मेरी जान लिखकर खत्म किया है और उनका यह उपन्यास भी जल्द ही हिंदी और अंग्रेजी में छपकर बाजार में आने वाला है । देखना यह होगा कि उनके इस उपन्यास को पाठक कैसे लेते हैं । ग्लोबल वार्मिंग को केंद्र में रखकर लिखी गई इस किताब को लेकर प्रकाशक उत्साहित हैं । यह बात समझ से परे है कि किताबों के पाठकों की कमी का रोना क्यों रोया जाता है । क्यों इस बात को प्रचारित किया जाता है कि हिंदी का प्रकाशन व्यवस्या तो सरकारी खरीद की वैशाखी थामे चल रहा है वर्ना तो ये कब का दम तोड़ चुका होता । यह कहा जा सकता है कि अंग्रेजी में किताबों की प्री बुकिंग हुई है लेकिन हिंदी की हालत भी बेहतर है वहां भी यह हो सकता है । दरअसल इस तरह का वातावरण बनाया जा रहा है कि हिंदी में पाठकों की कमी है । इसको निगेट करने की जरूरत है ।
अभी हाल ही में मार्केट सर्वे करनेवाली एक कंपनी नीलसन इंडिया की बुक मार्कट रिपोर्ट 2015 जारी की गई है । नीलसन इंडिया की इस रिपोर्ट में कई ऐसे खुलासे हुए हैं जो प्रकाशन जगत के लिए आंखें खोलनेवाले हैं । सबसे पहले तो इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत विश्व का छठा सबसे बड़ा किताबों का बाजार है । उस रिपोर्ट के मुताबिक इस वक्त भारत में किताबों का बाजार इक्कसी हजार छह सौ करोड़ रुपए का है । नीलसन के अनुमान के मुताबिक किताबों का ये बाजार सालाना करीब साढे उन्नीस फीसदी की दर से बढ़ेगा और 2020 तक इस बाजार का आकार तेहत्तर हजार नौ सौ करोड़ तक पहुंच जाएगा । नीलसन के इस अनुमान का आधार भारत की साक्षरता दर है । उसके मुताबिक भारत की साक्षरता दर 2020 तक नब्बे फीसदी हो जाएगी जो इस वक्त चौहत्तर फीसदी है । इस रिपोर्ट में और भी दिलचस्प आंकड़ें हैं । इसके मुताबिक भारत में अंग्रजी किताबों का बाजार पचपन फीसदी है और अंग्रेजी किताबों का विश्व में ये दूसरा सबसे बड़ा बाजार है । किताबों के बाजार में हिंदी किताबों का शेयर पैंतीस फीसदी है और अन्य भारतीय भाषाओं की किताबों की हिस्सेदारी मात्र दस फीसदी है । नीलसन के इन आंकड़ों में अकादमिक, प्रोफेशनल, स्कूल टेक्सट बुक, के अलावा रचनात्मक साहित्य की किताबें भी शामिल हैं । इतना बड़ा बाजार होने के बावजूद किताबों की बिक्री नहीं होने पर छाती कूटना उचित नहीं है । जरूरत इस बात की है कि किस तरह से किताबों के बढ़ते बाजार में अपनी उपस्थिति और हिस्सेदारी को मजबूत किया जाए । नीलसन की रिपोर्ट के मुताबिक किताबों के बाजार के फैलाव में कई सारी दिक्कतें हैं । इन दिक्कतों में सबसे बड़ी बाधा तो किताबों के डिस्ट्रीव्यूशन श्रृंखला को लेकर है । किताबों के वितरण की कोई निश्चित व्यवस्था नहीं होने और पुस्तक विक्रेताओं को लंबे समय तक क्रेडिट देने से इस कारोबार में कैशफ्लो कम होता है इस वजह से पूंजीगत समस्या खड़ी हो जाती है । इस अलावा किताबों के कारोबार में जो सबसे बड़ी समस्या है वह ये कि यहां पाइरेसी बहुत ज्यादा होती है । भारत उतना विशाल देश है कि पाइरेसी को रोक पाना लगभग असंभव है । इसका बेहतरीन उदाहरण तसलीमा नसरीन की किताब लज्जा है । इसके प्रकाशन का अधिकार दिल्ली के वाणी प्रकाशन के पास है लेकिन जाने कहां कहां और किन किन भाषाओं में यह किताब प्रकाशित हुई है वो ना तो लेखिका को मालूम है और ना ही प्रकाशक को । पाइरेसी रोकने के लिए जो कानून हैं वह उतने सख्त नहीं हैं लि्हाजा इसको मजबूत करने की जरूरत है । अंत में मशहूर शायर दुष्यंत कुमार की दो पंक्तियां कहना चाहूंगा- कौन कहता है कि आसमान में सूराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो । किताबें बिकेंगी कोशिश तो हों ।