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Saturday, October 24, 2026

दक्षिणपंथी फिल्मकारों के सामने चुनौतियां


फिल्म निर्देशक मधुर भंडारकर ने डा श्यामा प्रशाद मुखर्जी पर फिल्म बनाने की घोषणा की है। फिल्म का नाम होगा- श्यामा द मिसिंग चैप्टर। फिल्म की घोषणा के समय बताया गया कि इसमें डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राजनीतिक संघर्ष, वैचारिक प्रतिबद्धता और राष्टीय एकता के लिए उनके आंदोलनों को प्रमुखता से दिखाया जाएगा। कलकत्ता विश्विद्यालय के सबसे युवा कुलपति बनने से लेकर स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल के सदस्य होने तक डा मुखर्जी की संघर्ष यात्रा में भी कई दिलचस्प मोड़ हैं। स्वाधीन भारत में जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से उनका मतभेद हुआ तो वो मंत्रिमंडल छोड़ कर बाहर निकल गए। कश्मीर में अनुच्छेद 370 की समाप्ति के लिए बड़ा आंदोलन किया। उस आंदोलन में ही उनका बलिदान हुआ। इन सब महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं को इस फिल्म में समेटने की बात की जा रही है। अभी सिर्फ फिल्म की घोषणा की गई है, इसके शूटिंग शेड्यूल, स्टारकास्ट आदि के बारे में नहीं बताया गया है। दो वर्षॉ पहले वीर सावरकर पर रणदीप हुड्डा ने एक फिल्म बनाई थी। फिल्म का नाम था स्वातंत्र्यवीर सावरकर। रणदीप हुड्डा ने इस फिल्म को लेकर खूब मेहनत की थी। लेकिन फिल्म को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। जब फिल्म प्रदर्शित हुई थी तब चर्चा हुई कि अगर फिल्म की अवधि थोड़ी कम होती तो दर्शकों को अधिक पसंद आती। तीन घंटे की फिल्म थी। उस समय भी इस बात की भी चर्चा हुई थी कि जब देश के नायकों या राइट विंग के विषयों पर दक्षिणपंथी माने जानेवाले फिल्मकार फिल्में बनाते हैं तो उनमें से अधिकतर व्यावसायिक रूप से सफल क्यों नहीं हो पाते हैं। 

राइट विंगर फिल्मकारों की असफलता पर बात करने के पहले तीन फिल्मों के बारे मं जान लेते हैं। 2019 में एक फिल्म आई थी पीएम नरेन्द्र मोदी। इस फिल्म में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भूमिका विवेक ओबराय ने निभाई थी। निर्देशक थे उमंग कुमार। फिल्म नहीं चल पाई। एक और फिल्म आई जो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पर केंद्रित थी जिसका नाम था मैं अटल हूं। इसमें अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका पंकज त्रिपाठी ने की थी। ना तो विवेक ओबराय पीएम नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व के साथ न्याय कर पाए और ना ही पंकज त्रिपाठी अपनी अदाओं से अटल जी के करीब पहुंच पाए। पूरी फिल्म में वो पंकज त्रिपाठी ही बने रहे। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी एक फिल्म आई जिसका नाम था अजेय, द अनटोल्ड स्टोरी आप ए योगी। ये फिल्म भी नहीं चल पाई। ये शांतनु गुप्ता की पुस्तक द मंक हू बिकेम द चीफ मिनिस्टर पर आधारित थी। इस तरह की कई फिल्में बनीं पर द कश्मीर फाइल्स और द केरला स्टोरी को छोड़कर कम ही फिल्मों को सफलता मिल पाई। दूसरी तरफ अगर हम देखें तो संजय दत्त जैसे चरित्र पर बनी फिल्म संजू कई सौ करोड़ का बिजनेस करती है। संजय दत्त के व्यक्तित्व में बहुत सारी नकारात्मक बातें हैं फिर भी जब उनको फिल्मी पर्दे पर पेश किया जाता है तो दर्शकों को पसंद आती है। निर्देशक राजू हिरानी ने कथा को बहुत ही रोचक तरीके से पिरोया था।

राइट विंग के फिल्मकारों की फिल्मों की असफलता के कारणों पर विचार करें तो सबसे पहली बात जो सामने आती है वो ये कि इनकी फिल्मों का बजट बहुत कम होता है। इंटरनेट मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर बनी फिल्म का बजट 8 करोड़ रु था। अटल बिहारी वाजपेयी पर बनी फिल्म का बजट 20 करोड़ रु और योगी आदित्यनाथ पर बनी फिल्म का बजट 15 करोड़ था। वहीं 2018 में प्रदर्शित फिल्म संजू का बजट 100 करोड़ के करीब था। बजट कम होने के कारण फिल्मों में जो भव्यता और बड़े स्टार की उपस्थिति होनी चाहिए वो नहीं हो पाती है। राइट विंग के फिल्मकारों के साथ या राइट विंग के विषयों पर फिल्म करने से अभी हिंदी फिल्मों के बड़े स्टार हिचकते हैं। हिचकते क्या हैं बल्कि कोई न कोई बहाना बनाकर मना कर देते हैं। पता नहीं क्यों उनको किस बात का भय सताता है कि वो अब भी लेफ्ट के खेमे के निकट ही दिखना चाहते हैं। हिंदी फिल्मों में लंबे समय से एक इकोसिस्टम काम करता है जो राइट विंग के विषयों या उनके नायकों पर फिल्म बनाने से कतराता है। एक तो बजट की कमी दूसरे सितारों का नहीं मिलना कारण बनता है कि कोई स्टूडियो फिल्म को रिलीज करने के लिए आगे नहीं आता है। उनको इस बात की आश्वस्ति नहीं होती कि फिल्म में  सफल हो पाएगी और वो इपने निवेश पर मुनाफा कमा पाएंगे। संजू फिल्म की सफलता का एक बड़ा कारण उसमें रणवीर कपूर, अनुष्का शर्मा, विकी कौशल, परेश रावल का होना भी था। एक और कारण जो समझ आता है वो ये कि फिल्मों को दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाना चाहिए ना कि जिनके इर्दगिर्द फिल्म बना रहे हैं उनको ध्यान में रखते हुए। फिल्मकार का दायित्व दर्शकों के प्रति होता है। सिनेमा में सिनेमा का तत्वों का होना बहुत आवश्यक है। फिल्म बनाने के पीछे अगर कोई उद्देश्य है भी तो उसको प्रत्यक्ष नहीं करना चाहिए बल्कि परोक्ष रूप से दर्शकों के सामने जाना चाहिए। जैसे संजू फिल्म के माध्यम से संजय दत्त की नकारात्मक छवि को बेहतर करना था। पर वो फिल्मों में दिखाए प्रसंगों के माध्यम से आया, प्रत्यक्ष संवाद से नहीं। राइट विंग फिल्मकार जब नेताओं को केंद्र में रखकर फिल्में बनाते हैं तो उनके व्यक्तित्व पर पर्याप्त शोध नहीं करते। व्यक्तित्व के उन हिस्सों तक नहीं पहुंच पाते हैं जो अज्ञात या कम ज्ञात हो। उनको अपने रिसर्च का स्तर बढ़ाना होगा। फिल्म बनाने में समय लगाना होगा। ये सब तभी संभव होगा जब बजट हो। 

एक और बात जो फिल्मों को प्रभावित करती है वो है समीक्षकों और पीआर का ईकोसिस्टम। फिल्म प्रदर्शित होने के पहले जिस तरह का माहौल बनाया जाता है उसमें इस ईकोसिस्टम का बड़ा हाथ होता है। उस ईकोसिस्टम में अभी भी राइट विंग का प्रभाव नहीं बन पाया है। जबकि लेफ्ट और उससे समानुभूति रखनेवाले लोग खुलकर ना केवल अपने लोगों का समर्थन करते हैं बल्कि अन्य वैचारिक पृष्ठभूमि वाले फिल्मकारों का खुला विरोध भी करते हैं। मुझे याद पड़ता है कि जब डा चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म पिंजर रिलीज हुई थी तो उसकी समीक्षा एम एस सथ्यू ने लिखी थी। एम एस सथ्यू ने गरम हवा फिल्म बनाई थी। वो समीक्षक नहीं थे लेकिन चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म पर लिखा, उसकी कमियां गिनाईं। उसके बाद सथ्यू ने फिर किसी फिल्म की समीक्षा लिखी हो ध्यान नहीं आता। कुल मिलाकर अगर हम फिल्मों के परिदृश्य को देखें तो वहां राइट विंग के विषयों पर बननेवाली फिल्मों के सामने चुनौतियां बहुत अधिक हैं। पता नहीं श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर बनने वाली फिल्म के लिए मधुर भंडारकर का बजट कितना है। वो इसको किस भव्यता से बनाना चाहते हैं। श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमिका कौन सा अभिनेता निभाएगा। ये सब ऐसे प्रस्न हैं जो अब भी राइट विंगर हिंदी फिल्मकारों के सामने मुंह बाए खड़े हैं।  


संस्कार की धरा पर विराट संस्कृति


दुर्गा पूजा और पंडाल कोलकाता की उत्सवी संस्कृति का वो हिस्सा है जिसको हर भारतीय को एक बार महसूस करना चाहिए। नवरात्र के दौरान कोलकाता में देवी दुर्गा के आगमन से लेकर प्रस्थान तक का उत्सव भारतीय संस्कृति के उस आयाम को उद्घाटित करता है जहां संस्कार हैं, मर्यादा है, नवाचार है ,सहयोग से समन्वय का सोच है। देवी दुर्गा की मूर्ति से लेकर पंडाल तक में प्रयोगधर्मिता है। ऐसी प्रयोगधर्मिता जो जन के मन से जुड़कर उनके संस्कार को झंकृत करता है। इस वर्ष तो इनके साथ परिवर्तन भी जुड़ा है। कोलकाता के दुर्गा पूजोत्सव में प्रयोगधर्मिता पंडाल के डिजायन से लेकर मां की प्रतिमा निर्मित तक में दिख रही है। परंतु प्रयोग के नाम पर संस्कार को किसी भी प्रकार से खंडित नहीं किया जाता है। महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा में पौराणिक आख्यानों में वर्णित सारे प्रतिमान दिखेंगे। महिषासुर वध भी होगा, माता की भुजाओं में अस्त्र और कमल का फूल होगा लेकिन किसी प्रतिमा में वो एक भुजा में गणेश को उठाए भी होंगी। उनके पांवों के नीचे महिषासुर होगा ही। 

कहना ना होगा कि ये प्रयोगधर्मिता सनातन के संस्कारों से निर्मित होती है। जो इस वर्ष कोलकाता के पंडालों में दिख रही है। कहीं वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने की थीम, तहीं राम की अयोध्या, कहीं महाभारत तो कहीं देवी दुर्गा की ब्रहंमांडीय शक्ति को बताती विश्वरूपा-विश्वरूपिणी का विराट स्वरूप।कोलकाता में दुर्गा पूजा के अवसर पर नवरात्र में विशेषकर पांच दिनों तक पूरा शहर भक्ति में सराबोर होता है लेकिन किसी भी पंडाल में आपको कानफोड़ू संगीत का शोर नहीं सुनाई देगा। डीजे पर बजनेवाले फिल्मी संगीत भी अनुपस्थित। इन पांच दिनों के दौरान जो संस्कृति आकार लेती है उसमें ढाक के स्वर, रवीन्द्र संगीत की कर्णप्रिय धुनें और देवी मां की प्रतिमा के आगे ढाक की धुन पर धुनुची नृत्य करती महिलाएं। ये नृत्य मां दुर्गा के भक्तों में उल्लास भरता है। पंडाल और उसके आसपास खाने पीने की वस्तुएं बिकती हैं। इन स्टाल्स में विशेष प्रकार की सुरुचिसंपन्नता दिखती है। दुर्गा जी की प्रतिमा लगभग सभी मुहल्ले में स्थापित होती है लेकिन कहीं कोई शोर नहीं। कहीं कोई अफरातफरी नहीं। आत्मनियंत्रण और एक दूसरे के साथ सहयोग करते लोग। पांडालों के बीच कोई द्ववंद्व नहीं बल्कि संयोग और सहयोग का समन्वय दिखता है जो बंगाल की इस संस्कृतिक विरासत की एक अमिट छाप छोड़ता है। इस बार कोलकाता के विभिन्न दुर्गा पंडालों में सनातनी संस्कृति को लेकर एक विशेष आकर्षण दिखता है। जिस भूमि पर जयश्रीराम कहने पर सत्ताधारियों की भृकुटि तन जाती थी वहां अब पंडालों के बाहर राम-राम लिखा है। छत्तीसगढ़ के रामनामी समुदाय के लोग भजन गा रहे हैं। परिवर्तन ने बंगाल में सनातन के सातत्य को बल प्रदान किया।  

Saturday, October 17, 2026

संवाद ने उतारा सोच की मुखौटा


नायक कहता है, मिस शीतल साहनी, मैं एक बात आपको भी कहना चाहूंगा। लड़कियों को छेड़नेवाले ऐसे थर्ड क्लास गुंडों को पकड़ना और उन्हें सबक सिखाना हमारा फर्ज है और वो हम करते हैं। पर कुछ फर्ज लड़कियों का भी है। नायिका पूछती है, क्या फर्ज है मैं समझी नहीं। जरा देखिए अपने आप को, इस तरह के कपड़े पहनकर अगर आप बाहर सड़क पर निकलेंगी तो गुंडों की सीटियां नहीं बजेंगी तो क्या मंदिर की घंटियां बजेंगी। उत्तर मिलता है, क्या खराबी हैं इन कपड़ों में। कहा जाता है कि बहुत कम हैं। सुना था एक जमाने में लड़कियों को कपड़ों का बहुत शौक हुआ करता था ये आजकल आप लोग कपड़ों के मामले में कंजूस क्यों होती जा रही हैं। नायिका का उत्तर मैं क्या पहनती हूं ये मेरा पर्सनल मामला है। नायक प्रतिवाद करते हुए कहता है कि ये तो उसी तरह की बात हुई कि वो लोफर कहे कि सीटी बजाना मेरा पर्सनल काम है। हर वो काम जिससे दूसरों को परेशानी हो पर्सनल नहीं हो सकता। लड़की पूछती है कि मेरे इस लिबास से दूसरों को क्या परेशानी हो सकती है। जवाब- ये तो उस लोफर से पूछना पड़ेगा जिसने आपको देखकर सीटी बजाई। बहरहाल आप एक शरीफ घराने की शरीफ लड़की हैं और अगर थोड़े से शरीफाना कपड़े पहने लें तो किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी। ये संवाद है आज से 46 वर्ष पूर्व की फिल्म दोस्ताना का। 

फिल्म दोस्ताना के लेखक हैं सलीम- जावेद यानि सलीम खान और जावेद अख्तर। हिंदी फिल्मों की सफल लेखक जोड़ी। जावेद अख्तर स्वयं को तरक्कीपसंद लेखक के तौर पर पेश करते रहे हैं। उनकी प्रगतिशील सोच का उदाहरण है दोस्ताना का ये संवाद। ऐसा भी नहीं है कि उक्त लंबा संवाद कहानी की मांग हो। कहानी तो लगभग यहीं से आरंभ ही होती है। नायिका जीनत अमान बहुत कम कपड़ों में जा रही होती और पेंटल उनको छेड़ता है। जीनत अमान उसको पकड़कर थाने ले आती है। पुलिस उसको हवालात में बंद कर देती है। उसके बाद इंस्पेक्टर की भूमिका निभा रहे अमिताभ बच्चन नायिका को कम कपड़ों पहनने को लेकर ज्ञान उड़ेलने लगते हैं। अमिताभ तो वही संवाद बोलते हैं जो लेखक ने लिखा होगा। जावेद अख्तर और सलीम खान की जोड़ी के बारे में कहा जाता है कि सलीम खान कहानी लिखते थे, उसको रोमांचक मोड़ देनेवाले प्रसंग जोड़ते थे और जावेद अख्तर संवाद लिखते थे। अब दोस्ताना के उपरोक्त संवाद से लेखक द्वय की महिलाओं और उसके कपड़ों को लेकर सोच उजागर होता है। माना जाता है कि कोई भी लेखक दो चीजों से प्रभावित होता है। एक तो उसका परिवेश और दूसरा उसका नजरिया। आज से 46 वर्ष पूर्व के परिवेश का तो अनुमान लगाया जा सकता है लेकिन महिलाओं के कम कपड़ों को लेकर जावेद अख्तर और सलीम खान के नजरिए का पता या संकेत तो उक्त संवाद से मिलता ही है। आज जावेद अख्तर नैतिकता की मीनार पर खड़े होकर चाहे जितनी बड़ी-बड़ी बातें कर लें लेकिन उनकी लिखी फिल्में, उसके संवाद चीख चीख कर उनकी असलियत बताते चलते हैं। ये तो इन लेखकों की सौभाग्य है कि हिन्दुस्तान में फिल्मों को लेकर गंभीर अध्ययन कम होता है, अन्यथा इस तरह के लेखन करनेवाले लेखकों को महान तो नहीं ही माना जाता। उनके लिखे संवाद आदि पर तुलनात्मक अध्ययन होता। फिल्मों के दृष्य और संवाद के साथ साथ गीतों पर भी समग्रता में विचार होता। इस वैचारिकक मंथन से क्या निकलता इसका अनुमान पाठक लगा सकते हैं। 

बात सिर्फ महिलाओं के कम कपड़ों पर उपदेश की नहीं है। उस पूरे संवाद में एक पंक्ति में जिस तरह से मंदिर की घंटी की बात की गई है वो भी लेखकों के सोच का परिचायक है। इस वाक्य को एक बार फिर से देखा जाना चाहिए जहां लेखक एक पुरुष पात्र के मुंह से कहलवाता है कि इस तरह के कपड़े पहनकर अगर आप बाहर सड़क पर निकलेंगी तो गुंडों की सीटियां नहीं बजेंगी तो क्या मंदिर की घंटियां बजेंगी। लेखक को गुंड़ों की सीटियां के सामने मंदिर की घंटियां नजर आई थी। मंदिर की घंटी और गुंडे की सीटी में तुलना का क्या औचित्य। औचित्य को अगर छोड़ भी दिया जाए तो इस तुलना की उपयुक्तता पर विचार किया जाना चाहिए।  जावेद अख्तर के लेखन में हिंदू धर्म प्रतीकों को लेकर इस तरह की हल्की टिप्पणियां पहले भी रेखांकित की जा सकती हैं। इसलिए इस संवाद को लेकर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। लेकिन दर्शकों को पता तो होना चाहिए कि प्रगतिशीलता का दावा करनेवाले लेखक की असलियत क्या है। महिलाओं और धार्मिक प्रतीकों के बारे में वो क्या सोचता है। जावेद अख्तर बहुधा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बातें करते हुए नजर आते हैं। जब वो मंच से इस तरह की जुमलेबाजी करते हैं तो खूब तालियां बजती हैं। इस तरह की बातों रीलों पर लाइक्स भी बटोरते हैं। साहित्यिक मंचों पर इस तरह की बातें कर गंभीर लेखक और कवि होने का दावा पेश करते हैं पर उनके लिखे फिल्मी संवाद उनके सोच को सामने रख देते हैं। यह नहीं कहा जा सकता है कि फिल्मों की कहानी में तो फार्मूला और सफलता को ध्यान में रखकर लिखी जाती है। लिखी जाती होगी लेकिन लेखक के विचार तो उसमें आते ही हैं। ये सिर्फ जावेद अख्तर के साथ नहीं होता है बल्कि फिल्मों के सभी लेखकों के लेखन को देखने पर यही पता चलता है। अपने लेखन में लेखक वैचारिक छौंक लगाता ही है। 

जावेद अख्तर खुद को नास्तिक भी घोषित करते रहे हैं। अपनी इस छवि को बल प्रदान करने के लिए मंचों पर इस्लाम को लेकर भी कटु बातें कह जाते हैं। लेकिन वो बातें इस्लामिक समाज की कुरीतियों तक ही होती हैं। किसी मंच या फिल्मी संवाद में उन्होंने इस्लाम से संबंधित किसी उपमा का, किसी प्रतीक का उपहास किया हो ऐसा दिखाई नहीं देता है। जब उनसे कभी किसी मंच पर कोई व्यक्ति इससे संबंधित प्रश्न पूछ लेता है तो वो इसको बहुत चतुराई के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ देते हैं। इमोशनल होकर ये पूछने लग जाते हैं कि क्या आप अपने मुल्क को सीरिया बनाना चाहते हैं। दर्शकों को लगता है कि देखो कितनी अच्छी बातें कर रहा है। फिर कुछ और मजेदार बातें, क्रोधित होने का अभिनय और जनता की तालियां। लेकिन इन तालियों से ना तो मूल प्रश्न का उत्तर मिलता है और ना ही जावेद अख्तर के लेखन से उपजे विचार की तार्किकता सिद्ध होती है। जावेद अख्तर की ये कैसी नास्तिकता है जो उनको सिर्फ हिंदू धर्म प्रतीकों का उपहास करने की अनुमति देता है। क्या हिंदुओं की सहनशीलता और सहिष्णुता उनको इस तरह की उपहासजनक टिप्पणियां करने का साहस देता है। ये उनकी कैसी प्रगतिशीलता है जो लड़कियों के कम कपड़ों पर टिप्पणियां करवाता है। आज कुछ राजनीतिक दल देश में स्मैश द पैट्रियार्की का ना बुलंद करते हैं, मनुस्मृति को प्रश्नों के कठघरे में खड़ा करते हैं। करिए, लेकिन जावेद अख्तर जैसे लेखकों के सोच को और उस तरह के लेखन तो भी रेखांकित कर प्रश्नांकित करने की आवश्यकता है।  


Wednesday, October 14, 2026

दिल्लगी ने दी हवा


गोवा में आयोजित होनेवाले भारतीय अंतराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में कुछ वर्षों पूर्व एक सत्र के दौरान करण जौहर ने कहा था कि पहले फिल्मों में दो-तीन प्रकार की कहानियां ही दर्शकों को पसंद आती थीं। अगर मुझे ठीक याद आ रहा है तो करण ने कहा था कि एक तो खोया पाया का फार्मूला और दूसरा प्रेम त्रिकोण वाली कहानी को दर्शक खूब पसंद करते हैं। करण जौहर के उस वक्तव्य के बाद वहां उपस्थित फिल्म इतिहासकारों से इसपर चर्चा भी हुई थी। उस चर्चा में फिल्म दोस्ताना नहीं आई थी। फिल्म दोस्ताना करण जौहर के पिता यश जौहर की फिल्म है। इस फिल्म की कहनी भी प्रेम त्रिकोण ही है। विजय (अमिताभ बच्चन) और रवि (शत्रुघ्न सिन्हा) दो दोस्त हैं जिनको शीतल (जीनत अमान) से प्यार हो जाता है। रवि बिंदास अंदाज में शीतल से प्यार की पींगे बढ़ाता है वहीं रवि खामोश मोहब्बत करता है। शीतल रवि को दोस्त समझती है। उसको भी रवि के प्यार का अनुमान नहीं है। रोचक तरीके से कहानी कई दिलचस्प मोड़ लेती हुआ आगे बढ़ती है। रवि और विजय दोस्त से दुश्मन बन जाते हैं। कहानी के एक नाटकीय मोड़ से रवि को विजय की उसके प्रति भावना का पता चलता है। वो बेचैन हो जाता है। इस फिल्म को राज खोसला ने निर्देशित किया था। राज खोसला अपने जमाने के बेहतरीन निर्देशकों में गिने जाते थे। उन्होंने सलीम-जावेद की दोस्ताना की कहानी का ट्रीटमंट ऐसा किया कि दर्शकों को फिल्म भा गई। जो कहानी कई बार कही जा चुकी थी उसको दर्शकों का खूब प्यार मिला। 1980 में रिलीज हिट फिल्मों में दोस्ताना भी शामिल है। 

फिल्म दोस्ताना के बनने की कहानी भी दिलचस्प है। राज खोसला ने मराठी उपन्यास आशी तुझी प्रीत पर आधारित एक हिंदी फिल्म निर्देशित की थी जिसका नाम था ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’। इस फिल्म के बाद राज खोसला की शराब से ऐसी दोस्ती हुई कि वो कहने लगे थे कि अब फिल्म नहीं बस स्काच के साथ जिंदगी बिताई जाएगी। ये वही दौर था जब यश जौहर फिल्मों की पब्लिसिटी और प्रबंधन से मुक्त होकर फिल्म बनाना चाह रहे थे। वो राज खोसला के पास पहुंचे और उनसे फिल्म निर्देशित करने का अनुरोध किया। पहले तो राज खोसला ने मना कर दिया लेकिन यश जौहर ने हार नहीं मानी। उनके पास सलीम-जावेद की कहानी थी। सलीम जावेद का हिंदी फिल्मों में डंका बज रहा था। एक दिन यश जौहर ने राज खोसला से आग्रह किया कि वो कहानी सुन लें। खोसला ने जब कहानी सुनी तो हां कर दी। अब कास्टिंग की बात आरंभ हुई। अमिताभ को राज खोसला ने एक फिल्म में डायरेक्ट किया था। वो तय ही थे। जीनत अमान और विनोद खन्ना भी फाइनल किए गए। राज खोसला और विनोद खन्ना ने कई फिल्में साथ की थीं। दोनों में बहुत अच्छी दोस्ती थी। फिल्म दोस्ताना की रिलीज के दो साल पहले मुकद्दर का सिकंदर रिलीज हुई थी। उस फिल्म में अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना दोनों की दमदार उपस्थिति थी। विनोद खन्ना अपेक्षाकृत अधिक खूबसूरत थे। सब तय हो गया था। कहानी में राज खोसला ने कुछ बदलाव बताए जिसको सलीम-जावेद ने स्वीकार कर लिया था। स्टारकास्ट भी फाइनल ही था। अचानक एक दिन राज खोसला ने कहा कि विनोद खन्ना को दोस्ताना में लेना ठीक नहीं होगा। जब उनसे कारण पूछा गया तो बोले कि नायिका विनोद खन्ना जैसे खूबसूरत हीरो को छोड़कर अमिताभ बच्चन के साथ क्यों जाएगी। यहीं से फिल्म में शत्रुघ्न सिन्हा के चयन का रास्ता साफ हुआ। 

1980 में रिलीज हुई फिल्म दोस्ताना को उसके गानों के लिए भी याद किया जाता है। सलीम खान कहते भी हैं कि राज कपूर के बाद राज खोसला को ही कहानी और उसमें संगीत के उपयोग की शानदार समझ थी। जिस तरह से राज कपूर संगीत को समझ कर अपनी फिल्मों में उसका उपयोग करते थे उसी तरह से राज खोसला भी अपनी फिल्मों को संगीत से बढ़ाते थे। इस गाने को याद करिए- मेरे दोस्त किस्सा ये क्या हो गया, सुना है कि तू बेवफा हो गया। आनंद बक्षी के इस गीत को मोहम्मद रफी की आवाज ने अमर कर दिया। फिल्म में कहानी के जिस मोड़ पर इस गाने का उपयोग राज खोसला ने किया वो बेहतरीन है। इसी तरह से फिल्म का आरंभ भी एक गीत से ही होता है जिसको मोहम्मद रफी और किशोर कुमार ने आवाज दी है। आनंद बक्षी ने लिखा और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने संगीत दिया । गाने के बोल हैं- सलामत रहे दोस्ताना हमारा। मोहम्मद रफी और किशोर कुमार के साथ गाए गानों में ये गाना बहुत ही अधिक पसंद किया गया या कह सकते हैं कि अब भी किया जाता है। जब करेण जौहर कह रहे थे कि प्रेम त्रिकोण वाली फिल्में भारतीय दर्शक पसंद करते हैं तो उनके जेहन में अवश्य फिल्म दोस्ताना भी रही होगी क्योंकि बहुत लंबे समय तक धर्मा प्रोडक्शन की सबसे हिट फिल्म दोस्ताना ही थी। 


Saturday, October 10, 2026

साहित्यिक वक्ताओं की तैयारी पर प्रश्न


बात कड़वी लग सकती है लेकिन सच्चाई यही है। हद तो यह हो गई कि एक वक्ता कुंवर नारायण की जगह निर्मल वर्मा पर बोलने लगे। टोकने पर उसको स्मृति दोष बताने लगे। यह बात भी उचित है कि कुछ वक्ताओं को ही हर विषय पर बोलने के लिए बार-बार क्यों बुला जाता है। असल में रजा न्यास दरबारियों को प्राथमिकता देता है। दो दिन तक में इस कार्यक्रम में बतैर श्रोता मौजूद रहा, और एकाध वक्ताओं को छोड़ दें तो किसी ने भी कुंवर नारायण को पढ़ा नहीं था। यह कहने के बाद हो सकता है कि रजा न्यास मुझे बतौर श्रोता भी आमंत्रित नहीं करे लेकिन जिस तरह से सरकारी संस्थाओं में इस तरह के आयोजन रस्मी होते हैं रजा न्यास के आयोजन भी उसी तरह के होते हैं, जिसमें चमचों को माइक दिया जाता है। यह कठोर टिप्पणी लिखी है दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापक और हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक प्रभात रंजन ने। प्रभात रंजन बात कर रहे हैं हिंदी कवि कुंवर नारायण के जन्मशताब्दी के अवसर पर रजा न्यास के दो दिवसीय आयोजन की। रजा न्यास लेखक अशोक वाजपेयी की साहित्यिक दुकान है। ये संस्था नियमित रूप से कार्यक्रम आदि आयोजित करती है। इनके कार्यक्रमों में कुछ ऐसे लोगों को आमंत्रित किया जाता है जो अशोक वाजपेयी के हर कार्यक्रम में उपस्थित होते हैं। चाहे उनको पुरस्कार दिया जा रहा हो या फिर किसी लेखक कवि पर केंद्रित गोष्ठी आयोजित की जा रही हो। हिंदी के वर्तमान साहित्यिक परिदृष्य में बहुत ही कम ऐसे लेखक हैं जो किसी गोष्ठी में जाने के लिए मना करते हैं। अध्ययन हो या न हो। 

प्रभात रंजन की टिप्पणी हिंदी साहित्य की किसी राजनीति के अंतर्गत नहीं लिखी गई है बल्कि क्षोभ से उपजी हुई है। कुंवर नारायण समकालीन हिंदी साहित्य के ऐसे कवि या लेखक हैं जिनका रचना संसार विस्तृत है। उन्होंने श्रेष्ठ कवितें लिखी हैं। उनकी कविताओं में कई परतें हैं जिनको समझने के लिए भारतीय काव्य परंपरा का गहन अध्ययन होना चाहिए। काव्य परंपरा के साथ साथ भारतीय परंपराओं का ज्ञान भी होना चाहिए। कुंवर नारायाण ने अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के बहाने विश्व सिनेमा पर भी बहुत गंभीर टिप्पणियां की थीं जो उनके अध्ययन क्षेत्र का सूचक है। हिंदी साहित्य में कम ही ऐसे लेखक और कवि हुए हैं जिन्होंने अंतराष्ट्रीय सिनेमा पर अधिकारपूर्वक लिखा हो। ऐसे लेखक के जन्म शताब्दी समारोह में इस तरह के हल्के, अज्ञानी और लापरवाह वक्ताओं को बुलाकर दिवंगत लेखक का अपमान करना ही माना जाएगा। आप कल्पना करिए कि जन्म शताब्दी समारोह कुंवर जी की मनाई जा रही हो और मंच से कोई वक्ता निर्मल वर्मा पर बोलने लगे। यह तो लेखक और मंच दोनों का अपमान है। लापरवाही की हद तब होती है जब उनको याद दिलाया गया तो वो कहने लगे कि स्मृति दोष के कारण कुंवर जी की बजाए निर्मल जी पर बोलने लगे थे। यह बहुत ही गैर जिम्मेदारी वाला अप्रोच है। इस तरह की घटनाएं हिंदी साहित्य की गोष्ठियों में आम है। आप किसी विषय पर सुनने जाएंगे लेकिन इसकी गारंटी नहीं है कि वक्ता उसी विषय पर बोलें। वक्ता अपनी मर्जी से बोलते हैं और वक्तव्य के बीच में एक दो बार विषय का नाम ले लेते हैं ताकि ऐसा प्रतीत हो कि वो विषय पर बोल रहे हैं।  जन्म शताब्दी जैसे आयोजनों में तो ये खूब होता है। आप अपने पूर्वज लेखक की रचनाशीलता और उसके विभिन्न कोणों के बारे में जानने सुनने के लिए ऐसी गोष्ठियों में जाते हैं लेकिन वक्ता अपने और उनके संबंधों के बारे में बखान करने लग जाते हैं। उनको लगता है कि श्रोताओं को उनकी चतुराई समझ नहीं आती। श्रोता सब समझते हैं.  

यह अकारण नहीं है कि हिंदी साहित्य से जुड़ी गोष्ठियों में श्रोता नहीं या कम मिलते हैं। गोष्ठियों में श्रोताओं को कुछ नया मिलना लगभग बंद हो गया है। जो भी वक्ता आते हैं उनमें से अधिकतर बगैर किसी तैयारी के अपने ज्ञानदंभ के साथ आते हैं। जो मन आता है वो बोलकर चले जाते हैं। श्रोता बेचारा ठगा रह जाता है। अशोक वाजपेयी का ही उदाहरण लीजिए। वो अच्छे वक्ता माने जाते हैं। लच्छेदार हिंदी और अंग्रेजी बोलते हैं। उनके पास संस्मरणों का खजाना भी है। पर तय विषय पर उनको बोलते कम ही सुना गया है। आखिरी बार किसी गोष्ठी में तय विषय पर अशोक वाजपेयी कब बोले इसपर तो शोध हो सकता है। उनकी विशेषता है कि वो मंच पर आते हैं। आरंभ कुछ हल्की फुल्की बातों से करते हैं। फिर एकाध संस्मरण सुनाते हैं और तय विषय को छूते हुए निकल जाते हैं। बात रामचंद्र शुक्ल के कविता क्या है जैसे लेख पर होगी तो वो ये बताएंगे कि उनका रामचंद्र शुक्ल का अध्ययन कितना कम है। अरे भले आदमी अगर आपका अध्ययन कम है तो मत बोलिए। मंच और माइक का लोभ संवरण कर पाना बहुत कठिन कार्य है। नामवर सिंह भी अपने आरंभिक दिनों में बहुत तैयारी के साथ बोलते थे। उनके व्याख्यानों में तथ्य और तर्क दोनों होते थे। इसलिए लोग उनको सुनने के लिए घंटों प्रतीक्षा करते थे। बढ़ती अवस्था के साथ-साथ मंच और माइक के आकर्षण ने उनको भी वक्तव्य पूर्व की तैयारी से दूर कर दिया। वो भी अपने अनुभवों के आधार पर बोलने लगे थे। परिणाम होता था कि जब नामवर सिंह किसी पुस्तक लोकार्पण में जाते थे तो मंच पर ही पुस्तक को उलटते-पलटते थे। अपने भाषण में पुस्तक की दो-तीन पंक्तियां उद्धृत करते हुए लेखक पर तले जाते थे। यह अकारण नहीं था कि बाद के दिनों में नामवर सिंह मंच से हर किसी की प्रशंसा करने लगे थे। प्रशंसा कर देने से प्रश्न नहीं उठते हैं। 

इस तरह की गोष्ठियों और वक्ताओं से हिंदी साहित्य समृद्ध नहीं होता। ना ही लेखक की कृति पर चर्चा हो पाती है। तात्कालिक रूप से लेखकों को अच्छा लग सकता है कि नंच से उसकी प्रशंसा हुई पर कुछ समय बाद उसको कोई याद भी नहीं रखता क्योंकि कोई सार्थक बात तो हुई नहीं। दूसरी तरफ अशोक वाजपी जैसे वक्ताओं को जो बेहतर बोल सकते हैं वो भी संस्मरणात्मक घटनाओं से आगे नहीं बढ़ पाते हैं। संस्मरणों की हल्की फुल्की बातें सुनाकर श्रोतों का मनोरंजन तो हो सकता है लेकिन ज्ञानवर्धन नहीं। विषय के साथ न्याय के लिए आवश्यक है कि उसपर बोलने के लिए पर्याप्त तैयारी की जाए। कुछ ऐसा विश्लेषण या तथ्य प्रस्तुत किया जा सके जिससे श्रोता समृद्ध हो सकें, साहित्य की चौहद्दी बढ़े। किसी कृति पर बोलने के पहले यह भी आवश्यक है कि उसकी लेखन प्रकृत्ति की परंपरा को रेखांकित करते हुए इस बात का आकलन किया जाए कि अमुक कृति ने उस परंपरा को आगे बढ़ाया या उसमें कुछ जोड़ा या नहीं। पाठकों के सामने कृति के उस पक्ष को रखा जाना चाहिए जिसको लेखक स्पष्ट नहीं कर पाया हो। यही काम तो आललोचना का भी था और यही काम गोष्ठियों में अपने विचार प्रस्तुत करनेवालों का भी है। प्रभात रंजन की टिप्पणी में दरबारियों और चमचों की भी बात की गई है। कम से कम ये साहित्य का भला तो नहीं कर सकते। 


Saturday, October 3, 2026

सामान्यीकरण का स्वर्णकाल


दो दिन पूर्व फेसबुक स्क्रोल करते समय पटना के चिकित्सक डा विनय कुमार की एक पोस्ट पर नजर गई। विनय जी आमतौर पर विवादों से दूर रहते हैं। दाहिने-बायें सभी ओर उनके मित्र और प्रशंसक हैं। अच्छे डाक्टर के साथ अच्छे कवि भी हैं। इस कारण साहित्य जगत में उनकी प्रतिष्ठा है। अपने पोस्ट में वो हिंदी के बुजुर्ग साहित्यकार असगर वजाहत की किसी रील का उल्लेख करते हुए लिखते हैं-एक रील में असगर वजाहत साहब यह कहते हुए सुने जा सकते हैं कि डाक्टर इंजीनियर को मैं पढ़ा लिखा नहीं मानता। वे अपवाद का जिक्र भी करते हैं। उनकी इस टिप्पणी को पढ़ने के बाद इच्छा हुई कि असगर साहब क्या कह रहे हैं उसको सुना जाए। असगर वजाहत कह रहे हैं, मैं तो डाक्टर और इंजीनियर्स को आमतौर पर, अपवाद हो सकते हैं, पढ़ा लिखा नहीं मानता, शिक्षित नहीं मानता। स्वयं पूछते हैं कि क्यों नहीं मानता फिर उसका उत्तर देते हैं, हाई स्कूल और इंटरमीडियट करके ये पांच साल की इंजीनयरिंग कर लेते हैं और इंटरमीडियट तक क्या पढ़ाई होती है ये आप भी जानते हैं। न तो ठीक से भाषा की पढ़ाई होती है, न तो इतिहास पढ़ते हैं, न भूगोल पढ़ते हैं, न अर्थशास्त्र पढ़ते हैं, न साहित्य पढ़ते हैं। ह्यूमिनिटीज की पढ़ाई बिल्कुल नहीं होती है इनकी। इसलिए इनका आर्ट और कल्चर के प्रति रुझान जो है, आमतौर से नहीं होता। अपवाद हो सकते हैं। जबतक आप ग्रेजुएशेन नहीं करोगे तबतक ह्यूमिनिटीज को इतिहास को भूगोल को अर्थशास्त्र को नहीं पढ़ोगे तबतक समाज के प्रति कोई दृष्टिकोण नहीं बन पाएगा। वो पैसा कमा रहे हैं अच्छा काम कर रहे हैं लेकिन उनका बौद्धिक विकास नहीं हो पाता है।

असगर वजाहत के इस कथन पर डा विनय कुमार ने उचित ही प्रश्न उठाते हुए पूछा है कि क्या यह ओवर जेनरालाइजेशन नहीं है। दरअसल ये बिल्कुल ही सामान्यीकरण है। असगर जी जैसे चिंतनशील व्यक्ति कैसे इस तरह की टिप्पणी कर गए पता नहीं लेकिन विनय जी ने भी लिखा है और हमारा भी अनुभव है कि ह्यूमिनिटीज के विषयों से कई स्नातक और स्नातकोत्तर व्यक्ति भी अपना बौद्धिक विकास नहीं कर पाते हैं। इसके आधार पर यह कह देना कि जो लोग मानविकी के विषय नहीं पढ़ते हैं उनका समाज के प्रति कोई दृष्टिकोण नहीं बन पाता या उनका बौद्दिक विकास नहीं होता, अनुचित है। दरअसल पहले बौद्धिक जगत में चलनेवाले विमर्श को देख सुनकर लगता था कि राजनीति के साथ-साथ साहित्य में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का स्वर्णकाल चल रहा है। कुछ लोग अवश्य फैशन में फासीवाद-फासीवाद खेलते रहते हैं। पिछले कई दशकों में देश में फासीवाद की आहट सुनने वाले कम्युनिस्ट विचार के लेखकों को वर्तमान दौर में या यों कहें कि जून 2014 के बाद से फासीवाद के आने और पांव पसारने की आशंका तेज हो गई थी। 2014 के बाद करीब एक युग बीत गया लेकिन फासीवाद की ना तो आवाज तेज हुई और ना ही चाल। आशंका निर्मूल। दरअसल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर जो टिप्पणी की जाती है वो सामान्यीकरण के दोष का शिकार होती है। एक बुजुर्ग लेखिका-पत्रकार की फ्लाईदुबई विमान कांड पर की गई टिप्पणी सामान्यीकरण के दोष की शिकार है, हलांकि उसमें कुंठा का मिश्रण भी था। वो लिखती हैं, सुखांत में कई संयोग जुट गए हैं। मसलन हाईजैक हो रहे प्लेन का यमनी को-पायलट सुरक्षा को चरका देकर चाकू लाना, दो-दो प्रशिक्षित पायलटों की बतौर यात्री मौजूदगी, घायल पायलट का काकपिट का दरवाजा खोलते ही उनका आरोपी पर काबू और भारत के कथित फादरलैंड के मुखिया द्वारा भरपूर तारीफ। हलांकि पूर्व में भी इनकी टिप्पणियां कुंठा से सराबोर रहती हैं लेकिन एक आतंकी घटना का जिस तरह से सामान्यीकरण किया वो तो विक्षिप्त मन की विलक्षण प्रतिभा ही कर सकती है।

सामान्यीकरण को समझने के लिए ये दो उदाहरण ही काफी हैं लेकिन एक और उदाहरण देख लेते हैं। हाल में दिल्ली विश्वविद्यालय में कुछ छात्राओं ने सुरक्षा को लेकर मार्च निकाला था। उस जुलूस में जिस तरह के नारे लगे थे वो भी सामान्यीकरण का उदाहरण है। एक नारा था, एक कचौड़ी दो समोसा, मर्द जात का क्या भरोसा। एक और तख्ती पर लिखा था- चाय गरम दूध गरम, मर्द समाज बेशरम। इसी तरह की तुकबंदी वाले कई नारे थे जो हास्य तो उत्पन्न कर रहे थे लेकिन उनका प्रभाव समाज पर पड़ा हो ऐसा प्रतीत नहीं होता है। प्रभाव इस कारण से नहीं क्योंकि ये नारे बहुत ही जनरलाइज्ड थे। पूरे मर्द समाज को एक कोष्ठक में रख दिया गया। किसी भी समस्या या अपराध पर पूरे जेंडर को कठघरे में खड़ा करना अति सामान्यीकरण है जिसका प्रभाव शून्य हो जाता है। इंटरनेट मीडिया पर इस तरह के पोस्ट या नारे वायरल हो सकते हैं, हिट्स और लाइक्स मिल सकते हैं, हास्य वाली इमोजी से स्वागत भी हो सकता है लेकिन सब अर्थहीन। ये वैसा ही है जैसा असगर वजाहत ने सभी डाक्टर्स और इंजीनियर्स को एक ही कोष्ठक में रखकर उनकी बौद्धिक क्षमता को प्रश्नांकित कर दिया। इस कारण से एक आशंका है कि असगर वजाहत साहब की उक्त टिप्पणी पर लोग आनंद लेंगे, हो सकता है कि इंटरनेट मीडिया पर प्रचलित भी हो जाए, लेकिन उसका कोई प्रभाव समाज पर पड़ेगा इसमे संदेह है। कम ही लोग गंभीरता से लेंगे।

उपरोक्त उदाहरण से इतना तो स्पष्ट ही है कि लोगों में, समाज के लगभग सभी वर्गों में किसी घटना या किसी अपराध के सामान्यीकरण की प्रवृत्ति बढ़ी है। यह प्रवृत्ति समाज के हर क्षेत्र में बढ़ी है। बगैर सोचे समझे इस तरह की टिप्पणी कर दी जाती है जिसकी चर्चा तो हो जाती है लेकिन अर्थहीन। सामान्यीकरण के स्वर्णकाल की ही परिणति है एक दूसरे पर जातिगत टिप्पणी करना। इसमें किसी की मंशा किसी को अपमानित करने की नहीं भी हो सकती है। अब अगर किसी अगड़ी जाति के व्यक्ति पर उनकी जाति को लेकर टिप्पणी की जाती है तो वो तो सामान्यीकरण का दोष है। उद्देश्य अपमान नहीं बल्कि कुछ और हो सकता है।हमारा समाज इस तरह की टिप्पणियां क्यों करने लगा है इसपर विचार करना होगा। एक कारण तो तुरंता प्रसिद्धि की चाहत। इस तरह के कई लोग आपको इंटरनेट मीडिया पर मिल जाएंगें जो ऊलजलूल टिप्णियां करने के लिए ही जाने जाते हैं। उनके लाखों फालोवर्स भी हैं। पर ऐसे लोगों की समाज में क्या उपयोगिता है इसपर भी विचार किया जाना चाहिए। क्या ऐसे लोगों को समाज गंभीरता से लेता है या इनकी राय पर व्यापक वर्ग में कोई चर्चा होती है। उत्तर तो ना में ही देखने को मिलता है। तुरंता प्रसिद्धि भले ही मिल जाती है लेकिन उसमें स्थायित्व नहीं होता। सामान्यीकरण का सबसे बड़ा नुकसान ये होता है कि टिप्पणी करनेवाले या करनेवाली की प्रतिष्ठा धूमिल होती है और लोग उनकी बातों को गंभीरता से लेना छोड़ने लगते हैं। अब समय आ गया है कि सभी ये सोचें कि समान्यीकरण के इस दोष से कैसे मुक्ति मिल सकती है। इसके विकराल रूप धर लेने से पहले इसको रोकना आवश्यक है।

Saturday, September 19, 2026

सेंसर बोर्ड के समझ नई चुनौतियां


नौ वर्षों के लंबे अंतराल और प्रतीक्षा के बाद केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (चलन  में सेंसर बोर्ड) का पुनर्गठन किया गया। 2017 में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड में नए सदस्यों का मनोनयन हुआ था। नियमानुसार हर तीन साल में नया बोर्ड बनाया जाना चाहिए। इस वर्ष मई में जब केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी को प्रसार भारती का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था तब चर्चा हुई थी कि सेंसर बोर्ड का नए सिरे से गठन होगा। प्रसून जोशी के बाद शशिशेखर वेंपति को सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया लेकिन बोर्ड के नए सदस्यों की घोषणा नहीं हुई। अध्यक्ष की नियुक्ति के लगभग चार महीनों बाद 16 सितंबर को सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने अगले तीन वर्षों के लिए सेंसर बोर्ड के 18 नए सदस्यों के नाम की घोषणा कर दी। सेंसर बोर्ड में सिनेमा से जुड़े लोगों को प्राथमिकता दी गई है। फिल्मकार, अभिनेता, लेखक और रंगमंच से जुड़े लोगों को सदस्य बनाकर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने बोर्ड के गठन को तर्कसंगत बनाया। पर प्रश्न ये उठता है कि जिस बोर्ड का गठन तीन वर्षों बाद यानि 2020 में हो जाना चाहिए था उसके गठन में इतनी देरी क्यों हुई। पिछले नौ वर्षों में सेंसर बोर्ड कई बार विवादों में घिरी थी। तब के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने अपने सूझबूझ से उन विवादों का हल निकाल लिया था। नए बोर्ड के सामने अब नई तरह की चुनौतियां हैं। अब फिल्मकारों में सेंसर बोर्ड को फिल्म के प्रचार के टूल के तौर पर उपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। बोर्ड के गठन से ऐसा प्रतीत होता है कि मंत्रालय को इन चुनौतियों का अनुमान है इस कारण से विभिन्न क्षेत्रों में फिल्मों से जुड़े लोगों को सदस्य बनाया गया है। 

फिल्म सेंसर बोर्ड के गठन के बाद मनोरंजन की बदलती दुनिया को दृष्टिगत रखते हुए 1952 के सिनेमैटोग्राफी एक्ट में समयानुकूल बदलाव करने की चुनौती थी। मनोरंजन की दुनिया के बदलते स्वरूप और तकनीक के कारण बदलते समय के हिसाब से एक्ट में बदलाव पर लंबे समय से विमर्श हो रहा था। कोई निणय नहीं लिया जा सका था। सूचना और प्रसारण मंत्रालय में बैठे यथास्थिवाद के देवता बदलावों को नोटिफाई नहीं कर पा रहे थे। जिस दिन सेंसर बोर्ड के सदस्यों के नाम घोषित किए गए उसी दिन सरकार ने फिल्म प्रमाणन को लेकर एक नई गाइडलाइन भी जारी कर दी। 35 वर्षों बाद जारी इस गाइडलाइन में ड्रग्स और बच्चों को लेकर स्पष्टता दी गई है। दर्शकों के वर्गीकरण को और भी स्पष्ट किया गया है। 2016 में जब स्वर्गीय अरुण जेटली सूचना और प्रसारण मंत्री थी तो श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में उन्होंने एक समिति बनाई थी। उस समिति की सिफारिशों को आंशिक रूप से समय समय पर लागू किया जाता रहा। अब जब मनोरंजन की दुनिया के साथ-साथ समाज भी बदल रहा है तो इसमें और भी सुधार की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। 35 वर्षों बाद सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने ये कदम उठाया है। इस गाइडलाइन के आरंभ में ही कहा गया है कि कलात्मक और सृजनात्मक अभिव्यक्ति को बाधित नहीं किया जाएगा। प्रमाणन को सामाजिक बदलाव के अनुसार तय किया जाए। नए गाइडलाइन में अश्लीलता पर भी एक पंक्ति है। हम सब जानते हैं कि अश्लीलता को परिभाषित करना बहुत मुश्किल है। जहां जुगुप्साजनक अश्लीलता होगी उसकी पहचान तो आसानी से की जा सकती है। बहुत लंबा चुंबन दृष्य हो या इंटीमेट सीन, दोनों को देखकर सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि ये कहानी की मांग है या फिर फिल्मकार की मुनाफा कमाने की मंशा। 

गाडलाइन की एक और बिंदु ने ध्यान खींचा, जिसमें ये लिखा गया है कि सेंसर बोर्ड फिल्म के समाज पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करते हुए प्रमाणन का निर्णय ले। कई बार फिल्मकार बहुत चालाकी से पात्रों के नाम आदि के आधार पर ये संदेश देने की कोशिश करते हैं कि अमुक समुदाय पीड़ित है और अमुक समुदाय उसको दबा रहा है या उसपर अत्याचार कर रहा है। फिल्म मुक्काबाज के एक संवाद का उदाहरण कई बार दिया जा चुका है। संवाद है – वो आएंगे और पीट-पीटकर तुम्हारी हत्या कर देंगे और भारत माता की जय का नारा लगाकर चले जाएंगे। संवाद से स्पष्ट था कि फिल्मकार किसको टार्गेट कर रहे थे। इस संवाद का फिल्म की कहानी और संबंधित दृश्य से बहुत अधिक लेना देना नहीं था। लेना-देना था तो फिल्मकार के सोच और उसकी राजनीतिक मानस और प्रतिबद्धता से। फिल्मों के माध्यम से राजनीति करने की, अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाने की और विरोधी विचारधारा को गिराने का खेल इन दिनों काफी बढ़ गया है। बहुत सारे ऐसे फिल्मकार हैं जो मोदी सरकार के विरोधी हैं और वो अपनी कहानी और संवाद के माध्यम से सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने के लिए फिल्म की कलात्मक और सृजनात्मक स्वतंत्रता का सहारा लेते हैं। पहले भी ऐसा होता था पर कम।  

पिछले दिनों ऐसी खबरें आई थीं कि पंजाबी फिल्म दस्तार को लेकर सेंसर बोर्ड ने कड़ा रुख अपनाया था। उसमें कई कट्स लगाने की सलाह दी गई थी। इस फिल्म के दृष्य और संवाद ऐसे थे जो कि व्यापक समाज हित में नहीं थे। आतंकवादियों को लेकर गांवों में जिस तरह के दृष्य दिखाकर उनको महिमामंडित करने की कोशिश की गई थी वो व्यापक समाज और देशहित में नहीं था। आतंकवादियों के पड़ोसी देश में जाने को लेकर परिवार में जो संवाद होता था वो भी अनुचित था। इसके पहले फिल्म सतलुज को पिछले चार वर्षों से सेंसर सर्टिफिकेट नहीं मिला था तो उसके पीछे कारण है। वो फिल्म सिस्टम पर सवाल उठाने के आवरण में देश पर प्रश्न खड़े करती है। सेंसर बोर्ड  के सामने इस तरह के कंटेंट को देखना और उसका प्रमाणन बड़ी चुनौती है। सेंसर बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालयों को भी सुधारना होगा। वहां से पूर्व में भ्रष्टाचार की खबरें ती रही हैं। जो फिल्में क्षेत्रीय स्तर पर प्रमाणित की जाती हैं उसमें पारदर्शिता और जिम्मेदारी तय करने की आवश्यकता है। अकारण किसी फिल्म को रोका न जाए और कारण हो तो किसी फिल्म को प्रमाण पत्र दिया भी न जाए। चतुर फिल्म निर्माताओं ने ऐसी जुगत निकाली है कि फिल्म मुंबई में बनाओ लेकिन सर्टिफिकेशन के लिए कोलकाता या दिल्ली में आवेदन करो। क्यों। 

सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव के पास कई अहम जिम्मेदारियां हैं। पर एक काम अच्छा किया गया कि सेंसर बोर्ड के चेयरमैन शशिशेखर वेंपति को बनाया गया। शशिशेखर वेंपति तकनीक में माहिर हैं। उनके इस हुनर का लाभ सेंसर बोर्ड के क्रियाकलापों को और पारदर्शी बनाने में किया जाना चाहिए। हलांकि सेंसर बोर्ड का एक्स हैंडल जो 2022 के बाद से निष्क्रिय था उसको सक्रिय किया गया है। दरअसल फिल्म एक ऐसी विधा है जिसका समाज पर व्यापक प्रभाव है। इस कारण लोगों की इसमें अधिक रुचि होती है। कोई फिल्म विवादित होती है तो चर्चा बटोरती है। कोई सूत्र मिल जाए तो प्रधानमंत्री तक को लपेटे में लेने का प्रयास किया जाता है। नए बोर्ड के समझ चुनौतियां भी हैं और अवसर भी। 


Saturday, September 12, 2026

विचारधारा की जकड़न में फिल्मकार


हिंदी फिल्मों के एक निर्देशक हैं तिग्मांशु धूलिया। उन्होंने कई फिल्में निर्देशित की हैं। कुछ में अभिनय भी किया है। लोग उनको फिल्म पान सिंह तोमर के निर्देशक के तौर पर जानते हैं। इस फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था। पिछले दिनों एक कार्यक्रम में उनका भाषण हुआ। तिग्मांशु ने करीब आधे घंटे के अपने उद्बोधन में दुनिया जहान की बातें की। पूंजीवाद के खतरे से लेकर इप्टा (भारतीय जन नाट्य संघ) से जुड़े किस्से सुनाए। चूंकि वो फिल्मों से जुड़े हैं तो फिल्मी बातें अधिक हुईं। राजनीति पर भी गए। अपने अनुभव भी साझा किए। अपना मत भी रखा। उनका मानना था कि इन दिनों हिंदी फिल्मों से कहानी गायब हो गई है। फिल्म धुरंधर का उदाहरण देते हुए उपहास के अंदाज में उसकी कहानी पर प्रश्न खड़ा किया। बोले कि बस एक व्यक्ति है जो पाकिस्तान जाता है। वहां तबाही मचाता है। ऐसी टिप्पणी करनेवाले तिग्मांशु को ये बताना चाहिए था कि कहानी क्या होती है। क्या कहानी सिर्फ उन फिल्मों में ही होती है जो लेफ्ट इकोसिस्टम के निर्देशक बनाते हैं। फिल्म धुरंधर में अगर कहानी नहीं दिखाई देती है तो उनको कहानी की परिभाषा का फिर से अध्ययन करना चाहिए। हिंदी के कई आलोचकों ने कहानी की परिभाषा दी है। अगर तिग्मांशु उन परिभाषाओं को एक बार देख लेते तो बेहतर तरीके से अपनी बात रख पाते। 

तिग्मांशु ने ये भी कहा कि हिंदी फिल्मों में हिंसा बहुत हो गई है। समाज क्रोध में है। यह बात आंशिक रूप से सही हो सकती है लेकिन सामान्यीकरण भी है। फिल्मों में हिंसा दिखाई जा रही है पर कई ऐसी फिल्में बन रही हैं जिनमें हिंसा नहीं होती। हिंसा तो कहानी पर निर्भर करती है। पिछले दिनों कई बेहतर प्रेम कहानी आई हैं जिसको दर्शकों ने पसंद किया। फिल्म सैयारा इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। चूंकि उन्होंने कहा कि वो फिल्में नहीं देखते। संभव है कि इस कारण उनको हिंदी फिल्मों की दुनिया में क्या घट रहा है इसका अनुमान कम हो। तिग्मांशु धूलिया की बातों के आलोक में उनकी फिल्म घमासान को परख लेते हैं। बीते शुक्रवार को उनकी फिल्म घमासान रिलीज हुई। ये फिल्म 2006 के उत्तर प्रदेश की कहानी कहती है। उत्तर प्रदेश का एक दस्यु सम्राट जिसका बुंदेलखंड इलाके में खौफ है। राजनीति से उसका संबंध और चुनाव के बाद फिल्म के अंत में उसके एनकाउंटर पर कहानी समाप्त होती है। ये एक ऐसी कहानी है जो दर्जनों बार हिंदी फिल्मों में कही जा चुकी है। तिग्मांशु ने जिस तरह से इस फिल्म को बुना है वो भी पुरानी प्रविधि है। एक ही कहानी को बार बार दोहराने से कथा का मूल तत्त्व, उत्सुकता, समाप्त हो जाता है। उनकी शिकायत है कि हिंदी फिल्में हिंसा के एक विशेष टेंपलेट में फंस गई है। घमासान देखने के बाद तो यही लगता है कि तिग्मांशु स्वयं डकैतों की समस्या और उसके खात्मे के हिंदी फिल्मों के पुराने टेंपलेंट में फंसे हैं। अपनी ही फिल्म पान सिंह तोमर से एक इंच भी आगे नहीं जा पाए हैं। राजनीति का तड़का लगाने का प्रयास अवश्य किया है लेकिन वो फार्मूला भी बहुत ही पुराना हो चुका है। रही बात हिंसा की तो इस फिल्म में तिग्मांशु ने भी दस कटे हुए सर का सार्वजनिक प्रदर्शन किया है। क्लोज शाट भी दिखाया है। यहां वो हिंसा को कहानी की मांग बताकर उचित करार दे सकते हैं। यही बात अन्य फिल्मों पर भी लागू होगी। अपनी फिल्म में हिंसा दिखाना कहानी की मांग और कोई दूसरा दिखाए तो वो एक टेंपलेट। गजब विचार है। 

उन्होंने अपने व्याख्यान में दो उदाहरण दिए और बताया कि जवाहरलाल नेहरू कितने उदार थे। जब एक फिल्म सेंसर बोर्ड में अटक गई तो दिलीप कुमार ने नेहरू से गुहार लगाई। नेहरू ने फिल्म देखकर सेंसर बोर्ड को फिल्म रिलीज करने को कहा। तिग्मांशु को ये कदम उदारता लग सकती है। पर यह एक खतरनाक प्रवृत्ति थी कि एक वैधानिक संस्था के निर्णय को प्रधानमंत्री ने पलट दिया। आज अगर ऐसी कोई छोटी सी घटना हो जाए तो यही लोग आसमान सर पर उठा लेंगे। संविधान की दुहाई देने लगेंगे। उनकी एक और बात को रेखांकित करने की आवश्कता है कि 2017 तक सब ठीक था लेकिन पता नहीं क्यों उसके बाद फिल्मी दुनिया अचानक क्यों बदल गई। वो ये भी कह गए कि 2017 तक ‘इनको’ (वर्तमान सरकार को) फिल्मों की समझ नहीं थी। कैसा अजीब तर्क है। तिग्मांशु जैसे वामपंथी पता नहीं क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि देश का मूड बदल चुका है। दर्शकों की पसंद बदल गई है। दस्यु और उनके आतंक की कहानी अब दर्शक नहीं सुनना/देखना चाहते हैं। कई बार देख लेने के बाद उनको ये दोहराव लगता है। न कहानी अलग, न ही ट्रीटमेंट अलग न ही कोई चौंकानेवाली बात।

दरअसल तिग्मांशु और उन जैसे वामपंथी निर्देशकों की कठिनाई अलग है। अब उनकी फिल्में चल नहीं रही हैं तो वो दर्शकों के सर पर इसका ठीकरा फोड़ना चाहते हैं। इसी इकोसिस्टम के एक और निर्देशक हैं सुधीर मिश्रा। एकाध अच्छी फिल्में बनाईं हैं। जब उनकी फिल्म अफवाह रिलीज हुई तो वो दर्शकों को बांटने लगे थे। अफवाह और द केरल स्टोरी एक साथ रिलीज हुई थी। द केरल स्टोरी सुपर हिट रही और अफवाह बुरी तरह पिट गई। तब सुधीर ने एक्स पर लिखा था- ‘द कश्मीर फाइल्स के बारे में लिबरल्स को शिकायत रहती है। क्यों? विवेक अग्निहोत्री ने एक फिल्म बनाई और उसके दर्शक इस फिल्म को देखने के लिए थिएटर में आए। लेकिन जब हम फिल्म बनाते हैं तो हमारे दर्शक, जो विवेक की आलोचना करते हैं, चुपचाप बैठे रहते हैं। वो फिल्म देखने के लिए सिनेमा हाल नहीं पहुंचते हैं।‘ ये टिप्पणी कुंठा की पराकाष्ठा है। तिग्मांशु उसी राह पर हैं। 

तिग्मांशु जब फिल्मकारों की लाचारगी की बात करते हुए कहते हैं कि जब अच्छी कहानी कहनेवाले फिल्मकारों पर संकट आता हो तो कोई बचाने नहीं आता। भाईचारा खत्म हो गया है। तिग्मांशु धूलिया जी इस भाईचारे को खत्म करने का आरंभ तो आप जैसे कलाकारों ने ही 2014 में किया था। जब लोकसभा चुनाव का प्रचार अपने अंतिम चरण में था तो इम्तियाज अली, विशाल भारद्वाज, नंदिता दास, कबीर खान, महेश भट्ट जैसे लोगों ने परोक्ष रूप से कांग्रेस के पक्ष में और नरेन्द्र मोदी के विरोध में खुला पत्र लिखा था। आप जब नेहरू फैन होने की बात करते हैं तो 2014 की आपका बयान याद आता है कि मोदी को प्रधानमंत्री के पद पर देखना दुखद होगा। आपकी प्रतिबद्धता स्पष्ट है । आपलोगों को अगर राजनीति करनी है तो खुलकर राजनीति के मैदान में उतरिए। कला और फिल्मों को औजार मत बनाइए। दर्शक समझ चुके हैं आपलोग कब समझेंगे । जितनी जल्दी समझ जाएं वो फिल्मी दुनिया के लिए बेहतर होगा। और हां ! लोकतंत्र 1793 में फ्रांस में आरंभ नहीं हुआ था। उसके बहुत पहले से भारत में वैशाली में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली चल रही थी। अपने देश को, अपने अतीत को समझिए, उसपर गर्व करिए दर्शकों को समझ जाएंगे। 


Saturday, September 5, 2026

प्रयोगधर्मिता से ‘एक्शन’ में नायिकाएं,


हाल के दिनों में दो नायिका प्रधान फिल्में आई। दोनों एक्शन फिल्म है। दोनों फिल्मों में बच्चियों की जिंदगी केंद्र में है। जुलाई में शिव रवैल के निर्देशन में आई फिल्म अल्फा में आलिया और शरवरी मुख्य भूमिका में हैं। जबकि इसी महीने देवाशीष मखीजा के निर्देशन में बनी फिल्म गांधारी आई। इसमें तापसी पन्नू मुख्य भूमिका में है। गांधारी के पहले तापसी और कंगना के बीच विवाद भी उठा था। कई बार देखा गया है कि जब कोई फिल्म रिलीज होनेवाली होती है तो उससे जुड़े नायक-नायिका या कहानी को लेकर विवाद होता है। कुछ लोगों का मानना है कि फिल्म की रिलीज के समय इस तरह के विवाद उठाने के पीछे मंशा फिल्म को चर्चित करने की होती है। कंगना और तापसी के बीच के विवाद को तापसी ने खत्म करने का प्रयास किया, लेकिन विवाद की चर्चा तो हो ही गई। फिल्म को इससे कितना लाभ मिला ये कहना तो कठिन है लेकिन विवाद की टाइमिंग को तो रेखांकित किया ही जाना चाहिए। इस लेख का विषय दो नायिकाओं के बीच विवाद की चर्चा नहीं हे। चर्चा तो नायिका प्रधान एक्शन फिल्मों की करना चाह रहे हैं। 

हिंदी फिल्मों में इस बात की बहुत चर्चा होती रही है कि नायिकों को सिर्फ उनके ग्लैमर औरर आकर्षण के कारण फिल्मों में शो पीस की तरह रखा जाता है। ये बात तो कई दशकों से कही सुनी जा रही है कि हिंदी फिल्मों में नायिकाओं को पेड़ के चारों तरफ घूमते हुए डांस करना और रोमांटिक सीन देने के लिए फिल्मों रखा जाता है। पिछले सालों में तो चर्चा ये होने लगी थी नायक और नायिकाओं को फिल्म में काम करने के लिए एक समान पैसे मिलते हैं या नहीं। अगर नायिकाओं को कम दिए जाते हैं तो क्यों। एक दौर ऐसा भी आया था कि फिल्मों में माधुरी दीक्षित को कई नायकों से अधिक पैसे मिलते थे। टीवी की दुनिया में स्मृति इरानी को साथी पुरुष कलाकारों से अधिक पैसे मिला करते थे। लेकिन ये एक दो उदाहरण हैं। हिंदी फिल्मों में नायकों को अधिक और नायिकाओं को कम पैसे मिलते रहे हैं। अभी भी मिल रहे हैं। इसके पीछे का कारण तो सिर्फ व्यवसाय ही नजर आता है। इसमें नायक नायिका में भेद-भाव की मानसिकता जैसी कोई बात ना तो समझ आती है और ना ही नजर। फिल्म उद्योग पूरी तरह से कारोबारी दुनिया है जहां सबकुछ लाभ-हानि को ध्यान में रखकर होता है। अगर कोई फिल्म नायक के नाम और छवि पर सफल होती है तो उसका बाजार भाव बढ़ जाता है। अगर कोई फिल्म नायिका अपने कंधे पर उठाकर सफलता की सीढ़ी चढ़ती है तो उसका बाजार भाव निश्चित रूप से बढता है। 

फिल्म अल्फा यशराज फिल्म्स की स्पाई यूनिवर्श की कहानी है। इसमें अनिल कपूर, बाबी देओल, ऋतिक रोशन भी हैं लेकिन कहानी आलिया भट्ट और शरबरी के इर्द गिर्द ही घूमती है। कहानी अच्छी है। स्पाई यूनिवर्स की कहानियों में सरप्राइज एलिमेंट बहुत होते हैं। इस फिल्म में भी है। बाबी देओल का जो फिल्मी चरित्र है वो खुद को देशभक्त कहता है लेकिन अंत में उसका भेद खुलता है और वो पाकिस्तानी एजेंट होता है। वो सेना और आर एंड डब्ल्यू को चकमा देने में सफल रहता है। कहानी बहुत सधे तरीके से आगे बढ़ती है। फिल्म में मार-धाड़ बहुत है लेकिन निर्देशक ने फिल्म को जुगुप्साजनक हिंसा से बचा लिया है। हिंसक दृष्यों को देखकर मन खराब नही होता है। आलिया अपने एक्शन दृष्यों में स्वाभाविक लगती है लेकिन शबरबी की एंट्री के साथ ही वो आलिया पर भारी पड़ती दिखती है। आलिया की तुलना में शरबरी का रोल कम है लेकिन जितनी भी देर वो पर्द पर रहती है आलिया को टक्कर देती नजर आती है। अपने अपियरेंस से, अपने एटीट्यूड से और अपने अभिनय से। इस फिल्म में निर्देशक शिव रवैल की भी प्रशंसा की जानी चाहिए कि उन्होंने कथानक को बहुत मजबूती से बुना। दर्शक कहीं उबता नहीं है। कहानी में सरप्राइज एलिमेंट्स भी हैं जो कथानक के बढने के साथ साथ खुलता है। दर्शकों के मन में फिल्म देखते हुए ये चलता रहता है कि आगे क्या। यही आगे क्या किसी फिल्म की सफलता का पैमाना होना चाहिए, खासकर अगर स्पाई यूनिवर्स की फिल्म है तो। शिव रवैल ने इसके पहले भोपाल गैस त्रासदी पर आधारित वेबसीरीज द रेलवे मैन निर्देशित की थी। उस सीरीज को दर्शकों का प्यार मिला था और शिव के काम की सराहना हुई थी। शिव रवैल एक समृद्ध विरासत को भी आगे बढ़ा रहे हैं, उनके पिता राहुल रवैल और दादा एचएस रवैल ने कई सुपर हिट फिल्में बनाई थीं। फिल्म अल्फा में शिव रवैल ने पहली बार निर्देशक की भूमिका का निर्वाह किया है। 

फिल्म गांधारी में तापसी पन्नू अपनी छवि के अनुरूप किरदार निभा रही हैं। एक मध्यमवर्गीय परिवार की महिला जिसकी बेटी का अपहरण हो जाता है। बेटी की तलाश में पूरी फिल्म है। तापसी ने एक्शन करने का भी प्रयास किया है लेकिन जब वो फाइट सीन देती है तो स्वाभाविक नहीं लगती हैं। अपनी बेटी की तलाश करते करते उसको छह साल से कम उम्र की बच्चियों को अवैध तरीके से विदेश भेजने के गैंग का पता चलता है। कहानी बहुत उलझी हुई है और कथानक में गैप है जिसको भरने में निर्देशक विफल रहे हैं। दर्शकों को चौंकाने के चक्कर में कथानक की निरंतरता बाधित होती है। फिल्म में धर्म का ज्ञान भी दिया गया है लेकिन ये आउट आफ प्लेस लगता है। जैसे तापसी की ही एक अन्य फिल्म अस्सी में जबरदस्ती हिंदी के कवियों का नाम पात्रों से कहलवाया गया था। ना तो उसकी कोई प्रासंगिकता थी और ना ही आवश्यकता। निर्देशक और फिल्म लेखक को लगा होगा कि उन नामों के उल्लेख से उनको हिंदी साहित्य का ज्ञाता मान लिया जाएगा। फिल्म गांधारी के कई दृश्यों में तापसी स्वाभाविक भी लगी है। जब वो दृष्टिहीन महिला के रोल में थाने के बाहर बैठकर बेबस दिखती हैं। ये बहुत ही पावरफुल सीन है। ऐसा फिल्म में बहुत कम जगह दिखा है। कई जगह तो अस्वाभिवक से लगने वाले दृष्य भी निर्देशक ने ठूंसे हैं। बहुरूपियों की दुनिया को दिखाने का प्रयत्न भी किया गया है लेकिन उस दुनिया को लेकर और रिसर्च करने की जरूरत थी। 

फिल्म अल्फा और गांधारी को देखने के बाद लगता है कि हिंदी की फिल्मी दुनिया अब नायिका प्रधान फिल्मों में ज्यादा निवेश करने लगी है। कंगना की फिल्म भारत भाग्य विधाता भी नायिका प्रधान थी। नायिका प्रधान फिल्म बनाना अच्छी बात है लेकिन कहानी और उसके ट्रीटमेंट को लेकर बहुत सजग और सावधान रहने की आवश्कता होती है। जहां भी अनावश्यक रूप से नायिका को सुपर हीरो बनाने या दिखाने का प्रयास होता है, दर्शक फौरन भांप लेता है। परिणाम फिल्म असफलता के रास्ते पर चल पड़ती है। बावजूद इसके अगर नायिकाओं को लीड रोल और विशेषकर एक्शन रोल में लेकर फिल्में बनने लगी हैं तो यह एक सुखद ट्रेंड है। हिंदी दर्शकों को के लिए भी और फिल्मकारों के लिए भी।    


Saturday, August 29, 2026

पुस्तक को चर्चित करने का खेल


कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी की संस्मरणात्मक पुस्तक के भारत में प्रकाशन को लेकर विवाद जैसा हो गया है। बताया जा रहा है कि सोनिया गांधी की पुस्तक बिलांगिंग,ए जर्नी आफ लव के भारत में प्रकाशन पर लेखक और प्रकाशक में मतभेद है। इस पर चर्चा करने के पहले जरा इस पुस्तक की घोषणा की पृष्ठभूमि देखते हैं। पहले इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म्स पर इस पुस्तक का कवर आया। लोगों ने पोस्ट करना आरंभ किया, सोनिया जी की पुस्तक आ रही है। उत्सुकता का वातावरण बनाया गया। एक्स और फेसबुक पर कवर के बाद कहा जाने लगा कि सोनिया गांधी ने अपनी पुस्तक में राजीव गांधी से मिलने से लेकर गांधी परिवार की बहू बनने तक की घटनाओं का उल्लेख किया है। जो लोग भी पोस्ट कर रहे थे उनमें से किसी ने पुतक पढ़ी नहीं थी। पुस्तक 10 नवंबर को बाजार में आ रही है। अमेरिका का प्रकाशक इसको प्रकाशित कर रहा है। राजीव और सोनिया ने प्रेम विवाह किया था। किताब के नाम में जर्नी आफ लव को उनकी प्रेमकथा से जोड़कर लोगों ने पोस्ट लिखे। पुस्तक के प्रति उत्सुकता का वातावरण गाढ़ा हुआ। अब चर्चा हो रही है कि प्रकाशक पेंग्विन इंडिया ने भारत में उनकी पुस्तक को छापने से मना कर दिया है। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स पर चर्चा ने जोर पकड़ा। बताया जाने लगा कि प्रकाशक ने लेखिका से कुछ प्रसंगों और अंशों को बदलने का आग्रह किया गया। लेखिका ने प्रकाशक की बात मानने से इंकार कर दिया। इसको विवाद का रूप दिया गया। इस प्रसंग को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जाने लगा। 

प्रकाशक पेंग्विन ने अपनी तरफ से सफाई दी। घोषणा की कि सोनिया गांधी की पुस्तक पेंग्विन से प्रकासित नहीं हो रही है। आगे लिखा कि प्रकाशक होने के नाते उनका विशेषाधिकार और जिम्मेदारी है कि वो किसी भी पुस्तक के किसी भी प्रसंग का फैक्ट चेक करें। लेखक को अपनी राय से अवगत करवाएं, जो कि पुस्तक के हित में हो। ये प्रकाशन जगत की समान्य प्रक्रिया है। पेंग्विन ने आधिकारिक बयान में कहा वो अब भी इस पुस्तक को छापने के इच्छुक हैं। साथ ही बताया कि प्रकाशक और लेखक के बीच जो भी बात हुई है उसकी गोपनीता बरकरार रखना चाहते हैं। पेंग्विन ने सही कहा है। कथेतर पुस्तकों में फैक्ट चेक करने की आवश्यकता होती है। फिक्शन में तो किसी तरह प्रसंग काल्पनिक कहकर चल जाता है। जब आप किसी पुस्तक को संस्मरणात्मक कहते हैं या किसी घटना के आधार पर लिखते हैं तो उसकी प्रामाणिकता तो सिद्ध करनी ही होती है। ये तो प्रकाशन जगत की सामान्य प्रक्रिया है। जो लेखक कथेतर गद्य लिखते हैं उनको ये पता भी है। मैंने ही लोकसभा चुनाव में अमेठी में राहुल गांधी की हार और स्मृति इरानी की जीत को केंद्र में रखकर अमेठी संग्राम नाम की पुस्तक लिखी थी। उस पुस्तक के कई प्रसंगों पर प्रकाशक ने आपत्ति जताई थी। कइयों की उसकी प्रामणिकता के बारे में आशंकित थे। प्रियंका गांधी से संबंधित एक घटना मेरी पुस्तक में उल्लिखित है। प्रियंका पर टिप्पणी सुनने के बाद  स्मृति इरानी ने एक बेहद कठोर निर्णय लिया था। उस निर्णय का उनके चुनाव परिणा पर असर पड़ सकता था। इस प्रेसंग को लेकर प्रकाशक आश्वस्त नहीं थे। उन्होंने प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए बोला। जब उस घटना के साक्षियों के वर्जन आए तब प्रकाशक संतुष्ट हुए। दूसरी पुस्तक मार्क्सवाद का अर्धसत्य को लेकर भी प्रकाशक के कुछ प्रश्न थे। जिनको हमने साथ बैठकर हल किया था। यह तो लेखक और प्रकाशक के बीच चलनेवाली एक रुटीन प्रक्रिया है। लेकिन इन तमाम बातों के बीच सोनिया गांधी की पुस्तक को लेकर उत्सुकता का वातावरण बना हुआ है। 

इंटरनेटट मीडिया पर अब इस तरह की बातें आ रही हैं कि सोनिया जी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक भेंट के प्रसंग को लेकर प्रकाशक ने आपत्ति जताई। चीन-भारत संबंध के अध्याय को लेकर प्रकाशक के कुछ प्रश्न थे। इसी तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधित प्रसंगों की प्रामाणिकता को लेकर प्रकाशक आश्वस्त होना चाहते थे। संस्मरणों में इस तरह की बातें होती हैं जो बहुधा लेखक की धारणा पर आधारित होती है । उससे किसी अन्य की छवि पर असर पड़ सकता है। संभव है कि उक्त प्रसंगों में इस तरह की धारणाएं हों जिसको लेकर प्रकाशक आश्वस्त होना चाहता हो। यही आश्वस्ति तो कांग्रेस के नेता 2010 में चाह रहे थे जब स्पैनिश लेखक जेवियर मोरो की पुस्तक ‘द रेड साड़ी’ भारत में प्रकाशित होनेवाली थी। जेवियर मोरो ने 2008 में स्पैनिश भाषा में सोनिया गांधी की जीवनी लिखी थी। उसका अनुवाद इटैलियन, फ्रेंच और डच भाषा में हुआ था। भारत में जब मोरो की पुस्तक के प्रकाशन की बात आई थी को कांग्रेस के नेताओं ने इसका खूब विरोध किया था। जहां तक मुझे स्मरण है कि जेवियर मोरो को कानूनी नोटिस भी भेजी गई थी। उस पुस्तक के कुछ प्रसंगों को लेकर कांग्रेस के नेताओं को आपत्ति थी। इमरजेंसी में सोनिया गांधी की भूमिका, सोनिया और मेनका गांधी के बीच के संबंध, गांधी परिवार की घटनाओं को लेकर कांग्रेस नेताओं को आपत्ति थी। कांग्रेस नेताओं ने तब जेवियर मोरो की पुस्तक को असत्य, अर्धसत्य और अपमानजनक बताया था। उस समय जेवियर मोरे ने ये दावा किया था कि सोनिया गांधी की जीवनी लिखने के लिए इटली स्थित सोनिया गांधी के पैतृक शहर लुसियाना में काफी समय बिताया था। उसने तो यहां तक दावा किया था कि पुस्तक प्रकाशन के पहले उसकी पांडुलिपि सोनिया जी की बहन नाडिया को दिखाई गई थी। सोनिया जी को भेजने का दावा भी मोरो ने किया था। बाद में जब केंद्र में सरकार बदली तब 2015 में ये पुस्तक भारत में प्रकाशित हो सकी। मोरो ने विवादों के बीच अपनी पुस्तक को फिक्शनलाइज्ड बायोग्राफी कहा था। पुस्तक पर डिस्क्लेमर भी लगाया था कि बातचीत संवाद और स्थितियां लेखक की व्याख्या पर आधारित है। यह आवश्यक नहीं कि वो प्रामाणिक भी हो। 

अब जब सोनिया गांधी की संस्मरणात्मक पुस्तक आ रही है तो वही लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न खड़ा कर रहे हैं जो उस समय जेवियर मोरो की पुस्तक का विरोध कर रहे थे। प्रामाणिकता की मांग करनेवाले वही लोग या तो अब खामोश हैं या प्रकाशक को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। ना तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मसला है और ना ही इसमें किसी प्रकार के दबाव की बात है। यह मामला सीधे तौर पर प्रसंगों की प्रामाणिकता का है। संभव था कि सोनिया जी इसको फिक्शनलाइज्ड संस्मरण कह देती और पेंग्विन आपत्ति नहीं करता। पर ऐसा नहीं होने के संकेत हैं। दुनिया भर में ऐसे अनेक विवाद सामने आते रहे हैं जब प्रकाशक, लेखक की बातों से असहमत होते हैं और पुस्तक छापने से इंकार देते हैं। सोनिया जी की पुस्तक का विवाद को भी इसी आईने में देखे जाने की जरूरत है। हां, इन प्रसंगों से इतना अवश् हुआ कि पुस्तक को लेकर उत्सुकता का वातावरण बना हुआ है। चर्चा होगी तो बिक्री पर असर पड़ना स्वाभाविक है। 


Saturday, August 22, 2026

श्रीराम की छवि की व्याख्या का खेल


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किला की प्राचीर से दिमागी नक्सल शब्द युग्म का प्रयोग किया। तमाम दिमागी नक्सल बिलबिलाने लगे। समाज को पता लगाने के लिए श्रम नहीं करना पड़ा और उनकी पहचान हो गई। यह ठीक है कि समाज में दिमागी नक्सलियों की उपस्थिति है, पर दिमागी नक्सल व्यक्ति से अधिक प्रवृत्ति है। ये प्रवृत्ति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलती है। दिमागी नक्सली जैसी प्रवृत्ति समय के अनुसार अपने में बदलाव करके समाज को भ्रमित करने का कार्य भी करती है। प्रश्न उठता है कि क्या ये अनायास है कि प्रगतिशील और जनवादियों को अब प्रभु श्रीराम की चिंता होने लगी है। समाज में राम-राम कहकर अभिवादन करने की जगह जयश्रीराम से अभिवादन करना उनको राजनीतिक लगने लगा है। राम-राम और जयश्रीराम में उनको अंतर नजर आता है। राम-राम में कोमलता और जयश्रीराम में आक्रामकता। इतना ही नहीं समाजवाद की डोर थामे जनवाद की ध्वजा लहरानेवाले एक प्राध्यापक आलोचक तो कबीर और गांधी के राम, तुलसीदास के राम और सत्ताधारी दल के राम में अंतर दिखाने की कोशिश करते हैं। अयोध्या के भव्य और नव्य मंदिर में स्थापित श्रीराम की अलग छवि ढूंढने की कोशिश भी होती है। ढूंढते ही नहीं हैं बल्कि प्रभु श्रीराम की एक राजनीतिक छवि गाढा करने का प्रयत्न करते हैं। अच्छी बात है कि समाजवादी/जनवादी और वामपंथी प्रभु श्रीराम की बात तो करने लगे हैं। यह इनका ह्रदय परिवर्तन है या समाज को राम के नाम पर बांटने का प्रयास। इसको देखना होगा। वो राम की राजनीतिक छवि गढ़ने का प्रयत्न नहीं करते बल्कि राम के इमाम-ए-हिंद कहे जाने की बात को दोहराते हुए एक अलग विमर्श खड़ा करना चाहते हैं। ये भूल जाते हैं कि लोक में प्रभु श्रीराम की जो छवि व्याप्त है उसको बदलने या उसको प्रश्नांकित करने का प्रयास सफल हो ही नहीं सकता है। 

एक वामपंथी प्राध्यापक आलोचक प्रभु श्रीराम की छवियों में अंतर खोज रहे हैं तो एक अन्य वामपंथी प्राध्यापक-आलोचक तुलसी को याद करते हुए उनकी पंक्तियों को व्याख्यायित करते हुए वर्तमान राजनीति से जोड़कर सामने रखने का प्रयास कर रहे हैं। तुलसी दास की पंक्तियों के आधार पर ये महोदय भी श्रीराम की वाल्मीकि की बनाई छवि, तुलसी की रचनाओं से बनती छवि और आज की राजनीति में उनकी छवि को अलग अलग देखने का प्रयत्न करते हैं। आलोचक महोदय कहते हैं, तुलसी ने जिस राम को गढ़ा था वे वाल्मीकि से भिन्न हैं और आज जिस राम का प्रचार है वो तुलसी के राम से भिन्न हैं। फतवेबाजी करके निकल जाते हैं अपनी अवधारणा के समर्थन में कोई मजबूत तर्क प्रस्तुत नहीं करते हैं। ये महोदय तुलसी की एक पंक्ति राज-नीति बिनु धन-बिनु धर्मा को उद्धृत करते हुए कहते हैं कि इसमें तुलसी अपने समय में स्पष्ट कहते हैं कि राजनीति नीति-विहीन हो गई है और लोग अधर्म को अपना कर अमीर हो रहे हैं। साथ ही एक पंक्ति जड़ते हैं कि यह आज का भी यथार्थ है। प्रस्तुत ऐसे कर रहे हैं कि ऐसा हाल के दिनों में हो रहा है पहले ऐसा नहीं था। यही आलोचकीय बेईमानी है। इस तरह की कई पंक्तियों को उद्धत करके उसको आज का संदर्भ देने की कोशिश में भाईलोग लगे हुए हैं। तुलसीदास की पंक्तियों के साथ वामपंथी ऐसा पहली बार नहीं कर रहे हैं बल्कि पहले भी लगातार ऐसा करते हैं। महिलाओं और समाज के एक विशेष वर्ग को लेकर लिखी गई उनकी पंक्तियों के आधार पर तुलसीदास को कठघरे में खड़ा किया जाता रहा है। 

तुलसीदास की बात करते हुए इन वामपंथियों को कबीर अवश्य याद आते हैं। कबीर को वो क्रांतिकारी सिद्ध करते रहे हैं । उनकी तुलना में तुलसी को परंपरावादी और दकियानूसी कहते हैं। कबीर को क्रांतिकारी और तुलसी को परंपरावादी दिखाने की होड़ में कुछ क्रांतिकारी लेखकों ने तुलसीदास को वर्णाश्रम व्यवस्था का पोषक, नारी और शूद्र विरोधी करार देकर उनकी जमकर आलोचना की। श्रीरामचरितमानस की एक पंक्ति को उठाकर तुलसीदास को कलंकित करने का प्रयास हुआ लेकिन उनकी कविताओं में उनकी रचित चौपाइयों में इतनी शक्ति है कि वो उनपर इन आलोचनाओं का कोई असर ही नहीं हुआ। वामपंथियों ने सुनियोजित तरीके से तुलसीदास की उन पंक्तियों को उठाया जिनसे उनकी छवि स्त्री विरोधी और वर्णाश्रम व्यवस्था के पोषक की बनती हो। तुलसीदास को स्त्री विरोधी करार देनेवाले श्रीरामचरितमानस में अन्यत्र स्त्रियों का जो वर्णन है उसकी ओर उनकी नजर नहीं जाती है। तुलसीदास लिखते हैं – कत विधि सृजीं नारि जग माहीं, पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं । इसी तरह अगर देखें तो श्रीरामचरितमानस में पुत्री की विदाई के प्रसंग में लिखा - बहुरि बहुरि भेटहिं महतारी, कहहिं बिरंची रचीं कत नारी। इतना ही नहीं तुलसी ये भी कहते हैं कि- रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा। इन पंक्तियों को आलोच्य पंक्ति के सामने रखकर तुलसीदास का मूल्यांकन किया जाना चाहिए । नारी के अलावा जब उनको शूद्रों का विरोधी कहा जाता है तब भी खास विचार के पोषक आलोचक उन पंक्तियों को भूल जाते हैं जहां वो रामराज्य की बात करते हुए सबकी बराबरी की बात करते हैं। तुलसी के रामराज्य में चारों वर्णों के सरयू नदी के तट पर साथ स्नान करने का वर्णन मिलता है । इस ओर क्रांतिकारी कामरेड लेखकों का ध्यान जाता नहीं है। चुलसी ने लिखा है– राजघाट सब बिधि सुंदर बर, मज्जहिं तहां बरन चारिउ नर। साहित्य में ये वामपंथी खेल तुलसीदास के अलावा प्रेमचंद और निराला के साथ भी खेला गया। प्रेमचंद और निराला दोनों लेखकों ने गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका कल्याण के विशेषांकों और अन्य अंकों में लेख लिखे। उनको ओझल कर दिया गया। नई पीढ़ी के पाठकों को इस बात का पता ही नहीं चलने दिया गया कि प्रेमंद और निकाला ने कल्याण में भी लिखा है। उनको वामपंथी बता दिया गया। ये पाठ्य पुस्चतों से लेकर शोध तक होता रहा। इसके आधार पर ही स्वयं को बौद्धिक भी कहने लगे। 

इस तरह की बौद्धिक बेइमानियों को किस कोष्ठक में रखना चाहिए ये तो पाठक तय कर लेंगे। पाठकों के सामने नहीं आने देने का जो षडयंत्र रचा गया और जिसको सरकारों की शक्ति के कारण अंजाम तक पहुंचाया गया उसको परिभाषित करने के लिए लाल किला की प्राचीर से बोला गया शब्द युग्म दिमागी नक्सल सटीक बैठता है। हिंदी समाज को इसपर आत्ममंथन करना चाहिए। वही तत्व अब श्रीराम को भी बांटकर समाज के सामने प्रस्तुत करने के चक्कर में लग गए हैं लेकिन इससे इतना तो हुआ कि प्रभु श्रीराम के अस्तित्व को नकार नहीं रहे हैं, उनको काल्पनिक नहीं बता रहे हैं। जब ये संगठित और सुनियोजित तरीके से प्रचारित किया जाने लगे और सबकी टिप्पणियों में एक साझा सूत्र दिखाई देने लगे तो समझ लीजिए कि साहित्य के बेईमान लोग इकट्ठा हो गए हैं और कुछ काल्पनिक अवधारणा को यथार्थ का रूप देने निकल पड़े हैं। पर इस बार ये भूल जा रहे हैं कि भारतीय समाज में श्रीराम को परिभाषित करके उनको किसी कोष्ठक में नहीं रखा जा सकता। सबके अपने अपने काम हैं उनको किसी परिभाषा की आवश्कता नहीं।   


Saturday, August 15, 2026

दिमागी नक्सलियों से निपटने की चुनौती


स्वाधीनता दिवस के अवसर पर लाल किला की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही, जिसके निहितार्थ बहुत गहरे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि नक्सलवाद, माओवाद ने लाखों युवाओं के भविष्य को तबाह कर दिया। नक्सलवाद ने चार-पांच दशक तक हिंदुस्तान के बहुत बड़े हिस्से को, बहुत बड़ी आबादी को दबोच कर रखा। बंदूक की नोक पर दबोच रखा था। संविधान की धज्जियां उड़ा दी थीं। देश के समान्य नागरिकों की रक्षा में 3500 से ज्यादा सुरक्षा बल के जवान शहीद हुए। प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि उनको खुशी है कि नक्सलवादी-माओवादी हिंसा को आखिरी सांस लेने की ताकत भी नहीं बची। जहां पर कभी नक्सलियों की गोलियां चलती थी, जहां कभी धरती रक्त रंजित रहा करती थी, आज उन्हीं नक्सल क्षेत्रों में विकास, विश्वास और प्रयास का तिरंगा लहरा है। यहां तक तो प्रधानमंत्री अपनी सरकार की सफलता के बारे में बात कर रहे थे लेकिन इसके बाद प्रधानमंत्री ने जो कहा उसपर वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में विचार करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हथियारी नक्सल तो गए लेकिन दिमागी नक्सल बचे हैं। दिमागी नक्सल मौके की तलाश में हैं। वो हिंसा और अराजकता के रास्ते खोज रहे हैं। समाज को गलत राह पर घसीटने के लिए भांति-भांति के दांव चल रहे हैं। इन दिमागी नक्सलियों को पहचानना होगा। इन दिमागी नक्सलियों को आइसोलेट करना होगा और राष्ट्र को विकसित राष्ट्र बनाने की मुख्यधारा की ओर देश की युवा पीढ़ी को जोड़ना होगा। सुरक्षित भारत बनाना हम सबका दायित्व है। चुनौती सीमा के भीतर हो या सरहद के बाहर भारत हर परिस्थिति के लिए तैयार है।

प्रधानमंत्री की उपरोक्त बातों के आलोक में हम पिछले तीन चार महीने में घटी घटनाओं पर नजर डालते हैं। सबसे पहले अयोध्याजी के श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी के प्रकरण को देखते हैं। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय अपराध था। इसमें लिप्त लोगों की गिरफ्तारी हुई। सभी जेल में हैं। विशेष जांच दल इसकी पड़ताल में जुटा है। सुप्रीम कोर्ट भी इस केस पर नजर रखे हुए हैं। ये आपराधिक घटना कोई साधारण अपराध नहीं है इस कारण अपराधियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए और उनको कठोर दंड भी मिलना चाहिए। अब इसका दूसरा हिस्सा देखते हैं जो इस अपराध से अधिक खतरनाक है। चढ़ावा चोरी की घटना को सनातन से जोड़ कर सनातन को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है। संसद परिसर में एक निर्दलीय सांसद ने भगवा पहनकर सनातन के प्रतीकों के साथ सनातन को बदनाम करने के लिए एक प्रहसन किया। इस प्रहसन में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के सांसदों ने पात्र के तौर पर हिस्सा लिया। हिंदुओं के आराध्य प्रभु श्रीराम की तस्वीर जिस तरह से जमीन पर गिराकर अपमान किया गया उसको भी याद रखा जाना चाहिए। सनातन पर आक्रमण करके भारत की आत्मा पर चोट पहुंचाने का प्रयास किया गया। भारत की सभ्यता और संस्कृति पर चोट की गई। भारत विचार पर कुठाराघात किया गया। सनातन को कठघरे में खड़े करने का विचार दिमागी नक्सलियों का हो सकता है। उन्होंने इसकी रूपरेखा तय की होगी और कुछ दलों को चुनावी लाभ का स्वप्न दिखाया होगा। दिमागी नक्सली जब किसी को अपने कब्जे में लेते हैं तो सबसे पहले उसके दिमाग पर कब्जा करते हैं। फिर उसको लाभ होने या दिलाने का आश्वासन देकर अपने जाल में फांसते हैं। इस बात की चिंता किए बगैर कि उसके इस कदम के देश कितना और किस हद तक प्रभावित होगा। चढ़ावा चोरी प्रकरण में पूरे देश ने दिमागी नक्सलियों की इन करतूतों को देखा कि कैसे एक आपराधिक घटना को सनातन से जोड़कर उसका राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास किया गया।

दूसरा उदाहरण दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए युवाओं के प्रदर्शन के बाद की घटनाओं के विश्लेषण से निकलता है। अब ये बात लगभग स्पष्ट हो चुकी है कि जंतर-मंतर के आंदोलन का जिन लोगों ने नेतृत्व किया उनका सिरा आम आदमी पार्टी से जुड़ा हुआ था। यहां तक तो ठीक था। किसी भी राजनीतिक दल को ये अधिकार है कि वो अपने दांव पेंच से अपने राजनीतिक विरोधियों को घेरे, कभी सामने से आकर और कभी परोक्ष रूप से। पर जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन के दौरान वहां जिस तरह के नारे लगे। जिस तरह के भाषण दिए गए उसके पीछे की मंशा साफ थी। जंतर-मंतर पर नारे लगे कि मेरा लिंग मेरी मर्जी, मेरा जेंडर मेरी मर्जी, मेरे कपड़े मेरी मर्जी। वहीं कुछ प्रदर्शनकारियों के बयानों के निहितार्थ परिवार और शादी नाम की संस्था को चुनौती देनेवाले थे। एक तरफ एक संस्था पिछले सौ वर्षों से भारत और भारतीयता को लेकर आगे चल रही है। अपनी संस्था के सौ वर्ष पूरे होने पर परिवार नाम की संस्था को बल प्रदान करने के लिए कुंटुब प्रबोधन जैसा देशव्यापी कार्यक्रम चला रही हो, जिसमें नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, भाषा और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य बताए जाते हों ताकि राष्ट्र मजबूत हो सके। दूसरी तरफ दिमागी नक्सली परिवार नाम की संस्था को ही खारिज करते हैं। वो किशोरों और युवाओं के मन में स्वतंत्रता के नाम पर अराजकता का बीज बोना चाहते हैं। ये दो तरह के विचारों की लड़ाई है। एक भारतीय विचार जो परिवार को जोड़कर राष्ट्र को मजबूत करना चाहता है और दूसरा जो परिवार को कमजोर करके देश को कमजोर करना चाहता है। कहा भी जाता है कि देश एक बड़ा परिवार है और परिवार एक छोटा देश है। तो सनातन से लेकर भारतीय मूल्यों पर हमला करना ही दिमागी नक्सलियों का ध्येय है।

अर्बन नक्सल वो होते थे जो परोक्ष रूप से माओवादी हिंसा का समर्थन करते थे। उनके पक्ष में माहौल बनाकर देश के युवाओं को गुमराह करके माओवाद के रोमांटिसिज्म की ओर ले जाते थे। दिमागी नक्सल वो हैं जो अकादमिक जगत में भारतीय ज्ञान परंपरा का विरोध करते हैं। उसको दकियानूसी और रूढ़ीवादी बताकर खारिज करते हैं। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व के 12 वर्षों में अकादमिक जगत में ये दिमागी नक्सल कमजोर अवश्य हुए हैं लेकिन अपनी उपस्थिति का एहसास समय-समय पर करवाते रहते हैं। सरकारी सिस्टम में भी इनकी जड़ें बहुत गहरी हैं। विशेषकर शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में तो ये अब भी सक्रिय ही नहीं ताकतवर भी हैं। दिमागी नक्सलियों ने कमजोर पड़ने की आशंका में रणनीति बदल ली है। अब वे तिलक लगाकर सनातनी होने का स्वांग रचकर अपनी पहचान छिपाते हैं। तमाम तरह के लाभ लेते हैं। समय आने पर राष्ट्रवादी ताकतों का परोक्ष रूप से विरोध करते हैं और उनको अपने लक्ष्य से दूर करने के लिए राह में रोड़ा भी अटकाते हैं। कई बार तो बहुत साफ दिखता है कि ये हो रहा है लेकिन सिस्टम में दिमागी नक्सलियों की मजबूककी के कारण कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। इसलिए प्रधानमंत्री की चेतावनी को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। देश में सक्रिय दिमागी नक्सलियों की पहचान करने और उनको आइसोलेट करने का कार्य समाज को भी करना होगा। जब तक सामाजिक रूप से ये आइसोलेट नहीं होंगे तबतक वो रूप बदल बदलकर किशोरों और युवाओं को भटकाते रहेंगे।

 

Saturday, August 8, 2026

संप्रुभता को डिजीटल चुनौती


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फेसबुक पर की गई पोस्ट को थोड़े समय के लिए हटाने के लिए फेसबुक चलानेवाली कंपनी मेटा ने भारत सरकार से माफी मांग ली है लेकिन इससे पूरा प्रकरण समाप्त नहीं हो जाता। इंटरनेट मीडिया पर चलनेवाले प्लेटफार्म्स के बारे में गंभीरता से विचार ही करने और एक ठोस नीति बनाने की आवश्यकता है। जंतर-मंचर पर छात्रों के नाम पर जो आंदोलन हुआ और उसमें इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स की भूमिका रही उसपर राष्ट्रव्यापी बहस की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की व्यंग्यात्मक टिप्पणी के बाद अमेरिका में बैठा एक व्यक्ति काकरोच जनता पार्टी के नाम से इंस्टाग्राम हैंडल बनाता है। 78 घंटे में इस हैंडल को तीस लाख फालेवर्स मिल जाते हैं। कुछ और समय में ये संख्या दो करोड़ बीस लाख तक पहुंच जाती है। इस बात पर चर्चा होनी चाहिए कि क्या आर्गेनिक रूप से इतने फालोवर्स इतने कम समय में किसी भी हैंडल को मिल सकते हैं। इंटरनेट पर उपलब्ध विभिन्न स्त्रोतों के अनुसार भारत में इंस्टाग्राम पर करीब 55 करोड़ सक्रिय उपभोक्ता हैं। इस समूह में सबसे बड़ी संख्या 25-34 आयुवर्ग के उपभोक्ताओं की है और उसके बाद 18-24 वर्ष के यूजर्स है। इलके अलावा भारत में फेसबुक के करीब 70 करोड़ यूजर्स हैं। व्हाट्सएप का प्रयोग करनेवाले 85 करोड़ लोग हैं। ये तीनों प्लेटफार्म मेटा कंपनी के अंतर्गत आते हैं। मेटा अमेरिका की कंपनी है। 

इस पृष्ठभूमि में जंतर मंतर पर जुलाई में हुए काकरोच जनता पार्टी के धरने को देखते हैं। दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना आरंभ होता है। बहुत समर्थन नहीं मिलता है। काकरोच जनता पार्टी के लोग पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जंतर मंतर पर लाते हैं। उनके अनशन पर बैठने के बाद उनके स्वास्थ्य को लेकर चर्चा होती है। काकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को समर्थन मिलने लगता है लेकिन अपेक्षित नहीं। इंटरनेट मीडिया विशेषकर इंस्टाग्राम पर इस आंदोलन को लेकर रील आदि दिखने लगते हैं। काकरोच जनता पार्टी 20 जुलाई को संसद मार्च की घोषणा करती है। अनशन के कारण सोनम वांगचुक की तबीयत बिगड़ने लगती है। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स पर रीलों की संख्या बढ़ने लगती है। 18 जुलाई को दिल्ली पुलिस सोनम वांगचुक को जंतर मंतर से उठाकर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करवा देती है। सुबह हुए पुलिस एक्शन की खूब सारी रीलें और वीडियो इंटरनेट मीडिया पर वायरल होती हैं। उन अकाउंट्स पर भी ये रीलें दिखने लगती हैं जो कभी इस तरह की रील नहीं देखते थे। मेरे एक मित्र ने बताया कि वो सिर्फ फिल्मों और पर्यटन से जुड़ी रीलें देखते थे लेकिन उन दिनों उनके वाल पर जंतर मंतर की ही रीलें दिखती थीं। आमतौर पर ये माना जाता है कि इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म एक अल्गोरिथम से काम करता है और आप जिस तरह का वीडियो देकते हैं उसी तरह के वीडियो आपको दिखाता है। सोनम वांगचुक को अस्पताल में भर्ती करवाने के बाद उन अकाउंट्स पर भी जंतर मंतर से संबंधित वीडियो दिखने लगे थे जिनकी रुचि इनमें नहीं थी। रीलों  के माध्यम से माहौल बनाया जाने लगा। इसके बाद ही जंतर मंतर पर भीड़ बढ़ने लगी थी। ये कसेंट मैनुफैक्चरिंग का उदाहरण है। इंटरनेट मीडिया के माध्यम से आंदोलन को गति दिया जाने लगा। 

इंटरनेट मीडिया के माध्यम से साइकोलाजिकल टेकओवर आफ पालिटिकल कंज्यूमर का खेल आरंभ हो चुका था। बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से किसी के भाषण का अंश, सोनम वांगचुक को अनशन स्थल से उठाकर ले जाने का विजुअल, किशोर छात्रों का सरकार के विरुद्ध बयान रील के माध्यम से उपभोक्ताओं तक पहुंचने लगे थे। भारत में यह एक नए तरह का प्रयोग था। इसके पहले विश्व के कई देशों में इस तरह के प्रयोग हो चुके हैं। बंग्लादेश और नेपाल में तो हाल ही में ऐसा हुआ था। योजना इस तरह से बनाई जाती है कि पहले कोई मुद्दा उठाया जाता है। इस बार पेपर लीक को मुद्दा बनाया गया। पेपर लीक ऐसा मुद्दा है जिससे युवा वर्ग सीधे जुड़ता है। इस संवेदनशील मुद्दे की आड़ में सत्ता विरोधी माहौल बनाया जाने लगा। शासक को तानाशाह बताकर उसकी छवि गढ़ने का प्रयत्न किया गया। डिजीटल के माध्यम से इस तरह के बयानों को प्रसारित और प्रचलित करवा कर इस छवि को गाढ़ा करवाया जाता है। सारा खेल लोकतंत्र को बचाने की आड़ में खेला जाता है। 

नेपाल और बंगलादेश के अलावा 2010 में मध्यपूर्व और उत्तरी अफ्रीका के देशों में अरब स्प्रिंग का खेल हुआ था। 17 दिसंबर 2010 में ट्यूनीशिया में हुई घटना को याद करने की आवश्यकता है। एक ठेलेवाले के साथ हुए दुर्वव्यवहार पर विरोध का स्वर उठा। पूरे देश में ये इतनी तेजी से फैला कि वहां के राष्ट्रपति को 14 जनवरी 2011 को देश छोड़कर भागना पड़ा। ये सिर्फ ट्यूनीशिया की कहानी नहीं है। ऐसा कई देशों में हुआ। सब जगह सत्ता परिवर्तन की स्क्रिप्ट एक जैसी है। 2024 के चुनाव में जिस तरह से चुनाव प्रचार के दौरान इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स ने अपना अलगोरिथम बदला, जिस तरह से मोदी विरोधियों को प्रमुखता मिली वो एक अलग शोध की मांग करता है। डिजीटल और सोशल सेक्टर को साथ लेकर सरकार बनाने और गिराने का अंतराष्ट्रीय खेल खेला जाता है उसके बारे में चर्चा होनी चाहिए। भारत में भी बार-बार वो शक्तियां इस तरह का षडयंत्रकारी खेल रचती हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान नरेन्द्र मोदी को तानाशाह बताया गया। नागरिक अधिकारों की कटौती और संविधान बदलने जैसे विमर्श केंद्र में आए। मोदी के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद ये वैश्विक ताकतें निष्क्रिय नहीं हुई हैं। निरंतर सरकार विरोधी माहौल बनाने में जुटी हैं। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। इन वैश्विक ताकतों को लगता है कि भारत को कमजोर करने का यही तरीका है कि चुनी हुई सरकार के खिलाफ जनता में आक्रोश पैदा करो। इसके लिए वो छात्रों का और तथाकथित सिविल सोसाइटी कार्यकर्ताओं को औजार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। 

इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स की भूमिका की चर्चा 2020 के अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी हुई थी। ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति का चुनाव लड़े और हारे थे। चुनाव के दरान ट्रंप के ट्विटर अकाउंट को कुछ समय के लिए सस्पेंड किया गया था। चुनाव परिणाम के बाद ट्विटर (अब एक्स) ने डोनाल्ड ट्रंप के हैंडल पर बैन लगा दिया था। ट्रंप ने अपना प्लेटफार्म ट्रूथ सोशल लांच किया था। बाद में उनके समर्थक एलन मस्क ने ट्विटर खरीद लिया था और ट्रंप के अकाउंट से बैन हटाया था। ट्विटर नाम एक्स हुआ। ये अनायास नहीं है कि चीन इस तरह के प्लेटफार्म्स को अपने देश में घुसने नहीं देता। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स के बढ़ते दायरे के कारण भारत में उनका प्रभाव काफी बढ़ गया है। उनके पास उपभोक्ताओं की सारी जानकारी है। वो जब चाहें जिसको चाहें अपना मनचाहा कंटेंट दे सकते हैं। ये विशेष आयुवर्ग के लोगों को लक्षित कर दिया जा सकता है, विशेष भौगोलिक क्षेत्र को लक्षित कर दिया जा सकता है। यह एक नए तरह का उपनिवेशवाद है जो किसी भी देश की संप्रभुता पर आक्रमण करता है। इसके लिए राजनीतिक दल मायने नहीं रखते हैं। मायने रखती है अपना कारोबारी हित। सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी कि इस तकनीकी नवउपनिवेशवाद से राष्ट्र की संप्रभुता की रक्षा की जा सके। 


सफेद सागर में शौर्य की अग्नि


नई दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए आंदलोन और उसके बाद की परिस्थितियों के संदर्भ में ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म पर चलनेवाले वेबसीरीज में दी जानेवाली गालियों को लेकर चर्चा हो रही है। इसके पहले जी-5 पर फिल्म सतलुज के प्रदर्शित होने और उसको हटाने के बाद ओटीटी पर अंकुश लगाने के पक्ष और विपक्ष में तर्क रखे जा रहे हैं। उधर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने संसदीय समिति को बताया कि ओटीटी के विनियमन के लिए एक विस्तृत संवैधानिक फ्रेमवर्क तैयार किया जा रहा है। ये भी जोड़ा गया कि विनियमन को इस तरह से तैयार किया जा रहा है ताकि किसी व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वाधीनता बाधित ना हो। इस रिपोर्ट में एक और दिलचस्प बात कही गई है। वो ये सरकार ओटीटी प्लेटफार्म पर किसी वेबसीरीज या फिल्म के रिलीज होने के बाद विशेषज्ञों के पैनल से समीक्षा पर विचार कर रही है। अगर सीरीज या फिल्म में किसी प्रकार की आपत्तिजनक सामग्री हो तो उसको हटाने का उपक्रम किया जा सके। जानबूझकर मैंने इस संभावना को दिलचस्प कहा। अगर कोई फिल्म या वेबसीरीज रिलीज हो गई तो उसको भारत में तो हटवाया जा सकता है लेकिन क्या भारत के बाहर के दर्शकों के लिए हटवाया जा सकता है। तकनीक के विस्तार से ये लगभग मुमकिन नहीं है। फिल्म सतलुज के केस में हमने ये देखा कि जी 5 से फिल्म को हटवा देने के बाद भी वो इंटरनेट पर उपलब्ध रही। इस रिपोर्ट में ये भी माना गया है कि ओटीटी प्लेटफार्म ने मनोरंजन की दुनिया में पारंपरिक मनोरंजन के साधन यथा सिनेमा को पीछे छोड़ दिया है। फिल्मों में तो प्रदर्शन के पूर्व प्रमाणन की व्यवस्था है लेकिन ओटीटी मुख्यतया स्वनियमन के फार्मूले पर कार्य करती है। इसमें दर्शकों की उम्र को चेक करने का कोई मैकनिज्म भी नहीं है जिससे बहुधा कम उम्र के बच्चे भी सेक्सुअल कटेंट या गाली गलौच वाले संवादों से भरी सीरीज देखते हैं। इसका प्रभाव भी उनपर पड़ता है। इतना ही नहीं कई बार तो इस तरह के कटेंट सामने आते हैं जो समाज में वैमनस्यता परोसते हैं। दो समुदायों के बीच में कटुता बढ़ाते हैं। अब सूचना और प्रसारण मंत्रालय पोस्ट रिलीज पैनल के माध्यम से इसको विनयमित करना चाहती है। जब भी किसी वेबसीरीज या फिल्म को लेकर दर्शकों की शिकायत आएगी तो ये पैनल उसको देखेगी। अपने सुझावों से मंत्रालय को अवगत कराएगी। 

अभी भी लगभग इसी तरह की व्यवस्था है। स्वनियमन की त्रिस्तरीय व्यवस्था में शिकायत मिलने पर मंत्रालय की समिति विचार करती ही है। उसके बाद निर्णय करती है। इस तरह के कई उदाहरण है। 2024 में श्रीराम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का आयोजवन होनेवाले था। उससे एक महीने पहले नेटफ्लिक्स पर एक तमिल फिल्म अन्नपूर्णी, द गाडेस आफ फूड रिलीज की गई। नेटफ्लिक्स पर प्रसारित इस फिल्म में दिखाया गया था एक ब्राह्मण लड़की देश का श्रेष्ठ शेफ बनना चाहती है। उसको बताया गया कि इसके लिए उसको नानवेज खाना बनाना सीखना होगा। इस फिल्म के संवाद में प्रभु श्रीराम को मांसाहारी बताया गया। हिंदू लड़की को नमाज पढ़ते हुए दिखाया गया। तर्क दिया गया कि उसने बिरयानी बनाना एक मुस्लिम महिला से सीखा था इसलिए आभार प्रकट करने के लिए नमाज पढ़ी। नेटफ्लिक्स पर आने के बाद इसके संवाद और दृष्यों को लेकर मुकदमा हुआ। केस होने के बाद इसके निर्माता कंपनी ने क्षमा मांगी। इस फिल्म को नेटफ्लिक्स से हटाया गया। एक तो इसके प्रदर्शन के टाइमिंग पर विचार करना चाहिए। पहले ही फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी थी। दर्शक इसको नकार चुके थे। लेकिन प्राण प्रतिष्ठा के कुछ दिनों पूर्व इसको ओटीटी पर रिलीज करने के पीछे की मंशा क्या थी। इस तरह की स्थितियों में पोस्ट रिलीज पैनल की क्या भूमिका होगी। क्या मुकदमा होने के बाद वो फिल्म देखेगी। क्या दर्शकों की आपत्ति या शिकायत के बाद फिल्म देखेगी। सरकारी प्रक्रिया में जबतक पैनल देखेगी तबतक कितना समय बीत चुका होगा। किसी भी वैधानिक फ्रेमवर्क को बनाने के पहले इन बातों और पहलुओं पर विचार करना चाहिए। 

ओटीटी पर लेकर हो रही तमाम चर्चाओं के बीच एक ऐसी सिरीज आई जिसको लेकर किसी भी प्रकार का विवाद संभव नहीं है। नाम है आपरेशन सफेद सागर। 1999 के कारगिल युद्ध के समय भारतीय वायुसेना के आपरेशन पर आधारित छह एपिसोड की इस सीरीज में निर्देशक ओनी सेन ने अपने क्राफ्ट, संवाद और परिस्थितियों की रचना इस प्रकार से की है कि दर्शक बंधा रहता है। इस सीरीज में सिर्फ काकपिट और युद्ध की कहानी ही नहीं है। शांति के समय पायलटों और उनके परिवारों की भावनाओं का सुंदर चित्रण भी है। युवा और अनुभवी पायलटों के जीवन को इस तरह से दिखाया गया है जो लगभग वास्तविक जैसा है। एक युवा पायलट की प्रेमिका जब अपने घर से भागकर एयरफोर्स स्टेशन पहुंचती है तो उसके बाद के दृष्य एकदम वास्तविक प्रतीत होते हैं। लड़की को बगैर मेकअप या गहरे मेकअप के पेश करने का जोखिम निर्देशक ने उठाया है। इसी तरह से इस सीरीज के केंद्रीय पात्रों में से एक स्कावड्रन लीडर अजय आहूजा, जिसका किरदार सिद्धार्थ ने निभाया, ने बहुत ही स्वाभिवक ढंग से निभाया गया है। उनकी पत्नी अलका आहूजा का किरदार अमृता बागची ने निभाया है। कैसे सीनियर पायलट का परिवार भी जूनियर पायलट के परिवार को बातों बातों में ट्रेनिंग देते हैं। इसको स्वाभाविक तरीके से संवाद के माध्यम से चित्रित किया गया है। युवा पायलट की प्रेमिका अजय आहूजा के घर में रहती है। एक दिन बातों बातों में अलका आहूजा उससे कहती है कि जब भी उसके पति जहाज लेकर जाते हैं उस दिन वो झगड़ा नहीं करती। लेकिन शिकायतों की सूची बनाते रहती हैं। जब उनके पति को जहाज नहीं उड़ाना होता है उसदिन वो सारा हिसाब बराबर कर लेती हैं। वेबसीरीज आपरेशन सफेद सागर एयरफोर्स से जुड़े पायलटों की जीवन की तमाम बारीकियों को छूती है। रिश्तों की संवेदना को इस तरह से उकेरती है कि कई बार दर्शकों की आंखें भर आती हैं। बेहद सधा हुआ संवाद। कोई पात्र अकारण लाउड नहीं होता है। कई बार तो पात्रों के बीच की चुप्पी बहुत कुछ कह जाती है।  

इस वेब सीरीज के पहले भी माधुरी दीक्षित अभिनीत क्राइम थ्रिलर मिसेज देशपांडे आई थी। वो भी सलीके से बनाई गई थी। दरअसल जिन निर्देशकों को अपने हुनर और कहानी पर भरोसा होता है वो अकारण यौनिकता, हिंसा, गाली गलौच नहीं दिखाते। जिनको अपने हुनर पर भरोसा नहीं होता और जो कला में वैचारिकी की मिलावट करते हैं। राजनीति करते हैं। उससे सफलता का रसायन तैयार करना चाहते हैं। उससे ही विवाद खड़े होते हैं। ओटीटी को लेकर अगर सरकार को विनियमिन की व्यवस्था करनी है तो पोस्ट रिलीज पैनल के स्थान पर प्री रिलीज पैनल बनाने पर विचार करना होगा। ताकि अकारण नग्नता और अश्लीलता परोसने पर तो लगाम लगे ही सीरीज के बहाने राजनीति करनेवालों की पहचान भी हो सके। उनके मंसूबों को नाकाम किया जा सके। इससे ना केवल विवाद कम होंगे बल्कि अकारण सरकारी कामकाज भी नहीं बढ़ेगा।


Saturday, August 1, 2026

परंपरा में गालियों का सौंदर्यशास्त्र


जंतर मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के बाद आंदोलन में शामिल हुए युवक और युवतियों की भाषा और गालियों पर चर्चा हो रही है। साहित्य जगत इससे अछूता नहीं है। साहित्य जगत में भी गालियों पर खूब चर्चा हुई। प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से ऐसी भाषा का उपयोग किया गया जो साहित्यकारों और लेखक/लेखिकाओं से अपेक्षित नहीं थी। राजनीतिक प्रतिबद्धता के आधार पर गालियों की पैरोकारी की गई। कुछ उत्साही लेखकों ने तो गाली को साहित्य का अभिन्न अंग बता दिया। राही मासूम रजा से लेकर काशीनाथ सिंह के उपन्यासों में गालियों की बात कर अपने तर्कों में वजन डालने का प्रयत्न किया गया। अति उत्साह में वैसी रचनाएं खोजी गईं जिनको गालियों के पक्ष में उद्धूत किया जा सके। पर वहां ये नहीं बताया जा सका कि गालियों में प्रयुक्त शब्दावली कैसी थी और उसका किस संदर्भ में प्रयोग किया गया था। चूंकि ये विवाद साहित्यकारों, लेखकों और कुलेखकों के बीच था इस कारण हमें उन कृतियों पर भी विचार करना चाहिए जिसमें गालियों की भरमार है। विचार तो उसपर भी किया जाना चाहिए कि गालियों का संदर्भ क्या रहा है। किन पात्रों और परिवेश में गालियां दी जाती रही हैं। इस संबंध में राही मासूम रजा के उपन्यास आधा गांव का उदाहरण कई लोगों ने दिया। राही ने अपने उपन्यास आधा गांव में जिन पात्रों के मुंह से गालियां दिलवाई हैं उनका परिवेश और उन परिस्थितियों को भी देखा जाना चाहिए। उसको देखने से ये स्पष्ट हो जाता है कि गालियों का उपयोग लेखक ने कथा को प्रामाणिक बनाने के लिए किया। किसी को अपमानित करने या उसको नीचा दिखाने के लिए नहीं। कटेंट का इटेंट देखना सबसे आवश्यक है। यही स्थिति काशीनाथ सिंह के यहां भी दिखाई देती है। 

जिन लेखकों ने अपने उपन्यासों में गालियों को अश्लीलता के साथ प्रस्तुत किया उनपर भी विचार किया जाना चाहिए। हिंदी में एक उपन्यासकार हुए कृष्ण बलदेव वैद। उनका एक उपन्यास है विमल उर्फ जाएं तो जाएं कहां। इस उपन्यास में अश्लीलता की पराकाष्ठा है। उनकी ये कृति जब प्रकाशित होकर आई थी तो उसकी भाषा को लेकर,स्थितियों के चित्रण में अश्लीलता को लेकर चर्चा हुई थी। आमतौर पर इस तरह की कृतियों के साथ जो होता है वही उनके इस उपन्यास के साथ भी हुआ। समय बीतने के साथ इसकी चर्चा कम होती चली गई। अब तो गाहे बगाहे ही इस उपन्यास का नाम सुनाई देता है। वैद का एक और उपन्यास है उसका बचपन। इस औपन्यासिक कृति को संवेदनशील बचपन की आंख से देखी गई एक बड़ी दुनिया की कथा कहा गया। इसकी भाषा भी अश्लील ही थी। प्रकाशन के बाद इसकी चर्चा हुई लेकिन धीरे-धीरे चर्चा तो खत्म हुई ही ये कृति पाठकों की दृष्टि से ओझल भी हो गई। कहना ना होगा कि कटेंट का इंटेंट बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। वैद ने कभी कहा था कि ये हिंदी साहित्य में उनके खिलाफ साजिश है। उनको ये भी विचार करना चाहिए था कि किस कारण से उनके उपन्यास फौरी तौर पर चर्चित होते थे और फिर नेपथ्य में चले जाते थे। दूसरी तरफ निर्मल वर्मा हैं जो उनके ही समकालीन थे। उनके उपन्यासों में भी ऐसी परिस्थियां बनती थीं कि वो अश्लील हो सकते थे। गालियों और स्त्री देह का वर्णन कर सकते थे। उन्होंने अपने भाषा कौशल से उन स्थितियों को अश्लील होने से बचाया। याद पड़ता है उनका एक उपन्यास लाल टीन की छत। इस उपन्यास में निर्मल ने अपने पात्र काया के माध्यम से कथा को आगे बढ़ाया है। काया इस उपन्यास में बचपन और किशोरावस्था के संधिकाल में थी। यहां भी देह के यथार्थ से पात्र का मुठभेड़ होता है। लेखक बेहद संवेदनशील तरीके से उसका बगैर अश्लील हुए पात्र की मन:स्थिति का सफलतापूर्वक चित्रण कर ले जाते हैं। ये उपन्यास भी खूब चर्चित हुआ। अब भी ये हिंदी के पाठकों के साथ साथ गैर-हिंदी पाठकों को अपने शिल्प और भाषाई सौष्ठव के कारण लुभाता है। कंटेंट का इंटेंट साफ है। निर्मल कई बार विसंगतियों को रेखांकित करते हैं लेकिन अर्थहीन नहीं होते। 

कई लोगों ने प्रेमचंद और अमृतलाल नागर के उपन्यासों का नाम लेकर भी गालियों को या अश्लीलता के सार्वजनिक प्रदर्शन को उचित ठहराने का प्रयत्न किया। ऐसे लोगों की हालत भी वैद साहब जैसी होकर रह गई। चर्चा तो मिली लेकिन तर्कों को स्थायित्व नहीं। इंटरनेट मीडिया के जमाने में किसको स्थायित्व की चिंता है। हो भी क्यों ? यहां तो तुरंता प्रसिद्धि के फेर में लोग साहित्यकार बने फिरते हैं। किसी भी चर्चा में छूट ना जें इसलिए उलजलूल लिखकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। उपन्यासकारों के बाद अशोक वाजपेयी की बात कर लेते हैं। आयोजनधर्मी होने के बावजूद आज भी अशोक वाजपेयी को कवि के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। रतिक्रीड़ा की कविताएं लिखनेवाले अशोक वाजपेयी को देह और गेह का कवि ही माना गया। अपनी कविताओं में बाद के दिनों में अशोक वाजपेयी ने मोहक गद्य लिखना आरंभ किया लेकिन कवि के तौर पर पहचान और कविताओं को लोक में स्वीकृति नहीं मिल पाई है। उनकी तुलना में कुंवर नारायण और केदारनाथ सिंह ना केवल कवि के रूप में स्थापित हुए बल्कि कविताओं में वैचारिकी और सिद्धांत के कारण हिंदी साहित्य समाज में समादृत भी हुए। कुंवर जी कविता है- अबकी बार लौटा तो। उसकी कुछ पंक्तियां हैं- अबकी बार लौटा तो/ वृह्तर लौटूंगा। अबकी बार लौटूंगा तो मनुष्यतर लौटूंगा। अबकी बार लौटा तो/ हताहत नहीं/सबके हिताहित को सोचता/ पूर्णतर लौटूंगा। इन पंक्तियों में भारत है। भारत का दर्शन है । अशोक वाजपेयी की तरह पाश्चात्य पांडित्य को भारतीय परिवेश में ढालने की फूहड़ कोशिश नहीं। केदारनाथ सिंह की कविता है घास। इस कविता की आखिरी पंक्ति है कभी भी.../ कहीं से उग आने की/ एक जिद है वह। इस तरह की कई पंक्तियां पाठकों को याद हैं। अशोक वाजपेयी की शायद ही कोई ऐसी कविता हो जो पाठकों को या काव्य रसिकों को याद हो। यह है कंटेंट का इटेंट। इंटेंट अगर फौरी चर्चा है तो वो तो गालियों से मिल सकती है लेकिन कालजयी नहीं हो सकते। 

कुछ लोगों ने विवाहोत्सव में बारातियों के स्वागत में गाई जानेवाली गालियों और  नकटौरा के संवादों में अश्लीलता की बात की। दोनों बातें सही हैं। गालियां दी जाती हैं लेकिन उसका अपना एक सौंदर्यशास्त्र है। विवाहोत्सव के दौरान गाई जानेवाली गालियां शारदा सिन्हा ने खूब गाईं। बिहार में उसको गारी कहते हैं। उसको सुनकर कभी भी उबकाई नहीं आई। विवाहोत्सव और नकटौरा की गालियों में एक रस होता है। वैसा रस जो शब्दों में घुलकर सुननेवाले को आनंद देता है। नकटौरा तो बिल्कुल ही निजी आयोजन होता है। इसके मनोविज्ञान को समझना चाहिए। ये महिलाओं को अपनी बात, अपनी भावनाएं सामने रखने का एक निजी मंच है। इसलिए जंतर मंतर पर दी गई गालियों का गारी और नकटौरा से तुलना हास्यास्पद है। जो अंतर सेंसुअलिटी और सेक्सुअलिटी में है वही जंतर मंतर की गालियों और गारी में है। गालियों को लेकर फेसबुक आदि पर लिखी टिप्पणियों से कई लेखकनुमा जीवों का अज्ञान सामने आ गया।   


Sunday, July 26, 2026

हिंदी का संवादप्रिय आलोचक


हिंदी अकादमिक और साहित्य जगत में नामवर सिंह का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकी जन्म शताब्दी वर्ष में उनके लेखन और भाषणों पर समग्रता में विचार करने की आवश्कता है। नामवर सिंह पर अधिकांश लेख भक्ति भाव से लिखे जाते रहे हैं। बहुत कम लेख ऐसे लिखे गए जो उनकी रचनात्मकता के आधार पर उनका मूल्यांकन करने जैसा हो। या तो प्रशंसात्मक लिखा गया या उनकी व्यक्तिगत आलोचना की गई। नामवर सिंह ने अपने आरंभिक दिनों में विपुल लेखन किया। बाद में उन्होंने वाचन विधा को अपना लिया। मनसा वाचा कर्मणा वो आजीवन कम्युनिस्ट रहे। उनके लेखों में कभी भी कम्युनिस्ट विचारधारा से विचलन देखने को नहीं मिलता है। नामवर सिंह एक सच्चे पार्टी कार्यकर्ता की तरह साहित्य में भी अपनी विचारधारा के कार्यकर्ता थे। लेनिन का एक लेख है ‘पार्टी साहित्य और पार्टी संगठन’। इस लेख में वो पार्टी लेखकों से पक्षधरता का आग्रह करते हैं। नामवर सिंह के लेखन में लेनिन का वो आग्रह साकार दिखाई देता है। आलोचक होने के नाते उनका दायित्व था कि खोज-खोजकर हिंदी साहित्य के कवियों-लेखकों को मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित बताना और स्थापित करना। निराला को लेनिन के प्रभाव में बताने के लिए वो उनकी 1920 की एक कविता बादल राग की पंक्तियां लेकर आए थे। पंक्ति है- तुझे बुलाता कृषक अधीर/ऐ विप्लव के वीर। अब इस पंक्ति में चूंकि कृषक भी है और विप्लव भी तो निराला कम्युनिस्ट हो गए। नामवर सिंह ने तो जयशंकर प्रसाद पर भी लेनिन का प्रभाव देखा और कहा भी। दिनकर की किसी कविता में लेनिन का नाम आया तो उनको कम्युनिस्ट बताने लगे थे। प्रेमचंद को तो कम्युनिस्ट बता ही चुके थे। नामवर सिंह ने जो राह दिखाई थी उनके कम्युनिस्ट चेले उसी पर चलकर इन लेखकों कवियों के बारे में बोलने-लिखने लगे। परिणाम ये हुआ कि इन लेखकों का इकहरा और दोषपूर्ण मूल्यांकन हुआ। 

जब नामवर सिंह लेखन से वाचन की ओर आए तो उन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा पर भी प्रहार किया। विचारधारा को लेकर चलनेवाले इस नामवर आलोचक ने किसी गोष्ठी में कह दिया कि विचारधारा हमें अमानवीकृत करती है। फिर किसी गोष्ठी में कह दिया कि शुक्र है कि हमारे देश में कम्युनिष्टों का शासन नहीं है वर्ना हम सभी यानि उनसे असहमति रखनेवाले जेलों में बंद होते। एक और इसी तरह का बयान था-भारतीय समाज में जो दुर्गति समाजवाद की है साहित्य में वही प्रतिबद्धता की। इन बयानों पर प्रगतिशील जमात के लेखकों ने खूब हो हल्ला मचाया था। एक बार मैंने राजेन्द्र यादव से पूछा था कि नामवर सिंह इस तरह के बयान क्यों देते हैं? उन्होंने छूटते ही कहा कि वो प्रचार-प्रिय आलोचक हैं। उनको पता है कि कैसे चर्चा के केंद्र में रहा जाता है। नामवर सिंह ने भी अशोक वाजपेयी के साथ एक बातचीत में कहा था कि विवादों के माध्यम से सिद्धांत का विकास हो सकता है और इनके माध्यम से ठोस साहित्यिक कृतियों के मूल्यांकन की दिशा में भी हम पाठकों की समझ ज्यादा बढ़ा सकते हैं, विकसित कर सकते हैं। उसी बातचीत में ये भी कहा था कि विवाद आलोचना कर्म और आलोचना धर्म में ही निहित है। नामवर सिंह के शिष्यों ने उनके व्याख्यानों को लिपिबद्ध कर पुस्तकाकार प्रकाशित करवाया है। उन व्याख्यानों से नामवर सिंह की जो तस्वीर बनती है वो लेखक नामवर सिंह से अलग है। ऐसा प्रतीत होता है कि नामवर सिंह लिखे हुए शब्दों और बोले गए शब्दों के महत्व को समझते थे। लिखे हुए को संशोधित करना या बदलना या अपनी स्थापना से पलट जाना कठिन होता है जबकि व्याख्यानों में ये सुविधा होती है। नामवर सिंह का जिस समय हिंदी साहित्य में डंका बज रहा था उस समय संचार के माध्यम बहुत ही कम थे। नामवर सिंह ने इसका लाभ उठाया। 

नामवर सिंह की आलोचना में तमाम विचलन होने के बावजूद इतना तो स्वीकार करना होगा कि उनके अध्ययन का दायरा बहुत विशाल था। उन्होंने हिंदी, संस्कृत, उर्दू और विदेशी साहित्य बहुत पढ़ा था। एक तरफ अपने व्याख्यानों में वो श्रीरामचरितमानस की पंक्ति उद्धृत करते थे तो मीर और गालिब की शायरी का भी धड़ल्ले से प्रयोग करते थे। अपनी स्थापना के समर्थन में विदेशी आलोचकों और लेखकों को उद्धृत करते थे। उनके व्याख्यानों से ये लगता है कि वो हर गोष्ठी में पूरी तैयारी के साथ जाते थे और कुछ न कुछ नया देने की कोशिश करते। जब भी वो विचारधारा और राजनीति से मुक्त होकर अकादमिक स्तर पर बोलते तो उनका व्याख्यान सुनने योग्य होता था। उनकी आलोचना का जो वाचिक स्वरूप था वो विमर्शात्मक होता था लेकिन जब वो लिखते थे तो सृजनात्मक हो जाते थे। नामवर सिंह ने कभी स्वयं इस बात को स्वीकार किया था कि सिद्धांत निर्माण की जगह मूल्ययांकन पर प्रतिक्रिया देकर संवाद बढ़ाया जाना अधिक बेहतर है। नामवर सिंह ने छायावाद पर जो पुस्तक लिखी थी उसने अपने समय में छायावाद पर नए सिरे से साहित्य जगत को सोचने पर मजबूर किया था। कविता के नए प्रतिमान और कहानी नई कहानी उनकी दो पुस्तकों ने हिंदी साहित्य पर विचार करने की एक नई जमीन तैयार की थी। उसी तरह से जैसे डा रामविलास शर्मा ने ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ लिखकर हिंदी नवजागरण को समझने की नई दृष्टि दी थी। नामवर सिंह क्रिया केवलम उत्तरम को अपना आदर्श वाक्य मानते थे और जीवन के अंतिम दिनों तक वो इसपर डटे रहे। बाद के दिनों में जब उनपर बहुत व्यक्तिगत हमले होने लगे थे तो एक दिन मैंने उनसे इस बाबत पूछा था। उन्होंने कहा- चढ़िए हाथी ज्ञान को, सहज दुलीचा डाल/स्वान रूप संसार है, भूंकन दे झकमार।