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Saturday, February 8, 2025

सनातन से कांग्रेस की चिढ़ पुरानी


कुछ दिनों पूर्व कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रयागराज महाकुंभ को लेकर एक बयान दिया था। अपने बयान में खरगे ने गंगा में डुबकी लगाने को रोजगार और भूख से जोड़ा था। बयान की खूब चर्चा हुई थी। खरगे ने उसी तरह की बात की जैसे श्रीरामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के दौरान कहा जाता था कि अयोध्या में श्रीराममंदिर बनाने से अच्छा हो कि वहां एक अस्पताल या शिक्षण संस्थान बना दिया जाए। इसी संदर्भ में ध्यान आया कि पिछले दिनों श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के चेयरमैन डा अनिर्वाण गांगुली से राहुल सांकृत्यायन और भगवान बुद्ध को लेकर किए गए उनके कार्यों और लेखों पर चर्चा हो रही थी। चर्चा तो राहुल सांकृत्यायन के लेखों से आरंभ हुई थी लेकिन बात खरगे जी के कुंभ संबंधी बयान तक जा पहुंची। चर्चा के क्रम में डा गांगुली ने बताया कि नेहरू जी के प्रधानमंत्रित्व काल में 1956 में साधुओं के पंजीकरण के लिए कांग्रेस पार्टी के सांसद राधा रमण ने एक बिल पेश किया था। उस बिल पर लोकसभा में चर्चा हुई थी। चर्चा खत्म हो गई। पर मन में जिज्ञासा बनी रही कि कांग्रेस के सांसद ने लोकसभा में जो बिल पेश किया था वो क्या था। जिज्ञासा के कारण उस बिल की प्रति की खोज शुरू हुई। इंटरनेट मीडिया पर उक्त बिल की प्रति मिल गई। छह पन्नों के इस बिल को देखकर इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि कांग्रेस पार्टी की साधुओं और संन्यासियों को लेकर सोच क्या रहा होगा। आज अगर कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष कुंभ के दौरान पवित्र डुबकी को डुबकी का कंपटीशन कहते हैं तो इसपर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 1956 में संसद में पेश इस बिल संख्या 37 का नाम है, द साधुज एंड संन्यसीज रजिट्रेशन एंड लाइसेंसिंग बिल। नाम से ही स्पष्ट है कि इस बिल का उद्देश्य क्या रहा होगा। 

उक्त बिल में प्रस्तावित किया गया था कि साधु और संन्यासियों को अपने निवास या संन्यास स्थान के जिलाधिकारी के समक्ष अपना रजिस्ट्रेशन करवाना होगा। कल्पना करिए कि अगर ये बिल पास हो गया होता तो आज योगी आदित्यनाथ का रजिस्ट्रेशन हुआ होता, स्वामी अवधेशानंद जी और चिदानंद जी को साधु होने का लाइसेंस लेना पड़ता। शंकराचार्यों का भी एक रजिस्ट्रेशन नंबर होता। सबसे बड़ी बात तो ये होती कि जबतक रजिस्ट्रेशन न हो जाए या जब तक साधु या संन्यासी होने का लाइसेंस न मिल जाए तबतक कोई भी व्यक्ति खुद को न तो साधु कह सकता था और ना ही किसी मठ का मंदिर का महंथ बता सकता था। इतना ही नहीं साधुओं को लाइसेंस जारी करनेवाले अधिकारी को प्रत्येक साधु के बारे में एक रजिस्टर बनाना होता। इस रजिस्टर में साधु का लाइसेंस जारी करने के पहले का उनका नाम, उनकी उम्र, लिंग और धर्म की जानकारी दर्ज करनी होती। साधु बनने के पहले उनका पेशा क्या था, वो अपना जीवनयापन किन साधनों से कर रहे थे और वो किस क्षेत्र के रहनेवाले थे ये सब जानकारी उस रजिस्टर में दर्ज करनी होती। साधु बनने के बाद वो किस मठ या आश्रम में रहनेवाले होते ये जानकारी देनी होती। जिनको भी साधु का लाइसेंस चाहिए उनको संबंधित जिलाधिकारी को लिखित में आवेदन करना होता। इस बिल में लाइसेंसिंग अधिकारी से ये अपेक्षा की गई थी कि वो आवेदन मिलने के बाद तथ्यों की जांच करे और संतुष्ट होने के बाद ही संन्यासी होने का लाइसेंस जारी करे। जिलाधिकारी या लाइसेंसिंग अधिकारी को ये अधिकार प्रस्तावित किया गया था कि वो चाहे तो आवेदक के जीवन या उसके क्रियाकलापों के धार पर लाइसेंस के आवेदन को रद कर सकता है। साधु या संन्यासी बनने के प्रत्यक आकांक्षी को दस वर्षों के लिए लाइसेंस दिया जाना प्रस्तावित था। दस वर्षों के बाद इस लाइसेंस का नवीकरण होने था। लाइसेंसिंग अधिकारी को अगर ये लगता कि साधु या संन्यासी अपेक्षित तरीके से जीवन नहीं जी रहे हैं तो वो लाइसेंस को बीच अवधि में भी निरस्त कर सकता था। बिल में लाइसेंस देने और उसको रद करने की प्रकिया बताई गई थी। 

संसद में हर बिल को पेश करने के लिए उसके उद्देश्यों को भी स्पष्ट करना होता है। 1956 के अप्रैल में पेश इस बिल में भी उद्देश्य स्पष्ट किया गया था। उसके आधार पर ही संसद में बहस होनी थी। बिल में बताया गया था कि हमारे देश में साधु और संन्यासियों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। इनमें से बहुत सारे लोग साधुओं की वेशभूषा में दोषपूर्ण जीवन जीते हैं। भीख मांगते हैं। असमाजिक गतिविधियों में संलग्न रहते हैं। इस प्रवृत्ति को समय रहते ठीक नहीं किया गया तो देश में अपराध में बढ़ोतरी होगी। इस बिल का दूसरा लाभ ये बताया गया था कि रजिस्टर्ड साधुओं के अखिल भारतीय रजिस्टर से सबको पता होगा कि देशभर में कितनी संख्या में साधु और संन्यासी हैं। सरकार के पास हर साधु के बारे में जानकारी होगी । अगर कोई साधु अपराध में लिप्त पाया जाता है तो रजिस्टर से उसके बारे में पूर्ण जानकारी निकाली जा सकेगी। इतने विस्तार से इस बिल के बारे में बताना इस कारण आवश्यक लगा क्योंकि इससे कांग्रेस पार्टी की सनातन के प्रति सोच प्रतिबिंबित होता है।

ये बिल 1956 में ना सिर्फ संसद में पेश हुआ बल्कि अगस्त महीने में इसपर चर्चा भी हुई। बिल पास नहीं हो सका लेकिन नेहरू के प्रधानमंत्री रहते एक ऐसे बिल पर संसद में चर्चा हुई जिसमें सनातन के ध्वजवाहकों को अपमानित करने का प्रयास किया गया। कांग्रेस पार्टी साधुओं और संन्यासियों के स्वधीनता संग्राम में योगदान को भुला बैठी थी। बिल को इस तरह से प्रस्तावित किया गया जिससे  प्रतीत होता है कि सारे साधु और संन्यासी अपराधी हैं। उनका नेशनल रजिस्टर बनाना आवश्यक है, जैसे अपराधियों की हिस्ट्री शीट बनती है। कुछ दिनों पूर्व जब उत्तर प्रदेश सरकार ने कोराबार करनेवालों को अपने प्रतिष्ठानों पर अपना नाम प्रदर्शित करने का आदेश दिया था तब इसी कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने आसमान सर पर उठा लिया था। कांग्रेस के सहयोगी दलों ने भी इसको मुद्दा बनाने का प्रयास किया था। तब किसी ने ये नहीं सोचा कि कांग्रेस पार्टी ने साधुओं के साथ कैसा व्यवहार किया था। 

स्वाधीनता के बाद कांग्रेस पार्टी ने नेहरू के नेतृत्व में इस देश को ऐसा बनाने का प्रयास किया जिसमें सनातन के चिन्ह सार्वजनिक रूप से कम से कम दिखें। दिखें भी तो अपने मूल स्वरूप में न हों। इसके कई उदाहरण इतिहास से पन्नों में दबे हुए हैं। अगर ठीक से नेहरू के शासनकाल के क्रियकलापों पर चर्चा हो जाए तो कांग्रेस पार्टी का मूल चरित्र जनता के सामने आ जाएगा। अकारण नहीं है कि कांग्रेस के नेता सनातन और धर्म को लेकर भ्रमित रहते हैं। उनको वोट लेने के लिए सनातन एक टूल की तरह तो नजर आता है, उसका उपयोग करना चाहते हैं। जब मूल में ही सनातन का विरोध होगा तो टूल का उपयोग सही तरीके से संभव नहीं। वर्तमान कांग्रेस, उसका नेतृत्व और उनकी टिप्पणियों को अगर समग्रता में देखेंगे तो ये भ्रम साफ तौर पर नजर आता है। 


Saturday, November 23, 2024

नेहरू से मोदी युग के साहित्य पर विमर्श


हिंदी साहित्य में नेहरू युग या नेहरू के विचारों के प्रभाव की खूब चर्चा हुई है। नेहरू के बाद इंदिरा युग की भी चर्चा रही। आपातकाल को लेकर कुछ लेखकों ने इंदिरा गांधी के शासनकाल को परखने का प्रयास किया लेकिन अधिकतर वामपंथी लेखकों ने इंदिरा गांधी के संविधान को ध्वस्त कर आपातकाल लगाने के निर्णय को लेकर बहुत तीखी आलोचना नहीं की। नागार्जुन ने देश में आपातकाल लगाने के पहले ही इंदिरा गांधी के अंदर के अधिनायकवादी प्रवृत्ति को पहचान लिया था। इंदिरा गांधी ने जब देश पर आपातकाल थोपा था उसके दो वर्ष पूर्व ही नागार्जुन ने ‘देवी तुम तो कालेधन की वैसाखी पर टिकी हुई हो’ जैसी बहुत तीखी कविता लिखी थी। इस कविता को प्रगतिशील आलोचकों ने बहुत करीने से दबा दिया। उसकी चर्चा ही नहीं होने दी। आनेवाली पीढ़ी को ये बताने का प्रयास हुआ कि नागार्जुन स्वभाव से प्रगतिशील कवि थे। इस धारणा को पुष्ट करनेवाली नागार्जुन की कविताओं की ही चर्चा की गई। ‘देवी तुम तो कालेधन की वैसाखी पर टिकी हुई हो’ जैसी कविता में नागार्जुन ने इंदिरा गांधी और उनके क्रियाकलापों पर कठोर टिप्पणी की थी। अपनी इस कविता में नागार्जुन ने ना सिर्फ महंगाई को लेकर इंदिरा गांधी पर प्रहार किया था बल्कि उनको ठगों और उचक्कों की मलकाइन तक कह डाला था। पंक्तियां देखिए, महंगाई का तुझे पता क्या/जाने क्या तू पीर पराई/इर्द गिर्द बस तीस हजारी/साहबान की मुस्की छाई/तुझ को बहुत बहुत खलता है/’अपनी जनता’ का पिछड़ापन/महामूल्य रेशम में लिपटी/यों ही करती जीवन-यापन/ठगों- उचक्कों की मलकाइन/प्रजातंत्र की ओ हत्यारी/अबके हमको पता चल गया है/है तू किन वर्गों की प्यारी । यहां इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि नागार्जुन ने आपातकाल की घोषणा के पूर्व ही इंदिरा गांधी को प्रजातंत्र की हत्यारी कहा था। इंदिरा युग में इस तरह के साहित्य को जानबूझकर ओझल कर दिया गया। तू किन वर्गों को प्यारी से नागार्जुन कटाक्ष कर रहे हैं कि किस तरह से आम आदमी की बात करते करते वो धनाढ्य लोगों के पक्ष में खड़ी हो गईं। 

नेहरू युग में हिंदी के प्रगतिशील साहित्यकारों ने आधुनिकतावादी कम्युनिस्ट विचार ने ‘धर्म को अफीम’ बताया। जबकि मार्क्स ने उसको अफीम बताने के साथ मानव के दुखी मन का आर्तनाद भी बताया था लेकिन आधुनिकतावादियों और कम्युनिस्टों ने इस दुखी मन के मर्म को न कभी समझा न कभी सहलाया और वृहत्तर हिंदू समाज को क्रमिक तरीके से अपने से दूर कर दिया और अन्तत: खो दिया। ये बातें हिंदी के आलोचक सुधीश पचौरी ने सेतु प्रकाशन से प्रकाशित अपनी पुस्तक, हिंदी साहित्य के 75 वर्ष : नेहरू युग से मोदी युग तक में लिखी है। नेहरू युग से लेकर राजीव गांधी के दौर तक कम्युनिस्टों की चुनिंदा मामलों पर खामोशी से भी हिंदी साहित्य लेखन का सत्य से आंख मूंद लेने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। स्वाधीनता के समय जो देश विभाजन हुआ उसको हिंदी के अधिकतर साहित्यकारों ने अपने लेखन का विषय नहीं बनाया। दो चार लेखकों को छोड़कर मानवता के इतिहास की इतनी बड़ी घटना को कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित हिंदी के लेखकों ने अपनी कृतियों का विषय नहीं बनाया। सुधीश पचौरी प्रश्न उठाते हैं कि हिंदी के अधिकतर लेखक आश्विट्ज, जहां हिटलर ने लाखों यहूदियों को गैस चैंबर में मौत के घाट उतार दिया था, को तो याद करते हैं लेकिन उन्हें विभाजन की विभीषिका परेशान नहीं करती। मुक्तिबोध जैसा क्रांतिकारी कवि भी विभाजन की विभीषिका पर निरपेक्ष ही नजर आता है। इसका उत्तर भी मिलता है जब लेखक कहता है कि कम्युनिस्ट पार्टी की लाइन स्वयं टू नेशन थ्योरी पर आधारित थी। वह स्वयं प्रो विभाजन थी। उनके लिए तो विभाजन एकदम उचित था। ऐसे में प्रगतिवादियों को विभाजन का दर्द कैसे महसूस होता, यदि दर्द यत्र तत्र आया भी तो बेहद सेलेक्टिवली आया। 

कम्युनिट विचारधारा से जुड़े हिंदी के लेखकों ने विभाजन की विभीषिका को अपने लेखन का विषय नहीं बनाया बल्कि उनकी कलम 1984 में दिल्ली में हुए सिखों के नरसंहार पर भी कमोबेश खामोश ही रही। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद तीन दिनों तक दूरदर्शन ने शोक को लाइव दिखाया। कहा जाता है कि उस उस दौरान किसी ने खून का बदला खून का नारा दिया और दूरदर्शन के जरिए वो बड़े समुदाय तक पहुंचा और सिखों का नरसंहार आरंभ हो गया। राजीव गांधी के बड़े पेड़ गिरने से धरती हिलने वाले बयान ने भी आग में घी का काम किया। सुधीश पचौरी का मानना है कि टीवी के सतत प्रसारण और शोक दृष्यों को लगातार देख इंदिरा के प्रति हमदर्दी और मारने वालों के प्रति क्षोभ पैदा होता था। पता नहीं किन तत्त्वों का शोक बेदर्द होकर आम सिखों पर टूटने लगा। सिख और हिंदू जो कल तक एक दूसरे के अनन्य थे वो एक दूसरे के अन्य हो गए। इस बात का समाजशास्त्रीय अध्ययन होना चाहिए कि हिंदू परिवारों में धर्म की रक्षा के लिए अपने बड़े बेटे को सिख बनाने की परंपरा थी वही हिंदू इंदिरा की हत्या के बाद सिखों को पराया समझने लगे। जाहिर है जब इस तरह के धार्मिक अस्मितामूल्क विमर्श अपनी जगह बनाने लगते हैं तब न यथार्थ बचता है न कोई तटस्थता बच पाती है। समूचा यथार्थ ही विभक्त हो जाता है। 1984 में सिखों के नरसंहार ने इसी प्रकार से यथार्थ को विभाजित कर दिया। जो कल तक अपने को सिख या हिंदू की तरह महसूस नहीं करता था वह भी अपनी अस्मिता पहनकर चलने लगा। स्वाधीनता के समय देश विभाजन के बाद यह दूसरा नया विभाजन था। इस विभाजन ने भले ही भौगोलिक विभाजन नहीं किया लेकिन हमारे आसपास के दैनिक यथार्थ और अनुभवों को भी विभक्त कर दिया। प्रश्न यही उठता है कि सिखों के नरसंहार को हिंदी के लेखकों ने प्राय: अनदेखा क्यों किया? सिखों का दर्द हिंदी लेखकों की रचनाओं में नहीं आ पाया। कुछ लेखकों ने लिखा लेकिन वृहत्तर हिंदी साहित्यिक समाज खामोश रहा। एकबार फिर हिंदी के साहित्यकार संवेदनहीन साबित हुए। सुधीश पचौरी कहते हैं कि वो दंगों में शामिल हुए बिना भी दंगों में ‘शामिल’ नजर आए।

आज बहुत सारे साहित्यकार भ्रमित नजर आते हैं। इंदिरा गांधी युग में साहित्य में जिस अवसरवाद का उदय हुआ भूमंडलीकरण तक चलता रहा। मंडल के बाद साहित्य में अस्मितामूलक विमर्श आरंभ हुआ। दलित और स्त्री चेतना का उभार होता है। ये दौर चलता है। मोदी युग में हिंदी साहित्य का इंटरनेट मीडिया युग आरंभ होता है। हिंदी साहित्य की रचना प्रक्रिया से लेकर अर्थ प्रक्रिया और उसकी आलोचना प्रक्रिया भी बदलती नजर आती है। मगर इस बदलाव का अहसास बहुत कम लोगों को है और उससे बाहर निकलने की छटपटाहट तो और भी कम लोगों को है। मोदी युग में हिंदी साहित्य में नए नए प्रश्न खड़े हो रहे हैं। विमर्श पर बहुत चर्चा होती है। विमर्श, आधुनिकता आदि को लेकर साहित्य में बहस कम दिखाई देती है। उपभोक्ता संस्कृति से लेकर बाजर को नए सिरे परिभाषित करने में साहित्य पिछड़ता नजर आता है। हिंदी के वामपंथी साहित्यकार अब भी पुरानी घिसी पिटी लीक पर चलते हुए नजर आते हैं। उनको अपनी रचनाओं में इन प्रश्नों से मुठभेड़ करने की आवश्यकता है। आवश्कता तो इस बात को रेखांकित करने की भी है कि हिंदू समाज किन कारणों से संगठित हुआ और अपने अधिकारों के लिए कृतसंकल्पित भी। 


Saturday, August 3, 2024

सरकार और संगठन का द्वंद्व पुराना


इन दिनों उत्तर प्रदेश की राजनीति में संगठन बड़ा या सरकार को लेकर खूब चर्चा हो रही है। उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव मौर्य के बयान कि सरकार से संगठन बड़ा होता है, के बाद ये चर्चा तेज हो गई थी। उनके बयान के इस वाक्य की अलग अलग तरीके से व्याख्या की गई। इसको सरकार और संगठन के बीच मनमुटाव के तौर पर भी रेखांकित किया गया। राजनीतिक विश्लेषकों ने लोकसभा चुनाव परिणाम में भारतीय जनता पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिलने से जोड़कर इसकी व्याख्या प्रस्तुत की। सरकार और संगठन के बीच चल रही इस चर्चा के बीच उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो सत्यकाम ने पुरुषोत्तम दास टंडन की जयंती पर एक व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया। उस व्याख्यान की तैयारी के सिलसिले में जानकारी जुटाने के क्रम में एक टंडन और नेहरू ने जुड़ा एक बेहद रोचक प्रसंग मिला। वो प्रसंग भी सरकार और संगठन से जुड़ता है। स्वाधीनता के बाद 1950 में कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव होना था। पुरुषोत्तम दास टंडन कांग्रेस के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार होना चाहते थे। जबकि उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू नहीं चाहते थे कि पुरुषोत्तम दास टंडन कांग्रेस के अद्यक्ष बनें। टंडन अपनी उम्मीदावरी को लेकर अडिग थे। वो नेहरू की मुसलमानों की तुष्टीकरण की नीति को लेकर न केवल असहमत थे बल्कि उसका खुलकर विरोध भी करते थे। नेहरू ने कई नेताओं के जरिए टंडन को संदेश भिजवाया कि वो अध्यक्ष पद से अपनी उम्मीदवारी वापस ले लें। टंडन को सरदार पटेल से लेकर अन्य प्रदेशों के संगठन का समर्थन था। वो किसी भी कीमत पर अपनी उम्मीदावरी वापस लेने को तैयार नहीं थे। नेहरू को निरंतर ये संदेश मिल रहा था कि टंडन अपनी उम्मीदावरी वापस नहीं लेंगे। 

इस बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने इस मसले को सार्वजनिक करने का निर्णय लिया। उन्होंने 8 अगस्त 1950 को एक पत्र टंडन को लिखा। इस पत्र के टंडन तक पहुंचते ही सरकार और संगठन के बीच का झगड़ा सार्वजनिक हो गया। नेहरू ने जो पत्र लिखा था उसमें उन्होंने टंडन को नसीहत दी थी। नेहरू ने लिखा था कि इस वक्त कांग्रेस बुरे दौर से गुजर रही है और उसको अगर फिर से पार्टी में उर्जा का संचार नहीं किया गया तो इसकी बुरी हालत हो सकती है। पार्टी आतंरिक कलह से जूझ रही है और पार्टी नेताओं की लालसा बढ़ती जा रही है। नेहरू ने अपने पत्र में आगे लिखा कि ऐसा प्रतीत होता है कि आपको लगता है कि मैं जो कुछ कर और कह रहा हूं वो गलत है। मैं भी आपके भाषणों के बारे में सुनता और पढ़ता हूं और मेरा ये विश्वास दृढ़ होता जाता है कि आप भारत में उन ताकतों का समर्थन कर रहे हैं जो देश के लिए ठीक नहीं हैं। मुझे लगता है कि इस समय देश के सामने जो चुनौतियां हैं उसमें पार्टी में एकता आवश्यक है। हमें मुसलमानों की समस्याओं पर एकजुट होकर न सिर्फ विचार करना चाहिए बल्कि उनको सुलझाने का प्रयास भी करना चाहिए। हम ऐसा तो नहीं ही कर पा रहे हैं बल्कि अल्पसंख्यकों के प्रति पाकिस्तान के कदमों की आड़ में असहिष्णुता दिखा रहे हैं। अफसोस है कि आप उस जमात को समर्थन कर रहे हैं जो सांप्रदायिक है। नेहरू के इस पत्र के बाद संगठन में खेमेबंदी और तेज हो गई। जो बातें अबतक पार्टी में चल रही थीं वो खुलकर सामने आ गई। टंडन मजबूती के साथ अपनी उम्मीदवारी पर अड़े रहे। नेहरू को इस बात का अनुमान होने लगा था कि कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में उनका खेमा कमजोर पड़ रहा है। पटेल समेत दक्षिण के कई नेता टंडन के समर्थन में थे।  

अब जवारलाल नेहरू के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया क्योंकि उन्होंने तो सार्वजनिक रूप से टंडन की उम्मीदवारी का विरोध कर दिया था। अध्यक्ष का चुनाव उनकी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था। जवाहरलाल नेहरू ने टंडन के विरोध नें जे बी कृपलानी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया था। अब नेहरू ने एक ऐसा दांव चला जिसकी कल्पना उस समय के कांग्रेस के नेताओं को नहीं था। उन्होंने घोषणा कर दी कि अगर टंडन जीत जाते हैं तो वो उनकी अध्यक्षता वाली कांग्रेस कार्य समिति में किसी कीमत पर नहीं रहेंगे। नेहरू की इस घोषणा के बाद इस बात की चर्चा होने लगी थी कि संगठन बड़ा या सरकार। यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि ये सब तब हो रहा था जब देश को स्वाधीन हुए लगभग तीन वर्ष हुए थे। विभाजन की विभीषिका का दंश पूरा देश झेल रहा था। पुरुषोत्तम दास टंडन विभाजन का दंश झेल रही बहुसंख्यक हिंदू जनता के पक्ष में खड़े थे। वो निरंतर उनकी समस्याओं को उठा रहे थे और मुसलमान और उनके समर्थक नेताओं को प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर रहे थे। मुसलमान नेताओं पर उनके प्रहार से नेहरू नाखुश थे लेकिन कांग्रेस में टंडन का समर्थन बढ़ता जा रहा था। गोविंद वल्लभ पंत ने भी टंडन का समर्थन कर दिया था। तत्कालीन मैसूर प्रांत के मुख्यमंत्री के हुनुमंथैय्या ने तो पत्र लिखकर टंडन को समर्थन दिया था। अपने पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया था कि नेहरू सरकार ने स्वाधीन भारत के लिए जो राह चुनी है उससे वो असहमत हैं और चाहते हैं कि टंडन और पटेल मिलकर भारत को एक ऐसा नेतृत्व प्रदान करें जो नेहरू की नीतियों से पृथक हो। 

नेहरू की तमाम कोशिशों के बावजूद पुरुषोत्तम दास टंडन ने उनके उम्मीदवार जे बी कृपलानी को संगठन चुनाव में पराजित कर दिया। ये कृपलानी की हार से अधिक नेहरू की हार थी। टंडन की जीत के बाद नेहरू बेहद खफा हुए थे। पर न तो उन्होंने सरकार में पद छोड़ा था और न ही कांग्रेस कार्य समिति की सदस्यता। कार्य समिति में वो टंडन के निर्णयों पर निरंतर प्रश्न चिन्ह लगाते रहते थे। उन्होंने अपनी हार के लिए सरदार पटेल और हनुमंथैय्या को भी जिम्मेदार माना था और दोनों के विरुद्ध लगातार काम करने लगे थे। टंडन करीब एक वर्ष से कुछ अधिक समय तक पार्टी के अध्यक्ष रहे पर नेहरू ने उनके खिलाफ ऐसा माहौल बनाया कि उन्हें आखिरकार इस्तीफा देना पड़ा। उन्होंने नेहरू की राजनीतिक चालों को समझते हुए भी पद छोड़ दिया था। वो नहीं चाहते थे कि सरकार और संगठन के बीच निरंतर हो रहे झगड़े के कारण पार्टी की छवि खराब हो। पहले आमचुनाव में पार्टी को नुकसान हो। टंडन के इस्तीफे के बाद नेहरू खुद पार्टी के अध्यक्ष बने। लंबे समय तक प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष दोनों पद पर रहे। 

टंडन ने ये साबित किया था कि संगठन सरकार से बड़ा होता है लेकिन नेहरू ने टंडन को घेरकर इस्तीफा करवाकर ये दिखा दिया कि सरकार संगठन से बड़ा होता है। कालांतर में नेहरू ने पार्टी पर भी अपना दबदबा कायम कर लिया और अपनी मर्जी के अध्यक्ष बनवाते रहे। टंडन पर दबाव बनाकर नेहरू ने इस्तीफे तो ले लिया लेकिन पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र समाप्त होने की राह भी खोल दी।   


Saturday, June 29, 2024

सनातन प्रतीकों पर राजनीति का खेल


नई लोकसभा के गठन के बाद जब संसद का सत्र आरंभ हुआ तो विपक्षी दल के सांसदों ने संविधान का उपयोग नए राजनीतिक औजार के रूप में करना आरंभ किया। संविधान की प्रति लेकर शपथ लेना आरंभ किया। संविधान को लेकर चुनाव के समय से जो चर्चा आरंभ हुई थी वो लोकसभा तक पहुंच गई। संविधान पर चर्चा और उसके बचाने के दावे के साथ उत्साहित विपक्ष ने नई लोकसभा में सेंगोल की स्थापना को लेकर भी प्रश्न उठाया। समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में अपनी सफलता से उत्साहित है। पार्टी के सांसद आर के चौधरी ने संसद में सेंगोल की जगह संविधान की प्रति लगाने की बात कहकर एक नए विवाद को जन्म दिया। आर के चौधरी ने कहा कि ‘सेंगोल राजा महाराज के टाइम का था। सेंगोल तमिल भाषा का शब्द है। जब यहां राजा महाराजा थे तब यहां सेंगोल तैयार किया गया। जब देश को स्वतंत्रता मिल गई या मिलनेवाली थी या जब सत्ता का हस्तांतरण होनेवाला था तो यहां के पुरोहितों ने प्रस्ताव दिया और उनके प्रस्ताव पर सेंगोल बनवाया गया। सेंगोल के तैयार होने के बाद उसको लार्ड माउंटबेटन को दे दिया गया जिन्होंने उसको जवाहरलाल नेहरू को ट्रांसफर कर दिया। नेहरू ने उसको इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के संग्रहालय में स्थापित करवा दिया। ये पुरानी बात हो गई। सेंगोल जहां था वहां था। वहां से सेंगोल को लाकर नई संसद भवन में रख दिया गया। संसद लोकतंत्र का मंदिर है। हम चाहते हैं कि वहां सेंगोल नहीं देश के संविधान की एक प्रति रखी जाए। उसी से देश चलेगा। देश संविधान से चलेगा। लोकतंत्र से चलेगा। अगर लोकतंत्र को बचाना है तो सेंगोल को हटाना है।‘ 

समाजवादी पार्टी के सांसद ने सेंगोल को लेकर जो टिप्पणी की उसपर विचार करने की आवश्यकता है। पहली बात तो 1950 में संविधान लागू होने के बाद से ही देश संविधान से ही चल रहा है। अगर इमरजेंसी के कालखंड को छोड़ दें जब संविधान की प्रस्तावना को न केवल अवैध तरीके बदला गया बल्कि संविधान प्रदत्त नागरिक अधिकारों को भी खत्म कर दा गया था। प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दिया गया था। संविधान में संशोधन भी किए गए। शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद संविधान को बदला भी गया। इन घटनाओं के अलावा संविधान कभी खतरे में नहीं आया। दूसरी बात जो आर के चौधरी ने कही कि सेंगोल को पुरोहितों के कहने पर तैयार करवाया गया। यह तथ्य से परे प्रतीत होता है। सेंगोल से सत्ता हस्तांतरण का प्रस्ताव चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की पहल पर हुआ था। सेंगोल से सत्ता हस्तांतरण की परंपरा चोल राजवंश में थी उसको स्वतंत्र भारत में सनातन से जोड़कर अपनाया गया था। थिरूवावडुथुरई अधीनम तमिलनाडू के शिवभक्तों का एक बड़ा और प्रभावशाली समूह है। यह समूह सनातन में आस्था रखनेवाले पिछड़े समुदाय का है। समाज के उस हिस्से को सेंगोल बनाने और सत्ता हस्तांतरण समारोह की जिम्मेदारी दी गई जो गैर ब्राह्मण थे, लेकिन शिव और सनातन में उनकी आस्था थी। जब आर के चौधरी बोल रहे थे तो स्पष्ट हो रहा था कि वो सेंगोल के बारे में समग्र तथ्यों से अंजान थे। वो अपनी राजनीति करने के लिए अपनी सुविधानुसार बातों को रखने का प्रयास कर रहे हैं। आर के चौधरी के इस बयान के बाद कुछ राजनीतिक विश्लेषक भी अपने अपने तरीके से सेंगोल को हिंदू धर्म प्रतीक बताकर उसके विपोध की राजनीति को हवा देने में जुट गए। एक विश्लेषक ने तो यहां तक कह दिया कि सेंगोल की स्थापना के समय जिस तरह से सनातन धर्म के गुरुओं के साथ प्रधानमंत्री मोदी ने संसद भवन में प्रवेश किया था वो पंथ निरपेक्ष संविधान के अनुकूल नहीं है। प्रधानमंत्री तक को ये सलाह दे दी गई कि उनको इस तरह से हिंदू धर्म प्रतीकों के सार्वजनिक प्रदर्शन से बचना चाहिए। उनको लगता है कि सेंगोल स्थापना या नई संसद भवन के शुभारंभ के अवसर पर किया गया आयोजन हिंदू वोटबैंक को ध्यान में रखकर किया गया था। 

जब भी इस तरह की टिप्पणी सुनने को मिलती है तो इन राजनीतिक विश्लेषकों की खटाखट और फटाफट सोच पर हंसी आती है। आज जो लोग संविधान की बात कर रहे हैं। उसको हाथ में लेकर संविधान की कसमें खा रहे हैं उनको और उनके राजनीतिक विश्लेषकों को संविधान की प्रति को खोलकर देखना चाहिए। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की अगुवाई में जब संविधान का ड्राफ्ट तैयार हो गया था तब संविधान सभा में उसी साज सज्जा को लेकर चर्चा हुई थी। सदस्यों के साथ चर्चा के उपरांत ये तय किया गया कि प्रख्यात चित्रकार नंदलाल बोस से इसकी साज सज्जा करवाई जाए। संविधान को देखें तो उसका जो भाग तीन है, जिसमें मौलिक अधिकारों की चर्चा की गई है, उस भाग के आरंभ में प्रभु श्रीराम, सीता और लक्ष्मण की अयोध्या वापसी के चित्र अंकित हैं। इसी तरह से संविधान के भाग दो का आरंभ वैदिक काल के गुरुकुल के चित्र से की गई है। इस भाग में नागरिकता से संबंधित बातें हैं। संविधान के पहले भाग में सिंधु घाटी सभ्यता के प्रतीक जैबू, जो नंदी जैसे प्रतीत होते हैं, का चित्र है। इसके आलोक में देखा जाए तो क्या ये मान लिया जाए कि संविधान निर्माताओं ने हिंदू धर्म प्रतीकों को अंगीकार किया था। क्या वो सनातन के प्रतीक चिन्हों का सार्वजनिक प्रदर्शन था या संविधान सभा के सदस्यों की मूल भावना थी। दरअसल इसको और कालांतर में संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गए पंथनिरपेक्षता से मिलाकर देखें तो ये स्पष्ट होता है कि संविधान और संविधान सभा के सदस्यों के मूल भावना के विरुद्ध जाकर प्रस्तावना में पंथ निरपेक्षता जैसे शब्द जोड़े गए। 

संविधान और कानून के रक्षक सुप्रीम कोर्ट का ध्येय वाक्य देखा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के लोगो पर लिखा है यतो धर्मस्ततो जय: । इसका अर्थ है जहां धर्म है वहां जय है। अब इन राजनीतिक विश्लेषकों को कौन समझाए कि ये वाक्य कहां से लिया गया है। महाभारत में अनेकों बार ये पंक्ति आती है। क्या ये भी हिंदू धर्म का सार्वजनिक प्रदर्शन है। संविधान सभा के सदस्य भारत भूमि और भारत की सनातन संस्कृति की विराटता के परिचित थे। इस कारण उन्होंने सनातन और हिंदू धर्म के प्रतीक चिन्हों को उसकी मूल भावना के साथ रखा। राम और प्रकृति को समान महत्व दिया गया। बाद के दिनों में जब संकुचित मानसिकता के लोग सत्ता में आए तो वो सनातन की विराटता और भारतीय संस्कृति को समझ नहीं पाए। पंथ निरपेक्षता जैसे संकुचित शब्द से भारतीय संस्कृति को बांधने की कुचेष्टा की गई। परिणाम यह हुआ कि भारतीय समाज की सनातन परंपरा खांचों में विभाजित होती चली गई। आज जो लोग संविधान और सनातन प्रतीकों पर शोर शराबा मचा रहे हैं दरअसल वो संविधान की मूल भावना के विरुद्ध ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। संविधान को राजनीति का औजार बनाकर अपने राजनीतिक हित साध रहे हैं। संविधान का मूलाधार सनातन है जो आत्मा की तरह अजर अमर है। वो शरीर तो बदलता है लेकिन आत्मा वही रहता है। संविधान पर लाख बातें हो, खूब चर्चा हो लेकिन उसकी मूल भावना से खिलवाड़ न हो।      


Saturday, March 30, 2024

अकादमिक बौद्धिक वर्ग पर उठते प्रश्न


आमतौर पर इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स पर साहित्य को लेकर प्रशंसात्मक पोस्ट ही अधिक देखने को मिलती है। ‘तू पंत, मैं निराला’ वाली शैली में एक दूसरे की तारीफ करते हुए लेखक मिल जाते हैं। वैचारिक टिप्पणियां बहुत ही कम देखने को मिलती है।  जो भी टिप्पणियां होती हैं वो अपनी विचारधारा को पोषित करने या दूसरी विचारधारा को नीचा दिखाने के लिए की गई प्रतीत होती हैं। लेकिन पिछले दिनों फेसबुक पर एक ऐसी टिप्पणी देखने को मिली जिसने बहुत ही आधारभूत प्रश्न तो छुआ। टिप्पणी छोटी थी लेतिन उसके पीछे प्रश्न बहुत बड़ा था। उसने विचार करने पर मजबूर कर दिया। प्रकाशन जगत से जुड़े आलोक श्रीवास्तव ने एक टिप्पणी लिखी, किसी समय राष्ट्र बन रहा था इस भाषा के जरिए, अब इस भाषा में वैयक्तिक महात्वाकांक्षाएं, दुरभिसंधियां और उदासियां बची हैं। इसका साथ उन्होंने 1962 में उत्तर प्रदेश हिंदी समिति के प्रकाशनों की एक सूची डाली। उनका आश्य हिंदी भाषा से था क्योंकि उन्होंने जो सूची लगाई थी वो हिंदी में प्रकाशित पुस्तकों की थी। उनकी टिप्पणी को उद्धृत करते हुए कोलकाता में रहनेवाले साहित्य और इतिहास के अध्येता प्रोफेसर हितेन्द्र पटेल ने अपने विचार रखे। लिखा- स्वाधीन भारत में साठ के दशक तक भारतीय भाषाओं में ज्ञान-विज्ञान की किताबें छपती थीं और सरकारी सहयोग भी था। स्वाधीनता आंदोलन और उसके पूर्व के नवजागरण काल में भारतीय भाषाओं में यह प्रयास मिशनरी भाव से होता रहा था। लेखकों ने त्याग और तपस्या का जीवन चुना था ताकि देश में एक नया बौद्धिक वातावरण तैयार कर सकें। उसके बाद एक नया अकादमिक बौद्धिक वर्ग उभरा जिसके लिए ज्ञान-विज्ञान की भाषा बस अंग्रेजी ही हो सकती थी। उन्होंने आगे लिखा कि इस पोस्ट को पढ़कर बस इसको याद दिलाने का मन हुआ। प्रोफेसर पटेल की इस टिप्पणी ने कई प्रश्न खड़े किए जिसमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण अकादमिक बौद्धिक वर्ग को लेकर है। वो कौन सी स्थितियां थीं जिनमें साठ के दशक के बाद उभरे नए अकादमिक बौद्धिक वर्ग ने भारतीय भाषाओं को ज्ञान-विज्ञान की भाषा न मानकर अंग्रेजी को प्राथमिकता देना आरंभ किया। इसके लिए हमें साठ के दशक के उत्तरार्ध की स्थितियों के बारे में विचार करना होगा।  

यह वो दौर था जब देश ती जनता का नेहरू की नीतियों से मोहभंग हो रहा था। शास्त्री जी के असामयिक निधन के बाद इंदिरा युग का उदय हो रहा था। भाषा के आधार पर प्रांतों का गठन हो चुका था। हिंदी के विरुद्ध गैर हिंदी भाषी प्रदेशों में एक वातावरण बना दिया गया था। स्वाधीनता के बाद और नेहरू के शासनकाल में वामपंथियों ने अकादमिक जगत में जो बीज बोया था वो अब पेड़ बन गया था। साहित्य और मानविकी के क्षेत्र में वामपंथी अपनी जड़ें जमा चुके थे। उन्होंने माहौल बनाना आरंभ कर दिया था कि हिंदी और भारतीय भाषाओं में ज्ञान विज्ञान की बातें हो ही नहीं सकती हैं। वो अपने लेख से लेकर लेक्चर तक में विदेशी विद्वानों को उद्धृत करने लगे थे। पुस्तकें विदेशी अवधारणाओं के आधार पर तैयार की जाने लगी थी। भारतीय शब्दों को विदेशी शब्दों से विस्थापित किया जाने लगा था। भारतीय भाषाओं के शब्दों के अर्थ को संकुचिच करके उसके समान अर्थ वाले शब्द अकादमिक जगत में पेश किए गए थे। देशभर के विश्वविद्यालयों में इस तरह का माहौल बनाना गया था जैसे चेखव और ब्रेख्त कालिदास से बड़े नाटककार थे। समाज विज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में भारतीय विद्वानों की मान्यताओं पर विदेशी विद्वानों को महत्वपूर्ण बताया जाने लगा था। भारत की मेधा और बुद्धिमत्ता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया जाने लगा था। पूरी दुनिया को शून्य की अवधारणा से परिचित करानेवाले देश को बताया जाना लगा कि गणित और विज्ञान के लिए विदेशी फार्मूले अधिक उपयुक्त हैं। विदेशी फार्मूले को समझने के लिए विदेशी भाषा का ज्ञान आवश्यक है। मैकाले ने जो स्वप्न देखा था और जिसके आधार पर उसने भारत में शिक्षा पद्धति आरंभ करवाई थी, स्वाधीनता के बाद उसको रोकने का गंभीर प्रयास नहीं हुआ। हिंदी में लिखी पुस्तकें ओझल की जाने लगीं। हिंदी के स्थान पर अंग्रेजी की पुस्तकों को प्राथमिकता मिलने से गैर साहित्यिक विषयों पर पुस्तकें प्रकाशित करनेवाले प्रकाशक कम होते चले गए। 

याद पड़ता है जबलपुर विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास और संस्कृति विभाग के आचार्य और अध्यक्ष रहे डा राजबली पांडेय ने एक पुस्तक लिखी थी, भारतीय नीति का विकास। ये पुस्तक बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से साठ के दशक के मध्य में प्रकाशित हुई थी। इसमें डा राजबलि पांडेय ने नीतिशास्त्र पर विस्तार से अपनी बात रखी थी। इस पुस्तक की भूमिका में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के उस समय के निदेशक भुवनेश्वरनाथ मिश्र माधव ने लिखा है कि नीतिशास्त्र हिताहित का विवेचन करनेवाला शास्त्र है। इसका अध्ययन करने के मनुष्य को अपने कर्तव्य-अकर्तव्य, सत्य-असत्य, उचित अनुचित, शुभ-अशुभ आदि का ज्ञान होता है और वह जीवन यात्रा में उपयुक्त मार्ग पर अग्रसर होने में समर्थ होता है। नीति के अभाव में मानव का पथभ्रष्ट होना स्वाभाविक है। अब नीति की ऐसी व्याख्या या परिभाषा पश्चिम के विद्वानों के यहां नहीं मिलती। वो तो पालिसी की बात करते हैं और हमारे यहां के विद्वान नीति को पालिसी समझने की भूल कर बैठते हैं। सिर्फ नीतिशास्त्र ही नहीं बल्कि इतिहास, विज्ञान, गणित, दर्शन, पदार्थ शास्त्र, योग दर्शन, राजनीति शास्त्र, पश्चिम की विचारधाराओं और विदेश नीति पर हिंदी में मौलिक पुस्तकें लिखी गईं थी और प्रकाशित भी हुई थीं। चाहे वो राज्य सरकारों की अकादमियों से प्रकाशित हों या काशी नागरी प्रचारिणी सभा से या अन्य संस्थाओं से। आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य में आलोचक के रूप में समादृत हैं लेकिन उन्होंने भारतीय वस्त्रों से लेकर राजनीति और अन्य विषयों पर विपुल लेखन किया है, अधिकतर हिंदी में। अगर प्राचीन हस्तलिखित पोथियों के विवरण पर नजर डालेंगे तो वहां भी हिंदी में विविध विषयों पर लिखी गई पुस्तकों के बारे में जानकारी मिलेगी। उस विवरण में दर्शन, विज्ञान और धर्म पर लिखी पोथियों की लंबी सूची दिखाई देती है।

आज जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू होने के प्राथमिक चरण में है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी निरंतर भारतीय भाषाओं में शिक्षा को लेकर आग्रही बने हुए हैं तो अब एक महती जिम्मेदारी आती है संस्थाओं पर। इन संस्थानों का दायित्व बनता है कि वो प्राचीन काल में हिंदी में विभिन्न विषयों पर लिखी गई मौलिक पुस्तकों को खोजें और उसको अद्यतन करवाकर फिर से प्रकाशित करें। आज शिक्षा के क्षेत्र में धन की कमी नहीं है, प्रचुर मात्रा में संसाध्न उपलब्ध करवाए जा रहे हैं, आवश्यकता है मजबूत इच्छाशक्ति की। अगर इस भ्रम को तोड़ना है कि ज्ञान विज्ञान की भाषा हिंदी नहीं हो सकती है तो पहले इस भाषा में ज्ञान विज्ञान की लिखी पुस्तकों का पुनर्प्रकाशन करना होगा। प्रोफेसर हितेन्द्र पटेल भी कहते हैं कि उस स्वदेशी परंपरा का नवोन्मेष हो, इन किताबों का पढ़ने पढ़ाने का एक आंदोलन हो। और कुछ हो न हो करमजले यह कहना बंद करेंगे कि इन भाषाओं में भान विज्ञान की चर्चा कैसे करें। पढ़ने पढ़ानेवाले नवबौद्धिकों ने ही अंग्रेजी के प्रभुत्व को बढ़ाने में अपनी स्वार्थपरता, काहिली और लोलुपता से मदद की है। ये विस्मृत कर चुके हैं कि हिंदी, मराठी या बांग्ला में विपुव मात्रा में ज्ञान विज्ञान पर पुस्तकें लिखनेवाले लोग थे। अंत में एक बात और कह देना आवश्यक है कि इस कार्य में सरकारी संस्थाओं और विश्वविद्यालयों को पहल करनी होगी। साहित्य, कला, इतिहास और समाज शास्त्र से जुड़ी अधिकतर सरकारी संस्थाएं इवेंट मैनेजमेंट कंपनी बन गई हैं। सेमिनार और गोष्ठियां करवा कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेते हैं। जबकि होना ये चाहिए कि ये संस्थाएं हिंदी में मौलिक लिखवाने का प्रयास करें। ऐसा करनेवाले लेखकों को बेहतर मानदेय दें। अगर ये संभव हो पाता है तो हिंदी का गौरव पुनस्थापित हो सकेगा।  



Friday, February 2, 2024

हिंदी पर हिंदुस्तानी की प्रेतछाया


कहीं एक व्यंग्योक्ति पढ़ी थी कि वामपंथी इतिहासकारों के पास ज्योतिषि विज्ञान से अधिक शक्ति होती है। ज्योतिष किसी का भविष्य बदलने का दावा कर सकते हैं लेकिन वामपंथी इतिहासकार तो अतीत बदल देते हैं। इस बात का स्मरण दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के संस्थापक डा नगेन्द्र की आत्मकथा, अर्धकथा पढ़ते समय आया। दरअसल डा नगेन्द्र ने कुछ दिनों तक आल इंडिया रेडियो में भी नौकरी की थी। उस समय सूचना और प्रसारण मंत्री सरदार पटेल थे। मौलाना अबुल कलाम आजाद शिक्षा मंत्री थे। जब 1947 में डा नगेन्द्र ने आल इंडिया रेडियो का पद ग्रहण किया। उन्होंने लिखा- ‘उस समय रेडियो में हिंदी की काफी दुर्दशा थी। वार्ता, नाटक, संगीत आदि सभी अनुभागों में उर्दू का बोलबाला था। नाम हिंदुस्तानी था पर भाषा उर्दू थी। यह हिंदुस्तानी शुद्ध उर्दू ही थी जिसमें क्रियाओं और विभक्तियों के अतिरिक्त जो वस्तुत: हिंदी और उर्दू में समान ही होती है, हिंदी का कोई लक्षण नहीं था। अंतराष्ट्रीय के लिए वैनुलअकवामी, प्रधानमंत्री के लिए वजीरे आजम, गृहमंत्री और विदेश मंत्री आदि के लिए वजीरे दाखिला और वजीरे खालिजा जैसे शब्दों का प्रयोग होता था। स्वागत, धन्यवाद जैसे शब्दों का प्रयोग भी वर्जित था। कभी कभी पंजाबी भाषी के अनुवादक आभारी के स्थान पर धन्यवादी जैसे शब्दों का प्रयोग कर दिया करते थे, जिससे तथाकथित हिंदुस्तानी का रूप और भी विकृत हो जाता था।‘  

उस समय रेडियो के महानिदेशक पी सी चौधुरी थे। उनकी पीठ पर लौहपुरुष सरदार पटेल का हाथ था। वो रेडियो की हिंदी सेवा की भाषा को लेकर संवेदनशील थे। रेडियो में दिल्ली और पंजाब के लोगों की संख्या अधिक थी। केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों का बड़ा वर्ग था जो न हिंदी जानता था न उर्दू। जब रेडियो के हिंदी सेवा में भाषा को लेकर आवश्यक सुधार होने लगे तो ये सभी लोग मिलकर बुखारीकालीन उर्दूनिष्ठ हिंदुस्तानी के सहज रूपांतरण के सभी प्रकार के प्रयत्नों का तीव्र विरोध करने लगे थे। डा नगेन्द्र लिखते हैं कि प्रो बुखारी के समय आल इंडिया रेडियो में एंग्लो मुस्लिम संस्कृति का वातावरण था, इसलिए वहां के अधिकांश अधिकारी, जिनमें हिंदू भी थे, किसी प्रकार का साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवर्तन नहीं चाहते थे और तरह तरह की प्रशासनिक बाधाएं उत्पन्न करते थे।‘ डा नगेन्द्र धुन के पक्के थे। उनको भाषा संबंधी विसंगतियों को दूर करने के लिए रेडियो में लाया गया था। नगेन्द्र चाहते थे कि संगीत, नाटक, वार्ता आदि सभी घटकों में भारतीय संस्कृति का प्रवेश हो। इन जगहों पर भारतीय संस्कृति का प्रवेश भाषा के साथ ही संभव था। उस समय रेडियो में उच्चतर स्तर यानि विभागीय मंत्री सरदार पटेल की नीतियों को लागू करना था। इसमें उस समय एक बड़ी बाधा उतपन्न हो गई। बाधा ये कि जिनके हाथ में क्रियान्वयन का दायित्व  था उन्हें भाषा की व्वहारिक समस्याओं का ज्ञान नहीं था। उन लोगों ने एक सामान्य सूत्र तैयार कर लिया था। उसी सूत्र पर सबको कसते रहते थे। सूत्र था सर्वाधिक सुबोधता। सर्वाधिक सुबोधता का अर्थ आम बोलचाल के शब्द और छोटे वाक्यों का प्रयोग। ये समस्या जस की तस न भी हो लेकिन आज भी ये सर्वाधिक सुबोधता का जुमला उछलता ही रहता है। खैर ये अवांतर प्रसंग है इस पर फिर कभी। 

बात हो रही थी रेडियो की भाषा की। डा नगेन्द्र ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि हिंदी विरोधियों की अंतिम शरण भूमि थी तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद का कार्यालय। वहां से तरह तरह की शिकायतें आती रहती थीं। जाहिर है इस तरह की बातों को शिक्षा मंक्षी का प्रश्रय था। एक बार रेडियो पर मौलाना आदाज को वजीरे तालीम की जगह शिक्षा मंत्री कहा गया। एक कर्मचारी नगेन्द्र के पास पहुंचे और कहा कि मौलाना साहब के आफिस से फोन आया था और वहां से पूछा जा रहा है कि क्या उनका मंत्रालय बदल दिया गया है। नगेन्द्र कहते हैं कि ये भले मजाक हो लेकिन ये रेडियो की भाषा पर कटाक्ष जैसा था। इसी तरह से एक बार बुलेटिन में ‘वे’ शब्द के प्रयोग पर मौलाना के कार्यालय से आपत्ति आई। उसपर नगेन्द्र को उप-महानिदेशक के सामने सफाई पेश करनी पड़ी थी। उन्होंने बताया कि हिंदी में एकवचन में वह और बहुवचन में वे का प्रयोग किया जाता है। उर्दू में एकवचन और बहुवचन दोनों में वो का प्रयोग होता है, जो हिंदी व्याकरण की दृष्टि से गलत था। नगेन्द्र इस तरह की आपत्तियों से इतने परेशान हो गए थे कि उनको गांधी जी की शरण में जाना पड़ा। गांधी जी को उन्होंने एक बुलेटिन की भाषा दिखाई। गांधी जी ने उसको पढ़कर कहा था कि इसमें तो सब ठीक है। ये बात जब रेडियो महा-निदेशालय पहुंची तो सबको संतोष हुआ। नगेन्द्र का काम अपेक्षाकृत आसान। 

एक शिक्षा मंत्री किसी भाषा को लेकर इतना दुराग्रही हो तो क्या कहा जा सकता है। आरंभ में इतिहासकार और ज्योतिष का जो उदाहरण दिया है उसका संदर्भ यही था। मौलाना आजाद की जो छवि गढ़ी गई वो बहुत ही उदार, सहिष्णु, सर्वसमावेशी और सभी का सम्मान करनेवाले व्यक्ति के तौर पर किया गया। इस तरह की बातें भी पीढ़ियों से बताई गईं और अब भी बताई जा रही हैं। अकादमिक जगत में उनका एक अलग ही रूप दिखता है। सिर्फ नगेन्द्र ही नहीं जोश मलीहाबादी ने भी अपनी आत्मकथा, यादों की बारात में मौलाना के बारे में एक प्रसंग का उल्लेख किया है। उससे भी संकेत मिलता है कि मौलाना आजाद उर्दू और मुसलमानों की पक्षधरता के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे। जोश मलीहाबादी भारत विभाजन के बाद पातिस्तान चले गए लेकिन अन्यान्य कारणों से वहां टिक न सके। वहां से लौटे तो नेहरू ने उनको भारत सरकार की पत्रिका आजकल में संपादक के तौर पर नौकरी दे दी। एक दिन जोश मलीहाबादी नेहरू से मिलने पहुंचे। नेहरू ने उनसे पूछा कि आप अपने महकमे के मंत्री सरदार पटेल से मिले कि नहीं?  जोश मलीहाबादी ने कहा अभी तक नहीं। नेहरू ने फौरन सरदार पटेल के यहां फोन मिलाकार मुलाकात तय करवा दी। जोश साहब सरदार पटेल से मिले और कई तरह की बातें हुईं। जब जोश मलीहाबादी सरदार पटेल से मिलकर उनके बंगले से बाहर निकले तब की स्थिति का विवरण देखिए- सरदार पटेल से अभी मिलकर निकला ही था कि मौलाना आजाद से मुठभेड़ हो गई। उन्होंने अपनी मोटर रोककर मुझे आवाज दी और जब मैं उनकी मोटर में बैठा तो उन्होंने बेहद दर्दनाक तेवरों से देखकर कहा जोश साहब! आप और सरदार पटेल। इसके पहले भी जब नेहरू ने जोश मलिहाबादी को आजकल की नौकरी की पेशकश की थी तो मौलाना ने नेहरू को आगाह किया था कि सोच समझकर जोश साहब को आश्वासन दें ये महकमा सरदार पटेल का है। जोश मलीहाबादी की आत्मकथा में इस तरह के कई प्रंसग  हैं जिससे ये ध्वनित होता है कि मौलाना उर्दू और मुसलमानों की पक्षधरता करते थे और सरदार पटेल से नफरत अन्यथा दर्दनाक तेवर क्यों होता।

इतिहासकारों ने क्या किया, सरदार पटेल को कट्टर हिंदूवादी बताकर उनको आधुनिक भारत के इतिहास में परिधि पर रखने का प्रयास किया। दूसरी तरफ मौलाना आजाद के बारे में अच्छा लिखकर उनको एक ऐसे नेता के तौर पर पेश किया जो विभाजन के बाद भारत में रुका और भारतीय शिक्षा और संस्कृति के लिए जीवन के अंतिम समय तक संघर्ष करता रहा। उर्दू को हर हालत में बनाए रखने और हिंदी पर उसको वरीयता देने के उनके मन का विश्लेषण नहीं हुआ। जिस तरह से हिन्दुस्तानी का प्रेत हिंदी पर मंडराता रहा उसको मौलाना ने और शक्ति दी। स्वाधीनता के अमृतकाल में इन विषयों पर अकादमिक जगत में चर्चा हो और जो नैरेटिव सेट किया गया था उसको चुनौती दी जानी चाहिए। 


Saturday, August 19, 2023

हिंदी फिल्मों में साम्यवादी षडयंत्र


पिछले कई वर्षों से देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू चर्चा में हैं। नेहरू के व्यक्तित्व और कृतित्व के विभिन्न आयामों और पहलुओं को लेकर विमर्श चलता रहता है। एक तरफ उनको आधुनिक भारत का निर्माता बताया जाता है तो दूसरी तरफ विभाजन के समय के उनकी भूमिका से लेकर देश में कला जगत पर सोवियत रूस के प्रभाव को गहरा करने के लिए वातावरण बनाने का आरोप भी लगता है। नेहरू पर कम्युनिज्म का प्रभाव था ये बात वो स्वीकार भी करते थे। स्वाधीनता के बाद देश के प्रधानमंत्री बनने के बाद के निर्णयों में इसकी छाप भी दिखाई देती थी। कुछ दिनों पहले एक वेब सीरीज आई थी जुबली जिसमें हिंदी सिनेमा पर कम्युनिस्टों के प्रभाव की ओर इशारा किया गया था। इस वेब सीरीज के रिलीज के समय इस बात की चर्चा भी हुई थी कि किस तरह से 1952 में उस वक्त के सूचना और प्रसारण मंत्री ने आकाशवाणी पर हिंदी गानों के प्रसारण पर रोक लगा दी थी। तर्क ये दिया गया था कि गाने भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है। उस समय रूसियों का भी यही तर्क होता था। कहना न होगा कि स्वाधीनता के बाद जब भारत एक राष्ट्र के रूप में हर क्षेत्र में अपने को शक्तिशाली बनाने का प्रयास कर रहा था उस समय हिंदी सिनेमा पर रूसियों के प्रभाव को बढ़ाने में तत्कालीन सरकार ने जमीन उपलब्ध करवाई । हाल ही में प्रख्यात अभिनेता देवानंद के शताब्दी वर्ष पर कुछ शोध करने के क्रम में उनकी आत्मकथा रोमासिंग विद लाइफ को दूसरी बार पढ़ा। पहली बार जब पढ़ा था तो उसमें वर्णित कुछ प्रसंगों की ओर ध्यान नहीं गया था। जब दूसरी बार पढ़ रहा था तो वेब सीरीज जुबली के कई संवाद और दृष्य अवचेतन में थे। 

देवानंद ने अपनी आत्मकथा के अट्ठाइसवें और उनतीसवें अध्याय में विस्तार से तत्कालीन सोवियत संघ की यात्रा का वर्णन किया है। इस वर्णन में कई ऐसे सूत्र हैं जिससे ये स्पष्ट होता है कि उस समय की सरकार कैसे कम्युनिस्टों के एजेंडे को बढ़ाने में मदद कर रही थी। बात 1954 की है जब सोवियत संघ ने दूसरे देश के लोगों को अपने यहां आने की अनुमति दी थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ ने अपनी सीमाएं दूसरे देश के नागरिकों के लिए बंद कर रखी थीं। जब सोवियत संघ ने अपनी सीमाएं खोलीं तब भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने हिंदी सिनेमा से जुड़े अभिनेताओं, अभिनेत्री और लेखकों को वहां भेजने का निर्णय लिया। देवानंद ने लिखा है कि इस यात्रा पर जाने के लिए प्रतिनिधि मंडल के सदस्यों के चयन और नेतृत्व का दायित्व ख्वाजा अहमद अब्बास को सौंपा गया क्योंकि उनकी विचारधारा वामपंथी थी। इसका अर्थ ये हुआ कि मनेहरू सरकार के समय संस्कृति मंत्रालय इस तरह के दायित्व विचारधारा के आधार पर दिया करती थी। खव्जा अहमद अब्बास ने बलराज साहनी, बिमल राय, राज कपूर, नर्गिसस, देव आनंद, चेतन आनंद और ऋषिकेश मुखर्जी का चयन किया। नाम को देखकर अंदाज लगाया जा सकता है कि ख्वाजा अहमद अब्बास ने जिन कलाकारों का चयन किया, उनकी विचारधारा क्या थी या उनका झुकाव किस विचारधारा की ओर था। हिंदी फिल्मों से जुड़े ये कलाकार पहले जेनेवा पहुंचे और वहां से चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग। उस वक्त चेकोस्लोवाकिया में कम्युनिस्टों का शासन था। जेनेवा में रुकने के दौरान ये लोग मशहूर अमेरिकी कलाकार चार्ली चैपलिन से भी मिले थे। वो उन दिनों अमेरिका से देश निकाला झेल रहे थे और जेनेवा से थोड़ी दूर एक स्थान पर रह रहे थे। प्राग में प्रतिनिधिमंडल का स्वागत चेकोस्लोवाकिया के अफसर और दुभाषिया ने किया था। 

देवानंद ने लिखा है कि ऐसा लग रहा था कि प्रतिनिधिमंडल की हर गतिविधि पर लगातार नजर रखी जा रही थी। प्राग से इन सबको मास्को तक पहुंचाने के लिए सोवियत संघ के एक विशेष विमान की व्यवस्था की गई थी। ये लोग इतने महत्वपूर्ण थे कि इनके लिए एक विशेष विमान आया। इनको किस किस तरह से प्रभावित किया जा रहा था इसका विस्तार से वर्णन देवानंद ने किया है। ख्वाजा अहमद अब्बास निर्देशित फिल्म राही और अन्य हिंदी फिल्मों को सोवियत संघ की विभिन्न भाषाओं में डब किया गया था। सबके आठ सौ प्रिंट निकलवा कर पूरे सोवियत संघ में रिलिज की गई थी। देवानंद कहते हैं कि इस तरह की व्यवस्था सिर्फ सरकारी नियंत्रण वाले समाज में ही संभव थी। प्रतिनिधिमंडल का दौरा छह सप्ताह का था। उसके प्रत्येक सदस्य को सोवियत संघ के किसी भी शहर में घूमने जाने का विकल्प दिया गया था जिसकी सारी व्यवस्था सोवियत सरकार कर रही थी। सारी व्यवस्था थी, आतिथ्य में किसी प्रकार की कमी नहीं थी लेकिन किसी भी कलाकार को कहीं भी अकेले घूमने जाने की छूट नहीं दी गई थी। इन कलाकारों के सम्मान में हर दिन पार्टियां होती थीं जिनमें बैले नृत्य और वोडका से स्वागत किया जाता था। लेकिन किसी भी कलाकार को रूसियों से निकटता बढ़ाने की छूट नहीं थी। देवानंद ने एक पार्टी का उल्लेख किया है जिसमें दो बेहद खूबसूरत लड़कियां उनके साथ नृत्य कर रही थीं और वो इंटिमेट हो रही थीं। अचानक दोनों गायब हो गईं । देवानंद ने खोजने की कोशिश की लेकिन पता ही नहीं चला और पूरे दौरे के दौरान वो दोनों फिर कहीं नहीं दिखीं। इसी तरह से वो बताते हैं कि लोग फिल्मी सितारों के साथ दोस्ती बढ़ाना चाहते थे लेकिन उनको ऐसा नहीं करने दिया जाता था। देवानंद ने अपनी आत्मकथा में सवाल उठाया कि कहीं उनपर नजर रखनेवाले केजीबी के एजेंट तो नहीं थे। 

पूरे प्रसंग से एक बात तो स्पष्ट है कि उस समय की भारत सरकार अपने कलाकारों को सोवियत रूस भेजकर उनको वामपंथ के प्रभाव में आने का मार्ग प्रशस्त कर रही थी। ये वही दौर था जब हिंदी फिल्मों पर साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव बढ़ा। गरीबों- मजदूरों के अधिकारों को लेकर धड़ाधड़ फिल्में बन रही थीं। उनको सोवियत रूस के विभिन्न सिनेमाघरों में वहां की विभिन्न भाषाओं में डब करके दिखाया जा रहा था। सोवियत संघ के विभिन्न शहरों में हिंदी फिल्मों के लिए फिल्म फेस्टिवल आयोजित किए जाने लगे थे। सोवियत संघ के निर्माता और हिंदी फिल्मों के निर्माताओं के बीच साझेदारी बढ़ने लगी थी। इन सबसे होनेवाला मुनाफा हिंदी फिल्मों के निर्माताओं के साथ साझा किया जाता था। हिंदी फिल्मों के माध्यम से साम्यवादी विचारधारा को मजबूत करने का ये उपक्रम प्रतीत होता है। उस दौर के हिंदी गीतों और संवादों में साम्यवादी विचारधारा स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। पूंजीपति वर्ग को शोषक और गरीब को शोषित दिखाने की परंपरा ने स्वाधीनता के बाद ही जोर पकड़ा था। जमींदार है तो वो बुरा ही होगा ये लगभग हर हिंदी फिल्म का केंद्रीय थीम होने लगा था। पूंजीवादी व्यवस्था के कथित दुर्गुणों को फिल्मों में प्रमुखता से दिखाकर भारतीय जनमानस पर साम्यवादी विचारधारा को थोपने का प्रयास किया जा रहा था। 

उस समय भारत सरकार के मुखिया नेहरू के मन में साम्यवाद को लेकर एक आकर्षण था इसलिए इस प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता रहा, सरकारी संरक्षण भी। इसी दौर में भारतीय जन नाट्य संघ से जुड़े लोग हिंदी फिल्मों में प्रमुख स्थान पाने लगे। गीतकार और कहानीकार भी पूंजीपति बनाम आम जनता की कहानी लिखने लगे थे। उस समय ऐसी फिल्मों को सोवियत संघ में बाजार मिल जाता था। सोवियत संघ में उस समय वहां के संस्कृति मंत्रालय के नियंत्रण में फिल्में बनती थीं जिसमें विचारधारा होती थी। ऐसे में भारत से साम्यवादी विचार वाली फिल्में जिनमें मनोरंजनभी होता था वहां के दर्शकों को पसंद आने लगा था। समग्रता में इसपर विचार करें तो ये निष्कर्ष निकलता है कि स्वाधीनता के बाद नेहरू सरकार की सरपरस्ती में फिल्मों में साम्यवादी विचार फले फूले। 


Saturday, June 17, 2023

उद्देश्य बदलने की आवश्यकता


आज देश की राजनीति में नेहरू से जुड़ा कोई प्रसंग अगर आता है तो उसपर फौरन राजनीति आरंभ हो जाती है। पक्ष विपक्ष के बीच बयानों के तीर चलने लगते हैं। कुछ दिनों के बाद मामला शांत हो जाता है। ताजा मामला नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय से जुड़ा हुआ है। दिल्ली के इस परिसर का नाम बदलकर प्रधानमंत्री संग्रहालय और पुस्तकालय कर दिया गया है। उसी परिसर में नेहरू समेत भारत के सभी प्रधानमंत्रियों का एक विश्वस्तरीय संग्रहालय बनाया गया था। इसके आधार पर ही नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय सोसाइटी के सदस्यों ने इसका नाम बदलने का निर्णय लिया। कांग्रेस के नेता सोसाइटी के इस कदम से आगबबूला हैं। कांग्रेस अध्यक्ष ने लंबा ट्वीट लिखकर इसपर अपनी आपत्ति जताई और भारतीय जनता पार्टी को निशाने पर लिया। ये तो हुई राजनीति की बातें। जब भी किसी जिले, शहर, भवन या रोड आदि का नाम बदला जाता है उसपर विवाद उठते ही रहते हैं। बयानबाजी और राजनीति भी होती ही है। ये तो स्वाधीनता के बाद से ही चलता आया है। कांग्रेस की इस बात लेकर आलोचना होती रही है कि देशभर में सैकड़ों सड़कों, भवनों, संस्थानों आदि के नाम नेहरू, इंदिरा, राजीव और संजय गांधी के नाम पर रखे गए। बाद की सरकारों ने भी अपने नेताओं या अपनी विचारधारा से जुड़े लोगों के नाम पर भवनों, सड़कों आदि के नाम रखे। कभी कम तो कभी अधिक विवाद हुए। लेकिन आज हम बात कर रहे हैं नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय के नाम बदले जाने पर उठे विवाद की। 

पहले जान लेते हैं कि नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय किन परिस्थियों में और किन उद्देश्यों को लेकर बनाया गया था। नेहरु की कैबिनेट में शिक्षा मंत्री रहे मोहम्मदअली करीम छागला की आत्मकथा है रोजेज इन दिसंबर। ये पुस्तक भारतीय विद्या भवन से प्रकाशित है। इसमें छागला ने नेहरू के कालखंड की बहुत सारी स्मृतियों को सहेजा है। उन्होंने स्वाधीन भारत में इतिहास लेखन आरंभ करने के प्रसंग पर भी लिखा है। छागला औपनिवेशिक इतिहासकारों के लिखे से संतुष्ट नहीं थे। देश के इतिहास को नए सिरे से लिखवाने के लिए उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में लेक्चरर रहीं मिस थापर को चुना था। छागला के मुताबिक मिस थापर तर्कवादी और आधुनिक सोच वाली महिला थीं। पूर्वाग्रह से भी मुक्त। उन्होंने इतिहास की दो पुस्तकें तैयार की। इसके अलावा वो नेहरू संग्रहालय और पुस्तकालय की स्थापना की कहानी भी बताते हैं। लिखते हैं कि, ‘नेहरू के निधन के बाद मैंने ये व्यवस्था की कि तीन मूर्ति भवन का एक हिस्सा उसी तरह से संजोया जाए जिस तरह  नेहरू के जीवित रहते हुआ करता था। मैं चाहता था कि पूरे भारवर्ष से लाखों लोग आएं और इस घऱ को राष्ट्र मंदिर के तौर पर देखें। उस वक्त के राष्ट्रपति राधाकृष्णन ने एक भव्य समारोह में तीनमूर्ति भवन को इस उद्देश्य के लिए समर्पित किया। लेकिन मैं ये नहीं चाहता था कि ये सिर्फ एक संग्रहालय के तौर पर रहे मृतप्राय स्थिति में रहे बल्कि मेरी इच्छा थी कि ये विचार और आदर्श के जीवंत केंद्र के रूप मे विकसित हो। इसको ध्यान में रखते हुए वहां एक पुस्तकालय की स्थापना की गई। इस पुस्तकालय में आधुनिक भारत की प्रगति से संबंधित पुस्तकें और सामग्री रखने की योजना बनी। इसको ध्यान में रखते हुए इस विषय से संबंधित उपलब्ध पुस्तकों को जुटाया गया। छात्रों को पुस्तकें लिखने के लिए प्रेरित किया गया। उन लोगों के अनुभवों को टेप पर रिकार्ड किया गया जो नेहरू से मिले थे। अब समस्या थी एक ऐसे निदेशक को खोजने की जो इस तरह के कार्यों में रुचि रखता हो। फिर मेरी नजर रेल मंत्रालय में काम करनेवाले श्रीमान नंदा पर नजर गई। उन्होंने कुछ पुस्तकें लिखी थीं, जो मैंने देखी थीं। मैंने उनको नेहरू संग्रहालय में नियुक्त कर दिया।‘ इस प्रसंग को बताने के क्रम में वो ये भी स्वीकार करते हैं कि नेहरू संग्रहालय और पुस्तकालय की स्थापना के बाद देश में इतिहास लेखन को प्रोत्साहन मिला।

छागला की आत्मकथा के इस प्रसंग के कई बातें ध्वनित होती हैं जो नेहरू संग्रहालय और पुस्तकालय की स्थापना के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हैं। एक तो ये कि उस वक्त की सरकार नेहरू संग्रहालय और पुस्तकालय को राष्ट्र मंदिर के तौर पर स्थापित करना चाहती थी। एक ऐसा राष्ट्र मंदिर जहां नेहरू देवता के तौर पर स्थापित हों और देश की जनता उनको और उनके विचारों की पूजा करे। छागला ने जो लिखा है उससे स्पष्ट है कि इस केंद्र को इतिहास लेखन के केंद्र के रूप में विकसित करने की भी योजना बनी। इतिहास लिखा भी गया। किस तरह का इतिहास लिखा गया ये सबको पता है। अगर आप किसी व्यक्ति को केंद्र में रखकर राष्ट्र मंदिर बनाएंगे तो वहां लिखा जाने वाला इतिहास भी तो उस व्यक्ति की महत्ता को स्थापित करने के कार्य में जुटेगा। ठीक से याद नहीं है लेकिन किसी अन्य पुस्तक में इस बात भी उल्लेख है कि इंदिरा गांधी भी चाहती थीं कि तीन मूर्ति किसी भी कीमत पर सरकार के पास नहीं जाए और वहां नेहरू से जुड़ी चीजें आदि रखी जाएं। रही बात इसको आदर्श वैचारिक केंद्र बनाने की तो वो ये केंद्र कभी बन नहीं पाया। यहां के जो भी निदेशक हुए उनमें से अधिकतर ने जो कार्य करवाए उसके केंद्र में नेहरू और कांग्रेस रही। ज्यादा पीछे नहीं जाते हुए एक उदाहरण देता हूं। 2011 में कांग्रेस पार्टी के इतिहास पर केंद्रित दो खेंडो में पुस्तक आई। नाम था कांग्रेस एंड द मेकिंग आफ द इंडियन नेशन। इस पुस्तक के प्रधान संपादक थे प्रणब मुखर्जी और इसको तैयार करने में मृदुला मुखर्जी, आदित्य मुखर्जी और अन्य की भूमिका थी। अब जरा जान लीजिए कि मृदुला मुखर्जी कौन हैं। वो नेहरू संग्रहालय और पुस्तकालय की निदेशक थीं। उनको सोनिया गांधी का आशीर्वाद प्राप्त था। जब रामचंद्र हुहा के नेतृत्व में उनको नेहरू मेमोरियल के निदेशक पद से हटाने की मुहिम चली थी तो उन्होंने एक प्रसंग में कहा था कि उनको सोनिया गांधी का मैंडेट प्राप्त है। तब ये प्रश्न मुखरता से नहीं उठा था कि सोनिया गांधी ने किस हैसियत से नेहरू संग्रहालय और पुस्तकालय के निदेशक को मैंडेट दिया था। इस प्रसंग का उल्लेख इस कारण कर रहा हूं कि छागला ने जिस सोच के साथ नेहरू स्मारक औऐर संग्रहालय की स्थापना की थी उसको कालांतर में खाद पानी डालकर पोसा गया। नेहरू संग्रहालय और पुस्तकालय के अलावा नेहरू स्मारक निधि भी उसी परिसर से चलता है। इस निधि से शोध करने के लिए भी धन दिया जाता है। इस निधि से शोध करनेवाले शोधार्थियों की सूची और उनके विषयों पर नजर डाल लीजिए पता चल जाएगा कि कैसे एक परिवार और पार्टी विशेष को केंद्र में रखकर इसको चलाया जा रहा था। 

अभी तो नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय का नाम बदला गया है। सोसाइटी को ये निर्णय करना चाहिए कि भारत के सभी प्रधानमंत्रियों के कालखंड में देश को प्रभावित करने या दिशा देनेवाली घटनाएं घटी हैं उनपर शोध हो। उनका दस्तेवाजीकरण किया जाए। उन घटनाओं से जुड़े लोगों के साक्षात्कार रिकार्ड करवाकर इस पुस्तकालय में रखे जाएं ताकि आनेवाली पीढ़ियों के शोधार्थियों को देश के सभी प्रधानमंत्रियों के योगदान के बारे में जानकारी उपलब्ध हो सके। संस्कृति मंत्रालय के अधीन आनेवाले इस संस्थान को इस ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। देश के सभी प्रधानमंत्रियों ने इस राष्ट्र के निर्माण में अपना योगदान दिया है। उनके विचारों को और उनके समय की परिस्थियों को जानने का अधिकार हर भारतीय को है। अगर ऐसा हो पाता है तो इस संग्रहालय के नाम बदलने की सार्थकता सिद्ध होगी अन्यथा तो बस राजनीति और बयानों के भंवर में ये मुद्दा खो जाएगा.

Saturday, October 29, 2022

फिल्मों को सरदार ने दी थी जीवनी शक्ति


सरदार पटेल और फिल्म। सधारणतया इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। ऐसा कहने पर लोग चौंकते भी हैं। सरदार पटेल को स्वाधीनता के लिए संघर्ष करनेवाले अग्रिम पंक्ति के नेता, आधुनिक भारत के निर्माता,सख्त निर्णय लेनेवाले कुशल प्रशासक, राष्ट्रवाद के सजग प्रहरी आदि के तौर पर याद किया जाता है। लेकिन सरदार पटेल और फिल्म का बेहद गहरा नाता रहा है। स्वाधीनता आंदोलन के समय सरदार पटेल ने भारतीय फिल्मों के लिए एक ऐसा कार्य किया जिसने फिल्म जगत को लंबे समय तक प्रभावित ही नहीं किया बल्कि उसके विस्तार की जमीन भी तैयार कर दी। फिल्म को लेकर उनके योगदान की चर्चा करने से पूर्व यह जान लें कि उस समय फिल्मों को लेकर किस तरह का वातावरण था। स्वाधीनता संग्राम के दौरान तिलक भारतीय फिल्मों के प्रबल समर्थक थे। कई पुस्तकों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि तिलक ने दादा साहब फाल्के की फिल्म राजा हरिश्चंद्र के समर्थन में लेख लिखा था। बाबू राव पेंटर का उनकी फिल्म ‘सैरंध्री’ के लिए सार्वजनिक अभिनंदन किया था। जवाहरलाल नेहरू भी फिल्मों के शौकीन थे। जब स्वाधीनता संग्राम में गांधी का प्रभाव बढ़ा तो अग्रिम पंक्ति के नेताओं के बीच फिल्मों को लेकर उदासीनता का भाव उत्पन्न हो गया। गांधी जी फिल्मों को पसंद नहीं करते थे। वो फिल्मों को समाज में बुराई फैलाने वाला माध्यम और नैतिकता विरोधी मानते थे। गांधी के इस सोच का असर कांग्रेस पर भी पड़ा था। उस दौर में हिंदी फिल्म जगत अपने पैरों पर खड़ा हो रहा था। कई फिल्मकार अपने पुरुषार्थ के बल पर भारतीय सिनेमा को मजबूती देने में लगे थे। 

स्वाधीनता आंदोलन अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका था। इस बीच एक बेहद दिलचस्प घटना घटी। 1945 में फिल्मकार और अभिनेता किशोर साहू ने अपनी फिल्म वीर कुणाल पूरी कर ली थी। किशोर साहू चाहते थे कि इस फिल्म का जब प्रदर्शन हो तो उस अवसर पर कोई बड़ा नेता उपस्थित रहे। मुश्किल ये थी कि कांग्रेस के नेता फिल्मों को लेकर या फिल्मों से जुड़े समारोह को लेकर बिल्कुल उत्साहित नहीं रहा करते थे। उनके अंदर की इस झिझक के बारे में किशोर साहू को पता था, लेकिन उन्होंने ठाना कि कांग्रेस के नेताओं और फिल्मों के बीच जो एक खाई बनती जा रही है उसको रोका जाए। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि ‘मन करने लगा कि कांग्रेस और कला के बीच की खाई को पाटने की कोशिश करूं। फिल्मों के प्रति कांग्रेसी नेताओँ के मन की झिझक को निकाल दूं।यह काम शेर की गुफा में जाकर शेर को नत्थी करने के समान था। पर मैंने कमर कस ली। उन दिनों कांग्रेस में कई शेर थे। मगर बब्बरशेर एक ही था- सरदार वल्लभभाई पटेल। मैंने तवज्जो इन पर दी।‘  फिल्म उद्योग से चंदा आदि जमा करने के सिलसिले में किशोर साहू का परिचय पुरुषोत्तमदास टंडन से था। टंडन जी जब बांबे (अब मुंबई) आते थे तो वो किशोर साहू को मिलने के लिए कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के आवास पर बुलाया करते थे। इस तरह से किशोर साहू का मुंशी और श्रीमती लीलावती मुंशी से परिचय था। 

किशोर साहू मुंशी जी के घर पहुंचे और लीलावती जी से पटेल से मिलवाने का अनुरोध किया। लीलावती जी ने किशोर साहू की सरदार पटेल से भेंट तय करवा दी। किशोर साहू नियत समय पर पटेल के मुंबई के घर पर पहुंच गए। पटेल की बेटी मणिबेन ने किशोर साहू को हिदायत दी कि पटेल साहब की तबीयत ठीक नहीं है इसलिए पांच मिनट में बात समाप्त कर वो निकल जाएं। जब किशोर साहू पटेल के कमरे में पहुंचे तो वो सोफे पर लेटे हुए थे। बातचीत आरंभ हुई। किशोर साहू ने कांग्रेस पार्टी पर फिल्मवालों की अवहेलना का आरोप जड़ा। साथ ही फिल्म जगत की समस्याएं भी बताईं। इस बीच पांच मिनट खत्म हो गए थे। मणिबेन ने कमरे में घुसकर किशोर साहू को बातचीत समाप्त करने का संकेत दिया। जब दो तीन बार मणिबेन कमरे में आई तो पटेल समझ गए। उन्होंने मणिबेन को कहा कि इस व्यक्ति को बैठने दिया जाए। तब किशोर साहू ने अन्य समस्याओं के साथ पटेल के सामने विदेशी स्टूडियो के भारत में कारोबार आरंभ करने की योजना के बारे में बताया । उनको ये भी बताया कि विदेशी कंपनियों के पास इतनी अधिक पूंजी है कि वो भारतीय फिल्मों की व्यवस्या को खत्म कर सकती है। करीब घंटे भर बाद पटेल ने पूछा कि आप क्या चाहते हैं?  किशोर साहू ने उनसे कहा कि आप 1 दिसंबर (1945) को बांबे के नावेल्टी सिनेमा में मेरी फिल्म वीर कुणाल के प्रीमियर पर आएं और वहां से फिल्म जगत को आश्वासन दें कि कांग्रेस उनके साथ है। सरदार पटेल ने किशोर साहू को वचन दिया कि वो अवश्य आएंगे। जब उन्हें पता चला कि एक दिसंबर को कलकत्ता (अब कोलकाता) में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक है। अब दुविधा में थे लेकिन फिल्म के प्रीमियर में जाने के अपने वादे पर अटल थे। उन्होंने इसका हल निकाला। अपने सहयोगी को चार्टर प्लेन की व्यवस्था करने को कहा। जिससे वो प्रीमियर के बाद कलकत्ता जा सकें। किशोर साहू ने अपनी फिल्म के प्रीमियर को खूब प्रचारित किया। लोगों में आश्चर्य का भाव था कि कांग्रेस के नेता कैसे फिल्म के प्रीमियर पर पहुंच रहे हैं। उत्सकुकता सरदार पटेल के वक्तव्य को लेकर भी थी कि वो क्या बोलेंगे। एक दिसंबर को सिनेमाघर के बाहर हजारों की भीड़ जमा थी। समय पर सरदार सिनेमा हाल पहुंचे। फिल्म आरंभ होने के पहले उनको मंच पर ले जाया गया। किशोर साहू ने फिल्म जगत की समस्या उनके सामने रखी। अब बोलने की बारी सरदार की थी। उन्होंने सबसे पहले फिल्म की सफलता की शुभकामनाएं दीं लेकिन उसके बाद जो कहा उसका दूरगामी असर पड़ा। सरदार ने लंबा भाषण दिया और पहली बार फिल्मों से जुड़े लोगों को आश्वस्त भी किया कि कांग्रेस फिल्म विरोधी नहीं है। अंत में उन्होंने चेतावनी के स्वर में कहा, जिस दिन विदेशी पूंजीपतियों ने हमारे देश आकर स्टूडियो खोलने की कोशिश की, तो याद रखें वो विदेशी, और याद रखे ये बरतानवी सरकार, उस दिन कांग्रेस अपनी पूरी ताकत के साथ इसका विरोध करेगी। जिस तरह नमक सत्याग्रह हुआ था, उसी तरह इन विदेशी पूंजीपतियों के स्टूडियो पर सत्याग्रह होगा और इस सत्याग्रह का नेतृत्व मैं खुद करूंगा।‘  किशोर साहू ने विस्तार से इस पूरे प्रसंग को अपनी आत्मकथा में लिखा है। भाषण के बाद सरदार पटेल ने मध्यांतर तक फिल्म देखी। उसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में भाग लेने के लिए कलकत्ता चले गए। सरदार पटेल की इस चेतावनी के बाद विदेशी कंपनियों ने स्टूडियो खोलने की योजना रोक दी थी।

सरदार पटेल का वीर कुणाल के प्रीमियर पर दिया गया वक्तव्य फिल्मी के लिए एक बड़ी राहत लेकर आया था। उस दौर में जब गांधी फिल्मों का विरोध कर रहे थे, सरदार पटेल ने फिल्मों का ना केवल समर्थन किया बल्कि उसको आगे बढ़ाने के लिए हर संभव मदद का भरोसा भी दिया। गांधी के मत के खिलाफ जाकर कदम उठाने का साहस पटेल ने दिखाया था। अगर सरदार पटेल भारतीय फिल्मों के समर्थन में खड़े नहीं होते तो आज भारतीय फिल्म जगत किस स्थिति में होती, कहना कठिन है। स्वाधीनता के पहले ही हमारे देश में विदेशी स्टूडियो खुल गए होते और स्वदेशी फिल्मों पर विदेशी पूंजी का ग्रहण लग चुका होता। स्वाधीनता के सालों बाद जब भारतीय फिल्म उद्गोय परिपक्व हुआ, विश्व सिनेमा की बराबरी पर खड़ा होने लगा, तब जाकर यहां विदेशी स्टूडियो को खोलने की अनुमति दी गई। भारतीय फिल्म जगत की वैश्विक सफलता के पीछे सरदार पटेल का सोच भी था। 

Tuesday, May 17, 2022

दृढ इच्छाशक्ति से सिक्किम का विलय


स्वाधीनता के बाद जब रजवाड़ों के भारत में विलय के समय का इतिहास देखा जाए तो जवाहरलाल नेहरू अपने मित्रों को लेकर उदार दिखते हैं। कश्मीर में वो शेख अब्दुल्ला को लेकर साथ चलने पर लगातार बल देते थे। कश्मीर को लेकर उनके बयानों से उलझन भी पैदा होती थी। सरदार कई बार नेहरू के कदमों से खिन्न भी हो जाते थे। जून 1946 में नेहरू शेख अब्दुल्ला के समर्थन में कश्मीर जाना चाहते थे। सरदार पटेल ने उसका विरोध किया था। 11 जुलाई 1946 को डी पी मिश्रा को पटेल ने लिखा, ‘उन्होंने (नेहरू ने) हाल में बहुत सी ऐसी बातें कही हैं, जिनसे जटिल उलझनें पैदा हुई हैं। कश्मीर के संदर्भ में उनकी गतिविधियां, संविधान सभा में सिख चुनाव में हस्तक्षेप, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन के तुरंत बाद प्रेस कांफ्रेंस बुलाना, ये सभी कार्य भावनात्मक पागलपन के थे और इनसे हम सभी को इन मामलों को हल करने में बहुत ही तनावपूर्ण स्थिति का सामना करना पड़ा था। किंतु इन सभी निष्कलंक एवं अविवेकपूर्ण बातों को उनके स्वतंत्रता प्राप्ति के आवेश का असमान्य उत्साह माना जा सकता है।‘ महाराजा हरि सिंह से नेहरू के अच्छे संबंध नहीं थे इस वजह से उनको कश्मीर के भारतीय गणतंत्र में विलय के लिए सरदार पटेल पर निर्भर रहना पड़ रहा था। लेकिन ऐसी कोई मजबूरी सिक्किम को लेकर नहीं थी। आजादी के समय सिक्किम का राजा थोंडुप नामग्याल, नेहरू के मित्र थे। 1947 मे जब भारत को आजादी मिली तो सरदार पटेल और संविधान सभा के सलाहकार बी एन राव इस मत के थे कि सिक्किम का भारत में विलय किया जाना चाहिए लेकिन नेहरू ने इसका विरोध किया था। 

सिक्किम के भारत में विलय पर प्रामाणिक पुस्तक लिखने वाले जी बी एस सिद्धू ने अपनी पुस्तक, सिक्किम, डान आफ डेमोक्रेसी में उपरोक्त प्रंसग का भी उल्लेख किया है। प्रामाणिक इस वजह से कि वो इस अभियान का हिस्सा थे। उनके मुताबिक जवाहरलाल नेहरू अपने आदर्शवाद, एशिया को लेकर अपनी दृष्टि और चीन की स्थिति को ध्यान में रखकर इस विलय का विरोध कर रहे थे। नेहरू चाहते थे कि सिक्किम को विशेष दर्जा मिले। ये सब तब हो रहा था जब सिक्किम स्वाधीनता के पहले चैंबर आफ प्रिसेंस और संविधान सभा का सदस्य भी था। बावजूद इसके थोंडुप नामग्याल सिक्किम को स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर कायम रखना चाहता था। उसने तो आजादी के करीब एक पखवाड़े पहले दार्जिलिंग को सिक्किम में मिलाने की चाल भी चली थी जो नाकाम हो गई थी। इस मामले में नेहरू की चली और सिक्किम को विशेष दर्जा दिया गया। फरवरी 1948 में सिक्किम के साथ भारत सरकार ने एक समझौता किया जिसमें 11 मामलों को छोड़कर सभी अधिकार सिक्किम के राजा को दिए गए। इसमें विदेश और रक्षा मामले भारत सरकार के पास रहे। 1950 में सिक्किम के राजा और भारत सरकार के बीच एक और समझौता हुआ। सिक्किम की जनता इससे खुश नहीं थी और वहां लगातार लोकतंत्र के पक्ष में आंदोलन चल रहा था। तत्कालीन भारत सरकार इसको दबाने में नामग्याल का सहयोग कर रही थी। राजा ने एक अमेरिकी महिला से शादी कर ली थी जिसके बारे में ये धारणा थी वो सीआईए की एजेंट है। 

कालांतर में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं नामग्याल दिल्ली आए। उनसे मिले और भारत के साथ सिक्किम की जारी संधि से मुक्त होकर स्वतंत्र राष्ट्र की अपेक्षा जाहिर की। यही वो निर्णायक मोड़ था जब इंदिरा गांधी ने फैसला किया कि सिक्किम का पूर्ण रूप से भारत में विलय होना चाहिए। इस बीच बंग्लादेश की समस्या सामने आई लेकिन साथ ही साथ सिक्किम को लेकर कूटनीतिक और रणनीतिक स्तर पर तैयारी आरंभ हो चुकी थी। टी एन कौल उस समय विदेश सचिव थे। वो सिक्किम के भारत में पूर्ण विलय की बजाए चाहते थे कि पूर्व में हुए समझौते के आधार पर एक स्थायी संधि की जाए। इस स्थायी संधि के लिए कौल ने एक ड्राफ्ट तैयार किया और उसपर मंत्रियों के समूह में चर्चा हुई। इस चर्चा में तत्ताकलीन सेनाध्यक्ष जनरल मानिक शा को भी बुलाया गया था। सिद्धू की पुस्तक के मुताबिक किसी मंत्री ने इसपर कुछ नहीं बोला लेकिन जनरल मानिक शा ने कहा कि आपलोग चाहे जो भी निर्णय लें लेकिन मुझे तो सैनिकों की तैनाती और आपरेशन की स्वतंत्रता है।  जनरल शा के इस वाक्य से संदेश स्पष्ट था। इंदिरा गांधी ने अपने पिता नेहरू की सोच के उलट सिक्किम को पूरी तरह से भारतीय गणराज्य का हिस्सा बनाने का जिम्मा रिसर्च एंड एनलैसिस विंग( आरएडब्लू) के चीफ आर एन काव को सौंपा। ये वो दौर था जब पाकिस्तान के दो टुकड़े हो चुके थे और बंग्लादेश अस्तित्व में आ चुका था। काव ने रा के ही एक अधिकारी जी बी एस सिद्धू को इसका जिम्मा सौंपा। 

सिक्किम का ये आपरेशन आम खुफिया आपरेशन की तरह नहीं था। इसमें राजनीतिक तंत्र का उपयोग करके लक्ष्य हासिल करना था। सिद्धू ने सिक्किम में लोकतंत्र के समर्थक नेताओं के साथ संपर्क बढ़ाना आरंभ किया। उन्होने सिक्किम नेशनल कांग्रेस के दोरजी काजी और जनता कांग्रेस के महासचिव एस के राय को विश्वास में लिया और उनको हर तरह की मदद देने लगे। उद्देश्य था कि नामग्याल को अलग थलग करना, लोकतांत्रिक ताकतों को मजबूत करना और चुनाव करवाकर विलय को अंजाम देना। सिद्धू को काव का स्पष्ट निर्देश था कि वो अपनी गतिविधियों की जानकारी किसी भारतीय अधिकारी के साथ भी साझा न करें। इस मिशन की जानकारी सिर्फ तीन लोगों को थी, सिद्धू, कोलकाता में रा के अफसर पी एन बनर्जी और काव। इंदिर जी को को तो थी ही।  सिद्धू उस वक्त के सिक्किम कांग्रेस के नेता दोरजी काजी को मजबूत कर रहे थे। वो भारत के साथ विलय के लिए जनमत तैयार कर रहे थे। अप्रैल 1973 में राजा के विरोध की आग इतनी तेज हो गई कि उसको भारत सरकार के साथ एक समझैता करना पड़ा। तय हुआ कि भारत के निर्वाचन आयोग की देखरेख में राज्य में विधानसभा के चुनाव होंगे। अप्रैल 1974 में सिक्किम में चुनाव करवाए गए जिसमें सिक्किम कांग्रेस को 32 में 31 सीटें मिली। 

अब इस आपरेशन का दूसरा चरण आरंभ हुआ। रा के सामने ये चुनौती थी कि सिक्किम के सभी नवनिर्वाचित सदस्य काजी के पक्ष में एकजुट रहें और भारत के साथ विलय का प्रस्ताव पारित हो। नई दिल्ली से कोई निर्देश आने तक राजा की साजिशों पर ध्यान रखा जाए। सिक्किम के अन्य नेता के सी प्रधान और बी बी गुरुंग पर भी नजर रखी जा रही थी। नई दिल्ली से हरी झंडी मिलते ही विधानसभा से एक प्रस्ताव पारित हुआ कि भारत के साथ सक्रिय संबंध बनाए जाएं और संवैधानिक संस्थाओं के साथ मिलकर काम किया जाए। नामग्याल ने इसका कड़ा विरोध किया। लेकिन तबतक तय हो चुका था कि सिक्किम में  जनमत संग्रह करवाया जाए। नामग्याल जनमत संग्रह के लिए राजी नहीं हो रहा था। वो इसको किसी तरह फेल करना चाहता था। उसकी संदिग्ध गतिविधियां तेज हो गई थीं। तब भारतीय सेना को उसके महल में हल्की सैन्य कार्रवाई करनी पड़ी थी। उसके कुछ दिनों जनमत संग्रह हुआ और 97 फीसदी ने सिक्किम के भारत में विलय को मंजूरी दी। इसके बाद पहले लोकसभा और फिर राज्यसभा में विलय को मंजूरी दी और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ ही सिक्किम भारत का अंग बन गया। नेहरू ने ‘स्वतंत्रता प्राप्ति के आवेश के असमान्य उत्साह’ में जो गलती की थी उसको उनकी बेटी की दृढ़ इच्छाशक्ति ने सुधारा। 

Saturday, April 23, 2022

समृद्ध बने प्रधानमंत्री संग्रहालय


हाल ही में दिल्ली के तीन मूर्ति भवन परिसर में प्रधानमंत्री संग्रहालय का शुभारंभ किया गया ।  स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में देश के सभी प्रधानमंत्रियों को याद किया गया। इस संग्रहालय में उन सभी के योगदान को एक स्थान पर देखने समझने का अवसर उपलब्ध करवाया गया। देश की राजधानी दिल्ली में पहले से तीन प्रधानमंत्रियों की स्मृति को सहेज कर रखा गया था। जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद उनके निवास स्थान तीन मूर्ति भवन को ही नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय बना दिया गया था । नई दिल्ली के ही 1, सफदरजंग रोड को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की स्मृति में समर्पित कर दिया गया। ये वही स्थान है जहां इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी। नेहरू स्मारक संग्रहालय में नेहरू जी से जुड़ी रखी गई हैं और इंदिरा गांधी स्मृति में उनसे जुड़ी सामग्रियों के अलावा महत्वपूर्ण अवसरों के चित्र आदि हैं। इस भवन में इंदिरा गांधी के पारिवारिक अवसरों के चित्र भी सहेज कर रखे गए हैं। इसके अलावा नई दिल्ली क्षेत्र में ही पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की स्मृति में भी एक भवन है। इस भवन मे शास्त्री जी से जुड़ी चीजों को रखा गया है। ये भवन नई दिल्ली के 1 मोतीलाल नेहरू पैलेस, मान सिंह रोड के पास स्थित है। ये तीनों भवन बहुत बड़े भूखंड में फैले हैं। इंटरनेट मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इंदिरा गांधी स्मृति की जिम्मेदारी एक निजी ट्रस्ट के पास है जिसकी प्रमुख सोनिया गांधी हैं। लाल बहादुर शास्त्री स्मृति की देखभाल भी एक निजी ट्रस्ट ही करता है।

तीन मूर्ति भवन में प्रधानमंत्री संग्रहालय के शुभारंभ के आसपास इस तरह के समाचार आए कि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी से जुड़ी चीजें नेहरू-गांधी परिवार से मांगी गई थी, ताकि उनको संग्रहालय में संजा जा सके। नए बने संग्रहालय को गांधी परिवार की ओर से कोई सहयोग नहीं मिल पाया। खबरें तो इस तरह की भी आई थीं कि जिस परिवार ने देश को तीन प्रधानमंत्री दिए उस परिवार का कोई सदस्य प्रधानमंत्रियों के संग्रहालय के शुभारंभ के अवसर पर उपस्थित नहीं हो सका था। संस्कृति मंत्रालय के मुताबिक गांधी परिवार को इस समारोह में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था। सोनिया गांधी परिवार का प्रधानमंत्री संग्रहालय को लेकर उदासीनता के कारण स्पष्ट नजर आते हैं। गांधी-नेहरू परिवार के दो प्रधानमंत्रियों की स्मृति में बड़े-बड़े संग्रहालय बनाए गए लेकिन अन्य प्रधानमंत्रियों को लेकर उपेक्षा भाव बना रहा। यह अकारण नहीं है कि मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, चंद्रशेखर, आई के गुजराल और अन्य प्रधानमंत्रियों की स्मृतियों को सहेजने और उनकी उपलब्धियों को प्रदर्शित करने का कोई संस्थागत प्रयास नहीं दिखाई देता है। जबकि इन सभी प्रधानमंत्रियों का किसी न किसी रूप में देश के विकास में योगदान रहा है। नरसिम्हा राव की याद में भी कोई संग्रहालय दिल्ली में हो, ऐसा ज्ञात तो नहीं है। जबकि नरसिम्हा राव ने प्रधानमंत्री के तौर पर देश के आर्थिक विकास को एक नई दिशा दी थी। प्रकांड विद्वान थे। कई भाषाओं के ज्ञाता थे। उनकी समृद्ध लाइब्रेरी भी थी। प्रधानमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल स्वाधीन भारत के इतिहास में कई अहम घटनाओं का गवाह रहा है। 

नरसिम्हाराव के निधन के बाद की घटनाओं को अगर याद किया जाए तो परिवार से बाहर के प्रधानमंत्रियों को लेकर उपेक्षा भाव का कारण साफ समझ आता है। 23 दिसंबर 2004 को नरसिम्हा राव का दिल्ली में निधन हुआ। उसके बाद क्या क्या घटा उसके बारे में विनय सीतापति ने अपनी पुस्तक ‘हाफ लायन, हाऊ पी वी नरसिम्हा राव ट्रासफार्म्ड इंडिया’ में लिखा है। नरसिम्हा राव का पार्थिव शरीर उनके मोतीलाल नेहरू वाले सरकारी घर में लाया गया तो उस समय के गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने  उनके पुत्र प्रभाकर को सलाह दी कि अंतिम संस्कार हैदराबाद में किया जाना चाहिए। प्रभाकर ने जब दिल्ली में अंतिम सस्कार की बात की तो शिवराज पाचिल ने बेहद रूखे अंदाज में उनसे कहा कि कोई आएगा नहीं। बाद में उस वक्त के आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी ने भी प्रभाकर को फोन करके हैदराबाद में राव के अंतिम संस्कार की बात की थी और इसके लिए उनको तैयार करने के लिए दिल्ली भी आए थे। ये प्रसंग यहीं खत्म नहीं हुआ था। उस शाम को सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और प्रणब मुखर्जी के साथ राव के अंतिम दर्शन के लिए पहुंची थीं। तब मनमोहन सिंह ने भी प्रभाकर राव से जानना चाहा था कि परिवार का राव के अंतिम संस्कार के बारे में क्या विचार है। प्रभाकर ने सोनिया गांधी की उपस्थिति में मनमोहन सिंह को दिल्ली में अपने पिता के अंतिम संस्कार करने की इच्छा जताई थी। बाद में अहमद पटेल ने भी परिवार को हैदराबाद में राव का अंतिम संस्कार करने के लिए के लिए राजी करने की कोशिश की थी। राव के परिवारवालों पर जब हैदराबाद के लिए दबाव बनने लगा तो उन्होंने दिल्ली में राव का एक भव्य स्मारक बनाने की शर्त रखी थी। राव का पार्थिव शरीर घर में रखा हुआ था और उनके अंतिम संस्कार को लेकर राजनीति हो रही थी। उसी रात को राव के परिवारवालों की तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात करवाई गई। शिवराज पाटिल ने राव के परिवार वालों की मौजूदगी में मनमोहन सिंह को दिल्ली में राव के स्मारक की बात बताई। मनमोहन सिंह ने सुनते ही स्वीकृति दे दी और परिवारवालों को भरोसा दिया कि राव का स्मारक दिल्ली में बनेगा उसमें कोई दिक्कत नहीं है। पूरे प्रकरण के दौरान प्रभाकर राव को महसूस हुआ था कि सोनिया गांधी राव का दिल्ली में अंतिम संस्कार नहीं होने देना चाहती थीं। वो दिल्ली में राव का स्मारक बनाने के पक्ष में भी नहीं थीं। इसका दबाव परिवार पर था। आखिरकार परिवार हैदराबाद में अंतिम संस्कार के लिए तैयार हो गया। लेकिन महत्वपूर्ण बात ये कि सोनिया गांधी दिल्ली में राव के स्मारक को लेकर अनिच्छुक बनी रहीं। राव के प्रति उपेक्षा भाव का असर रहा कि उनका कोई स्मारक दिल्ली में नहीं बन पाया।

यही अनिच्छा और उपेक्षा भाव दिल्ली में अन्य प्रधानमंत्रियों के संग्रहालय बनने की राह में बाधा हो सकती है। नरेन्द्र मोदी ने पार्टी और मत से ऊपर उठकर इस कार्य को किया। अब जब कि दिल्ली में सभी प्रधानमंत्रियों का संग्रहालय एक स्थान पर निर्मित हो गया है तो केंद्र सरकार को एक काम और करना चाहिए। दिल्ली में इंदिरा गांधी स्मृति और लालबहादुर शास्त्री स्मारक का भी प्रधानमंत्री संग्रहालय में विलय करने के बारे में गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। सभी लोगों से सलाह मशविरा करके इसको अंतिम रूप दिया जा सकता है। इंदिरा जी को जिस स्थान पर गोली मारी गई थी उसको एक स्वरूप दिया जा सकता है और उस भवन का अन्य उपयोग किया जा सकता है। बाबरी विध्वंस के बाद श्रीरामजन्मभूमि  पर जो लोग अस्पताल और स्कूल खोलने का तर्क दे रहे थे उनको भी इन भवनों के खाली होने से अच्छा लगेगा। संभव है कि वो स्कूल और अस्पताल वाला तर्क फिर से दोहरा दें। लेकिन अगर ऐसा हो पाता है तो इसके दो लाभ होगें। एक तो देश विदेश के पर्यटकों को इंदिरा जी और लालबहादुर शास्त्री से जुड़ी सभी जानकारियां एक जगह पर उपलब्ध होंगी और उनको एक स्थान पर देखने की सहूलियत भी होगी।  तीन मूर्ति भवन में जिस भव्यता के साथ संग्रहालय का निर्माण हुआ है उसमें तकनीक का बेहतरीन उपयोग हुआ है। एक कनमी खटकती है कि सभी प्रधानमंत्रियों से जुड़ी चीजें वहां उपलब्ध नहीं है। अगर इंदिरा स्मृति और शास्त्री स्मारक को वहां शिफ्ट कर दिया जाता है तो ये कमी भी पूरी हो सकती है। 

Saturday, February 12, 2022

वैचारिक दासता से मुक्ति की दरकार


गीतकार मजरुह सुल्तानपुरी को उनकी एक कविता के लिए जेल भेज दिया गया था। तब देश में कांग्रेस का शासन था और नेहरू जी प्रधानमंत्री थे। संविधान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान ये बातें कहीं। कुछ बुद्धिजीवियों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश कर करने का आरोप लगाया। नरेन्द्र मोदी को बेहतरीन गल्पकार तक बता दिया गया। विद्वान माने जानेवाले  कुछ स्तंभकारों ने प्रधानमंत्री को लेकर अनर्गल टिप्पणियां कीं। प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में दिए अपने वक्तव्य में लता मंगेशकर के भाई ह्रदयनाथ मंगेशकर को वीर सावरकर की कविता को लेकर आकाशवाणी से निकाले जाने का उदाहरण दिया। विवाद मजरुह सुल्तानपुरी पर कही उनकी बातों को लेकर आरंभ हुआ। आरोप लगानेवालों ने जो प्रसंग बताया उसके मुताबिक मजरुह वामपंथी थे। स्वाधीनता  को झूठी आजादी बताकर वामपंथियों ने उस समय की सरकार के खिलाफ आंदोलन और षडयंत्र रचा था, उसमें मजरुह की गिरफ्तारी की बात की गई।

तथ्यों को जान लेते हैं कि मजरुह की गिरफ्तारी किस वजह से हुई थी। आजादी के बाद वामपंथियों का सरकार के खिलाफ विद्रोह चल रहा था। अलग-अलग क्षेत्र में काम करनेवाले कम्युनिस्ट उस विद्रोह में शामिल हो रहे थे। हिंदी फिल्म जगत भी उससे अछूता नहीं रहा था। सिनेमा से जुड़े कुछ लेखक, गीतकार, निर्देशक और अभिनेता भी उस आंदोलन में हिस्सा ले रहे थे। मजरुह उनमें से एक थे। मजरुह जिस कवि गोष्ठी या मुशायरे में जाते थे तो एक कविता अवश्य पढ़ते थे। उस कविता की कुछ पंक्तियां थीं- ये भी है हिटलर का चेला/मार लो साथी जाने न पाए/कामनवेल्थ का दास है नेहरू/मार लो साथी जाने न पाए। इस कविता में नेहरू का नाम लेकर मजरुह ने हमला किया था और उनके पहनावे को खादी का केंचुल बताकर तंज किया था। मजरुह को मुंबई में गिरफ्तार कर लिया गया। कांग्रेस से जुड़े कई लोगों ने उनको सलाह दी कि नेहरू से माफी मांग लें तो रिहाई हो जाएगी। मजरुह ने माफी नहीं मांगी और उनको लंबा समय जेल में बिताना पड़ा। उसी समय प्रदर्शन करते समय अभिनेता बलराज साहनी भी गिरफ्तार हुए थे। कैफी आजमी गिरफ्तारी से बचने के लिए भूमिगत हो गए थे। कई फिल्मों के संवाद लेखक अख्तर उल ईमान को सरकार के खिलाफ षडयंत्र रचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। अख्तर उल ईमान मशहूर अभिनेता अमजद खान के श्वसुर थे। ये तथ्य है और इसका उल्लेख सरकारी अभिलेखों में मिलता है। उस दौर में लिखी पुस्तकों में भी। बहुत संभव है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में कविता पर जेल भेजे जाने की ये पहली घटना हो। तो जो विद्वान लेखक प्रधानमंत्री को संसद की मर्यादा भंग करने की नसीहत दे रहै हैं या उनके भाषण को अर्धसत्य बता रहे हैं उनको अपने लेखन पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।

कलाकारों के खिलाफ कार्रवाई सिर्फ नेहरू जी के जमाने में ही नहीं हुई। कालांतर में जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं तो उनके कार्यकाल में भी फिल्म से जुड़े लोगों को विरोध करने की सजा मिली। प्रख्यात अभिनेता देवानंद ने अपनी आत्मकथा ‘रोमांसिंग विद लाइफ’ में इमरजेंसी के दौर की एक घटना का उल्लेख किया है। देवानंद के मुताबिक इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी सातवें आसमान पर थीं। ‘गूंगी गुड़िया’ निरंकुश हो गई थीं और अपनी हनक स्थापित करने में लगी थी। संजय गांधी अपनी मां की वारिस के तौर पर खुद को स्थापित कर चुके थे। कांग्रेस ने उस समय दिल्ली में एक रैली की थी जिसमें देवानंद भी शामिल हुए थे। दिलीप कुमार भी। उन्होंने रैली के दौरान के अपने अनुभव के आधार पर लिखा कि संजय गांधी या कांग्रेस की प्रोपगंडा मशीनरी फासीवादी तरीके से काम कर रही थी। रैली के बाद देवानंद और दिलीप कुमार को कांग्रेस की तरफ से संदेश दिया गया कि दूरदर्शन केंद्र जाकर इमरजेंसी के समर्थन में बयान रिकार्ड करवाएं। दिलीप कुमार हिचक रहे थे लेकिन देवानंद ने साफ मना कर दिया कि वो इमरजेंसी के समर्थन में बयान नहीं देंगे। देवानंद ने लिखा है कि उनके मना करने के तुरंत बाद से दूरदर्शन पर उनकी फिल्मों के प्रदर्शन को बैन कर दिया गया। किसी भी सरकारी माध्यम में देवानंद के नाम लिखे जाने तक पर पाबंदी लगा दी गई। इसके पहले किशोर कुमार के साथ भी ऐसा किया जा चुका था क्योंकि उन्होंने गाने से मना कर दिया था।

इस घटना से व्यथित होकर देवानंद ने उस समनय के सूचना ओर प्रसारण मंत्री से भेंट की। मंत्री ने छूटते ही देवानंद से पूछा कि आपको दिक्कत क्या है? देवानंद ने उनको स्पष्ट किया कि वो दबाव में किसी तरह का बयान इमरजेंसी के समर्थन में नहीं दे सकते हैं। मुलाकात खत्म हो गई। कुछ दिनों बाद गांधी परिवार की करीबी अभिनेत्री नर्गिस से देवानंद की मुंबई में एक पार्टी में मुलाकात हुई। नर्गिस ने भी देवानंद से सरकार के समर्थन में बयान न देने की चर्चा की और कहा कि वो अनावश्क रूप से जिद पाले बैठे हैं। बात खत्म हो गई लेकिन जो एक पंक्ति देवानंद ने लिखी है उसका उल्लेख आवश्यक है। देवानंद के मुताबिक इस पूरे प्रकरण के बाद संजय गांधी के दरबारियों ने उनको चिन्हित कर लिया था। उस वक्त देवानंद की फिल्म देस परदेस बन रही थी और वो उसके भविष्य को लेकर चिंतित थे। देवानंद ने भले ही मना कर दिया लेकिन उस वक्त फिल्मों के अधिकांश कलाकार इंदिरा गांधी और इमरजेंसी के समर्थन में थे। इन दिनों एक वरिष्ठ अभिनेत्री लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र की बात जोर शोर से कर रही हैं, लेकिन उस वक्त आपातकाल का समर्थन किया था। इमरजेंसी में इंदिरा गांधी की सरपरस्ती में संजय गांधी के फासीवादी कदमों की चर्चा विनोद मेहता भी अपनी पुस्तक ‘द संजय स्टोरी’ में करते हैं। ये सूची बहुत लंबी है। स्वतंत्र भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करने की चार बेहद गंभीर कोशिशें हुईं जो नेहरू, इंदिरा, राजीव और मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुई। इस स्तंभ में एकाधिक बार इसकी चर्चा की जा चुकी है।

अब प्रश्न ये उठता है कि जब संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात उठाकर प्रधानमंत्री ने नेहरू के दौर को याद किया तो एक विचारधारा विशेष के पोषक स्तंभकारों ने उसपर सुनियोजित तरीके से प्रतक्रिया क्यों दी। अगर आप ध्यान से प्रधानमंत्री के भाषण को सुनेंगे तो उत्तर भी उसमें ही निहित है। उन्होंने अपने भाषण में एक ईको सिस्टम की बात की। भारतीय जनता पार्टी के विरोधी कहें या कांग्रेस के समर्थकों का वो ईको सिस्टम इस तरह का है कि उसमें वैकल्पिक विचारों के लिए जगह ही नहीं है। वो सिर्फ अपने सिद्धांतों को और अपने विचारों को ही दुनिया का श्रेष्ठ विचार मानते हैं। दूसरे विचारों का उपहास करना और उनसे इतर विचारों को हेय समझना और बताना उनकी योजना का हिस्सा है। इसी श्रेष्ठता ग्रंथि को लेकर चलनेवाले स्तंभकार और कथित इतिहासकार आजाद भारत में घटी घटनाओं का विश्लेषण करते समय वैचारिक दोष के शिकार हो जाते हैं। इस कारण उनके लेखन में समग्र दृष्टि का अभाव दिखाई देता है। इतिहास पर लिखनेवालों से ये अपेक्षा की जाती है कि वो वैचारिक रूप से निरपेक्ष रहकर और समग्र दृष्टि के साथ लेखन करेंगे। अफसोस कि हमारे देश में स्वाधीनता के बाद का इतिहास लेखन वैचारिक जकड़न से मुक्त नहीं हो पाया। यह अकारण नहीं है कि स्वाधीन भारत में घटनेवाली राजनीतिक घटनाओं पर लिखते समय भी वैचारिक दासता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। स्वाधीनता के अमृत काल में वैचारिक दासता से मुक्ति भी आवश्यक है।

 

Saturday, January 30, 2021

प्रासंगिकता साबित करने की युक्ति


गणतंत्र दिवस के पहले रविवार को दिल्ली के सिंघु बॉर्डर गया था, सोचा था कि किसानों के आंदोलन को नजदीक से देखूंगा और समझूंगा। दिनभर वहां बिताया और आंदोलन के अलावा जो एक चीज वहां रेखांकित की, उसका उल्लेख करना आवश्यक है। प्रदर्शन आदि समान्य तरीके से चल रहा था। लोग टेंट में और ट्रैक्टर ट्रालियों के नीचे बैठे थे। मुख्य मंच पर जाकर लोग अपनी बातें कह रहे थे। फिर प्रदर्शन स्थल पर घूमने लगा। पूरे प्रदर्शन स्थल पर लोग जत्थों में घूम रहे थे। कई जगहों पर नारेबाजी भी हो रही थी। यहीं पर एक बेहद दिलचस्प नजारा देखने को मिला। जहां समूह में नारेबाजी हो रही थी उस समूह के साथ चल रहे चार-पांच लोग फटाफट अपने हाथ में लिया लाल झंडा खोल कर इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाने लगते थे। इनमें से ही एक दो लोग गत्ते पर हस्तलिखित नारे भी लहराने लगते थे। ये लोग उस समूह के आगे एक जगह इस तरह से जमा हो जाते जैसे कि वो पूरा समूह इनके नेतृत्व में ही प्रदर्शन कर रहा है। जब ये लोग लाल झंडा खोलकर नारे लगा रहे होते थे, या पोस्टर लहरा रहे होते थे तो उनका एक साथी तस्वीरें ले रहा था। तस्वीरें इस तरह से ली जा रही थी कि लगे कि लाल झंडा में जिनकी आस्था है वो लोग किसानों के समर्थन में आए हैं और नारेबाजी कर रहे हैं। थोड़ी देर में नारेबाजी बंद हो जाती थी और फिर झंडा-पोस्टर समेट कर ये लोग आगे बढ़ जाते थे। सिंघु बॉर्डर पर ऐसा कई जगह पर दिखाई दिया था। जब घर वापस लौटा तो वैसे कई फोटो फेसबुक और अन्य इंटरनेट मीडिया माध्यमों पर दिखाई दिए थे जिसमें ये दावा किया गया था कि वामपंथ में आस्था रखनेवाले लोग किसानों के आंदोलन के साथ हैं। बात आई गई हो गई। लेकिन गणतंत्र दिवस के दिन जब लालकिला पर हंगामा चल रहा था और तिरंगा लहराने वाली जगह पर उपद्रवियों ने झंडा लगाना शुरू कर दिया था। उपद्रव के उन क्षणों में एक दृश्य दिखा था जिसमें लाल किला की प्राचीर पर लगी रेलिंग पर कई झंडे एक साथ बांधे जा रहे थे। न्यूज चैनलों पर इसका लाइव करवेज चल रहा था। अचानक दिखा कि एक व्यक्ति लाल झंडा लिए आया और झंडा लगानेवालों के साथ खड़ा हो गया। उसने अपने हाथ में लिया लाल झंडा रेलिंग में इस तरह से फंसाने की कोशिश की जिससे ये लगे कि लाल झंडा प्रमुखता से दिखे। इस दृश्य को देखकर मेरे दिमाग में अचानक से सिंघु बॉर्डर के प्रदर्शऩ के दौरान लाल झंडा लहराने और उसकी फोटो खींचते वामपंथियों का दृश्य कौंध गया। 

उपरोक्त दोनों दृश्यों का विश्लेषण करें तो एक बात उभर कर आती है कि न्यून संख्या होने के बावजूद वामपंथी सिंघु बॉर्डर पर भी और लालकिला पर भी अपनी अपनी प्रासंगिकता और उपस्थिति दिखाने में लगे थे। लालकिला पर तो उपद्रव इतना बढ़ गया कि वहां लगाया गए लाल झंडे के फोटो को इंटरनेट मीडिया पर दिखाने की हिम्मत वामपंथियों को नहीं हुई। अगर किसी ने लगाया हो तो मुझे दिखा नहीं। दरअसल वामपंथियों की ये युक्ति बहुत पुरानी है। वो दूसरों के कंधे पर चढ़कर ना केवल अपनी उपयोगिता और उपस्थिति सिद्ध करने का उपक्रम करते हैं बल्कि राजनीति और सामाजिक लाभ भी लेते हैं। इसका एक लंबा इतिहास रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी वामपंथियों की ये परजीविता देखने को मिली थी। यह अकारण नहीं था कि डॉ बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने 12 दिसंबर 1945 को नागपुर के अपने भाषण में देश की जनता को वामपंथियों के मंसूबों को लेकर आगाह किया था। बाबा साहेब ने तब कहा था कि ‘मैं आप लोगों को आगाह करना चाहता हूं कि आप कम्युनिस्टों से बच कर रहिए क्योंकि अपने पिछले कुछ सालों के कार्य से वे कामगारों का नुकसान कर रहे हैं, क्योंकि वे उनके दुश्मन हैं, इस बात का मुझे पूरा यकीन हो गया है...हिन्दुस्तान के कम्युनिस्टों की अपनी कोई नीति नहीं है उन्हें सारी चेतना रूस से मिलती है।‘ बाबा साहेब के शब्दों पर गौर करने से स्थिति और साफ हो जाती है। उन्होंने कहा कि भारत के कम्युनिस्टों की अपनी कोई नीति नहीं है। तब साफ तौर पर वो उनकी परजीविता को रेखांकित कर रहे थे। दूसरी बात उन्होंने ये कही कि वो कामगारों का नुकसान कर रहे हैं। उनकी दूरदर्शिता ने उस वक्त ही कम्युनिस्टों को पहचान लिया था और बेहद स्पष्ट तरीके से साफ शब्दों में देश को आगाह किया था।

स्वतंत्रता के बाद के राजनीतिक इतिहास को देखें तो कई मौकों पर वामपंथियों की ये परजीविता और उससे लाभ उठाने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी के अधिकानयकवाद का समर्थन करके अपने को मजबूत करने की कोशिश दिखाई देती है। ऐसा इसलिए क्योंकि इमरजेंसी के समर्थन के एवज में वामपंथियों ने इंदिरा सरकार से कला और संस्कृति की ठेकेदारी हासिल की थी। ये उसी इंदिरा गांधी को समर्थन था जिन्होंने 1959 में केरल की पहली चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार को अपदस्थ करने में केंद्रीय भूमिका निभाई थी। ऑस्ट्रेलिया के ल ट्रॉब युनिवर्सिटी से संबद्ध रॉबिन जेफ्री ने एक बेहद मशहूर लेख लिखा था, ‘जवाहरलाल नेहरू एंड द स्मोकिंग गन, हू पुल्ड द ट्रिगर ऑन केरला’ज कम्युनिस्ट गवर्मनमेंट इन 1959’ । इस लेख में उन्होंने नेहरू और इंदिरा गांधी की कम्युनिस्टों को लेकर सोच और सरकार बर्खास्त करने के कारणों का विश्लेषण किया था। जेफ्री ने स्पष्ट रूप से इस बात को रेखांकित किया था कि नेहरू उस समय कम्युनिस्टों की जीत को पचा नहीं पा रहे थे। इंदिरा अपना स्थान बनाने के लिए संघर्ष कर रही थी। कम्युनिस्ट सरकार की बर्खास्तगी से दोनों के मंसूबे पूरे हुए थे। इन बातों को जानते समझते हुए भी वामपंथियों ने कालांतर में कई मौकों पर लाभ उठाने के लिए या राजनीतिक हित साधने के लिए कांग्रेस के साथ समझौता किया या उनके अधीन काम करना स्वीकार किया। अभी वामपंथी विचारों वाले कई लोग राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ काम करे हैं।  हाल ही में संपन्न हुए बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान और पश्चिम बंगाल के आगामी चुनाव को लेकर कांग्रेस और वामपंथियों में समझौता हुआ है। विचारधारा की बात करनेवाले वामपंथी दरअसल अवसर को ही विचार के तौर पर देखते और मानते रहे हैं। 

हमेशा से कम्युनिस्ट अपनी विचारधारा की आड़ में सिर्फ और सिर्फ सत्ता या लाभ लेने की कोशिश करते रहे हैं। यह अनायास नहीं है कि वो प्रोलेतेरियत तानाशाही की बात भी करते हैं और समाज या देश के पूंजीवाद से साम्यवादी व्यवस्था की ओर जाने के बीच इस तानाशाही व्यवस्था को जरूरी मानते हैं। जो इनकी इस सोच के हिसाब से नहीं चलता है उसके खिलाफ ये तमाम तरह की अनर्गल बातें करके, माहौल बनाकर दबाव में लेने की कोशिश करते हैं। ये प्रविधि भी पुरानी है। यहां इस बात का उल्लेख इस धारणा को पुष्ट करेगा कि लेनिन ने तो एक बारगी जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी के सिद्धांतों को इंफैंटाइल डिसऑर्डर (शिशु विकार) का शिकार तक कह डाला था। इस तरह के जुमले भारत में सुनने को मिलते रहते हैं। कभी असहिष्णुता का नारा गढ़ा जाता है तो कभी फासीवाद की आहट सुनने लगते हैं और कभी पुरस्कार वापसी की युक्ति अपनाई जाती है। वामपंथी विचारधारा के अनुयायी ये समझ नहीं पा रहे हैं कि लाभ हासिल करने के लिए दबाव बनाने की उनकी ये तरकीबें अब पुरानी हो गई हैं और देश की जनता इसको समझ भी गई हैं। कहते हैं न कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती तो इस कहावत को वामपंथियों को समझ लेना चाहिए।   


Wednesday, January 22, 2020

कविता पर नेहरू की चिंता


गणतंत्र दिवस पर लाल किला में कवि सम्मेलन की परंपरा बहुत पुरानी रही है, एक जमाने में इस कवि सम्मेलन की दिल्ली के साहित्यप्रमियों को प्रतीक्षा रहती थी और वहां श्रोताओं की संख्या काफी होती थी। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी इस कवि सम्मेलन में वहां जाया करते हैं। रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी पुस्तक लोकदेव नेहरू में कई जगह पर जवारलाल नेहरू के लाल किला पर होने वाले कवि सम्मेलन में जाने की बात लिखी है। कई दिलचस्प प्रसंग भी लिखे हैं। एक जगह दिनकर ने 1950 में लालकिले पर आयोजित कवि सम्मेलन के बारे में लिखा है, ‘लाल किले का कवि सम्मेलन 26 जनवरी को हुआ था या 25 जनवरी को, यह बात मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है। किन्तु उस सम्मेलन में पंडित जी भी आए थे और शायद, उन्हीं की मौजूदगी को देखकर मैंने ‘जनता और जवाहर’ कविता उस दिन पढ़ी थी। श्रोताओं ने खूब तालियां बजाईं, मगर पंडित जी को कविता पसंद आई या नहीं, उऩके चेहरे से इसका कोई सबूत नहीं मिला। पंडित जी कवियों का बहुत आदर करते थे, किन्तु कविताओं से वे बहुत उद्वेलित कभी भी नहीं होते थे। संसत्सदस्य होने के बाद मैं बहुत शीघ्र पंडित जी के करीब हो गया था। उनकी आंखों से मुझे बराबर प्रेम और प्रोत्साहन प्राप्त होता था और मेरा ख्याल है, वे मुझे कुछ थोड़ा चाहने भी लगे थे। मित्रवर फीरोज गांधी मुझे मजाक में महाकवि कहकर पुकारा करते थे। संभव है, पंडित जी ने कभी यह बात सुन ली हो, क्योंकि दो एकबार उन्होंने भी मुझे इसी नाम से पुकारा था। किन्तु आओ महाकवि कोई कविता सुनाओ ऐसा उनके मुख से सुनने का सौभाग्य कभी नहीं मिला।‘
दिनकर ने कवियों को लेकर जवाहरलाल के मन में चलनेवाले द्वंद को भी प्रसंगों के माध्यम से उजागर किया है। दिनकर के मुताबिक पंडित जी उन दिनों लिखी जा रही कविताओं को लेकर बहुत उत्साहित नहीं रहते थे और कई बार अपनी ये अपेक्षा जाहिर कर चुके थे कि हिंदी के कवियों को कोई ऐसा गीत लिखना चाहिए जिसका सामूहिक पाठ हो सके। एक कवि सम्मेलन में जवाहर लाल जी पहुंच तो गए लेकिन खिन्न हो गए। दिनकर के मुताबिक ‘सन् 1958 ई. में लालकिले में जो कवि सम्मेलन हुआ उसका अध्यक्ष मैं ही था और मुझे ही लोग पंडित जी को आमंत्रित करने को उनके घर लिवा ले गए थे। पंडित जी आधे घंटे के लिए कवि सम्मेलन में आए तो जरूर मगर खुश नहीं रहे। एक बार तो धीमी आवाज में बुदबुदाकर उन्होंने यह भी कह दिया कि ‘यही सब सुनने के लिए बुला लाए थे?’
जवाहर लाल नेहरू कवियों की सामाजिक भूमिका को लेकर भी अपनी चिंता यदा कदा प्रकट कर दिया करते थे। चाहे वो कोई गोष्ठी हो या कवि सम्मेलन नेहरू अपनी बात कहने से चूकते नहीं थे। दिनकर ने भी लोकदेव नेहरू में एक प्रसंग में इसका उल्लेख किया है, ‘एक बार लालकिले के गणतंत्रीय कवि-सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए उन्होंने यह बात भी कही थी कि कवियों का जनता के समीप जाना अच्छा काम है। मगर कवि सम्मेलनों में वो कितनी बार जाएं और कितनी बार नहीं जाएं, यह प्रश्न भी विचारणीय है।‘ दरअसल नेहरू ती चिंता यह भी थी कि कवि जब अधिक कवि सम्मेलनों में शामिल होने लगता है तो वो फिर रचनात्मकता या उसकी स्तरीयता का ध्यान नहीं रख पाता है और वो उस तरह की कविता लिखने लग जाता है तो तालियां बटोर सके। 1950-60 में कविता को लेकर नेहरू की जो चिंता थी क्या आज वो चिंता दूर हो पाई है, हिंदी साहित्य जगत को विचार करना चाहिए।