Translate

Showing posts with label बरसात. Show all posts
Showing posts with label बरसात. Show all posts

Sunday, December 8, 2024

मेरा नाम राजू...


दस ग्यारह वर्ष का एक बालक बाग में एयर गन से खेल रहा था। पेड़ पर चिड़ियां चहचहा रही थीं। अचानक बालक ने एयर गन से चिड़ियों की झुंड पर फायर कर दिया। एक बुलबुल पेड़ से नीचे गिरी। उसकी मौत हो चुकी थी। बालक ने उसको प्यार से उठाया। बाग में ही गड्ढा खोदकर बुलबुल को उसमें डालकर मिट्टी से ढंक दिया। फिर कुछ फूल लाकर उसने उस जगह पर रखा। बुलबुल को श्रद्धांजलि दी। साथ खेल रहे भाई बहनों से भी फूल डलवाया। बाद में इस कहानी को उसने बेहद संवेदनशील तरीके से अपने परिवारवालों को सुनाया। मधु जैन ने अपनी पुस्तक में इस घटना का रोचक वर्णन करते हुए लिखा है कि वो बालक मास्टर स्टोरीटेलर राज कपूर था। कहना ना होगा कि राज कपूर में बचपन से ही कहानी कहने का ना केवल शऊर था बल्कि उसमें समय के अनुरूप रोचकता का पुट मिलाने का हुनर भी। वो कहानियों में संवेदना को उभारते थे। राज कपूर ने अपने लंबे फिल्मी करियर में एक अभिनेता और निर्देशक के रूप में उस सपने को पर्दे पर उतारा जो कि भारतीय मध्यमवर्ग लगातार देख रहा था। अपने आंरंभिक दिनों में राज कपूर ने फिल्मों का व्याकरण और निर्माण कला की बारीकियों को सीखने के लिए इससे जुड़े प्रत्येक विभाग में कार्य किया। किशोरावस्था से ही वो सुंदर लड़कियों और महिलाओं के प्रति आकर्षित रहने लगे थे। कलकत्ता (तब कोलकाता) के अपने घर में उन्होंने जब बलराज साहनी की खूबसूरत पत्नी को देखा तो आसक्त हो गए थे। जब उनको केदार शर्मा ने फिल्म का आफर दिया तो उन्होंने बहुत संकोच के साथ उनके कान में फुसफुसफाते हुए कहा था कि प्लीज अंकल प्लीज मेरे साथ हीरोइन के तौर पर बेबी मुमताज तो रख लेना, वो बेहद खूबसूरत है। बेबी मुमताज को मधुबाला के नाम से जाना गया।

स्वाधीनता के पहले राज कपूर ने ‘आग’ फिल्म बनाने की सोची जो आजादी के बाद प्रदर्शित हुई। इस फिल्म में राज कपूर ने स्वाधीन भारत के युवा मन को पकड़ने का प्रयास किया। इस फिल्म को सफलता नहीं मिली। इसके बाद राज कपूर ने ‘बरसात’ बनाई। इस फिल्म से राज कपूर पर धन और प्रसिद्धि दोनों की बरसात हुई। यहीं से राज ने एक टीम बनाई जिसने साथ मिलकर हिंदी फिल्मों में सार्थक हस्तक्षेप किया। नर्गिस, गीतकार शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी, गायक मुकेश और लता मंगेशकर, संगीतकार शंकर जयकिशन, कैमरापर्सन राधू करमाकर और कला निर्देशक एम आर आचरेकर की टीम ने राज कपूर के साथ मिलकर हिंदी फिल्मों को एक ऐसी ऊंचाई प्रदान की जिसको छूने का प्रयत्न अब भी हो रहा है। फिल्म बरसात के बाद राज कपूर ने आर के स्टूडियोज की स्थापना की। यहीं अपनी फिल्म आवारा बनाई। ये फिल्म भारतीय गणतंत्र की मासूमियत को सामने लाती है। राज कपूर ने कहा भी था कि ये भारत के गरीब युवाओं के निश्छल प्रेम की कहानी है। इस फिल्म ने राज कपूर को वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय बनाया। आलोचकों ने तब इस फिल्म को साम्यवादी दृष्टि की प्रतिनिधि फिल्म बताने की चेष्टा की थी लेकिन राज कपूर किसी वाद की चौहद्दी में नहीं घिरे थे। फिल्म आवारा से लेकर राम तेरी गंगा मैली पर विचार करने के बाद ये लगता है कि राज कपूर प्रेम के ऐसे कवि थे जिनकी कविता फिल्मी पर्दे पर साकार होती रही। प्रेम पगे दृश्यों के बीच वो भारतीय समाज की विसंगतियों पर प्रहार भी करते चलते हैं। वो कहते थे कि मेरा पहला काम मनोरंजन करना है। ऐसा करते हुए अगर समाज को कोई संदेश जाता है तो अच्छी बात है। राज कपूर के बारे में उनके भाई शशि कपूर ने कहा था कि वो घोर परंपरावादी हिंदू हैं। 

राज कपूर ने अपनी फिल्मों में रोमांस का एक ऐसा स्वरूप पेश किया जो मिजाज में तो पश्चिमी था लेकिन उसमें भारतीयता के तत्व भी भरे हुए थे। उन्होंने एक ऐसी शैली विकसित की जिसमें पश्चिम की छाप थी लेकिन वातावरण और सामाजिक प्रतिरोध भारतीय था। आवारा में नर्गिस एक समय में दो पुरुषों से प्यार करती है। एक ऐसी नारी जो सोच और परिधान से पश्चिम से प्रभावित है लेकिन भारतीय वातावरण में रह रही है। इसका नायक भी समाज के तमाम बंधनों से मुक्त है। राज कपूर ने कैमरे की आंख से बाहर निकलकर एक ऐसे वातावरण का निर्माण किया जो दर्शकों को झटके भी दे रहा था लेकिन पसंद भी आ रहा था। ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों के दौर में राज कपूर ने लाइटिंग से दृष्यों को जीवंत किया। रंगीन फिल्मों का दौर आया तो राज कपूर ने इंद्रधनुषी रंगों का बेहतरनी उपयोग करके दर्शकों को बांधने में सफलता प्राप्त की। इसके बाद की फिल्मों में भी राज कपूर भारतीय जीवन के यथार्थ से टकराते रहे। नर्गिस से उनका रोमांस चरम पर था। देश विदेश में उनके साथ के दौरे चर्चा में रहते थे। 

राज कपूर की जिंदगी और उनकी फिल्मों का रास्ता बदलता है 1960 में। जब वो पद्मिनी को लेकर जिस देश में गंगा बहती है बनाते हैं। यहां से राज कपूर की फिल्मों में नारी देह पर कैमरा फोकस करने लगता है जो राम तेरी गंगा मैली तक निरंतर बढ़ता चला गया। इस बात पर बहस हो सकती है कि राज कपूर की फिल्मों में नारी देह का चित्रण जुगुप्साजनक होता है या सौंदर्य को उद्घाटित करने वाला। 1964 में राज कपूर की फिल्म आती है संगम। इस फिल्म से राज कपूर पूरी तरह से व्यावसायिक राह पर चल पड़े। लेकिन कलाकार मन फिर से दर्शन की ओर लौटने को बेताब था। 1970 में आई फिल्म मेरा नाम जोकर। फिल्म बिल्कुल नहीं चली। राज कपूर पर इस असफलता का गहरा प्रभाव पड़ा। यही वो दौर था जब उनके पिता का अमेरिका में इलाज चल रहा था। राज कपूर डिप्रेशन में तो गए लेकिन टूटे नहीं। पांच वर्ष बाद जब उनकी फिल्म बाबी आई तो उसने सफलता के कई कीर्तिमान स्थापित किए। हिंदी फिल्मों में रोमांस का रास्ता भी बदल दिया। बाबी के बाद की बनी कई फिल्मों में स्वाधीनता के बाद जन्मी पीढ़ी के किशोर और अल्हड़ प्रेम का प्लाट भी अन्य निर्माता निर्देशकों के हाथ लग गया। नारी देह पर घूमने वाला राज कपूर का कैमरा सत्यम शिवम सुंदरम में जीनत अमान की देह के विभिन्न कोणों पर पहुंचता है लेकिन फिल्म को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। नारी देह दिखाने का राज कपूर का फार्मूला हर फिल्म में नहीं चला। संगम में वैजयंती माला के अंग प्रदर्शन को दर्शकों ने पसंद किया लेकिन जब मेरा नाम जोकर में सिमी ग्रेवाल की नग्न टांगों को और सत्यम शिवम सुंदरम में जीनत के उत्तेजक दृष्यों को नकारा। फिर राम तेरी गंगा मैली में मंदाकिनी के देह दर्शन ने फिल्म को सफलता दिलाई। 1982 में जब राज ने प्रेम रोग बनाया तो इस फिल्म में सामतंवादी रूड़ियों पर प्रहार तो था लेकिन एक सुंदर प्रेम कहानी भी गढ़ी गई थी।

यहां ये भी ध्यान रखना चाहिए कि राज कपूर ने अपनी और अपने फिल्मों की अलग जगह उस समय बनाई जब महबूब खान और के आसिफ जैसे फिल्मकार फिल्में बना रहे थे। देवानंद, दिलीप कुमार और जुबली कुमार राजेन्द्र कुमार निरंतर सफल हो रहे थे। समाजिक यथार्थ और रोमांस का ऐसा मिश्रण राज कपूर ने तैयार किया जिसमें गीत-संगीत से ऐसी मिठास घोली कि दर्शक चार दशकों तक उसके प्रभाव में रहा। राज कपूर की जन्मशती का उत्सव ग्रेट शौ मैन का स्मरण पर्व भी है। 


Saturday, April 4, 2020

हिंदी फिल्मों से गायब होते गांव!

जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोरोना संकट से निबटने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की तो उसके दो दिन बाद ही लोग अपने अपने घर या यों कहें कि अपने अपने गांव जाने के लिए निकल पड़े। हर कोई संकट के इस समय अपने अपने स्थान पर लौट जाना चाहता था। बड़ी संख्या में लोगों के दिल्ली और अन्य जगहों से अपने अपने गांवों की ओर लौटने को विद्वान पत्रकार साथियों ने पलायन तक कह दिया। लेकिन समाजशास्त्रियों के मुताबिक इसको पूरी तरह से पलायन कहना उचित नहीं था। ये पलायन नहीं था ये तो सुरक्षा के लिए, अपने काम के लिए, सरकारी मदद पाने की आस में, संकट के वक्त अपनों या अपने परिवार के साथ रहने की इच्छापूर्ति के लिए अस्थायी तौर पर अपने गांव या अपने घऱ लौट जाने की चाहत थी। अपने घर की ओर लौटनेवाले इन लोगों में बड़ी संख्या में गांव जाने वाले थे। मुख्य रूप से इसमें गांवों में रहनेवाले वो लोग थे जो रोजगार, बेहतर शिक्षा और बेहतर आय के लिए शहरों में आकर रहते हैं। लोगों के अपने गांव लौटने के दौर में गांव एक बार फिर से वापस चर्चा में आ गया। उस घटना के दौरान जब गांव वापस जाने की खूब चर्चा होने लगी थी जब जेहन में एक विचार कौंधा था कि क्या हिंदी फिल्में भी गांव की ओर लौटेंगी? 
हिंदी फिल्मों के इतिहास पर विचार करें तो पातें हैं कि एक लंबे कालखंड में गांव और उसकी कहानी हिंदी फिल्मों का विषय हुआ करती थी। आजादी के पहले भी और आजादी के बाद भी हिंदी फिल्मों में गांवों की कहानियों प्रमुखता से चित्रित होती थीं। अगर हम राजकपूर की फिल्म ‘बरसात’ को याद करें तो इसकी कहानी भी गांव की पृष्ठभूमि पर है जिसमें फिल्म का नायक शहर से गांव जाता है वहां उसको एक लड़की से प्यार हो जाता है। इसी तरह से फिल्म का विलेन लड़कियों की तलाश में गांव जाता है। इस फिल्म में राज कपूर ने उस दौर के गांव और वहां रहनेवाले लोगों की मानसिकता के बेहतर चित्रण किया है। फिल्म ‘बरसात’ एक लव स्टोरी तो है लेकिन इसमें प्यार की कहानी के साथ-साथ गांव के परिवेश को भी सामने लाया गया है। गांव के लोगों का संघर्ष, उनकी दिक्कतें, उस दौर में डॉक्टरों की कमी और शहर से आए लोगों पर भरोसा कर लेने की प्रवृत्ति को रेखांकित किया गया था। इसके बाद भी कई फिल्में बनीं। 1957 में नर्गिस की फिल्म ‘मदर इंडिया’ आई जिसकी बहुत तारीफ हुई। ये फिल्म तो भारत के गांवों की प्रतिनिधि तस्वीर के तौर पर स्थापित हुई। इसमें गांव, किसान, फसल, गरीबी, महाजनी व्यवस्था के बीच गांव के युवाओं में आदर्श की राह पर चलनेवाली बाधाओं को भी चित्रित किया गया है। इस फिल्म में नर्गिस के अभिनय ने इसको एक ऐसी ऊंचाई प्रदान जिसको छूने की हसरत हर अभिनेत्री की अब भी होती है। इसके बाद भी कई फिल्में आईं जिसके केंद्र में गांव रहा है। रोमांटिक फिल्मों से लेकर एंग्री यंग मैन के दौर में भी फिल्मों में गांव और उसकी पृष्ठभूमि बनी रही और दर्शकों ने इसको पसंद भी किया। 
इसके बाद आता है वर्ष 1998 जब फिल्म के एक नए निर्देशक का आगमन होता है जिसका नाम है करण जौहर। 1998 के अक्तूबर में इस निर्देशक की एक फिल्म रिलीज होती है जिसका नाम है ‘कुछ कुछ होता है’। करण जौहर की इस फिल्म में काजोल और शाहरुख खान की जोड़ी को दर्शकों ने खूब पसंद किया। फिल्म जबरदस्त हिट रही। इस फिल्म की सफलता के साथ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी फिल्में बनने लगीं जिसमें गांव की गोरी की जगह शहर की स्कर्ट वाली लड़की ने ले ली। दुष्ट जमींदार और उससे चुहल करनेवाली महिला की जगह शहरी डॉन टाइप गुंडे और उसकी वैंप टाइप महिला मित्र ने ले ली। गांव के भोले-भाले नायक की जगह शहरी जींस-टीशर्ट वाले लड़के ने ले ली। नायिका भी वेशभूषा में मॉडर्न हो गईं। ‘कुछ कुछ होता है’ के थोड़े समय पहले ही अनिल कपूर और पूजा बत्रा की फिल्म ‘विरासत’ और प्रकाश झा निर्देशित फिल्म ‘मृत्युदंड’ आई थी। इन दोनों फिल्मों में गांव को प्रमुखता से दिखाया गया था लेकिन अगर आप फिल्म ‘विरासत’ को याद करें तो इसका नायक शहर से आता है उसकी गर्लफ्रेंड भी शहरी होती है। तो इस फिल्म में गांव तो है लेकिन शहर भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता है। ये ठीक वैसे ही है जैसे फिल्म ‘बरसात’ में भी नायिका गांव की होती है और नायक शहर से आता है, वो वायलिन बजाता है, वो क्लब में जाता है, डांस करता है लेकिन नायिका गांव की लड़कियों की तरह इन सबसे दूर रहती है।  
करण जौहर की फिल्म ‘कुछ कुछ होता है’ के बाद हिंदी फिल्मों का पात्र और परिवेश पूरी तरह से शहरी होने लगे। फिल्म के लोकेशन को लेकर निर्देशकों ने विदेशों की ओर रुख करना शुरू किया। लोकेशन की चमक दमक, बेहतरीन तकनीक, नायक नायिका के चमकते हुए आधुनिक परिधान ने हिंदी फिल्मों के चरित्र में बुनियादी परिवर्तन कर दिया। करण जौहर की फिल्म के ठीक पहले एक और फिल्म आई थी जिसको यश चोपड़ा ने निर्देशित किया था जिसका नाम था ‘दिल तो पागल है’। ये फिल्म भी जबरदस्त हिट रही थी। इसमें शाहरुख खान, माधुरी दीक्षित और करिश्मा कपूर के बीच के प्रेम त्रिकोण को यश चोपड़ा ने बहुत शानदार तरीके से पेश किया है। इस फिल्म ने हिंदी फिल्मों के शहरीकरण की बुनियाद रखी जिसपर ‘कुछ कुछ होता है’ की सफलता ने एक मजबूत इमारत खड़ी कर दी। लगभग इसी कालखंड में कई फिल्में आईं जो दर्शकों को काफी पसंद आईं और वो अपने बिल्कुल शहरी थीं। फिल्मों में शहरी चमकक दमक को देखकर और गांवों के नेपथ्य में जानेपर मशहूर फिल्म निर्देशक गोविंद निहलाणी ने कहा था कि ‘गांव को हमारी कल्पना के आखिऱी छोर पर धकेल दिया गया, ग्रामीण परिवेश का चित्रण अपनी जड़ों की स्वीकारोक्ति भर है, सारा जोर चमक दमक पर है।‘ 
अगर हम देखें तो 1997-98 के बाद जिस तरह से दर्शकों ने शहरी पृष्ठभूमि की फिल्मों को पसंद करना शुरू कर दिया है वो दर्शकों की रुचि में एक बुनियादी बदलाव की ओर संकेत कर रहा था। एक के बाद एक धड़ाधड़ शहरी परिवेश पर बननेवाली फिल्मों की सफलता में सिंगल थिएटर का बंद होते जाना और शहरों में मल्टीप्लैक्स संस्कृति का विकास होना भी महत्वपूर्ण कारक रहा। हमारे देश के छोटे शहरों से, कस्बों से सिंगल थिएटर क्यों बंद होते चले गए ये गहन शोध का विषय है। एक जमाना था जब फिल्मों का अर्थशास्त्र बहुत हद तक इन एकल थिएटर पर निर्भर करता था। उस वक्त की ट्रेड पत्रिकाओँ को देखने पर ये पता चलता है कि किसी भी सफल फिल्मों में मुनाफा का चालीस से लेकर पैंतालीस प्रतिशत तक इन एकल सिनेमा हॉल से आता था। तब कहा भी जाता था कि हिंदी फिल्मों की सफलता ड्रेस सर्किल और बॉलकनी के दर्शकों की पसंद पर निर्भर करता है। ड्रेस सर्किल और बॉलकनी एकल थिएटर में उच्च टिकट दर वाली जगह होती थी जहां कस्बों और छोटे शहरों के उच्च आयवर्ग के लोग फिल्में देखते थे। जैसे-जैसे फिल्मों की प्रस्तुतिकरण का अंदाज शहरी होता गया तो ये शब्दावली भी बदलती चली गई। अब इसपर बात होने लगी कि अमुक फिल्म को मल्टीप्लैक्स के दर्शक पसंद करेंगे या नहीं। किसी फिल्म को कितने स्क्रीन मिले। मल्टीप्लैक्स के टिकटों की बिक्री ही किसी फिल्म को सफल और असफल करवाने लगे। फिल्मों के इस शहरी दौर में भी ग्रामीण पृष्ठभूमि पर कुछ फिल्में बनीं जैसे 2001 में आमिर खान अभिनीत फिल्म ‘लगान’ बनीं और वो जबरदस्त हिट रहीं। लेकिन आमिर अभिनीत फिल्म ‘मेला’ को उस तरह की सफलता नहीं मिली। 
आज जब पूरी दुनिया में अपनी परंपराओं और अपनी जड़ों की ओर जाने की बात होती है, नैरेटिव और विमर्श के केंद्र में परंपरा और पूर्व की स्थापनाएं होती हैं। ऐसे समय में हिंदी फिल्मों का शहरी होते चले जाना एक समाजशास्त्रीय अध्ययन की मांग भी करता है। अर्थशास्त्र तो साफ है कि वो अपने लक्षित दर्शक वर्ग को लेकर फिल्में बना रहा है। लेकिन ये जानना भी दिलचस्प होगा कि जब शहरों में रहनेवाले अधिकतर लोग गांवों से आ रहे हैं और वो फिल्में भी देख रहे हैं तो ऐसे में गांव की कहानियां उनको अधिक नॉस्टेल्जिक नहीं लगेंगी? 

Sunday, October 20, 2019

नर्गिस की वादा खिलाफी से बने डांसर


हिंदी फिल्मों की चर्चा में राजेश खन्ना की सफलता की चर्चा आ ही जाती है और इस बात को रेखांकित किया जाता है कि उनकी लगातार सत्रह फिल्में सुपरहिट रहीं। लेकिन इस बात की चर्चा कम या नहीं के बराबर होती है कि एक सितारा ऐसा भी था जिसने एक के बाद एक अठारह फ्लॉप फिल्में दीं। पांच साल में अठारह फ्लॉप फिल्मों के बावजूद वो फिर से उठ खड़ा हुआ और उसके बाद हिट फिल्मों की झड़ी लगा दी। इस अभिनेता का नाम है शम्मी कपूर। दरअसल शम्मी कपूर जब फिल्मों में आए तब दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद अपने करियर के शिखर पर थे। इस त्रिमूर्ति के दबदबे और अपनी लगातार असफलताओं के बोझ तले दबे शम्मी कपूर को नासिर हुसैन ने अपनी फिल्म ‘तुमसा नहीं देखा’ में लिया। यहां भी नासिर हुसैन ने एक प्रयोग किया था और असफल फिल्मों के हीरो के तौर पर जाने जानेवाले शम्मी कपूर के साथ उन्होंने एकदम नई हिरोइन अमीता को लिया था। नासिर हुसैन इस बात तो भांप चुके थे कि स्थापित नायिकाओं के साथ शम्मी को दर्शक पसंद नहीं कर रहे थे क्योंकि शम्मी की अठारहल असफल फिल्मों की नायिकाओं में मीना कुमारी, मधुबाला, नूतन और सुरैया रह चुकी थीं। ये प्रयोग सफल रहा और ‘तुमसा नहीं देखा’ जबरदस्त हिट रहा। इसके बाद अगली फिल्म ‘दिल देके देखो’ ने तो सफलता के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए थे।
शम्मी कपूर का जीवन शुरू से ही ट्रैजिक भी रहा और दिलचस्प भी। जब वो मां की कोख में पल रहे थे तो पंद्रह दिनों के अंतराल पर उनके दो भाइयों बिंदी और देवी की मौत हो गई थी। पूरा परिवार टूट गया था। दो बच्चों की मौत से टूट चुकी महिला की गोद में समय से पहले पैदा हुआ बेहद कमजोर बच्चा आया, परिवार में कम ही लोगों को उसके बचने की उम्मीद थी। शम्मी कपूर का शैशवस्था इस माहौल में बीत रहा था। घर में लोग शम्मी को छोटा चूहा बुलाते थे। जब को किसी तरह से चौदह साल के हुए तो एक बार उनकी भाभी कृष्णा उनको अपने मायके रीवां लेकर गईं। वहां शम्मी कपूर का स्वास्थ्य काफी सुधरा और शम्मी ने एक इंटरव्यू में कहा भी था कि रीवां में तैराकी करने से उनके स्वास्थ्य में सुधार के साथ शारीरिक विकास भी हुआ। शम्मी कपूर जब रीवां से मुंबई लौटे तो बदले हुए थे। उनकी शरारतें भी बढ़ती जा रही थीं। स्कूल के बाद कॉलेज पहुंचे लेकिन वहां मन नहीं लगा। शैतानियां बढ़ते देख उनके पिता पृथ्वीराज कपूर ने उनको सत्रह साल की उम्र में 1948 में पृथ्वी थिएटर में पचास रुपए महीने की मौकरी पर रख लिया। यहीं से उनका हिंदी फिल्मों में जाने का रास्ता खुला था।
ये बहुत कम लोगों को पता है कि शम्मी कपूर को शिकार का बहुत शौक था। 1946 में उनकी मुलाकात जोधपुर की महारानी से हुई। महारानी अपने दो बेटों के साथ पृथ्वी थिएटर में नाटक देखने आई थी। शम्मी कपूर उनकी अदाओं और शाही अंदाज से बेहद प्रभावित हुए थे। उनके दोनों बेटों से भी उनकी पहचान हो गई। उनके साथ पहली बार वो शिकार पर गए थे। बाद तो में तो शिकार में इतना मन रमा कि भोपाल के पास के जंगल और तराई तक जाने लगे। शम्मी कपूर ने वेबसाइट पर भोपाल के पास के जंगल में अपने पहले बाघ के शिकार के बारे में विस्तार से लिखा भी था। गीता बाली के साथ शादी के बाद भी ये शौक बरकरार रहा। कई बार तो दोनों मुंबई से देहरादून तक अपनी गाड़ी के शिकार करने चले जाते थे। कार की पिछली सीट पर गद्दा होता था और दोनों में से जो थकता था वो पीछे जाकर सो जाता था। ये बात भी दिलचस्प है कि शम्मी कपूर अपने दोस्त जॉनी वॉकर के साथ शिकार पर जाना सबसे अधिक पसंद करते थे।
शम्मी कपूर के गानों और उनके डांस स्टाइल की बहुत चर्चा होती है। उनके पसंदीदा संगीत सुनने और उसपर नृत्य करने के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। हुआ ये कि एक दिन वो आर के स्टूडियो में नर्गिस के मेकअप रूम के सामने से गुजर रहे थे तो देखा कि नर्गिस रो रही हैं। उनके पास गए और पूछा तो पता चला कि उसके परिवारवालों ने उनको राज कपूर के साथ फिल्म करने से मना कर दिया है। उस वक्त ‘बरसात’ फिल्म की शूटिंग चल रही थी। नर्गिस फिल्म ‘आवारा’ में काम करना चाहती थी लेकिन पारिवारिक बंदिश लगी थी। शम्मी ने उनको दिलासा दिलाया और वादा किया कि वो भगवान से प्रार्थना करेंगे कि उनको राज कपूर के साथ काम करने की अनुमति मिल जाए । नर्गिस ने वादा किया कि अगर उनकी प्रार्थना सफल गोती है तो वो शम्मी को किस देंगी। समय गुजर गया, ‘बरसात’ हिट हो गई। नर्गिस को फिल्म ‘आवारा’ में काम करने की अनुमति मिल गई। जब शम्मी कपूर को इस बात का पता लगा तो वो फिल्म ‘आवारा’ के सेट पर पहुंचे और नर्गिस को उनका वादा याद दिलाया। नर्गिस ने शम्मी से कहा कि उनको वादा याद है लेकिन अब शम्मी बड़े हो गए हैं लिहाजा वो वादा नहीं निभा पाएंगीं। नर्गिस ने शम्मी से कुछ और मांगने को कहा। शम्मी ने नर्गिस से एक ग्रामोफोन मांगा, जो नर्गिस ने उसी दिन खरीद कर शम्मी को दे दिया। शम्मी कपूर ने बाद में इस बात को लिखा कि उनके अलबेले डांस स्टाइल के पीछे वो ग्रामोफोन है जो उनको किस के बदले मिला था। हिंदी फिल्मों के देसी काउ बॉय की छवि वाले इस अभिनेता की जिंदगी भी कई बार उनकी छवि से मेल खाती है लेकिन बहुधा उनको इससे दूर ले जाती है।   

Saturday, June 1, 2019

नैसर्गिक प्रतिभा की 'नर्गिस'


आज नर्गिस का जन्मदिन है। आज वो नब्बे साल की होतीं। 51 साल की छोटी सी उम्र में नर्गिस दुनिया छोड़ कर ची गईं। पिछले दिनों राज कपूर की फिल्म बरसात (1949) देख रहा था। क्या गजब की फिल्म बनाई थी। पूरी फिल्म में नर्गिस और पहाड़ी सौंदर्य बांधे रखता है। राज कपूर और नर्गिस के बीच की केमेस्ट्री लाजवाब है। इस फिल्म में नर्गिस बेहद खूबसूरत लगी हैं। इस फिल्म में मोहब्बत करने की सजा के तौर ऑनर किलिंग की कोशिश भी है। नर्गिस और राज कपूर का प्रेम भी इस फिल्म के बाद ही परवान चढ़ा। देवानंद से लेकर ऋषि कपूर तक ने इस प्रेम के बारे में लिखा है। पर जब नर्गिस ने आर के स्टूडियो छोड़ा तो फिर चौबीस साल बाद आर के स्टूडियो के कैंपस में लौटीं। मौका था ऋषि कपूर की शादी का और उसके समारोह में नर्गिस और सुनील दत्त आए थे। 1956 के बाद नर्गिस ने आर के स्टूडियो में 1980 में कदम रखा था। जब वो वहां पहुंती तो थोड़ नर्वस लग रही थी। अचानक राज कपूर की पत्नी कृष्णा की नजर नर्गिस पर पड़ी और वो उसके पास जा पहुंची। उसने नर्गिस का हाथ पकड़ा और उसको अलग ले गईं। कृष्णा ने नर्गिस से कहा कि मैं जानती हूं कि मेरा पति बेहद खूबसूरत है, वो रोमांटिक भी बहुत है। मैं आपके आकर्षण को समझ सकती हूं। मुझे मालूम है कि इस वक्त आपके दिमाग में क्या चल रहा है पर पुरानी बातें भूल जाइए। आप खुशी के मौके पर हमारे घर आई हैं, हमलोग मिलकर जश्न मनाते हैं। आप हमारी ना केवल मेहमान हैं बल्कि दोस्त भी हैं। नर्गिस यह सुनकर सामान्य हो सकीं।
हिंदी फिल्मों के इतिहास में नर्गिस और उसकी मां जद्दनबाई दो ऐसे किरदार हैं जिन्होंने अपने संघर्ष के बूते फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाई। अपनी मां के साथ शहर दर शहर भटकते हुए, बहुत छोटी उम्र से फिल्मों में काम करते हुए नर्गिस ने जो जगह बनाई वो अप्रतिम है।