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Saturday, July 25, 2026

सरकार के हिसाब से कब बनेगा सिस्टम ?


दिल्ली के जंतर मंतर पर जारी विरोध प्रदर्शन के बीच दो सरकारी कार्यक्रमों की जानकारी मिली। एक कार्यक्रम भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत चलनेवाली संस्था राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के भोपाल स्थित क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान और शालभंजिका का आयोजन है। भारत सरकार की संस्था एनसीईआरटी ने कवि विनय कुमार की कृति श्रेयसी पर चर्चा आयोजित की है। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कवि राजेश जोशी कर रहे हैं। चर्चा में कुमार अंबुज, निरंजन श्रोत्रिय, आशुतोष दुबे और अंबर पांडे भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम का पोस्टर देखकर तो सामान्य लग सकता है पर अगर अध्यक्षता कर रहे महानुभाव और कुछ वक्ताओं की प्रतिबद्धता को देखेंगे तो ऐसा लगता है कि भारत सरकार अपने विरोधियों को लेकर कितनी उदार है। घोर वामपंथी कवि राजेश जोशी हमेशा से मोदी सरकार के विरोधी रहे हैं और कई सार्वजनिक मंचों पर भी सरकार को विरोध करते रहते हैं। इस कार्यक्रम के पोस्टर देखने के बाद सोचा कि जोशी जी की फेसबुक वाल पर टहल आया जाए। वहां जाकर देखा तो पता चला कि वो भी शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफा के आकांक्षी हैं। बावजूद इसके भारत सरकार की शिक्षा मंत्रालय उनका आतिथ्य कर रही है। उनकी अध्यक्षता में कार्यक्रम आयोजित कर रही है। शिक्षा मंत्रालय तो चलिए अपनी उदारता का परिचय दे रही है लेकिन क्या राजेश जोशी को ये नहीं पता कि उन्होंने जिस कार्यक्रम में जाने की सहमति दी है उसी महकमे के मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान थे। दरअसल ये वामपंथियों का चरित्र है। जहां लाभ दिखता है वहां जाने में उनको कोई परहेज नहीं होता है। वहां जाने के लिए कोई खूबसूरत बहाना ढूंढ लेते हैं। उदाहरण के लिए इस केस में कह सकते हैं कि एनसीईआरटी तो करदाताओं के पैसे से चलता है इसलिए उनके कार्यक्रमों में जाने में क्या परेशानी है। इसका सर्वोत्तम उदाहरण साहित्यिक पत्रिकाओं मं देखा जा सकता है जहां संपादकीय में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री योगी की आलोचना होती है और उसके ठीक पहले इनर कवर पर योगी सरकार का विज्ञापन। राजेश जोशी के अलावा जो वक्ता हैं उनमें से अधिकतर शिक्षा मंत्री को हटाने के पक्षधर थे। 

दूसरा कार्यक्रम शिवपूजन सहाय की कृति देहाती दुनिया के सौ साल पूरा होने पर पटना में बिहार संग्रहालय का एक आयोजन है। देहाती दुनिया ठेठ देहात का औपन्यासिक चित्र की परिभाषा के साथ बाजार में आया था। देहाती दुनिया का पहला संस्करण जब प्रकाशित हुआ था तब उसके आरंभ में श्री गणेशाय नम: प्रकाशित था। पहले खंड में एक ही पृष्ठ पर श्री गणेशाय नम: उसके बाद बड़े अक्षरों में देहाती दुनिया फिर अंक एक और उसके नीचे माता का अंचल उल्लिखित था। ऐसे शिवपूजन सहाय की कृति के सौ वर्ष पूरे होने पर बिहार के कला और संस्कृति विभाग के अंतर्गत चलनेवाली संस्था बिहार संग्रहालय ने जो आयोजन किया है उसमें वक्ताओं में वामपंथ से जुड़े लेखकों की प्रधानता है। प्रगतिशील लेखक संघ के बिहार के अध्यक्ष, महासचिव और एक अन्य पदाधिकारी पहले सत्र में वक्ता के तौर पर आमंत्रित हैं। दूसरे सत्र में भी सरकार के विरोधियों को स्थान दिया गया है। ऐसे लोगों को आमंत्रित किया गया है जो सरकार के विरोध में खड़े होकर पटना के गांधी मैदान में नारे लगाते रहे हैं। अब भी लगाते रहते हैं। पर बिहार सरकार के कला और संस्कृति विभाग की उदारता के क्या ही कहने। दरअसल पिछले कुछ समय से ये देखा जा रहा है कि बिहार संग्रहालय वामपंथियों को अच्छी खासी जगह दे रहा है। कुछ वामपंथी लेखक तो वहां के कार्यक्रमों में स्थायी हैं। बिडंबना है कि शिवपूजन बाबू के साहित्य पर उस विचार के लोग बोलेंगे जिन्होंने प्रयासपूर्वक शिवपूजन सहाय का मूल्यांकन नहीं होने दिया। उनकी समग्र रचना उनके पुत्र मंगलमूर्ति जी के सौजन्य और श्रम से प्रकाशित हो पाई। शिवपूजन सहाय परम रामभक्त थे। वो अपनी डायरी में सैकड़ों जगह राम, रामकृपा और भगवान की इच्छा जैसी बातें लिखते हैं लेकिन उनके इस लेखन के बारे में बहुत ही कम चर्चा की गई। देश के विभाजन से लेकर चीन युद्ध तक शिवपूजन सहाय ने बेहद कठोर टिप्पणियां कीं। उन्होंने नेहरू से लेकर उनके मंत्री कृष्ण मेनन तक की आलोचना की। लेकिन नेहरू की विराट छवि बनाने में लगे कांग्रेस-वामपंथी इकोसिस्टम ने इन टिप्पणियों को दबा दिया। वही अब उनकी प्रमुख कृति पर बात करेंगे। 

संभव है कि बहुत लोगों को ये लगे कि इन दो सरकारी कार्यक्रम में वामपंथियों को बुलाने से क्या ही हो जाएगा। लेकिन ये दो कार्यक्रम तो सिर्फ उदाहरण के तौर पर दिए गए हैं। ऐसे सैकड़ों कार्यक्रम होते रहते हैं जहां वामपंथी किसी न किसी से जुगाड़ भिड़ाकर घुस जाते हैं। सरकारी समितियों से लेकर पुरस्कार आदि में भी वो अपनी गोटी सेट कर लेते हैं। हाल ही में एक महत्वपूर्ण पुरस्कार की घोषणा हुई। उसमें जिन सज्जन को पुरस्कृत किया है वो रोजाना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना करते रहते हैं। सार्वजनिक तौर पर करते रहते हैं। फिर भी उनको पुरस्कृत करने का ऐलान किया गया। ऐसा नहीं है कि पुरस्कृत करनेवालों को उनके बारे में पता नहीं था, पता था। फिर भी हुआ। इस तरह की घटनाएं नियमित अंतराल पर निरंतर हो रही हैं पर इसकी सुध लेनेवाला कोई नहीं है। साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में वैचारिक लड़ाई होती है। वर्षों तक वामपंथी-कांग्रेसी इकोसिस्टम ने दक्षिणपंथ से जुड़े लेखकों और साहित्यकारों को मंच तक नहीं दिया। फिर योजनाबद्ध तरीके से ये बात फैलाई गई कि दक्षिणपंथ में प्रतिभा की कमी है। वर्षों तक इस झूठ के सहारे अपने विचार को श्रेष्ठ दिखाने का जतन करते रहे। कुबेरनाथ राय जैसे अप्रतिम प्रतिभा के लेखक को अकादमिक जगत से षडयंत्रपूर्वक बाहर रखा गया। सिर्फ कुबेरनाथ राय ही क्यों हाल के दिनों की बात करें तो नरेन्द्र कोहली जी का भी सम्मान नहीं कर सके। यह वामपंथी विचारधारा की योजना थी। अब भी वामपंथी लेखक जिन कार्यक्रमों में जाते हैं और वहां इसी तरह की बातें करते हैं जिससे भारत और भारतीयता की बात करनेवाले लेखकों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नीचा दिखाया जा सके। कई गोष्ठियों में इस तरह के विमर्श का प्रत्यक्षदर्शी रहा हूं इस कारण यह बात रख रहा हूं। केंद्र में नरेन्द्र मोदी सरकार के 12 वर्ष पूरे हो गए हैं लेकिन शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र से वामपंथियों का प्रभाव कम नहीं हो पाया है। यह कार्य प्रधानमंत्री के स्तर से नहीं होना है। इस कार्य को करने के लिए शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रहे नेतृत्व को निर्णय लेना होगा। विश्वविद्यालयों में कुलपति के स्तर पर और सांस्कृतिक संस्थाओं में निदेशक/अध्यक्ष के स्तर पर ये कार्य होना चाहिए। फिल्मों से जुड़ी संस्थाओं को भी ध्यानपूर्वक कार्य करना होगा। फिल्मों के क्षेत्र में जिस तरह से वाम विचार के लोग विचार की रामनामी ओढ़कर सक्रिय हैं उनकी पहचान करके उनकी षडयंत्रकारी योजनाओं को नाकाम करना होगा। ये कहकर भी नहीं बचा जा सकता है कि सरकार भले ही हमारी है लेकिन सिस्टम तो उनका ही है। सिस्टम तो सरकार के हिसाब से बनती है। बनाने का प्रयास करना चाहिए। 

Saturday, November 8, 2025

इतिहास लेखन में प्रशासनिक ढिलाई


भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था है भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (इंडियन काउंसिल आफ हिस्टोरिकल रिसर्च यानि आईसीएचआर)। इसकी वेबसाइट पर इस संस्था के उद्देश्य का वर्णन है- भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का प्राथमिक उद्देश्य ऐतिहासिक शोध को बढ़ावा देना और उसे दशा देना तथा इतिहास के वस्तुनिष्ठ एवं वैज्ञानिक लेखन को प्रोत्साहित और पोषित करना है। चौबीस बिंदुओं में विस्तार से वर्णित इस संस्था के उद्देश्यों में अंतिम उद्देश्य है समान्यत: देश में ऐतिहासिक अनुसंधान और उसके उपयोग को बढ़ावा देने के लिए समय-समय पर आवश्यक समझे जानेवाले सभी उपाय करना। अंतिम उद्देश्य का दायरा बहुत विस्तृत है। इस संस्था के शीर्ष पर एक अध्यक्ष होते हैं और एक सदस्य सचिव। 2022 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर उमेश अशोक कदम को आईसीएचआर के सदस्य सतिव के तौर पर नियुक्त किया गया था। वो अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। वित्तीय अनियमितताओं के आरोप में करीब नौ महीने तक ही इस पद पर बने रह सके। प्रकाशित खबरों के मुताबिक वित्तीय अनियमितता के आरोप इतने गंभीर थे कि मंत्रालय ने लंबे समय तक संस्था को आर्थिक मदद रोक दी थी। पता नहीं उन वित्तीय अनियमिततताओं की जांच हुई या जांच पूरी नहीं हो पाई है। कोई दोषी पाया जा सका या नहीं। 

उमेश अशोक कदम जी के पद छोड़ने के बाद से ही आईसीएचआर में कार्यवाहक सदस्य-सचिव हैं। लंबे अंतराल के बाद शिक्षा मंत्रालय ने 1 मई 2025 को आईसीएचआर के अध्यक्ष को एक पत्र (एफ नंबर-3-15/2013-U.3) लिखकर सूचित किया कि प्रो अल्केश चतुर्वेदी को सदस्य सचिव के पद पर नियुक्त किया जा सकता है। पत्र के समय अल्केश चतुर्वेदी सांची विश्वविद्यालय में कुलसचिव थे। इस पत्र में आईसीएचआर के अध्यक्ष के पत्र संख्या एफ-1.1/2024/सीएचएमएन/आईसीएचआर दिनांक 9.11.2024 का हवाला देते हुए कहा कि मंत्रालय के सक्षम अधिकारी ने प्रो अल्केश चतुर्वेदी के सदस्य सचिव पद पर नियुक्ति को मंजूरी दे दी है। पहली नजर में ये पत्र सामान्य नियुक्ति पत्र लगता है लेकिन इसके तीसरे बिंदु में एक पेंच है। इस बिंदु में लिखा गया है कि आपसे अनुरोध किया जाता है कि नियुक्ति निर्देश जारी करें और इस क्रम में आईएचआर के नियमों का पालन करें। इसके बाद की पंक्ति को रेखांकित किया जाना चाहिए। इसमें कहा गया है कि नियुक्ति पत्र जारी करने के पहले संबंधित व्यक्ति के विजिलेंस क्लीयरेंस का ध्यान रखा जाए। पहली नजर में यह भी सामान्य बात लगती है, लेकिन इस पत्र में कहीं नहीं कहा गया है कि चयनित व्यक्ति के विजिलेंस क्लीयरेंस की प्रतीक्षा आईसीएचआर कब तक करे। इसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं कि गई। दूसरा प्रश्म उठता है कि क्या चयन समिति ने जब इनके नाम पर विचार किया था या जब आईसीएचआर के अध्यक्ष ने इनके नाम की संस्सतुति मंत्रालय से की थी तो विजिलेंस क्लीयरेंस नहीं लिया गया था? 

यह तो निश्चित है कि मंत्रालय के 1 मई 2025 के सदस्य सचिव के पद पर प्रो अल्केश चतुर्वेदी को नियुक्त करने के आदेश को कार्यान्वयित करने के लिए अध्यक्ष ने कार्यवाही आरंभ की होगी। कार्यवाही के अंतर्गत ये माना जा सकता है कि अध्यक्ष ने अल्केश चतुर्वेदी से विजिलेंस क्लीयरेंस के लिए लिखा अवश्य होगा। परंतु छह महीने तक सदस्य सचिव के पद पर नियुक्ति नहीं होने से ऐसा प्रतीत होता है कि अल्केश चतुर्वेदी विजिलेंस क्लीयरेंस जमा नहीं करवा पाए हैं या उनके विजिलेंस क्लीयरेंस में कोई समस्या है। दोनों ही स्थितियों में आईसीएचआर के अध्यक्ष प्रोफेसर रघुवेंद्र तंवर को नियुक्ति की स्थितियों पर पुनर्विचार करना चाहिए। या ये माना जाए कि इस पत्र की आड़ में अनंत काल तक अल्केश चतुर्वेदी के विजिलेंस क्लीयरेंस की प्रतीक्षा की जाएगी और तबतक संस्था कार्यवाहक सदस्य सचिव के भरोसे चलता रहेगा। जिस चयन समिति ने अल्केश चतुर्वेदी का चयन किया उसने तीन नाम का पैनल भेजा था। अगर नियम अनुमति देते हों तो अध्यक्ष उस पैनल में से किसी अन्य व्यक्ति की नियुक्ति के लिए शिक्षा मंत्रालय को अनुरोध पत्र भेज सकते हैं। संभव है भेजा भी होगा लेकिन सदस्य सचिव के पद पर नियमित नियुक्ति में अनावश्यक देरी से संदेह उत्पन्न होता है। कहीं यथास्थिति बनाए रखने की कोशिश तो नहीं की जा रही है। सदस्य सचिव के पद पर नियमित नियुक्ति नहीं होने से संस्था का कामकाज भी सुचारू रूप से नहीं चल पा रहा है। संस्था के उद्देश्य भी पूरे नहीं हो पा रहे हैं। पाठकों को याद होगा कि इस स्तंभ में ही मदर आफ डेमोक्रेसी नामक पुस्तक के प्रकाशन और उसके मूल्य निर्धारण पर पहले लिखा जा चुका है। कुछ लोग तो ये कहते हैं कि लाखों रुपए मूल्य की पुस्तकें अब भी आईसीएचआर के गोदाम में धूल फांक रही है। पता नहीं कभी इसकी जांच हुई या नहीं या होगी भी या नहीं। दरअसल जिम्मेदार पद पर नियमित नियुक्ति नहीं होने से गड़बड़ियों को फलने फूलने का मैदान तैयार होता है।

गड़बड़ियों से आगे जाकर अगर हम शोध कार्यों पर ध्यान दें तो एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा। 2022 में आईसीएचआर ने एक महात्वाकांक्षी परियोजना बनाई थी भारत के समग्र इतिहास लेखन की। योजनानुसार आठ खंडों में ये पुस्तक तैयार होनी थी। वरिष्ठ इतिहासकार सुष्मिता पांडे को इस परियोजना का जनरल एडीटर बनाया गया। प्रधानमंत्री मेमोरियल और संग्रहालय से एक व्यक्ति को प्रतिनियुक्ति पर आईसीएचआर लाया गया। करीब तीन वर्ष होने को आए अभी तक एक भी खंड पाठकों के लिए उपलब्ध नहीं हो पाया है। पहला खंड समग्र इतिहास की आवश्यकता को रेखांकित करनेवाला है। उसको अभी विशेषज्ञ देख रहे हैं यानि रेफरिंग पूल में डूब उतरा रहा है। इस हिसाब से देखा जाए तो अगले 24 वर्ष में शायद इस परियोजना को पूरा किया जा सकेगा। समग्र इतिहास लेखन अगर इस अगंभीरता से लिया जाएगा तो फिर भगवान ही मालिक हैं। आईसीएचआर जैसी संस्था का वामपंथी इतिहासकारों ने जितना उपयोग अपने विचार को फैलाने या एकांगी दृष्टि से इतिहास लिखने में किया उसका निषेध करना भी इस रफ्तार में संभव नहीं लगता है। आईसीएचआर जैसी संस्था को बेहद गंभीरता से चलाने की आवश्यकता है जिसमें निर्णय त्वरित हों, कार्य निर्धारित समय पर पूर्ण हों और प्रशासनिक बाधाओं से अकादमिक प्रक्रिया से मुक्त कराने की इच्छाशक्ति वाला कोई व्यक्ति संस्था में हो। 

2014 में जब से मोदी सरकार बनी है तभी से इतिहास को समग्र दृष्टि देने की बात हो रही है। गृहमंत्री अमित शाह ने बनारस में कुछ वर्षों पहले कहा था कि इतिहास लेखन में किसी की गलती बताने से बेहतर है हम अपनी लकीर लंबी करें। प्रधानमंत्री ने लालकिला की प्राचीर से पांच प्रण गिनाए थे उसमें से विरासत वाले प्रण का सिरा इतिहास से जुड़ता है। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान भी कई बार राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर बात करते हुए इतिहास के समग्र लेखन की महत्ता को रेखांकित कर चुके हैं। प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और शिक्षा मंत्री की चिंता के केंद्र में इतिहास का समग्र लेखन है लेकिन बावजूद इसके आईसीएचआर में ढिलाई दिखती है। समग्र इतिहास लेखन परियोजना को लेकर व्याप्त आलस पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर रहा है। जरूरत है कि शिक्षा मंत्री अपने स्तर पर इसमें दखल दें और प्रसासनिक बाधों को दूर करने की राह संस्था को दिखाएं।    


Saturday, May 27, 2023

हिंदी पुरस्कारों पर उदासीन केंद्र सरकार


आज संसद के नए भवन का शुभारंभ होनेवाला है। उसपर जमकर राजनीति हो रही है। कई विपक्षी दल इसके उद्घाटन समारोह के बहिष्कार की घोषणा कर चुके हैं तो कई दल समर्थन में हैं। इस बीच गृह मंत्री अमित शाह ने स्वाधीनता के बाद सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक सेंगोल के बारे में देश की जनता को बताया। इसके बाद सेंगोल को लेकर भी पक्ष विपक्ष में दलीलें दी जाने लगीं। कुछ लोगों ने सेंगोल की महत्ता पर प्रश्न खड़े कर दिए। सेंगोल की परंपरा को जब चोल सम्राज्य से जोड़ा गया तो कथित लिबरल और सेक्यूलर बुद्धिजीवियों ने इसको हिंदू राष्ट्र से जोड़ दिया। यहां वो ये भूल गए कि सत्ता के हस्तांतरण के समय इस तरह के दंड को सौंपने का विधान हमारे देश में सदियों से रहा है। महाभारत के शांति पर्व में विस्तार से इस बारे में चर्चा है। कर्नाटक के हंफी के विरुपाक्ष मंदिर में नटराज की मूर्ति के साथ सेंगोल भी है, जिसके शीर्ष पर नंदी की आकृति है। बताया जाता है कि ये मंदिर सातवीं शताब्दी का है। सेंगोल की परंपरा हमें ग्रंथों और मूर्तियों में मिलते हैं। इस पर अनावश्यक विवाद है। जब विवाद अनावश्यक होते है तो शोरगुल ज्यादा होता है।संसद के उद्घाटन और सेंगोल की प्रामाणिकता के शोरगुल में एक महत्वपूर्ण मुद्दा दब गया। सियासी शोर में भाषा के मुद्दे नेपथ्य में चले जाते हैं। 

भारतीय भाषाओं के विस्तार और उसको समृद्ध करने के लिए कई संस्थाएं कार्य करती हैं। इनमें हिंदी से जुड़ी संस्थाएं भी हैं जो अन्य कार्यों के अलावा हिंदी और गैर हिंदी भाषियों को हिंदी में श्रेष्ठ लेखन के लिए पुरस्कृत करती रही हैं। ऐसी ही एक संस्था है केंद्रीय हिंदी निदेशालय। ये भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के उच्चतर शिक्षा विभाग के अंतर्गत आती है। 17 मई 2023 को इस संस्था ने एक महत्वपूर्ण सूचना जारी की। विषय़ था शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत विभिन्न भाषाओं द्वारा दिए जा रहे पुरस्कारों का युक्तिकरण-हिंदी भाषा में पुरस्कारों को बंद करने के सबंध में। इस सूचना में बताया गया कि भाषा प्रभाग, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, दिल्ली के उपसचिव के निदेश पत्रांक एफ संख्या 8-86/2015/एल-II दिनांक 4 मई 2023 की अनुपालना के परिप्रेक्ष्य में सर्वसाधारण को सूचित करने का निदेश हुआ है कि शिक्षा मंत्रालय ने केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा शिक्षा पुरस्कार योजना तथा हिंदीतर भाषी लेखक पुरस्कार योजना के अंतर्गत दिए गए पुरस्कारों को समाप्त करने का निर्णय लिया है। यानि कि पिछले कई वर्षों से दिए जा रहे इन पुरस्कारों को भारत सरकार ने बंद कर दिया। बताया जा रहा है कि इसी तरह से केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा के पुरस्कारों को भी शिक्षा मंत्रालय ने बंद कर दिया है। केंद्रीय हिंदी संस्थान भी हिंदी सेवियों के अलावा गैर हिंदी भाषियों को हिंदी में श्रेष्ठ कार्य करने के लिए पुरस्कृत करती है। प्रवासी लेखकों को भी। केंद्रीय हिंदी संस्थान के पुरस्कार बेहद सम्मानित माने जाते हैं। ये राष्ट्रपति के हाथों दिए जाते थे जो परंपरा कई वर्षों से बंद है। संस्थान से सुब्रह्मण्य भारती, दीनदयाल उपाध्याय, सरदार वल्लभ भाई पटेल, गंगा शरण सिंह, गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे महानुभावों के नाम से वर्षों से दिए जा रहे पुरस्कारों को बंद कर दिया गया। प्रश्न ये उठता है कि इन महत्वपूर्ण पुरस्कारों को बंद करने का निर्णय सरकार के स्तर पर हो गया या हिंदी भाषा के लिए कार्य कर रहे विद्वानों या इन संस्थाओं में शीर्ष पर बैठे लोगों से विमर्श किया गया। 

शिक्षा मंत्रालय की तरफ से इन संस्थानों को 4 मई 2023 को जो आदेश आया है उसमें लिखा है कि गृह मंत्रालय के निर्देश पर राष्ट्रपति द्वारा दिए जानेवाले पुरस्कारों और अन्य भाषाई पुरस्कारों का युक्तिकरण किया जा रहा है। इस सिलसिले में शिक्षा मंत्री की अध्यक्षता में एक बैठक 15.11.2022 को हुई। इस बैठक में चर्चा के दौरान ये बात सामने आई कि हिंदी के लिए विभिन्न मंत्रालयों और संस्थाओं द्वारा पुरस्कार दिए जाते हैं। इसलिए शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत केंद्रीय हिंदी संस्थान और केंद्रीय हिंदी निदेशालय के पुरस्कार के संबंध में किसी प्रकार की कार्यवाही न की जाए। कुछ इसी तरह का निर्देश राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद को भी प्राप्त हुआ है। उनको भी निर्देशित किया गया है कि वो अपने पुरस्कारों पर किसी तरह की कार्यवाही न करें। 

इन सूचनाओं से ये पता चलता है कि गृह मंत्रालय के निर्देश के आलोक में शिक्षा मंत्रालय ने हिंदी के पुरस्कारों को बंद करने का निर्णय लिया है। हैरानी की बात है कि गृह मंत्री अमित शाह हिंदी की व्याप्ति को बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं और उनके ही मंत्रालय के निर्देश पर हिंदी और हिंदीतर भाषियों के पुरस्कारों को बंद किया जा रहा है। जब 2014 में नरेन्द्र मोदी की सरकार सत्ता में आई थी तो उसके दो वर्ष बाद 2016 में केंद्रीय हिंदी संस्थानों के पुरस्कारों की राशि एक लाख रुफए से बढ़ाकर पांच लाख रुपए कर दी गई थी। तब उसका हिंदी जगत में स्वागत हुआ था। सात वर्षों में ऐसा क्या हो गया कि यही सरकार उन पुरस्कारों को बंद कर रही है। एक अनुमान के मुताबिक देश में हिंदी भाषियों की संख्या 60-70 करोड़ के करीब है। ऐसे में अगर अलग अलग मंत्रालय और संस्थाएं हिंदी सेवियों को पुरस्कृत करती हैं तो उसमें हानि क्या है। अगर इन पुरस्कारों को युक्तिसंगत करने के लिए बंद किया गया है तो हिंदी भाषी लोगों से इस बारे में चर्चा करनी चाहिए थी। 

एक तरफ गृह मंत्रालय हिंदी और हिंदीतर भाषा के पुरस्करों को बंद कर रही है दूसरी तरफ वित्त मंत्रालय के अंतर्गत आनेवाला एक बैंक 61 लाख रुपए के पुरस्कारों की घोषणा कर चुका है। पुरस्कारों के लिए उसकी लांगलिस्ट प्रकाशित हो चुकी है। ये अलग बात है कि बैंक का ये पुरस्कार अनुवाद के लिए है। हैरानी की बात है कि इस पुरस्कार के लांगलिस्ट में भी हिंदी में अनूदित कोई पुस्तक नहीं है। इस पुरस्कार की जूरी के सदस्यों के नाम देखने पर फिल्म द कश्मीर फाइल्स के एक संवाद का स्मरण होता है- सरकार कोई भी हो सिस्टम तो अपना ही चलता है। इस पुरस्कार की जूरी में बुकर पुरस्कार से सम्मानित और वैचारिक रूप से वामपंथ के साथ गीतांजलिश्री, प्रसिद्ध वामपंथी लेखक अरुण कमल और पुष्पेश पंत आदि हैं। इसमें अनुवाद के लिए पहला पुरस्कार कृति की मूल भाषा के लेखक को रु 21 लाख और अनुवादक को 15 लाख रुपए देने का प्रविधान है। इसके अलावा 5 अन्य अनुवाद के पुरस्कार दिए जाने हैं जिसमें मूल कृति के लेखक को तीन लाख रुपए और अनुवादक को 2 लाख रु दिए जाएंगे। राशि के लिहाज से अगर देखें तो ये भारत का सबसे बड़ा पुरस्कार है। क्या ये वित्त मंत्रालय की बिना सहमति के आरंभ हुआ है। अगर बगैर भारत सरकार की सहमति के इतनी भारी भरकम रकम का पुरस्कार सरकारी बैंक से दिया जा रहा है तो भी चिंता की बात है। पुरस्कार की ये राशि भी करदाताओं के पैसे दिए जाने हैं और हिंदी निदेशालय या हिंदी संस्थान के पुरस्कार भी करदाताओं के पैसे दिए जाने हैं। अगर गृह मंत्रालय पुरस्कारों को युक्तिसंगत करना चाहता है तो क्या वहां से वित्त मंत्रालय को किसी प्रकार का निर्देश गया था। 

भारत सरकार को हिंदी भाषा की समृद्धि और उसके विस्तार के लिए काम करनेवालों को दिए जानेवाले इन पुरस्कारों को बंद किए जाने के अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए। गृह मंत्री अमित शाह को हस्तक्षेप करना चाहिए। कुछ वर्षों पूर्व इसी तरह से हिंदी की संस्थाओं के विलय का प्रस्ताव आया था लेकिन तब प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद उसका कार्न्वयन रोक दिया गया था। सरकार को हिंदी के पुरस्कारों को युक्तिसंगत बनाते समय हिंदी भाषा-भाषियों की संख्या पर भी विचार करना चाहिए।