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Monday, January 16, 2017

बाबा के भेष में बहुरूपिया !

इन दिनों खबरिया चैनलों पर साधु की वेशभूषा में एक शख्स कई राजनीतिक दावे कर रहा है । इंदिरा गांधी से नजदीकी और चंद्रशेखर और नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बवनाने में अपनी भूमिका का बखान कर रहा है । वो यहीं तक नहीं रुकता है, उसका दावा है कि उसने सलमान खान को थप्पड़ मारा है और बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक की कई अभिनेत्रियां उसकी शिष्या हैं । ये साधुनुमा शख्सियत है स्वयंभू बाबा ओम, जिसका असली नाम विनोदानंद झा है । ओम पर साइकिल चोरी से लेकर विस्फोटक रखने तक के मामले में टाडा जैसे केस दिल्ली के थानों में दर्ज हैं । फिर क्या वजह है कि एक आरोपी को नेशनल न्यूज चैनलों पर इतनी तवज्जो मिल रही है । दरअसल टीवी सीरियल बिग बॉस में ओम ने जिस तरह का उधम मचाया उसने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा । साधु के वेश में महिला के साथ स्वीमिंग पूल में नहाने से लेकर नागिन डांस करनेवाले बाबा को शर्तों को तोड़ने के आरोप में बिग बॉस के घऱ से बाहर कर दिया गया था । बड़बोले बाबा ने अपने बयानों से न्यूज चैनलों का ध्यान अपनी ओर खींचा । बाबा में टीआरपी की संभावनाएं देखते हुए बड़े बड़े चैनलों के संपादक तक उसका इंटरव्यू करने कूद पड़े । ओम को स्टूडियो में बुलाकर पूरे देश को घंटों तक उनका बकवास सुनाया गया । इन शोज़ के दौरान उनका बड़बोलापन बढ़ता चला गया । एक शो के दौरान दर्शकों में बैठी एक महिला को बेहद असंसदीय शब्द कहने से भीड़ और मेहमान दोनों भड़क गए और जमकर लात जूते चले । बाबजूद इसके शो चलता रहा, ओम दावे करते रहे ।
दरअसल अगर हम देखें तो ओम पिछले साल एक न्यूज चैनल के स्टूडियो में हुए थप्पड़ कांड से चर्चित हुआ । उसके पहले भी वो एक न्यूज चैनल के दफ्तर में पिटते पिटते बचे थे । लाइव शो में हुए थप्पड़ कांड के बाद वो चर्चित हो गए । महिला को थप्पड़ मारने के बाद पुलिस के डर से स्टूडियो से ये कहते हुए रफूचक्कर हो गए थे कि उनकी मुलायम सिंह यादव से बात हो गई है । उस केस का क्या हुआ ज्ञात नहीं है लेकिन ओम का हौसला उसके बाद बुलंद हो गया । ओम का उद्भव न्यूज चैनलों की भीड़ भरी दुनिया में उस वक्त हुआ जब डिबेट शो के दौरान चीखने चिल्लाने का दौर शुरू हुआ । ओम जैसी बेसिर-पैर की बातें करनेवाले लोग न्यूज चैनलों के प्रोड्यूसर्स की पसंद बनने लगे । खुद को हिंदी धर्म का रक्षक घोषित करनेवाले ओम का मकसद सिर्फ स्टूडियो में हंगामा करना और विरोधियों को बोलने नहीं देना होता था । उस वक्त ओम की मांग इतनी ज्यादा थी कि उसके टाइम स्लॉट बुक घंटे के हिसाब से बुक हुआ करते थे । स्टूडियो में थप्पड़ कांड के बाद ओम की मांग कम होने लगी थी लेकिन बिग बॉस के सीजन दस ने इस स्वयंभू बाबा को नया जीवन दे दिया । बिग बॉस में उलजलूल हरकतों ने ओम को फिर से चर्चा में ला दिया । हिंदू बाबा के नाम से खुद को प्रचारित करनेवाला ये बाबा हंसी का पात्र बनता चला गया और किसी भी सीरियल में एक अहमकनुमा जोकर तो चाहिए ही होता है ।

ओम को अहमियत से दो सवाल उठते हैं एक तो न्यूज चैनलों के कर्ताधर्ताओं पर । क्यों और कैसे उलजलूल बातें करनेवालों को इतना एयर टाइम दिया जाता है । यह सही है कि न्यूज चैनलों के लिए टीआरपी आवश्यक है लेकिन टीआरपी यानि रेटिंग के लिए कुछ भी किया जाए । कई वैसे लोग भी जो इस तरह के बाबा, भूत प्रेत आदि को टीवी पर दिखाए जाने के खिलाफ होते थे, संपादक बनते ही इनके ही शरण में जाते दिखने लगते हैं । ओम के कारनामों के दौरान और बाद में इस तरह की बातें सुनाई देती हैं कि फलां चैनल का इनके बयानों से कोई लेना देना नहीं है या फिर चैनल उनकी बातों और क्रियाकलापों से इत्तफाक नहीं रखता है । सही है इस तरह के डिस्क्लेमर बोले जाने चाहिए ताकि दर्शकों को जागरूक किया जा सके । लेकिन केबल एंड टेलीविजन एक्ट कहता है कि ब्राडकास्टर यानि चैनल की भी उतनी ही जिम्मेदारी होती है, जितना बोलने वाले की । किसी भी तरह का भड़काऊ बयान, आपत्तिजनक कटेंट, या फिर असंसदीय भाषा के टेलीकास्ट करने की जिम्मेदारी चैनलों की भी होती है । ओम के मामले में कई चैनल इस कानून की धाराओं का उल्लंघन करते दिखे । अब अगर सरकार उनको नोटिस देती है तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले का शोर मचने लगेगा । जरूरत जिम्मेदारी समझने की है । दूसरी तरफ जिस तरह से हिंदू धर्मगुरू होने दा दावा करनेवाला ये शख्स ओछी हरकतें कर रहा है उसके बारे में संत समाज को भी सोचना चाहिए । क्या कोई वेशभूषा से साधु होता है या फिर आचरण- व्यवहार से, इस पर विचार करने की आवश्यकता है । ओम को अंतराष्ट्रीय मीडिया हिंदू गॉडमैन लिख रहे हैं जिससे पूरी दुनिया में हिंदी संतों की छवि खराब हो रही है । संतों की प्रतिनिधि सभा अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद को ओम की हरकतों का संज्ञान लेना चाहिए और उसपर अंकुश लगाने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए । 

Saturday, December 3, 2016

बदलते वक्त में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

इन दिनों देश में अभिव्यक्ति की आजादी और उसके खतरों को लेकर जमकर चर्चा हो रही है । संपादकीय लिखे जा रहे हैं, प्राइम टाइम में खबरिया चैनलों पर बहस हो रही है । होनी भी चाहिए क्योंकि इस तरह की लगातार बहसों से लोकतंत्र जीवंत रहता है । परंतु अगर गंभीरता से विचार करें तो अभिव्यक्ति की आजादी पर होनेवाली बहस सरकार के पक्ष और विपक्ष की बहस होकर रह जा रही है । कोई भी विशेषज्ञ या स्तंभकार बुनियादी सवालों की ओर जाने से कतराते हैं । इमरजेंस-इमरजेंसी कहकर वो एक तरह से इमरजेंसी की भयावहता को कम कर देते हैं । नई पीढ़ी को इससे भ्रम हो सकता है कि इमरजेंसी में इन दिनों जितनी उदारता थी । आज एक बार फिर से अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर देशव्यापी गंभीर बहस की आवश्यकता है । आज जिस तरह से कई न्यूज चैनलों पर खबरों के नाम पर फिक्शन को बढ़ावा दिया जा रहा है या अंधविश्वास को बढ़ावा दिया जाता है उस पर यह बहस होनी चाहिए कि मीडिया की अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा कहां तक है या उसकी कोई सीमा है भी या नहीं । अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कई बार लक्ष्मण रेखा पार हो जाती है, ये कहना मुश्किल है कि जानबूझकर या अनजाने में । चंद दिनों पहले बिग बॉस सीरियल में मशहूर क्रिकेटर युवराज सिंह के भाई जोरावर सिंह और उनकी पत्नी आकांक्षा के बीच का पारिवारिक विवाद उछला । अदालत में विचाराधीन होने के बावजूद उनकी अलग रह रही पत्नी को शो में आमंत्रित कर अपना पक्ष प्रस्तुत करने का मौका दिया गया । शो के आगाज के वक्त आकांक्षा ने दर्शकों के सामने मंच से सरेआम जोरावर की प्रतिष्ठा को तार तार कर दिया । जोरावर को इस तरह से पेश किया गया जैसे उसने एक लड़की की जिंदगी बरबाद कर दी ।एकतरफा बातें हुई, जोरावर पर कई आरोप लगे, शो के दौरान भी बातीचत में ये मसला उठा । दूसरा पक्ष अपनी सफाई देने के लिए मौजूद नहीं था ।
अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा तो संविधान के पहले संशोधन के वक्त बहुत साफ कर दी गई थी । श्यामा प्रसाद मुखर्जी के अखंड भारत के भाषणों पर लगाम लगाने के लिए और नेहरू- लियाकत समझौते को पूरी तरह से लागू करने को लेकर पहला संविधान संशोधन किया गया । तब बहाना बना था मद्रास से निकलनेवाली पत्रिका क्रासरोड और राष्ट्रीय संघ से जुड़ी पत्रिका आर्गेनाइजर में छप रहे लेख । क्रासरोड में नेहरू की नीतियों की जोरदार आलोचना की जाती थी, जिससे वो खफा रहते थे । दोनों मामलों में अदालत ने पत्रिकाओं की स्वंतत्रता पर अंकुश लगाने से मना कर दिया था । नेहरू ने अपने मंत्रिमंडल के साथियों के साथ विचार करने के बाद संविधान में मिले अभिव्यक्ति की आजादी की लगभग पूर्ण स्वतंत्रता पर ही अंकुश लगाने का बिल संसद में दस मई उन्नीस सौ इक्यावन को पेश किया जिसे कि अठारह जून को पास कर दिया गया । मूल संविधान में प्राप्त अधिकारों में कई शर्तों का बंधन लगाया गया जिससे अभिव्यक्ति की आजादी की परिधि खींच दी गई । जबकि उस वक्त भी भारतीय दंड संहिता की धारा 295 ए मौजूद थी जिसको लगाकर अभिव्यक्ति की आजादी की पूर्णता को बाधित किया जा सकता था ।
टेलीविजन चैनलों की बहुतायत और इस माध्यम के जनमानस को प्रभावित करने की क्षमता को ध्यान में रखते हुए अभिव्यक्ति की आजादी या उसकी चौहद्दी को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है । न्यूज और मनोरंजन दोनों को मिलाकर इस मामले पर विचार किया जाना चाहिए । दरअसल टेलीविजन के कार्यक्रमों की सफलता का आकंलन जिस रेटिंग से होता है उसको लेकर कई बार प्रोड्यूसर्स में भ्रम की स्थिति रहती है । बहुधा चैनलों के कर्ताधर्ताओं को ये लगता है कि दर्शक संख्या बढ़ाने के लिए सेलिब्रिटी से जुड़े विवादों को हवा देने से रेटिंग हासिल की जा सकती है । इसी भ्रम में लक्ष्मण रेखा पार हो जाती है ।  हलांकि शोज के दौरान होनेवालों सर्वेक्षणों या वोटिंग से ये अवधारणा निगेट ही होती रही है । अगर इस तरह का आंकलन सही होता तो बिग बॉस के दर्शक जोरावर से अलग रह रही उनकी पत्नी आकांक्षा शर्मा को बनाए रखते ना कि दूसरे ही सप्ताह में उसको बिग बॉस के घर से बाहर निकाल देते । सवाल वही कि क्या टी आर पी हासिल करने के लिए किसी की निजता का हनन किया जा सकता है । निजता के हनन का मामला पहले भी पेश आ चुका है जब टेनिस स्टार सानिया मिर्जा और पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब की शादी का एलान हुआ था । कई बार कल्पना के आधार पर शोएब की पुरानी लव स्टोरीज परोसी गई थी । अभिषेक बच्चन की शादी के वक्त भी एक महिला उसकी पत्नी का दावा करते सामने आई थी और घंटों न्यूज चैनलों पर लाइव रही थी । क्या यहां किसी तरह की रोक होनी चाहिए । न्यूज चैनलों और अन्य टीवी चैनलों के स्वनियमन का मैकेनिज्म है लेकिन उसके दायरे को बढ़ाते हिए उसको मजबूत किए जाने की जरूरत है । मुंबई पर हुए आतंकी हमले के वक्त न्यूज चैनलों के कवरजे को लेकर सवाल उठे थे जिसके बाद सरकार ने आतंकवादी हमले के दौरान कवरेज को लेकर एक गाइडलाइन तो बना दी थी लेकिन न्यूज चैनलों के सबसे पहले की आपाधापी में गड़बड़ी हो जाती है । इसी तरह से अगर देखें तो हमारे चैनलों ने इस्लामिक स्टेट के बगदादी को कई बार मारा और फिर कई बार जिंदा कर दिया । उससे जुड़ी वारदातों को इस तरह से मिर्च मसाला लगाकर पेश किया जाता है जैसे लगता है कि कोई क्राइम थ्रिलर चल रहा हो । वीभत्स वीडियो को बार बार दिखाया जाता है और कई बार तो उसके कारनामे उसको समर्थकों के बीच हीरो भी बना देते हैं । अभिव्यक्ति की आजादी संविधान हमें देता है लेकिन वही संविधान कुछ जिम्मेदारियां भी तय करता है । हम सबको उसका गंभीरता से पालन करना चाहिए वर्ना सरकार को इस संवैधानिक अधिकार पर अंकुश लगाने के मौके मिलते रहेंगे । सत्ता अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं करती है और उसपर लगाम लगाने के मौके ढूंढती रहती है । अभिव्यक्ति की आजादी निर्बाध चलती रहे इसके लिए जरूरी है कि पत्रकारों की हर तरह से सुरक्षा की गारंटी हो। पत्रकारों को पेशेगत जोखिम उठाने होते हैं लेकिन उन जोखिमों को कम करने की कोशिशों से अभिव्यक्ति की आजादी मजबूत होगी और संविधान में मिले अधिकारों की रक्षा भी हो सकेगी।


Saturday, November 12, 2016

आजादी की आड़ में अराजकता ? ·


निजी न्यूज चैनल एनडीटीवी पर एक दिन की पाबंदी के दौरान अभियव्क्ति की आजादी को लेकर खूब हो हल्ला मचा । देशभर में पत्रकारों के कई छोटे-बड़े संगठनों ने सरकार के इस फैसले को इमरजेंसी की याद दिलानेवाला करार दिया । करीब हफ्ते भर चले विरोध प्रदर्शन के बाद सरकार ने पाबंदी को स्थगित कर दी । इस पूरे घटनाक्रम के दौरान एक बार फिर से अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर देशव्यापी गंभीर बहस की आवश्यकता महसूस की गई । आज जिस तरह से कई न्यूज चैनलों पर खबरों के नाम पर फिक्शन को बढ़ावा दिया जा रहा है या फिर कई बार तो अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता की आड़ में अंधविश्वास को बढ़ावा दिया जाता है उसपर यह बहस होनी चाहिए कि मीडिया की अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा कहां तक है या उसकी कोई सीमा नहीं है । अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा तो संविधान के पहले संशोधन के वक्त बहुत साफ कर दी गई थी । आजादी के बाद जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी अखंड भारत को लेकर आंदोलनरत थे तो उस वक्त उनके भाषणों को पाकिस्तान युद्धोन्माद बढ़ानेवाला मानते हुए आपत्ति जता रहा था । पाकिस्तान की शिकायत और नेहरू लियाकत समझौते के बाद तय हुआ कि अभियक्ति की आजादी की सीमा तय की जाए और फिर संविधान का पहला संशोधन हुआ जिसमें इसकी सीमा तय कर दी गई । तब बहाना बना था मद्रास से निकलनेवाली पत्रिका क्रासरोड और राष्ट्रीय संघ से जुड़ी पत्रिका आर्गेनाइजर में छप रहे लेख । अब जमाना बहुत बदल चुका है । संविधान के संशोधन के वक्त टीवी माध्यम या तो था नहीं या फिर उसका जनमानस पर उतना प्रभाव नहीं था । टेलीविजन चैनलों के जोर के बाद अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर इस वक्त सचमुच एक देशव्यापी बहस की जरूरत है । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में मीडिया को अराजक होने का लाइसेंस नहीं मिल जाता है । बहुधा यह देखा गया है कि इसकी आड़ में मशहूर शख्सियतों पर कीचड़ उछालने का काम भी किया जाता है । हालिया उदाहरण बिग बॉस के शो का है जहां क्रिकेटर युवराज सिंह के भाई जोरावर सिंह से अलग रह रहा पत्नी को शो में प्रतिभागी बनाया गया और उसने जोरावर सिंह के खिलाफ बेहद संगीन इल्जाम लगाए, जबकि ये पूरा मामला अदालत में विचाराधीन है । सवाल यह कि अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में क्या मीडिया किसी की इज्जत उछालने के लिए मंच दे सकता है या आरोपों में मिर्च मसाला लगाकर पेश करने की इजाजत दी जा सकती है। लोकप्रिय टीवी शो बिग बॉस में जिस तरह से मशहूर क्रिकेटर युवराज सिंह के भाई जोरावर सिंह पर इल्जाम लगे और उनकी तरफ से ना तो कोई पक्ष सामने आया उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं । शो में जब जोरावर सिंह की अलग रह रही पत्नी आकांक्षा शर्मा का परिचय करवाया जा रहा था तो लग रहा था कि जैसे उन्होंने कितने जुल्म सहे हैं और जोरावर कितने निर्दयी हैं । दोनों के बीच कई अदालतों में मामला विचाराधीन है और सवाल यही कि अदालतों में चल रहे मामलों के एक पक्ष को चैनल आरोप लगाने के लिए मंच मुहैया करवा सकता है । क्या ये अदालत की कार्रवाई में दखल का मामला नहीं है ।
जोरावर सिंह उसी युवराज सिंह के भाई हैं जिन्होंने कैंसर जैसी बीमारी को मात देते हुए देश को क्रिकेट का वर्ल्ड कप दिलाने में केंद्रीय भूमिका निभाई थी । शो के आगाज के वक्त आकांक्षा ने सलमान खान के सामने मंच पर खड़े होकर जोरावर की प्रतिष्ठा को तार तार कर दिया । जोरावर को इस तरह से पेश किया गया जैसे उसने एक लड़की की जिंदगी बरबाद कर दी ।आकांक्षा के परिवारवाले भी नाटकीय ढंग से सामने लाए गए और आकांक्षा को उसके कथित संघर्ष में साथ देने का वादा किया गया ।  इस पूरे मामले में अदालतों में चल रहे केस से कुछ अलहदा तस्वीर सामने आती हैं । जब आकांक्षा शर्मा ने जोरावर सिंह पर आरोप लगाए थे और काफी हो हल्ला मचाया था तब भी जोरावर ने आकांक्षा पर किसी तरह का इल्जाम नहीं लगाया और एक मर्यादा में रहे थे । अगर सोशल मीडिया पर इस पूरे विवाद की तफ्तीश करेंगे तो कई तरह के किस्से वहां मौजूद हैं जिसमें आकांक्षा के उपर भी ड्रग्स आदि के संगीन इल्जाम हैं । लेकिन सोशल मीडिया पर जो अराजकता है वो मुख्यधारा की मीडिया को नहीं दी सकती है और उनसे एक खास तरह की जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है । टेलीविजन  के कार्यक्रमों को बनाने वालों को या फिर उनके कर्ताधर्ताओं को ये लगता है कि दर्शक संख्या बढ़ाने के लिए सेलिब्रिटी से जुड़े विवादों को हवा दी जा सकती है ।
दरअसल अगर भारतीय समाज के मानस का विश्लेषण करें तो लोगों को दूसरे के परिवारों में क्या चल रहा है ये जानने की आकांक्षा होती है । इसी चाहत को भुनाने में टीवी चैनल बहुधा लक्ष्मण रेखा पार कर जाते हैं । हलांकि शोज के दौरान होनेवालों सर्वेक्षणों या वोटिंग से ये अवधारणा निगेट ही होती है । अगर इस तरह का आंकलन सही होता तो बिग बॉस के दर्शक आकांक्षा शर्मा को बनाए रखते और जोरावर के कथित जुल्म के किस्सों में उनकी रुचि होती तो दर्शक आकांक्षै को शो में बनाए रखते ना कि दूसरे ही सप्ताह में चलता कर देते । सवाल फिर वही कि संविधान की कौन सी धारा या केबल या टेलीविजन रेगुलेशन एक्ट का कौन सा सेक्शन इस तरह के कारनामों की इजातत देता है । कोई महिला किसी पर भी उलजलूल आरोप लगाएगी और एक प्रतिष्ठित चैनल बगैर दूसरे पक्ष को जाने उसका टेलीकास्ट कर देगी तो ये अव्यक्ति की कौन सी आजादी है । और अगर सरकार इसको आधार बनाकर किसी तरह का कोई नोटिस जारी कर देती है तो फिर देश में इमरजेंसी जैसे हालात का रोना शुरू हो जाएगा । इसी शो में जिस तरह से एक कथित बाबा और कई केस में नामजद ओम जी का मजाक बनाया जा रहा है उसपर भी आपत्ति होनी चाहिए । एक विशेष धर्म के चोगे में मौजूद .ह शख्स जिस तरह की हरकतें कर रहा है उससे धर्मगुरुओं के बारे में गलत संदेश जा रहा है । क्या दर्शकों की संख्या बढ़ाने के लिए क्या किसी की छवि धूमिल की जा सकती है । क्या टी आर पी हासिल करने के लिए किसी की इज्जत उछालने की इजाजत दी जा सकती है ।
अगर आपको याद हो तो अभिषेक बच्चन की शादी के वक्त भी एक महिला सामने आ गई थी और उसने अभिषेक की पत्नी होने का दावा किया था । उसको टी वी चैनलों पर घंटों तक दिखाया गया था । एक तरफ अभिषेक बच्चन के घर में शादी की शहनाई बज रही थी, ऐश्वर्या के हाथों में मेंहदी रचाई जा रही थी तो दूसरी तरफ वो महिला न्यूज चैनलों में लाइव होकर ये बता रही थी कि उसने कहां और कब अभिषेक बच्चन से कथित तौर पर शादी की थी । उसके जो मन में आ रहा था वो आरोप अभिषेक बच्चन पर लगा रही थी और बगैर किसी फिल्टर के वो एयर पर जा रहा था । इसी तरह का केस युवराज के भाई जोरावर के मामले में भी दिखाई दिया कि जो भी आकांक्षा इल्जाम लगा रही थी वो एयर पर जा रहा था, संभव है कि चैनल ने कुछ संपादन किया हो लेकिन दर्शकों को ऐसा प्रतीत नहीं हुआ था । इस तरह के सैकड़ों उदाहरण हैं । टेनिस स्टार सानिया मिर्जा की शादी के वक्त भी जमकर तमाशा हुआ था और न्यूज चैनलों ने इस तमाशे को जमकर भुनाया था । सानिया के पति शोएब के निकाहनामे तक दिखाए गए थे, पता नहीं ये किस तरह की अभिव्यक्ति की आजादी है । सानिया की शादी के वक्त तो उसके घऱ वाले काफी परेशान भी हुए थे लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी जैसे बड़े मुद्दे के सामने एक परिवार की परेशानी की क्या बिसात ।
दरअसल न्यूज चैनलों और अन्य टीवी चैनलों के स्वनियमन का जो मैकेनिज्म है वो बहुत कारगर नहीं है । उसको और मजबूत किए जाने की जरूरत है । मुंबई पर हुए आतंकी हमले के वक्त न्यूज चैनलों के कवरजे को लेकर सवाल उठे थे जिसके बाद सरकार ने आतंकवादी हमले के दौरान कवरेज को लेकर एक गाइडलाइन को बना दी थी लेकिन बहुधा उत्साह और न्यूज चैनलों के सबसे पहले की आपाधापी में गड़बड़ी हो जाती है । इसी तरह से अगर देखें तो हमारे चैनलों ने इस्लामिक स्टेट के बगदादी को कई बार मारा और फिर कई बार जिंदा कर दिया । उससे जुड़ी वारदातों को इस तरह से मिर्च मसाला लगाकर पेश किया जाता है जैसे लगता है कि कोई क्राइम थ्रिलर चल रहा हो । वीभत्स वीडियो को बार बार दिखाया जाता है और कई बार तो उसके कारनामे उसको समर्थकों के बीच हीरो भी बना देते हैं । अभिव्यक्ति की आजादी संविधान हमें देता है लेकिन वही संविधान कुछ जिम्मेदारियां भी तय करता है । हम सबको उसका गंभीरता से पालन करना चाहिए वर्ना सरकार को मौके मिलते रहेंगे ।