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Thursday, July 4, 2019

हिंदी विभागों में रचनात्मक लेखन


हिंदी के मशहूर कथाकार और साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ के संपादक राजेन्द्र यादव हमेशा कहा करते थे कि विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग प्रतिभाओं की कब्रगाह हैं।  उनकी इस भावना का हिंदी के कई साहित्यकार समर्थन भी करते रहे हैं। यादव जी कहा करते थे कि विश्वविद्यालय और कॉलेजों के हिंदी विभागों में रचनात्मक लेखन करनेवाले लोग कम होते जा रहे हैं और जो हैं वो भी बेहद शास्त्रीय किस्म का लेखन कर रहे हैं। हो सकता है ऐसा कहने के लिए उनके पास अपनी वजहें हों लेकिन उनके वक्तव्य के पहले भी और बाद में भी कम से कम दिल्ली विश्वविद्लय के हिंदी विभाग से लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों के हिंदी विभागों में भी कई रचनात्मक लेखक हुए। एक दौर था जब दिल्ली के जाकिर हुसैन कॉलेज के हिंदी विभाग में गंगाप्रसाद विमल, सुधीश पचौरी, कमलकिशोर गोयनका और प्रताप सहगल जैसे लेखक शिक्षण कार्य कर रहे थे। उसी कॉलेज के अंग्रेजी विभाग में भीष्म साहनी भी पढ़ाते थे। नरेन्द्र कोहली जैसे हिंदी के शीर्ष लेखक भी दिल्ली विश्वविदयालय के कॉलेज के हिंदी विभाग में पढ़ा चुके हैं। यह सूची बहुत लंबी है। मौजूदा दौर में भी दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों के हिंदी विभागों में कई लेखक हैं। इनमें से कुछ लेखकों की कृतियां तो इतनी लोकप्रिय हैं कि वो दैनिक जागरण हिंदी बेस्टसेलर की सूची में भी शामिल हो चुकी हैं।
दिल्ली के देशबंधु कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर संजीव कुमार हिंदी की युवा पीढ़ी के शीर्ष आलोचकों में शुमार किए जाते हैं। उन्होंने कहानी पर कई अच्छी आलोचनात्मक टिप्पणियां लिखी हैं। संजीव कुमार ने अनुवाद का काम भी किया है। संजीव कुमार ने कहानी भी लिखी है। उनको आलोचना के लिए दिया जानेवाले प्रतिष्ठित देवीशंकर अवस्थी सम्मान भी मिल चुका है। संजीव कुमार ने जैनेन्द्र और अज्ञेय का सृजनात्मक मूल्यांकन भी किया है। संजीव कुमार की अभी हाल ही में कहानी आलोचना पर एक किताब भी आई है।
जाकिर हुसैन इवनिंग कॉलेज में हिंदी के चर्चित लेखक प्रभात रंजन भी हिंदी पढ़ाते हैं। मनोहर श्याम जोशी पर अभी प्रभात रंजन की संस्मरणात्मक पुस्तक ‘पालतू बोहेमियन’ प्रकाशित होकर चर्चित हो रही है। इसके पहले प्रभात रंजन ने मुजफ्फरपुर की बाइयों को केंद्र में रखकर ‘कोठागोई’ ने नाम से एक औपन्यासिक कृति की रचना की थी। प्रभात रंजन जमकर अनुवाद भी करते हैं। उनकी अनूदित पुस्तक ‘आई डू व्हाट आई डू’, जिसके लेखक रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन हैं, दैनिक जागरण हिंदी बेस्टसेलर की अनुवाद श्रेणी में अपना स्थान बना चुकी है।
दिल्ली विश्वविद्लय के सत्यवती कॉलेज में हिंदी के शिक्षक प्रवीण कुमार ने अपनी रचनाओं के माध्यम से हिंदी साहित्य में सार्थक हस्तक्षेप किया है। उनकी कृति ‘छबीला रंगबाज का शहर’ दैनिक जागरण हिंदी बेस्टसेलर की कथा श्रेणी में अपना स्थान बना चुकी है। उनकी इस कृति की खूब चर्चा भी हुई थी। मशहूर कथाकार काशीनाथ सिंह ने इसपर लिखा था-दूसरे शहर झख मारें बिहार के इस अलबेले छबीला रंगबाज के शहर के आगे, इसे लंबी कहानी कहूं या लघु उपन्यास, जितना ही जबरदस्त है उतना ही मस्त।
इसी तरह किरोड़ीमल कॉलेज में हिंदी विभाग से संबद्ध प्रज्ञा ने भी हाल के दिनों में एक कहानीकार के तौर पर अपनी पहचान बनाई है। उनकी कहानी ‘मन्नत टेलर्स’ को पाठकों ने खूब सराहा। इसी नाम से उनका एक कहानी संग्रह भी प्रकाशित हुआ है। दिल्ली विश्वविद्यालय के ही श्रद्धानंद कॉलेज के हिंदी विभाग में कार्यरत उमाशंकर चौधरी ने भी अपनी कहानियों से हिंदी जगत का ध्यान अपनी ओर खींचा। उनका हाल ही में एक उपन्यास आया है, ‘अंधेरा कोना’। बिहार की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर लिखे गए इस उपन्यास को लेकर पाठकों में उत्सुकता है।       

Saturday, April 1, 2017

विधाओं की टूटती दीवारें

हिंदी साहित्य में जब से यथार्थवाद का जोर बढ़ा था तो उसके बाद धीरे धीरे विधाओं का दायरा भी सिकुड़ने लगा था । पत्र साहित्य, रेखाचित्र, यात्रा वृत्तांत, रिपोर्ताज आदि कम लिखे जाने लगे । पत्र साहित्य को तो तकनीक ने भी कमजोर किया और उसको लगभग खत्म ही कर डाला । यह दौर काफी लंबे समय तक चला । साहित्य में कविता, कहानी, उपन्यास और आलोचना और कुछ हद तक नाटक ये विधा ही केंद्र में रहे । जाहिर बात है कि कवि, कहानीकार, उपन्यासकार, आलोचक और कुछ हद तक नाटककार ही साहित्य के केंद्र में आ गए । यथार्थवाद के दौर में सिनेमा पर लेखन कम हुआ बल्कि यों कहें कि सिनेमा पर लिखनेवालों को बुर्जुआ प्रवृत्ति के पोषक के तौर पर प्रचारित कर हेय दृष्टि से देखा गया । उनकी कृतियों का मूल्यांकन करने के बजाए उसको बगैर पढ़े लिखे ही खारिज कर दिया जाता रहा । इसका बड़ा नुकसान यह हुआ कि हिंदी सिनेमा की इतनी दिलचस्प दुनिया पर गंभीरता से लंबे समय तक लेखन ही नहीं हुआ । हिंदी सिनेमा की उन शख्सियतों पर गंभीर किताबें नहीं आईं जिन्होंने सौ साल से ज्यादा की भारतीय फिल्मों की यात्रा में अपना बेहतरीन योगदान दिया था। काफी लंबे समय तक चले इस दौर के बाद पिछले कुछ वर्षों से उसमें बदलाव लक्षित किया जाने लगा । साहित्य के दायरे का विस्तार हुआ और कई अन्य तरह का लेखन भी साहित्य के केंद्र में आया । शास्त्रीय तरीके के विधाओं के कोष्टक को कई लेखकों ने विस्तृत किया । सिनेमा, खेल आदि पर लेखन शुरु हुआ । परंतु अब भी कई क्षेत्र हैं जिनपर लिखा जाना शेष है । हिंदी में साइंस फिक्शन की तरफ अभी भी लेखकों की ज्यादा रुति दिखाई नहीं देती है । 
साहित्य को लेकर हिंदी में लंबे समय से कोई विमर्श भी नहीं हुआ । इसके स्वरूप और प्रकृति को लेकर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है । प्राचीन भारतीय विद्वानों ने और पश्चिम के आलोचकों, लेखकों ने भी उसपर लंबे समय तक विचार किया था । उन्होनें साहित्य क्या है, साहित्य की प्रकृति क्या हो, कविता क्या है, कहानी कैसी हो, कहानी और उपन्यास में क्या अंतर होना चाहिए, उपन्यास का महाकाव्यत्व क्या हो, साहित्य का व्याकरण क्या हो पर अपनी राय रखी थी । समकालीनों से संवाद किया और अपने पूर्ववर्ती लेखकों के विचारों से मुठभेड़ किया था । बेलिंस्की जैसे विद्वान ने तो साहित्य क्या है, इसको केंद्र में रखकर एक मुकम्मल लेख लिखा ही था । गुरवर रवीन्द्रनाथ टौगोर से लेकर हजारी प्रसाद द्विवेदी तक ने साहित्य की सामग्री और साहित्य का व्याकरण जैसे लेख लिखे । पहले तो किसी विधा विशेष पर उपमहाद्वीप के लेखकों को इकट्ठा कर मंथन होता था । 1963 के आरंभ में लेनिनग्राद में नेवा नदी के किनारे यूरोपीय लेखकों का एक सम्मेलन हुआ था जिसमें अनेक भाषाओं के लेखकों और आलोचकों ने इसमें हिस्सा लिया था ।कई दिनों तक चले इस सम्मेलन में सिर्फ उपन्यास विधा पर बातचीत हुई थी जिसमें कई समकालीन उपन्यासों की प्रवृत्तियों और उपन्यास विधा के भविष्य पर मंथन हुआ था । हिंदी साहित्य में यथार्थवाद के दौर में एक खास विधा पर विचार करने के लिए सभी भारतीय भाषाओं के लेखकों का समागम शायद ही हुआ हो । अब भी इसकी आवश्यकता है ।
अब स्थितियां कुछ बदलने लगी हैं । अब विधाओं का विस्तार हुआ है बल्कि हम कह सकते हैं कि हिंदी में साहित्य ने अपना विस्तार किया है । तमाम बौद्धिक गतिविधियां जो लेखक ने कलमबद्ध किया है उसको साहित्य माना जाने लगा है । पहले भी इस तरह की मान्यता थी लेकिन अब उस मान्यता को पहचान के साथ-साथ स्वीकार्यता भी मिलने लगी है । अंग्रेजी में साहित्य को लिटरेचर कहा जाता है, लिटरेचर का संबंध लेटर यानि अक्षर से है और बहुधा अक्षर में व्यक्त किए गए भावों को साहित्य माने जाने की अवधारणा भी दी गई । इसी के अंतर्गत कृषि साहित्य से लेकर अश्लील साहित्य तक का वर्गीकरण किया गया था । हिंदी में यह अवधारणा बहुत चल नहीं पाई और मुख्य विधाओं को ही साहित्य माना जाता रहा । उसमें से कई युवा लेखकों ने प्रयोग किए । कई युवा साहित्यकारों ने पहले किसी अन्य विधा के लेखक के तौर पर अपनी पहचान बनाई और फिर उन्होंने अपने लिए नया रास्ता चुना और अब उनकी पहचान उस नए रास्ते की वजह से हो रही है ।
उदाहरण के तौर पर देखें तो यतीन्द्र मिश्र का आगमन साहित्य में एक कवि के तौर पर हुआ था और उन्हें कविता का प्रतिष्ठित ‘भारत भूषण अग्रवाल सम्मान’ भी मिला था लेकिन अब उनको साहित्य में कवि के रूप में कम और संगीत अध्येता के रूप में ज्यादा जाना जाता है । उन्होंने ‘अक्का महादेवी’ से लेकर ‘लता मंगेशकर’ पर गंभीरता से लिखकर अपनी तो नई पहचान स्थापित की ही साहित्य का दायरा भी बढ़ाया । इसी तरह से एक दूसरा नाम अनु सिंह चौधरी का है । अनु ने पहले अपनी पहचान एक कहानीकार के रूप में बनाई । उनका कहानी संग्रह ‘नीला स्कार्फ’ काफी चर्चित रहा और कहानी की दुनिया में उनको गंभीरता से लिया जाने लगा लेकिन जब से उनकी किताब ‘मम्मा की डायरी’ प्रकाशित हई तो उनकी कहानीकार वाली पहचान नेपथ्य में चली गईं और एक स्त्री के कदम कदम पर संघर्ष को सामने लाने वाली लेखिका के तौर पर पहचाना जाने लगा । इसी तरह से अगर देखें तो रत्नेश्वर सिंह ने पहले अपनी पहचान एक कहानीकार के तौर पर स्थापित की लेकिन बाद में ‘जीत का जादू’ जैसी बेहतरीन किताब लिखकर मोटिवेशनल गुरू के तौर पर खुद को स्थापित किया । रत्नेश्वर को उनकी कहानियों और मीडिया पर लिखी दर्जनों किताब से ज्यादा पहचान ‘जीत का जादू’ ने दिलाई । अब रत्नेश्वर का नया उपन्यास ‘रेखना मेरी जान’ प्रकाशित होने वाली है जिसके लिए प्रकाशक ने उनके साथ पौने दो करोड़ रुपए का कांट्रैक्ट किया है । यह सूची काफी लंबी हो सकती है । प्रभात रंजन की पहचान भी पहले कहानीकार के तौर पर हुई । कहानी के लिए उनको पुरस्कार आदि भी मिले लेकिन अब वो मुजफ्फरपुर की बाइयों पर लिखी अपनी किताब ‘कोठागोई’ की वजह से जाने जाते हैं । इसी सूची में एक नाम शाजी जमां का भी है । पत्रकार शाजी जमां ने एक उपन्यासकार के तौर पर खुद को स्थापित किया । उनके दो उपन्यास ‘प्रेम गली अति सांकरी’ और ‘जिस्म जिस्म के लोग’ खूब चर्चित रहे थे । अब अकबर पर ऐतिहासिक उपन्यास लिखकर अपनी एक अलग पहचान कायम की । साहित्य का दायरा तो बढाया ही । ये वो लोग हैं जिन्होंने विधाओं की चौहद्दी को तोड़ा ।

एक अलग तरह के लेखन से अपनी पहचान तो नीलिमा चौहान ने भी बनाई । उनकी किताब ‘पतनशील पत्नियों के नोट्स’ ने साहित्य की दुनिया को झकझोरा जरूर । यह पुस्तक किसी शास्त्रीय विधा के दायरे में नहीं आती है लेकिन इसने अपनी भाषा से अपने कथ्य से साहित्य की श्लील कही जानेवाली सीमा रेखा का अतिक्रमण किया । नीलिमा की इस बात के लिए खूब आलोचना भी हो रही है कि उसने अश्लील भाषा का इस्तेमाल किया । इस किताब के प्रकाशक ‘वाणी प्रकाशन’ की भी कुछ स्थापित शास्त्रीय किस्म के लेखकों ने लानत मलामत की । उनका कहना था कि प्रकाशक ने इस किताब को प्रकाशित कर फूहड़ता को बढ़ावा दिया है और साहित्यक प्रकाशनों की अपनी विरासत को झटका दिया है । इन लोगों से मेरी विनम्र गुजारिश है कि वो ई एल जेम्स की दो हजार ग्यारह में प्रकशित कृति ‘फिफ्टी शेड्स’ के बारे में जानकारी इकट्ठा कर लें । पूरी दुनिया में इस ट्राएलॉजी को प्रकाशित करनेवाले प्रकाशकों की सूची पर नजर डालेंगे तो रैंडम हाउस से लेकर एरो बुक्स जैसे प्रतिठित प्रकाशकों का नाम नजर आएंगें । दरअसल जो लोग किसी भी कृति पर अश्लीलता और फूहड़ता का आरोप लगाते हैं उनसे बदलते वक्त को पहचानने में चूक होती है या फिर किसी खास एजेंडे के तहत इस तरह की बहस उठाई जाती है । साहित्य में शुचिता का सवाल बहुत पुराना है । एक जमाने में लेडी चैटरलीज़ लवर को लेकर भी इस तरह की बातें हुई थीं और उसपर पाबंदी आदि लगाने तक के कदम उठे थे लेकिन आज वो क्लासिक माना जाता है । किसी भी कृति को अश्लील कहकर खारिज कर देना दरअसल पलायनवादी प्रवृत्ति है, प्रयोगों की नवीनता से टकराने से ज्यादा आग्रह इस बात का होता है कि उसका तमाशा बना दिया जाए । उपरोक्त बातों का यह अर्थ कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि पतनशील पत्नियों के नोट्स, ई एल जेम्स की फिफ्टी शेड्स या फिर लेडी चैटरलीज़ लवर जैसी कृति है । हां इतनी अपेक्षा अवश्य है कि किसी भी कृति का मूल्यांकन बगैर पूर्वग्रह के हो । वक्त बदल रहा है इसको पकड़ने की जरूरत है । कोंस्तानिन फेदिन ने कहा था- यथार्थ की सामग्री लगातार बदलती जा रही है अत: यह स्वाभाविक है कि कृतियों में उसकी अभिव्यक्ति भी परिवर्तित होगी। रूप भी रेडीमेड पोशाक नहीं है । लेखक का इसके संबंध में दृष्टिकोण भीइस सामग्री से पैदा होता है जो उसने जीवन से ग्रहण किया है । 

Wednesday, September 9, 2015

बाजार को सही पकड़े हैं...

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में एक प्रसंग में लिखा है – घन घमण्ड नभ गरजत घोरा/ प्रियाहीन डरपत मनमोरा । गोस्वामी जी इस पूरे प्रसंग में मौसम, बारिश और उफनती नदी के बहाने से नीतियों की बात करते हैं । राम और लक्ष्मण के इस संवाद में समाज और राजकाज के बारे में राम अपने विचार प्रकट करते हैं । दरअसल इस तरह की बातें करके राम अपने मन की बात अनुज लक्ष्मण से छिपाना चाहते हैं । लेकिन प्रियतमा का विछोग छुपाना मुश्किल है और मर्यादा पुरुषोत्तम होते हुए भी राम के मुख से उपरोक्त पंक्तियां निकल ही जाती हैं । वो बारिश के मौसम में सीता के वियोग का दर्द उनकी जुबां पर आ ही जाता है । हिंदी के वरिष्ठ लेखकों की हालत भी राम के जैसी ही है । वो भी मन ही मन बाजार की चाहत रखते हैं लेकिन नीतियों, सिद्धांतों और विचारधारा की वजह से उसकी बात करना उचित नहीं समझते हैं । उन्हें लगता है कि सार्वजनिक रूप से बाजार की वकालत करने से उनकी छवि पर विपरीत असर पड़ेगा, ठीक वैसे ही जैसे राम के मन में ये द्वंद चलता है कि अपनी प्रियतमा के विछोह के दर्द को अपने छोटे भाई के साथ कैसे साझा करें । हिंदी के साहित्यकारों के लिए अब तक बाजार एक अछूत की तरह था । बाजार का नाम लेना तक उन्हें गंवारा नहीं था और जब भी उनके लबों पर बाजार आता था तो उसके खिलाफ ही आवाज निकलती थी । यह विरोधाभास हिंदी में लंबे समय तक चलता रहा । विरोधाभास इस वजह से कि लेखक कोई भी रचना लिखता है तो उसकी आकांक्षा होती है कि वो छपे । जैसे ही वो प्रकाशक के पास जाता है वैसे ही वो बाजार में प्रवेश करता है । किताब छपने के बाद हर लेखक की आकांक्षा होती है कि वो हिंदी के विशाल पाठक वर्ग तक पहुंचे । अब ये जो चाहत है वो बाजार के बगैर पूरी नहीं हो सकती । किताब छपने और बिकने के तंत्र में बाजार आवश्यक है । हमारे हिंदी के लेखक इस बात को नहीं समझ पाए और विचारधारा की जकड़न में बेवजह बाजार का विरोध करने लगे । नतीजा यह हुआ कि बाजार भी हिंदी साहित्य के प्रति उदासीन होता चला गया । हाल के दिनों में अलका सरावगी ने फेसबुक के जरिए बाजार में अपनी पैठ बनाने की छोटी सी कोशिश की तो उनकी हिंदी के लोगों ने इतनी लानत मलामल कि दूसरे लेखकों को उस तरह की पहल करने से पहले सोचने को मजबूर होना पड़ेगा । हिंदी साहित्य जगत में अक्सर ये बात सुनी जाती है कि साहित्यक किताबें नहीं बिकतीं । प्रकाशक भी बिक्री नहीं होने की बात करते हुए साहित्यक कृतियों के प्रकाशन के प्रति उत्तरोतर उदासीन होने लगे हैं । कविता के प्रकाशक तो मिलने लगभग बंद हो गए हैं । बाजार और बाजार का विरोध विचारधारा के आधार पर करने को गलत ठहराना इस लेख का मकसद नहीं है । मकसद सिर्फ इतना जाहिर करना है कि इस ठस मानसिकता और विरोध ने साहित्य का कितना नुकसान किया ।

अब  स्थितियां थोड़ी बदलने लगी हैं । बाजार और उसके औजारों का उपयोग लेखक अपनी रचनाओं से लेकर उसकी बिक्री तक में करने लगे हैं । इसके सकारात्मक नतीजे भी मिलने लगे है । हिंदी के युवा लेखकों ने अपनी भाषा बदली, कहानी का विषय वस्तु बदला, परिवेश बदला और सबसे बड़ी बात कि रूढ़ होता जा रहा यथार्थ भी उनके रचनाओं में नए रूप में आने लगा । अब हम अगर इस वक्त के समकालीन साहित्यक परिदृश्य डालते हैं तो जो युवा या युवा होने की दहलीज पार कर चुके हैं उनकी रचनाओं में एक तरह का टटकापन नजर आता है । अगर हम उपन्यास लेखन पर बात करें तो जिस तरह से पंकज दूबे और सत्य व्यास ने अपने पहले ही उपन्यास से हिंदी के पाठकों को ना केवल चौकाया बल्कि उसकी बिक्री ने भी पहली कृति के लिहाज से सफलता के झंडे गाड़ दिए । पंकज दूबे के उपन्यास ‘लूजर कहीं का’ दो भाषाओं में लिखा गया- अंग्रेजी और हिंदी । अंग्रेजी में भी वो काफी सफल रहा । पंकज दूबे ने अपने इस उपन्यास को सफल बनाने के लिए बाजार से दोस्ती की । विषयवस्तु में नयापन था, प्रेम भी वैसा ही था जो कॉलेज के दिनों में होता है, बस कमी थी पाठकों तक पहुंचने की, जैसे ही इस कमी को दूर किया गया पाठकों के साथ साथ बाजर ने उसको हाथों हाथ लिया । इसी तरह से सत्य व्साय के उपन्यास ‘बनारस टॉकीज’ को भी पाठकों ने हाथों हाथ इस वजह से लिया कि उसने अपनी भाषा से, अपने कथानक से अपन किस्सागोई से पाठकों को अपनी ओर खींचा । भाषा को उसकी शुद्धता के जकड़न से मुक्त कर विश्वविद्लाय के छात्रों के बीच बोली जानेवाली भाषा को अपनाया । जैसे ‘बाबा’ शब्द विश्वविद्लायों में काफी चलता है, सत्य ने इस शब्द को अपने एक चरित्र के माध्यम से जीवंत कर दिया । इन दोनों उपन्यासों में लेखकों ने शीर्षक भी पाठकों के साथ साथ बाजार को ध्यान में रखते हुए चुना है । लूजर कहीं का और बनारस टॉकीज । शीर्षक के अलावा दोनों किताबों की कीमत भी कम सवा सौ रुपए के रेंज में है । दोनों लेखकों और उनके प्रकाशकों ने भी इन किताबों को बेचने के लिए सोशल मीडिया से लेकर ऑनलाइन बुक स्टोर्स पर जमकर प्रचार किया । नतीजा मिला । पंकज दूबे का नया उपन्यास ‘इश्कियापा’ भी छपकर आनेवाला है । उस किताब का कवर उसके प्रकाशक ने रिलीज कर दिया है और किताब को लेकर पाठकों के बीच उत्सकुकता का माहौल बनाने का काम भी जारी है । इसी तरह अभी वाणी प्रकाशन से प्रभात रंजन की किताब ‘कोठागोई’ प्रकाशित हुई है । इस किताब में हिंदी के लगभग वर्जित प्रदेश में लेखक घुसता है और वहां से कहानी को उठाता है । बिहार के मुजफ्फरपुर की बदनाम बस्ती चतुर्भुज स्थान में संगीत की एक समृद्ध परंपरा थी जो कि बदनामी में दबी हुई थी । प्रभात ने उसको उठाकर सामने रख दिया । इसके अलावा प्रभात रंजन और उसके प्रकाशक ने भी बाजार से रार नहीं ठानी और उसकी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया । किताब की बिक्री बढ़ाने के लिए ऑफर से लेकर उपलब्धता तक को इंश्योर किया गया । यासिर उस्मान नाम के एक युवा लेखक ने राजेश खन्ना पर हिंदी और अंगेजी दोनों भाषाओं में एक साथ लिखा – राजेश खन्ना, कुछ तो लोग कहेंगे । राजेश खन्ना भारतीय सिनेमा का एक ऐसा किरदार है जिसके बारे में अब भी किवदंतियां चलती हैं । यासिर की इस पहली किताब को भी पाठकों ने हाथों हाथ लिया । हिंदी के एक और प्रकाशक हिंदी युग्म ने भी बाजार को लेखक के साथ जोड़ने का उपक्रम शुरू किया है ।कम कीमत की पुस्तकें और ऑनलाइन बिक्री का कॉकटेल । इसका नतीजा भी मिल रहा है । अनु सिंह चौधरी से लेकर निखिल सचान तक की किताबों की जमकर बिक्री हो रही है । प्रकाशक का दावा है कि उनके लेखकों के किताबों की ऑनलाइन प्री बुकिंग भी होती है । यह बहुत अच्छी बात और साहित्य के लिए शुभ संकेत है। हिंदी युग्म ने बिल्कुल नए लेखकों को अपने साथ जोड़ा और उनको ऑनलाइन बिक्री के प्लेटफॉर्म पर पाठकों के सामने पेश कर दिया । उनका दावा है कि उनकी कई किताबें हजारों में बिकी हैं । अब एक दूसरा पक्ष । गीताश्री ने अपने नए कहानी संग्रह- स्वप्न साजिश और स्त्री में अपनी भाषा और नए कथ्य से पाठकों को चौकाया है । गीताश्री के पास चमत्कृत कर देनेवाली भाषा है और  विषय का नयापन भी । अगर इस किताब को प्रकाशक ऑनलाइन स्टोर्स पर उपलब्ध करवा सकें तो यह पाठकों के बीच जबरदस्त लोकप्रिय होने के पूरे आसार हैं ।  साहित्य में युवा लेखकों ने जिस तरह से बाजार की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया है और खुद को विचारधारा आदि की जकड़ने से मुक्त कर पाठकों को ध्यान में रखकर लिखना शुरू किया है वह एक शुभ संकेत हैं । लेखक और प्रकाशक के साझा प्रयास से बाजर पर फतह संभव है । बाजारवाद के इस दौर में बुद्धिमानी यही है कि बाजार का अपने हक में इस्तेमाल करें, इससे साहित्य, साहित्यकार और पाठक तीनों का भला होगा, प्रकाशक का तो होगा ही । 

Tuesday, June 30, 2015

साहित्य का बढ़ता दायरा

समकालीन हिंदी साहित्य के परिदृश्य में युवा लेखकों ने दशकों से चली आ रही लीक से अलग हटकर चलने के संकेत देने शुरू कर दिए हैं । दशकों से हिंदी में यह परंपरा चल रही थी कि कविता कहानी और उपन्यास के अलावा साहित्येतर विषयों पर लेखन नहीं हो रहा था । नतीजा हम सबके सामने हैं हिंदी साहित्य से कई विधाएं लगभग गायब होती चली गईं । संस्मरण तो यदा कदा लोग लिख भी रहे हैं लेकिन यात्रा वृत्तांत तो एक विधा के तौर पर लगभग समाप्त हो गया । यह माना जा सकता है कि तकनीक के फैलाव की वजह से पत्र लेखन खत्म हो गया लेकिन अन्य विधाओं को तो हमने खुद समाप्त किया । फिल्म और संगीत पर लिखनेवालों को हेय दृष्टि से देखने या फिर बुर्जुआ विचाधारा के पोषक माने जाने की वजह से नए लेखकों ने उधर देखना बंद कर दिया । कहानी और उपन्यास में एक खास किस्म की विचारधारा और यथार्थ को बढ़ावा देने की कोशिश ने भी इन विधाओं को नुकसान पहुंचाया । हलांकि इस शताब्दी की शुरुआत में ही कई लेखकों ने इस ठस सिद्धांत पर अपनी रचनाओं के माध्यम से हमला किया लेकिन फिर भी बहुतायत में लेखक में उसी लीक पर चलते रहे । हाल के दिनों में जिस तरह से लेखकों ने ना केवल फिल्मों पर बल्कि संगीत पर भी संजीदगी से लिखना शुरू किया है वह साहित्य की समृद्धि के संकेत देता है । हमारे यहां पहले गंभीरता से इन विषयों पर लिखा जाता था लेकिन कम्युनिस्ट काल में साहित्य लेखन एक खांचे में बंध गया जो अब आजाद होने के लिए छटपटा रहा है ।
पिछले दिनों युवा लेखक यासिर उस्मान ने राजेश खन्ना को केंद्र में रखकर एक मुकम्मल किताब लिखी । राजेश खन्ना बॉलीवुड के उन सितारों में से हैं जिनके वयक्तित्व के पहलुओं का खुलना बाकी है । अंग्रेजी में गौतम चिंतामणि ने ये कोशिश की । यासिर उस्मान के अलावा कुछ दिनों पहले पंकज दूबे ने लूजर कहीं का और सत्य व्यास ने बनारस टॉकीज नाम से उपन्यास लिखा । ये दोनों उपन्यास साहित्य की स्थापित लीक को चुनौती देते हैं । यही वजह है कि पाठकों को ये दोनों उपन्यास काफी पसंद आए । हिंदी के स्थापित आलोचकों ने इन उपन्यासों का नोटिस नहीं लिया उन्हें लगा कि इनकी भाषा मान्य भाषा से कमजोर है ।  लेकिन इनकी भाषा आज की युवा पीढ़ी की भाषा है । इनके पात्र वही भाषा बोलते हैं जो आज के लड़के लड़कियां बोलते हैं । यब बात हिंदी के आलोचकों के गले नहीं उतरती है । तो स्थापित मान्यताओं को हर स्तर पर चुनौती दी जाने लगी है । अभी हाल ही में कई वरिष्ठ लेखकों की कहानियां और उपन्यास पढ़ने का अवसर मिला । उनकी भाषा को देखकर अब भी लगता है कि वो पता नहीं किस दुनिया में जी रहे हैं । रेणु ने अपने जमाने जो भाषा लिखी क्या अब भी वही भाषा चलेगी । उन लेखकों को यह समझना होगा कि गांव की भाषा में बहुत ज्यादा बदलाव हुआ है  । प्रभात रंजन के नए उपन्यास कोठागोई को लेकर भी हिंदी साहित्य में बहुत उत्सकुता है । इस उपन्यास में प्रभात रंजन ने बिहार के मुजफ्परपुर के चतुर्भुज स्थान की बाइयों को केंद्र में रखा है और उनकी अनसुनी दास्तां पाठकों के सामने पेश की है । अब यह हिंदी साहित्य का एक ऐसा प्रदेश है जिसमें सालों से किसी लेखक ने प्रवेश नहीं किया था । कोठेवालियां से लेकर कोठागोई तक के सफर पर नजर डालें तो साहित्य के इस रास्ते पर लगभग सन्नाटा नजर आता है । जबकि बाइयों की यह परंपरा अब लगभग समाप्ति की ओर है और उनके किस्सों को अपनी रचनाओं में जीवित रखने की कोशिश का यह प्रयास सराहनीय है । यह कहना जल्दबाजी होगी की नए लेखकों ने अपनी कलम की ताकत से साहित्य को करवट लेने को मजबूर कर दिया है लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि साहित्य को करवट लेने के लिए उकसाने की गंभीर कोशिश शुरू हो गई है । यह हिंदी साहित्य के लिए शुभ संकेत है ।