Translate

Showing posts with label रत्नेश्वर. Show all posts
Showing posts with label रत्नेश्वर. Show all posts

Saturday, February 15, 2020

वैचारिक जकड़न से आजाद होते उपन्यास

हिंदी कथा परिदृश्य की अगर बात करें तो हम पाते हैं कि पिछले कुछ सालों में इसने अपने भूगोल का विस्तार किया है। वामपंथी विचार के प्रभाव में खास तरह की कहानियां या उपन्यास लिखे जा रहे थे। ये दौर बहुत लंबे समय तक चला और एक खास तरह की फॉर्मूलाबद्ध कहानियां और उपन्यास लिखे जाते रहे। एक गरीब होगा, उसका संघर्ष होगा, समाज के प्रभावशाली व्यक्ति के गरीबों के शोषण का चित्र होगा, उसमें लंबे लंबे वैचारिक आख्यान होगें और फिर कई बार सुखांत को कई बार दुखांत होगा। ये कथा-प्रविधि चलती रही। कुछ लेखक इससे हटकर भी लिखते रहे लेकिन जोर इसी तरह के लेखन का रहा। दुनिया को बदलने का स्वप्न देखनेवाले कथा लेखक अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता की वजह से अपनी कहानियों या उपन्यासों को भी दुनिया को बदलने का औजार बनाते चले गए।  जब इस तरह के औजार के प्रयोग हुआ तो उसने हिंदी के पाठकों को चौंकाया। लेकिन जब यही प्रविधि ज्यादातर लेखक लगातार उपयोग करने लगे तो पाठकों के बीच एक खास किस्म की ऊब पैदा हुई।
विचारधारा की जकड़न वाले ऐसे कथा लेखक इस बात का प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से उद्घोष भी करते रहे कि वो विचारधारा के पोषण के लिए और उसको मजबूत करने के लिए लिखते हैं। वो पाठकों की परवाह भी नहीं करते थे, बाजार की परवाह करना तो खैर उनकी मातृ-विचार के खिलाफ ही था। इसका दुष्परिणाम हिंदी साहित्य को झेलना पड़ा। एक समय ऐसा भी आया जब हिंदी साहित्य जगत में पाठकों की कमी को लेकर विमर्श शुरू हो गया। बड़े बड़े संस्थानों से लेकर साहित्यिक पत्रिकाओं में हिंदी के पाठकों की कमी का रोना रोते हुए लेख आदि छपने लगे। पाठकों की कमी की बात जब मुखर होने लगी तो उसी दौर में ये बाते में भी सामने आने लगीं कि हिंदी के कहानी संग्रह और उफन्यासों का संस्करण तीन सौ प्रतियों का होने लगा। लेकिन कभी भी इस बात की पड़ताल करने की कोशिश नहीं की गई कि पाठक क्यों कथा साहित्य से दूर जाने लगे हैं। लेखकों ने पाठकों की रुचि का ध्यान नहीं रखा और कहते भी थे कि वो रुचि का ध्यान रखकर लेखन नहीं कर सकते हैं। अगर बाजार की भाषा में इसको समझने की कोशिश करें तो कह सकते हैं कि वामपंथी लेखकों ने उपभोक्ता यानि पाठकों की रुचि का ध्यान नहीं रखा। वो रवीन्द्रनाथ टैगोर का कहा भी भूल गए। टैगौर साहब ने साहित्य की सामग्री नामक अपने लेख की शुरुआत में ही कहा था- ‘केवल अपने लिए लिखने को साहित्य नहीं कहते हैं- जैसे पक्षी अपने आनंद के उल्लास में गाता है उसी प्रकार हम भी अपने आनंद में विभोर होकर केवल अपने लिए ही लिखते हैं, मानो श्रोता या पाठक का उस से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता। यह बात बिल्कुल निर्विवाद रूप से नहीं कही जा सकती कि पक्षी जब गाता है तब वह पक्षी समाज जरा भी उसके ध्यान में नहीं होता। यदि नहीं होता को न सही, इस बात पर तर्क करने से लाभ ही क्या है? परंतु यह तो मानना ही पड़ेगा कि लेखक की रचना का प्रधान लक्ष्य पाठक-समाज होता है।‘ लेकिन वामपंथी लेखकों ने पाठक समाज को ध्यान में नहीं रखा उनका लक्ष्य तो कथा साहित्य से अपनी विचारधारा को पुष्ट करना था।  
जब वामपंथी विचारधारा का पराभव शुरू हुआ तो हिंदी साहित्य का कथा लेखन भी इस वैचारिक लेखन से मुक्त होने लगा। इसके बीच आर्थिक उदारीकरण के बाद के दौर में ही कथाभूमि में पड़ने शुरू हो गए थे। इक्कीसवीं सदी के आरंभ में बदलाव का ये पौधा उगना शुरू हो गया था और लोगों ने इससे अलग हटकर उपन्यास लिखना शुरू कर दिया था। इसी दौर में मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों ने अपनी नवीनता की वजह से हिंदी के पाठकों का ध्यान आकृष्ट किया था। भगवानदास मोरवाल का उपन्यास ‘रेत’ और मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास ‘अल्मा कबूतरी’ ने पाठकों को कथा के ऐसे प्रदेश से परिचय करवाया जिस ओर जाने से हिंदी के उपन्यास लेखक हिचकते थे। इन दोनों उपन्यासों में लेखकों ने जिन समुदायों को कथा के केंद्र में रखा है उसके जीवन को पाठकों के सामने पेश करने की कोशिश की, मोरवाल ने कुछ हिचक के साथ तो मैत्रेयी ने बोल्ड होकर। हम इन दोनों उपन्यासों को विचारधारा से मुक्त होने का प्रस्थान बिंदु मान सकते हैं। हलांकि मोरवाल के उपन्यासों में उसके अवशेष यदा कदा दिख जाते हैं।
इसके बाद के कथा लेखन खास तौर पर उपन्यासों को देखें तो वहां वैचारिक प्रतिबद्धता को पाठकों की रुचि ने विस्थापित कर दिया। नए लेखकों ने विश्वविद्यालय कैंपस की जिंदगी को विषय बनाया और पाठकों ने उनको खूब पसंद किया। इनमें से कुछ लेखक अब कैंपस से बाहर निकल गए हैं और उन्होंने अपने दायरे का विस्तार कर लिया जबकि कई लेखक अब भी कैंपस के ही चक्कर लगा रहे हैं। इनमें से जो लेखक कैंपस से बाहर निकल गए हैं उनकी व्याप्ति बढ़ी है और जो कैंपस में ही अटके हैं उनसे अपेक्षा की जा रही है कि वो अपनी कथाभूमि का विस्तार करें। पिछले दो तीन सालों को देखें तो कथा भूमि का और विस्तार दिखाई देता है। अब उपन्यासों के विषयों में पहले की अपेक्षा अधिक विविधताएं दिखाई देने लगी हैं। हिंदी का लेखक समाज बहुत बड़ा है और उसी अनुपात में पुस्तकें भी प्रकाशित होती हैं। लेकिन जिन उपन्यासों ने अपनी विषयगत नवीनता की वजह से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा उसमें पर्यावरण पर लिखा उपन्यास है, उसमें समाज में व्याप्त कानूनी असामनता को लेकर लिखा गया उपन्यास है। पिछले वर्ष के अंतिम महीने में दो ऐसे उपन्यास आए जिसने अपनी विशयगत नवीनता से पाठकों को चौंकाया। रत्नेश्वर ने फिर से पर्यावरण को अपने उपन्यास का विषय बनाया। उनका उपन्यास एक लड़की पानी पानी ने पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसमे रत्नेश्वर ने पानी की समस्या को बेहद रोचक तरीके से उठाया है। स उपन्यास के केंद्र में पानी की समस्या है, उपन्यास के पात्रों के बीच पानी की कमी को लेकर चलनेवाला विमर्श है जो भविश्य के खतरों के प्रति लोगों को आगाह भी करती है। इसी तरह से भगवानदास मोरवाल ने अपने नए उपन्यास वंचना में महिलाओं और बच्चों के लिए बनाए गए कानून की खामियों को विषय बनाया है। इस उपन्यास में मोरवाल ने बेहद सधे हुए अंदाज में संवेदनशील तरीके से उन स्थितियों की चर्चा की है। इन दोनों उपन्यासों में लेखकों के सामने अपनी कृतियों को पठनीय बनाए रखने की चुनौती थी जिसका सामना दोनों ने बखूबी किया। इस तरह के विषय हिंदी उपन्यासों के लिए पहले बिल्कुल नहीं सोचे गए थे। अगर लिखे गए हों तो संभव है कि मेरी नजर में ना आए हों। मार्क्सवादी लेखकों ने तो पर्यावरण को इस वजह से अपने लेखन में तवज्जो नहीं दी क्योंकि उनके आराध्य ने ही इस विषय पर कुछ नहीं देखा। दुनिया बदवे का स्वप्न देखते देखते बदलती हुई दुनिया उऩसे छूट गई।
ऐतिहासिक, पौराणिक और मिथकीय चरित्रों पर पहले भी लेखन होता था और अब उसमें काफी वृद्धि हुई है। राष्ट्रवाद के दौर में पाठकों की रुचि को ध्यान में रखकर ढेर सारे लेखकों ने महाभारत और रामायण के चरित्रों को लेकर उपन्यास लिखे। पहले नरेन्द्र कोहली ने अकेले इन विषयों पर विपुल लेखन किया जिसे बाद में अमीश से लेकर कई अन्य लेखकों ने बढाया। लेकिन पिछले ही साल नरेन्द्र कोहली का एक उपन्यास सागर मंथन प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने कथा के एक बिल्कुल नए क्षेत्र में प्रवेश किया जिसमें पौराणिकता के साथ साथ विज्ञान भी है। इस तरह से हम कह सकते हैं कि जो हिंदी में कथा साहित्य का जो मौदूदा दौर है उसको विचारधारा की गुलामी से मुक्त होने का दौर कह सकते हैं। उसको वर्तमान और भविष्य की चिंताओं को अपने अपने उपन्यासों का विषय बनाकर पाठकों के समक्ष ले जाने का जोखिम उठाने का दौर है। इस दौर को पाठकों या व्यापक हिंदी समाज की रुचियों की पूर्ति का दौर भी कह जा सकता है। यह अकारण नहीं है कि अब प्रकाशक लगातार सार्वजनिक तौर पर अपनी पुस्तकों के नए संस्करणों की बात करने लगे हैं। वो खुलकर ये बताने लगे हैं कि अमुक उपन्यास या अमुक पुस्तक की इतनी प्रतियां बिकीं। इस बदलाव को एक सुखद बदलाव के तौर पर भई देखा और रेखांकित किया जाना चाहिए। ये दौर उन आलोचकों के लिए भी चुनौती का दौर है जो सिर्फ उन्हीं पुस्तकों पर विचार करते रहे हैं जो उनकी विचारधारा के करीब रही है।

Saturday, August 24, 2019

बहिष्कार से नहीं संवाद से बनेगी बात


लगभग एक पखवाड़े पहले पटना में रहनेवाले हिंदी के उपन्यासकार रत्नेश्वर ने फेसबुक पर एक टिप्पणी लिखी, ‘इस समय हिन्दी के कई सुपर हिट गीत लिखने वाले मनोज मुंतशिर के साथ एक शाम। मनोज मुंतशिर ने ‘तेरी गालियां’ से लेकर ‘तेरे संग यारा’, ‘मेरे रश्के-कमर’ आदि अनेक लोकप्रिय गीत लिखे हैं। इनके गीत अभी क्या हिन्दी और क्या अहिन्दी सबकी जुबान पर चढ़े हुए हैं। ‘कलम’ श्रृंखला के अंतर्गत चाणक्य होटल में मनोज मुंतशिर मुखातिब थे। कार्यक्रम खत्म होने के बाद कार्यक्रम संयोजक एवं संचालिका अन्विता प्रधान मेरे पास आईं और मुझे धन्यवाद देते हुए कहा- 'आपका धन्यवाद कि आप आए। अन्यथा हिन्दी के एक भी प्रतिष्ठित लेखक का नहीं आना खटकता।‘ अब सवाल यह है कि हिन्दी का ढिंढोरा पीटने वाले, हिन्दी से यश पाने वाले, हिन्दी का पुरस्कार लेनेवाले स्वनामधन्य लेखक इसमें शामिल क्यों नहीं हुए! हिन्दी के गंभीर लेखक हिन्दी सिनेमा को स्तरहीन मानते हैं और उसे अपने साहित्य के बराबर का दर्जा नहीं देते। यह आज से नहीं हमेशा से है। जिस सिनेमा ने हिन्दी को हिन्दी भाषी क्षेत्रों में ही नहीं अहिन्दी आमजन तक पहुंचाने में जबरदस्त भूमिका निभाई। वह हमारे लिए अछूत जैसा क्यों है? हिन्दी के गंभीर लेखकों का अपना महत्त्व है पर भाषा को जन-जन तक पहुंचाने का काम हिन्दी सिनेमा ने उनसे कहीं ज्यादा किया है। अन्यथा संस्कृत के तो एक-से-एक प्रकांड विद्वान हमारे बीच रहे हैं पर वह क्यों आमजन के बीच सिर्फ मंत्रों में सिमट कर रह गई। हिन्दी की सर्वमान्य समृद्धि चाहिए तो सबको समान दर्जा देना ही होगा। अहिन्दी भाषियों की टूटी फूटी हिन्दी के उपहास से भी बचना होगा। अन्यथा ढोल पीटते रह जाएंगे और हिन्दी संस्कृत की राह चल पड़ेगी। रत्नेश्वर की टिप्पणी के उत्तरार्ध से असहमि होते हुए मुझे लगा कि फिल्म को लेकर तथाकथित गंभीर साहित्याकारों के मन में जो उपेक्षा भाव की बात उन्होंने की है उसको रेखांकित किया जाना आवश्यक है। पटना के कथित गंभीर साहित्यकारों की ‘कलम’ कार्यक्रम में अनुपस्थिति की रत्नेश्वर की टिप्पणी का वरिष्ठ लेखिका उषाकिरण खान ने प्रतिवाद किया। ठीक किया, लेकिन ‘कलम’ के हर कार्यक्रम में जिनकी आवश्यक उपस्थिति होती है उन सभी का ना होना रत्नेश्वर की आशंका को पुष्ट ही करता है। मनोज मुंतशिर हमारे दौर के महत्वपूर्ण कवि-गीतकार हैं। उनकी कविताओं का संग्रह जागरण बेस्टसेलर की सूची में शामिल हो चुका है। उनके गीत तो लोकप्रिय होते ही हैं। उनके कार्यक्रम में पटना के कथित गंभीर साहित्यकारों का ना आना साहित्यकारों के अहंकार को भी दर्शाता है। ये ऐसा अहंकार है जो आपको अघोषित बहिष्कार करने के लिए बाध्य करता है। जब आप किसी का बहिष्कार करते हैं तो आप संवाद बाधित करते हैं। संवाद बाधित होने से लोकतंत्र कमजोर होता है। लेकिन विचारधारा विशेष के लेखकों को लोकतंत्र से क्या देना वो तो विदेशों में बैठे अपने आकाओं के इशारे पर साहित्यिक कदमों को भी तय करते हैं। यह अलग बात है कि अब उनके विदेशी आका थोड़े कमजोर हो गए हैं और दिशा निर्देश के साथ धन नहीं भेज पाते हैं तो उनके समर्थक थोड़े उदासीन हो गए हैं। लेकिन अंग्रेजी की एक कहावत है न कि पुरानी आदतें देर से जाती हैं, तो ये भी अबतर पुरानी आदतों से उबर नहीं पाए हैं। मनोज मुंतशिर के कार्यक्रम को लेकर पटना के साहित्यकारों की उदासीनता खेदजनक है। खास तौर पर उन लेखकों की उदासीनता जो बिना नागा कलम के कार्यक्रम में उपस्थित रहते थे। इस तरह की कई टिप्पणी रत्नेश्वर के पोस्ट पर भी है।
आजकल वामपंथियों के प्रिय लेखक अशोक वाजपेयी भी फिल्मों पर या फिल्मी शख्सियतों पर लेखन को दोयम दर्जे का ही मानते रहे हैं, कुमार शाहनी जैसे फिल्मकारों को छोड़कर ।एक सम्मान समारोह में उन्होंने लता पर लिखी किताब के बारे में बेहद हल्की टिप्पणी की थी। यह एक प्रकार का आभिजात्य भी है। एक बार अशोक वाजपेयी ने ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोह में अमिताभ बच्चन को बुलाने को लेकर भी तंज किया था। तब भी खासा विवाद हुआ था। लेकिन अशोक वाजपेयी यह भूल जाते हैं कि अमिताभ बच्चन का अभिनय कला में तो अप्रतिम योगदान है ही हिंदी के प्रचार प्रसार में भी वो किसी भी साहित्यकार से अधिक योगदान कर रहे हैं। अमिताभ बच्चन इस बात पर जोर देते हैं कि उनको स्क्रिप्ट देवनागरी में दी जाए जबकि बॉलीवुड में ज्यादातर स्क्रिप्ट रोमन में लिखी जाती हैं। इसी तरह से भोपाल में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में अमिताभ को बुलाए जाने पर हिंदी के लेखकों ने बहुत अनाप शनाप लिखा था। सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय एक अध्यापक-लेखक ने उस समय लिखा था कि- हिंदी साहित्य में अभिनेता अमिताभ बच्चन के योगदान के बारे में गूगल से लेकर राष्ट्रीय पुस्तकालय तक पर कहीं कोई रचना नहीं मिलेगी । इसके बावजूद उनको मोदी सरकार ने दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन के समापन सत्र में आमंत्रित किया ।यह संकेत है कि मोदी जी की निष्ठा साहित्य में नहीं मुंबईया सिनेमा में है।‘  अब इतने विद्वान लेखक को क्या बताया जाए कि ये विश्व हिंदी साहित्य सम्मेलन नहीं था । मैं यह मानकर चलता हूं कि उनको इतना तो ज्ञान होगा ही कि साहित्य और भाषा में थोड़ा फर्क तो है । रही बात अमिताभ बच्चन के हिंदी साहित्य में योगदान की तो ना तो अमिताभ बच्चन ने और ना ही उस वक्त की सरकार ने कभी ये दावा किया था कि बच्चन साहब बड़े साहित्यकार हैं । पर हिंदी के प्रचार प्रसार को लेकर अमिताभ के प्रयास सराहनीय है । वयोवृद्ध फिल्मी गीतकार गुलजार की भी यही पीड़ा है कि हिंदी साहित्य जगत के कथित गंभीर आलोचक और कवि उनको कवि नहीं मानते। गुलजार की ये पीड़ा तो कई बार सार्वजनिक रूप से झलक भी जाती है। दरअसल ये हिंदी के इस तरह के लेखक ये समझ नहीं पा रहे हैं कि हिंदी फिल्मों और टेलीविजन सीरियलों ने उनकी भाषा को कितना विस्तार दिया। मुझे याद है कि 2012 में जोहिनसबर्ग में विश्व हिंदी सम्मेलन हुआ था। जोहिनसबर्ग में जिस टैक्सी से हमलोग एयरपोर्ट से होटल जा रहे थे उसका ड्राइवर वहां के लोकल एफएम चैनल लोटस पर हिंदी के गाने सुन रहा था। जब मैंने उन, पूछा कि क्या वो हिंदी गाने सनझते हैं तो उसने अंग्रेजी में उत्तर दिया था कि ‘वी डोंट अंडरस्टैंड हिंदी बट वी एंजॉय हिंदी सांग्स।‘ कोई भी भाषा जब किसी दूसरी भाषा के लोगों को आनंद देने लगे तो समझिए कि उस भा। की संप्रेषणीयता अपने उरूज पर है। विष्व हिंदी सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में मॉरिशस के उस वक्त के कला और संस्कृति मंत्री चुन्नी रामप्रकाश ने भी ये माना था कि हिंदी के प्रचार प्रसार में बॉलीवुड फिल्में और टीवी पर चलनेवाले हिंदी सीरियल्स का बड़ा योगदान है। उन्होंने सभा को हिंदी में संबोधित कर मजमा तो लूटा ही था, वहां मौजूद सभी लोगों का दिल भी जीत लिया था। चुन्नी रामप्रकाश ने सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया था कि उनकी जितनी भी दक्षता हिंदी में है वो हिंदी फिल्मों और टीवी की बदौलत। लेकिन हिंदी के कथित गंभीर साहित्यकार इस बात को कभी नहीं मानते। उनका तो तर्क ये होता है कि हिंदी सीरियल्स और सिनेमा में उपयोग में लाई जानेवाली भाषा हिंदी का नाश कर रही है। इस तरह की धारणा हिंदी की सबसे बड़ी शत्रु है।
हिंदी सिनेमा एक गंभीर विधा है और सिनेमा पर लेखन रचनात्मक साहित्य की श्रेणी में आता है। सिनेमा के लिए लिखनेवाले भी उतना ही महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं जितना कथित तौर पर गंभीरता से उपन्यास या कविता लिखने वाले हिंदी के लेखक या कवि। हिंदी के प्रचार प्रसार में फिल्मों का बहुत योगदान है । दरअसल फिल्मी कलाकारों को लेकर हिंदी के वामपंथी लेखक कभी संजीदा नहीं रहे । फिल्म वालों को बुर्जुआ संस्कृति का पोषक मानकर उनकी लगातार उपेक्षा की जाती रही । हिंदी फिल्मों के बड़े से बड़े गीतकार को हिंदी का कवि नहीं माना गया जबकि विचारधारा का झंडा उठाकर घूमनेवाले औसत कवियों को महान घोषित कर दिया गया । मनोज मुंतशिर के कार्यक्रम में कथित गंभीर साहित्यकारों का नहीं आना इसी मानसिकता का प्रकटीकरण था। आज जरूरत इस बात की है कि वामपंथी विचारधारा के लेखकों को किसी को भी अस्पृश्य मानने की अपनी मानसिकता से बाहर निकलें, हर तरह की विधा को महत्व दें और हर तरह की विचारधारा के साथ संवाद करें। अस्पृश्यता के सिद्धांत को अपनाकर वामपंथियों ने अबतक अपना बहुत नुकसान कर लिया है और अगर वक्त रहते नहीं चेते तो नुकसान भी नदी के कटान की तरह तेजी से उनकी बची-खुची जमीन को लील जाएगा।

Saturday, May 20, 2017

नए विमर्शों की तलाश

इन दिनों अगर हम देखें तो पाते हैं कि साहित्य के दायरे का विस्तार हुआ और कई अन्य तरह का लेखन भी साहित्य के केंद्र में आया । शास्त्रीय तरीके के विधाओं के कोष्टक को कई लेखकों ने विस्तृत किया । सिनेमा,खेल आदि पर लेखन शुरु हुआ । परंतु अब भी कई क्षेत्र हैं जिनपर लिखा जाना शेष है । हिंदी में साइंस फिक्शन की तरफ अभी भी लेखकों की ज्यादा रुचि दिखाई नहीं देती है । 
साहित्य को लेकर हिंदी में लंबे समय से कोई विमर्श भी नहीं हुआ । इसके स्वरूप और प्रकृति को लेकर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है । प्राचीन भारतीय विद्वानों ने और पश्चिम के आलोचकों, लेखकों ने भी उसपर लंबे समय तक विचार किया था । उन्होनें साहित्य क्या है, साहित्य की प्रकृति क्या हो, कविता क्या है,कहानी कैसी हो, कहानी और उपन्यास में क्या अंतर होना चाहिए, उपन्यास का महाकाव्यत्व क्या हो, साहित्य का व्याकरण क्या हो पर अपनी राय रखी थी । समकालीनों से संवाद किया और अपने पूर्ववर्ती लेखकों के विचारों से मुठभेड़ किया था । बेलिंस्की जैसे विद्वान ने तो साहित्य क्या है, इसको केंद्र में रखकर एक मुकम्मल लेख लिखा ही था । गुरवर रवीन्द्रनाथ टौगोर से लेकर हजारी प्रसाद द्विवेदी तक ने साहित्य की सामग्री और साहित्य का व्याकरण जैसे लेख लिखे । अंग्रेजी में साहित्य को लिटरेचर कहा जाता है, लिटरेचर का संबंध लेटर यानि अक्षर से है और बहुधा अक्षर में व्यक्त किए गए भावों को साहित्य माने जाने की अवधारणा भी दी गई । इसी के अंतर्गत कृषि साहित्य से लेकर अश्लील साहित्य तक का वर्गीकरण किया गया था । हिंदी में यह अवधारणा बहुत चल नहीं पाई और मुख्य विधाओं को ही साहित्य माना जाता रहा । उसमें से कई युवा लेखकों ने प्रयोग किए । कई युवा साहित्यकारों ने पहले किसी अन्य विधा के लेखक के तौर पर अपनी पहचान बनाई और फिर उन्होंने अपने लिए नया रास्ता चुना और अब उनकी पहचान उस नए रास्ते की वजह से हो रही है ।
उदाहरण के तौर पर देखें तो यतीन्द्र मिश्र का आगमन साहित्य में एक कवि के तौर पर हुआ था और उन्हें कविता का प्रतिष्ठित ‘भारत भूषण अग्रवाल सम्मान’ भी मिला था लेकिन अब उनको साहित्य में कवि के रूप में कम और संगीत अध्येता के रूप में ज्यादा जाना जाता है । उन्होंने ‘अक्का महादेवी’ से लेकर ‘लता मंगेशकर’ पर गंभीरता से लिखकर अपनी तो नई पहचान स्थापित की ही साहित्य का दायरा भी बढ़ाया । इसी तरह से एक दूसरा नाम अनु सिंह चौधरी का है । अनु ने पहले अपनी पहचान एक कहानीकार के रूप में बनाई । उनका कहानी संग्रह ‘नीला स्कार्फ’ काफी चर्चित रहा और कहानी की दुनिया में उनको गंभीरता से लिया जाने लगा लेकिन जब से उनकी किताब ‘मम्मा की डायरी’ प्रकाशित हई तो उनकी कहानीकार वाली पहचान नेपथ्य में चली गईं और एक स्त्री के कदम कदम पर संघर्ष को सामने लाने वाली लेखिका के तौर पर पहचाना जाने लगा । इसी तरह से अगर देखें तो रत्नेश्वर सिंह ने पहले अपनी पहचान एक कहानीकार के तौर पर स्थापित की लेकिन बाद में ‘जीत का जादू’ जैसी बेहतरीन किताब लिखकर मोटिवेशनल गुरू के तौर पर खुद को स्थापित किया । रत्नेश्वर को उनकी कहानियों और मीडिया पर लिखी दर्जनों किताब से ज्यादा पहचान ‘जीत का जादू’ ने दिलाई । अब रत्नेश्वर का नया उपन्यास ‘रेखना मेरी जान’ प्रकाशित होने वाली है जिसके लिए प्रकाशक ने उनके साथ पौने दो करोड़ रुपए का कांट्रैक्ट किया है । तो यह स्थिति साहित्य के लिए बेहतर मानी जा सकती है । 

Saturday, February 18, 2017

हिंदी की ताकत का करार


बिहार की राजधानी पटना में आयोजित पुस्तक मेला हाल ही में संपन्न हुआ है । पुस्तक मेलों के लिहाज से देखें तो पटना पुस्तक मेला देश के बड़े पुस्तक मेलों में शुमार होता है । दिल्ली में आयोजित विश्व पुसतक मेला की ही तरह पटना में भी सांस्कृतिक कार्यक्रम और साहित्यक मसलों पर मंथन होता रहता है । पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में आयोजित इस पुस्तक मेले को पूरब का सांस्कृतिक कुंभ कहना गलत नहीं होगा । ग्यारह दिन चलनेवाले इस पुस्तक मेले को लेकर देशभर के साहित्यकारों में उत्सुकता बनी रहती है । सहभागिता को लेकर भी और हाय हुसैन सिंड्रोम को लेकर भी पुस्तक मेला चर्चा में रहता है । इस बार तो इस मेले ने सोशल मीडिया पर भी अपनी जबरदस्त उपस्थिति दर्ज करवाई । इसके पक्ष और विपक्ष में कमेंट्स लिखे गए । कुछ ऊलजलूल आरोप भी लगे । बावजूद इसके यह आयोजन खूब सफल रहा और अपने तेइसवें संस्करण में भी पाठकों का जबरदस्त प्यार इसको मिला। इस बार पटना पुस्तक मेले में दलित साहित्य से लेकर लेखन से गायब होते रोमांस तक की चर्चा हुई । नरेन्द्र कोहली से लेकर स्थानीय लेखकों ऋषिकेश सुलभ और आलोक धन्वा की भागीदारी रही ।  बच्चों को लेकर दिनभर पुस्तक मेले में कार्यक्रम हुए लेकिन इस बार पुस्तक मेले में एक ऐसी साहित्यक घटना घटी जिसकी अनुगूंज काफी लंबे समय तक साहित्य जगत में सुनाई देनेवाली है ।
हिंदी में इस बात को लेकर हमेशा से रोना रोया जाता है कि लेखकों को पैसे नहीं मिलते । हिंदी की किताबों की कम बिक्री को लेकर लेखकों और प्रकाशकों के बीच चिंता देखी जा सकती है । इस बात पर कमोबेश हर गोष्ठी आदि में रेखांकित किया जाता है कि हिंदी में खरीदकर पढ़नेवाले पाठक नहीं हैं । बहुधा प्रकाशकों और लेखकों के बीच संबंध खराब होने की वजह किताबों की रॉयल्टी ही बनती रही है । लेकिन पटना में जो हुआ वो हिंदी में एरर नई मिसाल कायम करनेवाला है । बिहार के सबसे पुराने प्रकाशकों में से एक नोवेल्टी प्रकाशन ने अपने स्थापना के पचहत्तर वर्ष पूरे होने पर अब साहित्यक प्रकाशन के क्षेत्र में कदम रखने का फैसला लिया है । ब्लूबर्ड नाम के नए प्रकाशन की शुरुआत के साथ ही नोवेल्टी प्लेटिनम सीरीज के तहत स्तरीय साहित्यक कृतियों के प्रकाशन की योजना बनाई है । संस्थान ने ऐलान किया कि थोक के भाव से साहित्यक कृतियों के प्रकाशन की बजाए वो साल में एक या दो ऐसी किताबों को छापेगा जिन्हें वृहत्तर पाठक वर्ग तक पहुंचाकर इस मिथक को तोड़ने का प्रयास होगा कि हिंदी में किताबें नहीं बिकती हैं । नोवेल्टी ने अपने इस नए उपक्रम नोवेल्टी प्लेटिनम के तहत पहली किताब चुनी है हिंदी के कथाकार, मीडिया विशेषज्ञ और संस्कृतिकर्मी रत्नेश्वर कुमार सिंह की । उनके उपन्यास रेखना मेरी जान को इस सीरीज के तहत प्रकाशित करने का एलान करते हुए नोवेल्टी ने रत्नेश्वर के साथ एक करोड़ पचहत्तर लाख के अनुबंध की घोषणा भी की । यह किसी भी भारतीय प्रकाशक के लिए किसी एक लेखक को दी जानी वाली अबतक की सबसे बड़ी राशि है । अनुबंध के लिए साइनिंग अमांउट के तौर पर रत्नेश्वर को ढाई लाख का चेक मेले के दौरान हुए प्रेस कांफ्रेंस में सौंपा गया । प्रकाशक ने रेखना मेरी जान की दस लाख प्रतियां बेचने का लक्ष्य रखा है । नोवेल्टी के अमित झा का दावा है कि उन्हें हिंदी की ताकत का एहसास है और उसके हिसाब से ही उन्होंने रत्नेश्वर की किताब को बेचने की रणनीति बनाई है । तीन अप्रैल से इस किताब की ऑनलाइन बुकिंग शुरू हो रही है और पांच अप्रैल से पाठकों के लिए उपलब्ध हो जाएगी । किसी एक किताब के लिए इस तरह की रणनीति और महात्वाकांक्षी लक्ष्य हिंदी में तो कम से कम पहली बार देखने को मिल रहा है । तमाम आशंकाओं को दरकिनार करते हुए लेखक और प्रकाशक दोनों मिलकर इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए जुटे हुए हैं । देशभर के हर शहर में इस उपन्यास को लेकर कार्यक्रम आदि करने की योजना है जिसमें लेखक की मौजूदगी होगी और वो अपने पाठकों से संवाद भी करेंगे ।

अभी कुछ सालों पहले ही अंग्रेजी के एक प्रकाशक ने शिवा त्रैयी पर उपन्यास लिखनेवाले अंग्रेजी के स्टार लेखक अमीष त्रिपाठी के साथ उनके आगामी उपन्यासों के लिए पांच करोड़ रुपए का करार किया था । उस करार में किताब, आडियो बुक और ई बुक्स का वैश्विक अधिकार भी शामिल था । अमिष के प्रकाशक ने उनकी किताबों की बिक्री को आधार बनाकर यह करार करने का दावा किया था । अमिष त्रिपाठी पहले से बेस्टसेलर रहे हैं और अंग्रेजी में किताबों का एक बड़ा बाजार पहले से रहा है । पर फिर भी अमिष त्रिपाठी के उस करार को लेकर बाद में कई विवादित बातें सामने आई थी । लेकिन हिंदी में एक किताब के लिए पौने दो करोड़ का करार परीकथा की तरह लगता है । हिंदी के लेखकों को इस करार पर यकीन करने में मुश्किल हो रही है । रत्नेश्वर का प्रतीक्षित उपन्यास ग्लोबल वार्मिंग को केंद्र में रखकर लिखा गया है । ग्लोबल वार्मिग जैसे बड़े विषय के बड़े कैनवास के बीच इस उपन्यास में एक बेहदद इंटेंस प्रेम कथा भी साथ साथ चलती है । ग्लोबल वार्मिंग जैसे गंभीर विषय के साथ प्रेम को जोड़कर कथा को आगे बढ़ानेवाले रत्नेशवर को उम्मीद है कि पाठकों को यह विषय बहुत पसंद आएगा । आत्मविश्वास से लबालब रत्नेश्वर कहते हैं कि जिस देश में करीब साठ करोड़ हिंदी भाषी हों वहां दस लाख किताबें बिकनी ही चाहिए और इसपर जो लोग सवाल खड़े कर रहे हैं उनको हिंदी की ताकत का एहसास नहीं है । उनको उम्मीद है कि रेखना मेरी जान के प्रकाशन के बाद एक बार फिर से हिंदी की ताकत स्थापित होगी । रत्नेश्वर पौने दो करोड़ रुपए के करार को लेकर उत्साहित तो थे लेकिन दिमाग सातवें आसमान पर नहीं है । एक उपन्यास के लिए पौने दो करोड़ का करार करने वाले पहले हिंदी लेखक बनकर रत्नेश्वर को अपनी जिम्मेदारी का एहसास है। वो कहते हैं कि इस करार के बाद उनसे हिंदी की ताकत को स्थापित करने की साथी लेखकों और पाठकों की अपेक्षा बहुत ज्यादा है । वो इस बात से पूरी तरह से मुतमईन हैं कि उनका उपन्यास हिंदी लेखन में एक कीर्तिमान स्थापित करेगा और उसकी प्रतिष्ठा उसको हासिल होगी । 

Saturday, December 10, 2016

भाषा के भंवर से मुक्त साहित्य

भवानी प्रसाद मिश्र की एक कविता हैं जिस तरह हम बोलते हैं /उस तरह तू लिख/और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख/चीज़ ऐसी दे कि जिसका स्वाद सिर चढ़ जाए/ बीज ऐसा बो कि जिसकी बेल बन बढ़ जाए । इस कविता में कवि साफ तौर पर लेखकों को चुनौती देते हुए दिख रहे हैं कि जिस तरह से आप बोलते हैं उसी तरह से लिखें । दरअसल हिंदी साहित्य में ये बड़ी समस्या है कि लेखक जब लिखने बैठते हैं तो वो अलग किस्म की हिंदी लिखते हैं और जब वो बोलते हैं तो अलग किस्म की हिंदी सामने आती है । भवानी प्रसाद मिश्र यही कह रहे हैं कि जिस तरह से लेखक बोलते हैं उसी तरह से लिखें और फिर बड़ा बनकर दिखाएं । लिखने और बोलने की भाषा में फर्क होता है लेकिन चुनौती यही रहती है कि किस तरह से पात्रों और परिवेश के मुताबिक भाषा का इस्तेमाल किया जाए । इस बात पर लंबी बहस की गुंजाइश भी बनती है । एक दिन कहानीकार और उपन्यासकार रत्नेश्वर से इस विषय पर बात हो रही थी तो उन्होंने जो बात कही उसको रेखांकित किया जाना जरूरी है । हमारा तर्क ये था कि पात्र अपने परिवेश के हिसाब से संवाद करें और मैंने अपने तर्क के समर्थन में रेणु के मैला आंचल के पात्रों का उदाहरण दिया । रत्नेश्वर का तर्क था कि परिवेश के हिसाब से भाषा होनी चाहिए लेकिन अगर बिल्कुल ही उसकी भाषा में बात होगी तो फिर पाठकों को समझने में दिक्कत होगी । उन्होंने मैथिली का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर पात्र दरभंगा से है और वो खालिस मैथिली में बात करेगा तो हिंदी के राजस्थान और मध्यप्रदेश के पाठकों को समझने में दिक्कत होगी । उनका कहना था कि पात्रों की बोली वाणी में उसके परिवेश का पुट होना चाहिए लेकिन पूरी तरह से स्थानीय भाषा में लिखकर पाठकों की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए । रत्नेश्वर के तर्कों में दम है लेकिन भवानी प्रसाद मिश्र जिस ओर संकेत कर रहे थे उसका मतलब यह है कि साहित्यक कृतियों में जानबूझकर ऐसे शब्द नहीं ठूंसे जाने  चाहिए जिसको समझने में पाठकों को दिक्कत हो । उससे पाठकों पर लेखक का रौब तो गालिब हो सकता है लेकिन पाठकों का प्यार भी मिल जाए यह आवश्यक नहीं है ।
हिंदी में इन दिनों युवा लेखकों की एक ऐसी पीढ़ी आई है जो अपने आसपास के परिवेश पर इसी बोली वाणी में उपन्यास लिख रही है । अपनी उम्र और अपनी जिंदगी में बोली जानेवाली भाषा को पात्रों के माध्यम से कृतियों में उतार रही है । कई लोगों को इसपर ऐतराज भी है कि इससे भाषा भ्रष्ट हो रही है । भाषा की मर्यादा नष्ट की जा रही है । भाषा के व्यावकरण के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है लेकिन ये पीढ़ी है कि मानने को तैयार नहीं है । इनका तर्क वही है कि पात्र तो वही बोलेगा जो वो असल जिंदगी में बोलता है । बहुत हद तक यह बात सही हो सकती है कि पात्र वही बोलेगा जो वो हकीकत में बोलता है । वो तो इसको यथार्थवादी कृति कहकर शान से हिंदी के मैदान में डटे हैं । इस तरह के उपन्यासों की ऑनलाइन बिक्री के आंकड़ों से उनके हौसले भी बुलंद हैं । दरअसल होता यह है कि सफलता के बाद वो फॉर्मूला मान्य भी हो जाता है । जब कोई फॉर्मूला मान्य होता है तो उसको अपनाने वालों की संख्या भी बढ़ जाती है । कुछ ऐसा ही इस तरह की कृतियों के साथ भी हो रहा है ।
अभी उपन्यासकार सत्य व्यास का दूसरा उपन्यास दिल्ली दरबार छपा है । इसके पहले छपा उनका उपन्यास बनारस टॉकीज भी काफी पढ़ा गया था और उसकी जमकर तारीफ भी हुई थी । उनके नए उपन्यास का नायक राहुल मिश्रा का जो चरित्र है वो छोटे शहरों से दिल्ली में आकर रहनेवाले लड़कों के मनोविज्ञान को बहुत तक सामने लाता है । दिल्ली में किराए का कमरा, मकान मालिक की लड़की से मोहब्बत, मोहब्बत की मुसीबत आदि आदि । लेकिन जो सबसे चौंकानेवाली बात है वो यह है कि इसकी भाषा पूरी तरह से वही है जिसमें विश्वविद्यालय के छात्र आपस में बात करते हैं । भाषा कैसी होगी इस बात के संकेत वो उपन्यास शुरू करते ही दे देते हैं । जरा देखिए- ‘उस रोज दो घटनाएं हुईं । दिन में मोहल्लेवालों ने शुक्ला जी कीटीवी पर रामायण देखा था और रात में महाभारत हो गया था । दिन में सीता जी अपनी कुटिया से गायब हुई थी और रात में गीताजी ( शुक्ला जी की बेटी) अपनी खटिया से । सीता जी जब गायब हुईं तो रावण के पुष्पक विमान पर नजर आईं । गीता जी जब गायब हुई तो पुजारी जी के मचान पर नजर आईं । रावण ने सीताहरण में बलप्रयोग किया था । पुजारी जी के बेटे देवदत्त ने गीतावरण में लव प्रयोग किया था । सीता जी को पुष्पक पर जटायु ने देखा था और उन्हें बचाने की भरपूर कोशिश की थी । गीता जी को पुजारी के मचान पर जटाशंकर चाचा ने देख लिया था और बात फैलाने में कोई कोताही नहीं की थी ।‘ इसके अलावा दो मित्र एक लड़की के बारे में बात करते हैं – ‘क्या हुआ बे । जान बहुत नाराज नजर आई आज ? मैंने कमरे में घुसते ही पूछा । जान के पप्पा की बिग टाइम लंका लगी है । राहुल ने कपड़ा मुंह में ठूंस कर हंसी रोकते हुए कहा ।‘ इस तरह के कई प्रसंग इसी भाषा में इस उपन्यास में हैं । पाठतीयता गजब की है जो पढ़नेवालों को बगैर खत्म किए उठने नहीं देती है । इसी तरह से अगर हम देखें तो दिव्यप्रकाश दुबे की कृतियां मुसाफिर कैफे, मसाला चाय और टर्म्स और कंडीशन अपप्लाई भी पाठकों को खूब भाईं । अनु सिंह चौधरी की मम्मा की डायरी भी अपने फॉर्म और भाषा की वजह से खूब पढ़ी गई और बिकी भी । ऐसे कई और लेखक हैं जो मिलकर एक नई पीढ़ी का निर्माण कर रहे हैं ।

पहले दो चार लेखक इस तरह के उपन्यास लिख रहे थे लेकिन अब तो कई लेखक सामने आ गए हैं और वो हिंदी की स्थापित भाषा को चुनौती दे रहे हैं । इस चुनौती को मान्यता भी मिलनी शुरू हो गई है लेकिन ये देखना दिलचस्प होगा कि इस तरह का लेखन हिंदी साहित्य में स्थापित हो पाता है या फिर वो समय के साथ इतिहास में बिला जाता है । यह आशंका इस वजह से भी है कि करीब दो साल पहले हिंदी में लप्रेक को लेकर खूब शोर शराबा हुआ । दो तीन लप्रेक लेखकों की किताबें छपीं और उनमें से एकाध की बिकी भी, चर्चा भी हुई लेकिन अब उसका शोर थम गया है । लप्रेक यानि लघु प्रेम कथा जो कि सोशल मीडिया आदि पर लिखी जा रही थी । उसके शोर शराबे को देखकर उस वक्त ऐसा लग रहा था जैसे साहित्य में एक नए विधा का जन्म हो रहा है लेकिन वो स्थायी नहीं हो पाया । जैसे अस्सी के दशक में लघुकथा का बहुत शोर मचा था । उस वक्त भी इस तरह की बातें होने लगी थीं कि हिंदी साहित्य में एक नई विधा का आगमन हुआ है और कुछ उत्साही आलोचक उसको साहित्यक क्रांति के तौर पर पेश भी करने लगे थे जैसे कि लप्रेक को लेकर कुछ आलोचकनुमा लेखक बहुत उत्साहित हो गए थे । वो शोर भी वक्त के साथ थम गया और अब बहुत कम लेखक लघुकथा को अपना रहे हैं, नए लेखक तो लगभग ने के बराबर इस विधा में हाथ आजमा रहे हैं   । किसी भी विधा को स्थायित्व मिलने में काफी वक्त लगता है, और उस वक्त का इंतजार किया जाना चाहिए ।

दरअसल साहित्य में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने की हड़बड़ी बहुधा साहित्यक गड़बड़ियों को जन्म देती है । साहित्य में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने के पहले ठहरकर, सोच-समझकर किसी निर्णय पर पहुंचना चाहिए । सत्य व्यास, दिव्यप्रकाश दूबे, अनुसिंह चौधरी आदि लेखकों ने जो नया रास्ता अपनाया है उसका स्वागत किया जाना चाहिए, इनका इत्साह भी बढ़ाया जाना चाहिए  लेकिन किसी नतीजे पर पहुंचने के पहले आलोचकों को इंतजार भी करना चाहिए क्योंकि भवानी प्रसाद मिश्र कहते हैं कि चीज़ ऐसी दे कि जिसका स्वाद सिर चढ़ जाए/ बीज ऐसा बो कि जिसकी बेल बन बढ़ जाए ।  अब इस चीज के स्वाद का सिर चढ़ने के लिए तो इंतजार ही करना होगा, इस बीज के बेल बनकर फैलने का भी इंतजार करना होगा क्योंकि साहित्यक चीज और साहित्यक बीज दोनों को फैलने में और अपना प्रभाव छोड़ने में वक्त लगता है । 

Sunday, December 6, 2015

उपस्थिति से बढ़ेगी साझेदारी

जब से कॉफी हाउस की संस्कृति बंद हुई है तब से साहित्यक समाचार ज्यादातर सोशल मीडिया पर ही नजर आते हैं । साहित्यक गॉसिप से लेकर विवाद तक, गंभीर टिप्पणियों से लेकर फूहड़ कमेंट तक, साहित्यक समाचार से लेकर साहित्येतर कानाफूसी तक सब-कुछ सोशल मीडिया से सामने आने लगा है । कॉफी हाउस में तो बोलकर निकल जाने की सहूलियत थी और उसका उतना विस्तार भी नहीं था लेकिन जितना कि सोशल मीडिया है । यहां आप पोस्ट कर निकल नहीं सकते हैं । सोशल मीडिया पर एक और सहूलियत है कि जैसे ही आपकी पोस्ट को कोई लाइक करता है या उसपर अपनी टिप्पणी देता है तो वो टाइम लाइन पर सबसे उपर आ जाता है । इसका नतीजा यह होता है कि किसी भी तरह की खबर लंबे समय तक सोशल मीडिया पर बनी रहती है । बहुधा तो ऐसा होता है कि साल दो साल पहले की पोस्ट भी अगर किसी ने लाइक कर दी तो वो फौरन टाइम लाइन पर आ जाता है । इसके फायदे और नुकसान दोनों हैं । पायदा ये कि सकारात्मक खबरें वहां आती जाती रहती हैं और नुकसान येकि आरोपों की शक्ल में लिखे गए पोस्ट की भी उपस्थिति बनी रहती है । हाल ही में सोशल मीडिया पर एक खबर देखकर मैं चौंका । ये खबर थी पटना के लेखक रत्नेश्वर से जुड़ी । रत्नेश्वर ने अपनी वॉल पर अपनी किताब के पटना में होनेवाले लोकार्पण समारोह का कार्ड लगाया था । यह कोई अहम बात नहीं थी, हर किताब के लोकार्पण का कार्ड लोग फेसबुक आदि पर शेयर करते ही ही हैं । अब तो ये रिवाज भी हो चला है ।  लेकिन उस कार्ड पर प्रकाशित एक सूचना ने मुझे चौंकाया । मैजिक इन यू नाम की इस किताब की बीस हजार प्रतियों की प्री बुकिंग होने का दावा करते हुए प्रचारित किया जा रहा है । चौंका इस वजह से कि अंग्रेजी में लिखी इस किताब को छापा है कि हिंदी के प्रकाशक प्रभात प्रकाशन ने । इस लिहाज से यह एक बड़ी घटना है कि किसी किताब के लोकार्पित होने के पहले ही बीस हजार प्रतियों की बुंकिंग हो जाना । भारतीय प्रकाशन जगत के लिहाज से यह एक अहम घटना है । इसके पहले चेतन भगत की किताब हॉफ गर्ल फ्रेंड की साल लाख प्रतियों की एडवांस बुकिंग हुई थी परंतु वो बुकिंग एक ऑनलाइन कारोबार करनेवाली बेवसाइट ने की थी जिसके पास उक्त किताब को एक तय समय सीमा तक बेचने का एक्सक्लूसिव अधिकार था । अंग्रेजी के कई प्रकाशकों और लेखकों से मैंने इस बारे में बात कर यह समझने की कोशिश कि प्रकाशन जगत के लिहाज से यह कितनी बड़ी घटना है । प्रकाशकों और लेखकों, दोनों ने बताया कि यह घटना महत्वपूर्ण है जिसको रेखांकित किया जाना चाहिए । दूसरी जिस बात ने मुझे चौंकाया वह ये कि रत्नेश्वर की यह किताब मैजिक इन यू साहित्यक कृति नहीं हैं बल्कि ये किताब आपके अंदर की ताकत को पहचानने और उसको उजागर करने की बात करता है यानि कि यह व्यक्तित्व विकास की  किताब है । इस बात को समझने की आवश्यकता है कि किताब छपने और बाजर में आने के पहले ही उसकी बीस हजार प्रतियों की बुकिंग कैसे हो गई । भारत में जहां किताबों की बिक्री को लेकर रोना गाना मचा रहता है वैसे परिदृश्य में सुदूर बिहार के एक लेखक की लिखी किताब छपने के पहले इतनी लोकप्रिय हो जाए तो आश्चर्य भी होता है और इस बात का संतोष भी होता है कि भारत में किताबों की बिक्री का बड़ा बाजार है । रत्नेशवर पहले हिंदी में लिखते रहे हैं । उनकी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं । पिछले साल नेशनल बुक ट्रस्ट से आई उनकी किताब मीडिया लाइव के भी कई संस्करण हो चुके हैं । एक जमाने में कहानियां लिखनेवाले रत्नेश्वर कालांतर में नॉन फिक्शन की ओर मुड़े । कुछ दिनों पहले एक साक्षात्कार में रत्नेश्वर ने कहा  था कि सैद्धांतिक साहित्य को पाठक पूरी तरह नकार रहे हैं क्योंकि उनमें कहानी से ज्यादा विचार प्रबल होते हैं। उन्होंने माना था कि आजकल मोटे-मोटे उपन्यासों का लेखन भी खूब हो रहा है, पर अधिकांश उपन्यास विवरणात्मक शैली में लिखे जा रहे है वो कहते हैं कि उपन्यास या कहानी किस्सागोई की चासनी में ऐसे लिपटे हों कि पाठक अंत तक बहता चला जाय, आज के अधिकांश उपन्यासों और कहानियों के विवरण शैली को पाठक झेल ही नहीं पाते और उनमें ऊब पैदा होती है। मतलब साफ़ है - शायद आज के साहित्यकार का टारगेट आलोचक और पुरस्कार होते हैं ! जो साहित्य उनके लिए लिखा नहीं गया, ऐसे में भला पाठक आपको क्यों तरजीह देने लगे । वो इस बात पर भी चिंता प्रकट करते हैं कि हिन्दी पढ़ने-जानने वालों की संख्या करीब साठ सत्तर करोड़ है तो हमारे संस्करण तीन चार सौ के क्यों होते हैं । वो सवाल उठाते हैं कि क्या हमारा लक्ष्य उनमें से कम-से-कम सात लाख हिंदी प्रेमियों को पाठक बनाने का नहीं होना चाहिए?  उनका मानना है कि लेखक का दायित्व अच्छा साहित्य लिखना तो है ही उसे पाठकों तक पहुंचाना भी है। अभी हाल ही में रत्नेश्वर ने अपना पहला उपन्यास रेखना मेरी जान लिखकर खत्म किया है और उनका यह उपन्यास भी जल्द ही हिंदी और अंग्रेजी में छपकर बाजार में आने वाला है । देखना यह होगा कि उनके इस उपन्यास को पाठक कैसे लेते हैं । ग्लोबल वार्मिंग को केंद्र में रखकर लिखी गई इस किताब को लेकर प्रकाशक उत्साहित हैं । यह बात समझ से परे है कि किताबों के पाठकों की कमी का रोना क्यों रोया जाता है । क्यों इस बात को प्रचारित किया जाता है कि हिंदी का प्रकाशन व्यवस्या तो सरकारी खरीद की वैशाखी थामे चल रहा है वर्ना तो ये कब का दम तोड़ चुका होता । यह कहा जा सकता है कि अंग्रेजी में किताबों की प्री बुकिंग हुई है लेकिन हिंदी की हालत भी बेहतर है वहां भी यह हो सकता है । दरअसल इस तरह का वातावरण बनाया जा रहा है कि हिंदी में पाठकों की कमी है । इसको निगेट करने की जरूरत है ।
अभी हाल ही में मार्केट सर्वे करनेवाली एक कंपनी नीलसन इंडिया की बुक मार्कट रिपोर्ट 2015 जारी की गई है । नीलसन इंडिया की इस रिपोर्ट में कई ऐसे खुलासे हुए हैं जो प्रकाशन जगत के लिए आंखें खोलनेवाले हैं । सबसे पहले तो इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत विश्व का छठा सबसे बड़ा किताबों का बाजार है । उस रिपोर्ट के मुताबिक इस वक्त भारत में किताबों का बाजार इक्कसी हजार छह सौ करोड़ रुपए का है । नीलसन के अनुमान के मुताबिक किताबों का ये बाजार सालाना करीब साढे उन्नीस फीसदी की दर से बढ़ेगा और 2020 तक इस बाजार का आकार तेहत्तर हजार नौ सौ करोड़ तक पहुंच जाएगा । नीलसन के इस अनुमान का आधार भारत की साक्षरता दर है । उसके मुताबिक भारत की साक्षरता दर 2020 तक नब्बे फीसदी हो जाएगी जो इस वक्त चौहत्तर फीसदी है । इस रिपोर्ट में और भी दिलचस्प आंकड़ें हैं । इसके मुताबिक भारत में अंग्रजी किताबों का बाजार पचपन फीसदी है और अंग्रेजी किताबों का विश्व में ये दूसरा सबसे बड़ा बाजार है । किताबों के बाजार में हिंदी किताबों का शेयर पैंतीस फीसदी है और अन्य भारतीय भाषाओं की किताबों की हिस्सेदारी मात्र दस फीसदी है । नीलसन के इन आंकड़ों में अकादमिक, प्रोफेशनल, स्कूल टेक्सट बुक, के अलावा रचनात्मक साहित्य की किताबें भी शामिल हैं । इतना बड़ा बाजार होने के बावजूद किताबों की बिक्री नहीं होने पर छाती कूटना उचित नहीं है । जरूरत इस बात की है कि किस तरह से किताबों के बढ़ते बाजार में अपनी उपस्थिति और हिस्सेदारी को मजबूत किया जाए । नीलसन की रिपोर्ट के मुताबिक किताबों के बाजार के फैलाव में कई सारी दिक्कतें हैं । इन दिक्कतों में सबसे बड़ी बाधा तो किताबों के डिस्ट्रीव्यूशन श्रृंखला को लेकर है । किताबों के वितरण की कोई निश्चित व्यवस्था नहीं होने और पुस्तक विक्रेताओं को लंबे समय तक क्रेडिट देने से इस कारोबार में कैशफ्लो कम होता है इस वजह से पूंजीगत समस्या खड़ी हो जाती है । इस अलावा किताबों के कारोबार में जो सबसे बड़ी समस्या है वह ये कि यहां पाइरेसी बहुत ज्यादा होती है । भारत उतना विशाल देश है कि पाइरेसी को रोक पाना लगभग असंभव है । इसका बेहतरीन उदाहरण तसलीमा नसरीन की किताब लज्जा है । इसके प्रकाशन का अधिकार दिल्ली के वाणी प्रकाशन के पास है लेकिन जाने कहां कहां और किन किन भाषाओं में यह किताब प्रकाशित हुई है वो ना तो लेखिका को मालूम है और ना ही प्रकाशक को । पाइरेसी रोकने के लिए जो कानून हैं वह उतने सख्त नहीं हैं लि्हाजा इसको मजबूत करने की जरूरत है । अंत में मशहूर शायर दुष्यंत कुमार की दो पंक्तियां कहना चाहूंगा- कौन कहता है कि आसमान में सूराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो । किताबें बिकेंगी कोशिश तो हों ।


Tuesday, November 25, 2014

सांस्कृतिक आंदोलन का मेला

किसी भी एक दिन में अगर किसी पुस्तक मेले में एक लाख लोग पहुंचते हों तो इससे किताबों के प्रति प्रेम को लेकर एक आश्वस्ति होती है । यह हुआ हाल ही में खत्म पटना पुस्तक मेला में । पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में आयोजित पुस्तक मेला के बीच आए एक रविवार को मेला में पहुंचनेवालों की संख्या एक लाख के पार चली गई । इसके अलावा पुस्तक मेला से जुड़े लोगों का अमुमान है कि दस दिनों में पुस्तक मेला में किताबों की बिक्री का आंकड़ा भी करीब छह करोड़ रुपए से ऊपर पहुंच गया । पटना पुस्तक मेला में ज्यादातर किताबें हिंदी की थी लिहाजा इसको एक शुभ संकेत माना जा सकता है । एक तरफ हिंदी में साहित्यक कृतियों की बिक्री कम होने की बात हो रही है और उसपर चिंता जताई जा रही है वहीं साहित्येतर किताबों में पाठकों की बढ़ती रुचि को रेखांकित किया जा रहा है । पटना पुस्तक मेला इस लिहाज से अन्य पुस्तक मेलों से थोड़ा अलग है कि यहां किताबों की दुकान के अलावा सिनेमा, पेंटिंग, नाटक आदि पर भी विमर्श होता है । इस साल तो पटना पुस्तक मेला में संगीत नाटक अकादमी के सहयोग से देशज नाम का एक सांस्कृतिक आयोजन भी हुआ जिसमें मशहूर पंडवानी लोक नाट्य गायिका तीजन बाई से लेकर मणिपुर और कश्मीर की मंडली ने नाट्य मंडलियों ने अपनी प्रस्तुति दी । कश्मीर की गोसाईं पाथेर जो है वो वहां की भांड पाथेर परंपरा का नाटक है जिसे कश्मीर घाटी के भांड कलाकार लंबे समय से मंचित करते आ रहे हैं । बिहार के दर्शकों के लिए यह एकदम नया अनुभव था। इन नाटकों की प्रस्तुति इतनी भव्य थी कि भाषा भी आड़े नहीं आ रही थी ।

दरअसल अगर हम देखें तो पटना पुस्तक मेला ने बिहार में पाठकों को संस्कारित करने का काम भी किया । बिहार में एक सांस्कृतिक माहौल होने के पीछे पटना पुस्तक मेला का बड़ा हाथ है । पिछले दो साल से पटना पुस्तक मेला को नजदीक से देखने का अवसर मिला है । वहां जाकर लगा कि एक ओर जहां तमाम लिटरेचर फेस्टिवल साहित्य के मीना बाजार में तब्दील होते जा रहे हैं । जहां साहित्य और साहित्यकारों को उपभोक्ता वस्तु में तब्दील करने का खेल खेला जा रहा है । जहां प्रायोजकों के हिसाब से सत्र और वक्ता तय किए जाते हैं. वहीं पटना पुस्तक मेला देश की साहित्य और सांस्कृतिक विरासत को बचाने और उसे नए पाठकों तक पहुंचाने का उपक्रम कर रहे हैं । संवाद कार्यक्रमों के जरिए पाठकों को साहित्य की विभिन्न विधाओं की चिंताओं और उसकी नई प्रवृत्तियों से अवगत करवाने का काम किया जा रहा है । भगवानदास मोरवाल के नए उपन्यास नरक मसीहा के विमोचन के मौके पर एक वरिष्ठ आलोचक ने आलोचना में उठाने गिराने की प्रवृत्ति को रेखांकित किया तो इक्कसीवीं सदी की पाठकीयता पर भी जमकर चर्चा हुई । पाठकीयता के संकट के बीच उसको बढ़ाने के उपायों और सोशल मीडिया में हिंदी के साहित्यकारों की कम उपस्थिति पर भी चिंता व्यक्त की गई । प्रकाशन कारोबार मे आ रहे बदलावों पर हार्पर कालिंस की मुख्य संपादक कार्तिका वी के ने विस्तार से पाठकों को बताया । इसके अलावा पुस्तक मेला में पेंटिग को लेकर भी गंभीर चर्चा होती है । पटना के अलावा कोलकाता पुस्तक मेले में भी कउत इसी तरह का सांस्कृतिक विरासत को बचाने का उपक्रम होता है । साहित्य को उपभोग की वस्तु में तब्दील करतेइन लिटरेचर फेस्टिवल्स के बीच पुस्तक मेला अपनी अलग पहचान पर कायम है ।