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Saturday, November 22, 2025

सर्वोच्च शिखर पर धर्म-ध्वजा


भारतवासियों के आराध्य प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि पर अयोध्या में भव्य और दिव्य श्रीराम मंदिर परिसर का निर्माण कार्य पूरा होने को है। श्रीराम मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा तो 22 जनवरी 2024 को हुआ था लेकिन परिसर में अन्य मंदिरों और टीलों के निर्माण से पूरे परिसर को भव्यता मिल रही है। आगामी 25 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मुख्य मंदिर का पताकारोहण करेंगे। मुख्य मंदिर का ध्वज  बाइस फीट और ग्यारह फीट आकार का  होगा। केसरिया रंग के ध्वज में रामायणकालीन कोविदार वृक्ष और इक्ष्वाकु वंश के प्रतीक सूर्यदेव, ओंकार के साथ अंकित होंगे। इसके अलावा परिसर में जो अन्य सात मंदिर हैं उन सभी के ध्वज का रंग केसरिया होगा जिसके केंद्र में सूर्यदेव ओंकार के साथ अंकित किए जाएंगे । इस विशाल और भव्य मंदिर के निर्माण की आधारशिला प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने 5 अगस्त 2020 को विधि विधान के साथ रखी थी। मंदिर की आधारशिला के दौरान 1989 में विश्वभर से आई शिलाओं में से 9 शिलाओं की भी पूजा की गई थी और उन्हें मंदिर  की नींव में डाली गई । 1989 में श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन के दौरान दुनिया भर से मंदिर निर्माण के लिए शिलाएं पूजित करके अयोध्या भेजी गई थीं। लगभग 5 वर्षों में नव्य मंदिर का परिसर पूर्ण हुआ। परिसर के मंदिरों के निर्माण में करीब 5 लाख बीस हजार घनफुट गुलाबी सैंड स्टोन का उपयोग किया गया है जो राजस्थान के बंसी पहाड़पुर से लाया गया। इससे मंदिर की भव्यता अलग ही दिखती है। 

मुख्य मंदिर में जहां से गर्भगृह आरंभ होता है वहां सफेद संगमरमर शिलाओं पर उकेरी गई चंद्रधारी गंगा यमुना की बहुत ही सुंदर मूर्तियां हैं। गर्भगृह की बाईं तरफ बड़े से मंडप में एक ताखे पर गणेश जी की मूर्ति है और उसके ऊपर रिद्धि सिद्धि और शुभ लाभ के चिन्ह बनाए गए हैं। एक ताखे में हनुमान जी की प्रणाम मुद्रा की मूर्ति के ऊपर अंगद, सुग्रीव और जामवंत की मूर्तियां बनाई गई हैं। गर्भगृह के मुख्यद्वार के ठीक ऊपर समस्त सृष्टि के पालक विष्णु भगवान की शेषनाग पर लेटी मुद्रा को पत्थर पर उकेरा गया है। उनके पांव के पास देवी लक्ष्मी जी बैठी हुई हैं। शेषशैया पर लेटे विष्णु भगवान के साथ ब्रह्माजी और शिवजी की मूर्तियां भी बनाई गई हैं। गर्भगगृह के ऊपर वाले तल पर श्रीराम दरबार है और उसके ऊपरी तल पर विशाल जगमोहन बनाया गया है जो अभी खाली है। इस जगह का क्या उपयोग होगा ये श्रीरामतीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट तय करेगा। मुख्य मंदिर के उत्तर-पूर्व में विशाल यज्ञमंडप का निर्माण किया गया है और उसके पास ही सीता कूप भी बनाया गया है।परिसर में भगवान गणेश, शंकर, सूर्य भगवान, हनुमान जी, मां दुर्गा और माता अन्नपूर्णा का मंदिर भी निर्मित किया गया है। मंदिर निर्माण से जुड़े लोगों ने बताया कि जहां पहले सीता रसोई हुआ करती थी उसी जगह या उसके पास ही माता अन्नपूर्णा का मंदिर बनाया गया है। इन मंदिरों के अलावा शेष रूप में लक्ष्मण जी की मूर्ति वाले शेषावतार मंदिर को भी नव्य स्वरूप प्रदान किया गया है। इन मंदिरों की मूर्तियों का स्केच पद्मश्री वासुदेव कामत ने तैयार किया और मूर्तियों का निर्माण जयपुर में करवाया गया। वहां से प्रतिमा को अयोध्या लाकर मंदिरों में स्थापित किया गया है।   

श्रीरामजन्मभूमि परिसर में बहुत ही सुंदर तरीके से सप्त मंदिर बनाया गया है। इन सात मंदिरों में आदिकवि महर्षि वाल्मीकि का मंदिर है। महर्षि वाल्मीकि ने ही भारतीय स्संकृति के जीवनदर्शों के दीपस्तंभ रूप रामायण की रचना की थी। इनके साथ ही सूर्यवंश के कुलगुरू महर्षि वसिष्ठ के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने तपोबल से रघुवंश के नरेशों को बल प्रदान किया और सनातन के सुयश का विस्तार किया। किशोर श्रीराम को शिक्षित करने के लिए अपने साथ ले गए और प्रशिक्षण के दौरान महादेव से प्राप्त विविध दिव्यास्त्र श्रीराम को प्रदान किए। इनके साथ ही देवी अहल्या का मंदिर बनाया गया है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार प्रभु श्रीराम के वंदन स्पर्श से पाषाण रूपी अहल्या शापमुक्त होकर स्त्री रूप में वापस आईं। महर्षि अगस्त्य को राष्ट्रसंरक्षक ऋषि कहा जाता है, इनका मंदिर भी जन्मभूमि परिसर में सप्त मंदिर में से एक है। माता शबरी और निषादराज गुह के मंदिर भी बनाए गए हैं। मंदिरों के अलावा इस परिसर में कई टीलों को भी भव्य स्वरूप प्रदान किया गया है। श्री कुबेर टीला इनमें से एक है। पार्वती-शंकर संवाद में जिन प्रमुख तीर्थों की चर्चा आती है उनमें श्रीरामकोट जैसे पवित्र स्थान पर जन्मभूमि समेत कई स्थानों की चर्चा है जिनमें से कुबेर टीला का उल्लेख भी है। मान्यता है कि धन-धान्य के प्रतीक स्वरूप कुबेर जी का यहां निवास है। रुद्रमयाल में इस बात का भी उल्लेख है कि कुबेर टीला के पूर्व में सुषेण जी और उत्तर में गवाक्ष जी स्थापित हैं। 1902 में एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा का शिलालेख यहां स्थापित किया गया है। इसके अलावा अंगद टीला को भी नव्य स्वरूप प्रदान किया गया है। जटायु की बड़ी सी आकृति भी मंदिर परिसर में स्थापित की गई है। जनश्रुतियों में रामकथा में गिलहरी की खूब चर्चा होती है। रामसेतु के निर्माण में गिलहरी ने भी अपना योगदान किया था। लोक की इस मान्यता को भी परिसर में स्थापित किया गया है। स्थल का नाम है पावन गिलहरी। ये संदेश देती है कि सूक्ष्म जीव भी अपने प्रयास से किसी बड़े अभियान का हिस्सा हो सकते हैं। तीर्थयात्री सहायता केंद्र के बिल्कुल समीप तुलसीदास जी की भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है। 

जन्मभूमि परिसर के चार दरवाजे वैष्णव परंपरा के संतों के नाम पर रखे गए हैं। जगदगुरु श्रीरामानंदाचार्य जगदगुरु श्री माध्वाचार्य, जगदगुरु आद्य शंकराचार्य और जगदगुरु श्रीरामानुजाचार्य। इसके अलावा परिसर में 732 मीटर लंबा एक परकोटे का निर्माण किया गया है जिसपर भारत दर्शन और नीति व बोध कथाएं, ब्रॉन्ज पैनल के रूप में उकेरी गई हैं। इनकी संख्या 79 है। इसे गोविंद देव गिरी के निर्देशन में संस्कृतिकर्मी यतीन्द्र मिश्र ने चयनित किया है। इसकी ड्राइंग वासुदेव कामथ जी ने बनाई है, जिसे देश भर के अलग अलग कलाकारों ने तैयार किया है। मुख्य मंदिर के लोअर प्लिंथ पर वाल्मीकि रामायण की कथा के अनुरूप विविध विषयों के चित्र प्रख्यात चित्रकार वासुदेव कामथ ने बनाया है। इसका परिचयात्मक लेखन यतीन्द्र मिश्र ने तैयार किया है। पत्थर पर निर्मित ये थ्री डी कलात्मक संयोजन देश के पत्थर पर काम करने वाले विशिष्ट कलाकारों ने बनाया है। इनकी कुल संख्या 87 है। मंदिर परिसर में एक स्मृति स्तंभ का भी निर्माण किया गया है जिसपर उन सभी ज्ञात-अज्ञात लोगों के नाम अंकित हैं जिन्होंने श्रीराम मंदिर के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग किया। पताकारोहण के साथ ही श्रीराम मंदिर विश्व भर के श्रद्धालुओं के लिए परम पूज्य पावन तीर्थ के नव्य स्वरूप का निर्माण पूर्णता प्राप्त कर लेगा । 


Saturday, February 15, 2025

तिरुपति मंदिर जैसी हो दर्शन व्यवस्था


प्रयागराज में जारी महाकुंभ में लगभग 50 करोड़ श्रद्धालुओं ने पवित्र स्नान किया। महाकुंभ में स्नान के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु अयोध्या और काशी में पहुंच रहे हैं। अयोध्या में इतनी संख्या में श्रद्धालु पहुंच गए कि कई दिनों तक स्कूल बंद करना पड़ा। रामपथ को वाहनों के लिए बंद करना पड़ा। अयोध्या के निवासियों को रामपथ पर स्थित चिकित्सालय तक पहुंचने में संघर्ष करना पड़ा। आसपास के जिलों से आनेवाले रास्तों पर वाहनों पर सख्ती की गई। अयोध्या में प्रभु श्रीराम के नव्य और भव्य मंदिर का निर्माण कार्य जैसे जैसे आगे बढ़ रहा है वैसे वैसे वहां श्रद्धालुओं की संख्या भी बढ़ रही है। पिछले वर्ष श्रीराम मंदिर को दर्शन के लिए खोला गया था। मंदिर परिसर में अब भी कई तरह के निर्माण कार्य चल रहे हैं। परकोटा से लेकर अन्य स्थानों पर मंदिर के भव्य स्वरूप को अंतिम रूप दिया जा रहा है। जानकारों के मुताबिक मंदिर में एक लाख व्यक्ति प्रतिदिन दर्शन का अनुमान लगाकर तदनुसार व्यवस्था की गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि श्रद्धालुओं की संख्या अनुमानित संख्या से अधिक हो जा रही है। दर्शकों को व्यवस्थित करने के लिए स्कूल बंद करने पड़ते हैं, अयोध्या शहर के लोगों को घरों से निकलने में परेशानी होती है। रामपथ के आसपास वाहनों पर प्रतिबंध को लेकर मुश्किल होती है। व्यवस्था संभालने में पुलिस को भी काफी मशक्कत करनी पड़ती है। अभी मंदिर का कार्य चल रहा है तो इसके पूर्ण होने के साथ सुचारू रूप से प्रभु के दर्शन की व्यवस्था पर विचार करना चाहिए। 

अयोध्या में दो तरह से श्रद्धालु दर्शन करते हैं, एक तो आम दर्शन जिसमें श्रद्धालु पंक्तिबद्ध हो जाते हैं और धीरे धीरे चलते हुए दर्शन करके मंदिर परिसर से बाहर आ जाते हैं। इसके अलावा एक सुगम दर्शन होता है। इसकी लेन अलग है। इसमें पासधारक ही प्रवेश कर सकते हैं। इस लेन में जाने के लिए पास प्रशासन, पुलिस और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट से जारी होता है। तीसरा अतिविशिष्ट पास जारी होता है जिसके धारक रंगमंहल बैरियर के पास से मंदिर में प्रवेश करते हैं। दर्शन के लिए किसी प्रकार का कोई शुल्क नहीं लिया जाता है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पिछले वर्ष तो काफी इंताजम किए गए थे, लेकिन धीरे धीरे ये सुविधाएं कम होती चली गईं। अयोध्या पहुंचनेवाले श्रद्धालुओं को धर्मशालाओं और आश्रमों का आसरा रह गया। कई नए होटल खुले जरूर हैं लेकिन वो श्रद्धालुओं की संख्या के आधार पर अपने कमरों की दर तय करते हैं। जो कई बार बहुत अधिक हो जाता है। ऐसा लगता है कि अभी ट्रस्ट की प्राथमिकता में मंदिर परिसर का निर्माण है, इस कारण श्रद्धालुओं की सुविधाओं की ओर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जा रहा है। किंतु यही उचित समय है कि श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र श्रद्धालुओं की सुविधाओं और अयोध्या पहुंचनेवाले भक्तों की संख्या को ध्यान में रखते हुए योजनाबद्ध तरीके से निर्माण कार्य करे। दर्शन के लिए जिस प्रकार के लेन आदि की व्यवस्था करनी है या राम मंदिर के आसपास के क्षेत्र में वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था करनी है उसपर गंभीरता से विशेषज्ञों के साथ विचार करके निर्णय लिया जाना चाहिए। अगर ऐसा हो पाता है तो दीर्घकाल तक श्रद्धालुओं की संख्या से ना तो अयोध्यावासियों को कोई तकलीफ होगी और ना ही प्रभु श्रीराम के दर्शन के लिए पहुंचनेवाले भक्तों को। 

पिछले दिनों तिरुपति में बालाजी के मंदिर जाकर दर्शन करने का सौभाग्य मिला। वहां दर्शन की व्यवस्था देखकर मन में ये विचार आया कि श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के ट्रस्टियों को वहां जाकर श्रद्धालुओं और मंदिर परिसर की व्यवस्था को देखना चाहिए। अगर उनको उचित लगे तो उस व्यवस्था को बेहतर करके उसको राम मंदिर परिसर में लागू करने का प्रयास करना चाहिए। तिरुपति से जैसे ही आप तिरुमला की पहाड़ी स्थित मंदिर में दर्शन करने के लिए यात्रा आरंभ करते हैं तो उसके पहले आपको आनलाइन दर्शन का टिकट और मंदिर के आसपास रहने की व्यवस्था कर लेनी होगी। अन्यथा आपको नीचे तिरुपति में रुकना होगा। अगर आप विशिष्ट या सुगम दर्शन करना चाहते हैं तो तिरुमला तिरुपति देवस्थानम के कार्यालय में संपर्क करना होगा। वहां आपको अपने आधार कार्ड के साथ आवेदन करना होगा। इसके बाद से सारी व्यवस्था आनलाइन। अगर आपका आवेदन स्वीकृत हो जाता है तो आपके मोबाइल पर एक लिंक आएगा। उस लिंक से आपको पेमेंट करना होगा। पेमेंट होते ही आपके मोबाइल पर ही पास आ जाएगा। जिसमें दर्शन का समय और गैट आदि का उल्लेख होता है। वहां सर्व दर्शन, शीघ्र दर्शन और ब्रेक दर्शन की व्यवस्था है। सबके लिए अलग अलग शुल्क है।  अगर आपने तिरुमला में रात में रुकने की व्यवस्था करनी है तो आनलाइन बुकिंग करनी होगी। तिरुमला तिरुपति देवस्थानम के कार्यालय में जाकर अपने लिए कमरा आवंटित करवाना होगा। सबकुछ व्यवस्थित। आपकी फोटो ली जाएगी फिर पैसा जमा करने के लिए बगल के काउंटर पर भेजा जाएगा। आनलाइन पैसे जमा होंगे। कमरे के किराए जितना ही सेक्युरिटी जमा करवाना होता है। फिर आपके मोबाइल पर कमरा आवंटन की जानकारी और एक कोड आ जाएगा। उसको लेकर बताए हुए स्थान पर पहुंच जाइए। कमरा तैयार मिलेगा। कमरा में चेक इन करते ही एक कोड आपके मोबाइल पर आएगा। जब आप कमरा छोड़ रहे हों तो आपको ये कोड बताना होता है। फिर वापस उसी कार्यालय में जाना होता है जहां आपने पैसे जमा करवाए थे। वहां इस कोड को बताते ही आपको मोबाइल पर सेक्युरिटी मनी के रिफंड की जानकारी आ जाएगी। कहीं भी नकद से लेन देन नहीं। कहीं भी किसी प्रकार का बिचौलिया या एजेंट नहीं। 

सर्वदर्शन और शीघ्रदर्शन के श्रद्धालुओं को दर्शन के लिए मंदिरर के गर्भगृह तक पहुंचने में जितना भी समय लगे उनको पंक्ति में ही बने रहना होता है। 12-13 घंटे भी लगते हैं तो मंदिर प्रशासन श्रद्धालुओं का पूरा ख्याल रखते हैं। भोजन, फल और बच्चों के लिए दूध आदि की नियमित अंतराल पर व्यवस्था होती है। दर्शन के लिए जो रास्ता बनाया गया है उस रास्ते में वाशरूम की व्यवस्था है। चौबीस घंटे वहां सफाई कर्मचारी तैनात रहते हैं। एकदम स्वच्छ व्यवस्था। किसी भी श्रद्धालु को किसी प्रकार की परेशानी न हो इसका विशेष ध्यान रखा जाता है। ब्रेकदर्शन के लिए जब सर्वदर्शन की लाइन रोकी जाती है तब भी किसी को किसी तरह की परेशानी नहीं होती है क्योंकि सब पारदर्शी तरीके से किया जाता है। बताय जाता है कि तिरुमला तिरुपति देवस्थानम के चेयरमैन बी आर नायडू सक्रिय रूप से व्यवस्था पर नजर रखते हैं। दर्शन के बाद नीचे पहुंचने के लिए 40 मिनट का समय तय है। अगर आपका वाहन 40 मिनट के पहले नीचे के बैरियर तक पहुंचता है तो आपको जुर्माना देना होगा। ये व्यवस्था वाहनों की गति सीमा को कंट्रोल करने के लिए बनाई गई है। जिस प्रकार से मंदिरों में हिंदुओं की आस्था बढ़ रही है उसको ध्यान में रखते हुए दर्शन की व्यवस्था को बहुत बेहतर करने की आवश्यकता है। जिस प्रकार से युवाओं की सनातन में आस्था बढ़ रही है तो उनकी आस्था को गाढा करने के लिए आवश्यक है कि मंदिरों की व्यवस्था तिरुमला बालाजी मंदिर जैसी हो। 


Saturday, January 20, 2024

अकारण विवाद,आधारहीन तर्क


अयोध्याजी में श्रीराम लला की प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव में एक दिन शेष है। राम लला की प्राण प्रतिष्ठा के पहले कुछ भगवाधारियों ने प्राण प्रतिष्ठा के समय को लेकर प्रश्न उठाए तो कुछ ने अर्धनिर्मित मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा पर सवाल खड़े किए। इन भगवाधारियों की आलोचना की आड़ में एक पूरा इकोसिस्टम सक्रिय हुआ और इनको बड़ा संत महात्मा और सनातन का ज्ञाता मानते हुए सरकार और प्रधानमंत्री की आलोचना आरंभ कर दी। इससे जनमानस में ये शंका हुई कि आलोचना योजनाबद्ध ढंग से आरंभ किया गया। सनातन या हिंदू धर्म में हर किसी को प्रश्न करने का अधिकार है। ये एक मात्र ऐसा धर्म है जिसमें अपनी श्रद्धा के अनुसार अपने भगवान चुनने तक की स्वतंत्रता है। आप चाहें जिस भगवान की पूजा करें, जिसके भक्त बनना चाहें उसके बनें। हिंदू धर्म समग्रता में एक भगवान और एक किताब वाले धर्मों से अलग है। अगर उत्तर आधुनिक शब्दावली में कहें तो हिंदू धर्म पूरी दुनिया का एकमात्र लोकतांत्रिक धर्म है। लोकतंत्र में नागरिकों को जितना अधिकार है उससे अधिक अधिकार हिंदू धर्म अपने अनुयायियों को देता है। इसलिए इन भगवाधारियों के प्रश्नों का कोई विरोध नहीं है। लेकिन जिस प्रकार से सरकार विरोधी इकोसिस्टम ने इस विरोध को प्रतिकार का स्वरूप दिया उसकी आलोचना तो होनी ही चाहिए। प्रश्न और प्रतिकार के अंतर को समझना होगा। राममंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर प्रश्न उठाते हैं तो एक संवाद का जन्म होता है। भारतीय संस्कृति में संवाद का अपना एक महत्व रहा है और रहेगा। प्रश्न से आगे जाकर जब प्रतिकार आरंभ होता है तो तो वो आस्था का प्रतिकार होता है। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति का जो संघर्ष रहा है वो इसी आस्था के प्रतिकार से जुड़ा रहा। श्रीरामजन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में भी इस आस्था का सम्मान किया गया। यह बात इकोसिस्टम से जुड़े लोगों को समझ नहीं आ रही है। केंद्र सरकार या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विरोध करने की उसकी जो योजना है उसमें वो आस्था पर प्रहार करके उसको खंडित करने का प्रयत्न करते नजर आने लगे हैं। मोदी विरोध से राम विरोध तक पहुंच गए हैं। यहीं पर उनका अज्ञान और भारतीय जनमानस को समझने की कमजोरी उजागर होती है। 

श्रीराम से जुड़े दो ग्रंथ वाल्मीकि रचित रामायण और तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस को महत्वपूर्ण माना जाता है। तुलसी के श्रीरामचरितमानस की व्याप्ति किसी भी धर्मग्रंथ से कम नहीं है। उपरोक्त प्रश्नों के आलोक में इन दो ग्रंथों में वर्णित प्रसंगों पर दृष्टि डालते हैं। सबसे पहले मुहुर्त की बात करते हैं और देखते हैं कि वाल्मीकि रामायण में श्रीराम ने मुहुर्त के बारे में क्या कहा है। वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड के चतुर्थ सर्ग में मुहुर्त की चर्चा है। जब श्रीराम वानर सेना के साथ समुद्र तट पर पहुंचते हैं और हनुमान उनको लंकापुरी का वर्णन सुनाते हैं। उस वर्णन को सुनकर श्रीराम कहते हैं कि हनुमन! मैं तुमसे सच कहता हूं-तुमने उस भयानक राक्षस की जिस लंकापुरी का वर्णन किया है उसे मैं शीघ्र नष्ट कर डालूंगा। हनुमान से बात समाप्त करने के बाद श्रीराम ने सुग्रीव से कहा, अस्मिन् मुहुर्ते सुग्रीव प्रयाणमभिरोचय/ युक्तो मुहूर्ते विजये प्राप्तो मध्यं दिवाकर:। अर्थ ये हुआ कि – सुग्रीव! तुम इसी मुहुर्त में प्रस्थान की तैयारी करो। सूर्यदेव दिन के मध्य भाग में जा पहुंचे हैं, इसलिए इस विजय नामक मुहुर्त में हमारी यात्रा उपयुक्त होगी। श्रीराम जिस विजय मुहुर्त की बात कर रहे हैं उसके बारे में व्याख्या ये है कि दिन में दोपहरी के समय अभिजित मुहूर्त होता है इसी को विजय मुहूर्त भी कहते हैं । लंका प्रस्थान के लिए श्रीराम ने स्वयं दोपहर के इस मुहुर्त को चुना था तो श्रीरामजन्मभूमि पर बने मंदिर में भव्य समारोह के लिए इस मुहुर्त पर प्रश्न उठाना उचित नहीं प्रतीत होता है। ज्योतिष रत्नाकर में इस मुहूर्त में दक्षिणयात्रा निषिद्ध है लेकिन यहां तो किसी प्रकार की यात्रा की ही नहीं जा रही है। श्रीराम ने जब लंका विजय के प्रस्थान के लिए अभिजित मुहूर्त चुना था तो उससे अधिक पवित्र और सटीक मुहूर्त क्या हो सकता है। 

अब श्रीरामचरितमानस का वो प्रसंग देखते हैं जब श्रीराम समुद्र के किनारे शिव जी की पूजा करना चाहते हैं। यह प्रसंग भी लंका कांड का है। श्रीराम और उनकी सेना के सामने लंका जाने के लिए समुद्र को पार करने की समस्या थी। जामवंत ने नल नील को बुलाकर कहा कि मन में श्रीराम जी के प्रताप को स्मरण करके सेतु तैयार करो, कुछ भी परिश्रम नहीं होगा। फिर उन्होंने वानरों के समूह से वृक्षों और पर्वतों के समूह को उखाड़ लाने को कहा, धावहु मर्कट बिकट बरूथा। आनहु बिटप गिरिन्ह के जूथा।।सुनि कपि भालु चले करि हूहा।जय रघुबीर प्रताप समूहा।। वानर भालू अपना काम करके वृक्षों और पर्वतों के समूह ले आते हैं और नल नील उनको सेतु का आकार देने लगते हैं। सेतु की सुंदर रचना देखकर कृपा सिंधु श्रीराम कहते हैं- परम रम्य उत्तम यह धरनी। महिमा अमित जाइ नहीं बरनी।। करिहउं इहां संभु थापना। मोरो ह्रदयं परम कलपना।। श्रीराम को सुनकर सुग्रीव ने अपने दूत भेजे और ऋषियों को समुद्र तट पर बुलाया। फिर वहीं पर श्रीराम ने शिवलिंग की स्थापना करके उनकी पूजा अर्चना की। लंका कांड में तुलसीदास जी ने लिखा है- सुनि कपीस बहु दूत पठाए। मुनिवर सकल बोलि लै आए।। लिंग थापि विधिवत करि पूजा। सिव समान प्रिय मोहि न दूजा।। अगर इस प्रसंग को देखे तो भगवान की पूजा के लिए कहां किसी मंदिर या स्थान की आवश्यकता पड़ी। श्रीराम ने समुद्र किनारे शिवलिंग की स्थापना की और मुनियों की उपस्थिति में उनकी पूजा की। शिवलिंग भी पूजा के पहले ही बनाया गया। कथित शंकराचार्य आदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना इस आधार पर कर रहे हैं कि वो अर्धनिर्मित मंदिर में पूजा कर रहे हैं। आलोचना करनेवाले इन भगवाधारियों को रामायण और श्रीरामचरितमानस में वर्णित इन प्रसंगों को देखना चाहिए। कहां कोई मंदिर कहां कोई शिखर। बस सागर का किनारा, श्रेष्ठ मुनियों की उपस्थिति और भगवान शंकर के प्रति आस्था। शिवलिंग की स्थापना भी हुई और पूजा भी। निर्मित- अर्धनिर्मित की कोई बात ही नहीं है। जहां हमारे ग्रंथों में इस तरह की बातें हो वहां मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा को लेकर उठनेवाले प्रश्नों को इन प्रसंगो के आलोक में देखना चाहिए। प्रश्न करनेवालों को प्रभु श्रीराम के इस वचन का भी ध्यान रखना चहिए- होइ अकाम जो छल तजि सेइहि।भगति मोरि तेहि संकर देहहि।। मम कृत सेतु जो दरसनु करिही। सो बिनु श्रम भवसागर तरिही।। जो छल छोड़कर निष्काम होकर श्रीरामजी की सेवा करेंगे उन्हें शंकर जी मेरी भक्ति देंगे। श्रीराम के वचन सबको अच्छा लगा और शंकर जी की पूजा के पश्चात सभी ऋषि मुनि अपने अपने आश्रमों में लौट गए।

अयोध्या धाम में श्रीराम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में प्रश्न खड़ा करनेवाले यहां तक कह रहे हैं कि संविधान की शपथ लेनेवाले प्रधानमंत्री प्राण प्रतिष्ठा नहीं कर सकते। होता यह है कि जब विरोध के लिए विरोध करना हो तो ऐसे ऊलजलूल तर्क ढूंढे जाते हैं जो कई बार हास्यास्पद हो जाते हैं। संविधान की शपथ का तर्क भी ऐसा ही है। एक सज्जन ने तो यहां तक कह दिया कि नव्य मंदिर जन्म स्थान से तीन किलोमीटर दूर बन रहा है। आधारहीन, तथ्यहीन बयान। प्रश्न करनेवाले की मंशा और उसके ज्ञान पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं। श्रीराम और उनका चरित इस देश के लोक मानस में अंकित है। उसका प्रतिकार देश की जनता को शायद ही मंजूर हो। सोमवार को दोपहर विजय या अभिजित मुहूर्त में नव्य मंदिर में प्रभु श्रीराम की मनोहारी मूर्ति की स्थापना हो रही है। उनके साथ पूर्व में स्थापित रामलला विराजमान भी होंगे। मंगल की कामना होनी चाहिए।  


Saturday, April 17, 2021

आपदा में विरासत सहेजने का अवसर


कोरोना की दूसरी लहर की वजह से लोगों ने फिर से अपने-अपने घरों से निकलना कम कर दिया है। स्थितियां इस तरह की बनने लगी हैं कि पिछले साल की घटनाएं और स्थितियां याद आने लगी हैं। एक बार फिर से इलेक्ट्रानिक या ई-फॉर्मेट में प्राचीन पुस्तकों का आदान-प्रदान शुरू हो गया है। कुछ ऐसी पुस्तकें भी इस दौरान देखने को मिल रही हैं जो अब अप्राप्य हैं या जिनका प्रकाशन अब नहीं हो रहा है। पिछले साल जब कोरोना का कहर था तब भी एक ऐसी ही दुर्लभ पुस्तक ई फॉर्मेट में प्राप्त हुई थी। पुस्तक का नाम था ‘सनातन धर्म, एन एलिमेंट्री टेक्स्टबुक ऑफ हिंदी रिलीजन एंड एथिक्स’। इस पुस्तक के लेखक का नाम नहीं था लेकिन इसके कवर पर प्रकाशन वर्ष उन्नीस सौ सोलह और प्रकाशक के तौर पर सेंट्रल हिंदू कॉलेज बनारस के मैनेजिंग कमेटी का उल्लेख था। पिछले साल ये पुस्तक काफी उपयोगी मानी गई थी और कई लोगों ने इसका अध्ययन भी किया था। अभी एक ऐसी ही महत्वपूर्ण पुस्तक प्राप्त हुई है जिसका नाम है ‘जन जनक जानकी’ जिसके संपादक है सच्चिदानंद वात्स्यायन। वात्स्यायन जी को ज्यादातर लोग अज्ञेय के नाम से जानते हैं। इस पुस्तक के प्रकाशन वर्ष का उल्लेख नहीं है लेकिन ये उन्नीस सौ तिरासी के एक या दो वर्षों के बाद प्रकाशित हुई थी। ये पुस्तक इस अर्थ में भी महत्वपूर्ण है कि इसमें हिंदी के सत्रह महत्वपूर्ण लेखकों के विचार हैं जो एक यात्रा के दौरान उपजे थे। दरअसल उन्नीस सौ तिरासी में अज्ञेय जी की अगुवाई में लेखकों के एक दल ने बाइस जनवरी से लेकर अठारह मार्च तक दो चरणों में यात्रा की थी। इस यात्रा को ‘जानकी जीवन यात्रा’ का नाम दिया गया था और यात्रा के रूट को ‘सीयराममय पथ’ कहा गया था। पहले चरण में जनकनंदिनी के जन्मस्थान बिहार के सीतामढ़ी से लेकर श्रीराम प्रभु के जन्मस्थान अयोध्या तक और फिर दूसरे चरण में अयोध्या से लेकर चित्रकूट तक की यात्रा की गई थी। इस पुस्तक की भूमिका में इस यात्रा का उद्देश्य भी स्पष्ट किया गया है, ‘यह यात्रा केवल राम-जानकी की कथा से जुड़े स्थलों को देखने के लिए नहीं की गई थी, न ही उसका उद्देश्य रामायण की कथा के भौगोलिक विस्तार के प्रमाण को खोजने के लिए की गई थी। रामायण की, राम-जानकी की कथा का, भारत के जन जीवन में जो महत्वपूर्ण स्थान है, लोक चित्त जिस प्रकार उस कथा से जुड़कर ही अपनी सांस्कृतिक अस्मिता की पहचान बनाता है उसको रेखांकित करने का प्रयास था।‘ इस यात्रा में शामिल सत्रह लेखकों ने अपने अपने अनुभवों को कलमबद्ध किया था जो ‘जन जनक जानकी’ नाम के पुस्तक में संकलित किया गया था। अब यह पुस्तक अपने मूल स्वरूप में उपलब्ध नहीं है।

जब अज्ञेय जी ने इस यात्रा की योजना बनाई थी तब इसको लेकर कई तरह की चर्चा भी चली थी। इसपर सवाल भी खड़े हुए थे। वो वामपंथ का दौर था और वामपंथी इतिहासकार भारतीय पौराणिक चरित्रों को लगातार मिथक कहकर प्रचारित और स्थापित कर रहे थे। वैसे समय में अज्ञेय ने सीतामढी से लेकर अयोध्या और फिर अयोध्या से चित्रकूट तक की ‘जानकी जीवन यात्रा’ का आयोजन करके एक तरह से वामपंथियों को सांस्कृतिक मोर्चे पर चुनौती भी दी थी। यात्रा के पहले अज्ञेय ने पटना में आयोजित पत्रकार वार्ता में कहा भी था कि, ‘महाकाव्य-चेतना राष्ट्र एवं मनुष्य मात्र की भावनात्मक एकता को सार्थक और गतिशील बनाती है। लोकजीवन की प्रेरणा हमेशा से शाश्वत काव्य की उदगम भूमि रही है, आज भी राष्ट्र और मनुष्य मात्र की भावनात्मक एकता को शाश्वत सांस्कृतिक धरातल पर प्रतिष्ठित करने के लिए महाकाव्य-चेतना की अंतर्निहित शक्ति की पुन: खोज करनी पड़ेगी। ‘सीयराममय पथ’ पर अग्रसर होने का सामूहिक संकल्प इसी दिशा में प्रगति का एक संकल्प है।‘ एक लेख में जितेन्द्र सिंह ने लिखा था- ‘आजकल प्राचीन भारतीय इतिहास के विख्यात विद्वान इस विषय पर तीखी बहस चला रहे हैं कि क्या वाल्मीकि रामायण या तुलसीकृत रामचरितमानस में वर्णित मूल कथा अधिक ऐतिहासिक और पुरातन है अथवा वेदव्यास रचित महाभारत की कथा?’ इसके अलावा इस बात पर भी चर्चा हो रही थी कि क्या साहित्य से या पौराणिक ग्रंथों से इतिहास के संकेत मिलते हैं? अज्ञेय इन प्रश्ऩों से सीधे तो नहीं टकरा रहे थे लेकिन परोक्ष रूप से वो ये संकेत करना चाहते थे कि ‘हमारे रचनाकार इतिहास के घटनाचक्र और उसके अनुक्रम से अधिक महत्व माहाकाव्यों के गाथाओं में गुंफित लोकजीवन के शाश्वत सत्य को मानते हैं।‘ इन बातों से ये भी स्पष्ट होता है कि हमारे रचनाकारों में अपने लोक जीवन के तत्वों को लेकर कितनी गहरी आस्था हुआ करती थी। 

‘जानकी जीवन यात्रा’ को ज्यादा समय नहीं बीता है। अड़तीस साल पहले की गई इस महत्वपूर्ण यात्रा और उस यात्रा के बाद लिखे गए लेखों पर आधारित पुस्तक का उपलब्ध ना होना भी कई प्रश्न खड़े करता है। मन में यह प्रश्न स्वाभाविक तौर पर उठता है कि क्या साहित्य के इतिहास की इस महत्वपूर्ण घटना को हाशिए पर डालकर उसको विस्मृत करने का षडयंत्र तो नहीं रचा गया। यह अनायस नहीं है कि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के ‘कल्याण’ पत्रिका में छपे लेखों पर चर्चा नहीं होती, उसका कहीं उल्लेख नहीं मिलता। निराला को वामपंथी साबित करने के लिए उनकी कविताओं की तमाम तरह की व्याख्या हमारे सामने है लेकिन ‘कल्याण’ के ‘कृष्ण भक्ति अंक’ में लिखा उनका लेख नहीं मिलता। दो साल पहले पटना पुस्तक मेला के दौरान हिंदी के वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी ने एक अनौपचारिक बातचीत में बताया था कि वासुदेव शरण अग्रवाल ने ‘श्रृंगार हाट’ नाम से एक पुस्तक लिखी थी। उस पुस्तक में पौराणिक काल में स्त्रियों के श्रृंगार की विधियों का वर्णन है।  ये पुस्तक भी उपलब्ध नहीं है। इस तरह के कई और उदाहरण हैं जहां हिंदी के पूर्वज लेखकों की उन रचनाओं को दरकिनार करने की कोशिश की गई जिसमें भारतीयता और हिंदू धर्म प्रतीकों के बारे में बात की गई हो। हमारे देश के विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों पर वामपंथियों का लंबे समय से कब्जा है लिहाजा इन विषयों पर शोध कार्य भी नहीं हो सका। नतीजा यह हुआ कि जो पुस्तकें वामपंथी विचारधार का पोषण नहीं करती थीं और जिनमें भारतीयता और यहां के लोक-तत्व मिलते थे वो ओझल होते चले गए। जब पुस्तकें पाठकों के सामने आएंगीं नहीं तो उनको कोई पढ़ेगा कैसे, जब पढ़ेगा नहीं तो उसकी चर्चा कैसे होगी और जब चर्चा नहीं होगी तो उसकी व्याप्ति कैसे होगी, जब व्याप्ति नहीं होगी तो प्रकाशकों की रुचि नहीं होगी और अंतत: उसका पुनर्प्रकाशन नहीं होगा और वो अनुपलब्ध हो जाएंगी। नई पीढ़ी को पता ही नहीं चल पाएगा कि उनकी समग्र साहित्यिक विरासत क्या है, उऩके सामने जो होगा उसको ही वो साहित्यिक विरासत मान लेगें। अपनी देश के लेखन की विरासत से पीढ़ियों को दूर करने का या उसके बारे में उनको अंधेरे में रखने का जो अपराध पूर्व में हुआ है, उसके लिए किसी को दंडित तो नहीं किया जा सकता है। उसका प्रायश्चित तो किया ही जा सकता है। प्रायश्चित इस रूप में कि उन अनुपलब्ध पुस्तकों को आधुनिक रूप में प्रकाशित करके युवा पीढ़ी तक पहुंचाने का उपक्रम हो । अगर ऐसा हो पाता है तो न केवल हमारी नई पीढ़ी अपनी ज्ञान परंपरा से परिचित होगी और वो समग्र ज्ञानार्जन से अपेक्षाकृत बेहतर कर पाने में सक्षम हो पाएगी। इस काम में सरकार की सांस्कृतिक संस्थाओं को पहल करनी चाहिए और इस संकट के समय में जितनी पौराणिक पुस्तकें लोगों के पास पहुंच रही हैं उसको जमा कर, उसकी प्रामाणिकता जांचने के बाद उसको प्रकाशित करने की दिशा में प्रयास किया जाना चाहिए। 

Saturday, August 8, 2020

देश की संस्कृति के आधार राम

अयोध्या में राम जन्मभूमि पर बननेवाले भव्य मंदिर के भूमिपूजन के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण के निहितार्थों पर पर्याप्त चर्चा होनी चाहिए। अगर गंभीरता से विचार किया जाए तो पांच अगस्त को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सिर्फ मंदिर के विधिवत निर्माण की शुरुआत ही नहीं की उन्होंने भारतीय संस्कृति के बारे में व्याप्त भ्रांतियों को दूर करने की नींव भी डाली। भारतीय संस्कृति को राम से जोड़कर नरेन्द्र मोदी ने उन उदारवादियों की सोच को भी सही दिशा में लाने की कोशिश की जो राम को धर्म से जोड़कर देखते और व्याख्यायित करते रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी का अयोध्या में दिया गया भाषण कई मायनों में ऐतिहासिक है। मोदी ने जय श्रीराम के नारे के स्थान पर सियावर रामचंद्र की जय या जय सियाराम का उद्घोष करके एक और संदेश दिया। ऐसा संदेश जो अपेक्षाकृत समावेशी है। राम जन्मभूमि आंदोलन के समय जय श्रीराम का उद्घोष किया जाता रहा था, बाद में भी जय श्रीराम का ही नारा लगता रहा। कुछ लोगों को प्रधानमंत्री का सियावर रामचंद्र कहना प्रतीकात्मक लग सकता है, लेकिन संस्कृति के सवालों से जब मुठभेड़ होती है तो प्रतीकों का भी बहुत अधिक महत्व हो जाता है। अपने पूरे भाषण के दौरान नरेन्द्र मोदी ने राम के सांस्कृतिक पक्ष को सामने रखा और स्पष्ट रूप से ये संदेश दिया कि भारत में किसी भी व्यक्ति का धर्म कुछ भी हो सकता है लेकिन हम सबकी संस्कृति तो राम ही है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम। वो कहते हैं कि ‘राम हमारे मन में गढ़े हुए हैं, हमारे भीतर घुल-मिल गए हैं। कोई काम करना हो, तो प्रेरणा के लिए हम भगवान राम की ओर ही देखते हैं। आप भगवान राम की अद्भुत शक्ति देखिए। इमारतें नष्ट कर दी गईं, अस्तित्व मिटाने का प्रयास भी बहुत हुआ, लेकिन राम आज भी हमारे मन में बसे हैं, हमारी संस्कृति का आधार हैं। श्रीराम भारत की मर्यादा हैं, श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं।‘

अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी साफ तौर पर संस्कृति और धर्म को अलग करके देखते हैं। जब वो विदेशों का उदाहरण देते हैं तो ये और भी स्पष्ट होता है, ‘दुनिया में कितने ही देश राम के नाम का वंदन करते हैं, वहां के नागरिक, खुद को श्रीराम से जुड़ा हुआ मानते हैं। विश्व की सर्वाधिक मुस्लिम जनसंख्या जिस देश में है, वो है इंडोनेशिया। वहां हमारे देश की ही तरह ‘काकाविन’ रामायण, स्वर्णद्वीप रामायण, योगेश्वर रामायण जैसी कई अनूठी रामायणें हैं। राम आज भी वहां पूजनीय हैं। कंबोडिया में ‘रमकेर’ रामायण है, लाओ में ‘फ्रा लाक फ्रा लाम’ रामायण है, मलेशिया में ‘हिकायत सेरी राम’ तो थाईलैंड में ‘रामाकेन’ है! आपको ईरान और चीन में भी राम के प्रसंग तथा राम कथाओं का विवरण मिलेगा। श्रीलंका में रामायण की कथा जानकी हरण के नाम सुनाई जाती है, और नेपाल का तो राम से आत्मीय संबंध, माता जानकी से जुड़ा है। ऐसे ही दुनिया के और न जाने कितने देश हैं, कितने छोर हैं, जहां की आस्था में या अतीत में, राम किसी न किसी रूप में रचे बसे हैं! आज भी भारत के बाहर दर्जनों ऐसे देश हैं जहां, वहां की भाषा में रामकथा, आज भी प्रचलित है।‘ उनके वक्तव्य के इस अंश के निहितार्थ को अगर समझें तो ये साफ होता है कि राम और राम का चरित्र उन देशों में भी संस्कृति का आधार हैं जिन देशों का धर्म या मजहब अलग है। इस्लाम को मानने वाले देशों में भी राम वहां की संस्कृति के आधार हैं। कहना न होगा कि प्रधानमंत्री ये साफ कर रहे हैं कि किसी का धर्म इस्लाम हो सकता है, कोई ईसाई धर्म में विश्वास रख सकता है लेकिन अगर वो भारत में रहता है तो उसकी संस्कृति राम है। राम को सिर्फ धर्म विशेष से जोड़ना उचित नहीं है वो तो भारत के हर धर्म के लोगों से जुड़े हैं, उनके जीवन में हैं। और यही तो संस्कृति है। कहा भी गया है कि संस्कृति को हम लक्ष्णों से जान सकते हैं, उसको परिभाषित करना जरा मुश्किल है।

यह भी कहा गया है कि संस्कृति वह गुण है जो हम सब में व्याप्त है जबकि सभ्यता वह चीज है जो हमारे पास है। तो राम तो हर भारतवासी के अंदर व्याप्त है, अपने अलग अलग रूपों में चाहे वो राम की मर्यादा हो, राम की नीति हो या फिर राम का नाम। दैनिंदिन अभिवादन से लेकर आचार व्यवहार तक में। तभी तो अपने भाषण में मोदी जोर देकर कहते हैं कि ‘जीवन का ऐसा कोई पहलू नहीं है, जहां हमारे राम प्रेरणा न देते हों। भारत की ऐसी कोई भावना नहीं है जिसमें प्रभु राम झलकते न हों। भारत की आस्था में राम हैं, भारत के आदर्शों में राम हैं! भारत की दिव्यता में राम हैं, भारत के दर्शन में राम हैं! हजारों साल पहले वाल्मीकि की रामायण में जो राम प्राचीन भारत का पथ प्रदर्शन कर रहे थे, जो राम मध्ययुग में तुलसी, कबीर और नानक के जरिए भारत को बल दे रहे थे, वही राम आजादी की लड़ाई के समय बापू के भजनों में अहिंसा और सत्याग्रह की शक्ति बनकर मौजूद थे! तुलसी के राम सगुण राम हैं, तो नानक और कबीर के राम निर्गुण राम हैं।’ जब वो वाल्मीकि के रामायण से लेकर कबीर के निर्गुण राम तक आते हैं या फिर बापू के राम की बात करते हैं तो वो एक परंपरा को रेखांकित कर रहे होते हैं। वाल्मीकि का राम अलग है जो समय और काल के अनुरुप तुलसी के यहां बहुत अलग दिखाई देता है। यह अकारण नहीं है कि तुलसीदास शम्बूक वध और सीता परित्याग की घटना रामचरित मानस में नहीं लिखते हैं। अलग अलग कालखंड में राम का चरित्र चित्रण इस तरह से हुआ है कि वो समकालीन चुनौतियों से मुठभेड़ करता दिखता है। राम का चरित्र देश काल और परिस्थिति के अनुसार इतना लचीला है कि वो अपने अंदर तमाम तरह के बदलावों को समाहित कर लेता है। अपने युग के धर्म का पालन भी करता है।

राम की व्याप्ति के इतने गवाक्ष खोलकर प्रधानमंत्री ने उनको लोक से जोड़ दिया। जब हम लोक की संस्कृति की बात करते हैं तो हमें रामधारी सिंह दिनकर के एक लेख ‘रेती के फूल’ की पंक्तियां याद पड़ती हैं जिसमें वो कहते हैं कि ‘असल में संस्कृति जिंदगी का एक तरीका है और यह तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है जिसमें हम जन्म लेते हैं। ...संस्कृति वह चीज मानी जाती है जो हमारे जीवन को व्यापे हुए है तथा जिनकी रचना और विकास में अनेक सदियों के अनुभवों का हाथ है। संस्कृति असल में शरीर का नहीं आत्मा का गुण है और सभ्यता की सामग्रियों से हमारा संबंध शरीर के साथ ही छूट जाता है, तब भी हमारी संस्कृति का प्रभाव हमारी आत्मा के साथ जन्म-जन्मांतर तक चलता रहता है।‘  हमारे राम ऐसे ही तो हैं, उनका प्रभावव भी तो हमारे देश में पीढ़ियों से चला आ रहा है। प्रधानमंत्री के इस भाषण के बाद बहुत संभव है कि उन बुद्धिजीवियों के मानस पर वर्षों से जमा वो भ्रम का जाला भी साफ होगा जिसमें वो भारत को विविध संस्कृतियों का देश मानते और बताते रहते हैं। विविध संस्कृतियों का देश बतानेवाले सिद्धातों का निषेध होगा क्योंकि यह तो साफ है कि भारत की संस्कृति तो एक ही है, लेकिन हम इस एक संस्कृति में विविधता का उत्सव मनाते हैं।

Saturday, April 29, 2017

विरासत को सहेजने का वक्त

हिंदी की विपुल साहित्यक विरासत पर अगर नजर डालें तो इस वक्त उसको संरक्षित करने की बेहद आवश्कता दिखाई देती है । संरक्षण के साथ-साथ जरूरत इस बात की भी है कि हिंदी साहित्य को समृद्ध करनेवाली रचनाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम भी किया जाए। आज पूरे देश में हिंदी के पक्ष-विपक्ष में बयानबाजी हो रही है लेकिन अगर हिंदी के लिए कुछ ठोस करना है तो उसकी विरासत को समकालीन बनाने का यत्न किया जाना बेहद जरूरी है। हिंदी के व्याकरण को लेकर बहुत सारी बातें होती हैं, हिंदी में शब्दों की युग्म-रचना को लेकर भी बहसें होती रहती हैं । इन सारे प्रश्नों का जिस किताब में उत्तर है वह पुस्तक अब लगभग अप्राप्य है। पंडित किशोरीदास वाजपेयी की किताब ‘हिन्दी शब्दानुशासन’ अहम है.,लेकिन वो अब मिलती नहीं है। अगर बहुत जतन के बाद आप इस पुस्तक तक पहुंच भी गए तो इसकी छपाई के अक्षर काफी पुराने हैं, लिहाजा आपको पढ़ने में कठिनाई होगी। नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी से प्रकाशित इस पुस्तक के पुनर्प्रकाशन और पाठकों तक इसकी जानकारी पहुंचाने की कोशिश की जानी चाहिए। इसी तरह से अगर आप हमारे वेदों को देखें तो वो उपलब्ध तो हैं लेकिन उनको समकालीन बनाने की आवश्यकता है। प्रस्तुतिकरण में समकालीन, छपाई में बेहतर अक्षरों का प्रयोग और इन सबसे अलग जो हिंदी में इसका अनुवाद छपा है उसको फिर से देखकर आज के जमाने की हिंदी की अनुसार करना होगा ताकि हमारी आज की युवा पीढ़ी उसको पढ़ समझ सके।   
इसी तरह से अगर हम विचार करें तो हमारे कई ऐसे कवि-लेखक हैं जिनके बारे में, जिनकी रचनाओं के बारे में युवा पीढ़ी को बताने के लिए काम करना होगा। अपनी परंपरा और विरासत तो सहेजकर ही उसकी मजबूत जमीन पर बुलंद इमारत खड़ी की जा सकती है।
अभी हाल ही में केंद्रीय हिंदी निदेशालय के सहयोग से अयोध्या में जगन्नाथदास रत्नाकर पर दो दिन की राष्ट्रीय संगोष्ठी हुई। इस गोष्ठी में जगन्नाथदास रत्नाकर और हिंदी साहित्य में उनके योगदान पर गहन चर्चा हुई। जगन्नाथदास रत्नाकर को ज्यादातर लोग रीतिकालीन कवि और उद्धव शतक के रचयिता के तौर पर जानते हैं, परंतु उनका रचना संसार काफी व्यापक है। कहा जाता है कि उन्होंने जयपुर राजघराने से लेकर बिहारी सतसई का भाष्य प्रस्तुत किया। कुछ लोगों का तो ये भी मानना है कि सूर सागर के संपादन और संकलन का बड़ा हिस्सा उन्होंने ही किया था । उद्धव शतक के रचयिता कविवर जगन्नाथदास रत्नाकर की कर्मभूमि अयोध्या है। वो करीब तीन दशकों तक अयोध्या में रहे और वहीं रहकर उन्होंने उद्धव शतक, गंगालहरी, गंगावतरण, बिहारी सतसई की टीका जैसे कई महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की।अच्छी बात यह रही कि इस गोष्ठी में केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने रत्नाकर के बिखरे साहित्य को सहेजने एवं पुनर्प्रकाशन का ऐलान किया । जगन्नाथदास रत्नाकर के बारे में यह तथ्य अभी तक सामने है कि वो आजादी पूर्व उन्नीस सौ दो में अयोध्या के राजा के निजी सचिव होकर आए थे और वहां रहते हुअ उन्होंने साहित्य के लिए बेहद अहम कार्य किया। उनकी रचनाएं काल की सीमाओ को तोड़ते हुए आज भीअपने बूते पर जिंदा हैं। जरूरत उसको विशाल हिंदी पाठक वर्ग तक पहुंचाने की है ।
टी एस इलियट ने कहा था- ‘ऐतिहासिक बोध उन कवियों के लिए, जो अपनी उम्र के पच्चीस वर्ष बाद भी कवि बने रहना चाहते हैं, लभग अनिवार्य है। इस ऐतिहासिक बोध का मतलब है एक परप्रेक्ष्य, जो अतीत की अतीतता से नहीं, उसकी वर्तमानता से भी संबद्ध हो। ऐतिहासिक बोध व्यक्ति को इसके लिए बाध्य करता है कि वो अपनी अस्थियों में सिर्फ अपनी पीढ़ी को लेकर ही ना लिखे, बल्कि इस अनुभूति के साथ लिखे कि होमर से लेकर आजतक के यूरोप का संपूर्ण साहित्य उसमें अंतर्निहित है। इसमें उसके अपने देश के साहित्य का समांतर अस्तित्व होगा और वह समांतर क्रम में ही रचना करेगा।‘ कवि जग्गनाथदास रत्नाकर में ये गुण है।

हिंदी में लंबे समय तक परंपरा को तोड़ने फोड़ने का काम किया गया और इस तोड़ फोड़ का नुकसान यह हुआ कि हम अपनी विरासत से दूर होते चले गए। अपरंपरा का शोर मचानेवाले तो समय के साथ साहित्य में हाशिए पर चले गए लेकिन जबतक शोर मचाते रहे तबतक साहित्य का बहुत नुकसान कर दिया। कुछ कवियों को आगे बढ़ा दिया तो कुछ के विचारों में कमजोरी पकड़कर उसके बरख्श किसी और कवि को खड़ा करने की कोशिश की गई। मिसाल के तौर पर जिस तरह से आलोचकों में गोस्वामी तुलसीदास और कबीर को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ दिखाई देती है उसको देखा जा सकता है। कबीर को क्रांतिकारी और तुलसी को रूढ़िवादी करार देकर सालों तक तुलसी के कवि रूप पर विचार नहीं किया गया या कह सकते हैं कि तुलसी को सायास हाशिए पर डालने की कोशिश की गई । तुलसी को वर्णाश्रम व्यवस्था का समर्थक और कबीर को रूढ़ियों पर प्रहार करनेवाला रचनाकार बताया जाता रहा। यह तो तुलसी के कवित्व की ताकत थी कि जिसके बूते पर वो पाठकों के मानस पर पीढ़ी दर पीढ़ी बने रहे। सवाल तो उसपर भी खड़े होने चाहिए कि कविता की कसौटी कवि का विचार होना चाहिए या उसकी विचारधारा? हमारा तो मानना है कि कविता को कविता की प्रचलित कसौटी पर ही कसा जाना चाहिए। कविता को विचार और विचारधारा की कसौटी पर कसना कवि के साथ अन्याय करने जैसा है। हिंदी में विचारधारा के आलोचकों ने जब कवियों का विचार और धारा के आधार पर मूल्यांकन शुरू किया तो इस तरह की गड़बड़ियां होने लगीं। जगन्नाथदास रत्नाकर से लेकर अन्य रीतिकालीनऔर भक्तिकालीन कवि हाशिए पर धकेले जाने लगे। अब वक्त आ गया है कि एक बार फिर से हमअपने पूर्ववर्ती रचनाकारों पर गंभीरता से बगैर किसी वैचारिक पूर्वग्रह के विचार करें और मूल्यांकन का आधार साहित्यक हो। सरकारें भी हिंदी का बहुत शोर मचा रही हैं लेकि अगर वो सचमुच हिंदी को लेकर गंभीर हैं तो उनको प्रतीकात्मकता छोड़कर ठोस कार्य प्रारंभ करना होगा। केंद्रीय हिंदी निदेशालय के अलावा भी भारत सरकार के कई संस्थान हैं जो इस तरह के काम को अपने हाथ में ले सकते हैं। कई संस्थाएं तो पुरानी कृतियों के संरक्षण और संवर्धन के लिए हैं। इस बिखने हुए संस्थामों को साथ आकर, गंभीरता से, लोगों को चिन्हित कर इस काम को करवाना होगा।