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Sunday, March 8, 2026

रेडियो को दिए हिंदी के संस्कार


हिंदी साहित्य के इतिहास में डा नगेन्द्र की जब भी चर्चा होती है तो उनको या तो आलोचक के रूप में या दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के धाकड़ विभागाध्यक्ष के रूप में याद किया जाता है। आलोचक के रूप में रस सिद्धांत और कविता की प्रवृत्तियों पर उनके लिखे को हिंदी आलोचना में पर्याप्त प्रतिष्ठा प्राप्त है। उनके निबंधों की भी चर्चा होती है। दिलचस्प बात ये है कि अंग्रेजी में एमए करने के बाद नगेन्द्र ने हिंदी में भी एमए किया और जीवनपर्यंत हिंदी की सेवा में ही लगे रहे। शिक्षक-आलोचक के रूप में उनकी जो ख्याति है उसके सामने उनका हिंदी भाषा को लेकर किया गया कार्य बहुधा अलक्षित रह जाता है। स्वाधीनता के कुछ महीनों पूर्व 1947 के मई के तीसरे सप्ताह में डा नगेन्द्र ने आल इंडिया रेडियो में नौकरी आरंभ की। अपनी आत्मकथा नें डा नगेन्द्र ने लिखा है कि जब उन्होंने आल इंडिया रेडियो में नौकरी आरंभ की तो वहां हिंदी की दुर्दशा थी। वार्ता, नाटक, संगीत सभी अनुभागों में उर्दू का बोलबाला था। नाम उसका हिंदुस्तानी था पर भाषा उर्दू थी। उत्तर भारत में उस समय अंग्रेजी के अलावा हिंदुस्तानी में समाचार प्रसारित होते थे। आल इंडिया रेडियो में उपयोग में आनेवाली भाषा हिंदुस्तानी शुद्ध उर्दू ही थी जिसमें क्रियाओं और विभक्तियों के अतिरिक्त, जो वस्तुत: हिंदी और उर्दू में समान होती है, हिंदी का कोई लक्षण नहीं था। अंतराष्ट्रीय के लिए वैनुलअकवामी, प्रधानमंत्री के लिए वजीरे आजम, गृहमंत्री और विदेश मंत्री के लिए वजीरे दाखिला और वजीरे खालिजा जैसे शब्दों का प्रयोग होता था। स्वागत और धन्यवाद जैसे शब्दों का प्रयोग आल इंडिया रेडियो में वर्जित था। उस समय आल इंडिया रेडियो के महानिदेशक एस ए बुखारी थे। 

देश स्वाधीन हुआ और सरदार पटेल को इस बात का भान था कि रेडियो शिक्षा और संस्कृति के प्रसार प्रचार का प्रभावी साधन है।। उन्होंने गृह मंत्रालय के साथ-साथ सूचना और प्रसारण मंत्रालय अपने पास रखा। आल इंडिया रेडियो के उस समय के महानिदेशक एस ए बुखारी विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए लेकिन बुखारीकालीन भाषा आल इंडिया रेडियो पर चलती रही। बुखारी के बाद राजर्षि टंडन के प्रयास के बाद पी सी चौधुरी की नियुक्ति रेडियो में महानिदेशक के पद पर हुई। उनको सरदार पटेल का पूर्ण समर्थन था। चौधुरी भारतीय संस्कृति और इतिहास के ज्ञाता ही नहीं थे बल्कि उसके अनुरागी भी थे। जब डा नगेन्द्र ने रोडियो में अपनी सेवा आरंभ की तो हिंदी को हिंदी बनाने का प्रयास आरंभ हुआ। डा नगेन्द्र ने आल इंडिया रेडियो के उत्तर भारत के स्टेशनों में हिंदी के लेखकों और साहित्यकारों को सलाहकार के रूप में नामित कर जोड़ा। उनको कार्यक्रमों में बुलाया जाने लगा। चुनौती हिंदी समाचार की भाषा को हिंदी में प्रसारित करने की  थी। पहले तो हिंदी के साथ साथ उर्दू की पारिभाषिक शब्दावली का उपयोग होना शुरू हुआ। जैसे कहा जाता था कि प्रधानमंत्री यानि वजीरे आजम, अंतराष्ट्रीय यानि वैनुलअकवामी। इस तरह के प्रयोग की आलोचना आरंभ हुई। उर्दू अखबारों के अलावा मुस्लिम विद्वानों ने इसका जोरदार विरोध किया। महानिदेशक चौधुरी को इन आलोचकों की मंशा का पता था इस कारण वो डटे रहे और डा नगेन्द्र को हिंदी के अधिकतम शब्दों के उपयोग की छूट दी। उसी दौर में डा नगेन्द्र पर उनके एक सहकर्मी ने कटाक्ष करते हुए कहा था कि मौलाना अबुल कलाम आजाद के कार्यालय से फोन आया था और वो जानना चाहते थे कि क्या उनका महकमा बदल दिया गया है। दरअसल उस दिन के बुलेटिन में डा नगेन्द्र ने वजीरे तालीम की जगह शिक्षा मंत्री लिखा था जो प्रसारित हुआ था। इन आलोचनाओं और कटाक्षों से डा नगेन्द्र डिगे नहीं और हिंदी को आल इंडिया रेडियो में स्थापित करने का महती कार्य किया। 

डा नगेन्द्र ने चौधुरी के कहने पर सुमित्रानंदन पंत को रेडियो के लिए काम करने को तैयार किया। पंत जब रेडियो के लिए काम करने लगे तो साहित्य जगत के कुछ दिग्गजों ने उनके चयन पर प्रश्न उठाया था। नगेन्द्र अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, भारतीय प्रसारण का इतिहास इस बात का साक्षी है कि पंत जी की नियुक्ति को लेकर शंका सर्वथा निर्मूल थी। पंत जी के ज्योति-स्पर्श से रेडियो का वायुमंडल एक स्निग्ध-स्वर्णिम प्रकाश से दीपित हो उठा। उन्होंने अत्यंत परिश्रम के साथ आकाशवाणी( तबतक आल इंडिया रेडियो का हिंदी नाम आकाशवाणी हो चुका था) के कार्यक्रम का संस्कार-परिष्कार किया और उसे भारतीय संस्कृति का उपयुक्त माध्यम बनाने में अपूर्व योगदान किया। डा नगेन्द्र ने पंत को रेडियो पर प्रसारिक होनेवाले समाचार की भाषा को ठीक करने का श्रेय दिया है। ये उचित भी है लेकिन नगेन्द्र ने आल इंडिया रेडियो के हिंदी के समाचार प्रभाग में हिंदी को स्थापित करने के क्रम में अपमान और प्रताड़ना भी झेलकर डिगे नहीं ये भी उल्लेखनीय है। नेहरू जी का स्वाधीनता की अर्धरात्रि को दिए जानेवाले भाषण के हिंदी अवुवाद को लेकर भी डा नगेन्द्र को कठघरे में खड़ा किया गया था लेकिन उन्होंने उस भाषण के अंग्रजी से हिंदी अनुवाद में सिर्फ कुछ शब्द ठीक किए थे। यह पूरा प्रसंग काफी लंबा है लेकिन स्वाधीनता के बाद हिंदी भाषा को जनप्रिय बनाने में रेडियो और नगेन्द्र की भूमिका का स्मरण करना आवश्यक है।   


Saturday, July 1, 2023

प्रतिभा विकास में भाषा बाधक न बने


दिल्ली विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मेट्रो रेल से विश्वविद्यालय गए। मेट्रो की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री ने साथ यात्रा कर रहे छात्रों से बातचीत की। छात्रों से चर्चा के समय प्रधानमंत्री मोदी ने बहुत ही अच्छी बात कही जिसपर देशव्यापी सोच बनना चाहिए। प्रधानमंत्री ने एक छात्र से जानना चाहा कि वो मूल रूप से कहां के रहनेवाले हैं। छात्र ने बताया कि वो रांची, झारखंड का है। प्रधानमंत्री ने सहजता से पूछा कि बाहर के किसी को दोस्त बनाया। रांची के उस छात्र ने उत्साह से बताया कि यूपी के लड़कों से दोस्ती की। वो जिस कालेज में पढ़ते हैं उसका प्रबंधन बालाजी मंदिर भी चलाते हैं तो वहां तेलुगु भाषी भी हैं। उसने तेलुगु बोलनेवालो से भी दोस्ती की है। वो उत्साह से बोले जा रहा था लेकिन प्रधानमंत्री कुछ और जानना चाह रहे थे। वो जानना चाह रहे थे कि दक्षिण भारत के राज्यों के छात्रों से दोस्ती की और उनसे उनकी भाषा के पांच-दस वाक्य सीखे या नहीं। प्रधानमंत्री के इतना बोलते ही एक छात्रा फटाक से बोल पड़ी कि उसने ऐसा किया है। एक वाकया भी बताया। वो अपने कालेज परिसर में थी तो उसने देखा कि एक लड़की फोन पर बात कर रही थी। बातचीत की भाषा वो नहीं समझ पा रही थी। बात खत्म होने के बाद उसने जानना चाहा कि किस भाषा में बात हो रही थी। पता चला कि बातचीत मलयालम में हो रही थी। इसके बाद उसने उस लड़की से अनुरोध किया कि उसे भी मलयालम के कुछ वाक्य बता दे। जैसे कि अगर को किसी को हैलो करना हो या हालचाल पूछना हो तो मलयालम में कैसे और क्या बोलेंगे। जब उस लड़की ने मलयालम में बताना आरंभ किया तो हिंदी भाषी लड़की ने फोन पर रिकार्ड कर लिया, ताकि बाद में उसको सुनकर सीख सके। इसी तरह से एक छात्रा ने बताया कि उसने मणिपुरी छात्राओं से मित्रता करके उनको हिंदी सिखाई तो असम की छात्रा ने बताया कि दिल्ली विवविद्यालय में अपने अध्ययन के दौरान उसने अपने कई साथियों का असमिया सिखाई। 

देखने में ये पूरा प्रसंग बहुत सामान्य लग रहा है लेकिन अगर सूक्ष्मता और गंभीरता से विचार करें तो एक देश के प्रधानमंत्री अपने देश के छात्रों को देश के अलग अलग हिस्सों में बोली जानेवाली भाषाओं को सीखने के लिए प्रेरित कर रहे थे। सहजता के साथ। इस देश ने भाषा के नाम पर अतीत में बहुत हिंसा झेली है। राज्यों का बंटवारा देखा है। खून खराबा देखा है। भारतीय भाषाओं को राजनीति का औजार बनते देखा है। अभी भी कभी कभार इस तरह के प्रसंग देखने को मिल जाते हैं। तमिलनाडु जैसे भाषाई रूप से समृद्ध प्रदेश के नेता अकारण हिंदी विरोध का झंडा उठाते रहते हैं। अब स्थितियां कुछ बदलती दिखने लगी हैं। सत्ता के शीर्ष स्तर पर बैठे नेताओं ने भारतीय भाषाओं को आगे बढ़ाने और उसके बल देने का उपक्रम आरंभ किया है। भाषा की राजनीति अपेक्षाकृत कम होने लगी है। प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत के क्रम में एक छात्र ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं के महत्व की चर्चा की। इसपर प्रधानमंत्री मोदी का उत्तर बेहद सधा हुआ था। सधा हुआ इस वजह से कि उन्होंने अंग्रेजी की आलोचना नहीं की। बिना अंग्रेजी की आलोचना के उन्होंने भारतीय भाषाओं की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि हमारे देश के गांवों में बहुत प्रतिभा है लेकिन अधिकतर को अंग्रेजी का सौभाग्य नहीं मिला तो वे प्रतिभाएं बाधित हो गईं, रुक गईं। बातचीत के क्रम में ही प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि प्रतिभा के विकास में भाषा बाधक नहीं होनी चाहिए। इस बातचीत से जो संदेश निकल रहा था वो ये भी था कि भारतीय भाषाओं के बीच किसी प्रकार का वैमनस्य नहीं होना चाहिए। हर भारतीय को मातृभाषा के अलावा एक और भाषा सीखनी चाहिए। 

पिछले दिनों भारतीय भाषाओं के बीच बेहतर समन्वय और अतीत की कटुता को दूर करने के लिए वाराणसी और गुजरात में तमिल संगम जैसे कार्यक्रम हुए। उसके पहले पिछले वर्ष शिमला में साहित्य अकादमी ने उन्मेष नाम से चार दिनों का एक कार्यक्रम किया था। शिमला में आयोजित उस कार्यक्रम में भारतीय भाषाओं के चार सौ के करीब लेखकों की भागीदारी रही थी। विभिन्न विषयों पर मंथन किया गया था। आगामी अगस्त के पहले सप्ताह में फिर से साहित्य अकादमी भोपाल में उन्मेष का आयोजन कर रही है। इसमें भी भारतीय भाषाओं के विद्वानों की भागीदारी होगी। तमिल से लेकर कश्मीरी तक, गुजराती-मराठी से लेकर बांगला और पूर्वोत्तर की भाषाओं के लेखकों के बीच विचारों का आदान-प्रदान होगा। अगर देखा जाए तो केंद्र सरकार के स्तर पर भारतीय भाषाओं के बीच संवाद बढ़ाने का प्रयास निरंतर चल रहा है। 

स्वाधीनता के पहले हिंदी और तमिल के बीच इतना अधिक साहचर्य था कि 1910 में तत्कालीन मद्रास से काशी आकर बी कृष्णस्वामी अय्यर ने घोषणा की थी कि हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है। तमिल और हिंदी भाषा के बीच कृतियों के अनुवाद की बेहद समृद्ध परंपरा थी। जयशंकर प्रसाद की कालजयी कृति कामायनी और आंसू दोनों काव्यों के अनुवाद तमिल में प्रकाशित हुए थे। प्रेमचंद के उपन्यास सेवासदन का भी तमिल में अनुवाद हुआ था और उसपर तो तमिल में एक फिल्म भी बनी थी। सुब्रह्मण्य भारती की रचनाओं को अनुवाद हिंदी में हो रहा था। आपको ये जानकर आश्चर्य हो सकता है कि तमिल के महावि कंब के रामायण का हिंदी में अनुवाद बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना से प्रकाशित हुआ था। अन्य भारतीय भाषाओं के बीच भी अनुवाद के क्रम चलते रहते थे। स्वाधीनता के कुछ वर्षों बाद जब भाषा के आधार पर राजनीति आरंभ हुई तो ये प्रक्रिया बाधित हुई। राजनीति ने भाषा को औजार बनाकर भारत को बांटने का काम किया। स्वाधीनता के पहले दक्षिण, पश्चिम और पूर्वी भारत से हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात उठती रहती थी। उन प्रदेशों के लोगों के मस्तिष्क में हिंदी को लेकर आशंका के बीज बो दिए गए। संविधान सभा में देश की भाषा समस्या पर तीन दिनों तक चर्चा हुई थी। वहां पुरषोत्तमदास टंडन जी के विचारों को आज याद करने की आवश्यकता है। टंडन जी को इस कारण क्योंकि वो हिंदी के प्रचंड समर्थक थे। जब हिंदी में अंतरराष्ट्रीय अंकों की स्वीकार या अस्वीकार करने पर बात हो रही तो किसी ने कहा कि जनमत लेने से तो हिंदी आएगी नहीं। इसपर टंडन जी का उत्तर था कि ‘यदि विभिन्न प्रांत हिंदी को स्वीकार नहीं करते हैं तो मैं किसी भी स्थिति में उनपर हिंदी लादने को तौयार नहीं हूं। प्रांत हिंदी को ग्रहण करेंगे या नहीं यह निश्चय तो उन्हीं को करना है। जो लोग आज जिम्मेदारी की जगहों पर बैठे हैं उनसे मैं अपील करूंगा कि वे अपनी अन्तरात्मा की बारीक आवाज को सुनने की कोशिश करें और ऐसी कोई भी बात स्वीकार नहीं करें जो उनके प्रांतों को अमान्य होगी।‘ 

भाषा को लेकर जिस प्रकार को जोश और उत्साह स्वाधीनता के पहले दिखता है वो स्वाधीनता के बाद शिथिल हो गया। जब भाषा में राजनीति का प्रवेश हुआ तो उसने भारतीय भाषाओं को लड़ाकर अंग्रेजी की स्थिति मजबूत कर दी। जब देश की अर्थव्यवस्था को खोला गया या उदारीकरण का दौर चला तब भी भारतीय भाषाओं को मजबूत करने के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किया गया। अंग्रेजी की स्थिति शासकों की भाषा वाली बनी रही। प्रधानमंत्री मोदी के आने के बाद भारतीय भाषाओं को लेकर एक सुचिंतित मुहिम शुरु हुई है। ये मुहिम निरंतर आगे बढ़ रही है जो भारतीय भाषाओं के लिए सुखद है। 


Saturday, September 4, 2021

पाठ्यक्रम बदलाव पर बेवजह विवाद


देशभर के विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम में नियमित अंतराल पर बदलाव होते रहते हैं। विभाग विशेष की अनुशंसा पर विद्या परिषद (अकेडमिक काउंसिल) बदलाव को स्वीकार करते हुए मंजूरी देती है। नियमानुसार साल में दो बार विद्या परिषद की बैठक आवश्यक है। मोटे तौर पर विश्वविद्लाय दो या तीन साल में अपने पाठ्यक्रमों में बदलाव करते हैं। इसके पीछे उद्देश्य ये रहता है कि छात्रों में नई प्रवृत्तियों से परिचित करवाया जा सके। इसको इस तरह से भी समझा जा सकता है कि किसी विषय में कोई नया शोघ हुआ हो तो उससे छात्रों का परिचय हो सके। अगर साहित्य से जुड़े विषयों की बात करें तो लेखन की नई प्रवृत्तियों से छात्रों का परिचय तभी संभव होता है जब पाठ्यक्रम में उस नई प्रवृत्ति को शामिल किया जाए। अभी दिल्ली विश्विद्यालय ने अंग्रेजी के पाठ्यक्रम में बदलाव किया है और महाश्वेता देवी समेत कुछ अन्य लेखकों की रचनाओं को हटा कर दूसरे लेखकों की रचनाओं को स्थान दिया गया है। इसपर विवाद खड़ा किया जा रहा है। विवाद की वजह रचना नहीं बल्कि उससे इतर है। इसको विचारधारा के आधार पर विवादित करने का प्रयास आरंभ हो गया है। कुछ वामपंथी विचारधारा के समर्थक लेखक और स्तंभकार इसको केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जोड़कर देखने लगे हैं। उनको लगता है कि महाश्वेता देवी की रचना को पाठ्यक्रम से हटाने के पीछे हिंदुत्ववादी विचारधारा के लोग हैं। जबकि ये एक सामान्य प्रक्रिया है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से महाश्वेता देवी की कहानी द्रोपदी को हटाया गया है। इसके बारे में विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने अपना पक्ष रखा है। ये कहानी एक आदिवासी महिला और उसके संघर्ष के इर्द-गिर्द घूमती है। महाश्वेता देवी की रचना को पाठ्यक्रम से हटाने के फैसले की आलोचना करनेवाले ये तर्क भी दे रहे हैं कि महाश्वेता जी ने जीवन भर समाज के हाशिए के लोगों के लिए संघर्ष किया। उन्होंने उन लोगों के हितों की रक्षा के लिए आंदोलनों में भी हिस्सेदारी की। यह कहानी भी उसी वर्ग पर लिखी गई है, इसलिए इसको हटाना अनुचित है । यह ठीक बात है कि उन्होंने समाज के वंचित वर्गों के लिए संघर्ष किया, पर अब समय बदल गया है। क्या पाठ्यक्रम को बदलते हुए समय के साथ नहीं बदला जाना चाहिए। महाश्वेता देवी समादृत लेखिका रही हैं। उनकी रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है। भारत सरकार ने उनको पद्मविभूषण से भी सम्मानित किया है। इसके आधार पर अगर पाठ्यक्रम में उनकी रचना को रखने को फैसला होता है तो फिर उनके अन्य क्रियाकलापों पर भी विचार करना चाहिए और समग्र मूल्यांकन के आधार पर फैसला होना चाहिए। महाश्वेता देवी पर माओवादियों को हिंसा के लिए उकसाने का आरोप भी है। बात 1997 की है, तब बिहार में जातीय संघर्ष चरम पर था। जातीय हिंसा में लोग मारे जा रहे थे। 1997 के एक दिसंबर को लक्ष्मणपुर बाथे में नरसंहार हुआ। रणवीर सेना पर उस नरसंहार का आरोप लगा था। इसके बाद 27 दिसंबर 1997 को महाश्वेता देवी ने एक हस्तलिखित अपील जारी की थी। उस अपील में माओवादियों से बिहार में हुए इस नरसंहार का बदला लेने का आह्वान किया गया था। उस वक्त बदले का आह्वान करके महाश्वेता देवी साफ-साफ हिंसा के लिए उकसा रही थीं। इस तरह हिंसा के लिए उकसाना वर्ग शत्रुओं के सफाए की विचारधारा का अनुयायी ही कर सकता है। जिसकी भी संविधान में आस्था हो और जो सार्वजनिक जीवन में हो वो किसी नरसंहार के लिए बदला लेने की बात करे तो यह उसकी सोच को दर्शाता है। बदले के इस आह्वान का कितना असर हुआ ये नहीं पता लेकिन उनकी अपील के 15 महीने बाद मार्च, 1999 में बिहार के जहानाबाद जिले के सेनारी में माओवादियों ने एक नरसंहार को अंजाम दिया। तब महाश्वेता देवी से किसी ने सवाल नहीं पूछा ना ही उनके खिलाफ माओवादियों को उकसाने का कोई केस दर्ज किया। जब भी महाश्वेता देवी का मूल्यांकन होगा तो उनके इस हस्तलिखित पत्र का उल्लेख जरूर होगा क्योंकि बगैर समग्रता के उचित मूल्यांकन संभव नहीं है। जो लोग इस आधार पर महाश्वेता देवी की रचना को पाठ्यक्रम से हटाने का विरोध कर रहे हैं कि वो एक बड़ी और सम्मानित लेखिका थीं, उनको भी महाश्वेता के उपरोक्त पक्ष पर विचार करना चाहिए।

पाठ्यक्रम में बदलाव का फैसला न तो विचारधारा के आधार पर होना चाहिए, न ही लेखक की ख्याति के आधार पर और न ही किसी को खुश करने के लिए। स्वाधीनता के बाद से इस देश में जिस तरह शिक्षा के क्षेत्र में विचारधारा को प्राथमिकता देकर उसका राजनीतिकरण किया गया उसने छात्रों का बहुत नुकसान किया। शिक्षण प्रणाली का भी। शिक्षा को राजनीति का अखाड़ा नहीं बनाना चाहिए न ही पाठ्यक्रमों को तय करते समय लेखकों की विचारधारा के आधार पर फैसला लिया जाना चाहिए। पाठ्यक्रमों के बारे में निर्णय लेते समय छात्रों के हितों को सर्वोपरि रखना चाहिए। विश्वविद्यालयों के सामने इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने की है। इस शिक्षा नीति के हिसाब से तो अभी विद्यालय और महाविद्यालय स्तर पर पाठ्यक्रमों में बहुत बदलाव करना होगा। जिस तरह से भारतीयता के स्वर को इस शिक्षा नीति में प्राथमनिकता देने की बा की गई है उसके आधार पर बनने वाले पाठ्यक्रमों को बनाना भी बड़ी चुनौती है। विरोध के स्वर भी उठेंगे और विरोध का आधार भी लेखकों की प्रतिष्ठा आदि को बनाया जाएगा। लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय से मिले संकेतों से सीख लेने की जरूरत है ताकि पाठ्यक्रम बनाते समय किसि प्रकार के दबाव को नकारा जा सके। दरअसल भारत में हो रहे बदलावों पर पूरी दुनिया की नजर है। शिक्षा आदि के क्षेत्र से जुड़े संगठनों पर अगर इस बदलाव का असर पड़ता है तो वो किसी भी हद तक जाकर विरोध कर सकते हैं। 

इसका एक और दिलचस्प पहलू भी है। अमेरिका में रहनेवाले भारतीय मूल के लेखक सलिल त्रिपाठी ने भी दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में बदलाव पर लिखा है। विश्वविद्यालय को कठघरे में खड़ा करते हुए उन्होंने महाश्वेता देवी का गुणगान किया है। इस कहानी के बहाने सवाल खड़े करते हुए वो महाभारत के पात्र द्रोपदी और उसके चीरहरण की घटना की व्याख्या भी करने लग जाते हैं। अंग्रेजी के लेखकों के साथ दिक्कत ये है कि वो मूल ग्रंथ को नहीं पढ़ते हैं बल्कि उसके आधार पर लिखी गई पुस्तकों को आधार बना लेते हैं। महाश्वेता देवी की कहानी पर लिखते हुए द्रोपदी के चीरहरण के प्रसंग तक पहुंचते हैं तो अंग्रेजी के लेखक किरण नागरकर का उदाहरण देते हैं। उनके हवाले से कहते हैं कि द्रोपदी का जब चीर हरण हो रहा था तो कृष्ण देर से उनके बचाव के लिए आए थे। इस प्रसंग के लिए महाभारत का मूल पाठ देखना चाहिए। पौराणिक पात्रों पर विपुल लेखन करनेवाले नरेन्द्र कोहली हमेशा मूल महाभारत में वर्णित चरित्रों के संवाद को पढ़ने की बात किया करते थे। पौराणिक और ऐतिहासिक पात्रों पर लिखना बेहद श्रमसाध्य कार्य है। इसके लिए बहुत अध्ययन की आवश्यकता होती है और प्राथमिक स्त्रोत तक पहुंचने की चुनौती भी होती है। ऐतिहासिक पात्रों पर लिखते भी हैं और उसको फिक्शन भी करार देते हैं। फिक्शन ही लिखना है तो ऐतिहासिक पात्रों के नाम उनका परिवेश और कालखंड भी वही क्यों होता है। इस प्रकार की रचनात्मकता, फिक्शन की आड़ में इतिहास के साथ खिलवाड़ को वैधता देने की कोशिश होती है। अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए भी इस प्रविधि का सहारा लिया जाता है। यह खेल लंबे समय से हमारे देश में चल रहा है लेकिन अब जनता इस खेल को समझ चुकी है।   


Thursday, October 24, 2019

छात्रों-शिक्षकों का साहित्यिक अड्डा


उन्नीस सौ नब्बे के आसपास की बात होगी, उन दिनों हिंदी साहित्य जगत में लघु पत्रिकाएं बहुतायत में निकला करती थीं। इनमें से ज्यादातर पत्रिकाएं एक विशेष विचारधारा का पोषण और सवंर्धन करनेवाली होती थीं। कम संख्या में छपनेवाली इन पत्रिकाओं की मांग उस विशेष विचारधारा के अनुयायियों के बीच काफी होती थी। उस दौर में अलग अलग शहरों में इन पत्रिकाओं की बिक्री के लिए नियत स्थान हुआ करती थी। वहां साहित्यिक लोग पहुंचा करते थे, पत्र-पत्रिकाएं खरीदते थे और वहीं गपबाजी भी हुआ करती थी। दिल्ली में भी एक ऐसा साहित्यक अड्डा होता था दिल्ली विश्वविद्याल के कला-संकाय के कैंपस में। पटेल चेस्ट की तरफ वाली गेट से घुसते ही बांयी ओर सेंट्रल रेफरेंस लाइब्रेरी के पास खुराना जी की किताबों की एक दुकान थी। उस दुकान पर देश भर में प्रकाशित हिंदी की लघु पत्रिकाएं आया करती थी। खुराना जी की दुकान के पहले चाय नाश्ते की भी एक दुकान थी लिहाजा वहां पहुंचानेवालों के लिए आदर्श स्थिति होती थी। हाथ में चाय का ग्लास लेकर खुराना जी की दुकान पर पहुंच जाते थे। पत्र-पत्रिकाएं देखते थे और फिर आपस में चर्चा भी करते थे। खुराना जी की ये दुकान साहित्य प्रेमी शिक्षकों के साथ साथ छात्रों का भी अड्डा हुआ करता था।
खुराना जी की ये विशेषता थी वो अपने यहां आनेवाले तमाम ग्राहकों को नाम से जानते थे। जानते ही नहीं थे बल्कि उनकी रुचि का भी उनको अंदाज होता था। जैसे ही कोई छात्र या शिक्षक उनके यहां पहुंचता तो वो सीधे उसकी रुचि की पत्रिका या फिर किसी नई पुस्तक के बारे में उसको बताने लगते थे। वो किसी भी पत्रिका या पुस्तक के बारे में इतने रोचक तरीके से बताते थे कि ग्राहक उसको खरीदने के बारे में मन बना ही लेता था। खुराना जी की एक और विशेषता थी कि उनको इस बात का भी अंदाज हो जाता था कि उनका ग्राहक कितने मूल्य तक की पत्र-पत्रिका या पुस्तक खरीद सकता है। पैसों को लेकर वो कभी आग्रही नहीं होते थे और कोई भी ग्राहक चाहे जितने की पुस्तकें या पत्रिकाएं ले जा सकता था और बाद में पैसे खुराना साहब को दे सकता था। उन दिनों खुराना की पुस्तक की दुकान पर रमेश उपाध्याय, उदय प्रकाश, नित्यानंद तिवारी, विश्वनाथ त्रिपाठी जी आदि भी दिख जाते थे। आज के युवा लेखकों में संजीव कुमार, संजीव ठाकुर और रविकांत भी खुराना की दुकान पर नियमित आनेवालों में से थे। दिल्ली विश्वविद्यालय के इस साहित्यिक ठीहे पर छात्रों का भी जमावड़ा होता था और वो अपनी पसंद की पत्रिकाएँ ले जाते थे इस बात की चिंता किए बगैर कि उनके पास उसको खरीदने के लिए पर्याप्त पैसे हैं या नहीं। इस ठीहे पर कला संकाय की दीवार से सटाकर कुछ बेंच भी रखे रहते थे जिसपर बैठकर बातें होती थीं। छात्र अपने वरिष्ठ शिक्षकों और लेखकों से किसी भी मसले पर राय ले सकते थे। सेंट्रल रेफरेंस लाइब्रेरी के पास होने की वजह से यहां काफी चहल पहल रहती थी। अपनी दुकान पर आने के पहले खुराना साहब दिल्ली विश्वविद्लाय के छात्रावासों में भी साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं पहुंचाया करते थे। उनको पता होता था कि कौन से कमरे में साहित्यिक रुचि के लड़के रहते थे। छात्रावास में पत्रिकाएं पहुंचाने के बाद वो अपनी दुकान खोला करते थे। वर्ष दो हजार के आसपास खुराना साहब की दुकान बंद हो गई। क्यों किसी को पता नहीं चल पाया।  दिल्ली विश्वविद्यालय का ये साहित्यक कोना वीरान हो गया।      

Thursday, July 4, 2019

गुम हुए दिल्ली के जंगल और कुंए?


दिविक रमेश दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरू कॉलेज में हिंदी के शिक्षक रहे और वहीं प्राचार्य के पद से रिटायर हुए। उन्होंने कविताएं और कहानियां लिखी हैं। वो तीन साल तक दक्षिण कोरिया में हिंदी के विजिटिंग प्रोफेसर भी रहे हैं। उनको बाल साहित्य के लिए साहित्य अकादमी के पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा चुका है। उन्होंने अपनी यादें मेरे साथ साझा की। 
मेरा जन्म आजादी के एक साल पहले दिल्ली के एक गांव किराड़ी में हुआ, जिसका पूरा नाम किराड़ी सुलेमाननगर है। मेरा गांव नांगलोई से और आगे जाकर मुंडका के पास है। मुझे अभी भी याद है कि अपना सबसे पहला स्कूल, जिसकी कक्षाएं चौपाल पर लगा करती थीं। कभी बारिश आ जाए या फिर कभी गांव में कोई बारात आ जाए तो हमें चौपाल छोड़कर पेड़ के नीचे जाकर पढ़ाई करनी होती थी। मैंने पांचवीं तक की पढ़ाई चौपाल के स्कूल से की। आगे की पढ़ाई के लिए हमें नांगलोई जाना पड़ता था जो कि हमारे गांव से काफी दूर था और पूरा इलाका सुनसान भी रहता था। हमारे गांव से नांगलोई तक खेत ही खेत थे। आबादी बिल्कुल नहीं थी। नांगलोई में भी बड़े जंगल थे। हर रोज इतनी दूर जाने की तकलीफ देखकर मेरे पिता ने मुझे आगे की पढ़ाई के लिए मेरे ननिहाल देवनगर भेज दिया। देवनगर, करोलबाग का एक इलाका है। मैंने वहां के सरकारी स्कूल में एडमिशन ले लिया। तब हम किराड़ी को दिल्ली नहीं गांव बोलते थे, दिल्ली तो हमारे लिए करोलबाग था। जब मैं हायर सेकेंडरी की पढ़ाई देवनगर में करने लगा तो छुट्टियों में या सप्ताहांत में गांव जाता था। किशनगंज से ट्रेन से नांगलोई तक जाता था और फिर नांगलोई से पैदल ही किराड़ी तक जाना होता था। नांगलोई से किराड़ी के बीच इतना खाली था कि दिन में जाने में भी डर लगता था, उसपर से हिदायत थी कि अगर कोई साया दिखाई दे तो रुकना नहीं। कुंए पर पानी पीने तभी रुकना जब कोई और व्यक्ति वहां मिले। जाहिर तौर पर भूत के डर से सहमे हुए पूरा रास्ता तय करते थे। बाद में इस एहसास पर मैंने कविताओं की एक ऋंखला लिखी। ये बात 1960 के आसपास की है।
जब मैं करोलबाग आया था तब वो बिल्कुल मोहल्ले जैसा था। ऊंची इमारतें तो थीं नहीं, सभी एक या दो मजिंले घर थे। घरों में बिजली और पानी के कनेक्शन मेरे सामने आने शुरू हुए थे। मेरे नाना के घर में तो बिजली भी मेरे गांव से वहां शिफ्ट होने के बाद आई। मेरे दो मामा थे और दोनों नौकरी करते थे। वो दोनों मुझे एक-एक रुपया महीना जेबखर्च देते थे। तब दो रुपए बहुत होते थे। मैं उन पैसों से सिनेमा देखने चला जाता था। हमारे घर के पास लिबर्टी सिनेमा हॉल था। तब वो बेहद साधारण सा हुआ करता था। इसके अलावा आनंद पर्वत में डिफेंस सिनेमा होता था जो डिफेंस वालों का था। वहां सस्ते में फिल्में देखने को मिलती थीं, इस वजह से हमलोग लिबर्टी से ज्यादा डिफेंस सिनेमा ही जाया करते थे। वहां टिकट लेने के लिए कतार में खड़े होकर पहले हाथों पर मुहर लगवानी पड़ती थी। उस मुहर को देखने के बाद ही सिनेमा का टिकट दिया जाता था। पहले तो चोरी छिपे फिल्में देखता था लेकिन जब नौकरी करने लगा तो आराम से जाकर देख आता था। इसके अलावा देवनगर के चौराहों पर नियमित कवि सम्मेलन हुआ करते थे, उसको भी  सुना करता था। लालकिले पर होनेवाले कवि सम्मेलन को देखने पैदल ही देवनगर से लालकिला तक पहुंच जाया करता था। कवि सम्मेलन खत्म होने के बाद पैदल ही घर वापस लौटता था। उन कवि सम्मेलनों में बालकवि बैरागी जैसे बड़े कवियों के अलावा नवोदित मंचीय कवि भी शामिल होते थे । उन्हीं कवि सम्मेलनों के प्रभाव में मैंने सबसे पहले कविताएं लिखनी शुरू की थीं।
मेरा असली संघर्ष ग्यारहवीं करने के बाद शुरू हुआ। मैंने तय किया कि फीस के पैसे जुटाने के लिए नौकरी करूंगा। दरियागंज में एक पंजाबी रेफ्रिजरेटर नाम की दुकान थी, वहां पचहत्तर रुपए प्रतिमाह की नौकरी कर ली। दो महीने में फीस के डेढ सौ रुपए जमा हो गए तो नौकरी छोड़ दी। इन दो महीनों में पंजाबी रेफ्रिजरेटर के मालिकों की जूठी प्लेटें भी साफ कीं। फिर दिल्ली कॉलेज इवनिंग में एडमिशन लिया और वहां से बीए पास किया। बाद में दिल्ली कॉलेज का नाम बदलकर जाकिर हुसैन कॉलेज कर दिया गया। एमए करने के बाद 1970 में हस्तिनापुर कॉलेज ( अब मोतीलाल नेहरू कॉलेज) में व्याख्याता हो गया और वहीं तीस साल बाद प्रचार्य बना और उस पद पर लगभग एक दशक तक काम करने के बाद रिटायर हुआ। अब तो मैं दिल्ली से नोएडा शिफ्ट हो गया हूं, नोएडा शिफ्ट करते हुए सोचता था कि दिल्ली कितनी बदल गई है। नांगलोई के खेत, कुंए सब जाने कहां चले गए। शहरीकरण ने सबको खत्म कर दिया। जंगल अब कंक्रीट के जंगल बन गए।     
(अनंत विजय से बातचीत पर आधारित)

Friday, February 21, 2014

कलंकित पेशा, शर्मसार समाज

दिल्ली में जिस वक्त एक पूर्वोत्तर के छात्र की कथित पिटाई से मौत पर बवाल मचा हुआ था उसी वक्त पूर्वोत्तर से एक ऐसी खबर आई जो शर्मनाक होने के साथ साथ समाज को चिंतित करनेवाली थी । दिल्ली में पूर्वोत्तर की छात्र की मौत का मामला इतना तूल पकड़ा कि उसके कोलाहल में ये खबर दब कर रह गई ।  पूर्वोत्तर के ही एक विश्वविद्यालय की शोध छात्रा ने अपने शोध निर्देशक की हरकतों से तंग आकर खुदकुशी कर ली। खबरों के मुताबिक शोध निर्देशक छात्रा के साथ अश्लील हरकतें करता था और छात्रा के विरोध के बाद उसको तरह तरह से तंग करता था । इस तरह का वाकया भारत की गुरु शिष्य परंपरा पर कलंक है, हमारे समाज पर बदनुमा धब्बा है । दरअसल हाल के दिनों में पूरे देश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से इस तरह की बेचैन करनेवाली खबरें नियमित अंतराल पर आती रहती हैं । चाहे वो दिल्ली विश्वविद्यालय हो या फिर देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक दिल्ली का ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय । हर जगह से छात्राओं के यौन शोषण की खबरों के आरोप शिक्षक पर लगते रहे हैं। विश्वविद्यालय की जांच में बहुधा शिक्षक दोषी पाए जाते रहे हैं और उनपर कार्रवाई भी होती है। कई बार जुर्माना और पदावनति तो कई बार शिक्षकों को मुअत्तल तक किया जाता रहा है । दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर को तो इस तरह के आरोप में अपनी नौकरी तक गंवानी पड़ी । उनको अदालत से भी राहत नहीं मिली ।  सवाल नौकरी जाने या सजा मिलने का नहीं है सवाल है कि शिक्षा के संस्थानों में ऐसी कुत्सित मानसिकता वाले लोगों की बढ़ती संख्या और कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में यौन शोषण की बढ़ती घटनाएं ।
हमारे समाज में आदिकाल से गुरु को भगवान से उपर का दर्जा प्राप्त है । गुरू को ब्रहमा, विष्णु और महेश तक कहा गया है । कहा तो  भी गया है कि गुरू भगवान से भी ऊपर होते हैं । याद कीजिए – गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पांय, बलिहारि वा गुरू की जिमि गोविंद दियो बताय । मतलब यह कि अगर गुरु और भगवान दोनों साथ खड़े हों तो पहले गुरु को प्रणाम करूंगा क्योंकि गुरु ने ही तो भगवान के बारे में बताया है । उस देश में जहां गुरू को इतना ऊंचा दर्जा हासिल है वहां अगर कोई भी शिक्षक अपनी छात्रा के साथ यौन शोषण करता या करने की कोशिश करता है तो वो अक्षम्य अपराध है, समाज को कलंकित करनेवाला अपराध, भरोसे का कत्ल करने का अपराध, मान्यताओं को धराशायी करने का अपराध। इस तरह के अपराध या घिनौनी करतूतों की सजा पदावनति या नौकरी से बर्खास्तगी नहीं हो सकती है । जिस छात्रा को के साथ किसी शिक्षक ने बदसलूकी की है उसकी मानसिक स्थिति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है । लेकिन इस तरह के ज्यादातर मामलों में ये देखा गया है कि आरोपी शिक्षकों को मामूली सजा देकर यौन शोषण के मामले को रफा दफा कर दिया जाता है । होना यह चाहिए कि इस तरह के अपराध के लिए कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान हो । दिल्ली में निर्भया गैंगरेप के बाद बने कानून के तहत उनपर कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि गुरू-छात्र के बीच के भरोसे के रिश्ते को कोई कलंकित करने के बारे में कोई सोच भी नहीं सके । इस कानून क बनानेवाले स्वर्गीय जस्टिस जे एस वर्मा ने इस तरह के अपराध पर विस्तार से विचार किया है । लेकिन हमारे यहां की सरकारें छात्राओं के यौन शोषण के मामलों को लेकर संवेदनशील नहीं हैं । निर्भया गैंगरेप के पहले केंद्र सरकार ने कार्यस्थल पर यौन शोषण का एक बिल सितंबर दो हजार बारह में लोकसभा में पेश किया था । संवेदनहीनता इतनी कि इस बिल पर व्यापक चर्चा तक नहीं की गई थी । निर्भया गैंगरेप के बाद देशभर में उठे जनज्वार ने सरकार को फिर से विचार करने को मजबूर कर दिया ।
 दरअसल इन मामलों में होता यह है कि छात्रा जब भी अपने यौन शोषण की शिकायत करती है तो विश्वविद्यालय शिकायत की जांच के लिए एक कमेटी बना देती है । यौन शोषण का केस सामने आने के बाद विशाखा गाइडलाइंस के मुताबिक विश्वविद्यालय के ही कर्मचारियों की कमेटी बनाई जाती है जिसमें आधी सदस्य महिलाएं होती हैं, इसके अलावा महिलाओं के यौन शोषण के खिलाफ काम करनेवाली गैर सरकारी संस्था का भी एक सदस्य इस कमेटी में होता है ।  विशाखा गाइडलाइंस के मुताबिक ऐसे मामलों में सबसे पहले भारतीय दंडविधान की धाराओं के अंतर्गत सक्षम अधिकारियों के पास मामला दर्ज करवाना होता है । लेकिन हमारे देश के विश्वविद्यालयों में ये देखा जाता है कि यौन शोषण का केस दर्ज करवाने के पहले एक इंटरनल कमेटी से उसकी जांच करवाई जाती है । अब जबकि नए कानून के मुताबिक यौन शोषण और बलात्कार की परिभाषा बदल गई है तो जरूरत इस बात की है कि मामला के सामने आने के बाद फौरन बाद आरोपी के खिलाफ केस दर्ज हो और कानून के हिसाब से कड़ी से कड़ी कार्रवाई हो । ताकि फिर हम गर्व से कह सकें – गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुर देवो महेश्वर: ।