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Saturday, July 19, 2025

हिंदी हिंदू हिन्दुस्तान पर चर्चा हो


महाराष्ट्र में भाषा को लेकर जब राज ठाकरे के कार्यकर्ताओं ने मारपीट आरंभ की तो उसने पूरे देश का ध्यान खींचा। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के संबंध पर फिर से बहस आरंभ हुई। इस चर्चा में लोगों ने भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वययंसेवक संघ को खींचने का प्रयत्न किया। जबकि पिछले ग्यारह वर्षों से भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में चल रही सरकार ने भारतीय भाषाओं में बेहतर समन्वय किया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता दी गई। मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा देने का उद्देश्य रखा गया। इसके अच्छे परिणाम भी मिलने लगे हैं। कुछ लोगों ने भाषा विवाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को घसीटने का प्रयत्न किया। हिंदी, हिंदू, हिन्दुस्तान के नारे को संघ का नारा और मंसूबा बताकर उसकी आलोचना शुरू की। यहां यह बताना उचित रहेगा कि संघ हमेशा से भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता देने की बात करता रहा है। संघ के सरसंचालक रहे माधव सदाशिव गोलवलकर सभी भारतीय भाषाओं को राष्ट्रभाषा मानते थे। संघ अब भी यही मानता है। रही बात हिंदू और हिन्दुस्तान की तो उसको लेकर स्वाधीनता पूर्व के लेखन को देखा जाना चाहिए। कुछ दिनों पूर्व इस स्तंभ में मैथिलीशरण गुप्त की पुस्तक ‘हिंदू’ को आधार बनाकर उनके कवि मन की पड़ताल की गई थी। स्वाधीनता के पूर्व हिंदी में अधिकांश लेखकों का लेखन हिंदू और हिन्दुस्तान को केंद्र में रखकर ही किया गया है। प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के बाद इससे जुड़े कम्युनिस्ट लेखकों ने पार्टी प्रतिबद्दता के आधार पर लेखन और मूल्यांकन आरंभ किया। परिणाम ये हुआ कि हिंदू, हिंदुस्तान और भारतीयता को ओझल करने का खेल आरंभ हुआ। एक एक करके हिंदी के दिग्गज लेखकों की उन रचनाओं को जनता से दूर किया गया जिसमें हिंदू और भारतीय को एक मानकर लेखन हुआ था। उन रचनाओं को योजनाबद्ध तरीके से हाशिए पर डाला गया जिनमें हिंदू और भारतीय को एक बताया गया था। उन रचनाओं की उपेक्षा की गई जिनमें मुसलमानों के लिए नसीहत थी। 

हिंदी के लेखकों को समग्रता में पढ़ने से उपरोक्त धारणा दृढ़ होती जाती है। प्रतापनारायण मिश्र को पढ़ें, भारतेन्दु को पढ़ें, बालकृष्ण भट्ट को पढ़ें, महावीर प्रसाद द्विवेदी को पढ़ें या फिर प्रेमचंद से लेकर निराला और शिवपूजन सहाय तक को पढ़ें, आपको हिंदू और भारतीय में अंतर नहीं दिखाई देगा। भारतेन्दु युग के लेखक जब ये लिख रहे थे तबतक तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक की स्थापना भी नहीं हुई थी। प्रताप नारायण मिश्र ने जब अपनी प्रसिद्ध कविता हिंदी हिन्दू हिन्दुस्तान लिखी थी तब तो गांधी जी भी राष्ट्रीय पटल पर नहीं आए थे। इस कविता का रचना वर्ष ठीक ठीक नहीं मालूम। उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्रतापनारायण मिश्र का निधन सन् 1894 में हो गया था। जाहिर है कि उन्होंने ये कविता 1894 पहले लिखी होगी। अपनी इस कविता में उन्होंने लिखा था, चहहु जु सांचो निज कल्यान/तो सब मिलि भारत संतान/जपो निरंतर एक जबान/हिंदी हिंदू हिन्दुस्तान/तबहिं सुधिरिंहै जन्म निदान/तबहि भलो करिंहै भगवान/जब रहिहै निसिदिन यह ब्यान /हिंदी हिंदू हिन्दुस्तान। अब अगर संघ की स्थापना के तीन-चार दशक पहले ही हिंदी के ख्यात लेखक ऐसा लिख रहे थे तो उसको समझने की आवश्यकता है। हिंदी के पाठकों को बताने की भी। कुछ लोगों को लगता है कि इस तरह की बातें सार्वजनिक रूप से करना अनुचित है। क्या इस तरह के लेखन को छुपाना बौद्धिक बेईमानी नहीं है? क्या ये पाठकों के साथ छल नहीं है। ये तर्क दिया जाता है कि ये सब तो पुस्तकों में उपलब्ध है। बिल्कुल है। पर विचार इस बात पर होना चाहिए कि क्या ये सामाजिक और साहित्यिक विमर्श का हिस्सा है। क्या स्वाधीनता के बाद हिंदी के आलोचकों ने प्रतापनारायण मिश्र की इस रचना पर विचार किया, विमर्श का हिस्सा बनाया। क्या मैथिलीशरण गुप्त के हिंदू और भारत-भारती में लिखी गई पंक्तियों पर ईमानदारी से विचार हुआ। हिंदी के आलोचकों ने तो ये कह दिया कि मैथिलीशरण गुप्त ने हाली की कविता और शैली मुसद्दस से प्रेरित होकर ‘हिंदू’ लिखा। जब इस बात की पड़ताल की गई तो पता चला कि मैथिलीशरण गुप्त ने हाली के ‘मुसद्दस’ के उत्तर में ‘हिंदू’ लिखी थी। हाली ने अपने इस काव्य में मुसलमानों को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक महानता की याद दिलाया था। उनके इस काव्य को पढ़ने के बाद मैथिलीशरण गुप्त ने हिंदुओं के गौरवशाली अतीत का स्मरण किया था। जो हिंदू नाम के पुस्तक में सामने आया था। क्या इसकी बात करना अनुचित है। क्या स्वाधीनता के बाद हिंदी आलोचना की बेईमानियों की ओर संकेत करना गुनाह है।

अगर भारतेन्दु हरिश्चंद्र के लेखों को देखते हैं तो वहां हिंदू और भारतीय में अंतर नहीं मिलता। जब वो भारतवर्ष की उन्नति की बात करते हैं तो उसमें स्पष्टता के साथ इस बात को स्वीकारते हैं, भाई हिंदुओं! तुम भी मत-मतांतर का आग्रह छोड़ो। आपस में प्रेम बढ़ाओ। इस महामंत्र का जाप करो, जो हिन्दुस्तान में रहे, किसी चाहे किसी रंग,जाति का क्यों न हो, वह हिंदू। हिंदू की सहायता करो। बंगाली, मराठा, पंजाबी, मदरासी, वैदिक, जैन, ब्राह्मणों, मुसलमानों सब एक का हाथ एक पकड़ो। इसी लेख में वो आक्रांताओं को भी चिन्हित करते हैं और मुसलमानों से भी कहते हैं, मुसलमान भाइयों को भी उचित है कि इस हिन्दुस्तान में बसकर वो हिंदुओं को नीचा समझना छोड़ दें। ठीक भाइयों की भांति हिंदुओं से बर्ताव करें, ऐसी बात जो हिंदुओं का दिल दुखानेवाली हो वो ना करें।  इस तरह की बातों पर वो विमर्श खड़ा करते हैं। दरअसल स्वाधीनता के पूर्व और उन्नीसवीं शताबदी के अंतिम दशकों में इस तरह की बौद्धिक बातें खूब हो रही थीं। हिंदी-उर्दू को लेकर भी बौद्धिक विमर्श हो रहा था।रचना का उत्तर रचना से दिया जा रहा था। लेखक खुलकर अपनी बात लिख-बोल रहे थे। प्रश्न यही है कि स्वाधीनता के बाद ऐसा क्या हो गया कि हिंदू संस्कृति और हिंदू सभ्यता की बातें कम होने लगीं। भारतीयता और भारतीय शिक्षण पद्धति को छोड़कर हमारा बौद्धिक समाज पश्चिम की ओर उन्मुख होने लगा। बौद्धिक जगत में कथित गंगा-जमुनी तहजीब के सिद्धांत को गाढ़ा करने का प्रयास होने लगा। हिंदी में तो भारतेन्दु युग से लेकर द्विवेदी युग तक हिंदू होने पर लेखकों को गर्व होता था। ये गर्व उनके लेखन में झलकता भी था। दो उदाहरण तो उपर ही दिए गए हैं। इस तरह के दर्जनों उदाहरण दिए जा सकते हैं। भारतीय लेखन से भारतीयता या हिंदू विमर्श को मलिन करने के षडयंत्र के कारण बौद्धिक बेईमानी का एक अजीब सा वातावरण बना। इसने अकादमिक जगत को भी अपनी चपेट में लिया। हिंदू की बात करनेवालों की उपेक्षा की जाने लगी। हाल के वर्षों में देखें तो उस उपेक्षा का दंश नरेन्द्र कोहली जैसे विपुल लेखन करनेवाले साहित्यकार को भी झेलना पड़ा। आज आवश्यकता इस बात की है कि स्वाधीनता पूर्व जिस तरह का हिंदू लेखन हो रहा था उसपर विमर्श हो और उस विमर्श को समाज जीवन के केंद्र में लाया जाए। अकादमिक जगत में कार्य कर रहे शोधार्थियों को भी इस दिशा में विचार करना चाहिए। ये अतीत की बात नहीं है बल्कि अपनी परंपरा और धरोहर से एकाकार होने का उपक्रम होगा। 

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Saturday, June 28, 2025

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का हिंदू मन


कुछ दिनों पूर्व हिंदी के आलोचक नन्ददुलारे वाजपेयी का मैथिलीशरण गुप्त के कृतित्व पर लिखा एक लेख पढ़ रहा था। उसमें एक पंक्ति पढकर ठिठक गया। हिंदू उत्कर्ष के हामी, भारत-भारती के रचयिता रामोपासक मैथिलीशरण गुप्त। मैथिलीशरण गुप्त की रचनाएं छात्र जीवन में पढ़ी थीं। जब हिंदू उत्कर्ष के हामी और रामोपासक जैसे विशेषण देखा तो लगा कि एक बार मैथिलीशरण गुप्त को फिर से पढ़ा जाए। उनकी कृति साकेत के बारे में ज्ञात था, स्मरण में भी था। सोचा कि भारत-भारती पढ़ी जाए। भारत-भारती की प्रस्तावना के पहले शब्द से स्पष्ट हो गया कि मैथिलीशरण गुप्त रामोपासक थे। प्रस्तावना का आरंभ ही श्री राम: से होता है। फिर वो लिखते हैं आज जन्माष्टमी है, भारत के लिए गौरव का दिन...। आगे लिखते हैं कि भला मेरे लिए इससे शुभ दिन और कौन सा होता कि मैं प्रस्तुत पुस्तक आपलोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने के लिए पूर्ण करूं। आगे वो इस बात को और स्पष्ट करते हैं कि श्रीरामनवमी के दिन आरंभ करके इसको जन्माष्टमी के दिन पूर्ण कर रहा हूं। फिर मंगलाचरण में वो कहते हैं कि मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती। भारत-भारती की पंक्तियों पर आगे चर्चा करूंगा जिससे वो हिंदू उत्कर्ष के हामी भी सिद्ध होते हैं। उसके पूर्व एक और आलोचक की पंक्ति याद आ रही है। मैथिलीशरण गुप्त पर भारी-भरकम पुस्तक लिखनेवाले आलोचक ने माना कि जिन बड़ी पुस्तकों को मैंने छोड़ दिया है, उनमें से ‘हिंदू’ और ‘गुरुकुल’ से अधिकांश लोग परिचित हैं। उनके अपने तर्क हैं लेकिन प्रश्न उठता है कि क्या मैथिलीशरण जी की रचना साकेत, भारत-भारती, जयद्रथ-वध लोकप्रिय नहीं हैं जिसपर विचार किया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि यहां भी वही प्रविधि अपनाई गई जो निराला के कल्याण में लिखे लेखों को उनकी रचनाओं में शामिल नहीं करने की रही। आज के युवाओं को मैथिलीशरण गुप्त की पुस्तक हिंदू के बारे में जानने का अधिकार है। अगर हम मैथिलीशरण जी की दो कृतियों भारत-भारती और हिंदू पर विचार करें तो पाते हैं कि उनके लेखन के दो छोर हैं। एक छोर पर हिंदू या सनातन धर्म है और दूसरे छोर पर हिंदू समाज में व्याप्त कुरीतियां। एक छोर पर वो गर्व से खड़े होते हैं और दूसरे छोर पर जोरदार प्रहार करते हैं।

मैथिलीशरण गुप्त अपनी कृति हिंदू में कहते हैं श्री श्रीरामकृष्ण के भक्त/रह सकते हैं कभी अशक्त/दुर्बल हो तुम क्यों हे तात/उठो हिंदुओ हुआ प्रभात। विस्मृति नाम की इस कविता में मैथिलीशरण हिंदुओं से पराधीनता पाश में फंसे होने की बात करते हुए हिंदी समाज को जागृत करने का उपक्रम करते हैं। उनके हताश और दुखी होने को लेकर प्रश्न खड़े करते हैं। वो भारत का गौरव गान करते हुए कहते हैं कि हिंदुओं को धर्मप्रचार प्रिय था लेकिन हथियार लेकर नहीं बल्कि अपनी आध्यात्मिकता की शक्ति के आधार पर ये कर्म किया जाता था। लूटमार और तलवार के बल पर धर्म प्रचार पर प्रहार करते हुए मैथिलीशरण गुप्त हिंदू शासन की बात करते हैं उसके विकास को संसार के इतिहास से जोड़ते हैं । साथ ही वो ये कहना नहीं भूलते कि हिंदू शासन पद्धति में विभंजक नीति दुर्लभ थी। वो इतने पर ही नहीं रुकते हैं बल्कि हिन्दूओं को बतलाते हैं कि उनका धर्म धन्य है, उनकी ज्ञानासक्ति, श्रद्धा, भक्ति, प्रेम की महिमा का बखान करते हुए लिखते हैं कि हरि नर होकर भी खर्च नहीं हुए बल्कि अपने पुण्य स्पर्श से एक दिव्य आदर्श की स्थापना की। वो भारत की जनता से एक होने की अपेक्षा भी करते हैं और हिंदू जातीयता को संगठित करने की बात करते हैं- ऐसा है वह कौन विवेक/करता हो जो हमको एक/और बढ़ा सकता हो मान/केवल हिंदू-हिन्दुस्तान। अब इन पंक्तियों से स्पष्ट है कि मैथिलीशरण गुप्त की हिंदू धर्म और उसकी शक्ति में कितनी जबरदस्त आस्था थी। वो जैन, बौद्ध, सिख, शैव और वैष्णवों के बीच मतभिन्नता को लेकर परेशान तो हैं पर इस बात को लेकर आश्वस्त हैं हिंदू इससे खिन्न नहीं होंगे और इस बात पर जोर देते हैं कि सबके मत भिन्न हो सकते हैं पर वो हैं अभिन्न। हिंदू धर्म को लेकर मैथिलीशरण गुप्त अपने दृढ़ मत पर अड़े हैं। वो विधवा विवाह के पक्षधर हैं। बाल विवाह और बेमेल विवाह पर वो अपनी कृति हिंदू में कविता के माध्यम से प्रहार करते हैं। घर में वो स्त्री को लक्ष्मी, वन में सावित्री और रण में असुर नाशिनी मानते हुए महिला शक्ति का जयघोष करते चलते हैं। उनकी कविताओं में जिस तरह के शब्दों का उपयोग हुआ है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि वो स्त्री-पुरुष में भेद को गलत मानते थे। इसके अलावा मैथिलीशरण गुप्त ग्रामीण जीवन को सशक्त करने की बात भी करते थे। 

मार्क्सवादी आलोचकों ने भारत-भारती पर विचार करते हुए इस बात का उल्लेख किया कि मैथिलीशरण गुप्त की कृति भारत-भारती मौलाना हाली के मुसद्दस से प्रेरित है या उसके ही तर्ज पर लिखी गई है। हाली के साथ कैफी का नाम भी जोड़ा गया। बताया ये भी गया कि ऐसा मैथिलीशरण जी ने पुस्तक की भूमिका में इस बात को स्वीकार किया है। अब ये देख लेते हैं कि भूमिका में क्या लिखा है- कुछ ही दिन बाद उक्त राजा साहब का कृपा -पत्र मुझे मिला, जिसमें श्रीमान ने मौलाना हाली के मुसद्दस को लक्ष्य करके इस ढंग की पुस्तक हिंदुओं के लिए लिखने का मुझसे अनुग्रहपूर्वक अनुरोध किया। इसके बाद उन्होंने ये कहीं नहीं लिखा कि उसी पद्धति से भारत-भारती लिखी गई। पर मार्क्सवादी आलोचकों के प्रभाव में ये बात अकादमिक जगत में स्थापित हो गई। इस पुस्तक में उन्होंने भारतवर्ष की श्रेष्ठता, हमारे पूर्वज, हमारे आदर्श, हमारी सभ्यता आदि पर विस्तार से लिखा। मैथिलीशरण गुप्त इस पुस्तक में भी बार-बार हिंदू धर्म की श्रेष्ठता की बात करते चलते हैं। वो हिंदू सभ्यता के वैराट्य को उद्घाटित भी करते हैं। साथ ही हिंदू समाज में व्याप्त तरह-तरह की कुरीतियों पर भी प्रहार करते हैं। अपेक्षा करते हैं कि हिंदू समाज उनको दूर करेगा। भारत-भारती और हिंदू दो काव्यग्रंथों को पढ़ने के बाद ये स्पष्ट होता है कि मैथिलीशरण गुप्त के हिंदू मन में हिंदू सभ्यता को लेकर कितनी गहरी आसक्ति थी। आक्रांताओं के कारण हिंदू समाज में आई दुर्बलता को लेकर व्यथित भी थे।  

कुछ सप्ताह पूर्व जब इस स्तंभ में नामवर सिंह के बहाने से प्रेमचंद की रचनाओं में भारतीयता की बात की गई थी तो मृतप्राय लेखक संगठन चला रहे एक कथित और आत्मुग्ध मार्क्सवादी आलोचक ने तर्कों पर बात नहीं की थी। अपेक्षा भी नहीं थी। दरअसल वो जिस फासीवादी विचार के समर्थक और पोषक हैं उनमें तर्क और तथ्य की गुंजाइश होती नहीं है। मार्क्सवादी आलोचना पद्धति में झुंड बनाकर किसी लेखक को श्रेष्ठ बताने या उनके लिखे को ओझल करने का प्रयत्न होता है। वो चाहे प्रेमचंद हों, निराला हों, रामचंद्र शुक्ल हों। कुबेरनाथ राय जैसे श्रेष्ठ सनातनी लेखक का इस झुंडवादी आलोचना ने इतनी उपेक्षा कि उनके लेखों और निबंधों के बारे में हिंदी समाज की आनेवाली पीढ़ियों को पता ही नहीं चल सके। पर ऐसा होता नहीं है, सभी लेखकों की कृतियां अपने मूल प्रकृति में पाठकों के सामने आ रही हैं। 


Saturday, November 11, 2023

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का हिंदू मन


भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में पिछले दिनों भारतीय भाषाओं के अंतरसंबंध पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने का अवसर मिला। उस दौरान आचार्य रामचंद्र शुक्ल का अंग्रेजी में लिखा लेख हिंदी एंड द मुसलमान्स पर चर्चा हुई। उसी क्रम में रामचंद्र शुक्ल की तुलसी की भक्तिपरक और काव्य पद्धति को पढ़ने का मौका मिला। उसके बाद ऐसा प्रतीत हुआ कि रामचंद्र शुक्ल के साथ बाद के लेखकों ने न्याय नहीं किया। तुलसी काव्य की उनकी व्याख्या और उसके धार्मिक आधारों की विवेचना कम हुई। चर्चा इस बात की अधिक होती रही कि रामचंद्र शुक्ल ने तुलसी के सामने कबीर को याद नहीं किया। इतना ही नहीं कोशिश तो ये भी हुई कि तुलसी और कबीर को लेकर आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी को प्रतिद्वंदी की तरह पेश किया गया। रामचंद्र शुक्ल के तुलसी काव्य पर लिखे को आगे बढ़ाने का प्रयास न के बराबर हुआ। अगर शुक्ल के लेखन के समग्र आयामों पर अगर बात होती तो उनका हिंदू मन या सनातन धर्म में उनकी आस्था सामने आ जाती। ये बात वामपंथ में आस्था रखनेवाले लेखकों और आलोचकों को स्वीकार नहीं होता, लिहाजा इस तरह का प्रपंच रचा गया कि शुक्ल के लेखन के हिंदू पक्ष के बारे में बात ही न हो। यह कार्य निराला के साथ भी किया गया, प्रेमचंद के साथ भी किया गया और कल्याण पत्रिका में प्रकाशित उनके लेखों को हिंदी के नए पाठकों से दूर रखने का बौद्धिक षडयंत्र रचा गया। इस षडयंत्र की चर्चा आगे होगी लेकिन पहले देख लेते हैं कि शुक्ल जी ने क्या लिखा है। 

तुलसी की भक्ति पद्धति में आचार्य शुक्ल ने दिल खोलकर हिंदूओं और उनके धर्म प्रतीकों पर लिखा है। लेख के आरंभ में आचार्य शुक्ल कहते हैं कि देश में मुसलमान साम्राज्य के पूर्णतया प्रतिठित हो जाने पर वीरोत्साह के सम्यक संचार के लिए वह स्वतंत्र क्षेत्र न रह गया, देश का ध्यान अपने पुरुषार्थ और बल-पराक्रम की ओर से हटकर भगवान की शक्ति और दया-दाक्षिण्य की ओर गया। देश का वह नैराश्य काल था जिसमें भगवान के सिवा कोई सहारा नहीं दिखाई देता था। आचार्य शुक्ल ने आगे कहा कि सूर और तुलसी ने इसी भक्ति के सुधारस से सींचकर मुरझाते हुए हिंदू जीवन को फिर से हरा कर दिया। भगवान का हंसता खेलता रूप दिखाकर सूरदास ने हिंदू जाति की नैराश्यजनित खिन्नता हटाई जिससे जीवन में प्रफुल्लता आ गई। पीछे तुलसीदासजी ने भगवान का लोक-व्यापारव्यापी मंगलमय रूप दिखाकर आशा और शक्ति का अपूर्व संचार किया। अब हिंदू जाति निराश नहीं है। आचार्य शुक्ल इतने पर ही नहीं रुकते हैं वो आगे कहते हैं कि सूरदास की दिव्य वाणी का मंजु घोष घर-घर क्या, एक एक हिंदू के ह्रदय तक पहुंच गया। यही वाणी हिंदू जाति को नया जीवनदान दे सकती थी। इसके बाद वो तुलसी के रामचरित की जीवनव्यापकता पर आते हैं और कहते हैं कि राम के चरित से तुलसी की जो वाणी निकली उसने राजा, रंक, धनी, दरिद्र, मूर्ख, पंडित सबके ह्रदय और कंठ में बसा दिया। गोस्वामी जी ने समस्त हिंदू जीवन को राममय कर दिया।

आचार्य शुक्ल ने सूफियों के ईश्वर को केवल अपने मन के भीतर समझने और ढूढ़ने की अवधारणा पर भी प्रहार किया। उन्होंने कहा कि भारतीय परपंरा का भक्त अपने उपास्य को बाहर लोक के बीच प्रतिष्ठित करके देखता है, अपने ह्रदय के कोने में नहीं। गोस्वामी जी भी ललकार कर कहते हैं कि भीतर ही क्यों देखें, बाहर क्यों न देखें- अन्तर्जामिहु तें बड़ बारहजामी हैं राम जो नाम लिए तें। पैज परे प्रह्लादहु को प्रगटे प्रभु पाहन तें, न हिए तें। वो स्पष्ट रूप से कहते हैं कि अगर भगवान को देखना है तो उन्हें व्यक्त जगत के संबंध से देखना चाहिए। वो यह मानते थे कि भगवान को मन के भीतर देखना योगमार्ग का सिद्धांत है भक्ति मार्ग का नहीं। सूफियों की इस अवधारणा के बाद गोस्वामी जी ने उपासना या भक्ति का केवल कर्म और ज्ञान के साथ ही सामंजस्य स्थापित नहीं किया, बल्कि भिन्न भिन्न उपास्य देवों के कारण जो जो भेद दिखाई पड़ते थे, उनका भी एक में पर्यवसान किया। इसी एक बात से ये अनुमान हो सकता है कि उनका प्रभाव हिंदू समाज की रक्षा के लिए ,उसके स्वरूप को रखने के लिए कितने महत्व का था। तुलसी के इस महत्व को बाद के दिनों में बहुत ही कम रेखांकित किया गया। आचार्य शुक्ल ने तुलसी के काव्य को लेकर इस प्रकार के जो विचार प्रस्तुत किए थे उसको भी दबाने का प्रयास किया गया। धर्म और जातीयता के समन्वय पर भी आचार्य शुक्ल ने विचार किया। उनका मानना था कि तुलसी ने अपने काव्य में जो रामरसायन तैयार किया जिसके सेवन से हिंदू जाति विदेशी मतों के आक्रमणों से बहुत कुछ रक्षित रही और अपने जातीय स्वरूप को दृढ़ता से पकड़े रही। उनका मानना था कि सारा हिंदू जीवन राममय हो गया था। वो तो यहां तक कह गए कि राम के बिना हिंदू जीवन नीरस है, फीका है, यही रामरस उनका स्वाद बनाए रहा और बनाए रहेगा। राम का मुंह देख हिंदी जनता का इतना बड़ा भाग अपने धर्म और जाति के घेरे में पड़ा रहा। न उसे तलवार हटा सकी, न धनमान का लोभ, न उपदेशों की तड़क भड़क। जिन राम को जनता जीवन के प्रत्येक स्थिति में देखती आई, उन्हें छोड़ना अपने प्रियजन को छोड़ने से कम कष्टकर न था। आचार्य शुक्ल ने बहुत बोल्ड तरीके से अपनी बात कही थी कि हमने चौड़ी मोहरी का पायजामा पहना, आदाब अर्ज किया पर राम-राम न छोड़ा। कोट पतलून पहनकर बाहर ‘डैम नानसेंस’ कहते हैं पर घर आते ही राम-राम।

अब आते हैं बौद्धिक षडयंत्र पर जहां कि रामचंद्र शुक्ल के हिंदू मन को हिंदी पाठकों से छिपाने का प्रयत्न हुआ। यशपाल से लेकर प्रकाशचंद्र गुप्त तक ने शुक्ल जी को सामंतवाद का विरोधी और जनवादियों से सहानुभूति रखनेवाला बताया। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की त्रैमासिक पत्रिका बहुवचन के प्रवेशांक( अक्तूबर-दिसंबर 1999) में सुधीश पचौरी का एक लेख प्रकाशित हुआ था, रामचंद्र शुक्ल की धर्म भूमि। विखंडनवाद के औजारों से लैस होकर सुधीश पचौरी ने रामचंद्र शुक्ल को एक धार्मिक विमर्शकार करार दिया था। लेख जब आगे बढ़ता है तो वो शुक्ल जी को एक हिंदू विमर्शकार के रूप में रेखांकित करते हैं और कहते हैं कि वो एक हिंदू विमर्शकार हैं जो अपने समय के प्रतिबिंब तो हैं ही अपने समय को सत्ता विमर्श में बदलनेवाले भी हैं और हिंदी आलोचना अभी तक उनके विमर्श से बाहर नहीं निकली है। इस लेख में सुधीश पचौरी ने शुक्ल जी की आलोचना करते हुए उनको एकार्थवादी हिंदुत्व के औजार बनते देखते हैं। सुधीश पचौरी की स्थापनाओं पर तब काफी विवाद हुआ था। यह साहित्यिक विमर्श का विषय हो सकता है लेकिन शुक्ल जी ने जिस प्रकार से हिंदी आलोचना की अस्मिता को तुलसी और सूर के काव्य के माध्यम से राम और कृष्ण से जोड़ा वो उनके हिंदू मन को सामने लाता है। आचार्य शुक्ल ने उस हिंदू मन को पकड़ा और रेखांकित किया है जो अपने अतीत को याद रखते हुए अपनी ज्ञानदृष्टि को समायनुकूल बनाने में नहीं हिचकता है। शुक्ल जी ने जर्मन वैज्ञानिक हैकल की एक पुस्तक का अनुवाद किया था जो ‘विश्वप्रपंच’ के नाम से प्रकाशित है उसकी भूमिका में उनकी समयानुकूल दृष्टि दिखती है। अपनी परंपरा और जड़ों से जुड़े रहकर भी आधुनिक बने रहने की। कहना न होगा कि शुक्ल हिंदी आलोचना के ऐसे हिरामन हैं जिनकी वैश्विक दृष्टि ने भारतीय साहित्य को समृद्ध किया। जरूरत इस बात की है कि उनके हिंदू मन पर समग्रता में विमर्श हो। 

Saturday, May 6, 2023

फिल्म विरोध का एजेंडा नाकामयाब


फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ इन दिनों चर्चा में बनी हुई है। इसके पक्ष-विपक्ष में लगातार दलीलें दी जा रही हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर देशभर में एक बार फिर से बहस हो रही है। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाण पत्र मिलने के बाद भी इस फिल्म के प्रदर्शन को रोकने के लिए हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया गया। केरल हाईकोर्ट में फिल्म के रिलीज होने वाले दिन तक सुनवाई हुई। अदालतों ने इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। आश्चर्य की बात है कि कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर किसी भी तरह की सामग्री दिखाने के पक्षधर और स्वयं को लिबरल कहनेवाले लोग भी इस फिल्म के प्रदर्शन के विरुद्ध थे। इस शोरगुल के बीच केरल हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों की टिप्पणियां अलक्षित रह गईं। न्यायमूर्ति एन नागरेश और न्यायमूर्ति एस थामस की पीठ ने इस फिल्म के प्रदर्शन को रुकवाने की याचिका की सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। कोर्ट की कार्यवाही की लाइव रिपोर्टिंग करनेवाली वेबसाइट लाइव ला के अनुसार पीठ ने स्पष्ट किया इस फिल्म को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रमाण पत्र मिल चुका है। ऐसे में इसको रोकना उचित नहीं होगा। न्यायपीठ ने इस बात को भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ताओँ में से किसी ने भी फिल्म देखी नहीं है। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि अगर किसी ने फिल्म देखी नहीं थी तो इसको रुकवाने की याचिका लेकर अदालत के सामने क्यों उपस्थित हो गए। कुछ लोगों का आरोप है कि ये फिल्म एजेंडा फिल्म है लेकिन क्या फिल्म को बगैर देखे उसके प्रदर्शन को रुकवाने के लिए उच्च न्यायालय पहुंच जाना एजेंडा नहीं है। असल एजेंडा तो यही प्रतीत होता है कि आपने फिल्म देखी नहीं लेकिन कथित आसन्न खतरे को लेकर अदालत पहुंच गए। इस एजेंडा की चर्चा कहीं नहीं हो रही है न ही याचिकाकर्ताओं की मंशा पर प्रश्न खड़े किए जा रहे हैं। 

सुनवाई के दौरान न्यायपीठ ने कहा कि देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और कलात्मक स्वतंत्रता को संतुलित तरीके से देखा जाना चाहिए। इस टिप्पणी के गहरे निहितार्थ हैं। अगर हम कोर्ट की इस टिप्पणी के आलोक में देखें तो स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर वर्ग और समुदाय के लिए एक समान है। संविधान में इसकी ही व्यवस्था है। सुनवाई के दौरान कोर्ट की ये टिप्पणी भी उल्लेखनीय है जिसमें कहा गया कि इस फिल्म में इस्लाम के विरुद्ध कुछ नहीं है, इस्लाम पर किसी तरह का आरोप नहीं लगाया गया है। इस फिल्म में आतंकवादी संगठन आईएसआईएस के करतूतों को दिखाया गया है। इस टिप्पणी से के बाद ये सवाल उठता है कि अगर किसी फिल्म में अगर फिल्मकार आतंकवादी संगठन के खिलाफ दिखाता है तो उस फिल्म को बिना देखे इस्लाम के खिलाफ या मुसलमानों के खिलाफ कैसे मान लिया जाता है। सिर्फ मान ही नहीं लिया जाता है बल्कि उनकी रक्षा के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाते हैं। वो भी ऐसे लोग जो खुद को लिबरल या सेक्युलर मानते हैं। क्या इस देश में किसी आतंकवादी संगठन के खिलाफ फिल्म बनाना अपराध है। अबतक इस देश में कई ऐसी फिल्में बनीं जिसमें स्पष्ट रूप से आतंकवादियों को लेकर फिल्मकार साफ्ट रहे हैं। अधिकतर फिल्मों में आतंकवादी के बनने के लिए परिस्थितियों को जिम्मेदार दिखाया गया है। फिल्म मिशन कश्मीर में ऋतिक रोशन ने जिस अल्ताफ खान का चरित्र निभाया है, उसको याद करिए या फिर फिल्म फना में आमिर खान ने जिस आतंकी रेहान का रोल किया। आतंकी रेहान की कब्र पर जब उसका बेटा अपनी मां से पूछता है कि क्या रेहान ने गलत किया था तो उसकी मां कहती है कि रेहान ने वही किया जो उसको ठीक लगता था। इस तरह के संवाद आतंकवाद का परोक्ष समर्थन न भी हो लेकिन आतंकवाद को लेकर एक रोमांटिसिज्म तो है ही। इस तरह के कई प्रसंग हिंदी फिल्मों में देखे जा सकते हैं। 

केरल हाईकोर्ट की न्यायपीठ की एक और टिप्पणी थी। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के साथ फिल्म के ट्रेलर को कोर्ट में ही देखा और कहा कि ये काल्पनिक है। याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि इस फिक्शनल फिल्म का उद्देश्य मुसलमानों को खलनायक के रूप में पेश करना है। कोर्ट ने इससे भी असहमति जताई और कहा कि फिल्मों में कई तरह की चीजें दिखाई जाती हैं। भूत और पिशाच भी नहीं होते हैं लेकिन फिल्मों में काल्पनिक रूप से उनको भी दिखाया जाता है। सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी न्यायमूर्ति नागरेश ने की वो ये कि कई फिल्मों में हिंदू संन्यासियों को तस्कर और बलात्कारी दिखाया गया है लेकिन कभी भी किसी ने उसपर आपत्ति नहीं जताई। आपने हिंदी और मलयालम में इस तरह की कई फिल्में देखी होगी। मलयालम में तो एक फिल्म में पुजारी को मूर्ति पर थूकते दिखाया गया था लेकिन उससे भी किसी प्रकार की कोई समस्या उत्पन्न नहीं हुई थी। आप कल्पना कर सकते हैं कि वो फिल्म पुरस्कृत भी हुई थी। इस टिप्पणी ने भारतीय फिल्म जगत के उस एजेंडे को बेनकाब कर दिया जो अबतक निर्बाध रूप से चल रहा था। आईआईएम रोहतक के निदेशक धीरज शर्मा ने अपनी पुस्तक फिल्में और संस्कृति में लिखा है कि ऐसी फिल्में हमारे मूल्यों, परंपरा, हिंदुत्व की विचारधारा और भारतीय संस्कृति की जड़ें कमजोर कर रही हैं। बालीवुड व्यवस्थित तरीके से हिंदू धर्म को नीचा दिखाने में लगा हुआ है। धर्म के खिलाफ नकारात्मक धारणा, भावना या गतिविधि को बढ़ा रहा है। उदाहरण के लिए फिल्म वास्तव, संजू, सिंघम, सरकार में जितने भी नकारात्मक पात्र दिखाए गए हैं, उन सबने हिंदुओं के प्रतीक चिन्ह धारण कर रखे हैं और वे साफ नजर भी आते हैं। संभवत: यह दर्शाने के लिए हिंदू धर्म के प्रतीक जिन्होंने धारण कर रखे हैं, वे बुरे इंसान हैं। इसके उलट अगर किसी ने अन्य धर्म के प्रतीक धारण कर रखे हैं तो उसको पवित्र व्यक्ति के तौर पर पेश किया जाता है। फिल्म दीवार के नायक को भी इस संदर्भ में याद किया जाना चाहिए। अमिताभ बच्चन ने फिल्म दीवार में जिस विजय वर्मा का किरदार निभाया है वो हिंदू मंदिरों में जाने का इच्छुक नहीं होता है, लेकिन हमेशा अपनी जेब में 786 नंबर का बिल्ला रखता है। पुलिस से बचकर भागते समय उसका बिल्ला कहीं खो जाता है और उसको जान गंवानी पड़ती है। इससे परोक्ष रूप से क्या संदेश दिया जाता है। 

‘द केरल स्टोरी’ को लेकर जिस तरह की बातें इन दिनों हो रही है लगभग उसी तरह की बातें पिछले वर्ष ‘द कश्मीर फाइल्स’ को लेकर हो रही थीं। उसको भी एजेंडा फिल्म से लेकर समाज को बांटनेवाली फिल्म तक करार दिया गया था। ‘द कश्मीर फाइल्स’ के बाद ‘द केरल स्टोरी’ में आतंकवादियों की करतूतों को दिखाया गया है। कुछ लोग इसको बेवजह इस्लाम से जोड़ कर अपना एजेंडा चलाना चाह रहे हैं। इन दोनों फिल्मों में किसी धर्म के खिलाफ कुछ भी आपत्तिजनक नहीं दिखाया गया है। अगर ऐसा होता तो देश की अदालतें इसका संज्ञान अवश्य लेतीं। जो लोग इन फिल्मों को इस्लाम और मुसलमानों के विरुद्ध बता रहे हैं उनको गंभीरता से इस बारे में सोचना चाहिए कि वो ऐसा क्यों कह रहे हैं। कश्मीर में हिंदू पंडितों का नरसंहार करनेवाले आतंकवादी या आईएसआईएस के आतंकवादियों को मुसलमानों या इस्लाम जोड़ना अनुचित है। फिल्म इंडस्ट्री में कुछ ऐसे निर्माता हैं जिनकी आस्था न तो भारत में है न ही भारतीयता में। उनका लक्ष्य है किसी तरह से कला की आड़ में अपना एजेंडा चलाना। लेकिन इस बार अदालत ने उसे नाकाम कर दिया।  


Saturday, August 6, 2022

प्रेमचंद ने उर्दू में लिखना क्यों छोड़ा?


हिंदी में कथा सम्राट के नाम से प्रसिद्ध प्रेमचंद के कृतित्व और व्यक्तित्व को लेकर हिंदी में विपुल लेखन हुआ है। उनकी रचनाओं को आधार बनाकर देशभर के विश्वविद्यालयों में सैकड़ों शोध हुए हैं। इस बारे में भी सैकड़ों लेख लिखे गए कि कैसे प्रेमचंद गरीबों और किसानों की समस्याओं को अपनी रचनाओं में स्थान देते थे। उनकी रचनाओं में गरीबों और किसानों की समस्या के चित्रण के आधार पर उनकी प्रगतिशीलता और जनपक्षधरता को भी रेखांकित किया जाता रहा है। इस बात का उल्लेख भी मिलता है कि प्रेमचंद पहले उर्दू में नवाबराय के नाम से लिखते थे। कई जगह इस बात का उल्लेख मिलता है कि जुलाई 1908 में कानपुर से सोजेवतन नामक उनके पहले कहानी संग्रह का प्रकाशन हुआ था। इस संग्रह में प्रकाशित देशप्रेम की कहानियों को अंग्रेजों ने आपत्तिजनक माना था। तब कानपुर के कलक्टर ने उनको बुलाकर फटकारा था और कहा था कि अगर मुगलों का राज होता तो तुम्हारे दोनों हाथ काट लिए जाते। तुम्हारी कहानियां एकांगी हैं और तुमने अंग्रेजी राज की तौहीन की है। कलक्टर ने कहानी संग्रह को जब्त कर उसमें आग लगवा दी थी। फिर पुलिस के अफसरों के साथ कलेक्टर ने मीटिंग की जिसमें ये निष्कर्ष निकाला गया कि कहानियां राजद्रोह की श्रेणी में आती हैं। प्रेमचंद ने लिखा- ‘पुलिस के देवता ने कहा कि ऐसे खतरनाक आदमी को जरूर सख्त सजा देनी चाहिए।‘ मामला किसी तरह रफा दफा हुआ। उनको चेतावनी दी गई थी कि वो अपनी रचनाएं प्रकाशन पूर्व प्रशासन को दिखवा लिया करें। कहानी संग्रह की जब्ती और अंग्रेज कलेक्टर की फटकार के बाद नवाबराय ने प्रेमचंद के नाम से हिंदी में लिखना आरंभ कर दिया। इस तरह के आलेखों में ये बताया जाता रहा है कि इस कारण से ही प्रेमचंद ने उर्दू में लिखना बंद कर दिया। लेकिन ये सत्य नहीं बल्कि अर्धसत्य है। इस बात की चर्चा कम होती है कि प्रेमचंद ने जब ‘कर्बला’ नाम का नाटक लिखा था तो उसका उस दौर के मुस्लिम लेखकों ने जमकर विरोध किया था। ये तर्क दिया गया था कि हिंदू लेखक मुसलमानों के इतिहास को आधार बनाकर कैसे लिख सकते हैं। प्रेमचंद इस तरह की बातों के आधार पर अपनी आलोचना से बेहद खिन्न हुए थे। इस बात की चर्चा हिंदी के प्रगतिशील लेखकों ने बिल्कुल ही नहीं की है बल्कि उनके जीवनीकार ने भी इसका उल्लेख नहीं किया। कमलकिशोर गोयनका जैसे प्रेमचंद साहित्य के अध्येता इस बात को रेखांकित करते रहे हैं। 

अब देखते हैं कि प्रेमचंद ने स्वयं उर्दू में नहीं लिखने का क्या कारण बताया है। 1964 में साहित्य अकादमी से एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी जिसका नाम है प्रेमचंद रचना संचयन। इस पुस्तक का संपादन निर्मल वर्मा और कमलकिशोर गोयनका ने किया था। इस पुस्तक में 1 सितंबर 1915 का प्रेमचंद का अपने मित्र मुंशी दयानारायण निगम को लिखे एक पत्र का अंश प्रकाशित है। इस पत्र में प्रेमचंद ने लिखा है, ‘अब हिंदी लिखने की मश्क (अभ्यास) भी कर रहा हूं। उर्दू में अब गुजर नहीं। यह मालूम होता है कि बालमुकुंद गुप्त मरहूम की तरह मैं भी हिंदी लिखने में जिंदगी सर्फ (खर्च) कर दूंगा। उर्दू नवीसी में किस हिंदू को फैज (लाभ) हुआ है, जो मुझे हो जाएगा।‘  इस वाक्यांश को ध्यान से समझने की आवश्यकता है, उर्दू में अब गुजर नहीं है और उर्दू नवीसी में किस हिंदू को लाभ हुआ है। इससे प्रेमचंद के आहत मन का पता चलता है कि वो उर्दू वालों या अपने समकालीन मुसलमान लेखकों के विरोध से कितने खिन्न थे। वो स्पष्ट रूप से प्रश्न की शक्ल में कह रहे थे कि उर्दू में लिखने से किसी हिंदू को लाभ नहीं हो सकता । प्रेमचंद के इस आहत मन को प्रगतिशील आलोचकों और लेखकों ने या तो समझा नहीं या समझबूझ कर योजनाबद्ध तरीके से दबा दिया। इस बात की संभावना अधिक है कि जानबूझकर इस प्रसंग को नजरअंदाज किया गया। प्रेमचंद को प्रगतिशील जो साबित करना था। जानबूझकर इस वजह से क्योंकि प्रेमचंद से संबंधित कई तथ्यों को ओझल किया गया। नई पीढ़ी को ये जानना चाहिए कि 1920 में प्रकाशित कृति ‘वरदान’ को प्रेमचंद ने राजा हरिश्चंद्र को समर्पित किया था। उसको बाद के संस्करणों में हटा दिया गया। इसी तरह प्रेमचंद के कालजयी उपन्यास ‘गोदान’ का नाम ही बदल दिया गया। पंडित जनार्दन झा ‘द्विज’ ने अपनी ‘पुस्तक प्रेमचंद की उपन्यास कला’ में स्पष्ट किया है कि प्रेमचंद ने पहले अपने उपन्यास का नाम गौ-दान रखा था। द्विज जी के कहने पर उसका नाम गो-दान किया गया। गो-दान 1936 में सरस्वती प्रेस, बनारस और हिंदी ग्रंथ-रत्नाकर कार्यालय, बंबई (अब मुंबई) से प्रकाशित हुआ। लेकिन आज जो उपन्यास उपलब्ध हैं उसका नाम गोदान है। गो और दान के बीच के चिन्ह को हटाकर इसको मिला दिया गया। प्रेमचंद की रचनाओं में भी बदलाव किए गए जिसके प्रमाण उपलब्ध हैं। 

प्रेमचंद के उपरोक्त कथन कि उर्दू में लिखने से किसी हिंदू को लाभ नहीं हो सकता, में उपेक्षा का दर्द है और वो दर्द कालांतर में हिंदी-उर्दू संबंध में भी दिखता है। प्रगतिशीलों ने उर्दू में हिंदू लेखकों की उपेक्षा को अपने लेखन में प्रमुखता नहीं दी और उर्दू के पक्ष में खड़े होकर गंगा-जमुनी तहजीब के विचार को प्रमुखता देते रहे। यह अनायास नहीं है कि उर्दू लेखकों को जितना मान-सम्मान और स्थान हिंदी साहित्य में मिला उस अनुपात में हिंदी लेखकों को उर्दू में नहीं मिल पाया। उर्दू के तमाम शायर इकबाल से लेकर फैज तक देशभर में तब लोकप्रिय हो पाए जब उनके दीवान देवनागरी लिपि में छपकर आए। उर्दू वालों ने ये सह्रदयता हिंदी के लेखकों को लेकर नहीं दिखाई। निराला, दिनकर, पंत आदि की रचनाओं का उर्दू में अपेक्षाकृत कम अनुवाद हुआ। अंग्रेजों के साथ मिलकर उर्दू ने करीब सौ सालों तक हिंदी को दबाने का काम किया। उन्नसवीं सदी के आखिरी वर्षों में जब हिंदी अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रही थी तो सर सैयद अहमद ने अलीगढ़ में ‘उर्दू डिफेंस एसोसिएशन’ नाम की संस्था बनाई। इसी तरह जब 1900 में संयुक्त प्रांत के गवर्नर मैकडानल ने हिंदी को उर्दू के बराबर दर्जा देने की घोषणा की तो सर सैयद के उत्तराधिकारी मोहसिन उल मुल्क ने इसका विरोध किया था। ये बातें नामवर सिंह भी स्वीकार करते थे। लेकिन नामवर के इस स्वीकार का भी प्रचार प्रसार नहीं हो पाया और उसको दबा दिया गया। कहना न होगा कि प्रगतिशील विचार के झंडाबरदार हर उस विचार को दबा देते थे जिससे उर्दू और उर्दू वालों की छवि हिंदी और हिंदीवालों के विरोध की बनती थी। 

स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में या अमृतकाल में प्रेमचंद के साथ हुए इन छल के दोषियों को चिन्हित करना चाहिए। चिन्हित करने के साथ-साथ प्रेमचंद की रचनाओं को मूल स्वरूप में लाकर उनका समग्रता में मूल्यांकन भी होना चाहिए। साहित्य अकादमी  लेकर प्रेमचंद के नाम पर बनी संस्थाएं और विष्वविद्यालयों के हिंदी विभागों का ये उत्तरदायित्व है कि वो अपने पूर्वज लेखक की रचनाओं के साथ हुए इस अनाचार को दूर करने की दिशा में ठोस और सकारात्मक पहल करें। एक लेखक जिसका मन हिंदू धर्म में पगा है, जो अपनी रचनाओँ में भारत और भारतीयता की बात करता है, जो बच्चों के लिए रामचर्चा जैसी कथा पुस्तक लिखता है, जो स्वामी विवेकानंद को उद्धृत करता है उसको मूल रूप में पुनर्स्थापित किया जाए। प्रेमचंद को मार्क्सवाद की जकड़न से आजाद करवाने के लिए सांस्थानिक प्रयत्व किए जाने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन के लिए बनाए जानेवाले पाठ्यक्रमों में प्रेमचंद के वास्तविक स्वरूप को छात्रों को पढ़ाया जा सके, इसकी व्यवस्था की जानी चाहिए।   

Saturday, July 30, 2022

उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का हिंदू मन


आज उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की जयंती है। 1880 में आज के ही दिन प्रेमचंद का जन्म हुआ था। आज एक बार फिर मार्क्सवादी लेखक और मार्क्सवाद में आस्था रखनेवाले प्रेमचंद को कम्युनिस्ट और प्रगतिशील और जाने किन विशेषणों से विभूषित करेंगे। इस तरह की प्रवृति बहुत लंबे समय से हिंदी साहित्य में चल रही है। प्रेमचंद के लेखन का मूल्यांकन करते समय मार्क्सवादी आलोचकों ने समग्रता में उनके कृतित्व को ध्यान में नहीं रखा। प्रेमचंद की उन कृतियों को या उन कार्यों को जानबूझकर ओझल कर दिया गया जिससे उनकी एक अलग ही छवि बनती है। प्रेमचंद को जबरन मार्क्सवादी बताने का ये खेल हिंदी साहित्य में लंबे समय तक चलता रहा। स्कूल और कालेज की पुस्तकों में प्रेमचंद की रचनाओं की व्याख्या इस तरह से की जाती रही कि उनकी आस्था मार्क्सवाद में थी और उनकी रचनाओं में ये प्रतिबंबित होती थी। विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों में मार्क्सवादियों का बोलबाला रहा है जिसकी वजह से छात्रों के मानस पर प्रेमचंद की मार्क्सवादी लेखक की छवि अंकित करवाने में उनको अधिक परेशानी नहीं हुई।  जिस भी लेखक ने प्रेमचंद की रचनाओं को समग्रता में सामने लाने का प्रयत्न किया उनको हाशिए पर रखने का उपक्रम मार्क्सवादियों ने चलाया, खासतौर पर विश्वविद्यालयों में। परिणाम ये हुआ कि लंबे कालखंड तक प्रेमचंद की रचनाओं का मूल्यांकन एकतरफा होता रहा। छात्र भी प्रेमचंद के लेखकीय व्यक्तित्व के एक ही रूप से परिचित होते रहे। ये सिर्फ प्रेमचंद के साथ ही नहीं किया गया बल्कि हिंदी के तमाम लेखकों के साथ ऐसा किया गया। निराला के उन लेखों को साहित्य जगत में सामने ही नहीं आने दिया गया जो उन्होंने कल्याण पत्रिका में लिखे थे। निराला ने कल्याण पत्रिका के अलग अलग अंकों में कई लेख लिखे थे लेकिन उसपर हिंदी में चर्चा नहीं हुई। 

प्रेमचंद की रचनाओं में हिंदू संस्कृति को लेकर कितना कुछ लिखा गया है या उनकी कहानियों में हिंदू संस्कृति किस तरह से मुखर हुई है इसपर प्रेमचंद साहित्य के विद्वान कमलकिशोर गोयनका ने काफी लिखा है। गोयनका को विचारधारा विशेष के विरुद्ध जाकर लिखने की कीमत भी चुकानी पड़ी। अपमान झेलना पड़ा।  साहित्यिक मंच पर सरेआम धमकियां दी गईं। लेकिन कहते हैं न कि सत्य को बहुत दिनों तक रोका नहीं जा सकता है। अब प्रेमचंद के अनेक रूप उपस्थित हो रहे हैं। पिछले दिनों विश्वविद्यालय प्रकाशन, काशी ने प्रेमचंद के संपादन में 1933 में प्रकाशित हंस पत्रिका के काशी अंक का पुनर्प्रकाशन किया। अक्तूबर-नवंबर 1933 में प्रकाशित पत्रिका के इस अंक के लेखों को देखकर संपादक प्रेमचंद की रुचि का पता चलता है। प्रेमचंद के संपादन में निकली इस पत्रिका में एक लेख प्रकाशित है, काशी: हिंदू संस्कृति का केंद्र। इसमें लेखक ने लिखा है- ‘मध्य युग में देश पर बाहरवालों के कितने ही हमले हुए। उत्तर भारत का कोई भी प्रसिद्ध नगर उनके विनाशकारी प्रभाव से नहीं बचा। काशी पर भी सुल्तान नियाल्तगीन, कुतबुद्दीन इबुक के, तथा मुगल-काल में भी कितने ही हमले हुए, परंतु काशी की महिमा का मुख्य आधार व्यापारिक अथवा राजनीतिक महत्ता कभी नहीं रहा, उसका अटूट संबंध तो धर्म और संस्कृति से था। यदि कोई विजयी शासक नगर में लूटपाट मचा देता, मंदिर या मूर्तियों को विध्वंस्त करवा देता, अथवा लोगों का दमन करने लगता तो यह अवश्य था कि काशी कुछ दिनों के लिए श्रीविहीन हो जाती परंतु उसपर कोई वास्तविक प्रभाव न पड़ता था। हर साल फिर ग्रहण पड़ते, अमावस्या और एकादशी आतीं और उनके साथ ही साथ आता- स्त्री-पुरुषों का विशाल जनसमूह जो काशी की गलियों, घाटों और मंदिरों में समा जाता। फिर सदा की भांति प्रात: और संध्या आरती, काशी नगरी में घंटे और शंख के गंभीर निनाद के साथ भक्तों की कंठ ध्वनि मिलकर फिर वही अपूर्व समां बांध देती, मानो कुछ हुआ ही न हो।‘  इस उद्धरण से कई बातें स्पष्ट रूप से सामने आती हैं। पहला ये कि बाहर से कई हमले काशी पर हुए, मुगलों ने भी किए। मंदिर और मूर्तियां नियमित अंतराल पर तोड़ गए, लेकिन हिंदू संस्कृति में वो ताकत है कि वो इन हमलों को न केवल झेल गई बल्कि वापस उठ खड़ी हुई। प्रेमचंद अपने संपादन में इस तरह के लेख प्रकाशित करके उस वक्त अपना सोच देश के सामने रख रहे थे। 

हंस पत्रिका के इसी अंक में प्रेमचंद ने  काशी विश्वनाथ मंदिर पर भी एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख का एक महत्वपूर्ण अंश देखा जाना चाहिए, ‘काशी के श्रीविश्वनाथ मंदिर में स्वयंजात ज्योति:स्वरूप लिंग हैं, इनके ही दर्शन और अर्चन से भक्त लोग अपनी समस्त कामनाओं की पूर्ति के साथ-साथ मोक्ष जैसा अलभ्य प्राप्त करने काशी आते हैं। स्वर्गीय महारानी अहित्याबाई ने पंच मंडप-संयुक्त एक विशाल मंदिर बनवा दिया। 51 फीट ऊंचा यह वर्तमान मंदिर कीमती लाल पत्थरों से बना है। इसके बाद ही सन् 1839 ई. में सिख जाति के मुकुटमणि पंजाब केशरी स्वर्गीय महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के ऊपरी हिस्से को स्वर्ण मंडित करके उसकी सौगुनी शोभा बढ़ा दी।‘  इस लेख की ही कुछ और पंक्तियां, मुसलमान शासकों ने प्राचीन मंदिर को तोड़ा था, उन्हीं ने वर्तमान मंदिर के सिंहद्वार के सामने एक नौबतखाना बनवा दिया, जहां अबतक नौबत बजती है, जिसके ऊपर से विजातीय लोग दर्शन किया करते हैं। केवल दर्शन ही नहीं अंग्रेज लोग पूजोपहार और दक्षिणा भी दे जाते हैं। सम्राट पंचम जार्ज से लेकर प्रत्येक वायसराय विश्वनाथ-दर्शन कर चुके हैं। अभी हाल ही में जब लार्ड इरविन आए थे तब श्रद्धा के साथ चांदी के पूजा-पात्र उपहारस्वरूप भेंट कर गए थे। इस तरह विश्वनाथ इस समय समस्त जातियों द्वारा सम्मानित और पूजित होकर काशी में सुख से विराज रहे हैं।‘ 

उपरोक्त दोनों उद्धरणों में एक बात जो समान है कि मुस्लिम आक्रांताओं ने काशी में मंदिर और मूर्तियां तोड़ीं। इस पत्रिका के कई अन्य लेखों में भी मंदिरों के तोड़े जाने का प्रसंग आया है। एक और लेख है काशी का इतिहास उसमें भी लेखक ने विस्तार से काशी पर हुए अनके हमलों का उल्लेख किया है। इसमें इस बात का जिक्र भी है कि शाहजहां ने भी काशी में मंदिर तुड़वाए थे। धर्मांध औरंजगजेब ने यहां के मंदिर तुड़वाने की आज्ञा प्रचलित की जिनके चिन्ह स्वरूप ज्ञानवापी और बेनीमाधन की मस्जिदें अभी तक मौजूद हैं। औरंगजेब ने तो काशी का नाम बदलकर मुहम्मदाबाद रखा था पर वो प्रचलित नहीं हो पाया। लेकिन मुगलकाल में काशी की जो टकसाल थी वहां के कुछ सिक्कों और कागजों में ये नाम मिलता है। मंदिरों और मूर्तियों को तोड़े जाने के अलावा प्रेमचंद के संपादन में निकले इस अंक से एक और ध्वनि निकलती है वो है हिंदू धर्म और संस्कृति की । 

इस अंक से प्रेमचंद की हिंदू धर्म और संस्कृति में आस्था का पता चलता है। बार बार मंदिरों के तोड़े जाने का उल्लेख इस बात की ओर संकेत करता है कि संपादक इससे आहत था।  उसको अपनी पत्रिका के माध्यम से आमजन तक पहुंचाना भी चाहता था क्योंकि अगर इन लेखों में प्रयुक्त वक्तव्यों, उद्धरणों और घटनाओं के आवरण को हटाकर भीतर छिपी मूल भावनाओं को देखें आपको प्रेमचंद का हिंदू मन दिखाई देगा। वो हिंदू मन जो अपने मंदिरों के तोड़े जाने से आहत है, वो हिंदू मन जो अपनी संस्कृति पर हुए हमलों से दुखी है, वो हिंदू मन जो सनातन संस्कृति की शक्ति को जानता है, वो हिंदू मन जो अपनी परंपरा से विद्रोह का खोखला नारा नहीं लगता बल्कि अपनी परंपरा को अपनी लेखनी से समृद्ध करता है। जो मार्क्सवादी लेखक विचारधारा की शिलाखंड पर बैठकर प्रेमचंद के साम्यवादी होने का शोर मचाते हैं उनको प्रेमचंद के संपादन में प्रकाशित पत्रिकाओं के अंक देखने चाहिए।