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Sunday, December 20, 2015

साहित्य में अश्लीलता

साहित्य में भाषा का सवाल गाहे बगाहे उठता रहा है । जब भी कोई ऐसी कृति आती है जिसमें भाषा की स्थापित मर्यादा टूटती है तो साहित्य जगत में उसपर व्यपक विचार विमर्श होता है । कृतियों के अलावा भी अगर कोई लेखक या साहित्यकार अपने साक्षात्कार में कथित तौर पर आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग करता है तो उसपर भी साहित्यक जगत में प्रतिक्रिया होती है । बहुधा लेख आदि लिखकर तो कभी कभार धरना और विरोध प्रदर्शन भी होते रहे हैं । साहित्यक पत्रिका नया ज्ञानोदय में उस वक्त के महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने अपने साक्षात्कार में छिनाल शब्द का प्रयोग किया था तो मामला सरकार और मंत्री तक पहुंचा था । धरना और विरोध प्रदर्शन तो हुआ ही था और उनको खेद प्रकट करना पड़ा था । अभी कुछ दिनों पहले मराठी के मशहूर लेखक भालचंद नेमाड़े की किताब हिन्दू, जीने का समृद्ध कबाड़ अनुदित होकर प्रकाशित हुआ है । नेमाड़े मराठी के बेहद सम्मानित लेखक हैं और उनको ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है । नेमाडे अंग्रेजी के शिक्षक रहे हैं और लंदन के मशहूर स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज में अध्यापन कर चुके हैं । कुछ दिनों पहले उनका सलमान रश्दी से विवाद भी हुआ था । रश्दी ने अपने एक ट्वीट में उनके बारे में लिखा था- ग्रम्पी ओल्ड बास्टर्ड, जस्ट टेक योर प्राइज एंड से थैंक यू नाइसली । आई डाउट यू हैव इवन रेड द वर्क यू अटैक । दरअसल नेमाडे ने एक कार्यक्रम में सलमान रश्दी की किताब मिडनाइट चिल्ड्रन को औसत साहित्यक कृति करार दिया था । नेमाडे ने कहा था कि सलमान रश्दी और वी एस नायपॉल पश्चिम के हाथों खेल रहे हैं । सलमान रश्दी को नेमाडे की बातें नागवार गुजरीं थी और उन्होंने भाषिक मर्यादा को ताक पर रखते हुए गाली गलौच की भाषा में ट्वीट किया था । उसके बाद समकालीन साहित्यक परिदृश्य में उबाल आया था और सलमान रश्दी की जमकर लानत मलामत की गई थी । इस प्रसंग को बताने का मकसद सिर्फ इतना है कि भालचंद्र नेमाड़े के कहने का वैश्विक साहित्य जगत में असर होता है ।
उनकी ताजा किताब- हिन्दू, जीने का समृद्ध कबाड़, जो मूल कृति का हिंदी अनुवाद है, की खासी चर्चा रही लेकिन उनके इस किताब में कई प्रसंगों में इस्तेमाल किए गए शब्द अलक्षित रह गए । इस किताब के ब्लर्ब पर लिखा है – ‘देसी अस्मिता का महाकाव्य यह उपन्यास भारत के जातीय ‘स्व’ का बहुस्तरीय, बहुमुखी, बहुवर्णी उत्खनन है । यह ना गौरव के किसी जड़ और आत्मुग्ध आख्यान का परिपोषण करता है, न ‘अपने’ के नाम पर संस्कृति के रगों में रेंगती उन दीमकों का तुष्टीकरण, जिन्होंने ‘भारतवर्ष’ को भीतर से खोखला कर दिया है । यह उस विराट इकाई को समग्रता में देखते हुए चलते हुए देखता है जिसे भारतीय संस्कृति कहते हैं ।‘ ब्लर्ब लेखक का नाम नहीं होने से यह माना जाता है कि लेखक और प्रकाशक दोनों इससे सहमत होंगे और ये पाठकों को कृति की ओर खींचने के लिए लिखा गया है । इस कृति को देसी अस्मिता का महाकाव्य बताया गया है । नेमाड़े जी से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि इस कृति में करीब आधा दर्जन जगहों पर आपने जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया है वो किस देसी अस्मिता को प्रतिबिंबित करता है । अगर एक बार को यह मान भी लिया जाय कि इस तरह की भाषा कभी कभार निजी बातचीत में बोली जाती है तो क्या उसको हम अपने देश की संस्कृति के तौर पर पेश कर सकते हैं जिसका दावा भालचंद नेमाड़े करते हैं । एक जगह पुलिस वाले गश्ती के दौरान युवकों को मां की गाली देते हैं जिसको अक्षरश: प्रकाशित कर दिया है । उसी बातचीत के क्रम में लेखक ने लिखा है कि- उसे पारधी लड़कों ने बताया था कि पुलिसवाले थाने ले जाकर गXX में डंडा घुसेड़ते हैं । इसी तरह से एक दूसरा प्रसंग कहार बस्ती की एक औरत का संवाद है । यहां तो हद कर दी गई है । अपने और लड़के की जननांगों के बारे में कहते कहते लेखक का पात्र महात्मा गांधी के जननांगों का हवाला देते हुए उसकी बहन के साथ संबंध बनाने की गाली देने लग जाता है । यह अंश बेहद आपत्तिजनक है और पात्रों की आपसी बातचीत में सहजता से आनेवाली बातचीत से ज्यादा प्रचार पाने के लिए ठूंसा गया प्रसंग अधिक लगता है । गाली में महात्मा गांधी का प्रयोग अबतक साहित्य में नहीं देखा गया था और इस मामले में भालचंद्र नेमाड़े को इसका प्रणेता कहा जा सकता है ।
नेमाड़े को और इस किताब के प्रकाशक, राजकमल प्रकाशन, को लगता है कि हाल के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की जानकारी नहीं है । इस साल मई में सुप्रीम कोर्ट ने एक संपादक के खिलाफ आरोप हटाने से इंकार कर दिया था । एक पत्रिका ने उन्नीस सौ चौरानवे में महात्मा गांधी के बारे में एक अश्लील और भद्दी कविता प्रकाशित की थी । सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने साफ तौर पर कहा था कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश के ऐतिहासिक आदरणीय महापुरुषों के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल की इजाजत नहीं देता है । सुप्रीम कोर्ट ने बांबे हाईकोर्ट के फैसले को बरकार रखा था जिसमें संपादक की याचिका खारिज करने की मांग को रद्द कर दिया गया था । इसके अलावा भी सुप्रीम कोर्ट कई मौकों पर इस तरह की टिप्पणी कर चुका है । गांधी हमारे पूरे देश में समादृत हैं और उनको लेकर इस तरह की घोर आपत्तिजनक टिप्पणी भालचंद्र नेमाड़े और उनके प्रकाशक को मुश्किल में डाल सकती है । लगभग साढे पांच सौ पन्नों के इस उपन्यास में नेमाड़े ने भाषा की मर्यादा को तार-तार किया है ।
हिंदी में साहित्यक कृतियों में अश्लीलता के सवाल पर कई बार लंबी लंबी बहसें भी हुई हैं । द्वारका प्रसाद मिश्र की कृति -घेरे के बाहर- की भाषा और उसके विषय को लेकर उसको प्रतिबंधित भी किया गया था जो काफी बाद में प्रकाशित हुआ । अज्ञेय की कृति -शेखर एक जीवनी - भी जब प्रकाशित हुई थी तब भी उसमें भाई-बहन के संबंधों के चित्रण को लेकर खासा हंगामा मचा था । उसी तरह से कृष्णा सोबती को अपने उपन्यास में एक शब्द के इस्तेमाल पर बोल्ड लेखिका करार दे दिया गया था । मृदुला गर्ग के उपन्यास चितकोबरा के प्रकाशन के बाद सेक्स संबंधों और उसके उपन्यासों में चित्रण को लेकर हिंदी साहित्य में खासा विवाद हुआ था । मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास इदन्नमम और अलमा कबूतरी में वर्णित सेक्स प्रसंगों को लेकर अब भी उनकी लानत मलामत की जाती है । शरद सिंह ने अपने एक उपन्यास पिछले पन्ने की औरतों में भी एक प्रसंग में स्त्री के निजी अंगों के बारे में लिखा था जिसको लेकर भी बहस हुई थी । कृष्णा अग्निहोत्री की आत्मकथा में संबंधों को लेकर विवाद उठा था । हिंदी साहित्य में इस पर लंबे समय से वाद-विवाद होता रहा है कि भाषा कैसी हो । कई लेखक तो अपनी कृतियों में उसी तरह से जबरदस्ती सेक्स प्रसंगों को ठूंसते हैं जिस तरह से कहानी की बगैर मांग के हिंदी फिल्मों में नायक नायिका के बारिश में भीगते हुए गाने फिल्माए जाते हैं । हाल के दिनों में सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए कहानी और उपन्यासों में जबरदस्ती सेक्स प्रसंग ठूसने की प्रवृ्ति ने जोड़ पकड़ा है । जिस तरह से फिल्म में काम करनेवाली नायिकाओं को लगता है कि कम कपड़े पहनने से वो जल्द से जल्द स्टारडम हासिल कर लेगी उसी तरह से हिंदी के चंद युवा लेखकों को भी लगता है कि कथित तौर पर बोल्ड प्रसंगों को लिखकर स्थापित हो जाएंगे । अभी हाल ही में हिंदी की एक वयोवृद्ध लेखिका रमणिका गुप्ता की आत्मकथा आपहुदरी प्रकाशित हुई है जिसमें सेक्स प्रसंगों की भरमार है जो जुगुप्साजनक है । पोर्न साहित्य का भी एक सौंदर्यशास्त्र होता है लेकिन रमणिका गुप्ता ने तो पता नहीं क्या लिखा है । उसको परिभाषित करने के लिए वक्त देना वक्त जाया करने जैसा है ।
बावजूद इसके उक्त कृतियों में किसी महापुरुष को लेकर भद्दी टिप्पणी नहीं की गई है । नेमाड़े ने महात्मा गांधी पर तो टिप्पणी की ही है गालियों में भी उन शब्दों को लिख डाला है जो अबतक वर्जित रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ भी हैं । काशी का अस्सी में काशी नाथ सिंह ने भी गालियों का इस्तेमाल किया है, राही मासूम रजा ने आधा गांव में गालियों का उपयोग किया है लेकिन इस तरह से नहीं जिस तरह से नेमाड़े ने अपने उपन्यास में किया है । नेमाड़े ने तो फुटपाथ पर पीली पन्नी में बिकनेवाली किताबों की भाषा का इस्तेमाल कम से कम आधे दर्जन जगहों पर किया है ।  नेमाड़े के इस उपन्यास में उन शब्दों के उपयोग के बाद एक बार फिर से ये सवाल खड़ा हो गया है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर लेखकों को कितनी और कहां तक जाने की छूट मिली चाहिए ।  



Saturday, February 14, 2015

रश्दी की कुंठा, निशाने पर नेमाडे

सलमान रश्दी, विश्व प्रसिद्ध लेखक ।  अपने लेखन, व्यक्तित्व और बयानों से विवादों में बने रहने वाले । ये वही सलमान रश्दी हैं जिनकी किताब सैटेनिक वर्सेस के खिलाफ चौदह फरवरी उन्नीस सौ नवासी को ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खोमैनी ने मौत का फतवा जारी किया था जिसके बाद वो वर्षों तक निर्वासन में रहे । इसके पहले उन्नीस सौ चौरासी में सलमान रश्दी ने ज़ॉर्ज ऑरवेल की अवधारणा को निगेट करते हुए विवादित लेख लिखा था । ऑरवेल लेखकों के राजनीति से अलग रहने की वकालत करते थे लेकिन सलमान ने इस अवधारणा को खारिज करते हुए कहा था लेखन को राजनीति से मिलकर चलना होगा । हलांकि सलमान ने उस वक्त भी लेखन और राजनीति के मेल को घटिया करार दिया था लेकिन उसको जरूरी भी बताया था । इस पर भी उन दिनों काफी विवाद हुआ था । इसी वक्त लगभग सलमान ने अमेरिकी उपन्यासकार मैरियन विगिन्स से शादी की जो खासी विवादास्पद रही । उस दौर के अमेरिका के अखबार इस विवाद से रंगे रहते थे । अब ताजा विवाद उनके एक ट्वीट को लेकर पैदा हो गया है । उन्होंने अपने एक ट्वीट में लिखा- ग्रम्पी ओल्ड बास्टर्ड, जस्ट टेक योर प्राइज एंड से थैंक यू नाइसली । आई डाउट यू हैव इवन रेड द वर्क यू अटैक । ये विस्फोटक ट्वीट उन्होंने किया था इस बार के ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता मराठी के वरिष्ठ लेखक भालचंद नेमाडे के बारे में । दरअसल नेमाडे ने एक कार्यक्रम में सलमान रश्दी की किताब मिडनाइट चिल्ड्रन को औसत साहित्यक कृति करार दिया था । नेमाडे ने कहा था कि सलमान रश्दी और वी एस नायपॉल पश्चिम के हाथों खेल रहे हैं । अपने उस बयान में नेमाडे ने अंग्रेजी के खिलाफ बहुत कुछ कहा था और उनके अपने तर्क थे । सलमान रश्दी को नेमाडे की बातें नागवार गुजरीं और उन्होंने भाषिक मर्यादा को ताक पर रखते हुए गाली गलौच की भाषा में ट्वीट किया । सलमान रश्दी को शायद पता हो कि नेमाडे अंग्रेजी के ही शिक्षक रहे हैं और लंदन के मशहूर स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज में शिक्षक रह चुके हैं । तो सलमान रश्दी का ये संदेह बेकार है कि उन्होंने बगैर पढ़े उनके साहित्य को औसत कह दिया । भालचंद नेमाडे ने यह भी बताया था कि क्यों सलमान और नायपाल की रचनाएं पश्चिम के इशारे पर लिखी जा रही हैं । उनके अपने तर्क हैं, रश्दी को बजाए गाली गलौच की भाषा इस्तेमाल करने के तर्कों के आधार पर नेमाडे की प्रस्थापना को काटना चाहिए था ।
अब अगर सलमान रश्दी के लेखन की बात की जाए तो बहुत हद तक नेमाडे सही भी कह रहे हैं । पिछले दिनों उनकी किताब जोसेफ एंटन अ मेमोऑर प्रकाशित हुई थी । साढे छह सौ पन्नों के इस ग्रंथ में बोरियत की हद तक विस्तार दिया है । इसको खारिज नहीं किया जा सकता लेकिन बेहद ऊबाऊ तो कहा ही जा सकता है । चंद दिलचस्प अंशों को छोड़कर जहां वो अपने निर्वासन के दिनों का वर्णन करते हैं । पलायन इस संस्मरणात्नमक किताब की सेंट्रल थीम है लेकिन वो पाठकों को पलायन से नहीं रोक पाते हैं । इसी वजह से इस किताब को लेकर कहीं कोई उत्साह नहीं दिखा । निर्वासन के दौरान ही लिखा उनका उपन्यास द मूर’स लास्ट साय भी कोई खास प्रभाव पैदा नहीं कर पाया था और लंदन और अमेरिका के अखबारों में उसकी विध्वंसात्मक समीक्षाएं प्रकाशित हुई थी । नेमाडे ने पश्चिम के हाथों खेलने का जो आरोप लगाया है वो कोई नया आरोप नहीं है तो इससे अब क्यों तिलमिला रहे हैं यह समझ से परे हैं । रही बात वीएस नायपाल की तो उनको नोबेल पुरस्कार अवश्य मिला है लेकिन उनके बाद के लेखन में खास किस्म का ह्रास देखने को मिलता है । जो रचनात्मक चमक मिस्टिक मैसअर, सफरेज ऑफ अलवीरा या मायगुल स्ट्रीट में दिखाई देती है वो एन एरिया ऑफ डार्कनेस, इंडिया अ वूंडेड सिविलाइजेशन या इंडिया अ मिलियन म्यूटिनी नाऊ तक आते आते निस्तेज होने लगती है । उम्र बढ़ने के साथ साथ नायपाल के लेखन में एक ठहराव सा आ गया और विचारों में जड़ता भी । इस्लामिक जगत के जीवन का उन्होंने बहुत ही विवादास्पद चित्र खींचा है । बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने को जिस तरह से उन्होंने परोक्ष रूप से सही ठहराया वो भी लेखकों के सामने है । गांधी के बारे में वो लिखते हैं कि उनमें किसी तरह की पूर्णता थी ही नहीं, उनका व्यक्तित्व यहां वहां से उटाए टुकड़ों ने निर्मित हुआ था । बिनावो के बारे मे लिखते हैं कि वो एक मूर्ख शख्सियत थे जिन्होंने पचास के दशक में गांधी की नकल करने की कोशिश की । नीरद सी चौधरी को वो शारिरिक और मानसिक दोनों दृष्टियों से बौना करार दे चुके हैं । तभी तो विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि एक लेखक के रूप में नायपाल का अंत हो चुका है जितना ज्यादा वो अपने अनुभवों के बारे में लिखते हैं उनकी कलम उतनी ही नपुंसक होती जाती है ।
दरअसल अगर हम देखें तो सलमान रश्दी की नेमाडे को लेकर जो भड़ास है वो भारतीय लेखकों का वैश्विक परिदृश्य पर बढ़ते दबदबे की परिणति है । पिछले लगभग एक दशक से जिस तरह से भारतीय लेखकों ने अंग्रेजी साहित्य में अपनी धमक कायम की उससे सलमान और नायपाल के अलावा कुछ अंग्रेजी लेखक घबराए हुए हैं । उनकी पूछ और लोकप्रियता दोनों कम होने लगी है । जिस तरह से एशियाई लेखकों को पुलित्जर और बुकर मिलने लगे उसपर अंग्रेजी लेखक एलेक्स ब्राउन ने कहा भी था कि हमें डर लगने लगा है । चंद वर्षो पहले तक भारत के बारे में अंग्रेजी लेखक संपेरों के देश से लेकर कुछ भी कह जाते थे लेकिन बच जाते थे । अब उनको जवाब मिलने लगा है । ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब हॉवर्ड के प्रोफेसर और इतिहासकार नायल फर्ग्यूसन की किताब- सिविलाइजेशन, दे वेस्ट एंड द रेस्ट छपी थी तो पंकज मिश्रा ने लंदन रिव्यू ऑफ बुक्स में उसकी विध्वंसात्मकक समीझा लिखी थी । पंकज ने साफ साफ लेखक से पूछा था कि क्या महात्मा गांधी के बिना पिछली सदी की सभ्यता का मूल्यांकन संभव है । क्या चीन की उत्पादन क्षमता और भारत के टैक्नोक्रैट के योगदान को नजरअंदाज किया जा सकता है । तिलमिलाए नायल ने पत्रिका को लिखे अपने पत्र में कहा था कि पंकज मिश्रा ने उनके लेखन की तुलना अमेरिकी नस्लवादी सिद्धांतकार लॉथ्रॉप स्टोडार्ड की किताब द राइजिंग टाइड ऑफ कलर अगेंस्ट व्हाइट सुप्रीमेसी से की है । उन्होंन मिश्रा को कोर्ट आदि जाने की धमकी भी दी थी । लंदन रिव्यू ऑफ बुक्स में कई अंकों तक ये विवाद चला था लेकिन पंकज मिश्रा डटे रहे थे और एलआरबी ने भी पंकज का ही समर्थन किया था । इस तरह के वाकयों से साफ है कि पश्चिम में रह रहे लेखकों को यह गंवारा नहीं है कि उनके अलावा कोई और लेखक सामने आए या उनके लेखन पर कोई सवाल उठाए
अगर हम विस्तार से वैश्विक अंग्रेजी साहित्य के परिवेश को देखें तो सलमान रश्दी के फ्रस्टेशन की वजह साफ हो जाती है। सलमान भारत आते जाते रहते हैं, यहीं पैदा भी हुए हैं, उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार की प्रतिष्ठा का भी ज्ञान होगा । उन्हें चोट इस बात से पहुंची होगी कि इतने सम्मानित पुरस्कार से नवाजा गया लेखक उनके लेखन को औसत मानता है । इसी परेशानी में वो मर्यादा भूल गए और ट्वीट पर अपनी कुंठा को उड़ेल दिया । सलमान रश्दी ने अपने लेखन के नहीं पढ़े जाने की बात की है उसमें मैं सिर्फ इतना जोड़ना चाहूंगा कि क्या सलमान ने नेमाडे के साहित्य को पढ़ा है । अगर नहीं तो पढ़ लें तो उन्हें एहसास हो जाएगा कि नेमाडे कितना सही कह रहे थे । आग्रह सिर्प इतना है कि इस तरह की भाषा से उनकी छवि दरकती ही है मजबूत नहीं होती।   

Sunday, February 8, 2015

नेमाडे को ज्ञानपीठ सम्मान

भालचंद्र नेमाडे  मराठी साहित्य का एक ऐसा नाम जिसने साठ के दशक में अपनी लेखनी से उसकी धारा बदल दी । जिन्होंने साठ के दशक के बाद चले लघु पत्रिका आंदोलन में सक्रिय भागीदारी से मराठी साहित्य जगत को समकालीनता से जोड़े रखा था और सेठाश्रयी पत्रिका के बरक्श चले इस आंदोलन को मजबूती दी थी । पच्चीस साल की उम्र में भालचंद्र नेमाड़े ने अपना पहला उपन्यास लिखा था और वो भी सिर्फ सोलह दिनों में । 1963 में प्रकाशित उस उपन्यास का नाम कोसला था और उसने भालचंद्र नेमाड़े को रातोरात मशहूर कर दिया था और मराठी में जारी साहित्यक लेखन की जड़ता पर भी प्रहार किया था । दो हजार दस में जब भालचंद्र नेमाडे का उपन्यास हिंदू जगण्याची समृद्ध अडगल छपा तो उसकी भी खासी सराहना हुई थी । ये उनके उपन्यास त्रयी की पहली कड़ी थी और नेमाडे के प्रकाशक के मुताबिक वो दूसरा खंड पूरा कर चुके हैं और उसके संपादन का काम कर रहे हैं । उस वक्त भालचंद्र नेमाड़े ने कहा था कि हिंदू के दो और खंड लिखने के बाद वो उपन्यास लेखन से तौबा कर लेंगे और कविता पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगे । उस उपन्या में नेमाडे ने भारती सभ्यता और संस्कृति को सिंधु घाटी सभ्यता के वक्त से परखा है । नेमाडे भले ही मराठी में लिखते हों लेकिन उनकी लोकप्रियता ने भाषा की सारी सरहदें तोड़ दी हैं । उनके पहले उपन्यास कोसला का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है । इन्हीं भालचंद्र नेमाड़े को भारत का सर्वोच्च साहित्य सम्मान ज्ञानपीठ सम्मान देने का एलान किया है । ज्ञानपीठ सम्मान का यह पचासवां साल है । हिंदी के सबसे बड़े लेखक नामवर सिंह की अध्यक्षता में दस सदस्यीय समिति ने भालचंद्र नेमाड़े को सम्मानित करने का फैसला किया और अपने वक्तव्य में कहा कि – ‘भालचन्द्र नेमाडे मराठी साहित्य में सर्वस्पर्शी तथा सर्वप्रतिष्ठित नाम है। उपन्यास, कविता एवम्ïआलोचना में उनकी विरल ख्याति है। श्री नेमाड़े मराठी आलोचना में 'देसीवाद’ के प्रवर्तक हैं। 1963 में प्रकाशित 'कोसला’ उपन्यास ने मराठी उपन्यास लेखन में दिशा प्रवर्तन का काम किया। इस उपन्यास ने मराठी गद्य लेखन को पिछली आधी शताब्दी में लगातार चेतना और फॉर्म के स्तर पर उद्वेलित किया। उनके अन्य उपन्यास 'हिंदू’ में सभ्यता विमर्श उपस्थित है। यह कृति काल की आवधारणा की वैज्ञानिक दृष्टि से भाष्य करती है। ग्रामीण से आधुनिक परिसर तक की सामाजिक विसंगतियों को गहराई से अभिव्यक्त करने वाले श्री नेमाड़े मराठी साहित्य की तीन पीढिय़ों के सर्वप्रिय लेखक हैं।‘
पचासवें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित होने वाले भालचंद्र नेमाडे ने कोसला के बाद बिढाल, हूर, जरीला और झूल लिखकर पर्याप्त ख्याति अर्जित की थी । उपन्सकार के साथ साथ कवि और आलोचक भी हैं । नेमाडे ने मेलड़ी और देखणी कविता के जरिए भी अपार लोकप्रियता हासिल की थी । बहुमुखी प्रतिभा के धनी नेमाडे ने साहित्य की लगभग हर विधा में लेखन किया । उपन्यास और कविता के अलावा उन्होंने आलोचना के क्षेत्र में सार्थक हस्तक्षेप किया । आलोचना की उनकी कई किताबें प्रकाशित हैं जिनमें टीकास्वयंवर, साहित्याची भाषा प्रमुख हैं । 1999 में टीकास्वयंवर पर उन्हें प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिल चुका है । नेमाडे को पद्मश्री से भी सम्नानित किया जा चुका है । 27 मई उन्नीस सौ अड़तीस में खानदेश के एक गांव में पैदा हुए भालचंद्र नेमाडे ने पुणे के मशहूर फर्गुयसन कॉलेज से ग्रेजुएट और मुंबई विश्वविद्लाय से एम किया । पीएचडी और डी लिट करने के बाद भालचंद्र नेमाडे ने अहमदनगर, धुले और औरगंबाद युनिवर्सिटी में मराठी साहित्य पढ़ाने का काम किया । उसके बाद वो लंदन के मशहूर स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंज अफ्रीकन स्टडीज मे पढ़ाने चले गए । कालांतर में उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय के गुरुदेव टैगोर तुलनात्मक साहित्य चेयर की अध्यक्षता भी की और वहीं से रिटायर हुए । भालचंद्र नेमाडे के बारे में उनके प्रकाशक ने बेहतरीन टिप्पणी की है । उसके मुताबिक नेमाडे लोकप्रिय साहित्य नहीं लिखते लेकिन फिर भी उनका साहित्य बेहद लोकप्रिय है । किसी भी लेखक के लिए यह टिपप्णी किसी पुरस्कार से कम नहीं है । ज्ञानपीठ से सम्नानित होने पर नेमाडे को बधाई