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Thursday, June 30, 2016

स्वामी के खेल

सुब्रह्मण्य स्वामी भारतीय राजनीति का वो खिलाड़ी है जो अपने बयानों और सियासी कदमों से देशभर को चौंकाते रहता है । अर्थशास्त्र का ये प्रोफेसर सियासी दांव पेंच में भी फॉर्मूले फिट करता रहा है । कई सियासी दलों की यात्रा करने के बाद स्वामी की घर वापसी हुई है । कभी राजीव गांधी के बेहद करीबी रहे स्वामी अब सोनिया और राहुल गांधी के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं । कभी अटल बिहारी वाजपेयी के धुर विरोधी रहे स्वामी इन दिनों बीजेपी के आंखों के तारे हैं । पाठकों को याद होगा कि स्वामी जब राज्यसभा के लिए मनोनीत किए गए तो अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर पर बहस के दौरान पार्टी ने उनको अपने सभी सांसदों का वक्त मिलाकर दे दिया ताकि स्वामी कांग्रेस पर लंबे वक्त तक तीखे वार कर सके । बीजेपी के इस कदम ने स्वामी के हौसले बुलंद कर दिए । स्वामी अपने स्तरहीन बयानों के लिए भी जाने जाते हैं जैसे ट्विटर पर वो सोनिया गांधी को जिस नाम से संबोधित करते हैं वो सियासत की मर्यादा के बिल्कुल खिलाफ है । संसद में पार्टी के उस समर्थन के बाद स्वामी उस राह पर चल पड़े जहां सिर्फ टकराव की गुंजाइश बनती है । वो सरेआम ये कहने लगे कि वो सीधे पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से निर्देश लेते हैं और आगे भी ऐसा करेंगे । ऐसा करके वो राज्यसभा में नेता सदन अरुण जेटली को संदेश दे रहे थे कि सदन में भी वो उनकी बात नहीं मानेंगे । अरुण जेटली पार्टी का सौम्य, पढ़ा लिखा और नो नॉनसेंस चेहरा है । स्वामी दूर की कौड़ी लाने में भी माहिर हैं, कई बार वो कौड़ी सही भी होती है लेकिन बहुधा वो बस कौड़ी ही रह जाती है । रिजर्व बैंक के काबिल गवर्नर रघुराम राजन का कार्यकाल सितंबर में खत्म होनेवाला था पर स्वामी ने अरुण जेटली पर परोक्ष रूप से हमला करने के लिए राजन को चुना और एक के बाद एक हमले किए । सौम्य राजन ने स्वामी के आरोपों पर कुछ नहीं कहा लेकिन गरिमापूर्ण तरीके से अपने पद छोड़ने का एलान कर दिया । रघुराम राजन के इस कदम ने स्वामी को अगले कदम के लिए उकसाया और उन्होंने वित्त मंत्रालय के सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम और एक अन्य अधिकारी पर हमला बोला । वित्त मंत्री होने के नाते अरुण जेटली ने अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानते हुए दोनों का बचाव किया लेकिन स्वामी ने फिर जेटली से क्या लेना देना वो तो पीएम और अमित शाह को जानते हैं जैसा बयान दे डाला । और तो और उन्होंने इशारों इशारों में अरुण जेटली पर बिलो द बेल्ट हमला बोला और कहा कि विदेश जानेवाले नेताओं को सूट टाई नहीं पहननी चाहिए क्योंकि उसमें वो वेटर जैसे दिखते हैं । कुछ ही वक्त पहले टीवी चैनलों पर अरुण जेटली की चीन से सूट टाई में भाषण देती तस्वीरें आई थी । जब पानी सर से उपर जाने लगा तो खबरों के मुताबिक अरुण जेटली ने चीन का दौरा एक दिन पहले खत्म किया और प्रधानमंत्री से मिलने का वक्त मांग लिया ।
इन सारे सियासी घटनाक्रम के बीच प्रधानमंत्री ने अपने एक इंटरव्यू में स्वामी को सार्वजनिक रूप से नसीहत ही नहीं दी बल्कि कड़ा संदेश दे दिया कि वो अपनी सीमाओं में रहें और संगठन और व्यवस्था से बड़ा कोई नहीं होता है । लेख लिखे जाने तक स्वामी खामोश हैं । सवाल खामोशी या उनकी प्रतिक्रिया का नहीं है सवाल यह है कि स्वामी का स्वामी आखिर कौन है । किसके इशारे पर स्वामी वित्त मंत्री अरुण जेटली को निशाना बना रहे हैं । कहीं से तो स्वामी को ताकत मिल रही है । सियासी हलकों में इस बात की चर्चा होती है कि स्वामी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आशीर्वाद प्राप्त है । जब स्वामी को राज्यसभा में मनोनीत किया गया था तब भी ये बात आई थी या फैलाई गई थी कि स्वामी संघ की पसंद हैं । लेकिन इस तरह की बातें करनेवाले संघ के क्रियाकलापों को बेहतर तरीके से जानते नहीं हैं । संघ को अगर अरुण जेटली से कोई शिकायत होगी तो वो कम से कम उसको दूर करने के लिए स्वामी को तो नहीं लगाएंगें । जब स्वामी ने एक किताब में अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में बेहद आपत्तिजनक बातें कही थी तब भी इसी तरह के कयास लगाए जा रहे थे । अटल जी जबतक सक्रिय रहे उन्होंने स्वामी को हाशिए पर रखा । दऱअसल अगर स्वामी के करियर को विश्लेषित किया जाए तो ये नतीजा निकलता है कि जबतक उनको पद नहीं मिलता है वो बेचैन रहते हैं राजीव गांधी से लेकर जयललिता से लेकर हर सरकार से उनकी अदावत की लगभग यही वजह रही है । और बेचैनी किसी भी मनुष्य को कुछ भी करने को बाध्य करती है । बेचैनी के आलम में अगर उसको कोई भी बाधा नजर आती है तो वो हमलावर हो जाता है । स्वामी इसी बेचैन सिंड्रोम के शिकार नजर आते हैं । राज्यसभा के सदस्य बनने के लिए उन्होंने तमाम जतन किए, इसमें कोई बुराई भी नहीं है । रायसीना हिल्स में ये चर्चा है कि स्वामी वित्त मंत्री बनना चाहते हैं इसलिए वो अरुण जेटली की ओर बयानों के तीर चला रहे हैं । लेकिन पद की लालसा में अगर कोई मर्यादा भूल जाता है तो उसको उसकी सही जगह दिखाने का दायित्व प्रधानमंत्री का होता है और उन्होंने इसका निर्वाह किया ।

Thursday, August 16, 2012

रामदेव का संघ योग



दिल्ली के रामलीला मैदान में भगवा वेश धारी बाबा रामदेव का आंदोलन खत्म हो गया और वो वापस अपने घर हरिद्वार लौट गए हैं । रामदेव इस बार के अपने आंदोलन से बेहद खुश हैं और अंबेडकर स्टेडियम से निकलने के पहले अपनी जीत की दुंदुभि बजाते हुए हरिद्वार रवाना हुए । उनके समर्थक भी ये प्रचारित कर रहे हैं कि रामदेव ने पिछले साल रामलीला मैदान से अनशन के बीच से औरत का वेश धारण कर भागने का दाग अपने दामन से छुड़ा लिया है । जयघोष और जीत के इस जश्न के बीच रामदेव और उनके समर्थक ये भूल गए कि दिल्ली में छह दिनों तक के आंदोलन का आकलन होना शेष है । पिछले साल जब जून में रामदेव दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे थे तो सत्याग्रह ज्यादा दिन टिक नहीं पाया था और वो पुलिस के डर से वहां से भागते धरे गए थे । रामदेव ने उस वक्त दलील दी थी कि अगर वो वहां से भागने का प्रयास नहीं करते तो पुलिस उन्हें मार डालती । रामदेव के मैदान छोड़कर भागने और उसके बाद जान से मार डालने की दलील से उनकी जमकर फजीहत हुई थी । अपनी उस फजीहत को रामदेव भूले नहीं थे । इसलिए इस बार वो पुलिस के सामने सीना तानकर खड़े थे औऱ उनसे बहस भी कर रहे थे । उन्हें ये बात समझ में आ गई थी कि चौबीस घंटों के समाचार चैनलों के दौर में फर्जी मुठभेड़ लगभग नामुमकिन है । अब सवाल यह उठता है कि रामदेव को इस बार दिल्ली में छह दिन के आंदोलन से क्या हासिल हुआ । रामदेव पिछले दो तीन सालों से काला धन के खिलाफ देशभर में मुहिम चला रहे हैं । इस बार वो अपने आंदोलन के एक दिन पहले तक ये बताने को तैयार नहीं थे कि उनकी मांगे क्या है । वो अनशन कर रहे हैं या आंदोलन । लगातार सस्पेंस बनाए रखने और धीरे-धीरे खोलने की रणनीति पर काम रहे थे । पहले दिन रामदेव ने लगभग घंटेभर के अपने भाषण में देश दुनिया के तमाम मुददे गिनाए और सरकार से उन सभी पर त्वरित कार्रवाई की मांग की । रामदेव ने काले धन के अलावा अन्ना हजारे की मांगों मसलन लोकपाल, सिटीजन चार्टर, ज्यूडिशियल अकाउंटिबिलिटी बिल के अलावा देश के प्राकृतिक संसाधनों की लूट को रोकने की मांग की । उन्होंने ना केवल अन्ना की मांगों को अपनी मांगों में शामिल किया बल्कि अन्ना की टोली के अहम सदस्य अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधते हुए कहा कि शुगर के मरीज शिकंजी पिएं । गौरतलब है कि अरविंद शुगर के मरीज हैं । इसमें कोई दो राय नहीं कि योग शिविरों में भाषण देते देते रामदेव ने जनता से बेहतरीन संवाद करने की कला मै महारात हासिल कर ली। अब अगर हम पहले दिन के भाषण को देखें तो रामदेव ने कांग्रेस समेत किसी भी दल के नेता के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया बल्कि सोनिया गांधी को तो सोनिया माता और राहुल को राहुल भाई कहकर संबोधित किया । पहले दिन तो रामलीला मैदान में ठीक ठाक भीड जुटी थी लेकिन बाद में के दो दिनों में भीड़ अपेक्षा से कम जुटने से रामदेव और उनके रणनीतिकार बौखला गए । इसी बौखलाहट में वो मीडिया पर गलत कवरेज का आरोप जड़ बैठे और कहा कि मीडिया कम भीड़ की बात को प्रचारित कर रहा है । लेकिन कम भीड़ से रामदेव और उनके सिपहसलारों के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी । रामदेव के भाषण का ओज निस्तेज होने लगा था । हताशा और निराशा उनकी बॉडी लैंग्वेज में साफ झलकने लगी थी । पिछली बार जिस सरकार के चार बड़े मंत्री रामदेव की अगवानी के लिए एयरपोर्ट गए थे वही सरकार इस बार रामदेव की उपेक्षा पर उतारू थी । तीसरे दिन तक आंदोलन के बेअसर होने के आसार बनने लगे थे ।
कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार से जब किसी तरह की कोई पहल नहीं हुई तो रामदेव ने अन्य दलों का दरवाजा खटखटाना शुरू किया । आरएसएस में रामदेव के समर्थकों ने भी दिल्ली से लेकर हरिद्वार तक में आपात बैठकें हुई। संघ की तरफ से जनता पार्टी के अध्यक्ष और आजकल बीजेपी की आंखों के तारे सुब्रहम्ण्यम स्वामी सक्रिय हो गए । फिर तय हुआ कि भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के संयोजक शरद यादव रामदेव के मंच पर आएंगे । एक राष्ट्रीय पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष किसी आंदोलन के मंच पर जा रहा होता है तो उस पार्टी और उसके जुड़े संगठनों का दायित्व होता है कि उनको सुनने के लिए भीड़ का इंतजाम किया जाए । ना सिर्फ प्रमुख विपक्षी पार्टी का अध्यक्ष बल्कि प्रमुख विपक्षी गठबंधन का संयोजक भी जा रहा हो तो ये दायित्व और बढ़ जाता है । लिहाजा जब रामदेव के आंदोलन के चौथे दिन नितिन गडकरी और शरद यादव रामदेव के मंच पर पहुंचे तो रामलीला मैदान में ठीक ठाक भीड़ जमा कर दी गई थी । प्रत्यक्ष रूप से गडकरी और शरद यादव का साथ मिलने से बाबा बम बम करने लगे । यहां से रामदेव के बॉडी लैंग्वेज में साफ तौर पर बदलाव को लक्षित किया जा सकता था । अब जब गडकरी और शरद यादव मंच पर हों तो सोनिया गांधी को माता तो कहा नहीं जा सकता है लिहाजा रामदेव ने आक्रामक अंदाज में कांग्रेस पर जमकर हमला बोला और उसे देश की सबसे भ्रष्ट पार्टी करार देते हुए जनता से उसे हराने की अपील तक कर डाली । मनमोहन सिंह पर भी जमकर हमला बोला । मंच पर स्वामी के साथ गलबहियां करते मौजूद जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर बेहद संगीन इल्जाम मढे ।

अबतक जो कुछ पर्दे के पीछे था वो आईने की तरह साफ हो गया कि रामदेव का एक राजनैतिक एजेंडा है और वो उसी पर काम कर  रहे हैं । रामदेव का राजनैतिक एजेंडा वही है जो संघ के रणनीतिकार तय कर रहे हैं । संघ को लगता है कि बीजेपी नेताओं की साख उतनी नहीं रही कि केंद्र में सरकार बनाई जा सके । महंगाई के खिलाफ दो साल पहले बीजेपी के देशव्यापी आंदेलन का हश्र वो देख चुके थे । लिहाजा पहले अन्ना और बाद में रामदेव को साथ लेकर आगे बढ़ने की रणनीति पर काम शुरू हुआ । संघ हमेशा से दूसरों का इस्तेमाल बीजेपी को स्थापित करने में करते आया है चाहे वो जयप्रकाश नारायण हों या विश्वनाथ प्रताप सिंह । कभी प्रत्यक्ष तो कभी परोक्ष रूप से आंदोलनों से जुड़कर बीजेपी को फायदा पहुंचाता है । रामदेव ने कहा कि 2014 के चुनाव में कांग्रेस को हराना है लेकिन किसे जिताना है उस बारे में चुनाव के पहले बताएंगे । रामदेव को अब जनता को बताने की जरूरत नहीं है । जनता समझ उनकी मंशा और राजनीति दोनों समझ चुकी है । मुमकिन है रामदेव खुलकर चुनावी मैदान में ना आएं लेकिन अपनी राजनैतिक महात्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए वो बीजेपी से टिकटों का मोलतोल जरूर करेंगे तब शुरू होगा असली खेल । जिसके सूत्रधार ना तो रामदेव होंगे और ना ही गडकरी । सब कह रहे होंगे संघम शरण गच्छामि

Saturday, December 17, 2011

संकट में हॉवर्ड की प्रतिष्ठा ?

दुनिया के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक हॉवर्ड युनिवर्सिटी इऩ दिनों विवादों में घिर गया है। विश्वविद्यालय के दो निर्णयों की दुनियाभर में आलोचना हो रही है । पहला निर्णय तो भारतीय राजनेता और अर्थशास्त्री सुब्रह्ण्यम स्वामी को गर्मी के दौरान चलने वाले अर्थशास्त्र के दो पाठ्यक्रम के शिक्षण से हटा देने का है । गौरतलब है कि सुब्रह्ण्यम स्वामी पिछले कई सालों से हॉवर्ड के समर स्कूल में अर्थशास्त्र पढ़ा रहे थे । स्वामी को वहां से निकालने के पीछे जो तर्क दिया गया है वह यह है कि उन्होंने एक लेख लिखा जिसकी वजह से एक खास समुदाय की प्रतिष्ठा धूमिल हुई और उस समुदाय के पवित्र स्थलों को लेकर अपमानजनक और हिंसा भड़कानेवाली टिप्पणी की गई । विश्वविद्यालय के शिक्षकों और वहां के कर्ताधर्ताओं के बीच हुई लंबी बैठक में गर्मागर्म बहस के बाद यह फैसला लिया गया कि हॉवर्ड युनिवर्सिटी का यह नैतिक दायित्व है कि वह किसी भी ऐसे व्यक्ति या संस्था के साथ नहीं जुड़े जो किसी अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ घृणा फैलाता हो । विश्वविद्यालय के शिक्षकों के बीच चली बहस में कई लोगों को इस बात पर आपत्ति थी कि स्वामी का लेख अभिवयक्ति की आजादी नहीं बल्कि घृणा की राजनीति का हिस्सा है, लिहाजा हॉवर्ड से स्वामी को हटा दिया जाना चाहिए ।
दरअसल यह पूरा विवाद सुब्रह्ण्यम सावमी के 16 जुलाई को लिखे एक लेख से शुरू हुआ जिसका शीर्षक था- हाउ टू वाइप आउट इस्लामिक टेरर । अपने उस लेख में स्वामी ने लिखा कि भारत को एक संपूर्ण हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाना चाहिए और वहां उन्हीं लोगों को वोट देने का अधिकार मिले जो यह ऐलान करें कि उनके पूर्वज हिंदू थे । स्वामी ने अपने लेख में यह भी लिखा कि हिंदू धर्म से किसी भी धर्म में धर्मांतरण की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। स्वामी इतने पर भी नहीं रुके और अपने लेख में उन्होंने मांग कर दी कि काशी विश्वनाथ मंदिर समेत तीन सौ अन्य स्थानों से विवादास्पद मस्जिदों को हटाया जाए । जब यह लेख प्रकाशित हुआ तो उसपर जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई और पक्ष-विपक्ष में तर्क-वितर्क शुरू हो गया । हॉवर्ड ने भी पहले स्वामी के इस लेख को अभिव्यक्ति की आजादी माना और उनके ही साथ खड़ा दिखा । शुरूआत में हॉवर्ड प्रशासन को यह लेख फ्रीडम ऑफ स्पीच की कैटिगरी में दिखाई दिया । लेकिन चंद छात्रों ने स्वामी के खिलाफ विश्वविद्यालय में अभियान छेड़ दिया । उस अभियान में इस बात पर जोर दिया गया कि स्वामी ने हॉवर्ड की प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचाया है लिहाजा विश्वविद्यालय स्वामी के साथ अपने संबंधों को खत्म करे ।
चंद छात्रों की इस मुहिम के आगे विश्व के इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय ने अपने सदियों पुराने सिद्धांतो से समझौता कर लिया । पहले जो लेख विश्वविद्यालय को फ्रीडम ऑफ स्पीच दिख रहा था वही लेख चंद छात्रों और दो तीन वामपंथी रुझान वाले शिक्षकों की अगुवाई वाले मुहिम के बाद घृणा फैलानेवाले लगने लगा । युनिवर्सिटी प्रशासन ने स्वामी के इस लेख को घृणा फैलानेवाले वैसा लेख माना जो हिंसा के लिए उकसाता है । यह सही है कि हॉवर्ड हमेशा से उस सिद्धांत के तहत काम करता है जहां विश्व में एक ऐसे समाज की कल्पना की जाती है जहां पूरी दुनिया के संस्कृति के लोग मिलजुलकर रह सकें । लेकिन वहीं हॉवर्ड में अभिवयक्ति की आजादी को सर्वोपरि भी माना जाता है । विश्वविद्यालय की जो फ्री स्पीच गाइडलाइंस है उसके अनुसार स्वामी के खिलाफ लिया गया निर्णय न सिर्फ अनुचित है बल्कि खुद हॉवर्ड के बनाए गए गाइडलाइंस का उल्लंघन भी है । 15 मई 1990 में हॉवर्ड में युनिवर्सिटी फ्री स्पीच गाइडलाइंस तैयार किया जो यह कहता है कि अभिव्यक्ति की आजादी विश्वविद्यालय के लिए इस वजह से बेहद अहम है क्योंकि हमारा समूह कारण और तर्कों पर आधारित डिस्कोर्स की वकालत करता है । अपने विचारों को बगैर किसी दवाब के सबके सामने रखना हमारी प्राथमिकता है । किसी भी व्यक्ति के विचारों को दबाना या फिर उसमें काट छांट करने से हमारी बौद्धिक स्वतंत्रता के विचारों को ठेस पहुंचा सकता है । यह किसी वयक्ति के उन विचारों को भी सामने आने से रोकता है जिसमें उसके विचार बेहद अलोकप्रिय हों और किसी समुदाय को पसंद नहीं आते हों । साथ ही उस खास समुदाय को भी अपनी आलोचना सुनने के अधिकार से वंचित करता है ।
विश्वविद्यालय के इस गाइडलाइंस में और भी बातें कही गई हैं जो बहुत ही मजबूती से विचारों को अभिव्यक्त करने की इजाजत देता है । लेकिन अपने ही गाइडलाइंस को दरकिनार करते हुए स्वामी को कोर्स से हटा देना कई सवाल खड़े करता है । सवाल तो इस बात पर भी खड़े हो रहे हैं कि सुब्रह्ण्यम स्वामी से इस बाबत कोई सफाई नहीं मांगी गई न ही उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका दिया गया । दशकों से हॉवर्ड का हिस्सा रहे एक भारतीय विद्वान के साथ इस तरह का व्यवहार बेहद अफसोसनाक और हॉवर्ड के प्रतिष्ठा के खिलाफ होने के साथ साथ न्याय के प्राकृतिक सिद्धांत के खिलाफ भी है । हॉवर्ड में हर तरह के विचारों को जगह मिलती रही है । वहां के कई शिक्षकों ने एशियाई देशों के खिलाफ कई आपत्तिजनक लेख लिखे, हिंदू धर्म और देवी देवताओं के बारे में टिप्पणियां की, लेकिन कभी कोई कार्रवाई नहीं हुई । शोध के नाम पर लिखे गए लेखों में भारतीय संस्कृति और सभ्यता की धज्जियां उड़ाई गई लेकिन उन सबको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आईने में देखा गया,कभी किसी लेखक के खिलाफ युनिवर्सिटी ने कोई कार्रवाई नहीं की । छात्रों और शिक्षकों के किसी समूह ने कोई विरोध नहीं किया ।
स्वामी ने भी भारत के एक अखबार में लिखकर अपने विचारों को प्रकट किया है । वो भारत को हिंदू राष्ट्र के तौर पर देखना चाहते हैं इसमें क्या बुराई है । ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं और अपने विचार बनाना और उसे प्रकट करना हर व्यक्ति का हक है । भारत और विदेशों में भी कई ऐसे लोग मिल जाएंगे जो भारत को हिंदू राष्ट्र के तौर पर देखना चाहते हैं । विवादास्पद मस्जिदों को मंदिर परिसरों से हटाने की वकालत तो भारत का प्रमुख विपक्षी दल भी करता है और भारत के एक बड़े समुदाय का यह मत भी है । तो अगर स्वामी ने अपने मत को जाहिर कर दिया तो क्या गुनाह कर दिया । तीसरी बात स्वामी ने धर्मांतरण के खिलाफ कही है वह भी उनका निजी विचार है और उसपर किसी भी तरह की पाबंदी लगाना जायज नहीं कहा जाएगा । आप उनको अपने विचारों को प्रकट करने से नहीं रोक सकते, असहमत हो सकते हैं । लेकिन असहमति का दंड लेखक को देना हॉवर्ड विश्वविद्यालय के खुद के गाइडलाइंस और फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन के सिद्धांत के खिलाफ है । हॉवर्ड ने तो स्वामी से बगैर कुछ पूछे, बगैर उनका पक्ष जाने उनको अपने कोर्स से हटा दिया ।
दूसरी अहम बात जो हॉवर्ड की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाता है वह यह है कि विश्वविद्यालय ने ऑक्यूपॉय मूवमेंट के आंदोलन के मद्देनजर विश्वविद्यालय के हॉवर्ड यॉर्ड को बाहरी गतिविधियों के लिए बंद कर दिया । यह एक ऐसी जगह थी जहां छात्र, पर्यटक,सामाजिक सूमह आते थे ,बैठते थे, बहस मुहाबिसे करते थे और चले जाते थे । दशकों से वहां ऐसी परंपरा चल रही थी और हॉवर्ड यार्ड कई आंदोलनों का गवाह भी रहा है । लेकिन आरोप है कि अमेरिका में जारी ऑक्यूपॉय मूवमेंट को रोकने के लिए विश्वविद्यालय ने यह कदम उठाया । इन दो कदमों से विश्वविद्यालय की अभिवयक्ति की आजाजदी के समर्थक की उस उस छवि को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ठेस पहुंची है जिसके लिए वह जाना जाता है । जरूरत इस बात कि है कि विश्वविद्यालय अपने पुरानी परंपरा की ओर लौटे और विचारों को बैखौफ होकर अभिव्यक्त करनेवालों को मंच प्रदान करे । अंतराष्ट्रीय जगत को इस बात का इंतजार भी है कि हॉवर्ड अपनी गलतियों को सुधारे और स्वामी से माफी मांगे और हॉवर्ड यॉर्ड पर लगाई गई पाबंदी को हटाए ।