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Saturday, April 9, 2022

संस्थाओं में सुधार समय की मांग


मलयालम फिल्म के एक निर्देशक हैं अदूर गोपालकृष्णन। मलयालम में नई तरह की फिल्म बनाने को लेकर उनकी ख्याति रही है। कई राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं। पद्मश्री और पद्मविभूषण से भी सम्मानित हैं। देश विदेश की फिल्मों से जुड़ी संस्थाओं से किसी न किसी रूप में जुड़े रहे हैं। इंटरनेट मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार इमरजेंसी के दौर (1975-1977) में पुणे के भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान के निदेशक रह चुके हैं। फिल्मों से जुड़ी कई संस्थाओं की समितियों में भी लंबे समय तक रहे हैं। ये सब बताने का आशय ये है कि अदूर गोपालकृष्णन का फिल्मों से जुड़ी संस्थाओं के प्रशासन आदि का लंबा अनुभव है। कई बार होता है कि अनुभवों की थाती को लेकर चल रहा व्यक्ति समय के साथ आनेवाले बदलाव की आहट को भांप नहीं पाता है। अदूर गोपालकृष्णन के साथ भी यही होता प्रतीत हो रहा है। वो इन दिनों सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अलग अलग विभागों के पुनर्गठन के फैसले की आलोचना कर रहे हैं। उनको लगता है कि केंद्र सरकार का ये फैसला अनुचित है। उनका मानना है कि इन सभी संस्थाओं को वर्तमान स्वरूप में ही काम करने दिया जाए। दरअसल जब वो इस तरह की बात करते हैं तो ये स्पष्ट हो जाता है कि बदलते हुए समय को पहचान नहीं पा रहे हैं। मनोरंजन की दुनिया या उसके प्रशासन से जुड़े तौर-तरीके अब वो नहीं रहे जो उदारीकरण के पहले हुआ करते थे। उदारीकरण और अब महामारी के दौर के बाद मनोरंजन की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है। इस बदले हुए दौर को पहचानना और उसके हिसाब से कार्य करना सरकार का दायित्व है।  

सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत फिल्मों से सबंधित कई ऐसे विभाग हैं जिनका गठन उदारीकरण के दौर के पहले हुआ था। फिल्म प्रभाग, बाल चित्र समिति (चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी), फिल्म समारोह निदेशालय, नेशनल फिल्म आर्काइव और राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम। इनके गठन के समय की मांग के अनुसार इन विभागों के दायित्व तय किए गए थे। समय बदला, सिनेमा के व्याकरण से लेकर उसके तकनीक तक में आमूल चूल बदलाव आया। फिल्मों से संबंधित इन सरकारी संस्थाओं में अपेक्षित बदलाव नहीं हो पाया। समय के साथ नहीं चल पाने की वजह से इनमें से कई संस्थाएं अपने मूल उद्देश्यों से भटक गईं। एक ही काम कई संस्थाएं करने लग गईं। चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी, फिल्म समारोह निदेशालय और फिल्म प्रभाग अलग-अलग तरह से फिल्म फेस्टिवल का आयोजन करते हैं। कोई संस्था बच्चों की फिल्मों का फेस्टिवल आयोजित करती है तो कोई फीचर फिल्मों और कोई शार्ट फिल्म और एनिमेशन को लेकर फिल्मोत्सव आयोजित करती हैं।देश में फिल्म संस्कृति के विकास और दूसरे देशों के साथ सांस्कृतिक आदान प्रदान का कार्यक्रम भी दो संस्थाएं चलाती हैं। फिल्म प्रभाग, चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी और राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम फिल्मों के निर्माण और उसके प्रोत्साहन का कार्य करती हैं। कहने का तात्पर्य ये है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आनेवाले विभागों में कामों को लेकर दोहराव है। एक ही मंत्रालय के अलग अलग विभाग एक ही काम करते हैं, जिससे करदाताओं के पैसे का अपव्यय होता है। 

अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे तब भारत सरकार की एक समिति ने इन संस्थाओं में युक्तिसंगत बदलाव की सिफारिश की थी। उस समय कोई ठोस निर्णय नहीं हो सका था। कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार के दस साल के कार्यकाल में यथास्थिति कायम रही। 2016 में नीति आयोग ने फिल्मों से जुड़ी इन संस्थाओं के क्रियाकलापों का अध्ययन कर उससे संबंधित सुझाव दिए थे। फिर एक समिति बनी। समिति ने सुझाव दिए। लेकिन अमल नहीं हो सका। अब सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने इन विभागों के पुनर्गठन के प्रस्ताव को स्वीकार कर इनके कार्यों को युक्तिसंगत बनाने का आदेश दिया है। इसी क्रम में 30 मार्च को फिल्म समारोह निदेशालय से भारतीय अंतराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के आयोजन का काम लेकर फिल्म विकास निगम को सौप दिया गया है। अन्य विभागों को भी पुनर्गठित किया जा रहा है। अदूर गोपालकृष्णन का कहना है कि वो इन संस्थाओं से जुड़े होने की वजह से इनके कामकाज से परिचित हैं। उनका मानना है कि संस्थाओं का विलय करके उसका अस्तित्व समाप्त करने से कला का नुकासन होगा। इस संदर्भ में वो जया बच्चन का उदाहरण देते हैं कि जब वो चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी की अध्यक्ष थीं तो बेहतर फिल्म का निर्माण हुआ था और फिल्म फेस्टिवल भी स्तरीय हुआ था। यहां अदूर गोपालकृष्णन को ये बताना चाहिए था कि उस समय कौन सी ऐसी फिल्म का निर्माण हुआ था जिसने बच्चों की रुचि इस माध्यम में पैदा की थी। क्या अब उन फिल्मों के बारे में किसी को याद है। अगर बनी भी थी तो क्या फिल्म विकास निगम वैसी फिल्में नहीं बना सकता है। अदूर गोपालकृष्णन को ये भी बताना चाहिए कि जब वो पुणे के भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान के अगुवा थे उस समय वो कितनी बार संस्थान गए थे और उसकी कितनी बैठकों में शामिल हुए थे। उस वक्त उनको अनुपस्थित निदेशक क्यों कहा जाता था। 

2011 में जब नेशनल म्यूजियम आफ इंडियन सिनेमा बनाने की योजना बनी थी तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में एक सलाहकार समिति का गठन किया था। उस समिति में अदूर गोपालकृष्णन भी सदस्य थे। उसके बाद 2017 में सरकार ने प्रोक्यूरमेंट (खरीद) कमेटी बनाई जिसमें भी अदूरगोपालकृष्णन थे। अदूर गोपालकृष्णनको बताना चाहिए कि सलाहकार समिति ने 2019 तक क्या काम किया। क्या उस वक्त अदूर गोपालकृष्णन ने सरकार को ये सलाह दी थी कि पुणे की फिल्म आर्काइव को ही म्यूजियम बना दिया जाए। नौ वर्षों में सलाहकार समिति की बैठकों पर करदाताओं का कितना व्यय हुआ। बताना तो ये भी चाहिए कि सलाहकार समिति के रहते 2017 में  म्यूजियम की गुणवत्ता में सुधार के लिए नई समिति का गठन क्यों करना पड़ा। जिसके बाद म्यूजियम आकार ले सका। फिल्म विकास निगम ने समांतर सिनेमा या न्यू वेव सिनेमा के नाम पर जिस प्रकार के फिल्मों को वित्तीय सहायता दी उसका भी आकलन किया जाना चाहिए। दरअसल जब फिल्मों और उससे जुड़ी संस्थाओं में सुधार की बात होती है तो एक पूरा इकोसिस्टम उसके खिलाफ हो जाता है। अदूर गोपालकृष्णन उसी इकोसिस्टम के हिस्सा हैं। उन्होंने पहली बार इसका विरोध नहीं किया है । जब से नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं और फिल्मों की संस्थाओं पर कुंडली जमाकर बैठे एक विचारधारा विशेष के लोगों को चुनौती मिलने लगी तभी से इस तरह की बातें सामने आने लगी हैं। कहा जाने लगा कि वर्तमान सरकार का फिल्मों के प्रति रवैया नकारात्मक और विध्वंसात्मक है। अब ये लोग संस्थाओं के पुनर्गठन को संस्कृति के संरक्षण और क्षरण से जोड़कर प्रचारित कर रहे हैं। 

अदूर गोपालकृष्णन और उन जैसे लोगों को ये समझना होगा कि तकनीक के आगमन के बाद फिल्मों से जुड़ी पुरानी संस्थाओं के कार्य की समीक्षा आवश्यक है। अगर फिल्म विकास निगम फिल्म बनवाने में सक्षम है या उसके पास फिल्म बनाने या फिल्म निर्माण को प्रोत्साहित करने का मैंडेट है तो फिर दूसरी सरकारी संस्था फिल्म क्यों बनाए। क्यों नहीं फिल्म विकास निगम ही बच्चों की फिल्मों के निर्माण का कार्य करे। क्यों नहीं एक सरकारी संस्था सभी तरह के फिल्म फेस्टिवल का आयोजन करे। सूचना और प्रसारण मंत्रालय को पुर्नगठन और इन संस्थाओं में प्रशासवनिक सुधार के कार्य को तेज करना चाहिए। मंत्रालय के अधीन आनेवाले विभाग सांग और ड्रामा डिवीजन एवं प्रकाशन विभाग की उपोगिता पर भी पुनर्विचार करना चाहिए। उन्नत तकनीक के इस दौर में इन संस्थाओं के मैंडेट को भी बदले जाने की आवश्यकता है। 


Saturday, October 31, 2020

विसंगतियों की जकड़न में फिल्म विभाग


कोविड काल में कई महीनों तक सिनेमा हॉल बंद रहने के बाद जब खुला तो एक दिन सोचा कि फिल्म देखने चला जाए। पहुंचा। कम लोग थे। थोड़े इंतजार के बाद फिल्म का प्रदर्शन शुरू हुआ। फिल्म के पहले कुछ विज्ञापन भी चले। राष्ट्रगान भी हुआ। राष्ट्रगान खत्म हुआ तो दिमाग में एक बात कौंधी। कई साल पहले सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने के पहले फिल्म प्रभाग, भारत सरकार की शॉर्ट फिल्में चला करती थीं। इन फिल्मों में भारत सरकार की उपलब्धियों का बखान होता था। देश के प्रधानमंत्री के कामों को उनके देश विदेश के दौरों को दिखाया जाता था। अगर वो किसी महत्वपूर्ण इमारत का शिलान्यास आदि करते थे को उसको भी इन फिल्मों में दिखाया जाता था। सिर्फ सिनेमाघरों में ही नहीं बल्कि विद्यालयों आदि में जब साप्ताहिक फिल्मों का प्रदर्शन होता था तब भी फिल्म प्रभाग की ये छोटी फिल्में चला करती थीं। ये वो दौर था जब स्कूलों में छात्रों को हर महीने के तीसरे या चौथे शुक्रवार को फिल्में दिखाई जाती थीं। भारत सरकार का फिल्म प्रभाग ही इसका आयोजन करती थी और स्कूलों में पर्दा और प्रोजेक्टर लगाकर फिल्में दिखाई जाती थीं। फिल्मों के पहले दिखाई जाने वाली फिल्म प्रभाग की ये छोटी छोटी प्रमोशनल फिल्में इस तरह से पेश की जाती थीं कि दर्शकों को लगता था कि उसमें दिखाई जानेवाली उपलब्धियां देश की हैं। जबकि परोक्ष रूप से वो उस समय के प्रधानमंत्रियों की छवि चमकाने का काम करती थी।

महेन्द्र मिश्र ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय सिनेमा’ में लिखा है, ‘सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत फिल्म्स डिवीजन की स्थापना 1948 में हुई। फिल्म्स डिवीजन उस समय शायद दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक केंद्र था जिसमें समाचार और अन्य राष्ट्रीय विषयों पर वृत्तचित्र बनाए जाते थे। ये वृत्तचित्र, समाचार चित्र और लघु फिल्में पूरे देश में प्रदर्शन के लिए बनती थीं। प्रत्येक फिल्म की नौ हजार प्रतियां बनती थीं जिनकी संख्या कभी कभी चालीस हजार तक पहुंच जाती थीं। ये भारत की तेरह प्रमुख भाषाओं और अंग्रेजी में पूरे देश में सभी सिनेमाहॉलों में मुफ्त प्रदर्शित की जाती थीं। समाचर चित्रों और लघु फिल्मों एवं वृत्तचित्रों का परोक्ष रूप से दर्शकों पर व्यापक प्रभाव पड़ा जिसने उनकी रुचि बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।‘  

दर्शकों पर व्यापक प्रभाव और रुचि बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका की बात, हो सकता है, महेन्द्र जी सिनेमा के संदर्भ में कह रहे हों लेकिन इस बात पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए कि इन लघु फिल्मों के माध्यम से राजनीतिक हित कितने सधे। किसके सधे। जब फिल्म प्रभाग की न्यूज रील चला करती थी और नेहरू जी, इंदिरा जी और राजीव जी के सर भारत की तमाम उपलब्धियों का सेहरा बंधता था तो दर्शकों पर उसका क्या प्रभाव पड़ता होगा। स्कूली छात्रों पर उसका कितना और कैसा प्रभाव पड़ता होगा। किस तरह से राजनीतिक रुचि बदलती होगी?  फिल्म प्रभाग की स्थापना तो इस उद्देश्य से की गई थी कि ये देश में फिल्मों की संस्कृति को विकसित और मजबूत करेगा। लेकिन अपनी स्थापना के शुरुआती दिनों से लेकर उदारीकरण के दौर शुरू होने से पहले तक इसने अपनी ज्यादा ऊर्जा प्रधानमंत्रियों के पब्लिसिटी विभाग के तौर पर काम करने में लगाया। 1991 में जब देश में उदारीकरण का दौर शुरू हुआ तो प्रचार के माध्यमों का स्वरूप भी बदलने लगा। प्रचार के अन्य माध्यम सामने आए तो फिल्म प्रभाग में बनने वाले वृत्तचित्र या समाचार चित्र देश के सिनेमा घरों में कम दिखने लगे। ऐसा प्रतीत होने लगा कि इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों से तालमेल बिठाने में फिल्म प्रभाग पिछड़ गया। बावजूद इसके फिल्म्स डिवीजन अब भी सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वतंत्र विभाग के तौर पर काम कर रहा है।

फिल्म प्रभाग की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक मुंबई मुख्यालय के अलावा दिल्ली, कोलकाता और बेगलुरू में भी इसकी शाखाएं हैं। यहां अब भी दावा किया जा रहा है कि पूरे देश के सिनेमाघरों में लघु फिल्मों का प्रदर्शन किया जाता है। इसके अलावा ये प्रभाग डॉक्यूमेंट्री, शॉर्ट और एनिमेशन फिल्मों के लिए द्विवार्षिक मुंबई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन भी करता है। इसके अलावा पूरे देश में फिल्म फेस्टिवल का आयोजन करना भी इसका एक दायित्व है। इस संस्था का बजट देखने पर पता चलता है कि वित्त वर्ष 2019-20 में केंद्रीय स्कीम के लिए 7.7 करोड़, कर्मचारियों के वेतन पर 41.5 करोड़ और नेशनल म्यूजियम ऑफ इंडियन सिनेमा को चलाने के लिए 2.98 करोड़ रु का प्रावधान रखा गया है। करीब 52 करोड़ रुपए के बजट वाले इस विभाग में कई काम ऐसे हो रहे हैं जो इसी मंत्रालय के दूसरे विभाग में भी हो रहे हैं। जैसे उदाहरण के लिए अगर हम देखें तो फिल्म प्रभाग भी फिल्मों का निर्माण करता है और राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम और चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी भी फिल्मों का निर्माण करती है। फिल्म प्रभाग भी फिल्म फेस्टिवल का आयोजन करता है, चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी भी फिल्म फेस्टिवल का आयोजन करती है और फिल्म फेस्टिवल निदेशालय भी फिल्म फेस्टिवल का आयोजन करता है। कई एक जैसे काम हैं जो सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अलग अलग विभाग करते हैं।

दरअसल अगर हम इसपर विचार करें तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत फिल्मों से सबंधित कई विभाग ऐसे हैं जिनका गठन उदारीकरण के दौर के पहले हुआ था। उस समय की मांग के अनुसार उनके दायित्व तय किए गए थे। समय बदलता चला गया, सिनेमा के व्याकरण से लेकर उसके तकनीक तक में आमूल चूल बदलाव आ गया लेकिन फिल्मों से संबंधित इन संस्थाओं में अपेक्षित बदलाव नहीं हो पाया। अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे तो उस समय भारत सरकार की एक समिति ने इन संस्थाओं में युक्तिसंगत बदलाव की सिफारिश की थी पर उसके बाद कुछ हो नहीं सका। यूपीए के दस साल के शासनकाल में सबकुछ पूर्ववत चलता रहा। 2016 में नीति आयोग ने फिर से इन संस्थाओं के क्रियाकलापों को लेकर कुछ सिफारिशें की थीं। फिर 2017 के अंत में इस तरह की खबरें आईं कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय अपने विभागों के कामकाज को युक्तिसंगत बनाने जा रहा है। फिर कई महीने बीत गए। पिछले साल ये खबर आई कि पूर्व सूचना और प्रसारण सचिव विमल जुल्का की अगुवाई में फिल्म से जुड़े लोगों की एक समिति बनाई गई, राहुल रवैल भी उसके सदस्य थे। उनकी सिफारिशें भी आ गईं। लेकिन उन सिफारिशों का क्या हुआ अबतक सार्वजनिक नहीं हुआ है। सभी विभाग पूर्ववत चल रहे हैं।

दरअसल सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत चलनेवाले और फिल्मों से जुड़े कई विभागों में बेहतर तालमेल की तो जरूरत है ही, उनके कार्यों को भी समय के अनुरूप करने की आवश्यकता है। अब तो फिल्मों का स्वरूप और बदल रहा है। कोविड की वजह से ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म (ओटीटी) लोकप्रिय हो रहे हैं। सिनेमाघरों में लोगों की उपस्थिति कम है। कोविड के भय से मुक्ति के बाद भी ओटीटी की लोकप्रियता कम होगी इसमें संदेह है। बदलते तकनीक की वजह से भी फिल्मों का लैंडस्केप बदलेगा। फिल्म संस्कृति को मजबूती देने और विदेशों में भारतीय फिल्मों को पहचान दिलाने के उद्देश्यों पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।यह तभी संभव है जब मंत्रालय के स्तर पर पहल हो, योजनाएं बनें और उसको यथार्थ रूप देने के लिए उन लोगों का चयन किया जाए जो फिल्मों से जुड़े हों। पिछले दिनों फिल्म और टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे में शेखर कपूर की नियुक्ति सही दिशा में उठाया गया एक कदम है। रचनात्मक कार्य के लिए रचनात्मक लोगों को चिन्हित करके उनको सही जगह देना और राजनीति और लालफीताशाही से मुक्त करना सरकार का प्रमुख दायित्व है।  

Saturday, June 30, 2018

स्थापित उद्धेश्यों से भटकती संस्था

भारत सरकार की एक संस्था है नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएफडीसी)। सूचना और प्रसारण मंत्रालय से संबद्ध इस संस्था की स्थापना उसी वर्ष हुई जिस वर्ष देश में इमरजेंसी लगाई गई थी यानि 1975। ये संस्था पिछले कुछ दिनों से गलत वजहों से चर्चा में है। तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी ने इस संस्था की चीफ नीना लाठ को भ्रष्टाचार के आरोप में हटा दिया था। बाद में नीना कोर्ट चली गईं और मामला वहां विचाराधीन है। इस कार्रवाई के पहले भी इस संस्था की गड़बड़ियों की खबरें आती रहती थी, कभी किसी फिल्म को वित्तीय सहायता देने को लेकर तो कभी किसी छोटे मोटे आयोजन को लेकर। इसके पहले इस तरह की खबरें भी आईं कि एनएफडीसी, चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी ऑफ इंडिया और अन्य फिल्म से संबंधित संस्थाओं को मिलाकर एक नई संस्था बना दिया जाएगा। चर्चा तो इस बात की भी है कि इस बारे में कैबिनेट नोट भी तैयार हो गया था लेकिन चुनावी वर्ष होने की वजह से अब शायद ही इस पर फैसला हो सके। वैसे यह प्रस्ताव बहुत कुछ मौजूदा सूचना और प्रसारण मंत्री की सोच पर भी निर्भऱ करता है कि वो इसको कितना आगे बढ़ाना चाहते हैं। खैर ये अलहदा मुद्दा है जो कि राज नीति के हिसाब से तय होगी। हम चर्चा इस बात पर करेंगे कि नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन अपनी स्थापना के समय तय किए गए उद्देश्यों की कसौटी पर कितना खड़ा उतर रहा है।एनएफडीसी की बेवसाइट पर इसके मिशन और उद्देश्य दोनों प्रकाशित हैं। मिशन के बारे में लिखा है- एनएफडीसी का लक्ष्य सिनेमा में उत्कृष्टता के लिए के लिए परिवेश निर्मित करना और इसकी विभिन्न भाषाओं में बनी फिल्मों को सहायता और प्रोत्साहन देते हुए भारत की सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा देना है। मिशन के अलावा बेवसाइट पर उद्देश्य भी लिखा हुआ है। इस संस्था के मूल्यांकन के पहले इसके उद्देश्यों पर भी गौर करना आवश्यक है। उद्देश्य में उल्लिखित है कि- कौशल का विकास और सभी भाषाओं में निर्माण व सह-निर्माण, पटकथा लेखन का विकास और आवश्यकता आधारित कार्यशालाओं के जरिए भारतीय सिनेमा के विकास को सहायता देना। इसके अलावा दो और उद्देश्य बताए गए हैं, पहला है भारत और विदेश में सिनेमा के जरिए भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देना और दूसरा एक चुस्त और लचीले संगठन का निर्माण जो कि भारतीय फिल्म उद्योग की जरूरतों के प्रति क्रियाशील हो।
इससे भी एक दिलचस्प जानकारी इस संस्था की बेवसाइट के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित है कि इसने पिछले कई वर्षों में भारत के कुछ सबसे सम्मानित फिल्मकारों के साथ काम किया है जिसमें सत्यजीत रे, मीरा नायर, अपर्णा सेन, श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलानी, मृणाल सेन, रिचर्ड अटनबरो, अदूर गोपालकृष्णन और केतन मेहता शामिल हैं। अब अगर हम इस सूची पर विचार करें तो इसमें मौजूदा दौर के नए निर्देशक कोई नहीं नजर आता है। बेवसाइट की बैनर पर ‘अंग्रेजी में कहते हैं’ का पोस्टर जरूर लगा है कि जोकि मई में रिलिज हुई थी और इसके डायरेक्टर हरीश व्यास हैं। इसके अलावा जयदीप घोष की ‘माया बाजार’, प्रिया कृष्णस्वामी की ‘गंगूबाई’ जैसी फिल्में भी विज्ञापित हैं। इन फिल्मों के आधार पर अगर मिशन और उद्देश्य को देखते हैं तो एक प्रश्न मन में खड़ा होता है कि इन फिल्मों ने किस तरह का कौशल विकास किया, फिल्मों के माध्यम से कैसे भारतीय संस्कृति को मजबूत किया। पिछले कुछ वर्षों में जिन निर्देशकों के नाम यहां विज्ञापित हैं उसके बाद से जिस तरह की फिल्मों का निर्माण करने में एनएफडीसी सहायक रहा है उसने फिल्म संस्कृति को कैसे विकसित किया। संस्था की स्थापना के 43 साल बाद अगर इस संस्था के सहयोग से कमजोर फिल्मों का निर्माण हो रहा है तो ना तो ये संस्था अपने मिशन में ना ही इसके उद्देश्यों को हासिल करने में कामयाब हो रही है। करदाताओं का पैसा किस तरह से उपयोग में लाया जा रहा है, इस बारे में भी सरकार को विचार करने की जरूरत है। इस संस्था को फिल्म संस्कृति के विकास के लिए, सिनेमा में उत्कृषटा के लिए परिवेश निर्मित करना था। फिल्मों से जुड़े लोगों का मानना है कि ये संस्था अपने स्थापित उद्देश्यों से भटक गई है और अच्छी फिल्मों के निर्माण के सहयोग से ज्यादा अब ये सरकार की विज्ञापन एजेंसी हो गई है। सरकार और सार्वजनिक कंपनियों के प्रचार प्रसार में इसकी रुचि ज्यादा है।
पिछले कुछ सालों में एनएफडीसी ने क्या उल्लेखनीय कार्य किया है ये भी ज्ञात नहीं हो पा रहा है। क्या इसने किसी ऐसी कहानी का चुनाव किया या ऐसी फिल्म बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसको बनाने में वॉलीवुड कामयाब नहीं हो पाया। ‘जाने भी दो यारो’ या ‘परिणति’ जैसी कौन सी फिल्म एनएफडीसी के खाते में आई।एक जमाना था जब एनएफडीसी के कर्ताधर्ता उस तरह की कहानियों को तलाशते थे जिसपर मेनस्ट्रीम बॉलीवुड फिल्म नहीं बनाता था या नहबीं बना पाता था। हिंदी के बेहतरीन कथाकार विजयदान देथा की कहानी पर फिल्म बनावाई गई थी। क्या आज ऐसा सोचा भी जा रहा है या सोचा भी जा सकता है। लगता तो नहीं है। आज अगर असमिया की फिल्म ‘विलेज रॉकस्टार’ नेशनल अवॉर्ड जीतती है तो वो अपने बूते पर। कहानी की पहचान कर उसको रूपहले पर्द तक लाने में एनएफडीसी नाकाम रही है। आज सिनेमा निर्माण में तकनीक की बेहद अहम भूमिका है। नए फिल्म निर्माताओं को तकनीकी तौर पर समृद्ध करने के लिए एनएफडीसी कितनी कार्यशालाएं आयोजित करती है, एनिमेशन के बदसते स्वरूप पर विशेषज्ञों के साथ कितने वर्कशॉप हुए। देश के किन हिस्सों, किस किस भाषा के फिल्म निर्माताओं से संपर्क कर कौशल विकास के लिए प्रयास करती है इसको भी बताया जाना चाहिए। एनएफडीसी से अंग्रेजी में एक पत्रिका निकालती थी- सिनेमा इन इंडिया। सिनेमा प्रेमियों को उम्मीद थी कि अंग्रेजी के बाद ये पत्रिका हिंदी और अन्य भाषाओं में निकलेगी लेकिन निकल रही पत्रिका भी बंद हो गई। कौन है इसका जिम्मेदार। पत्रिका को बंद करने के पीछे की वजह को जानने का हक भारत की उस जनता को है जिसके पैसे पर ये संस्था चल रही है।
सिनेमा में उत्कृष्टता के लिए परिवेश निर्माण के लिए जरूरी होता है कि दर्शकों को सिनेमा से जोड़ा जाए। पिछले एक दशक में पूरे देश में सिंगल थिएटर एक एक करके बंद हो गए या उसका स्वरूप बदल गया। मैं बिहार के एक छोटे से शहर जमालपुर में पैदा हुआ और भागलपुर में पढ़ा। जमालपुर और भागलपुर में जितने सिंगल थिएटर थे सब बंद हो गए एक दो को छोड़कर। जमालपुर के अवंतिका सिनेमा हॉल में हमने दर्शकों की जो दीवनगी देखी है या भागलपुर के महादेव टॉकीज में जिस तरह फिल्मों को लेकर छात्रों का हुजूम उमड़ता था वैसा दृश्य अब सिर्फ संस्मरणों में ही है। क्या कभी एनएफडीसी ने इस ओर ध्यान दिया कि सिंगल थिएटर के बंद होने से भारतीय सिनेमा को कितना नुकसान हो रहा है। क्या इस बारे में उन इलाकों में जाकर कोई चर्चा आयोजित की गई, वहां के दर्शकों की राय ली गई। क्या कभी इस बारे में सूचना और प्रसारण मंत्रालय को सलारह के रूप में कोई कार्ययोजना दी गई। करोडों के बजट वाली इस संस्था के बारे में भारत सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए और सिनेमा के माध्यम से अगर भारतीय संस्कृति को मजबूत करना है तो इसकी चूलें कसनी होंगी। राजनीति और व्यक्तिगत हित से ऊपर उठकर कठोर फैसले लेने होंगे  ताकि करदाताओं की गाढ़ी कमाई का पैसा बर्बाद ना हो।
एनएफडीसी अगर अपने स्थापित उद्देश्यों से भटक गई है तो ये करदाताओं के साथ छल है। उनकी गाढ़ी कमाई को गलत जगह पर गलत तरीके से खर्च करने का अपराध भी। जिसकी सर्वोच्च स्तर पर जांच होकर जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। पिछले कई सालों में इस संस्था के कामकाज को लेकर कई कमेटियों ने ऑडिट आदि किया लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। या संभव है कि नतीजा नहीं निकलने दिया गया हो। संभव है कि इसी गड़बड़झाले की वजह से नीति आयोग ने इस तरह की संस्थाओं को बंद करने का प्रस्ताव किया हो। संस्था बंद होती है या नहीं ये तो सरकार तय करेगी लेकिन फिल्मों के उत्कृष्ट परिवेश को बनाने के लिए और सिनेमा के माध्यम से भारतीय संस्कृति को पूरी दुनिया के सामने पेश करना है तो इस निगम को अकर्मण्यता के दलदल से बाहर निकालना होगा और गतिशील बनाना होगा। इसके लिए वहां के कर्ताधर्ताओं की जिम्मेदारी तय करनी होगी क्योंकि अराजक स्वायत्तता लोकतंत्र में मंजूर नहीं होती है।