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Thursday, February 24, 2022

चुनाव प्रचार में तकनीक का बोलबाला


उत्तर प्रदेश विधानसभा के चार चरणों के चुनाव संपन्न हो चुके हैं। पहले दो चरण के चुनाव पर कोरोना महामारी की छाया रही और ज्यादातर चुनाव प्रचार आभासी माध्यमों के जरिए हुए। बाद में चुनाव का पारंपरिक रंग देखने को मिला। इस चुनाव में एक नया ट्रेंड देखने का मिला वो है इंटरनेट मीडिया और तकनीक का चुनाव प्रचार में उपयोग। 2014 के लोकसभा चुनाव में पहली बार देश की जनता ने तकनीक का कमाल देखा था। उस वक्त नरेन्द्र मोदी ने पहली बार अपने चुनाव प्रचार के दौरान होलोग्राम तकनीक का उपयोग किया था। इस तकनीक में वो अपने निवास से जमसभा को संबोधित करते थे, न्यूज चैनलों के स्टूडियो में लाइव दिखाई देते थे। इससे समय की बचत होती थी। उस चुनाव में फेसबुक और ट्विटर का भी उपयोग हुआ था। चुनाव में तकनीक का उपयोग उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान भी देखने को मिल रहा है। इस बार प्रचार में ट्विटर के स्पेसेज का जमकर उपयोग हो रहा है। इसमें किसी भी ट्वीटर हैंडल से आडियो के जरिए कहीं से भी जुड़ा जा सकता है। किसी भी विषय पर चर्चा आयोजित की जा रही है। हर दिन शाम को ट्विटर स्पेसेज पर राजनीतिक चर्चा सुनी जा सकती है। नेता और राजनीतिक दलों से जुड़े लोग अपने घर से या यात्रा के दौरान भी स्पेसेज पर जनता के सामने अपनी बात रखते हैं। स्पेसेज आयोजित करनेवाला होस्ट किसी को भी बोलने की अनुमति दे सकता है। चुनाव के आंरंभिक काल से ही बीजेपी उत्तर प्रदेश के हैंडल से नियमित अंतराल ट्विटर स्पेसज पर आयोजित हो रहा है। अलग अलग राजनीतिक दल भी स्पेसेज आयोजित करते हैं।

ट्विटर की कंटेंट पार्टनरशिप की इंडिया प्रमुख अमृता त्रिपाठी के मुताबिक स्पेसेज की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है और संस्थान, राजनीतिक दल और पत्रकार भी इसका उपयोग राजनीतिक चर्चा के लिए कर रहे हैं। अमृता ने बताया कि ट्विटर भी लगातार अपनी इस सेवा में नए नए फीचर जोड़ने पर काम कर रहा है। ट्विटर स्पेसेज पर होनेवाली चर्चा को अब रिकार्ड भी किया जा सकता है ताकि बाद में भी लोग चर्चा को सुन सकें। स्पेसज पर आयोजित चर्चा को शेड्यूल भी किया जा सकता है और आयोजन का समय और विषय आयोजक के हैंडल पर चर्चा आरंभ होने तक दिखता है। ट्विटर के प्लेटफार्म पर आयोजित चर्चा में जितने लोग जुड़े दिखाई देते हैं उससे कहीं अधिक लोग उसे सुन रहे होते हैं। इसको इंटरनेट पर भी सुना जा सकता है जो संख्या चर्चा के दौरान दिखती नहीं है। इस प्लेटफार्म को आभासी चौपाल कहा जा सकता है। ट्विटर के अलावा फेसबुक रूम पर भी राजनीतिक चर्चा सुनी जा सकती है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान क्लबहाउस की लोकप्रियता भी दिखी थी। इस ऐप के जरिए उस समय राजनीतिक चर्चा और नेताओं से संवाद के कई कार्यक्रम हुए थे।

चुनाव के दौरान मैसेजिंग प्लेटफार्म का भी खूब उपयोग हो रहा है। व्हाट्सएप, टेलीग्राम और सिग्नल पर संदेशों और इमोजी का आदान-प्रदान पुरानी बात हो गई है। उत्तर प्रदेश,उत्तराखंड, गोवा  आदि राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान मैसेजिंग एप पर राजनीतिक संदेशों वाले स्टिकर और जीआईएफ का प्रयोग देखने को मिला। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की भिन्न-भिन्न मुद्राओं वाले स्टिकर उपयोग में लाए जा रहे हैं। इन स्टीकरों ने चुनाव चिन्ह वाले बैज और बिंदी का स्थान ले लिया है। तकनीक के प्रयोग ने चुनाव प्रचार को एक नया आयाम प्रदान किया है।    



Wednesday, December 23, 2015

आतंक से मुक्त हो सोशल साइट्स

देश में इंटरनेट के फैलाव के बाद तेजी से सोशल मीडिया ने अपने पांव-पसारे हैं । शहरों से लेकर गांवों तक में फेसबुक के कंज्यूमरों की संख्या में खासा इजाफा हुआ है । ट्विटर के यूजर्स भी लगातार बढ़ रहे हैं । प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के मंत्रियों और विभागों के ट्विटर पर सक्रिय होने की वजह से आम आदमी के बीच भी इस माध्यम को लेकर उत्सुकता बढ़ी है । इसका नतीजा यह हुआ है कि फेसबुक और ट्विटर हमारे देश के गांवों तक अपनी पैठ बनाने में कामयाब हो चुका है । स्मार्ट फोन और इंटरनेट पैक के सस्ता होने से भी फेसबुक की लोकप्रियता में खासा इजाफा हुआ है । डिजीटल क्रांति के इस दौर में ये बेहतर है कि हम भी दुनिया के अन्य देशों की तरह ही सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म का उपयोग करने में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं । लेकिन इस मीडिया के अपने खतरे भी हैं । इन खतरों से सचेत रहने और उसको रोकने की दिशा में भी कदम उठाने की आवश्यकता है । अभी हाल ही में खबर आई कि जयपुर में रहने वाला एक तीस साल का मार्केटिंग मैनेजर खूंखार आतंकवादी संगठन आई एस के संपर्क में था और उसके लिए काम कर रहा था । उसकी गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में ये बात सामने आई कि वो देश के युवाओं को सोशल मीडियाके माध्यम से प्रतिबंधिक आतंकवादी संगठन आई एस में भर्ती करने का काम कर रहा था । उसके फेसबुक पर अपनी कई फेक आईडी बनाई हुई थी जिसके मार्फत वो हजारों लोगों के संपर्क में था और आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दे रहा था । वो ना केवल फेसबुक पर सक्रिय था बल्कि व्हाट्स एप और टेलीग्राम जैसे नेटवर्किंग टूल्स का भी इस्तेमाल कर रहा था । वो फेसबुक पर डायरी ऑफ अ मुजाहदीन के नाम से एक पेज भी चला रहा था । इस पेज के माध्यम से वो सिस्टम से खपा युवकों की तलाश कर उसको आतंकवादी बनाने की कोशिश करता था । पुलिस की आगे की जांच में पता चलेगा कि उसके मंसूबे क्या थे लेकिन जो जानकारियां छन कर आ रही हैं उसके हिसाब से उसके मंसूबे बेहद खतरनाक थे । इसी तरह से पुणे की एक सोलह साल की लड़की को आई एस ने अपने चंगुल में ले लिया । कॉंन्वेंट स्कूल की छात्रा को आई एस के श्रीलंका के एक ऑपरेटिव ने पहले अपने चंगुल में फंसाया और फिर उससे फेसबुक और ट्विटर के जरिए उसका ब्रेनवॉश शुरू हो गया । उसके बाद कई मैसेज इस बात की पुष्टि करते हैं कि आई एस ने उस नाबालिग लड़की को सीरिया में आतंकवादी संगठन ज्वाइन करने के लिए राजी कर लिया था और वो चंद दिनों बाद वहां जाने को तैयार हो गई थी । इससे भी खतरनाक बात यह हुई कि जब से वो आई एस के आतंकवादियों के संपर्क में आई तो उसने जीन्स और शर्ट पहनना छोड़कर बुर्का पहनना शुरू कर दिया । ये दो उदाहरण है कि किस तरह से सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर आतंकवादी संगठन हमारे देश में पांव पसार रहे हैं । इस साल फरवरी में केंद्र सरकार ने आई एस पर बैन लगा दिया था और कहा था कि ये आतंकवादी संगठन भारत समेत पूरी दुनिया के युवाओं को दिग्भ्रमित कर रैडिकलाइज कर रहा है । इस प्रतिबंध के बावजूद सोशल मीडिया के जरिए ये आतंकवादी संगठन पूरे देश में सक्रिय है

बावजूद इसके सोशल मीडिया आतंकवादी संगठन आई एस और उसके समर्थकों के पेज को हटाने को तैयार नहीं है । खबरों के मुताबिक पैरिस में हुए आतंकवादी हमले के बाद एक शख्स ने आई एस के पेज को लेकर शिकायत भेजी थी लेकिन फेसबुक ने कहा था कि वो उसके कम्युनिटि स्टैंडर्ड और नीतियों के खिलाफ नहीं है । दरअसल इन फैन पेज पर जाने के बाद वहां सक्रिय लोग विजिटर को आई एस के नियंत्रण वाले बेवसाइटस पर रिडायरेक्टर कर देते हैं । यही हालत ट्विटर की भी है जहां कोई भी खलीफा न्यूज जैसे कई हैंडल सक्रिय हैं जो आई एस की जानकारियां साझा करते रहते हैं । ट्विटर पर आई एस के समर्थकों की पूरी फौज है जिनकी पहचान करना आसान नहीं है लेकिन वो खामोशी के साथ अपने काम को अंजाम देते रहते हैं । कुछ दिनों पहले तक पाकिस्तानी आतंतवादी हाफिज सईद भी ट्विटर पर खासा सक्रिय था बाद में उसके अकाउंट को सस्पेंड किया गया । इसी तरह से यूट्यूब पर आई एस की आतंकवादी करतूतों के कई दिल दहलाने वाले वीडियो मौजूद हैं । इस वक्त हमारे देश को आतंकवादियों से जबरदस्त खतरा है ऐसे में सोशल मीडिया साइट्स की निगरानी आवश्यक है । इसका मतलह यह कतई नहीं है कि इन साइट्स पर किसी भी तरह की सेंसरशिप होनी चाहिए बल्कि सोशल मीडिया पर आतंकवादी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए कोई मैकेनिज्म बनाया जाना चाहिए । दरअसल ये साइट्स पूरी दुनिया में लोग उपयोग करते हैं, लिहाजा आतंकवादी संगठनों के समर्थकों पर नजर रखना काफी मुश्किल काम है । परंतु हमारे देश में फेसबुक पर फेक आईडी बनाकर आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देनेवालों और अफवाह फैलाने वालों पर लगाम लगाने के लिए फोन नंबर या आधार कार्ड नंबर को प्रोफाइल के साथ अनिवार्य किया जा सकता है । मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक दंगों के दौरान फेसबुक का कितना गलत इस्तेमाल हुआ ये पूरी दुनिया ने देखा । कई बार तो अफवाह फैलाने वालों की पहचान हो जाती है लेकिन कई बार जब फेक आई डी विदेश से बनाई जाती है और उसका इस्तेमाल किया जाता है तब उसको ट्रैक करना बहुत मुश्किल होता है । कार्रवाई करना तो लगभग नामुमकिन ही होता है । इसके अलावा इन सोशल साइट्स को भारत में अपने सर्वर लगाने की भी आवश्यकता है । फेसबुक और ट्विटर भारत सरकार के साथ कई महात्वाकांक्षी योजनाओं को आगे बढ़ाने का मंसूबा पाले बैठे हैं लेकिन उनको पहले बारत की इन चिंताओं पर भी ध्यान देना होगा । 

Wednesday, July 15, 2015

सच का सामना का साहस !

अभी पिछले दिनों मैं अपने ट्वीटर अकाउंट को देख रहा था तो मैंने पाया कि कुछ लोगों ने मुझे ब्लॉक कर रखा है । मुझे हैरानी तब हुई जब मैंने देखा कि ब्लॉक करनेवालों की फेहरिश्त में अलग अलग विचारधारा के नेता, एक्टिविस्ट और हमारी पत्रकार बिरादरी के सदस्य भी हैं । आश्चर्य तब और ज्यादा हुआ जब मैंने देखा कि विश्व प्रसिद्ध लेखक सलमान रश्दी ने भी मुझे ब्लॉक कर रखा है । मैं सोच में पड़ गया कि सलमान रश्दी ने मुझे क्यों ब्लाक किया । नैतिकता के उच्च मानदंडों की बात करनेवाले दो तीन नेताओं ने तो मुझे इस वजह से ब्लॉक किया है कि उनको मेरे सवालों से दिक्कत थी । मेरे सवाल उनको सार्वजनिक तौर पर असहज कर रहे थे । सलमान रश्दी ने जब मुझे ब्लॉक किया तो मुझे हैरानी इस वजह से हुई कि वो तो लेखकीय स्वतंत्रता के लिए जाने जाते हैं । उन्होंने अपनी पोजिशनिंग इस तरह की बनाई है लेखकीय स्वतंत्रता के लिए उन्हें कितना झेलना पड़ा । झेलना भी पड़ा है । उनको जिसके बारे में वो बहुधा बताते भी रहते हैं । अपनी किताब जोसेफ एंटन में उन्होंने इस पर विस्तार से लिखा भी है । मैंने जोसेफ एंटन की विस्तृत समीक्षा लिखी थी उसमें अन्य बातों के अलावा मैंने ये कहा था कि उसको थोडा और कसने की जरूरत है और उस उपन्यास में उबाऊ होने की हद तक विस्तार दिया गया है । खैर जोसेफ एंटन की समीक्षा लिखे जाने तक हमारा ट्विटर संवाद था, बहुधा एकतरफा । मैंने अपनी लिखी समीक्षा के लिंक उनको टैग भी किए थे । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में जब सलमान रश्दी के भारत आने को लेकर विवाद हुआ था,  तब भी मैंने सलमान रश्दी के पक्ष में स्टैंड लिया था। देशभर के कई अखबारों में लंबे लंबे लेख लिखे थे । उस वक्त भी ट्विटर पर उनके साथ जुड़ाव था, मैं उनको फॉलो करता था । मुझे लगता है गड़बड़ी की शुरुआत, रश्दी और भालचंद नेमाड़े के बीच हुए विवाद में मेरे स्टैंड को लेकर हुआ । भालचंद नेमाडे को जब ज्ञानपीठ पुरस्कार देने का एलान किया गया था तब सलमान रश्दी ने एक घोर आपत्तिजनक ट्वीट किया था- ग्रम्पी ओल्ड बास्टर्ड, जस्ट टेक योर प्राइज ऐंड से थैंक्य यू नाइसली । आई डाउट यू हैव इवन रेड द वर्क यू अटैक । दरअसल नेमाडे ने मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान सलमान की किताब मिडनाइट चिल्ड्रन को औसत कृति करार दिया था । सलमान के गाली गलौच भरे ट्वीट के खिलाफ मैंने जनसत्ता में एक लेख लिखा था – ताक पर मर्यादा, जो इसी वर्ष पंद्रह फरवरी को प्रकाशित हुआ था । अपने उस लेख में मैंने सलमान रश्दी के आपत्तिजनक ट्वीट के बहाने से उनके कृतित्व पर भी अपने विचार रखे थे । ट्वीट पर तो उनको जवाब दिया ही था, जनसत्ता का लिंक भी टैग कर दिया था । लेकिन कभी भी मैंने सलमान रश्दी की तरह भाषिक मर्यादा का उल्लंघन कभी नहीं किया, हां उनकी कृतियों को तर्क की कसौटी पर अवश्य कसा । उनके ट्वीट को भाषा की मर्यादा की हदों से बाहर जानेवाला करार दिया । अब एक बात मेरी समझ से परे है । इतना बड़ा लेखक, जो वर्षों से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक बना हो वो अपनी कृतियों के खिलाफ, अपने भद्दे ट्वीट्स के खिलाफ कुछ भी सुनने का माद्दा नहीं रखता है । दरअसल अब मुझे लगने लगा है कि सलमान रश्दी के तरह के जो लेखक हैं उनको अपने खिलाफ सुनना अच्छा नहीं लगता है । रचनात्मकता के उस दौर में जब कलम नपुंसक होने लगती है और उसके पुंसत्व पर सवाल खड़े करते लेख या टिप्पणी प्रकाशित हो तो लेखक बिलबिलाने लगता है । यही बिलबिलाहट लेखक को दूसरे की राय को ब्लॉक करने के लिए उकसाती है । जब कोई काम प्रतिक्रिया में या बदले की भावना से किया जाता है तब उस वक्त हर इंसान मतिभ्रम का शिकार हो जाता है । मतिभ्रम होने की स्थिति में इसी तरह के काम होते हैं जैसा कि सलमान रश्दी ने किया । आदर्श स्थिति तो वह होती जिसमें मेरे तर्कों पर बहस होती और वो अपने तर्क रखते । संभव है कि वो इतने बड़े लेखक हैं कि मुझ जैसे अदने शख्स से बहस नहीं करना चाहते हों । ये उनका फैसला हो सकता है, इसमें मुझ समेत किसी को भी आपत्ति नहीं । आपत्ति तो इसमें भी नहीं कि उन्होंने ट्विटर पर ब्लॉक कर दिया, लेकिन सवाल तब उठते हैं जब ऐसा किसी खास मकसद और मंशा से किया गया हो । मकसद साफ है और मंशा भी । सलमान रश्दी में अपना सार्वजनिक आलोचना सहने की क्षमता नहीं है ।
दरअसल यह एक प्रवृत्ति है । इस प्रवृत्ति के शिकार वैसे सभी लोग होते हैं जिनको लगता है कि वो आलोचनाओं से परे हैं । इस तरह के लोगों को यह भी लगता है कि समाज में उनका जो स्थान है वो इतना पवित्र है कि उसपर उंगली नहीं उठाई जा सकती है । नैतिकता के जिस पायदान पर वो खड़े हैं वहां तक सवालों की पहुंच नहीं हो सकती है । लिहाजा जब उनको लगता है कि असहज करनेवाले सवाल उनतक पहुंचने लगे हैं तो वो इसी तरह के कदम उठाते हुए खुद को एक्सपोज कर देते हैं । अन्ना आंदोलन के दौरान जब किरण बेदी के टिकटों के मसले पर उनसे सवाल पूछे गए थे तो उन्होंने भी ट्विटर पर व्लॉक कर दिया था । इसी तरह से मधु किश्वर को भी जब लगा कि असहज करनेवाले सवालों में वो घिर रही हैं तो उन्होंने भी ब्लॉक करने का रास्ता अख्तियार किया । लेकिन इन सारे लोगों में एक साझा सूत्र दिखाई देता है अपने को आलोचना से उपर देखने, रखने का । इस तरह के लोग हमेशा से लोकतंत्र की भी दुहाई देते हैं, लोकतांत्रिक होने का दावा भी करते हैं लेकिन अपने तौर तरीकों में लोकतांत्रिक होने में उनको तकलीफ होती है । यह उसी तरह का मामला है कि क्रांति की चाहत हमेशा पड़ोसी के घर में होती है । यह भी सचाई है कि सोशल साइट्स पर गाली गलौच होती है, हर तरह के अपशब्द कहे जाते हैं, भद्दी टिप्पणियां की जाती हैं । उनको ब्लॉक करने का हक होना चाहिए । लेकिन जब आप सार्वजनिक जीवन में हैं तो आपको अपनी रचनात्मक आलोचना तो सुननी ही होगी । आपके बयानों के आलोक में उठ रहे सवालों या सच का समाना तो करना ही होगा । मर्यादा में रहते हुए अगर आपकी टिप्पणियों की धज्जियां उड़ेंगी तो उसको झेलना ही होगा अन्यथा अभिव्यक्ति की आजादी की ध्वजा लहराने वाले सलमान रश्दियों की बातें खोखली लगेंगी ।    

Friday, April 26, 2013

ट्विटर का अराजक गणतंत्र

पिछले एक दशक में देश में तकनीक का फैलाव काफी तेजी से हुआ है । हर हाथ को काम मिले ना मिले हर हाथ को मोबाइल फोन जरूर मिल गया है । घर में काम करनेवाली मेड से लेकर रिक्शा चलानेवाले तक अब मोबाइल पर उपलब्ध हैं । किसी भी देश के लिए यह एक बेहतर स्थिति है जहां समाज के सबसे निचले पायदान पर रहनेवालों को भी तकनीक का फायदा मिल रहा है । तकनीक के इस विस्तार से उनकी हालात में भी सुधार हुआ । कुछ दिनों पहले एक कार्यक्रम के दौरान हिंदी की वरिष्ठ लेखिका और महिला अधिकारों को लेकर अपने लेखन में बेहद सजग मैत्रेयी पुष्पा ने तकनीक की ताकत पर प्रकाश डाला था । मैत्रेयी ने कहा था कि आज गांव घर की बहुओं की ज्यादातर समस्याएं मोबाइल फोन ने हल कर दी हैं । बहुएं घूंघट के नीचे से फोन पर अपनी समस्याओं के बारे में अपने मां बाप को या फिर शुभचिंतकों को अपनी व्यथा बता सकती हैं । मैत्रेयी ने इसे स्त्री सशक्तीकरण की दिशा में लगभग क्रांति करार दिया । मैत्रेयी पुष्पा की बातों में दम है । हो सकता है कि कुछ लोगों को ये समस्या का सरलीकरण लगे लेकिन महिलाओं की हालात को मोबाइल फोन ने बेहतर बनाया है साथ ही उनके हाथ में ताकत भी मिली है । खैर यह एक अवांतर प्रसंग है ।
मोबाइल फोन की क्रांति के बाद जो विकास हुआ वह था इंटरनेट का फैलाव । तकनीक के विकास ने आज लोगों के हाथ में इंटरनेट का एक ऐसा अस्त्र पकड़ा दिया जो उनको अपने आपको अभिव्यक्त करने के लिए एक बड़ा प्लेटफॉर्म प्रदान करता है, बगैर किसी रोक टोक के । स्मार्ट फोन के बाजार में आने और उसकी कीमत मध्यवर्ग के दायरे में आने से यह और फैला । थ्री जी सेवा ने इसे और फैलाया । हाथ में इंटरनेट के इस औजार ने सोशल मीडिया पर लोगों की सक्रियता बेहद बढ़ा दी है । पहले तो ऑरकुट हुआ करता था जो नेट यूजर्स के बीच खासा लोकप्रिय था । बाद में सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक ने जोर पकड़ा और हर वर्ग के लोगों के बीच फेसबुक पर होने की होड़ लग गई । सोशल नेटवर्किंग साइट सोशल स्टेटस साइट में तब्दील हो गया । महानगरों के अलावा छोटे शहरों में फेसबुक पर होना अनिवार्य माना जाने लगा । जो लोग यह कहकर फेसबुक की खिल्ली उड़ाते थे कि फोन पर बात नहीं कर सकते वो वर्चुअल प्लेटफॉर्म पर बात करेंगे वो लोग भी अब फेसबुक पर घंटों गुजारते हैं । दरअसल किसी भी नई तकनीक को पहले इस तरह की विरोध का सामना करना ही होता है और बाद में लोगों की आदतों में शुमार हो जाता है । जब अस्सी के दशक में कंप्यूटर आया था तो पहले उसका जमकर विरोध हुआ था । वामपंथियों और समाजवादियों ने इस बात को लेकर खासा बवाल मचाया था कि कंप्यूटर से बेरोजगारी बढ़ेगी । लोगों के हाथों से काम छिन जाएगा आदि आदि ।
हम बात कर रहे थे सोशल मीडिया साइट्स की । सोशल मीडिया साइट् फेसबुक ने लोगों को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की आजादी दी । वहां किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं थी लिहाजा वह हुआ जिसका अंदाजा फेसबुक की कल्पना करनेवालों को नहीं रहा होगा । अभिव्यक्ति की जो आजादी मिली उसका कई लोगों ने, जिसकी संख्या भारत में बहुत ज्यादा थी, बेजा फायदा उठाया और राजनीतिक से लेकर व्यक्तिगत तक कई तरह की आपत्तिजनक बातें और फोटोग्राफ्स फेसबुक पर पोस्ट होने लगे । फेसबुक पर ऐसी भाषा भी लिखी जाने लगी जिसको पढ़ा नहीं जा सकता था । देश की राजनीतिक शख्सियतों के बारे में भद्दी और अनर्गल पोस्ट शुकु हो गए । फेक आईडी बनाकर लोगों की धार्मिक भावनाएं भड़कानें की कोशिशें भी खूब हुई । दोस्ती और सामाजिक मेल मिलाप के लिए बनाई गई साइट का इस्तेमाल अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने और अपमानित करने के लिए किया जाने लगा । अराजकता इस हद तक बढ़ गई कि सरकार को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा । सरकार के हस्तक्षेप के इरादे का पता चलते ही अभिव्यक्ति के आजादी के पैरोकार खड़े हो गए नतीजे में सरकार को अपने पैर वापस खींचने पड़े । कुछ कानून बने हैं जो इस तरह की बातों को रोकने में सक्षम हैं लेकिन जिसके बारे में कुछ कहा जा रहा हो वो अगर शिकायत ही नहीं करेगा तो कार्रवाई लगभग मुमकिन नहीं है । फेसबुक से निकलकर यह वायरस अब ट्विटर पर पहुंच गया है ।
ट्विटर पर अब राजनीकित विरोधी एक दूसरे को निबटाने में जुट गए हैं । इसका बेहतरीन नमूना दिखा था पिछले महीने जब राहुल गांधी एक उद्योग संगठन के कार्यक्रम में बोल रहे थे तो ट्विटर पर पप्पू नाम से उनके विरोधियों ने हैस टैग लगाकर लिखना शुरू कर दिया । इसका नतीजा यह हुआ कि ट्विटर पर पप्पू ट्रेंड करने लग गया । कांग्रेस से जुड़े लोगों ने आरोप लगाया कि यह भारतीय जनता पार्टी से जुड़े लोगों की करतूत है । चंद दिनों बाद ही गुजरात के मुख्यमंत्री भी भाषण देने दिल्ली पहुंचे । तब अचानक से ट्विटर पर फेंकू ट्रेंड करने लगा । इस बार आरोप लगाने की बारी भारतीय जनता पार्टी की थी । उन्होंने कांग्रेस पर आरोप जड़ा कि फेंकू के पीछे उनकी पार्टी के लोग हैं । लेकिन तबतक तो सोशल नेटवर्किंग साइट पर राहुल गांधी पप्पू और नरेन्द्र मोदी फेंकू हो चुके थे । यह लड़ाई इतने पर ही नहीं रुकी । अभिव्यक्ति की आजादी अराजकता में बदल गई । दोनों पार्टियों से जुड़े उत्साही कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने ट्विटर पर सोनिया गांधी, राहुल गांधी, नरेन्द्र मोदी और उनके संगठनों के बारे में आपत्तिजनक बातें लिखनी शुरू कर दी । उत्साह इतना बढ़ता चला गया कि बात गाली गलौच तक पहुंच गई । कांग्रेस पार्टी का आरोप है कि बीजेपी ने सोशल मीडिया पर काम करने के लिए एक पूरा सेल बना रखा है जो इस तरह की आपत्तिजनक बातें लिखता है । लेकिन बीजेपी इस बात से इंकार करती रही है । इस बीच इस तरह की खबरें भी आई कि कांग्रेस पार्टी ने भी सोशल मीडिया को लेकर एक भारी भरकर ग्रुप बनाया । यहां तक तो ठीक है लेकिन खुद को कांग्रेस का समर्थक होने का दावा करनेवाले एक इतिहासकार इन दिनों ट्विटर पर बेहद गंदी और बेहूदी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं । महिलाओं के लिए बेहद आपत्तिजनक बातें लिख रहे हैं जिसकी सभ्य समाज में कोई जगह नहीं है । इतिहासकार महोदय का तर्क है कि फासीवाद से निबटने के लिए गाली गलौच की आक्रामकता जरूरी है । अपने इस तर्क के समर्थन में वो मोजार्ट का नाम भी लेते हैं । उधर संघ और मोदी समर्थक भी कम नहीं है वो भी उसी अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते हैं । इस सबके बीच कुछ संवेदनशील लोग हैं जो ट्विटर पर इस तरह की गाली गलौच के बीच अपनी संवेदना बचाए हुए हैं ।
इस बीच एक सर्वे आया कि सोशल मीडिया इस बार दो सौ से ज्यादा लोकसभा क्षेत्रों पर प्रभाव डालेगी । इस खबर ने भी राजनीतिक दलों के कान खड़े कर दिए । आज हालात यह है कि ट्विटर पर आने और ट्विटरबाज बनने की होड़ लगी है चाहे वो नेता हो या अभिनेता । लेकिन साथ ही अब इस बात का भी वक्त आ गया है कि इन सोशल मीडिया बेवसाइट्स को लेकर कोई नीति बने जहां अराजकता की कोई जगह ना हो । अभिव्यक्ति की आजादी बहुत अच्छी बात है, सबको होनी चाहिए लेकिन जब यह आजादी अराजकता में बदलती है तो उसपर रोक भी लगाई जानी चाहिए । आज फेसबुक और ट्विटर एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके हैं कि उनके लिए किसी तरह की गाइडलाइंस की सख्त जरूरत महसूस होने लगी है । इन साइट्स के लिए गाइडलाइंस जितनी जल्दी बन जाएं उतना अच्छा है वर्ना वर्चुअल की दुनिया की जंग एक दिन हकीकत बन जाएगी और अभिव्यक्ति की यह आजादी अराजकता के गणतंत्र में तब्दील हो जाएगा और तब हम फिर सरकार के हाथों में पाबंदी लगाने का हक दे देंगे जो कि लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं होगा ।