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Tuesday, March 14, 2017

साईबाबा को उम्रकैद से निकलते संदेश

उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव और उसके नतीजों के कोलाहल के बीच एक बेहद अहम खबर लगभग दब सी गई । राजनीतित विश्लेषखों ने इस खबर को उतनी तवज्जो नहीं दी जितनी मिलनी चाहिए थी । उस खबर पर प्राइम टाइम में उतनी बहस नहीं हुई जितनी होनी चाहिए थी । वह खबर थी दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज के शिक्षक जी साईबाबा और चार अन्य को देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश रचने से लेकर प्रतिबंधित माओवादियों को मदद देने के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाए जाने की । सजा सुनाते वक्त महाराष्ट्र के गढचिरौली के जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने बेहद कड़ी टिप्पणी की । उन्होंने कहा कि मुजरिमों के क्रियाकलापों की वजह से कई लोगों की जान गई और सरकारी संपत्ति का भारी नुकसान हुआ । जज ने कहा कि उम्रकैद की सजा इन लोगों के लिए मुकम्मल नहीं है लेकिन उनके हाथ यूएपीए कानून की धाराओ से बंधे हैं । अदालत से साईबाबा को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद अखबारों में उनकी पत्नी का जो बयान छपा है उसपर ध्यान देने की जरूरत है । प्रोफेसर जी एन साईबाबा की पत्नी ने सजा के बाद कहा- इस फासिस्ट गवर्नमेंट ने हमारे साथ ऐसा किया कि हमारे आंख में आंसू नहीं आ रहे, आग आ रही है । उन्होंने अपने बयानों में राज्य और केंद्र सरकार द्वारा न्यायपालिका पर दबाव डाले जाने की आशंका भी जताई । आंखों में आंसू नहीं आग आ रही है । सवाल यह उठता है कि आग किस चीज की, क्या उनकी पत्नी किसी तरह के इंतकाम की ओर संकेत कर रही हैं या फिर सिर्फ तात्कालिक गुस्से की वजह से उन्होंने ऐसा बयान दे दिया । साईबाबा की पत्नी ने केंद्र और राज्य सरकार पर भी संगीन इल्जाम लगाए । उनके पति को अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई है  और वो इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में अपील कर सकती हैं । बजाए न्यायपालिका पर भरोसा जताने के साईबाबा की पत्नी ने न्यायपालिका को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है । दरअसल यह उनका दोष नहीं है यह उस विचारधारा का असर है जिसमें सत्ता बंदूक की नली से निकलती है । यह उस विचारधारा का प्रभाव है जिसका लोकतंत्र में नहीं हिंसातंत्र में यकीन है । अगर लोकतंत्र में यकीन होता तो आंखों में आग नहीं आती । यह अकारण नहीं है कि 27 दिसंबर 1997 को महाश्वेता देवी ने हस्तलिखित अपील में सीपीआई एमएल से बिहार में बदला लेने का आह्वान किया था । रणवीर सेना पर उस वक्त एक सामूहिक नरसंहार का आरोप लगा था उसके बाद महाश्वेता देवी ने यह अपील की थी । उस वक्त महाश्वेता देवी किससे बदला लेने के लिए उकसा रही थीं, ऊमती जाति के उन गरीब लोगों पर जो निरीह थे । यह हिंसा के लिए उकसाना वर्ग शत्रुओं के सफाए की विचारधारा या सिद्धांत का पोषक ही कर सकता था । इस विचारधारा को पोषकों को ना तो संविधान की फिक्र है ना ही कानून और अदालतों पर उनका भरोसा है । व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर, गरीबों, मजलूमों को उनका हक दिलाने के नाम पर निरीह, निर्दोष लोगों की हत्या को अंजाम दिया जाता रहा है ।
महाश्वेता देवी पर किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं हुई क्योंकि उनको गरीबों का मसीहा माना जाता था और गरीबों की हत्या का बदला लेने के लिए उकसाने को लेकर कहीं किसी प्रकार का स्पंदन नहीं हुआ था । जब साईबाबा को नक्सलियों से सांठगांठ के आरोप में गिरफ्तार किया गया तो मार्क्सवादियों को सांप सूंघ गया था । इसको तानाशाही से लेकर फासीवाद आदि आदि तक करार दिया गया था । दरअसल 22 अगस्त दो हजार तेरह को हेम मिश्रा की गिरफ्तारी के बाद इनलोगों के मंसूबों का पर्दाफाश हुआ था । आरोप लगा था कि साईबाबा ने मिश्रा के हाथों गढ़चिरौली इलाके में सक्रिय खूंखार नक्सली कमांडर नर्मदा अक्का के पास एक माइक्रोचिप भिजवाया था । उसके बाद मिश्रा और उनके साथियों की गिरफ्तरी और पूछताछ के बाद पुलिस साईबाबा तक पहुंची थी । करीब छह सात महीने तक साई बाबा पर नजर रखने के बाद महाराष्ट्र पुलिस ने 9 मई दो हजार चौदह को साई बाबा को दिल्ली से गिरफ्तार किया था । पुलिस ने उस वक्त दावा किया था कि साईबाबा के घर से उनको जो हॉर्ड डिस्क मिला था उससे साईबाबा की नक्सलियों के साथ संलिप्तता साबित होती थी । पुलिस को जांच के दौरान यह भी पता चला था कि साईबाबा रिवोल्यूशनरी डेमोक्रैटिक फ्रंट का संयुक्त सचिव था । यह संगठन खुले तौर पर इस बात की वकालत करता था कि नक्सली तौर-तरीकों से ही सरकार को हटाया जा सकता है । उनकी जमानत याचिका हाईकोर्ट की नागपुर बेंच से खारिज हुई थी, फिर बांबे हाईकोर्ट से उनको अस्थायी जमानत मिली थी जिसे बाद में रद्द भी किया गया था । पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने साईबाबा को जमानत दे दी थी ।
अब सवाल यही उठता है कि नक्सलियों के रोमांटिसिज्म में या फिर हिंसक विचारधारा के प्रभाव में भारत के खिलाफ युद्ध झेड़ने का जुर्म साबित होने पर उम्रकैद होने से नक्सलियों या उनके बौद्धिक समर्थकों के बीच कड़ा संदेश जाएगा । दरअसल नक्सलियों के जो बौद्धिक समर्थक हैं वो उनके स्लीपर सेल के तौर पर काम करते हैं । रहा होगा किसी जमाने में नक्सलबाड़ी आंदोलन की नैतिक आभा लेकिन पिछले एक दो दशक से तो नक्सली खालिस अपराधी हो गए हैं जो ठेकेदारों से रंगदारी वसूलते हैं, लूटपाट करते हैं, बलात्कार करते हैं, अपने संगठन की महिलाओं पर जमकर यौन अत्याचार करते हैं । यह कौन सी विचारधारा है जो गांधी के इस देश में हिंसा का प्रचार प्रसार करती है । अब इसपर नक्सलियों को बौद्धिक आधार देनेवालों को भी गंभीरता से विचार करना चाहिए कि वो हिंसा के साथ हैं या अहिंसा के साथ ।    

Wednesday, July 3, 2013

खंडित यथार्थ का प्रोपगंडा़

झारखंड के पाकुड़ में नक्सलियों ने एक बार फिर से बड़ी वारदात का अंजाम दिया और जिले के पुलिस अधीक्षक को गोलियों से भून कर मार डाला । इसके पहले हाल ही में नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के काफिले को घेर कर उनके नेताओं समेत कई लोगों की हत्या कर दी । इसके बाद नक्सलियों के एक गुट ने बिहार के जमुई के पास एक ट्रेन पर हमला किया और सुरक्षा बलों के हथियार लूट ले गए । इन बड़ी वारदातों के अलावा छोटे मोटे अपराध को नियमित अंतराल पर अंजाम दिया जा रहा है । इन वारदातों को गिनाने का मकसद सिर्फ इतना बताना है कि देश के कई हिस्सों में कानून के राज पर ग्रहण लगा हुआ है । केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री कई बार इस बात को दुहरा चुके हैं कि नक्सली इस देश के लिए बड़ा खतरा है । तमाम दावों और बयानों के बावजूद उनसे निबटने के उपायों पर सख्ती से अमल करने की इच्छा शक्ति दिखाई नहीं देती, बल्कि सरकार की नाकामी ही उजागर होती है । नक्सलियों से निबटने को लेकर प्रधानमंत्री के बयान खोखले लगते हैं । दरअसल कांग्रेस के कुछ नेताओं और केंद्र सरकार के कई मंत्रियों को नक्सलियों से सहानुभूति है । उन्हें अब भी लगता है कि नक्सल समस्या एक सामाजिक समस्या है और उसका हल उसी को आदार मानकर किया जाना चाहिए । लेकिन इस उहापोह के बीच और किसी ठोस रणनीति के आभाव में नक्सली बार बार बड़ी वारदातों को अंजाम देकर केंद्र सरकार को चुनौती दे रहे हैं । नक्सलियों ने जिस तरह से अपने प्रभाव वाले इलाकों में रंगदारी, वसूली, लड़कियों को जबरन उठाकर शादी करने की घटनाओं को अंजाम दिया है उसकी जड़ में ना तो विचारधारा हो सकती है और ना ही किसी लक्ष्य को हासिल करने का संघर्ष । कौन सी विचारधारा इस बात की इजाजत दे सकता है शिक्षा के मंदिर स्कूल को बम से उड़ा दिया जाए और आदिवासी इलाकों के बच्चों को शिक्षा से वंचित कर दिया जाए । दरअसल नक्सलियों की एक रणनीति यह भी है कि आदिवासियों को शिक्षित नहीं होने दो ताकि उनको आसानी से बरगलाया जा सके । अधिकारों के नाम पर बंदूक उठाने के लिए अशिक्षित आदिवासियों को प्रेरित करना ज्यादा आसान है ।  इन सबके उसके पीछे सिर्फ और सिर्फ अपराध की मानसिकता है और सरकार को नक्सलियों से अपराधी और हत्यारे की तरह सख्ती के साथ निबटना चाहिए ।
सरकार के अलावा इस देश के तथाकथित व्यवस्था विरोधी बुद्धिजीवी नक्सलियों के रोमांटिसिज्म से ग्रस्त हैं और नक्सलियों के वैचारिक समर्थन को जारी रखने की बात करते हैं । उन्हें नक्सलियों के हिंसा में अराजकता नहीं बल्कि एक खास किस्म का अनुशासन नजर आता है । नक्सलियों की हिंसा को वो सरकारी कार्रवाई की प्रतिक्रिया या फिर अपने अधिकारों के ना मिल पाने की हताशा में उठाया कदम करार देते हैं । नक्सल मित्रों को सुरक्षा बलों के तथाकथित अत्याचार नजर आते और उनकी कार्रवाई को राज्य सत्ता की संगठित हिंसा तक करार देते हैं। दरअसल नक्सलियों के विचारधारा के रोमांटिसिज्म से ग्रस्त ज्यादातर लोग मार्क्सवाद के बड़े पैरोकार हैं या वैसा होना का दावा करते हैं । दरअसल मार्क्सवादियों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है कि उनकी दीक्षा ही हिंसा और हिंसक राजनीति में होती है । उन्नीस सौ साठ में विभाजन के बाद सीपीआई तो लोकतांत्रिक आस्था के साथ काम करती रही लेकिन सीपीएम तो सशस्त्र संघर्ष के बल पर भारतीय गणतंत्र को जीतने के सपने देखती रही । चेयरमैन माओ का नारा लगानेवाली पार्टी चीन के तानाशाही के मॉडल को इस देश पर लागू करने करवाने का जतन करती रही । चीन में जिस तरह से राजनीतिक विरोधियों को कुचला डाला जाता है , विरोधियों का सामूहिक नरसंहार किया जाता है वही इनके रोल मॉडल बने । उसी चीनी कम्युनिस्ट विचारधारा की बुनियाद पर बनी पार्टी भारत में भी लगातार कत्ल और बंदूक की राजनीति को जायज ठहराने में लगी रही । पिछले साल केरल में एक मार्क्सवादी नेता ने खुले आम सार्वजनिक सभा में हिंसा और मरने मारने की बात की थी ।
अब वक्त आ गया है कि हमें देखना होगा कि जिनकी दीक्षा ही हिंसा और हिंसक राजनीति से शुरू होती है और जिनकी आस्था अपने देश से ज्यादा दूसरे देश में हो उनकी बातों को कितनी गंभीरता से ली जानी चाहिए । मेरा मानना है कि मार्क्स और माओ के इन अनुयायियों की बातों का बेहद गंभीरता से प्रतिकार किया जाना चाहिए । देश की जनता को उनके प्रोपगंडा और उसके पीछे की मंशा को बताने की जरूरत है । जब यह मंशा उजागर होगी तो उनके खंडित यथार्थ का असली चेहरा सामने आएगा । आज देश के बुद्धिजीवियों के सामने नक्सलमित्रों और नक्सलमित्रों की चालाकियों को सामने लाने की बड़ी चुनौती है । इसमें बहुत खतरे हैं । मार्क्सवाद के नाम पर अपनी दुकान चलानेवाले लोग बेहद शातिराना ढंग से आपको सांप्रदायिक, संघी आदि आदि करार देकर बौद्धिक वर्ग में अछूत बनाने की कोशिश करेंगे । अतीत में उन्होंने कई लोगों के साथ ऐसा किया भी है । लेकिन सिर्फ इस वजह से हिंसा की राजनीति को बढ़ावा देने उसको जायज ठहरानेवालों को बेनकाब करने से पीछे हटना अपने देश और उसकी एकता और अखंडता के साथ छल करना है ।

Thursday, December 22, 2011

खत्म होता नक्सलियों का खौफ

जनलोकपाल बिल पर सरकार और टीम अन्ना के बीच जारी बवाल, रिटेल में विदेशी निवेश पर सरकार, उसके सहयोगी दलों और विपक्ष के बीच मचे घमासान और गृहमंत्री चिंदबरम पर एक के बाद एक लग रहे आरोपों के बीच देश में कई अहम खबरें गुम सी हो गई । हर दिन या तो अन्ना हजारे कोई ऐलान करते हैं, कांग्रेस का कोई नेता अन्ना पर हमला करता है या फिर किसी न किसी वजह से संसद में हंगामा हो जाता है या फिर अदालत कोई ऐसा फैसला सुना देता है या फिर कोई टिप्पणी कर देता है जो सुर्खियां बन कर मीडिया में छा जाता है । देशभर में हुए हालिया उपचुनावों के नतीजों के कई गंभीर निहितार्थ निकले जिसपर मीडिया में न तो मंथन हो पाया और न ही ढंग से उसपर चर्चा हो सकी । अखबारों में कहीं किसी कोने अंतरे में वैसी खबरें दब गई और न्यूज चैनलों में तो तवज्जो ही नहीं मिल पाई । अगर हम ओडीशा विधानसभा के लिए हुए उपचुनावों के नतीजों का विश्लेषण करें तो साफ तौर पर यह देखा जा सकता है कि ओडीशा में माओवादियों का असर कम होना शुरू हो गया है । जिन इलाकों में माओवादियों को लंबे समय से आदिवासियों से हर तरह का समर्थन मिल रहा था वहां भी अब वो लगभग बेअसर होने लगे हैं ।ओडीशा के आदिवासी बहुल जिले नवरंगपुर के उमरकोट विधानसभा चुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो नक्सलियों के समर्थन में आ रही इस कमी को साफ तौर पर परिलक्षित किया जा सकता है । चुनाव के ऐन पहले माओवादियों ने नक्सल प्रभावित उमरकोट विधानसभा में आदिवासियों से वोटिंग का वहिष्कार करने का फरमान जारी कर दिया । लेकिन नक्सलियों के फरमान को धता बताते हुए भारी संख्या में आदिवासियों ने मतदान किया और चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक पचहत्तर फीसदी से ज्यादा आदिवासियों ने वोट डाले । इसी विधानसभा के छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे रायगढ़ इलाके में, जो दशकों से माओवादियों का गढ़ माना जाता है, सबसे ज्यादा मतदान हुआ। गौरतलब है कि यह वही रायगढ़ है जहां बीजू जनता दल के विधायक जगबंधु मांझी की माओवादियों ने एक जनसभा के दौरान नृशंस तरीके से हत्या कर दी थी । मांझी की मौत के बाद हो रहे इस उपचुनाव में नक्सलियों के मतदान के बहिष्कार के फरमान के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में वोटिंग होना उस इलाके में नक्सलियों के कमजोर पड़ने की निशानी है । इस पूरे इलाके में जबरदस्त वोटिंग का फायदा सत्तारूढ बीजू जनता दल के उम्मीदवार को हुआ जिसने तकरीबन बीस हजार वोटों से जीत हासिल की । माओवादियों ने वोट के बहिष्कार के साथ-साथ बीजू जनता दल के खिलाफ भी अपनी राय जाहिर की थी । जो लगभग बेअसर रही ।
उपचुनावों के नतीजों और नक्सलियों के वोट के बहिष्कार के अलावा भी ओडीशा में काफी कुछ घटित हो रहा है जिसको अगर रेखांकित किया जाए तो माओवादियों के लगातार कमजोर होते जाने की तस्वीर सामने आती है । माओवादियों के बड़े नेता किशन जी को जब पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया था तो माओवादियों ने दो दिनों के बंद का ऐलान किया । इस बंद का भी ओडीशा और झारखंड के कई इलाकों में असर देखने को नहीं मिला । मलकानगिरी, जो ओडीशा का सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित क्षेत्र माना जाता है, में ये बंद लगभग बेअसर रहा । आदिवासी इलाकों के लड़के,लडकियां अपने स्कूल पहुंचे । बंद के दौरान छात्रों का ऐसा व्यवहार अबतक इस इलाके में कभी नहीं देखा गया था । मलकानगिरी जैसे नक्सलियों के गढ़ में तो बंद के ऐलान के बाद कर्फ्यू जैसे हालात हो जाते थे । सड़कों पर सन्नाटा और पूरे इलाके में कामकाज ठप । नक्सलियों का खौफ इतना ज्यादा होता था कि बंद के दौरान मां-बाप अपने बच्चों को घर से बाहर तक नहीं निकलने देते थे । यही हाल झारखंड के डाल्टनगंज और पलामू जिलों में देखने को मिला । दो दिन के बंद के दौरान स्कूलों में छात्र पहुंचे । लोग सड़कों पर निकले अपने कार्यालय पहुंचे। सड़कों पर गाड़ियां चलीं । सबसे आश्चर्यजनक बात तो ओडीशा के नुआपाड़ा में देखने को मिला । वहां नक्सलियों ने यातायात बंद करने के लिए पेड़ काटकर सड़क पर डाल दिया था । स्थानीय नागरिकों ने नक्सलियों से बगैर डरे सड़क से पेड़ हटाकर उसे यातायात के लिए खोल दिया । पहले यह काम सुरक्षा बल किया करते थे । स्थानीय जनता के इस कदम को भी नक्सलियों के घटते प्रभाव के तौर पर देखा गया ।
दरअसल यह सब दो वजहों से हो रहा है । एक तो राज्य और केंद्र सरकार खामोशी के साथ मिलकर उन इलाकों में नक्सलियों का प्रभाव कम करने की दिशा में काम कर रहे थे जिसका थोड़ा बहुत नतीजा अब दिखाई देने लगा है । नक्सल प्रभावित इलाकों में केंद्र और राज्य सरकारों ने मिलकर समग्र विकास के प्रयास किए । नक्सलियों को सत्ता के भय से मुक्त किया और उनके शोषण पर लगाम लगाकर उनका विश्वास हासिल करने में आंशिक सफलता भी हासिल की । अर्धसैनिक बलों ने नक्सल प्रभावित इलाकों में आदिवासियों का विश्वास जीतने के फॉर्मूले पर काम किया गया और बहुत हद तक सफलता भी पाई । सरकार के रणनीतिकारों का मानना है कि आदिवासियों का जितना भरोसा सरकार या सत्ता पर बढ़ेगा उतना ही नक्सलियों को समर्थन मिलना कम होगा ।
नक्सलियों का समर्थन कम होने की एक और जो सामाजिक वजह है वह यह कि अब इस आंदोलन में अपराधी तत्वों का प्रवेश हो गया है जो आंदोलन के नाम पर इलाके में वसूली करते हैं । पैसेवालों का अपहरण करके फिरौती वसूलते हैं । इस तरह की भी कई खबरें सामने आईं जहां पता चला कि माओवादियों ने लड़कियों को जबरन अपने साथ रखकर उनका बलात्कार किया । सिद्धांत और विचारों का स्थान लूटपाट और चोरी डकैती ने ले लिया । जबरन हफ्ता वसूली, फिरौती, लड़कियों और महिलाओं के साथ बढ़ती बदसलूकी, आंदोलन के नाम पर हत्या आदि जैसी वारदातों ने आम जनता के मन में नक्सलियों के प्रति नफरत का भाव पैदा कर दिया । जो आदिवासी नक्सलियों को तम मन धन से समर्थन दे रहे थे वो अब डर से समर्थन देने लगे । लेकिन डर, खौफ या भय से मिला समर्थन ज्यादा दिन चलता नहीं है और जैसे ही मौका मिलता है वही समर्थन विरोध का स्वर बनकर खड़ा हो जाता है । माओवादियों का साथ भी वही हुआ । जैसे ही आदिवासी इलाके की जनता का माओवादियों से मन टूटा और राज्य सत्ता में भरोसा कायम हुआ वैसे ही विरोध के स्वर उठने लगे और जब भी मौका मिला विरोध या तो मुखर या फिर मौन के रूप में सामने आया । अब जरूरत इस बात की है कि इस बदलाव की अहमियत को समझते हुए राज्य सत्ता आदिवासियों का भरोसा तो जीते ही उनके दिल को जीतने भी कोशिश करे ताकि नक्सल समस्या का जड़ से अंत किया जा सके । लेकिन ऐसा लगता है कि लोकपाल के शोरगुल में इस देश के शासक वर्ग और जनता दोनों का इस समस्या से ध्यान लगभग हट सा गया है । नक्सलवाद हमारे देश के लिए एक ऐसी समस्या है जो लगभग नासूर की शक्ल अख्तियार कर चुका है ।
ऐसे में इस समस्या में अगर थोड़ा भी सकारात्मक बदलाव दिखाई देता है तो उसका प्रचार प्रसार होना चाहिए । इसका फायदा यह होगा कि नक्सल प्रभावित दूसरे इलाकों में सरकार के प्रति लोगों का भरोसा बढ़ेगा और नक्सलियों के प्रति भरोसा घटेगा । भरोसे के इसी घटत और बढ़त में इस समस्या का समाधान निकलेगा । लेकिन केंद्र में सरकार चला रही पार्टी कांग्रेस अपनी कामयाबियों को जनता तक पहुंचाने के लिए प्रयत्नशील ही नहीं है । कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता जनता से संवाद नहीं कर पा रहे हैं । अपनी कामयाबियों को जनता तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं । पहले पार्टी ने अपने दर्जनभर नेताओं की एक सूची जारी की जो मीडिया में पार्टी का पक्ष रखेंगे लेकिन उन नेताओं का कहीं अता पता नहीं है । नतीजा यह हुआ कि सरकार के प्रयत्नों से समाज में जो सकारात्मक बदलाव आए उसका प्रचार नहीं हो सका । वहीं विपक्ष और टीम अन्ना ने बढ़-चढ़कर सरकार की नाकामियों को मीडिया के जरिए जनता तक पहुंचाया । अभी हाल में सरकार के दस युवा मंत्रियों को सरकार की उपल्बधियों को जनता तक पहुंचाने का जिम्मा दिया गया । लेकिन ये युवा मंत्री भी गाहे बगाहे ही नजर आते हैं । नतीजा यह हो रहा है कि सरकार की उपल्बधियां जनता तक नहीं पहुंच पा रही है । लंबे समय से नक्सलियों का बडा़ हमला नहीं हुआ है, नक्सलियों का बड़ा नेता किशन जी को मारकर माओवादियों की कमर तोड़ दी गई । लेकिन इन कामयाबियों को नक्सल इलाकों में पहुंचाकर वहां की जनता का विश्वास जीतने का प्रयास नहीं किया जा रहा है । गरीबों के लिए खाने की गारंटी देनेवाला ऐतिहासिक कानून आनेवाला है जिसका बड़ा फायदा जंगलों में रहनेवालों को होगा यह बात भी उन इलाकों में नहीं पहुंच पा रही है । यूपीए सरकार अपने पहले कार्यकाल में हर छोटी बड़ी उपल्बधि का ढिंढोरा पीटती नजर आती थी वही अब आलस में डूबी नजर आ रही है । लेकिन वक्त आ गया है कि सरकार के कर्ताधर्ता सत्ता के मद से बाहर निकलें और जनता से संवाद स्थापित करें ताकि नक्सलवाद की समस्या को समूल खत्म किया जा सके ।

Thursday, June 17, 2010

धोखे का सरकारी दस्तावेज

मनमोहन सिंह सरकार ने अपनी दूसरी पारी में एक साल पूरे होने पर समारोहपूर्वक अपने कामकाज का लेखा-जोखा पेश किया । इस लेखा-जोखा को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की जनता के लिए रिपोर्ट के तौर पर पेश किया गया । इस रिपोर्ट कार्ड में मनमोहन सरकार ने मुख्यतया तेरह क्षेत्रों में अपनी उपलब्धियों का बखान किया । रिपोर्ट कार्ड की प्रस्तावना में प्रधानमंत्री ने बढ़ती महंगाई पर काबू पाने में अपनी सरकार की नाकामी सीधे तौर पर तो नहीं मानी लेकिन शब्दों की बाजीगरी को अगर डिकोड करें को यह साफ तौर पर सामने आती है । यह रिपोर्ट कहती है कि वैश्विक आर्थिक मंदी का सामना हमारी अर्थव्यवस्था ने बेहतर ढंग से किया । आर्थिक संकट से निबटने और सरकार की मानें तो उबरने में उसकी वृहद आर्थिक प्रबंधन की सरकार की कार्यनीति की सफलता साफ झलकती है । पता नहीं मनमोहन सिंह किस कार्यनीति और किस वृहद आर्थिक प्रबंधन की बात कर रहे हैं । सरकार अरना राजकोषीय घाटा पूरा करने के लिए थ्री जी मोबाइल सेवा से जुटाए गए लगभग एक लाख करोड़ का सहारा ले रही है । बेहतर आर्थिक प्रबंघन के नाम पर सरकार ने अभी चुपके से एक फरमान जारी कर दिया । सरकार ने इस बात को अनिवार्य कर दिया है कि शेयर बाजार में लिस्टेड सभी कंपनियों को अपने पच्चीस प्रतिशत शेयर जनता के लिए जारी करने होंगे । इसके पीछे की मंशा यह है कि सरकारी कंपनियों के शेयर भी बेचे जा सकें ताकि बढ़ते राजकोषीय घाटे को पाटा जा सके । अपनी संपत्ति बेचकर घाटा कम करना कैसा वित्तीय प्रबंधन है,आप अनुमान लगा सकते हैं ।
उधर पूरा देश महंगाई से त्रस्त है । जिस आम आदमी की बेहतरी के नाम पर कांग्रेस ने पिछले चुनाव में वोट मांगे थे वो त्राहिमाम कर रही है । जरूरी सामनों के अलावा हर चीज के दामों में जोरदार बढो़तरी हुई है । बीते सप्ताह में फूड इंफ्लेशन पौनै सत्रह फीसदी पहुंच गई है । सरकार विकास दर के बेहतर होने के नाम पर आंकड़ों की बाजीगरी में जुटी है । जनता को सुनहरे सपने दिखाए जा रहे हैं । लेकिन दरअसल जनता को विकास का सपना दिखाकर उसके साथ छल किया जा रहा है । सरकार के पास महंगाई पर लगाम लगाने के लिए ना तो कोई ठोस योजना है और ना ही इसपर काबू पाने के लिए दृढ इच्छा । हर बार केंद्र सरकार महंगाई के लिए राज्य सरकारों के सर ठीकरा फोड़कर अपनी जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश करती है ।
अपनी इस रिपोर्ट कार्ड में मनमोहन सिंह हर तरह की विपदा का इस्तेमाल अपनी नाकामियों को ढकने में करते दिख रहे हैं । महंगाई के लिए सरकार ने दो हजार नौ के में देश में आए सूखे को भी ढाल बनाने की कोशिश की है । यहां भी सरकार ने सूखे से निपटने के सरकार के कदमों को लेकर अपनी पीठ थपथापाई है । मनमोहन सिंह शायद यह भूल गए कि सूखे के बावजूद देश में अनाज के गोदाम भरे रहे । फूड कॉर्पोरेशन के गोदामों में अनाज खुले में सड़ते रहे और जनता के बीच पहुंच ही नहीं पाए । कीमतें आसमान छूती रही लेकिन सरकार है कि बेहतर प्रबंधन का ढोल पीट रही है । चीनी की कीमतों पर ही बात करें तो पहले देश से चीनी निर्यात में छूट दी गई फिर जब कीमतें बेकाबू होने लगी तो चीनी आयात किया गया । चीनी के आयात-निर्यात का खेल अलग से जांच का विषय है, जिसमें अगर ईमानदारी से तफ्तीश की जाए तो एक बड़ा घोटाला सामने आएगा । इस रिपोर्ट कार्ड में सरकार ने बढ़ती महंगाई पर नजर रखने की बात कही है लेकिन सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमतों को अंतराष्ट्रीय मूल्य की आड़ में बढाने के लिए भी एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए है । सरकार के वित्त और पेट्रोलियम मंत्री लगातार इस बात की वकालत कर रहे हैं कि पारिख कमेटी की रिपोर्ट जल्द से जल्द मानकर पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के दाम बढाए जाएं । बेहतर आर्थिक प्रबंधन का दावा करनेवाली सरकार को क्या यह नहीं मालूम है कि पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने से हर क्षेत्र में इसका असर पड़ेगा ।
बच्चो को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिए जाने और प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा में सुधार को लेकर सरकार अपने उठाए कदमों से गदगद है । शिक्षा का अधिकार कानून बना देने से ही सबको शिक्षा मिलनी शुरू हो जाएगी यह जरूरी नहीं है । यह कानून बना देना आसान है, यह भी मान लिया जा सकता है कि आपकी मंशा भी साफ है लेकिन इस बात पर विचार किया गया कि इस कानून को देशभर में लागू कैसे किया जाएगा, इसके लिए वांछित संसाधन कहां से जुटाए जाएंगें । बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे राज्य इस बात की आशंका जता चुके हैं कि धनाभाव की वजह से इस कानून को लागू करने में मुश्किल होगी । उच्च शिक्षा में सुधार के नाम पर विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए देश में आने का रास्ता खोल दिया गया । लेकिन शिक्षा के नाम पर व्यवसाय करनेवाले विदेशी विश्वविद्यालय ही यहां अपना कारोबार चलाएंगी । अभी तक इस बात के कोई संकेत नहीं है कि कैंब्रिज या ऑक्सफोर्ड जैसी प्रतिष्टित युनिवर्सिटी यहां अपना कैंपस खोलेंगी । देश में मेडिकल शिक्षा की क्या गत हुई है ये मेडिकल काउंसिल के मुखिया केतन देसाई की गिरफ्तारी के बाद साफ हो गया । अपनी इस रिपोर्ट कार्ड में सरकार ने स्कूली छात्रों को मिड डे मील देने का दंभ भी भरा है । लेकिन इस योजना की जमीनी हकीकत आए दिन सामने आती रहती है ।
ग्रामीण विकास के नाम पर भी सरकार ने बेहद बेशर्मी से अपनी उपलब्धियां गिनाई हैं । आज देश के ग्रामीण इलाकों में क्या हालत है ये किसी रिपोर्ट कार्ड से सामने नहीं आ सकता । इसके लिए उन इलाकों में जाने की जरूरत है । ग्रामीण विकास में ऐतिहासिक काम करने का दावा करनेवाली मनमोहन सरकार को विदर्भ के किसानों की खुदकुशी नजर नहीं आती । अगर मनमोहन सरकार के पिछले छह साल के कार्यकाल में सिर्फ विदर्भ में किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों को जोडा़ जाए तो यह एक सभ्य सरकार के मुंह पर तमाचा होगा । खाद पर सब्सिडी हटाने की भी साजिश रची जा रही है । कृषि प्रधान देश और अर्थवयवस्था में किसानों को सहूलियत देने के बजाए सरकार बडे़ उद्योगपतियों को सहूलियतें दे रही है । उनको टैक्स हॉलीडे के नाम पर अरबो रुपये की छूट दी गई लेकिन किसानों से ऋण वसूली के लिए बैंक के बाबू उसकी जान के पीछे पड़ जाते हैं । दो बड़ी विमान कंपनियों ने तेल के सात सौ करोड़ रुपए सरकार को नहीं चुकाए हैं लेकिन अबतक उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है । ये कुछ ऐसे मसले हैं जो समेकित विकास का दावा करनेवाली इस सरकारी रिपोर्ट कार्ड की चमक को फीका कर देते हैं ।
इस रिपोर्ट कार्ड में सुरक्षा के भी बड़े दावे किए गए हैं । सरकार ने कहा है कि वामपंथी उग्रवादियों से निपटने के लिए सुरक्षा विकास और जन धारणा जैसे क्षेत्रों में समेकित दृष्टिकोण अपनाया गया है । लेकिन सरकार और कांग्रेस पार्टी में वामपंथी उग्रवादियों से निपटने में जिसतरह का मतभेद दिखाई देता है उससे भ्रम की स्थिति बनती है । गृहमंत्री नक्सलियों के खिलाफ कड़े कदम उठाने की वकालत करते हैं तो कांग्रेस का महासचिव और पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने लेखों में कार्रवाई के साथ नरमी के भी संकेत देती है । नतीजा यह है कि पिछले दो महीने में वामपंथी उग्रवादियों ने तकरीबन तीन बड़े हमले कर तीन सौ से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार दिया । नक्सलियों से निपटने के लिए सरकार के पास कोई ठोस कार्ययोजना नहीं है ।
अपनी उपलब्धियों को गिनाते-गिनाते सरकार ने एक बेहद दिलचस्प उपलब्धि को अपनी इस रिपोर्ट कार्ड में सम्मिलित कर लिया । सरकार ने गिनाया है कि – प्रवासी भारतीय दिवस के अवसर पर आयोजित समारोह में पंद्रह सौ प्रवासी भारतीयों ने शिरकत की । सरकार ने इसमें से चौदह को प्रवासी भारतीय सम्मान पुरस्कार दिए । सत्तर पृष्ठ की उपलब्धि पुस्तिका में इस तरह के उपलब्धियों की भरमार है । दरअसल यह पूरी पुस्तिका जनता के साथ छल है और उसे भरमाने की एक सोची समझी चाल भी ।
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