Translate

Showing posts with label दिल्ली. Show all posts
Showing posts with label दिल्ली. Show all posts

Friday, May 3, 2024

फिल्म फेस्टिवल की रोचक कथा


कोरोना महामारी के दौरान फिल्मों के भविष्य को लेकर खूब चर्चा हुई। फिल्म के कई विशेषज्ञों ने सिनेमा हाल में फिल्मों के प्रदर्शन के अंत की आशंका भी जताई थी। इस तरह की तमाम आशंकाएं गलत साबित हुईं और भारतीय फिल्में न केवल पहले की तरह लोकप्रिय हुईं बल्कि पूरे देश में फिल्म संस्कृति और गाढ़ी हुई। फिल्मों की संस्कृति को मजबूत करने में फिल्म फेस्टिवल्स का बड़ा योगदान रहा है। दिल्ली में कई फिल्म फेस्टिवल्स होते रहे हैं। विश्व का सबसे बड़ा घुमंतू फिल्म फेस्टिवल का आयोजन पिछले ग्यारह वर्षों से दैनिक जागरण करता रहा है। जागरण फिल्म फेस्टिवल का आरंभ दिल्ली से होता है और देश के 18 शहरों में आयोजित होता है। दिल्ली में ओशियान फिल्म फेस्टिवल भी होता था। बीते कल (शुक्रवार) से दिल्ली में हैबिटैट फिल्म फेस्टिवल का आरंभ हुआ है। गोवा में आयोजित होनेवाला इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल आफ इंडिया (इफी) की शुरुआत मुंबई में हुई थी लेकिन उसी वर्ष दिल्ली में भी इसका आयोजन किया गया था। तब इस फेस्टिवल का आयोजन भारत सरकार के फिल्म प्रभाग ने किया था। दिल्ली में अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल शुरु होने की भी एक दिलचस्प कहानी है। जब देश स्वाधीन हुआ तो उसके करीब एक वर्ष बाद 1948 में भारत सरकार ने फिल्म प्रभाग की स्थापना की थी। तब इसका काम भारत सरकार से जुड़े कार्यों के बारे में जनता को बताना था। महेन्द्र मिश्र ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय सिनेमा’ में लिखा है, ‘सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत फिल्म्स डिवीजन की स्थापना 1948 में हुई। फिल्म्स डिवीजन उस समय शायद दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक केंद्र था जिसमें समाचार और अन्य राष्ट्रीय विषयों पर वृत्तचित्र बनाए जाते थे। ये वृत्तचित्र, समाचार चित्र और लघु फिल्में पूरे देश में प्रदर्शन के लिए बनती थीं। प्रत्येक फिल्म की नौ हजार प्रतियां बनती थीं जिनकी संख्या कभी कभी चालीस हजार तक पहुंच जाती थीं। ये भारत की तेरह प्रमुख भाषाओं और अंग्रेजी में पूरे देश में सभी सिनेमाहॉलों में मुफ्त प्रदर्शित की जाती थीं। समाचार चित्रों और लघु फिल्मों एवं वृत्तचित्रों का परोक्ष रूप से दर्शकों पर व्यापक प्रभाव पड़ा जिसने उनकी रुचि बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।‘ 

फिल्म प्रभाग के चीफ प्रोड्यूसर थे मोहन भवनानी। वो दिल्ली में ही सूचना और प्रसारण मंत्रालय के कार्यालय में बैठते थे। मोहन भवनानी जून 1951 में फिल्म विशेषज्ञों के एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए पेरिस गए थे। ये कार्यक्रम यूनेस्को ने आयोजित किया था। उस कार्यक्रम में फिल्म फेस्टिवल के आयोजनों और उसके प्रभाव पर जमकर चर्चा हुई थी। वहां से लौटकर मोहन भवनानी ने भारत सरकार को फिल्म फेस्टिवल के आयोजन संबंधी एक प्रस्ताव दिया। उनके इस प्रस्ताव को भारत सरकार ने स्वीकार कर लिया। उस समय तय ये किया गया था कि फिल्म फेस्टिवल का आयोजन देश के चार शहरों- बांबे (अब मुंबई), दिल्ली, कलकत्ता (अब कोलकाता) और मद्रास (अब चेन्नई) में करवाने का निर्णय हुआ। तय ये किया गया कि इनमें देशी विदेशी दोनों फिल्में दिखाई जाएंगी। दिल्ली में इस आयोजन को लेकर काफी तैयारियां की गई थीं। फिल्मी सितारों ने नईदिल्ली इलाके में रोडशो किया था। सितारों को देखने के लिए दिल्ली की सड़कों पर भारी भीड़ उमड़ी थी। कहीं-कहीं इस बात का उल्लेख मिलता है कि राजकपूर और नरगिस के अलावा भी कुछ कलाकारों ने दिल्ली में आयोजित प्रथम इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भाग लिया था। दिल्ली में उस समय सिनेमाघरों की संख्या कम थी इस कारण कई जगहों पर अस्थायी टेंट लगाकर सिनेमाघर बनाए गए थे और प्रोजोक्टर पर फिल्में दिखाई गई थीं। दिल्ली में चार हजार दर्शकों के लिए अस्थायी सिनेमाघर तैयार किए गए थे। 21 फरवरी 1952 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दिल्ली में आयोजित फिल्म फेस्टिवल का शुभारंभ किया था। इस समारोह में भाग लेनेवाले कलाकारों के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति डा राजेन्द्र प्रसाद ने राष्ट्रपति भवन में विशेष भोज का आयोजन किया था और बताया जाता है कि राजेन्द्र बाबू पूरे समय उपस्थित रहे थे। उन्होंने दुनियाभऱ में फिल्मों के ट्रेंड के बारे में कलाकारों से बातचीत की थी। इस रात्रिभोज में उस समय के सूचना और प्रसारण मंत्री आर आर दिवाकर भी उपस्थित थे।

दिल्ली में आयोजित फिल्म फेस्टिवल में अमेरिका, इटली, फ्रांस और रूस समेत 23 देशों के फिल्मकारों ने भाग लिया था। अमेरिका के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व मशहूर निर्देशक फ्रैंक कैपरा ने किया था। इसमें 40 फीचर फिल्में और करीब 100 गैर फीचर फिल्में प्रदर्शित की गई थीं। दिल्ली के दर्शकों ने इटली की फिल्म बायसकिल थीब्स, मिरेकल इन मिलान और ओपन सिटी को खूब पसंद किया था। इस फिल्म फेस्टिवल में ही जापान के प्रख्यात फिल्म निर्देशक अकीरा कुरोसावा की फिल्म राशोमन भी दिखाई गई थी। कहा जाता है कि पहले फिल्म फेस्टिवल में ही बिमल राय ने इटली की फिल्म बायसकिल थीब्स देखने के बाद ही उनके मन में दो बीघा जमीन बनाने का आयडिया आया। कहा तो ये भी जाता है कि इस फिल्म ने ही भारतीय फिल्मकारों को यथार्थवादी फिल्में बनाने के लिए प्रेरित किया। 

1952 में आयोजित फिल्म फेस्टिवल के बाद अपने देश में विदेशी फिल्मों को लेकर रुचि जाग्रत हुई। कई अन्य देशों के फिल्मों से परिचय होना आरंभ हुआ। अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल की उस समय काफी चर्चा हुई थी, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी दिल्ली के आयोजन में उपस्थित थे। बावजूद इसके दूसरे आयोजन में नौ वर्ष लगे और अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल का दूसरा संस्करण 1961 में आयोजित हो सका। फिल्म फेस्टिवल का दूसरा संस्करण नईदिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित किया था। चार वर्षों के बाद फिर फेस्टिवल का आयोजन हुआ। फिर चार वर्षों के अंतराल पर दिल्ली के अशोक होटल में इसका आयोजन हुआ। इसके बाद फिल्म फेस्टिवल का आयोजन तीन चार वर्षों के अंतराल पर होता रहा। 1983 में अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल का आयोजन दिल्ली के सीरीफोर्ट आडिटोरियम में हुआ था।  फिल्म फेस्टिवल देश के अलग अलग शहरों में हो रहा था। लंबे अंतराल के बाद दिल्ली में होता था तो दर्शकों के बीच काफी उत्सुकता रहती थी। दिल्ली में भारतीय अंतराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का 34वां संस्करण अक्तूबर 2003 में आयोजित किया गया था। इसके बाद से केंद्र सरकार ने निर्णय लिया और अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल को प्रतिवर्ष गोवा में आयोजित किया जाएगा। तब से गोवा में आयोजित हो रहा है। दिल्ली में जागरण फिल्म फेस्टिवल, हैबिटैट फिल्म फेस्टिवल और आईआईसी फिल्म फेस्टिवल का आयोजन होता है जिसमें दर्शकों को क्षेत्रीय और विदेशी फिल्में देखना का अवसर मिल जाता है।   

Saturday, April 30, 2022

कलाकारों के सम्मान की संस्कृति


पिछले दिनों मुंबई जाने का अवसर मिला । महानगर के अलग अलग हिस्सों से गुजरते हुए सड़कों के नाम ने ध्यान आकृष्ट किया। मुंबई के बांद्रा इलाके से गुजरते हुए सबसे पहले नजर पड़ी एक विशाल पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर। चबूतरा छोटे छोटे सफेद पत्थरों से सजा था। उन पत्थरों के बीच उगे पौधों के बीच कलात्मक तरीके से लिखी गई एक पट्टिका लगी थी। उस पर लिखा था बिमल राय पथ। स्थानीय लोगों ने बताया कि वहां पास ही में भारतीय फिल्मों के महानतम निर्देशकों में से एक बिमल राय का घर हुआ करता था। ये वही बिमल राय हैं जिन्होंने दो बीघा जमीन, मधुमती, देवदास जैसी कालजयी फिल्मों का निर्माण किया था। थोड़ा आगे बढ़ने पर ब्रांद्रा रिक्लमेशन के एक तिराहे पर मशहूर गजल गायक पद्मभूषण जगजीत सिंह का नाम दिखा। बताया गया कि उनकी पांचवीं पुण्यतिथि पर इस तिराहे को जगजीत सिंह की स्मृति में समर्पित किया गया। ब्रांद्रा के ही पाली हिल इलाके में अपने जमाने की मशहूर अभिनेत्री नरगिस दत्त के नाम भी एक सड़क दिखी। फिर तो मुंबई घूमते हुए सड़कों के नाम पर नजर जाने लगी। नरीमन प्वाइंट से उपनगरीय इलाकों की तरफ बढते हुए संगीतकार नौशाद अली मार्ग दिखा। सांताक्रूज इलाके में आर डी बर्मन और खार इलाके में एस डी बर्मन साहब के नाम की पट्टिका दिखी। जुहू इलाके में कैफी आजमी के नाम पर पार्क, हास्य कलाकार महमूद के नाम पर चौक, ख्वाजा अहमद अब्बास के नाम पर एक सड़क। ये सूची बहुत लंबी है। मुंबई में परिचितों ने बताया कि पूरे महानगर में कलाकारों, लेखकों के नाम पर सड़कों और चौराहों का नामकरण किया गया है। अब भी किया जाता है।  

मुंबई में गीतकार, संगीतकार, गायक, अभिनेता, फिल्म निर्देशक आदि के नाम पर बनी सड़कों के नाम देखकर अचानक दिल्ली की सड़कों के नाम याद आने लगे। दिल्ली की सड़कों के नाम याद करने पर बाबर रोड, अकबर रोड, लोधी रोड, औरंगजेब लेन, तुगलक रोड, शेरशाह रोड, शाहजहां रोड, अशोक रोड, हुमांयू रोड, महात्मा गांधी मार्ग, इंदिरा चौक, राजीव गांधी चौक आदि का नाम जेहन में आता रहा। लेखकों आदि के नाम पर सड़कों के नाम याद करने की कोशिश करने लगा। सबसे पहले स्मरण हुआ तमिल लेखक कवि सुब्रह्मण्य भारती मार्ग का,अमृता शेरगिल मार्ग, रविशंकर लेन  का फिर याद आया रूस के प्रसिद्ध लेखक टालस्टाय के नाम बनी सड़क का और हिंदी लेखिका दिनेश नंदिनी डालमिया मार्ग का। ढाई दशक से अधिक समय से दिल्ली में रहने के बावजूद याद नहीं पड़ता कि कहीं प्रेमचंद मार्ग हो, निराला मार्ग हो या भारतीय रंगमंच के दिग्गज इब्राहिम अल्काजी के नाम पर ही किसी सड़क का नाम हो। दिल्ली देश की राजधानी है, यहां तो पूरे देश के बड़े लेखकों, कलाकारों के नाम पर सड़कों के नाम होने चाहिए। दिल्ली में रवीन्द्र नाथ टैगोर के नाम पर कोई सड़क नहीं है लेकिन इजरायल के शहर तेल अवीव में टैगोर स्ट्रीट है। दिल्ली में तेलुगू के महान लेखक वी सत्यनारायण या मलयालम के महत्वपूर्ण लेखकों में से एक जी शंकर कुरुप के नाम पर भी कोई सड़क नहीं है। स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभानेवाले मध्यप्रदेश के माखनलाल चतुर्वेदी के नाम भी कोई मार्ग दिल्ली में नहीं है। 

प्रश्न ये उठता है कि दिल्ली और मुंबई में ये अंतर क्यों है? दिल्ली अपने नायकों को लेकर इतनी उदासीन क्यों है और मुंबई अपने लेखकों और कलाकरों को लेकर इतना उदार क्यों है?  इसके पीछे के कारणों को देखने पर ये प्रतीत होता है कि मुंबई मराठों की संस्कृति से प्रभावित रहा और दिल्ली मुगलों की संस्कृति के प्रभाव में रहा। मराठा राजाओं के शासनकाल के दौरान अपने कौशल या अपनी कला से समाज को प्रभावित करनेवालों को सम्मान देने की परंपरा रही है। पूरा समाज उनके प्रति एक ऋणभाव में रहता है। मुगलों के दरबार में भी कला और कलाकारों का सम्मान होता था लेकिन सर्वोच्च सम्मान  बादशाह को ही मिलता था। मुगलिया शासन के दौरान इमारतों और स्मारकों के नाम भी बादशाह या बादशाह के परिवारवालों के नाम पर ही बनाए गए। भारत में मुगल सल्तनत की स्थापना भले ही जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर ने की लेकिन इस देश में मुगलों की सांस्कृतिक सत्ता का संस्थापक हुमांयू था। जब हुमांयू दूसरी बार दिल्ली की गद्दी पर बैठा तब उसने भारत में फारसी कलाओं को बढ़ाना आरंभ किया था। उसने फारसी वास्तुकला, चित्रकला, स्थापत्य कला को प्राथमिकता देकर भारतीय कलाजगत को नेपथ्य में धकेलने का कार्य किया। उसने इस कार्य के लिए फारस के वास्तुविद, चित्रकार आदि हिन्दुस्तान बुलाए थे। समय के साथ भले ही मुगल सल्तनत का अंत हो गया लेकिन जिस सांस्कृतिक सल्तनत की स्थापना हुमांयू ने की थी वो अब भी किसी न किसी रूप में कहीं न कहीं दिखता ही रहता है। 

मेरे देश पर मुगलों ने तीन सौ साल से अधिक समय तक शासन किया। उसके बाद अंग्रजी राज स्थापित हुआ लेकिन उसका कालखंड मुगलों की तुलना में कम रहा। भारतीय समाज और संस्कृति को अंग्रेजों ने भी प्रभावित किया लेकिन जिस योजनाबद्ध तरीके से मुगलों ने यहां की संस्कृति को बदलने का कार्य किया वो अंग्रेज नहीं कर पाए। दिल्ली की संस्कृति बादशाहों और शासकों से प्रभावित रही। स्वाधीनता के बाद भी वही हाल रहा। पहले तो कई वर्षों तक सड़कों और इमारतों के नाम अंग्रेजों और मुगल शासकों के  नाम पर रहे। स्वाधीनता के बाद जब सड़कों और इमारतों के नाम आदि बदलने आरंभ हुए तो नेताओं को ही प्राथमिकता मिली। नई दिल्ली का मंडी हाउस इलाका सांस्कृतिक केंद्र माना जाता है लेकिन वहीं पर पास में बाबर रोड है, बाबर लेन है। कलाकारों के नाम पर सिर्फ सफदर हाशमी और तानसेन मार्ग है। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में दिल्ली के इस सांस्कृतिक इलाके के गोल चक्कर का नाम किसी भारतीय लेखक या कलाकार के नाम पर किया जाना चाहिए। बेहतर होता कि इंडिया गेट गोलचक्कर से निकलनेवाले मार्गों के नाम भी मुगल बादशाहों की जगह भारतीय समाज के नायकों के नाम पर रख पाते। यह अल्कपनीय है कि जिस बाबर ने हमें गुलाम बनाया, जिस हुमांयू ने हमारी संस्कृति को नष्ट करने का षडयंत्र रचा उन आततायियों के नामों को हम आज भी अपनी यादों में संजोए हुए हैं। जिस तरह से धीरे-धीरे अंग्रजों के नाम हटाकर सड़कों के नाम भारतीय नेताओं के नाम पर रखे गए उसी तरह से मुगलों के नाम पर बने सड़कों के नाम भारतीयों के नाम पर होने चाहिए। दरअसल मुगलों का नाम हटाने को लेकर राजनीति आरंभ हो जाती है और सरकारें बैकफुट पर आ जाती हैं। यह अनायास नहीं है कि दिल्ली में औरंगजेब रोड का नाम बदलकर ए पी जे अब्दुल कलाम तो कर दिया गया लेकिन औरंगजेब लेन का नाम नहीं बदला जा सका। केंद्र सरकार को सड़कों के नामकरण को लेकर एक स्पष्ट नीति बनानी चाहिए। एक ऐसी नीति जिसमें ये प्रविधान हो कि लेखकों और कलाकारों के नाम पर भी सड़कों के नाम रखे जा सकें। अगर हम आनेवाली पीढ़ियों को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत सौंपना चाहते हैं तो सबसे पहले उनके मानस पर उन कला मनीषियों का नाम अंकित करना होगा। उसका सबसे आसान तरीका है सड़कों और इमारतों का नाम उनके नाम पर रखे जाएं। इससे हमारी सांस्कृतिक विरासत भी संरक्षित होगी और आततातियों के नाम भी धीरे-धीरे इतिहास की पुस्तकों में कैद होकर रह जाएंगे। लेखकों और कलाकारों के सम्मान की सस्कृति भी विकसित होगी।  

Saturday, September 18, 2021

राजधानी में गुलामी के निशान?


सरकारी नीतियों और फैसलों को लागू करने में नौकरशाही की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अगर अधिकारी योग्य और कार्यक्रमों को लागू करने की कला में माहिर होता है तो उसको लंबे समय तक याद रखा जाता है। राजनीति के गलियारों में भी उसकी पूछ होती है और उसको समय के साथ बड़ी भूमिकाएं दी जाती हैं। ऐसे ही एक अंग्रेज अधिकारी थे विलियम मैल्कम हेली। 1895 में उन्होंने भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) की परीक्षा पास की और अधिकारी बने। भारत में उनकी पहली पोस्टिंग उपनिवेशन (कोलोनाइजेशन) अधिकारी के तौर पर हुई। उस दौर में उपनिवेशन अधिकारी के अन्य कार्यों में एक कार्य औपनिवेशिक शासन को मजबूत करना था ताकि उसका विस्तार संभव हो सके। मैल्कम हेली ने झेलम में अपनी पदस्थापना के समय ये काम बखूबी किया और बरतानिया सरकार ने उनके कामकाज से खुश होकर 1912 में उनको दिल्ली का कमिश्नर नियुक्त कर दिया। वो इस पद पर छह साल तक रहे। इस दौरान उन्होंने ब्रिटिश राज को अपनी कामों से मजबूती भी दी और जनता के बीच अलग अलग तरीकों से स्वीकार्यता बढ़ाने का काम भी किया। औपनिवेशिक शक्तियों को मैल्कम हेली लगातार अपने काम से खुश कर रहे थे और करियर के शिखर की ओर बढ़ रहे थे। उस दौर के इस तरह के अफसर जनता को बेहतर सपने दिखा कर ब्रिटिश राज के समर्थन में करने की कोशिश कर रहे थे। ये अंग्रेजों की रणनीति का हिस्सा था कि एक तरफ सैन्य सख्ती और दूसरी तरफ प्रशासनिक नरमी से गुलामी की व्यवस्था को बनाए रखा जा सके। 

मैल्कम हेली बाद में पंजाब और तत्कालीन संयुक्त प्रांत के गवर्नर भी बने। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल की वेबसाइट पर इस बात की जानकारी है। उपनिवेशवादी ताकतों को मजबूत करनेवाले इसी अंग्रेज अफसर के नाम पर नई दिल्ली में एक सड़क है नाम है हेली रोड। नई दिल्ली में पहले कई अंग्रेज अफसरों, सैन्य अधिकारियों और ब्रिटिश राज से जुड़े कई लोगों के नाम पर सड़कें आदि थीं। उन सड़कों का नाम धीरे धीरे बदला गया। लेकिन अब भी कई सड़कें विदेशी आक्रांताओं और देश को लंबे समय तक गुलामी की जंजीर में रखनेवालों और उनके मददगारों के नाम पर मौजूद हैं। आज जब पूरा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव वर्ष मना रहा है तो उपनिवेश के इन चिन्हों को मिटाने का अनुकूल समय । बेहतर होगा कि देश को गुलाम बनाए रखने में भूमिका निभानेवाले अफसरों और आक्रांताओं के नाम हटाकर हम भारत के उन सपूतों के नाम पर इन सड़कों और इमारतों का नाम रखें जिन्होंने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान किया। जिन्होंने स्वाधीनता के स्वप्न को साकार करने में अपने प्राणों की आहुति दी।  


Thursday, August 15, 2019

दिल्ली विश्वविद्यालय में पनपा प्रेम


इस वक्त हिंदी के सबसे समादृत लेखकों में से एक नरेन्द्र कोहली ने लंबे समय तक दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन किया। उन्होंने भारतीय पौराणिक चरित्रों पर विपुल लेखन किया है। उनको पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया है। अभी वे केंद्रीय फिल्म प्रमाणण बोर्ड के सदस्य हैं। उन्होंने दिल्ली के अपने शुरुआती दिनों को मुझसे साझा किया। 

मैं 1961 में यानि आज से 68 साल पहले जमशेदपुर से दिल्ली आया। मैंने जमशेदपुर के कॉपरेटिव कॉलेज से बीए किया था और एम की पढ़ाई के लिए दिल्ली आया। उस वक्त डाक से ही नामांकन आदि हो जाते थे। मुझे रामजस कॉलेज का छात्रावास मिला था और मैं दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरकर सीधे छात्रावास में रहने चला गया था। उस समय दिल्ली विश्वविद्यालय में एमए के लिए भी किसी कॉलेज में नामांकन होता था और क्लास के लिए पोस्ट ग्रेजुएट विभाग में जाना पड़ता था। 1963 में मैंने एमए पास किया और उसी वर्ष मुझे डी ए वी कॉलेज में सहायक व्याख्याता की नौकरी मिल गई जहां मेरा वेतन सवा तीन सौ रुपए प्रतिमाह था। उस वक्त डीएवी कॉलेज पहाड़गंज थाने के पीछे चला करता था। तब डीएवी कॉलेज ईवनिंग कॉलेज हुआ करता था जो कि मुझे बहुत पसंद नहीं था। मुझे लगता था कि शादी-वादी करनी है और जीवन व्यवस्थित करना है तो किसी और कॉलेज में नौकरी करनी चाहिए। 1965 में मैं गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज, जो अब मोतीलाल नेहरू क़लेज है, में व्याख्याता बनकर आ गया। यहां मेरा वेतन भी करीब साढे चार सौ रुपए प्रतिमाह हो गया था। 1965 में ही मैंने विवाह का इरादा किया। दिल्ली विश्वविद्यालय में मधुरिमा मुझसे एक साल जूनियर थी। उससे विभाग में देखा देखी होती थी, थोड़ी बातचीत, कभी कभार कटाक्ष आदि भी होता था। हम दोनों एक दूसरे के प्रति आकर्षित थे,, प्रेम भी करते थे पर प्रपोज नहीं कर पाए थे। जब मेरी मौकरी लग गई और मधु फाइनल इयर में आ गई तो एक दिन हमने तय किया कि अब शादी कर लेनी चाहिए। शादी के बाद हमलोग बंगाली मार्केट इलाके में बाबर प्लेस में रहने आ गए। किसी सरकारी बाबू का घर था जो हमने किराए पर लिया था। ये 1967 की बात है उस वक्त बाबर प्लेस के घर का किराया काफी कम था। दो साल बाद हम ग्रेटर कैलाश वन के एस ब्लॉक में रहने आ गए।
मई 1967 में ग्रेटर कैशाल इलाका काफी खाली था। हर दूसरे घर पर टू लेट का बोर्ड लगा था। उस इलाके में अगर आप किराए का मकान देखने जाते तो मकान मालिक आपकी बांहें पकड़कर अपना घर किराया पर देने को तैयार होते थे। हमने 275 रु प्रतिमाह के किराए पर घर लिया और वहां 17 वर्षों तक रहे। उस वक्त ग्रेटर कैलाश इतना खाली था कि आप अभी कल्पना नहीं कर सकते। हमें शॉपिंग आदि करने के लिए साउथ एक्सटेंशन जाना पड़ता था या फिर लाजपत नगर। हमारे देखते देखते ग्रेटर कैलाश में भीड़ इतनी बढ़ गई क्या कहने। 17 साल बाद जब हमने पीतमपुरा में अपना घर बनाया और किराए का मकान छोड़ा तो ग्रेटर कैलाश का चेहरा पूरी तरह बदल गया था। हम 17 साल तक 275 रु प्रतिमाह के किराए पर ही रहे। मकान मालिक अमेरिका में रहता था और कभी कभार ही किराया बढ़ाने को कहता लेकिन कभी बढ़ाया नहीं। जब हम मकान खाली कर रहे थे तो उस वक्त घर खाली करने का रेट तीन लाख रुपए था जो मकान मालिक अपने किराएदार को देता था। लेकिन मैंने कोई पैसा नहीं लिया क्योंकि मुझे ये अनुचित लगा था।
1983 के नवरात्रों में मैं पीतमपुरा में रहने आ गया था। मैंने कहीं पढ़ा था कि ये इलाका पृथ्वीराज चौहान के नाम पर था और पहले इसका नाम पृथोपुरा होता था जो बाद में पीतमपुरा हो गया। और अब तो डीडीए ने इसका नाम बदलकर मौर्य एंक्लेव कर दिया है। पीतमपुरा में जिस सड़क पर हमारा घर था वहां कोई ट्रैफिक नहीं होता था लेकिन अब तो उस सड़क को पार करने में दस मिनट लग जाते हैं। शादी के पहले हमलोग बहुधा फिल्में देखने जाते थे। हमारा पसंदीदा सिनेमा हॉल रिवोली, रीगल और ओडियन हुआ करता था। लेकिन मुझे नाटक देखना ज्यादा पसंद था। बंद थिएर में मुझे अजूब सी घुटन होती है। और पिछले लगभग 35 साल से मैंने थिएटर में जाकर कोई फिल्म नही देखी। नाटक के समय पर भी यानि शाम में जब उसका मंचन होता है तो ट्रैफिर इतना होता है कि देखने जाने की हिम्मत नहीं होती है। दिल्ली काफी बदल गई है, भीड़ और गाड़ियों ने इस शहर की शक्ल पूरी तरह से बदल दी है।
(अनंत विजय से बातचीत पर आधारित)     

Thursday, June 20, 2019

बदल गई है दिल्ली की संस्कृति


मीडिया के विभिन्न आयामों पर हिंदी में शोधपूर्ण लेखन कुमुद शर्मा की पहचान हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर और हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय की निदेशक कुमुद शर्मा ने स्त्री विमर्श को अपने तरीके से व्याख्यायित किया है। उनको भारतेन्दु हरिश्चद्र सम्मान, साहित्यश्री सम्मान समेत कई पुरस्कार मिल चुके हैं। दिल्ली की अपनी यादें मेरे साथ साझा की।

मैं 1981 में इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से दिल्ली आई थी। दिल्ली के बारे में बात करने के पहले आपको एक दिलचस्प बात बताती हूं। प्रयागराज निवासी होने के बावजूद मैंने तय किया था कि मैं उस शहर के लड़के से शादी नहीं करूंगी। लेकिन जब आप प्रेम में पड़ते हैं तो सारी तय की गई चीजें धरी रह जाती हैं। मुझे भी प्रेम हुआ और प्रयाग के लड़के से ही हुआ, शादी भी उसी से कर ली। शादी करके हम दोनों दिल्ली आ गए। दिल्ली में मॉडल टाउन इलाके में रहने लगे। मैं 1981 के मई या जून में दिल्ली आई थी और नवंबर 1981 में मुझे जीसस एंड मेरी कॉलेज में लेक्चरर की नौकरी मिल गई। मुझे मॉडल टाउन से बापू धाम हर रोज बस से आना पड़ता था। प्रयागराज में बस कल्चर था नहीं तो मेरे लिए ये नई बात थी। मेरे पति मुझे सिखाते कि कैसे रॉड पकड़कर बस में चढ़ो, कैसे उतरो आदि। कई बार तो वो बस स्टॉप तक इसलिए आते थे कि मुझे बस में चढ़ा दें। इतनी लंबी दूरी तय करना हर रोज संभव नहीं हो पा रहा था। 15 दिनों में ही मैंने वो नौकरी छोड़ दी थी। उस समय लेक्चरार को 1300 रु प्रतिमाह वेतन मिलता था। मुझ पीएचडी के लिए 900 रु प्रतिमाह स्कॉलरशिप मिलती थी। मैंने तय किया कि पीएचडी करूंगी। उस दौर में हमारे पास पैसे कम होते थे, मैंने अखबारों और पत्रिकाओँ में लिखना शुरू कर दिया था ताकि कुछ अतिरित आय हो सके। धीरे धीरे बस में चलने की आदत सी बन गई तो दिल्ली भाने लगी। तब बसों का किराया तीस पैसे से लेकर पचास पैसे तक हुआ करता था। मेरे पति मुझे दिल्ली दर्शन करवाने के लिए मुद्रिका बस पर बैठाकर निकलते थे। उस वक्त रिंग रोड पर मुद्रिका बस सेवा चला करती थी जो मॉडल टाउन से चलकर पूरी दिल्ली का चक्कर लगाकर वापस मॉडल टाउन तक आती थी। मुद्रिका में बैठे-बैठे हम दिल्ली दर्शन किया करते थे। मॉडल टाउन में उस दौर में काफी साहित्यकार और लेखक रहा करते थे। कवि अजित कुमार का घर हमारे लिए हमेशा खुला रहता था। कथाकार मन्नू भंडारी तब शक्तिनगर इलाके में रहती थीं और हमलोग उनके घऱ पहुंच जाते थे। पर हमारा अड्डा मंडी हाउस में जमता था। वहीं पास में त्रिवेणी कला संगम के कैंपस में बहुत सारे साहित्यकारों से मिलना हो जाता था। सप्ताह में एक दिन बंगाली मार्केट के नाथू स्वीट्स में बैठकी जमा करती थी, बैठकी का मकसद वहां का स्वादिष्ट खाना होता था। इसके अलावा वहां से दूरदर्शन कार्यालय पास में था। मैं सोचा करती थी कि दूरदर्शन में न्यूज रीडर बनूंगी। एक दिन हम लोग त्रिवेणी में बैठे गपबाजी कर रहे थे तो मैंने दूरदर्शन में काम करने की अपनी इच्छा जाहिर की। हमारे मित्रों ने कहा कि वहां मत जाना, वहां का माहौल खराब है। लेकिन मैं एक दिन वहां जा पहुंची । अखबारों और पत्रिकाओं में लिखे अपने लेखों की कटिंग आदि दिखाया। वहां हमें काम मिला, पहले एक कार्यक्रम में फिर पत्रिका कार्यक्रम में। कहीं किसी तरह की दिक्कत नहीं आई।
1983 में मैंने फिर से दिल्ली विश्वविद्यालय के श्यामा प्रसाद मुखर्जी कॉलेज ज्वाइन कर लिया था। इसकी भी एक दिलचस्प कहानी है। मैं जब इंटरव्यू देने पंजाबी बाग पहुंची जहां ये कॉलेज था। किसी से कॉलेज का पता पूछा तो उसने बता दिया कि पास ही में है। वो पास ही में करीब तीन किलोमीटर दूर था। जब कॉलेज पहुंची तो इंटरव्यू का वक्त निकल गया था। किसी तरह से इंटरव्यू हुआ। एक साक्षात्कारकर्ता ने पूछा कि जब आप इंटरव्यू में ही लेट आ रही हैं तो नौकरी में समय पर कैसे आ पाएंगीं। मैंने गलत बस स्टॉप पर उतरने की बात बताकर अपनी जान बचाई।
आज अड़तीस साल बाद जब दिल्ली के बारे में सोचती हूं तो लगता है कि दिल्ली ने हमसे संघर्ष बहुत करवाया लेकिन मेरे व्यक्तित्व को बहुत आयाम भी दिए। दिल्ली एक ऐसी जगह है जो कहीं से भी आए लोगों को बहुत कुछ देती है, हां बहुत मेहनत करवाने के बाद देती है। आज दिल्ली बहुत बदल गई है। यहां दिखावा बहुत बढ़ गया है, लोगों के पास अपने पड़ोसी या दूसरों के लिए वक्त ही नहीं है। पहले भी लोग व्यस्त होते थे लेकिन आज की तरह की संवेदनहीन व्यस्तता नहीं थी। करीब चार दशक तक दिल्ली मे रहने के बाद यह कह सकती हूं कि दिल्ली की संस्कृति बहुत बदल गई है।
(अनंत विजय से बातचीत पर आधारित)

Thursday, May 30, 2019

ये वो दिल्ली तो नहीं...


मैत्रेयी पुष्पा हिंदी की वरिष्ठ और चर्चित उपन्यासकार हैं। इनकी कहानियों पर टेलीफिल्मों का भी निर्माण हो चुका है। ये दिल्ली की हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष रह चुकी हैं। इनको सार्क लिटरेरी अवॉर्ड समेत कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं। वो आज से पांच दशख पहले दिल्ली आई थीं, उनसे उनकी यादों के बारे में मैंने बातचीत की। 

मैं आज से करीब 51 साल पहले ग्वालियर से दिल्ली आई। मेरे पति डॉ आर सी शर्मा को आल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) में नौकरी मिली थी। कुछ दिनों तक एम्स के हॉस्टल में रहे, फिर साउथ एक्स में किराए के घर में रहे। जल्द ही एम्स के वेस्टर्न कैंपस में हमें घर मिल गया। उस वक्त सरकारी आवास के लिए इतनी लंबी लाइऩ नहीं होती थी बल्कि घरों की ही लाइऩ होती थी कि कोई भी पसंद कर लो। एम्स के वेस्टर्न कैंपस और एम्स के मुख्य इमारत के बीच की जो सड़क थी वो एकदम सूनी रहती थी। उस वक्त दिल्ली में सड़कों में एकदम भीड़-भाड़ नहीं होती थी। कभी अखबारों में पढ़ते कि उस वक्त के कलकत्ता या बंबई में जाम लग गया तो हम चर्चा किया करते थे कि पता नहीं जाम कैसा होता है और वो कैसे लगता है। एक और दिलचस्प किस्सा बताती हूं। एक दिन हम अपने बच्चों के साथ अपनी गाड़ी से कहीं जा रहे थे। डॉक्टर साब गाड़ी चला रहे थे और मेरी बेटी मोहिता उनके साथ बैठी थी। हमलोग पीछे की सीट पर थे। कार का अगला दरवाजा खुला रह गया और मोहिता चलती कार से नीचे गिर गई। लेकिन सड़क पर ट्रैफिक नहीं होने की वजह से कोई दुर्घटना नहीं हुई। अब इस तरह की बात सोची भी नहीं जा सकती है। उस वक्त दिल्ली की सड़कों पर दो ही गाड़ियां दिखती थीं अंबेसडर और फिएट।
तब दिल्ली में जगह ही जगह हुआ करती थी। फ्लैट सिस्टम आया नहीं था। क्वाटर होते थे ज्यादातर, दो मंजिले। पहले मुनरिका इलाके में फ्लैट बने जिसकी कीमत 45000 रु थी, उसके बाद सफदरजंग इलाके में फ्लैट बने जो 52000 के थे। तब मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए ये फ्लैट महंगे थे।
दिल्ली में हम साथी डॉक्टरों के परिवारों के साथ जमकर पिकनिक करते थे। घर से खाना बनाकर कभी बुद्धा गार्डन या लोदी गार्डन तो कभी चिड़ियाघर तो कभी कुतुबमीनार। उस वक्त एम्स के अंदर एकदम गांव जैसा अपनापन था। घूमने के लिए चांदनी चौक जाते थे। स्कूटर पर बैठते थे और तुरंत पहुंच जाते थे क्योंकि ट्रैफिक होता नहीं था। हां, करोलबाग मार्केट और सरोजनीनगर बाजार में अपेक्षाकृत भीड़ हुआ करती थी इस वजह से हम इन बाजारों में लगभग नहीं जाते थे। अपने पड़ोसियों के साथ खूब घूमते फिरते थे। हमारे आपसी संबंध बहुत अच्छे थे। मेरी पड़ोसी पीएचडी कर रही थीं तो मैं उनके पति के लिए खाना बना देती थी। एम्स में इफ्तार की दावतें खूब हुआ करती थीं, कभी हमारे घर तो कभी डॉ गुप्ता के घर तो कभी डॉ शर्मा के घर तो कभी इल्माना के घर। पिकनिक से लेकर दावतों के लिए हम सब साउथ एक्सटेंशन मार्केट में शॉपिंग किया करते थे। इतने सालों से नोएडा में रहने के बाद अब भी खरीदारी के लिए हम साउथ एक्सटेंशन ही जाते हैं। उस वक्त हमारे मनोरंजन का एक और साधन होता था फिल्में देखना। गौतम नगर में ‘सुदर्शन’ नाम का एक सिनेमा हॉल था। हमारे घर के पास था लेकिन पुराना होने की वजह से हम उसमें कम ही फिल्में देखते थे। मुझे याद है कि हमने ‘ब्रह्मचारी’ फिल्म ‘सुदर्शन’ सिनेमा हॉल में ही देखी थी। उस वक्त सफदरजंग में ‘कमल’ सिनेमा बना ही था। वहां हम ज्यादा जाया करते थे। अच्छी फिल्म देखने तो दरियागंज के ‘गोलचा’ सिनेमा तक पहुंच जाते थे। चिड़ियाघर के पास एक सिनेमा हॉल हुआ करता था वहां भी हम गाहे बगाहे फिल्म देखने चले जाते थे। मुझे याद है कि फिल्म ‘अनोखी रात’ हमने वहीं देखी थी।
दिल्ली में जब हम आए थे तो तब बहुत सुकून था, हमने 1971 युद्ध भी देखा, 1975 की इमरजेंसी भी देखी और 1984 में सिख विरोधी दंगे भी देखे, मंडल कमीशन के लागू होने के बाद की हिंसा भी देखी । पर दो प्रसंग अब भी कचोटते हैं। एक तो 1971 के युद्ध के समय जब एम्स में दो मुस्लिम डॉक्टरों को निगरानी की जिम्मेदारी नहीं दी गई थी। हम कई दिनों तक उन दोनों का सामना नहीं कर पाते थे। दूसरी 1984 में। मेरी झांसी की एक दोस्त थी वो सिख थी। हम साथ ही रहते थे लेकिन जब सिख विरोधी दंगा हुआ तो वो हमपर विश्वास नहीं कर पाई और कहीं और रहने चली गईं। बाद में उसने कहा भी कि भरोसा नहीं था। अब इतने सालों बाद जब पलटकर देखती हूं तो लगता है कि ये वो दिल्ली तो नहीं।
(अनंत विजय से बातचीत पर आधारित)   

Thursday, March 15, 2012

ताबड़तोड़ विमोचनों का मेला

कुछ दिनों पहले दिल्ली में बीसवां अतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला समाप्त हुआ । दरअसल यह मेला एक साहित्यिक उत्सव की तरह होता है जिसमें पाठकों की भागीदारी के साथ साथ देशभर के लेखक भी जुटते हैं और परस्पर वयक्तिगत संवाद संभव होता है । इस बार के मेले की विशेषता रही किताबों का ताबड़तोड़ विमोचन और कमी खली राजेन्द्र यादव की जो बीमारी की वजह से मेले में शिरकत नहीं कर सके । एक अनुमान के मुताबिक इस बार के पुस्तक मेले में हिंदी की तकरीबन सात से आठ सौ किताबों का विमोचन हुआ । हिंदी के हर प्रकाशक के स्टॉल पर हर दिन किसी ना किसी का संग्रह विमोचित हो रहा था । इस बार फिर से नामवर सिंह और अशोक वाजपेयी ने सबसे ज्यादा किताबें विमोचित की होंगी, ऐसा मेरा अमुमान है । इस अनुमान का आधार प्रकाशकों से मिलनेवाले विमोचन के एसएमएस रूपी निमंत्रण हैं । मेले में इस बार शिद्दत से हंस संपादक राजेन्द्र यादव की कमी महसूस हुई । राजेन्द्र यादव एक छोटे से ऑपरेशन के बाद से ठीक होने की प्रक्रिया में हैं और इस प्रक्रिया में उनका बिस्तर से उठ पाना मुश्किल है । लिहाजा वो पुस्तक मेले में नहीं आ पाए । सिर्फ मेला ही क्यों दिल्ली का हिंदी समाज हंस के दरियागंज दफ्तर में उनकी अनुपस्थिति को महसूस कर रहा है। हिंदी साहित्य का एक स्थायी ठीहा आजकल उनकी अनुपस्थिति की वजह से वीरान ही नहीं उदास भी है । हम सबलोग उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना कर रहे हैं ताकि दिल्ली के हिंदी जगहत की जिंदादिली वापस आ सके ।
वापस लौटते हैं पुस्तक मेले पर । पुस्तक मेले में इतनी बड़ी संख्या में किताबों के विमोचन को देखते हुए लगता है कि हिंदी में पाठकों की कमी का रोना नाजायज है । अगर पाठक नहीं हैं तो फिर इतनी किताबें क्यों छप रही हैं । मेरा मानना है कि सिर्फ सरकारी खरीद के लिए इतनी बड़ी संख्या में पुस्तकें नहीं छप सकती हैं । एक बार फिर से हिंदी के कर्ता-धर्ताओं को इस पर विचार करना चाहिए और डंके की चोट पर यह ऐलान भी करना चाहिए कि हिंदी सिर्फ पाठकों के बूते ही चलेगी भी और बढेगी भी । इससे ना केवल लेखकों का विश्वास बढेगा बल्कि पाठकों की कमी का रोना रोनेवालों को भी मुंहतोड़ जबाव मिल पाएगा । छात्रों की परीक्षा के बावजूद मेले में लोगों की सहभागिता के आधार पर मेरा विश्वास बढ़ा है । मेले में जो किताबें विमोचित या जारी हुई उसमें कवि-संस्कृतिकर्मी यतीन्द्र मिश्र के निबंधों का संग्रह विस्मय का बखान (वाणी प्रकाशन), कवि तजेन्दर लूथरा का कविता संग्रह अस्सी घाट पर बांसुरीवाला(राजकमल प्रकाशन), हाल के दिनों में अपनी कहानियों से हिंदी जगत को झकझोरनेवाली लेखिका जयश्री राय का उपन्यास –औरत जो नदी है(शिल्पायन, दिल्ली) अशोक वाजपेयी के अखबारों में लिखे टिप्पणियों का संग्रह- कुछ खोजते हुए के अलावा झारखंड की उपन्यासकार महुआ माजी का नया उपन्यास मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ (राजकमल प्रकाशन) – और पत्रकार और कहानीकार गीताश्री की शोधपरक पुस्तक सपनों की मंडी प्रमुख है । हिंदी में शोध के आधार पर साहित्यिक या गैर साहित्यिक लेखन बहुत ज्यादा हुआ नहीं है । जो हुआ है उसमें विषय विशेष की सूक्षमता से पड़ताल नहीं गई है । विषय विशेष को उभारने के लिए जिस तरह से उसके हर पक्ष की सूक्ष्म डिटेलिंग होनी चाहिए थी उसका आभाव लंबे समय से हिंदी जगत को खटक रहा था। अपने ज्ञान,प्रचलित मान्यताओं, पूर्व के लेखकों के लेखन और धर्म ग्रंथों को आधार बनाकर काफी लेखन हुआ है । लेकिन तर्क और प्रामाणिकता के अभाव में उस लेखन को बौद्धिक जगत से मान्यता नहीं मिल पाई । लेखकों की नई पीढ़ी में यह काम करने की छटपटाहट लक्षित की जा सकती है। इस पीढ़ी के लेखकों ने श्रमपूर्वक गैर साहित्यिक विषयों पर बेहद सूक्ष्म डीटेलिंग के साथ लिखना शुरू किया । नई पीढ़ी की उन्हीं चुनिंदा लेखकों में एक अहम नाम है गीताश्री का। कुछ दिनों पहले एक के बाद एक बेहतरीन कहानियां लिखकर कहानीकार के रूप में शोहरत हासिल कर चुकी पत्रकार गीताश्री ने तकरीबन एक दशक तक शोध और यात्राओं और उसके अनुभवों के आधार पर देह व्यापार की मंडी पर पर यह किताब लिखी है । गीताश्री ने अपनी इस किताब में अपनी आंखों से देखा हुआ और इस पेशे के दर्द को झेल चुकी और झेल रही महिलाओं से सुनकर जो दास्तान पेश की है उससे पाठकों के हृदय की तार झंकृत हो उठती है । उम्मीद की जा सकती है कि गीताश्री की इस किताब से हिंदी में जो एक कमी महसूस की जा रही थी वो पूरी होगी ।
कवि तजेन्दर लूथरा के कविता संग्रह का नाम अस्सी घाट पर बांसुरीवाला चौंकानेवाला है । संग्रह के विमोचन के बाद जब मैंने नामवर सिंह से इस कविता संग्रह के शीर्ष के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि जबतक वो बनारस में थे तबतक उन्होंने अस्सी घाट पर बांसुरी वाले को नहीं देखा था । लेकिन नामवर सिंह ने तजेन्दर की कविताओं को बेहतर बताया । हलांकि कवि का दावा है कि उन्होंने अस्सी घाटपर बजाप्ता बांसुरीवाले को बांसुरी बजाते देखा है और वहीं से इस कविता को उठाया है । मैंने भी तजेन्दर की कई कविताएं पढ़ी और सुनी हैं । उनकी कविताओं की एक विशेषता जिसे हिंदी के आलोचकों को रेखांकित करना चाहिए वो यह है कि वहां कविता के साथ साथ कहानी भी समांतर रूप से चलती है । तजेन्दर की कविताएं ज्यादातर लंबी होती हैं और उसमें जिस तरह से समांतर रूप से एक कहानी भी साथ साथ चलती है उससे पाठकों को दोनों का आस्वाद मिलता है । तजेन्दर की कविताओं के इस पक्ष पर हिंदी में चर्चा होना शेष है । मैं आमतौर पर कविता संग्रहों पर नहीं लिखता हूं क्योंकि मैं मानता हूं कि आज की ज्यादातर कविताएं सपाटबयानी और नारेबाजी की शिकार होकर रह गई हैं । लेकिन तजेन्दर की कविताओं में नारेबाजी या फैशन की क्रांति नहीं होने से यह थोड़ी अलग है । कभी विस्तार से इस कविता संग्रह पर लिखूंगा ।
महुआ माजी का पहला उपन्यास मैं बोरिशाइल्ला ठीक ठाक चर्चित हुआ था । अब एक लंबे अंतराल के बाद उनका जो दूसरा उपन्यास आया है उसे लेखिका विकिरण, प्रदूषण और विस्थापन से जुड़े आदिवासियों की गाथा बताया है । लेखिका के मुताबिक इसमें द्वितीय विश्वयुद्ध से हुए विध्वंस से लेकर वर्तमान तक को समेटा गया है । विजयमोहन सिंह इसे जंगल जीवन की महागाथा बताते हैं लेकिन देखना होगा कि हिंदी के पाठक इस उपन्यास को किस तरह से लेते हैं । रचनाओं को परखने की आलोचकों की नजर पाठकों से इतर होती है और बहुधा उनकी राय भी अलग ही होती है ।
पुस्तक मेले के आयोजक नेशनल बुक ट्रस्ट के नए और युवा निदेशक एम ए सिकंदर से भी लंबी बातचीत हुई । दरअसल मेले में कुछ प्रकाशकों ने आयोजन की तिथि और व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए थे । एनबीटी के निदेशक ने साफ तौर पर यह स्वीकार किया कि बच्चे कम संख्या में आ पाए लेकिन जिस तरह से ट्रस्ट ने दिल्ली के कॉलेजों में एक अभियान चलाया उससे पुस्तक मेले में छात्रों की भागीदारी बढ़ी । बातचीत के क्रम में सिकंदर साहब ने जो एक अहम बात कही वो यह कि एनबीटी विश्व पुस्तक मेले को हर साल आयोजित करने की संभावनाओं को तलाश रहा है । अगर यह हो पाता है तो हिंदी समेत अन्य भाषाओं के लिए भी बेहतरीन काम होगा ।