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Friday, May 5, 2017

खेती पर कर पर भ्रम!

किसानों को आयकर के दायरे में लाने के प्रस्ताव पर केंद्र सरकार में भ्रम की स्थिति दिखाई देती है। पहले नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय ने आयोग की बैठक में पेश अपने मसौदे में टैक्स दायरे को बढ़ाने के लिए किसानों को खेती से होनेवाली आय पर टैक्स लगाने का सुझाव दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई नीति आयोग की इस बैठक में बिबेक देबरॉय ने तीन साल की कार्ययोजना को पेश करते समय कृषि से होनेवाली आय को आयकर के दायरे में लाने की वकालत की। बिबेक देबरॉय ने कहा था कि आयकर का दायरा बढ़ाने का यह एक तरीका हो सकता है। बिबेक ने तमाम तरह के आयकर कानूनों का हवाला देते हुए अपना पक्ष रखा था। नीति आयोग के विजन डॉक्यूमेंट में एक हेडर है- इनकम टैक्स ऑन एग्रिकल्चर इनकम जो कहता है कि ‘अभी खेती से होनेवाली आय में हर तरह की ठूट मिली है चाहे किसानों को कितनी भी आय हो। जबकि कृषि से होनेवाली आय में छूट देने का उद्देश्य किसानों को संरक्षण देना था। कभी कभार इस छूट का बेजा इस्तेमाल भी होता है और खेती के अलावा अन्य आय को भी कृषि आय के रूप में दिखाकर टैक्स में छूट हासिल किया जाता है। काले धन की समस्या से निबटने के लिए इस तरह के चोर दरवाजों को बंद करना होगा।‘ नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय के इस बयान के बाहर आते ही पूरे देश में हंगामा मच गया। किसानों का मुद्दा हमेशा से हमारे देश में संवेदनशील रहा है । कृषि से होनेवाली आय को आयकर के दायरे में लाने की खबर और उसके होनेवाले असर से केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी दोनों चौकन्नी हो गई।
केंद्र सरकार की तरफ से वित्त मंत्री अरुण जेटली ने स्वयं मोर्चा संभाला और साफ कर दिया कि सरकार का कृषि से होनेवाली आय को कर के दायरे में लाने का कोई इरादा नहीं है और बिबेक देबरॉय का प्रस्ताव उनकी निजी राय है। वित्त मंत्री ने तो यहां तक कह दिया कि कृषि पर टैक्स लगाना केंद्र सरकार के कार्यक्षेत्र में आता भी नहीं है । नीति आयोग ने भी बिबेक देबरॉय के मत से अपना पल्ला झाड़ लिया था। लेकिन वित्त मंत्री अरुण जेटली के बयान के अड़तालीस घंटे भी नहीं बीते थे कि केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने भी खेती पर टैक्स की बात कहकर सरकार को धर्मसंकट में डाल दिया । एक कार्यक्रम में अरविंद सुब्रह्मण्यम ने साफ किया कि सरकार को अमीर और गरीब किसान में भेद करना होगा । अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए अरविंद ने जोर देकर किसानों पर टैक्स लगाने के प्रस्ताव का समर्थन कर दिया। केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने वित्त मंत्री अरुण जेटली से अलग अपनी राय रखी और कहा कि केंद्र सरकार को इस तरह का टैक्स लगाने के लिए कोई पाबंदी नहीं है। अरविंद के मुताबिक कोई भी कानून राज्य सरकारों को कृषि आय पर कर लगाने से नहीं रोकता है । उन्होंने कहा, राज्यों के पास ऐसा करने के लिए पूरा अधिकार है। इसके बाद से इस बात पर चर्चा शुरू हो गई है।

दरअसल कृषि से होनेवाली आय को कर के दायरे में लाने की वकालत समय समय पर अर्थशास्त्री करते रहे हैं। कानूनी पेचीदगियों से लेकर आंकड़ों की बाजीगरी करके इस तरह के प्रस्तावों के समर्थन करनेवाले लोग भी सामने आकर खड़े हो जाते हैं । बिबेक देबरॉय और अरविंद के सुझावों को उसी आईने में देखा जाना चाहिए। प्रतीत होता है कि राजनीति की तरह ही इस मुद्दे को भी उछालकर या उछलवाकर देश का मूड टेस्ट किया जाता रहा है। इस देश में जहां अब भी किसान इंद्र देवता की कृपा पर हों, वहां उनपर इंकम टैक्स लगाने की सोचने से पहले देश के रहनुमाओं को उनकी बेहतरी के बारे में कोई ठोस कार्ययोजना का प्रस्ताव करना चाहिए। नीति आयोग टैक्स के दायरे को बढ़ाने और कालेधन को रोकने के लिए चोर दरवाजे को बंद करने की कवायद कर रहा है, यह अच्छी बात है लेकिन बजाए इसमें ठोस सुझाव आने के किसानों को टैक्स के दायरे में लपेटने का आसान रास्ता चुना गया। अगर सचमुच मंशा कालेधन के जेनरेशन पर रोक लगाने की है तो उसके लिए फॉर्मूला सोचना होगा। या फिर जो किसानों के नाम पर अपना काला धन सफेद कर रहे हैं उनपर शिकंजा कसने के लिए प्रस्ताव लाना चाहिए।
इस देश में जहां किसानों की आत्महत्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही हो वहां इस तरह के टैक्स का बोझ डालना उनकी मुसीबतों को बढ़ानेवाला ही होगा । राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के पिछले साल दिसंबर में जारी आंकड़ों के मुताबिक किसानों की आत्महत्या की दर तेजी से बढ़ी है और दो हजार पंद्रह में बारह हजार छह सौ से ज्यादा किसानों ने खुदकुशी की। सबसे ज्यादा खुदकुशी के केस महाराष्ट्र से आए। इस रिपोर्ट के मुताबिक किसानों और खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या की वजह कर्ज, कंगाली और खेती से जुड़ी दिक्कतें हैं। ऐसे माहौल में नीति आयोग को किसानों को राहत देने के प्रस्ताव पर विचार करना चाहिए। किसानों को छेड़ना केंद्र सरकार को महंगा पड़ सकता है।
रही बात काले धन को बढ़ावा देने की तो क्या नीति आयोग ने उद्योगपतियों की कारगुजारियों से होनेवाले कालेधन के जेनरेशन पर विचार किया ? अगर किया तो उसको इतनी ही प्रमुखता से प्रचारित क्यों नहीं किया? आयकर बढ़ाने के लिए खेती पर टैक्स की वकालत करनेवाले अर्थशास्त्रियों को उन उद्योगपतियों के बारे में विचार करना चाहिए जो बैंकों का करोड़ो रुपए दबाकर बैठे हैं ।विजय माल्या जैसे लोग करोड़ो का चूना लगाकर चंपत हो जाते हैं लेकिन एजेंसियां कुछ कर नहीं पातीं। एक अनुमान के मुताबिक भारत के बैकों का सवा लाख करोड़ रुपए का एनपीए है। बैंक के बड़े डिफॉल्टरों को तो सरकार से लेकर इंकम टैक्स विभाग और बैंक हर जगह से राहत मिलती है और करोडों की राशि को एनपीए यानि नॉन परफॉर्मिंग असेट में दिखाने का खेल खेला जाता है। क्या नीति आयोग को सरकार को यह हीं सुझाना चाहिए कि वो बैंकों के इन डिफाल्टरों से पैसे वसूली के लिए उनके अन्य कारोबार को भी जब्त कर ले या फिर किसी और तरीके से इसकी वसूली की जा सके।
भारत को इन मामलों में चीन से सीखना होगा। चीन ने अभी अपने यहां बैंकों की राशि समय पर नहीं चुकानेवालों पर डंडा चलाया है। चीन ने करीब साठ लाख लोगों को चिन्हित किया है जिन्होंने बैंकों का धन वक्त पर नहीं चुकाया है । ऐसे लोगों को विमान से यात्रा करने पर रोक लगा दी गई है । इसी तरह के करीब तेइस लाख लोगों को हाई स्पीड ट्रेन से चलने पर रोक लगा दी गई है। हमारे यहां तो बैकों का लाखों करोड़ रुपए डूबा हुआ है और जो लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं वो अलग अलग कंपनियों के खाते पर तमाम तरह की लक्जरी का उपभोग करते हैं । इसके अलावा रिजर्व बैंक विलफुल डिफाल्टर्स के नाम भी उजागर करने की इजाजत बैंकों को नहीं देता है। बैंक कर्मचारियों के एसोसिएशन इसकी मांग कर रहे हैं लेकिन रिजर्व बैंक इसके लिए तैयार नहीं दिख रहा है। ऐसी हालत में कृषि पर आय का प्रस्ताव किसानों के लिए मुसीबत बढ़ानेवाला तो होगा ही राजनीतिक तौर पर सत्ताधारी दल के लिए भी मुश्किलें लेकर आ सकता है। राजनीतिक बुद्धिमत्ता तो यही कहती है कि किसानों को ना छेडा जाए।       


Tuesday, February 7, 2017

चुनाव सुधार पर मामूली पहल

केंद्रीय बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने चुनाव सुधार के लिए सरकार के संकल्पों को दोहराते हुए पार्टियों की फंडिंग की पारदर्शिता के लिए कुछ कदम उठाने का एलान किया है । चुनावी बॉंड और पार्टियों को नकदी के रूप में मिलनेवाली चंदे की रकम को बीस हजार से घटाकर दो हजार करने का प्रस्ताव किया गया है । ये चुनाव सुधार की दिशा में उठाए जानेवाले कदमों की शुरुआत भर मानी जा सकती है । इन दो कदमों से चुनावों में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन आ सकेगा ऐसा मानना मुश्किल है परंतु किसी सरकार ने इस दिशा में कदम उठाने का साहस तो दिखाया । अगर रास्ते पर चल पड़े हैं तो कोईना कोई हल निकलेगा लेकिन अभी तो ये पहल नाकाफी हैं । दरअसल जब भारतीय जनता पार्टी ने काले धन को दो हजार चौदह के चुनाव में बड़ा मुद्दा बनाया उसके बाद से ही राजनीतिक दलों को मिलनेवाले चंदे को लेकर बहस शुरू हो गई थी । जब पिछले साल नवंबर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विमुद्रीकरण का एलान किया तो उसके बाद से ही सरकार को घेरने के लिए चुनावी चंदों से लेकर चुनाव में होनेवाले बेहिसाब खर्चे को लेकर भी विशेषज्ञ सवाल खडे करने लगे थे । सरकार क्या सभी राजनीतिक दलों पर यह इल्जाम लग रहे थे कि धनकुबरों के काला धन पर लगाम लगाने के लिए तो कार्रवाई शुरू की गई लेकिन जब बात राजनीतिक दलों की आती है तो सभी दल मिलकर अपने आपको बचाने के लिए कानून बनाने या पुराने कानून को बचाने में एकजुट हो जाते हैं । इस सिलसिले में संसद की कैंटीन में मिलनेवाले सस्ते खाने को भी इससे जोड़ा जाता रहा है । लगातार इस तरह की बातों से राजनीतिक दलों के विरोधी में एक माहौल सा बनने लगा था । इस तरह के माहौल के बीच चुनाव आयोग ने भी सरकार को चुनाव के दौरान पारदर्शिता के लिए कई सुझाव दिए थे । शीतकालीन सत्र के शुरू होने के पहले हुई सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी राजनीतिक दलों को होनेवाली फंडिंग पर चर्चा की थी और सभी दलों से आग्रह किया था कि इसमें सुधार के लिए अपने सुझाव दें ।
अब अगर आम बजट में सरकार के प्रस्तावों को देखें तो यह कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं है । एक स्त्रोत से नकद चंदे की रकम की सीमा बीस हजार से घटाकर दो हजार करने का प्रस्ताव है । इसका फायदा किसे होगा यह तो पता नहीं चल पा रहा है लेकिन राजनीतिक दलों को इतना नुकासन अवश्य होगा कि अब उनको एक की बजाए दस पर्चियां काटनी होगी । पहले बीस हजार के चंदे के लिए एक पर्ची काटनी पड़ती थी लेकिन अब दो दो हजार की दस पर्चियां कटेंगी । इस चंदे पर कोई पूछताछ नहीं होने का कानून है लिहाजा जितनी भी पर्चियां कटे क्या फर्क पड़ता है । अगर इस चंदे के साथ पैन कार्ड या फिर आधार कार्ड की फोटो प्रति अनिवार्य की जाती तो काले धन पर रोक लगाने में मदद मिल सकती थी या फिर राजनीतिक दलों को मिलनेवाले नकद चंदे में ज्यादा पारदर्शिता आ सकती थी । अगर ऐसा होता तो राजनीतिक दलों पर लगनेवाले आरोपों में कमी आ सकती थी । राजनीतिक दलों को तीन लाख तक की नकद लेन-देन की छूट भी दी गई है । यह उचित है क्योंकि अब भी भारत में कई तरह के खर्चे ऐसे होते हैं जो सिर्फ नकद में किए जा सकते हैं ।
आम बजट में जिस तरह से चुनावी बॉंड का प्रस्ताव दिया गया है उसके बारे में भी अभी तक स्थिति साफ नहीं है । अपने बजट प्रस्ताव में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि चुनावी बॉंड जारी करने के लिए आरबीआई एक्ट में संशोधन किया जाएगा ताकि कुछ बैंकों के माध्यम से इस बॉंड की बिक्री की जा सके । सरकारी प्रस्ताव के मुताबिक इस चुनावी बॉंड को सिर्फ चेक या फिर डिजीटल पेमेंट के माध्यम से ही खरीदा जा सकेगा । इस बॉंड को उन्हीं खातों में जमाकर भुनाया जा सकता है जो पंजीकृत राजनीतिक दलों के चंदा लेने के मकसद से खोले गए हों । इसके लिए एक निश्चित समय सीमा भी तय किए जाने का प्रस्ताव है । जिस तरह के बॉंड का प्रस्ताव है उसके बारे में विस्तृत जानकारी तो नहीं है लेकिन जो प्रस्ताव है उससे तो यही प्रतीत होता है कि यह धारक के लिए जारी होगा किसी खास राजनीतिक दल के नाम से जारी नहीं किया जाएगा । जिसके पास भी ये ब़ॉंड रहेंगे वो इसका मालिक होगा और जिस चाहे उस राजनीतिक दल का डोनेट कर सकेगा क्योंकि यह बॉंड बीयरर चेक की तरह होगा । ये बॉंड लगभग नकदी की ही तरह होता है इसलिए इससे क्या फर्क पड़ता है कि राजनीतिक दल को नकद मिल रहा है या फिर बॉंड के माध्यम से । अब यहीं से गड़बड़ी की आशंका शुरू होती है । मान लीजिए किसी व्यक्ति ने दस लाख के बॉंड खरीदे और उसने ये खरीदारी चेक से या फिर डिजीटल पेमेंट के माध्यम से की । उसके बाद उसने लाख दो लाख के मुनाफे पर इसको दूसरे व्यक्ति को कैश पेमेंट पर बेच दिया । अगले ने उसको राजनीतिक दल को डोनेट कर दिया तो फिर कहां से काला धन के डोनेशन पर रोक लगी ।
चुनावी बॉडं के बाजार में खरीद बिक्री को कैसे नियंत्रित किया जाएगा इसपर ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि बॉंड को लेकर इस तरह का वाकया पहले भी देखने को मिला है । दो हजार सतासी में राजीव गांधी के शासन काल के दौरान विकास के लिए धन जुटाने की मंशा से इंदिरा विकास पत्र जारी किए गए थे । इंदिरा विकास पत्र जारी करने का अधिकार डाकघरों को दिया गया था । इस बॉंड में भी वही दिक्कत थी कि यह लगभग बीयरर बॉंड था यानि जिसके पास रहेगा वो इसको भुना सकता था । नकद के जैसा । कुछ सालों के बाद सरकार को जब लगा कि इस बॉंड का इस्तेमाल मनी लॉंड्रिंग के लिए किया जा रहा है तो इसको बंद कर दिया गया । अब इस तरह का चुनावी बॉं जारी करने को लेकर भी विशेषज्ञों के बीच इसी आधार पर बहस शुरू हो गई है ।

दरअसल चंदे कि रकम की सीमा के घटाने या बॉंड जारी करना चुनाव सुधार की दिशा में उठाया गया एक बेहद ही मामूली कदम है । अगर सरकार और सभी राजनीतिक दल सचमुच चुनाव सुधार या चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता को लेकर संजीदा है तो उनको चुनाव आयोग को और अधिकार देने होंगे और पीपल्स रिप्रेजेंटेशन एक्ट में सुधार करते हुए उसको और मजबूती देनी होगी । इस तरह का कानून बनाना होगा कि चुनाव आयोग को ये अधिकार मिले की वो एक फंड बनाए और सभी राजनीतिक दलों को चुनाव के वक्त उस फंड से चुनाव लड़ने के लिए पैसे दिए जाएं । जो भी औद्योगिक घराना चुनाव के वक्त राजनीतिक दलों को चंदा देना चाहते हैं उनको चुनाव आयोग को देना चाहिए और फिर चुनाव आयोग इसका उचित वितरण करने का फॉर्मूला बनाए । इससे चुनावों में कालेधन पर रोक लगाई जा सकती है । सालों से स्टेट फंडिंग की बात होती रहती है लेकिन वो विमर्शों का ही हिस्सा बनकर रह जाती है उस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं । सालों पहले चुनाव सुधार के लिए बनाई गई इंद्रजीत गुप्ता कमेटी ने भी स्टेट फंडिंग का सुझाव दिया था लेकिन वो सुझाव फाइलों में धूल फांक रही है । इन प्रस्तावों को लेकर आरबीआई एक्ट और पीपल्स रिप्रेजेंटेशन एक्ट में संसद में संशोधन करवाना होगा, यह देखना दिलचस्प होगा कि अन्य राजनीतिक दल इसपर किस तरह का रुख अपनाते हैं ।     

Thursday, June 30, 2016

स्वामी के खेल

सुब्रह्मण्य स्वामी भारतीय राजनीति का वो खिलाड़ी है जो अपने बयानों और सियासी कदमों से देशभर को चौंकाते रहता है । अर्थशास्त्र का ये प्रोफेसर सियासी दांव पेंच में भी फॉर्मूले फिट करता रहा है । कई सियासी दलों की यात्रा करने के बाद स्वामी की घर वापसी हुई है । कभी राजीव गांधी के बेहद करीबी रहे स्वामी अब सोनिया और राहुल गांधी के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं । कभी अटल बिहारी वाजपेयी के धुर विरोधी रहे स्वामी इन दिनों बीजेपी के आंखों के तारे हैं । पाठकों को याद होगा कि स्वामी जब राज्यसभा के लिए मनोनीत किए गए तो अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर पर बहस के दौरान पार्टी ने उनको अपने सभी सांसदों का वक्त मिलाकर दे दिया ताकि स्वामी कांग्रेस पर लंबे वक्त तक तीखे वार कर सके । बीजेपी के इस कदम ने स्वामी के हौसले बुलंद कर दिए । स्वामी अपने स्तरहीन बयानों के लिए भी जाने जाते हैं जैसे ट्विटर पर वो सोनिया गांधी को जिस नाम से संबोधित करते हैं वो सियासत की मर्यादा के बिल्कुल खिलाफ है । संसद में पार्टी के उस समर्थन के बाद स्वामी उस राह पर चल पड़े जहां सिर्फ टकराव की गुंजाइश बनती है । वो सरेआम ये कहने लगे कि वो सीधे पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से निर्देश लेते हैं और आगे भी ऐसा करेंगे । ऐसा करके वो राज्यसभा में नेता सदन अरुण जेटली को संदेश दे रहे थे कि सदन में भी वो उनकी बात नहीं मानेंगे । अरुण जेटली पार्टी का सौम्य, पढ़ा लिखा और नो नॉनसेंस चेहरा है । स्वामी दूर की कौड़ी लाने में भी माहिर हैं, कई बार वो कौड़ी सही भी होती है लेकिन बहुधा वो बस कौड़ी ही रह जाती है । रिजर्व बैंक के काबिल गवर्नर रघुराम राजन का कार्यकाल सितंबर में खत्म होनेवाला था पर स्वामी ने अरुण जेटली पर परोक्ष रूप से हमला करने के लिए राजन को चुना और एक के बाद एक हमले किए । सौम्य राजन ने स्वामी के आरोपों पर कुछ नहीं कहा लेकिन गरिमापूर्ण तरीके से अपने पद छोड़ने का एलान कर दिया । रघुराम राजन के इस कदम ने स्वामी को अगले कदम के लिए उकसाया और उन्होंने वित्त मंत्रालय के सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम और एक अन्य अधिकारी पर हमला बोला । वित्त मंत्री होने के नाते अरुण जेटली ने अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानते हुए दोनों का बचाव किया लेकिन स्वामी ने फिर जेटली से क्या लेना देना वो तो पीएम और अमित शाह को जानते हैं जैसा बयान दे डाला । और तो और उन्होंने इशारों इशारों में अरुण जेटली पर बिलो द बेल्ट हमला बोला और कहा कि विदेश जानेवाले नेताओं को सूट टाई नहीं पहननी चाहिए क्योंकि उसमें वो वेटर जैसे दिखते हैं । कुछ ही वक्त पहले टीवी चैनलों पर अरुण जेटली की चीन से सूट टाई में भाषण देती तस्वीरें आई थी । जब पानी सर से उपर जाने लगा तो खबरों के मुताबिक अरुण जेटली ने चीन का दौरा एक दिन पहले खत्म किया और प्रधानमंत्री से मिलने का वक्त मांग लिया ।
इन सारे सियासी घटनाक्रम के बीच प्रधानमंत्री ने अपने एक इंटरव्यू में स्वामी को सार्वजनिक रूप से नसीहत ही नहीं दी बल्कि कड़ा संदेश दे दिया कि वो अपनी सीमाओं में रहें और संगठन और व्यवस्था से बड़ा कोई नहीं होता है । लेख लिखे जाने तक स्वामी खामोश हैं । सवाल खामोशी या उनकी प्रतिक्रिया का नहीं है सवाल यह है कि स्वामी का स्वामी आखिर कौन है । किसके इशारे पर स्वामी वित्त मंत्री अरुण जेटली को निशाना बना रहे हैं । कहीं से तो स्वामी को ताकत मिल रही है । सियासी हलकों में इस बात की चर्चा होती है कि स्वामी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आशीर्वाद प्राप्त है । जब स्वामी को राज्यसभा में मनोनीत किया गया था तब भी ये बात आई थी या फैलाई गई थी कि स्वामी संघ की पसंद हैं । लेकिन इस तरह की बातें करनेवाले संघ के क्रियाकलापों को बेहतर तरीके से जानते नहीं हैं । संघ को अगर अरुण जेटली से कोई शिकायत होगी तो वो कम से कम उसको दूर करने के लिए स्वामी को तो नहीं लगाएंगें । जब स्वामी ने एक किताब में अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में बेहद आपत्तिजनक बातें कही थी तब भी इसी तरह के कयास लगाए जा रहे थे । अटल जी जबतक सक्रिय रहे उन्होंने स्वामी को हाशिए पर रखा । दऱअसल अगर स्वामी के करियर को विश्लेषित किया जाए तो ये नतीजा निकलता है कि जबतक उनको पद नहीं मिलता है वो बेचैन रहते हैं राजीव गांधी से लेकर जयललिता से लेकर हर सरकार से उनकी अदावत की लगभग यही वजह रही है । और बेचैनी किसी भी मनुष्य को कुछ भी करने को बाध्य करती है । बेचैनी के आलम में अगर उसको कोई भी बाधा नजर आती है तो वो हमलावर हो जाता है । स्वामी इसी बेचैन सिंड्रोम के शिकार नजर आते हैं । राज्यसभा के सदस्य बनने के लिए उन्होंने तमाम जतन किए, इसमें कोई बुराई भी नहीं है । रायसीना हिल्स में ये चर्चा है कि स्वामी वित्त मंत्री बनना चाहते हैं इसलिए वो अरुण जेटली की ओर बयानों के तीर चला रहे हैं । लेकिन पद की लालसा में अगर कोई मर्यादा भूल जाता है तो उसको उसकी सही जगह दिखाने का दायित्व प्रधानमंत्री का होता है और उन्होंने इसका निर्वाह किया ।

Thursday, December 4, 2014

कालेधन के चक्रव्यूह में सरकार

एक तरफ जहां काले धन के मुद्दे पर संसद के बाहर और अंदर हंगामा मचा हुआ था, गर्मागर्म बहस चल रही थी वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के नोएडा में आयकर विभाग की छापेमारी चल रही थी । एक तरफ जहां मुलायम सिंह यादव सरकार पर काला धन वापस नहीं लाने के मुद्दे पर हमलावर थे तो दूसरी ओर नोएडा के चीफ इंजीनियर के घर के बाहर खड़ी गाड़ी से दस करोड़ रुपए बरामद हो रहे थे । नोएडा के चीफ इंजीनियर के घर से करोड़ो की नकदी और दो किलो हीरे के अलावा देश विदेश में निवेश के दस्तावेज बरामद हुए हैं । संसद में बहस और छापेमारी में मिला घूस का अकूत पैसा । एक बार फिर से देश की राजनीति के केंद्र में काला धन का मुद्दा वापस आ गया । नरेन्द्र मोदी सरकार के कदमों और प्रधानमंत्री के विदेश दौरे के बीच काला धन का मुद्दा नेपथ्य में चला गया था ।  जबकि विदेशों में जमा कालेधन के मुद्दे को लोकसभा चुनाव के दौरान नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी ने खूब हवा दी थी । बीजेपी समर्थक रामदेव और बीजेपी से निष्कासित मशहूर वकील राम जेठमलानी ने भी कालेधन के खिलाफ एक माहौल तैयार किया था । उस वक्त की कालेधन के खिलाफ बने माहौल से यह संदेश गया था कि अगर विदेशों में जमा काला धन वापस आ गया तो देश के हर शख्स को पंद्रह लाख रुपए मिलेंगे । समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने यही आरोप लोकसभा में लगाया भी । लोकसभा चुनाव के दौरान ग्लोबल फाइनेंसियल इंटेग्रिटी ऑर्गेनाइजेशन की उस रिपोर्ट का बार बार जिक्र किया गया था जिसमें यह बताया गया था कि दो हजार तीन से दो हजार ग्यारह के बीच भारत से करीब इक्कीस लाख करोड़ रुपए बाहर गए । इस बात का आकलन करना मुश्किल है कि विदेशी बैंकों में कितना कालाधन जमा है । विदेशों में जमा कालेधन को वापस लाने का मुद्दा इतना आसान नहीं है जितना कि चुनावों के वक्त भाषणों में बताया जा रहा था । यह एक बेहद जटिल प्रक्रिया है जिसमें कई कूटनीतिक पेंच भी हैं । सरकार में आने के बाद बीजेपी के नेताओं को इस बात का एहसास हुआ जब वित्त मंत्री ने साफ कियाकि सरकार के हाथ कई अंतराष्ट्रीय संधियों से बंधे हुए हैं  । सरकार के वरिष्ठ मंत्री अब कह रह रहे हैं कि सौ दिनों में काला पैसा वापस लाने की बात नहीं हुई थी बल्कि सौ दिनों में प्रक्रिया शुरू करने का वादा था । वित्त मंत्री अरुण जेटली के मुताबिक अबतक चार सौ सत्ताइस विदेशी खातों की जानकारी मिली है जिसमें से ढाई सौ खाताधारकों ने विदेशी बैंकों में खाता होने की बात स्वीकार की है । सरकार के मुताबिक इन चार सौ सत्ताइस बैक खातों और उनके आयकर की गणना 31 मार्च 2015 तक कर ली जाएगी, उसके बाद ही कुछ नाम सामने आ सकते हैं । यह बात अब साफ हो चुकी है कि कालाधन का मुद्दा एनडीए सरकार के लिए बड़ी चुनौती है । दो हजार दस के जी 20 के सम्मेलन में फ्रांस और जर्मनी ने कालेधन के खिलाफ आवाज उठाई थी और इस बार ऑस्ट्रेलिया में इस बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसके खिलाफ एकजुट होने की अपील की । दरअसल कई देशों की अर्थव्यवस्था कालेधन के कारोबार से चलती है । परोक्ष रूप से वो देश अन्य देशों में निवेश करते हैं । इस तरह के कालेधन की विषबेल कई देशों में फैली हुई है । उसके खिलाफ प्रबल इच्छा शक्ति और ईमानदार नेतृत्व चाहिए तभी कुछ सकारात्मक नतीजे सामने आ सकेंगे ।
सरकार के सामने इससे भी बड़ी चुनौती है देश में जमा कालेधन को बाहर निकालने की । विदेशों में जमा काला धन आयकर की चोरी के साथ साथ देश के राजकोष को कमजोर करता है वहीं देश में इकट्ठा कालाधन आयकर चोरी और विकास के काम को प्रभावित करता है । झारखंड के एक मंत्री ने तो आय से अधिक संपत्ति के मामले में गिरफ्तारी के बाद अजीबोगरीब बयान देकर सबको चौका दिया था । करीब सौ करोड़ की संपत्ति बरामद होने के बाद भी लवो अपने आपको देशभक्त भ्रष्ट करार होने का दावा कर रहा था । उसने आय से अधिक संपत्ति के मामले में गिरफ्तारी के बाद यह कहा था कि पैसा भारत में ही निवेश किया है स्विस बैंक में तो नहीं भेजा । इसी तरह से नोएडा के चीफ इंजीनियर के बारे में अनुमान लगाया जा रहा है कि वो करीब दस हजार करोड़ का मालिक है और उसने खाड़ी और यूरोपीय देशों में निवेश किया है । इस तरह के न जाने कितने अफसर देश के अलग अलग राज्यों में फैले हैं । मध्य प्रदेश में तो आए दिन लोकायुक्त के छापे में सरकारी कर्मचारी बेनकाब होते हैं जो करोडो़ं की संपत्ति के मालिक हैं । मध्य प्रदेश के ही आईएएस जोशी दंपति का केस अब भी चल ही रहा है । दो हजार बारह में मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में काम करनेवाले एक कर्मचारी के घर से सौ करोड़ रुपए की बेनामी संपत्ति का पचा चला था तो छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य सचिव के घर से बावन लाख नकद बरामद हुआ था । अभी हाल ही में एक सहारा के नोएडा और दिल्ली के ठिकानों पर छापे में डेढ सौ करोड़ से ज्यादा की बरामदगी गुई । चुनाव के ऐन पहले बीजेपी के नेता गिरिराज सिंह के घर से करीब सवा करोड़ नकद चोरी चले गए थे जो बाद में बरामद हुए । बताया गया कि वो उनके एक कारोबारी रिश्तेदार का पैसा है । यह सूची बताने का मकसद सिर्फ इतना है कि समाज के हर वर्ग के लोगों पर शक की सुई जाती रही है । समाज के हर तबके में भ्रष्ट लोगों की वजह से कालेधन का धंधा फल फूल रहा है । दरअसल काला धन हमारे देश में नासूर की तरह फैल चुका है । आयकर विभाग के कर्मचारियों और अफसरों से इस बात की उम्मीद करना बेमानी है कि वो देश में काला धन को बरामद करने में सक्रियता दिखाएंगे । काले धन की धुरी में नेता, पुलिस और सरकारी कर्मचारी का ऐसा गठजोड़ है जिसको तोड़ पाना आसान नहीं है । अब वक्त आ गया है कि सरकार देश में मौजूद कालेधन को बाहर निकालने के लिए संजीदगी से कोशिश करे । विदेशों में मौजूद कालेधन को लाने में लाख दिक्कतें हो लेकिन देश में मौजूद कालेधन को बाहर निकालने में तोसिर्फ इच्छाशक्ति की आवश्यकता है और अब तक के ट्रैक रिकॉर्ड से तो लगता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पास वह इच्छाशक्ति है । इंतजार है देश की जनता को ।
 

Monday, September 1, 2014

मोदी सरकार के सौ दिन

एक बहुत पुरानी कहावत है कि शासन इकबाल से चलता है । राजा या शासक की हनक हो तो फिर ज्यादातर काम बेहद सुचारू रूप से कार्यान्वित हो जाता है । नरेन्द्र मोदीकी सरकार ने जब जब 26 मई को कामकाज संभाला था तो प्रधानमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी की हनक साफ हो चुकी थी । इन सौ दिनों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का इकबाल भी पूरे तौर पर स्थापित हो चुका है लिहाजा गवर्नेंस में, नीतिगत फैसलों में कहीं कोई दिक्कत देखने को नहीं मिल रही है । पिछले दस साल से सहयोगी दलों की वैशाखी और सोनिया गांधी की मर्जी पर चल रही मनमोहन सरकार के दूसरे कार्यकाल में शासक का नो तो इकबाल दिखता था और ना ही उनकी हनक । ऐसा लगता था कि एक ही सरकार में कई कई प्रधानमंत्री काम कर रहे हैं । सरकार का हाल वैसा ही था जैसा उस रथ का होता है जिसमें जुते चारों घोड़े अलग अलग दिशा में दौड़ने लगते हैं । मोदी की अगुवाई में जब भारतीय जनता पार्टी ने प्रचंड बहुमत हासिल किया तो इस बात की उ्ममीद बढ़ गई थी कि एक लोकतांत्रिक संस्था के तौर पर प्रधानमंत्री के पद की गरिमा बहाल होगी । मोदी सरकार के सौ दिन के कार्यकाल की यह सबसे बड़ी उपलब्धि है कि देश में प्रधानमंत्री के पद की गरिमा बहाल और उसकी सर्वोच्च सत्ता स्थापित हुई । इसका असर देश में हर ओर दिखने लगा । चाहे वो विदेशी निवेशकों का भरोसा हो या फिर विकास दर हो या फिर विदेश नीति हो । यह प्रधानमंत्री की हनक ही है कि अमेरिका भी उनकी आगवानी के लिए पलक पांवड़े विछाए हुए है । अपने शपथ ग्रहण समारोह में ही नरेन्द्र मोदी ने इस बात के संकेत दे दिए थे कि पड़ोसी देशों के साथ बेहतर संबंध उनकी प्राथमिकता होंगे । अपनी सरकार के सौ दिन पूरे होने के पहले उन्होंने भूटान और नेपाल की यात्रा की और विदेश मंत्री को बांग्लादेश और म्यांमार के दौरे पर भेजा । इन कदमों से सरकार की नीति औरनीयत दोनों के संकेत तो मिलते ही हैं क्योंकि भारत जैसे विशाल देश में किसी भी सरकार के आकलन के लिए सौ दिन का वक्त बहुत ही कम है ।
मोदी सरकार के सौ दिन की एक उपलब्धि यह मानी जा सकती है कि सरकार काम करती हुई दिखने लगी है । मंत्रालयों में बाबू वक्त पर मौजूद रहने लगे हैं । यह एक ऐसा बदलाव है जो सीधे सीधे लोगों को दिखाई देता है । पर किसी भी सरकार के आकलन के लिए यह बड़ा आधार नहीं हो सकता है । मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करना है । पिछले सौ दिन में अगर हम मानव संसाधन मंत्रालय के कामकाज पर नजर डालते हैं तो वहां से कोई बिग टिकट आइडिया दिखाई नहीं देता है । मोदी सरकार की शुरुआत ही में मानव संसाधन मंत्रालय दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति से उलझ गया था । हमारे देश में युवाओं की इतनी बड़ी संख्या है और प्रधानमंत्री लगातार कौशल विकास की बात करते हैं ऐसे में मानव संसाधन विकास मंत्रालय की महती जिम्मेदारी है कि वो देश में कौशल विकास के लिए जमीन तैयार करे । मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी खुद युवा और उर्जावान हैं तो उनसे यह अपेक्षा और बढ़ जाती है । बावजूद इसके मानव संसाधन मंत्रालय में फैसलों में देरी हो रही है । देश के दर्जनभर से ज्यादा विशवविद्यालयों के कुलपति के पद खाली हैं लेकिन उसको भरने की प्रक्रिया भी काफी धीमे गति से चल रही है । इसी तरह से पर्यावरण मंत्रालय में जयंति टैक्स भले ही खत्म हो गया है लेकिन विकास री राह में बाधा बन रहे कानूनों को बदलने की बातें तो हो रही हैं लेकिन ठोस पहल नहीं दिखाई दे रही है । पर्यावरण मंत्रालय ने हलांकि 5 जून से लेकर 28 जुलाई तक कई अहम फैसले लिए । 24 जुलाई को एक अहम फैसले में पर्यावरण की मंजूरी के लिए रुके डेढ सौ प्रोजेक्टों को एक साथ हरी झंडी दी गई ।
लोकसभा चुनाव जीतने के बाद सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की थी । अप्रैल जून की तिमाही में आर्थिक विकास दर 5.7 फीसदी होने से अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने के संकेत मिले हैं । इसके पहले के दो तिमाही में आर्थिक विकास दर 4.6 फीसदी के करीब थी । मोदी सरकार के काबिल वित्त मंत्री अरुण जेटली भले ही अर्थव्यवस्था को पटरी पर लौटाने में लगे हों लेकिन खराब मॉनसून की वजह से चुनौती और बढ़ती जा रही है । इसके अलावा वित्त मंत्रालय के सुधार प्रस्तावों को अमली जामा पहनाना बाकी है । रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स के बारे में कानून में बदलाव का एलान हो गया है लेकिन उसपर कार्रवाई शेष है । इंश्योरेंस में 49 फीसदी विदेशी निवेश का कानून नहीं बन पाया है । एक्सपेंडिचर मैनेजमैंट कमीशन बना दिया गया है, कमेटी का एलान भी हो गया है लेकिन अबतक उसका टर्म ऑफ रेफरेंस सार्वजनिक नहीं हो पाया है । इस सरकार ने गुड्स एंड सर्विस टैक्स को देशभर में लागू करवाने का दावा किया था लेकिन अब इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि यह कानून इस साल के अंत तक लागू हो पाएगा ।
मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती महंगाई पर काबू पाना था । जानकारों का मानना है कि सरकार को इस दिशा में अभी बहुत काम करना है । फल, सब्जी, चीनी जैसे आवश्यक वस्तुओं की कीमतो में कमी नहीं आने से मध्यमवर्ग के माथे पर चिंता की लकीरें कम नहीं हो रही है । सरकार को यह कोशिश करनी होगी कि चिंता की इन लकीरों को लोगों के माथे पर गहराने ना दें । इस दिशा में ही कदम उठाते हुए सरकार ने पेट्रोल की कीमतों और गैर सब्सिडी वाले सिलिडरों की कीमत में कमी की है । लेकिन अगर पिछले सौ दिन के सरकार के कार्यकाल में महंगाई पर उटाए गए कदमों को देखें तो वो नाकाफी हैं । सरकार को इस दिशा में ठोस कदमन उठाने होंगे । साथ ही सरकार को चाहिए कि वो अपनी पार्टी के नेताओं को महंगाई पर संवेदनहीन बयान देने से रोकें । प्रधानमंत्री के हाथ में जादू की छड़ी नहीं है जैसे बयान मध्यवर्ग की भावनाओं को आहत करते हैं ।
इसके अलावा पिछले सौ दिन में सरकार ने जजों की नियुक्ति के लिए नया कानून बनाया और कोलेजियम सिस्टम को खत्म कर दिया । यह मोदी सरकार के अहम फैसलों में से एक है । कोलेजियम सिस्टम पर अपने पसंद के लोगों को जज नियुक्त करने के आरोप लगते थे जिसकीआड़ में सरकार ने यह कदम उठाया । अब हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति छह सदस्यीय न्यायिक नियुक्ति कमीशन करेगी । सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्टके ही दो वरिष्ठ जज, कानून मंत्री और दो मशहूर न्यायविद या नागरिक इस कमीशन के सदस्य होंगे । नए कानून के मुताबिक कमीशन में दो न्यायविदों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और नेता विपक्ष या लोकसभा में सबसे बड़े दल के नेता की तीन सदस्यीय कमेटी करेगी । कानून के मुताबिक अगर छह सदस्यीय कमीशन के दो सदस्य किसी भी उम्मीदवार के चयन से सहमत नहीं हैं तो उनका नाम राष्ट्रपति के पास नहीं भेजा जाएगा । नियुक्ति के लिए कम से कम पांच सदस्यों की सहमति आवश्यक की गई है । अब पेंच यहीं से शुरू होता है । संविधान कहता है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की राय को वरीयता (प्राइमेसी) होगी । कल्पना कीजिए कि किसी भी जज की नियुक्ति के वक्त पांच सदस्य सहमत हैं और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश उससे असहमत हैं तो क्या होगा । क्या सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की राय को दर किनार करते हुए पांच सदस्यों की राय पर जज की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति को संस्तुति कर दी जाएगी । अगर ऐसा होता है तो राष्ट्रपति के सामने बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा । राष्ट्रपति इस मसले को प्रेसिडेंशियल रेफरेंस के तहत फिर से सुप्रीम कोर्ट की राय मांग सकते हैं । वहां जाकर एकबार फिर से मामला फंस सकता है । इस कानून में और भी कई झोल हैं और अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट में होगा । सरकार के लिए यह सरदर्द बन सकता है । इसके अलावा सालों पुराने योजना आयोग को खत्म करके नई संस्था बनाने का कदम भी बेहतर है ।  
सौ दिन के मोदी सरकार की से लोगों को काफी उम्मीदें हैं । सरकार काम करती हुई दिख रही है । यह आनेवाले दिनों में तय होगा कि जिन उम्मीदों पर मोदी सरकार को जनता ने चुना था उन अपेक्षाओं पर सरकार खड़ी उतर पाई है या नहीं लेकिन इसके लिए सौ दिन नाकाफी हैं ।