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Saturday, May 21, 2022

भारत के भविष्य का उत्सव


फ्रांस में आयोजित विश्व प्रसिद्ध कान फिल्म फेस्टिवल में हिंदी के कालजयी कवि जयशंकर प्रसाद की कविता।  यह सोचना या कल्पना करना थोड़ा कठिन था लेकिन फेस्टिवल के इस संस्करण में ये हुआ। इंडिया फोरम के एक कार्यक्रम में अभिनेत्री वाणी त्रिपाठी टिक्कू ने जयशंकर प्रसाद की कविता की पंक्तियों से एक चर्चा सत्र का समापन किया। जब वाणी ने जयशंकर प्रसाद की कविता की पंक्तियां, हिमाद्री तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयं प्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती, अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो-बढे चलो, सुनाई तो हाल तालियों से गूंज उठा। वाणी ने ‘बढ़े चलो’ से भारतीय दर्शन को जोड़कर आगे बढ़ने की बात कही। कान फिल्म फेस्टिवल के दौरान हिंदी के कई वाक्य और मुहावरे गूंजे। सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने इंडिया फोरम के मुख्य मंच से अपनी बात ही हिंदी गीत ‘है प्रीत जहां की रीत सदा, मैं गीत वहां के गाता हूं, भारत का रहनेवाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं’ से आरंभ की। गीतकार और लेखक प्रसून जोशी ने भी भारत की रचनात्मकता को ‘बेचैन सपने’ जैसे पद से जोड़ा और कुछ कर गुजरने की बात की। लगभग इसी समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वडोदरा के युवा शिविर को संबोदित कर रहे थे। उन्होंने भी कुछ इसी तरह की बात की। उन्होंने भारत को दुनिया की नई उम्मीद बताते हुए कहा था कि कोरोनाकाल में संकट के बीच दुनिया को वैक्सीन और दवाईयां पहुंचाने से लेकर बिखरी हुई सप्लाई चेन के बीच आत्मनिर्भर भारत की उम्मीद तक, वैश्विक अशांति और संघर्षों के बीच शांति के लिए एक सामर्थ्यवान राष्ट्र की भूमिका तक, भारत आज दुनिया की नई उम्मीद है। ऐसे वक्त में जब देश में कुछ राजनीतिज्ञ हिंदी और भाषा को लेकर राजनीति कर रहे हों तो वैश्विक मंच पर भारत के गौरव को, भारतीय दर्शन को, भारत के युवाओं के सपनों को हिंदी में अभिव्यक्त करना न सिर्फ हिंदी बल्कि भारतीय भाषाओं का भी सम्मान है। वोट की राजनीति के लिए भाषा को हथियार बनाकर समाज को बांटने की जुगत में लगे नेताओं को ये बात समझनी होगी कि भारत की आकांक्षाओं को  वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए वैश्विक मंचों पर भारतीय भाषा में बात करनी होगी। हिंदी के लोगों को भी इस बात का ध्यान रखना होगा कि हिंदी की उन्नति का रास्ता भी भारतीय भाषाओं के आंगन से होकर जाता है। इस बार कान फिल्म महोत्सव में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने इस सोच को पूरी दुनिया के सामने रखा। यह अनायास नहीं था कि मंत्री अनुराग ठाकुर जब भारतीय प्रतिनिधिमंडल के साथ रेड कार्पेट पर चल रहे थे तो उनकी शेरवानी के बटन पर हिंदी, मराठी, गुजराती समेत अन्य भारतीय भाषाओं में भारत लिखा था। 

भारतीय फिल्मों को वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान को गाढ़ा करना है तो उसको भारत की कहानियों पर ध्यान देना होगा। अभिनेता माधवन ने ठीक कहा कि उत्तर प्रदेश से लेकर मध्य प्रदेश तक में भारतीय समाज के नायकों की, उनकी सफलताओं की कहानियां बिखरी हैं। उन कहानियों पर फिल्में बनाई जाएं तो भारतीय फिल्मों की व्याप्ति पूरी दुनिया में होगी। आर्यभट्ट से लेकर सुंदर पिचाई तक भारतीयों की सफलता की कहानी पूरी दुनिया को बताने की जरूरत है। माधवन ने इसरो के वैज्ञानिक नंबी नारायणन की जिंदगी पर आधारित फिल्म राकेट्री, द नंबी इफेक्ट बनाई है जिसका प्रदर्शन कान में हुआ। ये फिल्म हिंदी, तमिल, तेलुगू समेत कई भारतीय भाषाओं में बनाई गई है। वैज्ञानिकों और तकनीक के महारथियों के जीवन पर बनी फिल्मों में अलग-अलग देशों के दर्शकों की रुचि इस वजह से संभव है कि उनके कार्य को कई देश के लोग जानते हैं। आज अगर गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई और माइक्रोसाफ्ट के सत्य नडेला की सफलता की कहानी को फिल्मों में चित्रित किया जाता है तो वो न केवल दुनिया के युवाओं को आकर्षित करेगी बल्कि भारत के गौरव को भी दुनिया में स्थापित कर सकेगी। आज अगर कोई फिल्मकार कोरोनाकाल में भारत की महामारी से लड़ने की जिजीविषा को केंद्र में रखकर फिल्म बनाता है तो पूरी दुनिया उसको ध्यान से देखेगी। कोरोनाकाल में जिस तरह से भय का वातावरण बना था और उस वातावरण में भारत ने वैक्सीन बनाया। भयंकर भय के उस माहौल में इस विशाल देश में वैक्सीन को अलग अलग राज्यों तक पहुंचाना और करोड़ों लोगों का टीकाकरण कराना किसी थ्रिलर से कम नहीं है। 

यह भी एक सुखद संयोग है कि कान फिल्म महोत्सव अपनी स्थापना के पचहत्तरवें साल में है, भारत अपनी स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है और भारत और फ्रांस के राजनयिक संबंध के भी 75 साल हो रहे हैं। इस संयोग को कान फिल्म फिल्म फेस्टिवल ने उत्साह के साथ समरोहपूर्वक मनाने का निर्णय लिया। भारत को फेस्टिवल के दौरान सम्मानित देश (कंट्री आफ आनर) का दर्जा दिया गया। ये पहली बार हो रहा है कि फिल्म फेस्टिवल के दौरान किसी भी देश को सम्मानित देश के तौर पर आमंत्रित किया गया है। कान फिल्म फेस्टिवल में चेतन आनंद की 1946 की फिल्म ‘नीचा नगर’ को सम्मानित किया जा चुका है, सत्यजित राय की फिल्म पाथेर पंचाली को भी । 2013 में अमिताभ बच्चन और लियेनार्दो द कैप्रियो ने संयुक्त रूप से कान फिल्म फेस्टिवल के औपचारिक शुरुआत की घोषणा की थी। भारत के फिल्मकार समय समय पर कान फिल्म फोस्टिवल की जूरी में नामित होते रहे हैं। अब कान फिल्म फेस्टिवल ने भारत की फिल्मों को,यहां की कहानियों को लेकर विशेष रुचि दिखाई है। कान फिल्म फेस्टिवल में भारतीय फिल्मों और फिल्मकारों को इतना महत्व मिलना ये साबित करता है कि पूरी दुनिया भारतीय मनोरंजन जगत को बहुत संजीदगी से देख रही है। मशहूर फिल्मकार और भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान, पुणे के चेयरमैन शेखर कपूर ने कान फिल्म फेस्टिवल के मंच से कहा कि ये भविष्य का उत्सव है। 

अब जब पूरी दुनिया भारतीय फिल्मों की ओर एक उम्मीद भरी नजरों से देख रही है तो भारतीय फिल्मकारों खासतौर पर हिंदी के फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों के सामने उन उम्मीदों पर खरा उतरने की चुनौती है। ऊलजलूल कहानियों से आगे जाकर, बेवजह की मारधाड़ और यौनिकता से आगे जाकर भारत के गौरव को स्थापित करनेवाली कहानियों को लेकर फिल्में बनानी होंगी। फिल्मकारों के लिए मुनाफा पहली प्राथमिकता है, होनी भी चाहिए लेकिन सिर्फ मुनाफे के लिए फिल्म बनाकर इस कला को समृद्ध नहीं किया जा सकता है। कला की उत्कृष्टता को बरकरार रखकर भी मुनाफा कमाया जा सकता है। पूर्व में कई फिल्मकारों ने ऐसा किया भी है। फिल्म ‘रंग दे बसंती’ और ‘तारे जमीं पर’ आदि का उदाहरण दिया जा सकता है। राजमौली ने अपनी फिल्मों में साबित किया है कि कला की भव्यता से भी जमकर पैसा कमाया जा सकता है। इस काम में राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम की महती भूमिका हो सकती है। भारत सरकार की इस संस्था को आगे आकर उन फिल्मकारों की पहचान करनी होगी जो भारतीय भूभाग पर बिखरी कहानियों की खोज करें। साथ ही उन फिल्मकारों को चिन्हित करें जो इन कहानियों पर उत्कृष्ट फिल्में बनाकर दर्शकों के सामने पेश कर सकें। इसके लिए आवश्यक है कि भारतीय फिल्म विकास निगम के पुनर्गठन के कार्य में तेजी लाई जाए। इसको अफसरशाही और लालफीताशाही की जकड़न से मुक्त किया जाए। फिल्म की समझ रखनेवाले, भारतीय कहानियों को, भारतीय भाषाओं में समझने और उसको भारतीय भाषाओं में ही अभिव्यक्त करनेवालों की भूमिका बढ़ाई जाए। अगर ऐसा हो पाता है तो न केवल भारतीय फिल्मों का भला होगा बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दुनिया जिस ‘नई उम्मीद’ की बात कर रहे हैं वो भारतीय फिल्म जगत में भी साकार हो सकेगा। 


Saturday, March 3, 2018

मजबूत पहल से निखरेगी प्रतिभा ·


आज अगर हम भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य पर नजर डालते हैं, खासकर नाटक और फिल्म के क्षेत्र में तो हमें तमाम विदेशी नाटककारों और फिल्मकारों का उदाहरण ही देखने सुनने को मिलता है। फिल्म और नाटक पर होनेवाली चर्चा में  ब्रेख्त, चेखव, हेनरिक इब्सन, कुरुसोवा, गोदार आदि के नाम ही गूंजते हैं। रूस के लेखक एंतोन चेखव के नाटकों के बारे में कहा जाता है कि 1918 से 1956 तक चेखव की रचनाओं का इकहत्तर भाषाओं में अनुवाद हुआ। पूरी दुनिया की अलग अलग भाषा में करीब पचास लाख पुस्तकें छापकर सस्ते दाम पर उसका वितरण करवाने का व्यवस्था की गई। दुनियाभर में चेखव के नाटकों के मंचन के लिए सोवियत रूस ने एक अभियान चलाया। आर्थिक के अलावा हर तरह की मदद नाटककारों को दी गई। यही हाल ब्रेख्त के नाटकों के साथ भी हुआ। हेनरिक इब्सन के नाटक अब भी हिंदी में अनूदित होकर मंचित हो रहे हैं। नार्वे के इस नाटककार के लिए वहां की सरकार ने जो जतन किए वो सबके सामने है। शेक्सपियर के साथ भी इस तरह की सहूलियत रही। अपने देश की सांस्कृतिक प्रतिभा को विश्वभर में फैलाने के लिए रूस और जर्मनी के अलावा कई देशों ने योजनाबद्ध तरीके से प्रचार किया। इसी तरह से अगर हम देखें तो फिल्मकार गोदार को धीमे ट्रैकिंग शॉट का जनक मानकर स्थापित करने के लिए दुनियाभर में प्रचार किया गया। गोदार को महान बनाने के लिए भी योजनाबद्ध तरीके से कोशिशें की गईं। लेकिन व्ही शांताराम ने जिल तरह से कैमरे का उपयोग किया उसको वैश्विक फलक पर पहचान नहीं मिल पाई। ये शांताराम ही थे जिन्होंने जिब या ट्राली शॉट के आने के पहले ही इस तरह के प्रयोग अपनी फिल्मों में किए। उस दौर में व्ही शांताराम ने बैलगाड़ी में कैमरा बांधकर जिब की तरह से उसका इस्तेमाल किया और उसको नीचे उपर करते हुए शॉट्स लिए। गंधर्व नाटक मंडली में काम करते हुए शांताराम ने जो अनुभव हासिल किए थे उसके आधार पर उन्होंने अपनी फिल्मों में बेहद क्लोज शॉट और ट्रॉली शॉट्स का इस्तेमाल शुरु किया। इस बात की चर्चा बहुत कम होती है। इसकी वजह यही है कि अबतक सरकार के स्तर पर अपने कलाकारों की कला को वैश्विक मंच पर रखने की कोशिश संजीदगी से नहीं हुई।
दुनियाभर में इस तरह के कई उदाहरण हमे देखने को मिल जाते हैं जहां सरकारें अपनी कलात्मक प्रतिभाओं के प्रचार प्रसार के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाती रही है, उसपर बजट बनाकर धन खर्च करती रही है। लेकिन हमारे देश में अपनी कलात्मक प्रतिभाओं को पूरी दुनिया के सामने पेश करने की सांगठनिक पहल नहीं हुई। इसके नाम पर होता यह था कि या तो अंतराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भागीदारी या फिर भारत में आयोजित अंतराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में सिनेमा का प्रदर्शन आदि करवाकर सरकारी अमला अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेता था। कल्चरल एक्सचेंज के नाम पर भी छिटपुट गतिविधियां होती थीं। भारत में आयोजित अंतराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में भी सिनेमा का प्रदर्शन होता था लेकिन उसको प्रचारित प्रसारित करने के लिए खास नहीं किया जाता था। अभी हाल ही में भारत सरकार ने इस दिशा में एक ठोस पहल की है। बर्लिन में आयोजित फिल्म महोत्सव, जिसको बर्लिनाले के नाम से जाना जाता है, में सीआईआई के साथ मिलकर एक प्रतिनिधिमंडल भेजा। इसकी अगुवाई मशहूर फिल्मकार करण जौहर ने किया और सदस्य के तौर पर वरिष्ठ फिल्मकार जानू बरुआ, शाजी करुण, सेंसर बोर्ड की सदस्य वाणी त्रिपाठी, अभिनेत्री भूमि पेडणेकर, सूचना और प्रसारण मंत्रालय में संयुक्त सचिव अशोक परमार के अलावा सीआईआई के प्रतिनिधि भी शामिल थे। तीन दिनों तक चले इस बर्लिनाले में भारत की तरफ से इस प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने अपने देश के सिनेमा को तो शोकेस किया ही, इसके अलावा भारत में सिनेमा निर्माण की अनंत संभावनाओं के बारे में भी इस फेस्टिवल में शामिल होनेवाले दुनियाभर के फिल्मकारों को बताया। भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय के उस पहल की मंशा बर्लिनाले में जाकर भारत की विविध और समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा के बारे में पूरी दुनिया के फिल्माकरों को बताना था। प्रतिनिधि मंडल की सदस्य वाणी त्रिपाठी के मुताबिक तीन दिनों तक चले इस फिल्म महोत्सव में अनेक देशों के फिल्मकारों से बातचीत हुई और उनको भारत में शूटिंग करने से लेकर फिल्मों के एडिटिंग की सहूलियतों के बारे में बताया गया। इस तरह की पहल पहले शायद ही हुई हो जिसमें अंतराष्ट्रीय स्तर के निर्देशकों और भारतीय फिल्मकारों को आमने सामने बैठकर फिल्म निर्माण से लेकर सांस्कृतिक साझेदारी की संभावनाओं पर विचार करने का अवसर मिला हो। उनको भारत में फिल्म बनाने के लिए तमाम सहूलियतों के बारे में भी बताया गया जिनमें फिल्म फेलिसिटेशन ऑफिस भी शामिल है जो कि फिल्मकारों को सिंगल विंडों क्लीयरेंस देता है।ऐसा पहली बार हुआ है कि बर्लिनाले में कोई सरकारी प्रतिनिधिमंडल इस तरह के एजेंडे के साथ शामिल हुआ हो। बर्लिनाले के दौरान भारतीय दूतावास में बर्लिनाले के अंतराष्ट्रीय दर्शकों, जिनमें कई मशहूर प्रोड्यूसर्स भी थे, के सामने फिल्म नीरजा का प्रदर्शन भी किया गया। फिल्म से जुड़े लोगों को अस्सी का दशक याद होगा जब फ्रांस ने पूरी दुनिया के फिल्मकारों को तमाम तरह की सहूलियतें दी थीं। जर्मन फिल्मकार श्लौंडार्फ की 1984 में बनी फिल्म ‘स्वान इन लव’ फ्रांस में बनी थी। इनके अलावा भी कई फिल्मकारों ने फ्रांस में जाकर फिल्म निर्माण किया था। अगर भारत में भी उसी तरह का माहौल बनाया जा सके तो दुनिया के मशहूर निर्देशक यहां आकर फिल्म निर्माण कर सकते हैं। 

एक अनुमान के मुताबिक इस वक्त हमारे देश में सालभर में 1500 फीचर फिल्मों का निर्माण होता है, करीब 900 टीवी चैनलों के लिए कंटेंट तैयार किए जाते हैं, पैंतालीस करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता हैं, जिनमें से करीब 35 करोड़ के पास स्मार्ट फोन है। यह परिदृश्य अंतराष्ट्रीय फिल्म निर्माताओं के लिए एक बेहतर बाजार है जिसके बारे में उनको विस्तार से बताए जाने की जरूरत है। अगर सरकार बर्लिनाले जैसे आयोजनों में भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के लोगों की लगातार भागीदारी सुनिश्चित करवाती है तो इसके कई फायदे हो सकते हैं। अगर विदेशों के बड़े फिल्म निर्माता अपनी फिल्मों की शूटिंग और पोस्ट प्रोडक्शन का काम भारत में करती है तो स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं। विदेश के फिल्मकारों को क्षेत्रीय स्तर के फिल्मकारों के साथ संवाद का मौका मिल सकता है जिससे की हमारे देश की स्थानीय प्रतिभा के बारे में पूरी दुनिया को पता चल सकता है और उनको बेहतर अवसर मिल सकते हैं। प्रत्यक्ष रूप से रोजगार और परोक्ष रूप से वैश्विक स्तर पर अवसर मिलने की संभावना बनती है। भारतीय फिल्म उद्योग को भी मजबूकी मिलेगी क्योंकि जब विदेशी फिल्में यहां बनने लगेंगी तो स्थानीय प्रतिभाओं को भी वैश्विक सोच और समझ का फायदा मिलेगा।  
पिछले दिनों कला विदुषी सोनल मान सिंह ने एक बातचीत में इस बात पर दुख जताया था कि हमारे देश में आजादी के सत्तर साल बाद भी कोई सांस्कृतिक नीति नहीं बन पाई है। उन्होंने एक दिलचस्प किस्सा भी सुनाया था कि जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तो उनको चेतावनी दी थी कि अगर संस्कृति मंत्रालय को उचित महत्व नहीं दिया गया तो वो उनके आवास के बाहर धरने पर बैठ जाएंगी। सोनल जी इस बात से दुखी थीं कि संस्कृति मंत्रालय को किसी भी मंत्रालय के साथ पुछल्ले के तौर पर जोड़ दिया जाता है, कभी जहाजरानी मंत्रालय के साथ तो कभी महिला और बाल विकास मंत्रालय के साथ तो कभी विमानन मंत्रालय के साथ। दरअसल ये क्षोभ इस बात से उपजा था कि संस्कृति को महत्व नहीं मिलने की वजह से भारतीय कला को दुनिया में जितना महत्व मिलना चाहिए उतना मिल नहीं पाता है। अब अगर हम कालिदास का ही उदाहरण लें तो उनके नाटकों को वैश्विक स्तर पर प्रचारित करने के लिए कितने प्रयास किए गए ये शोध का विषय हो सकता है। संस्कृत में कई ऐसे नाटक और नाटककार हैं जिनके बारे में जब विदेशी विद्वानों ने लिखा तो वो अचानक से महत्वपूर्ण हो गए। कई ऐसी फिल्में बनीं, कई ऐसे निर्देशक हुए, कई ऐसी रचनाएं रची गईं जिनको वैश्विक मंच नहीं मिल पाया। वो अलक्षित रह गए। स्थानीय प्रतिभाओं को लक्षित और रेखांकित करने के लिए इस वक्त देश में एक ठोस सांस्कृतिक नीति की जरूरत महसूस की जा रही है। जबतक वो नहीं बन पाती है तबतक बर्लिनाले में जाकर भारतीय प्रतिभा और स्थितियों को मजबूती से रखने जैसी पहल लगातार होती रहे तो दुनिया के सामने भारतीय कला और कला संपदा को प्रमुखता से पेश करने में मदद मिल सकती है।


Saturday, August 19, 2017

एक्ट में बदलाव से बदलेगी सूरत

हाल ही में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड जिसे आमतौर पर लोग सेंसर बोर्ड के नाम से जानते हैं, का पुर्नगठन किया गया और अध्यक्ष समेत कई सदस्यों को बदला गया। हटाए गए अध्यक्ष पहलाज निहलानी के कार्यकाल में फिल्मों के सेंसरशिप को लेकर काफी हो हल्ला मचता रहा। उनके विवादास्पद बयानों ने भी उनके विरोधियों को काफी मसाला दे दिया। बोर्ड के अंदर ही सदस्यों के बीच मतभेद शुरू हो गए थे। दरअसल पहलाज निहलानी ने सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष बनते ही ऐसे काम शुरू कर दिए किए कि बोर्ड तो को संस्कारी बोर्ड कहा जाने लगा था। सेंसर बोर्ड ने जब जेम्स बांड की फिल्म में कांट-छांट की थी तो संस्कारी बोर्ड हैश टैग के साथ कई दिनों तक वो मसला ट्विटर पर ट्रेंड करता रहा था । फिल्म में चुंबन के दृश्य पर सेंसर बोर्ड की कैंची चली थी । उस वक्त पहलाज निहलानी का तर्क था कि भारतीय समाज के लिए लंबे किसिंग सीन उचित नहीं हैं और उन्होंने आधे से ज्यादा इस तरह के सीन को हटवा दिया था । बांड की फिल्म में कट लगाने के बाद पूरी दुनिया में सेंसर बोर्ड और उसके अध्यक्ष की फजीहत हुई थी । अभी हाल ही में प्रकाश झा की फिल्म लिपस्टिक अंडर बुर्का को लेकर भी काफी विवाद हुआ। विवादित फिल्मों की काफी लंबी सूची है। अब जब सेंसर बोर्ड का नए सिरे से गठन किया गया है और प्रसून जोशी को उसका अध्यक्ष बनाया गया है तो फिल्मकारों को उम्मीद जगी है कि अब उनका काम आसान होगा। पर क्या सच में यह इतना आसान है। क्या फिल्मों पर कैंची चलनी रुक जाएगी। शायद नहीं।
नवगठित बोर्ड में दोबारा नामित वाणी त्रिपाठी के बयानों से लगता है कि जबतक सिनेमेटोग्राफी एक्ट में बदलाव नहीं किया जाएगा तो बहुत कुछ बदलने वाला नहीं है। वाणी त्रिपाठी जिस ओर इशारा कर रही हैं उसपर विचार करना बहुत आवश्यक है । सिनेमेटोग्राफी एक्ट की धारा 5 बी (1) को देखे जाने की जरूरत है। इस धारा के अंतर्गत बोर्ड के सदस्यों को यह छूट मिलती है कि वो शब्दों को अपने तरीके से व्याख्यायित कर सकें । इस धारा के मुताबिक - किसी फिल्म को रिलीज करने का प्रमाण पत्र तभी दिया जा सकता है जब कि उससे भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता पर कोई आंच ना आए । मित्र राष्ट्रों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी ना हो । इसके अलावा तीन और शब्द हैं – पब्लिक ऑर्डर, शालीनता और नैतिकता का पालन होना चाहिए । अब इसमें सार्वजनिक शांति या कानून व्यवस्था तक तो ठीक है लेकिन शालीनता और नैतिकता की व्याख्या अलग अलग तरीके से की जाती रही है । अब नए बोर्ड में ही अगर हम देखें तो प्रसून और वाणी के लिए शालीनता और नैतिकता की परिभाषा अलग हो सकती है वहीं नरेन्द्र कोहली की व्य़ाख्या इनसे अलग हो सकती है। और यहीं से मतभेद और विवाद की शुरुआत होती है।
इस एक्ट के तहत सालों से विवाद होते रहे हैं । उन्नीस सौ तेहत्तर में बी के आदर्श की फिल्म ‘गुप्त ज्ञान’ को लेकर काफी बवाल मचा था । तत्कालीन बोर्ड के कई सदस्यों को लग रहा था कि ये जनता की यौन भावनाओं को भड़का कर पैसा कमाने के लिए बनाई गई फिल्म है जबकि निर्माताओं का तर्क था था वो समाज को शिक्षित करना चाहते हैं । लंबी बहस के बाद ‘गुप्त ज्ञान’ को बगैर किसी काट छांट के प्रदर्शन की इजाजत तो दी गई थी।  फिल्म के प्रदर्शन के बाद उसके अंतरंग दृष्यों को लेकर इतनी आलोचना हुई कि चंद महीने में ही उसको सिनेमाघरों से वापस लेना पड़ा था । उन्नीस सौ चौरानवे में दस्यु सुंदरी फूलन देवी की जिंदगी पर बनी फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ में भी स्त्री देह की नग्नता को लॉंग शॉट में ही दिखाने की इजाजत दी गई थी । फिल्म ‘फायर’ से लेकर ‘डर्टी पिक्चर’ तक पर अच्छा खासा विवाद हुआ लेकिन सेंसर बोर्ड ने अपनी बात मनवा कर ही दम लिया था । फिल्म ‘12 इयर्स अ स्लेव’ में गुलामों के अत्याचार के नाम पर नग्नतापूर्ण दृश्यों की इजाजत देना हैरान करनेवाला था । जब दो हजार में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के सीईओ घूसखोरी के आरोप में सीबीआई के हत्थे चढ़े तो स्थितियां साफ होने लगी थीं कि किस वजह से मानदंड को अलग अलग तरीके से किसी के हक में इस्तेमाल किया जाता है। सीईओ की गिरफ्तारी के बाद कई सुपरस्टार्स और निर्देशकों ने इस बात के पर्याप्त संकेत दिए थे कि उनको अपनी फिल्मों में गानों को पास करवाने के लिए घूस देना पड़ा था । एक सेंसर बोर्ड सैफ अली की फिल्म ‘ओमकारा’ में गालियों के प्रयोग की इजाजत देता है तो दूसरा सेंसर बोर्ड प्रकाश झा की फिल्म में गाली हटाने को कहता है ।फिल्म प्रमाणन बोर्ड में जिस तरह से एडल्ट और यू ए फिल्म को श्रेणीबद्ध करने की गाइडलाइंस है उसको लेकर भी बेहद भ्रम है । फिल्मों को सर्टिफिकेट देने की गड़बड़ी शुरू होती है क्षेत्रीय स्तर की कमेटियों से जहां वैसे लोगों का चयन होता है जिनको सिनेमा की गहरी समझ नहीं होती है । इसके बाद फिल्म प्रमाणन बोर्ड में भी कई स्तर होते हैं और एक्ट के शब्दों को अपनी तरह से व्याख्यित कर अध्यक्ष अपनी मनमानी चलाते हैं ।
वाणी त्रिपाठी इस बात को जोर देकर कहती हैं कि फिल्म प्रमाणन बोर्ड में सुधार के लिए श्याम बेनेगल समिति की सिफारिशों को जल्द से जल्द लागू किया जाना चाहिए। अरुण जेटली जब सूचना और प्रसारण मंत्री थे तब श्याम बेनेगल की अध्क्षता में एक समिति बनाई थी। इस समिति में राकेश ओमप्रकाश मेहरा और पियूष पाडें सदस्य थे। सीबीएफसी में सुधारों को लेकर इस समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी लेकिन उसको लागू नहीं किया जा सका है।जहां तक ज्ञात हुआ है कि श्याम बेनेगल समिति ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को सेंसर बोर्ड के कामकाज के अलावा फिल्मों को दिए जानेवाले सर्टिफिकेट की प्रक्रिया में बदलाव की सिफारिश की थी । यह भी कहा जा रहा है कि बेनेगल कमेटी की सिफारिशों के मुताबिक अब इस संस्था को सिर्फ फिल्मों के वर्गीकरण का अधिकार रहना चाहिए । वो फिल्म को देखे और उसको किस तरह के यू , ए या फिर यूए सर्टिफिकेट दिया जाना चाहिए, इसका फैसला करे । इस सिफारिश को अगर मान लिया जाता है तो फिल्म सेंसर के इतिहास में बदलाव की शुरुआत हो सकेगी। सूचना और प्रसारण मंत्रालय संभालने के बाद जिस तरह से स्मृति ईरानी ने फिल्म प्रमाणन बोर्ड से लेकर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की आयोजन से जुड़ी समितियों में बदलाव किया है उससे उम्मीद जगी है कि बेनेगल समिति की सिफारिशों को लागू किया जा सकेगा। फिल्म प्रमाणन बोर्ड के सदस्य ही बेनेगल समिति की सिफारिशों को लेकर उत्साहित हैं तो संभव है कि उसको लागू करने का प्रक्रिया में तेजी आए। बेनेगल कमेटी की सिफारिशों को लागू करते हुए यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उसमें भी सिनेमेटोग्राफिक एक्ट की धारा 5 बी(1) का ख्याल रखने की सलाह दी गई है। सारी समस्या की जड़ में तो यही धारा है ।
यह भी ज्ञात हुआ है कि बेनेगल समिति की सिफारिशों के मुताबिक फिल्मकारों के लिए ये बताना जरूरी होगा कि वो किस श्रेणी की फिल्म बनाकर लाए हैं और उन्हें किस श्रेणी में सर्टिफिकेट चाहिए । उसके बाद सीबीएफसी के सदस्य फिल्म को देखकर तय करेंगे कि फिल्मकार का आवेदन सही है या उनके वर्गीकरण में बदलाव की गुंजाइश है । उसके आधार पर ही फिल्म को सर्टिफिकेट मिलेगा । बेनेगल कमेटी ने अपनी सिफारिशों में फिल्मों के वर्गीकरण का दायरा और बढा दिया गया है । यू के अलावा यूए श्रेणी को दो हिस्सों में बांटने की सलाह दी गई है । पहली यूए + 12 और यूए +15 । इसी तरह से ए कैटेगरी को भी दो हिस्सों में बांटा गया है । ए और ए सी । ए सी यानि कि एडल्ट विद कॉशन । इसके अलावा कमेटी ने बोर्ड के कामकाज में सुधार के लिए भी सिफारिश की है । उन्होंने सुझाया है कि बोर्ड के चेयरमैन समेत सभी सदस्य फिल्म प्रमाणन के दैनिक कामकाज से खुद को अलग रखेंगे और इस काम की रहनुमाई करेंगे । पहलाज निहलानी के साथ एक दिक्कत यह भी थी कि वो रोजाना बोर्ड के दफ्तर में बैठते थे और हर छोटे बड़े फैसलों को लेकर बयान देने के लिए उपलब्ध रहते थे। अबतक की छवि के मुताबिक प्रसून जोशी बेहद संजीदगी से काम करते हैं और विवादों से दूर रहते हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि उनके कार्यकाल में विवादित बयान कम आएंगे लेकिन फिल्मों पर कैंची चलनी कम हो जाएगी यह उम्मीद तबतक बेमानी है जबतक कि बेनेगल कमेटी की सिफारिशों को सुधारों के साथ लागू नहीं कर दिया जाता है ।

Saturday, May 6, 2017

‘मेघदूत’ पर नाहक विवाद को हवा

‘समय- समय पर अनेक वादों और आदर्शों ने उम्मीदें दी थीं। जिन पर ठिठुरते हुए हमने अपने हाथों को सेंका था, आज उनके कोयले मद्धिम हो चले हैं। सिर्फ राख बची रही गई है जो फूंक मारने से कभी दायीं ओर जाती है, कभी बाईं ओर। जिस दिशा में जाती है, हम उस तरफ भागते हुए कभी दक्षिणपंथी हो लेते हैं, कभी वामपंथी लेकिन राख-राख है, उसके पीछे अधिक दूर तक नहीं भागा जा सकता। आखिर में अपने पास लौटना पड़ता है।‘ हिंदी के मूर्धन्य लेखक निर्मल वर्मा की ये बातें कब कही गईं थी, उसका काल ठीक से याद नहीं पड़ता लेकिन इस वक्त भी उनकी कही बातें एकदम सटीक मालूम पड़ती हैं। जब ठिठुरते हुए हाथ सेंके जा रहे थे तो उन कोयलों का रंग ‘लाल’ होता था, जो मद्धिम पड़ा और फिर अब जब राख बनकर हवा में उड़ रहा है तब कभी कभार ऐसा होता है कि वो राख आपकी आंखों में पड़ जाए और आपको तकलीफ दे। आंखों में राख पड़ने से कोई नुकसान नहीं होता है लेकिन वो कुछ समय के लिए काफी तकलीफदेह होता है। अभी हाल ही में संगीत नाटक अकादमी में इस तरह की राख उड़ी थी जो अकादमी के चेयरमैन शेखर सेन की आंखों में जा पड़ी और उसने उनको तात्कालिक रूप से तकलीफ पहुंचाई। दरअसल हुआ यह कि संगीत नाटक अकादमी ने एक इब्राहिम अल्काजी की याद में एक कार्यक्रम का आयोजन किया। जब कार्ड का ड्राफ्ट तैयार होकर आया तो उसको मीडिया में लीक कर दिया गया। लीक किए कार्ड से भ्रम फैला कि दिल्ली के रवीन्द्र भवन स्थित मेघदूत थिएटर का नाम बदलकर इब्राहिम अल्काजी ने नाम पर किया जा रहा है। उस कार्ड के आधार पर सोशल मीडिया से लेकर अखबारों आदि में शोरगुल मचना शुरू हो गया। संगीत नाटक अकादमी के चेयरमैन शेखर सेन की घेरबंदी शुरू हो गई। शेखर सेन पर इस बात को लेकर हमले शुरू हो गए कि वो इब्राहिम अल्काजी को कालिदास से अहम मानते हैं। अजीब अजीब से तर्क गढ़े जाने लगे। बैगर तथ्यों को जाने समझे शोर मचाने की ये एक ऐसी मिसाल है जिसपर कला-संस्कृति जगत से जुड़े लोगों को गंभीरता से विचार करना चाहिए। जब शोरगुल ज्यादा बढ़ा तो थिएटर से गहरे जुड़ी वाणी त्रिपाठी ने विस्तार से लेख लिखकर भ्रम के इस जाले को साफ किया। वाणी ने अपने लेख में मेघदूत थिएटर की ऐतिहासिकता और इब्राहिम अल्काजी के थिएटर के योगदान को रेखांकित किया। वाणी ने इस बात को भी साफ किया कि रवीन्द्र भवन के परिसर के इस खुले रंगमंच का नामकरण अल्काजी ने ही किया था । वाणी त्रिपाठी के लेख के बाद इस पूरे विवाद पर से जाला हटना शुरू हो गया। फिर संगीत नाटक अकादमी की तरफ से भी इस पूरे विवाद पर चेयरमैन शेखर सेन अपनी सफाई पेश की। अगर हम समग्रता में विचार करें तो संगीत नाटक अकादमी से जुड़े पुराने लोगों ने विवाद उठाने की गरज से नए सिरे से काम करना शुरू किया है। उन्होंने गलत बातों को फैलाकर विवाद की आंधी खड़ा करने की कोशिशें शुरू कर दी है। लेकिन पंखे की हवा से बनाई गई कृत्रिम आंधी का कोई असर नहीं होता है। फिर वामपंथ के अनुयायी लेखकों-कलाकारों- संस्कृतिकर्मियों का एक ऐसा संगठित तंत्र है जहां किसी भी बात को या तथ्य को अपनी सुविधा के हिसाब से फैलाकर जनमानस को प्रभावित या भ्रमित करने की कोशिश होती है। कितनी सफलता मिलती है इसका आंकलन होना शेष है। वामपंथी गणेश जी देशभर में दूध पिलाने की घटना को आरएसएस से जोड़कर उनके अफवाह तंत्र को निशाने पर लेते रहे हैं। लेकिन खुद वामपंथियों का अफवाह तंत्र बेहद मजबूत है और वो जब चाहें, जैसे चाहें किसी को भी नाम दिला दें, बदनाम कर दें। पुरस्कार दिला दें या तिरस्कृत कर दें। अपनी इस ताकत के बूते पर वो परसेप्शन की लड़ाई भी लड़ते रहे हैं, अब भी लड़ रहे हैं। गंभीर विषयों की चाशनी में दरअसल वो अपनी विचारधारा को मार्ग प्रशस्त कर रहे होते हैं।    
दरअसल साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़ी अकादमियों और संस्थानों पर भले ही दो हजार चौदह में सरकार बदलने के बाद से पुरानी व्यवस्था में बदलाव कर दिए गए हो लेकिन यह बदलाव शीर्ष स्तर पर हुए हैं। चेयरमैन, अध्यक्ष आदि की भले ही नियुक्ति हो गई लेकिन उनको काम करने के लिए पर्याप्त कर्मचारी आदि नहीं दिए गए हैं। अभी तो इन संस्थानों के मुखिया को अपने कर्माचरियों के लिए ही मंत्रालय से संघर्ष करना पड़ रहा है, वो नया करने की सोचने की हालत में ही नहीं है। कलाकारों को इन संस्थाओं का अगुआ बनाकर अच्छी पहल की गई है लेकिन इन कलाकारों के साथ एक कुशल प्रशासक की नियुक्ति भी आवश्यक है। कुशल प्रशासक इस वजह से कि सालों से जड़ जमाए बैठी विचारधारा को अगर चुनौती देनी है तो पहले इस व्यवस्था को चुनौती देनी होगी । इसके अलावा जो लोग इन संस्थानों के कार्यकारी परिषद आदि में मनोनीत किए गए हैं वो पुरानी व्यवस्था को बदलना तो चाहते हैं लेकिन कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते हैं, किसी तरह के विवाद में पड़े बगैर शांति से संस्था को चलाने की कोशिश हो रही है। जबकि जरूरत इस बात की है कि सालों से जंग खाई व्यवस्था को एक बारगी तो जोरदार तरीके से हिलाने की जरूरत है। यहां इस बात की परवाह भी छोड़नी होगी कि विरोधी खेमे के लोग क्या कहेंगे। अगर विरोधियों की चिंता की गई तो बदलाव के नतीजों में संदेह है। दिल्ली के सांस्कृतिक गलियारे में इस बात की काफी चर्चा है कि नेशनल गैलरी ऑफ मॉर्डन आर्ट की पुरानी समिति ने दो हजार बीस तक के कार्यक्रमों को तय कर दिया है । अब अगर दो हजार बीस तक का संस्था का काम तय है तो नेशनल गैलरी ऑफ मॉर्डन आर्ट जो नए डायरेक्टर जनरल नियुक्त किए गए हैं वो क्या करेंगे । उन उड़ती हुई राख को बैठकर उड़ाते रहेंगे? क्योंकि इनके करने के बहुत कुछ तो है नहीं । यह सिर्फ नेशनल गैलरी ऑफ मॉर्डन आर्ट की स्थिति नहीं है। मंत्रालय में बैठे कुछ अधिकारी भी नई सरकार के नामित इन संस्थाओं के मुखिया की राह आसान बनाने की बजाए उसपर कांटे बिछाते रहते हैं। लालफीताशाही के फंदे में फंसाकर बदलाव को रोकना अफसरशाही के लिए काफी आसान होता भी है। लालफीताशाही से इन संस्थाओं को चलानेवाले इतने खफा हो गए थे कि उन्होंने दिल्ली में एक बैठक कर सामूहिक रूप से अपनी नाराजगी का इजहार किया था। उच्चस्तरीय दखल के बाद उसके बाद से संस्कृति मंत्रालय में काम को गति मिली थी। 
सवाल यह है कि इस सरकार पर सांस्कृतिक संस्थाओं पर कब्जे के आरोप भी लग रहे हैं, वामपंथियों का अफवाह तंत्र इसको फैलाने के लिए बेहद सक्रिय भी है और किसी भी बड़े छोटे मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहता है। बावजूद इस स्थिति के काम ज्यादातर वही हो रहे हैं जो पहले से तय कर दिए गए हैं। हद तो तब हो जाती है कि इन्हीं संस्थाओं में से एक के खर्चे पर विदेश जाकर एक इतिहासकार भारत के प्रधानमंत्री और मौजूदा सरकार को कठघरे में खड़ा कर देती हैं, अपनी ही देश की चुनी हुई सरकार को फासिस्ट आदि कह देती हैं। दरअसल यह तब होता है जब आपको अपने बौद्धिक सामर्थ्य पर भरोसा होता है लेकिन जब आप विचारधारा वाले तर्क पेश करते हैं तो वो अंधविश्वास के रूप में सामने आता है। विचारधारा की इस लड़ाई में वामपंथ के योद्धा हर तरह के हथियार से लैस हैं। पस्त जरूर हैं, लेकिन उनके अंदर इतनी ताकत तो शेष बची है कि वो किसी को भी शक के घेरे में खड़ा कर देने के लिए काफी है। किसी भी कार्यक्रम को वादित कर सकते हैं। उनसे वैचारिक रूप से लड़ा जा सकता है लेकिन वैचारिक लड़ाई में वो जिस तरह के गैर वैचारिक औजारों का इस्तेमाल करते हैं उनसे निबटने के लिए यह आवश्यक है कि सामने वाले भी उसको भांपकर अपनी तैयारी करें। संगीत नाटक अकादमी में ङी अगर वाणी त्रिपाठी ने मोर्चा नहीं संभाला होता तो उन्होंने अकादमी को बदनाम करने और शेखर सेन को लेकर एक भ्रम की ल्थिति तो बना ही दी थी। उनको एक तरीके से परंपरा और विरासत विरोधी बताने की महिम शुरू हो चुकी थी। अब भी वक्त है कि इस वैचारिक लड़ाई में अपने सामने वाले की चालों को समझा जाए और उनको निश्क्रिय करने के लिए उसी तरह की कोशिशें भी की जाएं ।