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Saturday, October 24, 2026

दक्षिणपंथी फिल्मकारों के सामने चुनौतियां


फिल्म निर्देशक मधुर भंडारकर ने डा श्यामा प्रशाद मुखर्जी पर फिल्म बनाने की घोषणा की है। फिल्म का नाम होगा- श्यामा द मिसिंग चैप्टर। फिल्म की घोषणा के समय बताया गया कि इसमें डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राजनीतिक संघर्ष, वैचारिक प्रतिबद्धता और राष्टीय एकता के लिए उनके आंदोलनों को प्रमुखता से दिखाया जाएगा। कलकत्ता विश्विद्यालय के सबसे युवा कुलपति बनने से लेकर स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल के सदस्य होने तक डा मुखर्जी की संघर्ष यात्रा में भी कई दिलचस्प मोड़ हैं। स्वाधीन भारत में जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से उनका मतभेद हुआ तो वो मंत्रिमंडल छोड़ कर बाहर निकल गए। कश्मीर में अनुच्छेद 370 की समाप्ति के लिए बड़ा आंदोलन किया। उस आंदोलन में ही उनका बलिदान हुआ। इन सब महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं को इस फिल्म में समेटने की बात की जा रही है। अभी सिर्फ फिल्म की घोषणा की गई है, इसके शूटिंग शेड्यूल, स्टारकास्ट आदि के बारे में नहीं बताया गया है। दो वर्षॉ पहले वीर सावरकर पर रणदीप हुड्डा ने एक फिल्म बनाई थी। फिल्म का नाम था स्वातंत्र्यवीर सावरकर। रणदीप हुड्डा ने इस फिल्म को लेकर खूब मेहनत की थी। लेकिन फिल्म को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। जब फिल्म प्रदर्शित हुई थी तब चर्चा हुई कि अगर फिल्म की अवधि थोड़ी कम होती तो दर्शकों को अधिक पसंद आती। तीन घंटे की फिल्म थी। उस समय भी इस बात की भी चर्चा हुई थी कि जब देश के नायकों या राइट विंग के विषयों पर दक्षिणपंथी माने जानेवाले फिल्मकार फिल्में बनाते हैं तो उनमें से अधिकतर व्यावसायिक रूप से सफल क्यों नहीं हो पाते हैं। 

राइट विंगर फिल्मकारों की असफलता पर बात करने के पहले तीन फिल्मों के बारे मं जान लेते हैं। 2019 में एक फिल्म आई थी पीएम नरेन्द्र मोदी। इस फिल्म में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भूमिका विवेक ओबराय ने निभाई थी। निर्देशक थे उमंग कुमार। फिल्म नहीं चल पाई। एक और फिल्म आई जो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पर केंद्रित थी जिसका नाम था मैं अटल हूं। इसमें अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका पंकज त्रिपाठी ने की थी। ना तो विवेक ओबराय पीएम नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व के साथ न्याय कर पाए और ना ही पंकज त्रिपाठी अपनी अदाओं से अटल जी के करीब पहुंच पाए। पूरी फिल्म में वो पंकज त्रिपाठी ही बने रहे। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी एक फिल्म आई जिसका नाम था अजेय, द अनटोल्ड स्टोरी आप ए योगी। ये फिल्म भी नहीं चल पाई। ये शांतनु गुप्ता की पुस्तक द मंक हू बिकेम द चीफ मिनिस्टर पर आधारित थी। इस तरह की कई फिल्में बनीं पर द कश्मीर फाइल्स और द केरला स्टोरी को छोड़कर कम ही फिल्मों को सफलता मिल पाई। दूसरी तरफ अगर हम देखें तो संजय दत्त जैसे चरित्र पर बनी फिल्म संजू कई सौ करोड़ का बिजनेस करती है। संजय दत्त के व्यक्तित्व में बहुत सारी नकारात्मक बातें हैं फिर भी जब उनको फिल्मी पर्दे पर पेश किया जाता है तो दर्शकों को पसंद आती है। निर्देशक राजू हिरानी ने कथा को बहुत ही रोचक तरीके से पिरोया था।

राइट विंग के फिल्मकारों की फिल्मों की असफलता के कारणों पर विचार करें तो सबसे पहली बात जो सामने आती है वो ये कि इनकी फिल्मों का बजट बहुत कम होता है। इंटरनेट मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर बनी फिल्म का बजट 8 करोड़ रु था। अटल बिहारी वाजपेयी पर बनी फिल्म का बजट 20 करोड़ रु और योगी आदित्यनाथ पर बनी फिल्म का बजट 15 करोड़ था। वहीं 2018 में प्रदर्शित फिल्म संजू का बजट 100 करोड़ के करीब था। बजट कम होने के कारण फिल्मों में जो भव्यता और बड़े स्टार की उपस्थिति होनी चाहिए वो नहीं हो पाती है। राइट विंग के फिल्मकारों के साथ या राइट विंग के विषयों पर फिल्म करने से अभी हिंदी फिल्मों के बड़े स्टार हिचकते हैं। हिचकते क्या हैं बल्कि कोई न कोई बहाना बनाकर मना कर देते हैं। पता नहीं क्यों उनको किस बात का भय सताता है कि वो अब भी लेफ्ट के खेमे के निकट ही दिखना चाहते हैं। हिंदी फिल्मों में लंबे समय से एक इकोसिस्टम काम करता है जो राइट विंग के विषयों या उनके नायकों पर फिल्म बनाने से कतराता है। एक तो बजट की कमी दूसरे सितारों का नहीं मिलना कारण बनता है कि कोई स्टूडियो फिल्म को रिलीज करने के लिए आगे नहीं आता है। उनको इस बात की आश्वस्ति नहीं होती कि फिल्म में  सफल हो पाएगी और वो इपने निवेश पर मुनाफा कमा पाएंगे। संजू फिल्म की सफलता का एक बड़ा कारण उसमें रणवीर कपूर, अनुष्का शर्मा, विकी कौशल, परेश रावल का होना भी था। एक और कारण जो समझ आता है वो ये कि फिल्मों को दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाना चाहिए ना कि जिनके इर्दगिर्द फिल्म बना रहे हैं उनको ध्यान में रखते हुए। फिल्मकार का दायित्व दर्शकों के प्रति होता है। सिनेमा में सिनेमा का तत्वों का होना बहुत आवश्यक है। फिल्म बनाने के पीछे अगर कोई उद्देश्य है भी तो उसको प्रत्यक्ष नहीं करना चाहिए बल्कि परोक्ष रूप से दर्शकों के सामने जाना चाहिए। जैसे संजू फिल्म के माध्यम से संजय दत्त की नकारात्मक छवि को बेहतर करना था। पर वो फिल्मों में दिखाए प्रसंगों के माध्यम से आया, प्रत्यक्ष संवाद से नहीं। राइट विंग फिल्मकार जब नेताओं को केंद्र में रखकर फिल्में बनाते हैं तो उनके व्यक्तित्व पर पर्याप्त शोध नहीं करते। व्यक्तित्व के उन हिस्सों तक नहीं पहुंच पाते हैं जो अज्ञात या कम ज्ञात हो। उनको अपने रिसर्च का स्तर बढ़ाना होगा। फिल्म बनाने में समय लगाना होगा। ये सब तभी संभव होगा जब बजट हो। 

एक और बात जो फिल्मों को प्रभावित करती है वो है समीक्षकों और पीआर का ईकोसिस्टम। फिल्म प्रदर्शित होने के पहले जिस तरह का माहौल बनाया जाता है उसमें इस ईकोसिस्टम का बड़ा हाथ होता है। उस ईकोसिस्टम में अभी भी राइट विंग का प्रभाव नहीं बन पाया है। जबकि लेफ्ट और उससे समानुभूति रखनेवाले लोग खुलकर ना केवल अपने लोगों का समर्थन करते हैं बल्कि अन्य वैचारिक पृष्ठभूमि वाले फिल्मकारों का खुला विरोध भी करते हैं। मुझे याद पड़ता है कि जब डा चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म पिंजर रिलीज हुई थी तो उसकी समीक्षा एम एस सथ्यू ने लिखी थी। एम एस सथ्यू ने गरम हवा फिल्म बनाई थी। वो समीक्षक नहीं थे लेकिन चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म पर लिखा, उसकी कमियां गिनाईं। उसके बाद सथ्यू ने फिर किसी फिल्म की समीक्षा लिखी हो ध्यान नहीं आता। कुल मिलाकर अगर हम फिल्मों के परिदृश्य को देखें तो वहां राइट विंग के विषयों पर बननेवाली फिल्मों के सामने चुनौतियां बहुत अधिक हैं। पता नहीं श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर बनने वाली फिल्म के लिए मधुर भंडारकर का बजट कितना है। वो इसको किस भव्यता से बनाना चाहते हैं। श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमिका कौन सा अभिनेता निभाएगा। ये सब ऐसे प्रस्न हैं जो अब भी राइट विंगर हिंदी फिल्मकारों के सामने मुंह बाए खड़े हैं।  


Sunday, October 24, 2021

लता को सावरकर ने संवारा


महापुरुष वो होते हैं जो अपने ज्ञान से मानव जाति का कल्याण मात्र नहीं करते बल्कि पीढ़ियों को संस्कारित करते हैं । अपने विचार और ज्ञान से वो प्रतिभा को न सिर्फ चिन्हित करते हैं बल्कि उनको उस पथ पर चलने की प्रेरणा देते हैं जो महानता की ओर जाता है। रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविंद और वीर सावरकर ऐसे ही महापुरुष थे जिन्होंने अपनी वाणी और व्यक्तित्व से कई लोगों को संस्कारित किया। वीर सावरकर ने तो  न केवल भारत माता को गुलामी की जंजीर से मुक्त करने का स्वप्न देखा बल्कि उसको साकार करने के लिए लंबे समय तक भयंकर यातनाएं झेलीं। इतना ही नहीं उन्होंने अपने प्रेरणादायी व्यक्तित्व से, अपने विचारों से पीढ़ियों को प्रभावित किया। कई कई ऐसे नायक तैयार कर दिए जो भारत के भाल पर चमकता सितारा है। ऐसा ही एक सितारा है लता मंगेशकर। भारत रत्न लता मंगेशकर । 

कुछ दिनों पहले लता मंगेशकर ने लिखा,आज से 90 साल पहले 18 सितंबर 1931 को मेरे पिताजी के ‘बलवंत संगीत मंडली’ के लिए वीर सावरकर जी ने एक नाटक लिखा जिसका नाम था, संन्यस्त खड्ग। उसका पहला प्रयोग मुंबई (तब बांबे) ग्रांट रोड के एलफिस्टन थिएटर में हुआ जिसमें बाबा ने ‘सुलोचना’ की भूमिका की थी। लता मंगेशकर जब ये लिख रही थीं तो वो उस दौर कि बात कर रही थीं जब उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर अपनी संगीत मंडली के जरिए संगीत और रंगमंच की दुनिया में सार्थक हस्तक्षेप कर रहे थे। दीनानाथ मंगेशकर ने मात्र 18 वर्ष की उम्र में अपने दोस्तों के साथ मिलकर बलवंत संगीत मंडली का गठन किया था। अभिनेत्री पद्मिनी कोल्हापुरे के दादा कृष्णराव कोल्हापुरे भी उस वक्त इस संगीत मंडली में बेहद सक्रिय थे। जब संगीत मंडली के कार्यक्रम लोकप्रिय होने लगे तो दीनानाथ मंगेशकर ने अपनी मंडली के लिए नए नाटक लिखवाने आरंभ किए। उस दौर में विनायक दामोदर सावरकर ने बलवंत संगीत मंडली के लिए संन्यस्त खड्ग नाटक लिखा था। जिसकी चर्चा लता मंगेशकर ने की है। ये नाटक बेहद लोकप्रिय हुआ था। दीनानाथ मंगेशकर और सावरकर के संबंध प्रगाढ़ होते चले गए। अब ये संबंध औपचारिकताओं की सीमा तोड़कर घरेलू संबंध जैसे हो गए थे। लता मंगेशकर ने कई इंटरव्यू में वीर सावरकर के साथ अपने संबंधों को बहुत आत्मीयता के साथ याद किया है। वीर सावरकर ने कैसे लता मंगेशकर के जीवन की दिशा बदल दी इसपर आने के पहले आपको बता दें कि बलवंत संगीत मंडली के मंच पर ही पहली बार लता मंगेशकर ने गाया था। इसकी बेहद दिलचस्प कहानी है जिसको लता मंगेशकर ने अपने एक इंटरव्यू में बताया है। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर अपनी मंडली के साथ कोल्हापुर गए थे, साथ में अपनी बेटी को लेकर भी गए थे। नौ साल की छोटी सी बच्ची हमेशा पिता के साथ रहती थी। वहां के माहौल को देखकर अचानक बच्ची ने पिता से स्टेज पर गाने के बारे में पूछा । पिता थोड़े चकित हुए जब बिटिया ने कहा कि वो उनके साथ गाना चाहती हैं। मुस्कुराते हुए पिता ने पुत्री को गाने की अनुमति तो दी लेकिन ये पूछा कि वो कौन सा राग गाएगी। बेटी के मुंह से निकला राग खंबावती। ये सुनकर दीनानाथ मंगेशकर को आश्चर्य तो हुआ पर प्रसन्न भी हुए। कहा चलो आज तुम स्टेज पर गाकर दिखाओ। कोल्हापुर के नूतन थिएटर में लता मंगेशकर ने राग खंबावती तो गाया ही, दो और मराठी गाने गाए। इस संगीत मंडली से भी सावरकर का गहरा जुड़ाव था।  और लता मंगेशकर के पिता उनके साथ अपने अनुभवों को साझा करते थे। एक दूसरे से सलाह मशविरा किया करते थे।

मंगेशकर परिवार में जीवन अपनी गति से चल रहा था। लता मंगेशकर जब तेरह साल की हुईं तो अचानक से उनके परिवार पर वज्रपात हुआ। उनके पिता गुजर गए। अब परिवार के सामने कई तरह का संकट खड़ा होगा। इतने कम उम्र में लता मंगेशकर के कंधे पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी आ गई। पिता की मृत्यु के बाद लता मंगेशकर बेहुत परेशान रहने लगी थी। संघर्ष के उस दौर में भी मंगेशकर परिवार को वीर सावरकर का साथ मिला था। उन्होंने अपने सोच और विचारों से लता मंगेशकर को प्रभावित किया। यतीन्द्र मिश्र ने अपनी पुस्तक में लता मंगेशकर  की जिंदगी को अहम मोड़ देने के सावरकर के योगदान को रेखांकित किया है। अपनी किशोरावस्था में लता मंगेशकर ने समाज सेवा करने की ठान ली थी। अपने इस निर्णय के बारे में लता ने वीर सावरकर से चर्चा की थी। सावरकर ने ही उन्हें समझाया था कि तुम ऐसे पिता की संतान हो जिसका शास्त्रीय संगीत और कला में शिखर पर नाम चमक रहा है। अगर देश की सेवा ही करनी है तो संगीत के मार्फत समाजसेवा करते हुए भी उसको किया जा सकता है। यहीं से लता मंगेशकर का मन भी बदला जो उन्हें संगीत की कोमल दुनिया में बड़े संघर्ष की तैयारी के लिए ले आया। हम भारतीयों को सावरकर का ऋणी होना चाहिए कि उन्होंने एक बड़ी प्रतिभा को खिलकर सफल होने का जज्बा दिया। कल्पना कीजिए कि अगर सावरकर ने लता मंगेशकर को ये सलाह न दी होती तो क्या होता। स्वाधीनता का स्वप्न देखनेवाले एक क्रांतिवीर ने अपनी मिट्टी में जन्मी प्रतिभा को रास्ता दिखाकर उसको संवारा। बाद के वर्षों में भी लता मंगेशकर ने वीर सावरकर के लिखे कई गीतों को अपनि वाणी दी। सावरकर का शिवाजी पर लिखा एक मराठी गीत आज भी बेहद लोकप्रिय है। इस गीत के बोल हैं ‘हे हिंदू नृसिंहा प्रभो शिवाजी राजा’। लता मंगेशकर ने जब संगीत पर आधारित फिल्म बनाने की सोची तो उसका मुहुर्त वीर सावरकर से ही करवाया था। कहना ना होगा कि वीर सावरकर ने लता मंगेशकर की जिंदगी को जो दिशा दी उसने सुरों की दुनिया को लता जैसा कोहिनूर दिया। 

Tuesday, February 28, 2017

सावरकर के समग्र मूल्यांकन की दरकार

रविवार को विनायक दामोदर सावरकर की इक्यावनवीं पुण्यतिथि थी । इस देश में हिंदुत्व शब्द को देश की भौगोलिकता से जोड़नेवाले इस शख्स की विचारधारा पर वस्तुनिष्ठ ढंग से अब तक काम नहीं हुआ है । सावरकर की विचारधारा को एम एस गोलवलकर और के बी हेडगेवार की विचारधार और मंतव्यों से जोड़कर उनकी एत ऐसी छवि गढ़ दी गई जो दरअसल उनके विचारों से मेल नहीं खाती है । सावरकर ने जिस हिन्दुत्व की विचारधारा को प्रस्तावित और प्रचारित किया था उसको आजादी के बाद या यों कहें कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद उसपर हिकारत की नजरों से विचार किया गया । किसी भी सिद्धांत को जब घृणा की बुनियाद पर या नतीजे को सामने रखकर परखा जाता है तो उसका दोषपूर्ण होना तय होता है । सावरकर की विचारधारा को महात्मा गांधी की हत्या से जोड़कर जिस तरह से प्रचारित किया गया और उसको घृणा की कसौटी पर कसा गया उससे जो नतीजा निकला वह सावरकर के योगदान को सीमित करने के लिए काफी था । फिर वामपंथी विचारधारा के लोगों में एक साथ हल्ला करने की जो संगठित ताकत है वह किसी को भी झूठ की बुनियाद पर बदनाम कर सकती है । बहुधा वामपंथी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर अफवाह फैलाने की मशीनरी का आरोप लगाते हैं लेकिन अफवाह और झूठ फैलाने में वामपंथियों जितना संगठित उदाहरण पूरी दुनिया में कहीं अन्यत्र नहीं मिलता है । इसको लेनिन से लेकर माओ और फिडेल कास्त्रों तक को मुक्ति का मसीहा बनाने के उपक्रम को देखकर समझा जा सकता है । माओ और फिडेल ने मुक्ति के नाम पर कितना अत्याचार किया, गरीबों के अधिकारों के नाम पर लोकतंत्र का गला घोंट दिया, बावजूद इसको वो मसीहा बने रहे तो यह मूल्यांकन की वामपंथी पद्धति ही है । यह पद्धति अपनी विचारधारा के अनुयायियों को आगे तो बढ़ाती ही है विपरीत या अन्य विचारधारा के मानने वालों को साथ-साथ बदनाम भी करती चलती है । अब अगर हम सावरकर के मामले में ही देखें तो उनके लिखे का मूल्यांकन कम उनपर लिखे का मूल्यांकन ज्यादा हुआ है । जैसे उन्होंने हिंदुत्व में पृष्ठ 81 पर लिखा है कि – कोई भी व्यक्ति बगैर वेद में विश्वास किए भी सच्चा हिंदू हो सकता है । सावरकर के मुताबिक सिर्फ जातीय संबंध या पहचान हिंदुत्व को परिभाषित नहीं कर सकता है । उनके मुताबिक किसी भी राष्ट्र की पहचान के तीन आधार होते हैं – भौगोलिक एकता,जातीय गुण और साझा संस्कृति । यह भी सही है कि सावरकर ने साझा संस्कृति की जो वकालत की है उसके मुताबिक कोई एक ऐसी भाषा होनी चाहिए जो सबको जोड़ कर रख सके । सावरकर ने इसके लिए संस्कृत या फिर हिंदी को अपनाने की वकालत की । सावरकर के यहां जिस तरह से धार्मिक स्वतंत्रता की बात मिलती है उसको भी ध्यान में रखकर उनका मूल्यांकन किया जाना चाहिए । जैसे वो अपने लेखन में कहते हैं कि भारत से ज्यादा उदार धार्मिक व्यवस्था कहां हो सकती है जहां चार्वाक जैसा विद्वान महाकाल मंदिर की सीढ़ियों से नास्तिकता पर बात करते हैं ।
दरअसल आजादी के बाद गांधी के साथ के लोगों को उच्च स्थान मिला और गांधी से मतभिन्नता रखनेवाले लोगों को जानबूझकर इतिहास के हाशिए पर रखा गया । इसके वजहों की गहन पड़ताल की जरूरत है । इतिहास बहुत निर्मम होता है और वक्त जब करवट लेता है तो वो इतिहास को दुरुस्त भी करता चलता है । अब आप देखें तो जिस सावरकर को कट्टर हिदुत्व का पोषक बताकर प्रचारित किया गया वही सावरकर आजादी के आंदोलन के दौरान भी और उसके बाद भी लगातार यंत्र-युग की वकालत करता रहा लेकिन उनके इस विचार को उनके मूल्यांकन के वक्त भुला दिया गया क्योंकि इससे कट्टर हिंदू की छवि गढ़ने में दिक्कत हो सकती थी । सावरकर अपने विचारों में आधुनिक थे और उनको विज्ञान की महत्ता का पता था, लिहाजा वो देश के विकास के लिए विज्ञान को तरजीह देने के मुखर समर्थक थे ।

अब अगर हम देखें तो आजादी आंदोलन में जनता को संगठित करने के लिए गांधी और सावरकर दोनों ने हिंदू धर्म का सहारा लिया । अगर हम सूक्षम्ता और वस्तुनिष्ठता के साथ विचार करें तो यह पाते हैं कि सावरकर गांधी से ज्यादा उग्रता से हिंदू धर्म की कुरीतियों और कर्मकांडों पर प्रहार करते चलते हैं । अगर हम हिंदू महासभा के उनके अध्यक्षीय उद्बोधन को देखें तो उसमें से यह बात निकलकर आती है सावरकर की लोकतांत्रिक मूल्यों में जबरदस्त आस्था थी और वो हर किसी को समानता के सिद्धांत की वकालत भी करते थे चाहे उसकी जाति, धर्म कुछ भी हो । सावरकर के इन विचारों का मुठेभड़ उनके ही हिदुत्व को परिभाषित करते हुए पितृभमि और पुण्यभूमि के विचारों से होता है । सावरकर के विचार के इन दोनों छोरों को कभी भी साथ रखकर विचार नहीं किया गया । सावरकर गांधी के अहिंसा के सिद्धांत के भी प्रबल विरोधी थे लेकिन उन्होंने हिंसा की वकालत की हो ऐसा प्रमाण नहीं मिलता है । दरअसल सावरकर जब सेल्यूलर जेल से बाहर आए तो उनके विचार पूर्व के विचार से बदले हुए थे । इस्लाम के नाम पर सियासत के वो तीव्र आलोचना करने लगे थे । धर्मांतरण के खिलाफ उग्रता से अपने विचारों को रखने लगे थे । दरअसल अगर हम देखें तो सावरकर के विचारों का सही मूलायंकन किया ही नहीं गया । 1923 में प्रकाशित उनकी किताब हिंदुत्वा, हू इज हिंदू के आधार पर उनके समर्थकों ने अपनाया और विरोधियों ने आलोचना की । हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहते उनके विचारों को छोड़कर जब उनका एकांगी मूल्यांकन होता है तो यह एक तरह से बौद्धिक बेइमानी हो जाती है । उनके निधन के पचास साल बाद क्या अब वक्त नहीं आ गया है कि सावरकर के विचारों को समग्रता में पेश किया जाए और उनकी जो छवि गढ़ी गई है उसको सही तरीके से जनता के सामने रखा जाए ।