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Saturday, May 23, 2026

इतिहास के लैंडस्केप में बदलाव संभव


पिछले दिनों भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के कई विद्वानों से संवाद का अवसर मिला। उनके विभिन्न प्रकार के शोध की जानकारी मिली। उच्च अध्ययन संस्थान में ही टैगोर फेलो के रूप में कार्यरत प्रो ओम प्रकाश शर्मा जी से लंबी बातचीत हुई। उनका अध्ययन हिमाचली पहाड़ी भाषा, लिपियां और लोकसाहित्य पर है। बातचीत के क्रम में उन्होंने एक पांडुलिपि दिखाई। उन्होंने बताया कि इस पांडुलिपि का नाम खुजित्रा फलित ज्योतिष पांडुलिपि है। इसमें आगम शास्त्र के अंतर्गत होरारि ज्योतिष के विषय पर लिखा गया है। पांडुलिपि की लिपि के संबंध में उन्होंने दिलचस्प बात बताई। उनका कहना है कि इसकी लिपि शारदा लिपि से जन्मी हिमाचल प्रदेश की भटाखरी लिपि है। उत्तराखंड के जौंसार-बाबर के लिपिकार इस पांडुलिपि को जड़ाखरी लिपि मानते हैं। ओम प्रकाश शर्मा लंबे समय से पांडुलिपियों की खोज में लगे हैं और करीब सात वर्षों की कठिन मेहनत के बाद उनको ये पांडुलिपि डिजिटाइजेशन के लिए मिली है। उनका शोध ये कहता है कि यह पांडुलिपि बहुत पुरानी है और मूल शारदा लिपि में लिखी गई होगी। शारदा लिपि ब्राह्मी परिवार की लेखन प्रणाली के तौर पर कश्मीर में मान्य रही है। ज्ञान की देवी शारदा के नाम पर ही इस लिपि का नामकरण बताया जाता है। प्राचीन काल में इस लिपि का प्रयोग कश्मीर से लेकर हिमाचल प्रदेश तक में होता था। उत्तराखंड से मिली इस पांडुलपि से संकेत मिलता है कि किस प्रकार से शारदा लिपि की यात्रा कश्मीर से लेकर उत्तराखंड तक हुई होगी। जब डा शर्मा से बात हो रही थी तो उसी समय संस्कृति मंत्रालय की योजना ज्ञान भारतम का ध्यान आया।

ज्ञान भारतम के बारे में पहली बार इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली के प्रोफेसर रमेशचंद्र गौड़ से पिछले वर्ष विस्तार से चर्चा हुई थी। ये वो समय था जब ज्ञान भारतम पर मंथन के लिए तीन दिनों का अंतराष्ट्रीय सम्मेलन दिल्ली में आयोजित किया गया था। इस सम्मेसन का विषय था- रिक्लेमिंग इंडियाज नालेज लीगेसी थ्रू मैनुस्क्रिप्ट हैरिटेज। हाइब्रिड मोड में आयोजित इस सम्मेलन में देश विदेश के करीब दो हजार विद्वानों ने हिस्सा लिया था जिसमें डेढ सौ विशेषज्ञों ने अपनी बात रखी थी। सम्मेलन के दूसरे दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ज्ञान भारतम को औपचारिक रूप से आरंभ किया था । इसके पहले बजट में भी इस तरह की योजना की घोषणा की गई थी। इस सम्मेलन में इस योजना से जुड़े वर्किंग ग्रुप की रिपोर्ट भी जारी की गई थी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पांडुलिपियां भारतीय ज्ञान परंपरा के लिखित स्त्रोत हैं जो भारत की विभिन्न संस्थाओं के साथ-साथ व्यक्तिगत अधिकार के घरों में उपलब्ध हैं। इन पांडुलिपियों के बारे में गहन सर्वेक्षण की आवश्यकता पर बल दिया गया है। संस्कृति मंत्रालय ने इस वर्ष अप्रैल से जून तक तीन महीने की अवधि में पांडुलिपियों के सर्वेक्षण का कार्य आरंभ किया है। 2003 में भी राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन आरंभ किया गया था। तब इसमें जन भागीदारी नहीं थी। विशेषज्ञों और संस्थाओं के माध्यम से कार्य किया गया था जो बाद में लगभग समाप्त हो गया। अब भारत सरकार ने पांच वर्षों के लिए करीब पांच सौ करोड़ रुपए का बजट ज्ञान भारतम के लिए तय किया है। उसके अंतर्गत पांडुलिपियों की खोज का पहला चरण आरंभ हो गया है। अभी जो सर्वेक्षण हो रहा है उसमें जन भागीदारी सुनिश्चित की गई है। जनसाधारण से एक एप के माध्यम से पांडुलिपियों के बारे में जानकारी देने की अपेक्षा की गई है। ज्ञान भारतम के सर्वे समाप्त हो जाने के बाद प्राप्त जानकारी की प्रामाणिकता जांची जाएगी। फिर संरक्षण, प्रलेखन, डिजीटाइजेशन, आकार्इविंग, पाठक संपादन और प्रकाशन का चरण आरंभ होगा। दीर्घ योजना है। पिछले वर्ष आयोजित अंतराष्ट्रीय सम्मेलन के वर्किंग समूह की रिपोर्ट में भवनाथ झा ने विस्तार से पांडुलिपि सर्वेक्षण के चरणों और उसके बाद के कार्यों का लेखा जोखा प्रस्तुत किया है।

एक अनुमान के मुताबिक राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के अंतर्गत पहले ही हमारे पास करीब 50 लाख पांडुलपियों की कैटलागिंग हो चुकी है। मनमोहन सिंह सरकार के दौरान इसका काम बहुत धीमा हो गया था। अब नरेन्द्र मोदी सरकर ने संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत इसका रोडमैप बनाकर सर्वेक्षण का कार्य आरंभ किया है। संस्कृति मंत्रालय में इस कार्य से जुड़े व्यक्ति ने बताया कि पिछले करीब डेढ महीने में 25 लाख पांडुलिपियों की जानकारी मिल चुकी है। जिस प्रकार से जानकारियां मिल रही हैं उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि आनेवाले दिनों में इस जानकारी का दायरा विस्तृत होगा। सबसे मुश्किल कार्य है जानकारी के बाद उन पांडुलपियों को डिजीटाइजेशन के लिए हासिल करना। जिन धार्मिक संस्थाओं के कमरों में पांडुलपियां बंद हैं उनके प्रमाणीकरण और उसके डिजिटाइजेशन के लिए पांडुलिपियों प्राप्त करना कठिन हो सकता है। ये काम हो भी गया तो उसके बाद इन पांडुलिपियों के पाठ के लिए बड़ी संख्या में भाषा, लिपि और इतिहास के विद्वानों की आवश्यकता होगी। कृत्रिम प्रज्ञा (एआई) से पांडुलिपियों के वर्गीकरण में सहायता मिल सकती है लेकिन एआई बहुत मददगार साबित होगा इसमें संदेह है। अभी जर्मनी के एक विश्वविद्लाय से जुड़ा एक समाचार चर्चा में आया है। इसके अनुसार वहां इस तरह का एक एआई टूल विकसित किया गा है जो प्राचीन लिपियों को पढ़ने में मददगार है। ये अभी बहुत आरंभिक बातें हैं इसके विकसित होने और उपयोगी टूल के रूप में चलन में आने में समय लग सकता है। पांडुलपियों के इंडेक्सिंग का कार्य भी समय लेगा। कीवर्ड के आधार पर इंडेक्सिंग की विधि से ही ये काम होगा। इसमें एक चुनौती और भी है कि अगर इस कार्य में कुशल लोगों को नहीं लगाया गया तो सारी मेहनत पर पानी फिर सकता है। पांडुलिपियों को जुटाने के काम के साथ साथ संस्कृति मंत्रालय को कुशल मानव संसाधन के विकास की भी योजना बनानी पड़ेगी। सर्वेक्षण के साथ साथ इस कार्य को करने से भविष्य में मदद मिलेगी।

ज्ञान भारतम भारत सरकार का एक ऐसा प्रकल्प है जो भारत की सभ्यतागत विशेषताओं को रिक्लेम करेगा। इस स्तंभ में पहले भी प्रधानमंत्री की सभ्यतागत चेतना की पुनर्स्थापना के कार्यों को रेखांकित किया गया है। ज्ञान भारतम के अंतर्गत जमा की गई पांडुलपियों के माध्यम से भारत की वो शक्ति सामने आ सकती है जिसको विदेशी इतिहासकारों और विदेशी विचारधारा से प्रभावित विद्वानों ने योजनाबद्ध तरीके से नजरअंदाज किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पिछले बारह वर्षों के महत्वपूर्ण कार्यों का विश्लेषण करें तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वो भारत और भारतीयता को स्थापित करने और अपनी सभ्यतागत निरंतरता से जोड़ने के लिए प्रयत्नशील हैं। प्राचीन पांडुलपियों में वो खजाना छुपा हुआ जो भारत के इतिहास को बदल देने की सामर्थ्य रखता है। बस इसमें एक सतर्कता बरतनी होगी कि इन पांडुलिपियों को लेकर जिस प्रकार से संगठित तरीके से अफवाह फैलाई जाती रही है उसकी काट भी रखनी होगी। अगर वैश्विक इतिहास और ज्ञान का लैंडस्केप बदलता दिखेगा तो तमाम वैश्विक शक्तियां ज्ञान भारतम के कार्य को पटरी से उतारने की कोशिश करेंगी। अकादमिक रूप से बहुत सतर्क रहने की आवश्यकत है। ये सतर्कता इस कारण भी आवश्यक है कि ये हमारी सभ्यता की निरंतरता और ज्ञान परंपरा को स्थापित करेगी।