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Monday, August 31, 2020

किताबों से झांकती राजनीति

जुलाई 1969 में राज्यसभा की सबसे पीछे वाली सीट पर बैठने वाले प्रणब मुखर्जी जब जुलाई 2012 में देश के प्रथम नागरिक बने तब उन्होंने सक्रिय राजनीति को अलविदा कहा। राष्ट्रपति बनने के बाद प्रणब मुखर्जी ने अपनी यादों को संजोना शुरू किया था। प्रणब मुखर्जी के बारे में कहा जाता है कि उनकी याददाश्त हाथी के जैसी थी। वो जिस घटना के साक्षी बनते थे वो उनको याद रहता था, वो जिस कागज को एक बार देख लेते थे वो उनके मस्तिष्क पर छप जाता था। प्रणब मुखर्जी ने अपने राजनीति दौर को तीन पुस्तकों में समेटा, ‘द ड्रामैटिक डिकेड:द इंदिरा गांधी इयर्स’, ‘द टर्बुलेन्ट इयर्स’ और ‘द कोएलीशन इयर्स’। पहली किताब में प्रणब मुखर्जी ने इंदिरा गांधी के दौर के कांग्रेस की राजनीति का सूक्ष्मता से विवरण दिया। 1971 में पाकिस्तान से युद्ध जीतने वाली नायिका किस तरह से चार साल में ही देश में इमरजेंसी लगाने को मजबूर होती हैं, इसके कारण भी गिनाए। प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब में सिद्धार्थ शंकर रे को परोक्ष रूप से आपातकाल लगाने के लिए पृष्ठभूमि बनाने के लिए जिम्मेदार ठहराया।

अपनी दूसरी किताब द टर्बुलेंट इयर्स में उन्होंने 1980 से लेकर 1996 की भारतीय राजनीति का विवरण दिया। राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके बुरे दिन शुरू हो गए थे। यहां उन्होंने एक दिलचस्प टिप्पणी की है कि वो पार्टी और सरकार के काम में इतने व्यस्त हो गए थे कि काम लगानेवाले पर नजर नहीं रख सके थे। जितना जरूरी काम करना है उतना ही अहम काम लगानेवालों पर नजर रखना है।तीनों पुस्तकों में प्रणब मुखर्जी ने बहुत ही शास्त्रीय ढंग से राजनीतिक घटनाक्रम का विवरण पेश किया है, विवादों से दूर । तीसरी किताब द कोएलीशन इयर्स में उन्होंने कांची के शंकराचार्य की गिरफ्तारी के प्रसंग पर कैबिनेट की चर्चा का वर्णन किया है वो भी सपाट। लिखा कि ‘कैबिनेट की बैठक में शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती की गिरफ्तारी की टाइमिंग पर सवाल उठाते हुए गुस्सा हो गया और पूछा कि इस देश में धर्मनिरपेक्षता सिर्फ हिंदुओं के लिए ही है, किसी की हिम्मत है कि वो ईद के समय किसी मुस्लिम धर्मगुरू को गिरफ्तार कर ले?’ इसके बाद फौरन शंकराचार्य की रिहाई के आदेश हो गए। इस तरह के प्रसंग बहुत कम हैं लेकिन कांग्रेस के संविधान, कांग्रेस कार्यसमिति के नियम और अधिकार से लेकर संसदीय नियामवलियों का कब कैसे उपयोग हुआ है उसकी विस्तार से जानकारी है। यह अकारण नहीं था कि जब उनका राष्ट्रपति चुनाव के लिए उन्होंने मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दिया तो उस वक्त 97 मंत्रिमंडलीय समूह के अध्यक्ष थे।    

Sunday, December 28, 2014

ऑनलाइन बुक स्टोर के खतरे और चुनौतियां

दो हजार चौदह को किताबों की दुनिया या कहें कि प्रकाशन के कारोबार के लिहाज से भी अहम वर्ष के तौर पर देखा जाएगा । किताबों की दुनिया में दो ऐसी घटनाएं घटी जिसने भारत में कम होती जा रही किताबों की दुकानों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है । पहले मशहूर लेखक चेतन भगत के उपन्यास हाफ गर्ल फ्रेंड के लिए उसके प्रकाशक ने ऑनलाइन बेवसाइट फ्लिपकार्ट से समझौता किया । उस करार के मुताबित प्रकाशक ने फ्लिपकार्ट को यह अधिकार दिया था कि पहले कुछ दिनों तक चेतन भगत की किताब सिर्फ फ्लिपकार्ट के ऑनलाइन बुकस्टोर पर ही मौजूद रहेगी । बदले में फ्लिपकार्ट ने भी प्रकाशक को एकमुश्त साढे सात लाख प्रतियों का ऑर्डर दिया । चेतन भगत के उपन्यास की प्रबुकिंग ही जमकर हुई । इस एक्सक्लूसिव करार की वजह से भारत में चेतन के लाखों प्रशंसकों ने फ्लिपकार्ट के ऑनलाइन स्टोर से जाकर किताब खरीदी । जबतक उनका उपन्यास किताबों की दुकान तक पहुंचता तब तक उसके पाठक उसको खरीद चुके थे । चेतन भगत के ज्यादातर पाठक इंटरनेट की दुनिया से जुड़े हैं, लिहाजा उनके लिए फ्लिपकार्ट से खरीद करना सुविधाजनक भी रहा था । उस वक्त भारत के प्रकाॆशन जगत के लिए यह बिल्कुल नई घटना थी, लिहाजा देश के किताब विक्रेता खामोश रहे । अब इसी तरह का करार भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की नई किताब द ड्रामेटिक डिकेड, द इंदिरा गांधी इयर्स भी सामने आया है । राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की किताब के प्रकाशक ने एक बार फिर एक दूसरी बड़ी ऑनलाइन कंपनी अमेजन से करार किया। इस करार के मुताबिक किताब के जारी होने के इक्कसी दिन तक यह सिर्फ अमेजन पर उपलब्ध होगी । मतलब यह कि इक्कीस दिनों तक अगर कोई पाठक प्रणब मुखर्जी की यह किताब एक्सक्लूसिव तौर पर इसी बेवसाइट से खरीद सकता था । उसके बाद यह देशभर के पुस्तक विक्रेताओं के पास पहुंचेगा । इसका नतीजा यह हुआ कि प्री बुकिंग के दौर में ही महामहिम की इस किताब लोकप्रियता के लिहाज से चेतन भगत और सचिन तेंदुलकर की किताब के बाद तीसरे पायदान पर पहुंच गई । प्री बुकिंग के आंकड़ों को देखकर तो यही लग रहा था कि इससे पुस्तक विक्रेताओं को खासा नुकसान हुआ होगा । यहां भी एक अलग तरह का तंत्र है । बेवसाइट ने प्रणब मुखर्जी की इस किताब की प्री बुकिंग शुरू की । जैसे जैसे किताब रिलीज होने की तारीख पास आने लगी तो ऑनलाइन स्टोर ने इसके मूल्य में भी कमी करनी शुरू की । किताब पर छपे मूल्य पांच सौ पचानवे की बजाय प्रीबुकिंग में इसका मूल्य चार सौ छियालीस रुपए रखा गया था । रिलीज वाले दिन इस किताब का मूल्य घटाकर तीन सौ निन्यानवे कर दिया गया । यह बिक्री का अपना गणित भी है और मुनाफा का अर्थशास्त्र भी है । इस खेल का एक और पक्ष भी है वो यह कि अमेजन पर एक ग्राहक प्रणब मुखर्जी की सिर्फ एक ही किताब खरीद सकता था । अगर किसी को दो या उससे अधिक किताबें चाहिए तो उसे उतने ही ग्राहक प्रोफाइल या अकाउंट बनाने होंगे । यह बाजार में थोक बिक्री के आसन्न खतरे के मद्देनजर किया गया है । इसी तरह से मार्केटिंग के दांव चेतन की किताब की बिक्री के वक्त भी किया गया था । चेतन की किताब ने बिक्री के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए । प्रकाशन जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि प्रणब मुखर्जी की किताब भी खूब बिक रही है । एक तो प्रणब मुखर्जी का लेखन, दूसरे किताब के केंद्र में इंदिरा गांधी । इन दोनों को मजबूती प्रदान करने के लिए जबरदस्त मार्केटिंग के तौर तरीके ।
अंग्रजी में किताब बिक्री के इस नए चलन से एक सवाल भी उठा है । क्या दुकान पर जाकर पुस्तक खरीदनेवाले किताब प्रेमियों को अब कुछ खास किताबों के लिए इंतजार करना होगा या फिर उन्हें भी किताबों की दुकान से मुंह मोड़कर ऑनलाइन स्टोर की ओर जाना पड़ेगा । भारत में कम हो रही किताबों की दुकान के लिए बिक्री का यह नया अर्थशास्त्र एक गंभीर चुनौती है । वक्त बदला है । वक्त के साथ प्रकाशन जगत के कायदे कानून भी बदल रहे हैं । लेकिन बदलाव की इस बयार में ऑनलाइन स्टोर्स की एक्सक्लूसिविटी पुस्तकों की दुकान में पूंजी लगानेवालों को हतोत्साहित करनेवाली है । इसको रोकने के लिए दिल्ली के मशहूर खान मार्किट में मौजूद एक बुक स्टोर और दिल्ली और अन्य महानगरों में बुक स्टोर की श्रंखला के मालिकों ने कड़ा रुख अख्तियार किया है । इन दोनों ने तो चेतन भगत और प्रणब मुखर्जी की किताबों के प्रकाशक की अन्य किताबें उनको वापस भेजने का फैसला लिया है । उनका कहना है कि ये पाठकों के साथ धोखधड़ी है । उनका एक तर्क यह भी है कि इस तरह से किताबों का कारोबार नहीं चलता है । अगर किसी भी प्रकाशक को ऑनलाइन बुक स्टोर पर जाना है तो फिर सारी किताबें वहीं बेचनी होंगी । ये नहीं हो सकता है कि चर्चित शख्सियतों और लेखकों की किताबें ऑनलाइन बेची जाएं और कम चर्चित और गंभीर किताबें दुकानों के माध्यम से बेची जाएं ।  कुछ अन्य बुक स्टोर्स ने प्रकाशक को पत्र लिखकर विरोध जताया है और भविष्य में ऐसा नहीं करने की चेतावनी दी है । चेतन भगत और प्रणब मुखर्जी की किताबों की मार्केटिंग के बरक्श अगर हम हिंदी प्रकाशन की दुनिया को देखें तो हमारे हिंदी के प्रकाशक मित्र अभी इस स्तर पर बाजार का का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं । बाजार के इस खेल को समझने और लागू करने की दिशा में अगर सोच भी रहे हों तो मैदान में उतरने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं । हिंदी के प्रकाशकों का अभी इन ऑनलाइन बुक स्टोर से राफ्ता कायम नहीं हो सका है । हिंदी की कुछ गिनी चुनी किताबें ही इन बेवसाइ्टस के ऑनलाइन बुक स्टोर पर मौजूद हैं । उसमें भी कई बार लिंक क्लिक करने पर एरर ही आ जाता है । जिससे पाठकों को कोफ्त होती है । हिंदी के प्रकाशकों को बाजार के इस खेल में शामिल होना पड़ेगा । इसका एक फायदा यह होगा कि हिंदी में लिखनेवाले लेखकों की पहुंच ज्यादा होगी और हिंदी के किताबों के संस्करणों की जो संख्या लगातार कम होता जा रही है उसमें बढ़ोतरी होगी । बाजार के अपने खतरे भी हैं लेकिन पाठकों तक पहुंचने के लिए इन खतरों का उठा लेना चाहिए । 

जिस तरह से हमारे देश में पुस्तक विक्रेताओं का आभाव है उसकी कमी को पूरा करने के लिए भी कदम उठाने होंगे । विशाल हिंदी पाठक वर्ग को ध्यान में रखते हुए यह आवश्यक है कि ऑनलाइन स्टोर के साथ साथ हिंदी के प्रकाशक इस तरह की कोई योजना बनाएं जिससे वो पाठकों तक पहुंच सकें । छोटे शहरों में तो फिर भी किताबें मिल जाती हैं लेकिन बड़े शहरों और मेट्रो में किताबों की अनुपल्बधता पाठकों को खिन्न करती हैं । अभी हाल ही में साहित्य अकादमी ने दिल्ली मेट्रो के साथ स्टेशनों पर किताब की दुकान खोलने के लिए करार किया है । लेकिन दो मेट्रो स्टेशनों पर किताब की दुकान से काम नहीं चलनेवाला है । साहित्य अकादमी को इस दिशा में और पहल करनी होगी और भारत सरकार को इसमें सहयोग करना होगा । साहित्य अकादमी के माध्यम से अगर किताबों की दुकानें शुरू करने का प्रयोग सफल होता है तो भारत सरकार को अकादमी को इस मद में बजट देना होगा । इसके लिए आवश्यक है कि भारत सरकार एक नई पुस्तक नीति बनाए । पुस्तकों को लेकर सरकार का रुख नरम है । अभी जिस तरह से पुस्तकों के कारोबार को जीएसटी के दायरे से बाहर कर दिया गया है वह संकेत उत्साहजनक है । सरकार को राष्ट्रीय पुस्तक नीति बनाने से पहले इसपर राष्ट्रव्यापी बहस करवाने की जरूरत है । इस व्यवसाय से जुड़े और इसको जाननेवाले सारे पक्षों की बातों को सुनकर, समझकर नीति बनाने की कोशिश की जानी चाहिए लेकिन प्राथमिकता किताबों की उपलब्धता को ध्यान में रखकर तय की जानी चाहिए । हमारे देश में हर तरह की नीति बनती है लेकिन किताबों को लेकर एक समग्र नीति के आभाव में आजादी के इतने सालों बाद भी पुस्तक संस्कृति का विकास नहीं हो पाया है । सरकार के अलावा गैर सरकारी संस्थाओं को भी पुस्तकों की संस्कृति विकसित करने की दिशा में कोशिश करनी होगी । सबकी सामूहिक कोशिशों से ही किताबों को लेकर नई पीढ़ी में ललक पैदा करनी होगी । अगर यह हो सकता है तो फिर ऑनलाइऩ स्टोर पर एक्सक्लूसिव किताबें बेचने की मार्केंटिंग के तरीकों पर रोक भी लग सकती है और मुनाफे का समावेशी वितरण हो सकेगा । दूसरा फायदा हिंदी के लेखकों को भी होगा और उनकी आय में बढ़ोतरी होगी । अबतक बाजार से भागनेवाले लेखकों को बाजार के तौर तरीके अपनाने ही होंगे । अगर ऐसा हो पाता है तो यह पुस्तक प्रकाशन कारोबार के लिए अच्छे दिन लेकर आएगा । 

Friday, December 16, 2011

बढ़ती रहेगी महंगाई

हमारा देश आज दो बड़ी समस्याओं से जूझ रहा है । पहली बड़ी समस्या है महंगाई जो सुरसा की मुहं की तरह फैलती जा रही है । दूसरी बड़ी समस्या है भ्रष्टाचार, जिसको लेकर लोगों के मन में गुस्सा बढ़ता जा रहा है । बढ़ती महंगाई को लेकर सरकार के हाथ पांव फूले हुए हैं । हर तीसरे महीने या तो वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी या फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह महंगाई पर काबू पाने की एक डेडलाइन दे देते हैं । सरकार हर बार यह विश्वास दिलाती है कि फलां महीने तक महंगाई पर काबू पा लिया जाएगा लेकिन होता ठीक उसके उल्टा है । पेट्रोल के दाम बढ़ जाते हैं । मंहगाई दर और खाद्य महंगाई दर में बढ़ोतरी हो जाती है । बढ़ती महंगाई को लेकर विरोधी दल संसद में सक्रिय नजर आते हैं लेकिन आवश्यक वस्तुओं के बढ़ते दाम को लेकर विपक्षी दल अबतक कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं कर पाए हैं । भारतीय जनता पार्टी ने मंहगाई को लेकर देशव्यापी आंदोलन का ऐलान तो किया था लेकिन व्यापक जनसमर्थन नहीं मिल पाने की वजह से आंदोलन टांय टांय फिस्स हो गया था । भारतीय जनता पार्टी के महंगाई के खिलाफ आंदोलन का हश्र देखकर अन्य विपक्षी दलों के भी हाथ पांव फूल गए और उन्होंने कोई आंदोलन नहीं किया । लेकिन संसद के शीतकालीन सत्र के शुरूआती दिनों में विपक्ष ने मंहगाई को लेकर खासा बवाल किया । सदन में कामकाज भी ठप करवाया । महंगाई के खिलाफ जनता से समर्थन नहीं मिल पाने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी और बंगाल में अपनी प्रासंगिकता खो चुके वामदलों को संसद में एक अवसर दिखाई दिया । सवाल यह उठता है कि क्या संसद सत्र को ठप करके मंहगाई पर काबू पाया जा सकता है । क्या बहस से मंहगाई काबू में आ जाएगी । यह बात विपक्ष के कद्दावर नेताओं को समझ में नहीं आती । वो संसद में लंबे-लंबे भाषण करके देश के लोगों को यह दिखाना चाहते हैं कि बढ़ती कीमतों को लेकर वो चिंतित है । लेकिन जनता अब खाने और दिखाने के दांत के फर्क को समझ गई है ।
दरअसल विकास के पायदान पर उपर की ओर चढ़ रहे देश में बढ़ती मंहगाई पर काबू पाना लगभग नामुमकिन है । खुली अर्थवयवस्था में बाजार ही सबकुछ तय करती है और बाजार तो मांग और आपूर्ति के बहुत ही आधारभूत सिद्धांत पर चलता है । अगर हम भारत में ही देखें तो पिछले दो दशक में हमारे देश में हर चीज की मांग में जबरदस्त इजाफा हुआ है लेकिन उस अनुपात में आपूर्ति में बढो़तरी नहीं हुई है लिहाजा वस्तुओं के दाम बढ़े । किसी के कम तो किसी के ज्यादा । पिछले दो दशकों में भारतीय जनता की खर्च करने की क्षमता में भी तकरीबन दो गुना इजाफा हुआ है । नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च के शोध- मॉर्केट इंफॉर्मेशन सर्वे ऑफ हाउसहोल्ड- से इस बात की पुष्टि भी हुई थी । इस सर्वे के मुताबिक आम भारतीय हाउसहोल्ड की खर्च करने की क्षमता 1985 के मुकाबले 2004 में दुगनी हो गई । नतीजा यह हुआ कि भारत में एक नए मध्यवर्ग का उदय हुआ जिसके पास पैसे थे । क्षमता बढ़ी तो खर्च करने की इच्छा भी बढ़ी । मैंकेजी के एक सर्वे के मुताबिक अगर भारत की विकास दर आनेवाले सालों में वर्तमान स्तर पर कायम रहती है तो भारतीय बाजार में और उपभोक्ताओं के नजरिए में क्रांतिकारी बदलाव आ सकता है । एक मजबूत और नए मध्यवर्ग का उदय संभव है जिसकी आय अगले दो दशक में लगभग तिगुनी हो जाएगी । इस विकास का फायदा सिर्फ शहरी मध्यवर्ग को नहीं होगा बल्कि अनुमान है कि ग्रामीण क्षेत्र के हाउसहोल्ड आय में भी बढ़ोतरी होगी । जिस ग्रामीण हाउसहोल्ड की आय 2.8 प्रतिशत है वो अगले दो दशक में बढ़कर 3.6 प्रतिशत हो जाने की उम्मीद है । जाहिर है शहरी और ग्रामीण दोनों उपभोक्ताओं की खर्च करने की क्षमता और ललक दोनों में बढ़ोतरी होगी । नतीजा यह होगा कि खाद्य पदार्थों से लेकर स्वास्थ्य, परिवहन पर लोगों का खर्च बढ़ेगा । लेकिन उस अनुपात में अगर उत्पादन नहीं हुआ तो मूल्य बढ़ोतरी को रोका नहीं जा सकता ।
महंगाई सिर्फ भारत में ही नहीं बढ़ रही है । विश्व के कई विकासशील और विकसित मुल्कों में जहां लोगों का जीवन स्तर बेहतर हो रहा है और उनकी आय और खर्च करने की क्षमता में बढ़ोतरी हो रही है वहां हर तरह की कमोडिटी के दामों में इजाफा हो रहा है । एक अंतराष्ट्रीय एजेंसी की सर्वे के आंकड़ों को मानें तो अगले बीस सालों में तीन अरब उपभोक्ता खरीदारी के बाजार में आएंगे । एक अनुमान के मुताबिक अगले दो दशक में विश्व में खाद्य पदार्थ से लेकर, बिजली, पानी, पेट्रोल और गाड़ियों की मांग बेहद बढ़ जाएगी । अभी की खरीदारी पैटर्न और ऑटोमोबाइल सेक्टर के ग्रोथ के आधार पर जो प्रोजेक्शन किया जा रहा है उसके मुताबिक दो हजार तीस तक विश्व में गाड़ियों की संख्या एक अरब सत्तर करोड हो जाने का अनुमान है । सिर्फ गाड़ियों में ही नहीं बल्कि हर तरह के कमोडिटी की खपत बढ़ने से कीमतों पर भारी दबाव पड़ सकता है । अंतराष्ट्रीय एजेंसी मैकेंजी की नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कैलोरी खपत के बीस फीसदी बढ़ जाने का अनुमान लगाया जा रहा है जिसका असर साफ तौर पर खाद्य महंगाई दर पर पड़ेगा और इस सेक्टर की कमोडिटी महंगी हो जाएगी । इसी तरह चीन में भी प्रति व्यक्ति मांस के खपत में 60 फीसदी बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया है । वहां मांस की खपत प्रति व्यक्ति 80 किलोग्राम सालाना होना का अनुमान है । अगले बीस साल तक भारत में बुनियादी ढांचे पर भी खासा जोर दिए जाने की योजना है । अगर ये योजना परवान चढ़ती है तो निर्माण कार्य में खपत होनेवाली चीजों की खपत बढ़ेगी और अगर उस अनुपात में उत्पादन नहीं बढ़ा तो उसका दबाव भी मूल्य पर पडे़गा ।
ऐसा नहीं है कि कमोडिटी के खपत में इस तरह की बढ़ोतरी से भारत और विश्व का पहली बार पाला पड़ा है । बीसबीं शताब्दी में भी इस तरह का दबाव महसूस किया गया था जब पूरी सदी के दौरान विश्व की जनसंख्या तिगुनी हो गई थी और तमाम तरह की चीजों की मांग में 6000 से 2000 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली थी । लेकिन उस वक्त कीमतों पर यह दबाव इस वजह से ज्यादा महसूस नहीं किया गया था क्योंकि उस सदी के दौरान बहुत सारी वैकल्पिक वस्तुओं की खोज के अलावा पूरे विश्व में खेती में जबरदस्त बदलाव हुआ था । नतीजे में खाद्य उत्पादन में हुई बढ़ोतरी ने मूल्य के दबाव को थाम सा लिया था और कीमतें बेकाबू नहीं हो पाई। लेकिन इस सदी में पिछली सदी के मुकाबले तीन तरह की दिक्कतें सामने आ रही हैं । कार्बन उत्सर्जन को लेकर मौसम पर पड़नेवाले असर को लेकर जिस तरह से पूरे विश्व में जागरूकता आई है उससे किसी भी प्रकार का अंधाधुंध उत्पादन संभव नहीं है । दूसरा यह कि अब कमोडिटी एक दूसरे से इस कदर जुड़ गए हैं कि एक दूसरे को प्रभावित करने लगे हैं । मसलन अगर पेट्रोल की कीमतों में इजाफा होता है तो उसका दबाव खाद्य पदार्थ के मूल्य पर भी पड़ता है । अब जरूरत इस बात की है कि सरकारें मूल्य को रेगुलेट करने की बजाए कमोडिटी के उत्पादन और मांग के मुताबिक सप्लाई बढ़ाने की नीति बनाए और इसमें आनेवाली बाधाओं को दूर करे तभी महंगाई पर काबू पाया जा सकता है और तभी डेडलाइऩ को प्राप्त किया जा सकता है अन्यथा हर तीन महीने पर भरोसे का बयान आता रहेगा और कीमतें बढ़ती रहेंगी ।