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Saturday, January 10, 2015

पार्टनर, अपनी भी पॉलिटिक्स बताओ

सलमान खान की एक फिल्म का संवाद है – तुम करो तो रासलीला, हम करें तो कैरेक्टर ढीला । रायपुर साहित्य महोत्सव पर हिंदी के मशहूर वामपंथी आलोचक वीरेन्द्र यादव के मनोरंंजक लेख को पढ़ते हुए यह फिल्मी संवाद शिद्दत से याद आया। आलोचक मित्र वीरेन्द्र यादव का यह लेख मनोरंजक, पर पुराने तर्कों से भरा  हुआ है । जैसे वरिष्ठ कवि नरेश मेहता की रमन सिंह के साथ की तस्वीर को पढ़ते हुए उनको उनकी कविता ‘गिरना’ की पंक्तियां याद आती हैं, वैसे ही मुझे भी अखिलेश यादव से साहित्य भूषण सम्मान से सम्मानित होते आलोचक की तस्वीर देखकर कुछ स्मरण होता है । वीरेन्द्र यादव के लेख का शीर्षक है- पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है । मैं सिर्फ इसको थोड़ा हेरफेर के साथ कहना चाहता हूं- पार्टनर, अपनी पॉलिटिक्स तो बताओ । दरअसल वीरेन्द्र यादव का रायपुर साहित्य महोत्सव पर लिखा गया यह लेख वामपंथियों के बौद्धिक पाखंड का शिखर है । इस लेख में वीरेन्द्र यादव तमाम घिसे पिटे तर्कों के साथ उपस्थित हैं । भगवा, हिंदुत्ववादी एजेंडा, जल जंगल जमीन की कारपोरेट लूट और माओवादियों के हिंसक आंदोलन के समर्थन की परोक्ष कोशिश । वीरेन्द्र यादव को आदिवासी महिलाओं की मौतों ( हलांकि यह गलत प्रयोग है, मौत का बहुवचन नहीं होता ) की चीख तो सुनाई देती है लेकिन सीआरपीएफ के जवानों के परिवारवालों की चीत्कार नहीं सुनाई देती है । विचारधारा के रुदन में वच्चों का क्रन्दन दब जाता है । सिर्फ मौतों का ही नहीं वीरेन्द्र यादव तो पारिश्रमिक और मानदेय का फर्क भी मालूम नहीं प्रतीत होता है । संभव है कि रायपुर साहित्य महोत्सव में शामिल लोगों को डिफेम करने के लिए पारिश्रमिक शब्द का इस्तेमाल किया गया हो । यहां यह बताते चलें कि पिछले दो साल से बिहार सरकार का संस्कृति विभाग दो दिनों का भारतीय कविता समारोह आयोजित कर रहा है ।  इस कविता समारोह में हिंदी समेत गुजराती, मलयालम, मराठी, बांग्ला, तेलुगू, ओडिया, काक बरोत, मणिपुरी कई भारतीय भाषाओं के कवि शिरकत करते हैं । बिहार सरकार वहां भी कवियों को मानदेय के तौर पर पच्चीस हजार रुपए देती है । तब तो कोई हो हल्ला नहीं मचता है । तो कुछ तो पॉलिटिक्स होगी ।
अपने लेख में श्री यादव यह सवाल उठाते हैं कि क्या उन लेखकों को इस आयोजन में शामिल होना चाहिए था जो नरेन्द्र मोदी, अमित शाह और भाजपा के हिंदुत्ववादी एजेंडे के मुखर विरोधी रहे हैं । उनके इस प्रश्न का प्रतिप्रश्न यह है कि क्या इस महोत्सव में शामिल होने से लेखकों का मुखर विरोध कुंद हो गया है । क्या छत्तीसगढ़ महोत्सव में जाकर हिंदी लेखकों ने अपने विरोध को दरकिनार कर अमित शाह, नरेन्द्र मोदी और भाजपा की विरुदावलियां गाईं ?  बिकने के तर्क से तो वो खुद भी सहमत नहीं हैं । वो विरोध के दृढता की अपेक्षा कर रहे हैं । मार्क्सवाद की शवसाधना कर रहे लोगों में एक बड़ा दोष सुनी सुनाई बातों पर यकीन कर उसके आधार पर मत बनाने का है । जिस विरोध की दृढता की वो अपेक्षा कर रहे हैं वह वहां कई वक्ताओं के वक्तव्यों में पुरजोर तरीके से उठा वो चाहें तो अशोक वाजपेयी या फिर रमणिका गुप्त के भाषणों के बारे में दरियाफ्त कर लेते । वीरेन्द्र यादव को यह तक नहीं मालूम कि - प्रतिरोध का साहित्य,सत्र में हिंदी की वरिष्ठ लेखिका रमणिका गुप्ता ने आदिवासियों के मुद्दे पर छत्तीसगढ़ सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक को कठघरे में खड़ा कर दिया था।

दरअसल मार्क्सवाद की कैद से अस्पृश्ता और तानाशाही के सिद्धांतों का प्रतिपादन करनेवाले वीरेन्द्र यादव जैसे बुद्धिजीवियों के तर्कों को पढ़ते हुए मुझे मैक्सिम गोर्की याद आते हैं जब वो कहते हैं – हमें यह निश्चित रूप से समझ लेना चाहिए कि स्वतंत्रता और न्याय का सबसे बड़ा शत्रु हमारे भीतर ही है, वह हमारी मूढ़ता, हमारी क्रूरता, हमारी निम्न, अराजक भावनाओं की उच्छृंखलता है ।‘  मार्क्स के इन अनुयायियों ने तानाशाही और फासिज्म की खिलाफत का तर्क लेकर सालों तक भारत की जनता को भ्रम में रखा है । फासिज्म का विरोध का नारा देनेवाले ये लोग भूल जाते हैं कि जब हिटलर की पराजय और फासिज्म के खात्मे का उल्लास था उसी वक्त सोल्झेनित्सिन को देश विरोधी गतिविधियों की आड़ में दस साल के लिए यातना शिविर में भेज दिया गया था । उस विचारधारा के अंधानुकरण करनेवालों के मुख से फासिज्म विरोध का नारा सालों तक भारत की जनता को लुभाता रहा लेकिन वक्त आने पर यहां भी ये फासिज्म के साथ खड़े दिखे । उन्नीस सौ पचहत्तर में जब इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाया तो कम्युनिस्टों ने उसका साथ दिया । जिन्हें इमरजेंसी में फासिज्म नहीं दिखा वो हिंदुत्ववादी ताकतों को फासिस्ट कह रहे हैं । प्रगतिशीलता के नाम हिंदी साहित्य को लंबे वक्त तक अपनी गिरफ्त में रखनेवालों ने हिंदी में सरकारी आयोजनों में शिरकत करनेवालों या नेताओं के साथ मंच साक्षा करनेवालों को हेय दृष्टि से देखा । हिंदी में इस तरह का वातावरण तैयार किया गया कि सरकारी साहित्यक आयोजन अछूत हो गए । वह दौर था जब देश में विचारधारा वाले साहित्य और साहित्यकार की तूती बोलती थी । उस दौर ने हिंदी साहित्य का जितना भला किया उससे ज्यादा उसका नुकसान किया । इमरजेंसी के समर्थन के एवज में इंदिरा गांधी ने साहित्य संस्कृति को वामपंथी विचारधारा वाले लेखकों के हवाले कर दिया । उसके बाद वामपंथी विचारकों ने इस तरह का ताना-बाना बुना कि सामान्य लेखकों को सरकार से दूर कर दिया । सरकार किनके पैसे पर चलती है । वह आम जनता का पैसा होता है । हमारे अपने पैसे पर आयोजित होनेवाले समारोहों से लेखकों को काट देने का एक षडयंत्र रचा गया । उसके तहत यह बात फैलाई गई कि सरकारी कार्यक्रमों में शामिल होनेवाले कवि-लेखक दरबारी हैं । जबकि उक्त विचारधाऱा के पोषक शीर्ष लेखक सरकारों से फायदा लेते रहे । तमाम कमेटियों में नामित होकर क्यूबा से लेकर आयोबा तक की यात्रा के मजे लूटते रहे । अब वक्त आ गया है कि सत्तर के दशक के बाद देश में जिस तरह से साहित्य संस्कृति को लेकर खेल खेला गया उसपर गंभीरता से विचार हो कि उस खेल से साहित्य का और प्रगतिशील साहित्यकारों का कितना फायदा और कितना नुकसान हुआ । प्रगतिशीलता का मुखौटा लगाकर अस्पृश्यता और तानाशाही का जो खेल खेला गया, उसकी पहचान आवश्यक है । किसी को भी संघी कहकर उसकी विचारधारा पर बात नहीं करना साहित्यक अस्पृश्यता ही तो है । अगर किसी विचारधारा से विरोध हो तो उसको तर्कों के आधार पर ध्वस्त करना साहित्यक शिष्टाचार होना चाहिए । मंच साझा नहीं करना और उनसे वाद विवाद संवाद रोक देना तो अस्पृश्यता ही है । वीरेन्द्र यादव मृतप्राय वामपंथी लेखक संगठनों से भी प्रतिरोध की उम्मीद जता रहे हैं । जो लेखक संगठन अपने लेखकों की हितों की आवाज बुलंद नहीं कर पा रहा है उससे किसी मुद्दे पर प्रतिरोध की अपेक्षा करना हास्यास्पद ही है । रायपुरवाद के एक नए वाद के रूप में आसन्न महिमामंडन से वीरेन्द्र यादव चिंतित दिखाई देते हैं लेकिन क्या उन्हें कभी मार्क्सवादी विमर्श की बजाए ईमानदार विमर्श की चिंता हुई । शायद नहीं । अगर साहित्य में ईमानदार विमर्श होता तो इस तरह के लेख सामने नहीं आते, बल्कि रायपुर में उठे मुद्दों पर बात होती। हिंदी के मार्क्सवादी कवि ने तो रायपुर विरोध में तमाम मर्यादा तोड़ डाली और गाली गलौच पर उतर आए । उनके फिसलन और विचलन पर एक मित्र ने बेहद सटीक टिप्पणी की थी कि पता कर लो उनके गाली गलौच का वक्त क्या है । अगर वो रसरंजन के बाद का वक्त है तो बाइबिल की उक्ति की तरह कहना- हे यीशु ! उन्हें माफ कर दो उन्हें नहीं पता वो क्या कह रहे हैं ।   

Tuesday, December 30, 2014

आयोजनों का 'साल'

पिछले सात साल से साहित्य का कैलेंडर जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजन से शुरू होता है । इस साल भी साहित्यक आयोजनों में सबसे पहला आयोजन जयपुर साहित्य महोत्सव ही रहा । जयपुर के दिग्गी पैसेल होटल परिसर में सत्रह से पच्चीस जनवरी तक पांच दिनों तक जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल आयोजित था । जनवरी की हा़ड़ कंपा देनेवाली सर्द सुबह में तत्कालीन राज्यपाल मारग्रेट अल्वा और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अमर्त्य सेन ने इसकी औपचारिक शुरुआत की थी । जयपुर के इस साहित्योत्सव में अब विमर्श कम भीड़ ज्यादा होने लगी है । पिछले दो सालों से जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल विवादों की वजह से चर्चा में रहा । पिछले साल समाजशास्त्री आशीष नंदी ने के पिछड़ों पर दिए गए बयान और आशुतोष के प्रतिवाद ने पूरे देश में एक विवाद खड़ा कर दिया था । आशीष नंदी ने कहा था कि – इट इज अ फैक्ट दैट मोस्ट ऑफ द करप्ट कमन फ्राम दे ओबीसी एंड शेड्यूल कास्ट एंड नाऊ इंक्रीजिंगली शेड्यूल ट्राइब्स । आशीष नंदी के उस बयान का उस वक्त पत्रकार रहे और अब आम आदमी पार्टी के नेता आशुतोष ने जमकर प्रतिवाद किया था । कुछ नेता भी इस विवाद में कूद पड़े थे और आयोजकों और आशीष नंदी पर केस मुकदमे भी हुए थे, वारंट जारी हुआ था । बाद में जब मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और सुलझा तबतक लिटरेचर फेस्टिवल हर किसी की जुबां पर था । आशीष नंदी के बयान पर उठे विवाद के पहले पहले भारतीय मूल के लेखक सलमान रश्दी के जयपुर आने को लेकर अच्छा खासा विवाद हुआ था । कुछ कट्टरपंथी संगठनों ने सलमान के जयपुर साहित्य महोत्सव में आने का विरोध किया था । उनकी दलील थी कि सलमान ने अपनी किताब- सैटेनिक वर्सेस में अपमानजन बातें लिखी हैं जिनसे उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुई थी । उस वक्त उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होनेवाले थे लिहाजा सियासी दलों ने भी इस विवाद को जमकर हवा दी और नतीजा यह हुआ कि सलमान रश्दी को आखिरकार भारत आने की मंजूरी नहीं मिली । इस वर्ष कोई विवाद नहीं हुआ । हलांकि इस साल फ्रीडम जैसा उपन्यास लिखकर दुनियाभर में शोहरत पा चुके अमेरिकी उपन्यासकार जोनाथन फ्रेंजन ने यह कहकर आयोजकों को सकते में डाल दिया कि- जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल जैसी जगहें सच्चे लेखकों के लिए खतरनाक है, वे ऐसी जगहों से बीमार और लाचार होकर घर लौटते हैं । इसके पहले नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अमर्त्य सेन ने आम आदमी पार्टी के उभार को भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती के तौर पर पेश किया । वहीं अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के नेत्रहीन लेखक वेद मेहता ने मोदी पर निशाना साधा था और कहा था  कि अगर वो देश के प्रधानमंत्री बनते हैं तो वो भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लिए खतरनाक होगा । अस्सी वर्षीय मेहता ने अपने विचारों और वक्तव्य से स्पंदन पैदा करने की कोशिश की लेकिन उनके विचारों में मौजूद पूर्वग्रह साफ झलक रहा था लिहाजा लोगों ने उनको गंभीरता से नहीं लिया ।
दूसरा बड़ा आयोजन दिल्ली में हुआ विश्व पुस्तक मेला रहा । विश्व पुस्तक मेले के दौरान नौ दिनों तक अलग अलग विषयों और पुस्तकों के विमोचवन के बहाने से तकरीबन सौ गोष्ठियां और संवाद हुए थे । पुस्तक मेला में हिंदी, अंग्रेजी और अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों का सिर्फ जमावड़ा ही नहीं था बल्कि उन्होंने पाठकों के साथ अपने विचार भी साझा किए । हिंदी महोत्सव तक आयोजित किए गए । पुस्तक मेला के आयोजक नेशनल बुक ट्रस्ट ने इस बार मेला का चरित्र बदलने की भरसक कोशिश की । कुछ हद तक उसको बदलने में उनको सफलता भी मिली । पुस्तक मेला के इस बदले हुए स्वरूप को देखकर मुझे ये कहने में कोई हिचक नहीं है कि ये मेला पुस्तकों के अलावा साहित्योत्सव के लिए भी मंच प्रदान कर रहा था ।  यह पुस्तक मेला लेखकों के महात्वाकांक्षाओं का उत्सव था, खासतौर पर वैसे लेखकों का जिन्हें लेखक होने का भ्रम है और वो सोशल मीडिया पर अपनी रचनाओं की बाढ़ से पाठकों का आप्लावित करते रहते हैं । इस बार के पुस्तक मेले में फेसबुकिया लेखकों का ही जोर था । हालात यहां तक पहुंच गए थे कि इन लेखकों में वरिष्ठ साहित्यकारों के साथ फोटो खिंचवाने और उसे फौरन फेसबुक पर पोस्ट करने की होड़ लगी थी ।
तीसरा बड़ा आयोजन साहित्य अकादमी ने मार्च में 10 से 15 तारीख तक आोजित किया था । यह अकादमी का सालाना जलसा होता है जिसमें अकादमी पुरस्कार विजेताओं को पुरस्कृत किया जाता है । उनसे बातचीत होती है । इस बार पहली बार सभी भाषाओं के अकादमी पुरस्कार विजेताओं और मीडिया से बातचीत रखी गई थी । इस बातचीत के दौरान भाषा को लेकर कई तीखे सवाल जवाब हुए । साहित्य अकादमी ने ही भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से चार दिनों का विश्व कविता समारोह सबद का आयोजन किया था । इसमें कई देश के कवियों ने कविता पाठ किया । इस आयोजन को लेकर जिस तरह का उत्साह दिखाई देना चाहिए था वो दिल्ली में दिखा नहीं । जरूरत इस बात की है कि इस तरह के आयोजनों को देश के अन्य हिस्सों में किया जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा श्रोताओं को लाभ मिल सके । रवीन्द्र कालिया के ज्ञानपीठ से रिटायर होने के बाद हिंदी कवि लीलाधर मंडलोई को कमान सौंपी गई । लीलाधर मंडलोई ने वाक के नाम से मासिक आयोजन की शुरुआत की । तीन जुलाई को वाक के कार्यक्रम में नामवर सिंह के संवाद था जो काफी दिलचस्प रहा था ।
कथा मासिक हंस की सालाना गोष्ठी देशभर के साहित्यकारों के लिए एक सालाना साहित्यक जलसे की तरह है । दो दशक से ज्यादा समय से आयोजित हो रही यह गोष्ठी पहली बार राजेन्द्र यादवव की अनुपस्थिति में हुई । रादेन्द्र यादव के निधन के बावजूद उनकी बेटी रचना यादव ने ना केवल हंस को संभाला बल्कि अच्छे से इस गोष्ठी को भी आयोजित किया । इस साल गोष्ठी का विषय था- वैकल्पिक राजनीति की तलाश । पटना पुस्तक मेला का आयोजन भी हिंदी साहित्य के लिहाज से अहम रहा । इसके कई सत्रों में जमकर संवाद हुए । वरिष्ठ कथाकार भगवानदास मोरवाल के नए उपन्यास – नरक मसीहा- का लोकार्पण वरिष्ठ आलोचक नंदकिशोर नवल, समाजशास्त्री सैबल गुप्ता और उषाकिरण खान ने किया। इस बीच दिल्ली में रजा फाउंडेशन ने मुक्तिबोध पर एक अहम आयोजन ग्यारह सितंबर को किया । यह वर्ष मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता अंधेरे में के प्रकाशन का पचासवां वर्ष है । इल आयोजन में मुक्तिबोध की रचनात्मकता और उसके छोरों पर गंभीर चर्चा हुई । दिल्ली में जनवादी लेखक संघ का राज्य सम्मेलन भी एक नवंबर को आयोजित किया गया था । बिहार सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने पटना में भारतीय कविता समारोह आयोजित किया था । इस कविता समारोह में हिंदी समेत गुजराती, मलयालम, मराठी, बांग्ला, तेलुगू, ओडिया काक बरोत, मणिपुरी कई भारतीय भाषाओं के कवियों ने शिरकत की । शिरकत करनेवालों ज्ञानपीठ पुरस्कार से हाल ही सम्मानित कवि केदारानाथ सिंह, हिंदी के वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी, साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी आदि थे । महाराष्ट्र के रायगढ़ में 12-13 दिसबंर को महाराष्ट्र हिंदी परिषद का बाइसवां अधिवेशन आयोजित किया गया था । लेकिन इस साल का सबसे ज्यादा चर्चित आयोजन रहा रायपुर साहित्य महोत्सव । छत्तीसगढ़ सरकार ने तीन दिनों का रायपुर साहित्य महोत्सव आयोजित किया था । यह एक सरकारी आयोजन था । इस आयोजन में हिंदी के वरिष्ठ कवियों और लेखकों की भागीदारी रही । इनमें विनोद कुमार शुक्ल, नरेश सक्सेना , अशोक वाजपेयी, मैत्रेयी पुष्पा से लेकर ह्रषिकेश सुलभ, विभा रानी, अराधना प्रधान, पंकज दूबे, प्रभात रंजन, परमिता सत्पथी जैसे दिग्गज लेखक, रंगकर्मी शामिल हुए इन वरिष्ठ लेखकों के अलावा पत्रकारिता के अच्युतानंद मिश्र और रमेश नैयर जैसे वरिष्ठ स्तंभ ने भी इस साहित्योत्सव में शिरकत की । इस आयोजन को लेकर कई वामपंथी लेखकों ने आपत्ति जताई और सोशल मीडिया पर अब भी इसको लेकर पक्ष विपक्ष में जमकर लिखा जा रहा है 

Sunday, December 21, 2014

हाय हुसैन हम ना हुए !

छत्तीसगढ़ सरकार ने तीन दिनों का रायपुर साहित्य महोत्सव आयोजित किया था । यह एक सरकारी आयोजन था । इस आयोजन में हिंदी के वरिष्ठ कवियों और लेखकों की भागीदारी रही । इनमें विनोद कुमार शुक्ल, नरेश सक्सेना , अशोक वाजपेयी, मैत्रेयी पुष्पा से लेकर ह्रषिकेश सुलभ जैसे दिग्गज लेखक शामिल हुई । इन वरिष्ठ लेखकों के अलावा पत्रकारिता के अच्युतानंद मिश्र और रमेश नैयर जैसे वरिष्ठ स्तंभ ने भी इस साहित्योत्सव में शिरकत की । वरिष्ठ लेखकों के अलावा साहित्य के समकालीन कथाकार कवियों ने भी अपनी उस्थिति से इस साहित्योत्सव को जीवंत बना दिया । इन दिनों साहित्य में जिस एक प्रवृत्ति ने जोर पकड़ा है वह यह है कि सभी तरह के आयोजनों की समीक्षा फेसबुक पर होती है । लिहाजा रायपुर साहित्य महोत्सव के आयोजन के पहले उसके दौरान और उसके बाद इसको लेकर पक्ष विपक्ष में विमर्श प्रारंभ हो गया । विरोध में यह तर्क दिया जाने लगा कि चूंकि छत्तीसगढ़ सरकार नक्सलियों के खिलाफ सख्ती से पेश आ रही है लिहाजा उसके आयोजन में जनपक्षधरता की पैरोकारी करनेवाले और वाम दलों में अपनी आस्था का सार्वजनित प्रदर्शन करनेवालों के शिरकत नहीं करनी चाहिए । जैसा कि आमतौर पर फेसबुक पर होता है कि वहां विमर्श के दौरान हर तरह की मर्यादा का उल्लंघन होता है । इस बार भी हुआ । हिंदी के वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल और कोलकाता के लेखक जगदीश्वर चतुर्वेदी के बीच हुई तीखी बहस गाली गलौच तक पहुंच गई । व्यक्तिगत हमले हुए । इसके अलावा साहित्य जगत में जुगनू की तरह चमकनेवाले कुछ लेखक कवि और कुछ छद्म लेखक भी फेसबुक पर रायपुर साहित्य महोत्सव में शामिल होनेवाले लेखकों को घेरने में जुटे । वहां मैत्रेयी पुष्पा और अन्य लोगों को सफाई देना पड़ा । फेसबुक के विमर्श की अराजकता एक बार फिर उजागर हो गई । लोगों ने एक दूसरे पर लाभ लोभ लेने का सस्ता और घटिया आरोप जड़ा ।  
दरअसल रायपुर साहित्य महोत्सव का विरोध करनेवालों में ज्यादातर लोग हाय हुसैन हम ना हुए सिंड्रोम के शिकार नजर आए । ज्यादातर फेसबुकिया साहित्यकारों की पीड़ा यह थी कि उनको वहां आमंत्रित क्यों नहीं किया गया । उनकी यह पीड़ा बार बार झलक रही थी । हिंदी के एक कवि ने अपने ना बुलाने के दर्द को अपनी कविता के माध्यम से सार्वजनिक कर दिया । छत्तीसगढ़ सरकार पर आरोप लगानेवाले लेखकों को यह नहीं मालूम था कि साहित्य महोत्सव के दौरान मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में की अर्धसती पूरे होने पर एक पूरा का पूरा सत्र रखा गया था जिसमें इस कविता और मुक्तिबोध की जनपक्षधरता पर जमकर विमर्श हुआ । कवि नरेश सक्सेना, प्रभात त्रिपाठी और लीलाधर मंडलोई ने इस कविता को नए सिरे से व्याख्यायित करने का उपक्रम किया था । नरेश सक्सेना ने तो इस कविता पर बोलते हुए एक नई स्थापना दी । उनका कहना था कि अंधेर में के प्रकाशन के बाद कविता की धुरी उत्तर प्रदेश से हटकर मध्य प्रदेश पहुंच गई । उन्होंने अपनी इस स्थापना के पीछे कवियों की पूरी सीची गिनाई । उनका तर्क था कि अंधेर में की ताकत ने कवियों को ताकतवर बनाया । विरोध करनेवालों को यह तक नहीं मालूम कि एक सत्र- प्रतिरोध का साहित्य में हिंदी की वरिष्ठ लेखिका रमणिका गुप्ता ने तो आदिवासियों के मुद्दे पर छत्तीसगढ़ सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक को कठघरे में खड़ा कर दिया था । इस साहिय्य महोत्सव में इस तरह के कई सत्र आयोजित किए गए थे जिनमें सत्ता पर जमकर हमले हुए । दूसरा आरोप यह लगाया गया कि इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भागीदारी रही । दरअसल मार्क्स के अंधानुयायियों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वो संघ से बुरी तरह से आक्रांत रहते हैं । उन्हें जब किसी भी शख्स या आयोजन को डिफेम करना होता है तो वो संघ का सहारा लेते हैं । वामपंथियों का संघ पर अफवाह तंत्र में मजबूत होने का आरोप रहता है लेकिन वामपंथियों से बेहतर अफवाहतंत्र देश में किसी का नहीं है । क्योंकि वो अफवाह उड़ाने और उसको वैधता प्रदान करने के लिए विचारधारा का जमकर इस्तेमाल करते हैं और हर चीज को जनपक्षधरता से जोड़ देते हैं । इस पूरे कार्यक्रम के दौरान कहीं भी संघ का कोई पदाधिकारी नजर नहीं आया । किसी भी सत्र और वक्ताओं को सुनने के बाद यह नहीं लगा कि संघ इस कार्यक्रम के पीछे हैं । साहित्य से जुड़े हर व्यक्ति को इस तरह के आयोजनों की सराहना करनी चाहिए । साहित्य, कला और संस्कृति को लेकर सरकारों में अगर अनुराग का भाव पैदा होता है तो यह एक अच्छी शुरुआत है । क्योंकि आयोजन में जो धन लगता है वह हम टैक्स देनेवालों का ही है । जनपक्षधरता की बात करनेवालों को जनता के पैसों पर होनेवाले आयोजनों का विरोध करते देखकर मुझे सलमान खान की फिल्म का एक डॉयलॉग याद आता है- तुम करो तो रासलीला, हम करें तो कैरेक्टर ढीला ।
दरअसल हाल के दिनों में यह देखने को मिल रहा है कि राज्य सरकारें साहित्य आयोजनों में रुचि लेने लगी हैं । अभी हाल ही में बिहार सरकार के कला संस्कृति विभाग से सौजन्य दो दिनों का भारतीय कविता समारोह आयोजित किया गया । इस कविता समारोह में हिंदी समेत गुजराती, मलयालम, मराठी, बांग्ला, तेलुगू, ओडिया काक बरोत, मणिपुरी कई भारतीय भाषाओं के कवियों ने शिरकत की । शिरकत करनेवालों ज्ञानपीठ पुरस्कार से हाल ही सम्मानित कवि केदारानाथ सिंह, हिंदी के वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी, साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी आदि थे । इस जानकारी को साक्षा करने का उद्देश्य सूचना देना मात्र नहीं है बल्कि यह बताना है कि सरकारें साहित्य को लेकर सहृद्य हो गई हैं । बिहार में हुए इस कविता समारोह में सरकार ने कवियों को हवाई यात्रा के अलावा पांच सितारा होटलों में रुकवाया साथ ही पांच दस मिनट के कविता पाठ के लिए पच्चीस हजार रुपए का मानदेय भी दिया । यह एक सुखद संकेत है कि हमारी सरकारें रचनाकारों को आर्थिक सम्मान भी देने लगी है । बिहार में तीन दिन के भारतीय कविता समारोह की तुलना में रायपुर के साहित्य महोत्सव का फलक काफी बड़ा था । पटना में जहां काव्य पाठ हुआ वहीं रायपुर में काव्यपाठ के अलावा साहित्य की विभिन्न विधाओं और पत्रकारिता पर कई सत्र आयोजित थे । रायपुर साहित्य महोत्सव के विज्ञापन और होर्डिंग पूरे देश भर में लगाए गए थे । इन दोनों समारहों में एक बात जो कॉमन दिखाई दे रही है वो ये है कि यहां स्थानीय भाषा को भी प्रमुखता दी जा रही है । जैसे पटना के भारतीय कविता महोत्सव में अन्य भारतीय भाषाओं के अलावा बिहार की लोकभाषाओं के कवि भी आमंत्रित किए गए थे । उन्होंने मैथिली, अंगिका, वज्जिका और मगही में काव्यपाठ किया । इसी तरह से रायपुर में छत्तीसगढ़ी पर भी कई सत्र आयोजित हैं । इस तरह से अगर हम देखें तो यह राज्य सरकारों की स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देने का एक उपक्रम है ।
बहुत ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जबकि हिंदी में सरकारी आयोजनों या नेताओं के साथ मंच साक्षा करने पर लेखक एक दूसरे की लानत मलामत किया करते थे । नेताओं के साथ मंच साक्षा करनेवालों को हेय दृष्टि से देखा जाता था । हिंदी में इस तरह का वातावरण तैयार कर दिया गया था कि सरकारी आयोजनों को हेय दृष्टि से देखा जाता था । जब भारत भवन में अशोक वाजपेयी ने अर्जुन सिंह की सरपरस्ती में लेखकों को जोड़ने का काम शुरू किया था तब भी उली तरह का दुष्प्रचार किया गया था । वह दौर था जब देश में विचारधारा वाले साहित्य और साहित्यकार की तूती बोलती थी । उस दौर ने हिंदी साहित्य का जितना भला किया उससे ज्यादा उसका नुकसान किया । इमरजेंसी के समर्थन के एवज में इंदिरा गांधी ने साहित्य संस्कृति को वामपंथी विचारधारा वाले लेखकों के हवाले कर दिया । अब इन वामपंथी विचारकों ने इस तरह का ताना-बाना बुना कि सामान्य लेखकों को सरकार से दूर कर दिया । सरकार किनके पैसे पर चलती है । वह आम जनता का पैसा होता है । हमारे अपने पैसे पर आयोजित होनेवाले समारोहों से लेखकों को काट देने का एक षडयंत्र रचा गया । उसके तहत यह बात फैलाई गई कि सरकारी कार्यक्रमों में शामिल होनेवाले कवि-लेखक दरबारी हैं । जबकि उक्त विचारधाऱा के पोषक शीर्ष लेखक सरकारों से फायदा लेते रहे । तमाम कमेटियों में नामित होकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते रहे । विचारधाऱा के प्रभाव के कम होने के बाद अब ये सारी बातें सामने आने लगी हैं । ये उसी तरह के लोग हैं जो सरकारें चाहें किसी की भी रही हों साहित्यक संस्थाओं पर उनका ही कब्जा रहता आया है । हर सरकारी शिष्टमंडल में कुछ नाम घूमंफिर आते जाते रहे हैं । अब यह वक्त आ गया है कि सत्तर के दशक के बाद देश में जिस तरह से साहित्य संस्कृति को लेकर खेल खेला गया उसपर गंभीरता से विचार हो कि उस खेल से कितना फायदा हुआ और कितना नुकसान हुआ 

Sunday, December 7, 2014

साहित्य पर मेहरबान सरकार

अभी हाल ही में बिहार सरकार के कला संस्कृति विभाग से सौजन्य दो दिनों का भारतीय कविता समारोह आयोजित किया गया । इस कविता समारोह में हिंदी समेत गुजराती, मलयालम, मराठी, बांग्ला, तेलुगू, ओडिया काक बरोत, मणिपुरी कई भारतीय भाषाओं के कवियों ने शिरकत की । शिरकत करनेवालों ज्ञानपीठ पुरस्कार से हाल ही सम्मानित कवि केदारानाथ सिंह, हिंदी के वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी, साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी आदि थे । इस जानकारी को साक्षा करने का उद्देश्य सूचना देना मात्र नहीं है बल्कि इसके माध्यम से यह जानने की कोशिश है कि क्या हमारी सरकारें साहित्यको लेकर सहृद्य हो गई हैं । बिहार में हुए इस कविता समारोह में सरकार ने कवियों को हवाई यात्रा के अलावा पांच सितारा होटलों में रुकवाया साथ ही पांच दस मिनट के कविता पाठ के लिए पच्चीस हजार रुपए का मानदेय भी दिया । यह एक सुखद संकेत है कि हमारी सरकारें रचनाकारों को आर्थिक सम्मान भी देने लगी है । इसी तरह से दिसबंर के मध्य में छत्तीसगढ़ की सरकार भी रायपुर साहित्य महोत्सव का आयोजन करने जा रही है । बिहार में तीन दिन के भारतीय कविता समारोह की तुलना में रायपुर के साहित्य महोत्सव का फलक काफी बड़ा है । पटना में जहां काव्य पाठ हुआ वहीं रायपुर में काव्यपाठ के अलावा साहित्य की विभिन्न विधाओं और पत्रकारिता पर कई सत्र आयोजित हैं । रायपुर साहित्य महोत्सव के विज्ञापन और होर्डिंग पूरे देश भर में लगाए गए हैं । इन दोनों समारहों में एक बात जो कॉमन दिखाई दे रही है वो ये है कि यहां स्थानीय भाषा को भी प्रमुखता दी जा रही है । जैसे पटना के भारतीय कविता महोत्सव में अन्य भारतीय भाषाओं के अलावा बिहार की लोकभाषाओं के कवि भी आमंत्रित किए गए थे । उन्होंने मैथिली, अंगिका, वज्जिका और मगही में काव्यपाठ किया । इसी तरह से रायपुर में छत्तीसगढ़ी पर भी कई सत्र आयोजित हैं । इस तरह से अगर हम देखें तो यह राज्य सरकारों की स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देने का एक उपक्रम है ।

बहुत ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जबकि हिंदी में सरकारी आयोजनों या नेताओं के साथ मंच साक्षा करने पर लेखक एक दूसरे की लानत मलामत किया करते थे । नेताओं के साथ मंच साक्षा करनेवालों को हेय दृष्टि से देखा जाता था । हिंदी में इस तरह का वातावरण तैयार कर दिया गया था कि सरकारी आयोजनों को हेय दृष्टि से देखा जाता था । वह दौर था जब देश में विचारधारा वाले साहित्य और साहित्यकार की तूती बोलती थी । उस दौर ने हिंदी साहित्य का जितना भला किया उससे ज्यादा उसका नुकसान किया । इमरजेंसी के समर्थन के एवज में इंदिरा गांधी ने साहित्य संस्कृति को वामपंथी विचारधारा वाले लेखकों के हवाले कर दिया । अब इन वामपंथी विचारकों ने इस तरह का ताना-बाना बुना कि सामान्य लेखकों को सरकार से दूर कर दिया । सरकार किनके पैसे पर चलती है । वह आम जनता का पैसा होता है । हमारे अपने पैसे पर आयोजित होनेवाले समारोहों से लेखकों को काट देने का एक षडयंत्र रचा गया । उसके तहत यह बात फैलाई गई कि सरकारी कार्यक्रमों में शामिल होनेवाले कवि-लेखक दरबारी हैं । जबकु उक्त विचारधाऱा के षोषक शीर्ष लेखक सरकारों से फायदा लेते रहे । तमामा कमेटियों में नामित होकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते रहे । विचारधाऱा के प्रभाव के कम होने के बाद अब येसारूी बातें सामने आने लगी हैं । अब यह वक्त आ गया है कि सत्तर के दशक के बाद देश में जिस तरह से साहित्य संस्कृति को लेकर खेल खेला गया उसपर गंभीरता से विचार हो कि उस खेल से कितना फायदा हुआ और कितना नुकसान हुआ ।