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Friday, September 8, 2023

जी 20 देश के दिग्गज और दिल्ली


जी 20 के राष्ट्राध्यक्षों का दिल्ली में सम्मेलन हो रहा है। दिल्ली इनके स्वागत के लिए पूरी तरह से तैयार है। प्रगति मैदान के भारत मंडपम में ये सम्मेलन हो रहा है। भारत की अध्यक्षता में दिल्ली में हो रहे इस सम्मेलन में कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होगी। दिल्ली और जी 20 के कई देशों के साथ पहले से भी अच्छे संबंध रहे हैं। जी 20 देशों के प्रमुख शिक्षाविदों, लेखकों और राजनीतिज्ञों के नाम पर दिल्ली में इमारतें और सड़कों के नाम रखकर उनको सम्मानित किया गया है। इस कड़ी में सबसे पहले नाम याद आता है लेव तोलस्तोय का। तोलस्तोय रूस के विश्व प्रसिद्ध लेखक हैं जिन्होंने युद्ध और शांति जैसा कालजयी उपन्यास लिखा। लेव तोलस्तोय पहले रूसी सेना में थे लेकिन युद्ध की विभीषिका से क्षुब्ध थे। कुछ दिनों बाद उन्होंने सेना की नौकरी छोड़ दी। बाद में वो रचनात्मक लेख में जुटे और एक के बाद एक कई प्रआसिद्ध कृतियों की रचना की। गांधी और तोलस्तोय के बीच भी पत्र व्यवहार था और गांधी ने जब दक्षिण अफ्रीका में अपना आश्रम बनाया तो सका नाम उन्होंने तोलस्तोय फार्म ही रखा था। गांधी उनकी कृति द किंगडम आफ गाड विदइन यू से प्रभावित थे। लेव तोलस्तोय की एक प्रतिमा जनपथ और लेव तोलस्तोय मार्ग के कोने पर लगी है। वहीं एक इमारत का नाम भी तोलस्तोय हाउस है। तोलस्तोय मार्ग जनपथ से कस्तूरबा गांधी मार्ग को जोड़ती है।

लेव तोलस्तोय मार्ग से कस्तूरबा गांधी मार्ग पहुंचने पर मैक्स मूलर भवन की याद आती है जो इसी मार्ग पर है। मैक्स मूलर जर्मनी के प्रसिद्ध विद्वान थे। मैक्स मूलर का जन्म जर्मनी में हुआ था लेकिन उनको प्रसिद्धि ब्रिटेन में मिली जब वो वहां के प्रसिद्ध आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में आधुनिक भाषा के शिक्षक बने। कुछ दिनों के बाद उनकी नियुक्ति तुलनात्मक भाषा विज्ञान के प्रोफेसर के पद पर हुई। वहां रहते हुए उन्होंने संस्कृत का विशद अध्ययन किया। ऋगवेद और बौद्ध ग्रंथों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। मैक्स मूलर ने धर्म और विज्ञान के अंतर्संबंधों पर भी गहनता से विचार किया था। मैक्स मूलर के नाम से दिल्ली में सिर्फ एक भवन ही नहीं बल्कि एक सड़क भी है। खान मार्केट से जब इंडिया इंटरनेशनल सेंटर होते हुए जब लोदी रोड की तरफ जाते हैं तो वो मार्ग मैक्स मूलर के नाम पर है। दिल्ली में इस तरह अगर देखें तो जी 20 देशों से जुड़े कई अन्य लोगों के नाम पर भी सड़कें और भवनों के नाम रखकर उनको सम्मानित किया गया है। मैक्सिको के पूर्व राष्ट्रपति बेनितो जुआरेज के नाम पर भी दक्षिणी दिल्ली में एक सड़क है जो राव तुला राम मार्ग को धौला कुंआ से जोड़ता है। दो किलोमीटर लंबी इस सड़क पर दिल्ली विश्वविद्यालय का दक्षिणी परिसर है। इस सड़क पर ही कई महाविद्यालय भी हैं। इनके अलावा अमेरिका के आर्किटेक्ट जोसेफ स्टेन के नाम भी एक सड़क है। जोसेफ ने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर को डिजायन किया था। इसके अलावा तुर्किए के नेता मुस्तफा कमाल अतातुर्क के नाम पर भी एक सड़क है। जि 20 के देशों के इन महानुभावों का दिल्ली में वर्षों से सम्मान हो रहा है और अब उन देशों के राष्ट्राध्यक्ष यहां हैं तो उनको ये जानकर प्रसन्नता होगी।


 

Friday, July 23, 2021

इमारत कला के पुरोधा के नाम पर सड़क


दिल्ली के मशहूर लोदी गार्डन जाने के कई रास्ते हैं। एक रास्ता इंडिया इंटरनेशनल सेंटर(आईआईसी) के बगल से भी जाता है। ये एक घुमावदार गलीनुमा रास्ता है जो मैक्स मूलर मार्ग से लोदी गार्डन तक जाता है। लोदी गार्डन तक पहुंचने के पहले इसके दोनों तरफ कई इमारतें हैं। मैक्स मूलर रोड से लोदी गार्डन तक इस सड़क का नाम जोसफ स्टेन लेन है। कई बार इस गली से गुजरा। गलीनुमा सड़क के नाम पर ध्यान जाता था, लगता था कि ये नाम औपनिवेशिक शासनकाल से जुड़ा होगा लेकिन इसकी बिल्कुल अलग कहानी है। जोसफ स्टेन मशहूर अमेरिकी आर्किटेक्ट थे। उन्होंने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर समेत उस इलाके की कई इमारतों को डिजायन किया था, उनमें फोर्ड पाउंडेशन, वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर-इंडिया (डब्लूडब्लूएफ-आई), यूनिसेफ आदि हैं। इस वजह से कई बार उस इलाके को स्टेनाबाद भी कहा जाने लगा था। जोसफ स्टेन जब आईआईसी की इमारत का डिजायन कर रहे थे तब उन्होंने कहा था कि ‘एक ऐसी इमारत बनाने की चुनौती है कि जो जगह से ज्यादा सादगी और सहजता के साथ संबंधों को विकसित कर सके। मार्बल और ग्रेनाइट से बनी फाइव स्टार प्रापर्टी न हो। ये एक ऐसी इमारत हो जहां प्रकृति और इमारत के बीच एक संबंध दिखे।‘ बाग में इमारत उनका कांसैप्ट था। आईआईसी के परिसर में प्रवेश करने पर आप संबंध को महसूस कर सकते हैं। ऐसा नहीं है कि उनकी ये सोच सिर्फ आईआईसी परिसर में दिखाई देती है। अगर आप डब्लूडब्लूएफ-आई की इमारत या उसके आसपास की इमारतों को ध्यान से देखेंगे तो आपको जोसफ स्टेन की कला की छाप साफ तौर पर दिखाई देगी। इन इमारतों में प्रकृति से जुड़ाव की समान कला के दर्शन होते हैं। इस इलाके से थोड़ी दूर पर दिल्ली के मंडी हाउस इलाके में है त्रिवेणी कला संगम। इसका भवन भी जोसफ स्टेन की कला का ही नमूना है। अगर आप ध्यान से देखें तो त्रिवेणी कला संगम के बाहर की तरफ की दीवार और आईआईसी की दीवार में समानता दिखाई देगी। त्रिवेणी कला संगम में जगह कम होने के बावजूद खुली जगह और पेड़-पौधों को उचित स्थान दिया गया है जोसफ स्टेन ने ही इंडिया हैबिटेट सेंटर को भी डिजायन किया था।  

जोसफ स्टेन अमेरिका में जन्मे थे और वहीं से आर्किटेक्ट की पढ़ाई की। 1952 में वो पहली बार भारत आए और कोलकाता (तब कलकत्ता) के बंगाल इंजीनियरिंग कॉलेज के आर्किटेक्चर डिपार्टमेंट के अद्यक्ष बने। 1955 में वो दिल्ली आ गए। स्वाधीनता के बाद के इस दौर में कई विदेशी आर्किटेक्ट भारत आए थे क्योंकि उनको यहां असीम संभावनाएं नजर आ रही थीं। उनमें से ज्यादातर अपना काम करके अपने वतन लौट गए थे। जोसफ स्टेन पचास वर्षों से अधिक समय तक भारत में रहे और कई महत्वपूर्ण काम किए। उन्होंने दुर्गापुर स्टील प्लांट और दुर्गापुर औद्योगिक शहर को बसाने के काम में भी महत्वपूर्ण योगदान किया था। उनके कार्यों को देखते हुए 1992 में उनको पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया था। बाद में वो वापस अमेरिका लौट गए थे जहां 2001 में उनका निधन हो गया। 


Friday, May 7, 2021

कठोर प्रशासक, संवेदनशील लेखक


करीब दो साल पहले की बात है। सर्दी के दिन थे। किसी मित्र ने दोपहर के भोजन के लिए इंडिया इंरनेशनल सेंटर(आईआईसी) आमंत्रित किया था। डायनिंग हॉल में जगह नहीं थी, तो हमलोग लॉन में अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। अचानक सफेद पैंट शर्ट पहने एक बुजुर्ग पास से निकले, मैंने अपने दोस्त से कहा कि ये तो जम्मू कश्मीर के पूर्व गवर्नर जगमोहन लग रहे हैं। उसने पुष्टि की। जगमोहन जी लॉन में टहल रहे थे। थोड़ी देर टहलने के बाद वो धूप में बैठ गए। मैंने थोड़ा साहस जुटाया और उनको परिचय देकर पास रखे खाली कुर्सी पर बैठ गया। उनसे कश्मीर पर बात शुरू की। उनकी एक बात मुझे अब भी याद है। उन्होंने कहा था कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर समाप्त कर दो, समस्या बहुत हद तक खत्म हो जाएगी। थोड़ी देर की बातचीत के बाद वो ये कहते हुए उठ खड़े हुए कि लाइब्रेरी जाने का समय हो गया है। आईआईसी की लाइब्रेरी जाने के लिए बढ़े, फिर थोड़ा रुके और बोले कि अगर समय मिले तो मेरी किताब ‘माई फ्रोजन टरबुलेंस इन कश्मीर’ पढ़ना। तीन मई को तिरानवे साल की उम्र में जगमोहन जी के निधन की खबर सुनते ही ये मुलाकात याद आ गई।   

जगमोहन का जन्म अविभाजित भारत के हफीजाबाद में हुआ था। विभाजन के बाद उनका परिवार पंजाब आ गया। पंजाब से होते हुए जगमोहन दिल्ली पहुंचे थे।  पूरे देश ने उनका नाम इमरजेंसी में तब जाना जब वो दिल्ली विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष थे। उनके उपाध्यक्ष रहते हुए तुर्कमान गेट इलाके की अवैध इमारतों पर बुलडोजर चला था। काफी विरोध हुआ, प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलीं लेकिन जगमोहन ने काम नहीं रुकने दिया था। उस वक्त इस बात की चर्चा थी कि संजय गांधी चाहते थे कि तुर्कमान गेट से जामा मस्जिद साफ-साफ दिखे और उसके बीच कोई बाधा न हो। जगमोहन ने संजय गांधी की इस ख्वाहिश को पूरा किया था। तुर्कमान गेट पर जब इमारतों को ढहाने का काम रोका नहीं गया तो कुछ लोग जगमोहन के पास पहुंचे थे। इलाके के लोगों ने अपने पुनर्वास की बात की और जगमोहन से अनुरोध किया कि उन सबको एक ही जगह रहने की व्यवस्था की जाए। तब जगमोहन ने उनसे दो टूक कहा था कि वो यहां एक दूसरा पाकिस्तान नहीं बसाना चाहते हैं। उमा वासुदेव की उन्नीस सौ सतहत्तर में प्रकाशित पुस्तक ‘टू फेसेस ऑफ इंदिरा गांधी’ में इस प्रसंग का उल्लेख है। 

आज हम दिल्ली के ज्यादातर इलाकों को झुग्गियों से मुक्त देखते हैं तो इसके लिए जगमोहन की दूरदर्शी नीति और उनके कठोर निर्णय के अलावा अपने फैसलों के क्रियान्वयन की इच्छाशक्ति जिम्मेदार है। उन्नीस सौ बयासी में दिल्ली में  एशियाई खेल का आयोजन हो या फिर उसके अगले साल निर्गुट देशों के राष्ट्राध्यक्षों का सम्मेलन, जगमोहन ने अपनी प्रशासनिक क्षमता की छाप छोड़ी। जगमोहन जब राजनीति में उतरे तो नई दिल्ली लोकसभा सीट से सुपरस्टार राजेश खन्ना को मात दी। इस सीट से तीन बार सांसद रहे। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में शहरी विकास मंत्री रहे। उनके निधन ने दिल्ली के बौद्धिक और प्रशासनिक जगत को थोड़ा विपन्न कर दिया है।