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Thursday, June 27, 2019

थ्रिलर के साथ लेखन की शुरुआत


सुप्रीम कोर्ट की मशहूर वकील, नई दिल्ली से दो बार निर्वाचित सांसद और एक क्राइम थ्रिलर, जिसमें प्रधानमंत्री की हत्या की बात हो। पाठकों के बीच उत्सुकता का वातावरण बनाने के लिए काफी है। किरदारों, परिस्थितियों और प्लॉट को लेकर जितनी उत्सकुता किसी क्राइम थ्रिलर में होती है, उतनी ही उत्सकुता नई दिल्ली से भारतीय जनता पार्टी की सांसद और सुप्रीम कोर्ट की वकील मीनाक्षी लेखी के पहले उपन्यास ‘न्यू देल्ही कांसिपिरेसी’ को लेकर है। उत्सुकता इस बात को लेकर भी ज्यादा है कि ये क्राइम थ्रिलर एक पॉलिटिकल क्राइम थ्रिलर है जिसके केंद्र में प्रधानमंत्री की हत्या है। पुस्तक के बारे में प्रकाशक से जितनी जानकारी उपलब्ध हो पाई है उसके मुताबिक दिल्ली की सांसद वेदिका खन्ना के इर्द गिर्द पूरी कहानी चलती है। दिल्ली में एक दिन एक बड़े वैज्ञानिक को गोली मार दी जाती है और वो वैज्ञानिक मौत के पहले सांसद वेदिका को प्रधानमंत्री राघव मोहन की हत्या की योजना के बारे में बता देता है। प्रधानमंत्री की हत्या की योजना को सुनकर वेदिका के होश उड़ जाते हैं क्योंकि जो योजना बेहद संजीदगी से बनाई गई थी। अब उसके दिमाग में इस योजना को नाकाम करने का कीड़ा कुलबुलाने लगा था। उसने प्रधानमंत्री की हत्या की योजना के बारे में दिल्ली की रसूखदार पत्रकार रेया और साइबर विशेषज्ञ कार्तिक से इस बारे में बात की। कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ती है तो हत्या की योजना के सूत्र हांगकांग तक पहुंच जाते हैं। उसके बाद कहानी एक तिब्बती मॉनेस्ट्री तक पहुंचती है। प्रधान मंत्री की हत्या की योजना का केंद्रबिंदु यही तिब्बती मॉनेस्ट्री है। प्रधानमंत्री राघव मोहन की हत्या की योजना को बेनकाब करने के लिए वेदिका हर संभव कोशिश करती है लेकिन ना तो लेखिका ने और ना ही प्रकाशक की तरफ से इस बात की जानकारी दी गई है कि प्रधानमंत्री की हत्या की योजना नाकाम होती है या फिर उनकी हत्या कर दी जाती है। लेखिका ने कहा कि ये जानने के लिए पाठकों को इंतजार करना होगा कि सांसद वेदिका अपने दोस्तों के साथ मिलकर प्रधानमंत्री की हत्या की योजना को नाकाम कर पाती है या नहीं। इस किताब के सह लेखक कृष्ण कुमार हैं।
भारत में क्राइम फिक्शन कम ही लिखे जाते हैं। हिंदी में वेद प्रकाश शर्मा ने ‘वर्दी वाला गुंडा’ लिखा था जो राजीव गांधी की हत्या की साजिश पर केंद्रित था। वेदप्रकाश शर्मा का वो उपन्यास जबरदस्त हिट रहा था। भारतीय प्रकाशन जगत में वेदप्रकाश शर्मा का ये उपन्यास एक घटना की तरह था। एक अनुमान के मुताबिक इसकी लाखों प्रतियां बिकी थीं। हिंदी के लेखक प्रभात रंजन का दावा है कि वेदप्रकाश शर्मा ने उनको एक साक्षात्कार में कहा था वर्दी वाला गुंडा की आठ करोड़ प्रतिया बिकी थीं। हो सकता है कि ये आंकड़ा अतिरंजित हो लेकिन उसकी लोकप्रियता में कोई संदह नहीं है। पिछले साल सीमा गोस्वामी का उपन्यास रेस कोर्स रोड छपकर आया था। पर ये राजनीतिक साजिशों पर था। प्रधानमंत्री की हत्या के बाद की घटनाओं पर केंद्रित था लेकिन इसमें भी ये सवाल बार बार उठता है कि प्रधानमंत्री की हत्या किसने की थी। नई दिल्ली की सांसद मीनाक्षी लेखी के उपन्यास में भी प्रधानमंत्री की हत्या की बात आती है। उत्सकुकता के इस माहौल में ये देखना दिलचस्प होगा कि पाठकों को मीनाक्षी का पहला प्रयास कितना भाता है।  
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अपने क्राइम थ्रिलर न्यू देल्ही कांसिपिरेसी को लेकर नई दिल्ली की सांसद मीनक्षी लेखी इन दिनों काफी चर्चा में हैं। अपने इस क्राइम थ्रिलर के प्लॉट, उसको लिखने की योजना आदि को लेकर उन्होंने मुझसे बात की ।
प्रश्न- आपको क्राइम थ्रिलर लिखने की बात दिमाग में कैसे आई?
मीनाक्षी- जब आप इस कृति को पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि इसमें सिर्फ क्राइम ही नहीं है, उससे आगे जाकर भी कई सारी बातें हैं। आपको मालूम है कि मैं वकील भी हूं और कई सारे क्रमिनिल केस किए हैं। वकालत में कई तरह के क्लू ढूंढने पड़ते हैं, इंवेस्टिगेशन देखने पड़ते हैं। कई व्हाइट कॉलर क्राइम भी होते हैं, उसको भी हमें देखना होता है। ये सब अवचेनन मन में चल ही रहा था। आप जब इस किताब को पढ़ेंगे तो इसमें आपको क्राइम के अलावा इंवेस्टीगेशन और धर्म का एंगल भी मिलेगा।
प्रश्न- आप कब से इसको लिख रही हैं।
मीनाक्षी- देखिए, इसको लिखने की बात तो दिमाग में तीन चार साल पहले आ गई थी। पहले सोचा था कि नॉन फिक्शन लिखूंगी। इस पर काफी दिनों तक मंथन चलता रहा। मित्रों से बातें भी हुई। फिर लगा कि अगर इसको नॉन फिक्शन की तरह लिखा जाएगा तो वो बोरिंग हो जाएगा। ये ऐसा प्लॉट है जिसको मसालेदार बनाने के लिए फिक्शनलाइज करना जरूरी लगा। फिर फिक्शन की तरह लिखा। इसको तो तीन चार महीने पहले ही प्रकाशित हो जाना था लेकिन चुनाव और अन्य व्यस्तताओं की वजह से टल गया था।  
प्रश्न- आपकी इस किताब की जो नायिका है वेदिका वो भी दिल्ली से सांसद है, आप भी नई दिल्ली से सांसद हैं। क्या इस किताब में आपके कुछ व्यक्तिगत अऩुभव भी हैं।
मीनाक्षी- बिल्कुल भी नहीं। मुझे तो एक काल्पनिक चरित्र गढ़ना था, वो मैंने गढ़ा। मेरी इस किताब की जो नायिका है उसमें और मेरे व्यक्तिगत जीवन में किसी तरह की कोई समानता नहीं है। वो एकदम ही कालपनिक है।
प्रश्न- क्या आप पहले से क्राइम फिक्शन पढ़ती रही हैं।
मीनाक्षी- एक उम्र में तो सब लोग क्राइम फिक्शन से लेकर हर तरह की किताबें पढ़ते हैं। पर जैसा कि मैंने आपको बताया कि मैंने वकालत के पेशे में भी इतने तरह के क्राइम केस देखे, उसके विविध पहलुओं पर काम किया, अध्ययन किया उसने भी मुझे इस पुस्तक को लिखने में मदद की।   

Saturday, March 9, 2019

फॉर्मूलाबद्ध लेखन की बेड़ी में साहित्य


आगामी सितंबर में स्कॉटलैंड में इंटरनेशनल क्राइम राइटिंग फेस्टिवल का आयोजन होना है। इस क्राइम राइटिंग फेस्टिवल का नाम ब्लडी स्कॉटलैंड है। इस फेस्टिवल में दुनिया की अलग अलग भाषाओं के अपराध कथा लेखक शामिल होते हैं। इस फेस्टिवल की चर्चा इस वजह से हो रही है क्योंकि पिछले दिनों एक साहित्योत्सव के दौरान संस्कृतिकर्मी मित्र संदीप भूतोडिया ने बातचीत के दौरान बताया कि ब्लडी स्कॉटलैंड इंटरनेशनल क्राइम राइटिंग फेस्टिवल ने तय किया है कि वो हिंदी से भी एक अपराध कथा लेखक को इस फेस्टिवल में निमंत्रित करेंगे। तीन चार साहित्यिक मित्र वहां खड़े थे। इस खबर को सुनने के बाद सबके चेहरे पर खुशी का भाव था क्योंकि उनको लग रह था कि हिंदी लेखकों की पूछ वैश्विक स्तर पर बढ़ रही है। हम सब लोग खुश हो ही रहे थे कि संदीप भूतोड़िया ने हमसे हिंदी के एक क्राइम फिक्शन या अपराध कथा लेखक का नाम पूछा ताकि ब्लडी स्कॉटलैंड फेस्टिवल के आयोजकों को सुझा सकें। वहां खड़े सबके मुंह से निकला सुरेन्द्र मोहन पाठक। फिर पता चला कि पाठक जी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है। पाठक जी के अलावा किसी क कोई नाम सूझ नहीं रहा था। लंबी चर्चा के बाद भी हम सब हिंदी के किसी अपराध कथा लेखक का नाम नहीं सुझा पाए। हिंदी के अपराध कथा लेखक पर बात चल निकली। जितने भी नाम आए लगभग सभी पॉकेट बुक्स के लेखक के आए चाहे वो कर्नल रंजीत हों, वेद प्रकाश शर्मा हों या ओम प्रकाश शर्मा हों। तथाकथित मुख्यधारा के साहित्यकारों में से कोई भी ऐसा नाम नहीं आया जिसको हिंदी में अपराध कथा लेखक के तौर पर स्वीकृति मिली हो। ले देकर एक गोपाल राम गहमरी का नाम याद पड़ता है जिन्होंने अपनी पत्रिका ‘जासूस’ के लिए कई जासूसी उपन्यास लिखे। खूनी की खोज, अद्भुत लाश, बेकसूर की फांसी और गुप्तभेद उनके चर्चित उपन्यास रहे हैं। आजादी के कुछ दिनों पहले ही गोपाल राम गहमरी का निधन हो गया। दरअसल अगर हम देखें तो गहमरी ने हिंदी साहित्य की अन्य विधाओं के अलावा जासूसी उपन्यास लिखे। उन्होंने जमकर अनुवाद भी किए। गहमरी के निधन के बाद उनके कद का तो छोड़ दें, कोई उनसे कमतर जासूसी लेखक भी हिंदी साहित्य को नहीं मिला। अपराध कथा पढ़ने वाले हिंदी के पाठक अपनी पाठकीय क्षुधा मेरठ से छपनेवाले पॉकेट बुक्स से पूरी करते रहे। एक जमाना था जब रेलवे स्टेशन के व्हीलर के स्टॉल पर राजन-इकबाल सीरीज के जासूसी उपन्यासों के लिए किशोरों की लाइन लगा करती थी। नए-नए पाठक राजन-इकबाल सीरीज के नए उपन्यासों की प्रतीक्षा करते थे। उसकी अग्रिम बुकिंग हुआ करती थी।  
अब इस बात की पड़ताल करनी चाहिए कि हिंदी में अपराध कथा लेखक क्यों नहीं हुए या क्यों बहुत कम हुए। हिंदी समेत पूरी दुनिया की अलग अलग भाषाओं में अपराध कथा का विशाल पाठक वर्ग है। अंग्रेजी में तो क्राइम फिक्शन लिखनेवाले लेखकों की एक बेहद समृद्ध परंपरा है। अमेरिकी क्राइम फिक्शन लेखक जेम्स पैटरसन दुनिया के सबसे अमीर लेखकों में से एक हैं। वो जासूसी उपन्यास के साथ साथ, रोमांस और एडल्ट फिक्शन भी लिखते हैं। उनके जासूसी उपन्यासों के लोग दीवाने हैं। लेकिन हिंदी साहित्य में अगर इस विधा पर विचार करें तो एक सन्नाटा नजर आता है। सुरेन्द्र मोहन पाठक को भी हाल के वर्षों में तथाकथित मुख्यधारा के लेखकों के बराबर सम्मान मिलना शुरू हुआ जब उनको हार्पर कॉलिंस जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशन गृह ने छापना शुरू किया। दरअसल हिंदी साहित्य लेखन में एक खास किस्म की वर्ण व्यवस्था दिखाई देती है। इसमें अलग अलग विधाओं में लेखन करनेवाले और अलग अलग प्रकाशकों से छपनेवाले वर्णव्यवस्था के अलग अलग पायदान पर हैं। ये वर्ण व्यवस्था इतनी कठोर या रूढ़ है कि इसके खांचे को तोड़ पाना लगभग नामुमकिन है। इसको समझने के लिए एक उदाहरण ही काफी होगा। हिंदी में प्रेम पर लिखनेवाले दो उपन्यासकार हुए। एक धर्मवीर भारती जिनका लिखा ‘गुनाहों का देवता’ बहुत प्रसिद्ध हुआ। दूसरे हुए गुलशन नंदा जिनके कई उपन्यास बेहद लोकप्रिय हुए, उनके लिखे उपन्यासों पर खूब फिल्में बनीं। प्रेमकथा लिखनेवाले धर्मवीर भारती और गुलशन नंदा में साहित्यिक वर्ण व्यवस्था में धर्मवीर भारती केंद्र में रहे और गुलशन नंदा तमाम लोकप्रियता और फिल्मों में स्वीकार्यता के बावजूद उसकी परिधि के भी बाहर रहे। क्यों? तथाकथित मुख्यधारा के आलोचकों ने कभी गुलशन नंदा की कृतियों को विचार योग्य भी नहीं समझा। क्यों? जब भी गुनाहों का देवता का नया संस्करण छपता उसपर चर्चा होती, उसको और मजबूती प्रदान की जाती। अगर अब भी गुलशन नंदा के किसी एक उपन्यास की प्रतियों की संख्या और गुनाहों के देवता की अबतक बिकी प्रतियों की तुलना की जाए तो बेहद दिलचस्प आंकड़े और नतीजे सामने आ सकते हैं।  
साहित्य की इस वर्ण व्यवस्था को वामपंथी विचारधारा ने बहुत मेहनत से तैयार और मजबूत किया। इस विचारधारा को मानने वाले लेखकों और आलोचकों ने एक ऐसा मजबूत घेरा तैयार किया जिसमें बाहरी विचारधारा के लेखकों को मान्यता ही नहीं दी। गुलशन नंदा, कुशवाहा कांत और इन जैसे अन्य लेखकों का मूल्यांकन क्या उसपर चर्चा ही नहीं की गई । इनको लुगदी लेखक कहकर साहित्यिक वर्णव्यवस्था से बहिष्कृत रखा। यही हाल वर्षों तक फिल्मों और गीत संगीत पर लिखनेवालों का रहा। उनको भी गंभीर लेखक नहीं माना गया। फिल्मों और गीत संगीत को लेकर वामपंथी आलोचकों की राय अच्छी नहीं रही। उनको वो बुर्जुआ के लिए किया गया उपक्रम मानते रहे। नतीजा यह हुआ कि इस विधा पर लिखने वालों का विकास नही हो सका और हिंदी फिल्मों को लेकर जितना अच्छा और अधिक अंग्रेजी में लिखा गया उतना हिंदी में नहीं लिखा जा सका। हिंदी साहित्य जब वामपंथ के जकड़न से मुक्त होने लगी तो फिल्म और संगीत पर लेखन बढ़ने लगा। लेकिन अबतक हिंदी में इन विषयों पर लेखन इतना पीछे रह गया है कि उसको अंग्रेजी के बराबर आने में काफी वक्त लगेगा। अपराध कथा और जासूसी उपन्यासों को लेकर भी यही स्थिति रही। जासूसी उपन्यासों के लेखकों को हिंदी साहित्य में प्रतिष्ठा नहीं मिली लिहाजा इस विधा में हाथ आजमाने वाले कम हुए। साहित्य के वाम विचारधारा काल में यथार्थवादी लेखन या मजदूरों और दबे कुचलों के पक्ष में इतना अधित लेखन हुआ, और उस लेखन को प्रतिष्ठा दिलाने का चक्र चला कि बाकी विधाएं या तो दम तोड़ गईं या फिर उनमें लिखनेवाले कम होते चले गए। इतना ही नहीं जनलेखक और अभिजन लेखक के खांचे में बांटकर भी लेखकों को उठाने और गिराने का खेल खेला गया। जनवादिता, प्रगतिशीलता और क्रांतिकारिता के नाम पर जिस तरह से साहित्यिक यथार्थ गढे गए उसने भी लेखकों को एक फॉर्मूला दिया। उस फॉर्मूले को अपनाकर पुरस्कार और प्रसिद्धि दोनों मिले। लेकिन उसने हिंदी साहित्य का नुकसान किया। उसके विस्तार को बाधित किया। फॉर्मूलाबद्ध लेखन लंबे समय तक चल नहीं सकता है।
जासूसी कथा या अपराध कथा नहीं लिखे जाने की एक औक वजह समझ में आती है वो है कि यह विधा लेखक से बहुत मेहनत की मांग करती है। इसमें पॉर्मूलाबद्ध लेखन नहीं हो सकता है, इसमें पाठकों के लिए हर पंक्ति में आगे क्या की रोचकता बरकरार रखनी होती है। यहां काल्पनि यथार्थ नहीं चलता है। दूसरी बात ये कि अपराध कथा में सूक्षम्ता से स्थितियों का वर्णन करना होता है जिसके लिए कानून और अपराध दोनों का ज्ञान होना आवश्यक है। अन्य विधा में इतनी सूक्ष्मता से वर्णन की अपेक्षा नहीं की जाती है वहां काल्पनिक यथार्थ से भी काम चल जाता है। एक और वजह ये हो सकती है कि हिंदी के प्रकाशकों ने भी लंबे समय तक अपराध कथा को छापने का साहस नहीं किया। लेखकों से अपराध कथा या जासूसी उपन्यास लिखवाने की कोई योजना नहीं बनाई। पिछले दिनों जब कॉलेज की कहानियां बेस्टसेलर होने लगी तो हिंदी के तमाम प्रकाशकों ने एक खास तरह के लेखन को ना केवल स्वीकारा बल्कि उसको बढ़ावा देने के लिए कमर कस कर तैयार हो गए। जासूसी उपन्यासों को लेकर हिंदी के प्रकाशकों में किसी तरह का उत्साह नहीं दिखा क्योंकि अगर उत्साह दिखता तो उसको छापने का प्रयत्न भी सामने आता। प्रकाशकों की उदासीनता ने भी लेखकों को जासूसी कथा लिखने से दूर किया। उपन्यासकार प्रभात रंजन कहते भी हैं कि अगर वो जासूसी उपन्यास लिख भी देगें तो छापेगा कौन। इअगर छपेगा ही नहीं तो लिखने का क्या फायदा। दरअसल अगर हम देखें तो भारतीय प्रकाशन जगत के एक बड़े हिस्से पर भी वामपंथी विचारधारा और रूस के धन का व्यापक प्रभाव लंबे समय तक रहा। उसने भी कायदे से हिंदी में अलग अलग तरह के लेखन का विकास अवरुद्ध किया। मार्क्स और मार्क्सवाद की आड़ में ना केवल पौराणिक लेखन को प्रभावित किया बल्कि अलग अलग विधा को भी पनपने से रोका। जबकि मार्क्स ने तो साफ कहा था कि ‘पुराणों में अतिलौकिक और धार्मिक तत्व ही नहीं होते वो मनुष्य की नैतिक मान्यताओं और यथार्थ के प्रति उसके सौंदर्यात्मक दृष्टिकोण को भी प्रतिबिंबित करते हैं।‘ जरूरत इस बात की है कि इन कारगुजारियों पर हिंदी साहित्य विचार करे।    


Sunday, September 21, 2014

क्राइम फिक्शन की कमी

हिंदी में अगर हम क्राइम फिक्शन की ओर देखें तो एक बड़ा सन्नाटा नजर आता है । सुरेन्द्र मोहन पाठक, वेद प्रकाश शर्मा आदि ने कई क्राइम थ्रिलर लिखे लेकिन मुख्यधारा के हिंदी साहित्य पर नजर डालें तो क्राइम को केंद्र में रखकर बहुत कम रचनाएं लिखी गईं है । पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय में स्पेनिश की प्रोफेसर डॉ मनीषा तनेजा ने जब इस बाबत सवाल पूछा तो मेरे पास कोई जवाब नहीं था । फिर इस दिशा में सोचना शुरू किया । ले देकर सुरेन्द्र मोहन पाठक ही नजर आए। इसके उलट अगर हम अंग्रेजी में देखें तो कई रियल लाइफ स्टोरी को केंद्र में रखकर बेहतरीन क्राइम थ्रिलर लिखे गए । यहां बात सिर्फ उन लेखकों की हो रही है जो भारतीय हैं या फिर जिन्होंने भारतीय पृष्ठभूमि पर केंद्रित अपकराध कथाएं लिखी हैं । पत्रकार एस हसन जैदी की नई किताब- भायखला टू बैंकाक, मुंबई’ज महाराष्ट्रियन माबस्टर्स की नई किताब में उन्होंने मुंबई के हिंदू माफिया डॉन को फिक्शनलाइज किया है । इस उपन्यास में छोटा राजन को देखा जा सकता है जबकि इसके पहले हसन जैदी ने डोंगरी टू दुबई, सिक्स डिकेड्स ऑफ मुंबई माफिया के केंद्र में दाऊद को रखा था । अंग्रेजी उपन्यासों के प्रकाशन के ट्रेंड को अगर देखें तो साफ तौर पर यह दिखाई देता है कि भारतीय अंग्रेजी लेखक क्राइम फिक्शन लिखने की ओर चल पड़े हैं । मीनल बघेल की किताब डेथ इम मुबंई भी खासी चर्चित रही थी । बेहतरीन खोजी पत्रकार जे डे की हत्या के पहले दो हजार दस में उनकी किताब- जीरो डायल, द डेंजरस वर्ल्ड ऑफ इंफॉरमर्स को भी लोगों ने काफी सराहा था । अंग्रेजी में लिखी जा रही अपराध कथाओं में एक और कॉमन सूत्र रेखांकित किया जा सकता है वह यह कि सारे उपन्यास किसी ना किसी रूप में मुंबई से जुड़े हैं । क्राइम लिखनेवालों को मुंबई के अपराध का परिवेश अगर आकर्षित करता है तो उसके पीछे की वजह फिल्मों में अपराधियों को नायकों की तरह पेश करना रहा है और उन फिल्मों का हिट होना भी।

हिंदी के नए लेखकों की रचनाओं पर नजर डालने से यह लगता है कि वो विषयों को लेकर खतरा उठाने को तैयार नहीं हैं । हिंदी के युवा लेखकों का फॉर्मूलाबद्ध लेखन से मुक्त नहीं होना चिंता की बात है । अगर युवा लेखिका है तो वो स्त्री पुरुष के संबंधों पर हाथ आजमाती हैं । अपनी रचना की नायिका को बोल्ड दिखाकर पाठकों को चौंकाने की कोशिश करती है । युवा लेखक हैं तो वो समाज की समस्याओं को अपनी रचना के केंद्र में रखते हैं, घर परिवार, विस्थापन से लेकर मजदूरों पर होनेवाले जुल्म जैसे विषयों पर ही लिखते हैं । नई जमीन तोड़ने की घोषणा के शोर में नए विषय की ओर जाने का जोखिम बहुधा हिंदी के युवा लेखक नहीं उठा पाते हैं । इसके पीछे एक वजह यह भी है कि हिंदी में वरिष्ठ लेखकों और आलोचकों ने ऐसा माहौल बना रखा है जिसमें अपराध कथा लेखक लुगदी साहित्य लेखकों के कोष्ठक में आंकें जाते हैं । इस मानसिकता को तोड़ना होगा । हिंदी साहित्य के विकास और फैलाव के लिए विषयों में विविधता जरूरी है । साहित्य के पाठकों को जबतक अलग-अलग रंग नहीं मिलेंगे, अलग अलग स्वाद नहीं दिखेंगें तो फिर नए पाठक नहीं जुड़ेंगे । कोई भी साहित्य अगर अपने साथ नए पाठकों को जोड़ने का उपक्रम नहीं करती है तो फिर उसका पिछड़ना और कालांतर में सिमट जाना तय माना जाता है ।