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Saturday, December 17, 2016

महान विभूतियों का नमन और स्मरण

वर्ष दो हजार सोलह बीतने को है, साहित्य और संस्कृति को लेकर इस बीतते हुए साल में काफी कोलाहल हुआ । आजादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि किसी और विचारधारा ने स्थापित विचारधारा को चुनौती दी । इसके पीछे राजनीतिक और गैर राजनीतिक कारण हो सकते हैं लेकिन इस बीतते हुए वर्ष में विमर्श के कोलाहल के बीच साहित्य, संस्कृति और कला के दिग्गजों के निधन ने अपनी अपनी विधाओं को विपन्न कर दिया । इस साल के शुरुआत में ही हिंदी के यशस्वी कथाकार और बेहतरीन संपादक रवीन्द्र कालिया का छिहत्तर साल की उम्र में निधन हो गया । रवीन्द्र कालिया बेहतर कथाकार थे या बेहतर संपादक ये तय करना मुश्किल है लेकिन एक बात जिसपर पूरे साहित्य में मतैक्य है वो ये कि वो एक बेहतरीन और बेहद जिंदादिल इंसान थे । हंस के संपादक राजेन्द्र यादव के निधन के बाद बोरियत की हद तक गंभीरता का आवरण ओढे दिल्ली की साहित्यक जमात में कालिया जी ही थे जो अपने विट और ह्यूमर से इसको बहुधा तोड़ते रहते थे । कालिया जी ने शिक्षण से अपने करियर की शुरुआत की फिर वो धर्मयुग में  धर्मवीर भारती की सोहबत में पत्रकारिता के तमाम गुर सीखे थे । मुंबई में रहते हुए कालिया जी ने साहित्य और पत्रकारिता को बेहद नजदीक से देखा जो बाद में उनकी कहानी काला रजिस्टर में सामने भी आया । रवीन्द्र कालिया, धर्मवीर भारती के साथ काम करने के पहले मोहन राकेश की नजर में आ गए थे । माना जाता है कि भाषा का जो अनुशासन रवीन्द्र कालिया में दिखाई देता है वो मोहन राकेश की ही सोहबत का असर था । एक अनुमान के मुताबिक उनकी किताब ‘गालिब छुटी शराब’ धर्मवीर भारती की ‘गुनाहों के देवता’ के बाद हिंदी में सबसे ज्यादा बिकनेवाली किताबों में से है ।  एक बार कालिया जी ने कहा था कि हिंदी साहित्य में कुछ कथाकार एक दूसरे को जलील करने के लिए कहानियां लिख रहे हैं । पात्रों के चयन से ये बात साफ होती भी रही है । आज वो नहीं हैं लेकिन उनकी कही कई बातें आज भी साहित्य में गूंज रही हैं
कालिया जी के निधन से साहित्य जगत उबरा भी नहीं था कि निदा फाजली के निधन ने एक बार फिर से इस दुनिया को हिला दिया । निदा फाजली हिंदी-उर्दू की तरक्कीपसंद अदबी रवायत के प्रतिनिधि शायर थे । मजरूह सुल्तानपुरी के बाद निदा ऐसे शायर थे जिन्होंने शायरी को उर्दू और फारसी की गिरफ्त से आजाद कर आम लोगों तक पहुंचाया । उन्होंने हिंदी-उर्दू की जुबां में शायरी की । कह सकते हैं कि हिन्दुस्तानी उनकी शायरी में बेहतरीन रूप से सामने आई । ताउम्र निदा हिंदी और उर्दू के बीच की खाई को पाटने में लगे भी रहे । वो इस बात के विरोधी थे कि मुशायरों में सिर्फ शायरों को और कवि सम्मेलनों में सिर्फ कवियों को बुलाया जाए । उन्होंने कई मंचों पर गोपाल दास नीरज के साथ साझेदारी में कविताएं पढ़ी थी । उनकी शायरी को देखते हुए ये लगता था कि उन्होंने हिंदू मायथोलॉजी का गहरा अध्ययन किया था । सूरदास और कबीर के पदों से उन्होंने प्रेरणा ली और शायरी की । कबीर की तरह निदा भी कहते हैं - ‘बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीशान, एक खुदा के पास इतना बड़ा मकान’ या फिर ‘घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें , किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए ।‘ उनकी शायरी के ये स्वर अमर हैं । निदा के बाद काल के क्रूर हाथों ने हमसे उर्दू के सबसे बड़े कहानीकारों में एक जोगेन्द्र पॉल को छीन लिया । जोगेन्द्र पॉल पूरे उपमहाद्वीप में उर्दू पाठकों के बीच बेहद लोकप्रिय थे । जोगेन्द्र पॉल का मानना था कि उर्दू भाषा नहीं बल्कि तहजीब है वो अपना रचनात्मक लेखन एक तहजीब में करते हैं । जोगेन्द्र पॉल ने विपुल लेखन किया है और उनके तेरह से अधिक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें खुला, खोदू बाबा का मकबरा और बस्तिआन शामिल हैं । कहानियों के अलावा पॉल ने कई उपन्यास भी लिखे जिनमें से एक बूंद लहू की खासी चर्चित रही है । पॉल की ज्यादातर किताबें हिंदी में भी अनूदित हैं ।
हिंदी और उर्दू के ये महान विभूति एक एक कर जा रहे थे और साहित्य जगत सदमे में था । लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था । हिंदी के मशहूर लेखक मुद्राराक्षस का भी निधन हुआ ।छोटे कदकाठी के मुद्राराक्षस अंत तक अपने सिद्धांतों पर डिगे ही नहीं रहे बल्कि उसको फैलाने के लिए सक्रिय भी रहे । विचारों से मार्क्सवादी-लेनिनवादी मुद्रा जी ने सामजिक आंदोलनों में भी भागीदारी की । लखनऊ के पास बेहटा में जन्मे मुद्राराक्षस ने रंगमंच की दुनिया में भी अपना लोहा मनवाया । उनका लिखा - आला अफसर – बेहतरीन नाटक है ।
बांग्ला की प्रख्यात साहित्यकार महाश्वेता देवी भी इस साल अपनी महायात्रा पर निकल गईं । महाश्वेता देवी लिखती अवश्य बांग्ला में थीं लेकिन वो पूरे देश में समादृत थीं । महाश्वेता देवी के लेखन में समाज के हाशिए के लोगो की आवाज प्रमुखता से दिखाई देती थीं । महाश्वेता देवी के लेखन में एक खास किस्म का यथार्थ दिखाई देता था जो कि गढ़े हुए यथार्थ से अलग होता था । महाश्वेता देवी जितना साहित्य में सक्रिय थी उतनी ही सक्रियता से वो राजनीति के मसलों पर भी अपनी राय रखती थीं । उन्नीस सौ छब्बीस में ढाका में साहित्यक परिवार में पैदा हुई महाश्वेता के पिता मनीष घटक मशहूर कवि थे और चाचा ऋत्विक घटक मशहूर फिल्मकार । महाश्वेता देवी की हजार चौरासी की मां, अरण्येर अधिकार, झांसीर रानी, अग्निगर्भा आदि मशहूर कृतियां थी । महाश्वेता देवी को ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, रोमन मैगसेसे अवॉर्ड समेत कई सम्मान मिल चुके थे । भारत सरकार ने उनको पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया था ।

महाश्वेता के जाने से साहित्य जगत की जो क्षति हुई है उतना ही बड़ा नुकसान सैयद हैदर रजा के निधन से कला क्षेत्र को हुआ है । रजा साहब की चित्रकारी में अद्वैत दर्शन को साफ तौर पर देखा जा सकता था । वो कहते भी थे कि दिव्य शक्तियों के सहयोग के बिना कला संभव नहीं है । विशेषज्ञों का मानना है कि सैयद हैदर रजा रंगों के माध्यम से भारतीय मिथकों के प्रतीकों का अपने चित्रों में इस्तेमाल करते हैं । इसी साल मशहूर तबला वादक और गायक लच्छू महाराज भी हमें छोड़कर चले गए । स्वभाव से ठेठ बनारसी लच्छू महाराज के जाने से भारतीय तबला वादन परंपरा में एक खास किस्म की खामोशी आई है । पंजाबी के मशहूर कथाकार गुरदयाल सिंह भी इस वर्ष हमसे जुदा हो गए । गुरदयाल सिंह का लेखन पचास सालों से ज्यादा के कालखंड में फैला है । उनका उपन्यास मरही दे दीवा पंजाबी साहित्य में बेहद लोकप्रिय है और इस उपन्यास ने ही उनको उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठा दिलाई । इनके उपन्यासों पर फिल्में भी बनी हैं । गुरदयाल सिंह को उनके लेखन के लिए प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला था । मलयालम के मशहूर कवि ओ वी एन कुरुप का निधन भी साहित्य के लिए बड़ा झटका था । साल दो हजार सोलह अब बीतने को हो रहा था लेकिन समय के गर्भ में क्या छुपा था इसका अंदाज तब लगा जब यशस्वी संपादक और लेखक प्रभाकर श्रोत्रिय भी इस दुनिया को छोड़कर चले गए । प्रभाकर श्रोत्रिय नेअपने लेखन से हिंदी साहित्य को तो समृद्ध किया ही उन्होंने अपने संपादन से युवा लेखकों की पहचानन कर उनको संस्कारित भी किया । यह उनका साहित्य का बड़ा योगदान है । उन्होंने वागर्थ, नया ज्ञानोदय और साहित्य अकादमी की पत्रिकाओं का संपादन किया । पूरब के प्रेमचंद कहे जानेवाले विवेकी राय भी इस साल हमसे बिछुड़ गए । विवेकी राय ने पचास से अधिक किताबें लिखीं । उनकी रचनाओं में भारत का गांव अपने समग्र परिवेश के साथ उपस्थित रहता था । इनके ललित निबंध हिंदी साहित्य की थाती हैं और कहा जाता है कि हजारी प्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र और कुबेरनाथ राय की परंपरा तो विवेकी राय ने काफी आगे बढ़ाया । बनारस और गाजीपुर इलाके में अपना जीवन बिकानेवाले विवेकी राय जी के जाने से साहित्य में गांव की मिट्टी की सोंधी खुशबू कम होगी । विवेकी राय के अलावा हाल ही में उपन्यासकार ह्रदयेश का भी निधन हुआ । ह्दयेश हिंदी के उन चंद लेखकों में थे जो खामोशी के साथ बगैर किसी शोर-शराबे के लेखन में जुटे रहते थे । उनके दस के करीब उपन्यास और दर्जनभर कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । इनकी आत्मकथा को भी हिंदी के पाठकों ने खासा पसंद किया था । मशहूर कलाकार और पद्मविभूषण से सम्मानित के जी सुब्रह्मण्य भी इस साल हमसे बिछड़ गए । इस साल पत्रकारिता को भी एक बड़ा झटका लगा जब वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडगांवकर का निधन हो गया । दिलीप उन संपादकों में थे जो इस संस्था की गरिमा और साख बचाने के लिए अंतिम समय तक संघर्षरत रहे । इन तमाम विभूतियों की स्मृति को नमन और श्रद्धांजलि ।  

Sunday, July 31, 2016

महान विभूतियों को प्रणाम

पिछला सप्ताह साहित्य, कला और संगीत के लिहाज से बेहद दुखद रहा । इन तीनों क्षेत्रों की तीन महान विभूतियों के महाप्रयाण से ये क्षेत्र विपन्न हुआ । मशहूर चित्रकार सैयद हैदर रजा, महान लेखिका महाश्वेता देवी और गायक और तबला वादक लच्छू महाराज के निधन ने साहित्य और कलाजगत को झककोर कर रख दिया । महाश्वेता देवी लिखती अवश्य बांग्ला में थीं लेकिन वो पूरे देश में समादृत थीं । महाश्वेता देवी के लेखन में समाज के हाशिए के लोगो की आवाज प्रमुखता से दिखाई देती थीं । महाश्वेता देवी के बारे में एक बात तो दावे के साथ कही जा सकती है कि वो आदिवासियों और दबे कुचले लोगों के जीवन के बीच जीवन गुजारकर जो जीवानानुभव होता था उसको अपने लेखन में समाहित करती थी । नतीजा यह होता था कि महाश्वेता देवी के लेखन में एक खास किस्म का यथार्थ दिखाई देता था जो कि गढ़े हुए यथार्थ से अलग होता था । वो जब बोलती थीं तो उनकी आवाज में ना तो बनावटीपन होता था और ना ही श्रोताओं को खोखला लगता था क्योंकि उन्होंने जो जिया वही लिखा । महाश्वेता देवी नक्सलियों के प्रति झुकाव रखती थीं और मौके बेमौके उनके समर्थन आदि में लेख आदि भी लिखते रहती थीं । मुझे याद है कि उन्नीस सौ सत्तानवे में 27 दिसंबर को महाश्वेता देवी ने सीपीआई एमएल को अपने हाथों से लिखा एक खत दिया था जिसमें उनसे रणबीर सेना द्वारा किए गए एक सामहूक नरसंहार का बदला लेने की बात कही गई थी । उनके उस पत्र के छपने के बाद महाश्वेता देवी पर हिंसा के लिए उकसाने का आरोप भी लगा था लेकिन वो अपने स्टैंड से टस से मस नहीं हुई थी । वो अपनी विचारधारा में सीपीएम के करीब थीं लेकिन जब नंदीग्राम में लोगों पर सीपीएम शासनकाल में अत्याचार हुआ तो वो बंगाल की सीपीएम सरकार के खिलाफ खड़ी हो गई थी। अपने जीवन के अंतिम समय में वो ममता बनर्जी के साथ खड़ी थीं । महाश्वेता देवी जितना साहित्य में सक्रिय थी उतनी ही सक्रियता से वो राजनीति के मसलों पर भी अपनी राय रखती थीं । उन्नीस सौ छब्बीस में ढाका में साहित्यक परिवार में पैदा हुई महाश्वेता के पिता मनीष घटक मशहूर कवि थे और चाचा ऋत्विक घटक मशहूर फिल्मकार । महाश्वेता देवी की हजार चौरासी की मां, अरण्येर अधिकार, झांसीर रानी, अग्निगर्भा आदि मशहूर कृतियां थी । हजार चौरासी की मां पर तो इसी नाम से फिल्म भी बनी और अग्निगर्भा पर रुदाली के नाम से फिल्म का निर्माण हुआ था । महाश्वेता देवी को ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, रोमन मैगसेसे अवॉर्ड समेत कई सम्मान मिल चुके थे । भारत सरकार ने उनको पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया था । मैं दो तीन बार महाश्वेता देवी से मिला था । पहली बार उनसे दो हजार तीन में साहित्य अकादमी के चुनाव के दौरान मुलाकात हुई थी । उस वक्त वो गोपीचंद नारंग के खिलाफ अकादमी के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ रही थीं । उस दौरान मैंने उनके दो इंटरव्यू किए थे । उस वक्त उनपर आरोप लगा था कि वो अशोक वाजपेयी के दबाव में अकादमी का चुनाव लड़ रही थीं । पहले उन्होंने ऐलान किया था कि अगर वो निर्विरोध चुनी जाती हैं तभी अध्यक्ष बनेंगी लेकिन बाद में उन्होंने अपना विचार बदल लिया था । तब पहली बार उन्होंने मुझसे ही बातचीत में इस बात को स्वीकार किया था कि वो लोकतांत्रिक परंपरा का सम्मान करने की वजह से चुनाव मैदान में हैं । हलांकि महाश्वेता देवी वो चुनाव हार गई थीं । उसके बाद भी मैंने उनका एक इंटरव्यू किया था तब उनके दिल में चुनाव हारने की टीस तो थी ही इस बात का भी मलाल था कि हिंदी के कुछ लेखकों ने उनका इस्मेताल कर लिया था । उन्होंने खुलकर तो ये बात नहीं कही थी लेकिन ये अवश्य कहा था कि साहित्य अकादमी के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने की वजह से उन्हें बेवजह के कई आरोपों को झेलने पड़े थे । महाश्वेता के जाने से समाज के वंचितों की आवाज भी कमजोर होगी ।
महाश्वेता के जाने से साहित्य जगत की जो क्षति हुई है उतना ही बड़ा नुकसान सैयद हैदर रजा के निधन से कला क्षेत्र को हुआ है । रजा साहब भारत की चित्रकारी की त्रिमूर्ति- रजा ,सूजा और हुसैन- के आखिरी स्तंभ थे । उनके निधन से विश्व कला की दुनिया का एक कोना सूना हो गया है । रजा साहब की चित्रकारी में अद्वैत दर्शन को साफ तौर पर देखा जा सकता था । वो कहते भी थे कि दिव्य शक्तियों के सहयोग के बिना कला संभव नहीं है । उनकी कला के केंद्र में बिंदू का खास महत्व था और उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा भी था कि बिंदू की अहमियत को समझने में उनको करीब पचास साल लगे थे । रजा साहब का मानना था कि पूरी सृष्टि के केंद्र में बिंदू है । रजा की चित्रकारी में एक क्रमिक विकास दिखाई देता है जब पहले वो पीला और नारंगी रंग का इस्तेमाल करते हैं और कालांतर में उनकी चित्रकारी में काले रंग का प्रवेश दिखाई देता है । विशेषज्ञों का मानना है कि वो रंगों के माध्यम से भारतीय मिथकों के प्रतीकों का अपने चित्रों में इस्तेमाल करते हैं । रजा सहाब के बारे में मित्र चित्रकार मनीष पुष्कले से यदा कदा बातचीत होती रहती थी । हमने उनके साथ स्टूडियो में जाकर बातचीत का एक कार्यक्रम भी बनाया था लेकिन वो योजना परवान नहीं चढ़ सकी । मनीष बताते थे कि रजा साहब युवा चित्रकारों को सोचने के लिए उकसाते थे और हमेशा प्रश्नों के साथ उसका उत्तर ढूंढने के लिए छोड़ देते थे । संभव है ये उनकी युवाओं को सिखाने की अदा हो ।
महाश्वेता और रजा के अलावा इस सप्ताह बनारस के मशहूर तबला वादक और गायक लच्छू महाराज भी हमें छोड़कर चले गए । बनारस घराने के लच्छू महाराज ने आठसाल की उम्र से ही तबला बजाना शुरू कर दिया था । भले ही लच्छू महाराज ने बनारस घराने में ट्रेनिंग ली हो लेकिन वो तबले पर चारो घराने की थाप को उसी सहजता के साथ बजाते थे । लच्छू महाराज प्रचार प्रसार से दूर रहते थे और अपनी शर्तों पर ही संगत करते थे । लच्छू महाराज के तबला वादन की एक विशेषता ये भी थि उनकी थाप में दोहराव देखने को नहीं मिलता था । स्वभाव से ठेठ बनारसी लच्छू महाराज के जाने से भारतीय तबला वादन परंपरा में एक खास किस्म की खामोशी आई है । इन तीन विभूतियों को श्रद्धांजलि ।


Friday, January 27, 2012

'71 के अशोक

बीते सोलह जनवरी को हिंदी के वरिष्ठ कवि, आलोचक, स्तंभकार अशोक वाजपेयी इकहत्तर बरस के हो गए । उनके जन्मदिन के मौके पर इंडिया इंटरनेशलन सेंटर की एनेक्सी में एक बेहद आत्मीय सा समारोह हुआ । उस मौके पर वरिष्ठ आलोचक डॉक्टर पुरुषोत्तम अग्रवाल के संपादन में अशोक वाजपेयी पर एकाग्र एक किताब का विमोचन मशहूर चित्रकार रजा साहब, अशोक जी और उनकी पत्नी रश्मि जी ने किया । डॉ अग्रवाल द्वारा संपादित इस पुस्तक का नाम कोलाज : अशोक वाजपेयी है जिसे राजकमल प्रकाशन, दिल्ली ने छापा है । समारोह के दौरान ही रजा साहब ने यह सवाल उठाया कि किताब का नाम कोलाज क्यों । जिसपर पुरुषोत्तम अग्रवाल ने सफाई देते हुए बताया कि उसमें अशोक वाजपेयी के व्यक्तित्व के विभिन्न रंगों को एक जगह इकट्ठा किया गया है इस वजह से पुस्तक का नाम कोलाज रखा गया है ।इस किताब को देखने का मौका अभी नहीं मिला है लेकिन जैसा कि पुरुषोत्तम अग्रवाल जी ने बताया उससे अंदाज लगा कि उसमें अशोक जी के मित्रों के लेख और उनके कुछ पुराने फोटोग्राफ्स संकलित हैं ।पुरुषोत्तम जी ने इस किताब की तैयारी और उसमें होने वाली देरी के बारे में बताया । कृष्ण बलदेव वैद ने अशोक वाजपेयी को सैकड़ों विशेषणों से बेहद ही रोचक तरीके से नवाजा है जो कि कोलाज में संकलित है ।
पुस्तक विमोचन और पुरुषोत्तम अग्रवाल के संक्षिप्त भाषण के बाद अशोक वाजपेयी से सवाल जवाब हुए । कई शास्त्रीय किस्म के सवाल हुए जिसका अंदाज अशोक जी ने अपने ही अंदाज में दिया । पहला सवाल उनकी पत्नी ने उनसे पूछा कि आपकी कविताओं में परिवार बार-बार आता है तो कविता के परिवार और खुद के परिवार में कोई अंतर नजर आता है । पत्नी के सवालों को वो भी सार्वजनिक तौर पर सामाना करना मुमकिन तो नहीं होता लेकिन वो भी ठहरे अशोक वाजपेयी । क्रिकेट की शब्दावली में कहें तो अशोक वाजपेयी ने अपनी पत्नी के सवाल को स्टेट ड्राइव करने की बजाए हल्के से टर्न देकर फ्लिक कर दिया । उन्होंने कहा कि मुझे ये मानने में कोई संकोच नहीं है कि मुझे परिवार को जितना वक्त देना चाहिए था उतना दे नहीं पाया । यहीं पर उन्होंने ये भी कहकर रश्मि जी को खुश कर दिया कि उनका रश्मि में इस बात को लेकर अगाध विश्वास था कि उनके अंदर एक को परिवार चलाने की क्षमता हैं । रश्मि जी के सवालों से ही उन्होंने उनको खुश करने का एक और मौका ढूंढा और सार्वजनिक तौर पर अपनी पत्नी की तारीफ करके उनको प्रसन्न कर दिया, हलांकि पति के पास कोई विकल्प होता भी नहीं है । एक सवाल के जबाव में उन्होंने यह भी कहा कि वो बहुलतावाद के हिमायती हैं लेकिन अगर उनको चुनना पड़ा तो वो अनिच्छापूर्वक कविता और भारत भवन को चुनेंगे । इस बात पर अफसोस भी जताया कि वो पूर्वग्रह को नहीं चुन पाए । कविता में बेवजह और फैशन में अंग्रेजी के शब्दों के इस्तेमाल पर अशोक जी ने अपनी आपत्ति दर्ज करवाई । उन्होंने कहा कि कविता में अंग्रेजी शब्दों का गैरजरूरी इस्तेमाल उन्हें बौद्धिक लापरवाही लगता है इस तरह के जो शब्द इस्तेमाल होते है उससे कविता में कोई विशेष रस भी पैदा नहीं होता । लेकिन अशोक वाजपेयी ने साथ में यह भी जोड़ दिया कि भाषा का खुलापन बेहद आवश्यक है । कविता में अंग्रेजी के शब्दों के इस्तेमाल पर तो कविवर जानें लेकिन मुझे लगता है कि अंग्रेजी के वो शब्द जो हमारी बोलचाल की भाषा में स्वीकृत होकर हमारी ही भाषा के शब्द जैसे हो गए हैं उनका इस्तेमाल गद्य में तो कम से कम गलत नहीं ही है । जैसे कि अगर हम कहीं चयनित पारदर्शिता की जगह सेलक्टिव ट्रासपेरिंसी लिखें तो प्रभाव भी ज्यादा होता है और ग्राह्यता भी । अशोक जी के बारे में मैं नहीं कह रहा हूं लेकिन हिंदी के कई बड़े लेखक भाषा की शुद्धता को लेकर खासे सतर्क रहते हैं और उन्हें लगता है कि अगर हिंदी में अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल हो जाएगा तो हमारी भाषा भ्रष्ट हो जाएगी । हिंदी के उन शुद्धतावादियों से मेरा आग्रह है कि वो हिंदी को इतनी कमजोर भाषा नहीं समझें कि अंग्रेजी के दो चार शब्दों के इस्तेमाल से वह भ्रष्ट हो जाएगी । मेरा तो मानना है कि किसी भी अन्य भाषा के शब्दों को ग्रहण करनेवाली भाषा समृद्ध होती है । अंग्रेजीवालों को तो किसी भी भाषा के शब्दों को लेने में और उसके उपयोग में कभी कोई दिक्कत नहीं होती । हर वर्ष अंग्रेजी के शब्दकोश में हिंदी के कई शब्दों को शामिल कर उसका धड़ल्ले से उपयोग किया जाता है । अब जंगल, बंदोबस्त आदि अंग्रेजी में भी उपयोग में आते हैं और पश्चिम के कई लेखकों की कृतियों में इस तरह के शब्दों के इस्तेमाल को देखा जा सकता है । किसी भी शब्द को लेकर आग्रह और दुराग्रह ठीक नहीं है हमें तो उस शब्द की स्वीकार्यता और संप्रेषणीयता को देखने और तौलने की जरूरत है ।
हम फिर से वापस लौटते हैं अशोक जी के सवाल जबाव के सत्र की ओर । वहां कई छोटे बड़े सवाल हो रहे थे, शास्त्रीयता कुछ बढ़ रही थी लेकिन आयोजकों ने समय कम रखा था । जनसत्ता के संपादक ओम थानवी ने अशोक जी पर एक सवाल दागा । थानवी जी ने कहा कि अशोक वाजपेयी उनके जानते सबसे ज्यादा प्रेम कविताएं लिखनेवाले कवियों में से एक हैं । सवाल यह था कि इन प्रेम कविताओं के पीछे राज क्या है । लगा कि ओम थानवी की गुगली पर वाजपेयी जी बोल्ड हो जाएंगे लेकिन उन्होंने एक सधे हुए बल्लेबाज की तरह ओम जी की गुगली को पहले ही भांप लिया और सीधे बल्ले से उसको खेल दिया । वाजपेयी जी ने माना कि उनकी हर प्रेम कविता किसी ना किसी को संबोधित हैं । लेकिन यहां एक मंजे हुए खिलाड़ी की तरह यह जोड़ना भी नहीं भूले कि उन्हें यह नहीं पता कि जिनको ये प्रेम कविताएं संबोधित हैं उनतक वो पहुंच पाई या नहीं ।
अशोक वाजपेयी के बोलने के अंदाज में एक चुटीलापन है । वो बेहद कठिन से कठिन सवाल को भी हल्के फुल्के अंदाज में निबटाने की क्षमता रखते हैं । जब उनसे एक व्यक्ति ने पूछा कि वो नए लोगों के लिए क्या किया और उनके साथ क्यों नहीं उठते बैठते हैं तो अशोक जी ने बेहद खिलंदड़े अंदाज में यह कहा कि नई पीढ़ी को उनकी सलाह की जरूरत ही नहीं है वो लोग खुद से बहुत समझदार हैं । लेकिन नई पीढ़ी के लिए अपने किए गए कामों को याद भी दिलाया और वहां मौजूद लोगों को यह याद दिलाया कि पहचान सीरीज के तहत उन्होंने उस दौर के कई कवियों का पहला कविता संग्रह प्रकाशित करने में अहम भूमिका निभाई थी । इस छोटे लेकिन गरिमापूर्ण कार्यक्रम के बाद रजा साहब ने रात्रिभोज का आयोजन किया था । रजा साहब ने इस बात पर खुशी जाहिर की वो इतने लंबे समय तक फ्रांस में रहने के बाद अपने जिंदगी के इस पड़ाव पर मुल्क लौट आए हैं । मेरी इच्छा थी कि रजा साहब से यह पूछूं कि दशकों तक विदेश में रहने के बाद वो कौन सी वजह थी जो उनको भारत खींच लाई । लेकिन रजा साहब के इतने चाहनेवालों ने उनको घेर रखा था कि यह सवाल मेरे मन में ही रह गया । दो साल पहले भी रजा साहब का एक इंटरव्यू किया था लेकिन सनारोह में कई कैमरों के बीच उतना वक्त नहीं मिल पाया था कि तफसील से बात हो सके । ये ख्वाहिश है कि रजा साहब का एक लंबा इंटरव्यू करूं और उनसे पेंटिग्स के अलावा उनकी जिंदगी के कई पहलुओं पर बात करूं । देश की राजनीति से लेकर उनके समकालीन पेंटरों के संस्मऱण को कैमरे में कैद कर सकूं ।